सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन उठ कर आकाश मार्ग से होती हुई धीरे धीरे भैराणा पर्वत के एक खोल (वर्तमान दादूखोल) में पहुँची । सारा शिष्यवृंद तथा विशाल जनसमुदाय भी पालकी के पीछे - पीछे वहां पहुँच गया । दादू खोल में पालकी के स्थित होते ही एक अद्भुत दिव्य दृश्य नभ मंडल में दिखाई पड़ा । देव, गंधर्व, किन्नर आदि प्रकट होकर जय जयकार करते हुए पुष्प केशर की वर्षा करने लगे, अप्सराएं यशोगान करती हुई नृत्य करने लगीं । ठीक यही दृश्य श्री महाराजजी के प्राकट्य के दिन भी उपस्थित हुआ था और संयोग से उस दिन भी अष्टमी तिथि थी । सारे भक्तजन इस अनोखे दृश्य को देखकर आश्चर्य, आनंद एवं श्रद्धा से प्लावित हो गए । तत्पश्चात् अचानक पालकी फिर ऊपर उठी और उड़ती हुई भैराणा पर्वत की एक गुफा ( यहां वर्तमान गुफा मंदिर है ) के द्वार तक गई । पालकी के गुफा में प्रविष्ट होने के पूर्व श्री महाराज जी ने दाहिना कर - कमल वरद मुद्रा में उठाकर उच्च स्वर से “संतों ! भक्तों ! सत्यराम” का उद्घोष किया और पालकी गुफा में अंतर्ध्यान होगई । तभी से दादू सम्प्रदाय में “सत्यराम” महामंत्र का प्रयोग आशीर्वादात्मक तथा अभिवादनात्मक दोनों भावों में किया जाता है । जब भी दादू भक्तों को परस्पर अभिवादन करना होता है या आशीर्वाद देना होता है तब अपने सद्गुरुदेव का स्मरण करते हुए “सत्यराम” का उच्चारण करते हैं, अतः यह श्रेष्ठ अभिवादन है । ( परम श्रद्धेय श्री दादूदयालजी महाराज की यह संक्षिप्त जीवनी है )
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श्री स्वामी दादूदयालजी महाराज की वाणी ।। महिमा - महात्म्य ।। ।। दोहा ।। प्रगट कल्प तरु अवनि परि, उदय भयो इक आय । कृतसु दादूदास को मनवांछित फल दाय ॥ 1 ॥ ।। कवित्त ।। अवनि कल्प तरु प्रगट, भई दादू की वाणी । साखी शब्द दोई ग्रन्थ, सुतो बड़ स्कन्द पिछाणीं ॥ साखी स्कन्द में डारि, अंग सैंतीस सुनाऊँ । पद स्कन्द में डारि, सप्त अरु बीस बताऊँ ॥ पच्चीससै पैंसठि साखि, सोउ पुनि साखा । चार सैं चंव्वालीस, पद सोउ उपदाखा ॥ पत्र अक्षर लक्ष कहै साठि, सहज पुनि और गनि । भक्ति पहुप वैराग्य फल, ब्रह्म बीज जगन्नाथ भनिं ॥ 2 ॥ प्रथम सत्ताईस राग पोई, अब मोटी डारा । तामैं छोटी और अंग, सैंतीस बिचारा ॥ पद जू चंव्वालीस चारि, सत ऊपर डलियाँ । उभय सहस शत पंच, साखी इकतीस दुकलियाँ ॥ अब पात सो अक्षर एक लख, साठ सहस पुनि और गन । भक्ति पहुप अरु दर्श फल, ब्रह्म बीज कहै लालजन ॥ 3 ॥ ज्ञान भक्ति वैराग्य भाग, बहु भेद बतायो । कोटि ग्रंथ को मन्त, पन्थ संक्षेप लखायो ॥ विशुद्धि बुद्धि अविरुद्धि, शुद्धि सर्वज्ञ उजागर । परमानंद प्रकाश नाश, बिगदंड महाधर ॥ वर्णबूँद साखी सलिल, पद ललिता सागर हरि । दादूदयालु दिनकर दुती, जिन विमल वृष्टि वाणी करी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-महिमा महात्म्य भये सम्पूर्ण पद अरु साखी, भक्ति मुक्ति तिनमें सो भाखी । मनसा वाचा बाचै कोई, ताकूँ आवागमन न होई ॥5॥ वाणी दादू दयालु की, सब शास्त्रन को सार । पढे विचारे प्रीती सूं, जे जन उतरे पार ॥ 6 ॥ दादू दीन दयालु की, वाणी विस्वावीस । तिनकूं खोजि विचार करि, अंग धरे सैंतीस ॥ 7 ॥ तिन माहीं जो हारडे, तिनके तिते स्वरुप । कोई विवेकी केलवे, काढै अर्थ अनूप ॥ 8 ॥ वाणी दादू दयालु की, वाणी कंचन रूप । कोई इक सोनी संत जन, घड़ि हैं घाट अनूप ॥ 9 ॥ वाणी दादू दयालु की, वाणी अनुभव सार । जो जन या हृदय धरै, सो जन उतरे पार ॥ 10 ॥ जे जन पढ़े जु प्रीति सूं, उपजे आत्मज्ञान । तिनकूं आनन भास ही, एक निरंजन ध्यान ॥ 11 ॥ जिनके या हृदय बसी, याही में मन दीं । तिनकूं अति मीठी लगी, आठ पहर लैलीन ॥ 12 ॥ वेद पुराण सब शास्त्र, और जीते जो ग्रन्थ । तिनको बोध बिलोइकै, यह काढ्या निज मंथ ॥ 13 ॥ बोले दादू दासजी, साचै शब्द रसाल । तिनकी उपमा को कहै, मानो उगले लाल ॥ 14 ॥ या वाणी सुनि ज्ञान ह्वे, याही तै वैराग्य । या सुन भजन भक्ति बढ़े, या सुन माया त्याग ॥ 15 ॥ या वाणी पढ़ि प्रेम ह्वे, या पढ़ि प्रीति अपार । या पढ़ि निश्चय नाम की, या पढ़ि प्राण अधार ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-दादूवाणी के अंग नाम या पढ़ि कूँ खोजतां, क्षमा शील संतोष । याही विचारत बुद्धि ह्वे, या धारत जिव मोक्ष ॥ 17 ॥ आदि निरंजन अन्त निरंजन, मध्य निरंजन आदू । कहि जगजीवन अलख निरंजन, तहाँ बसे गुरु दादू ॥ 18 ॥ बषना वाणी बरसणी, बरसो गहर गंभीर । सूकानैं हरिया करे, गुरु वाणी का नीर ॥ 19 ॥ अविचल मंत्र जपे निशि वासुर, अविचल आरती गावै । अविचल इष्ट रहै शिर ऊपरि, अविचल ही पद पावै ॥ 20 ॥ जिनकी वाणी अमृत बखानी, सन्तन मानी सुखदानी । जो सुनकर प्राणी हिरदै आनी, बुद्धि थिरानी उन जानी ॥ यह अकथ कहानी प्रगट प्रवानी, नाहिं न छानी गंगा सी । गुरु दादू आया शब्द सुनाया, ब्रह्म बताया अविनाशी ॥ दादूवाणी के अंग नाम गुरु मिल सुमिरण सों लागा, बिरहा जब आया । परचा पिवजी सों भया, जरना ठहराया ॥ 1 ॥ हैरान देख लय लग रही, निहकर्मी पतिवन्ता । चिंतामणि मन को भई, सूक्ष्म-जन्म अनन्ता ॥ 2 ॥ माया त्यागी, साँच गहि, भेख रु पंथ निराले । साध अंग सब सोध कर, मध मारग चालै ॥ 3 ॥ सारगृही जू विचार कर, विश्वास हरि दीया । पीव पिछाना आपना, समरथ सब कीया ॥ 4 ॥ सब्द सुना श्रवणों धरा, जीवत मिरतक हूवा । सूरातन साहस किया, अरु इन्द्रिय मूवा ॥ 5 ॥
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श्री दादूवाणी-दादूवाणी के राग नाम कालहि मेट सजीवनी, पारस घर आया । उपजन, दया, निर्वैरता, सुंदरि पिव पाया ॥ 6 ॥ कस्तूरी की बॉंस ले, निन्दा परिहरिये । निगुणा नेह निवार कर, हरी बिनती करिये ॥ 7 ॥ साखीभूत बेली बधी, अबिहड़ अंग लागा । अमर भये अरु थिर हुवै, हरि-संगति पागा ॥ 8 ॥ दादू दीनदयाल की, बानी बिस्वाबीस । सकल अंक सो सोध कर, अंग धरे सैंतीस ॥ 9 ॥ इन सैंतीसों अंग में, परमारथ गाया । 'महानन्द' मुक्ता भया, गुरु दादू पाया ॥ 10 ॥ दादूवाणी के राग नाम राग विविध बहु शोध कर, हरि का गुण गाया । साध महामुनि जे भये, परमेश्वर पाया ॥ 1 ॥ प्रथम गौड़ी मालवा, कीया कल्याना । कनड़ा अड़ाणा आण कर, केदार ठाना ॥ 2 ॥ मारू रामकली भली, आशावरि सिन्धूड़ा । देवगन्धार कलिंगडा, परजिया पाया ॥ 3 ॥ भाणमली गायन रली, सारँग सार तोडी । हुसैनी बंगाली गावताँ, ऐसे मन होडी ॥ 4 ॥ नटनारायण सोरठी, गुंड प्रेम अपारा । बिलावल सोहे सदा, सोहे रस सारा ॥ 5 ॥ बसंत भैरूं ललिता भनी, जैतश्री सवाई । धनाश्री और अनन्त की, मिल आरति गाई ॥ 6 ॥
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श्री दादूवाणी-मंगलाचरण आदि अंत हरि सेवही, मिल सबही साधू । इन रागन में पद किये, श्री सतगुरु-दादू ॥ 7 ॥ अंग-रागन का जोड़ यह, महानन्द गाया । गुरु-दादू परसाद तैं, हरि हिरदै पाया ॥ 8 ॥ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरञ्जनं, नमस्कार गुरु देवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥ परब्रह्म परापरं, सो मम् देव निरंजनम् । निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥ 2 ॥ गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परंब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 3 ॥ अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरं । तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 4 ॥ केशराम्बरधरं स्वामी, नूर तेज सुधामयम् । दादू दयालु दया कृत्यं, सर्व विघ्न विनाशन् ॥ 5 ॥ काश्मीर रंजितं वस्त्रं, गौरवर्णं शशीप्रभम् । दधानं श्रीगुरुंदादूं, वंदे कारण विग्रहम् ॥ 6 ॥ जो प्रभु जग में ज्योतिर्मय, कारण करण अभेव । विघ्न हरण मंगलकरण, श्री नमो निरंजन देव ॥ 7 ॥ स्वामी दादू सुमिरिये, गहिये निर्मल ज्ञान । मनसा वाचा कर्मणा, सुन्दर धरिये ध्यान ॥ 8 ॥ स्वामी दादू ब्रह्म है, फेर सार नहिं कोय । सुन्दर ताकों सुमिरतां, सब सिध कारज होय ॥ 9 ॥
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श्री दादूवाणी-मंगलाचरण स्वामीजी सिर ऊपरे, स्वामीजी उर मांहि । स्वामी दादू सारिसा, सुन्दर दूजा नाहिं ॥ 10 ॥ स्वामी दादू दीनदयाल सा, नजर न आया कोय । घडसी सारी मांड में, कर्ता करे सो होय ॥ 11 ॥ सब संतन सौं बीनती, जे सुमिरें जगदीस । हरि गुरु हिरदै में, बसो और हमारे शीश ॥ 12 ॥ हरि वन्दन गुरु रीझहीं, गुरु वन्दन सुख राम । जगन्नाथ हरि गुरु खुशी, करियो जन परनाम ॥ 13 ॥ सदा हमारे रामजी, गुरु गोविंदजी सहाय । जन रज्जब जोख्यों नहीं, विघ्न विलय होय जाय ॥ 14 ॥ नाम लेत नव ग्रह टरें, भजन करत भय जाय । जगजीवन अजपा जपें, सबही विघ्न विलाय ॥ 15 ॥ विघ्न बचें हरि नाम सौं, व्याधि विकार विलाय । ऐसा शरणा नाम का, सब दुख सहजैं जाय ॥ 16 ॥
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दादूराम ।। ॐ परमात्मने नमः ।। सत्यराम ।। श्री दादूदयालवे नमः ।। अथ श्री स्वामी दादूदयाल जी की अनुभव वाणी गुरूदेव का अंग www.dadooram.org अथ गुरुदेव का अंग - १ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्वसाधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् । निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥ 2 ॥ गुरु प्राप्ति और फल दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद । मस्तक मेरे कर धर्या,दिक्ष्या अगम अगाध ॥ 3 ॥ दादू सतगुरु सहज में, किया बहु उपकार । निर्धन धनवंत करि लिया, गुरु मिलिया दातार ॥ 4 ॥ दादू सतगुरु सूं सहजैं मिल्या, लिया कंठ लगाइ । दया भई दयाल की, तब दीपक दिया जगाइ ॥ 5 ॥ दादू देखु दयाल की, गुरु दिखाई बाट । ताला कूंची लाइ कर, खोले सबै कपाट ॥ 6 ॥ सद्गुरु सामर्थ्य के अंग दादू सतगुरु अंजन बाहिकर, नैन पटल सब खोले । बहरे कानों सुणने लागे, गूं गे मुख सौं बोले ॥ 7 ॥ सतगुरु दाता जीव का, श्रवण सीस कर नैन । तन मन सौंज संवारि सब, मुख रसना अरु बैन ॥ 8 ॥ राम नाम उपदेश कर, अगम गवन यहु सैन । दादू सतगुरु सब दिया, आप मिलाये ऐन ॥ 9 ॥ सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप । दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥ 10 ॥ साचा सतगुरु जे मिलै, सब साज संवारै । दादू नाव चढ़ाय कर, ले पार उतारै ॥ 11 ॥ सतगुरु पसु मानस करै, मानस थैं सिध सोइ । दादू सिध थैं देवता, देव निरंजन होइ ॥ 12 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दादू काढै काल मुखि, अंधे लोचन देइ। दादू ऐसा गुरु मिल्या, जीव ब्रह्म कर लेइ ॥ 13 ॥ दादू काढै काल मुखि, श्रवणहुँ सबद सुनाइ। दादू ऐसा गुरु मिल्या, मृतक लिये जिलाइ ॥ 14 ॥ दादू काढै काल मुखि, गूंगे लिये बुलाइ। दादू ऐसा गुरु मिल्या, सुख में रहे समाइ ॥ 15 ॥ दादू काढै काल मुख, मिहर दया करि आइ। दादू ऐसा गुरु मिल्या, महिमा कही न जाइ ॥ 16 ॥ सतगुरु काढै केस गहि, डूबत इहि संसार। दादू नाव चढ़ाइ करि, कीये पैली पार ॥ 17 ॥ भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढै आय। दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढ़ाइ ॥ 18 ॥ दादू उस गुरुदेव की, मैं बलिहारी जाऊँ। जहाँ आसण अमर अलेख था, ले राखे उस ठाऊँ ॥ 19 ॥ ज्ञानोत्पत्ति आत्म मांहै ऊपजै, दादू पंगुल ज्ञान। कृतम् जाइ उलंधि करि, जहां निरंजन थान ॥ 20 ॥ आत्म बोध बँझ का बेटा, गुरु मुखि उपजै आइ। दादू पंगुल पंच बिन, जहाँ राम तहँ जाइ ॥ 21 ॥ गुरु शब्द साचा सहजैं ले मिलै, शब्द गुरु का ज्ञान। दादू हमको ले चल्या, जहाँ प्रीतम का स्थान ॥ 22 ॥ दादू शब्द विचार करि, लागि रहे मन लाइ। ज्ञान गहै गुरुदेव का, दादू सहज समाइ ॥ 23 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दया विनती दादू कहै सतगुरु शब्द सुनाइ करि, भावै जीव जगाइ। भावै अन्तरि आप कहि, अपने अंग लगाइ ॥ 24 ॥ सतगुरु शब्द बाण दादू बाहरि सारा देखिये, भीतरि किया चूर। सतगुरु शब्दों मारिया, जाण न पावै दूर ॥ 25 ॥ दादू सतगुरु मारे शब्द सौं, निरखि निरखि निज ठौर। राम अकेला रह गया, चित्त न आवै और ॥ 26 ॥ दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान। सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥ 27 ॥ सतगुरु शब्द बाण दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ। जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥ 28 ॥ सतगुरु शब्द मुख सौं कह्या, क्या नेड़े क्या दूर। दादू सिष श्रवणहुँ सुण्या, सुमिरण लागा सूर ॥ 29 ॥ करनी बिना कथनी शब्द दूध घृत राम रस, मथि करि काढै कोइ। दादू गुरु गोविन्द बिन, घट घट समझि न होइ ॥ 30 ॥ शब्द दूध घृत राम रस, कोई साध बिलोवणहार। दादू अमृत काढ़ि ले, गुरुमुखि गहै विचार ॥ 31 ॥ घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक सब ही ठौर। दादू वक्ता बहुत हैं, मथि काढैं ते और ॥ 32 ॥ कामधेनु घट घीव है, दिन दिन दुर्बल होइ। गौरू ज्ञान न ऊपजै, मथि नहिं खाया सोइ ॥ 33 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 साचा समर्थ गुरु मिल्या, तिन तत्त दिया बताइ । दादू मोटा महाबली, घट घृत मथि कर खाइ ॥ 34 ॥ मथि करि दीपक कीजिये, सब घट भया प्रकाश । दादू दीवा हाथि करि, गया निरंजन पास ॥ 35 ॥ परमार्था दीवै दीवा कीजिये, गुरुमुख मार्ग जाइ । दादू अपने पीव का, दर्शन देखै आइ ॥ 36 ॥ दादू दीया है भला, दीया करौ सब कोइ । घर में धन्धा न पाइये, जे कर दीया न होइ ॥ 37 ॥ दादू दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात । दीया जग में चाँदणां, दीया चालै साथ ॥ 38 ॥ सत्य गुरु निर्मल गुरु का ज्ञान गहि, निर्मल भक्ति विचार । निर्मल पाया प्रेम रस, छूटे सकल विकार ॥ 39 ॥ निर्मल तन मन आत्मा, निर्मल मनसा सार । निर्मल प्राणी पंच कर, दादू लंघे पार ॥ 40 ॥ परापरी पासै रहै, कोइ न जाणै ताहि । सतगुरु दिया दिखाइ करि, दादू रह्या ल्यौ लाइ ॥ 41 ॥ शिष्य जिज्ञासा जिन हम सिरजे सो कहाँ, सतगुरु देहु दिखाइ । दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाइ ॥ 42 ॥ मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ । आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥ 43 ॥ भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ । सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलिबलि जाइ ॥ 44 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 सरवर भरिया दह दिसा, पंखी प्यासा जाइ । दादू गुरु प्रसाद बिन, क्यों जल पीवै आइ ॥ 45 ॥ सतगुरु बेपरवाही मान सरोवर मांहिं जल, प्यासा पीवै आइ । दादू दोष न दीजिये, घर घर कहण न जाइ ॥ 46 ॥ गुरु लक्षण दादू गुरु गरवा मिल्या, ताथैं सब गमि होइ । लोहा पारस परसतां, सहज समाना सोइ ॥ 47 ॥ दीन गरीबी गहि रह्या, गरवा गुरु गम्भीर । सूक्ष्म शीतल सुरति मति, सहज दया गुरु धीर ॥ 48 ॥ सो धी दाता पलक में, तिरे तिरावण जोग । दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहीं संजोग ॥ 49 ॥ दादू सतगुरु ऐसा कीजिये, राम रस माता । पार उतारे पलक में, दर्शन का दाता ॥ 50 ॥ देवै किरका दरद का, टूटा जोड़ै तार । दादू सांधै सुरति को, सो गुरु पीर हमार ॥ 51 ॥ दादू घाइल ह्वै रहे, सतगुरु के मारे । दादू अंग लगाय कर, भौसागर तारे ॥ 52 । दादू साचा गुरु मिल्या, साचा दिया दिखाइ । साचे को साचा मिल्या, साचा रह्या समाइ ॥ 53 ॥ साचा सतगुरु सोधि ले, साचे लीजे साध । साचा साहिब सोधि करि, दादू भक्ति अगाध ॥ 54 ॥ सन्मुख सतगुरु साधु सौं, साईं सौं राता । दादू प्याला प्रेम का, महारस माता ॥ 55 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 सांई सौं साचा रहै, सतगुरु सौं सूरा । साधू सौं सनमुख रहै, सो दादू पूरा ॥ 56 ॥ सतगुरु मिलै तो पाइये, भक्ति मुक्ति भंडार । दादू सहजैं देखिए, साहिब का दीदार ॥ 57 ॥ दादू सांई सतगुरु सेविये, भक्ति मुक्ति फल होइ । अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोइ ॥ 58 ॥ सतगुरु विमुख ज्ञान इक लख चन्दा आण घर, सूरज कोटि मिलाय । दादू गुरु गोविन्द बिन, तो भी तिमिर न जाय ॥ 59 ॥ अनेक चंद उदय करै, असंख्य सूर प्रकास । एक निरंजन नांव बिन, दादू नहीं उजास ॥ 60 ॥ दादू कद यहु आपा जाइगा, कद यहु बिसरै और । कद यह सूक्ष्म होइगा, कद यहु पावै ठौर ॥ 61 ॥ दादू विषम दुहेला जीव को, सतगुरु तैं आसान । जब दरवै तब पाइए, नेड़ा ही अस्थान ॥ 62 ॥ गुरु ज्ञान दादू नैन न देखे नैन को, अन्तर भी कुछ नाहिं । सतगुरु दर्पण कर दिया, अरस परस मिलि माहिं ॥ 63 ॥ घट घट रात रतन है, दादू लखै न कोइ । सतगुरु सब्दौं पाइये, सहजैं ही गम होइ ॥ 64 ॥ जब ही कर दीपक दिया, तब सब सूझन लाग । यों दादू गुरु ज्ञान थैं, राम कहत जन जाग ॥ 65 ॥ आत्मार्थी भेष दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ दिवस न परसै रात । तहाँ गुरु बाना दिया, सहजैं जपिये तात ॥ 66 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ प्रीतम बैठे पास । आगम गुरु थैं गम भया, पाया नूर निवास ॥ 67 ॥ दादू मन माला तह फेरिये जहाँ आपै एक अनन्त । सहजैं सो सतगुरु मिल्या, जुग-जुग फाग बसन्त ॥ 68 ॥ दादू सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सूँ पोइ । बिन हाथों निश दिन जपै, परम जाप यूँ होय ॥ 69 ॥ दादू मन फकीर मांही हुवा, भीतर लिया भेख । शब्द गहै गुरुदेव का, मांगै भीख अलेख ॥ 70 ॥ दादू मन फकीर सतगुरु किया, कहि समझाया ज्ञान । निश्चल आसन बैस कर, अकल पुरुष का ध्यान ॥ 71 ॥ दादू मन फकीर जग तैं रह्या, सतगुरु लीया लाइ । अहर्निश लागा एक सौं, सहज शून्य रस खाइ ॥ 72 ॥ दादू मन फकीर ऐसैं, भया, सतगुरु के प्रसाद । जहाँ का था लागा तहाँ, छूटे वाद विवाद ॥ 73 ॥ ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया कलेश । दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥ 74 ॥ भ्रम विध्वंस दादू यहु मसीति यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाइ । भीतर सेवा बंदगी, बाहर काहे जाइ ॥ 75 ॥ कस्तूरिया मृग दादू मंझे चेला मंझि गुरु, मंझे ही उपदेश । बाहर ढूँढें बावरे, जटा बधाये केश ॥ 76 ॥ मन का दमन मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश । दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 77 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 भ्रम विध्वंश दादू पड़दा भ्रम का, रह्या सकल घट छाइ । गुरु गोविन्द कृपा करें, तो सहजैं ही मिट जाइ ॥ 78 ॥ सूक्ष्म मार्ग दादू जिहिं मत साधू उद्धरैं, सो मत लिया सोध । मन लै मारग मूल गहि, यह सतगुरु का परमोध ॥ 79 ॥ विचार दादू सोइ मार्ग मन गह्या, जिहिं मारग मिलिए जाइ । वेद कुरानों ना कह्या, सो गुरु दिया दिखाइ ॥ 80 ॥ दादू मन भुजंग यहु विष भऱ्या, निर्विष क्योंही न होइ । दादू मिल्या गुरु गारड़ी, निर्विष कीया सोइ ॥ 81 ॥ एता कीजे, आप थैं, तन मन उनमन लाइ । पंच समाधी राखिये, दूजा सहज सुभाइ ॥ 82 ॥ दादू जीव जंजालों पड़ गया, उलझया नौ मण सूत । कोई इक सुलझे सावधान, गुरु बाइक अवधूत ॥ 83 ॥ मन का निग्रह करना चंचल चहुँ दिसि जात है, गुरु बाइक सूँ बंधि । दादू संगति साध की, पारब्रह्म सौं संधि ॥ 84 ॥ गुरु अंकुश मानैं नहीं, उदमद माता अंध । दादू मन चेतै नहीं, काल न देखे फंध ॥ 85 ॥ दादू मान्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन । ज्ञान खड़ग गुरुदेव का, ता संगि सदा सुजान ॥ 86 ॥ जहाँ मन उठि चलै, फेरि तहां ही राखि । तहाँ दादू लैलीन करि, साध कहैं गुरु साखि ॥ 87 ॥ दादू मनहीं सौं मल उपजै, मन हीं सौं मल धोइ । सीख चली गुरु साध की, तौ तूं निर्मल होइ ॥ 88 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दादू कच्छब अपने करि लिये, मन इन्द्रिय निज ठौर । नाम निरंजन लागि रहु, प्राणी परिहर और ॥ 89 ॥ अधिकारी अनधिकारी के लक्षण मन के मतै सब कोई खेलै, गुरु मुख बिरला कोई । दादू मन की मानैं नहीं, सतगुरु का सिष सोइ ॥ 90 ॥ सब जीवों को मन ठगै, मन को बिरला कोइ । दादू गुरु के ज्ञान सौं, सांई सन्मुख होइ ॥ 91 ॥ दादू एक सौं लैलीन होना, सबै सयानप येह । सतगुरु साधु कहत हैं, परम तत्त जपि लेह ॥ 92 ॥ सतगुरु शब्द विवेक बिन, संयम रह्या न जाइ । दादू ज्ञान विचार बिन, विषय हलाहल खाइ ॥ 93 ॥ घर घर घट कोल्हू चलै, अमी महारस जाइ । दादू गुरु के ज्ञान बिन, विषै हलाहल खाइ ॥ 94 ॥ गुरु शिष्य परमोध सतगुरु शब्द उलंधि करि, जनि कोई सिष जाइ । दादू पग पग काल है, जहाँ जाइ तहँ खाइ ॥ 95 ॥ सतगुरु बरजै सिष करै, क्यूँ कर बंधै काल । दहदिश देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥ 96 ॥ दादू सतगुरु कहै सो सिष करै, सब सिधि कारज होइ । अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोई ॥ 97 ॥ दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो हम थें जनि होइ । सतगुरु लाजै आपना, साध न मानै कोइ ॥ 98 ॥ दादू हूं की ठाहर है कहो, तन की ठाहर तूं । री की ठाहर जी कहो, ज्ञान गुरु का यूं ॥ 99 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दादू पंच स्वादी पंच दिशि, पंचे पंचों बाट। तब लग कह्या न कीजिये, गहि गुरु दिखाया घाट ॥ 100 ॥ दादू पंचों एक मत, पंचों पूज्या साथ। पंचों मिल सन्मुख भये, तब पंचों गुरु की बाट ॥ 101 ॥ सतगुरु विमुख ज्ञान दादू ताता लोहा तिणैं सौं, क्यूं कर पकड़या जाइ। गहन गति सूझै नहीं, गुरु नहीं बूझै आइ ॥ 102 ॥ गुरुमुख कसौटी दादू औगुण गुण कर माने गुरु के, सोई शिष्य सुजाण। सतगुरु औगुण क्यों करै, समझै सोई सयाण ॥ 103 ॥ सोने सेती बैर क्या, मारे घण के घाइ। दादू काटि कलंक सब, राखै कंठ लगाइ ॥ 104 ॥ पाणी माहैं राखिये, कनक कलंक न जाहि। दादू गुरु के ज्ञान सौं, ताइ अगनि में बाहि ॥ 105 ॥ दादू माहैं मीठा हेत करि, ऊपर कड़वा राख। सतगुरु सिष कौं सीख दे, सब साधों की साख ॥ 106 ॥ दादू कहै, सिष भरोसे आपणै, ह्वै बोली हुसियार। कहेगा सो बहेगा, हम पहली करैं पुकार ॥ 107 ॥ दादू सतगुरु कहै सो कीजिये, जे तूं सिष सुजाण। जहाँ लाया तहँ लागि रहु, बुझे कहा अजाण ॥ 108 ॥ गुरु पहली मन सौं कहै, पीछे नैन की सैन। दादू सिष समझै नहीं, कहि समझावै बैन ॥ 109 ॥ कहै लखै सो मानवी, सैन लखै सो साध। मन लखै सो देवता, दादू अगम अगाध ॥ 110 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 कठोरता दादू कहि कहि मेरी जीभ रही, सुनि सुनि तेरे कान । सतगुरु बपुरा क्या करै, जो चेला मूढ़ अजान ॥ 111 ॥ गुरु शिष्य प्रबोध एक शब्द सब कुछ कह्या, सतगुरु सिष समझाइ । जहाँ लाया तहँ लागै नहीं, फिर फिर बूझै आइ ॥ 112 ॥ अज्ञ स्वभाव अपलट ज्ञान लिया सब सीख सुणि, मन का मैल न जाइ । गुरु बिचारा क्या करै, सिष विषै हलाहल खाइ ॥ 113 ॥ सतगुरु की समझै नहीं, आपणै उपजै नांहि । तो दादू क्या कीजिए, बुरी बिथा मन मांहि ॥ 114 ॥ सत्यासत्य गुरु पारख गरु अपंग पग पंष बिन, शिष शाखा का भार । दादू खेवट नाव बिन, क्यूं उतरेंगे पार ॥ 115 ॥ दादू शंसा जीव का, शिष शाखा का साल । दोनों को भारी पड़ी, होगा कौण हवाल ॥ 116 ॥ झूठे गुरु और झूठे शिष्यों की गति अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार । कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥ 117 ॥ सोधी नहीं शरीर की, औरों को उपदेश । दादू अचरज देखिया, ये जाहिंगे किस देस ॥ 118 ॥ दादू सोधी नहीं शरीर की, कहैं अगम की बात । जान कहावैं बापुड़े, आवध लिए हाथ ॥ 119 ॥ सत्यासत्य गुरु पारख लक्षण दादू माया माहै काढि करि, फिर माया में दीन्ह । दोऊ जन समझैं नहीं, एको काज न कीन्ह ॥ 120 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दादू कहै, सो गुरु किस काम का, गहि भ्रमावै आन। तत्त बतावै निर्मला, सो गुरु साध सुजान ॥ 121 ॥ तूं मेरा, हूं तेरा, गुरु सिष किया मंत। दोनों भूले जात हैं, दादू बिसऱ्या कंत ॥ 122 ॥ दुहि दुहि पीवै ग्वाल गुरु, सिष है छेली गाइ। यह औसर योंही गया, दादू कहि समझाइ ॥ 123 ॥ शिष गोरु, गुरु ग्वाल है, रक्षा कर कर लेइ । दादू राखै जतन कर, आनि धणी को देय ॥ 124 ॥ झूठे अंधे गुरु घणे, भरम दिढ़ावैं आइ। दादू साचा गुरु मिलै, जीव ब्रह्म है जाइ ॥ 125 ॥ झूठे अंधे गुरु घणे, बँधे विषय विकार । दादू साचा गुरु मिल्या, सन्मुख सिरजनहार ॥ 126 ॥ झूठे अंधे गुरु घणे, भरम दिढ़ावैं काम। बँधे माया मोह सौं, दादू मुख सौं राम ॥ 127 ॥ झूठे अँधे गुरु घणे, भटकैं घर घर बार। कारज को सीझै नहीं, दादू माथै मार ॥ 128 ॥ बेखर्च व्यवसनी दादू भक्त कहावैं आपको, भक्ति न जानैं भेव। सुपनै ही समझैं नहीं, कहाँ बसै गुरुदेव ॥ 129 ॥ भ्रम विध्वंस भ्रम कर्म जग बंधिया, पंडित दिया भुलाइ। दादू सतगुरु ना मिले, मारग देइ दिखाइ ॥ 130 ॥ दादू पंथ बतावैं पाप का, भ्रम कर्म विश्वास। निकट निरंजन जे रहै, क्यों न बतावैं तास ॥ 131 ॥
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