छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
किया। बादशाह को सारी पुरानी बातें याद आने लगीं। बादशाह बहुत उद्विग्न हो गया। उसकी आँख की आग वजीर को स्पष्ट दिखाई पड़ी। औरंगजेब ने क्रोध से कहा, "वजीरे आजम और कब तक चलेगा यह बीजापुर का घेरा? दक्खिन की इस कठोर और धोखेबाज मिट्टी के साथ कितने दिन बीत गये? इसका हिसाब कीजिए। छः सात साल। मेरी जगह कोई दूसरा बादशाह होता तो केवल युमना के पानी को याद करके पागल हो गया होता।" बादशाह की वह मनोदशा देखकर वजीर चुप हो गया। अन्य सरदार और सेवकों ने सिर नीचे झुका लिया। कुछ दिनों से बादशाह की गर्दन कुछ हिलने लगी थी। अपनी गर्दन को हिलने से रोकने की कोशिश की। वह यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि अभी बूढ़ा नहीं हुआ है या पका नहीं है। उसने कहा, "असदखान बीजापुर की इस जालिम जंग में बड़े शहजादे मुअज्जम को भी शामिल होने का फरमान मैंने भेजा है।" "बड़ा शहजादा वहाँ जाएगा तो छोटे शहजादे को यह बहुत अच्छा नहीं लगेगा। हुजूर इसीलिए कर रहा था" वजीर ने लड़खड़ाते हुए कहा। शहंशाह के चेहरे पर विषादपूर्ण हँसी आयी, फिर भी उसने अपने अन्दर की भड़ास निकालते हुए कहा, "अब किसी का क्या अच्छा लगता है, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, असदखान। इस समय सबसे महत्त्वपूर्ण दक्खिन की इस मिट्टी में फँसी हुई अपनी तकदीर को बाहर निकालना। नहीं तो मेरी कब्र के लिए आपको यहीं कहीं पर जगह ढूँढनी पड़ेगी।" 544 सम्भाजी
खंड-तीन सम्भाजी २५१
546 :: सम्भाजीं
हंबीरगढ़ एक 1686 का जुलाई महीना चल रहा था। बादशाह का डेरा रसूलपुर में खड़ा किया गया था। वहाँ से बीजापुर की दूरी इतनी ही थी कि दूर तक मार करने वाली तोप वार कर सकें। देखते-देखते दिन बीतते गये। बादशाह को बीजापुर आये साठ दिन बीत चुके थे। फिर भी सामने की दीवार गिर नहीं रही थी। बादशाह अपने डेरे के पास खड़े होकर सन्तप्त दृष्टि से बीजापुर की ओर देखता था। तब उसे अनुभव होता था कि गन्धक और तोप के धुएँ में डूबे शहर की ऊँची मीनार उसकी ओर टकटकी लगाए देख रही है। गोल गुम्बद की भव्य इमारत बादशाह के कलेजे में काँटे की तरह चुभती थी। शहर के चारों ओर दो सशक्त तटबन्दियाँ ही बीजापुर की शक्ति थी। किन्तु गोलकुंडा और शम्भू महाराज का पन्हाला, बीजापुर की प्रच्छन्न रक्तवाहिनियाँ थीं। यद्यपि कुतुबशाह ने समझौता कर लिया था कि बादशाह को उस पर विश्वास नहीं था। इसलिए उसने कुतुबशाह को एक चेतावनी भरा पत्र लिखा था, "यदि तुम्हें अपने तख्त को बचाने की चिन्ता है तो बीजापुर के किसी मामले मे दखलन्दाजी करने का व्यर्थ प्रयास नहीं करना।" उसी समय मुगलों की रसद लूटने वाले हंबीरराव मोहिते का मुकाबला करने के लिए बादशाह ने एक विशेष फौज तैयार की थी। वजीर का अनुमान सही निकला। बड़े शहजादे मुअज्जम का बीजापुर आना छोटे शहजादे आजम को अच्छा नहीं लगा। पहले ही दिन "अब यह आया है मंडी लूटने के लिए।" इस आशय से उसने अपने बडे भाई की ओर घूर कर देखा। बड़ा भाई मुअज्जम भी छोटे भाई से उतना ही द्वेष करता था। यदि बीजापुर वाले आत्मसमर्पण करते तो उसका श्रेय आजम को मिलने वाला था। मुअज्जम के लिए यह सम्भव नहीं था। समय के साथ मुअज्जम ने भी अपनी अकल दौड़ानी सम्भाजी 547
शुरू की। स्वयं बादशाह और आजम के लड़ने से बीजापुर पर क़ब्ज़ा नहीं हो पाया। यदि अपनी किसी युक्ति से बीजापुर पर कब्ज़ा हो जाये तो उसका सेहरा मेरे माथे पर ही बँधेगा। मुअज्जम को विश्वास था कि भावी सम्राट वही होगा। उसने शहाकुली जैसे अनेक विश्वस्त सेवक अपनी सहायता के लिए गुप्त रूप से लगा रखे थे। "लेकिन शहजादे, अपने सारे पयत्नों की सूचना बादशाह को दी है या नहीं?" उसके मित्र भयभीत होकर पूछने लगे। "अभी क्यों? सारा काम एकबार हो जाये तो इकट्ठे ही अब्बाजान को सब बताऊँगा।" मुअज्जम ने गुप्त रूप से अपनी योजना आरम्भ की। उसकी सिकन्दरशाह के साथ पहले से जान-पहचान थी। इसलिए उसका विश्वस्त नौकर शहाकुली सामने की दीवार के दरवाजे से बीजापुर में आने-जाने लगा। समझौते की बातचीत भी गुप्त रूप से होने लगी। दुर्दैव से शहाकुली मदिरा का व्यसनी था। उसके ऊपर एक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे जाने के कारण उसका अभिमान और भी बढ़ गया। वह पहले की अपेक्षा अधिक मदिरापान करने लगा। उसका नियन्त्रण छूट गया। एक रात को वह शराब के नशे में चूर बीजापुर के तोपची गोलन्दाजों से चिल्लाकर कहने लगा, "भाई जान इस मोर्चे पर ज्यादा गोलाबारी न करो। यहाँ पर सभी अपने ही यार-दोस्त हैं।" शहाकुली की बातों का जो परिणाम होना था वही हुआ। शहजादा आजम के सेवकों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। रात में ही उसे शाहंशाह के सामने खड़ा किया गया। उसकी पीठ और शरीर के अन्य अंगों को लोहे की तपती सरिया से दागा गया। उसका शराब का नशा पूरी तरह उतर गया। उसने मुअज्जम का नाम लेकर सारी बात उगल दी। बादशाह के मैदानी डेरे में शहाकुली घायल कुत्ते की तरह पड़ा था। वहाँ पर मुअज्जम को बुलाया गया। सारी बात का अन्दाज लेकर बड़ा शहजादा झूठी दलीलें देने लगा। अपने बाप के हाथ-पाँव पकड़कर वह रोते हुए कहने लगा, "जहाँपनाह, यह सब जाहन है, आपकी नजरों से मुझे गिराने का षड्यन्त्र है। मेरी जिन्दगी को बर्बाद करने का यह कुटिल कुचक्र है। इस शराबी व्यक्ति से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं।" बादशाह ने अपने चेहरे पर क्रोध या लोभ को कोई झलक नहीं आने दी। उसने शान्त स्वर में केवल इतना ही कहा, "शहजादे मुअज्जम, कितना भी झटका दिया जाए, किन्तु पाप कुछ मनुष्यों का पीछा नहीं छोड़ता। शहजादे, आज नहीं तो कल तुम्हें इसकी सजा भुगतनी ही होगी।" 548 सम्भाजी
दूसरे दिन मुअज्जम के हाथ से युद्ध सम्बन्धी सारे अधिकार छीन लेने का शाही फरमान जारी किया गया। अब मुअज्जम लकड़ी के लट्ठे की तरह डेरे में ही बैठा रहने लगा। युद्ध का संचालन अपने हाथ में लिये बादशाह को दो महीने बीत चुके थे। दिन भी बहुत बुरे आये थे। 1686 की वर्षा ऋतु का आषाढ़ महीना सूखा चला गया। बादशाह के भिश्ती चारों ओर घूमकर कहीं न कहीं से पखाल में भरकर पानी ढोकर ला रहे थे। मनुष्य और पशु किसी प्रकार जीवन रक्षा कर रहे थे। तटबन्दी के भीतर बीजापुर वालों की स्थिति भी अत्यन्त शोचनीय थी। बीजापुर वालों की शक्ति का पता बादशाह ने लगा लिया था। तटबन्दी के पीछे हैदराबाद और मराठों की ओर से कोल्हापुर तथा अथणी के रास्ते रसद की सहायता आ रही थी। रसद के उन सभी रास्तों को आलमगीर ने पूरी तरह बन्द कर दिया था। अब बिना अन्न-पानी के बीजापुर वालों की दशा बहुत बिगड़ने लगी थी। जानवर पैर पटकते हुए तड़पकर मरने लगे। तबेले खाली होने लगे। इसलिए रात- बेरात रसद को लूटकर ले आने की शक्ति घोड़ों में बची नहीं। अन्न के अभाव में सैनिक घोड़ों और ऊँटों को काटकर खाने लगे। इस प्रकार किसी तरह जान बचाने का प्रयास करने लगे। पान-फूल से सुसज्ज बीजापुर नगरी उजड़ी हुई दिखाई पड़ने लगी। एक दिन सवेरे सामने वाला दरवाजा खुला। वहाँ से हाथ में सफ़ेद निशान लेकर निकलने वाले लोगों को बादशाह ने देखा। वह तीस चालीस लोगों का समूह था। उनके हाथों में कोई शस्त्र नहीं था। वे सैनिक भी नहीं थे। छाती तक लम्बी दाढ़ियाँ, गोल कफनी बाँधे, ढीली लुंगी पहने वे कोई और ही लोग थे। उनका समूह ज्यों-ज्यों समीप आने लगा बादशाह की पारखी नजर ने उन्हें देखा और पहचाना। वे सामने की नगरी के काजी, उलेमा, फकीर जैसे इस्लाम के बन्दे थे। मुख्य न्यायाधीश शेख-उल इस्लाम हरकत में आ गये। बादशाह को शेख की यह बेचैनी बनावटी और अनावश्यक लगी। बादशाह ने उन्हें तुरन्त डेरे में बुलाया। उन्हें तीखी नजर से देखा। शेख साहब बहुत नाराज थे। लगभग हाँफते हुए उन्होंने हाथ हिलाकर कहा, "कुरान के पवित्र आदेशानुसार बीजापुर पर आपका यह आक्रमण गैरकानूनी है।" बादशाह ने शेख उल-इस्लाम को सिर से पैर तक ध्यान से देखा। "ठीक है, जैसा आप कहते हैं वैसा हो भी सकता है। इस सम्बन्ध में हम बाद में विचार करेंगे। परन्तु आज आपकी तबीयत बहुत खराब हो गयी है। जाकर आराम करें। मैं देखता हूँ।" बादशाह ने अपने रक्षकों को इशारा किया। रक्षक उनकी बाँहें पकड़कर सम्भाजी :: 549
लगभग खींचते हुए वहाँ से दूर ले गये। वह सारा दल बादशाह के सामने घुटने टेककर प्रार्थना करने लगा, "बादशाह सलामत ! आप एक पाक मुसलमान हैं। एक जीवित पीर मानकर लोग आपका गौरव करते हैं। कुरान के हुक्म के बिना आपकी पलकें भी नहीं झपकतीं।" "आपको क्या चाहिए ? उतनी ही बात करो, काजी।" बादशाह ने गिने चुने शब्दों में कहा। "शहंशाह, गुस्ताखी माफ, यह युद्ध नापाक है। इतने बड़े दिल्ली के बादशाह, एक छोटे से इस्लामी राज्य और वहाँ की गरीब प्रजा का इतना नुकसान क्यों कर रहे हैं? हजरत हम सब आपके भाई हैं।" "काजी, कौन किसका भाई?" सन्तप्त औरंगजेब की आँखों की पुतलियाँ सुई की नोक की तरह नाचने लगीं। सभी की नजरें नीचे झुक गयीं। "आप सभी इस्लाम के रखवाले दिखाई पड़ते हैं। एक बात बताइए, वह शिवाजी का बदमाश लौंडा, वह काफिर सम्भा तुम्हारा भाईबन्द कब से बन गया?" "लेकिन जहाँपनाह - ?" सभी हड़बड़ा गये। "तुम दक्षिण के सभी लोग जानते हो। पहले कहाँ था मरगठों का हिन्दवी स्वराज्य ? उस जमींदार शिवा ने और उसके मूर्ख लड़के ने, सम्भा ने आदिलशाह के राज्य का कुछ हिस्सा निकालकर, थोड़ा निजामशाही से निकालकर मरगठों की नापाक सल्तनत कायम कर ली।" "हजरत, गनीमों की वह कार्यवाही हमें कभी मंजूर न थी।" उलेमा ने कहा। "ऐसा है तो मराठों की फौज को पिछले दिनों बीजापुर के रास्ते पर गाजे- बाजे के साथ क्यों लेकर गये। उनका बारात की तरह सम्मान क्यों करते हो?" "सिकन्दर आदिलशाह नासमझ है हुजूर। उसे माफ करें।" "यह कैसी नासमझी ? वह सम्भाजी और कुतुबशाह के साथ गुप्त समझौते करता है। हमारे कहने पर भी सर्जाखान को अपनी फौज से निकालने से साफ इंकार करता है। ऐसा बेमुरव्वत जवाब हिन्दुस्तान के बादशाह को देता है। इस सारे बेवकूफी वाले व्यवहार को आप नासमझी कहते हैं ? उधर पन्हाला पर जाइए। अपने बाप उस सम्भा के पैर पर सिर पटकिए।" "लेकिन हजरत फिर भी हमारी एक प्रार्थना है। सारा कुरान शरीफ तो जिल्लेसुभानी की जबान पर है। हम मुल्ला-मौलवियों का अध्ययन भी उतना नहीं है जितना आपका है। आप मेहरबानी करके एक ही सवाल का जवाब दें।" बादशाह ने उनकी ओर प्रश्नसूचक दृष्टि से देखा। "बताइये जहाँपनाह, एक इस्लामी सत्ता को दूसरी इस्लामी शासन व्यवस्था पर हथियार उठाना कुरान शरीफ 550 :: सम्भाजी
के किस नियम के तहत आता है?" "आपका शब्द-शब्द सच्चाई से भरा है। आपकी हुकूमत गिराने का हमारा इरादा भी नहीं है। किन्तु एक काफिर का बच्चा आपके साथ खड़ा है। उसके आपके रिश्ते किस मजहबी आचरण के तहत आते हैं? इसे पहले बताइये। उस काफिर के बच्चे को हमारे सामने लाकर खड़ा कीजिए। दूसरे क्षण ही हम बीजापुर का घेरा उठा लेते हैं।" मुल्ला मौलवी निकलकर चले गये। उसी समय असदखान घबराया हुआ वहाँ आया। उसने अपने हाथ हुकुमनामा बादशाह के सामने कर दिया। बादशाह ने गुर्राते हुए पूछा, "क्या है? पढ़िए—" "हुजूर यह अपने सरकाजी, शेख उल इस्लाम का हुक्म है— उन्होंने उन्होंने " "पढ़िएऽऽ" बादशाह चिल्लाया। "उन्होंने हमारा बीजापुर के विरुद्ध , एक इस्लामी सल्तनत का दूसरी इस्लामी सल्तनत पर किया गया हमला गैर कानूनी और नापाक बताया है।" बादशाह ने वह खत माँग लिया। उसके टुकड़े टुकड़े करके, डेरे के बाहर बँधे घोड़ों के पैरों में फेंक दिया। सरकाजी को गिरफ्तार करके अथणी की ओर ले जाने और किसी अनजान बन्दीखाने में फेंक देने का हुक्म तत्काल जारी किया गया। बादशाह की इच्छानुसार, रायगढ़ की नौकरी छोड़कर आये काजी हैदर को बुलाया गया। बादशाह ने हैदर से पूछा, "काजी मियाँ, सच्चा मजहब क्या होता है?" "राजा की इच्छा। सुल्तान की मर्जी। इसके अलावा इस दुनिया में कोई धर्म हो सकता है, मेरे मालिक?" काजी हैदर की जी हुजूरी बादशाह को बहुत अच्छी लगी। वह देर तक जोर जोर से हँसता रहा। अन्त में काजी की तारीफ करते हुए बादशाह ने कहा, "आप जैसे वफादार इनसान पर हमें नाज होता है। इसी तरह के हकीकतपरस्त इनसान की हर सियासत को जरूरत होती है। शिवा का रायगढ़ हो या शहंशाह ओरंगजेब का दरबार, आप जैसे इनसान हर जगह उपयुक्त होते हैं। एक बार कोई कुशल दर्जी कमीज की माप लेने में कहीं चूक कर सकता है किन्तु बदलती परिस्थिति को ठीक ठीक माप लेने वाला आप जैसा इनसान मिलना खुदा की मेहरबानी है।" उसी दिन लालबाग के दरबार में एक शाही जश्न मनाया गया। उसी में काजी हैदर को सरकाजी पद का लिबास दे दिया गया। सम्भाजी :: 551
दो काजियों का जत्था मिलकर चला गया। अगले तीन महीने तक बीजापुर का घेरा चलता रहा। बादशाह ने बड़ी मेहनत से नगर के किनारे की खाई को भर दिया। वर्षा शुरू हो गयी थी। शहर में अकाल कहर ढाने लगा। तटबन्दी के भीतर रसद समाप्त हो गयी थी। इसके पहले रात-बेरात बीजापुर के घोड़े बाहर झटके से निकलते थे और कहीं न कहीं से रसद ले आते थे। किन्तु अब बादशाह ने घेरे पर कड़ी नजर रखी थी। पहले पन्हाला से कवि कलश और हंबीरराव के घोड़े बीजापुर की मदद के लिए दौड़े आते थे। किन्तु अब कृष्णा नदी में बाढ़ आ जाने के कारण वह सम्भव नहीं था। मिरज-अथणी से कोल्हापुर जाने के रास्ते बन्द हो गये थे। औरंगजेब को अपनी सल्तनत पन्द्रह बीस सूबों में से कहीं न कहीं से रसद मिल सकती थी। किन्तु दक्षिण की तीनों शक्तियों के बुरे दिन आये थे। अन्त में बादशाह ने खाई पार कर अपने घोड़े बीजापुर में भेज दिये। अब तक वह शहर श्मशान बन गया था। 26 सितम्बर 1686 को सोलह वर्षीय सुकुमार सिकन्दर ने आत्मसमर्पण कर दिया। आदिलशाह के कैद होते ही बीजापुर में शोक की लहर फैल गयी। घोर विषाद के वातावरण में भी कुछ हिम्मतबाज अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। आदिलशाह के आत्मसमर्पण के समय बादशाह की आँख सर्जाखान पर लगी हुई थी। डूबते जहाज को छोड़कर मोटे चूहे ने उछाल मारकर दूसरी ओर शरण ले ली थी। सर्जाखान मुगलों का बड़ा मनसबदार बन गया था। औरंगजेब का महत्त्वाकांक्षी मन बीजापुर में रुका नहीं। वह अपनी फौज लेकर पुनः गोलकुंडा की ओर चला आया। वहाँ का किला, वहाँ की तटबन्दी और खाई बहुत मजबूत थे। द्रव्य से उनके तलघर भरे पड़े थे। तानाशाह अब भी शरणागत नहीं हो रहा था। बादशाह ने उसे गद्दार घोषित किया और गोलकुंडा पर घेरा डाल दिया। गोलकुंडा के घेरे के समय बादशाह को धूप, वर्षा और ठंडी हवाओं का सामना करना पड़ रहा था। अड़सठ वर्ष के इस बूढ़े के लिए एक हल्का झूलता सिंहासन बनाया गया था। कहार उसे कन्धे पर रखकर देर सबेर घुमाते थे। शाहंशाह अपनी फौज को आदेश देता था। एक बार तोप का गोला लगने से उसके अंगरक्षक का हाथ टूट गया। औरंगजेब से सिर्फ चार हाथ की दूरी से मौत आकर चली गयी थी। 552 . सम्भाजी
शहंशाह ने मुकर्रबखान जैसे हैदराबादी सरदार को फोड़ लिया। अबदुल्ला फन्नी नाम के एक अधिकारी ने सवेरे तीन बजे किले का द्वार खोल दिया। कपटनीति और दगाबाजी की जीत हुई। 29 सितम्बर 1687 को गोलकुंडा पराजित हुआ। वहाँ बादशाह को सात करोड़ रुपये का खजाना मिला। सालाना तीन करोड़ आय का प्रदेश मिला। केवल पचास हजार रुपये की तनख्वाह पर सिकन्दर आदिलशाह और कुतुबशाह को देवगिरि के किले के बन्दीखाने में भेज दिया गया। जिस समय हैदराबाद जीतकर बादशाह बीजापुर की ओर लौट रहा था, उस समय विजय की प्रसन्नता के साथ उसका एक विशिष्ट विषाद से भरा हुआ था। कुछ महीने पहले हैदराबाद के घेरे के समय एक घटना घट चुकी थी। इसके पहले शहजादा मुअज्जम के पास शम्भू महाराज के पत्र पकड़े गये थे। किन्तु उस रात को शहजादा आजम के द्वेष के अथवा किसी अन्य कारण से या महत्त्वाकांक्षा की ललक में मुअज्जम ने एक दुस्साहसी कदम उठाया। अपने बाप से बगावत करके उसी रात वह कुतुबशाह से मिलकर लड़ाई की घोषणा करने वाला था। उसे केवल इस बात का डर था कि उसके जाने के बाद उसका बाप उसके बीवी, बच्चों की दुर्गति करके हत्या कर देगा। इसलिए उसने रात में ही अपने बीवी बच्चों को लालबारी से लड़ाई के मैदान में आगे ले गया। वहाँ से छलाँग लगाना सरल था। मुअज्जम के इन कारनामों से बादशाह को बगावत का शक हुआ। उसने तुरन्त सेना भेजकर शहजादे मुअज्जम और उसके बीवी, बच्चों को हमेशा के लिए गिरफ्तार कर लिया। वृद्ध बादशाह का काफिला आगे निकल रहा था। उसकी दृष्टि पश्चिम की ओर न जाकर बार-बार सह्याद्रि की ओर घूम रही थी। पिछले सात वर्षों से उसे सम्भाजी मिल नहीं पा रहे थे। अविजित रामशेज और हैवतीगढ़ आज भी अबाधित थे। जो कुछ पाया उसकी अपेक्षा जो खोया उसका बादशाह को बड़ा दुख था। बादशाह का स्वाभिमानी मन बहुत सन्तप्त हो रहा था। प्रवास के समय ही असदखान बादशाह के समीप आकर कहने लगा, "बादशाह सलामत, कुछ राहत देने वाली खबर है।" "कौन-सी?" "अपना प्रिय शहजादा अकबर ईरान चला गया। सम्भा ने उसकी मदद की। राजापुर के बन्दरगाह में उन्होंने एक निजी जहाज तैयार किया। अन्ततः वह चला गया।" "कहाँ, ईरान को?" "जी मेरे मालिक।" सम्भाजी :: 553
बादशाह एक विषंड हँसी हँसा। कभी आसमान की ओर तो कभी धरती की ओर देखते हुए उसने कहा, "किसकी किस्मत और किसकी बदकिस्मत किस जंगल या किस पहाड़ में लिखी है? इसे तो खुदा ही जाने।" तीन एक दिन हंबीरराव ने महाराज से महज ही कहा, "शम्भू महाराज, स्वराज्य की स्थिति बिगड़ती जा रही है। जागीरों की लालच में अच्छे-अच्छे लोगों का दिमाग बदलता जा रहा है। इसको रोका भी जाये तो कैसे?" "मामा साहब, समय ही बहुत कठिन आ गया है।" "परन्तु महाराज, जैसा आपने कहा, इस कठिन समय को निभाना पड़ेगा। इसके लिए जैसे वह औरंगजेब जागीरें बाँट रहा है, वैसे हम भी नकली कागजातों पर कुछ लोगों को जागीरें दे दें।" "ऐसा कैसे हो सकता है, हंबीरमामा ?" हंबीरराव के सुझाव पर शम्भू महाराज अत्यन्त गम्भीर होकर बोले, "जागीरों को बाँटना पिताजी के द्वारा दिए गये आदेशों के विरुद्ध है। पिताजी कहते थे देवताओं को भी जागीर मत दो। उन्हें भ्रष्ट न करो।" शम्भू महाराज ने विनोद में आगे कहा, "मामा साहब आपको जागीर की आशा कब से लगी ?" विनोद के भाव को न समझने के कारण यह सीधा सा विनोदी प्रश्न हंबीरराव के कलेजे में तीर की तरह चुभ गया। कुछ क्षणों के लिए उन्हें कुछ समझ में नहीं आया। फिर भी उन्होंने हँसते हुए कहा, "शम्भू महाराज, आपने अपने मामा को क्या समझा है ?" वह विनोद का प्रसंग वहीं पर समाप्त हो गया। किन्तु हंबीरराव के भीतर शम्भू महाराज का प्रश्न चुभता रहा। उनका चेहरा अपमान के बोध से फीका पड़ गया। मानहानि के बोध से उनका कलेजा टूटने लगा। उन्होंने कहा, "शम्भू महाराज इस हंबीरराव को जागीर की जरूरत ही क्या है ? यदि मुझे सत्ता या राजपद की भूख होती तो अपने सगे भांजे राजाराम को रायगढ़ के सिंहासन पर बिठाकर आधे राज्य का मालिक बन गया होता। राजाराम को राजा बनाने के लिए हमारे बुजुर्ग 554 सम्भाजी
अधिकारी बेताब हो रहे थे। मुझे तो उसमें कोई कठिनाई नहीं थी। ' ' ' 'हंबीरमामा! कृपया इस बात को इतनी गम्भीरता से न लें मैंने तो विनोद में कहा था।' ' शम्भू महाराज ने उन्हें मनाने के स्वर में कहा। शम्भू महाराज मनाने की पूरी कोशिश कर रहे थे किन्तु सेनापति हंबीरमामा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। उन्होंने कहा, ' 'हमारी वफादारी की परीक्षा लेने औरंगजेब के दूत भी आये थे। हमने उनकी दाढ़ी मूँछें मुड़वाकर उन्हें भगा दिया। फिर भी आपने आज हमारी ऐसी परीक्षा ली।' ' हंबीरराव का स्वाभिमानी मन विनोद में किये गये आरोप को सह नहीं पा रहा था। वे आवेश में ही वहाँ से उठकर चले गये। इस प्रसंग से येसूबाई भी आश्चर्यचकित रह गयीं। शम्भू महाराज के लिए अब वहाँ रुक पाना सम्भव नहीं हो रहा था। वह भी उठकर अपने कक्ष में चले गये। इस छोटे से वाद विवाद से रायगढ़ का रंग ही बदल गया। अपने कक्ष में उदास बैठे शम्भू महाराज के पास येसूबाई गयीं। उन्होंने शान्त स्वर में बड़ी सावधानी से कहा, ' 'जो भी हुआ अच्छा नहीं है। राजा और सेनापति के बीच अनबन से सल्तनत का विनाश हो जाता है। इस घटना की भनक औरंगजेब को लगने की देर है। आप दोनों में दरार पैदा करने के लिए वह जी जान से कोशिश करेगा।' ' ' 'आखिर मैंने ऐसा क्या कह दिया था, युवराज्ञी?' ' ' 'महाराज, हंबीरमामा ने जो कुछ कहा वह भी गलत नहीं था।' ' येसूबाई ने बड़े विवेक से कहा, ' 'चलिए उठिए उन्हें सम्मान के साथ पुनः बुलाकर ले आयें। आप उम्र में छोटे हैं। उनकी मान मर्यादा की रक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।' ' ' 'हम तो बच्चे हैं। हम क्यों जाएँ उनके पास? वे बड़े हैं इसलिए उन्हें ही हमें मनाने आना चाहिए।' ' इस घटना से उत्पन्न सन्ताप के कारण महाराज ने रात को भोजन में कुछ भी ग्रहण नहीं किया। बिस्तर में आधी रात तक तड़पते रहे। दूसरे दिन देव पूजन भी नहीं कर सके। विगत अनेक वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था। दोपहर को महारानी के आग्रह के कारण किसी प्रकार आधा प्याला दूध लिया। दूसरी रात महारानी येसूबाई बेचैन हो गयीं। किले पर शीतल हवा चल रही थी। इस छोटी सी घटना को लोगों ने बहुत बड़े झगड़े के रूप में प्रचारित कर दिया था। यह सब कुछ न सह पाने के कारण महारानी जाकर महाराज के सामने खड़ी हो गयीं। वे अपने भीतर का रोष छुपा न सकीं। उन्होंने कहा, ' 'बस, अब बहुत हो चुका। महाराज! आपको पता है? पिछले दो दिनों में मामा ने अन्न का एक दाना सम्भाजी :: 555
ग्रहण नहीं किया है।" शम्भू महाराज झट से उठकर खड़े हो गये। उनका गला भर आया। उन्होंने कहा, "क्या कह रही हो येसू? आपने दोपहर को ही मुझे यह क्यों नहीं बताया? हमारे हंबीरमामा को आप क्या समझती हैं। पिछले पाँच छह वर्षों में पिताजी के पुण्य की छाया और हंबीरमामा का साथ के अतिरिक्त क्या किसी और ने हमारा साथ दिया है?" शम्भू महाराज ने अपने वस्त्र ठीक किये, सेवकों ने जो रत्नाभूषण सामने किये उन्हें पहन लिये। शम्भू महाराज और महारानी दोनों हंबीरमामा के घर जाने के लिए दरवाजे से बाहर निकले। महाराज ने मशाल की रोशनी में देखा तो बाहर मन्द पवन का सेवन करते हंबीरमामा स्वयं खड़े थे। वे स्वयं महाराज से मिलने आये थे। महाराज कुछ पूछें उससे पहले सत्तर वर्ष की आयु पूरा कर चुके, मजबूत कदकाठी वाले हंबीरमामा ने बड़ी व्यग्रता के साथ कहा, "शम्भू बेटे, आपने यह क्या चला रखा है? पिछले दो दिनों से आपने कुछ भोजन ही नहीं लिया।" "मेरी बात जाने दीजिए। परन्तु मामा आपने उपवास क्यों रखा है?" "हम तो पीले पत्ते हैं। हमारी इतनी चिन्ता क्यों करते हैं? आपको तो हिन्दवी स्वराज्य का भविष्य गढ़ना है। हम तो आज हैं, कल हों न हों।" आगे बढ़ते हुए महाराज बोले, "हंबीरमामा, ऐसी अशुभ बात मुँह से न निकालें। आपके न होने की कल्पना मात्र से हमें ऐसा लगता है जैसे हमारे ऊपर पहाड़ टूट पड़ा हो।" बाहर शीतल हवा चल रही थी। राजमहल के बन्द वातावरण में जाने का किसी का मन नहीं हो रहा था। मामा-भांजे साथ-साथ पश्चिम की ओर चलते रहे। कुछ दूरी पर कातीव छोर था और दूसरी ओर हिरकणी बुर्ज। वहीं पर एक समतल पत्थर पर दोनों बैठ गये। पास ही एक पत्थर पर बैठकर येसूबाई दोनों के मनोमिलाप को बड़े कुतूहल से देख रही थीं। आधी रात के समय स्वयं महाराज के बुर्ज पर आने से पहरेदारों में हलचल मच गयी थी। वहीं पर राजमहल से भोजन मँगवाया गया। महाराज और सेनापति ने वहीं पर भोजन किया। चर्चा के दौरान कई बातें निकलीं। हंबीरमामा ने कहा, "हमारे सगे भांजे और जवाई राजाराम को राजा बनाने के लिए राज कर्मचारी हठ कर रहे थे, इसका पता है शम्भू महाराज?" महाराज ने सिर्फ मामा की ओर देखा। "महाराज, उन संकट के दिनों में मैंने आपको शिवाजी के पुत्र के नाते नमन नहीं किया था बल्कि यह मानकर कि आप हमारे शिवाजी के स्वप्नों के सच्चे उत्तराधिकारी हैं इसलिए आपके सामने हमारी गर्दन झुकी थी।" "आपके उन उपकारों को यह हिन्दवी स्वराज्य कभी भी भूल नहीं पाएगा, 556 :: सम्भाजी
हंबीरमामा। किन्तु मुझसे यदि कोई भूल हुई है तो क्षमा करें मामाजी।'' "क्षमा की क्या बात कर रहे हैं शम्भू महाराज? हंबीरराव नाम की इस तलवार को शिवाजी महाराज ने फौलाद की दहकती भट्टी में निर्मित किया है, उसे सजाया सँवारा है। किन्तु चारों ओर उसने रणकौशल दिखाया तो आपके समय में।'' "सच है मामासाहब, कहाँ ब्रह्माणपुर, कहाँ मुर्तजापुर, अकोला, नान्देड़, सोलापुर से अथणी-बीजापुर, कोंकण का घाट हर एक रास्ता। दक्खिन की भूमि पर ऐसी कोई नदी या नाला नहीं होगा जहाँ हंबीरराव मोहिते के घोड़े ने पानी न पिया हो। पर हंबीरमामा आजकल आपको कुछ थकान महसूस होती है क्या?'' "मतलब?'' "मतलब, यदि स्वास्थ्य न ठीक हो तो आप कुछ आराम करें और हमारा मार्गदर्शन करते हुए अपना आशीर्वाद दें।'' रायगढ़ के पश्चिमी छोर की छाती पर पाँव रखते हुए हवा का एक तेज झोंका आया। हंबीरमामा ठठाकर हँसते हुए बोले, "अम्बा भवानी का सेवक जैसे हाथ में मशाल लेकर रात रातभर नाचते हुए जागरण करता है, उसी प्रकार शिवाजी का सेवक यह हंबीरराव युद्धभूमि में तोपों की ताल पर घोड़े नचाने का कार्य करता है।'' "मामासाहब इस सम्भाजी को भी औरंगजेब की तोपों या ढाल, तलवारों से जरा भी भय नहीं लगता। हमें केवल एक बात का भय लगता है—'' "—महाराज?'' "हाँ हंबीरमामा, कभी कभी लगता है कि यह देश सन्तों, महन्तों और बुद्धिमानों का न होकर, बाल बच्चों के नाम जागीरों के कागज-पत्र बनवाने के लिए आतुर जागीरदारों का हो गया है।'' "सच है महाराज, दुनिया में मनुष्य की कोख से बच्चे ही पैदा होते हैं। किन्तु अपने महाराष्ट्र की तरह अपने बाले बच्चों और उत्तराधिकारियों से ऐसा अन्धा प्रेम करने वाले लोग दुनिया में कहीं खोजने पर भी नहीं मिलेंगे।'' शम्भू महाराज ने भारी मन से पूछा "तो मामासाहब क्या किया जाय? निर्णय ले लिया जाय?'' "कौन सा?'' "स्वराज्य के टुकड़े टुकड़े करके सभी जागीरदारों में खैरात बाँट देने का?'' "नहीं, बिलकुल नहीं।'' हंबीरराव ने दृढ़ता से कहा, "शम्भू बेटे! उस औरंगजेब को हमारे कुछ मूर्खों को खुशी खुशी खैरात बाँटने दो किन्तु इस हंबीर और शम्भुराजा की ओर से शिवाजी महाराज के विचारों की हत्या नहीं की जाएगी।'' इस मूक संवाद में सारी रात कैसे बीत गयी पता ही नहीं चला। सम्भाजी 557
चार दुर्गादास राजपूताना के लिए प्रस्थान कर रहे थे। वे महाराज से मिलने के लिए आये। भाव भरे हृदय से दुर्गादास ने शम्भू महाराज से कहा, "शम्भू महाराज, आपने हमारे लिए बहुत किया। आपने जितना किया उसके लिए हम कितना भी धन्यवाद दें, कम ही होगा।" "दुर्गादास, हम भी और अधिक क्या कर सकते हैं? शहजादे का स्वभाव ऐशोआराम का था। किसी भी प्रकार की जागरूकता नहीं थी। थोड़ी भी हिम्मत की होती तो किसी न किसी रास्ते से हम शहजादा अकबर को दिल्ली-आगरा की ओर भेज दिए होते। उसके उधर जाने से बादशाह के दुश्मन अपने आप अकबर के झंडे के नीचे आ जाते। परन्तु क्या किया जाय? वह तो स्वभाव से ही डरपोक। दस-दस बीस-बीस हजार लोगों के सहायक होने पर क्या लाभ हो पाया?" "जाने दें महाराज! आप भी क्या कर सकते हैं? घोड़े की नयी नाल बँधवाने का कार्य लोहार के पास दिया जा सकता है, किन्तु आदमी की रीढ़ की हड्डी बनाने का काम किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। हमारा सात वर्षों का कष्ट, सारा संघर्ष व्यर्थ हो गया।" दुर्गादास ने दुखी स्वर में कहा। "दुर्गादास, एक बात कहूँ?" "आज्ञा हो महाराज।" "अम्बर के राजा रामसिंह ने औरंगजेब के राजाओं के संगठन बनाने के हमारे आवाहन को प्रतिसाद नहीं दिया। फिर भी मैंने हार नहीं मानी। किन्तु मुझे लगता है कि आपके जैसा देशाभिमानी, धर्माभिमानी व्यक्ति हमारे पास रहे। आप किसलिए राजपूताना जा रहे हैं? आप यहीं रहिये। जिस प्रकार कविराज भूषण के रहने से रायगढ़ की शोभा में वृद्धि हुई थी, उसी प्रकार आप जैसे भले व्यक्ति के साथ होने से हमारा विश्वास दृढ़ होगा।" "क्षमा करें महाराज! महाराज जसवन्तसिंह को मरने से पहले मैंने एक वचन दिया था। मैंने कहा था कि अजितसिंह को पाल पोसकर मैं बड़ा करूँगा। उसके अनुसार जोधपुर जाकर वहाँ की राजगद्दी की सेवा करना मेरा कर्तव्य है, महाराज।" 558 :: सम्भाजी
पाँच सवेरे ही बादशाह ने सर्जाखान को बुला लिया। अपनी थकी आवाज में बादशाह ने कहा, "सर्जा हमने बीजापुर की कठिन तटबन्दी तोड़ दी। गोलकुंडा को ध्वस्त कर वहीं की खन्दक में डाल दिया। किन्तु यदि सच कहूँ तो यह कोई बहादुरी का काम नहीं है। एक ही पीड़ा मेरे कलेजे को आज भी जला रही है।" "सम्भाऽऽ!" "बिल्कुल ठीक सर्जाखान बेटे। बुरहानपुर में पाँव रखने से पहले ही हम तुम्हें अपनी सेवा में बुला रहे थे। कोई बात नहीं तुम हमारे पास देर से आये हो, किन्तु दुरुस्त आये हो। हम तुमसे खुश हैं। नहीं तो सर्जाखान आजकल खुशी की कोई बात होती कहाँ है?" "जी बादशाह सलामत!" "तू बीजापुर वालों का सेनापति था। बीजापुर की एक बात की याद है तुमको?" "कौन सी जहाँपनाह ?" "वहाँ के बुर्ज के नीचे बारूद की सुरंग लगाने के लिए गड्ढे खोदे जा रहे थे। किन्तु वहाँ की पथरीली जमीन में हमारे कुदाल फावड़े काम नहीं आ रहे थे। उनकी धारें टूट जाती थीं। तब हमने बगल के गाँव से एक देहाती लोहार को बुलाया। तब उस बुड्ढे लोहार ने हँसते हुए हमें उपदेश दिया, "हुज़ूर, जहाँ का पत्थर तोड़ना हो वहीं की भाथी के बने हथियार का उपयोग करना चाहिए। क्या कुछ समझ में आया?" "हजरत- ?" "उस काफिर सम्भा को समाप्त करने की शक्ति हमारे तीन शहजादों, बाइस पोतों और तीस सरदारों में से किसी में भी नहीं है। उस शैतान का खात्मा तुम्हारे जैसा कोई दक्खिनी बहादुर ही कर सकता है।" बादशाह थोड़ा रुका फिर लम्बी साँस लेकर बोला, "जाओ जल्दी से जल्दी निकलो। जितनी भी फौज और रसद लेना चाहो, ले लो यदि सम्भा की गर्दन काटकर ले आया तो तू नसीब का सिकन्दर बन जाएगा। दक्खिन से बाजे गाजे के साथ तुम्हारा जुलूस हम उत्तर ले जाएँगे। लालकिले में राजसी वस्त्र पहनाकर हम तुम्हारा सम्मान करेंगे।" "जहाँपनाह मैं जरूर कोशिश-" सम्भाजी :: 559
"किन्तु पिछले छह-सात वर्षों के अनुभव से मेरे सिर के बाल-" बादशाह बोलते-बोलते रुक गया। उसने अपने सिर पर हाथ फेरा। सिर पर मुकुट नहीं था। उसके सुनहरे बाल भी विरल हो गये थे। थका हुआ बादशाह बोला, "खैर, सम्भा का जिन्दा मिलना तो बहुत मुश्किल है। किन्तु यदि वह न मिला तो उसका एकाध हाथ या पैर तोड़कर-" "मतलब ?" "उसका एक बड़े से बड़ा किला-जैसे रायगढ़, राजगढ़, पन्हाला या हंबीरगढ़ऽ !" "जरूर, जहाँपनाह जरूर।" कोयना नदी पार कर हंबीरराव की सेना तलबीड पहुँच गयी। अब तक आधी रात बीत चुकी थी। घर में सभी लोग जग रहे थे। लड़ाई पर जाते समय करहाड क्षेत्र से गुजरते हुए हंबीरराव तेज हवा के झोंके की तरह अपने तलबीड के घर पर जाते थे। कुछ घंटे रुककर वे हवा के झोंके की तरह ही निकल जाते थे। यदि घर के लोग रात रुकने का आग्रह करने लगते तो वे कहते, "औरंगजेब को दफन किये बिना हमें पीठ टिकाने की आज्ञा भगवान कहाँ देने वाले हैं?" परन्तु आज वे तन-मन से बहुत देर तक घर पर रुके रहे। उनकी प्यारी बेटी ताराऊ रायगढ़ से मायके आयी थी। अपने मायके में आनन्दित थी। हंबीरराव ने उसके पति राजारामसाहब और महारानी येसूबाई की कुशलक्षेम पूछी। उन्होंने बड़े वात्सल्यभाव से ताराबाई से कहा, "तारूऽ, येसूबाई का बराबर ध्यान रखना। स्वराज्य पर संकट बढ़ने के कारण महाराज चिन्ताग्रस्त हैं। महाराज तनाव में हैं इसलिए येसूबाई भी तनावग्रस्त हैं।" "बाबा, आजकल बड़ी बाईसाहब मुझे अपनी छाया की तरह लिये रहती हैं।" "देख बेटी बराबर ध्यान रखती रहना। यह कभी न भूलना कि तुम शिवाजी महाराज की पुत्रवधू हो।" "उसके साथ ही मैं हंबीरराव की बेटी हूँ। इस बात को मैं कभी भूल नहीं सकती, बाबा।" तारा के यह कहने पर सारा घर ठठाकर हँस पड़ा। आधी रात हो चुकी थी। हंबीरराव और उनके पच्चीस-तीस विशिष्ट साथी भोजन के लिए तैयार हुए। आँगन के मध्य में पत्तलें बिछा दी गयीं। खुली हवा में हंबीरराव सुखपूर्वक भोजन कर रहे थे। इसी समय घर के दरवाजे पर घोड़ों की टाप सुनाई दी। हंबीरराव के कान हिरनों की तरह सावधान हो गये। वे चिन्तित होकर इधर-उधर देखने लगे। हंबीरराव चार ग्रास खा लें इसलिए घर के लोगों ने हरकारे 560 : सम्भाजी
को कुछ समय के लिए रोक लिया। किन्तु समय पूछकर नहीं आता। हंबीरराव ने ऊँची आवाज में पुकारा, "बाहर कौन है? अन्दर आ जाओ।" हरकारा सामने आकर खड़ा हो गया। हंबीरराव ने पूछा, "क्यों रे जानू? क्या खबर है?" "सरकार, अपने देश पर औरंगजेब ने आक्रमण करने के लिए सर्जाखान को भेजा है। "क्याऽऽ?" हंबीरराव ने भोजन छोड़कर हाथ धो लिया। उन्होंने दुपट्टे से हाथ पोंछते हुए खड़े-खड़े ही पूछा, "कहाँ? किस तरफ हैं वे शत्रु?" "वे अभी तलबीड पर नहीं आये हैं। किन्तु दोपहर में उनकी सेना औंधघाट के रहिमतपुर में उतरी थी। सन्ध्या समय वे कृष्णा नदी पार कर रहे थे।" "कितनी सेना है?" "दस-बारह हजार।" "—और दिशा उन्होंने कौन सी पकड़ी है?" "प्रतापगढ़ की ओर जा रहे हैं। खान ने कुछ भी करके दो दिन में प्रतापगढ़ जीतने का बीड़ा उठाया है।" अपने सामने की थाली बगल में सरकाकर सभी उठ गये। सभी शीघ्रता से घर के बाहर निकले। अपने पति को चार ग्रास खाने को भी नहीं मिलता यह सोचकर हंबीरराव की पत्नी को बड़ा दुख हुआ। उन्होंने अपने अश्रुओं को छिपाने का प्रयास किया। किन्तु उनकी ओर देखने का सेनापति के पास समय ही नहीं था। किन्तु घर की देहरी पर शुभेच्छा में हाथ हिलाती प्यारी बेटी खड़ी थी। हंबीरराव ने एक क्षण के लिए घोड़े को रोका, "बोल बेटी, मायके की ओर से तुम्हारे लिए क्या करूँ?" "बाबा कुछ नहीं। दुश्मनों के हाथ में अपने प्रतापगढ़ को न जाने दें। वहीं पर अपनी भवानी का मन्दिर है।" 'हर हर महादेव' की गर्जना के घोड़ों ने अँधेरे की राह पकड़ी। रास्ते में दूसरे हरकारे मिले। उन्होंने बताया कि सर्जाखान की पन्द्रह-सत्रह हजार की फौज सातारा से वाई की ओर बढ़ रही है। हंबीरराव ने अपने सहयोगी नारोजी भोंसले से कहा, "अपनी मुख्य फौज तो अंबा-घाट के नीचे कोंकण में गयी है। यहाँ तो हम यों ही चले आये थे। अब क्या किया जाय? इस तरह के अचानक संकट की तो हमने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।" "सेनापति, कुछ भी करके शत्रु को रोकना चाहिए। यदि उसने प्रतापगढ़ जीत लिया तो हमारी इज्जत का कचरा हो जाएगा।" सम्भाजी :: 561
"ऐसा हम कैसे होने देंगे? औरंगजेब ने भले ही आदिलशाही और कुतुबशाही का खात्मा कर दिया हो, किन्तु लाख कोशिश करने पर भी शम्भू महाराज का एक भी किला पराजित नहीं हुआ।" "इसीलिए हम उसका पीछा करें।" "तब तक शत्रु वाई को पार कर परसणी घाट की घाटी चढ़ने लगेगा। भोसले यदि खिंडी पर उसने अधिकार कर लिया तो उसकी शक्ति दस गुना बढ़ जाएगी।" "तो फिर सेनापति जी किया क्या जाय?" हंबीरराव ने घोड़े की लगाम खींची। एक क्षण के लिए अँधेरे में वसन्तगढ़ के बुर्ज की ओर देखा। दूसरे ही क्षण उन्होंने कहा, "हम रास्ता ही बदल दें। कोयना के किनारे-किनारे, वासोटा किले के किनारे से जंगल का रास्ता पकड़ें। कल सुबह होने से पहले महाबलेश्वर पहुँच जाएँगे। वहाँ से पीछे मुड़ जाएँगे। शत्रु यदि हवा की गति से जाएगा तो भी उसे रास्ते में ही रोकेंगे।" "किन्तु हंबीरराव, यह रास्ता बहुत ही दुर्गम है। आदमियों और घोड़ों दोनों की दुर्गति हो जाएगी।" "मृत्यु के समान आयी इस आपदा को रोकने का दूसरा कोई उपाय नहीं। चलिए, बढ़ाइये घोड़ा। मुड़िये पीछे। हंबीरराव गरजे, "बोलो हर हर महादेवऽऽ।" कोयना नदी के किनारे का रास्ता शुरू हुआ। जंगल में कमर तक उगी घास में घोड़े दौड़ने लगे। विगत अनेक दिनों से हंबीरराव ठीक से सोये न थे। सुख चैन की नींद क्या होती है, इसका उन्हें पता ही न था। हंबीरमामा ने रिकेब से पाँव बाहर निकाल लिया। वे दौड़ते घोड़े पर झुक गये। घोड़े की जीन के साथ हाथ रखकर वे दौड़ते घोड़े पर ही सो गये। उनके घोड़े को भी अपने मालिक की दशा का ज्ञान था। पीठ पर अपने मालिक का ध्यान रखते हुए अपनी गति को बिना कम किये, वह बेजबान जानवर दौड़ रहा था। नींद में ही यह कठिन प्रवास हो रहा था। हंबीरराव की आँखों के सामने पहले के प्रतापगढ़ का दृश्य उभर आया। सजी हुई पालकी में बैठकर शिवाजी महाराज अफजलखान मे मिलने जा रहे थे। खान की दगाबाजी का महाराज द्वारा तत्काल लिया गया बदला। उसी तलहटी में घेरा डालकर सर्जाखान खड़ा था। प्रतापगढ़ के बुर्ज की ओर हँसते हुए देख रहा था। शिवाजी और सम्भाजी का नाम लेकर उपहासपूर्वक हँस रहा था। हंबीरराव अचानक ग्लानिग्रस्त होकर जाग गये। उन्होंने आवेश में घोड़ा दौड़ाया। उन्होंने नारोजी भोसले को सावधान करते हुए कहा, "चलो जल्दी अभी तक कोई मुगल सह्याद्रि का घाट पार करके आया नहीं है। यदि 'पारघाट' पर दुश्मन ने क़ब्ज़ा कर लिया तो गजब हो जाएगा।" 562 :: सम्भाजी
इतना लम्बा सफर हंबीरराव की सेना ने दस-बारह घंटों में तय कर लिया। दूसरे दिन सवेरे ही पूरी सेना महाबलेश्वर पहुँच गयी। शत्रु अभी वहाँ नहीं पहुँचा था, इसकी पक्की जानकारी मिली। सेना वापस मुड़कर घौड रास्ते से सीधे गुरेघर की चढ़ाई पार कर पाँचगणी पहुँच गयी। वहाँ पर सेना ने दोपहर का कुछ विश्राम किया। पाँचगणी से निकलते-निकलते अँधेरा घिर आया था। इस जंगली प्रदेश का चप्पा-चप्पा नारोजी भोसले को पता था। सर्जाखान की आधी फौज पाँचगणी का घाट पार कर ऊपर आ गयी थी। उसने रात बिताने के लिए घाट की एक खोह का आश्रय लिया। पाँचगणी की भोर की गुलाबी ठंडक में सर्जाखान सोया हुआ था। उसी समय 'हर हर महादेव' का शोर उठा। हंबीरराव के घोड़े सर्जाखान पर टूट पड़े। वह छोटी-सी घाटी घोड़ों और मनुष्यों से भर गयी। मार काट शुरू हुई। सोते समय ही मराठों ने खान पर आक्रमण किया था। अचानक ऊपर के पहाड़ से दैत्यों की तरह दौड़ते हुए आये थे। मुगल फौज की दुर्दशा हो रही थी। घाट के रास्ते से उनसे भागते भी नहीं बन रहा था। मराठों ने मुगलों के दो हजार सैनिकों को मार गिराया। इस भयंकर आक्रमण से मुगल सेना जान बचाकर भागने लगी। मुगल वाई की ओर भागने लगे। सूर्य के निकलने के पहले ही हंबीरराव ने घाटी और घाट के रास्ते पर अपना कब्जा जमा लिया था। प्रतापगढ़ की ओर बढ़ने के खान के स्वप्न को चूर चूर कर दिया था। दहशत खाई बीजापुरी और मुगल फौज नदी पार कर केंजल जंगल मे भाग गयी थी। सर्जाखान की फौज तीन गुना थी। कुछ लोग हड़बड़ा गये थे किन्तु आज हंबीरराव के शरीर में प्रचंड वीरत्व उत्पन्न हो गया था। अपने घोड़े को शिविर में नचाते हुए उन्होंने कहा, "चलो हमारा एक-एक वीर और एक-एक घोड़ा दस दस के लिए भारी है। बोलो हमला—" दुश्मन थोड़ा पीछे हट गया था। किन्तु साहसी हंबीरराव ने कहा, "लगे हाथ इन्हें आज ही समाप्त कर दो। कृष्णा नदी के किनारे सर्जाखान नाम की जहरीली लता को आज ही जड़ से उखाड़ कर फेंक दो। अन्य लोगों ने पूछा, "आज के दिन थोड़ा विश्राम किया जाये तो ?" हंबीरराव का शरीर कुछ ढीला पड़ गया था। वहीं पर दरी पर एक चद्दर डालकर मामा लेट गये। थोडी ही देर में वे गहरी नींद में सो गये। वर्षों के कष्ट, परिश्रम, चारों मौसमों की भाग दौड़ से मामा का शरीर दुख रहा था। किसी प्रकार आधा घंटा हुआ होगा कि उन्हें लगा जैसे कान में कोई कीड़ा घुस गया। वे झट से उठकर बैठ गये। उन्होंने अपने सहयोगियों को जोर से पुकारा, "चलो बच्चो उठो, हमारा शम्भूराजा हमारी राह देख रहा है। अभी ऐसी बहुत सी लड़ाइयाँ जीतनी हैं, सम्भाजी 563