सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
दया निर्वैरता का अंग www.dadooram.org अथ दया निर्वैरता का अंग २९ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ सारमत आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार । निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मत सार ॥ 2 ॥ दादू निर्वैरी निज आत्मा, साधन का मत सार । दादू दूजा राम बिन, बैरी मंझ विकार ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 निर्वैरी सब जीव सौं, संतजन सोई । दादू एकै आत्मा, बैरी नहिं कोई ॥ 4 ॥ सब हम देख्या शोध कर, दूजा नांही आन । सब घट एकै आत्मा, क्या हिन्दू मुसलमान ॥ 5 ॥ दादू नारी पुरुष का नाम धर, इहि संशय भ्रम भुलान । सब घट एकै आत्मा, क्या हिंदू मुसलमान ॥ 6 ॥ दादू दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान । दोनों भाई नैन हैं, हिंदू मुसलमान ॥ 7 ॥ दादू संशय आरसी, देखत दूजा होइ । भ्रम गया दुविधा मिटी, तब दूसर नाहिं कोइ ॥ 8 ॥ किस सौं बैरी ह्वै रह्या, दूजा कोई नांहि । जिसके अंग तैं ऊपजै, सोई है सब मांहि ॥ 9 ॥ सब घट एकै आत्मा, जानै सो नीका । आपा पर में चीन्ह ले, दर्शन है पीव का ॥ 10 ॥ काहे को दुख दीजिये, घट घट आत्माराम । दादू सब संतोषिये, यह साधु का काम ॥ 11 ॥ काहे को दुख दीजिये, साँई है सब मांहि । दादू एकै आत्मा, दूजा कोई नांहि ॥ 12 ॥ साहिब जी की आत्मा, दीजे सुख संतोंष । दादू दूजा को नहीं, चौदह तीनों लोक ॥ 13 ॥ दादू जब प्राण पिछाणै आपको, आत्म सब भाई । सिरजनहारा सबनि का, तासौं ल्यौ लाई ॥ 14 ॥ आत्माराम विचार कर, घट घट देव दयाल । दादू सब संतोषिये, सब जीवों प्रतिपाल ॥ 15 ॥ दादू पूरण ब्रह्म विचारले, द्वैत भाव कर दूर । सब घट साहिब देखिये, राम रह्या भरपूर ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 दादू मंदिर काँच का, मर्कट सुनहाँ जाइ । दादू एक अनेक है, आप आपको खाइ ॥ 17 ॥ आत्म भाई जीव सब, एक पेट परिवार । दादू मूल विचारिये, तो दूजा कौन गँवार ॥ 18 ॥ दादू सूखा सहजैं कीजिये, नीला भानै नांहि । काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥ 19 ॥ दया निर्वैरता घट घट के उनहार सब, प्राण परस है जाइ । दादू एक अनेक है, बरतैं नाना भाइ ॥ 20 ॥ आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ । दादू न्यारे नांम धर, भिन्न भिन्न है जाइ ॥ 21 ॥ आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ । आदि अंत सब एक है, दादू सहज समाइ ॥ 22 ॥ आतम देव आराजिये, विरोधिये नहिं कोइ । आराधे सुख पाइये, विरोधे दुःख होइ ॥ 23 ॥ ज्यों आपै देखे आपको, यों जे दूसर होइ । तो दादू दूसर नहीं, दुःख न पावै कोइ ॥ 24 ॥ दादू सम कर देखिये, कुंजर कीट समान । दादू दुविधा दूर कर, तज आपा अभिमान ॥ 25 ॥ अदया हिंसा दादू अर्श खुदाय का, अजरावर का थान । दादू सो क्यों ढाहिये, साहिब का नीशान ॥ 26 ॥ दादू आप चिणावै देहुरा, तिसका करहि जतन । प्रत्यक्ष परमेश्वर किया, सो भानै जीव रतन ॥ 27 ॥ मसीत संवारी माणसाँ, तिसको करैं सलाम । ऐन आप पैदा किया, सो ढाहैं मुसलमान ॥ 28 ॥
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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 दादू जंगल मांही जीव जे, जग तैं रहैं उदास। भयभीत भयानक रात दिन, निश्चल नाहीं वास ॥ 29 ॥ वाचा बंधी जीव सब, भोजन पानी घास। आत्म ज्ञान न ऊपजै, दादू करहि विनास ॥ 30 ॥ काला मुँह कर करद का, दिल तैं दूर निवार। सब सूरत सुबहान की, मुल्लां मुग्ध न मार ॥ 31 ॥ गला गुस्से का काटिये, मियाँ मनी को मार। पंचों बिस्मिल कीजिये, ये सब जीव उबार ॥ 32 ॥ वैर विरोधे आत्मा, दया नहीं दिल मांहि। दादू मूरति राम की, ताको मारन जांहि ॥ 33 ॥ दया निर्वैरता कुल आलम यके दीदम, अरवाहे इखलास। बद अमल बदकार दुई, पाक यारां पास ॥ 34 ॥ काल झाल तैं काढ कर, आतम अंग लगाइ। जीव दया यहु पालिये, दादू अमृत खाइ ॥ 35 ॥ दादू बुरा न बांछै जीव का, सदा सजीवन सोइ। परलै विषय विकार सब, भाव भक्ति रत होइ ॥ 36 ॥ सतगुरु संतों की यह रीत, आत्म भाव सौं राखैं प्रीत। ना को बैरी ना को मीत, दादू राम मिलन की चीत ॥ 37 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य उन्तीसवां दया निर्वैरता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 29 ॥ साखी 37 ॥
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सुंदरी का अंग www.dadooram.org अथ सुन्दरी का अंग ३० मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।। सुन्दरी विलाप आरतवन्ती सुन्दरी, पल पल चाहे पीव । दादू कारण कंत के, तालाबेली जीव ।। 2 ।। काहे न आवहु कंत घर, क्यों तुम रहे रिसाइ । दादू सुन्दरी सेज पर, जन्म अमोलक जाइ ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30 आतम अंतर आव तूं, या है तेरी ठौर। दादू सुन्दरी पीव तूं, दूजा नांही और ॥ 4 ॥ दादू पीव न देख्या नैन भर, कंठ न लागी धाइ। सूती नहीं गल बाँह दे, बीच हि गई बिलाइ ॥ 5 ॥ सुरति पुकारै सुन्दरी, अगम अगोचर जाइ। दादू विरहनी आत्मा, उठ उठ आतुर धाइ ॥ 6 ॥ साँई कारण सेज सँवारी, सब तैं सुन्दर ठौर। दादू नारी नाह बिन, आण बिठाये और ॥ 7 ॥ कोई अवगुण मन बस्या, चित तैं धरी उतार। दादू पति बिन सुन्दरी, हाँडै घर-घर बार ॥ 8 ॥ अन्य लगन व्यभिचार प्रेम प्रीति सनेह बिन, सब झूठे श्रृंगार। दादू आतम रत नहीं, क्यों मानै भरतार ॥ 9 ॥ दादू हौं सुख सूती नींद भर, जागै मेरा पीव। क्यों कर मेला होइगा, जागै नांही जीव ॥ 10 ॥ सखी न खेलै सुन्दरी, अपने पीव सौं जाग। स्वाद न पाया प्रेम का, रही नहीं उर लाग ॥ 11 ॥ पंच दिहाड़े पीव सौं, मिल काहे न खेले। दादू गहली सुन्दरी, क्यों रहै अकेले ॥ 12 ॥ सखी सुहागिन सब कहैं, हौं री दुहागिन आहि। पिव का महल न पाइये, कहाँ पुकारूँ जाहि ॥ 13 ॥ सखी सुहागिन सब कहैं, कंत न बूझै बात। मनसा वाचा कर्मणा, मूर्च्छ मूर्च्छ जीव जात ॥ 14 ॥ सखी सुहागिन सब कहैं, पीव सौं परस न होइ। निशवासर दुख पाइये, यहु व्यथा न जान कोइ ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30 सखी सुहागिन सब कहैं, प्रकट न खेलै पीव। सेज सुहाग न पाइये, दुखिया मेरा जीव ॥ 16 ॥ अन्य लग्न व्यभिचार पुरुष पुरातन छाड़ कर, चली आन के साथ। सो भी संग तैं बीछुट्या, खड़ी मरोड़े हाथ ॥ 17 ॥ सुन्दरी विलाप सुन्दरी कबहुँ कंत का, मुख सौं नाम न लेइ। अपने पीव के कारणैं, दादू तन मन देइ ॥ 18 ॥ नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण। दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥ 19 ॥ तन भी तेरा, मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण। सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥ 20 ॥ सुन्दरी मोहे पीव को, बहुत भाँति भरतार। त्यों दादू रिझवै राम को, अनन्त कला करतार ॥ 21 ॥ नदियाँ नीर उलंघ कर, दरिया पैली पार। दादू सुन्दरी सो भली, जाइ मिले भरतार ॥ 22 ॥ सुन्दरी सुहाग प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास। आत्म सुन्दरी पीव को, विलसै दादू दास ॥ 23 ॥ सुन्दरी को साँई मिल्या, पाया सेज सुहाग। पींव सौं खेलै प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥ 24 ॥ दादू सुन्दरी देह में, साँई को सेवै। राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवै ॥ 25 ॥ दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह। दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30 साँई सुन्दरी सेज पर, सदा एक रस होइ । दादू खेलै पीव सौं, ता सम और न कोइ ॥ 27 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तीसवां सुन्दरी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 30 ॥ साखी 27 ॥
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कस्तूरिया मृग का अंग www.dadooram.org अथ कस्तूरिया मृग का अंग ३१ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।। दादू घट कस्तूरी मृग के, भ्रमत फिरै उदास । अन्तरगति जाणै नहीं, तातैं सूंघै घास ।। 2 ।। सब घट में गोविन्द है, संग रहै हरि पास । कस्तूरी मृग में बसै, सूंघत डोलै घास ।। 3 ।। दादू जीव न जानै राम को, राम जीव के पास । गुरु के शब्दों बाहिरा, तातैं फिरै उदास ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-कस्तूरिया मृग का अंग 31 दादू जा कारण जग ढूंढ़िया, सो तो घट ही मांहि। मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥ 5 ॥ दादू दूर कहैं ते दूर हैं, राम रह्या भरपूर। नैनहुं बिन सूझै नहीं, तातैं रवि कत दूर ॥ 6 ॥ ओडो हूवो पाण खे, न लघाऊं मंझ। न जाताऊं पाण में, तांई क्या ऊंपंध ॥ 7 ॥ दादू केई दौड़े द्वारिका, केई काशी जांहि। केई मथुरा को चले, साहिब घट ही मांहि ॥ 8 ॥ दादू सब घट मांही रम रह्या, बिरला बूझै कोइ। सोई बूझै राम को, जे राम सनेही होइ ॥ 9 ॥ दादू जड़मति जीव जाणै नहीं, परम स्वाद सुख जाइ। चेतन समझै स्वाद सुख, पीवै प्रेम अघाइ ॥ 10 ॥ जागत जे आनन्द करै, सौ पावै सुख स्वाद। सूते सुख ना पाइये, प्रेम गँवाया बाद ॥ 11 ॥ दादू जिसका साहिब जागणा, सेवक सदा सचेत। सावधान सन्मुख रहै, गिर गिर पड़े अचेत ॥ 12 ॥ दादू साँई सावधान, हम ही भये अचेत। प्राणी राख न जानहि, तातैं निष्फल खेत ॥ 13 ॥ सगुना निगुना कृतघ्नी दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव। अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥ 14 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र- सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इकतीसवां कस्तूरिया कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 31 ॥ साखी 14 ॥
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निंदा का अंग www.dadooram.org अथ निन्दा का अंग ३२ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ मत्सर ईर्ष्या साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ । दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥ 2 ॥ दादू जब ही साधु सताइये, तब ही ऊँघ पलट। आकाश धँसै, धरती खिसै, तीनों लोक गरक ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32 निन्दा दादू जिहिं घर निंदा साधु की, सो घर गये समूल । तिनकी नींव न पाइये, नांव न ठांव न धूल ॥ 4 ॥ दादू निंदा नाम न लीजिये, स्वप्नै ही जनि होइ । ना हम कहैं, न तुम सुनो, हमें जनि भाषै कोइ ॥ 5 ॥ दादू निन्दा किये नरक है, कीट पड़ैं मुख मांहि । राम विमुख जामै मरै, भग-मुख आवै जाहि ॥ 6 ॥ दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ । हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥ 7 ॥ दादू जिहिं विधि आतम उद्धरै, परसे प्रीतम प्राण । साधु शब्द क्यूं निंदणां, समझैं चतुर सुजाण ॥ 8 ॥ मत्सर ईर्ष्या अनदेख्या अनरथ कहैं, कलि पृथिवी का पाप । धरती अंबर जब लगै, तब लग करैं कलाप ॥ 9 ॥ अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार । जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥ 10 ॥ दादू डरिये लोक तैं, कैसी धरहिं उठाइ । अनदेखी अजगैब की, ऐसी कहैं बनाइ ॥ 11 ॥ अमिट पाप प्रचंड दादू अमृत कूँ विष, विष को अमृत, फेरि धरैं सब नाम । निर्मल मैला, मैला निर्मल, जाहिंगे किस ठाम ॥ 12 ॥ मत्सर ईर्ष्या दादू साचे को झूठा कहैं, झूठे को साचा । राम दुहाई काढिये, कंठ तैं वाचा ॥ 13 ॥ दादू झूठ न कहिये सच को, सच न कहिये झूठ । दादू साहिब मानै नहीं, लागै पाप अखूट ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32 दादू झूठ दिखावै साच को, भयानक भयभीत । साचा राता साच सौं, झूठ न आनै चीत ॥ 15 ॥ साचे को झूठा कहैं, झूठा साच समान । दादू अचरज देखिया, यहु लोगों का ज्ञान ॥ 16 ॥ निन्दा दादू निन्दक बुरा न कहिये, पर उपकारी अस कहाँ लहिये । ज्यों ज्यों निन्दैं लोग विचारा, त्यों त्यों छीजै रोग हमारा ॥ 17 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य बत्तीसवां निन्दा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 32 ॥ साखी 17 ॥
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निगुणा का अंग www.dadooram.org अथ निगुणा का अंग ३३ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥ सगुणा निगुणा कृतघ्नी दादू चंदन बावना, बसै बटाऊ आइ । सुखदाई शीतल किये, तीनों ताप नसाइ ॥ 2 ॥ काल कुहाड़ा हाथ ले, काटन लागा ढाइ । ऐसा यहु संसार है, डाल मूल ले जाइ ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33 अज्ञ स्वभाव अपलट सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवंग। दादू विष छाडैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥ 4 ॥ दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि। उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥ 5 ॥ सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ। दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥ 6 ॥ कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास। दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥ 7 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि। दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥ 8 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग। दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥ 9 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ। दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥ 10 ॥ सगुणा निगुणा कृतघ्नी मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल। मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥ 11 ॥ सब जीव भुवंगम कूप में, साधु काढैं आइ। दादू विषहर विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥ 12 ॥ दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ। गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥ 13 ॥ अज्ञ स्वभाव अपलट बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि। दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33 सगुणा निगुणा कृतघ्नी सुफल वृक्ष परमार्थी, सुख देवै फल फूल। दादू ऊपर बैस कर, निगुणा काटै मूल ॥ 15 ॥ दादू सगुणा गुण करै, निगुणा मानै नांहि। निगुणा मर निष्फल गया, सगुणा साहिब मांहि ॥ 16 ॥ निगुणा गुण मानै नहीं, कोटि करै जे कोइ। दादू सब कुछ सौंपिये, सो फिर बैरी होइ ॥ 17 ॥ दादू सगुणा लीजिये, निगुणा दीजे डार। सगुणा सन्मुख राखिये, निगुणा नेह निवार ॥ 18 ॥ सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक। दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥ 19 ॥ सगुणा गुण केते करै, निगुणा नाखै ढाहि। दादू साधू सब कहैं, निगुणा निष्फल जाइ ॥ 20 ॥ सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै कोइ। दादू साधु सब कहैं, भला कहाँ तैं होइ ॥ 21 ॥ सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै नीच। दादू साधू सब कहैं, निगुणा के सिर मीच ॥ 22 ॥ साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु के घट होइ। दादू काढै काल मुख, निगुणा न मानै कोइ ॥ 23 ॥ साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु मांही आइ। दादू राखै जीव दे, निगुणा मेटै जाइ ॥ 24 ॥ साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु का दे संग। दादू परलै राखिले, निगुणा न पलटै अंग ॥ 25 ॥ साहिब जी सब गुण करै, सतगुरु आडा देइ। दादू तारै देखतां, निगुणा गुण नहिं लेइ ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33 सतगुरु दिया राम धन, रहै सुबुद्धि बताइ। मनसा वाचा कर्मणा, बिलसै वितड़ै खाइ ॥ 27 ॥ किया कृत मेटै नहीं, गुण ही मांहि समाइ। दादू बधै अनन्त धन, कबहुँ कदे न जाइ ॥ 28 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तैंतीसवां निगुणा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 33 ॥ साखी 28 ॥
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विनती का अंग अथ विनती का अंग ३४ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ करूणा दादू बहुत बुरा किया, तुम्हें न करना रोष। साहिब समाई का धनी, बन्दे को सब दोष ॥ 2 ॥ दादू बुरा बुरा सब हम किया, सो मुख कह्या न जाइ । निर्मल मेरा सांइयाँ, ताको दोष न लाइ ॥ 3 ॥ साँई सेवा चोर मैं, अपराधी बन्दा । दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गन्दा ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 तिल तिल का अपराधी तेरा,रती रती का चोर । पल पल का मैं गुनही तेरा, बख्शो अवगुण मोर ॥ 5 ॥ महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार । अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥ 6 ॥ बे मर्यादा मित नहीं, ऐसे किये अपार । मैं अपराधी बापजी, मेरे तुम्हीं एक अधार ॥ 7 ॥ दोष अनेक कलंक सब, बहुत बुरे मुझ मांहि । मैं किये अपराध सब, तुम तैं छाना नांहि ॥ 8 ॥ गुनहगार अपराधी तेरा, भाजि कहाँ हम जाहिं । दादू देख्या शोध सब, तुम बिन कहीं न समाहिं ॥ 9 ॥ आदि अंत लौं आय कर, सुकृत कछू न कीन्ह । माया मोह मद मत्सरा, स्वाद सबै चित दीन्ह ॥ 10 ॥ विनती काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन । पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥ 11 ॥ दादू बहु बंधन सौं बंधिया, एक बिचारा जीव । अपने बल छूटै नहीं, छोड़नहारा पीव ॥ 12 ॥ दादू बंदीवान है, तूँ बन्दी छोड़ दीवान । अब जनि राखो बंदि में, मीरां मेहरबान ॥ 13 ॥ दादू अंतर कालिमा, हिरदै बहुत विकार । प्रकट पूरा दूर कर, दादू करै पुकार ॥ 14 ॥ सब कुछ व्यापै राम जी, कुछ छूटा नांही । तुम तैं कहाँ छिपाइये, सब देखो मांही ॥ 15 ॥ सबल साल मन में रहै, राम बिसर क्यों जाइ । यहु दुख दादू क्यों सहै, साँई करो सहाइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 राखणहारा राख तूँ, यहु मन मेरा राखि । तुम बिन दूजा को नहीं, साधू बोलैं साखि ॥ 17 ॥ माया विषय विकार तैं, मेरा मन भागे । सोई कीजे साँईयाँ, तूँ मीठा लागे ॥ 18 ॥ साँई दीजे सो रति, तूँ मीठा लागे । दूजा खारा होइ सब, सूता जीव जागे ॥ 19 ॥ ज्यों आपै देखे आपको, सो नैना दे मुझ । मीरां मेरा मेहर कर, दादू देखे तुझ ॥ 20 ॥ विनती दादू पछतावा रह्या, सके न ठाहर लाइ । अर्थ न आया राम के, यहु तन योंही जाइ ॥ 21 ॥ दादू कहै- दिन दिन नवतम भक्ति दे, दिन दिन नवतम नांव । दिन दिन नवतम नेह दे, मैं बलिहारी जांव ॥ 22 ॥ साँई संशय दूर कर, कर शंका का नाश । भान भ्रम दुविध्या दुख दारुण, समता सहज प्रकाश ॥ 23 ॥ दया विनती नांही प्रकट ह्वै रह्या, है सो रह्या लुकाइ । संइयाँ पड़दा दूर कर, तूँ ह्वै प्रकट आइ ॥ 24 ॥ दादू माया प्रकट ह्वै रही, यों जे होता राम । अरस परस मिल खेलते, सब जीव सब ही ठाम ॥ 25 ॥ दया करै तब अंग लगावै, भक्ति अखंडित देवै । दादू दर्शन आप अकेला, दूजा हरि सब लेवै ॥ 26 ॥ दादू साध सिखावैं आत्मा, सेवा दिढ कर लेहु । पारब्रह्म सौं विनती, दया कर दर्शन देहु ॥ 27 ॥
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