देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० २२ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०७
अ० २२ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०७
| अभ्युत्थानार्घ्यपाद्यादि चकारोग्रसुतस्तदा।<br>पप्रच्छ कुशलं राजा तत्रागमनकारणम्॥ ४७ | उस समय उग्रसेन-पुत्र कंसने श्रद्धापूर्वक उठकर विधिवत् अर्घ्य, पाद्य आदि अर्पण किया और पुनः कुशल-क्षेम तथा उनके आगमनका कारण पूछा॥ ४७॥ | | नारदस्तं तदोवाच स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>कंस कंस महाभाग गतोऽहं हेमपर्वतम्॥ ४८<br><br>तत्र ब्रह्मादयो देवा मन्त्रं चक्रुः समाहिताः।<br>देवक्यां वसुदेवस्य भार्यायां सुरसत्तमः॥ ४९<br><br>वधार्थं तव विष्णुश्च जन्म चात्र करिष्यति।<br>तत्कथं न हतः पुत्रस्त्वया नीतिं विजानता॥ ५० | तब नारदजीने मुसकराकर कंससे यह वचन कहा—हे कंस! हे महाभाग! मैं सुमेरुपर्वतपर गया था। वहाँ ब्रह्मा आदि देवगण एकत्र होकर आपसमें मन्त्रणा कर रहे थे कि वसुदेवकी पत्नी देवकीके गर्भसे सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णु आपके संहारके उद्देश्यसे अवतार लेंगे; तो फिर नीतिका ज्ञान रखते हुए भी आपने उस शिशुका वध क्यों नहीं किया?॥ ४८-५०॥ | | कंस उवाच<br>अष्टमं च हनिष्येऽहं मृत्युं मे देवभाषितम्। | कंस बोला—आकाशवाणीके द्वारा बताये गये अपने मृत्यु-रूप [देवकीके] आठवें पुत्रका मैं वध करूँगा॥ ५० १/२॥ | | नारद उवाच<br>न जानासि नृपश्रेष्ठ राजनीतिं शुभाशुभाम्॥ ५१<br><br>मायाबलं च देवानां न त्वं वेत्सि वदामि किम्।<br>रिपुरल्पोऽपि शूरेण नोपेक्ष्यः शुभमिच्छता॥ ५२ | नारदजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! आप शुभ तथा अशुभ राजनीतिको नहीं जानते हैं और देवताओंकी माया-शक्ति भी नहीं जानते हैं। अब मैं क्या बताऊँ? अपना कल्याण चाहनेवाले वीरको छोटे-से-छोटे शत्रु की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये॥ ५१-५२॥ | | सम्मेलनक्रियायां तु सर्वे ते ह्यष्टमाः स्मृताः।<br>मूर्खस्त्वमरिसन्त्यागः कृतोऽयं जानता त्वया॥ ५३ | [गणितशास्त्रकी] सम्मेलन-क्रियाके आधारपर तो सभी पुत्र आठवें कहे जा सकते हैं। आप मूर्ख हैं; क्योंकि ऐसा जानते हुए भी आपने शत्रुको छोड़ दिया है॥ ५३॥ | | इत्युक्त्वाशु गतः श्रीमान्नारदो देवदर्शनः।<br>गतेऽथ नारदे कंसः समाहूयाथ बालकम्।<br>पाषाणे पोथयामास सुखं प्राप च मन्दधीः॥ ५४ | ऐसा कहकर श्रीमान् देवदर्शन नारद वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चले गये। नारदके चले जानेपर कंसने उस बालकको मँगवाकर उसे पत्थरपर पटक दिया और उस मन्दबुद्धि कंसको महान् सुख प्राप्त हुआ॥ ५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां कंसेन देवकीप्रथमपुत्रवधवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
अथ द्वाविंशोऽध्यायः
देवकीके छः पुत्रोंके पूर्वजन्मकी कथा, सातवें पुत्रके रूपमें भगवान् संकर्षणका अवतार, देवताओं तथा दानवोंके अंशावतारोंका वर्णन
| जनमेजय उवाच<br>किं कृतं पातकं तेन बालकेन पितामह।<br>यज्जातमात्रो निहतस्तथा तेन दुरात्मना॥ १ | जनमेजय बोले—हे पितामह! उस बालकने ऐसा कौन-सा पापकर्म किया था, जिससे जन्म लेते ही उसको दुष्टात्मा कंसने मार डाला?॥ १॥ |
| ५०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारदोऽपि मुनिश्रेष्ठो ज्ञानवान्धर्मतत्परः।<br>कथमेवंविधं पापं कृतवान्ब्रह्मवित्तमः॥ २<br><br>कर्ता कारयिता पापे तुल्यपापौ स्मृतौ बुधैः।<br>स कथं प्रेरयामास मुनिः कंसं खलं तदा॥ ३ | महान् ज्ञानी, धर्मपरायण तथा ब्रह्मवेत्ता होते हुए भी मुनिश्रेष्ठ नारदने इस प्रकारका पाप क्यों किया? विद्वज्जनोंने पाप करने तथा करानेवाले—इन दोनोंको समान पापी बताया है; तो फिर उन देवर्षि नारदने इस पापकर्मके लिये दुष्ट कंसको प्रेरित क्यों किया?॥ २-३॥ |
| संशयोऽयं महाम्मेऽत्र ब्रूहि सर्वं सविस्तरम्।<br>येन कर्मविपाकेन बालको निधनं गतः॥ ४ | इस विषयमें मुझे यह महान् सन्देह हो गया है। जिस कर्मफलसे वह बालक मारा गया, उसके बारेमें मुझे सब कुछ विस्तारपूर्वक बताइये॥ ४॥ |
| व्यास उवाच<br>नारदः कौतुकप्रेक्षी सर्वदा कलहप्रियः।<br>देवकार्यार्थमागत्य सर्वमेतच्चकार ह॥ ५ | व्यासजी बोले— देवर्षि नारदको कौतुक करना तथा कलह करा देना अत्यन्त प्रिय है। अतः देवताओंका कार्य साधनेके लिये ही उन्होंने उपस्थित होकर यह सब किया था॥ ५॥ |
| न मिथ्याभाषणे बुद्धिर्मुनेस्तस्य कदाचन।<br>सत्यवक्ता सुराणां स कर्तव्ये निरतः शुचिः॥ ६ | उन मुनि नारदकी बुद्धि झूठ बोलनेमें कभी भी प्रवृत्त नहीं हो सकती। सत्यवादी तथा पवित्र हृदयवाले वे सदा देवताओंका कार्य सिद्ध करनेमें तत्पर रहते हैं॥ ६॥ |
| एवं षड् बालकास्तेन जाता जाता निपातिताः।<br>षड् गर्भाः शापयोगेन सम्भूय मरणं गताः॥ ७ | इस प्रकार कंसने देवकीके छः पुत्रोंको बारी-बारीसे जन्म लेते ही मार डाला। पूर्वजन्ममें प्राप्त शापके कारण वे छः बालक जन्म लेते ही मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ७॥ |
| शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तेषां शापस्य कारणम्।<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पुत्रा मरीचेः षण्महाबलाः॥ ८<br><br>ऊर्णायां चैव भार्यायामासन्धर्मविचक्षणाः।<br>ब्रह्माणं जहसुर्वीक्ष्य सुतां यभितुमुद्यतम्॥ ९ | हे राजन्! सुनिये, अब मैं उनके शापका कारण बताऊँगा। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें मरीचिकी भार्या ऊर्णाके गर्भसे छः अत्यन्त बलशाली पुत्र उत्पन्न हुए; ये धर्मशास्त्रमें पूर्णरूपसे निष्णात थे॥ ८ १/२॥<br>एक बार ब्रह्माजीको अपनी पुत्री सरस्वतीके साथ समागमके लिये उद्यत देखकर वे हँस पड़े थे। |
| शशाप तांस्तदा ब्रह्मा दैत्ययोनिं विशन्त्वधः।<br>कालनेमिसुता जातास्ते षड्गर्भा विशाम्पते॥ १० | तब ब्रह्माजीने उन्हें शाप दे दिया कि तुमलोगोंका पतन हो जाय और तुम सब दैत्ययोनिमें जन्म लो। हे महाराज! इस प्रकार वे छहों पुत्र कालनेमिके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए॥ ९-१०॥ |
| अवतारे परे ते तु हिरण्यकशिपोः सुताः।<br>जातास्ते ज्ञानसंयुक्ताः पूर्वशापभयान्नृप॥ ११<br><br>तस्मिञ्जन्मनि शान्ताश्च तपश्चक्रुः समाहिताः।<br>तेषां प्रीतोऽभवद् ब्रह्मा षड्गर्भाणां वरन्ददौ॥ १२ | हे राजन्! अगले जन्ममें वे हिरण्यकशिपुके पुत्र हुए। उनका पूर्वज्ञान अभी बना हुआ था। अतः वे सब पूर्वशापसे भयभीत होकर उस जन्ममें समाहितचित्त हो शान्तभावसे तप करने लगे। इससे ब्रह्माजीने अत्यधिक प्रसन्न होकर उन छहोंको वरदान दे दिया॥ ११-१२॥ |
| अ० २२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५०९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मोवाच<br>शप्ता यूयं मया पूर्वं क्रोधयुक्तेन पुत्रकाः।<br>तुष्टोऽस्मि वो महाभागा ब्रुवन्तु वाञ्छितं वरम्॥ १३ | **ब्रह्माजी बोले—**हे महाभाग पुत्रो! मैंने क्रोधमें आकर उस समय तुम लोगोंको शाप दे दिया था। मैं तुम सभीपर परम प्रसन्न हूँ; अतएव अपना अभिलषित वर माँगो॥ १३॥ |
| व्यास उवाच<br>ते तु श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मणः प्रीतमानसाः।<br>ब्रह्माणमब्रुवन्कामं सर्वे कार्यार्थतत्पराः॥ १४ | **व्यासजी बोले—**उन ब्रह्माका वचन सुनकर उनके मनमें अत्यधिक प्रसन्नता हुई। अपना कार्य सिद्ध करनेमें तत्पर उन सबने ब्रह्माजीसे वर माँग लिया॥ १४॥ |
| गर्भा ऊचुः<br>पितामहाद्य तुष्टोऽसि देहि नो वाञ्छितं वरम्।<br>अवध्या दैवतैः सर्वैर्मानवैश्च महोरगैः॥ १५<br>गन्धर्वसिद्धपतिभिर्वधो माभूतित्यितामह। | **बालक बोले—**हे पितामह! यदि आज आप हमपर प्रसन्न हैं तो हमें मनोवांछित वरदान दीजिये। हमलोगोंको सभी देवता, मानव और महानाग न मार सकें। हे पितामह! यहाँतक कि गन्धर्व तथा बड़े-से-बड़े सिद्ध पुरुषोंसे भी हमारा वध न हो सके॥ १५ ½॥ |
| व्यास उवाच<br>तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वमेतद्भविष्यति॥ १६<br>गच्छन्तु वो महाभागाः सत्यमेव न संशयः।<br>दत्त्वा वरं गतो ब्रह्मा मुदितास्ते तदाभवन्॥ १७ | **व्यासजी बोले—**तब ब्रह्माजीने उनसे कहा कि यह सब पूर्ण होगा। हे महाभाग्यशाली बालको! अब तुमलोग जाओ। यह सत्य होकर रहेगा; इसमें सन्देह नहीं है। जब ब्रह्माजी वरदान देकर चले गये, तब वे सब परम प्रसन्न हुए॥ १६-१७॥ |
| हिरण्यकशिपुः क्रुद्धस्तानुवाच कुरूद्वह।<br>यस्माद्विहाय मां पुत्रास्तोषितो वै पितामहः॥ १८<br>वरेण प्रार्थितोऽत्यर्थं बलवन्तो यतोऽभवन्।<br>युष्माभिर्हापितः स्नेहस्ततो युष्मांस्त्यजाम्यहम्॥ १९ | हे कुरुश्रेष्ठ! [वरदानकी बात जानकर] हिरण्यकशिपु कुपित होकर उनसे बोला—हे पुत्रो! तुमलोगोंने मेरी उपेक्षा करके अपनी तपस्यासे ब्रह्माको प्रसन्न किया है। उनसे प्रार्थना करके वरदान पाकर तुमलोग अत्यधिक बलशाली हो गये हो। तुम सभीने अपने पिताके स्नेहको अपमानित किया है; अतएव मैं तुमलोगोंका परित्याग करता हूँ॥ १८-१९॥ |
| यूयं व्रजन्तु पाताले षड्गर्भा विश्रुता भुवि।<br>पाताले निद्रयाविष्टास्तिष्ठन्तु बहुवत्सरान्॥ २०<br>ततस्तु देवकीगर्भे वर्षे वर्षे पुनः पुनः।<br>पिता वः कालनेमिस्तु तत्र कंसो भविष्यति॥ २१<br>स एव जातमात्रान्वो वधिष्यति सुदारुणः। | अब तुमलोग पाताललोक चले जाओ। इस पृथ्वीपर तुमलोग ‘षड्गर्भ’ नामसे विख्यात होओगे। पाताललोकमें तुमलोग बहुत वर्षोंतक निद्राके वशीभूत रहोगे। तत्पश्चात् तुमलोग क्रमसे प्रतिवर्ष देवकीके गर्भसे उत्पन्न होते रहोगे और पूर्वजन्मका तुम्हारा पिता कालनेमि उस समय कंस नामसे उत्पन्न होगा। वह अत्यन्त क्रूर कंस तुमलोगोंको उत्पन्न होते ही मार डालेगा॥ २०-२१ ½॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं शप्तांस्तदा तेन गर्भे जातान्युन्ः पुनः॥ २२<br>जघान देवकीपुत्रान्षड्गर्भाञ्छापनोदितः।<br>शेषांशः सप्तमस्तत्र देवकीगर्भसंस्थितः॥ २३ | **व्यासजी बोले—**इस प्रकार हिरण्यकशिपुसे शापित होकर वे क्रमसे एक-एक करके देवकीके गर्भमें आते गये और कंस पूर्वशापसे प्रेरित होकर उन षड्गर्भरूप देवकीके पुत्रोंका वध करता गया। इसके बाद शेषनागके अंशावतार बलभद्रजी देवकीके सातवें गर्भमें आये॥ २२-२३॥ |
५१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२
५१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२
| विस्रंसितश्च गर्भोऽसौ योगेन योगमायया।<br>नीतश्च रोहिणीगर्भे कृत्वा संकर्षणं बलात् ॥ २४ | तत्पश्चात् योगमायाने अपने योगबलसे उस गर्भको च्युत कर दिया और हठात् खींचकर उसे रोहिणीके गर्भमें स्थापित कर दिया॥ २४॥ |
| पतितः पञ्चमे मासि लोकख्यातिं गतस्तदा।<br>कंसोऽपि ज्ञातवांस्तत्र देवकीगर्भपातनम् ॥ २५ | इसी बीच लोगोंको यह बात मालूम हो गयी कि पाँचवें महीनेमें ही देवकीका गर्भस्राव हो गया। कंस भी देवकीके गर्भपातका समाचार जान गया। अपने लिये यह सुखप्रद समाचार सुनकर वह दुरात्मा कंस बहुत प्रसन्न हुआ॥ २५ १/२ ॥ |
| मुदं प्राप स दुष्टात्मा श्रुत्वा वार्तां सुखावहाम्।<br>अष्टमे देवकीगर्भे भगवान्सात्वतां पतिः ॥ २६<br><br>उवास देवकार्यार्थं भारावतरणाय च। | उधर देवताओंके कार्यको सिद्ध करने तथा पृथ्वीका भार उतारनेके लिये जगत्पति भगवान् विष्णु देवकीके आठवें गर्भमें विराजमान हो गये॥ २६ १/२ ॥ |
| राजोवाच<br>वसुदेवः कश्यपांशः शेषांशश्च तदाभवत् ॥ २७<br><br>हरेरंशस्तथा प्रोक्तो भवता मुनिसत्तम।<br>अन्ये च येऽंशा देवानां तत्र जातास्तु तान्वद ॥ २८<br><br>भारावतरणार्थं वै क्षितेः प्रार्थनयानघ। | राजा बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! आपने यह बता दिया कि वसुदेवजी महर्षि कश्यपके अंशावतार थे और उनके यहाँ शेषनाग तथा भगवान् विष्णु अपने-अपने अंशोंसे उत्पन्न हुए। हे अनघ! देवताओंके अन्य जो-जो अंशावतार पृथ्वीकी प्रार्थनापर उसका भार उतारनेके लिये हुए हैं, उन्हें भी बताइये॥ २७-२८ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>सुराणामसुराणां च ये येऽंशा भुवि विश्रुताः ॥ २९<br><br>तानहं सम्प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण शृणुष्व तान्।<br>वसुदेवः कश्यपांशो देवकी च तथादितिः ॥ ३० | व्यासजी बोले—हे राजन्! देवताओं तथा असुरोंके जो-जो अंश लोकमें विख्यात हुए हैं, उनके विषयमें मैं संक्षिप्तरूपमें बता रहा हूँ; आप उन्हें सुनिये—वसुदेव कश्यपके अंशसे तथा देवकी अदितिके अंशसे उत्पन्न थीं॥ २९-३०॥ |
| बलदेवस्त्वनन्तांशो वर्तमानेषु तेषु च।<br>योऽसौ धर्मसुतः श्रीमान्नारायण इति श्रुतः ॥ ३१<br><br>तस्यांशो वासुदेवस्तु विद्यमाने मुनौ तदा।<br>नरस्तस्यानुजो यस्तु तस्यांशोऽर्जुन एव च॥ ३२ | बलदेवजी शेषनागके अंश थे। इन सभीके अवतरित हो जानेपर जिन धर्मपुत्र श्रीमान् नारायणके विषयमें कहा जा चुका है, उन्हींके अंशसे ही साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने अवतार लिया। मुनिवर नारायणके श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हो जानेपर उनके नर नामक जो छोटे भाई हैं, उनके अंशस्वरूप अर्जुनका प्राकट्य हुआ॥ ३१-३२॥ |
| युधिष्ठिरस्तु धर्मांशो वाय्वंशो भीम इत्युत।<br>अश्विन्योंशौ ततः प्रोक्तौ माद्रीपुत्रौ महाबलौ॥ ३३ | महाराज युधिष्ठिर धर्मके अंश, भीमसेन पवनदेवके अंश तथा माद्रीके दोनों महाबली पुत्र नकुल एवं सहदेव दोनों अश्विनीकुमारोंके अंश कहे गये हैं॥ ३३॥ |
| सूर्यांशः कर्ण आख्यातो धर्मांशो विदुरः स्मृतः।<br>द्रोणो बृहस्पतेरंशस्तत्सुतस्तु शिवांशजः ॥ ३४ | कर्ण सूर्यके अंशसे प्रकट हुए और विदुरको धर्मका अंश बताया गया है। द्रोणाचार्य बृहस्पतिके अंशसे तथा उनका पुत्र अश्वत्थामा शिवके अंशसे उत्पन्न थे॥ ३४॥ |
| अ० २२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| समुद्रः शन्तनुः प्रोक्तो गङ्गा भार्या मता बुधैः ।<br>देवकस्तु समाख्यातो गन्धर्वपतिरागमे ॥ ३५ | विद्वानोंका मानना है कि समुद्रके अंशसे महाराज शन्तनु तथा गंगाके अंशसे उनकी भार्या उत्पन्न हुई थीं। पुराणप्रसिद्ध गन्धर्वराजके अंशसे महाराज देवक उत्पन्न हुए थे ॥ ३५ ॥ |
| वसुर्भीष्मो विराटस्तु मरुद्गण इति स्मृतः ।<br>अरिष्टस्य सुतो हंसो धृतराष्ट्रः प्रकीर्तितः ॥ ३६ | भीष्मपितामहको वसुका तथा राजा विराटको मरुद्-गणोंका अंशावतार बताया गया है। महाराज धृतराष्ट्र अरिष्टनेमिके पुत्र हंसके अंशसे उत्पन्न कहे गये हैं ॥ ३६ ॥ |
| मरुद्गणः कृपः प्रोक्तः कृतवर्मा तथापरः ।<br>दुर्योधनः कलेरंशः शकुनिं विद्धि द्वापरम् ॥ ३७ | कृपाचार्यको किसी एक मरुद्गणका अंश तथा कृतवर्माको किसी दूसरे मरुद्गणका अंश बताया गया है। [हे राजन्!] दुर्योधनको कलिका अंश तथा शकुनिको द्वापरका अंश समझिये ॥ ३७ ॥ |
| सोमपुत्रः सुवर्चाह्व्यः सोमप्ररुरुदाहृतः ।<br>पावकांशो धृष्टद्युम्नः शिखण्डी राक्षसस्तथा ॥ ३८ | प्रसिद्ध सोमनन्दन सुवर्चा पृथ्वीपर सोमप्ररु नामसे विख्यात हुए। धृष्टद्युम्न अग्नि तथा शिखण्डी राक्षसके अंशसे उत्पन्न हुए ॥ ३८ ॥ |
| सनत्कुमारस्यांशस्तु प्रद्युम्नः परिकीर्तितः ।<br>द्रुपदो वरुणस्यांशो द्रौपदी च रमांशाजा ॥ ३९ | प्रद्युम्न सनत्कुमारके अंश कहे गये हैं। द्रुपद वरुणके अंश थे तथा द्रौपदी साक्षात् लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थीं ॥ ३९ ॥ |
| द्रौपदीतनयाः पञ्च विश्वेदेवांशजाः स्मृताः ।<br>कुन्तिः सिद्धिर्धृतिर्माद्री मतिर्गान्धारराजजा ॥ ४० | द्रौपदीके पाँचों पुत्र विश्वेदेवके अंशसे उत्पन्न माने गये हैं। कुन्ती सिद्धिके अंशसे, माद्री धृतिके अंशसे तथा गान्धारी मतिके अंशसे उत्पन्न हुई थीं ॥ ४० ॥ |
| कृष्णपत्न्यस्तथा सर्वा देववाराङ्गनाः स्मृताः ।<br>राजानश्च तथा सर्वे असुराः शक्रनोदिताः ॥ ४१ | भगवान् कृष्णकी सभी पत्नियाँ देवताओंकी रमणियोंके अंशसे उत्पन्न कही गयी हैं। इन्द्रके द्वारा भेजे हुए सब दैत्य धरातलपर आकर दुराचारी नरेश बने थे ॥ ४१ ॥ |
| हिरण्यकशिपोरांशः शिशुपाल उदाहृतः ।<br>विप्रचित्तिर्जरासन्धः शल्यः प्रह्लाद इत्यपि ॥ ४२ | शिशुपालको हिरण्यकशिपुका अंश कहा गया है। जरासन्ध विप्रचित्तिका तथा शल्य प्रह्लादका अंशावतार था ॥ ४२ ॥ |
| कालनेमिस्तथा कंसः केशी हयशिरास्तथा ।<br>अरिष्टो बलिपुत्रस्तु ककुद्मी गोकुले हतः ॥ ४३ | कालनेमि कंस हुआ तथा हयशिराको केशीका जन्म प्राप्त हुआ। बलिपुत्र ककुद्मी अरिष्टासुर बना, जो गोकुलमें मारा गया ॥ ४३ ॥ |
| अनुह्लादो धृष्टकेतुर्भगदत्तोऽथ बाष्कलः ।<br>लम्बः प्रलम्बः सञ्जातः खरोऽसौ धेनुकोऽभवत् ॥ ४४ | अनुह्लाद धृष्टकेतु बना और बाष्कल भगदत्तके रूपमें उत्पन्न हुआ। लम्बने प्रलम्बासुरके रूपमें जन्म लिया तथा खर धेनुकासुर हुआ ॥ ४४ ॥ |
| वाराहश्च किशोरश्च दैत्यौ परमदारुणौ ।<br>मल्लौ तावेव सञ्जातौ ख्यातौ चाणूरमुष्टिकौ ॥ ४५ | अत्यन्त भयंकर वाराह और किशोर नामक दोनों दैत्य चाणूर और मुष्टिक नामक पहलवानोंके रूपमें प्रख्यात हुए ॥ ४५ ॥ |
| ५१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २३ |
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| दितिपुत्रस्तथारिष्टो गजः कुवलयाभिधः।<br>बलिपुत्री बकी ख्याता बकस्तदनुजः स्मृतः॥ ४६ | दितिका पुत्र अरिष्टासुर कुवलयापीड नामक हाथी हुआ। बलिकी पुत्री पूतना (बकी) राक्षसी बनी और उसका छोटा भाई बकासुर कहलाया॥ ४६॥ | | यमो रुद्रस्तथा कामः क्रोधश्चैव चतुर्थकः।<br>तेषामंशैस्तु सञ्जातो द्रोणपुत्रो महाबलः॥ ४७ | द्रोणपुत्र महाबली अश्वत्थामा यम, रुद्र, काम और क्रोध—इन चारोंके अंशसे उत्पन्न हुआ था॥ ४७॥ | | अंशावतरणे पूर्वं दैतेया राक्षसास्तथा।<br>जाताः सर्वे सुरांशास्ते क्षितिभारावतारणे॥ ४८ | पूर्वकालमें अंशावतारके समय जो दैत्य तथा राक्षस उत्पन्न हुए थे, पृथ्वीपरसे उनका भार उतारनेके लिये सभी देवता अपने-अपने अंशसे उत्पन्न हुए॥ ४८॥ | | एतेषां कथितं राजन्नंशावतरणं नृप।<br>सुराणां चासुराणां च पुराणेषु प्रकीर्तितम्॥ ४९ | हे राजन्! पुराणोंमें इन देवताओं तथा असुरोंके अंशावतारोंका जो वर्णन किया गया है, वह सब मैंने आपसे कह दिया॥ ४९॥ | | यदा ब्रह्मादयो देवाः प्रार्थनार्थं हरिं गताः।<br>हरिणा च तदा दत्तौ केशौ खलु सितासितौ॥ ५० | जब ब्रह्मा आदि देवता प्रार्थना करनेके लिये भगवान् विष्णुके पास गये थे तब विष्णुजीने उन्हें श्वेत तथा श्याम वर्णवाले दो केश प्रदान किये थे॥ ५०॥ | | श्यामवर्णस्ततः कृष्णः श्वेतः सङ्कर्षणस्तथा।<br>भारावतारणार्थं तौ जातौ देवांशसम्भवौ॥ ५१ | तदनन्तर पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवान् कृष्ण श्यामवर्ण विष्णुका अंश लेकर तथा बलरामजी श्वेतवर्ण शेषनागका अंश लेकर अवतरित हुए॥ ५१॥ | | अंशावतरणं चैतच्छृणोति भक्तिभावतः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो मोदते स्वजनैर्वृतः॥ ५२ | जो प्राणी भक्ति-भावनासे इस अंशावतारकी कथाका श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर अपने बन्धु-बान्धवोंके सहित आनन्दित रहता है॥ ५२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवदानवानामंशावतरणवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
कंसके कारागारमें भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, वसुदेवजीका उन्हें गोकुल पहुँचाना और वहाँसे योगमायास्वरूपा कन्याको लेकर आना, कंसद्वारा कन्याके वधका प्रयास, योगमायाद्वारा आकाशवाणी करनेपर कंसका अपने सेवकोंद्वारा नवजात शिशुओंका वध कराना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| हतेषु षट्सु पुत्रेषु देवक्या औग्रसेनिना।<br>सप्तमे पतिते गर्भे वचनान्नारदस्य च॥ १<br><br>अष्टमस्य च गर्भस्य रक्षणार्थमतन्द्रितः।<br>प्रयत्नमकरोद्राजा मरणं स्वं विचिन्तयन्॥ २ | [हे राजन्!] उग्रसेनपुत्र कंसके द्वारा देवकीके छहः पुत्रोंका वध कर दिये जानेपर तथा सातवाँ गर्भ गिर जानेके पश्चात् वह राजा कंस नारदजीके कथनानुसार अपनी मृत्युके सम्बन्धमें भलीभाँति विचार करते हुए सावधानीपूर्वक आठवें गर्भको [गिरनेसे] बचानेका प्रयत्न करने लगा॥ १-२॥ |
| अ० २३ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५१३ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| समये देवकीगर्भे प्रवेशमकरोद्धरिः ।<br>अंशेन वसुदेवे तु समागत्य यथाक्रमम् ॥ ३ | उचित समय आनेपर भगवान् श्रीहरि अपने अंशके साथ वसुदेवमें प्रविष्ट होकर देवकीके गर्भमें विराजमान हो गये ॥ ३ ॥ |
| तदेयं योगमाया च यशोदायां यथेच्छया ।<br>प्रवेशमकरोद्देवी देवकार्यार्थसिद्धये ॥ ४ | उसी समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे भगवती योगमायाने अपनी इच्छासे यशोदाके गर्भमें प्रवेश किया ॥ ४ ॥ |
| रोहिण्यास्तनयो रामो गोकुले समजायत ।<br>यतः कंसभयोद्विग्ना संस्थिता सा च कामिनी ॥ ५ | कंसके भयसे उद्विग्न होकर गोकुलमें कालक्षेप कर रही वसुदेव-भार्या रोहिणीके गर्भसे पुत्ररूपमें बलरामजी प्रकट हो चुके थे ॥ ५ ॥ |
| कारागारे ततः कंसो देवकीं देवसंस्तुताम् ।<br>स्थापयामास रक्षार्थं सेवकान्समकल्पयत् ॥ ६ | तदनन्तर कंसने देववन्दिता देवकीको कारागारमें बन्द कर दिया और उनकी रखवालीके लिये बहुतसे सेवक नियुक्त कर दिये ॥ ६ ॥ |
| वसुदेवस्तु कामिन्याः प्रेमतन्तुनियन्त्रितः ।<br>पुत्रोत्पत्तिं च सञ्चिन्त्य प्रविष्टः सह भार्यया ॥ ७ | अपनी पत्नी देवकीके पुत्र-प्रसवकी बातको ध्यानमें रखते हुए तथा उनके प्रेमपाशमें आबद्ध रहनेके कारण वसुदेवजी भी उनके साथ कारागारमें ही रहने लगे ॥ ७ ॥ |
| देवकीगर्भगो विष्णुर्देवकार्यार्थसिद्धये ।<br>संस्तुतोऽमरसङ्घैश्च व्यवर्धत यथाक्रमम् ॥ ८ | देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये देवकीके गर्भमें विराजमान भगवान् विष्णु देवसमुदायद्वारा स्तूयमान होते हुए धीरे-धीरे वृद्धिको प्राप्त होने लगे ॥ ८ ॥ |
| सञ्जाते दशमे तत्र मासेऽथ श्रावणे शुभे ।<br>प्राजापत्यर्क्षसंयुक्ते कृष्णपक्षेऽष्टमीदिने ॥ ९<br>कंसस्तु दानवान्सर्वानुवाच भयविह्वलः ।<br>रक्षणीया भवद्भिश्च देवकी गर्भमन्दिरे ॥ १० | श्रावणमासमें दसवाँ महीना पूर्ण हो जानेपर (भाद्रपद-मासके) कृष्णपक्षमें रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ अष्टमी तिथिके उपस्थित होनेपर भयसे व्याकुल कंसने सभी दानवोंसे कहा कि आपलोग इस समय गर्भकक्षमें विद्यमान देवकीकी रखवाली करें ॥ ९-१० ॥ |
| अष्टमो देवकीगर्भः शत्रुर्मे प्रभविष्यति ।<br>रक्षणीयः प्रयत्नेन मृत्युरूपः स बालकः ॥ ११ | देवकीके आठवें गर्भसे उत्पन्न बालक मेरा शत्रु होगा। अतएव आपलोगोंको मेरे कालरूप उस बालककी यत्नपूर्वक रखवाली करनी चाहिये ॥ ११ ॥ |
| हत्वैनं बालकं दैत्याः सुखं स्वप्स्यामि मन्दिरे ।<br>निवृत्तिवर्जिते दुःखे नाशिते चाष्टमे सुते ॥ १२ | हे दैत्यो ! इस समय मैं अत्यन्त उद्वेगकारी तथा दुःखदायी आठवें गर्भसे उत्पन्न होनेवाले इस बालकका वध कर लेनेके बाद ही अपने महलमें सुखपूर्वक सो सकूँगा ॥ १२ ॥ |
| खड्गप्रासधराः सर्वे तिष्ठन्तु धृतकार्मुकाः ।<br>निद्रातन्द्राविहीनाश्च सर्वत्र निहितेक्षणाः ॥ १३ | आप सभी लोग अपने हाथोंमें तलवार, भाला और धनुष धारण करके निद्रा तथा आलस्यसे रहित होकर चारों ओर दृष्टि रखियेगा ॥ १३ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्यादिश्यासुरगणान् कृशोऽतिभयविह्वलः ।<br>मन्दिरं स्वं जगामाशु न लेभे दानवः सुखम् ॥ १४ | **व्यासजी बोले—**उन दैत्योंको यह आज्ञा देकर भयाकुल तथा [चिन्ताके कारण] अति दुर्बल दानव कंस तत्काल अपने महलमें चला गया, किंतु वहाँ भी वह सुखकी नींद नहीं सो पा रहा था ॥ १४ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 A
५१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
५१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
| निशीथे देवकी तत्र वसुदेवमुवाच ह।<br>किं करोमि महाराज प्रसवावसरो मम॥ १५<br><br>बहवो रक्षपालाश्च तिष्ठन्त्यत्र भयानकाः।<br>नन्दपत्न्या मया सार्धं कृतोऽस्ति समयः पुरा॥ १६<br><br>प्रेषितव्यस्त्वया पुत्रो मन्दिरे मम मानिनि।<br>पालयिष्याम्यहं तत्र तवातिमनसा किल॥ १७<br><br>अपत्यं ते प्रदास्यामि कंसस्य प्रत्ययाय वै।<br>किं कर्तव्यं प्रभो चात्र विषमे समुपस्थिते॥ १८<br><br>व्यत्ययः सन्ततेः शौरे कथं कर्तुं क्षमो भवेः।<br>दूरे तिष्ठस्व कान्ताद्य लज्जा मेऽतिदुरत्यया॥ १९<br><br>परावृत्य मुखं स्वामिन्नन्यथा किं करोम्यहम्।<br>इत्युक्त्वा तं महाभागं देवकी देवसम्मतम्॥ २० | तत्पश्चात् मध्यरात्रिमें देवकीने वसुदेवजीसे कहा—महाराज! मेरे प्रसवका समय आ गया है, अब मैं क्या करूँ ? ॥ १५ ॥<br><br>यहाँपर बहुतसे भयंकर रक्षक नियुक्त हैं। यहाँ आनेके पूर्व नन्दकी पत्नी यशोदासे मेरी यह बात निश्चित हुई थी। [उन्होंने कहा था—] ‘हे मानिनि ! तुम अपने पुत्रको मेरे घर भेज देना, मैं मन लगाकर तुम्हारे पुत्रका पालन-पोषण करूँगी। कंसको विश्वास दिलानेके लिये मैं तुम्हें इसके बदले अपनी सन्तान दे दूँगी।' अतः हे प्रभो ! इस विषम परिस्थितिमें अब हमें क्या करना चाहिये ? हे शूरतनय ! आप इन दोनों सन्तानोंकी अदला-बदली करनेमें कैसे समर्थ हो सकेंगे? हे कान्त ! आप अपना मुख फेरकर मुझसे दूर होकर बैठिये; क्योंकि दुस्तर लज्जाके कारण मैं संकोचमें पड़ रही हूँ। हे स्वामिन् ! इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ विशेष कर ही क्या सकती हूँ॥ १६—१९ १/२ ॥ | | बालकं सुषुवे तत्र निशीथे परमाद्भुतम्।<br>तं दृष्ट्वा विस्मयं प्राप देवकी बालकं शुभम् ॥ २१ | देवतुल्य महाभाग वसुदेवसे ऐसा कहकर देवकीने उसी अर्धरात्रिकी शुभ वेलामें एक परम अद्भुत बालकको जन्म दिया। उस सुन्दर बालकको देखकर देवकीको महान् आश्चर्य हुआ॥ २०—२१॥ | | पतिं प्राह महाभागा हर्षोत्फुल्लकलेवरा।<br>पश्य पुत्रमुखं कान्त दुर्लभं हि तव प्रभो॥ २२<br><br>अद्यैनं कालरूपोऽसौ घातयिष्यति भ्रातृजः।<br>वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा तमादाय करे सुतम्॥ २३<br><br>अपश्यच्चाननं तस्य सुतस्याद्भुतकर्मणः।<br>वीक्ष्य पुत्रमुखं शौरिश्चिन्ताविष्टो बभूव ह ॥ २४ | [पुत्रप्राप्तिके कारण] हर्षातिरेकसे प्रफुल्लित अंग-प्रत्यंगोंवाली महाभागा देवकीने पतिसे कहा— हे कान्त ! अपने पुत्रका मुख तो देख लीजिये; क्योंकि हे प्रभो ! इसका दर्शन आपके लिये फिर सर्वथा दुर्लभ हो जायगा। कालरूपी मेरा भाई कंस आज ही इसका वध कर डालेगा। तब 'ठीक है'—ऐसा कहकर वसुदेवजी उस पुत्रको अपने हाथोंमें लेकर अद्भुत कर्मशाली अपने उस पुत्रका मुख निहारने लगे। तत्पश्चात् अपने पुत्रका मुख देखकर वसुदेवजी इस चिन्तासे आकुल हो गये कि मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे इस बालकके लिये मुझे विषाद न हो ॥ २२—२४ १/२ ॥ | | किं करोमि कथं न स्याद्दुःखमस्य कृते मम।<br>एवं चिन्तातुरे तस्मिन्वागुवाचाशरीरिणी ॥ २५<br><br>वसुदेवं समाभाष्य गगने विशदाक्षरा।<br>वसुदेव गृहीत्वैनं गोकुलं नय सत्वरः ॥ २६<br><br>रक्षपालास्तथा सर्वे मया निद्राविमोहिताः।<br>विवृतानि कृतान्यष्ट कपाटानि च शृङ्खलाः ॥ २७<br>मुक्त्वैनं नन्दगेहे त्वं योगमायां समानय। | वसुदेवजीके इस प्रकार चिन्तामग्न होनेपर उन्हें सम्बोधित करके आकाशमें स्पष्ट शब्दोंमें आकाश-वाणी हुई—हे वसुदेव ! तुम इस बालकको लेकर तत्काल गोकुल पहुँचा दो। सभी रक्षकगण मेरे द्वारा निद्रासे अचेत कर दिये गये हैं, आठों फाटकोंको खोल दिया गया है तथा जंजीरें तोड़ दी गयी हैं। इस बालकको नन्दके घर छोड़कर वहाँसे तुम योगमायाको उठा लाओ ॥ २५—२७ १/२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 17 B
अ० २३ ] चतुर्थ स्कन्ध ५१५
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| श्रुत्वैवं वसुदेवस्तु तस्मिन्कारागृहे गतः ॥ २८<br>विवृतं द्वारमालोक्य बभूव तरसा नृप ।<br>तमादाय ययावाशु द्वारपालैरलक्षितः ॥ २९ | यह वाणी सुनकर उस कारागृहमें निरुद्ध वसुदेवजी बाहरकी ओर गये। हे राजन्! इस प्रकार वसुदेवजी फाटकोंको खुला हुआ देखकर बड़ी शीघ्रतापूर्वक उस बालकको लेकर द्वारपालोंकी दृष्टिसे बचते हुए तत्काल कारागारसे निकल पड़े॥ २८-२९॥ |
| कालिन्दीतटमासाद्य पूरं दृष्ट्वा सुनिश्चितम् ।<br>तदैव कटिदघ्नी सा बभूवाशु सरिद्वरा ॥ ३० | यमुनाके किनारे पहुँचकर उन्होंने देखा कि इस पारसे उस पार अगाध जल आप्लावित हो रहा है। उनका गोकुल जाना भी सुनिश्चित था। उनके जलमें उतरते ही नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाजीमें कमरभर पानी हो गया॥ ३०॥ |
| योगमायाप्रभावेण ततारानकदुन्दुभिः ।<br>गत्वा तु गोकुलं शौरिर्निशीथे निर्जने पथि ॥ ३१<br>नन्दद्वारे स्थितः पश्यन्विभूतिं पशुसंज्ञिताम् । | योगमायाके प्रभावसे वसुदेवजीने सहजतापूर्वक यमुनाजीको पार कर लिया और वे उस आधी रातमें सुनसान मार्गपर चलते हुए गोकुलमें पहुँचकर नन्दके द्वारपर विपुल गौ-सम्पदा देखते हुए वहाँ स्थित हो गये॥ ३१ १/२॥ |
| तदैव तत्र सञ्जाता यशोदा गर्भसम्भवा ॥ ३२<br>योगमायांशजा देवी त्रिगुणा दिव्यरूपिणी ।<br>जातां तां बालिकां दिव्यां गृहीत्वा करपङ्कजे ॥ ३३<br>तत्रागत्य ददौ देवी सैरन्ध्रीरूपधारिणी ।<br>वसुदेवः सुतं दत्त्वा सैरन्ध्रीकरपङ्कजे ॥ ३४<br>तामादाय ययौ शीघ्रं बालिकां मुदिताशयः । | उसी समय योगमायाके अंशसे जायमान दिव्यरूपमयी त्रिगुणात्मिका भगवतीने यशोदाके गर्भसे अवतार लिया था। तदनन्तर सैरन्ध्रीका रूप धारण करके स्वयं भगवतीने उत्पन्न उस अलौकिक बालिकाको अपने करकमलमें ग्रहण करके वहाँ जाकर वसुदेवजीको दे दिया। वसुदेवजी भी अपने पुत्रको देवीरूपा सैरन्ध्रीके करकमलमें रखकर योगमायास्वरूपा उस बालिकाको लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे तत्काल चल पड़े॥ ३२—३४ १/२॥ |
| कारागारे ततो गत्वा देवक्याः शयने सुताम् ॥ ३५<br>निःक्षिप्य संस्थितः पार्श्वे चिन्ताविष्टो भयातुरः । | कारागारमें पहुँचकर उन्होंने देवकीकी शय्यापर बालिकाको लिटा दिया और भय तथा चिन्तासे युक्त होकर वे पासहीमें एक ओर जाकर बैठ गये॥ ३५ १/२॥ |
| रुरोद सुस्वरं कन्या तदैवागतसंज्ञकाः ॥ ३६<br>उत्तस्थुः सेवका राज्ञः श्रुत्वा तद्रुदितं निशि ।<br>तमूचुर्भूपतिं गत्वा त्वरितास्तेऽतिविह्वलाः ॥ ३७<br>देवक्याश्च सुतो जातः शीघ्रमेहि महामते । | इतनेमें कन्याने उच्च स्वरमें रोना आरम्भ किया। तब प्रसवकालको सूचित करनेके लिये नियुक्त कंसके सेवकगण रातमें रोनेकी वह ध्वनि सुनकर जाग पड़े। आनन्दसे विह्वल वे सेवक तत्काल उसी समय जाकर राजासे बोले—हे महामते! देवकीका पुत्र उत्पन्न हो गया, आप शीघ्र चलिये॥ ३६-३७ १/२॥ |
| तदाकर्ण्य वचस्तेषां शीघ्रं भोजपतिर्ययौ ॥ ३८<br>प्रावृतं द्वारमालोक्य वसुदेवमथाह्वयत् । | उनका यह वचन सुनते ही भोजपति कंस तत्काल जा पहुँचा और वहाँपर दरवाजा खुला हुआ देखकर कंसने वसुदेवजीको बुलवाया॥ ३८ १/२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 C
५१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
५१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| कंस उवाच<br>सुतमानय देवक्या वसुदेव महामते॥ ३९<br>मृत्युर्मे चाष्टमो गर्भस्तन्निहन्मि रिपुं हरिम्। | कंस बोला—हे महामतिसम्पन्न वसुदेव! देवकीके पुत्रको यहाँ ले आओ। देवकीका आठवाँ गर्भ मेरी मृत्यु है, अतः मैं उस विष्णुरूप अपने शत्रु का वध करूँगा॥ ३९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>श्रुत्वा कंसवचः शौरिर्भयत्रस्तविलोचनः॥ ४०<br>तामादाय सुतां पाणौ ददौ चाशु रुदन्निव।<br>दृष्ट्वाथ दारिकां राजा विस्मयं परमं गतः॥ ४१ | व्यासजी बोले—कंसका वचन सुनकर भयसे सन्त्रस्त नयनोंवाले वसुदेवजीने शीघ्र ही उस कन्याको ले जाकर कंसके हाथोंमें रोते हुए रख दिया। उस बालिकाको देखकर राजा कंस बड़ा विस्मित हुआ॥ ४०-४१॥ |
| देववाणी वृथा जाता नारदस्य च भाषितम्।<br>वसुदेवः कथं कुर्यादनृतं सङ्कटे स्थितः॥ ४२<br>रक्षपालाश्च मे सर्वे सावधाना न संशयः।<br>कुतोऽत्र कन्यका कामं क्व गतः स सुतः किल॥ ४३<br>सन्देहोऽत्र न कर्तव्यः कालस्य विषमा गतिः। | आकाशवाणी तथा नारदजीका वचन—दोनों ही मिथ्या सिद्ध हुए और यहाँ संकटकी स्थितिमें पड़ा हुआ यह वसुदेव भी झूठी बात भला कैसे बना सकता है? मेरे सभी रक्षक भी सावधान थे; इसमें कोई सन्देह नहीं है। तब यह बालिका कहाँसे आ गयी और वह बालक कहाँ चला गया? कालकी बड़ी विषम गति होती है, अतएव इसके सम्बन्धमें अब किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ४२-४३ १/२॥ |
| इति सञ्चिन्त्य तां बालां गृहीत्वा पादयोः खलः॥ ४४<br>पोथयामास पाषाणे निर्घृणः कुलपांसनः।<br>सा करान्निःसृता बाला ययावाकाशमण्डलम्॥ ४५<br>दिव्यरूपा तदा भूत्वा तमुवाच मृदुस्वना।<br>किं मया हतया पाप जातस्ते बलवान् रिपुः॥ ४६<br>हनिष्यति दुराराध्यः सर्वथा त्वां नराधमम्।<br>इत्युक्त्वा सा गता कन्या गगनं कामगा शिवा॥ ४७ | ऐसा सोचकर उस दुष्ट, निर्मम तथा कुलकलंकी कंसने बालिकाके दोनों पैर पकड़कर पत्थरपर पटका। किंतु वह कन्या कंसके हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी। वहाँ दिव्य रूप धारण करके उस कन्याने मधुर स्वरमें उससे कहा—'अरे पापी! मुझे मारनेसे तुम्हारा क्या लाभ होगा; तेरा महाबलशाली शत्रु तो जन्म ले चुका है। वे दुराराध्य परमपुरुष तुझ नराधमका वध अवश्य करेंगे।' ऐसा कहकर स्वेच्छा-विहारिणी तथा कल्याणकारिणी भगवतीस्वरूपा वह कन्या आकाशमें चली गयी॥ ४४—४७॥ |
| कंसस्तु विस्मयाविष्टो गतो निजगृहं तदा।<br>आनाय्य दानवान्सर्वानिदं वचनमब्रवीत्॥ ४८ | यह सुनकर आश्चर्यसे युक्त कंस अपने महलके लिये प्रस्थान कर गया। वहाँ बकासुर, धेनुकासुर तथा वत्सासुर आदि दानवोंको बुलवाकर अत्यन्त कुपित तथा भयाक्रान्त कंसने उनसे कहा—हे दानवो! मेरा कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम सभी यहाँसे अभी प्रस्थान करो और जहाँ कहीं भी तुमलोगोंको नवजात शिशु मिलें, उन्हें अवश्य मार डालना। बालघातिनी यह पूतना अभी नन्दराजके गोकुलमें चली जाय। वहाँ सद्यःप्रसूत जितने बालक मिलें, उन्हें यह पूतना मेरी आज्ञासे मार डाले। धेनुक, वत्सक, केशी, प्रलम्ब और बक—ये समस्त असुर मेरा कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ निरन्तर विद्यमान रहें॥ ४८—५१ १/२॥ |
| बकधेनुकवत्सादीन्क्रोधाविष्टो भयातुरः।<br>गच्छन्तु दानवाः सर्वे मम कार्यार्थसिद्धये॥ ४९<br>जातमात्राश्च हन्तव्या बालका यत्र कुत्रचित्।<br>पूतनैषा व्रजत्वद्य बालघ्नी नन्दगोकुलम्॥ ५०<br>जातमात्रान्विनिघ्नन्ती शिशूंस्तत्र ममाज्ञया।<br>धेनुको वत्सकः केशी प्रलम्बो बक एव च॥ ५१<br>सर्वे तिष्ठन्तु तत्रैव मम कार्यचिकीर्षया। |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 D
अ० २४ ] चतुर्थ स्कन्ध ५१७
| इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसो ययौ निजगृहं खलः॥ ५२<br><br>चिन्ताविष्टोऽतिदीनात्मा चिन्तयित्वैव तं पुनः॥ ५३ | इस प्रकार सभी दैत्योंको आदेश देकर वह दुष्ट कंस अपने भवनमें चला गया। अपने शत्रुरूप उस बालकके विषयमें बार-बार सोचकर वह अत्यन्त चिन्तातुर तथा खिन्नमनस्क हो गया॥ ५२-५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कंसं प्रति योगमायावाक्यं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णावतारकी संक्षिप्त कथा, कृष्णपुत्रका प्रसूतिगृहसे हरण, कृष्णद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवती चण्डिकाद्वारा सोलह वर्षके बाद पुनः पुत्रप्राप्तिका वर देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| प्रातर्नन्दगृहे जातः पुत्रजन्ममहोत्सवः।<br>किंवदन्त्यथ कंसेन श्रुता चारमुखादपि॥ १ | [हे राजन्!] प्रातःकाल नन्दजीके घरमें पुत्रजन्मका बड़ा भारी समारोह सम्पन्न हुआ, यह बात चारों ओर फैल गयी और कंसने भी किसी दूतके मुखसे यह सुन लिया॥ १॥ |
| जानाति वसुदेवस्य दारास्तत्र वसन्ति हि।<br>पशवो दासवर्गश्च सर्वे ते नन्दगोकुले॥ २<br><br>तेन शङ्कासमाविष्टो गोकुलं प्रति भारत।<br>नारदेनापि तत्सर्वं कथितं कारणं पुरा॥ ३<br><br>गोकुले ये च नन्दाद्यास्तत्पत्न्यश्च सुरांशजाः।<br>देवकीवसुदेवाद्याः सर्वे ते शत्रवः किल॥ ४ | कंस यह पहलेसे ही जानता था कि वसुदेवकी अन्य भार्या, पशु तथा सेवकगण—सब-के-सब गोकुलमें नन्दके यहाँ रह रहे हैं। हे भारत! इस कारणसे गोकुलके प्रति कंसका सन्देह और बढ़ गया। नारदजीने भी सभी कारण पहले ही बता दिये थे। उन्होंने कह दिया था कि गोकुलमें नन्द आदि गोप, उनकी पत्नियाँ, देवकी तथा वसुदेव आदि जो भी लोग हैं, वे सब देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; इसलिये वे निश्चितरूपसे तुम्हारे शत्रु हैं॥ २—४॥ |
| इति नारदवाक्येन बोधितोऽसौ कुलाधमः।<br>जातः कोपमना राजन् कंसः परमपापकृत्॥ ५ | हे राजन्! देवर्षि नारदने जब यह बात बतायी थी तो बड़े-से-बड़े पापकर्मोंमें प्रवृत्त रहनेवाला वह कुलकलंकी कंस अत्यधिक कुपित हो गया था॥ ५॥ |
| पूतना निहता तत्र कृष्णेनामिततेजसा।<br>बको वत्सासुरश्चापि धेनुकश्च महाबलः॥ ६<br><br>प्रलम्बो निहतस्तेन तथा गोवर्धनो धृतः।<br>श्रुत्वैतत्कर्म कंसस्तु मेने मरणमात्मनः॥ ७ | अपरिमित तेजवाले श्रीकृष्णने पूतना, बकासुर, वत्सासुर, महाबली धेनुकासुर तथा प्रलम्बासुरको मार डाला और गोवर्धनपर्वतको उठा लिया—इस अद्भुत कर्मको सुनकर कंसने यह अनुमान लगा लिया कि मेरा भी मरण अब सुनिश्चित है॥ ६-७॥ |
| तथा विनिहतः केशी ज्ञात्वा कंसोऽतिदुर्मनाः।<br>धनुर्यागमिषेणाशु तावानेतुं प्रचक्रमे॥ ८ | [महान् बलशाली] केशी भी मार डाला गया—यह जानकर कंस अत्यधिक खिन्नमनस्क हो गया, तब उसने धनुष-यज्ञके बहाने [कृष्ण तथा बलराम] दोनोंको शीघ्र ही मथुरामें बुलानेकी योजना बनायी॥ ८॥ |
| ५१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ |
|---|
| अक्रूरं प्रेषयामास क्रूरः पापमतिस्तदा।<br>आनेतुं रामकृष्णौ च वधायामितविक्रमौ ॥ ९ | निर्दयी तथा पापबुद्धि कंसने असीम पराक्रमी श्रीकृष्ण तथा बलरामका वध करनेके उद्देश्यसे उन्हें बुलानेके लिये अक्रूरको भेजा ॥ ९ ॥ | | रथमारोप्य गोपालौ गोकुलाद् गान्दिनीसुतः।<br>आगतो मथुरायां तु कंसादेशे स्थितः किल॥ १० | तदनन्तर कंसका आदेश मानकर गान्दिनीपुत्र अक्रूर गोकुल गये और दोनों गोपालों—श्रीकृष्ण तथा बलरामको रथपर बैठाकर गोकुलसे मथुरा लौट आये ॥ १० ॥ | | तावागत्य तदा तत्र धनुर्भङ्गञ्च चक्रतुः।<br>हत्वाथ रजकं कामं गजं चाणूरमुष्टिकम् ॥ ११<br><br>शलं च तोशलं चैव निजघान हरिस्तदा।<br>जघान कंसं देवेशः केशेष्वाकृष्य लीलया ॥ १२ | वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण तथा बलरामने धनुषको तोड़ा। पुनः रजक, कुवलयापीड हाथी, चाणूर और मुष्टिकका संहार करके भगवान् श्रीकृष्णने शल तथा तोशलका वध किया। तत्पश्चात् देवेश श्रीकृष्णने कंसके बाल पकड़कर लीलापूर्वक उसको भी मार डाला॥ ११-१२॥ | | पितरौ मोचयित्वाथ गतदुःखौ चकार ह।<br>उग्रसेनाय राज्यं तद्ददावरिनिषूदनः ॥ १३ | तदनन्तर शत्रुविनाशक श्रीकृष्णने अपने माता-पिताको कारागारसे मुक्त कराकर उनका कष्ट दूर किया और उग्रसेनको उनका राज्य वापस दिला दिया ॥ १३॥ | | वसुदेवस्तयोस्तत्र मौञ्जीबन्धनपूर्वकम्।<br>कारयामास विधिवद् व्रतबन्धं महामनाः ॥ १४ | तदनन्तर महामना वसुदेवने उन दोनोंका मौंजी-बन्धन तथा उपनयन-संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न करवाया ॥ १४ ॥ | | उपनीतौ तदा तौ तु गतौ सान्दीपिनालयम्।<br>विद्याः सर्वाः समभ्यस्य मथुरामागतौ पुनः॥ १५ | उपनयन-संस्कार हो जानेके पश्चात् वे दोनों सान्दीपनिऋषिके आश्रममें विद्याध्ययनके लिये गये और समस्त विद्याओंका अध्ययन करके पुनः मथुरा लौट आये ॥ १५ ॥ | | जातौ द्वादशवर्षीयौ कृतविद्यौ महाबलौ।<br>मथुरायां स्थितौ वीरौ सुतावानकदुन्दुभेः ॥ १६ | आनकदुन्दुभि (वसुदेवजी)-के पुत्र कृष्ण और बलराम बारह वर्षकी अवस्थामें ही सम्पूर्ण विद्याओंमें निष्णात तथा महान् बलशाली होकर मथुरामें ही निवास करने लगे॥ १६॥ | | मागधस्तु जरासन्धो जामातृवधदुःखितः।<br>कृत्वा सैन्यसमाजं स मथुरामागतः पुरीम् ॥ १७ | उधर अपने जामाता कंसके वधसे मगधनरेश जरासन्ध अत्यन्त दुःखित हुआ और उसने विशाल सेना संगठितकर मथुरापुरीपर आक्रमण कर दिया ॥ १७॥ | | स सप्तदशवारं तु कृष्णेन कृतबुद्धिना।<br>जितः संग्राममासाद्य मधुपुर्यां निवासिना ॥ १८ | किंतु मधुपुरी (मथुरा)-में निवास करनेवाले बुद्धिमान् श्रीकृष्णने समरांगणमें उपस्थित होकर सत्रह बार उसे पराजित किया ॥ १८ ॥ | | पश्चाच्च प्रेरितस्तेन स कालयवनाभिधः।<br>सर्वम्लेच्छाधिपः शूरो यादवानां भयङ्करः ॥ १९ | इसके बाद जरासन्धने यादव-समुदायके लिये भयदायक तथा सम्पूर्ण म्लेच्छोंके अधिपति कालयवन नामक योद्धाको श्रीकृष्णका सामना करनेके लिये प्रेरित किया ॥ १९॥ |
अ० २४] चतुर्थ स्कन्ध ५१९
अ० २४] चतुर्थ स्कन्ध ५१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा यवनमायान्तं कृष्णः सर्वान् यदूत्तमान्।<br>आनाय्य च तथा राममुवाच मधुसूदनः॥ २०<br><br>भयं नोऽत्र समुत्पन्नं जरासन्धान्महाबलात्।<br>किं कर्तव्यं महाभाग यवनः समुपैति वै॥ २१ | कालयवनको आता सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्णने सभी प्रसिद्ध यादवों तथा बलरामको बुलाकर कहा— महाबलशाली जरासन्धसे हमलोगोंको यहाँ बराबर भय बना हुआ है। [उसीकी प्रेरणासे] कालयवन यहाँ आ रहा है। हे महाभाग! ऐसी स्थितिमें हमलोगोंको क्या करना चाहिये?॥ २०–२१॥ |
| प्राणत्राणं प्रकर्तव्यं त्यक्त्वा गेहं बलं धनम्।<br>सुखेन स्थीयते यत्र स देशः खलु पैतृकः॥ २२ | इस समय घर, सेना और धन छोड़कर हमें प्राण बचा लेना चाहिये। जहाँ भी सुखपूर्वक रहनेका प्रबन्ध हो जाय, वही पैतृक देश होता है॥ २२॥ |
| सदोद्वेगकरः कामं किं कर्तव्यः कुलोचितः।<br>शैलसागरसान्निध्ये स्थातव्यं सुखमिच्छता॥ २३ | इसके विपरीत उत्तम कुलके निवास करनेयोग्य पैतृक भूमिमें भी यदि सदा अशान्ति बनी रहती हो तो ऐसे स्थानपर रहनेसे क्या लाभ? अतः सुखकी कामना करनेवालेको पर्वत या समुद्रके पास निवास कर लेना चाहिये॥ २३॥ |
| यत्र वैरिभयं न स्यात्स्थातव्यं तत्र पण्डितैः।<br>शेषशय्यां समाश्रित्य हरिः स्वपिति सागरे॥ २४<br><br>तथैव च भयाद्धीतः कैलासे त्रिपुरार्दनः।<br>तस्मान्नात्रैव स्थातव्यमस्माभिः शत्रुतापितैः॥ २५<br><br>द्वारवत्यां गमिष्यामः सहिताः सर्व एव वै।<br>कथिता गरुडेनाद्य रम्या द्वारवती पुरी॥ २६<br><br>रैवताचलासान्निध्ये सिन्धुकूले मनोहरा। | जिस स्थानपर शत्रुओंका भय नहीं रहता, ऐसे स्थानपर ही विज्ञजनोंको रहना चाहिये। भगवान् विष्णु शेषशय्याका आश्रय लेकर समुद्रमें शयन करते हैं और इसी प्रकार त्रिपुरदमन भगवान् शंकर भी कैलासपर्वतपर निवास करते हैं। अतएव शत्रुओंद्वारा निरन्तर सन्तप्त किये गये हमलोगोंको अब यहाँ नहीं रहना चाहिये। अब हम सभी लोग एक साथ द्वारकापुरी चलेंगे। गरुडने मुझसे बताया है कि द्वारकापुरी अत्यन्त रमणीक तथा मनोहर है, जो समुद्रके तटपर तथा रैवतपर्वतके समीप विराजमान है॥ २४–२६ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br><br>तच्छ्रुत्वा वचनं तथ्यं सर्वे यादवपुङ्गवाः॥ २७<br><br>गमनाय मतिं चक्रुः सकुदुम्बाः सवाहनाः।<br>शकटानि तथोष्ट्रांश्च वाम्यश्च महिषास्तथा॥ २८<br><br>धनपूर्णानि कृत्वा ते निर्ययुर्नगराद् बहिः।<br>रामकृष्णौ पुरस्कृत्य सर्वे ते सपरिच्छदाः॥ २९<br><br>अग्रे कृत्वा प्रजाः सर्वाश्चेलुः सर्वे यदूत्तमाः।<br>कतिचिद्दिवसैः प्रापुः पुरीं द्वारवतीं किल॥ ३० | व्यासजी बोले— श्रीकृष्णकी यह युक्तिपूर्ण बात सुनकर सभी श्रेष्ठ यादवोंने अपने परिवारजनों तथा वाहनोंके साथ जानेका निश्चय कर लिया। गाड़ियों, ऊँटों, घोड़ियों और भैंसोंपर धन-सामग्री लादकर तथा श्रीकृष्ण और बलरामको आगे करके वे सभी यादवश्रेष्ठ अपने परिजनोंको साथ लेकर नगरसे बाहर हो गये। समस्त प्रजाजनोंको आगे-आगे करके सभी श्रेष्ठ यादव चल पड़े। वे सब कुछ ही दिनोंमें द्वारकापुरी पहुँच गये॥ २७–३०॥ |
| शिल्पिभिः कारयामास जीर्णोद्धारं हि माधवः।<br>संस्थाप्य यादवांस्तत्र तावेतौ बलकेशवौ॥ ३१ | श्रीकृष्णने कुशल शिल्पकारोंसे द्वारकापुरीका जीर्णोद्धार कराया, सभी यादवोंको वहाँ बसाकर वे श्रीकृष्ण और बलराम तत्काल मथुरा लौटकर उस |
५२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तरसा मथुरामेत्य संस्थितौ निर्जनां पुरीम्।<br>तदा तत्रैव सम्प्राप्तो बलवान् यवनाधिपः॥ ३२<br>ज्ञात्वैनमागतं कृष्णो निर्ययौ नगराद् बहिः।<br>पदातिरग्रे तस्याभूद्यवनस्य जनार्दनः॥ ३३<br>पीताम्बरधरः श्रीमान्प्राहसन्मधुसूदनः। | निर्जन पुरीमें रहने लगे। उसी समय शक्तिशाली कालयवन भी वहाँ आ गया। कालयवनको आया जानकर वे पीताम्बरधारी तथा ऐश्वर्यसम्पन्न मधुसूदन भगवान् जनार्दन नगरसे बाहर निकल पड़े और जोर-जोर हँसते हुए उसके आगे-आगे पैदल ही चलने लगे॥ ३१-३३ १/२ ॥ |
| तं दृष्ट्वा पुरतो यान्तं कृष्णं कमललोचनम्॥ ३४<br>यवनोऽपि पदातिः सन्पृष्ठतोऽनुगतः खलः।<br>प्रसुप्तो यत्र राजर्षिर्मुचुकुन्दो महाबलः॥ ३५<br>प्रययौ भगवान्स्तत्र सकालयवनो हरिः।<br>तत्रैवान्तर्दधे विष्णुर्मुचुकुन्दं समीक्ष्य च॥ ३६ | उन कमललोचन श्रीकृष्णको अपने आगे जाता देखकर वह दुष्ट कालयवन उनके पीछे-पीछे पैदल ही चलता रहा। तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण कालयवनसहित वहाँ पहुँच गये, जहाँ महाबली राजर्षि मुचुकुन्द शयन कर रहे थे। मुचुकुन्दको देखकर भगवान् कृष्ण वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ३४-३६॥ |
| तत्रैव यवनः प्राप्तः सुप्तभूतमपश्यत्।<br>मत्वा तं वासुदेवं स पादेनाताडयन्नृपम्॥ ३७ | वह कालयवन भी वहीं पहुँच गया। उसने देखा कि कोई सो रहा है। राजर्षि मुचुकुन्दको कृष्ण समझकर कालयवनने उनके ऊपर पैरसे प्रहार किया॥ ३७॥ |
| प्रबुद्धः क्रोधरक्ताक्षस्तं ददाह महाबलः।<br>तं दग्ध्वा मुचुकुन्दोऽथ ददर्श कमलेक्षणम्॥ ३८<br>वासुदेवं सुदेवेशं प्रणम्य प्रस्थितो वनम्।<br>जगाम द्वारकां कृष्णो बलदेवसमन्वितः॥ ३९ | [कालयवनद्वारा पाद-प्रहार किये जानेसे] वे जग गये और क्रोधसे आँखें लाल किये हुए महाबली मुचुकुन्दने [उसकी ओर दृष्टिपात करके] उसे भस्म कर दिया। उसे जलानेके बाद मुचुकुन्दने अपने समक्ष कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको उपस्थित देखा। तदनन्तर देवाधिदेव वासुदेवको प्रणाम करके वे वनकी ओर प्रस्थान कर गये। भगवान् श्रीकृष्ण भी बलरामको साथ लेकर द्वारकापुरी चले गये॥ ३८-३९॥ |
| उग्रसेनं नृपं कृत्वा विजहार यथारुचि।<br>अहरद्रुक्मिणीं कामं शिशुपालस्वयंवरात्॥ ४०<br>राक्षसेन विवाहेन चक्रे दारविधिं हरिः।<br>ततो जाम्बवतीं सत्यां मित्रविन्दाञ्च भामिनीम्॥ ४१<br>कालिन्दीं लक्ष्मणां भद्रां तथा नाग्नजितीं शुभाम्।<br>पृथक्पृथक्समानीयोप्युपयेमे जनार्दनः॥ ४२<br>अष्टावेव महीपाल पत्न्यः परमशोभनाः।<br>प्रासूत रुक्मिणी पुत्रं प्रद्युम्नं चारुदर्शनम्॥ ४३ | इस प्रकार उग्रसेनको पुनः राजा बनाकर वे इच्छापूर्वक विहार करने लगे। इसके बाद शिशुपालके साथ रुक्मिणीके सुनिश्चित किये गये विवाहहेतु आयोजित स्वयंवरसे भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीका हरण कर लिया और उसके साथ राक्षसविधिसे विवाह कर लिया। तत्पश्चात् जाम्बवती, सत्यभामा, मित्रविन्दा, कालिन्दी, लक्ष्मणा, भद्रा तथा नाग्नजिती—इन दिव्य सुन्दरियोंको बारी-बारीसे ले आकर श्रीकृष्णने उनके साथ भी पाणिग्रहण किया। हे भूपाल! श्रीकृष्णकी ये ही परम सुन्दर आठ पत्नियाँ थीं। इनमें रुक्मिणीने देखनेमें परम सुन्दर पुत्र प्रद्युम्नको जन्म दिया॥ ४०-४३॥ |
| जातकर्मादिकं तस्य चकार मधुसूदनः।<br>हृतोऽसौ सूतिकागेहाच्छम्बरेण बलीयसा॥ ४४<br>नीतश्च स्वपुरीं बालो मायावत्यै समर्पितः। | मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने उस बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये। महाबली शम्बरासुरने प्रसवगृहसे उस बालकका हरण कर लिया और उसे अपनी नगरीमें ले जाकर मायावतीको सौंप दिया॥ ४४ १/२॥ |
| अ० २४] | चतुर्थ स्कन्ध | ५२१ | | :--- | :--- |
| वासुदेवो हृतं दृष्ट्वा पुत्रं शोकसमन्वितः ॥ ४५<br><br>जगाम शरणं देवीं भक्तियुक्तेन चेतसा।<br>वृत्रासुरादयो दैत्या लीलयैव यया हताः ॥ ४६ | उधर, अपने पुत्रका हरण देखकर शोक-सन्तप्त वासुदेव श्रीकृष्णने भक्तिभावयुक्त हृदयसे उन भगवती योगमायाकी शरण ली, जिन्होंने वृत्रासुर आदि दैत्योंका लीलामात्रसे वध कर दिया था॥ ४५-४६॥ | | ततोऽसौ योगमायायाश्चकार परमां स्मृतिम्।<br>वचोभिः परमोदारैरक्षरैः स्तवनैः शुभैः ॥ ४७ | तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त सारगर्भित अक्षरों तथा वाक्योंसे युक्त मंगलमय स्तवनोंके द्वारा योगमायाका पुण्य-स्मरण करने लगे॥ ४७॥ | | श्रीकृष्ण उवाच<br>मातर्मया तितपसा परितोषिता त्वं<br>प्राग्जन्मनि प्रसुमनादिभिरर्चितासि।<br>धर्मात्मजेन बदरीवनखण्डमध्ये<br>किं विस्मृतो जननि ते त्वयि भक्तिभावः ॥ ४८ | श्रीकृष्ण बोले—हे माता! पूर्वकालमें मैंने धर्मपुत्र नारायणके रूपमें बदरिकाश्रममें घोर तपस्या करके तथा पुष्प आदिसे आपकी विधिवत् पूजा करके आपको प्रसन्न किया था। हे जननि! क्या अपने प्रति मेरे उस भक्तिभावको आपने विस्मृत कर दिया ? ॥ ४८॥ | | सूतीगृहादपहृतः किमु बालको मे<br>केनापि दुष्टमनसाप्यथ कौतुकाद्वा।<br>मानापहारकरणाय ममाद्य नूनं<br>लज्जा तवाम्ब खलु भक्तजनस्य युक्ता ॥ ४९ | किस कुत्सित हृदयवाले दुराचारीने प्रसूतिगृहसे मेरे पुत्रका हरण कर लिया? अथवा किसीने मेरा अभिमान दूर करनेके लिये कौतूहलवश यह प्रपंच रच दिया है। हे अम्ब! चाहे जो हो, किंतु आज अपने भक्तजनकी लाज रखना आपका परमोचित कर्तव्य है॥ ४९॥ | | दुर्गो महानतितरां नगरी सुगुप्ता<br>तत्रापि मेऽस्ति सदनं किल मध्यभागे।<br>अन्तःपुरे च पिहितं ननु सूतिगेहं<br>बालो हृतः खलु तथापि ममैव दोषात् ॥ ५० | चारों ओर दुस्तर खाइयोंसे अति सुरक्षित मेरी नगरी है, उसमें भी मेरा भवन मध्य भागमें स्थित है और उस भवनके अन्तःपुरमें प्रसूतिगृह स्थित है, जिसके दरवाजे बन्द रहते हैं; फिर भी मेरे पुत्रका हरण हो गया। यह तो मेरे दोषके ही कारण हुआ॥ ५०॥ | | नाहं गतः परपुरं न च यादवाश्च<br>रक्षावतीव नगरी किल वीरवर्यैः।<br>माया तवैव जननि प्रकटप्रभावा<br>मे बालकः परिहृतः कुहकेन केन ॥ ५१ | मैं द्वारकापुरी छोड़कर किसी अन्य नगरमें नहीं गया और यादवगण भी वहाँसे कहीं नहीं गये थे। महान् वीरोंके द्वारा नगरीकी पूर्ण सुरक्षा की गयी थी। हे माता! इसमें तो मुझे आपकी ही मायाका प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित हो रहा है, जिसकी प्रेरणासे किसी मायावीने मेरे पुत्रका हरण कर लिया है॥ ५१॥ | | नो वेद्यहं जननि ते चरितं सुगुप्तं<br>को वेद मन्दमतिरल्पविदेव देही।<br>क्वासौ गतो मम भटैर्न च वीक्षितो वा<br>हर्त्ताम्बिके जवनिका तव कल्पितेयम् ॥ ५२ | हे माता! जब मैं आपके अत्यन्त गुप्त चरित्रको नहीं जान पाया तो फिर मन्दबुद्धि तथा अल्पज्ञ ऐसा कौन प्राणी होगा, जो आपके चरित्रको जान सकता है। मेरे पुत्रका हरण करनेवाला कहाँ चला गया, जिसे मेरे सैनिक देखतक नहीं पाये, हे अम्बिके! यह आपकी ही रची हुई मायाका प्रभाव है॥ ५२॥ |
| ५२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० २४ |
|---|
| चित्रं न तेऽत्र पुरतो मम मातृगर्भो<br>नीतस्त्वयार्धसमये किल माययासौ।<br>यं रोहिणी हलधरं सुषुवे प्रसिद्धं<br>दूरे स्थिता पतिपरा मिथुनं विनापि॥५३ | आपके लिये यह कोई विचित्र बात नहीं है; क्योंकि मेरे प्रकट होनेके पूर्व आपने अपनी मायाके प्रभावसे माता देवकीके पाँच महीनेके गर्भको खींचकर [माता रोहिणीके गर्भमें] स्थापित कर दिया था। वसुदेवजी कारागारमें निरुद्ध थे; उनसे दूर रहती हुई पतिपरायणा माता रोहिणीने सम्पर्कके बिना ही उसे जन्म दिया, जो हलधर नामसे प्रसिद्ध हुआ॥५३॥ | | सृष्टिं करोषि जगतामनुपालनं च<br>नाशं तथैव पुनरप्यनिशं गुणैस्त्वम्।<br>को वेद तेऽम्ब चरितं दुरितान्तकारि<br>प्रायेण सर्वमखिलं विहितं त्वयैतत्॥५४ | हे अम्ब! आप सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके द्वारा जगत्का सृजन, पालन तथा संहार निरन्तर करती रहती हैं। हे जननि! आपके पापनाशक चरित्रको कौन जान सकता है? वास्तविकता तो यह है कि यह सम्पूर्ण जगत्प्रपंच आपके ही द्वारा विरचित है॥५४॥ | | उत्पाद्य पुत्रजननप्रभवं प्रमोदं<br>दत्त्वा पुनर्वरहजं किल दुःखभारम्।<br>त्वं क्रीडसे सुललितैः खलु तैर्विहारै-<br>र्नो चेत्कथं मम सुताप्तिरतिर्वृथा स्यात्॥५५ | आप पहले प्राणियोंके समक्ष पुत्र-जन्मसे होनेवाले असीम आनन्दको उपस्थित करके पुनः पुत्र-वियोगजनित दुःखका भार उनके ऊपर ला देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन सुललित प्रपंचोंकी रचना करके आप अपना मनोरंजन करती हैं। यदि ऐसा न होता तो पुत्र-प्राप्तिजनित मेरा आनन्द व्यर्थ क्यों होता?॥५५॥ | | मातास्य रोदिति भृशं कुररीव बाला<br>दुःखं तनोति मम सन्निधिगा सदैव।<br>कष्टं न वेत्सि ललितेऽप्रमितप्रभावे<br>मातस्त्वमेव शरणं भवपीडितानाम्॥५६ | हे अमित प्रभाववाली भगवति! इस बालककी माता कुररी पक्षीकी भाँति रो रही है। वह बेचारी सदा मेरे पास ही रहती है, जिसे देखकर मेरा दुःख और भी बढ़ जाता है। हे माता! आप ही तो भवव्याधिसे पीड़ित प्राणियोंकी एकमात्र शरण हैं; हे ललिते! आप उसका दुःख क्यों नहीं समझ रही हैं?॥५६॥ | | सीमा सुखस्य सुतजन्म तदीयनाशो<br>दुःखस्य देवि भवने विबुधा वदन्ति।<br>तत्किं करोमि जननि प्रथमे प्रनष्टे<br>पुत्रे ममाद्य हृदयं स्फुटतीव मातः॥५७ | हे देवि! विद्वज्जन कहते हैं कि पुत्र-जन्मके अवसरपर सुखकी कोई सीमा नहीं रहती तथा उसके नष्ट हो जानेपर दुःखकी भी सीमा नहीं रहती। हे जननि! अब मैं क्या करूँ? हे माता! अपने प्रथम पुत्रके विनष्ट हो जानेपर मेरा हृदय अब विदीर्ण होता जा रहा है॥५७॥ | | यज्ञं करोमि तव तुष्टिकंर व्रतं वा<br>दैवं च पूजनमथाखिलदुःखहा त्वम्।<br>मातः सुतोऽत्र यदि जीवति दर्शयाशु<br>त्वं वै क्षमा सकलशोकविनाशनाय॥५८ | मैं आपको प्रसन्न करनेवाला अम्बायज्ञ करूँगा, नवरात्रव्रत करूँगा और विधि-विधानसे आपका पूजन करूँगा; क्योंकि आप सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेवाली हैं। हे माता! यदि मेरा पुत्र जीवित हो तो आप मुझे शीघ्र उसे दिखा दीजिये; क्योंकि आप समस्त प्रकारके शोकोंका शमन करनेमें समर्थ हैं॥५८॥ |
| अ० २५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५२३ |
|---|
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>प्रत्यक्षदर्शना भूत्वा तमुवाच जगद्गुरुम्॥ ५९ | व्यासजी बोले— असाध्य-से-असाध्य कार्योंको भी सहज भावसे कर सकनेमें समर्थ भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती उन जगद्गुरु वासुदेवके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होकर बोलीं—॥ ५९॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>शोकं मा कुरु देवेश शापोऽयं ते पुरातनः।<br>तस्य योगेन पुत्रस्ते शम्बरेण हतो बलात्॥ ६० | श्रीदेवी बोलीं— हे देवेश! आप शोक न करें। यह आपका पूर्वजन्मका शाप है; उसीके परिणामस्वरूप शम्बरासुरने आपके पुत्रका बलपूर्वक हरण कर लिया है॥ ६०॥ |
| अतस्ते षोडशे वर्षे हत्वा तं शम्बरं बलात्।<br>आगमिष्यति पुत्रस्ते मत्प्रसादान्न संशयः॥ ६१ | सोलह वर्षका हो जानेपर वह पुत्र मेरी कृपासे उस शम्बरासुरका संहार करके स्वयं ही घर आ जायगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६१॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी चण्डिका चण्डविक्रमा।<br>भगवानपि पुत्रस्य शोकं त्यक्त्वाभवत्सुखी॥ ६२ | व्यासजी बोले— ऐसा कहकर प्रचण्ड पराक्रमसे सम्पन्न भगवती चण्डिका अन्तर्धान हो गयीं और भगवान् श्रीकृष्ण भी पुत्र-शोक त्यागकर प्रसन्न हो गये॥ ६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देव्या कृष्णशोकापनोदनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः
व्यासजीद्वारा शाम्भवी मायाकी बलवत्ताका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा शिवजीकी प्रसन्नताके लिये तप करना और शिवजीद्वारा उन्हें वरदान देना
| राजोवाच<br>सन्देहो मे मुनिश्रेष्ठ जायते वचनात्तव।<br>वैष्णवांशे भगवति दुःखोत्पत्तिं विलोक्य च॥ १ | राजा बोले— हे मुनिवर! आपकी इस बातसे तथा साक्षात् विष्णुके अंशावतार भगवान् कृष्णके ऊपर कष्टका पड़ना देखकर मुझे सन्देह हो रहा है॥ १॥ |
| नारायणांशसम्भूतो वासुदेवः प्रतापवान्।<br>कथं स सूतिकागाराद्धृतो बालो हरेरपि॥ २ | भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न श्रीकृष्ण [अपरिमित] प्रतापसे सम्पन्न थे, फिर भी भगवान्के उस पुत्रका प्रसव-गृहसे हरण कैसे सम्भव हुआ?॥ २॥ |
| सुगुप्तनगरे रम्ये गुप्तेऽथ सूतिकागृहे।<br>प्रविश्य तेन दैत्येन गृहीतोऽसौ कथं शिशुः॥ ३ | वह दैत्य शम्बरासुर चारों ओरसे भलीभाँति सुरक्षित रमणीय नगरके अत्यन्त गुप्त स्थानमें अवस्थित प्रसव-गृहमें प्रवेश करके उस बालकको कैसे उठा ले गया?॥ ३॥ |
| न ज्ञातो वासुदेवेन चित्रमेतन्ममाद्भुतम्।<br>जायते महदाश्चर्यं चित्ते सत्यवतीसुत॥ ४ | यह बड़ी विचित्र तथा अद्भुत बात है कि भगवान् श्रीकृष्ण भी इसे नहीं जान पाये। हे सत्यवतीनन्दन! मेरे मनमें [इस बातको लेकर] महान् आश्चर्य उत्पन्न हो रहा है!॥ ४॥ |
५२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
५२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रूहि तत्कारणं ब्रह्मन् ज्ञातं केशवेन यत्।<br>हरणं तत्रसंस्थेन शिशोर्वा सूतिकागृहात्॥ ५ | हे ब्रह्मन्! वहाँ द्वारकापुरीमें वासुदेव श्रीकृष्णके विद्यमान रहते हुए भी सूतिका-गृहसे बच्चेके हरणकी जानकारी उन्हें नहीं हो सकी; मुझे इसका कारण बताइये॥ ५॥ |
| व्यास उवाच<br>माया बलवती राजन्नराणां बुद्धिमोहिनी।<br>शाम्भवी विश्रुता लोके को वा मोहं न गच्छति॥ ६ | व्यासजी बोले—हे राजन्! प्राणियोंके बुद्धिको विमोहित कर देनेवाली माया बड़ी बलवती होती है; यह शाम्भवी नामसे प्रसिद्ध है। संसारमें कौन-सा प्राणी है, जो [इस मायाके प्रभावसे] मोहित नहीं हो जाता है॥ ६॥ |
| मानुषं जन्म सम्प्राप्य गुणाः सर्वेऽपि मानुषाः।<br>भवन्ति देहजाः कामं न देवा नासुरास्तदा॥ ७ | मनुष्य-जन्म पाते ही प्राणीमें समस्त मानवोचित गुण उत्पन्न हो जाते हैं। ये सभी गुण देहसे सम्बन्ध रखते हैं। देवता अथवा दानव—कोई भी इससे परे नहीं है॥ ७॥ |
| क्षुत्तृण्निद्रा भयं तन्द्रा व्यामोहः शोकसंशयः।<br>हर्षश्चैवाभिमानश्च जरामरणमेव च॥ ८<br><br>अज्ञानं ग्लानिरप्रीतिरीर्ष्यासूया मदः श्रमः।<br>एते देहभवा भावाः प्रभवन्ति नराधिप॥ ९ | भूख, प्यास, निद्रा, भय, तन्द्रा, व्यामोह, शोक, सन्देह, हर्ष, अभिमान, बुढ़ापा, मृत्यु, अज्ञान, ग्लानि, वैर, ईर्ष्या, परदोषदृष्टि, मद और थकावट—ये देहके साथ उत्पन्न होते हैं। हे राजन्! ये भाव सभीपर अपना प्रभाव डालते हैं॥ ८-९॥ |
| यथा हेममृगं रामो न बुबोध पुरोगतम्।<br>जानक्या हरणञ्चैव जटायुमरणं तथा॥ १० | जिस प्रकार श्रीराम अपने समक्ष विचरणशील स्वर्ण-मृगकी वास्तविकताको नहीं जान पाये और वे सीताहरण तथा जटायुमरणकी घटना भी नहीं जान सके॥ १०॥ |
| अभिषेकदिने रामो वनवासं न वेद च।<br>तथा न ज्ञातवान् रामः स्वशोकान्मरणं पितुः॥ ११ | श्रीराम यह भी नहीं जान सके कि अभिषेकके दिन ही उन्हें वनवास होगा और वे अपने वियोगजनित शोकसे पिताकी मृत्यु भी नहीं जान पाये॥ ११॥ |
| अज्ञवद्विचचारासौ पश्यमानो वने वने।<br>जानकीं न विवेदाथ रावणेन हृतां बलात्॥ १२ | रावणके द्वारा बलपूर्वक हरी गयी सीताके सम्बन्धमें श्रीराम कुछ भी नहीं जान सके थे और एक अज्ञानी पुरुषकी भाँति उन्हें खोजते हुए वन-वनमें भटकते रहे॥ १२॥ |
| सहायान् वानरान्कृत्वा हत्वा शक्रसुतं बलात्।<br>सागरे सेतुबन्धञ्च कृत्वोत्तीर्य सरित्पतिम्॥ १३<br><br>प्रेषयामास सर्वासु दिक्षु तान्कपिपुङ्गवान्।<br>संग्रामं कृतवान्घोरं दुःखं प्राप रणाजिरे॥ १४ | तदनन्तर उन्होंने बलपूर्वक वालीका वध करके वानरोंको अपना सहायक बनाकर सागरपर सेतु बाँधा और पुनः उस समुद्रको पार करके उन्होंने सभी दिशाओंमें बड़े-बड़े शूरवीर वानरोंको भेजा। तत्पश्चात् संग्रामभूमिमें रावणके साथ घोर युद्ध किया, जिसमें उन्हें महान् कष्ट उठाना पड़ा॥ १३-१४॥ |
| बन्धनं नागपाशेन प्राप रामो महाबलः।<br>गरुडान्मोक्षणं पश्चादन्वभूद्रघुनन्दनः॥ १५ | महाबली होते हुए भी श्रीरामको नागपाशमें बँधना पड़ा; बादमें गरुड़की सहायतासे वे रघुनन्दन बन्धनमुक्त हुए॥ १५॥ |
| अ० २५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५२५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अहनद्रावणं संख्ये कुम्भकर्णं महाबलम्।<br>मेघनादं निकुम्भञ्च कुपितो रघुनन्दनः॥ १६ | श्रीरामने कोप करके समरभूमिमें रावण, महाबली कुम्भकर्ण, मेघनाद तथा निकुम्भका संहार किया॥ १६॥ |
| अदूष्यत्वञ्च जानक्या न विवेद जनार्दनः।<br>दिव्यञ्च कारयामास ज्वलितेऽग्नौ प्रवेशनम्॥ १७ | भगवान् श्रीरामको जानकीकी निर्दोषताका भी परिज्ञान नहीं हो सका और उन्होंने शुद्धताकी परीक्षाहेतु प्रज्वलित अग्निमें उनका प्रवेश कराया॥ १७॥ |
| लोकापवादाच्च परं ततस्तत्याज तां प्रियाम्।<br>अदूष्यां दूषितां मत्वा सीतां दशरथात्मजः॥ १८ | तत्पश्चात् दशरथपुत्र श्रीरामने परम पवित्र तथा प्रिय सीताको लोकनिन्दाके भयसे दूषित मानकर उनका परित्याग कर दिया॥ १८॥ |
| न ज्ञातौ स्वसुतौ तेन रामेण च कुशीलवौ।<br>मुनिना कथितौ तौ तु तस्य पुत्रौ महाबलौ॥ १९ | वे श्रीराम अपने पुत्रों लव-कुशको नहीं पहचान सके। बादमें महर्षि वाल्मीकिने उन्हें बताया कि वे दोनों महाबली बालक उन्हींके पुत्र हैं॥ १९॥ |
| पातालगमनं चैव जानक्या ज्ञातवान्न च।<br>राघवः कोपसंयुक्तो भ्रातरं हन्तुमुद्यतः॥ २० | वे रघुनन्दन श्रीराम सीताके पाताल जानेकी भी बात नहीं जान पाये। वे कुपित होकर भाईका वध करनेको उद्यत हो गये॥ २०॥ |
| कालस्यागमनञ्चैव न विवेद खरान्तकः।<br>मानुषं देहमाश्रित्य चक्रे मानुषचेष्टितम्॥ २१ | दानव खरके संहारक श्रीरामको कालके आगमनका भी ज्ञान नहीं हो सका। मानव-शरीर धारण करके उन्होंने मनुष्योंके समान कार्य किये॥ २१॥ |
| तथैव मानुषान्भावान्नात्र कार्या विचारणा।<br>पूर्वं कंसभयात्प्राप्तो गोकुले यदुनन्दनः॥ २२<br><br>जरासन्धभयात्पश्चाद् द्वारवत्यां गतो हरिः।<br>अधर्मं कृतवान्कृष्णो रुक्मिण्या हरणञ्च यत्॥ २३<br><br>शिशुपालवृतायाश्च जानन्धर्मं सनातनम्।<br>शुशोच बालकं कृष्णः शम्बरेण हतं बलात्॥ २४<br><br>मुमोद जानन्पुत्रं तं हर्षशोकयुतस्ततः। | ऐसे ही श्रीकृष्णने भी सभी मानवोचित भाव प्रदर्शित किये, इस विषयमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। यदुनन्दन श्रीकृष्ण पहले कंसके भयसे गोकुल जानेको विवश हुए। कुछ समयके पश्चात् जरासन्धके भयसे मथुरा छोड़कर श्रीकृष्णको द्वारका जाना पड़ा। वे ही श्रीकृष्ण अधर्मपूर्ण कार्य करनेमें प्रवृत्त हुए जो कि उन्होंने सनातन धर्मको जानते हुए भी शिशुपालके द्वारा वरण की गयी रुक्मिणीका हरण कर लिया। शम्बरासुरके द्वारा पुत्रका बलपूर्वक हरण कर लिये जानेपर उसके लिये श्रीकृष्ण शोकाकुल हो उठे और [ भगवतीसे ] पुत्रके जीवित होनेकी बात जानकर वे प्रसन्न हो गये। इस प्रकार हर्ष तथा शोक—इन दोनोंसे वे प्रभावित रहे॥ २२—२४ १/२॥ |
| सत्यभामाज्ञया यत्तु युयुधे स्वर्गतः किल॥ २५<br><br>इन्द्रेण पादपार्थं तु स्त्रीजितत्वं प्रकाशयन्।<br>जहार कल्पवृक्षं यः पराभूय शतक्रतुम्॥ २६<br><br>मानिनीमानरक्षार्थं हरिश्चित्रधरः प्रभुः।<br>बद्ध्वा वृक्षे हरिं सत्या नारदाय ददौ पतिम्॥ २७<br>दत्त्वाथ कनकं कृष्णं मोचयामास भामिनी। | सत्यभामाकी आज्ञासे स्वर्गमें जाकर कल्पवृक्षके लिये उन्होंने इन्द्रके साथ युद्ध किया। युद्धमें इन्द्रको परास्त करके अपना स्त्रीवशित्व प्रकट करते हुए श्रीकृष्णने इन्द्रसे वह कल्पवृक्ष छीन लिया था। मानिनी सत्यभामाका मान रखनेके लिये प्रभु श्रीकृष्ण काष्ठमूर्तिके रूपमें चित्रित हो गये और सत्यभामाने पति कृष्णको वृक्षमें बाँधकर उन्हें नारदको दान कर दिया। तत्पश्चात् सत्यभामाने सोनेका कृष्ण दानमें देकर उन्हें नारदजीसे मुक्त कराया॥ २५—२७ १/२॥ |
| ५२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
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| दृष्ट्वा पुत्रानुरुगुणान्प्रद्युम्नप्रमुखानथ॥ २८<br>कृष्णं जाम्बवती दीना ययाचे सन्ततिं शुभाम्।<br>स ययौ पर्वतं कृष्णास्तपस्याकृतनिश्चयः॥ २९ | रुक्मिणीके प्रद्युम्न आदि विशिष्ट गुणसम्पन्न पुत्रोंको देखकर दीनभावसे जाम्बवतीने कृष्णसे सुन्दर सन्तानहेतु याचना की, तब तपस्या करनेका निश्चय करके वे पर्वतपर चले गये, जहाँ महान् तपस्वी तथा शिवभक्त मुनि उपमन्यु विराजमान थे॥ २८-२९ १/२॥ |
| उपमन्युर्मुनिर्यत्र शिवभक्तः परन्तपः।<br>उपमन्युं गुरुं कृत्वा दीक्षां पाशुपतीं हरिः॥ ३०<br>जग्राह पुत्रकामस्तु मुण्डी दण्डी बभूव ह।<br>उग्रं तत्र तपस्तेपे मासमेकं फलाशनः॥ ३१<br>जजाप शिवमन्त्रं तु शिवध्यानपरो हरिः।<br>द्वितीये तु जलाहारस्तिष्ठन्नेकपदा हरिः॥ ३२<br>तृतीये वायुभक्षस्तु पादाङ्गुष्ठाग्रसंस्थितः।<br>षष्ठे तु भगवान् रुद्रः प्रसन्नो भक्तिभावतः॥ ३३<br>दर्शनञ्च ददौ तत्र सोमः सोमकलाधरः।<br>आजगाम वृषारूढः सुरैरिन्द्रादिभिर्वृतः॥ ३४<br>ब्रह्मविष्णुयुतः साक्षाद्यक्षगन्धर्वसेवितः।<br>सम्बोधयन्वासुदेवं शङ्करस्तमुवाच ह॥ ३५<br>तुष्टोऽस्मि कृष्ण तपसा तवोग्रेण महामते।<br>ददामि वाञ्छितान्कामान्ब्रूहि यादवनन्दन॥ ३६<br>मयि दृष्टे कामपूरे कामशेषो न सम्भवेत्। | वहाँपर पुत्राभिलाषी श्रीकृष्णने उपमन्युको अपना गुरु बनाकर उनसे पाशुपत-दीक्षा ली और वे वहींपर मुण्डित होकर दण्डी हो गये। महीनेभर फलाहार करते हुए श्रीकृष्णने घोर तपस्या की और शिवके ध्यानमें लीन होकर शिवमन्त्रका जप किया। दूसरे महीनेमें केवल जल पीकर और एक पैरसे खड़े होकर श्रीकृष्णने कठोर तप किया। तीसरे महीनेमें वे वायुभक्षण करते हुए पैरके अँगूठेके अग्रभागपर स्थित रहे। तत्पश्चात् छठे महीनेमें भगवान् रुद्र उनके भक्तिभावसे प्रसन्न हो गये और उन चन्द्रकलाधारी भगवान् शंकरने पार्वतीसहित उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे नन्दी बैलपर सवार होकर वहाँ आये थे और इन्द्र आदि देवताओंसे घिरे हुए थे। उस समय ब्रह्मा और विष्णु भी उनके साथ थे तथा साक्षात् यक्ष और गन्धर्व उनकी निरन्तर सेवा कर रहे थे। उन वासुदेव श्रीकृष्णको सम्बोधित करते हुए शंकरजीने कहा—हे कृष्ण! हे महामते! तुम्हारी इस कठोर तपस्यासे मैं प्रसन्न हूँ। अतः हे यादवनन्दन! तुम अपने वांछित मनोरथ बताओ, मैं उन्हें दूँगा। सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले मुझ शिवका दर्शन हो जानेपर कोई भी कामना शेष नहीं रह जाती॥ ३०-३६ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>तं दृष्ट्वा शङ्करं तुष्टं भगवान्देवकीसुतः॥ ३७<br>पपात पादयोस्तस्य दण्डवत्प्रेमसंयुतः।<br>स्तुतिं चकार देवेशो मेघगम्भीरया गिरा॥ ३८<br>स्थितस्तु पुरतः शम्भोर्वासुदेवः सनातनः। | व्यासजी बोले—उन भगवान् शंकरको प्रसन्न देखकर देवकीनन्दन श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक उनके चरणोंमें दण्डकी भाँति गिर पड़े। तदनन्तर देवेश्वर सनातन श्रीकृष्ण शंकरजीके सम्मुख खड़े होकर मेघ-सदृश गम्भीर वाणीमें उनकी स्तुति करने लगे॥ ३७-३८ १/२॥ |
| श्रीकृष्ण उवाच<br>देवदेव जगन्नाथ सर्वभूतार्तिनाशन॥ ३९<br>विश्वयोने सुरारिघ्न नमस्त्रैलोक्यकारक।<br>नीलकण्ठ नमस्तुभ्यं शूलिने ते नमो नमः॥ ४०<br>शैलजावल्लभायाथ यज्ञघ्नाय नमोऽस्तु ते।<br>धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं दर्शनात्तव सुव्रत॥ ४१ | श्रीकृष्ण बोले—हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे सभी प्राणियोंके कष्टके विनाशक! हे विश्वयोने! हे दैत्यमर्दन! हे त्रैलोक्यकारक! आपको नमस्कार है। हे नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है, आप त्रिशूलधारीको बार-बार नमस्कार है। दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाले आप पार्वतीवल्लभको नमस्कार है। हे सुव्रत! आपके |