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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
४५०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

अथैकादशोऽध्यायः

मन्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये शुक्राचार्यका तपस्यारत होना, देवताओं द्वारा दैत्योंपर आक्रमण, शुक्राचार्यकी माताद्वारा दैत्योंकी रक्षा और इन्द्र तथा विष्णुको संज्ञाशून्य कर देना, विष्णुद्वारा शुक्रमाताका वध

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तथा गतेषु देवेषु काव्यस्तान्प्रत्युवाच ह।<br>ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं यच्छृणुध्वं दानवोत्तमाः॥ १तत्पश्चात् देवताओंके चले जानेपर शुक्राचार्यने उन दैत्योंसे कहा—हे श्रेष्ठ दानवो! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मुझसे जो कहा था, उसे तुमलोग सुनो। दैत्योंके वधके लिये भगवान् विष्णु सदा प्रत्यनरत रहते हैं, वे दैत्योंका वध अवश्य करेंगे। जैसे वाराहका रूप धारण करके उन्होंने हिरण्याक्षका वध किया और नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको मारा, उसी प्रकार उत्साहसम्पन्न होकर वे सब दैत्योंका संहार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥ १-३॥
विष्णुर्दैत्यवधे युक्तो हनिष्यति जनार्दनः।<br>वाराहरूपं संस्थाय हिरण्याक्षो यथा हतः॥ २
यथा नृसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>तथा सर्वान्कृतोत्साहो हनिष्यति न चान्यथा॥ ३
न मे मन्त्रबलं सम्यक्प्रतिभाति यथा हरिम्।<br>जेतुं यूयं समर्थाः स्थ मया त्राताः सुरानथ॥ ४मुझे जान पड़ता है कि वैसा समुचित मन्त्रबल अभी मेरे पास नहीं है, जिससे मेरे द्वारा सुरक्षित होकर तुमलोग इन्द्र तथा देवताओंको जीतनेमें समर्थ हो सको। अतः हे श्रेष्ठ दानवगण! तुमलोग कुछ समयतक प्रतीक्षा करो। मैं मन्त्रसिद्धिके लिये आज ही भगवान् शिवके पास जा रहा हूँ। हे श्रेष्ठ दानवो! महादेवजीसे मन्त्र लेकर मैं तत्काल आऊँगा और यथावत् रूपमें तुमलोगोंको सिखा दूँगा॥ ४-६॥
तस्मात्कालं प्रतीक्षध्वं कियन्तं दानवोत्तमाः।<br>अहमद्य महादेवं मन्त्रार्थं प्रव्रजामि वै॥ ५
प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि साम्प्रतम्।<br>युष्मभ्यं तान्प्रदास्यामि यथार्थं दानवोत्तमाः॥ ६
दैत्या ऊचुःदैत्यों ने कहा—
पराजिताः कथं स्थातुं पृथिव्यां मुनिसत्तम।<br>शक्ता भवामोऽप्यबलास्तावत्कालं प्रतीक्षितुम्॥ ७हे मुनिश्रेष्ठ! देवताओंसे पराजित होकर हमलोग अत्यन्त निर्बल हो गये हैं, अतः उतने समयतक प्रतीक्षा करनेके लिये हम पृथ्वीपर रहनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं? सभी पराक्रमी दानव मारे जा चुके हैं और जो शेष बचे हुए हैं, सुखकी इच्छा करनेवाले वे अब युद्धमें ठहरनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ७-८॥
निहता बलिनः सर्वे केचिच्छिष्टाश्च दानवाः।<br>नाद्य युक्ताश्च संग्रामे स्थातुमेवं सुखावहाः॥ ८
शुक्र उवाचशुक्राचार्य बोले—
यावदहं मन्त्रविद्यामानयिष्यामि शङ्करात्।<br>तावद्भवद्भिः स्थातव्यं तपोयुक्तैः शमान्वितैः॥ ९जबतक मैं शिवजीसे मन्त्रविद्या लेकर नहीं आता हूँ, तबतक तुमलोग शान्ति और तपस्यासे युक्त होकर यहीं रुके रहो॥ ९॥
सामदानादयः प्रोक्ता विद्वद्भिः समयोचिताः।<br>देशं कालं बलं वीरैर्ज्ञात्वा शक्तिं बलं बुधैः॥ १०विद्वानोंने कहा है कि समयानुसार साम, दान आदिका प्रयोग करना चाहिये। बुद्धिमान् तथा वीर पुरुष देश, काल, बल, शक्ति और सेनाकी जानकारी करके ही अपना सामर्थ्य दिखाते हैं॥ १०॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 15 B

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१


सेवाथ समये कार्या शत्रूणां शुभकाम्यया ।<br>स्वशक्त्युपचये काले हन्तव्यास्ते मनीषिभिः ॥ ११बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अपने कल्याणकी इच्छासे समयपर शत्रुओंकी भी सेवा करे और अपनी शक्तिका संचय हो जानेपर उन्हें मार डाले ॥ ११ ॥
तदद्य विनयं कृत्वा सामपूर्वं छलेन वै।<br>तिष्ठध्वं स्वनिकेतेषु मदागमनकाङ्क्षया ॥ १२अतः देवताओंकी विनती करके छलपूर्वक सामनीतिका प्रयोग करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षाके साथ अपने-अपने घरोंमें रहो ॥ १२ ॥
प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि दानवाः ।<br>युध्यामहे पुनर्दैवान्मन्त्रमास्थाय वै बलम् ॥ १३हे दानवो! महादेवजीसे मन्त्र प्राप्त करके मैं आऊँगा और तब उसी मन्त्रबलका आश्रय लेकर हमलोग देवताओंसे युद्ध करेंगे ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वाथ भृगुस्तेभ्यो जगाम कृतनिश्चयः ।<br>महादेवं महाराज मन्त्रार्थं मुनिसत्तमः ॥ १४हे महाराज! उन दानवोंसे ऐसा कहकर दृढ़ संकल्पवाले मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्य मन्त्रप्राप्तिके लिये शिवजीके पास चले गये ॥ १४ ॥
दानवाः प्रेषयामासुः प्रह्लादं सुरसन्निधौ ।<br>सत्यवादिनमव्यग्रं सुराणां प्रत्ययप्रदम् ॥ १५तदनन्तर दैत्योंने सत्यवादी, धैर्यवान् तथा देवताओंके विश्वासपात्र प्रह्लादको देवताओंके पास भेजा ॥ १५ ॥
प्रह्लादस्तु सुरान्प्राह प्रश्रयावनतो नृपः ।<br>असुरैः सहितस्तत्र वचनं नम्रतायुतम् ॥ १६<br><br>न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःसन्नाहास्तथैव च ।<br>देवास्तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैर्युताः ॥ १७असुरोंके साथ वहाँ जाकर राजा प्रह्लाद विनय-सम्पन्न होकर देवताओंसे नम्रतायुक्त वचन बोले। हे देवताओ! हम सभी लोगोंने शस्त्र रख दिये हैं और कवचका त्याग कर दिया है। अब हम वल्कल धारण करके तपस्या करेंगे ॥ १६-१७ ॥
प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं तु तत् ।<br>ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते ॥ १८प्रह्लादका वचन सुनकर देवताओंने उसे सत्य मान लिया और इसके बाद वे निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे लौट गये ॥ १८ ॥
न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः ।<br>विश्रब्धाः स्वगृहान्गत्वा क्रीडासक्ताः सुसंस्थिताः ॥ १९तब दैत्योंके शस्त्र त्याग देनेपर देवता युद्धसे विरत हो गये और चिन्तारहित होकर अपने-अपने घर जाकर स्वस्थचित्त हो क्रीड़ाविलासमें संलग्न हो गये ॥ १९ ॥
दैत्या दम्भं समालम्ब्य तापसास्तपिसंयुताः ।<br>कश्यपस्याश्रमे वासं चक्रुः काव्यागमेच्छया ॥ २०उस समय दैत्यगण पाखण्डका सहारा लेकर तपस्वीके रूपमें तपस्यारत होकर शुक्राचार्यके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए कश्यपमुनिके आश्रममें रहने लगे ॥ २० ॥
काव्यो गत्वाथ कैलासं महादेवं प्रणम्य च।<br>उवाच विभुना पृष्टः किं ते कार्यमिति प्रभुः ॥ २१<br><br>मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ ।<br>पराजयाय देवानामसुरणां जयाय च ॥ २२उधर, मुनि शुक्राचार्यने कैलासपर्वतपर पहुँचकर शंकरजीको प्रणाम किया। भगवान् शिवके पूछनेपर कि 'आपका क्या कार्य है?'—उन्होंने कहा—हे देव! मैं देवताओंकी पराजय और असुरोंकी विजयके लिये उन मन्त्रोंको चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके भी पास न हों ॥ २१-२२ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 C

४५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सर्वज्ञः शङ्करः शिवः।<br>चिन्तयामास मनसा किं कर्तव्यमतः परम्॥ २३<br><br>सुरेषु द्रोहबुद्ध्यासौ मन्त्रार्थमिह साम्प्रतम्।<br>प्राप्तः काव्यो गुरुस्तेषां दैत्यानां विजयाय च॥ २४<br><br>रक्षणीया मया देवा इति सञ्चिन्त्य शङ्करः।<br>दुष्करं व्रतमत्युग्रं तमुवाच महेश्वरः॥ २५<br><br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममवाक्शिराः।<br>यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मन्त्रानवाप्स्यसि॥ २६ | व्यासजी बोले—उनका वचन सुनकर सर्वज्ञ और कल्याणकारी भगवान् शिव मनमें सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? ये दैत्यगुरु शुक्राचार्य देवताओंके प्रति द्रोह-बुद्धिसे युक्त होकर उन दैत्योंकी विजयके लिये मन्त्रहेतु इस समय यहाँ आये हैं, अतः मुझे देवताओंकी रक्षा करनी चाहिये—ऐसा सोचकर शिवजीने उन्हें यह अत्यन्त कठोर और दुष्कर व्रत करनेको कहा—पूरे एक हजार वर्षोंतक यदि आप सिर नीचे करके कणधूम (भूसीके धुएँ)-का पान करेंगे, तभी आपका कल्याण होगा और आप मन्त्र प्राप्त कर सकेंगे॥ २३—२६॥ | | इत्युक्तोऽसौ प्रणम्येशं बाढमित्यब्रवीद्वचः।<br>व्रतं चराम्यहं देव त्वयाज्ञप्तः सुरेश्वर॥ २७ | शिवजीके ऐसा कहनेपर उन्होंने महेश्वरको प्रणाम करके यह वचन कहा—'बहुत अच्छा', हे देव! हे सुरेश्वर! आपने मुझे जो आदेश दिया है, मैं उस व्रतका पालन करूँगा॥ २७॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा शङ्करं काव्यश्चकार व्रतमुत्तमम्।<br>धूमपानरतः शान्तो मन्त्रार्थं कृतनिश्चयः॥ २८ | व्यासजी बोले—शिवजीसे ऐसा कहकर मन्त्रप्राप्तिके लिये दृढ़संकल्प शुक्राचार्यजी शान्त होकर धुएँका सेवन करते हुए कठोर व्रत करने लगे॥ २८॥ | | ततो देवाः परिज्ञाय काव्यं व्रतरतं तदा।<br>दैत्यान्दम्भरतांश्चैव बभूवुर्मन्त्रतत्पराः॥ २९ | तब उस समय शुक्राचार्यको व्रतमें संलग्न तथा दैत्योंको [तपस्वी बनकर] पाखण्डमें निरत देखकर देवता लोग आपसमें मन्त्रणा करने लगे॥ २९॥ | | विचार्य मनसा सर्वे संग्रामायोद्यता नृप।<br>ययुर्धृतायुधास्तत्र यत्र ते दानवोत्तमाः॥ ३० | हे राजन्! भलीभाँति विचार करके सभी देवता संग्रामके लिये उद्यत हो गये और शस्त्रास्त्र धारणकर वहाँ पहुँच गये, जहाँ वे बड़े-बड़े दानव विद्यमान थे॥ ३०॥ | | तानागतानसमीक्ष्याथ सायुधान्दंशितांस्तथा।<br>आसंस्ते भयसंविग्ना दैत्या देवान्समन्ततः॥ ३१ | तदनन्तर दैत्यगण उन आये हुए देवताओंको आयुधोंसे सज्जित और कवच धारण किये तथा अपनेको उनसे सब ओरसे घिरा देखकर भयसे व्याकुल हो उठे॥ ३१॥ | | उत्पेतुः सहसा ते वै सन्नद्धान्भयकर्शिताः।<br>अब्रुवन्वचनं तथ्यं ते देवान्बलदर्पितान्॥ ३२ | वे भयातुर दानव तुरंत उठकर खड़े हो गये और युद्धके लिये उद्यत बलाभिमानी देवताओंसे सारगर्भित वचन कहने लगे—हमने शस्त्र रख दिये हैं, हम भयभीत हैं और हमारे आचार्य इस समय व्रतमें संलग्न हैं। हे देवताओ! पहले अभयदान देकर भी आप लोग हमें मारनेकी इच्छासे आ गये। हे | | न्यस्तशस्त्रे भयवति आचार्ये व्रतमास्थिते।<br>दत्त्वाभयं पुरा देवाः सम्प्राप्ता नो जिघांसया॥ ३३ | |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 D

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५३

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सत्यं वः क्व गतं देवा धर्मश्च श्रुतिनोदितः ।<br>न्यस्तशस्त्रा न हन्तव्या भीताश्च शरणं गताः ॥ ३४देवगण! आप लोगोंका सत्य और श्रुतिसम्मत वह धर्म कहाँ चला गया कि ‘जो शस्त्र रख चुके हों, भयभीत हों और शरणागत हो गये हों, उन्हें नहीं मारना चाहिये’॥ ३२–३४॥
देवा ऊचुः<br>भवद्भिः प्रेषितः काव्यो मन्त्रार्थं कुहकेन च ।<br>तपो ज्ञातं हि युष्माकं तेन युध्याम एव हि ॥ ३५देवता बोले—आप लोगोंने छलसे शुक्राचार्यको मन्त्र प्राप्त करनेके लिये भेजा है। हम आपलोगोंके तपको जान गये हैं, इसीलिये हमलोग युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हैं॥ ३५॥
सज्जा भवन्तु युद्धाय संरब्धाः शस्त्रपाणयः ।<br>शत्रुश्छिद्रेण हन्तव्य एष धर्मः सनातनः ॥ ३६अब क्षुब्ध हुए आपलोग भी हाथोंमें शस्त्र धारणकर युद्धके लिये तैयार हो जाइये। यह सनातन सिद्धान्त है कि जब शत्रु दुर्बल हो, तभी उसे मार डालना चाहिये॥ ३६॥
व्यास उवाच<br>

४५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११


संस्कृतहिन्दी
इत्युक्त्वा प्रेरिता निद्रा तानागत्य पपात च।<br>सेन्द्रा निद्रावशं याता देवा मूकवदास्थिताः॥ ४४ऐसा कहकर उन्होंने निद्राको प्रेरित किया। उस निद्राने देवताओंके पास आकर उनपर अपना प्रभाव डाल दिया, जिससे इन्द्रसहित सभी देवता निद्राके वशीभूत हो गये और गूँगेकी भाँति पड़े रहे॥ ४४॥
इन्द्रं निद्राजितं दृष्ट्वा दीनं विष्णुिरभाषत।<br>मां त्वं प्रविश भद्रं ते नये त्वां च सुरोत्तम॥ ४५इन्द्रको निद्राके द्वारा नियन्त्रित तथा दीन देखकर भगवान् विष्णुने कहा—हे देवश्रेष्ठ! तुम मुझमें प्रविष्ट हो जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें अन्यत्र पहुँचाता हूँ॥ ४५॥
एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरन्दरः।<br>निर्भयो गतनिद्रश्च बभूव हरिरक्षितः॥ ४६विष्णुके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र उनमें प्रवेश कर गये और उन श्रीहरिसे रक्षित होकर वे निर्भय तथा निद्रारहित हो गये॥ ४६॥
रक्षितं हरिणा दृष्ट्वा शक्रं तत्र गतव्यथम्।<br>काव्यमाता ततः क्रुद्धा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>मघवंस्त्वां भक्षयामि सविष्णुं वै तपोबलात्।<br>पश्यतां सर्वदेवानामीदृशं मे तपोबलम्॥ ४८तब भगवान् विष्णुके द्वारा रक्षित इन्द्रको व्यथाशून्य देखकर शुक्राचार्यकी माता कुपित हो उठीं और यह वचन बोलीं—हे इन्द्र! सभी देवताओंके देखते-देखते मैं अपने तपोबलसे विष्णुसहित तुम्हें खा जाऊँगी; ऐसा मेरा तपोबल है॥ ४७-४८॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्तौ तु तया देवौ विष्ण्विन्द्रौ योगविद्यया।<br>अभिभूतौ महात्मानौ स्तब्धौ तौ सम्बभूवतुः॥ ४९व्यासजी बोले—ऐसा कहकर उन्होंने अपनी योगविद्याके द्वारा इन्द्र तथा विष्णुको आक्रान्त कर दिया और वे दोनों महात्मा स्तब्ध हो गये॥ ४९॥
विस्मितास्तु तदा देवा दृष्ट्वा तावतिबाधितौ।<br>चक्रुः किलकिलाशब्दं ततस्ते दीनमानसाः॥ ५०उन दोनोंको बहुत बड़े संकटमें पड़ा देखकर देवताओंको महान् आश्चर्य हुआ और वे दुःखित्त हो जोर-जोरसे चीखने-चिल्लाने लगे॥ ५०॥
क्रोशमानान्सुरान्दृष्ट्वा विष्णुं प्राह शचीपतिः।<br>विशेषेणाभिभूतोऽस्मि त्वत्तोऽहं मधुसूदन॥ ५१<br><br>जह्येनां तरसा विष्णो यावन्नौ न दहेत्प्रभो।<br>तपसा दर्पितां दुष्टां मा विचारय माधव॥ ५२देवताओंको चीखते-चिल्लाते देखकर इन्द्रने विष्णुसे कहा—हे मधुसूदन! मैं [इस समय] आपकी अपेक्षा अधिक आक्रान्त हूँ। अतः हे विष्णो! हे प्रभो! यह हमें जबतक भस्म न कर दे, आप तपस्याके अभिमानमें चूर इस दुष्टाको शीघ्रतापूर्वक मार डालिये। हे माधव! अब आप सोच-विचार न करें॥ ५१-५२॥
इत्युक्तो भगवान्विष्णुः शक्रण प्रथितेन च।<br>चक्रं सस्मार तरसा घृणां त्यक्त्वाथ माधवः॥ ५३<br><br>स्मृतमात्रं तु सम्प्राप्तं चक्रं विष्णुवशानुगम्।<br>दधार च करे क्रुद्धो वधार्थं शक्रनोदितः॥ ५४कीर्तिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने दया छोड़कर तत्काल सुदर्शन चक्रका स्मरण किया। विष्णुके वशमें रहनेवाला वह चक्र उनके स्मरण करते ही आ पहुँचा और इन्द्रसे प्रेरित होकर उन्होंने कुपित हो उसके वधके लिये चक्रको अपने हाथमें ले लिया॥ ५३-५४॥

अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५

अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५


संस्कृतहिन्दी
गृहीत्वा तत्करे चक्रं शिरश्चिच्छेद रंहसा।<br>हतां दृष्ट्वा तु तां शक्रो मुदितश्चाभवत्तदा॥ ५५<br><br>देवाश्चातीव सन्तुष्टा हरिं जय जयेति च।<br>तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे सञ्जाता विगतज्वराः॥ ५६उस चक्रको हाथमें लेकर भगवान् विष्णुने बड़े वेगसे उसका सिर काट दिया। तब उसे मृत देखकर इन्द्र हर्षित हो उठे। सभी देवता भी अत्यन्त सन्तुष्ट होकर विष्णुकी जयकार करने लगे। वे प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे और सन्तापरहित हो गये॥ ५५-५६॥
इन्द्रविष्णू तु सञ्जातौ तत्क्षणाद्धृदयव्यथौ।<br>स्त्रीवधाच्छंकमानौ तु भृगोः शापं दुरत्ययम्॥ ५७स्त्रीवधसे [होनेवाले पाप] तथा भृगुमुनिके भीषण शापकी शंका करते हुए वे भगवान् विष्णु तथा इन्द्र उसी समयसे दुःखितचित्त रहने लगे॥ ५७॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे<br>शुक्रमातृवधवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥

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अथ द्वादशोऽध्यायः

महात्मा भृगुद्वारा विष्णुको मानवयोनिमें जन्म लेनेका शाप देना, इन्द्रद्वारा अपनी पुत्री जयन्तीको शुक्राचार्यके लिये अर्पित करना, देवगुरु बृहस्पतिद्वारा शुक्राचार्यका रूप धारणकर दैत्योंका पुरोहित बनना

संस्कृतहिन्दी
व्यास उवाच<br>तं दृष्ट्वा तु वधं घोरं चुक्रोध भगवान्भृगुः।<br>वेपमानोऽतिदुःखार्तः प्रोवाच मधुसूदनम्॥ १व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उस भयानक वधको देखकर भगवान् भृगु अत्यन्त कुपित हुए और दुःखसे व्याकुल होकर काँपते हुए वे मधुसूदन विष्णुसे कहने लगे॥ १॥
भृगुरुवाच<br>अकृत्यं ते कृतं विष्णो जानन्पापं महामते।<br>वधोऽयं विप्रजाताया मनसा कर्तुमक्षमः॥ २**भृगु बोले—**हे महाबुद्धिमान् विष्णो! जो नहीं करना चाहिये वह पाप आपने जान-बूझकर कर डाला। विप्र-स्त्रीके इस वधकी तो मनसे कल्पना करना भी अनुचित है॥ २॥
आख्यातस्त्वं सत्त्वगुणः स्मृतो ब्रह्मा च राजसः।<br>तथासौ तामसः शम्भुर्विपरीतं कथं स्मृतम्॥ ३<br><br>तामसस्त्वं कथं जातः कृतं कर्मातिनिन्दितम्।<br>अवध्या स्त्री त्वया विष्णो हता कस्मान्निरागसा॥ ४आप तो सत्त्वगुणसे सम्पन्न कहे गये हैं, ब्रह्मा रजोगुणी और शिव तमोगुणी बताये गये हैं; तब आपने अपने गुणके विपरीत कार्य क्यों किया? आप तामसी कैसे हो गये, जिससे आपने यह घोर निन्दनीय कर्म कर डाला? हे विष्णो! आपने उस अवध्य तथा निरपराध स्त्रीको क्यों मार डाला?॥ ३-४॥
शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत्प्रकरोमि ते।<br>विधुरोऽहं कृतः पाप त्वयाहं शुक्रकारणात्॥ ५[उन्होंने क्रोधपूर्वक कहा कि] अब मैं तुझ दुराचारीको शाप दे रहा हूँ, इसके अतिरिक्त तुम्हारा क्या प्रतीकार करूँ? अरे पापी! तुमने इन्द्रके हितके लिये मुझे विधुर बना दिया। हे मधुसूदन! मैं इन्द्रको शाप नहीं दूँगा, बल्कि तुम्हें ही शाप दूँगा।
न शपेऽहं तथा शक्रं शपे त्वां मधुसूदन।<br>सदा छलपरोऽसि त्वं कीटयोनिर्दुराशयः॥ ६कृष्ण सर्पसदृश दुरभिप्रायवाले तुम सदा छल करनेमें ही तत्पर रहते हो॥ ५-६॥
४५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ये च त्वां सात्त्विकं प्राहुस्ते मूर्खा मुनयः किल।<br>तामसस्त्वं दुराचारः प्रत्यक्षं मे जनार्दन॥ ७<br><br>अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसम्भवाः।<br>प्रायो गर्भभवं दुःखं भुंक्ष्व पापाज्जनार्दन॥ ८हे जनार्दन! जो मुनि तुम्हें सात्त्विक कहते हैं, वे निश्चय ही मूर्ख हैं। मैंने तो प्रत्यक्ष जान लिया कि तुम तमोगुणी तथा दुराचारी हो। अतः हे जनार्दन! मेरे शापसे मृत्युलोकमें तुम्हारे अनेक अवतार हों और [इस स्त्री-वधजन्य] पापके कारण बार-बार गर्भवाससे होनेवाले दुःखको भोगो॥ ७-८॥
व्यास उवाच<br>ततस्तेनाथ शापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः।<br>लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह॥ ९व्यासजी बोले—उसी शापके कारण भगवान् विष्णु धर्मका ह्रास होनेपर संसारके कल्याणके लिये बार-बार मानवरूपोंमें प्रकट होते हैं॥ ९॥
राजोवाच<br>भृगुभार्या हता तत्र चक्रेणामिततेजसा।<br>गार्हस्थ्यञ्च पुनस्तस्य कथं जातं महात्मनः॥ १०राजा बोले—[हे व्यासजी!] जब अमित तेजस्वी चक्रके द्वारा भृगुपत्नीका वध हो गया, उसके बाद महात्मा भृगुका गार्हस्थ्य-जीवन कैसे व्यतीत हुआ?॥ १०॥
व्यास उवाच<br>इति शप्त्वा हरिं रोषात्तदादाय शिरस्त्वरन्।<br>काये संयोज्य तरसा भृगुः प्रोवाच कार्यवित्॥ ११<br><br>अद्य त्वां विष्णुना देवि हतां सञ्जीवयाम्यहम्।<br>यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा॥ १२<br><br>तेन सत्येन जीवेत यदि सत्यं ब्रवीम्यहम्।<br>पश्यन्तु देवताः सर्वा मम तेजोबलं महत्॥ १३<br><br>अद्भिस्त्वां प्रोक्ष्य शीताभिर्जीवयामि तपोबलात्।<br>सत्यं शौचं तथा वेदा यदि मे तपसो बलम्॥ १४व्यासजी बोले—इस प्रकार रोषपूर्वक भगवान् विष्णुको शाप देकर कार्यकुशल महर्षि भृगु तत्काल उस [कटे] सिरको लेकर शीघ्रतापूर्वक [अपनी पत्नीके] धड़में जोड़ करके बोले—हे देवि! विष्णुके द्वारा तुम मारी जा चुकी हो, किंतु अब मैं तुम्हें फिरसे जीवित कर रहा हूँ। यदि मैं सम्पूर्ण धर्म जानता हूँ तथा उसका सम्यक् आचरण करता हूँ और सदा सत्य भाषण करता हूँ तो उसी सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ। सभी देवता मेरे महान् तेज-बलको देख लें। यदि मुझमें सत्य, पवित्रता, वेदाध्ययन तथा तपस्याका बल होगा तो मैं उन्हींके प्रभावसे शीतल जलसे तुम्हारा प्रोक्षण करके तुम्हें जीवित कर दूँगा॥ ११-१४॥
व्यास उवाच<br>अद्भिः सम्प्रोक्षिता देवी सद्यः सञ्जीविता तदा।<br>उत्थिता परमप्रीता भृगोर्भार्या शुचिस्मिता॥ १५व्यासजी बोले—तब जलसे प्रोक्षित करते ही मधुर मुसकानवाली वे भृगुपत्नी शीघ्र ही जीवित हो गयीं और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उठकर खड़ी हो गयीं॥ १५॥
ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव।<br>साधु साध्विति तं तां तु तुष्टुवुः सर्वतो दिशम्॥ १६तब सोकर उठी हुईके समान उसे देखकर सब ओरसे लोग 'साधु-साधु'—ऐसा कहकर भृगुमुनि तथा उनकी भार्या दोनोंकी स्तुति करने लगे॥ १६॥
एवं सञ्जीविता तेन भृगुणा वरवर्णिनी।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवाः सेन्द्रा विलोक्य तत्॥ १७इस प्रकार उन महर्षि भृगुने उस सुन्दरीको जीवित कर दिया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवता अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे॥ १७॥
अ० १२ ]चतुर्थ स्कन्ध४५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इन्द्रः सुरानथोवाच मुनिना जीविता सती।<br>काव्यस्तप्त्वा तपो घोरं किं करिष्यति मन्त्रवित्॥ १८तत्पश्चात् इन्द्रने देवताओंसे कहा—भृगुमुनिने अपनी साध्वी भार्याको जीवित कर दिया। साथ ही मन्त्रज्ञानी शुक्राचार्य कठोर तपस्या करके [शिवसे मन्त्र प्राप्तकर] पता नहीं क्या कर डालेंगे!॥ १८॥
व्यास उवाच<br>गता निद्रा सुरेन्द्रस्य देहेऽक्षेममभून्नृप।<br>स्मृत्वा काव्यस्य वृत्तान्तं मन्त्रार्थमतिदारुणम्॥ १९**व्यासजी बोले—**हे राजन्! मन्त्रप्राप्तिके लिये शुक्राचार्यके अत्यन्त कठोर तपका स्मरण करके इन्द्रकी नींद समाप्त हो गयी और उनके शरीरमें व्याकुलता होने लगी॥ १९॥
विमृश्य मनसा शक्रो जयन्तीं स्वसुतां तदा।<br>उवाच कन्यां चार्वङ्गीं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ २०<br><br>गच्छ पुत्रि मया दत्ता काव्याय त्वं तपस्विने।<br>समाराधय तन्वङ्गि मत्कृते तं वशं कुरु॥ २१<br><br>उपचारैर्मुनिं तैस्तैः समाराध्य मनःप्रियैः।<br>भयं मे तरसा गत्वा हर तत्र वराश्रमे॥ २२तब मनमें भली-भाँति विचार करके इन्द्रने सुन्दर स्वरूपवाली अपनी पुत्री जयन्तीसे मुसकराते हुए कहा—हे पुत्रि! मैंने तुम्हें तपस्वी शुक्राचार्यको सौंप दिया। अतः हे तन्वंगि! अब तुम जाओ और मेरे कल्याणके लिये उनकी सेवा करो और उन्हें वशमें कर लो। उस उत्तम आश्रममें शीघ्र जाकर उनके मनको प्रिय लगनेवाले विविध उपचारोंसे उन्हें प्रसन्न करके मेरा भय दूर करो॥ २०—२२॥
सा पितुर्वचनं श्रुत्वा तत्रागच्छन्मनोरमा।<br>तमपश्यद्विशालाक्षी पिबन्तं धूममाश्रमे॥ २३विशाल नयनोंवाली वह सुन्दर कन्या पिताकी बात सुनकर [शुक्राचार्यके] आश्रममें गयी और वहाँपर उसने मुनिको [नीचेकी ओर सिर करके] धुएँका सेवन करते हुए देखा॥ २३॥
तस्य देहं समालोक्य स्मृत्वा वाक्यं पितुस्तदा।<br>कदलीदलमादाय वीजयामास तं मुनिम्॥ २४तब उनके [तपोरत] शरीरको देखकर और पिताकी बात याद करके वह केलेका एक पत्ता लेकर मुनिको पंखा झलने लगी॥ २४॥
निर्मलं शीतलं वारि समानीय सुवासितम्।<br>पानाय कल्पयामास भक्त्या परमया लघु॥ २५<br><br>छायां वस्त्रातपत्रेण भास्करे मध्यगे सति।<br>रचयामास तन्वङ्गी स्वयं धर्मे स्थिता सती॥ २६तबसे वह उनके पीनेके लिये अत्यन्त स्वच्छ, शीतल, सुगन्धित तथा रुचिकर जल ले आकर [उनके समक्ष] श्रद्धापूर्वक उपस्थित किया करती। सूर्यके मध्य आकाशमें होते ही वह सुन्दरी उनके ऊपर वस्त्रसे छतरी बनाकर छाया कर देती थी। वह साध्वी सदा पातिव्रत्य धर्मका पालन करती थी॥ २५—२६॥
फलान्यानीय दिव्यानि पक्वानि मधुराणि च।<br>मुमोचाग्रे मुनेस्तस्य भक्षार्थं विहितानि च॥ २७<br><br>कुशाः प्रादेशमात्रा हि हरिताः शुकसन्निभाः।<br>दधाराग्रेऽथ पुष्पाणि नित्यकर्मसमृद्धये॥ २८<br><br>निद्रार्थं कल्पयामास संस्तरं पल्लवान्वितम्।<br>तस्मिन्मुनौ चादरस्था चकार व्यजनं शनैः॥ २९वह शास्त्रविहित दिव्य, पके तथा मीठे फल लाकर खानेके लिये उन मुनिके समक्ष रख देती थी। वह कन्या उनके नित्यकर्मके सम्पादनार्थ पुष्प और तोतेके वर्णके समान प्रादेशमात्र मापवाले हरे-हरे कुश उनके आगे प्रस्तुत कर देती थी। उनके शयनके लिये वह कोमल-कोमल पत्तोंका बिछौना तैयार करती थी और फिर उन मुनिके प्रति आदरभाव रखकर धीरे-धीरे पंखा झलने लगती थी॥ २७—२९॥
४५८श्रीमद्देवीभागवत[अ० १२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हावभावादिकं किञ्चिद्विकारजननं च तत्।<br>न चकार जयन्ती सा शापभीता मुनेस्तदा॥ ३०मुनिके शापसे भयभीत होकर वह जयन्ती उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेवाला कोई हाव-भाव प्रदर्शित नहीं करती थी॥ ३०॥
स्तुतिं चकार तन्वङ्गी गीर्भिस्तस्य महात्मनः।<br>सुभाषिण्यनुकूलाभिः प्रीतिकर्त्रीभिरप्युत॥ ३१<br>प्रबुद्धे जलमादाय दधाराचमनाय च।<br>मनोऽनुकूलं सततं कुर्वन्ती व्यचरत्तदा॥ ३२सुकुमार अंगोंवाली तथा मृदुभाषण करनेवाली वह कन्या उन महात्माके मनके अनुकूल तथा प्रीति उत्पन्न करनेवाले शब्दोंसे उनकी स्तुति करती थी। तत्पश्चात् उनके जाग जानेपर आचमनके लिये जल लाकर रख देती थी। इस प्रकार सदा उनके मनके अनुकूल कार्य करती हुई उनके साथ व्यवहार करती थी॥ ३१-३२॥
इन्द्रोऽपि सेवकांस्तत्र प्रेषयामास चतुरः।<br>प्रवृत्तिं ज्ञातुकामो वै मुनेस्तस्य जितात्मनः॥ ३३चिन्तासे व्याकुल इन्द्र भी उन जितेन्द्रिय मुनिकी प्रवृत्ति जाननेकी इच्छासे अपने सेवक भेजते रहते थे॥ ३३॥
एवं बहूनि वर्षाणि परिचर्यापरावभूत्।<br>निर्विकारा जितक्रोधा ब्रह्मचर्यपरा सती॥ ३४इस प्रकार वह साध्वी कन्या क्रोधपर विजय प्राप्त करके, निर्विकार होकर तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहती हुई बहुत वर्षोंतक मुनिकी सेवामें संलग्न रही॥ ३४॥
पूर्णे वर्षसहस्रे तु परितुष्टो महेश्वरः।<br>वरेण छन्दयामास काव्यं प्रीतमना हरः॥ ३५तदनन्तर हजार वर्ष पूर्ण होनेपर महेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक वे शुक्राचार्यसे वर माँगनेके लिये कहने लगे॥ ३५॥
ईश्वर उवाच<br>यच्च किञ्चिदपि ब्रह्मान्विद्यते भृगुनन्दन।<br>प्रतिपश्यसि यत्सर्वं यच्च वाच्यं न कस्यचित्॥ ३६<br>सर्वाभिभावकत्वेन भविष्यसि न संशयः।<br>अवध्यः सर्वभूतानां प्रजेशश्च द्विजोत्तमः॥ ३७ईश्वर बोले— हे ब्रह्मन्! हे भृगुनन्दन! जगत्में जो कुछ भी विद्यमान है, आप जो सब देख रहे हैं तथा जो किसीकी भी वाणीका विषय नहीं है—उन सबके स्वामित्वसे आप युक्त हो जायेंगे; इसमें कोई सन्देह नहीं है। आप सभी प्राणियोंसे अवध्य होंगे। आप प्रजाओंके स्वामी तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे॥ ३६-३७॥
व्यास उवाच<br>एवं दत्त्वा वराञ्छम्भुस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>काव्यस्तामथ संवीक्ष्य जयन्तीं वाक्यमब्रवीत्॥ ३८<br>कासि कस्यासि सुश्रोणि ब्रूहि किं ते चिकीर्षितम्।<br>किमर्थमिह सम्प्राप्ता कार्यं वद वरोरु मे॥ ३९<br>किं वाञ्छसि करोम्यद्य दुष्करं चेत्सुलोचने।<br>प्रीतोऽस्मि त्वत्कृतेनाद्य वरं वरय सुव्रते॥ ४०व्यासजी बोले— इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् जयन्तीको देखकर शुक्राचार्यने उससे कहा—हे सुश्रोणि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो; मुझे अपनी अभिलाषा बताओ। हे सुन्दरि! तुम यहाँ किसलिये आयी हो, अपना कार्य बताओ। हे सुनयने! तुम क्या चाहती हो; यदि वह कार्य दुष्कर भी हो तो भी मैं उसे अभी कर दूँगा। हे सुव्रते! आज मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ, अतः वर माँग लो॥ ३८-४०॥

| अ० १२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४५९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः सा तु मुनिं प्राह जयन्ती मुदितानना।<br>चिकीर्षितं मे भगवंस्तपसा ज्ञातुमर्हसि॥ ४१तदनन्तर प्रसन्न मुखमण्डलवाली जयन्तीने मुनिसे कहा—हे भगवन्! आप तो अपनी तपस्यासे मेरा अभिलषित जान लेनेमें समर्थ हैं॥ ४१॥
शुक्र उवाच<br>ज्ञातं मया तथापि त्वं ब्रूहि यन्मनसेप्सितम्।<br>करोमि सर्वथा भद्रं प्रीतोऽस्मि परिचर्यया॥ ४२**शुक्राचार्य बोले—**वह तो मैंने जान लिया, फिर भी जो तुम्हारा मनोभिलषित है, उसे तुम मुझे बताओ। मैं हर तरहसे तुम्हारा कल्याण करूँगा; क्योंकि मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ॥ ४२॥
जयन्त्युवाच<br>शक्रस्याहं सुता ब्रह्मन् पित्रा तुभ्यं समर्पिता।<br>जयन्ती नामतश्चाहं जयन्तावरजा मुने॥ ४३**जयन्ती बोली—**हे ब्रह्मन्! मैं इन्द्रकी पुत्री हूँ और पिताजीने मुझे आपको सौंप दिया है। हे मुने! मेरा नाम जयन्ती है और मैं जयन्तकी छोटी बहन हूँ॥ ४३॥
सकामास्मि त्वयि विभो वाञ्छितं कुरु मेऽधुना।<br>रंस्ये त्वया महाभाग धर्मतः प्रीतिपूर्वकम्॥ ४४हे विभो! मैं आपपर आसक्त हूँ, अतः मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिये। हे महाभाग! मैं पातिव्रत-धर्मके अनुसार प्रेमपूर्वक आपके साथ विहार करूँगी॥ ४४॥
शुक्र उवाच<br>मया सह त्वं सुश्रोणि दशवर्षाणि भामिनि।<br>सर्वैर्भूतैरदृश्या च रमस्वेह यदृच्छया॥ ४५**शुक्राचार्य बोले—**हे सुश्रोणि! हे भामिनि! तुम सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहती हुई दस वर्षोंतक इच्छानुसार मेरे साथ यहाँ विहार करो॥ ४५॥
व्यास उवाच<br>एवमुक्त्वा गृहं गत्वा जयन्त्याः पाणिमुद्वहन्।<br>तया सहावसद्देव्या दशवर्षाणि भार्गवः॥ ४६**व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर शुक्राचार्यने घर जाकर जयन्तीके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् मायासे आच्छादित होकर सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए वे ऐश्वर्यसम्पन्न मुनि शुक्राचार्य देवी जयन्तीके साथ दस वर्षोंतक वहाँ रहे॥ ४६ ½॥
अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः।<br>दैत्यास्तमागतं श्रुत्वा कृतार्थं मन्त्रसंयुक्तम्॥ ४७<br><br>अभिजग्मुर्गृहे तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः।<br>नापश्यन् रममाणं ते जयन्त्या सह संयुक्तम्॥ ४८गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल हो मन्त्रसे युक्त होकर आया हुआ सुनकर सभी दैत्य उनके दर्शनकी इच्छासे प्रसन्नतापूर्वक उनके घर गये, किंतु वे उन्हें देख न सके; क्योंकि उस समय वे जयन्तीके साथ विहार कर रहे थे॥ ४७-४८॥
तदा विमनसः सर्वे जाता भग्नोद्यमाश्च ते।<br>चिन्तापरातिदीनाश्च वीक्षमाणाः पुनः पुनः॥ ४९<br><br>अदृष्ट्वा तं तु संवृतं प्रतिजग्मुर्यथागतम्।<br>स्वगृहान्दैत्यवर्यास्ते चिन्ताविष्टा भयातुराः॥ ५०इससे उन सभी दैत्योंका मन उदास हो गया और उनके सभी उद्योग व्यर्थ हो गये। वे बहुत चिन्तित और दुःखी होकर उन्हें बार-बार खोजते रहे। अन्तमें [मायासे] आच्छादित उन मुनिको न देखकर वे चिन्तित तथा भयभीत दैत्य जैसे आये थे वैसे ही अपने घर लौट गये॥ ४९-५०॥
रममाणं तथा ज्ञात्वा शक्रः प्रोवाच तं गुरुम्।<br>बृहस्पतिं महाभागं किं कर्तव्यमितः परम्॥ ५१तत्पश्चात् शुक्राचार्यको विहार करता हुआ जानकर इन्द्रने अपने गुरु महाभाग बृहस्पतिसे कहा—अब क्या किया जाय?॥ ५१॥
४६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
गच्छाद्य दानवान्ब्रह्मन्मायया त्वं प्रलोभय।<br>अस्माकं कुरु कार्यं त्वं बुद्ध्या सञ्चिन्त्य मानद॥ ५२हे ब्रह्मन्! आप दानवोंके पास जाइये और मायाके द्वारा उन्हें मोहमें डाल दीजिये। हे मानद! बुद्धिसे भलीभाँति विचार करके आप हमारा कार्य सिद्ध कर दीजिये॥ ५२॥
तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यं रममाणं सुसंवृतम्।<br>ज्ञात्वा तद्रूपमास्थाय दैत्यान्प्रति ययौ गुरुः॥ ५३इन्द्रकी बात सुनकर देवगुरु बृहस्पति शुक्राचार्यको मायाच्छादित होनेके कारण [अदृश्य हो जयन्तीके साथ] क्रीडा करते जानकर उन्हींका रूप धारण करके दैत्योंके पास गये॥ ५३॥
गत्वा तत्रातिभक्त्यासौ दानवान्समुपाह्वयत्।<br>आगतास्तेऽसुराः सर्वे ददृशुः काव्यमग्रतः॥ ५४वहाँ पहुँचकर उन्होंने बड़े आदरके साथ दानवोंको बुलवाया। तब सभी दानव आ गये और उन्होंने शुक्राचार्यको अपने सम्मुख देखा॥ ५४॥
प्रणम्य संस्थिताः सर्वे काव्यं मत्वातिमोहिताः।<br>न विदुस्ते गुरोर्मायां काव्यरूपविभाविनीम्॥ ५५मायासे विमोहित सभी दैत्य [उन छद्मवेषधारी देवगुरु बृहस्पतिको ही] शुक्राचार्य समझकर उन्हें प्रणाम करके उनके समक्ष खड़े हो गये। वे शुक्राचार्यका कृत्रिम रूप प्रकट करनेवाली देवगुरु बृहस्पतिकी मायाको नहीं जान सके॥ ५५॥
तानुवाच गुरुः काव्यरूपः प्रच्छन्नमायया।<br>स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तोऽहं वो हिताय वै॥ ५६<br><br>अहं वो बोधयिष्यामि विद्यां प्राप्ताममायया।<br>तपसा तोषितः शम्भुर्युष्मत्कल्याणहेतवे॥ ५७तत्पश्चात् छद्म मायासे शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले गुरु बृहस्पतिने उनसे कहा—मेरे यजमानोंका स्वागत है। मैं आपलोगोंके हितके लिये अब आ गया हूँ। मैंने आप सबके कल्याणके लिये तपस्याके द्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न कर लिया और अब मैं उनसे प्राप्त विद्याको निष्कपट भावसे आपलोगोंको बता दूँगा॥ ५६-५७॥
तच्छ्रुत्वा प्रीतिमनसो जातास्ते दानवोत्तमाः।<br>कृतकार्यं गुरुं मत्वा जहृषुस्ते विमोहिताः॥ ५८<br><br>प्रणेमुस्ते मुदा युक्ता निरातङ्का गतव्यथाः।<br>देवेभ्यश्च भयं त्यक्त्वा तस्थुः सर्वे निरामयाः॥ ५९यह सुनकर वे श्रेष्ठ दानव प्रसन्नचित्त हो गये। गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल समझकर वे मोहग्रस्त दानव बहुत हर्षित हुए और उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया। वे भयमुक्त तथा सन्तापरहित हो गये। अब देवताओंका भय छोड़कर वे सभी दैत्य स्वस्थचित्त होकर रहने लगे॥ ५८-५९॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे जयन्त्या शुक्रसहवासवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


अथ त्रयोदशोऽध्यायः

शुक्राचार्यरूपधारी बृहस्पतिका दैत्योंको उपदेश देना

राजोवाच<br>किं कृतं गुरुणा पश्चाद् भृगुरूपेण वर्तता।<br>छलेनैव हि दैत्यानां पौरोहित्येन धीमता॥ १राजा बोले—[हे व्यासजी!] तत्पश्चात् शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले बुद्धिमान् गुरु बृहस्पतिने छलपूर्वक दैत्योंका पुरोहित बनकर क्या किया?॥ १॥

| अ० १३ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४६१ | | :--- | :--- |

| गुरुः सुराणामनिशं सर्वविद्यानिधिस्तथा।<br>सुतोऽङ्गिरस एवासौ स कथं छलकृन्मुनिः॥ २ | वे तो देवताओंके गुरु हैं, सदासे सभी विद्याओंके निधान हैं और महर्षि अंगिराके पुत्र हैं; तब उन मुनिने छल क्यों किया?॥ २॥ | | धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु सत्यं धर्मस्य कारणम्।<br>कथितं मुनिभिर्येन परमात्मापि लभ्यते॥ ३ | मुनियोंने समस्त धर्मशास्त्रोंमें सत्यको ही धर्मका मूल बताया है, जिससे परमात्मातक प्राप्त किये जा सकते हैं॥ ३॥ | | वाचस्पतिस्तथा मिथ्यावक्ता चेद्दानवान्प्रति।<br>कः सत्यवक्ता संसारे भविष्यति गृहाश्रमी॥ ४ | जब बृहस्पति भी दानवोंसे झूठ बोले, तब संसारमें कौन गृहस्थ सत्य बोलनेवाला हो सकेगा?॥ ४॥ | | आहारादधिकं भोज्यं ब्रह्माण्डविभवेऽपि न।<br>तदर्थं मुनयो मिथ्या प्रवर्तन्ते कथं मुने॥ ५ | हे मुने! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका वैभव पासमें हो जानेपर भी [कोई व्यक्ति अपने] आहारसे अधिक नहीं खा सकता, तब उसीके निमित्त मुनिलोग भी मिथ्या-भाषणमें किसलिये प्रवृत्त हो जाते हैं?॥ ५॥ | | शब्दप्रमाणमुच्छेदं शिष्टाभावे गतं न किम्।<br>छलकर्मप्रवृत्ते वाविगीतत्वं गुरौ कथम्॥ ६ | इस प्रकारके अशिष्ट आचरणसे देवगुरु बृहस्पतिके वचनोंकी प्रामाणिकता क्या नष्ट नहीं हो गयी और इस छलकर्ममें लिप्त होनेसे उन्हें निष्कलंक कैसे कहा जा सकता है?॥ ६॥ | | देवाः सत्त्वसमुद्भूता राजसा मानवाः स्मृताः।<br>तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ता उत्पत्तौ मुनिभिः किल॥ ७ | मुनियोंने देवताओंको सत्त्वगुणसे, मनुष्योंको रजोगुणसे तथा पशु-पक्षियोंको तमोगुणसे उत्पन्न बतलाया है॥ ७॥ | | अमराणां गुरुः साक्षान्मिथ्यावादी स्वयं यदि।<br>तदा कः सत्यवक्ता स्याद्राजसस्तामसः पुनः॥ ८ | यदि स्वयं देवगुरु बृहस्पति ही साक्षात् मिथ्या-भाषणमें प्रवृत्त हो गये, तब रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त कौन प्राणी सत्यवादी हो सकेगा?॥ ८॥ | | क्व स्थितिस्तस्य धर्मस्य सन्देहोऽयं ममात्मनः।<br>का गतिः सर्वजन्तूनां मिथ्याभूते जगत्त्रये॥ ९ | इस प्रकार तीनों लोकोंके मिथ्यापरायण हो जानेपर धर्मकी स्थिति कहाँ होगी और सभी प्राणियोंकी क्या दशा होगी? यही मेरा संदेह है॥ ९॥ | | हरिर्ब्रह्मा शचीकान्तस्तथान्ये सुरसत्तमाः।<br>सर्वे छलविधौ दक्षा मनुष्याणाञ्च का कथा॥ १० | भगवान् विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र तथा और भी दूसरे महान् देवतागण—सब छलकार्यमें निपुण हैं, तब मनुष्योंकी बात ही क्या?॥ १०॥ | | कामक्रोधाभिसन्तप्ता लोभोपहतचेतसः।<br>छले दक्षाः सुराः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः॥ ११ | सभी देवता और तपोधन मुनिगण भी काम तथा क्रोधसे सन्तप्त और लोभसे व्याकुलचित्त होकर छल-प्रपंचमें तत्पर रहते हैं॥ ११॥ | | वसिष्ठो वामदेवश्च विश्वामित्रो गुरुस्तथा।<br>एते पापरताः कात्र गतिर्धर्मस्य मानद॥ १२ | हे मानद! जब वसिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र और गुरु बृहस्पति—ये लोग भी पाप-कर्ममें संलग्न हो गये, तब धर्मकी क्या दशा होगी?॥ १२॥ | | इन्द्रोऽग्निश्चन्द्रमा वेधाः परदाराभिलम्पटाः।<br>आर्यत्वं भुवनेष्वेषु स्थितं कुत्र मुने वद॥ १३ | इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा और ब्रह्मातक कामके वशीभूत हो गये, तब हे मुने! आप ही बतायें कि इन भुवनोंमें शिष्टता कहाँ रह गयी?॥ १३॥ |

४६२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३

| वचनं कस्य मन्तव्यमुपदेशधियानघ।<br>सर्वे लोभाभिभूतास्ते देवाश्च मुनयस्तदा ॥ १४ | हे पुण्यात्मन् ! जब वे सब देवता और मुनिलोग भी लोभके वशीभूत हैं, तब उपदेश ग्रहण करनेके विचारसे किसका वचन प्रमाण माना जाय ? ॥ १४ ॥ | | व्यास उवाच<br>किं विष्णुः किं शिवो ब्रह्मा मघवा किं बृहस्पतिः।<br>देहवान् प्रभवत्येव विकारैः संयुतस्तदा ॥ १५ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] चाहे विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र और बृहस्पति ही क्यों न हों—देहधारी तो विकारोंसे युक्त रहता ही है ॥ १५ ॥ | | रागी विष्णुः शिवो रागी ब्रह्मापि रागसंयुतः।<br>(रागवान्किमकृत्यं वै न करोति नराधिप)<br>रागवानपि चातुर्याद्विदेह इव लक्ष्यते ॥ १६<br><br>सम्प्राप्ते संकटे सोऽपि गुणैः सम्बाध्यते किल।<br>कारणाद्रहितं कार्यं कथं भवितुमर्हति ॥ १७<br><br>ब्रह्मादीनां च सर्वेषां गुणा एव हि कारणम्।<br>पञ्चविंशत्समुद्भूता देहास्तेषां न चान्यथा ॥ १८<br><br>काले मरणधर्म्मोऽस्ते सन्देहः कोऽत्र ते नृप। | ब्रह्मा, विष्णु और महेशतक आसक्तिसे ग्रस्त हैं। (हे राजन्! आसक्त प्राणी कौन-सा अनर्थ नहीं कर बैठता) आसक्तिसे युक्त प्राणी भी चतुराईके कारण विरक्तकी भाँति दिखायी पड़ता है, किंतु संकट उपस्थित होनेपर वह [सत्त्व, रज, तम] गुणोंसे आबद्ध हो जाता है। कोई भी कार्य बिना कारणके कैसे हो सकता है? ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंके भी मूल कारण गुण ही हैं। उनके भी शरीर पचीस तत्त्वोंसे बने हैं, इसमें सन्देह नहीं है। हे राजन्! समय आ जानेपर वे भी मृत्युको प्राप्त होते हैं, इसमें आपको संशय कैसा? ॥ १६—१८ ½ ॥ | | परोपदेशे विस्पष्टं शिष्टाः सर्वे भवन्ति च ॥ १९<br><br>विप्लुतिर्ह्यविशेषेण स्वकार्ये समुपस्थिते।<br>कामः क्रोधस्तथा लोभद्रोहोहङ्कारमत्सराः ॥ २०<br><br>देहवान्कः परित्यक्तुमीशो भवति तान्युनः।<br>संसारोऽयं महाराज सदैवैवंविधः स्मृतः ॥ २१<br><br>नान्यथा प्रभवत्येव शुभाशुभमयः किल। | यह पूर्णरूपसे स्पष्ट है कि दूसरोंको उपदेश देनेमें सभी लोग शिष्ट बन जाते हैं, किंतु अपना कार्य पड़नेपर उस उपदेशका पूर्णतः लोप हो जाता है। जो काम, क्रोध, लोभ, द्रोह, अहंकार और डाह आदि विकार हैं; उन्हें छोड़नेमें कौन-सा देहधारी प्राणी समर्थ हो सकता है? हे महाराज! यह संसार सदासे ही इसी प्रकार शुभाशुभसे युक्त कहा गया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ १९—२१ ½ ॥ | | कदाचिद्भगवान्विष्णुस्तपश्चरति दारुणम् ॥ २२<br><br>कदाचिद्विविधान्यज्ञान्वितनोति सुराधिपः।<br>कदाचित्तु रमारङ्गरञ्जितः परमेश्वरः ॥ २३<br><br>रमते किल वैकुण्ठे तद्वशस्तरुणो विभुः।<br>कदाचिद्दानवैः सार्धं युद्धं परमदारुणम् ॥ २४<br><br>करोति करुणासिन्धुस्तद्बाणापीडितो भृशम्।<br>कदाचिज्जयमाप्नोति दैवात्सोऽपि पराजयम् ॥ २५<br><br>सुखदुःखाभिभूतोऽसौ भवत्येव न संशयः।<br>शेषे शेते कदाचिद्वै योगनिद्रासमावृतः ॥ २६<br><br>काले जागर्ति विश्वात्मा स्वभावप्रतिबोधितः। | कभी भगवान् विष्णु घोर तपस्या करते हैं, कभी वे ही सुरेश्वर अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं, कभी वे परमेश्वर विष्णु लक्ष्मीके प्रेम-रसमें सिक्त होकर उनके वशीभूत हो वैकुण्ठमें विहार करते हैं। वे करुणासागर विष्णु कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण युद्ध करते हैं और उनके बाणोंसे आहत हो जाते हैं। [उस युद्धमें] वे कभी विजयी होते हैं और कभी दैववश पराजित भी हो जाते हैं। इस प्रकार वे भी सुख तथा दुःखसे प्रभावित होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। वे विश्वात्मा कभी योगनिद्राके वशवर्ती होकर शेषशय्यापर शयन करते हैं और कभी सृष्टिकाल आनेपर योगमायासे प्रेरित होकर जाग भी जाते हैं॥ २२—२६ ½ ॥ |

अ० १३] चतुर्थ स्कन्ध ४६३

अ० १३] चतुर्थ स्कन्ध ४६३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शर्वो ब्रह्मा हरिश्चेति इन्द्राद्या ये सुरास्तथा ॥ २७<br><br>मुनयश्च विनिर्मायैः स्वायुषो विचरन्ति हि।<br>निशावसाने सञ्जाते जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २८<br><br>म्रियते नात्र सन्देहो नृप किञ्चित्कदापि च।<br>स्वायुषोऽन्ते पद्माद्याः क्षयमृच्छन्ति पार्थिव ॥ २९<br><br>प्रभवन्ति पुनर्विष्णुहरशक्रादयः सुराः।ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र आदि जो देवता तथा मुनिगण हैं—वे भी अपनी आयुके परिमाणकालतक ही जीवित रहते हैं। हे राजन्! अन्तकाल आनेपर स्थावर-जंगमात्मक यह जगत् भी विनष्ट हो जाता है, इसमें कभी भी कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिये। हे भूपाल! अपनी आयुका अन्त हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र आदि देवता भी विनष्ट हो जाते हैं और [सृष्टिकाल आनेपर] पुनः ये उत्पन्न भी हो जाते हैं॥ २७—२९ १/२॥
तस्मात्कामादिकान्भावान्देहवान्प्रतिपद्यते ॥ ३०<br><br>नात्र ते विस्मयः कार्यः कदाचिदपि पार्थिव।<br>संसारोऽयं तु सन्दिग्धः कामक्रोधादिभिर्नृप ॥ ३१<br><br>दुर्लभस्तद्विनिर्मुक्तः पुरुषः परमार्थवित्।अतएव देहधारी प्राणी काम आदि भावोंसे ग्रस्त हो ही जाता है; हे राजन्! इस विषयमें आपको कभी भी विस्मय नहीं करना चाहिये। हे राजन्! यह संसार तो काम, क्रोध आदिसे ओतप्रोत है। इनसे पूर्णतः मुक्त तथा परम तत्त्वको जाननेवाला पुरुष दुर्लभ है॥ ३०—३१ १/२॥
यो बिभेतीह संसारे स दारान्न करोत्यपि ॥ ३२<br><br>विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो विचरत्यविशङ्कितः।<br>तस्माद् बृहस्पतेर्भार्या शशिना लम्भिता पुनः ॥ ३३<br><br>गुरुणा लम्भिता भार्या तथा भ्रातुर्यवीयसः।<br>एवं संसारचक्रेऽस्मिन् रागलोभादिभिर्वृतः ॥ ३४<br><br>गार्हस्थ्यञ्च समास्थाय कथं मुक्तो भवेन्नरः।जो इस संसारमें [काम, क्रोध आदि विकारोंसे] डरता है, वह विवाह नहीं करता। वह समस्त प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर निर्भीकतापूर्वक विचरता है। इसके विपरीत संसारसे आबद्ध रहनेके कारण ही बृहस्पतिकी पत्नीको चन्द्रमाने रख लिया था और देवगुरु बृहस्पतिने अपने छोटे भाईकी पत्नीको अपना लिया था। इस प्रकार इस संसार-चक्रमें राग, लोभ आदिसे जकड़ा हुआ मनुष्य गृहस्थीमें आसक्त रहकर भला मुक्त कैसे हो सकता है?॥ ३२—३४ १/२॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन हित्वा संसारसारताम् ॥ ३५<br><br>आराधयेन्महेशानीं सच्चिदानन्दरूपिणीम्।<br>तन्मायागुणतश्छन्नं जगदेतच्चराचरम् ॥ ३६<br><br>भ्रमत्युन्मत्तवत्सर्वं मदिरामत्तवन्नृप।अतः पूर्ण प्रयत्नके साथ संसारमें आसक्तिका त्याग करके सच्चिदानन्दस्वरूपिणी भगवती महेश्वरीकी आराधना करनी चाहिये। हे राजन्! यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उन्हींके मायारूपी गुणसे आच्छादित होकर उन्मत्त तथा मदिरापान करके मतवाले मनुष्यकी भाँति चक्कर काटता रहता है॥ ३५—३६ १/२॥
तस्या आराधनैनैव गुणान्सर्वान्विमृद्य च ॥ ३७<br><br>मुक्तिं भजेत मतिमान्नान्यः पन्थास्त्वितः परः।<br>आराधिता महेशानी न यावत्कुरुते कृपाम् ॥ ३८<br><br>तावद्द्रवेत्सुखं कस्मात्कोऽन्योऽस्ति दयया युतः।<br>करुणासागरामेतां भजेत्तस्मादमायया ॥ ३९<br><br>यस्यास्तु भजनेनैव जीवन्मुक्तत्वमश्नुते।उन्हींकी आराधनाके द्वारा [सत्त्व आदि] सभी गुणोंको पराभूत करके बुद्धिमान् मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है। आराधित होकर महेश्वरी जबतक कृपा नहीं करतीं, तबतक सुख कैसे हो सकता है? उनके सदृश दयावान् दूसरा कौन है? अतः निष्कपट भावसे करुणासागर भगवतीकी आराधना करनी चाहिये, जिनके भजनसे मनुष्य जीते-जी मुक्ति प्राप्त कर सकता है॥ ३७—३९ १/२॥
४६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य सेविता न महेश्वरी ॥ ४०<br><br>निःश्रेणिकाग्रात्पतिता अध इत्येव विद्महे ।<br>अहङ्कारावृतं विश्वं गुणत्रयसमन्वितम् ॥ ४१<br><br>असत्येनापि सम्बद्धं मुच्यते कथमन्यथा ।<br>हित्वा सर्वं ततः सर्वैः संसेव्या भुवनेश्वरी ॥ ४२दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर जिसने उन महेश्वरीकी उपासना नहीं की, वह मानो अन्तिम सीढ़ीसे फिसलकर गिर गया—मैं तो यही धारणा रखता हूँ। सम्पूर्ण विश्व अहंकारसे आच्छादित है, तीनों गुणोंसे युक्त है तथा असत्यसे बँधा हुआ है, तब प्राणी मुक्त कैसे हो सकता है? अतः सब कुछ छोड़कर सभी लोगोंको भगवती भुवनेश्वरीकी उपासना करनी चाहिये॥ ४०—४२॥
राजोवाच<br>किं कृतं गुरुणा तत्र काव्यरूपधरेण च ।<br>कदा शुक्रः समायातस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ४३राजा बोले—हे पितामह! शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिने वहाँ दैत्योंके पास पहुँचकर क्या किया और शुक्राचार्य पुनः कब लौटे? वह हमें बताइये॥ ४३॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यत्कृतं गुरुणा तदा ।<br>कृत्वा काव्यस्वरूपञ्च प्रच्छन्नेन महात्मना ॥ ४४व्यासजी बोले—हे राजन्! तब गोपनीय ढंगसे शुक्राचार्यका स्वरूप बनाकर देवगुरुने जो कुछ किया, वह मैं बताता हूँ, आप सुनिये॥ ४४॥
गुरुणा बोधिता दैत्या मत्वा काव्यं स्वकं गुरुम् ।<br>विश्वासं परमं कृत्वा बभूवुस्तन्मयास्तदा ॥ ४५देवगुरु बृहस्पतिने दैत्योंको बोध प्रदान किया। तब शुक्राचार्यको अपना गुरु समझकर और उनपर पूर्ण विश्वास करके सभी दैत्य उन्हींके कथनानुसार व्यवहार करने लगे॥ ४५॥
विद्यार्थं शरणं प्राप्ता भृगुं मत्वातिमौहिताः ।<br>गुरुणा विप्रलब्धास्ते लोभात्को वा न मुह्यति ॥ ४६अत्यधिक मोहितचित्त वे दैत्य बृहस्पतिको शुक्राचार्य समझकर विद्याप्राप्तिके लिये उनके शरणागत हुए। देवगुरु बृहस्पतिने भी उन्हें बहुत ठगा। [यह सत्य है कि] लोभसे कौन-सा प्राणी मोहमें नहीं पड़ जाता॥ ४६॥
दशवर्षात्मके काले सम्पूर्णसमये तदा ।<br>जयन्त्या सह क्रीडित्वा काव्यो याज्यानचिन्तयत् ॥ ४७<br><br>आशया मम मार्गं ते पश्यन्तः संस्थिताः किल ।<br>गत्वा तान्वै प्रपश्येऽहं याज्यानतिभयातुरान् ॥ ४८<br><br>मा देवेभ्यो भयं तेषां मद्भक्तानां भवेदिति ।<br>सञ्चिन्त्य बुद्धिमास्थाय जयन्तीं प्रत्युवाच ह ॥ ४९<br><br>देवानेवोपसंयान्ति पुत्रा मे चारुलोचने ।<br>समयस्तेऽद्य सम्पूर्णो जातोऽयं दशवार्षिकः ॥ ५०<br><br>तस्माद् गच्छाम्यहं देवि द्रष्टुं याज्यान्सुमध्यमे ।<br>पुनरेवागमिष्यामि तवान्तिकमनुद्रुतः ॥ ५१तब जयन्तीके साथ क्रीडा करते-करते निर्धारित प्रतिज्ञासम्बन्धी दस वर्षकी अवधि पूर्ण हो जानेपर शुक्राचार्य अपने यजमानोंके विषयमें विचार करने लगे कि मेरी राह देखते हुए वे आशान्वित हो बैठे होंगे। अतः अब मैं चलकर अपने उन अत्यन्त भयभीत यजमानोंको देखूँ। कहीं ऐसा न हो कि मेरे उन भक्तोंके सम्मुख देवताओंसे कोई भय उत्पन्न हो गया हो॥ ४७-४८ ½॥<br><br>यह सोचकर अपनी बुद्धि स्थिर करके उन्होंने जयन्तीसे कहा—हे सुनयने! मेरे पुत्रसदृश दैत्यगण देवताओंके पास कालक्षेप कर रहे हैं। प्रतिज्ञानुसार तुम्हारे साथ रहनेका दस वर्षका समय पूरा हो चुका है, अतः हे देवि! अब मैं अपने यजमानोंसे मिलने जा रहा हूँ। हे सुमध्यमे! मैं पुनः तुम्हारे पास शीघ्र ही लौट आऊँगा॥ ४९—५१॥

अ० १३ ] चतुर्थ स्कन्ध ४६५

अ० १३ ] चतुर्थ स्कन्ध ४६५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथेति तमुवाचाथ जयन्ती धर्मवित्तमा।<br>यथेष्टं गच्छ धर्मज्ञ न ते धर्मं विलोपये॥ ५२परम धर्मपरायणा जयन्तीने उनसे कहा—हे धर्मज्ञ! बहुत ठीक है, आप स्वेच्छापूर्वक जाइये। मैं आपका धर्म लुप्त नहीं होने दूँगी॥ ५२॥
तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यो जगाम त्वरितस्ततः।<br>अपश्यद्दानवानां च पार्श्वे वाचस्पतिं तदा॥ ५३<br><br>छद्मरूपधरं सौम्यं बोधयन्तं छलेन तान्।<br>जैनं धर्मं कृतं स्वेन यज्ञनिन्दापरं तथा॥ ५४<br><br>भो देवरिपवः सत्यं ब्रवीमि भवतां हितम्।<br>अहिंसा परमो धर्मोऽहन्तव्या ह्याततायिनः॥ ५५<br><br>द्विजैर्भोगरतैर्वेदे दर्शितं हिंसनं पशोः।<br>जिह्वास्वादपरैः काममहिंसैव परा मता॥ ५६उसका यह वचन सुनकर शुक्राचार्य वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि दैत्योंके पास विराजमान होकर बृहस्पति छद्मरूप धारण करके शान्तचित्त हो छलसे उन्हें अपने द्वारा रचित जिन-धर्म तथा यज्ञनिन्दापरक वचनोंकी शिक्षा इस प्रकार दे रहे हैं—‘हे देवताओंके शत्रुगण! मैं सत्य तथा आपलोगोंके हितकी बात बता रहा हूँ कि अहिंसा सर्वोपरि धर्म है। आततायियोंको भी नहीं मारना चाहिये। भोगपरायण तथा अपनी जिह्वाके स्वादके लिये सदा तत्पर रहनेवाले द्विजोंने वेदमें पशुहिंसाका उल्लेख कर दिया है, किंतु सच्चाई यह है कि अहिंसाको ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है’॥ ५३-५६॥
एवंविधानि वाक्यानि वेदशास्त्रपराणि च।<br>ब्रुवाणं गुरुमाकर्ण्य विस्मितोऽसौ भृगोः सुतः॥ ५७<br><br>चिन्तयामास मनसा मम द्वेष्यो गुरुः किल।<br>वञ्चिताः किल धूर्तेन याज्या मे नात्र संशयः॥ ५८इस प्रकारकी वेद-शास्त्रविरोधी बातें कहते हुए देवगुरु बृहस्पतिको देखकर वे भृगुपुत्र शुक्राचार्य आश्चर्यचकित हो गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि यह देवगुरु तो मेरा शत्रु है। इस धूर्तने मेरे यजमानोंको अवश्य ठग लिया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ५७-५८॥
धिग्लोभं पापबीजं वै नरकद्वारमूर्जितम्।<br>गुरुरप्यनृतं ब्रूते प्रेरितो येन पाप्मना॥ ५९नरकके द्वारस्वरूप तथा पापके बीजरूप उस उग्र लोभको धिक्कार है, जिस लोभरूप पापसे प्रेरित होकर देवगुरु बृहस्पति भी झूठ बोल रहे हैं॥ ५९॥
प्रमाणं वचनं यस्य सोऽपि पाखण्डधारकः।<br>गुरुः सुराणां सर्वेषां धर्मशास्त्रप्रवर्तकः॥ ६०जिनका वचन प्रमाण माना जाता है और जो समस्त देवताओंके गुरु तथा धर्मशास्त्रोंके प्रवर्तक हैं, वे भी पाखण्डके पोषक हो गये हैं॥ ६०॥
किं किं न लभते लोभान्मलिनीकृतमानसः।<br>अन्योऽपि गुरुरप्येवं जातः पाखण्डपण्डितः॥ ६१<br><br>शैलूषचेष्टितं सर्वं परिगृह्य द्विजोत्तमः।<br>वञ्चयत्यतिसम्मूढान्दैत्यान्याज्यान्ममाप्यसौ॥ ६२लोभसे विकृत मनवाला प्राणी क्या-क्या नहीं कर डालता। दूसरोंकी क्या बात, जबकि साक्षात् देवगुरु ही इस प्रकारके पाखण्डके पण्डित हो गये हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी ये धूर्तोंकी सारी भाव-भंगिमाएँ बनाकर मेरे इन घोर अज्ञानी दैत्य यजमानोंको ठग रहे हैं॥ ६१-६२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे शुक्लरूपेण गुरुणा दैत्यवञ्चनावर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥

४६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

शुक्राचार्यद्वारा दैत्योंको बृहस्पतिका पाखण्डपूर्ण कृत्य बताना, बृहस्पतिकी मायासे मोहित दैत्योंका उन्हें फटकारना, क्रुद्ध शुक्राचार्यका दैत्योंको शाप देना, बृहस्पतिका अन्तर्धान हो जाना, प्रह्लादका शुक्राचार्यजीसे क्षमा माँगना और शुक्राचार्यका उन्हें प्रारब्धकी बलवत्ता समझाना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इति सञ्चिन्त्य मनसा तानुवाच हसन्निव।<br>वञ्चिता मत्स्वरूपेण दैत्याः किं गुरुणा किल॥ १<br><br>अहं काव्यो गुरुश्चायं देवकार्यप्रसाधकः।<br>अनेन वञ्चिता यूयं मद्याज्या नात्र संशयः॥ २<br><br>मा श्रद्दध्वं वचोऽस्यार्या दाम्भिकोऽयं मदाकृतिः।<br>अनुगच्छत मां याज्यास्त्यजतैनं बृहस्पतिम्॥ ३मनमें ऐसा सोचकर उन दैत्योंसे शुक्राचार्यने हँसते हुए कहा—हे दैत्यगण! मेरा स्वरूप बनाये हुए इस देवगुरु बृहस्पतिने तुमलोगोंको ठग लिया क्या? शुक्राचार्य मैं हूँ और ये तो देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाले देवगुरु बृहस्पति हैं। हे मेरे यजमानो! इन्होंने तुम सबको अवश्य ठग लिया; इसमें सन्देह नहीं है। हे आर्यो! इनकी बातोंपर विश्वास मत करो। ये पाखण्डी हैं तथा मेरा स्वरूप बनाये हुए हैं। हे यजमानो! तुमलोग मेरा अनुसरण करो और इन बृहस्पतिका त्याग कर दो॥ १—३॥
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य दृष्ट्वा तौ सदृशौ पुनः।<br>विस्मयं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चिताः॥ ४उनका यह वचन सुनकर और फिर उन दोनोंको समान रूपवाला देखकर सभी दैत्य महान् आश्चर्यमें पड़ गये। पुनः उन्होंने विचार किया कि हो सकता है ये ही शुक्राचार्य हों॥ ४॥
स तान्वीक्ष्य सुसम्भ्रान्तान्गुरुर्वाक्यमुवाच ह।<br>गुरुर्वो वञ्चयत्येव मद्रूपोऽयं बृहस्पतिः॥ ५<br><br>प्राप्तो वञ्चयितुं युष्मान्देवकार्यार्थसिद्धये।<br>मा विश्वासं वचस्तस्य कुरुध्वं दैत्यसत्तमाः॥ ६<br><br>प्राप्ता विद्या मया शम्भोर्युष्मानध्यापयामि ताम्।<br>देवेभ्यो विजयं नूनं करिष्यामि न संशयः॥ ७इस प्रकार उन दैत्योंको अत्यन्त विस्मित देखकर [शुक्राचार्यरूपधारी] गुरु बृहस्पतिने यह बात कही—मेरा स्वरूप बनाये हुए ये देवगुरु बृहस्पति तुम सबको धोखा दे रहे हैं। ये देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके निमित्त तुमलोगोंको ठगनेके लिये आये हुए हैं। हे श्रेष्ठ दैत्यगण! तुमलोग इनकी बातपर विश्वास मत करो। मैंने शंकरजीसे विद्या प्राप्त कर ली है और उसे तुम सबको पढ़ा रहा हूँ। इस प्रकार मैं तुम्हें देवताओंपर विजय दिला दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५—७॥
इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं काव्यरूपधरस्य ते।<br>विश्वासं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चयात्॥ ८<br><br>काव्येन बहुधा तत्र बोधिताः किल दानवाः।<br>बुबुधुर्न गुरोर्मायामोहिताः कालपर्ययात्॥ ९शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिका यह वाक्य सुनकर उन दैत्योंको पूर्ण विश्वास हो गया कि ये ही निश्चितरूपसे [हमारे गुरु] शुक्राचार्य हैं। उस समय शुक्राचार्यने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया फिर भी समयके फेरसे गुरु बृहस्पतिकी मायासे मोहित होनेके कारण वे दैत्य समझ नहीं सके॥ ८-९॥
अ० १४ ]चतुर्थ स्कन्ध४६७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं ते निश्चयं कृत्वा ततो भार्गवमब्रुवन् ।<br>अयं गुरुर्नो धर्मात्मा बुद्धिदश्च हिते रतः ॥ १०<br><br>दशवर्षाणि सततमयं नः शास्ति भार्गवः ।<br>गच्छ त्वं कुहको भासि नास्माकं गुरुरप्युत ॥ ११ऐसा निश्चय करनेके उपरान्त उन्होंने शुक्राचार्यसे कहा—ये ही हमारे गुरु हैं। ये धर्मात्मा हमें बुद्धि प्रदान करनेवाले हैं और हमारा हित करनेमें तत्पर हैं। इन शुक्राचार्यजीने हमें निरन्तर दस वर्षतक शिक्षा दी है। तुम चले जाओ, तुम धूर्त जान पड़ते हो; तुम हमारे गुरु बिलकुल नहीं हो सकते ॥ १०-११ ॥
इत्युक्त्वा भार्गवं मूढा निर्भर्त्स्य च पुनः पुनः ।<br>जगृहुस्तं गुरुं प्रीत्या प्रणिपत्याभिवाद्य च ॥ १२ऐसा कहकर उन मूर्ख दैत्योंने शुक्राचार्यको बार-बार फटकारा और बृहस्पतिको प्रेमपूर्वक प्रणाम तथा अभिवादन करके उन्हें ही अपना गुरु स्वीकार कर लिया ॥ १२ ॥
काव्यस्तु तन्मयान्दृष्ट्वा चुकोपाथ शशाप च ।<br>दैत्यान्विबोधितान्मत्वा गुरुणा चातिवञ्चितान् ॥ १३<br><br>यस्मान्मया बोधिता वै गृह्णीयुर्न च मे वचः ।<br>तस्मात्प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ ॥ १४<br><br>मदवज्ञाफलं कामं स्वल्पे काले ह्यवाप्स्यथ ।<br>तदास्य कपटं सर्वं परिज्ञातं भविष्यति ॥ १५देवगुरु बृहस्पतिने इन दैत्योंको पूर्णरूपसे सिखा-पढ़ा दिया है तथा इन्हें खूब ठगा है—ऐसा मानकर और इन्हें गुरु बृहस्पतिमें तन्मय देखकर शुक्राचार्य बहुत कुपित हुए और उन्होंने शाप दे दिया कि मेरे बार-बार समझानेपर भी तुमलोगोंने मेरी बात नहीं मानी, इसलिये नष्ट बुद्धिवाले तुम सब पराभवको प्राप्त होओगे। तुमलोग थोड़े ही समयमें मेरे तिरस्कारका फल पाओगे। तब इनका सारा कपट तुम सबको मालूम पड़ जायगा ॥ १३–१५ ॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वासौ जगामाशु भार्गवः क्रोधसंयुतः ।<br>बृहस्पतिर्मुदं प्राप्य तस्थौ तत्र समाहितः ॥ १६व्यासजी बोले— ऐसा कहकर क्रोधमें भरे शुक्राचार्य तत्काल चल दिये और [शुक्राचार्यरूपधारी] बृहस्पति प्रसन्न होकर निश्चिन्तभावसे वहाँ रहने लगे ॥ १६ ॥
ततः शप्तानगुरुर्ज्ञात्वा दैत्यांस्तान्भार्गवेण हि ।<br>जगाम तरसा त्यक्त्वा स्वरूपं स्वं विधाय च ॥ १७<br><br>गत्वोवाच तदा शक्रं कृतं कार्यं मया ध्रुवम् ।<br>शप्ताः शुक्रेण ते दैत्या मया त्यक्ताः पुनः किल ॥ १८<br><br>निराधाराः कृता नूनं यतध्वं सुरसत्तमाः ।<br>संग्रामार्थं महाभाग शापदग्धा मया कृताः ॥ १९तदनन्तर शुक्राचार्यके द्वारा उन दैत्योंको शापित हुआ जानकर गुरु बृहस्पति तत्काल उन्हें छोड़कर अपना रूप धारणकर वहाँसे चल पड़े। उन्होंने जाकर इन्द्रसे कहा—मैंने [आपका] सम्पूर्ण कार्य भलीभाँति बना दिया है। शुक्राचार्यने उन दैत्योंको शाप दे दिया और बादमें मैंने भी उनका त्याग कर दिया। अब मैंने उन्हें पूर्णरूपसे असहाय बना दिया है। अतः हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग युद्धके लिये अब उद्योग करें। हे महाभाग! मैंने उन दैत्योंको शापसे दग्ध कर दिया है ॥ १७–१९ ॥
इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं मघवा मुदमाप्तवान् ।<br>जहृषुश्च सुराः सर्वे प्रतिपूज्य बृहस्पतिम् ॥ २०गुरु बृहस्पतिका यह वचन सुनकर इन्द्र बहुत आनन्दित हुए और सभी देवता भी हर्षित हो उठे। तत्पश्चात् गुरु बृहस्पतिकी पूजा करके वे युद्धके लिये

| ४६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ | | :--- | :--- | | संग्रामाय मतिं चक्रुः संविचार्य मिथः पुनः।<br>निर्ययुर्मिलिताः सर्वे दानवाभिमुखाः सुराः॥ २१ | मन्त्रणा करने लगे। आपसमें भलीभाँति सोच-विचार करके सभी देवता एक साथ मिलकर दानवोंसे लड़नेके लिये वहाँसे निकल पड़े॥ २०-२१॥ | | सुरान्समुद्यताञ्ज्ञात्वा कृतोद्योगान्महाबलान्।<br>अन्तर्हितं गुरुं चैव बभूवुश्चिन्तयान्विताः॥ २२ | उधर महाबली देवताओंको युद्धकी तैयारी करके आक्रमणके लिये उद्यत तथा शुक्राचार्यरूपधारी गुरु बृहस्पतिको अन्तर्हित जान करके दैत्यगण बहुत चिन्तित हुए॥ २२॥ | | परस्परमथोचुस्ते मोहितास्तस्य मायया।<br>सम्प्रसाद्यो महात्मा च यातोऽसौ रुष्टमानसः॥ २३ | अब उन देवगुरुकी मायासे मोहित वे दैत्य आपसमें कहने लगे कि वे गुरु शुक्राचार्य कुपितमन होकर यहाँसे चले गये, अतः हमें उन महात्माको भलीभाँति मनाना चाहिये॥ २३॥ | | वञ्चयित्वा गतः पापो गुरुः कपटपण्डितः।<br>भ्रातृस्त्रीलम्भनः प्रायो मलिनोऽन्तर्बहिः शुचिः॥ २४ | वह पापी और कपटकार्यमें अत्यन्त प्रवीण देवगुरु हमें ठगकर चला गया। अपने भाईकी पत्नीके साथ अनाचार करनेवाला वह भीतरसे कलुषित है तथा ऊपरसे पवित्र प्रतीत होता है॥ २४॥ | | किं कुर्मः क्व च गच्छामः कथं काव्यं प्रकोपितम्।<br>कुर्वीमहि सहायार्थं प्रसन्नं हृष्टमानसम्॥ २५ | अब हम क्या करें और कहाँ जायें? अत्यन्त कुपित गुरु शुक्राचार्यको अपनी सहायताके लिये हम किस तरह हर्षित तथा प्रसन्नचित्त करें॥ २५॥ | | इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे मिलिता भयकम्पिताः।<br>प्रह्लादं पुरतः कृत्वा जग्मुस्ते भार्गवं पुनः॥ २६ | ऐसा विचार करके वे सब एकजुट हुए। प्रह्लादको आगे करके भयसे काँपते हुए वे दैत्य पुनः भृगुपुत्र शुक्राचार्यके पास गये। | | प्रणेमुश्चरणौ तस्य मुनेर्मौनभृतस्तदा।<br>भार्गवस्तानुवाचाथ रोषसंरक्तलोचनः॥ २७ | [वहाँ पहुँचकर] उन्होंने मौन धारण किये हुए उन मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया। तब क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले शुक्राचार्य उनसे कहने लगे॥ २६-२७॥ | | मया प्रबोधिता यूयं मोहिता गुरुमायया।<br>न गृहीतं वचो योग्यं तदा याज्या हितं शुचि॥ २८ | हे यजमानो! मैंने तुमलोगोंको बहुत समझाया, किंतु देवगुरुकी मायासे व्यामुग्ध रहनेके कारण तुम-लोगोंने मेरा उचित, हितकर और निष्कपट वचन नहीं माना॥ २८॥ | | तदावगणितश्चाहं भवद्भिस्तद्दृशं गतैः।<br>प्राप्तं नूनं मदोन्मत्तैर्ममावमानजं फलम्॥ २९ | उस समय उनके वशवर्ती हुए तुम सबने मेरी अवहेलना की। मदसे उन्मत्त रहनेवाले तुम सबको मेरे अपमान करनेका फल अवश्य मिल गया॥ २९॥ | | तत्र गच्छत सद्भ्रष्टा यत्रासौ कपटाकृतिः।<br>वञ्चकः सुरकार्यार्थी नाहं तद्विद्धि वञ्चकः॥ ३० | तुमलोगोंका सर्वस्व छिन गया। अब तुमलोग वहींपर चले जाओ; जहाँ वह कपटी, छली और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाला बृहस्पति विद्यमान है; मैं उसकी तरह वंचक नहीं हूँ॥ ३०॥ | | व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवन्तं शुक्रं तु वाक्यसन्दिग्धया गिरा।<br>प्रह्लादस्तं तदोवाच गृहीत्वा चरणौ ततः॥ ३१ | व्यासजी बोले— इस प्रकार संदेहयुक्त वाणीमें बोलते हुए शुक्राचार्यके दोनों पैर पकड़कर प्रह्लाद उनसे कहने लगे—॥ ३१॥ |

अ० १४] चतुर्थ स्कन्ध ४६१

अ० १४] चतुर्थ स्कन्ध ४६१


संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
प्रह्लाद उवाच<br>भार्गवाद्य समायातान्याज्यानास्मांस्तथातुरान्।<br>त्यक्तुं नार्हसि सर्वज्ञ त्वद्गतांस्तनयानिव॥ ३२प्रह्लाद बोले— हे भार्गव! हे सर्वज्ञ! अत्यन्त दुःखी होकर आज पास आये हुए अपने पुत्रतुल्य तथा हितचिन्तक हम यजमानोंका आप त्याग न करें॥ ३२॥
गते त्वयि तु मन्त्रार्थं शैलूषेण दुरात्मना।<br>त्वद्वेषमधुरालापैर्वयं तेन प्रवञ्चिताः॥ ३३मन्त्र-प्राप्तिके लिये आपके चले जानेपर उस कपटी तथा दुष्टात्मा बृहस्पतिने आपकी वेश-भूषा तथा मधुर वाणीके द्वारा हमलोगोंको खूब ठगा॥ ३३॥
अज्ञानकृतदोषेण नैव कुप्यति शान्तिमान्।<br>सर्वज्ञस्त्वं विजानासि चित्तं नः प्रवणं त्वयि॥ ३४शान्तिसम्पन्न व्यक्ति किसीके द्वारा अनजानमें किये गये अपराधसे कुपित नहीं होता। आप तो सर्वज्ञ हैं, अतः जानते ही हैं कि हमलोगोंका चित्त सदा आपमें ही अनुरक्त रहता है॥ ३४॥
ज्ञात्वा नस्तपसा भावं त्यज कोपं महामते।<br>ब्रुवन्ति मुनयः सर्वे क्षणकोपा हि साधवः॥ ३५अतः हे महामते! अपने तपोबलसे हमलोगोंका भाव जानकर आप क्रोधका त्याग कर दीजिये; क्योंकि सभी मुनिगण कहा करते हैं कि साधुपुरुषोंका क्रोध क्षणभरके लिये ही होता है॥ ३५॥
जलं स्वभावतः शीतं वह्न्यातपसमागमात्।<br>भवत्युष्णं वियोगाच्च शीतत्वमनुगच्छति॥ ३६जल स्वभावसे शीतल होता है, किंतु अग्नि और धूपके संपर्कसे वह गर्म हो जाता है। वही जल आग तथा धूपका संयोग दूर होते ही पुनः शीतलता प्राप्त कर लेता है॥ ३६॥
क्रोधश्चाण्डालरूपो वै त्यक्तव्यः सर्वथा बुधैः।<br>तस्माद्रोषं परित्यज्य प्रसादं कुरु सुव्रत॥ ३७क्रोध चाण्डालरूप होता है; बुद्धिमान् लोगोंको इसका पूर्णरूपसे त्याग कर देना चाहिये। अतः हे सुव्रत! क्रोध छोड़कर आप हमपर प्रसन्न हो जाइये॥ ३७॥
यदि न त्यजसि क्रोधं त्यजस्यस्मान्सुदुःखितान्।<br>त्वया त्यक्ता महाभाग गमिष्यामो रसातलम्॥ ३८हे महाभाग! यदि आप क्रोधका त्याग नहीं करते बल्कि अत्यन्त दुःखित हमलोगोंका ही त्याग कर देते हैं, तो आपसे परित्यक्त होकर हम सब रसातलमें चले जायँगे॥ ३८॥
व्यास उवाच<br>प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा भार्गवो ज्ञानचक्षुषा।<br>विलोक्य सुमना भूत्वा तानुवाच हसन्निव॥ ३९व्यासजी बोले— प्रह्लादका वचन सुनकर शुक्राचार्य ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ देख करके प्रसन्नचित्त हो उनसे हँसते हुए बोले—॥ ३९॥
न भेतव्यं न गन्तव्यं दानवा वा रसातलम्।<br>रक्षयिष्यामि वो याज्यान्मन्त्रैरवितथैः किल॥ ४०हे दानवो! तुमलोगोंको अब न तो डरना है और न रसातलमें ही जाना है। मैं अपने अचूक मन्त्रोंसे तुम सब यजमानोंकी निश्चय ही रक्षा करूँगा॥ ४०॥
हितं सत्यं ब्रवीम्यद्य शृणुध्वं तत्तु निश्चयम्।<br>वचनं मम धर्मज्ञाः श्रुतं यद् ब्रह्मणः पुरा॥ ४१हे धर्मज्ञो! पूर्वकालमें मैंने ब्रह्माजीसे जो सुना है, वह हितकर, सत्य तथा अटल बात मैं तुमलोगोंको बता रहा हूँ, मेरी वह बात सुनिये—॥ ४१॥
अवश्यम्भाविनो भावाः प्रभवन्ति शुभाशुभाः।<br>दैवं न चान्यथा कर्तुं क्षमः कोऽपि धरातले॥ ४२निश्चित रूपसे होनेवाली शुभ या अशुभ घटनाएँ होकर रहती हैं। धरातलपर कोई भी प्राणी प्रारब्धको टाल पानेमें समर्थ नहीं है॥ ४२॥