देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| २३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| अहिंसा परमो धर्मो विप्राणां नात्र संशयः।<br>दया सर्वत्र कर्तव्या ब्राह्मणेन विजानता॥ ३९<br>यज्ञादन्यत्र विप्रेन्द्र न हिंसा याज्ञिकी मता। | लिये अहिंसा परम धर्म है, इसमें सन्देह नहीं। अतः विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि वह सर्वत्र दया करे। हे विप्रवर! यज्ञसे अतिरिक्त कहीं भी की गयी हिंसा याज्ञिकी हिंसा नहीं कही गयी है॥ ३५-३९ १/२ ॥ | | उत्तङ्क उवाच | उत्तंक बोले— | | सर्पयोनेर्विनिर्मुक्तो ब्राह्मणोऽसौ रुरुस्ततः॥ ४०<br>कृत्वा तस्य च शापान्तं परित्यक्तं च हिंसनम्।<br>विवाहिता तेन बाला मृता सञ्जीविता पुनः॥ ४१ | तब वह ब्राह्मण सर्पयोनिसे मुक्त हो गया। इस प्रकार उस ब्राह्मणके शापका अन्त करके रुरुने भी हिंसा छोड़ दी। उन्होंने मरी हुई उस सुन्दरीको पुनः जीवित कर दिया और उसके साथ विवाह कर लिया॥ ४०-४१॥ | | कदनं सर्वसर्पाणां कृतं वैरमनुस्मरन्।<br>त्वं तु वैरं समुत्सृज्य वर्तसे पन्नगेष्वथ॥ ४२<br>विमन्युर्भरतश्रेष्ठ पितृघातकरेषु वै।<br>अन्तरिक्षे मृतस्तातः स्नानदानविवर्जितः॥ ४३<br>तस्योद्धारं च राजेन्द्र कुरु हत्वाथ पन्नगान्।<br>पितुर्वैरं न जानाति जीवन्नेव मृतो हि सः॥ ४४<br>दुर्गतिस्ते पितुस्तावद्यावत्तान्न हनिष्यसि।<br>अम्बामखमिशं कृत्वा कुरु यज्ञं नृपोत्तम॥ ४५<br>सर्पसत्रं महाराज पितुर्वैरमनुस्मरन्। | हे राजन्! उस मुनिने इस प्रकार शत्रुताका स्मरण करते हुए सभी सर्पोंका संहार किया था, परंतु हे भरतश्रेष्ठ! आप तो वैर भूलकर अपने पिताको मारनेवाले सर्पोंके प्रति क्रोधशून्य बने रहते हैं। आपके पिता स्नान-दान किये बिना अन्तरिक्षमें ही मर गये। इसलिये हे राजेन्द्र! सर्पोंका नाश करके आप उनका उद्धार कीजिये। जो पुत्र पिताके शत्रुओंसे बदला नहीं लेता, वह जीते हुए भी मृतकवत् है। हे नृपश्रेष्ठ! जबतक आप सर्पोंका विनाश नहीं करते, तबतक आपके पिताकी दुर्गति ही रहेगी। हे महाराज! आप देवीयज्ञके व्याजसे अपने पिताकी शत्रुताका स्मरण करते हुए सर्पसत्र नामक यज्ञ कीजिये॥ ४२—४५ १/२ ॥ | | सूत उवाच | सूतजी बोले— | | इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा जन्मेजयस्तदा॥ ४६<br>नेत्राभ्यामश्रुपातं च चकारातीव दुःखितः।<br>धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धेर्वृथा मानकरस्य वै॥ ४७<br>पिता यस्य गतिं घोरां प्राप्तः पन्नगपीडितः।<br>अद्याहं मखमारभ्य करोम्यपचितिं पितुः॥ ४८<br>हत्वा सर्पानसन्दिग्धो दीप्यमाने विभावसौ। | उत्तंकमुनिका यह वचन सुनकर राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखी हुए और उनके नेत्रोंसे अश्रुपात होने लगा। [वे मनमें सोचने लगे] जिसके पिता सर्पसे दंशित होकर इस प्रकार गतिको प्राप्त हों, उस मुझ मिथ्याभिमानी तथा दुर्बुद्धिको धिक्कार है। मैं आज ही यज्ञ आरम्भ करके प्रज्वलित अग्निमें सर्पोंकी आहुति देकर अवश्य ही पिताकी मृत्युका बदला लूँगा॥ ४६—४८ १/२ ॥ | | आहूय मन्त्रिणः सर्वान् राजा वचनमब्रवीत्॥ ४९<br>कुर्वन्तु यज्ञसम्भारं यथार्हं मन्त्रिसत्तमाः।<br>गङ्गातीरे शुभां भूमिं मापयित्वा द्विजोत्तमैः॥ ५० | सभी मन्त्रियोंको बुलाकर राजाने यह वचन कहा—हे मन्त्रिप्रवरो! गंगाके किनारे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे उत्तम भूमिकी माप कराकर आपलोग यथोचित यज्ञसामग्रीका प्रबन्ध करें। हे मेरे बुद्धिमान् मन्त्रियो! सौ खंभोंवाले एक सुरम्य मण्डपका निर्माण कराकर |
| अ० ११] | द्वितीय स्कन्ध | २३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कुर्वन्तु मण्डपं स्वस्थाः शतस्तम्भं मनोहरम्।<br>वेदी यज्ञस्य कर्तव्या ममाद्य सचिवाः खलु॥ ५१<br><br>तदङ्गत्वे विधेयो वै सर्पसत्रः सुविस्तरः।<br>तक्षकस्तु पशुस्तत्र होतोत्तङ्को महामुनिः॥ ५२<br><br>शीघ्रमाहूयतां विप्राः सर्वज्ञा वेदपारगाः। | आपलोग उसमें आज ही यज्ञके लिये वेदीका भी निर्माण सम्पन्न करा लें। उस यज्ञके अंगरूपमें विस्तारसहित सर्पसत्र भी करना है। महामुनि उतंक उस यज्ञके होता होंगे और तक्षकनाग उसमें यज्ञपशु होगा। आपलोग शीघ्र ही सर्वज्ञाता एवं वेदपारगामी ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करें॥ ४९—५२ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>मन्त्रिणस्तु तदा चक्रुर्भूपवाक्यैर्विचक्षणाः॥ ५३<br><br>यज्ञस्य सर्वसम्भारं वेदीं यज्ञस्य विस्तृताम्।<br>हवने वर्तमाने तु सर्पाणां तक्षको गतः॥ ५४<br><br>इन्द्रं प्रति भयार्तोऽहं त्राहि मामिति चाब्रवीत्।<br>भयभीतं समाश्वास्य स्वासने सन्निवेश्य च॥ ५५ | **सूतजी बोले—**बुद्धिमान् मन्त्रियोंने राजाके कथनानुसार यज्ञसम्बन्धी समस्त सामग्रीका प्रबन्ध कर लिया और विस्तृत यज्ञवेदी भी निर्मित करायी। सर्पोंका हवन आरम्भ होनेपर तक्षक इन्द्रके यहाँ गया और उनसे बोला—मैं भयाकुल हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। तत्पश्चात् इन्द्रने उस भयभीत तक्षकको सान्त्वना देकर अपने आसनपर बैठाकर उसे अभय प्रदान किया और कहा—हे पन्नग! तुम निर्भय हो जाओ॥ ५३—५५ १/२॥ |
| ददावभयमत्यर्थं निर्भयो भव पन्नग।<br>तमिन्द्रशरणं ज्ञात्वा मुनिर्दत्ताभयं तथा॥ ५६<br><br>उत्तङ्कोऽह्वयदुद्विग्नः सेन्द्रं कृत्वा निमन्त्रणम्।<br>स्मृतस्तदा तक्षकेण यायावरकुलोद्भवः॥ ५७<br><br>आस्तीको नाम धर्मात्मा जरत्कारुसुतो मुनिः।<br>तत्रागत्य मुनेर्बालस्तुष्टाव जनमेजयम्॥ ५८ | तदनन्तर उतंकमुनि उस तक्षकको इन्द्रका शरणागत और उनसे अभयदान पाया हुआ जानकर उद्विग्न हो उठे और उन्होंने मन्त्रप्रभावसे इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया। तब तक्षकने यायावरवंशमें उत्पन्न जरत्कारुपुत्र धर्मनिष्ठ आस्तीक-नामक मुनिका स्मरण किया। वे मुनिबालक आस्तीक वहाँ आकर जनमेजयकी प्रशंसा करने लगे॥ ५६—५८॥ |
| राजा तमर्चयामास दृष्ट्वा बालं सुपण्डितम्।<br>अर्चयित्वा नृपस्तं तु छन्दयामास वाञ्छितैः॥ ५९ | राजा जनमेजयने उस बालकको महान् पण्डित देखकर उसकी पूजा की। पूजन-अर्चन करके राजाने अपनी मनोवांछित वस्तु माँगनेके लिये उससे निवेदन किया॥ ५९॥ |
| स तु वव्रे महाभाग यज्ञोऽयं विरमत्विति।<br>सत्यबद्धो नृपस्तेन प्रार्थितश्च पुनस्तथा॥ ६० | तब आस्तीकने याचना की—हे महाभाग! इस यज्ञको समाप्त किया जाय। उसने सत्य वचनमें आबद्ध राजासे बार-बार ऐसी प्रार्थना की॥ ६०॥ |
| होमं निवर्तयामास सर्पाणां मुनिवाक्यतः।<br>भारतं श्रावयामास वैशम्पायन विस्तरात्॥ ६१ | तत्पश्चात् मुनिके वचनानुसार राजाने सर्पोंका हवन बन्द कर दिया और फिर वैशम्पायनऋषिने उन्हें विस्तारपूर्वक महाभारतकी कथा सुनायी॥ ६१॥ |
| श्रुत्वापि नृपतिः कामं न शान्तिमभिजग्मिवान्।<br>व्यासं पप्रच्छ भूपालो मम शान्तिः कथं भवेत्॥ ६२ | उस कथाको सुनकर भी राजाको विशेष शान्ति नहीं प्राप्त हुई तब राजाने व्यासजीसे पूछा—मुझे किस प्रकार शान्ति मिलेगी? मेरा मन अशान्तिकी |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे<br>सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
| २३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| मनोऽतिदह्यते कामं किं करोमि वदस्व मे।<br>पिता मे दुर्भगस्यैव मृतः पार्थसुतात्मजः ॥ ६३<br><br>क्षत्रियाणां महाभाग सङ्ग्रामे मरणं वरम्।<br>रणे वा मरणं व्यास गृहे वा विधिपूर्वकम् ॥ ६४<br><br>मरणं न पितुर्मेऽभूदन्तरिक्षे मृतोऽवशः।<br>शान्त्युपायं वदस्वात्र त्वं च सत्यवतीसुत ॥ ६५<br>यथा स्वर्गं व्रजेदाशु पिता मे दुर्गतिं गतः ॥ ६६ | अग्निमें अत्यधिक दग्ध हो रहा है, मैं क्या करूँ ? मुझको बतलाइये। मुझ मन्दभाग्यके पिता और अर्जुनपौत्र परीक्षित् अकाल-मृत्युको प्राप्त हुए हैं। हे महाभाग ! युद्धमें होनेवाली मृत्यु ही क्षत्रियोंके लिये श्रेष्ठ होती है। हे व्यासजी ! रणमें अथवा घरमें विधिपूर्वक होनेवाली मृत्यु ही अच्छी मानी जाती है, किंतु मेरे पिताका वैसा मरण नहीं हुआ। वे तो असहाय अवस्थामें अन्तरिक्षमें मृत्युको प्राप्त हुए। हे सत्यवतीपुत्र ! आप उनकी शान्ति-प्राप्तिका कोई उपाय बतलाइये, जिससे दुर्गति को प्राप्त मेरे पिताजी शीघ्र ही स्वर्ग चले जायँ॥ ६२—६६॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे<br>सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
आस्तीकमुनिके जन्मकी कथा, कद्रू और विनताद्वारा सूर्यके घोड़ेके रंगके विषयमें शर्त लगाना और विनताको दासीभावकी प्राप्ति, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप
</div>| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच वचनं तत्र सभायां नृपतिं च तम् ॥ १ | **सूतजी बोले—**राजा जनमेजयका वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासने सभामें उन राजासे कहा—॥ १॥ |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराणं गुह्यमद्भुतम्।<br>पुण्यं भागवतं नाम नानाख्यानयुतं शिवम् ॥ २ | **व्यासजी बोले—**हे राजन् ! सुनिये, मैं आपसे एक पुनीत, कल्याणकारक, रहस्यमय, अद्भुत तथा विविध कथानकोंसे युक्त देवीभागवत नामक पुराण कहूँगा॥ २॥ |
| अध्यापितं मया पूर्वं शुकायात्मसुताय वै।<br>श्रावयामि नृप त्वां हि रहस्यं परमं मम ॥ ३ | मैंने पूर्वकालमें उसे अपने पुत्र शुकदेवको पढ़ाया था। हे राजन् ! मैं अपने परम रहस्यमय पुराणका श्रवण आपको कराऊँगा॥ ३॥ |
| धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं श्रवणात्किल।<br>शुभदं सुखदं नित्यं सर्वागमसमुद्धृतम् ॥ ४ | सभी वेदों एवं शास्त्रोंके सारस्वरूप तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके कारणभूत इस पुराणका श्रवण करनेसे यह मंगल तथा आनन्द प्रदान करनेवाला होता है॥ ४॥ |
| जनमेजय उवाच<br>आस्तीकोऽयं सुतः कस्य विघ्नार्थं कथमागतः।<br>प्रयोजनं किमत्रास्य सर्पाणां रक्षणे प्रभो ॥ ५ | **जनमेजय बोले—**हे प्रभो ! यह आस्तीक किसका पुत्र था और यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये क्यों आया ? यज्ञमें सर्पोंकी रक्षा करनेके पीछे इसका क्या उद्देश्य था ? ॥ ५ ॥ |
| अ० १२ ] | द्वितीय स्कन्ध | २३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कथयैतन्महाभाग विस्तरेण कथानकम्।<br>पुराणं च तथा सर्वं विस्तराद्वद सुव्रत ॥ ६ | हे महाभाग ! उस आख्यानको विस्तारपूर्वक बताइये। हे सुव्रत ! उस सम्पूर्ण पुराणको भी विस्तारके साथ कहिये ॥ ६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>जरत्कारुर्मुनिः शान्तो न चकार गृहाश्रमम्।<br>तेन दृष्टा वने गर्ते लम्बमानाः स्वपूर्वजाः ॥ ७ | व्यासजी बोले— जरत्कारु एक शान्त स्वभाववाले ऋषि थे, उन्होंने गार्हस्थ्य-जीवन अंगीकार नहीं किया था। उन्होंने एक बार वनमें एक गड्ढेके भीतर अपने पूर्वजोंको लटकते हुए देखा ॥ ७ ॥ |
| ततस्तमाहुः कुरु पुत्र दारा-<br>न्यथा च नः स्यात्परमा हि तृप्तिः।<br>स्वर्गे व्रजामः खलु दुःखमुक्ता<br>वयं सदाचारयुते सुते वै ॥ ८ | तदनन्तर पूर्वजोंने उनसे कहा—हे पुत्र! तुम विवाह कर लो, जिससे हमारी परम तृप्ति हो सके। तुझ सदाचारी पुत्रके ऐसा करनेपर हम-लोग निश्चितरूपसे दुःखमुक्त होकर स्वर्गकी प्राप्ति कर लेंगे ॥ ८ ॥ |
| स तानुवाचाथ लभे समाना-<br>मयाचितां चातिवशानुगां च।<br>तदा गृहारम्भमहं करोमि<br>ब्रवीमि तथ्यं मम पूर्वजा वै ॥ ९ | तब उन जरत्कारुने उनसे कहा—हे मेरे पूर्वजो ! जब मुझे अपने समान नामवाली तथा अत्यन्त वशवर्तिनी कन्या बिना माँगे ही मिलेगी तभी मैं विवाह करके गृहस्थी बसाऊँगा, मैं यह सत्य कह रहा हूँ ॥ ९ ॥ |
| इत्युक्त्वा ताञ्जरत्कारुर्गतस्तीर्थान्प्रति द्विजः।<br>तदैव पन्नगाः शप्ता मात्राग्नौ निपतन्त्विति ॥ १० | उनसे ऐसा कहकर ब्राह्मण जरत्कारु तीर्थाटनके लिये चल पड़े। उसी समय सर्पोंको उनकी माताने शाप दे दिया कि वे अग्निमें गिर जायँ ॥ १० ॥ |
| कश्यपस्य मुनेः पत्न्यौ कद्रूश्च विनता तथा।<br>दृष्ट्वादित्यरथे चाश्वमूचतुश्च परस्परम् ॥ ११ | कश्यपऋषिकी कद्रू और विनता नामक दो पत्नियाँ थीं। सूर्यके रथमें जुते हुए घोड़ेको देखकर वे आपसमें वार्तालाप करने लगीं ॥ ११ ॥ |
| तं दृष्ट्वा च तदा कद्रूर्विनतामिदमब्रवीत्।<br>किंवर्णोऽयं हयो भद्रे सत्यं प्रब्रूहि माचिरम् ॥ १२ | उस घोड़ेको देखकर कद्रूने विनतासे यह कहा—हे कल्याणि ! यह घोड़ा किस रंगका है ? यह मुझे शीघ्र ही सही-सही बताओ ॥ १२ ॥ |
| विनतोवाच<br>श्वेत एवाश्वराजोऽयं किं वा त्वं मन्यसे शुभे।<br>ब्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततस्तु विपणावहे ॥ १३ | विनता बोली— यह अश्वराज श्वेत रंगका है। हे शुभे ! तुम इसे किस रंगका मानती हो ? तुम भी इसका रंग बता दो। तब हम दोनों आपसमें इसपर शर्त लगायें ॥ १३ ॥ |
| कद्रुरुवाच<br>कृष्णवर्णमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते।<br>एहि सार्धं मया दिव्यं दासीभावाय भामिनि ॥ १४ | कद्रू बोली— हे शुभ मुसकानवाली ! मैं तो इस घोड़ेको कृष्णवर्णका समझती हूँ। हे भामिनि ! आओ, मेरे साथ शर्त लगाओ कि जो हारेगी, वह दूसरेकी दासी होना स्वीकार करेगी ॥ १४ ॥ |
| २३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ ] |
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| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**कद्रूने अपने सभी आज्ञाकारी सर्पपुत्रोंसे कहा कि तुम सभी लिपटकर उस घोड़ेके शरीरमें जितने बाल हैं, उन्हें काला कर दो॥ १५॥ | | कद्रूश्च स्वसुतानाह सर्वान्सर्पान्वशे स्थितान्।<br>बालाञ्छ्यामान्प्रकुर्वन्तु यावतोऽश्वशरीरके॥ १५ | | | नेति केचन तत्राहुस्तानथासौ शशाप ह।<br>जनमेजयस्य यज्ञे वै गमिष्यथ हुताशनम्॥ १६ | उनमेंसे कुछ सर्पोंने कहा कि हम ऐसा नहीं करेंगे। उन सर्पोंको कद्रूने शाप दे दिया कि तुम लोग जनमेजयके यज्ञमें हवनकी अग्निमें गिर पड़ोगे॥ १६॥ | | अन्ये चक्रुर्हयं सर्पाः कर्बुरं वर्णभोगकैः।<br>वेष्टयित्वास्य पुच्छं तु मातुः प्रियचिकीर्षया॥ १७ | अन्य सर्पोंने माताको प्रसन्न करनेकी कामनासे उस घोड़ेकी पूँछमें लिपटकर अपने विभिन्न रंगोंसे घोड़ेको चितकबरा कर दिया॥ १७॥ | | भगिन्यौ च सुसंयुक्ते गत्वा ददृशतुर्हयम्।<br>कर्बुरं तं हयं दृष्ट्वा विनता चातिदुःखिता॥ १८ | तदनन्तर दोनों बहिनोंने साथ-साथ जाकर घोड़ेको देखा। उस घोड़ेको चितकबरा देखकर विनता बहुत दुःखी हुई॥ १८॥ | | तदाजगाम गरुडः सुतस्तस्या महाबलः।<br>स दृष्ट्वा मातरं दीनामपृच्छत्पन्नगाशनः॥ १९ | उसी समय सर्पोंका आहार करनेवाले महाबली विनतापुत्र गरुडजी वहाँ आ गये। उन्होंने अपनी माताको दुःखित देखकर उनसे पूछा—॥ १९॥ | | मातः कथं सुदीनासि रुदितेव विभासि मे।<br>जीवमाने मयि सुते तथान्ये रविसारथौ॥ २०<br><br>दुःखितासि ततो वां धिग्जीवितं चारुलोचने।<br>किं जातेन सुतेनाथ यदि माता सुदुःखिता॥ २१<br><br>शंस मे कारणं मातः करोमि विगतज्वराम्। | हे माता! आप बहुत उदास क्यों हैं? आप मुझे रोती हुई प्रतीत हो रही हैं। हे सुनयने! मेरे एवं सूर्यसारथि अरुणसदृश पुत्रोंके जीवित रहते यदि आप दुःखी हैं, तब हमारे जीवनको धिक्कार है! यदि माता ही परम दुःखी हों तो पुत्रके उत्पन्न होनेसे क्या लाभ? हे माता! आप मुझे अपने दुःखका कारण बताइये, मैं आपको दुःखसे मुक्त करूँगा॥ २०-२१ १/२॥ | | विनतोवाच<br>सपल्या दास्यहं पुत्र किं ब्रवीमि वृथा क्षता॥ २२<br><br>वह मां सा ब्रवीत्यद्य तेनास्मि दुःखिता सुत। | **विनता बोली—**हे पुत्र! मैं अपनी सौतकी दासी हो गयी हूँ। अब व्यर्थमें मारी गयी मैं क्या कहूँ? वह मुझसे अब कह रही है कि मैं उसे अपने कन्धेपर ढोऊँ। हे पुत्र! मैं इसीसे दुःखी हूँ॥ २२ १/२॥ | | गरुड उवाच<br>वहिष्येऽहं तत्र किल यत्र सा गन्तुमुत्सुका॥ २३<br><br>मा शोकं कुरु कल्याणि निश्चिन्तां त्वां करोम्यहम्। | **गरुडजी बोले—**वे जहाँ भी जानेकी कामना करेंगी, मैं उन्हें ढोकर वहाँ ले जाऊँगा। हे कल्याणि! आप शोक न करें, मैं आपको निश्चिन्त कर देता हूँ॥ २३ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा गता पार्श्वं कद्रोश्च विनता तदा॥ २४ | **व्यासजी बोले—**गरुडद्वारा ऐसा कहे जानेपर विनता उसी समय कद्रूके पास चली गयी। महाबली गरुड भी अपनी माता विनताको दास्य- |
अ० १२] द्वितीय स्कन्ध २३७
अ० १२] द्वितीय स्कन्ध २३७
| दासीभावमपाकर्तुं गरुडोऽपि महाबलः।<br>उवाह तां सपुत्रां वै सिन्धोः पारं जगाम ह॥ २५ | भावसे मुक्ति दिलानेके उद्देश्यसे कद्रूको उसके पुत्रोंसहित अपनी पीठपर बैठाकर सागरके उस पार ले गये॥ २४-२५॥ |
| गत्वा तां गरुडः प्राह ब्रूहि मातर्नमोऽस्तु ते।<br>कथं मुच्येत मे माता दासीभावादसंशयम्॥ २६ | वहाँ जाकर गरुडने कद्रूसे कहा—हे जननि! आपको बार-बार प्रणाम है। अब आप मुझे यह बतायें कि मेरी माता दासीभावसे निश्चित ही कैसे मुक्त होंगी ?॥ २६॥ |
| कद्रुरुवाच<br>अमृतं देवलोकात्त्वं बलादानीय मे सुतान्।<br>समर्पय सुताद्याशु मातरं मोचयाबलाम्॥ २७ | कद्रू बोली—हे पुत्र! तुम स्वर्गलोकसे बलपूर्वक अमृत लाकर मेरे पुत्रोंको दे दो और शीघ्र ही अपनी अबला माताको मुक्त करा लो॥ २७॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तः प्रययौ शीघ्रमिन्द्रलोकं महाबलः।<br>कृत्वा युद्धं जहाराशु सुधाकुम्भं खगोत्तमः॥ २८ | व्यासजी बोले—कद्रूके ऐसा कहनेपर पक्षिश्रेष्ठ महाबली गरुड उसी समय इन्द्रलोक गये और देवताओंसे युद्ध करके उन्होंने सुधा-कलश छीन लिया। अमृत लाकर उन्होंने उसे अपनी विमाता कद्रूको अर्पण कर दिया और उन्होंने विनताको दासीभावसे निःसन्देह मुक्त करा लिया॥ २८-२९॥ |
| समानीयामृतं मात्रे वैनतेयः समर्पयत्।<br>मोचिता विनता तेन दासीभावादसंशयम्॥ २९ | |
| अमृतं सञ्जहारेन्द्रः स्नातुं सर्पा यदा गताः।<br>दासीभावाद्धिनिर्मुक्ता विनता विपतेर्बलात्॥ ३० | जब सभी सर्प स्नान करनेके लिये चले गये, तब इन्द्रने अमृत चुरा लिया। इस प्रकार गरुडके प्रतापसे विनता दासीभावसे छूट गयी॥ ३०॥ |
| तत्रास्तीर्णाः कुशास्तैस्तु लीढाः पन्नगनामकैः।<br>द्विजिव्हास्ते सुसम्पन्नाः कुशाग्रस्पर्शमात्रतः॥ ३१ | अमृतघटके पास कुश बिछे हुए थे, जिन्हें सर्प अपनी जिह्वासे चाटने लगे। तब कुशके अग्रभागके स्पर्शमात्रसे ही वे दो जीभवाले हो गये॥ ३१॥ |
| मात्रा शप्ताश्च ये नागा वासुकिप्रमुखाः शुचा।<br>ब्रह्माणं शरणं गत्वा ते होचुः शापजं भयम्॥ ३२ | जिन सर्पोंको उनकी माताने शाप दिया था, वे वासुकिआदि नाग चिन्तित होकर ब्रह्माजीके पास गये और उन्होंने अपने शाप-जनित भयकी बात बतायी। ब्रह्माजीने उनसे कहा—जरत्कारु नामके एक महामुनि हैं, तुमलोग उन्हींके नामवाली वासुकिनागकी बहन जरत्कारुको उन्हें अर्पित कर दो। उस कन्यासे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुमलोगोंका रक्षक होगा। वह ‘आस्तीक’—इस नामवाला होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३२–३४॥ |
| तानाह भगवान्ब्रह्मा जरत्कारुर्महामुनिः।<br>वासुकेर्भगिनीं तस्मै अर्पयध्वं सनामिकाम्॥ ३३ | |
| तस्यां यो जायते पुत्रः स वस्त्राता भविष्यति।<br>आस्तीक इति नामासौ भविता नात्र संशयः॥ ३४ | |
| वासुकिस्तु तदाकर्ण्य वचनं ब्रह्मणः शिवम्।<br>वनं गत्वा सुतां तस्मै ददौ विनयपूर्वकम्॥ ३५ | ब्रह्माजीका वह कल्याणकारी वचन सुनकर वासुकिने वनमें जाकर अपनी बहन उन्हें विनयपूर्वक समर्पित कर दी॥ ३५॥ |
| २३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सनामां तां मुनिर्ज्ञात्वा जरत्कारुरुवाच तम्।<br>अप्रियं मे यदा कुर्यात्तदा तां सन्त्यजाम्यहम्॥ ३६ | जरत्कारुमुनिने उसे अपने ही समान नामवाली जानकर उनसे कहा—जब भी यह मेरा अप्रिय करेगी, तब मैं इसका परित्याग कर दूँगा॥ ३६॥ |
| वाग्बन्धं तादृशं कृत्वा मुनिर्जग्राह तां स्वयं।<br>दत्त्वा च वासुकिः कामं भवनं स्वं जगाम ह॥ ३७ | वैसी प्रतिज्ञा करके जरत्कारुमुनिने उस जरत्कारुको पत्नीरूपसे ग्रहण कर लिया। वासुकिनाग भी अपनी बहन उन्हें प्रदानकर आनन्दपूर्वक अपने घर लौट गये॥ ३७॥ |
| कृत्वा पर्णकुटीं शुभ्रां जरत्कारुर्महावने।<br>तया सह सुखं प्राप रममाणः परन्तप॥ ३८ | हे परन्तप! मुनि जरत्कारु उस महावनमें सुन्दर पर्णकुटी बनाकर उसके साथ रमण करते हुए सुख भोगने लगे॥ ३८॥ |
| एकदा भोजनं कृत्वा सुप्तोऽसौ मुनिसत्तमः।<br>भगिनी वासुकेस्तत्र संस्थिता वरवर्णिनी॥ ३९<br><br>न सम्बोधयितव्योऽहं त्वया कान्ते कथञ्चन।<br>इत्युक्त्वा तु गतो निद्रां मुनिस्तां सुदतीं तदा॥ ४० | एक समय मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु भोजन करके विश्राम कर रहे थे, वासुकिकी बहन सुन्दरी जरत्कारु भी वहीं बैठी हुई थी। [मुनिने उससे कहा] हे कान्ते! तुम मुझे किसी भी प्रकार जगाना मत—उस सुन्दर दाँतोंवालीसे ऐसा कहकर वे मुनि सो गये॥ ३९-४०॥ |
| रविरस्तगिरिं प्राप्तः सन्ध्याकाल उपस्थिते।<br>किं करोमि न मे शान्तिस्त्यजेन्मां बोधितः पुनः॥ ४१<br><br>धर्मलोपभयाद्भीता जरत्कारुरचिन्तयत्।<br>नोचेत्प्रबोधयाम्येनं सन्ध्याकालो वृथा व्रजेत्॥ ४२ | सूर्य अस्ताचलको प्राप्त हो गये थे। सन्ध्या-वन्दनका समय उपस्थित हो जानेपर धर्मलोपके भयसे डरी हुई जरत्कारु सोचने लगी—मैं क्या करूँ? मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। यदि मैं इन्हें जगाती हूँ तो ये मेरा परित्याग कर देंगे और यदि नहीं जगाती हूँ तो यह सन्ध्याकाल व्यर्थ ही चला जायगा॥ ४१-४२॥ |
| धर्मनाशाद्वरं त्यागस्तथापि मरणं ध्रुवम्।<br>धर्महानिर्नराणां हि नरकाय भवेत्पुनः॥ ४३<br><br>इति सञ्चिन्त्य सा बाला तं मुनिं प्रत्यबोधयत्।<br>सन्ध्याकालोऽपि सञ्जात उत्तिष्ठोत्तिष्ठ सुव्रत॥ ४४ | धर्मनाशकी अपेक्षा त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि मृत्यु तो निश्चित है ही। धर्मके नष्ट होनेपर मनुष्योंको निश्चित ही नरकमें जाना पड़ता है—ऐसा निश्चय करके उस स्त्रीने उन मुनिको जगाया और कहा—हे सुव्रत! उठिये, उठिये, अब सन्ध्याकाल भी उपस्थित हो गया है॥ ४३-४४॥ |
| उत्थितोऽसौ मुनिः कोपात्तामुवाच व्रजाम्यहम्।<br>त्वं तु भ्रातृगृहं याहि निद्राविच्छेदकारिणी॥ ४५ | जगनेपर मुनि जरत्कारुने क्रोधित होकर उससे कहा—अब मैं जा रहा हूँ और मेरी निद्रामें विघ्न डालनेवाली तुम अपने भाई वासुकिके घर चली जाओ॥ ४५॥ |
| अ० १२ ] | द्वितीय स्कन्ध | २३९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वेपमानाब्रवीद्वाक्यमित्युक्ता मुनिना तदा।<br>भ्रात्रा दत्ता यदर्थं तत्कथं स्यादमितप्रभ॥ ४६ | मुनिके ऐसा कहनेपर भयसे काँपती हुई उसने कहा—हे महातेजस्वी! मेरे भाईने जिस प्रयोजनसे मुझे आपको सौंपा था, वह प्रयोजन अब कैसे सिद्ध होगा?॥ ४६॥ |
| मुनिः प्राह जरत्कारुं तदस्तीति निराकुलः।<br>गता सा मुनिना त्यक्ता वासुकेः सदनं तदा॥ ४७ | तदनन्तर मुनिने शान्तचित्त होकर जरत्कारुसे कहा—‘वह तो है ही।’ इसके बाद मुनिके द्वारा परित्यक्त वह कन्या वासुकिके घर चली गयी॥ ४७॥ |
| पृष्टा भ्रात्राब्रवीद्वाक्यं यथोक्तं पतिना तदा।<br>अस्तीत्युक्त्वा च हित्वा मां गतोऽसौ मुनिसत्तमः॥ ४८ | भाई वासुकिके पूछनेपर उसने पतिद्वारा कही गयी बात उनसे यथावत् कह दी और [वह यह भी बोली कि] ‘अस्ति’—ऐसा कहकर वे मुनिश्रेष्ठ मुझको छोड़कर चले गये॥ ४८॥ |
| वासुकिस्तु तदाकर्ण्य सत्यावाङ्मुनिरित्युत।<br>विश्वासं च परं कृत्वा भगिनीं तां समाश्रयत्॥ ४९ | यह सुनकर वासुकिने सोचा कि मुनि सत्यवादी हैं; तत्पश्चात् पूर्ण विश्वास करके उन्होंने अपनी उस बहनको अपने यहाँ आश्रय प्रदान किया॥ ४९॥ |
| ततः कालेन कियता जातोऽसौ मुनिबालकः।<br>आस्तीक इति नामासौ विख्यातः कुरुसत्तम॥ ५० | हे कुरुश्रेष्ठ! कुछ समय बाद मुनिबालक उत्पन्न हुआ और वह आस्तीक नामसे विख्यात हुआ॥ ५०॥ |
| तेनायं रक्षितो यज्ञस्तव पार्थिवसत्तम।<br>मातृपक्षस्य रक्षार्थं मुनिना भावितात्मना॥ ५१ | हे नृपश्रेष्ठ! पवित्र आत्मावाले उन्हीं आस्तीक-मुनिने अपने मातृ-पक्षकी रक्षाके लिये आपका सर्पयज्ञ रुकवाया है॥ ५१॥ |
| भव्यं कृतं महाराज मानितोऽयं त्वया मुनिः।<br>यायावरकुलोत्पन्नो वासुकेर्भगिनीसुतः॥ ५२ | हे महाराज! यायावर वंशमें उत्पन्न और वासुकिकी बहनके पुत्र आस्तीकका आपने सम्मान किया, यह तो बड़ा ही उत्तम कार्य किया है॥ ५२॥ |
| स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो भारतं सकलं श्रुतम्।<br>दानानि बहु दत्तानि पूजिता मुनयस्तथा॥ ५३<br><br>कृतेन सुकृतेनापि न पिता स्वर्गतिं गतः।<br>पावितं न कुलं कृत्स्नं त्वया भूपतिसत्तम॥ ५४<br><br>देव्याश्चायतनं भूप विस्तीर्णं कुरु भक्तितः।<br>येन वै सकला सिद्धिस्तव स्याज्जनमेजय॥ ५५ | हे महाबाहो! आपका कल्याण हो। आपने सम्पूर्ण महाभारत सुना, नानाविध दान दिये और मुनिजनोंकी पूजा की। हे भूपश्रेष्ठ! आपके द्वारा इतना महान् पुण्यकार्य किये जानेपर भी आपके पिता स्वर्गको प्राप्त नहीं हुए और न आपका सम्पूर्ण कुल ही पवित्र हो सका। अतः हे महाराज जनमेजय! आप भक्तिभावसे युक्त होकर देवी भगवतीके एक विशाल मन्दिरका निर्माण कराइये, जिसके द्वारा आप समस्त सिद्धिको प्राप्त कर लेंगे॥ ५३—५५॥ |
| पूजिता परया भक्त्या शिवा सकलदा सदा।<br>कुलवृद्धिं करोत्येव राज्यं च सुस्थिरं सदा॥ ५६ | सर्वस्व प्रदान करनेवाली भगवती दुर्गा परम श्रद्धापूर्वक पूजित होनेपर सदा वंश-वृद्धि करती हैं तथा राज्यको सदा स्थिरता प्रदान करती हैं॥ ५६॥ |
| २४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
|---|
| देवीमखं विधानेन कृत्वा पार्थिवसत्तम।<br>श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं परमं शृणु॥ ५७ | हे भूपश्रेष्ठ! विधि-विधानके साथ देवीयज्ञ करके आप श्रीमद्देवीभागवत नामक महापुराणका श्रवण कीजिये॥ ५७॥ | | त्वामहं श्रावयिष्यामि कथां परमपावनीम्।<br>संसारतारिणीं दिव्यां नानारससमाहृताम्॥ ५८ | अत्यन्त पुनीत, भवसागरसे पार उतारनेवाली, अलौकिक तथा विविध रसोंसे सम्पृक्त उस कथाको मैं आपको सुनाऊँगा॥ ५८॥ | | न श्रोतव्यं परं चास्मात्पुराणाद्विद्यते भुवि।<br>नाराध्यं विद्यते राजन्देवीपादाम्बुजादृते॥ ५९ | हे राजन्! सम्पूर्ण संसारमें इस पुराणसे बढ़कर अन्य कुछ भी श्रवणीय नहीं है और भगवतीके चरणारविन्दके अतिरिक्त अन्य कुछ भी आराधनीय नहीं है॥ ५९॥ | | ते सभाग्याः कृतप्रज्ञा धन्यास्ते नृपसत्तम।<br>येषां चित्ते सदा देवी वसति प्रेमसंकुले॥ ६० | हे नृपश्रेष्ठ! जिनके प्रेमपूरित हृदयमें सदा भगवती विराजमान रहती हैं; वे ही सौभाग्यशाली, ज्ञानवान् एवं धन्य हैं॥ ६०॥ | | सुदुःखितास्ते दृश्यन्ते भुवि भारत भारते।<br>नाराधिता महामाया यैर्जनैश्च सदाम्बिका॥ ६१ | हे भारत! इस भारतभूमिपर वे ही लोग सदा दुःखी दिखायी देते हैं, जिन्होंने कभी भी महामाया अम्बिकाकी आराधना नहीं की है॥ ६१॥ | | ब्रह्मादयः सुराः सर्वे यदाराधनतत्पराः।<br>वर्तन्ते सर्वदा राजंस्तां न सेवेत को जनः॥ ६२ | हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी जिन भगवतीकी आराधनामें सर्वदा लीन रहते हैं, उनकी आराधना भला कौन मनुष्य नहीं करेगा?॥ ६२॥ | | य इदं शृणुयान्नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात्।<br>भगवत्या समाख्यातं विष्णवे यदनुत्तमम्॥ ६३ | जो मनुष्य इस पुराणका नित्य श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। स्वयं भगवतीने भगवान् विष्णुके समक्ष इस अतिश्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था॥ ६३॥ | | तेन श्रुतेन ते राजंश्चित्ते शान्तिर्भविष्यति।<br>पितॄणां चाक्षयः स्वर्गः पुराणश्रवणाद्भवेत्॥ ६४ | हे राजन्! इस पुराणके श्रवणसे आपके चित्तको परम शान्ति प्राप्त होगी और आपके पितरोंको अक्षय स्वर्ग प्राप्त होगा॥ ६४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे श्रोतॄप्रवक्तृप्रसङ्गो नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
॥ द्वितीयः स्कन्धः समाप्तः ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
तृतीयः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
राजा जनमेजयका ब्रह्माण्डोत्पत्तिविषयक प्रश्न तथा इसके उत्तरमें व्यासजीका पूर्वकालमें नारदजीके साथ हुआ संवाद सुनाना
| जनमेजय उवाच<br>भगवन् भवता प्रोक्तं यज्ञमम्बाभिधं महत्।<br>सा का कथं समुत्पन्ना कुत्र कस्माच्च किंगुणा॥ १ | जनमेजय बोले—हे भगवन्! आपने महान् अम्बा-यज्ञके विषयमें कहा है। वे अम्बा कौन हैं, वे कैसे, कहाँ और किसलिये उत्पन्न हुई हैं और वे कौन-कौनसे गुणोंवाली हैं?॥ १॥ |
|---|---|
| कीदृशश्च मखस्तस्याः स्वरूपं कीदृशं तथा।<br>विधानं विधिवद् ब्रूहि सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ २ | उनका यह यज्ञ कैसा है और उसका क्या स्वरूप है? हे दयानिधान! आप सब कुछ जाननेवाले हैं; उस यज्ञका विधान सम्यक् रूपसे बताइये॥ २॥ |
| ब्रह्माण्डस्य तथोत्पत्तिं वद विस्तरतस्तथा।<br>यथोक्तं यादृशं ब्रह्मन्नखिलं वेत्सि भूसुर॥ ३ | हे ब्रह्मन्! आप विस्तारपूर्वक ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका भी वर्णन कीजिये। हे भूसुर! इस विषयमें अन्य ज्ञानियोंने जैसा कहा है, वह सब कुछ भी आप भलीभाँति जानते हैं॥ ३॥ |
| ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवा मया श्रुताः।<br>सृष्टिपालनसंहारकारकाः सगुणास्त्वमी॥ ४ | मैंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों देवताओंके विषयमें सुना है कि ये सगुण रूपमें सम्पूर्ण जगत्का सृजन, पालन एवं संहार करते हैं॥ ४॥ |
| स्वतन्त्रास्ते महात्मानः पाराशर्य वदस्व मे।<br>आहोस्वित्परतन्त्रास्ते श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम्॥ ५ | हे पराशरसुत व्यासजी! वे तीनों देवश्रेष्ठ स्वाधीन हैं अथवा पराधीन; आप मुझे बताइये, मैं इस समय सुनना चाहता हूँ॥ ५॥ |
| मृत्युधर्मांश्च ते नो वा सच्चिदानन्दरूपिणः।<br>अधिभूतादिभिर्युक्ता न वा दुःखैस्त्रिधात्मकैः॥ ६ | वे सच्चिदानन्दस्वरूप देवगण मरणधर्मा हैं अथवा नहीं; और वे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंसे युक्त हैं अथवा नहीं?॥ ६॥ |
| कालस्य वशगा नो वा ते सुरेन्द्रा महाबलाः।<br>कथं ते वै समुत्पन्नाः कस्मादिति च संशयः॥ ७ | वे तीनों महाबली देवेश कालके वशवर्ती हैं अथवा नहीं; और वे कैसे तथा किससे आविर्भूत हुए, मेरी यह भी एक शंका है॥ ७॥ |
| २४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| हर्षशोकयुतास्ते वै निद्रालस्यसमन्विताः।<br>सप्तधातुमयास्तेषां देहाः किं वान्यथा मुने॥ ८ | हे मुने! क्या वे हर्ष, शोक आदि द्वन्द्वोंसे युक्त हैं, क्या वे निद्रा एवं प्रमाद आदिसे प्रभावित हैं तथा क्या उनके शरीर सप्त धातुओं (अन्नरस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य)-से निर्मित हैं अथवा नहीं?॥ ८॥ | | कैर्द्रव्यैर्निर्मितास्ते वै कैर्गुणैरिन्द्रियैस्तथा।<br>भोगश्च कीदृशस्तेषां प्रमाणमायुषस्तथा॥ ९ | वे किन द्रव्योंसे निर्मित हैं, वे किन-किन गुणोंको धारण करते हैं, उनमें कौन-कौन-सी इन्द्रियाँ अवस्थित हैं, उनका भोग कैसा होता है तथा उनकी आयुका परिमाण क्या है?॥ ९॥ | | निवासस्थानमप्येषां विभूतिं च वदस्व मे।<br>श्रोतुमिच्छाम्यहं ब्रह्मन् विस्तरेण कथामिमाम्॥ १० | इनके निवास-स्थान एवं विभूतियोंके भी विषयमें मुझको बतलाइये। हे ब्रह्मन्! इस कथाको विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है॥ १०॥ | | व्यास उवाच<br>दुर्गमः प्रश्नभारोऽयं कृतो राजंस्त्वयाधुना।<br>ब्रह्मादीनां समुत्पत्तिः कस्मादिति महामते॥ ११ | व्यासजी बोले—हे महामति राजन्! ब्रह्मादि देवोंकी उत्पत्ति किससे हुई, इस समय आपने यह बड़ा दुर्गम प्रश्न किया है॥ ११॥ | | एतदेव मया पूर्वं पृष्टोऽसौ नारदो मुनिः।<br>विस्मितः प्रत्युवाचेदमुत्थितः शृणु भूपते॥ १२ | हे राजन्! पूर्वमें मैंने यही प्रश्न देवर्षि नारदजीसे पूछा था। तब विस्मित होकर वे उठ खड़े हुए और उन्होंने जो उत्तर दिया था, उसे आप सुनें॥ १२॥ | | कस्मिंश्च समये चाहं गङ्गातीरे स्थितं मुनिम्।<br>अपश्यं नारदं शान्तं सर्वज्ञं वेदवित्तमम्॥ १३ | किसी समय मैंने शान्त, सर्ववेत्ता तथा वेद-विद्वानोंमें श्रेष्ठ नारदमुनिको गंगाके किनारे विद्यमान देखा॥ १३॥ | | दृष्ट्वाहं मुदितो भूत्वा पादयोरपतं मुनेः।<br>तेनाज्ञप्तः समीपेऽस्य संविष्टश्च वरासने॥ १४ | मुनिको देखकर तथा प्रसन्न होकर मैं उनके चरणोंपर गिर पड़ा। तदनन्तर उनके द्वारा आज्ञा देनेपर मैं उनके पासमें ही एक सुन्दर आसनपर बैठ गया॥ १४॥ | | श्रुत्वा कुशलवार्तां वै तमपृच्छं विधेः सुतम्।<br>निविष्टं जाह्नवीतीरे निर्जने सूक्ष्मवालुके॥ १५ | कुशल-क्षेमकी वार्ता सुन करके सूक्ष्म बालूवाले गंगा-तटके निर्जन स्थानपर बैठे हुए ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारदसे मैंने पूछा—॥ १५॥ | | मुनेऽतिविततस्यास्य ब्रह्माण्डस्य महामते।<br>कः कर्ता परमः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि विधानतः॥ १६ | हे महामति मुनिदेव! इस अति विस्तीर्ण ब्रह्माण्डका प्रधान कर्ता कौन कहा गया है? उसे आप मुझे सम्यक् रूपसे बताइये॥ १६॥ | | कस्मादेतत्त्समुत्पन्नं ब्रह्माण्डं मुनिसत्तम।<br>अनित्यं वा तथा नित्यं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम॥ १७ | हे मुनिश्रेष्ठ! इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति किससे हुई है? हे विप्रवर! आप मुझे यह भी बताइये कि यह ब्रह्माण्ड नित्य है अथवा अनित्य?॥ १७॥ | | एककर्तृकमेतद्वा बहुकर्तृकमन्यथा।<br>अकर्तृकं न कार्यं स्याद्विरोधोऽयं विभाति मे॥ १८ | यह ब्रह्माण्ड किसी एकके द्वारा विरचित है अथवा अनेक कर्ताओंद्वारा मिलकर इसका निर्माण किया गया है? किसी कर्ताके बिना कार्यकी सत्ता सम्भव नहीं है। इस विषयमें मुझे अत्यन्त सन्देह हो रहा है॥ १८॥ |
अ० १] तृतीय स्कन्ध २४३
अ० १] तृतीय स्कन्ध २४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति सन्देहसन्दोहे मग्नं मां तारयाधुना।<br>विकल्पकोटीः कुर्वाणं संसारेऽस्मिन् प्रविस्तरे॥ १९ | इस प्रकार इस विस्तृत ब्रह्माण्डके विषयमें विविध कल्पना करते हुए तथा सन्देहसागरमें डूबते हुए मुझ दुःखीका आप उद्धार कीजिये॥ १९॥ |
| ब्रुवन्ति शङ्करं केचिन्मत्वा कारणकारणम्।<br>सदाशिवं महादेवं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम्॥ २०<br>आत्मारामं सुरेशं च त्रिगुणं निर्मलं हरम्।<br>संसारतारकं नित्यं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम्॥ २१ | कुछ लोग सदाशिव, महादेव, प्रलय तथा उत्पत्तिसे रहित, आत्माराम, देवेश, त्रिगुणात्मक, निर्मल, हर, संसारसे उद्धार करनेवाले, नित्य तथा सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले भगवान् शंकरको ही मूल कारण मानकर उन्हें ही इस ब्रह्माण्डका रचयिता कहते हैं॥ २०-२१॥ |
| अन्ये विष्णुं स्तुवन्त्येनं सर्वेषां प्रभुमीश्वरम्।<br>परमात्मानमव्यक्तं सर्वशक्तिसमन्वितम्॥ २२<br>भुक्तिदं मुक्तिदं शान्तं सर्वादिं सर्वतोमुखम्।<br>व्यापकं विश्वशरणमनादिनिधनं हरिम्॥ २३ | दूसरे लोग श्रीहरि विष्णुको सबका प्रभु, ईश्वर, परमात्मा, अव्यक्त, सर्वशक्तिसम्पन्न, भोग तथा मोक्षप्रदाता, शान्त, सबका आदि, सर्वतोमुख, व्यापक, समग्र संसारको शरण देनेवाला तथा आदि-अन्तसे रहित जानकर उन्हींका स्तवन करते हैं॥ २२-२३॥ |
| धातारं च तथा चान्ये ब्रुवन्ति सृष्टिकारणम्।<br>तमेव सर्ववेत्तारं सर्वभूतप्रवर्तकम्॥ २४<br>चतुर्मुखं सुरेशानं नाभिपद्मभवं विभुम्।<br>स्रष्टारं सर्वलोकानां सत्यलोकनिवासिनम्॥ २५ | अन्य लोग ब्रह्माजीको सृष्टिका कारण, सर्वज्ञ, सभी प्राणियोंका प्रवर्तक, चार मुखोंवाला, सुरपति, विष्णुके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत, सर्वव्यापी, सभी लोकोंकी रचना करनेवाला तथा सत्यलोकमें निवास करनेवाला बताते हैं॥ २४-२५॥ |
| दिनेशं प्रवदन्त्यन्ये सर्वेशं वेदवादिनः।<br>स्तुवन्ति चैव गायन्ति सायं प्रातरतन्द्रिताः॥ २६ | कुछ वेदवेत्ता विद्वान् सर्वेश्वर भगवान् सूर्यको ब्रह्माण्डकर्ता मानते हैं और सावधान होकर सायं-प्रातः उन्हींकी स्तुति करते हैं तथा उन्हींका यशोगान करते हैं॥ २६॥ |
| यजन्ति च तथा यज्ञे वासवं च शतक्रतुम्।<br>सहस्राक्षं देवदेवं सर्वेषां प्रभुमुल्बणम्॥ २७<br>यज्ञाधीशं सुराधीशं त्रिलोकेशं शचीपतिम्।<br>यज्ञानां चैव भोक्तारं सोमपं सोमपप्रियम्॥ २८ | यज्ञमें निष्ठाभाव रखनेवाले लोग धनप्रदाता, शतक्रतु, सहस्राक्ष, देवाधिदेव, सबके स्वामी, बलशाली, यज्ञाधीश, सुरपति, त्रिलोकेश, यज्ञोंका भोग करनेवाले, सोमपान करनेवाले तथा सोमपायी लोगोंके प्रिय शचीपति इन्द्रको [सर्वश्रेष्ठ मानकर] यज्ञोंमें उन्हींका यजन करते हैं॥ २७-२८॥ |
| वरुणं च तथा सोमं पावकं पवनं तथा।<br>यमं कुबेरं धनदं गणाधीशं तथापरे॥ २९<br>हेरम्बं गजवक्त्रं च सर्वकार्यप्रसाधकम्।<br>स्मरणात्सिद्धिदं कामं कामदं कामगं परम्॥ ३० | कुछ लोग वरुण, सोम, अग्नि, पवन, यमराज, धनपति कुबेरकी तथा कुछ लोग हेरम्ब, गजमुख, सर्वकार्यसाधक, स्मरणमात्रसे सिद्धि प्रदान करनेवाले, कामस्वरूप, कामनाओंको प्रदान करनेवाले, स्वेच्छ विचरण करनेवाले, परम देव गणाधीश गणेशकी स्तुति करते हैं॥ २९-३०॥ |
| २४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
|---|
| भवानीं केचनाचार्याः प्रवदन्त्यखिलार्थदाम्।<br>आदिमायां महाशक्तिं प्रकृतिं पुरुषानुगाम्॥ ३१<br>ब्रह्मैकतासमापन्नां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्।<br>मातरं सर्वभूतानां देवतानां तथैव च॥ ३२<br>अनादिनिधनां पूर्णां व्यापिकां सर्वजन्तुषु।<br>ईश्वरीं सर्वलोकानां निर्गुणां सगुणां शिवाम्॥ ३३ | कुछ आचार्य भवानीको ही सब कुछ देनेवाली, आदिमाया, महाशक्ति तथा पुरुषानुगामिनी परा प्रकृति कहते हैं। वे उनको ब्रह्मस्वरूपा, सृजन-पालन-संहार करनेवाली, सभी प्राणियों एवं देवताओंकी जननी, आदि-अन्तरहित, पूर्णा, सभी जीवोंमें व्याप्त, सभी लोकोंकी स्वामिनी, निर्गुणा, सगुणा तथा कल्याणस्वरूपा मानते हैं॥ ३१—३३॥ | | वैष्णवीं शाङ्करीं ब्राह्मीं वासवीं वारुणीं तथा।<br>वाराहीं नारसिंहीं च महालक्ष्मीं तथाद्भुताम्॥ ३४<br>वेदमातरमेकां च विद्यां भवतरोः स्थिराम्।<br>सर्वदुःखनिहन्त्रीं च स्मरणात्सर्वकामदाम्॥ ३५<br>मोक्षदां च मुमुक्षूणां कामदां च फलार्थिनाम्।<br>त्रिगुणातीतरूपां च गुणविस्तारकारकाम्॥ ३६<br>निर्गुणां सगुणां तस्मात्तां ध्यायन्ति फलार्थिनः। | फलकी आकांक्षा रखनेवाले उन भवानीका वैष्णवी, शांकरी, ब्राह्मी, वासवी, वारुणी, वाराही, नारसिंही, महालक्ष्मी, विचित्ररूपा, वेदमाता, एकेश्वरी, विद्यास्वरूपा, संसाररूपी वृक्षकी स्थिरताकी कारणरूपा, सभी कष्टोंका नाश करनेवाली और स्मरण करते ही सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, मुक्ति चाहनेवालोंके लिये मोक्षदायिनी, फलकी अभिलाषा रखनेवालोंके लिये कामप्रदायिनी, त्रिगुणातीतस्वरूपा, गुणोंका विस्तार करनेवाली, निर्गुणा-सगुणा-रूपमें ध्यान करते हैं॥ ३४—३६ १/२॥ | | निरञ्जनं निराकारं निर्लेपं निर्गुणं किल॥ ३७<br>अरूपं व्यापकं ब्रह्म प्रवदन्ति मुनीश्वराः।<br>वेदोपनिषदि प्रोक्तस्तेजोमय इति क्वचित्॥ ३८<br>सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्रनयनस्तथा।<br>सहस्रकरकर्णश्च सहस्रास्यः सहस्रपात्॥ ३९ | कुछ मुनीश्वर निरंजन, निराकार, निर्लिप्त, गुणरहित, रूपरहित तथा सर्वव्यापक ब्रह्मको जगत्का कर्ता बतलाते हैं। वेदों तथा उपनिषदोंमें कहीं-कहीं उसे अनन्त सिर, नेत्र, हाथ, कान, मुख और चरणसे युक्त तेजोमय विराट् पुरुष कहा गया है॥ ३७—३९॥ | | विष्णोः पादमथाकाशं परमं समुदाहृतम्।<br>विराजं विरजं शान्तं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ४० | कुछ मनीषीगण आकाशको विष्णुके परम पादके रूपमें मानते हैं और उन्हें विराट्, निरंजन तथा शान्तस्वरूप कहते हैं॥ ४०॥ | | पुरुषोत्तमं तथा चान्ये प्रवदन्ति पुराविदः।<br>नैकोऽपीति वदन्त्यन्ये प्रभुरीशः कदाचन॥ ४१ | कुछ तत्त्वज्ञानी पुराणवेत्ता पुरुषोत्तमको सृष्टिका निर्माता कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इस अनन्त ब्रह्माण्डकी रचनामें केवल एक ईश्वर कदापि समर्थ नहीं हो सकता है॥ ४१॥ | | अनीश्वरमिदं सर्वं ब्रह्माण्डमिति केचन।<br>न कदापीशजन्यं यज्जगदेतदचिन्तितम्॥ ४२<br>सदैवेदमनीशं च स्वभावोत्थं सदेदृशम्।<br>अकर्तासौ पुमान्प्रोक्तः प्रकृतिस्तु तथा च सा॥ ४३<br>एवं वदन्ति सांख्याश्च मुनयः कपिलादयः। | कुछ लोग कहते हैं कि यह जगत् अचिन्त्य है, अतः यह ईश्वररचित कदापि नहीं हो सकता; उनके मतमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ईश्वररहित है। 'यह जगत् सदासे ही ईश्वरीय सत्तासे रहित रहा है और यह स्वभावसे उत्पन्न होता है तथा सदासे ऐसा ही है। यह पुरुष तो कर्तृत्वभावसे रहित कहा गया है और वह प्रकृति ही सर्वसंचालिका है'—कपिल आदि सांख्यशास्त्रके आचार्य ऐसा ही कहते हैं॥ ४२—४३ १/२॥ |
| अ० २ ] | तृतीय स्कन्ध | २४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते सन्देहसन्दोहाः प्रभवन्ति तथापरे ॥ ४४<br><br>विकल्पोपहतं चेतः किं करोमि मुनीश्वर।<br>धर्माधर्मविवक्षायां न मनो मे स्थिरं भवेत् ॥ ४५ | हे मुनिनाथ! मेरे मनमें ये तथा अन्य प्रकारके और भी सन्देहपुंज उत्पन्न होते रहते हैं। नाना प्रकारकी कल्पनाओंसे उद्विग्न मनवाला मैं क्या करूँ ? धर्म तथा अधर्मके विषयमें मेरा मन स्थिर नहीं हो पाता है ॥ ४४-४५ ॥ |
| को धर्मः कीदृशोऽधर्मश्चिह्नं नैवोपलभ्यते।<br>देवाः सत्त्वगुणोत्पन्नाः सत्यधर्मव्यवस्थिताः ॥ ४६<br><br>पीड्यन्ते दानवैः पापैः कुत्र धर्मव्यवस्थितिः।<br>धर्मस्थिताः सदाचाराः पाण्डवा मम वंशजाः ॥ ४७<br><br>दुःखं बहुविधं प्राप्तास्तत्र धर्मस्य का स्थितिः।<br>अतो मे हृदयं तात वेपतेऽतीव संशये ॥ ४८ | क्या धर्म है और क्या अधर्म है; इसका कोई स्पष्ट लक्षण प्राप्त नहीं होता है। लोग कहते हैं कि देवता सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए हैं और वे सत्यधर्ममें स्थित रहते हैं फिर भी वे देवगण पापाचारी दानवोंद्वारा प्रताड़ित किये जाते हैं, तो फिर धर्मकी व्यवस्था कहाँ रह गयी ? धर्मनिष्ठ और सदाचारी मेरे वंशज पाण्डव भी नाना प्रकारके कष्ट सहनेको विवश हुए, ऐसी स्थितिमें धर्मकी क्या मर्यादा रह गयी ? अतः हे तात! इस संशयमें पड़ा हुआ मेरा मन अतीव चंचल रहता है ॥ ४६–४८ ॥ |
| कुरु मेऽसंशयं चेतः समर्थोऽसि महामुने।<br>त्राहि संसारवार्धेस्त्वं ज्ञानपोतेन मां मुने ॥ ४९<br><br>मज्जन्तं चोत्पतन्तं च मग्नं मोहजलाविले ॥ ५० | हे महामुने! आप सर्वसमर्थ हैं, अतः मेरे हृदयको संशयमुक्त कीजिये। हे मुने! संसार-सागरके मोहसे दूषित जलमें गिरे हुए तथा बार-बार डूबते-उतराते मुझ अज्ञानीकी अपने ज्ञानरूपी जहाजसे रक्षा कीजिये ॥ ४९-५० ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे भुवनेश्वरीवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
भगवती आद्याशक्तिके प्रभावका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>यत्त्वया च महाबाहो पृष्टोऽहं कुरुसत्तम।<br>तान्प्रश्नान्नारदः प्राह मया पृष्टो मुनीश्वरः ॥ १ | व्यासजी बोले— हे महाबाहो! हे कुरुश्रेष्ठ! आपने मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उन्हीं प्रश्नोंको मेरेद्वारा मुनिराज नारदजीसे पूछे जानेपर उन्होंने इस विषयमें ऐसा कहा था ॥ १ ॥ |
| नारद उवाच<br>व्यास किं ते ब्रवीम्यद्य पुरायं संशयो मम।<br>उत्पन्नो हृदयेऽत्यर्थं सन्देहासारपीडितः ॥ २ | नारदजी बोले— हे व्यासजी! मैं आपसे इस समय क्या कहूँ? प्राचीन कालमें यही शंका मेरे भी मनमें उत्पन्न हुई थी और सन्देहकी बहुलतासे मेरा मन उद्वेलित हो गया था ॥ २ ॥ |
| गत्वाहं पितरं स्थाने ब्रह्माणममितौजसम्।<br>अपृच्छं यत्त्वया पृष्टं व्यासाद्य प्रश्नमुत्तमम् ॥ ३ | हे व्यासजी! तदनन्तर मैंने ब्रह्मलोकमें अपने अमित तेजस्वी पिता ब्रह्माजीके पास पहुँचकर यही प्रश्न पूछा था, जो उत्तम प्रश्न आपने आज मुझसे पूछा है ॥ ३ ॥ |
| २४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| पितः कुतः समुत्पन्नं ब्रह्माण्डमखिलं विभो।<br>भवत्कृतेन वा सम्यक् किं वा विष्णुकृतं त्विदम्॥ ४<br><br>रुद्रकृतं वा विश्वात्मन् ब्रूहि सत्यं जगत्पते।<br>आराधनीयः कः कामं सर्वोत्कृष्टश्च कः प्रभुः॥ ५ | [मैंने पूछा—] हे पिताजी! इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका आविर्भाव कैसे हुआ? हे विभो! इसका निर्माण आपने किया है अथवा विष्णुने अथवा शिवने इसकी रचना की है? हे विश्वात्मन्! मुझे सही-सही बताइये। हे जगत्पते! सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन है और किसकी आराधना की जानी चाहिये?॥ ४-५॥ | | तत्सर्वं वद मे ब्रह्मन्सन्देहांश्छिन्धि चानघ।<br>निमग्नो ह्यस्मि संसारे दुःखरूपेऽनृतोपमे॥ ६ | हे ब्रह्मन्! वह सब कुछ बताइए और मेरे सन्देहोंको दूर कीजिये। हे निष्पाप! मैं असत्य तथा दुःखरूप संसारमें डूबा हुआ हूँ॥ ६॥ | | सन्देहान्दोलितं चेतो न प्रशाम्यति कुत्रचित्।<br>न तीर्थेषु न देवेषु साधनेष्वितरेषु च॥ ७ | सन्देहोंसे दोलायमान मेरा मन तीर्थोंमें, देवताओंमें तथा अन्य साधनोंमें—कहीं भी शान्त नहीं हो पा रहा है॥ ७॥ | | अविज्ञाय परं तत्त्वं कुतः शान्तिः परन्तप।<br>विकीर्णं बहुधा चित्तं नैकत्र स्थिरतां व्रजेत्॥ ८ | हे परन्तप! परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त किये बिना शान्ति मिल भी कैसे सकती है? अनेक प्रकारसे उलझा हुआ मेरा मन एक जगह स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ८॥ | | कं स्मरामि यजे कं वा कं व्रजाम्यर्चयामि कम्।<br>स्तौमि कं नाभिजानामि देवं सर्वेश्वरेश्वरम्॥ ९ | मैं किसका स्मरण करूँ, किसका यजन करूँ, कहाँ जाऊँ, किसकी अर्चना करूँ और किसकी स्तुति करूँ? हे देव! मैं तो उस सर्वेश्वर परमात्माको जानता भी नहीं हूँ॥ ९॥ | | ततो तां प्रत्युवाचेदं ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>मया सत्यवतीसूनो कृते प्रश्ने सुदुस्तरे॥ १० | हे सत्यवतीतनय व्यासजी! मेरे द्वारा किये गये दुरूह प्रश्नोंको सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने तब मुझसे ऐसा कहा—॥ १०॥ | | ब्रह्मोवाच<br>किं ब्रवीमि सुताद्याहं दुर्बोधं प्रश्नमुत्तमम्।<br>त्वयाशक्यं महाभाग विष्णोरपि सुनिश्चयात्॥ ११ | ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! तुमने आज एक दुरूह तथा उत्तम प्रश्न किया है, उसके विषयमें मैं क्या कहूँ? हे महाभाग! साक्षात् विष्णुद्वारा भी इन प्रश्नोंका निश्चित उत्तर दिया जाना सम्भव नहीं है॥ ११॥ | | रागी कोऽपि न जानाति संसारेऽस्मिन्महामते।<br>विरक्तश्च विजानाति निरीहो यो विमत्सरः॥ १२ | हे महामते! इस संसारके क्रियाकलापोंमें आसक्त कोई भी ऐसा नहीं है, जो इस तत्त्वका ज्ञान रखता हो। कोई विरक्त, निःस्पृह तथा विद्वेषरहित ही इसे जान सकता है॥ १२॥ | | एकार्णवे पुरा जाते नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>भूतमात्रे समुत्पन्ने सञ्जज्ञे कमलादहम्॥ १३ | प्राचीन कालमें जल-प्रलयके होनेपर स्थावर-जंगमादिक प्राणियोंके नष्ट हो जाने तथा मात्र पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति होनेपर मैं कमलसे आविर्भूत हुआ॥ १३॥ | | नापश्यं तरणिं सोमं न वृक्षान्न च पर्वतान्।<br>कर्णिकायां समाविष्टश्चिन्तामकरवं तदा॥ १४ | उस समय मैंने सूर्य, चन्द्र, वृक्षों तथा पर्वतोंको नहीं देखा और कमलकर्णिकापर बैठा हुआ मैं विचार करने लगा—॥ १४॥ |
अ० २ ] तृतीय स्कन्ध २४७
अ० २ ] तृतीय स्कन्ध २४७
| कस्मादहं समुद्भूतः सलिलेऽस्मिन्महार्णवे।<br>को मे त्राता प्रभुः कर्ता संहर्ता वा युगान्तये॥ १५ | इस महासागरके जलमें मेरा प्रादुर्भाव किससे हुआ? मेरा निर्माण करनेवाला, रक्षा करनेवाला तथा युगान्तके समय संहार करनेवाला प्रभु कौन है? ॥ १५ ॥ |
| न च भूर्विद्यते स्पष्टा यदाधारं जलं त्विदम्।<br>पङ्कजं कथमुत्पन्नं प्रसिद्धं रूढियोगयोः॥ १६ | कहीं भूमि भी स्पष्ट दिखायी नहीं दे रही है, जिसके आधारपर यह जल टिका है तो फिर यह कमल कैसे उत्पन्न हुआ, जिसकी उत्पत्ति जल और पृथ्वीके संयोगसे ही प्रसिद्ध है? ॥ १६ ॥ |
| पश्याम्यद्यास्य पङ्कं तं मूलं वै पङ्कजस्य च।<br>भविष्यति धरा तत्र मूलं नास्त्यत्र संशयः॥ १७ | आज मैं इस कमलका मूल आधार पंक अवश्य देखूँगा; और फिर उस पंककी आधारस्वरूपा भूमि भी अवश्य मिल जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ १७॥ |
| उत्तरन्सलिले तत्र यावद्वर्षसहस्रकम्।<br>अन्वेषमाणो धरणीं नावाप तां यदा तदा॥ १८<br><br>तपस्तपेति चाकाशे वाग्भूदशरीरिणी।<br>ततो मया तपस्तप्तं पद्मे वर्षसहस्रकम्॥ १९ | तदनन्तर मैं जलमें नीचे उतरकर हजार वर्षोंतक पृथ्वीको खोजता रहा, किंतु जब उसे नहीं पाया तब आकाशवाणी हुई कि 'तपस्या करो'। तत्पश्चात् मैं उसी कमलपर आसीन होकर हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता रहा॥ १८-१९॥ |
| सृजेति पुनरुद्भूता वाणी तत्र श्रुता मया।<br>विमूढोऽहं तदाकर्ण्य कं सृजामि करोमि किम्॥ २० | इसके बाद पुनः एक अन्य वाणी उत्पन्न हुई—'सृष्टि करो', इसे मैंने साफ-साफ सुना। उसे सुनकर व्याकुल चित्तवाला मैं सोचने लगा, किसका सृजन करूँ और किस प्रकार करूँ?॥ २०॥ |
| तदा दैत्यावपि प्राप्तौ दारुणौ मधुकैटभौ।<br>ताभ्यां विभीषितश्चाहं युद्धाय मकरालये॥ २१ | उसी समय मधु-कैटभ नामवाले दो भयानक दैत्य मेरे सम्मुख आ गये। उस महासागरमें युद्धके लिये तत्पर उन दोनों दैत्योंसे मैं अत्यधिक भयभीत हो गया ॥ २१ ॥ |
| ततोऽहं नालमालम्ब्य वारिमध्यमवातरम्।<br>तदा तत्र मया दृष्टः पुरुषः परमाद्भुतः॥ २२ | तत्पश्चात् मैं उसी कमलकी नालका आश्रय लेकर जलके भीतर उतरा और वहाँ एक अत्यन्त अद्भुत पुरुषको मैंने देखा ॥ २२॥ |
| मेघश्यामशरीरस्तु पीतवासाश्चतुर्भुजः।<br>शेषशायी जगन्नाथो वनमालाविभूषितः॥ २३ | उनका शरीर मेघके समान श्याम वर्णवाला था। वे पीत वस्त्र धारण किये हुए थे और उनकी चार भुजाएँ थीं। वे जगत्पति वनमालासे अलंकृत थे तथा शेषशय्यापर सो रहे थे ॥ २३॥ |
| शङ्खचक्रगदापद्माद्यायुधैः सुविराजितः।<br>तमद्राक्षं महाविष्णुं शेषपर्यङ्कशायिनम्॥ २४ | वे शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुध धारण किये हुए थे। इस प्रकार मैंने शेषनागकी शय्यापर शयन करते हुए उन महाविष्णुको देखा ॥ २४॥ |
| योगनिद्रासमाक्रान्तमविस्पन्दिनमच्युतम् ।<br>शयानं तं समालोक्य भोगिभोगोपरि स्थितम् ॥ २५<br><br>चिन्ता ममाद्भुता जाता किं करोमीति नारद।<br>मया स्मृता तदा देवी स्तुता निद्रास्वरूपिणी ॥ २६ | हे नारदजी! योगनिद्राके वशीभूत होनेके कारण निष्पन्द पड़े उन भगवान् अच्युतको शेषनागके ऊपर सोया हुआ देखकर मुझे अद्भुत चिन्ता हुई और मैं सोचने लगा कि अब क्या करूँ? तब मैंने निद्रास्वरूपा भगवतीका स्मरण किया और मैं उनकी स्तुति करने लगा॥ २५-२६॥ |
| २४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देहान्निर्गत्य सा देवी गगने संस्थिता शिवा।<br>अवितर्क्यशरीरा सा दिव्याभरणमण्डिता॥ २७ | [मेरी स्तुतिसे] वे कल्याणी भगवती विष्णु-भगवान्के शरीरसे निकलकर आकाशमें विराजमान हुईं। उस समय दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत वे भगवती कल्पनाओंसे परे विग्रहवाली प्रतीत हो रही थीं॥ २७॥ |
| विष्णोर्देहं विहायाशु विरराज नभःस्थिता।<br>उदतिष्ठदमेयात्मा तया मुक्तो जनार्दनः॥ २८ | इस प्रकार विष्णुका शरीर तत्काल छोड़कर जब वे आकाशमें विराजित हो गयीं, तब उनके द्वारा मुक्त किये गये अनन्तात्मा वे जनार्दन उठ गये॥ २८॥ |
| पञ्चवर्षसहस्राणि कृतवान्युद्धमुत्तमम्।<br>तदा विलोकितौ दैत्यौ हरिणा विनिपातितौ॥ २९<br><br>उत्सङ्गं विपुलं कृत्वा तत्रैव निहतौ च तौ।<br>रुद्रस्तत्रैव सम्प्राप्तो यत्रावां संस्थितावुभौ॥ ३० | पश्चात् उन्होंने पाँच हजार वर्षोंतक उन दैत्योंके साथ घोर युद्ध किया। पुनः उन महामाया भगवतीके दृष्टिपातसे मोहित किये गये उन दोनों दैत्योंको भगवान् विष्णुने मार दिया। अपनी जाँघोंको विस्तृत करके भगवान् विष्णुने उसीपर उन दोनोंका वध किया। उसी समय जहाँ हम दोनों थे, वहींपर शंकरजी भी आ गये॥ २९-३०॥ |
| त्रिभिः संवीक्षितास्माभिः स्वस्था देवी मनोहरा।<br>संस्तुता परमा शक्तिरुवाचास्मानवस्थितान्॥ ३१<br><br>कृपावलोकनैः कृत्वा पावनैर्मुदितानथ। | तब हम तीनोंने गगन-मण्डलमें विराजमान उन मनोहर देवीको देखा। हमलोगोंके द्वारा उन परम शक्तिकी स्तुति किये जानेपर अपनी पवित्र कृपादृष्टिसे हमलोगोंको प्रसन्न करके उन्होंने वहाँ स्थित हमलोगोंसे कहा— ॥ ३१ ½ ॥ |
| देव्युवाच<br>काजेशाः स्वानि कार्याणि कुरुध्वं समतन्द्रिताः॥ ३२<br><br>सृष्टिस्थितिविशिष्टानि हतावेतौ महासुरौ।<br>कृत्वा स्वानि निकेतानि वसध्वं विगतज्वराः॥ ३३<br><br>प्रजाश्चतुर्विधाः सर्वाः सृजध्वं स्वविभूतिभिः। | देवी बोलीं— हे ब्रह्मा, विष्णु, महेश! अब आपलोग सृष्टि, पालन एवं संहारके अपने-अपने कार्य प्रमादरहित होकर कीजिये। अब आपलोग अपना-अपना निवास बनाकर निर्भीकतापूर्वक रहिये; क्योंकि उन दोनों महादैत्योंका संहार हो गया है। अतः आपलोग अपनी विभूतियोंसे अण्डज, पिण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज—चारों प्रकारकी सभी प्रजाओंका सृजन कीजिये॥ ३२-३३ ½ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः पेशलं सुखदं मृदु॥ ३४<br><br>अब्रूम तामशक्ताः स्मः कथं कुर्मस्त्विमाः प्रजाः।<br>न मही वितता मातः सर्वत्र विततं जलम्॥ ३५<br><br>न भूतानि गुणाश्चापि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च।<br>तदाकर्ण्य वचोऽस्माकं शिवा जाता स्मितानना॥ ३६ | ब्रह्माजी बोले— उन भगवतीका वह मनोहर, सुखकर तथा मधुर वचन सुनकर हमलोगोंने उनसे कहा— हे माता! हमलोग शक्तिहीन हैं, अतः इन प्रजाओंका सृजन कैसे करें? अभी विस्तृत पृथ्वी ही नहीं है और सभी ओर जल-ही-जल फैला हुआ है। सृष्टिकार्यके लिये आवश्यक पंचतत्त्व, गुण, तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ—ये कुछ भी नहीं हैं। हमलोगोंके ये वचन सुनकर भगवतीका मुखमण्डल मुसकानसे भर उठा॥ ३४—३६॥ |
अ० ३ ] तृतीय स्कन्ध २४९
अ० ३ ] तृतीय स्कन्ध २४९
| झटित्येवागतं तत्र विमानं गगनाच्छुभम्।<br>सोवाचास्मिन्सुराः कामं विशध्वं गतसाध्वसाः॥ ३७ | उसी समय वहाँ आकाशसे एक रमणीक विमान आ पहुँचा। तत्पश्चात् उन भगवतीने कहा—हे देवताओ! आप लोग निर्भीक होकर इस विमानमें इच्छानुसार बैठ जायँ॥ ३७॥ | | विमाने ब्रह्मविष्ण्वीशा दर्शयाम्यद्य चाद्भुतम्।<br>तन्निशम्य वचस्तस्या ओमित्युक्त्वा पुनर्वयम्॥ ३८<br><br>समारुह्योपविष्टाः स्मो विमाने रत्नमण्डिते।<br>मुक्तादामसुसंवीते किंकिणीजालशब्दिते॥ ३९<br><br>सुरसद्मनिभे रम्ये त्रयस्तत्राविशंकिताः।<br>सोपविष्टांस्ततो दृष्ट्वा देव्यस्मान्विजितेन्द्रियान्॥ ४०<br><br>स्वशक्त्या तद्विमानं वै नोदयामास चाम्बरे॥ ४१ | हे ब्रह्मा, विष्णु और शिव! मैं आपलोगोंको आज इस विमानमें एक अद्भुत दृश्य दिखाऊँगी। उनका यह वचन सुनकर हम तीनों उनकी बात स्वीकार करके रत्नजटित, मोतियोंकी झालरोंसे शोभायमान, घंटियोंकी ध्वनिसे गुंजित तथा देव-भवनके तुल्य उस रमणीक विमानपर संशयरहित भावसे चढ़कर बैठ गये। तब भगवतीने हम जितेन्द्रिय देवताओंको बैठा हुआ देखकर उस विमानको अपनी शक्तिसे आकाशमण्डलमें उड़ाया॥ ३८—४१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विमानेन ब्रह्मादीनाङ्गतिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
ब्रह्मा, विष्णु और महेशका विभिन्न लोकोंमें जाना तथा अपने ही सदृश अन्य ब्रह्मा, विष्णु और महेशको देखकर आश्चर्यचकित होना, देवीलोकका दर्शन
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
|---|---|
| विमानं तन्मनोवेगं यत्र स्थानान्तरे गतम्।<br>न जलं तत्र पश्यामो विस्मिताः स्मो वयं तदा॥ १ | मनके समान वेगसे उड़नेवाला वह विमान जिस स्थानपर पहुँचा, वहाँ जब हमने जल नहीं देखा तब हमलोगोंको महान् आश्चर्य हुआ॥ १॥ |
| वृक्षाः सर्वफला रम्याः कोकिलारावमण्डिताः।<br>मही महीधराः कामं वनान्युपवनानि च॥ २ | उस स्थानके वृक्ष सभी प्रकारके फलोंसे लदे हुए और कोकिलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजायमान थे। वहाँकी भूमि, पर्वत, वन और उपवन—ये सभी सुरम्य दृष्टिगोचर हो रहे थे॥ २॥ |
| नार्यश्च पुरुषाश्चैव पशवश्च सरिद्वराः।<br>वाप्यः कूपास्तडागाश्च पल्वलानि च निर्झराः॥ ३ | उस स्थानपर स्त्रियाँ, पुरुष, पशु, बड़ी नदियाँ, बावलियाँ, कुएँ, तालाब, पोखरे तथा झरने इत्यादि विद्यमान थे॥ ३॥ |
| पुरतो नगरं रम्यं दिव्यप्राकारमण्डितम्।<br>यज्ञशालासमायुक्तं नानाहर्म्यविराजितम्॥ ४ | वहाँ भव्य चहारदीवारीसे घिरा हुआ एक मनोहर नगर था, जो यज्ञशालाओं तथा अनेक प्रकारके दिव्य महलोंसे सुशोभित था॥ ४॥ |
| प्रत्यभिज्ञा तदा जाताप्यस्माकं प्रेक्ष्य तत्पुरम्।<br>स्वर्गोऽयमिति केनासौ निर्मितोऽस्ति तदाद्भुतम्॥ ५ | तब उस नगरको देखकर हमलोगोंको ऐसी प्रतीति हुई, मानो यही स्वर्ग है और फिर हम लोगोंकी यह जिज्ञासा हुई कि इस अद्भुत नगरका निर्माण किसने किया है, उस समय हमलोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ!॥ ५॥ |
२५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजानं देवसङ्काशं व्रजन्तं मृगयां वने।<br>अस्माभिः संस्थिता दृष्टा विमानोपरि चाम्बिका॥ ६ | हमलोगों ने आखेटके उद्देश्यसे वनमें जाते हुए एक देवतुल्य राजाको देखा। उसी समय हमलोगोंको जगदम्बा भगवती भी विमानपर स्थित दिखायी पड़ीं॥ ६॥ |
| क्षणाच्चचाल गगने विमानं पवनेरितम्।<br>मुहूर्ताद्वा ततः प्राप्तं देशे चान्ये मनोहरे॥ ७ | थोड़ी ही देर बाद हमारा विमान वायुसे प्रेरित होकर आकाशमें पुनः उड़ने लगा और मुहूर्तभरमें वह पुनः एक अन्य सुरम्य देशमें पहुँच गया॥ ७॥ |
| नन्दनं च वनं तत्र दृष्टमस्माभिरुत्तमम्।<br>पारिजाततरुच्छायासंश्रिता सुरभिः स्थिता॥ ८ | वहाँपर हमलोगोंको अत्यन्त रमणीक नन्दनवन दृष्टिगत हुआ, जिसमें पारिजातवृक्षकी छायाका आश्रय लिये हुए कामधेनु स्थित थी॥ ८॥ |
| चतुर्दन्तो गजस्तस्याः समीपे समवस्थितः।<br>अप्सरसां तत्र वृन्दानि मेनकाप्रभृतीनि च॥ ९<br>क्रीडन्ति विविधैर्भावैर्गाननृत्यसमन्वितैः।<br>गन्धर्वाः शतशस्तत्र यक्षा विद्याधरास्तथा॥ १०<br>मन्दारवाटिकांमध्ये गायन्ति च रमन्ति च।<br>दृष्टः शतक्रतुस्तत्र पौलोम्या सहितः प्रभुः॥ ११ | कामधेनुके समीप ही चार दाँतोंवाला ऐरावत हाथी विद्यमान था और वहाँ मेनका आदि अप्सराओंके समूह अपने नृत्यों तथा गानोंमें विविध भाव-भंगिमाओंका प्रदर्शन करते हुए अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ कर रहे थे। वहाँ मन्दार-वृक्षकी वाटिकाओंमें सैकड़ों गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर गा रहे थे और रमण कर रहे थे। वहाँपर इन्द्रभगवान् भी इन्द्राणीके साथ दृष्टिगोचर हुए॥ ९-११॥ |
| वयं तु विस्मिताश्चास्म दृष्ट्वा त्रैविष्टपं तदा।<br>यादःपतिं कुबेरं च यमं सूर्य विभावसुम्॥ १२<br>विलोक्य विस्मिताश्चास्म वयं तत्र सुरान्स्थितान्।<br>तदा विनिर्गतो राजा पुरात्तस्मात्सुमण्डितात्॥ १३ | स्वर्गमें निवास करनेवाले देवताओंको देखकर हमें परम विस्मय हुआ। वहाँपर वरुण, कुबेर, यम, सूर्य, अग्नि तथा अन्य देवताओंको स्थित देखकर हम आश्चर्यचकित हुए। उसी समय उस सुसज्जित नगरसे वह राजा निकला॥ १२-१३॥ |
| देवराज इवाक्षोभ्यो नरवाह्यावनौ स्थितः।<br>विमानस्था वयं तच्च चचाल तरसागतम्॥ १४ | देवताओंके राजा इन्द्रकी भाँति पराक्रमी वह राजा धरातलपर पालकीमें बैठा था। वह विमान हमलोगोंको लेकर द्रुत गतिसे आगे बढ़ा॥ १४॥ |
| ब्रह्मलोकं तदा दिव्यं सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>तत्र ब्रह्माणमालोक्य विस्मितौ हरकेशवौ॥ १५ | तदनन्तर हमलोग अलौकिक ब्रह्मलोकमें पहुँच गये। वहाँपर सभी देवताओंसे नमस्कृत ब्रह्माजीको विद्यमान देखकर भगवान् शंकर एवं विष्णु विस्मयमें पड़ गये॥ १५॥ |
| सभायां तत्र वेदाश्च सर्वे साङ्गाः स्वरूपिणः।<br>सागराः सरितश्चैव पर्वताः पन्नगोरगाः॥ १६ | वहाँ ब्रह्माजीकी सभामें सभी वेद अपने-अपने अंगोंसहित मूर्तरूपमें विराजमान थे। साथ ही समुद्र, नदियाँ, पर्वत, सर्प एवं नाग भी उपस्थित थे॥ १६॥ |
| मामूचतुश्चतुर्वक्त्र कोऽयं ब्रह्मा सनातनः।<br>ताववोचमहं नैव जाने सृष्टिपतिं पतिम्॥ १७ | तत्पश्चात् भगवान् विष्णु और शंकरने मुझसे पूछा—हे चतुर्मुख! ये दूसरे सनातन ब्रह्मा कौन हैं? तब मैंने उनसे कहा कि मैं सबके स्वामी तथा सृष्टिकर्ता इन ब्रह्माको नहीं जानता॥ १७॥ |
| अ० ३ ] | तृतीय स्कन्ध | २५१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कोऽहं कोऽयं किमर्थं वा भ्रमोऽयं मम चेश्वरौ।<br>क्षणादथ विमानं तच्चाचालाशु मनोजवम् ॥ १८ | हे ईश्वरो! मैं कौन हूँ, ये कौन हैं और हम दोनोंका क्या प्रयोजन है? इसमें मैं भ्रमित हूँ। थोड़ी ही देरमें वह विमान पुनः मनके सदृश वेगसे आगेकी ओर बढ़ा॥ १८॥ |
| कैलासशिखरे प्राप्तं रम्ये यक्षगणान्विते।<br>मन्दारवाटिकारम्ये कीरकोकिलकूजिते ॥ १९<br><br>वीणामुरजवाद्यैश्च नादिते सुखदे शिवे।<br>यदा प्राप्तं विमानं तत्तदैव सदनाच्छुभात् ॥ २०<br><br>निर्गतो भगवान्छम्भुर्वृषारूढस्त्रिलोचनः।<br>पञ्चाननो दशभुजः कृतसोमार्थशेखरः ॥ २१ | तत्पश्चात् वह विमान यक्षगणोंसे सुशोभित, मन्दार-वृक्षकी वाटिकाओंके कारण अति सुरम्य, शुक और कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजित, वीणा और मृदंग आदि वाद्य-यन्त्रोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित, सुखदायक तथा मंगलकारी कैलास-शिखरपर पहुँचा॥ १९ १/२ ॥<br><br>उस शिखरपर जब वह विमान पहुँचा; उसी समय वृषभपर आरूढ, पंचमुख, दस भुजाओंवाले, मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए भगवान् शंकर अपने दिव्य भवनसे बाहर निकले॥ २०-२१॥ |
| व्याघ्रचर्मपरीधानो गजचर्मोत्तरीयकः।<br>पार्ष्णिरक्षौ महावीरो गजाननषडाननौ ॥ २२ | उस समय वे व्याघ्रचर्म पहने हुए तथा गजचर्म ओढ़े हुए थे। महाबली गजानन (श्रीगणेश) तथा षडानन (कार्तिकेय) उनके अंगरक्षकके रूपमें विद्यमान थे॥ २२॥ |
| शिवेन सह पुत्रौ द्वौ व्रजमानौ विरेजतुः।<br>नन्दिप्रभृतयः सर्वे गणपाश्च वराश्च ते ॥ २३<br><br>जयशब्दं प्रयुञ्जाना व्रजन्ति शिवपृष्ठगाः।<br>तं वीक्ष्य शङ्करं चान्यं विस्मितास्तत्र नारद ॥ २४<br><br>मातृभिः संशयाविष्टस्तत्राहं न्यवसं मुने।<br>क्षणात्तस्माद् गिरेः शृङ्गाद्विमानं वातरंहसा ॥ २५<br><br>वैकुण्ठसदनं प्राप्तं रमारमणमन्दिरम्।<br>असम्भाव्या विभूतिश्च तत्र दृष्टा मया सुत ॥ २६ | भगवान् शंकरके साथ चल रहे उनके दोनों पुत्र अतीव सुशोभित हो रहे थे। नन्दी आदि सभी प्रधान शिवगण जयघोष करते हुए भगवान् शिवके पीछे-पीछे चल रहे थे। हे नारद! वहाँ अन्य लोगों तथा शंकरको मातृकाओंसहित देखकर हमलोग विस्मयमें पड़ गये और हे मुने! मैं संशयग्रस्त हो गया। थोड़ी ही देरमें वह विमान उस कैलास-शिखरसे वायुगतिसे लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुके वैकुण्ठलोकमें जा पहुँचा। हे पुत्र! मैंने वहाँ अद्भुत विभूतियाँ देखीं॥ २३-२६॥ |
| विसिष्मिये तदा विष्णुर्दृष्ट्वा तत्पुरमुत्तमम्।<br>सदनाग्रे ययौ तावद्धरिः कमलोचनः ॥ २७ | उस अति रमणीक नगरको देखकर भगवान् विष्णु विस्मयमें पड़ गये। उसी समय कमलोचन भगवान् विष्णु अपने भवनसे बाहर निकले॥ २७॥ |
| अतसीकुसुमाभासः पीतवासाश्चतुर्भुजः।<br>द्विजराजाधिरूढश्च दिव्याभरणभूषितः ॥ २८<br><br>वीज्यमानस्तदा लक्ष्म्या कामिन्या चामरैः शुभैः।<br>तं वीक्ष्य विस्मिताः सर्वे वयं विष्णुं सनातनम् ॥ २९ | उनका वर्ण अलसीके पुष्पकी भाँति श्याम था, वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, उनकी चार भुजाएँ थीं, वे पक्षिराज गरुडपर आरूढ़ थे और दिव्य अलंकारोंसे विभूषित थे। भगवती लक्ष्मी उन्हें शुभ चँवर डुला रही थीं। उन सनातन भगवान् विष्णुजीको देखकर हम सभीको महान् आश्चर्य हुआ॥ २८-२९॥ |