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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

बादशाह आश्चर्यचकित होता था। कभी बुरहानपुर पर मराठों की बीस हजार घुड़सवार सेना आक्रमण कर रही है तो उसी समय सोलापुर के समीप मराठों की सेना हड़कम्प मचा रही है। कभी सम्भाजी खुद जंजीरे के सीने पर पैर रखकर खड़ा हो रहा है। सम्भाजी के बिना भी उसके सहयोगी हंबीरराव, रूपाजी भोसले, मानाजी मोरे जैसे लोग अपनी-अपनी सेनाएँ लेकर एक ही समय में मुगलों के अनेक क्षेत्रों में उपद्रव मचा रहे हैं। इस प्रकार के चौमुखी संघर्ष की कल्पना बादशाह ने कभी नहीं की थी। मराठों के उपद्रव से मुगल क्षेत्र की प्रजा हैरान हो गयी थी। दो दिनो में बादशाह ने विचार-विमर्श के लिए बैठक बुलायी। रात में देर से असद खान के साथ सभी अधिकारी बादशाह के पास जमा हुए। बादशाह ने कल्याण की ओर भेजी गयी सेना की गतिविधियों की जानकारी ली। उसी बैठक में उसने शहजादा आजम और दिलेर खान को आदेश दिया—‘‘जाओ अहमदनगर के बाहर निकलो, घोड नदी को पार करो। मरगट्ठों के क्षेत्र में घुस जाओ। उनके गाँव, खेत सब कुछ बर्बाद करो। सम्भा के क्षेत्र में कुहराम मचा दो।’’ शहजादे आजम और दिलेरखान ने सहमति से गर्दनें हिलाईं। बादशाह की नजर हट्टे कट्टे जुल्फिकार पर पड़ी। उसने ऊँची आवाज में पूछा—‘‘क्या खबर है रामशेज की?’’ ‘‘जहाँपनाह शहाबुद्दीन साहब कोशिश कर रहे हैं। मरगट्ठे किले पर चढ़ने नहीं दे रहे हैं। शहाबुद्दीन साहब जिद पर अड़े हैं। वे वहाँ के बडे-बड़े पेड़ काटकर लकड़ी की एक मीनार बनाने की शुरुआत की हैं। उस ऊँची मीनार पर तोप चढ़ाकर रामशेज को ध्वस्त करेंगे, ऐसा उनका इरादा है।’’ यह समाचार सुनकर बादशाह प्रसन्न हुआ। उसने असदखान को हुक्म दिया—‘‘वजीरे आजम रामशेज और खानदेश के युद्ध पर विशेष ध्यान दो।’’ ‘‘हजरत गुस्ताखी माफ।’’ बीच में असद खान घुटनों के बल बैठते हुए बोला, ‘‘नासिक और खानदेश में जाकर इतनी बड़ी सेना ले जाकर जाया करने की जरूरत ही क्या है? उससे बेहतर तो यह होगा कि हम सम्भा के रायगढ़ पर सह्याद्रि पर्वत पर सीधा हमला करें।’’ अपने वजीर की सलाह सुनकर बादशाह ने आँखें फैलाकर देखा। एक लम्बी साँस लेकर बादशाह ने कहा, ‘‘वजीरे-आजम, आपके इरादे काबिले तारीफ हैं। लेकिन आते-आते ही रायगढ़ और सह्याद्रि पर आक्रमण करके अपने बादशाह को अपने लिए मौत का कुआँ खोदने की सलाह क्यों दे रहे हो? उससे उस शैतान सम्भा का ही फायदा होगा। वह सह्याद्रि सचमुच भूतों का डेरा है। घने पहाड़ों में अफजलखान नाम के इस्लाम के बन्दे को शिवाजी ने बकरे की सम्भाजी .. 407

तरह काटा था। उसी पर्वत का सहारा लेकर हमारी लाखों की सेना में घुसकर मामू साहब साइस्ता खान की उसने उँगलियाँ तोड़ दी थीं। हमें अपमानित करके वह शिवाजी रात में ही भाग गया था। उसी बैताल नगरी में उस शिवा का बच्चा शैतानी खेल खेल सकता है। वर्षा के मौसम में सह्याद्रि पर आक्रमण असम्भव है। हमारी जानकारी के अनुसार वहाँ पर एक बार बरसात शुरू हो जाये तो छोटे-छोटे नाले भी बड़ी-बड़ी नदियाँ बन जाते हैं। वहाँ के नालों को भी दो-दो महीने तक पार करना असम्भव हो जाता है।" "पर जहाँपनाह, सम्भा वहाँ तमिलनाडु में चला गया है—बादशाह को इसकी खबर थी। वह हँसकर बोला—"देखेंगे बन्दर कितना नाचता है? उस चिक्कदेव की कैद से जिन्दा बचकर वापस आएगा तब आगे की सोचेंगे।" "पर जहाँपनाह, शुरुआत में नासिक और बागलण की ओर इतनी बड़ी फौज भेजने का कारण क्या है?" जुल्फिकारखान ने पूछा। आलमगीर दिल खोलकर हँसा। उसने गर्व से वजीर की ओर देखा। जुल्फिकार खान के प्रश्न से बादशाह प्रसन्न था। नक्शे पर उँगली फेरते हुए दोनों की ओर संकेत करके बोला, "यह देखो, यह बुरहानपुर से आने वाली राह खानदेश से नासिक, कल्याण और आगे रायगढ़ की ओर जाती है। अगर कल हमारी बदनसीबी से मराठों की बड़ी सेना शहजादा अकबर के साथ हो जाये और हमारे विद्रोही बेटे में इतनी हिम्मत आ जाये और अकबर तथा सम्भा इसी रास्ते से दिल्ली पर हमला बोल दें तो अनर्थ हो जाएगा। आगरा और दिल्ली में छिपे हमारे दुश्मन भी इसी प्रेत मंडली में जा मिलेंगे। इसलिए हम यहाँ धोखा नहीं खाना चाहते। नासिक से थाने तक के इलाके में इस रास्ते के सारे किलों और सारी चारी चौकियों पर हमारा क़ब्ज़ा होना चाहिए। आठ "रायप्पा, अच्छी तरह सँभालना बाबा। घाव को बढ़ने नहीं देना। अभी और युद्ध लड़ना है।" शम्भुराजा ने कहा। विशाल कावेरी नदी के किनारे एक घने जंगल में मराठों की सेना थी। शम्भुराजा की बाँह पर रायप्पा पट्टी बाँध रहा था। दस दिन पहले लगा घाव अब 408 : सम्भाजी

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किया। आजकल उस पाषाणी किले पर मदुरेकर चोक्कनाथ नायक अपनी मदुरई छोड़कर स्थायी रूप से रह रहा था। वह इस समय का अतिशय दुर्बल और शक्तिहीन राजा था। वैसे मदुरा सम्पन्न नगरी थी, किन्तु उसका कुछ हिस्सा मैसूर के चिक्कदेव राजा ने, कुछ हिस्सा एकोजी राजा ने, कुछ हिस्सा हरजी राजा ने अपने कब्जे में कर लिया था। आजकल चोक्कनाथ नायक चिक्कदेव राजा की कृपा पर दिन काट रहा है। त्रिचनापल्ली नगरी में और ऊपर किले पर मदुरेकर की सेना नाममात्र की थी। वहाँ की सारी फौज चिक्कदेव की थी। पहाड़ी किले पर चिक्कदेव राजा के अनेक कुशल गोलन्दाज थे। उनकी निश्चित संख्या का पता किसी को नहीं था। किन्तु नगर में ऐसी चर्चा होती थी कि वह सेना बहुत शक्तिशाली है। हुक्केरीकर बसप्पा नाइक शम्भूराजा की क्रुद्ध और उद्विग्न मुद्रा को बार-बार देख रहा था। उसने बड़े उत्साह से कहा, "शम्भू महाराज, वाणावर की लड़ाई में हमारी फौज ने भी पराजय स्वीकार की है। इसका यह मतलब नहीं है कि हम डर गये हैं या हार गये हैं। वहाँ हमारे डेढ़ हजार सैनिक शहीद हुए। किन्तु आप चिन्ता न करें। चार-आठ दिनों में हमारी पाँच हजार की सेना आपके चरणों की सेवा में पहुँच जाएगी।" "हुक्केरीकर लड़ाई के लिए आप बहुत उत्सुक दिखाई पड़ रहे हैं।" "क्या करें चाचा साहब?" बसप्पा ने हँसते हुए कहा। "जब तक आपके राजा हैं तभी तक उस उन्मत्त चिक्कदेव को हम ललकार सकते हैं। उनके चले जाने पर चिक्कदेव हमें निगले बिना नहीं रहेगा।" शम्भूराजा ने एकोजी राजा के तंजौर और हरजी राजा की जिंजी से अधिक से अधिक गोला- बारूद मँगवाया। विचार-विमर्श आरम्भ होने के पहले ही शम्भूराजा ने कवि कलश से कहा, "आज ही गोलकुंडा को दूत भेजिए। कुतुबशाह की नयी पाँच हजार सेना दस-पन्द्रह दिन में यहाँ पहुँच जानी चाहिए।" बातचीत समाप्त करते हुए शम्भूराजा ने कहा, "अपने घाव अच्छे होने के पहले शत्रु को घायल करना है।" नौ शम्भूराजा के उठने से पहले वहाँ पहुँचना और उनकी सेवा में खड़ा रहना, रायप्पा का जीवनभर का नियम था। परन्तु उस दिन रायप्पा को ही शम्भूराजा के दूसरे सेवक जगाने के लिए आये। उठने में विलम्ब हो गया, ऐसा सोचकर रायप्पा तुरन्त उठकर 410 :: सम्भाजी

खड़ा हो गया। आँखें मलते हुए बाहर देखा तो सुबह होने को आयी थी। वह वैसे ही शीघ्रता से राजा के पास पहुँचा। शम्भूराजा की आँखें लाल दिख रही थीं। सम्भवतः वे रातभर सोये नहीं थे। उन्होंने रायप्पा को तत्काल आदेश दिया— “रायप्पा अपने सिपाहियों को लेकर आसपास के गाँवों में जाओ। हमें अधिक से अधिक चमारों की आवश्यकता है।” “जी सरकार।” सेना के लोग हड़बड़ा गये। कविराज की समझ में भी कुछ नहीं आया। दक्षिण के आक्रमण के लिए निकलते समय येसूबाई ने स्वयं इस बात की निगरानी की थी कि अपनी सेना के बहादुर जवानों के पास जूते-चप्पल हैं या नहीं? रायगढ़वाड़ी में इसके लिए चर्मोद्योग का एक कारखाना ही था। राजा की आज्ञा के अनुसार आस-पास के गाँवों से अनेक चमार एकत्र हो गये। फिर शम्भूराजा ने भैंस, बैल, हाथी जिसका भी मिले चमड़ा जमा करने का आदेश दिया। चमड़े को अच्छी तरह कमाकर अच्छे जूते बनाने की आज्ञा सभी चर्मकारों को दी गयी। जोत्याजी और कविराज को अलग उत्तरदायित्व सौंपा गया। कावेरी नदी के दोनों किनारों पर जितने भी मछुआरे थे उन्हें सभी छोटी-बड़ी नौकाओं को एक साथ ले आने का आदेश दिया गया। कुछ दिनों के लिए ये सारी नावें किराये पर ले ली गयीं। लगभग एक हजार नौकाएँ उस विशाल नदी में एक कतार में खड़ी हो गयीं। वर्षा का मौसम जैसे समीप आया, शम्भूराजा शीघ्रता करने लगे। उनके भीतर एक जुझारू युद्धवीर अधीर हो रहा था। उस सेनानायक के कन्धे उचकने लगे। हरजी महाड़िक भी राजा का संकल्प पूरा करने के लिए अपना खून-पसीना एक कर रहे थे। एक बार कावेरी में यदि बाढ़ आ गयी तो राजा की सारी योजना भी डूब जाएगी। कम से कम दो महीने तक यह नदी पार नहीं उतरने देगी। कोई साहसी व्यक्ति इसे पार कर भी ले, किन्तु भारी सामान और घोड़ों का उस पार ले जाना असम्भव था। इसी बीच कविराज ने तीन सौ बहादुर सवारों का दल छाँटकर उन्हें तीरंदाजी का अभ्यास कराना आरम्भ किया। वे बाँस और बेंत के बाणों से अभ्यास करते थे। प्रतिदिन सुबह-शाम अभ्यास होता था। किन्तु चिक्कदेव जैसे बाण मराठा फौज के पास नहीं थे। सभी को विश्वास था कि ठीक समय पर शम्भूराजा कहीं न कहीं से सामान उपलब्ध कराएँगे। तंजौर, जिंजी, गोलकुंडा और इक्केरी से नयी सेनाएँ आ गयी थीं। रायगढ़ से आये लोगों और घोड़ों में गुरूर चढ़ रहा था। घोड़े और मनुष्य दोनों ललकारने लगे। सेना में खबर फैली कि आने वाले एक-दो दिन में शम्भूराजा मछली के बड़े शिकार के लिए निकलने वाले हैं। आखिर वह सुबह आयी। कावेरी की धारा में सवेरे-सवेरे हजारों नावें कतार में खड़ी थीं। उनकी काली सम्भाजी :: 411

छाया पानी की सतह पर फैली थी। कुछ मराठे नावों में कूद पड़े। उनमें से अनेक ने घोड़ों की लगाम हाथ में पकड़ रखी थी। ये नाव के सहारे तैरकर दूसरे किनारों पर जाने वाले थे। यहाँ के जंगलों में हाथी बहुत थे। हरजी राजा ने पाँच सौ हाथियों का दल तैयार किया था। उनकी पीठ पर भारी सामान लादा गया। शाम से सुबह तक नदी तट पर बड़ी व्यस्तता और हलचल रही। मशाल की रोशनी में शम्भूराजा की मुद्रा दृढ़ संकल्पी लग रही थी। उन्होंने कावेरी के दूसरे किनारे पर सोई हुई त्रिचनापल्ली नगरी और वहाँ की ऊँची पहाड़ी की ओर देखा। पहाड़ी की वह चोटी उन्हें रायगढ़ की चोटी जैसी लग रही थी। उन्होंने हँसते हुए हरजी राजा की ओर देखा। संकेत मिलते ही नावें पानी को काटते हुए सर-सर आगे बढ़ने लगीं। पतवारें हिलने लगीं, पानी से छपाक, छपाक की आवाज उठने लगी। उथले पानी का अन्दाजा लगाकर महावतों ने हाथियों को पानी में उतारा। वे जल्दी जल्दी आगे बढ़ने लगे। शम्भूराजा की चतुरंगिणी सेना सुबह होते-होते त्रिचनापल्ली से जा टकराई। अचानक हुए इस आक्रमण से अन्दर की सेना डर गयी। 'ऐदिरीऽ, ऐदिरीऽ' 'दुश्मनऽ दुश्मन' 'मराठाऽ मराठाऽ' ऐसी आवाज अन्दर से आने लगी। पर वे लोग जल्दी से उठ गये और तटबन्दी के बुर्ज पर खड़े हो गये। उनके जानलेवा तेज बाण सूंऽ सूंऽ करके छूटने लगे। अब तक पूरी तरह सवेरा हो चुका था। चिक्कदेव की सेना बाणों की वर्षा कर रही थी। किन्तु मराठे और उनकी साथी पीछे नहीं हट रहे थे। बुर्ज के कन्नड़ और तमिल सैनिक अवाक् होकर आगे देखने लगे। नावों की ओर चर्मधारी सेना थी। राजा ने सिपाहियों के लिए मोटे चमड़े के लिबास और सिर के लिए चमड़े के टोप बनवा दिये थे। आने वाले बाण नाकाम हो रहे थे। तेल लगे उन चमड़ों पर से नीचे फिसल रहे थे। चिक्कदेव के आदेश के अनुसार शस्त्रों के उपयोग का कोई लाभ नहीं हो रहा था। नाव पर शम्भूराजा, हरजी महाड़िक और इक्केरीकर मुस्करा रहे थे। चढ़ती धूप के साथ रणचंडी ने उग्र रूप धारण किया। त्रिचनापल्ली की सेना को पीछे खदेड़ने लगी। हाथी और हाथी जितना शक्ति रखने वाले मराठे भीतर घुसने लगे। प्रवेश द्वार के दरवाजे पर हाथियों ने टक्कर मारी। इन टक्करों से दरवाजे टूट गये। मराठा मित्रों की सेना अन्दर प्रवेश कर गयी। हर ओर संघर्ष होने लगा। शाम तक त्रिचनापल्ली शहर जीत लिया गया। विजेता शम्भूराजा को हँसी आयी। उसी शाम शम्भूराजा, हरजी महाड़िक, एकोजी, कलश सभी की पालकियाँ श्रीरंगमाला पहुँच गयीं। उनमें से एक पालकी में शम्भूराजा की बड़ी बहन अंबिका बाई थीं। वह अपने पराक्रमी छोटे भाई की ओर बड़े अभिमान से देख रही थीं। कावेरी और कोलडिम नदी के संगम पर शेष शैया पर लेटे भगवान विष्णु का सभी 412 :: सम्भाजी

ने दर्शन किया। भगवान का अभिषेक किया गया। परन्तु मन्दिर से बाहर आते समय शम्भूराजा की दृष्टि बार-बार सामने के पहाड़ की चोटी से टकरा रही थी। वहाँ के बुर्जों पर खड़े पहरेदार दिखाई पड़ रहे थे। राजा की उदास मुद्रा को देखकर हरजी राजा ने कहा, "शम्भूराजा, इस समय किले पर आक्रमण करना धोखादायक है। वहाँ पर मदुरेकर नायक चोक्कनाथ रहता है।" और कुछ दिनों तक किले के आसपास छोटी मोटी लड़ाइयाँ होती रहीं। किन्तु दोनों सेनाएँ एक दूसरे की शक्ति का सही अन्दाजा लगा रही थीं। किले की तलहटी में सात आठ एकड़ का एक तेपाकुलम नाम का तालाब था। वहाँ कावेरी के पानी में मराठा सैनिक आराम से स्नान करते थे। बीच-बीच में वे किले की ओर ललचायी दृष्टि से देख लिया करते थे। थोड़े दिनों में ऊपर किले में रहने वाले राजा चोक्कनाथ नायक की मृत्यु हो गयी। नायक दीवान शम्भूराजा से मिलने आया। वह अपने राजा चोक्कनाथ के शव को राजधानी मदुरई ले जाने की आज्ञा माँगने लगा। शम्भूराजा ने बड़े उदार मन से उसे अनुमति दे दी। बसप्पा संकेत से शम्भूराजा को बुलाकर एक ओर ले गया। उसने धीरे से कहा, "शम्भूराजा, समय अच्छा है। राजा का शव बाहर ले जाने के लिए सिंहद्वार खुलेगा। इस अवसर को हम हाथ से जाने नहीं देंगे, अपनी सेना अन्दर ले जाएँगे।" शम्भूराजा ने रुष्ट होकर हुक्केरीकर की ओर देखा। उन्होंने कहा, "बसप्पा, हम राजा हैं, कोई चोर डकैत नहीं।" शम्भूराजा बहुत सावधान थे। एकोजी राजा कुछ चिंतित थे। उन्हें मैसूर के राजा का भय सता रहा था। हरजी महाड़िक और कवि कलश के घोड़े रातभर नगर की सीमा पर घूमते रहे। त्रिचनापल्ली जैसी समृद्ध नगरी मराठों के अधिकार में आना चिक्कदेव से सहन नहीं होगा। वह किसी भी क्षण आक्रमण करेगा। ऐसी चर्चा चल रही थी। चार-आठ दिन तक कुछ भी नहीं हुआ। उसके बाद आसमान में काले मेघों ने भविष्य का भय दिखाना आरम्भ कर दिया। एक दिन शम्भू महाराज ने अपने घोड़े को बाहर निकाला और ललकारा— 'हरऽ हरऽ महादेव' 'जय शिवाजीऽऽ' 'जय सम्भाजीऽ' जैसे नारों से आसमान गूँजने लगा। दस हजार की सेना ने उस पाषाणी किले को घेर लिया। किला बहुत बड़ा और खड़ी ऊँचाई उसकी ऊँचाई। सौ गज थी। किनारों पर बहुत मजबूत तटबन्दी थी और उसके बाद पानी से भरी गहरी खन्दक। मराठी और कन्नड़ सैनिक आगे बढ़े। अन्दर की सेना बुर्ज पर आ गयी। वहाँ से उन्होंने बाणों की वर्षा आरम्भ की। मराठा, हैदराबादी और हुक्केरीकर सैनिकों ने चमड़े के लिबास का सहारा लिया। इसलिए बाणों का उनके ऊपर कोई असर नहीं हुआ। सम्भाजी :: 413

दो-तीन दिन तक घनघोर युद्ध होता रहा। मराठे सीढ़ियाँ लगाकर तटबन्दी पर साहसपूर्व चढ़ने का प्रयास करने लगे। हाथी सिंहद्वार को तोड़ने की कोशिश करने लगे। दोनों दलों में बाणों से, भालों से और गोला-बारूद से युद्ध हो रहा था। घोड़े खून में लथपथ होकर जमीन पर गिर रहे थे। तोपों के गोलों से आहत हाथी तांडव करने लगे थे। उनकी चिंग्घाड़ कान के पर्दे फाड़ रही थी। युद्ध भयानक हो उठा था। तीसरी शाम शम्भुराजा ने कवि कलश को आदेश दिया। उनके आदेश के अनुसार कविराज की तीन सौ तीरन्दाजों की सेना सामने खड़ी हो गयी। शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा- "हमारे मैसूरकर मित्र को बाण बहुत पसन्द हैं। उसे वही देंगे।" परन्तु कविराज के सैनिकों के पास बाँस की फट्टियों के बाण थे। इन बाणों से किसी का क्या बिगड़ने वाला था। अनेक लोग कवि कलश और शम्भुराजा की ओर देखकर हँसने लगे। इसी समय मशालची दौड़ते हुए आये। उन्होंने उन बाणों में कपड़े बाँधे। उन्हें तेल में भिगोकर आग लगाना शुरू किया। अब ये अग्निबाण सूँऽ सूँऽ करके ऊपर चढ़ने लगे। इन बाणों के बारूदखाने में गिरते ही भयंकर आग लग गयी। 'धुड़मऽऽ धामऽऽ, धुद्दूमऽऽ धामऽऽ' की आवाज के साथ विस्फोट होने लगे। किले के ऊपर ही शीशमहल धड़ाधड़ जलने लगा। एक बारूदखाना तटबन्दी के समीप ही था। उसमें इतने जोर का धमाका हुआ कि तटबन्दी ढहकर पानी भरी खंदक में जा गिरी। धुआँ, धूल और आग के कारण होहल्ला मच गया। किले के अनेक सैनिक उस आग में जलकर खाक हो गये। दीवार गिर जाने से किले के अन्दर की भाग-दौड़ साफ दिखाई दे रही थी। किले के सरदारों के बच्चे छाती पीट-पीटकर चिल्लाने लगे। 'कापातिंगऽऽ' 'कापातिंगऽऽ' 'बचाइए' 'बचाइए' 'निरतिंगऽऽ' 'निरतिंगऽऽ' 'रुकिएऽऽ रुकिएऽऽ' इस प्रकार करुण चीत्कार करने लगे। शम्भुराजा के संकेत पर अग्निबाण रुक गये। किला पूरी तरह पराजित हो गया। शम्भुराजा प्रसन्न हुए। हरजी और एकोजी ने राजा की पीठ थपथपायी। श्री रंगपट्टनम के उस पहाड़ी किले पर मराठों का भगवा झंडा पहली बार फहराया गया। इस विजय के बाद शम्भुराजा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैसूर, कर्नाटक और तमिल के कुल बाईस किले मराठों के कब्जे में आ गये। एक ओर धर्मपुरी, होसूर का क्षेत्र तो दूसरी ओर नीचे मदुरा से जिंजी बेलूर तक का क्षेत्र मराठों के अधिकार में आ गया था। यह सारा क्षेत्र मराठों के घोड़ों की टापों से प्रतिध्वनित होने लगा। कावेरी में बाढ़ आयी और चली गयी किन्तु वह शिवपुत्र सम्भाजी के पराक्रम के 414 :: सम्भाजी

आड़े न आ सकी। अनेक जगहों से वसूली एकत्र की जा रही थी। एकत्र किये गये द्रव्य की गठरियाँ घोड़ों और बैलों की पीठ पर लादकर रायगढ़ को भेजी जा रही थीं। चिक्कदेवराजा को दुबारा सम्भाजी का सामना करने का साहस नहीं हुआ। तिलुगा, कोडग और मलायला जैसे दाक्खिनी राजाओं ने चिक्कदेव का साथ छोड़ दिया था। वे मराठों के मित्र बन गये थे। शम्भूराजा को वे कर दे रहे थे। मराठों के गुप्तचर चारों ओर घूमते थे। चिक्कदेव ने औरंगजेब को पत्र लिखकर कहा था— 'दक्षिण में आकर सभी को कष्ट देने वाले सम्भा को काबू में करो। हमारी सहायता के लिए शीघ्र आओ।' पर जाने क्यों बादशाह की ओर से उन पत्रों की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। शम्भूराजा ने दशहरे का सोना त्रिचनापल्ली में ही लूटा। उनकी सेना आस- पास से शीघ्रतापूर्वक कर वसूल कर रही थी। दशहरा बीत गया फिर भी शम्भूराजा वापस महाराष्ट्र लौटने का नाम नहीं ले रहे थे। उनकी उपस्थिति से दक्षिण के अमीर उमराव निश्चिन्त हो गये थे। चिक्कदेव को कर देना बन्द कर दिया था। कर न मिलने से चिक्कदेव बौखला गया था। उसकी स्थिति का पता शम्भूराजा को लगा तो उन्होंने अपने गुप्तचरों से चिक्कदेव के पास सन्देश भिजवाया—'हम कर्नाटक और तमिल राज्य पर शासन करें, ऐसी हमारी पिताजी की इच्छा थी। हमारे चाचा एकोजी राजा जैसे चाचा और हरजी राजा जैसे जीजा यहीं पर हैं। हम उस सह्याद्रि के जंगल में वापस क्यों जायें? हम यहीं पर आनन्द से रहेंगे।' इस सन्देश से चिक्कदेवराजा डर गया। उसने बिना शर्त समझौते की बातें शुरू कीं। दीवाली के बाद त्रिचनापल्ली के पहाड़ी किले में सौ खंभों वाले सभागार में समझौता वार्ता निश्चित की गयी। उसके लिए दो करोड़ की पूँजी लेकर चिक्कदेवराजा स्वयं आने वाला था। समझौता वार्ता का दिन आ गया। चिक्कदेवराजा के बदले उसका ग्यारह साल का छोटा बेटा चिक्कदेव के हस्ताक्षर वाले कागजात लेकर आया। वह दो करोड़ के स्थान एक करोड़ की पूँजी लेकर आया था। शेष द्रव्य बाद में देने का वादा किया गया था। अपना राज्य छोड़कर इतने दिनों तक दूर रहना शम्भूराजा को भी ठीक नहीं लग रहा था। अन्ततः समझौता हो गया। अपनी दक्षिण की विजय में यशस्वी होकर शम्भूराजा महाराष्ट्र की ओर जाने के लिए निकले। सेना में इस बात की चर्चा हो रही थी कि चिक्कदेव समझौता वार्ता के लिए क्यों नहीं आया। लोगों ने अनुमान लगाया कि उसे किसी ने बताया होगा कि सम्भाजी उसी शिवाजी के पुत्र हैं जिसने अफजल खान को मिलने के लिए बुलाया था। अफजल खान धोखा खा गया था इसीलिए चिक्कदेव ने ऐन वक्त पर अपना इरादा बदल लिया। सम्भाजी :: 415

त्रिचनापल्ली की सीमा पर आने पर शम्भूराजा ने हरजी राजा को बाँहों में भर लिया। उम्र में छोटे शम्भूराजा को हरजी और अम्बिका दीदी ने असंख्य आशीर्वाद दिये। हरजी ने कहा, "शम्भूराजा, रायगढ़ और हिन्दवी स्वराज्य आपके हाथ में सदा सुरक्षित रहे।" शम्भूराजा ने भावुक होकर कहा, "दुर्भिक्ष के कारण आजकल अपना राज्य जर्जर हो गया है। जीजाजी आप दक्षिण रसद आपूर्ति सँभालें। फिर दस औरंगजेब भी हमारे ऊपर आक्रमण करें तो भी उसकी परवाह कौन करता है?" दस शम्भूराजा कर्नाटक की लड़ाई के बाद वापस आ गये थे। झंडे लगाकर उनका जोरदार स्वागत किया गया। आते आते ही शम्भूराजा ने येसूबाई को धन्यवाद दिया और बोले, "रानी साहब, हरजी राजा को दक्षिण का सूबेदार बनाने की आपकी सलाह बहुत उचित सिद्ध हुई। वरना मुझे तो यही लग रहा था कि हम पुराने कर्मचारी हणमन्त के साथ अन्याय कर रहे हैं। इस संवाद से येसूबाई प्रसन्नता से खिल उठीं। शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में यह भी कहा कि निंबालकर और शिर्के जैसे लोगों से महाड़िक कहीं अच्छे हैं। दो ही दिनों के बाद दुर्गादास राजा से मिलने आये और धीमी आवाज में कहने लगे— "शम्भूराजा शहजादा अकबर की प्रार्थना कुछ अलग है।" "क्या है?" "उनका कहना है कि आप शहजादे के साथ दिल्ली चलें।" "रायगढ़ को छोड़कर ? औरंगजेब जैसा अजगर मुँह खोलकर बैठा है। ऐसी स्थिति में हम कैसे जा सकते हैं?" "वे कहते हैं कि आप कर्नाटक-जिंजी तक इतना बड़ा युद्ध लड़कर कैसे आ गये?" "वह वर्षा का मौसम था दुर्गादास ! मेरे पिता द्वारा जीते गये क्षेत्र में गड़बड़ी चल रही थी। उसे समय रहते ठीक करना आवश्यक था।" "महाराज, शहजादे के साथ कम से कम सेना तो दीजिए।" "दुर्गादास, आपकी समझ में यह क्यों नहीं आता? हमारे हिन्दवी स्वराज्य की, उसकी प्रतिष्ठा की ध्वजा भले ही आकाश में उड़ रही हो। किन्तु हमारा 416 :: सम्भाजी

स्वराज्य बहुत छोटा है। हमारी साधन-सामग्री सीमित है। बड़े महाराज के समय से आज तक हमारी सेना कभी भी सत्तर-पचहत्तर हजार से आगे नहीं गयी। औरंगजेब की सैनिक शक्ति हमसे सात-आठ गुना अधिक है। द्रव्य, साधन सामग्री और हाथी-घोड़ों की संख्या तो बहुत अधिक है। " दुर्गादास ने गर्दन नीचे झुका ली। तब शम्भुराजा ने कहा- "इस तरह नाराज न हों दुर्गादास। एक बार इस महासंग्राम में फँसे हमारे पैर एक बार बाहर निकल जायें तो आपकी ओर ध्यान देना हमारे लिए सम्भव होगा।" दुर्गादास ने उत्तर के हिन्दू राजाओं, जमींदारों, कुछ मुसलमान और राजपूत सरदारों की सूची पढ़कर सुनाई। इस पर कवि कलश, दुर्गादास और शम्भुराजा में वाद-विवाद हुआ। बीच में ही शम्भुराजा ने कहा- "हमारा पुर्तगालियों से अघोषित युद्ध चल रहा है। यदि आवश्यक हुआ तो आपको और शहजादे को गुजरात के रास्ते बाहर निकलना पड़ेगा आप तैयारी रखें।" "हम उत्तर की ओर जाने के लिए कब से व्यग्र हैं।" दुर्गादास ने कहा। "आज की बैठक में शहजादे नहीं पहुँच पाये?" राजा ने पूछा। "महल में आराम कर रहे हैं।" दुर्गादास ने कहा। "महाराज, शहजादे ने आपके लिए सन्देशा भेजा है। उनका कहना है कि उन्हें विचार विमर्श की जगह प्रत्यक्ष कार्य करना पसन्द है। अपने घोड़े तैयार रखें, हम उन्हें दिल्ली ले जाएँगे।" इस सन्देश को सुनकर शम्भुराजा और उनके बाद दुर्गादास भी हँसे। शम्भुराजा ने कहा, "यदि ये शहजादे सचमुच बातों से अधिक कार्य में विश्वास रखने तो कितना अच्छा होता?" कहते-कहते शम्भुराजा मौन हो गये। उन्होंने स्पष्ट किया- "मरे हुए हाथी के चमड़े की भी कीमत होती है। जो भी हो आखिर ये हैं तो शहजादे ही न। यदि हम इन्हें दिल्ली की गद्दी पर बिठाने में सफल हो जायें तो उत्तर के सारे अमलदार शहजादे के प्रेम कारण नहीं औरंगजेब के डर से, कठोर दंड के भय से अकबर के पीछे खड़े हो जाएँगे, विद्रोह करेंगे।" "शम्भू महाराजा, कुछ कीजिए। राजपूताना से हमें अनेक सन्देश आ रहे हैं। औरंगजेब के दानवी जजिया समझौते के कारण मुसलमानों को छोड़कर शेष सभी धर्मों और जातियों के लोग परेशान हैं। बादशाह के विरुद्ध खड़ा होने वाला कोई मसीहा प्रजा को चाहिए।" "दुर्गादास जी, अम्बर के उस राजा राम सिंह जैसे लोग इस अत्याचार के विरोध में आगे क्यों नहीं आते?" दुर्गादास के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। वे उठकर वकीली महल सम्भाजी 41-

में चले गये। बादशाह औरंगजेब को अपनी प्रचंड सेना के साथ दक्षिण में आये चौदह- पन्द्रह महीने बीत चुके थे। उसे अभी भी अपेक्षा के अनुसार कोई सफलता नहीं मिली थी। इसलिए वह बहुत निराश था। इसके विपरीत शम्भूराजा, हंबीरराव, मानाजी, रूपा जी, निलोपन्त आदि ने महाराष्ट्र में मुगल सत्ता को नष्ट करना आरम्भ कर दिया था। शम्भूराजा ने राजा राम सिंह के सम्बन्ध में कविराज से पूछा- "कविराज, इस अम्बर नरेश से आगरा दौरे के समय हमारी भेंट हुई थी। आप भी उसे पहचानते हैं। कैसा लगता है, वह आदमी आपको?" "राज्य के कार्यों की अपेक्षा उन्हें शिकार का अधिक शौक है।" "फिर भी वे मिर्जा राजा के पुत्र हैं। मिर्जा राजा को औरंगजेब ने बुढ़ापे में कष्ट दिया था। राम सिंह का भी बार-बार अपमान किया है। हमारे आह्वान से यदि वे खड़े हो जाएँ तो अच्छा होगा। कविराज, कुछ करना चाहिए।" राजा राम सिंह द्वारा भेजे गये पहले के पत्र को शम्भूराजा ने कविराज से मँगवा लिया। उन्होंने तत्काल कवि कलश को पत्र लिखने के लिए कहा और स्वयं पत्र संस्कृत भाषा में लिखवाने लगे- 'राजाधिराज अम्बर नरेश राजा राम सिंह को सादर प्रणाम। अपने हिन्दवी स्वराज्य में हमने शहजादा अकबर को आश्रय दिया है। इस सम्बन्ध में सन्तोष व्यक्त करने वाला आपका पत्र मिला। आप सभी हिन्दू हैं और सभी को मिलकर सभी के भले के लिए कुछ करना चाहिए। आपका यह विचार हमारे मन को बहुत भला लगा। किन्तु हम औरंगजेब का विरोध न करके उसकी हुकूमत को स्वीकार करें, आपका यह सुझाव एक राजपूत को शोभा नहीं देता। बादशाह का मांडलिक बनने का प्रस्ताव किसी भी स्वाभिमानी मराठा को स्वीकार न होगा। शिवाजी के पुत्र के लिए तो इसका प्रश्न ही नहीं उठता। आपके पुत्र कृष्ण सिंह को औरंगजेब ने किम निर्दयता से मार डाला? यह बताने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु यदि धर्म की रक्षा और विकास के लिए सभी हिन्दुओं को संगठित करने का उद्देश्य है तो आप जैसे अनुभवी लोगों को इस कार्य के लिए आगे बढ़ना चाहिए। उस दुष्ट औरंगजेब को ऐसा लगने लगा है कि हम हिन्दू तत्व शून्य और दुर्बल हैं। हममें अपने देश और धर्म के प्रति कोई अभिमान नहीं है। बादशाह का यह बर्ताव हमें सह्य नहीं है। हम क्षत्रिय हैं। अपनी धार्मिक भावना और संस्कृति का अपमान हमारा क्षात्र तेज सहन नहीं करेगा। आप अनुभव और उम्र में बड़े हैं। हम अभी नये अनुभवहीन हैं। आपके धर्माभिमान और शौर्य की बातें मैंने सुनी हैं। आप सप्तांग-राज्य सम्पन्न हैं। थोड़ा 418 :: सम्भाजी

साहस दिखायें। उस नीच यवन के अहंकार को मिटाने में हमारी सहायता करें। फिर देखें कि हम किस तरह का दिव्य पराक्रम करते हैं। इस संकट के समय में आप जैसा बलशाली और विवेकवान राजा शान्त कैसे बैठ सकता है? हमें इसी का आश्चर्य हो रहा है। हम अकबर और दुर्गादास को गुजरात के रास्ते उत्तर की ओर भेजने की सोच रहे हैं। हमारी धैर्य और साहस की वृत्ति को आप भी प्रोत्साहित करें। वह पठानों का बादशाह ईरान नरेश अब्बास भी अकबर की सहायता अवश्य करेगा। उसने ऐसा वचन दिया है। कल की यदि अकबर को गद्दी मिली तो उसमें सभी को लाभ होगा। हमारे मन्त्री कवि कलश और जनार्दन पंडित तो आपको अलग से पत्र लिखेंगे ही।' ग्यारह बहुत दौड़ धूप के दिन थे। बागलान की ओर मराठा मुगल युद्ध आरम्भ था। साल्हेर के किले को मुगल सेना ने चारों ओर से घेर लिया था। रामशेज विजित नहीं हो रहा था। बलशाली मुगल सेना को चिढ़ाते हुए सीधी गर्दन किये खड़ा था। वीर हंबीरराव अपनी सेना लेकर भीमा के प्रवाह की ओर प्रवेश कर गये थे। वे अपने अचानक आक्रमण से मुगलों को पीड़ित कर रहे थे। येसूबाई फिर से दरबार में आकर कार्य- भार सँभालने लगीं। उनके पुत्र शाहू राजा वहीं बड़े हो रहे थे। दरबार के कामों, कागजात और हिसाब किताब में खोई येसूबाई महारानी को बीच-बीच में अपने राजकुमार का स्मरण हो आता था। वे उन्हें उठाकर सीने से लगा लेती थीं। आसपास चार-पाँच किलों की देखभाल करके शम्भूराजा शाम को ही महल में आ गये थे। किस किले पर किस चीज की कमी है क्या अधिक है आदि बातों की चर्चा हुई। भोजन के समय भी राजा उदास थे। रात को राजा अपने महल में चौक के झूले पर बहुत देर तक बैठे रहे। पिछले महीने फल्टन के बजाजी निंबालकर का निधन हो गया था। अपने मामा के दुखद निधन की छाया तो उन पर थी ही, किन्तु आज वे बहुत उदास दिख रहे थे। “महाराज, तबियत ठीक नहीं है क्या?” येसूबाई ने धीमे स्वर में पूछा। “हमारे बजाजी मामा बहादुर और साहसी मराठा थे, किन्तु उनका सारा जीवन मुगलों की चाकरी में चला गया।” “जाने दीजिए। अब उन पुरानी बातों को याद करने से क्या फायदा? उनके सम्भाजी :: 419

पुत्र महादजी बाबा आपकी सगी बहन सखुबाई के पति हैं। भविष्य में आप पर यदि कोई विपत्ति आयी तो वे शेर की तरह आपके पीछे खड़े रहेंगे।" अब शम्भुराजा के लिए चुप बैठना असम्भव हो गया। वे दाँत पीसते हुए बोले, "शेर की खाल पहनने वाली लोमड़ी जब सामने आती है तो बड़ी बदसूरत लगती है, येसू।" "मतलब?" "खबर बुरी है पर दुर्भाग्य से सही है—हमारे सगे बहनोई साहब महादजी बाबा मुगलों से मिले हुए हैं ऽऽ।" येसूबाई झट से नीचे झूले पर बैठ गयीं। उनके पेट में गोला उठ गया था। शम्भुराजा ने कहा, "पिता के स्थान पर मुगलों ने महादजी को मनसबदार बनाया है। चार हजार जाति और तीन हजार सवारों की अच्छी मनसब दी है। इसके अतिरिक्त उनके चचेरे भाई को खानजहान की सेना में समाविष्ट कर लिया गया है।" "पर ये लोग इतने बेशर्म कैसे हो गये?" "उस महादजी पर उनके अन्य सम्बन्धियों ने दबाव डाला होगा। उन्होंने कहा होगा कि बादशाह की कृपा को अपनी झोली में डाल लो। यह शिवाजी और सम्भाजी का कल का स्वराज्य कितने दिन सुरक्षित रहेगा?" चार-आठ दिन बीते नहीं कि एक दूसरी बुरी खबर राजधानी में पहुँची। महारानी येसूबाई के चचेरे भाई कान्होजी शिर्के जाकर औरंगजेब से मिल गये। यह खबर सुनकर शम्भुराजा को धक्का लगा। उन्होंने पूछा— "येसू, अब आपके सगे भाई गणोजी राव का क्या है?" येसूबाई ने गर्दन नीचे झुका ली। उन्हें भी इस विषैली हवा पर भरोसा नहीं था। तब शम्भुराजा ने पीड़ा भरे स्वर में कहा— "गणोजी राव तो केवल शरीर से स्वराज्य में घूमते हैं, मन से तो वे कब के मुगलों के राज्य में जा पहुँचे हैं।" रात में शम्भुराजा को नींद नहीं आ रही थी। वे बहुत बेचैन थे। छत में लगी झूमर की ओर देखते हुए शम्भुराजा ने कहा— "येसू मुझे कभी-कभी लगता है कि यह भूमि केवल ज्ञानियों, सन्तों और महन्तों की ही नहीं कृतघ्नों, मक्कारों और दलबदलू लोगों की भी हैं यह केवल राज्य की सेवा के लिए अपना सिर कमल चढ़ा देने वालों की ही नहीं, जमीन के छोटे टुकड़े के लिए, अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए अपने ईमान और स्वराज्य में बेच देने वाले पाजियों की भी है।" येसूबाई बहुत दुखी हुईं। राजा ने दर्द भरे स्वर में पूछा— "एक ही समय में हम क्या-क्या करें? मुगलों की पाँच लाख की सेना की 420 : सम्भाजी

महाबाढ़ का सामना करें या शत्रु से जाकर मिलने वाले इन धोखेबाज लोगों को सँभालें? कुछ भी करके इन दगाबाज लोगों को काबू में ले आना होगा।" येसूबाई अपने आँसू नहीं रोक पायीं। राजा की बाँह पर अपना सिर रखकर उन्होंने कहा, "महाराज क्षमा कीजिये। मेरे मायके वालों ने आपको धोखा दिया है।" शम्भूराजा ने येसूबाई का सिर अपने सीने से लगा लिया। उन्हें थपकी देते हुए वे भारी मन से बोले "आप अपने मायके का क्या लेकर बैठी हैं? अब तो अपना ननिहाल फलटन भी हमारा नहीं रहा। वे लोग औरंगजेब के शरणागत होकर प्रसन्न हैं।" सम्भाजी :: 421

मुकुट-हरण एक आज बादशाह अत्यन्त उदास दिख रहा था। पिता के सम्बन्ध का फायदा उठाते हुए अन्त में असदखान ने पूछा— "बादशाह सलामत, आपकी तबीयत ठीक नहीं है क्या?" "अब बिगड़ने के लिए क्या बचा है वजीरे-आजम ? वह काफिर का बच्चा सम्भा समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। हमारे शहजादे अकबर का कुछ पता नहीं। वे जंजीरे के साथ शेर चीते जैसा बर्ताव करते हैं किन्तु भीतर से वे सम्भाजी से डरते हैं। वह बेवकूफ गोवा का वाइसराय मराठों के विरुद्ध खुली लड़ाई का एलान करने के लिए तैयार नहीं होता। रामशेज का वह नटखट किला इतने दिनों के बाद भी हाथ नहीं आ रहा है। हमारी सल्तनत में कोई अच्छी खबर सुनी है आपने?" "लोग कह रहे हैं कि आपके छोटे शहजादे आजम बीजापुर की सीमा से पन्हाला की ओर वापस चले गये हैं। वहाँ पर उन्होंने मराठों के सेनानायक हंबीरराव को संकट में डाल दिया है।" "लोग तो कुछ भी कहते हैं।" असदखान का उपहास करते हुए बादशाह ने कहा, "हमारे चारों शहजादे, बहादुर, वफादार और साहसी हैं, हम भी ऐसा ही मानते थे। लेकिन क्या फायदा ? सब के सब नादान निकले। वजीरे आजम एक-एक किले से इतनी लम्बी टक्कर देनी पड़ी तो हमारी जिन्दगी कम पड़ जाएगी। बादशाह बूढ़ा, शहजादे नादान और पोते बेवकूफ ! हमारे सारे अमीर उमराव गधे। हमें अब आप में से किसी से कोई उम्मीद नहीं रही।" "लेकिन जहाँपनाह...।" "पहले बताइए कि जयपुर के रामसिंह को भेजे सन्देश का क्या हुआ?" 422 :: सम्भाजी

‘‘दो महीने पहले उन्होंने खत में लिखा है—‘हम स्वयं सम्भाजी को पत्र ‘ लिखकर पीछे रहने के लिए कहेंगे। उनसे कहेंगे कि कम से कम अकबर को तो पकड़कर हमारे हवाले करें।‘’ उसी दोपहर में बादशाह के बड़े शहजादे मुअज्जम और असदखान के बीच विचार-विमर्श हुआ। मुअज्जम ने चिढ़कर असदखान से कहा-‘‘वजीर साहब, हमारे अब्बाजान का संशयी स्वभाव और अविश्वास उनकी परेशानी और हमारी बर्बादी का मुख्य कारण है।’’ ‘‘मतलब?’’ ‘‘मैं और आजम दोनों पैंतालीस वर्ष के हो गये हैं पर अब्बाजान को लगता है कि हम अभी अबोध और अनजान बच्चे हैं। उन्हें किसी पर रंचमात्र का भरोसा नहीं है।’’ ‘‘हमारे आजम को उन्होंने रायगढ़ न भेजकर बीजापुर-कोल्हापुर की ओर क्यों भेजा है? पता है?’’ ‘‘क्यों?’’ ‘‘चौदह साल पहले शिवाजी ने सम्भा को हमारे यहाँ मनसबदार के पद पर रखा था। तब आजम और सम्भा की थोड़ी जान-पहचान हुई थी। रायगढ़ जाने से उस दोस्ती को नयी शुरुआत मिलेगी और दोनों मिलकर बादशाह के विरुद्ध बगावत करेंगे। ऐसा उन्हें शक था।’’ कुछ दिन ऐसे ही बीते। एक दिन पन्हाला से आजम का एक हरकारा आया। बादशाह के दरबार में वह समाचार बताने लगा—‘‘खुशखबरी है हजरत! आजम साहब ने बहुत बहादुरी की है उस हंबीर मरगट्ठे को पूरी तरह कुचल डाला। उनके अनेक सैनिकों को मारकर घायल कर दिया। बहुत बहादुरी दिखाई।’’ हरकारा समझता था कि इस खुशखबरी को सुनकर बादशाह अपनी रत्नों की माला उसे पुरस्कार में दे देगा परन्तु बादशाह ने उसकी बातों पर विशेष ध्यान नहीं दिया। फिर दस दिनों के बाद आजम का एक खास दूत पत्र लेकर दरबार में विजयी मुद्रा में उपस्थित हुआ। वजीर ने उस पत्र को स्वयं पढ़कर बादशाह को सुनाया। उसमें लिखा था—‘अब्बाजान दुश्मन के साथ ढाल तलवार से जोरदार मुकाबला किया। हजरत साहब की खुश किस्मती से दुश्मन के आठ सौ सैनिकों को कत्ल किया। सात सौ को जिन्दा पकड़ा है। प्रमुख स्थानों और छतरियों पर क़ब्ज़ा किया। बहुत बड़ी विजय हासिल की।’ बादशाह ने इस ताजी खबर को सुनते हुए एक बीमार पंछी की तरह आधी आँख खोली। फिर से वह कौड़ियों की माला आँखों से लगाकर अल्लाह के चिन्तन में डूब गया। जब नहीं रहा गया तो वजीर ने बादशाह के कान में कहा, ‘‘बादशाह सम्भाजी :: 423

सलामत, हर बार इस प्रकार चुप रहने से कैसे चलेगा?" "फिर क्या करें?" "शहजादे को इनाम पाने की अपेक्षा है।" "हूँ।" एक क्षण चुप रहकर बादशाह ने मुँह खोला-"मुअज्जम बेटे, इस खत को जरा पढ़ो।" मुअज्जम द्वारा खत को पूरा पढ़ते ही, बादशाह ने रूहूल्लाखान को हुक्म दिया-"इसमें किस-किस ने क्या-क्या बहादुरी की? इसका ब्यौरा मुझे दीजिए।" ये आज्ञाएँ देने के बाद भी वह वजीरे-आलम की ओर देखता रहा। तब बादशाह ने खजांची से कहा, "शौकत मियाँऽऽ, शहजादा आजम की बहादुरी के लिए उसे एक लाख का ईनाम देना है। इसलिए खजाने से वह राशि निकालकर रखिए।" चार-पाँच दिनों में पन्हाला से सच्ची खबर आयी। पहले दो आक्रमणों में सेनापति हंबीरराव जानबूझकर पीछे हट गये थे। शहजादा आजम को उन्होंने अधिक से अधिक अपने प्रदेश में आने दिया था। तीसरी बार उसने खुद आक्रमण किया। अपने प्राण बचाने के लिए शहजादा आजम सातारा के रास्ते नीरा नदी के पार भाग गया।" उस पत्र को अपने उत्साही वजीर को पकड़ाते हुए, बादशाह ने कहा, "क्यों वजीरे-आजम? देखा? इसी वजह से शहजादे की बहादुरी पर हमें यकीन नहीं हो रहा था।" "गुस्ताखी माफ जहाँपनाह। आपका आदेश सुनकर मैंने खजाने से राशि निकाली थी, किन्तु उसे आगे नहीं भेजा। यह कितना अच्छा हुआ।" उस रात बड़ा शहजादा मुअज्जम और वजीर असदखान बहुत देर तक बातें करते रहे। बादशाह के आगे असहाय बने वजीर ने कहा, "बेटे मुअज्जम, मैं बादशाह को जीवनभर अपना उस्ताद मानता रहा हूँ। अभी भी उन्हीं से कुछ सीखने की कोशिश कर रहा हूँ। "वह कैसे?" "अब यही देखिए न। छोटे शहजादे ने अपनी बहादुरी का पत्र भेजा। उसे बादशाह ने जानबूझकर आपको पढ़ने के लिए दिया। कारण यह था कि यदि उस तरह का पराक्रम छोटे शहजादे ने सचमुच किया हो तो आप भी उससे कुछ सीखें। रूहूल्लाखान को बारीकी से समझने के लिए कहा जिससे घटित घटना की विश्वसनीयता समझ में आ जाय। तीसरी बात, ईनाम के लिए ईनाम देने के लिए खजाने से एक लाख की राशि निकालने को कहा किन्तु बुद्धिमानी से भेजा नहीं क्योंकि इतनी बड़ी रकम व्यर्थ में नष्ट नहीं होने देनी थी। ऐसा बुद्धिमान पिता 424 . - संभाजी

मिलना मुश्किल है। " उस रात बादशाह को थोड़ा-सा बुखार आ गया था। उदयपुरी बेगम रातभर बादशाह के पास बैठी रहीं। उन्होंने मुअज्जम को भी वहीं रोक रखा था। बादशाह को गहरी नींद आयी।, सवेरे उनका चेहरा प्रसन्न दिख रहा था। अवसर पाकर मुअज्जम ने धीरे से पूछा—"अब्बाजान, आदमी को अपनी औलाद पर तो भरोसा रखना चाहिए। कम-से-कम हर बात को अविश्वास से तो न देखें?" औरंगजेब मुस्कराया। अपनी सफेद दाढ़ी पर हल्के से हाथ फेरकर बोला, "बेटे मुअज्जम जिसे हुकूमत का घोड़ा दौड़ाना है उसे अपनी परछाईं की ओर भी संशय से देखना चाहिए।" दो मुंब्रादेवी का दर्शन करके शम्भुराजा बगल की पहाड़ी की चोटी पर चढ़े। उनके साथ कवि कलश, रूपाजी भोसले एवं अन्य सहयोगी थे। उस पहाड़ी की चोटी से राजा ने बाई ओर देखा। दूर घोड़बन्दर किले की दिशा में थाना गाँव के पास सामने की पहाड़ी से लगी विशाल खाड़ी दिखाई पड़ी। वहीं खाड़ी आगे कल्याण बन्दरगाह तक पहुँच रही थी। दाहिनी ओर नारियल के घने जंगलों में थाना और उसके आसपास के गाँव छुपे थे। वहाँ मछुआरों की बस्ती के आसपास सफेद बालू की चमचमाती पर्त दिखाई पड़ रही थी। वहीं पर अपनी तटबन्दी को पानी में डुबोये थाना का किला एक सुस्त राक्षस की तरह खड़ा था। किले की तटबन्दी पर लम्बी टोपी वाले सैनिकों का पहरा था। शम्भुराजा बीच बीच में कल्याण बन्दर की ओर चिन्तित दृष्टि से देख रहे थे। पिछले साल इसी जंगल से मराठों ने रूहूल्लाखान को भगाया था। दो-तीन महीने बाद औरंगजेब का सेनापति रणमस्तखान कल्याण पर आक्रमण करने आया था। चोले, डोंबिवली अंबरनाथ से दूसरी ओर मुरखाड तक का क्षेत्र उसने जलाकर राख कर दिया था। मराठी क्षेत्र पर दहशत पैदा करके कल्याण के बन्दरगाह पर क़ब्ज़ा कर लिया था। "कविराज कल्याण का बन्दरगाह वैश्विक आयात-निर्यात का केन्द्र है। यहीं सम्भाजी :: 425

से ही इस्ताम्बूल, पेरिस, लंदन से लेकर अफ्रीका, जावां. सुमात्रा तक का व्यापार चलता है। इस सोने की लंका को अधिक दिन के लिए औरंगजेब के अधिकार में छोड़ना, उसकी शक्ति को बढ़ावा देना है।" "राजन, एक और मुद्दा भी बड़े महत्त्व का है।" "कौन-सा?" "औरंगजेब के सरदारों का यहाँ पैर जमाकर बैठ जाना अनुचित और धोखादायक होगा। मराठों का कोंकण से नासिक और बाग़लान की ओर जाने का रास्ता दुश्मनों के क़ब्ज़े में आ जाएगा। एक बार रसद पहुँचाना बन्द हुआ कि खानदेश के अपने बीस-पचीस किले अपने आप पके जामुन की तरह हमेशा के लिए औरंगजेब के मुँह में चले जाएँगे। शम्भूराजा ने गर्दन हिलाकर हामी भरी। पहाड़ी से उतरते-उतरते सूबेदार बिट्ठलराव ने राजा और कविराज को जानकारी दी—"महाराज, अभी हाल में समुद्री क्षेत्र में अरबों के जंगेखान और अँग्रेजो के नौसैनिकों में बड़ी अनबन हुई।" "कैसी अनबन सूबेदार?" "अँग्रेजों के प्रेसिडेंट नामक जहाज पर आक्रमण करने के लिए जंगेखान ने अपनी पाँच जहाजें भेजी थीं। उस जहाज को जला देने की अरबों ने पूरी कोशिश की।" "आगे?" "जहाज बहुत बड़ा था। उसका नुकसान भी बहुत हुआ। किन्तु वह डूबा नहीं। इससे मुम्बई के सारे अँग्रेज विचलित हो गये हैं।" "अरब लोग छूट गये?" राजा ने जानना चाहा। "नहीं, नहीं, जंगेखान के तीन जहाज जला दिये गये। आखिर में वे पीछे हटे। कुछ भी हो निलोपन्त पेशवा से पता चला है कि जंगेखान ने अँग्रेजों को अच्छा सबक सिखाया।" शम्भूराजा और कविराज एक दूसरे की ओर देखकर सन्तोष व्यक्त करते हुए हँसे। शम्भूराजा की दृष्टि नीचे तलहटी की ओर गयी। वहीं पर खाड़ी में घुसी हुई पहाड़ी की सूँड़ पर बसा हुआ पारसिक गाँव था। शम्भूराजा ने हाल ही में वहाँ एक किला बनाना आरम्भ किया था। पास खुदाई का काम चल रहा था। वहाँ सैकड़ों की संख्या में कमाठी मजदूर और कारीगर काम कर रहे थे। हाथियों की पीठ पर और ऊँटगाड़ी में लादकर पत्थर इकट्ठे किये जा रहे थे। इन्हीं पत्थरों से पानी के तट पर बड़े-बड़े बुर्जों का निर्माण हो रहा था। 426 :: सम्भाजी