देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ६८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| घातयिष्याम्यहं दैत्यं त्वं भक्षय च सत्वरा।<br>पिबन्ती क्षतजं सर्वं यतमानारिसंक्षये ॥ २७<br><br>इत्थं दैत्यक्षयं कृत्वा दत्त्वा राज्यं सुरालयम्।<br>इन्द्राय सुस्थिरं सर्वं गमिष्यामो यथासुखम्॥ २८ | जब मैं इस दैत्यको मारूँ, तब तुम शत्रुसंहाररूपी इस कार्यमें प्रयत्नशील होकर सारा रक्त पीती हुई शीघ्रतापूर्वक इसका भक्षण कर जाना। इस प्रकार दैत्यवध करके स्वर्गका सारा राज्य इन्द्रको देकर हम सब आनन्दपूर्वक यहाँसे चली जायँगी॥ २७-२८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ताम्बिकया देवी चामुण्डा चण्डविक्रमा।<br>पपौ च क्षतजं सर्वं रक्तबीजशरीरजम्॥ २९<br><br>अम्बिका तं जघानाशु खड्गेन मुसलेन च।<br>चखाद देहशकलांश्चामुण्डा तान्कृशोदरी ॥ ३० | **व्यासजी बोले—**भगवती अम्बिकाके ऐसा कहनेपर प्रचण्ड पराक्रमवाली देवी चामुण्डा रक्तबीजके शरीरसे निकले हुए समस्त रुधिरको पीने लगीं। जगदम्बा खड्ग तथा मुसलसे उस दैत्यको मारने लगीं और कृशोदरी चामुण्डा उसके शरीरके कटे हुए अंगोंका भक्षण करने लगीं॥ २९-३०॥ |
| सोऽपि क्रुद्धो गदाघातैश्चामुण्डां समघातयत्।<br>तथापि सा पपावाशु क्षतजं तमभक्षयत्॥ ३१ | अब वह रक्तबीज भी कुपित होकर गदाके प्रहारोंसे चामुण्डाको घायल करने लगा, फिर भी वे शीघ्रतापूर्वक उसका रुधिर पीती रहीं और उसका भक्षण करती रहीं॥ ३१॥ |
| येऽन्ये रुधिरजाः क्रूरा रक्तबीजा महाबलाः।<br>तेऽपि निष्पातिताः सर्वे भक्षिता गतशोणिताः ॥ ३२ | उस दैत्यके रुधिरसे उत्पन्न हुए अन्य जो भी महाबली और क्रूर रक्तबीज थे, उन्हें भी चामुण्डांने मार डाला। वे देवी उनका भी रक्त पी गयीं और उन सबको खा गयीं॥ ३२॥ |
| कृत्रिमा भक्षिताः सर्वे यस्तु स्वाभाविकॊऽसुरः।<br>सोऽपि प्रपातितो हत्वा खड्गेनातिविखण्डितः ॥ ३३ | इस प्रकार भगवतीने जब सभी कृत्रिम रक्तबीजोंका भक्षण कर लिया, तब जो वास्तविक रक्तबीज था, उसे भी मारकर उन्होंने खड्गसे उसके अनेक टुकड़े करके भूमिपर गिरा दिया॥ ३३॥ |
| रक्तबीजे हते रौद्रे ये चान्ये दानवा रणे।<br>पलायनं ततः कृत्वा गतास्ते भयकम्पिताः ॥ ३४<br><br>हाहेति विब्रुवन्तस्ते शुम्भं प्रोचुः सविह्वलाः।<br>रुधिरारक्तदेहाश्च विगतास्त्रा विचेतसः ॥ ३५<br><br>राजन्नम्बिकया रक्तबीजोऽसौ विनिपातितः।<br>चामुण्डा तस्य देहात्तु पपौ सर्वं च शोणितम्॥ ३६<br><br>ये चान्ये दानवाः शूरा वाहनेनातिरंहसा।<br>सिंहेन निहताः सर्वे काल्या च भक्षिताः परे॥ ३७ | तत्पश्चात् भयंकर रक्तबीजका वध हो जानेपर जो अन्य दानव रणभूमिमें थे, वे भयसे काँपते हुए भाग करके शुम्भके पास पहुँचे। उनका चित्त बहुत व्याकुल था, उनका शरीर रुधिरसे लथपथ था, वे शस्त्रविहीन हो गये थे और अचेत-से हो गये थे। वे हाय, हाय—ऐसा पुकारते हुए शुम्भसे कहने लगे—हे राजन्! अम्बिकाने उस रक्तबीजको मार डाला और चामुण्डा उसकी देहसे निकला सारा रुधिर पी गयी। जो अन्य दानववीर थे, उन सबको देवीके वाहन सिंहने बड़ी तेजीसे मार डाला और शेष दानवोंको भगवती काली खा गयीं॥ ३४–३७॥ |
| वयं त्वां कथितुं राजन्नागता युद्धचेष्टितम्।<br>चरितञ्च तथा देव्याः संग्रामे परमाद्भुतम्॥ ३८ | हे राजन्! हमलोग आपको युद्धका वृत्तान्त तथा संग्राममें देवीके द्वारा प्रदर्शित किये गये उनके अत्यन्त अद्भुत चरित्रको बतानेके लिये आपके पास आये हुए हैं॥ ३८॥ |
अ० २९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८९
अ० २९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८९
| अजेयेयं महाराज सर्वथा दैत्यदानवैः।<br>गन्धर्वासुरयक्षैश्च पन्नगोरगराक्षसैः॥ ३९ | हे महाराज! यह देवी दैत्य, दानव, गन्धर्व, असुर, यक्ष, पन्नग, उरग और राक्षस—इन सभीसे सर्वथा अजेय है॥ ३९॥ |
| अन्यास्तत्रागता देव्य इन्द्राणीप्रमुखा भृशम्।<br>युध्यमाना महाराज वाहनैरायुधैर्युताः॥ ४०<br><br>ताभिः सर्वं हतं सैन्यं दानवानां वरायुधैः।<br>रक्तबीजोऽपि राजेन्द्र तरसा विनिपातितः॥ ४१ | हे महाराज! इन्द्राणी आदि अन्य प्रमुख देवियाँ भी वहाँ आयी हुई हैं। वे अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर नानाविध आयुध धारण करके घोर युद्ध कर रही हैं। हे राजेन्द्र! उन देवियोंने अपने उत्तम अस्त्रोंसे दानवोंकी सारी सेनाका विध्वंस कर डाला और रक्तबीजको भी बड़ी शीघ्रतासे मार गिराया॥ ४०-४१॥ |
| एकापि दुःसहा देवी किं पुनस्ताभिरन्विता।<br>सिंहोऽपि हन्ति संग्रामे राक्षसानमितप्रभः॥ ४२ | एकमात्र देवी अम्बिका ही हमलोगोंके लिये असह्य थी, और फिर जब वह उन देवियोंके साथ हो गयी है तब कहना ही क्या? असीम तेजवाला उसका वाहन सिंह भी संग्राममें राक्षसोंका वध कर रहा है॥ ४२॥ |
| अतो विचार्य सचिवैर्यद्युक्तं तद्विधीयताम्।<br>न वैरमनया युक्तं सन्धिरैव सुखप्रदः॥ ४३ | अतएव मन्त्रियोंके साथ विचार-विमर्श करके जो उचित हो, वह कीजिये। इसके साथ शत्रुता उचित नहीं है, अपितु सन्धि कर लेना ही सुखदायक होगा॥ ४३॥ |
| आश्चर्यमेतदखिलं यन्नारी हन्ति राक्षसान्।<br>रक्तबीजोऽपि निहतः पीतं तस्यापि शोणितम्॥ ४४<br><br>अन्ये निपातिता दैत्याः संग्रामेऽम्बिकया नृप।<br>चामुण्डया च मांसं वै भक्षितं सकलं रणे॥ ४५ | यह आश्चर्य है कि एक स्त्री राक्षसोंका संहार कर रही है! रक्तबीज भी मार डाला गया! देवी चामुण्डा उसका सारा रक्त भी पी गयी! हे नृप! अम्बिकाने संग्राममें अन्य दैत्योंको मार डाला और देवी चामुण्डा उनका सम्पूर्ण मांस खा गयी॥ ४४-४५॥ |
| वरं पातालगमनं तस्याः सेवाथवा वरा।<br>न तु युद्धं महाराज कार्यमम्बिकया सह॥ ४६<br><br>न नारी प्राकृता ह्येषा देवकार्यार्थसाधिनी।<br>मायेयं प्रबला देवी क्षपयन्तीयमुत्थिता॥ ४७ | हे महाराज! अब हमलोगोंके लिये या तो पाताल चला जाना श्रेयस्कर है अथवा उसकी दासता स्वीकार कर लेना; किंतु उस अम्बिकाके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये। यह साधारण स्त्री नहीं है, यह देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली है और यह मायारूपिणी शक्तिसम्पन्न देवीके रूपमें दैत्योंका नाश करनेके लिये प्रकट हुई है॥ ४६-४७॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचस्तथ्यं श्रुत्वा कालविमोहितः।<br>मुमूर्षुः प्रत्युवाचेदं शुम्भः प्रस्फुरिताधरः॥ ४८ | **व्यासजी बोले—**उन सैनिकोंकी यह यथार्थ बात सुनकर कालसे मोहित तथा मरनेके लिये उद्यत वह काँपते हुए ओठोंवाला शुम्भ उनसे कहने लगा॥ ४८॥ |
| शुम्भ उवाच<br>यूयं गच्छत पातालं शरणं वा भयातुराः।<br>हनिष्याम्यहमद्यैव ताञ्च ताश्च समुद्यतः॥ ४९ | **शुम्भ बोला—**तुमलोग भयभीत होकर पाताल चले जाओ अथवा उसकी शरणमें चले जाओ, किंतु मैं तो युद्धमें पूर्णरूपसे तत्पर रहते हुए उस अम्बिका तथा उन देवियोंको आज ही मार डालूँगा॥ ४९॥ |
६९० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| जित्वा सर्वान्सुरानाजौ कृत्वा राज्यं सुपुष्कलम्।<br>कथं नारीभयोद्विग्नः पातालं प्रविशाम्यहम्॥ ५०<br>निहत्य पार्षदान्सर्वान् रक्तबीजमुखान् रणे।<br>प्राणत्राणाय गच्छामि हित्वा किं विपुलं यशः॥ ५१ | रणभूमिमें सभी देवताओंको जीतकर तथा विशाल राज्यका भोग करके भला एक स्त्रीके भयसे व्याकुल होकर मैं पाताल क्यों चला जाऊँ? रक्तबीज आदि प्रमुख पार्षदोंको रणमें मरवाकर और अपनी विशद कीर्तिका नाश करके प्राणरक्षाके लिये मैं पाताल क्यों चला जाऊँ?॥ ५०-५१॥ |
| मरणं त्वनिवार्यं वै प्राणिनां कालकल्पितम्।<br>तद्भयं जन्मनोपात्तं त्यजेत्को दुर्लभं यशः॥ ५२ | कालके द्वारा निर्धारित प्राणियोंकी मृत्यु तो अनिवार्य है। जन्मके साथ ही मृत्युका भय प्राणीके साथ लग जाता है। तब भला कौन (बुद्धिमान्) व्यक्ति दुर्लभ यशका त्याग कर सकता है?॥ ५२॥ |
| निशुम्भाहं गमिष्यामि रथारूढो रणाजिरे।<br>हत्वा तामागमिष्यामि नागमिष्यामि चान्यथा॥ ५३ | हे निशुम्भ! मैं रथपर सवार होकर युद्धभूमिमें जाऊँगा और उसे मारकर ही वापस आऊँगा और यदि मैं उसे मार न सका तो फिर वापस नहीं लौटूँगा॥ ५३॥ |
| त्वं तु सेनायुतो वीर पार्ष्णिग्राहो भवस्व मे।<br>तरसा तां शरैस्तीक्ष्णैर्नारीं नय यमालये॥ ५४ | हे वीर! तुम भी सेना साथमें लेकर चलो और युद्धमें मेरे सहायक बनो। वहाँ अपने तीक्ष्ण बाणोंसे मारकर तुम उस स्त्रीको शीघ्र ही यमलोक पहुँचा दो॥ ५४॥ |
| निशुम्भ उवाच<br>अहमद्य हनिष्यामि गत्वा दुष्टाञ्च कालिकाम्।<br>आगमिष्याम्यहं शीघ्रं गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्॥ ५५ | निशुम्भ बोला—मैं अभी युद्धक्षेत्रमें जाकर दुष्ट कालिकाको मार डालूँगा और उस अम्बिकाको लेकर शीघ्र ही आपके पास आ जाऊँगा॥ ५५॥ |
| मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र वराकायास्तु कारणे।<br>क्वौषा बाला क्व मे बाहुवीर्यं विश्ववशङ्करम्॥ ५६<br>त्यक्त्वार्त्तिं विपुलां भ्रातृर्भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान्।<br>आनयिष्याम्यहं कामं मानिनीं मानसयुताम्॥ ५७ | हे राजेन्द्र! आप उस बेचारीके विषयमें चिन्ता मत कीजिये। कहाँ यह एक साधारण स्त्री और कहाँ पूरे विश्वको अपने वशमें कर लेनेवाला मेरा बाहुबल! हे भाई! आप इस भारी चिन्ताको छोड़कर सर्वोत्तम सुखोंका उपभोग कीजिये। मैं आदरकी पात्र उस मानिनीको अवश्य ही ले आऊँगा॥ ५६-५७॥ |
| मयि तिष्ठति ते राजन्न युक्तं गमनं रणे।<br>गत्वाहमानयिष्यामि तवार्थे वै जयश्रियम्॥ ५८ | हे राजन्! मेरे रहते युद्धक्षेत्रमें आपका जाना उचित नहीं है। आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये मैं वहाँ जाकर विजयश्री अवश्य ही प्राप्त करूँगा॥ ५८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा भ्रातरं ज्येष्ठं कनीयान्बलगर्वितः।<br>रथमास्थाय विपुलं सन्नद्धः स्वबलावृतः॥ ५९ | व्यासजी बोले—बड़े भाई शुम्भसे ऐसा कहकर अपने बलपर अभिमान रखनेवाले छोटे भाई निशुम्भने कवच धारण कर लिया और अपनी सेना साथमें लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो स्वयं अनेकविध |
| अ० ३० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६९१ |
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| जगाम तरसा तूर्णं सङ्गरे कृतमङ्गलः।<br>संस्तुतो बन्दिसूतैश्च सायुधः सपरिष्करः॥ ६० | आयुध लेकर वह पूरी तैयारीके साथ तुरंत बड़ी तेजीसे युद्धभूमिकी ओर चल पड़ा। उस समय मंगलाचार किया जा रहा था और बन्दीजन तथा चारण उसका यशोगान कर रहे थे॥ ५९-६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या सह युद्धकरणाय निशुम्भप्रयाणं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
अथ त्रिंशोऽध्यायः
देवीद्वारा निशुम्भका वध
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| निशुम्भो निश्चयं कृत्वा मरणाय जयाय वा।<br>सोद्यमः सबलः शूरो रणे देवीमुपाययौ॥ १ | [हे राजन्!] वह पराक्रमी निशुम्भ अब मृत्यु अथवा विजयका निश्चय करके पूरी तैयारीके साथ सेनासहित समरभूमिमें उपस्थित हो गया॥ १॥ |
| तमाजगाम शुम्भोऽपि स्वबलेन समावृतः।<br>प्रेक्षकोऽभूद्रणे राजा संग्रामरसपण्डितः॥ २ | अपनी सेना साथमें लेकर शुम्भ भी उस निशुम्भके पास आ गया और युद्धकलाका पूर्ण ज्ञान रखनेवाला वह दैत्यराज शुम्भ रणमें दर्शक बनकर युद्धका अवलोकन करने लगा॥ २॥ |
| गगने संस्थिता देवास्तदाभ्रपटलावृताः।<br>दिदृक्षवस्तु संग्रामे सेन्द्रा यक्षगणास्तथा॥ ३ | इन्द्रसहित समस्त देवता तथा यक्षगण संग्राम देखनेकी इच्छासे आकाशमण्डलमें मेघपटलोंमें छिपकर विराजमान हो गये॥ ३॥ |
| निशुम्भोऽथ रणे गत्वा धनुरादाय शार्ङ्गकम्।<br>चकार शरवृष्टिं स भीषयञ्जगदम्बिकाम्॥ ४ | निशुम्भ रणभूमिमें पहुँचकर सींगका बना हुआ धनुष लेकर भगवती जगदम्बाको भयभीत करता हुआ उनके ऊपर बाणोंकी बौछार करने लगा॥ ४॥ |
| मुञ्चन्तं शरजालानि निशुम्भं चण्डिका रणे।<br>वीक्ष्यादाय धनुः श्रेष्ठं जहास सुस्वरं मुहुः॥ ५<br><br>उवाच कालिकां देवी पश्य मूर्खत्वमेतयोः।<br>मरणायागतौ कालि मत्समीपमिहाधुना॥ ६ | युद्धभूमिमें निशुम्भको बाण-समूह छोड़ते हुए देखकर भगवती चण्डिका अपना उत्कृष्ट धनुष धारण करके उच्च स्वरमें बार-बार हँसने लगीं। देवी चण्डिकाने कालीसे कहा—हे काली! इन दोनोंकी मूर्खता तो देखो, ये दोनों इस समय यहाँ मेरे पास मरनेके लिये ही आये हुए हैं॥ ५-६॥ |
| दृष्ट्वा दैत्यवधं घोरं रक्तबीजात्ययं तथा।<br>जयाशां कुरुतस्त्वेतौ मोहितौ मम मायया॥ ७ | दैत्योंका भीषण संहार तथा रक्तबीजकी मृत्यु देखकर भी मेरी मायासे विमोहित हुए ये दोनों दैत्य विजयकी आशा कर रहे हैं॥ ७॥ |
| आशा बलवती ह्येषा न जहाति नरं क्वचित्।<br>भग्नं हृतबलं नष्टं गतपक्षं विचेतनम्॥ ८ | यह आशा बड़ी बलवती होती है; यह प्राणियोंको कभी नहीं छोड़ती है। यहाँतक कि अंगहीन, बलहीन, नष्टप्राय, असहाय तथा अचेत प्राणी भी आशाके प्रभावसे छूट नहीं पाता है॥ ८॥ |
| ६१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
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| आशापाशनिबद्धौ द्वौ युद्धाय समुपागतौ।<br>निहन्तव्यौ मया कालि रणे शुम्भनिशुम्भकौ॥ ९ | हे कालि! इस प्रकार आशा-पाशमें बँधे हुए ये दोनों शुम्भ-निशुम्भ युद्धके लिये समरभूमिमें आये हुए हैं, अब मुझे इन दोनोंका वध कर देना चाहिये॥ ९॥ | | आसन्नमरणावेतौ सम्प्राप्तौ दैवमोहितौ।<br>पश्यतां सर्वदेवानां हनिष्याम्यहमद्य तौ॥ १० | आसन्न मृत्युवाले ये दोनों दैत्य प्रारब्धकी प्रेरणासे यहाँ आये हुए हैं। सभी देवताओंके समक्ष आज ही मैं इन्हें मार डालूँगी॥ १०॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा कालिकां चण्डी कर्णाकृष्टशरोत्करैः।<br>छादयामास तरसा निशुम्भं पुरतः स्थितम्॥ ११ | व्यासजी बोले—भगवती चण्डिकाने कालिकासे ऐसा कहकर कानोंतक खींचकर छोड़े गये बाण-समूहोंसे अपने समक्ष खड़े निशुम्भको शीघ्र ही आच्छादित कर दिया॥ ११॥ | | दानवोऽपि शरांस्तस्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः।<br>तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम्॥ १२ | दैत्य निशुम्भने भी उन चण्डिकाके बाणोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे काट डाला। इस प्रकार उन दोनोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा॥ १२॥ | | केसरी केशजालानि धुन्वानः सैन्यसागरम्।<br>गाहयामास बलवान्सरसीं वारणो यथा॥ १३ | देवीका सिंह भी अपने गर्दनके बालोंको झाड़ता हुआ दैत्योंके सेनारूपी समुद्रको उसी प्रकार मथने लगा, जैसे कोई बलवान् हाथी तालाबको मथ रहा हो॥ १३॥ | | नखैर्दन्तप्रहारैस्तु दानवान्पुरतः स्थितान्।<br>चखाद च विशीर्णाङ्गान् गजानिव मदोत्कटान्॥ १४ | जिस प्रकार कोई सिंह मतवाले हाथियोंके अंग-प्रत्यंग चीरकर खा डालता है, उसी प्रकार भगवतीका वह सिंह अपने समक्ष स्थित दानवोंको अपने नखों तथा दाँतोंके प्रहारसे फाड़कर खाने लगा॥ १४॥ | | एवं विमथ्यमाने तु सैन्ये केसरिणा तदा।<br>अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ विकृष्टवरकार्मुकः॥ १५ | भगवतीके उस सिंहद्वारा दानवी सेनाका इस प्रकार संहार होते देखकर निशुम्भ अपना श्रेष्ठ धनुष चढ़ाकर सिंहके पीछे दौड़ा॥ १५॥ | | अन्येऽपि क्रुद्धा दैत्येन्द्रा देवीं हन्तुमुपाययुः।<br>सन्दष्टदन्तरसना रक्तनेत्रा ह्यनेकशः॥ १६ | उसी समय कोपके कारण लाल नेत्रोंवाले अन्य बहुत-से प्रधान दानव भी दाँतोंसे अपनी जीभ चबाते हुए भगवतीको मारनेके लिये उनपर टूट पड़े॥ १६॥ | | तत्राजगाम तरसा शुम्भः सैन्यसमावृतः।<br>निहत्य कालिकां कोपाद् ग्रहीतुं जगदम्बिकाम्॥ १७ | उसी अवसरपर कुपित होकर शुम्भ भी कालिकापर प्रहार करके भगवती अम्बिकाको पकड़नेके लिये अपनी सेनाके साथ बड़े वेगसे वहाँ आ पहुँचा॥ १७॥ | | तत्रागत्य ददर्शाजावम्बिकाञ्च पुरःस्थिताम्।<br>रौद्ररसयुतां कान्तां शृङ्गाररससंयुताम्॥ १८ | वहाँ आकर उसने जगदम्बिकाको युद्धभूमिमें अपने सामने खड़ी देखा; जो परम सुन्दरी, शृङ्गाररससे परिपूर्ण तथा रौद्ररससे भरी हुई थीं॥ १८॥ |
अ० ३०] पञ्चम स्कन्ध ६९३
अ० ३०] पञ्चम स्कन्ध ६९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं त्रैलोक्यवरसुन्दरीम्।<br>सुरक्तनयनां रम्यां क्रोधरक्तेक्षणां तथा॥ १९<br>विवाहेच्छां परित्यज्य जयाशां दूरतस्तथा।<br>मरणे निश्चयं कृत्वा तस्थावाहितकार्मुकः॥ २० | [स्वभावतः] लाल नेत्रोंवाली, किंतु उस समय कोपके कारण अतिरक्त नयनोंवाली, तीनों लोकोंमें परम सुन्दरी तथा विशाल नेत्रप्रान्तोंवाली उन मनोहर भगवतीको देखकर विजयकी आशा तथा विवाहकी अभिलाषाका दूरसे ही परित्याग करके वह दानव अब अपने मरणका निश्चय-कर हाथमें धनुष लिये हुए खड़ा ही रह गया॥ १९-२०॥ |
| तं तथा दानवं देवी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>बभाषे शृण्वतां तेषां दैत्यानां रणमस्तके॥ २१<br>गच्छध्वं पामरा यूयं पातालं वा जलार्णवम्।<br>जीविताशां स्थिरां कृत्वा त्यक्त्वात्रैवायुधानि च॥ २२<br>अथवा मच्छराघातहतप्राणा रणाजिरे।<br>प्राप्य स्वर्गसुखं सर्वे क्रीडन्तु विगतज्वराः॥ २३<br>कातरत्वं च शूरत्वं न भवत्येव सर्वथा।<br>ददाम्यभयदानं वै यान्तु सर्वे यथासुखम्॥ २४ | तब भगवतीने युद्धस्थलमें उपस्थित उन सभी दानवोंको सुनाते हुए मुसकराकर उस दैत्यसे यह वचन कहा—हे नीच दानवो! यदि तुम सब जीवित रहनेकी इच्छा रखते हो तो अपने आयुध यहीं छोड़कर पाताललोक या समुद्रमें चले जाओ अथवा तुमलोग समरांगणमें मेरे बाणोंके प्रहारसे निष्प्राण होकर स्वर्गमें सुख प्राप्तकर वहाँ निर्भय होकर विहार करो। कायरता तथा पराक्रम दोनोंका एक साथ रह पाना सम्भव नहीं है। मैं तुम सबको अभयदान देती हूँ; तुम सब सुखपूर्वक चले जाओ॥ २१-२४॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्या निशुम्भो मदगर्वितः।<br>निशितं खड्गमादाय चर्म चैवाष्टचन्द्रकम्॥ २५<br>धावमानस्तु तरसासिना सिंहं मदोत्कटम्।<br>जघानातिबलामूर्ध्नि भ्रामयञ्जगदम्बिकाम्॥ २६ | व्यासजी बोले— उन भगवतीका वचन सुनकर मदोन्मत्त निशुम्भ तीक्ष्ण खड्ग तथा अष्टचन्द्र नामक ढाल लेकर बड़े वेगसे दौड़ा और उसने बलपूर्वक अपने खड्गसे मतवाले सिंहके मस्तकपर प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने तलवार घुमाकर जगदम्बापर भी प्रहार किया॥ २५-२६॥ |
| ततो देवी स्वगदया वञ्चयित्वासिपातनम्।<br>ताडयामास तं बाहोर्मूले परशुना तदा॥ २७ | तब भगवतीने अपनी गदासे उसके तलवारके प्रहारको रोककर अपने परशुसे उसके बाहुमूल (कन्धे)-पर आघात किया॥ २७॥ |
| खड्गेन निहतः सोऽपि बाहुमूले महामदः।<br>संस्तभ्य वेदनां भूयो जघान चण्डिकां तदा॥ २८ | अपने कन्धेपर खड्गसे प्रहार होनेपर भी उस महाभिमानी अहंकारी निशुम्भने उस आघातकी वेदना सहकर भगवती चण्डिकापर पुनः प्रहार किया॥ २८॥ |
| सापि घण्टास्वनं घोरं चकार भयदं नृणाम्।<br>पपौ पुनः पुनः पानं निशुम्भं हन्तुमिच्छती॥ २९ | तत्पश्चात् भगवती चण्डिकाने भी प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली भीषण घण्टाध्वनि की और निशुम्भको मारनेकी इच्छा प्रकट करती हुई उन्होंने बार-बार मधुपान किया॥ २९॥ |
| एवं परस्परं युद्धं बभूवातिभयप्रदम्।<br>देवानां दानवानाञ्च परस्परजयैषिणाम्॥ ३० | इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी प्रबल इच्छावाले देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया॥ ३०॥ |
| ६९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
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| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पलादाः पक्षिणः क्रूराः सारमेयाश्च जम्बुकाः ।<br>ननृतुश्चातिसन्तुष्टा गृध्राः कङ्काश्च वायसाः ॥ ३१ | मांसाहारी क्रूर पक्षी, कुत्ते, सियार, गीध, कंक तथा कौए अति प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे ॥ ३१ ॥ |
| रणभूर्भाति भूयिष्ठपतितासुरवर्ष्मकैः ।<br>रुधिरस्रावसंयुक्तैर्गजाश्वदेहसंकुला ॥ ३२ | उस समय बहुत-से गिरे हुए दैत्योंके रक्त बहते हुए शरीरोंसे तथा हाथियों और घोड़ोंके देहसे पटी हुई वह रणभूमि अत्यधिक [ भयानक ] प्रतीत हो रही थी ॥ ३२ ॥ |
| पतितान्दानवान्दृष्ट्वा निशुम्भोऽतिरुषान्वितः ।<br>प्रययौ चण्डिकां तूर्णं गदामादाय दारुणाम् ॥ ३३ | [ भूमिपर ] गिरे हुए दानवोंको देखकर निशुम्भ अत्यन्त कुपित हो उठा और एक भयंकर गदा लेकर शीघ्रतापूर्वक भगवतीके समक्ष पहुँच गया ॥ ३३ ॥ |
| सिंहं जघान गदया मस्तके मदगर्वितः ।<br>प्रहृत्य च स्मितं कृत्वा पुनर्देवीमताडयत् ॥ ३४ | अभिमानमें चूर उस निशुम्भने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने मुसकराकर पुनः देवीपर प्रहार करके उन्हें चोट पहुँचायी ॥ ३४ ॥ |
| सापि तं कुपितातीव निशुम्भं पुरतः स्थितम् ।<br>प्रहरन्तं समीक्ष्याथ देवी वचनमब्रवीत् ॥ ३५ | इससे वे भगवती भी अत्यन्त कुपित हो गयीं और समक्ष स्थित होकर प्रहार कर रहे उस निशुम्भको देखकर कहने लगीं— ॥ ३५ ॥ |
| देव्युवाच<br>तिष्ठ मन्दमते तावद्यावत्खड्गमिदं तव ।<br>ग्रीवायां प्रेरयाम्यस्माद् गन्तासि यमसादनम् ॥ ३६ | **देवी बोलीं—**हे मन्दबुद्धि! मैं तलवार चला रही हूँ। तुम तबतकके लिये ठहर जाओ, जबतक मेरी यह तलवार तुम्हारी गर्दनतक नहीं पहुँच जाती। इसके बाद तुम यमपुरी निश्चय ही पहुँच जाओगे ॥ ३६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा तरसा देवी कृपाणेन समाहिता ।<br>चिच्छेद मस्तकं तस्य निशुम्भस्याथ चण्डिका ॥ ३७ | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर भगवती चण्डिकाने एकाग्रचित्त होकर बड़ी शीघ्रतासे अपने कृपाणसे उस निशुम्भका मस्तक काट दिया ॥ ३७ ॥ |
| सच्छिन्नमस्तको देव्या कबन्धोऽतीव दारुणः ।<br>बभ्राम च गदापाणिस्त्रासयन्देवतागणान् ॥ ३८ | इस प्रकार भगवतीके द्वारा सिर कटा हुआ अत्यन्त विकराल वह धड़ हाथमें गदा धारण किये देवगणोंको भयभीत करता हुआ इधर-उधर घूमने लगा ॥ ३८ ॥ |
| देवी तस्य शितैर्बाणैश्चिच्छेद चरणौ करौ ।<br>पपातोर्व्यां ततः पापी गतासुः पर्वतोपमः ॥ ३९ | तत्पश्चात् भगवतीने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके दोनों हाथ तथा पैर भी काट दिये। इसके बाद पर्वतके समान शरीरवाला वह पापी दैत्य प्राणहीन होकर धरतीपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥ |
| तस्मिन्निपतिते दैत्ये निशुम्भे भीमविक्रमे ।<br>हाहाकारो महानासीत्तत्सैन्ये भयकम्पिते ॥ ४०<br><br>त्यक्त्वायुधानि सर्वाणि सैनिकाः क्षतजाप्लुताः ।<br>जग्मुर्बुम्बारवं सर्वे कुर्वाणा राजमन्दिरम् ॥ ४१ | प्रचण्ड पराक्रमवाले उस निशुम्भ दैत्यके गिर जानेपर भयसे कम्पित दानवसेनामें महान् हाहाकार मच गया। रक्तसे लथपथ समस्त दानवसैनिक अपने-अपने सभी आयुध फेंककर चीख-पुकार करते हुए राजभवनकी ओर भाग गये ॥ ४०-४१ ॥ |
| तानागतान्सम्प्रेक्ष्य शुम्भः शत्रुनिषूदनः ।<br>पप्रच्छ क्व निशुम्भोऽसौ कथं भग्नाः पलायिताः ॥ ४२ | शत्रुओंके संहारकी शक्ति रखनेवाले शुम्भने वहाँ आये हुए उन सैनिकोंको देखकर उनसे पूछा—निशुम्भ कहाँ है और घायल होकर तुम सब युद्धभूमिसे भाग क्यों आये ? ॥ ४२ ॥ |
| अ० ३० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१५ |
|---|
| तच्छ्रुत्वा वचनं राजंस्ते प्रोचुः प्रणता भृशम्।<br>राजंस्ते निहतो भ्राता शेते समरमूूर्धनि॥ ४३ | दानवराज शुम्भका वह वचन सुनकर उन सैनिकोंने अति विनम्रतापूर्वक कहा—हे राजन्! आपके भाई निशुम्भ मृत होकर रणभूमिमें सोये पड़े हैं॥ ४३॥ | | तया निपातिताः शूरा ये च तेऽप्यनुजानुगाः।<br>वयं त्वां कथितुं सर्वं वृत्तान्तं समुपागताः॥ ४४ | उस स्त्रीने आपके अनुज (निशुम्भ)-के जो भी अनुचर दानववीर थे, उन्हें मार डाला। यही सब समाचार आपको बतानेके लिये हम यहाँ आये हुए हैं॥ ४४॥ | | निशुम्भो निहतस्तत्र तया चण्डिकयाधुना।<br>न हि युद्धस्य कालोऽद्य तव राजन् रणाङ्गणे॥ ४५ | उस चण्डिकाने इसी समय युद्धभूमिमें निशुम्भका संहार किया है। अतएव हे राजन्! उसके साथ समरभूमिमें आपके लिये आज युद्ध करनेका [उचित] अवसर नहीं है॥ ४५॥ | | देवकार्यं समुद्दिश्य कापीय परमाङ्गना।<br>हन्तुं दैत्यकुलं नूनं प्राप्तेति परिचिन्तय॥ ४६ | आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे दानवकुलका संहार करनेके लिये यह कोई अद्भुत देवी प्रकट हुई है॥ ४६॥ | | नैषा प्राकृतयोषैव देवी शक्तिरनुत्तमा।<br>अचिन्त्यचरिता क्वापि दुर्ज्ञेया दैवतैरपि॥ ४७ | यह सामान्य नारी नहीं है, अपितु देवीरूपिणी कोई अत्युत्तम शक्ति है। अद्भुत चरित्रोंवाली ये देवी देवताओंके भी ज्ञानसे परे हैं॥ ४७॥ | | नानारूपधरातीय मायामूलविशारदा।<br>विचित्रभूषणा देवी सर्वायुधधरा शुभा॥ ४८ | ये कल्याणी भगवती अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ हैं, मायाके मूल तत्त्वका पूर्ण ज्ञान रखनेवाली हैं और अद्भुत भूषण तथा समस्त प्रकारके आयुध धारण करनेवाली हैं॥ ४८॥ | | गहना गूढचरिता कालरात्रिरिवापरा।<br>अपारपारगा पूर्णा सर्वलक्षणसंयुता॥ ४९ | गूढ़ चरित्रोंवाली इन देवीको जान पाना अत्यन्त कठिन है। ये दूसरी कालरात्रिके समान प्रतीत होती हैं। असीमके भी पार जा सकनेमें समर्थ ये पूर्णतामयी देवी सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं॥ ४९॥ | | अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्त्यकुतोभयाः।<br>देवकार्यञ्च कुर्वाणां श्रीदेवीं परमाद्भुताम्॥ ५० | समस्त देवतागण अन्तरिक्षमें स्थित होकर देवकार्य सिद्ध करनेवाली परम अद्भुतस्वरूपिणी उन देवीका निर्भीकतापूर्वक स्तवन कर रहे हैं॥ ५०॥ | | पलायनं परो धर्मः सर्वथा देहरक्षणम्।<br>रक्षिते किल देहेस्मिन्कालेऽस्मत्सुखताङ्गते॥ ५१ | यदि आप शरीरकी रक्षा करना चाहते हैं तो इस समय पलायन ही परम धर्म है। इस शरीरकी रक्षा हो जानेके बाद पुनः आनन्ददायक अनुकूल समय आनेपर संग्राममें आपकी विजय होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है। | | संग्रामे विजयो राजन् भविता ते न संशयः।<br>कालः करोति बलिनं समये निर्बलं क्वचित्॥ ५२ | हे राजन्! कभी-कभी काल बलवान्को भी बलहीन बना देता है और पुनः समय आनेपर उसे बलशाली बनाकर विजयकी प्राप्ति |
| ६९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं पुनः सबलं कृत्वा जायायोपदधाति हि।<br>दातारं याचकं कालः करोति समये क्वचित्॥ ५३<br><br>भिक्षुकं धनदातारं करोति समयान्तरे। | करा देता है। कभी-कभी काल विषम परिस्थितिमें दाताको भिखारी बना देता है और पुनः कुछ समय बीतनेपर उसी भिखारीको धन देनेवाला बना देता है॥ ५१–५३ १/२ ॥ |
| विष्णुः कालवशे नूनं ब्रह्मा वा पार्वतीपतिः॥ ५४<br><br>इन्द्राद्या निर्जराः सर्वे काल एव प्रभुः स्वयम्।<br>तस्मात्कालं प्रतीक्षस्व विपरीतं तवाधुना॥ ५५ | विष्णु, ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता निश्चितरूपसे सदा कालके वशवर्ती हैं। यह काल स्वयं ही सबका स्वामी है। हे राजन्! अभी काल आपके लिये विपरीत है, अतएव आप समयकी प्रतीक्षा कीजिये॥ ५४–५५॥ |
| सम्मुखो देवतानाञ्च दैत्यानां नाशहेतुकः।<br>एकैव च गतिर्नास्ति कालस्य किल भूपते॥ ५६<br><br>नानारूपधराप्यस्ति ज्ञातव्यं तस्य चेष्टितम्।<br>कदाचित्सम्भवो नृणां कदाचित्प्रलयस्तथा॥ ५७<br><br>उत्पत्तिहेतुः कालोऽन्यः क्षयहेतुस्तथापरः। | हे पृथ्वीपते! इस समय काल देवताओंके लिये अनुकूल तथा दैत्योंके लिये विनाशकारी है। कालकी गति सर्वथा एक ही तरहकी नहीं बनी रहती है। यह काल-गति नानाविध रूप भी धारण करती है। अतः कालकी चेष्टापर विचार करते रहना चाहिये। कभी प्राणियोंका जन्म होता है और कभी उनका मरण उपस्थित हो जाता है। एक काल उत्पत्तिका हेतु होता है तो दूसरा काल विनाशका हेतु बन जाता है॥ ५६–५७ १/२ ॥ |
| प्रत्यक्षं ते महाराज देवाः सर्वे सवासवाः॥ ५८<br><br>करदास्ते कृताः पूर्वं कालेन सम्मुखेन च।<br>तेनैव विमुखेनाद्य बलिनोऽबलयासुराः॥ ५९<br><br>निहता नितरां कालः करोति च शुभाशुभम्।<br>नैवात्र कारणं काली नैव देवाः सनातनाः॥ ६० | हे महाराज! आपके समक्ष इसका प्रमाण विद्यमान है कि पहले इन्द्र आदि सभी देवता आपके लिये अनुकूल समय रहनेपर आपके करदाता बन गये थे, किंतु आज उसी कालके विपरीत हो जानेके कारण एक अबलाने बलशाली असुरोंका संहार कर डाला। यही काल हित भी करता है तथा अहित भी करता है। इस पराजयमें न तो काली कारण हैं और न तो सनातन देवता ही कारण हैं॥ ५८–६०॥ |
| यथा ते रोचते राजंस्तथा कुरु विमृश्य च।<br>कालोऽयं नात्र हेतुस्ते दानवानां तथा पुनः॥ ६१ | हे राजन्! आपको जैसा उचित जान पड़े भलीभाँति सोच-समझकर आप वैसा ही कीजिये। हमारी समझमें तो यह काल अभी आपके तथा अन्य दानवोंके लिये भी अनुकूल नहीं है॥ ६१॥ |
| त्वदग्रतो गतः शक्रो भग्नः संख्ये निरायुधः।<br>तथा विष्णुस्तथा रुद्रो वरुणो धनदो यमः॥ ६२<br><br>तथा त्वमपि राजेन्द्र वीक्ष्य कालवशं जगत्।<br>पातालं गच्छ तरसा जीवन्भद्रमवाप्स्यसि॥ ६३ | किसी समय संग्राममें घायल होकर तथा अपने आयुध छोड़कर इन्द्र आपके सामनेसे भाग गये थे। ऐसे ही विष्णु, रुद्र, वरुण, कुबेर, यम आदि देवता भी आपके समक्ष टिक नहीं पाये थे। अतः हे राजेन्द्र! इस समस्त जगत्को कालके अधीन मानकर आप भी तत्काल पाताललोक चले जाइये; जीवन बचा रहा तो आप कल्याण अवश्य प्राप्त करेंगे॥ ६२–६३॥ |
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१७ |
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| मृते त्वयि महाराज शत्रवस्ते मुदान्विताः ।<br>मङ्गलानि प्रगायन्तो विचरिष्यन्ति सर्वतः ॥ ६४ | हे महाराज ! यदि कहीं आपका निधन हो गया तो आपके शत्रु प्रसन्नतापूर्वक मंगलगान करते हुए निर्भय होकर सर्वत्र विचरण करेंगे ॥ ६४ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे युद्धात्प्रत्यागतानां रक्षसां शुम्भाय वार्तावर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
अथैकत्रिंशोऽध्यायः
शुम्भका रणभूमिमें आना और देवीसे वार्तालाप करना, भगवती कालिकाद्वारा उसका वध, देवीके इस उत्तम चरित्रके पठन और श्रवणका फल
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भो दैत्यपतिस्तथा।<br>उवाच सैनिकानाशु कोपाकुलितलोचनः ॥ १ | व्यासजी बोले—उन सैनिकोंका यह वचन सुनकर क्रोधसे आकुलित नेत्रोंवाले दानवराज शुम्भने उनसे तुरन्त कहा ॥ १ ॥ |
| शुम्भ उवाच<br>जाल्माः किं ब्रूत दुर्वाच्यं कृत्वा जीवितमुत्सहे।<br>निहत्य सचिवान्भ्रातृन्निर्लज्जो विचरामि किम्॥ २ | शुम्भ बोला—हे मूर्खों! तुम सब खोटी बात क्यों बोल रहे हो? तुम्हारे वचनोंको मानकर मैं भला अपने जीवनकी रक्षा क्यों करूँ? क्या अपने सचिवों तथा भाई-बन्धुओंका वध कराकर मैं निर्लज्ज बनकर विचरण करूँ? ॥ २ ॥ |
| कालः कर्ता शुभानां वाशुभानां बलवत्तरः।<br>का चिन्ता मम दुर्वारे तस्मिन्नीशेऽप्यरूपके ॥ ३ | प्राणियोंके शुभ अथवा अशुभका कर्ता जब एकमात्र वही अति बलवान् काल है तो मुझे चिन्ता क्या? क्योंकि परोक्षरूपसे सबपर शासन करनेवाला वह काल टाला नहीं जा सकता ॥ ३ ॥ |
| यद्भवति तद्भवतु यत्करोति करोतु तत्।<br>न मे चिन्तास्ति कुत्रापि मरणाजीवनात्तथा ॥ ४ | जो हो रहा है, वह होता रहे तथा काल जो कुछ भी कर रहा है, उसे करता रहे; अब तो मुझे जीवन तथा मृत्युके विषयमें किसी भी प्रकारकी चिन्ता नहीं है ॥ ४ ॥ |
| स कालोऽप्यन्यथाकर्तुं भावितो नेशते क्वचित्।<br>न वर्षति च पर्जन्यः श्रावणे मासि सर्वथा ॥ ५<br><br>कदाचिन्मार्गशीर्षे वा पौषे माघेऽथ फाल्गुने।<br>अकाले वर्षतीवाशु तस्मान्मुख्यो न चास्त्ययम्॥ ६ | वह काल भी भवितव्यताको मिटा सकनेमें समर्थ नहीं है। ऐसा भी होता है कि सावनके महीनेमें मेघ सदा नहीं बरसते; अपितु कभी-कभी अगहन, पौष, माघ तथा फाल्गुनमें असमय ही तेज वृष्टि होने लगती है। अतएव [समस्त कार्योंमें] काल ही प्रधान नहीं है ॥ ५-६ ॥ |
| कालो निमित्तमात्रं तु दैवं हि बलवत्तरम्।<br>दैवेन निर्मितं सर्वं नान्यथा भवतीत्यदः ॥ ७ | काल तो निमित्तमात्र है, अपितु [इसकी तुलनामें] दैव अधिक बलवान् है। सब कुछ देवनिर्मित है; इसके विपरीत कुछ नहीं होता ॥ ७ ॥ |
| दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>जेता यः सर्वदेवानां निशुम्भोऽप्यनया हतः ॥ ८ | मैं तो दैवको ही प्रधान मानता हूँ। अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है; क्योंकि जिस निशुम्भने सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर ली थी, उसे इस स्त्रीने मार डाला ॥ ८ ॥ |
| ६९८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
|---|
| रक्तबीजो महाशूरः सोऽपि नाशं गतो यदा।<br>तदाहं कीर्तिमुत्सृज्य जीविताशां करोमि किम्॥ ९ | जब महान् शूरवीर रक्तबीज भी विनाशको प्राप्त हो गया, तब अपनी कीर्तिको कलंकित करके मैं ही जीवनकी आशा क्यों करूँ?॥ ९॥ | | प्राप्ते काले स्वयं ब्रह्मा परार्धद्वयसम्मिते।<br>निधनं याति तरसा जगत्कर्ता स्वयं प्रभुः॥ १० | जगत्के रचयिता सर्वसमर्थ स्वयं ब्रह्मा भी दो परार्धका समय बीत जानेपर तत्क्षण ही निधनको प्राप्त हो जाते हैं॥ १०॥ | | चतुर्युगसहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसे किल।<br>पतन्ति भवनात्पञ्च नव चेन्द्रास्तथा पुनः॥ ११ | ब्रह्माजीके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग समाप्त हो जाते हैं और इतनी ही अवधिमें चौदह इन्द्रोंका स्वर्गसे पतन हो चुकता है॥ ११॥ | | तथैव द्विगुणे विष्णुर्मरणायोपकल्पते।<br>तथैव द्विगुणे काले शङ्करः शान्तिमेति च॥ १२ | इसी प्रकार [ब्रह्माजीके जीवनकालका] दुगुना समय बीतनेपर विष्णुका अन्त हो जाता है तथा इससे भी दूने समयके पश्चात् शंकर भी समाप्त हो जाते हैं॥ १२॥ | | का चिन्ता मरणे मूढा निश्चले दैवनिर्मिते।<br>मही महीधराणाञ्च नाशः सूर्यशशाङ्कयोः॥ १३ | इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, सूर्य तथा चन्द्रमा आदिका भी विनाश हो जाता है, तब हे मूर्खो! दैवकी बनायी हुई इस अटल मृत्युके विषयमें क्या चिन्ता है?॥ १३॥ | | जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>अध्रुवेऽस्मिञ्छरीरे तु रक्षणीयं यशः स्थिरम्॥ १४ | जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है तथा मरनेवालेका जन्म निश्चित है। अतः इस अनित्य शरीरके द्वारा अपनी स्थिर कीर्तिकी रक्षा करनी चाहिये॥ १४॥ | | रथो मे कल्प्यतां शीघ्रं गमिष्यामि रणाजिरे।<br>जयो वा मरणं वापि भवत्वद्यैव दैवतः॥ १५ | शीघ्रतापूर्वक मेरा रथ तैयार करो। मैं समरांगणमें जाऊँगा। विजय अथवा मरण प्रारब्धानुसार जो भी होनेवाला हो, वह आज ही हो जाय॥ १५॥ | | इत्युक्त्वा सैनिकाञ्छुम्भो रथमास्थाय सत्वरः।<br>प्रययावम्बिका यत्र संस्थिता तु हिमाचले॥ १६ | सैनिकोंसे ऐसा कहकर वह शुम्भ तुरंत रथपर सवार होकर हिमालयकी ओर चल दिया, जहाँ भगवती विराजमान थीं॥ १६॥ | | सैन्यं प्रचलितं तस्य सङ्गे तत्र चतुर्विधम्।<br>हस्त्यश्वरथपादातिसंयुक्तं सायुधं बहु॥ १७ | उस समय हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल चलने-वालोंसे सुसज्जित एवं नानाविध आयुधोंसे युक्त विशाल चतुरंगिणी सेना भी उसके साथ चल पड़ी॥ १७॥ | | तत्र गत्वाचले शुम्भः संस्थितां जगदम्बिकाम्।<br>त्रैलोक्यमोहिनीं कान्तामपश्यत्सिंहवाहिनीम्॥ १८<br><br>सर्वाभरणभूषाढ्यां सर्वलक्षणसंवृताम्।<br>स्तूयमानां सुरैः खस्थैर्गन्धर्वयक्षकिन्नरैः॥ १९<br><br>पुष्पैश्च पूज्यमानाञ्च मन्दारपादपोद्भवैः।<br>कुर्वाणां शङ्खनिनदं घण्टानादं मनोहरम्॥ २० | उस पर्वतपर पहुँचकर शुम्भने त्रिभुवनको मोहित करनेवाली परम सुन्दरी सिंहवाहिनी भगवती जगदम्बिकाको वहाँ विराजमान देखा। वे सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत थीं तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं; देवता, यक्ष तथा किन्नर आकाशमें स्थित होकर उनकी स्तुति कर रहे थे तथा मन्दारवृक्षके पुष्पोंसे पूजा कर रहे थे और वे मनोहर शंखध्वनि तथा घंटानाद कर रही थीं॥ १८-२०॥ |
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६९९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वा तां मोहमगमच्छुम्भः कामविमोहितः।<br>पञ्चबाणाहतः कामं मनसा समचिन्तयत्॥ २१ | उन्हें देखकर शुम्भ मोहित हो गया। कामबाणसे आहत वह शुम्भ कामासक्त होकर मन-ही-मन सोचने लगा— ॥ २१ ॥ |
| अहो रूपमिदं सम्यगहो चातुर्यमद्भुतम्।<br>सौकुमार्यञ्च धैर्यञ्च परस्परविरोधि यत्॥ २२ | अहो, इसका ऐसा आकर्षक रूप तथा ऐसा अद्भुत चातुर्य है। सुकुमारता तथा धीरता—ये दोनों परस्पर विरोधीभाव इसमें एक साथ विद्यमान हैं!॥ २२॥ |
| सुकुमारातिन्वङ्गी सद्यः प्रकटयौवना।<br>चित्रमेतदसौ बाला कामभावविवर्जिता॥ २३ | अत्यन्त कृश शरीरवाली इस सुकुमारीमें अभी-अभी यौवन प्रस्फुटित हुआ है, किंतु आश्चर्य है कि यह रमणी कामभावनासे रहित है॥ २३॥ |
| कामकान्तासमा रूपे सर्वलक्षणलक्षिता।<br>अम्बिकेयं किमेतत्तु हन्ति सर्वान्महाबलान्॥ २४ | रूपमें कामदेवकी पत्नी रतिके समान सुन्दर तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह स्त्री कहीं अम्बिका ही तो नहीं, जो सभी महाबली दानवोंका संहार कर रही है॥ २४॥ |
| उपायः कोऽत्र कर्तव्यो येन मे वशगा भवेत्।<br>न मन्त्रा वा मरालाक्षीसाधने सन्निधौ मम॥ २५ | इस अवसरपर मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे यह मेरी वशवर्तिनी हो जाय? इस हंस-सदृश नेत्रोंवालीको वशमें करनेहेतु मेरे पास कोई मन्त्र भी नहीं है॥ २५॥ |
| सर्वमन्त्रमयी ह्येषा मोहिनी मदगर्विता।<br>सुन्दरीयं कथं मे स्याद्वशगा वरवर्णिनी॥ २६ | सर्वमन्त्रमयी, सबको मोहित करनेवाली, अभिमानमें मत्त रहनेवाली तथा उत्तम लक्षणोंवाली यह सुन्दरी किस प्रकार मेरे वशमें होगी?॥ २६॥ |
| पातालगमनं मेऽद्य न युक्तं समराङ्गणात्।<br>सामदानविभेदैश्च नेयं साध्या महाबला॥ २७ | अब युद्धभूमि छोड़कर पाताललोक जाना भी मेरे लिये उचित नहीं है। साम, दान तथा भेद आदि उपायोंसे भी यह महाबलशालिनी वशमें नहीं की जा सकती॥ २७॥ |
| किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यं विषमे समुपस्थिते।<br>मरणं नोत्तमं चात्र स्त्रीकृतं तु यशोऽपहृत्॥ २८ | इस विषम परिस्थितिके आ जानेपर अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? स्त्रीके हाथों मर जाना भी उचित नहीं है; क्योंकि ऐसी मृत्यु यशको नष्ट करनेवाली होती है॥ २८॥ |
| मरणमृषिभिः प्रोक्तं सङ्गरे मङ्गलास्पदम्।<br>यत्तत्समानबलयोर्योधयोर्युध्यतोः किल॥ २९ | ऋषियोंने उस मृत्युको श्रेयस्कर कहा है, जो समरभूमिमें समान बलवाले योद्धाओंके साथ लड़ते-लड़ते प्राप्त हो॥ २९॥ |
| प्राप्तेयं दैवरचिता नारी नरशतोत्तमा।<br>नाशायास्मत्कुलस्येह सर्वथातिबलाबला॥ ३० | सैकड़ों वीरोंसे श्रेष्ठ, महाबलशालिनी तथा दैव-विरचित यह नारी मेरे कुलके पूर्ण विनाशके लिये यहाँ उपस्थित हुई है॥ ३०॥ |
| वृथा किं सामवाक्यानि मया योज्यानि साम्प्रतम्।<br>हननायागता ह्येषा किं नु साम्ना प्रसीदति॥ ३१ | मैं इस समय सामनीतिसे युक्त वचनोंका प्रयोग व्यर्थमें क्यों करूँ? क्योंकि यह तो संहारके लिये आयी हुई है, तो फिर सामवचनोंसे यह कैसे |
| ७०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| न दानैश्चालितुं योग्या नानाशस्त्रविभूषिता।<br>भेदस्तु विफलः कामं सर्वदेववशानुगा॥ ३२<br><br>तस्मात्तु मरणं श्रेयो न संग्रामे पलायनम्।<br>जयो वा मरणं वाद्य भवत्वेव यथाविधि॥ ३३ | प्रसन्न हो सकती है? अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे विभूषित होनेके कारण दान आदिके प्रलोभनोंसे भी यह विचलित नहीं की जा सकती। भेदनीति भी निष्फल सिद्ध होगी; क्योंकि सभी देवता इसके वशमें हैं॥ ३१-३२॥<br>अतएव संग्राममें मर जाना श्रेयस्कर है, किंतु पलायन करना ठीक नहीं है। अब तो प्रारब्धके अनुसार विजय अथवा मृत्यु जो भी होना हो, वह हो॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा शुम्भः सत्त्वाश्रितोऽभवत्।<br>युद्धाय सुस्थिरो भूत्वा तामुवाच पुरःस्थिताम्॥ ३४ | व्यासजी बोले— इस प्रकार अपने मनमें विचार करके शुम्भने धैर्यका सहारा लिया। अब युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके उसने अपने सामने खड़ी भगवतीसे कहा॥ ३४॥ | | देवि युध्यस्व कान्तेऽद्य वृथायं ते परिश्रमः।<br>मूर्खासि किल नारीणां नायं धर्मः कदाचन॥ ३५ | हे देवि! युद्ध करो, किंतु हे प्रिये! इस समय तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है। तुम मूर्ख हो; क्योंकि युद्ध करना स्त्रियोंका धर्म कदापि नहीं है॥ ३५॥ | | नारीणां लोचने बाणा भ्रुवावेव शरासनम्।<br>हावभावास्तु शस्त्राणि पुमाल्लक्ष्यं विचक्षणः॥ ३६ | स्त्रियोंके नेत्र ही बाण हैं, उनकी भौंहें ही धनुष हैं, उनके हाव-भाव ही शस्त्र हैं और रसज्ञ पुरुष उनका लक्ष्य है॥ ३६॥ | | सन्नाहश्चाङ्गरागोऽत्र रथश्चापि मनोरथः।<br>मन्दप्रजल्पितं भेरीशब्दो नान्यः कदाचन॥ ३७ | अंगराग (शीतल चन्दन आदि) ही उनका कवच है, मनोकामना रथ है तथा धीरे-धीरे मधुर वाणीमें बोलना भेरी-ध्वनि है। अतएव स्त्रियोंके लिये अन्य शस्त्रोंकी कोई आवश्यकता नहीं रहती॥ ३७॥ | | अन्यास्त्रधारणं स्त्रीणां विडम्बनमसंशयम्।<br>लज्जैव भूषणं कान्ते न च धाष्टर्यं कदाचन॥ ३८ | यदि स्त्रियाँ इनके अतिरिक्त अन्य अस्त्र धारण करें तो यह निश्चितरूपसे उनके लिये विडम्बना ही है। हे प्रिये! लज्जा ही नारियोंका आभूषण है, धृष्टता उन्हें कभी भी शोभा नहीं देती॥ ३८॥ | | युध्यमाना वरा नारी कर्कशेवाभिदृश्यते।<br>स्तनौ सङ्गोपनीयौ वा धनुषः कर्षणे कथम्॥ ३९ | युद्ध करती हुई उत्तम नारी भी कर्कशाके सदृश दिखायी देती है। धनुष खींचते समय कोई स्त्री अपने दोनों स्तनोंको छिपानेमें कैसे सफल हो सकती है?॥ ३९॥ | | क्व मन्दगमनं कुत्र गदामादाय धावनम्।<br>बुद्धिदा कालिका तेऽत्र चामुण्डा परनायिका॥ ४०<br><br>चण्डिका मन्त्रमध्यस्था लालनेऽसुस्वरा शिवा।<br>वाहनं मृगराडास्ते सर्वसत्त्वभयङ्करः॥ ४१ | कहाँ नारियोंकी मन्थरगति और कहाँ युद्धमें गदा लेकर दौड़ना। इस समय यह कालिका तथा दूसरी स्त्री चामुण्डा ही तुम्हें बुद्धि देनेवाली हैं। मध्यस्थ होकर चण्डिका मन्त्रणा देती है, कर्कश स्वरवाली शिवा तुम्हारी शुश्रूषामें रहती है और सभी प्राणियोंमें भयंकर सिंह तुम्हारा वाहन है॥ ४०-४१॥ |
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७०१ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वीणानादं परित्यज्य घण्टानादं करोषि यत्।<br>रूपयौवनयोः सर्वं विरोधि वरवर्णिनि॥ ४२ | हे सुन्दरि! वीणा-वादन छोड़कर तुम यह जो घण्टा-नाद कर रही हो, वह सब तुम्हारे रूप तथा यौवनके सर्वथा विपरीत है॥ ४२॥ |
| यदि ते सङ्गरेच्छास्ति कुरूपा भव भामिनि।<br>लम्बोष्ठी कुनखी क्रूरा ध्वांक्षवर्णा विलोचना॥ ४३<br><br>लम्बपादा कुदन्ती च मार्जारनयनाकृतिः।<br>ईदृशं रूपमास्थाय तिष्ठ युद्धे स्थिरा भव॥ ४४<br><br>कर्कशं वचनं ब्रूहि ततो युद्धं करोम्यहम्।<br>ईदृशीं सुदतीं दृष्ट्वा न मे पाणिः प्रसीदति॥ ४५<br><br>हन्तुं त्वां मृगशावाक्षि कामकान्तोपमे मृधे। | हे भामिनि! यदि युद्ध करना ही तुम्हें अभीष्ट है तो तुम सर्वप्रथम लम्बे ओठोंवाली, विचित्र नखोंवाली, क्रूर स्वभाववाली, कौए-जैसे वर्णवाली, विकृत आँखोंवाली, लम्बे पैरोंवाली, भयंकर दाँतोंवाली और बिल्लीसदृश नेत्रोंवाली कुरूप स्त्री बन जाओ। ऐसा ही विकराल रूप धारण करके तुम युद्धभूमिमें स्थिरतापूर्वक खड़ी हो जाओ और कर्कश वचन बोलो, तभी मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा; क्योंकि हे मृगशावक-सदृश नेत्रोंवाली! हे रतितुल्य सुन्दरि! सुन्दर दाँतोंवाली ऐसी रमणीको देखकर तुम्हें युद्धमें मारनेके लिये मेरा हाथ नहीं उठ पा रहा है॥ ४३—४५ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति ब्रुवाणं कामार्तं वीक्ष्य तं जगदम्बिका॥ ४६<br><br>स्मितपूर्वमिदं वाक्यमुवाच भरतोत्तम। | व्यासजी बोले— हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! उस कामातुर शुम्भको ऐसा बोलते हुए देखकर भगवती जगदम्बा मुसकराकर यह वचन कहने लगीं—॥ ४६ १/२॥ |
| देव्युवाच<br>किं विषीदसि मन्दात्मन् कामबाणविमोहितः॥ ४७<br><br>प्रेक्षिकाहं स्थिता मूढ कुरु कालिकया मृधम्।<br>चामुण्डया वा कुर्वैते तव योग्ये रणाङ्गणे॥ ४८<br><br>प्रहरस्व यथाकामं नाहं त्वां योद्धुमुत्सहे।<br>इत्युक्त्वा कालिकां प्राह देवी मधुरया गिरा॥ ४९ | देवी बोलीं— हे मन्दबुद्धि! कामबाणसे विमोहित होकर तुम इस प्रकार विषाद क्यों कर रहे हो? हे मूढ़! तुम पहले कालिका अथवा चामुण्डाके साथ ही युद्ध कर लो। ये दोनों देवियाँ ही समरांगणमें तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें पूर्ण समर्थ हैं। मैं तो केवल दर्शक बनकर खड़ी हूँ। तुम इन दोनोंपर यथेच्छ प्रहार करो। मैं तुमसे लड़नेकी इच्छा नहीं करती॥ ४७-४८ १/२॥ |
| जह्येनं कालिके क्रूरे कुरूपप्रियमाहवे। | शुम्भसे ऐसा कहकर भगवतीने मधुर वाणीमें कालिकासे कहा—हे क्रूर कालिके! कुरूपाके साथ लड़नेकी इच्छावाले इस दानवको तुम युद्धमें मार डालो॥ ४९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ता कालिका कालप्रेरिता कालरूपिणी॥ ५०<br><br>गदां प्रगृह्य तरसा तस्थावाजौ कृतोद्यमा।<br>तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम्॥ ५१<br><br>पश्यतां सर्वदेवानां मुनीनाञ्च महात्मनाम्। | व्यासजी बोले— भगवतीके इस प्रकार कहनेपर कालरूपिणी कालिका कालसे प्रेरित होकर बड़ी तेजीसे तत्काल गदा उठाकर सावधानीपूर्वक रणमें खड़ी हो गयीं। इसके बाद सभी देवताओं, मुनियों और महात्माओंके देखते-देखते उन दोनोंमें अतीव भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ५०-५१ १/२॥ |
| ७०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गदामुद्यम्य शुम्भोऽथ जघान कालिकां रणे॥ ५२<br>कालिका दैत्यराजानं गदया न्यहनद् भृशम्।<br>बभंजास्य रथं चण्डी गदया कनकोज्ज्वलम्॥ ५३<br>खरान्हत्वा जघानाशु दारुकं दारुणस्वना।<br>स पदातिर्गदां गुर्वीं समादाय क्रुधान्वितः॥ ५४ | शुम्भने अपनी गदा लेकर उससे कालिकापर प्रहार किया। भगवती कालिका भी अपनी गदासे दैत्यराज शुम्भपर तेज प्रहार करने लगीं। भयानक स्वरवाली चण्डीने गदासे उस दैत्यके सुवर्णमय चमकीले रथको चूर-चूर कर डाला और [शुम्भका रथ खींचनेवाले] गदहोंको मारकर उसके सारथिको भी मार डाला॥ ५२-५३ १/२॥<br>अब क्रोधमें भरे हुए शुम्भने अपनी विशाल गदा लेकर अट्टहास करते हुए पैदल ही पहुँचकर कालिकाकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग (वक्षःस्थल)-पर प्रहार किया॥ ५४ १/२॥ |
| कालिकाभुजयोर्मध्ये प्रहसन्नहनत्तदा।<br>वञ्चयित्वा गदाघातं खड्गमादाय सत्वरा॥ ५५<br>चिच्छेदास्य भुजं सव्यं सायुधं चन्दनार्चितम्।<br>स छिन्नबाहुर्विरथो गदापाणिः परिप्लुतः॥ ५६ | तब कालिकाने उसके गदा-प्रहारको निष्फल करके शीघ्रतापूर्वक तलवार उठाकर शुम्भके चन्दनचर्चित तथा आयुधयुक्त बायें हाथको काट दिया॥ ५५ १/२॥<br>हाथ कट जाने तथा रथविहीन होनेके बावजूद भी रक्तसे लथपथ वह शुम्भ हाथमें गदा लिये हुए शीघ्रतापूर्वक कालिकाके पास पहुँचकर उनके ऊपर प्रहार करने लगा॥ ५६ १/२॥ |
| अचिरेण समागम्य कालिकामहनत्तदा।<br>काली च करवालेन भुजं तस्याथ दक्षिणम्॥ ५७<br>चिच्छेद प्रहसन्ती सा सगदं किल साङ्गदम्।<br>कर्तुं पादप्रहारं स कुपितः प्रययौ जवात्॥ ५८ | तब कालीने अपने करवाल (तलवार)-से उसके गदायुक्त तथा बाजूबन्दसे सुशोभित दाहिने हाथको हँसते-हँसते काट डाला॥ ५७ १/२॥<br>इसके बाद वह शुम्भ कुपित होकर कालिकापर पैरसे प्रहार करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ा। तभी कालिकाने अपनी तलवारसे तुरंत उसके दोनों पैर भी काट डाले॥ ५८ १/२॥ |
| काली चिच्छेद चरणौ खड्गेनास्य त्वरान्विता।<br>सच्छिन्नकरपादोऽपि तिष्ठ तिष्ठेति च ब्रुवन्॥ ५९<br>धावमानो ययावाशु कालिकां भीषयन्निव।<br>तमागच्छन्तमालोक्य कालिका कमलोपमम्॥ ६० | हाथ-पैर कट जानेपर भी 'ठहरो-ठहरो' ऐसा कहता हुआ वह शुम्भ कालिकाको भयभीत करते हुए वेगपूर्वक दौड़ता हुआ उनकी ओर बढ़ा॥ ५९ १/२॥<br>उसे आते देखकर कालिकाने उसके कमलसदृश मस्तकको काट दिया, जिससे उसके कण्ठसे रक्तकी अजस्र धारा बहने लगी। मस्तक कट जानेपर पर्वततुल्य वह शुम्भ जमीनपर गिर पड़ा और उसके प्राण शरीरसे निकलकर तत्काल प्रयाण कर गये॥ ६०-६१ १/२॥ |
| चकर्त मस्तकं कण्ठाद्रुधिरौघवहं भृशम्।<br>छिन्नेऽसौ मस्तके भूमौ पपात गिरिसन्निभः॥ ६१<br>प्राणा विनिर्ययुस्तस्य देहादुत्क्रम्य सत्वरम्।<br>गतासुं पतितं दैत्यं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः॥ ६२<br>तुष्टुवुस्तां तदा देवीं चामुण्डां कालिकां तथा। | दैत्य शुम्भको इस प्रकार प्राणविहीन होकर गिरा हुआ देखकर इन्द्रसहित सभी देवता भगवती चामुण्डा तथा कालिकाकी स्तुति करने लगे॥ ६२ १/२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
| अ० ३२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७०३ |
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| ववुर्वाताः शिवास्तत्र दिशश्च विमला भृशम्॥ ६३<br><br>बभूवुश्चाग्नयो होमे प्रदक्षिणशिखाः शुभाः।<br>हतशेषाश्च ये दैत्याः प्रणम्य जगदम्बिकाम्॥ ६४<br><br>त्यक्त्वायुधानि ते सर्वे पातालं प्रययुर्नृप।<br>एतत्त्ते सर्वमाख्यातं देव्याश्चरितमुत्तमम्॥ ६५<br><br>शुम्भादीनां वधं चैव सुराणां रक्षणं तथा।<br>एतदाख्यानकं सर्वं पठन्ति भुवि मानवाः॥ ६६<br><br>शृण्वन्ति च सदा भक्त्या ते कृतार्था भवन्ति हि।<br>अपुत्रो लभते पुत्रान्निर्धनश्च धनं बहु॥ ६७<br><br>रोगी च मुच्यते रोगात्सर्वान्कामानवाप्नुयात्।<br>शत्रुतो न भयं तस्य य इदं चरितं शुभम्।<br>शृणोति पठते नित्यं मुक्तिभाग्जायते नरः॥ ६८ | सुखदायक पवन बहने लगा तथा सभी दिशाएँ अत्यन्त निर्मल हो गयीं। हवन करते समय [शुभ सूचनाके रूपमें] अग्निकी पवित्र ज्वालाएँ दाहिनी ओरसे उठने लगीं॥ ६३ ½॥<br><br>हे राजन्! जो दानव मरनेसे बच गये थे, वे सभी जगदम्बिकाको प्रणाम करके अपने-अपने आयुध त्यागकर पाताल चले गये॥ ६४ ½॥<br><br>देवीका उत्तम चरित्र, शुम्भ आदि दैत्योंका वध तथा देवताओंकी रक्षा—इन सबका वर्णन आपसे कर दिया। पृथ्वीपर रहनेवाले जो मनुष्य इस समस्त आख्यानका भक्तिभावसे निरन्तर पठन तथा श्रवण करते हैं, वे निश्चितरूपसे कृतार्थ हो जाते हैं। पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त होते हैं, निर्धनको विपुल सम्पदा सुलभ हो जाती है तथा रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है। वह सभी वांछित फल प्राप्त कर लेता है और उसे शत्रुओंसे किसी प्रकारका भय नहीं रह जाता है। जो मनुष्य इस पवित्र आख्यानका नित्य पठन तथा श्रवण करता है, वह अन्तमें मोक्षका भागी हो जाता है॥ ६५—६८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
शुम्भवधो नामैकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः
देवीमाहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुरथ और समाधि वैश्यकी कथा
| जनमेजय उवाच<br>महिमा वर्णितः सम्यक्चण्डिकायास्त्वया मुने।<br>केन चाराधिता पूर्वं चरित्रत्रययोगतः॥ १ | जनमेजय बोले— हे मुने! आपने भगवती चण्डिकाकी महिमाका भलीभाँति वर्णन किया। अब आप यह बतानेकी कृपा करें कि तीन चरित्रोंका प्रयोग करके पहले किसने भगवतीकी आराधना की थी?॥ १॥ |
|---|---|
| प्रसन्ना कस्य वरदा केन प्राप्तं फलं महत्।<br>आराध्य कामदां देवीं कथयस्व कृपानिधे॥ २ | वे वरदायिनी भगवती किसके ऊपर प्रसन्न हुईं? सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली देवीकी उपासना करके किसने महान् फल प्राप्त किया? हे कृपानिधान! यह सब बताइये॥ २॥ |
| उपासनाविधिं ब्रह्मंस्तथा पूजाविधिं वद।<br>विस्तरेण महाभाग होमस्य च विधिं पुनः॥ ३ | हे ब्रह्मन्! हे महाभाग! जगदम्बाकी उपासनाविधि, पूजाविधि तथा हवनविधिका भी विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ ३॥ |
| ७०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३२ | | :--- | :--- |
| सूत उवाच<br>इति भूपवचः श्रुत्वा प्रीतः सत्यवतीसुतः।<br>प्रत्युवाच नृपं कृष्णो महामायाप्रपूजनम्॥ ४ | सूतजी बोले— राजाकी यह बात सुनकर सत्यवतीनन्दन कृष्णद्वैपायन प्रसन्न होकर उन्हें महामाया भगवतीका पूजन-विधान बताने लगे॥ ४॥ | | व्यास उवाच<br>स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं सुरथो नाम पार्थिवः।<br>बभूव परमोदारः प्रजापालनतत्परः॥ ५<br>सत्यवादी कर्मपरो ब्राह्मणानाञ्च पूजकः।<br>गुरुभक्तिरतो नित्यं स्वदारगमने रतः॥ ६<br>दानशीलोऽविरोधी च धनुर्वेदैकपारगः। | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें स्वारोचिष-मन्वन्तरमें सुरथ नामक एक राजा हुए; जो परम उदार, प्रजापालनमें तत्पर, सत्यवादी, कर्मनिष्ठ, ब्राह्मणोंके उपासक, गुरुजनोंके प्रति भक्ति रखनेवाले, सदा अपनी ही भार्यामें अनुरक्त, दानशील, किसीके साथ विरोधभाव न रखनेवाले तथा धनुर्विद्यामें पूर्ण पारंगत थे॥ ५-६ १/२ ॥ | | एवं पालयतो राज्यं म्लेच्छाः पर्वतवासिनः॥ ७<br>बलाच्छत्रुत्वमापन्नाः सैन्यं कृत्वा चतुर्विधम्।<br>हस्त्यश्वरथपादातिसहितास्ते मदोत्कटाः॥ ८<br>कोलाविध्वंसिनः प्राप्ताः पृथ्वीग्रहणतत्पराः।<br>सुरथः सैन्यमादाय सम्मुखः समपद्यत॥ ९<br>युद्धं समभवद् घोरं तस्य तैरतिदारुणैः। | इस प्रकार प्रजापालनमें तत्पर रहनेवाले राजा सुरथसे कुछ पर्वतवासी म्लेच्छोंने अनायास ही शत्रुता ठान ली। हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकोंसे सुसज्जित चतुरङ्गिणी सेना लेकर अभिमानमें चूर वे कोलाविध्वंसी सुरथके राज्यपर अधिकार करनेकी लालसासे वहाँ आ पहुँचे। सुरथ भी अपनी सेना लेकर सामने डट गये। उन महाभयंकर म्लेच्छोंके साथ राजा सुरथका भीषण युद्ध होने लगा॥ ७-९ १/२ ॥ | | म्लेच्छानां तु बलं स्वल्पं राजंस्तद्बलमद्भुतम्॥ १०<br>तथापि तैर्जितो युद्धे दैवाद्राजा पराजितः।<br>भग्नश्च स्वपुरं प्राप्तः सुरक्षं दुर्गमण्डितम्॥ ११ | यद्यपि म्लेच्छोंकी सेना बहुत थोड़ी थी तथा राजाकी सेना अत्यन्त विशाल थी, फिर भी दैवयोगसे उन्होंने राजा सुरथको युद्धमें जीत लिया। इस प्रकार उनसे पराजित हुए राजा सुरथ हताश होकर अपने दुर्गवेष्टित सुरक्षित नगरमें आ गये॥ १०-११॥ | | चिन्तयामास मेधावी राजा नीतिविचक्षणः।<br>प्रधानान्विमना दृष्ट्वा शत्रुपक्षसमाश्रितान्॥ १२<br>स्थानं गृहीत्वा विपुलं परिखादुर्गमण्डितम्।<br>कालप्रतीक्षा कर्तव्या किं वा युद्धं वरं मतम्॥ १३<br>मन्त्रिणः शत्रुवशगा मन्त्रयोग्या न ते किल।<br>किं करोमीति मनसा भूपतिः समचिन्तयत्॥ १४<br>कदाचित्ते गृहीत्वा मां पापाचाराः पराश्रिताः।<br>शत्रुभ्योऽथ प्रदास्यन्ति तदा किं वा भविष्यति॥ १५<br>पापबुद्धिषु विश्वासो न कर्तव्यः कदाचन।<br>किन्न ते वै प्रकुर्वन्ति ये लोभवशगा नराः॥ १६<br>भ्रातरं पितरं मित्रं सुहृदं बान्धवं तथा। | पश्चात् प्रतिभासम्पन्न तथा नीतिविशारद राजा सुरथ अपने मन्त्रियोंको शत्रुपक्षके अधीन देखकर अत्यन्त खिन्नमनस्क होकर विचार करने लगे कि मैं खाई तथा किलेसे सुरक्षित किसी बड़े स्थानपर रहकर समयकी प्रतीक्षा करूँ अथवा मेरे लिये युद्ध करना उचित होगा। मेरे मन्त्री शत्रुके वशीभूत हो गये हैं, इसलिये वे अब परामर्श करनेयोग्य नहीं रह गये हैं, तो अब मैं क्या करूँ? वे राजा सुरथ पुनः मन-ही-मन विचार करने लगे। कदाचित् वे पापी तथा शत्रुके साथ मिले हुए मन्त्री मुझे पकड़कर शत्रुओंको सौंप देंगे, तब क्या होगा? पापबुद्धि पुरुषोंपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जो मनुष्य लोभके वशीभूत होते हैं वे क्या-क्या नहीं कर बैठते? लोभपरायण मनुष्य अपने भाई, पिता, मित्र, सुहृद्, |
अ० ३२] पञ्चम स्कन्ध ७०५
अ० ३२] पञ्चम स्कन्ध ७०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गुरुं पूज्यं द्विजं द्वेष्टि लोभाविष्टः सदा नरः ॥ १७<br>तस्मान्मया न कर्तव्यो विश्वासः सर्वथाधुना ।<br>मन्त्रिवर्गेऽतिपापिष्ठे शत्रुपक्षसमाश्रिते ॥ १८ | बन्धु-बान्धव, पूजनीय गुरु तथा ब्राह्मणसे भी सदा द्वेष करता है। अतएव इस समय शत्रुपक्षके आश्रयको प्राप्त अत्यन्त पापपरायण अपने मन्त्रिसमुदायपर मुझे बिलकुल विश्वास नहीं करना चाहिये॥ १२—१८॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा परमदुर्मनाः ।<br>एकाकी हयमारुह्य निर्जगाम पुरान्नतः ॥ १९ | इस प्रकार अपने मनमें भलीभाँति विचार करके अत्यन्त दुःखीचित्त राजा सुरथ घोड़ेपर आरूढ होकर अकेले ही उस नगरसे निकल पड़े॥ १९॥ |
| असहायोऽथ निर्गत्य गहनं वनमाश्रितः ।<br>चिन्तयामास मेधावी क्व गन्तव्यं मया पुनः ॥ २० | वे बिना किसी सहायकको साथ लिये ही नगरसे बाहर निकलकर एक घने जंगलमें चले गये। प्रतिभासम्पन्न राजा सुरथ सोचने लगे कि अब मुझे कहाँ चलना चाहिये ? ॥ २०॥ |
| योजनत्रयमात्रे तु मुनेराश्रममुत्तमम् ।<br>ज्ञात्वा जगाम भूपालस्तापसस्य सुमेधसः ॥ २१ | तपस्वी सुमेधाका पवित्र आश्रम यहाँसे मात्र तीन योजनकी दूरीपर है—यह जानकर राजा सुरथ वहाँ चले गये॥ २१॥ |
| बहुवृक्षसमायुक्तं नदीपुलिनसंश्रितम् ।<br>निर्वैरश्वापदाकीर्णं कोकिलारावमण्डितम् ॥ २२<br>शिष्याध्ययनशब्दाढ्यं मृगयूथशतावृत्तम् ।<br>नीवारान्नसुपक्वाढ्यं सुपुष्पफलपादपम् ॥ २३<br>होमधूमसुगन्धेन प्रीतिदं प्राणिनां सदा ।<br>वेदध्वनिसमाक्रान्तं स्वर्गादपि मनोहरम् ॥ २४<br>दृष्ट्वा तमाश्रमं राजा बभूवासौ मुदान्वितः ।<br>भयं त्यक्त्वा मतिं चक्रे विश्रामाय द्विजाश्रमे ॥ २५ | बहुत प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, नदीके तटपर विराजमान, वैरभावसे रहित होकर विचरण करनेवाले पशुओंसे समन्वित, कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे मण्डित, अध्ययनरत शिष्योंके स्वरसे निनादित, सैकड़ों मृगसमूहोंसे घिरे हुए, भलीभाँति पके हुए नीवारान्नसे परिपूर्ण, सुन्दर फल-फूलसे लदे हुए पादपोंसे सुशोभित, होमके सुगन्धित धूमसे प्राणियोंको सदा आनन्दित करनेवाले, निरन्तर वेदध्वनिसे परिव्याप्त तथा स्वर्गसे भी मनोहर उस आश्रमको देखकर वे राजा अत्यन्त आनन्दित हुए और उन्होंने भय त्यागकर मुनिके आश्रममें विश्राम करनेका निश्चय कर लिया॥ २२—२५॥ |
| आसज्य पादपेऽश्वं तु जगाम विनयान्वितः ।<br>दृष्ट्वा तं मुनिमासीनं सालच्छायासु संश्रितम् ॥ २६<br>मृगाजिनासनं शान्तं तपसातिकृशं ऋजुम् ।<br>अध्यापयन्तं शिष्यांश्च वेदशास्त्रार्थदर्शिनम् ॥ २७<br>रहितं क्रोधलोभाद्यैर्द्वन्द्वातीतं विमत्सरम् ।<br>आत्मज्ञानरतं सत्यवादिनं शमसंयुतम् ॥ २८<br>तं वीक्ष्य भूपतिर्भूमौ पपात दण्डवत्तदा ।<br>तदग्रेऽश्रुजलापूर्णनयनः प्रेमसंयुतः ॥ २९ | तत्पश्चात् अपने घोड़ेको एक वृक्षमें बाँधकर उन्होंने विनम्रतापूर्वक आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने देखा कि मुनि एक सालवृक्षकी छायामें मृगचर्मके आसनपर बैठे हुए हैं, उनकी आकृति शान्त है, तपस्या करनेके कारण उनका शरीर क्षीण हो गया है, उनका स्वभाव अति कोमल है, वे शिष्योंको पढ़ा रहे हैं, वे वेद-शास्त्रोंके तत्त्वदर्शी विद्वान् हैं, क्रोध-लोभ आदि विकारोंसे मुक्त हैं, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे परे हैं, ईर्ष्यारहित हैं, आत्मज्ञानके चिन्तनमें संलग्न हैं, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय हैं। उन्हें देखकर अश्रुपूरित नयनोंवाले राजा सुरथ प्रेमपूर्वक उनके आगे दण्डकी भाँति भूतलपर गिर पड़े॥ २६—२९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 A
७०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३२
| उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तमुवाच तदा मुनिः।<br>शिष्यो ददौ बृसीं तस्मै गुरुणा नोदितस्तदा॥ ३० | तब मुनिने उनसे कहा—उठिये-उठिये, आपका कल्याण हो। तत्पश्चात् गुरुसे आदेश पाकर एक शिष्यने उन्हें आसन प्रदान किया॥ ३०॥ |
|---|---|
| उत्थाय नृपतिस्तस्यां समासीनस्तदाज्ञया।<br>अर्घ्यपाद्यार्हणं चक्रे सुमेधा विधिपूर्वकम्॥ ३१<br><br>पप्रच्छात्र कुतः प्राप्तः कस्त्वं चिन्तापरः कथम्।<br>कथयस्व यथाकामं संवृतं कारणं त्विह॥ ३२<br><br>किमागमनकृत्यं ते ब्रूहि कार्यं मनोगतम्।<br>करिष्ये वाञ्छितं काममसाध्यमपि यत्तव॥ ३३ | तब वे उठकर मुनिसे आज्ञा लेकर उस आसनपर बैठ गये। इसके बाद सुमेधाऋषिने अर्घ्य-पाद्य आदिसे उनका विधिपूर्वक सत्कार किया। मुनिने उनसे पूछा कि आप यहाँ कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं तथा चिन्तित क्यों हैं? यहाँ आनेका जो भी कारण हो, उसे आप यथारुचि बतायें। आपके आगमनका प्रयोजन क्या है? आप अपने मनके विचारोंको अवश्य बताइये। आपका कोई असाध्य मनोरथ होगा तो उसे भी मैं पूर्ण करूँगा॥ ३१–३३॥ |
| राजोवाच<br>सुरथो नाम राजाहं शत्रुभिश्च पराजितः।<br>त्यक्त्वा राज्यं गृहं भार्यामहं ते शरणं गतः॥ ३४<br><br>यदाज्ञापयसे ब्रह्मंस्तदहं भक्तितत्परः।<br>करिष्यामि न मे त्राता त्वदन्यः पृथिवीतले॥ ३५<br><br>शत्रुभ्यो मे भयं घोरं प्राप्तोऽस्म्यद्य तवान्तिकम्।<br>त्रायस्व मुनिशार्दूल शरणागतवत्सल॥ ३६ | राजा बोले—मैं सुरथ नामवाला राजा हूँ। शत्रुओंसे पराजित होकर मैं राज्य, महल तथा स्त्री—सब कुछ छोड़कर आपकी शरणमें आया हूँ॥ ३४॥<br><br>हे ब्रह्मन्! अब आप मुझे जो भी आज्ञा देंगे, मैं श्रद्धापूर्वक वही करूँगा। इस पृथ्वीतलपर आपके अतिरिक्त अब कोई दूसरा मेरा रक्षक नहीं है॥ ३५॥<br><br>हे मुनिराज! हे शरणागतवत्सल! शत्रुओंसे मुझे महान् भय उपस्थित है, अतएव मैं आपके पास आया हूँ; अब आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ३६॥ |
| ऋषिरुवाच<br>निर्भयं वस राजेन्द्र नात्र ते शत्रवः किल।<br>आगमिष्यन्ति बलिनो निश्चयं तपसो बलात्॥ ३७<br><br>नात्र हिंसा प्रकर्तव्या वनवृत्त्या नृपोत्तम।<br>कर्तव्यं जीवनं शस्तैर्नीवारफलमूलकैः॥ ३८ | ऋषि बोले—हे राजेन्द्र! आप निर्भीक होकर यहाँ रहिये। यह निश्चित है कि मेरी तपस्याके प्रभावसे आपके पराक्रमी शत्रु यहाँ नहीं आ सकेंगे॥ ३७॥<br><br>हे नृपश्रेष्ठ! यहाँपर आपको हिंसा नहीं करनी चाहिये और वनवासियोंकी भाँति पवित्र नीवार तथा फल-मूल आदिके द्वारा जीवन-निर्वाह करना चाहिये॥ ३८॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा निर्भयः स नृपस्तदा।<br>उवासाश्रम एवासौ फलमूलाशनः शुचिः॥ ३९<br><br>कदाचित्स नृपस्तत्र वृक्षच्छायां समाश्रितः।<br>चिन्तयामास चिन्तार्तो गृह एव गताशयः॥ ४०<br><br>राज्यं मे शत्रुभिः प्राप्तं म्लेच्छैः पापरतैः सदा।<br>सम्पीडिताः स्युर्लोकास्तैर्दुराचारैर्गतत्रपैः॥ ४१ | व्यासजी बोले—तब मुनिकी यह बात सुनकर राजा सुरथ निर्भय हो गये। अब वे फल-मूलका आहार करते हुए पवित्रताके साथ उस आश्रममें ही रहने लगे॥ ३९॥<br><br>किसी समय उस आश्रममें एक वृक्षकी छायामें बैठे हुए चिन्ताकुल राजा सुरथका चित्त घरकी ओर चला गया और वे सोचने लगे—॥४०॥<br><br>निरन्तर पापकर्ममें लगे रहनेवाले म्लेच्छ शत्रुओंने मेरा राज्य छीन लिया है। उन दुराचारी तथा निर्लज्ज म्लेच्छोंके द्वारा मेरी प्रजा बहुत सतायी जाती होगी॥ ४१॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 B
| अ० ३२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७०७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गजाश्च तुरगाः सर्वे दुर्बला भक्ष्यवर्जिताः।<br>जाताः स्युर्र्नात्र सन्देहः शत्रुणा परिपीडिताः॥ ४२ | मेरे सभी हाथी तथा घोड़े आहार न पाने तथा शत्रुसे प्रताड़ित किये जानेके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गये होंगे; इसमें तो कोई सन्देह नहीं है॥ ४२॥ |
| सेवका मम सर्वे ते शत्रूणां वशवर्तिनः।<br>दुःखिता एव जाताः स्युः पालिता ये मया पुरा॥ ४३ | अपने जिन सेवकोंका मैंने पहले पालन-पोषण किया था, वे सब शत्रुओंके अधीन हो जानेके कारण कष्टका अनुभव करते होंगे॥ ४३॥ |
| धनं मे सुदुराचारैरसद्व्ययपरैः परैः।<br>द्यूतासवभुजिष्यादिस्थाने स्यात्प्रापितं किल॥ ४४ | उन अति दुराचारी तथा अपव्यय करनेके स्वभाववाले शत्रुओंने मेरा धन द्यूत, मदिरालय एवं वेश्यालयोंमें निश्चित-रूपसे खर्च कर दिया होगा॥ ४४॥ |
| कोशक्षयं करिष्यन्ति व्यसनैः पापबुद्धयः।<br>न पात्रदाननिपुणा म्लेच्छास्ते मन्त्रिणोऽपि मे॥ ४५ | वे पापबुद्धि मेरा समस्त राजकोष व्यसनोंमें नष्ट कर डालेंगे, सत्पात्रोंको दान देनेकी योग्यता भी उन म्लेच्छोंमें नहीं है और मेरे मन्त्री भी अधीनतामें रहनेके कारण उन्हींके जैसे हो गये होंगे॥ ४५॥ |
| इति चिन्तापरो राजा वृक्षमूलस्थितो यदा।<br>तदाजगाम वैश्यस्तु कश्चिदार्तिपरस्तथा॥ ४६ | महाराज सुरथ वृक्षके नीचे बैठकर इसी चिन्तामें पड़े हुए थे कि उसी समय एक विषादग्रस्त वैश्य वहाँ आ पहुँचा॥ ४६॥ |
| नृपेण पुरतो दृष्टः पार्श्वे तत्रोपवेशितः।<br>पप्रच्छ तं नृपः कोऽसि कुत एवागतो वनम्॥ ४७<br><br>कोऽसि कस्माच्च दीनोऽसि हरिणः शोकपीडितः।<br>ब्रूहि सत्यं महाभाग मैत्री साप्तपदी मता॥ ४८ | राजाने उस वैश्यको सामने देख लिया। उन्होंने उसे अपने समीपमें बैठा लिया और पुनः उससे पूछा—आप कौन हैं तथा इस वनमें कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं, आप उदास क्यों हैं? चिन्ताग्रस्त रहनेके कारण आप तो पीले वर्णके हो गये हैं? हे महाभाग! सात पग एक साथ चलनेपर ही मैत्री समझ ली जाती है, अतः आप मुझे सब कुछ सच-सच बता दीजिये॥ ४७-४८॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञस्तमुवाच विशोत्तमः।<br>उपविश्य स्थिरो भूत्वा मत्वा साधुसमागमम्॥ ४९ | व्यासजी बोले—राजाका वचन सुनकर वह वैश्यश्रेष्ठ उनके पास बैठ गया और इसे सज्जनसमागम समझकर शान्तचित्त होकर उनसे कहने लगा॥ ४९॥ |
| वैश्य उवाच<br>मित्राहं वैश्यजातीयः समाधिर्नाम विश्रुतः।<br>धनवान्धर्मनिपुणः सत्यवागनसूयकः॥ ५०<br><br>पुत्रदारैर्निरस्तोऽहं धनलुब्धैरर्साधुभिः।<br>(कृपणेति मिषं कृत्वा त्यक्त्वा मायां सुदुस्त्यजाम्।)<br>स्वजनेन च संत्यक्तः प्राप्तोऽस्मि वनमाशु वै॥ ५१<br>कोऽसि त्वं भाग्यवान्भासि कथयस्व प्रियाधुना। | वैश्य बोला—हे मित्र! मैं वैश्यजातिमें उत्पन्न हूँ और समाधि नामसे प्रसिद्ध हूँ। मैं धनवान्, धर्मकार्योंमें निपुण, सत्यवादी और ईर्ष्यासे रहित हूँ, फिर भी धनके लोभी और कुटिल स्त्री-पुत्रोंने मुझे घरसे निकाल दिया (उन्होंने मुझे कृपण कहकर कठिनाईसे टूटनेवाला माया-बन्धन भी तोड़ दिया), अतः अपने कुटुम्बियोंसे परित्यक्त होकर मैं अभी-अभी इस वनमें आया हूँ। हे प्रिय! आप कौन हैं? मुझे बतायें; आप भाग्यवान् प्रतीत होते हैं॥ ५०-५१ १/२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 C