श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
नौवाँ अध्याय
२८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 नौवाँ अध्याय हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्वोंका कश्यपमुनिके आश्रममें आना, गन्धर्वोंद्वारा पंच- देवोंका पूजन, बालक गणेशद्वारा लीलापूर्वक पंचदेवोंकी मूर्तियोंको अदृश्य कर देना, माताको अपने मुखमें समस्त ब्रह्माण्डको प्रतिष्ठित दिखाना तथा गन्धर्वोंको विश्वात्मारूप दिखाकर उनके भ्रमको निवारित करना, गन्धर्वोंद्वारा गणेश-स्तवन ब्रह्माजी बोले- हे मुने ! मैं बालरूपधारी गणेशजीके | हैं, अतः हम लोग जाते हैं, हमें आज्ञा प्रदान कीजिये।' अन्य चरितका भी वर्णन आपसे करता हूँ, जो समस्त | उनके वचनोंको सुनकर तपोनिधि कश्यपजी पुनः बोले- पापोंका नाशक है। उसे आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ १ ॥ | आप लोग भोजन करनेके अनन्तर थोड़ी देर विश्राम एक बारकी बात है, हाहा, हूहू तथा तुम्बुरु नामक | करके ही यहाँसे जायँ, बिना भोजन लिये यहाँसे कोई गन्धर्व कैलास जानेकी इच्छासे महर्षि कश्यपजीके | नहीं गया है। तदनन्तर महर्षिने स्नान आदिके लिये जल आश्रममें पहुँचे। वे गन्धर्व वीणाको हाथमें लेकर वीणा | प्रदान किया और उनके लिये भोजनका निर्माण बजाते हुए गान कर रहे थे, वे भगवान् विष्णुकी भक्तिमें | करवाया ॥ ९-१० ॥ निरत रहनेवाले थे। शंख, चक्र, गदा, पद्म एवं | तदनन्तर मननशीलोंमें श्रेष्ठ वे हाहा-हूहू आदि तुलसीकी मालासे सुशोभित थे। उनके शरीरके अंगोंमें | गन्धर्व स्नानके पश्चात् देवताओंकी पूजा करने लगे ॥ ११ ॥ गोपीचन्दनका अनुलेपन लगा हुआ था, उन्होंने पीताम्बर | वे देवी पार्वती, शिव, विष्णु, गणेश तथा धारण कर रखा था और वे अत्यन्त मनोहर थे। महर्षि | सूर्यनारायणकी पूजा करके मुहूर्तभरके लिये ध्यानमें कश्यपजीने उनका बहुत आदर-मान किया और यथाविधि | स्थित हो गये। उसी समय बालकोंके साथ बाहर उनकी पूजा की ॥ २-४ ॥ | खेलनेके अनन्तर बालक विनायक जब घरके अन्दर उन्हें प्रणाम करके कश्यपजी बोले- 'मेरे किसी | आये तो वहाँ उन्होंने पंचदेवोंकी उन मूर्तियोंका दर्शन पुण्यके प्रभावसे ही धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष- इस | किया। उन्होंने शीघ्र ही मूर्तियोंको उठाकर बाहर फेंक चतुर्विध पुरुषार्थको प्रदान करनेवाले आप-जैसे महापुरुषोंका | दिया और वे स्वयं अग्निगृह (यज्ञशाला)-में चले दर्शन मुझे हुआ है। आज मेरा तप धन्य हो गया, मेरा | गये ॥ १२-१३ ॥ जन्म लेना सफल हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, | तदनन्तर वे अपने सारे शरीरमें भस्म लगाकर मेरा ज्ञान धन्य हो गया और यह मेरा आश्रम धन्य हो | अन्तर्धान हो गये। जब उन गन्धर्वोंका ध्यान टूटा तो गया। आपके यहाँ आगमनका उद्देश्य मैं नहीं जानता हूँ, | उन्होंने सामने रखी हुई मूर्तियोंको नहीं देखा ॥ १४ ॥ उसे आप बतायें' ॥ ५-६ ॥ | उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और वे सभी आपसमें ही इस प्रकारसे पूछे गये वे गन्धर्व उनके वचनको | कहने लगे, किस दैत्यने कर्मकी हेतुभूता हमारी इन सुनकर उनसे बोले- 'हम लोग कैलास-दर्शनकी इच्छासे | मूर्तियोंको चुराया है ॥ १५ ॥ आये हैं और इसीमें हमें आपका दर्शन हो गया ॥ ७ ॥ | क्या कोई गन्धर्व, राक्षस या यक्ष इन मूर्तियोंको आज हमारा पाप नष्ट हो गया और हमारा जन्म | चुराने आये अथवा क्या हमारे सत्त्वकी परीक्षा लेनेके लेना सफल हो गया। हमें लगता है कि अब परम सिद्धि | लिये ये मूर्तियाँ स्वतः ही अन्तर्धान हो गयीं ! ॥ १६ ॥ हमसे दूर नहीं है, हमें परम विश्रान्ति प्राप्त हुई है ॥ ८ ॥ | तदनन्तर वे महान् क्रोध करते हुए मुनि कश्यपके हम लोग भगवान् शंकरका दर्शन करनेको उत्सुक | पास पूछनेके लिये आये और बोले- 'आपके घरमें जब
क्री०ख०-अ०९ ] * हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्वोंका कश्यपमुनिके आश्रममें आना * २८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 [बायाँ स्तम्भ] हम लोग ध्यानपरायण थे, उसी बीच कैसे सब मूर्तियाँ गायब हो गयीं ? जन्मजात वैर रखनेवाले प्राणी भी जब आपके आश्रममें परस्परके वैरका त्यागकर क्रीड़ा करते हैं, देवता भी जब आपसे भयभीत रहते हैं, तब इस आश्रममें लुटेरे कैसे आ गये ?' ॥ १७-१८ ॥ उनका वह वचन सुनकर मुनि कश्यप अत्यन्त रुष्ट हो गये। उन्होंने यह जान लिया कि मूर्ति प्राप्त किये बिना ये भोजन नहीं करेंगे ॥ १९ ॥ तब मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने अपने शिष्योंको बुलाकर उनसे कहा कि 'मेरे जन्मसे लेकर आजतक इस आश्रममें कोई चोर-लुटेरा नहीं आया, दैववश कौन यहाँ दस्यु बन गया, इस विषयमें तुम लोग बतलाओ?' महर्षि कश्यपके इस क्रुद्ध वचनको सुनकर वे शिष्य अपने गुरुसे कहने लगे— ॥ २०-२१ ॥ हे स्वामिन् ! हम लोग चोर नहीं हैं, आप अपने पुत्रके विषयमें तो जानते ही हैं, दोषोंको गिनानेमें हम लोगोंको पाप लगेगा, अतः वह सब हम नहीं बतायेंगे। उनकी बात सुनकर मुनि कश्यपजीने हाथमें छड़ी ले ली और वे पुत्रको खोजते हुए निकल पड़े तो अग्निशालामें उन्होंने उसको देखा ॥ २२-२३ ॥ वे बालक गणेशको उन गन्धर्वोंके पास ले आये, उन लोगोंने उसे शिवके समान देखा। क्रोधसे मूर्च्छित कश्यपजीने उन्हींके सामने विनायकसे कहा— ॥ २४ ॥ अरे वत्स ! तुम शीघ्र ही मूर्तियोंको ले आओ, नहीं तो तुम आज मेरे हाथों मरोगे। तब निडर गणेशजी बोले—'हे तात ! मूर्तियोंको मैंने नहीं लिया है। आप जो-जो भी शपथ लेनेको कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा।' ऐसा कहते हुए पिताके भयसे भयभीत वे बालक गणेश अत्यधिक रुदन करने लगे ॥ २५-२६ ॥ अत्यन्त विह्वल होकर वे अपने मुखको फैलाकर भूमिपर गिर पड़े। उसी समय माता अदिति भी वहाँ आ पहुँचीं, तब बालकने उनसे कहा— ॥ २७॥ 'यदि मैंने देवताओंकी मूर्तियोंको खा लिया है, तो मेरे मुखमें देखो', फिर जब उसने मुख खोला तो माताने मुखके अन्दर समस्त विश्वको स्थित देखा ॥ २८ ॥ [दायाँ स्तम्भ] वे आश्चर्यचकित होकर भयसे अत्यन्त विह्वल हो मूर्च्छित हो गयीं और भूमिपर गिर पड़ीं। इसके अनन्तर मुखके अन्दर उन हाहा-हूहू आदि गन्धर्वों तथा मुनि कश्यपने कैलासपर्वत, सपरिकर भगवान् शंकर, वैकुण्ठ, विष्णु भगवान्, ब्रह्मा, सत्यलोक, इन्द्र तथा उनकी पुरी अमरावती, पर्वत एवं वनोंसे समन्वित पृथ्वी और उसमें रहनेवाले लोगों, नदियों, सागरों, यक्षों, राक्षसों, पन्नगों, वृक्षों, पक्षिगणों, चौदह भुवनों, इन्द्रादि देवताओं, [स्वर्गादि] समस्त लोकों, समस्त पातालों तथा दसों दिशाओंको देखा ॥ २९–३२ ॥ जब माताको चैतन्य हुआ, तो उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। उन विश्वात्माका इस प्रकार दर्शनकर मुनि कश्यपने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने मनमें यह निश्चय किया कि जिन साक्षात् परमात्माने मेरे घरमें अवतार लिया है, उन्हींको मैं प्रताड़ित करने जा रहा था ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर कश्यपमुनिने उन गन्धर्वोंसे कहा कि 'आप लोग भोजन कर लें। इस महाबली बालकको ताड़ित करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ३५ ॥ समष्टि तथा व्यष्टिरूप धारण करनेवाले इस बालकको आपलोग अपना उग्ररूप दिखाकर भयभीत करें। यदि आप लोगोंमें शक्ति है तो मूर्तियोंको प्राप्त करनेके लिये इसे ताड़ित करें' ॥ ३६ ॥ वे कहने लगे कि हम लोग आपके घरमें बिना पंचायतन देवोंकी मूर्तियोंको प्राप्त किये अन्न अथवा कन्दमूल—कुछ भी भक्षण नहीं करेंगे ॥ ३७ ॥ तदनन्तर इस प्रकार कहनेवाले उन गन्धर्वोंने बालकको पाँच रूपोंमें देखा। उस एक ही बालकको दुर्गा, विष्णु, सूर्य, शिव तथा गणेश—इस प्रकारसे पाँच रूपोंवाला देखा। तब स्वस्थमन होकर उन गन्धर्वोंने उन बालरूप गणेशको प्रणाम किया, उनकी पूजा की और वे उनकी स्तुति करने लगे। क्षणभरमें वे उसे बालकरूपमें देखते थे और दूसरे ही क्षण वे उन्हें पाँच रूपोंवाले दिखायी देते थे ॥ ३८-३९ ॥ फिर अगले ही क्षण वे महान् भयकारी रूप धारण
२९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] कर लेते थे और कभी समस्त विश्व-ब्रह्माण्डको अपनेमें समेटे हुए दिखायी देते थे। तब उन्हें ही उन्होंने षड्रससम्पन्न नैवेद्यान्नका भोग लगाकर स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद वे उस विश्वरूपधारी बालक गणेशकी भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे ॥ ४० ॥ तीनों गन्धर्व बोले—हे विभो ! विविध प्रकारके स्वरूप धारण करनेवाले, रूपहीन, अद्वितीय एवं सगुण स्वरूप धारण करनेवाले आपकी भक्ति न करनेके कारण ही यह सम्पूर्ण जीव-जगत् अज्ञानसे मोहित होकर संसार-चक्रमें भ्रमण कर रहा है। नाना प्रकारकी भेद- बुद्धिसे ग्रस्त होकर आपके स्वरूपसे विमुख हुआ यह विविध प्रकारसे भ्रमित हो रहा है और अपने द्वारा किये गये विविध प्रकारके कर्मोंके अंकुरोंसे भ्रंशित और नाना प्रकारके पाशोंमें जकड़ा हुआ है ॥ ४१ ॥ दूसरे जो भक्तजन कर्मफलकी उपेक्षा करके आपके चरणारविन्दोंकी सेवामें परायण हैं, अपनी आत्माको ही दूसरेके शरीरमें प्रतिष्ठित देखनेवाले हैं, निरन्तर परमात्माके ध्यानमें परायण हैं, निर्मल अन्तःकरणवाले हैं, वे ज्ञानसे समस्त पापोंका प्रक्षालन करके, सभी कर्मांकुरोंको दग्ध करके आपमें उसी प्रकार सत्वर प्रवेश करते हैं, जिस प्रकार कि मेघोंके जलसे व्याप्त सभी नदियाँ समुद्रमें प्रविष्ट होती हैं ॥ ४२ ॥ और कुछ लोग जो आपकी भक्तिमें परायण चित्तवाले
[दायाँ स्तम्भ] हैं, वे जब बहुत-सी सिद्धियोंको प्राप्त कर लेते हैं तो उन्हींमें आसक्त मनवाले होकर आपके चरणारविन्दको भूल जाते हैं, वे तो बड़े कष्टसे उत्तम पदको प्राप्त करके भी अज्ञानवश [तत्त्वको] न जाननेके कारण अपने वास्तविक पदसे उसी प्रकार पतनको प्राप्त होते हैं, जैसे कि व्यक्ति दुर्लभ अमृतको छोड़कर विषका पान करता है ॥ ४३ ॥ अतएव हमारा जन्म चाहे किसी शुभ योनिमें हो अथवा किसी अशुभ योनिमें, हमें आपकी स्मृति निरन्तर बनी रहे और समस्त दुःखोंका उच्छेद करनेवाली आपकी मंगलमयी भक्ति सदा बनी रहे। यदि ऐसा हो जाय तो संसार-समुद्रमें भ्रमण करते हुए हम लोगोंका उद्धार आपकी कृपादृष्टिसे कभी-न-कभी हो ही जायगा। हे सर्वात्मन् ! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे योगेश्वर ! आपके अवतार क्यों होते हैं, कितने होते हैं तथा कब होते हैं, इन्हें जाननेमें कोई भी समर्थ नहीं है। हे मायापति ! हे गुणेश्वर ! हे भूमन् ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे भगवन् ! आपको नमस्कार है ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर वे हाहा-हूहू आदि गन्धर्व पंचदेवोंकी पूजा करके तथा उस बालक महोत्कट गणेशकी चेष्टाओंके प्रति विस्मित होते हुए भगवान् शिवके निवास-स्थान कैलासकी ओर चले गये ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'हाहा आदि गन्धर्वोंके द्वारा की गयी गजानन-स्तुतिका वर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय बालक गणेशद्वारा विघातादि राक्षसोंका उद्धार, बालक गणेशके यज्ञोपवीत-संस्कारका वर्णन, विविध देवोंद्वारा उन्हें अनेक नाम तथा विविध उपहार प्रदान करना
[बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर धीमान् महर्षि कश्यपजीने उस बालक गणेशके पाँचवें वर्षमें अपने गृह्यसूत्रमें बतायी गयी विधिके अनुसार शुभ मुहूर्त तथा शुभ लग्नमें वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा उसका चूड़ाकरणसहित मंगलमय व्रतबन्ध-संस्कार कराया। महर्षि कश्यपजीके शिष्योंद्वारा आमन्त्रित किये गये
[दायाँ स्तम्भ] देवता, दानव, राक्षस, मुनिगण, यक्ष, नाग और अनेक राजर्षि तथा वैश्य एवं शूद्रगण नाना प्रकारके उपहारोंको हाथमें लेकर वहाँ आये ॥ १-३ ॥ उस समय मनुष्यों तथा देवताओंने विविध प्रकारके वाद्योंको बजाया। महर्षि कश्यपने गणेश-पूजन किया तथा स्वस्तिवाचन, मण्डप-स्थापन, मातृकापूजन एवं
क्री०ख०-अ० १० ] * बालक गणेशद्वारा विघातादि राक्षसोंका उद्धार * २९१ आभ्युदयिक श्राद्ध किया और ब्राह्मणोंकी पूजा की। मित्र- गणोंको यथायोग्य वस्त्रदान किया। अन्य जनोंको भी वस्त्र दिये। उन सभीने भी उन वस्त्रोंको पहन लिया ॥ ४-६ ॥ कश्यपजीने हवन सम्पन्न हो जानेपर पुनः ब्राह्मणोंकी पूजा की। तदनन्तर शीघ्र ही वेदिकामें अन्तःपट लगाकर वेदीमें अग्निकी स्थापना की गयी और बालकको वहाँ लाया गया। सुवासिनी स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंने उसके ऊपर अक्षतोंको बिखेरा ॥ ७-८ ॥ उन ब्राह्मणोंके मध्यमें ब्राह्मणोंका रूप धारणकर पाँच अत्यन्त दुष्ट राक्षस भी बैठे थे। उनके नाम थे- विघात, पिंगाक्ष, विशाल, पिंगल तथा चपल। वे बड़ा- बड़ा तिलक लगाये थे, अक्षमालासे सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने अपने-अपने हाथमें जलपात्र धारण किया हुआ था, वे अत्यन्त रमणीय वस्त्रों तथा आभूषणोंको धारण किये हुए थे ॥ ९-१० ॥ उन दुष्टोंने उस बालक गणेशके प्राणोंका हरण करनेकी इच्छासे उसपर अस्त्रोंसे आघात किया। उनके अस्त्रोंसे उस कुमारका शरीर छिन्न-भिन्न हो गया ॥ ११ ॥ कुमार महोत्कटने उन्हें दुष्ट जानकर अक्षतोंको मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित किया और उन पाँचों राक्षसोंपर पाँच अक्षत फेंके ॥ १२ ॥ [जिससे] उसी समय उनके प्राण निकल गये और वे अपने विकराल रूप धारणकर दस योजन विस्तारवाले हो गये एवं छिन्न-भिन्न होकर भूमिपर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे कि इन्द्रके द्वारा किये गये प्रहारसे पर्वत गिर पड़े हों। उस समय भारी कोलाहल मच गया और दसों दिशाएँ धूलसे आच्छादित हो गयीं ॥ १३-१४ ॥ वहाँ एकत्रित लोग कहने लगे- 'छद्म रूप धारण करनेवाले इन पाँच राक्षसोंको उस बालकने क्षणभरमें कैसे मार डाला ? हम सब इस बालकको नहीं जानते हैं। क्या साक्षात् परमेश्वरने ही इस पृथ्वीके भारको दूर करनेके लिये स्वयं अवतार धारण किया है ?' इस प्रकारका वार्तालाप हो ही रहा था, कि उसी समय अपने-अपने विमानोंमें बैठे हुए ब्रह्मा आदि देवताओँने उस आदरणीय बालकपर पुष्पोंकी वृष्टि की ॥ १५-१६१/२ ॥ उन प्रेतों (शवों)-के वहाँसे ले जाये जानेके अनन्तर ब्राह्मणों तथा मुनि कश्यपने उस उपनीत बालक गणेशको अपनी शाखामें कहे गये मन्त्रोंके द्वारा वस्त्र, मेखला, यज्ञोपवीत, मृगचर्म तथा दण्ड धारण कराया ॥ १७-१८ ॥ इसके अनन्तर महर्षि कश्यपने उसकी अंजलिमें जल भरकर उसे भगवान् सूर्यके मण्डलका दर्शन कराया और हवन समाप्त करनेके पश्चात् उसे गायत्री मन्त्रका उपदेश दिया ॥ १९ ॥ पहले गायत्री मन्त्रके एक पादका, तदनन्तर प्रथम पाद एवं द्वितीय पादका और फिर सम्पूर्ण मन्त्रका उपदेश दिया। सर्वप्रथम माताने उसे भिक्षा प्रदान की। तदनन्तर वहाँ आये हुए संख्यातीत लोगोंने उसे भिक्षा दी ॥ २० ॥ तदनन्तर बटुक गणेशको महर्षि कश्यपने शौचाचार- सम्बन्धी अनेक नियमोंका उपदेशकर पुनः ब्राह्मणोंकी पूजा की और उन्हें वस्त्र, सुवर्ण तथा गौएँ प्रदान कीं। बालकके महान् अरिष्ट कट जानेपर महर्षि कश्यपने ब्राह्मणोंको यह सब दान अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक दिया था। तदनन्तर मुनि वसिष्ठजी उस बटुकको सभाके मध्यमें स्थित ब्रह्माजीके पास ले गये ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजीके कमण्डलुमें स्थित पवित्र जलको बालकने ग्रहण किया। तब ब्रह्माजीने अपने हाथमें स्थित तथा सदा ही खिले रहनेवाले कमलको उसे प्रदान किया ॥ २३ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने उस बालक गणेशका 'ब्रह्मणस्पति' यह नाम रखा। बृहस्पतिजीने बालक गणेशकी पूजाकर उसका 'भारभूति' यह नाम रखा ॥ २४ ॥ कुबेरने अपने कण्ठमें स्थित रहनेवाली रत्नोंकी माला उसे प्रदान की। तदनन्तर उसका पूजनकर कुबेरने बालकका 'सुरानन्द' यह नाम रखा ॥ २५ ॥ जलाधिपति वरुणने सभी देवताओंके सुनते हुए 'सर्वप्रिय' यह नाम रखकर उसे अपना 'पाश' प्रदान किया। भगवान् शंकरने अपना त्रिशूल और डमरु उसे प्रदानकर 'विरूपाक्ष' यह नाम उसका रखा। साथ ही उन्होंने उसे चन्द्रमाकी कला प्रदानकर 'भालचन्द्र' यह नाम भी रखा ॥ २६-२७ ॥ त्रैलोक्यजननी भगवती शिवाने उसे प्रसन्नतापूर्वक
२९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ‘परशु’ नामक अस्त्र प्रदान किया और ‘परशुहस्त’ | पूजा नहीं की और न कोई मंगलमय श्रेष्ठ उपहार ही यह सुन्दर नाम रखा तथा पुनः उसकी पूजा करके | प्रदान किया ॥ ३३-३४॥ अपना श्रेष्ठ वाहन ‘सिंह’ उसे प्रदान किया और | इन्द्र सोचते थे, मैं तीनों लोकोंके द्वारा पूज्य हूँ, ‘सिंहवाहन’ यह सुन्दर नाम रखा और उसे आदेश | देवताओंका राजा हूँ, वरिष्ठ हूँ, अमृतका पान करनेवाला देते हुए कहा—‘हे विनायक! तुम शीघ्र ही दुष्टोंका | हूँ, गजेन्द्र ऐरावतकी सवारी करनेवाला हूँ और भगवान् विनाश करो’॥ २८—२९१/२ ॥ | विष्णु तथा शूलपाणि शंकरजीद्वारा भी पूजित हूँ तो फिर समुद्रने ब्राह्मणरूप धारणकर वहाँ उपस्थित होकर | मैं कश्यपजीके छोटे बालक उस गणेशको क्यों नमस्कार उसे मुक्ताकी माला प्रदान की और उसकी पूजाकर | करूँ? सिंह कभी भी तृणका भक्षण नहीं करता, समुद्र ‘मालाधर’ यह नाम उसका रखा। भगवान् शेषने | कभी भी छोटे सरोवरसे जलकी अभिलाषा नहीं करता गणेशजीके आसनके रूपमें स्वयं अपनेको समर्पित किया | और सब कुछ प्रदान करनेवाला कल्पवृक्ष अन्य किसी और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक ‘फणिराजासन’ उसका नामकरण | दूसरेसे कुछ भी नहीं माँगता ॥ ३५-३६ ॥ किया। अग्निदेवने उसे दाहशक्ति प्रदान की और | महर्षि कश्यपजीने अपने ध्यानयोगसे इन्द्रके इस ‘धनञ्जय’ यह नाम रखा ॥ ३०—३२॥ | प्रकारके भावको समझकर उसकी भलाईकी कामनासे वायुदेवने बालकका ‘प्रभंजन’ यह नाम रखा और | इस प्रकारके धर्मयुक्त वचन कहे— ॥ ३७ ॥ महान् पराक्रम उसे प्रदान किया। इस प्रकार सभी देवोंने | जो अद्भुत कर्मवाला हो और जो गुणोंकी खान यथाशक्ति उसे कुछ भेंट प्रदानकर उसके विविध नाम | हो, वह पूजाके योग्य तथा प्रणाम करनेके योग्य होता रखे। हे मुने! उनके नामोंका वर्णन करनेमें किसीकी भी | है, इसी प्रकार गुणोंसे रहित ब्राह्मण भी पूज्य एवं शक्ति नहीं है। देवराज इन्द्रने मदसे उन्मत्त होकर उसकी | नमस्कार्य नहीं होता है ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें ‘नाना नामोंका वर्णन’ नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १० ॥ ग्यारहवाँ अध्याय महर्षि कश्यपजीद्वारा इन्द्रको बालक गणेशके अद्भुत कर्मोंको बताना, इन्द्रकी आज्ञासे वायु तथा अग्निद्वारा बालक गणेशकी परीक्षा, गणेशका विराट् रूप धारणकर इन्द्रको दिखाना, इन्द्रका भयभीत होकर उनकी स्तुति करना, इन्द्रकृत स्तुतिका माहात्म्य कश्यपजी बोले—मेरे घरमें यह कोई परम पुरुष | दो दैत्य थे। वे तोतेका रूप धारणकर इसे मारनेके लिये ही अवतीर्ण हुआ है, जो अनिर्वचनीय गुणोंवाला है। यह | आये। इसने उनके पंख पकड़कर शिलापर पटक डाला, सत्त्वादि तीनों गुणोंसे समन्वित होते हुए भी उन तीनों | जिससे निष्प्राण होकर वे भूमिपर गिर पड़े, उन भयंकर गुणोंसे रहित है, गुणातीत है ॥ १ ॥ | दैत्योंको सबने अपने सामने देखा था। उसी प्रकार एकबार जो इसका विरोध करेगा, वह अपने स्थानसे च्युत | चित्र नामक गन्धर्व [शापवश] मगरमच्छका रूप हो जायगा। हे देवेन्द्र! मेरे द्वारा बताये गये इसके अद्भुत | धारणकर जलमें स्थित था। वह इस बालकके स्पर्शमात्र कर्मोंके विषयमें आप सुनें। भयंकर विरजा नामक राक्षसी | करनेसे दिव्य शरीरको प्राप्त हो गया ॥ ४—६ ॥ इसे मारनेके लिये आयी थी, किंतु इस बालकने उसे मार | हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक दैत्योंके सत्त्वकी डाला, वह दो योजन दूर जाकर गिरी ॥ २-३ ॥ | शुद्धिके लिये इसने स्वयं पंचदेवोंकी मूर्तियोंका अपहरण उद्धत तथा धुन्धु (धुन्धुर) नामक अत्यन्त मदान्ध | करके स्वयंको ही पंचदेवोंके रूपमें प्रकट किया ॥ ७ ॥
क्री०ख०-अ०११ ] * महर्षि कश्यपजीद्वारा इन्द्रको बालक गणेशके अद्भुत कर्मोंको बताना * २९३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] आप सभी लोगोंके देखते-देखते इसने विघात आदि पाँच राक्षसोंको मार डाला। महर्षि कश्यपजीके इस प्रकारके वचन सुनकर बल नामक राक्षस तथा वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र बोले— ॥ ८ ॥ इन्द्र बोले— जबतक मैं इसके गुणोंके वैशिष्ट्यको नहीं देख लेता, तबतक यह मेरे लिये कैसे मान्य हो सकता है ? ॥ ८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर देवराज इन्द्रने वायुदेवताको आज्ञा दी कि इस बालकको उड़ाकर आकाशमें ले चलो ॥ ९ ॥ इन्द्रकी आज्ञा प्राप्त करते ही वायुदेव प्रलयकालमें प्रवाहित होनेवाली आँधीके समान वेगसे प्रवहमान हो गये, वे सभी लोकोंको आन्दोलित करने लगे, पृथ्वीको धारण करनेवाले पर्वतोंको जोरसे घुमाने लगे, कहीं असमयमें ही प्रलय तो नहीं शुरू हो गया, इस प्रकारसे विचार करते हुए अत्यन्त भयभीत ऋषिगण काँप उठे ॥ १०-११ ॥ तदनन्तर वायुदेवता उस बटुक गणेशको उड़ा ले जानेके लिये बड़े वेगसे उसके पास पहुँचे, परंतु न तो उस बालकका आसन हिला और न एक रोम ही हिल सका। वायुदेव जब अपने प्रयत्नमें विफल हो गये, तब इन्द्रने अग्निसे कहा— तुम शीघ्र ही इस बटुकको जला डालो, आज तुम्हें अपनी सामर्थ्यका प्रदर्शन करना होगा ॥ १२-१३ ॥ इन्द्रकी आज्ञाको शिरोधार्य करके वे अग्निदेव प्रलयकालीन अग्निके समान देदीप्यमान होकर तीनों लोकोंको जलाते हुए-से उस बालकके पास पहुँचे ॥ १४ ॥ सभी वृक्षोंको जला डालते हुए, सभी समुद्रोंको सुखाते हुए और सभी लोगोंको जलाते हुए उन अग्निको देखकर महर्षि कश्यपजीके पुत्र बालक गणेशने अग्निको तत्काल वैसे ही निगल लिया, जैसे कोई रोगी औषधिकी गोलीको निगल जाता है ॥ १५१/२ ॥ अग्निको इस प्रकारसे निगल लिये जानेपर वे इन्द्र क्रोधसे लाल आँखोंवाले हो गये और वे हजार आँखोंवाले इन्द्र अपनी सब कुछ देख सकनेवाली सभी आँखोंसे लोगोंको देखने लगे ॥ १६१/२ ॥
[दायाँ स्तम्भ] उसी समय इन्द्रने देखा कि वह बालक गणेश हजारसे भी अधिक आँखोंवाला हो गया है। उसके असंख्य सिर और असंख्य मुकुट हैं, उसके कानोंकी संख्या अनन्त है, वह अनन्त हाथ, पैरोंवाला है, अन्तहीन उत्कृष्ट पराक्रमसे सम्पन्न है, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि— ये उसके तीन नेत्र हैं, उसने अपने शिरोमण्डलसे आकाश तथा पृथ्वीको व्याप्त कर रखा है, सात पाताल ही उसके चरण हैं, सातों लोक उसके एक मस्तकके समान हैं, असंख्यों सूर्योंके समान उसकी आभा है, असंख्य इन्द्र उसकी सेवा कर रहे हैं, वह असंख्य विष्णु, ब्रह्मा, शिव आदिसे समन्वित है, उसके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड स्थित हैं, जिस प्रकार गूलरके वृक्षमें जड़से लेकर सिरेतक गूलरके फल-ही-फल लगे रहते हैं अथवा जैसे गूलरके फलमें असंख्य मात्रामें मच्छर भिनभिनाते रहते हैं, वैसे ही उसके एक-एक रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्ड स्थित थे ॥ १७-२११/२ ॥ भ्रान्त होकर उन अनेक ब्रह्माण्डोंमेंसे एक ब्रह्माण्डके भीतर इन्द्र प्रविष्ट हो गये तो वहाँ उन्होंने चराचर जगत्सहित तीनों लोकोंको देखा। जैसे वनमें उगनेवाले केलेके कोशके प्रत्येक पत्रमें फल लगे रहते हैं, वैसे ही शचीपति इन्द्रने वहाँ एक ब्रह्माण्डके अन्तर्गत असंख्य जगत् देखे ॥ २२-२३१/२ ॥ भ्रान्तचित्त होकर वे उसीके अन्दर चक्कर काटने लगे, लेकिन उन्हें वहाँसे बाहर निकलनेका कोई मार्ग दिखायी नहीं दिया, तब विफल मनोरथवाले इन्द्रने भगवान् गणपतिको सिर झुकाकर प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने देवदेवेश्वर गजाननकी प्रार्थना की ॥ २४-२५ ॥ इन्द्र बोले— जो महर्षि कश्यपके पुत्ररूपमें पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये अवतरित हुए हैं और जिनकी महिमाका आकलन ही नहीं हो सकता, फिर मेरे द्वारा उनकी महिमाका कैसे वर्णन किया जा सकता है ? ॥ २६ ॥ हे देवेश्वर! आप अत्यन्त विस्तारवाली कुक्षिसे मुझे बाहर निकलनेका मार्ग प्रदान कीजिये। यहाँ घूमते हुए मुझे बारह वर्ष व्यतीत हो गये हैं, किंतु मैं इससे पार पानेका मार्ग नहीं देख पा रहा हूँ ॥ २७ ॥
२९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हे एकराट् गणेशजी ! मैंने आपके उदरदेशमें प्रत्येक | एवं हर्षसे समन्वित इन्द्रने सभी लोगोंके देखते हुए उन रोममें व्याप्त ब्रह्माण्डोंमेंसे पृथक्-पृथक् विभक्त एक- | गणेशजीको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ३५ ॥ एक ब्रह्माण्डमें चौदह भुवनोंको प्रतिष्ठित देखा है ॥ २८ ॥ | देवराज इन्द्र सभी देवताओंके सुनते हुए लीलाके मैंने अत्यन्त विस्तारवाले आपके समष्टि-स्वरूपों | लिये मनुष्यरूप धारण करनेवाले और महर्षि कश्यपके एवं व्यष्टि-स्वरूपोंके साथ ही आपके सौम्य तथा | घरमें उत्पन्न उन ब्रह्मचारी गणेशकी स्तुति करने लगे ॥ ३६ ॥ भयंकर स्वरूपोंका दर्शन किया है ॥ २९ ॥ | इन्द्र बोले—आप अनन्त शक्तिसे सम्पन्न हैं, मैंने आपके असंख्य एवं अद्भुत मुखों तथा | परमेश्वर हैं, विश्वात्मा हैं, विश्वके कारणरूप हैं, गुणोंके नयनोंका दर्शन किया है और जगत्को क्षुब्ध कर | स्वामी हैं, विश्वको प्रकाशित करनेवाले हैं, समस्त डालनेवाले आपके दुर्दर्श रूपोंको भी देखा है ॥ ३० ॥ | जगत्के लिये वन्दनीय हैं, भूत-भविष्य तथा वर्तमान— दैत्यों, दानवों, देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, राक्षसों, | तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले हैं; ब्रह्मा, विष्णु तथा पिशाचों तथा अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज— | शिवके रूपमें त्रिधा विभक्त हैं और सृष्टि, पालन तथा इस प्रकारके चतुर्विध जीवोंसे परिपूर्ण आपके विराट् | प्रलय करनेवाले हैं, मैं आपको नहीं जानता ॥ ३७॥ स्वरूपोंका मैंने दर्शन किया है ॥ ३१ ॥ | आप अद्वितीय, शाश्वत, सच्चिदानन्दस्वरूप, हे जगत्स्रष्टा ! आप अपने इस विकराल महान् | सर्वाध्यक्ष, कारणातीत, ईश्वर, चराचर जीवोंके प्रयत्नके रूपको छिपा लें। हे निखिलेश्वर ! मैं तो मोहमें पड़ा था, | कारणभूत, कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले तथा सर्वत्र किंतु आपके कृपाप्रसादसे [मेरा अज्ञान दूर हो गया है | व्याप्त रहनेवाले हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ ३८ ॥ तथा] मेरी स्मृति जाग्रत् हो गयी है ॥ ३२ ॥ | आप सभीके स्वामी हैं, सभी प्रकारकी विद्याओंके हे विभो! मैं शरीर, मन तथा वाणीसे आपकी | निधान हैं, सबके आत्मरूप हैं, सबको ज्ञान प्रदान शरणमें आया हूँ। हे भक्तवत्सल! आप अपना सौम्य | करनेवाले हैं, सबसे परे हैं, मन-वाणीसे न जाननेयोग्य स्वरूप दिखलाइये१ ॥ ३३ ॥ | हैं, सभीके अधिष्ठान तथा सब कुछ जाननेवाले हैं, मैं ब्रह्माजी बोले—इन्द्र इस प्रकार प्रार्थना कर ही | आपकी स्तुति करता हूँ२ ॥ ३९ ॥ रहे थे कि उन्होंने स्वयंको सभाके मध्यमें विद्यमान तथा | ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार स्तुति करके, प्रणाम उन गणेशजीको ब्रह्मचारीके रूपमें स्थित देखा ॥ ३४ ॥ | करके और उनकी पूजा करनेके अनन्तर इन्द्रने उन्हें अत्यन्त आश्चर्यचकित मनवाले होकर तथा लज्जा | अपना अंकुश, कल्पवृक्ष तथा दो सेविकाएँ प्रदान कीं १-शक्र उवाच भूभारहरणार्थं यो जातः कश्यपनन्दनः। अचिन्त्यो महिमा यस्य किमु वर्ण्यो भवेन्मम ॥ निर्गमं देहि देवेश कुक्षेरत्यन्तविस्तरात् । अदृष्टपाराद्वर्षाणि द्वादश भ्रमता मया ॥ तव कुक्षौ मयादर्शि भुवनानि चतुर्दश । स्थाने स्थाने विभक्तानि प्रतिरोमाङ्गमेकराट् ॥ समष्टिव्यष्टिरूपाणि महाविस्तारवन्ति च। दृष्टानि तव रूपाणि ससौम्यानीतराणि च ॥ अद्भुतान्यप्यसंख्यानि वक्त्राणि नयनानि च। दृष्ट्वा दुर्दर्शरूपाणि जगत्क्षोभकराणि ते ॥ दैत्यदानवपूर्णानि सुरमानववन्ति च। यक्षरक्षःपिशाचादिचतुराकरवन्ति च ॥ विकराल महारूपमुपसंहर विश्वकृत् । गतो मोहं स्मृतिर्लब्धा प्रसादान्निखिलेश्वर ॥ कायेन मनसा बुद्ध्या वाचा त्वां शरणं गतः । प्राकृतं दर्शय विभो रूपं ते भक्तवत्सल ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ११। २६–३३) २-शक्र उवाच जाने न त्वानन्तशक्तिं परेशं विश्वात्मानं विश्वबीजं गुणेशम्। विश्वाभासं विश्ववन्द्यं त्रिसत्यं त्रेधाभूतं जन्मरक्षार्तिहेतुम् ॥ एकं नित्यं सच्चिदानन्दरूपं सर्वाध्यक्षं कारणातीतमिशम्। चेष्टाहेतुं स्थावरे जङ्गमे च वाञ्छापूरं सर्वगं त्वाभिवन्दे ॥ सर्वेशानं सर्वविद्यानिधानं सर्वात्मानं सर्वबोधावभासम्। सर्वातीतं वाङ्मनोगोचरं त्वां सर्वावासं सर्वविज्ञानमीडे ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ११ । ३७–३९)
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क्री०ख०-अ०१२ ] * काशीनरेशका मुनि कश्यपके आश्रममें आगमन * २९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 और उनका 'विनायक' यह सुन्दर नाम रखा। यह नाम | हो गयीं। तदनन्तर एकराट् विनायकने प्रसन्न होकर स्मरण करनेसे सभी प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला | इन्द्रको अभयदान दिया और कहा - ॥४३-४४॥ है। उस समय जय-जयकारके घोषों, नमस्कारकी | हे इन्द्र! तुम्हें युद्ध-स्थलमें कहीं भी कोई भय नहीं ध्वनियों तथा अनेक प्रकारके वाद्योंके निनादों और | होगा। तुम श्रद्धाभक्तिसे सम्पन्न होकर तीनों कालोंमें इस गन्धर्वोंके गीतोंकी ध्वनियों तथा अप्सराओंके नृत्योंकी | स्तोत्रका पाठ करो। अन्य भी जो कोई मनुष्य भक्तिपूर्वक झंकारोंसे एवं पुष्पोंकी वर्षासे समस्त आकाशमण्डल | इन तीनों श्लोकोंका पाठ करेगा, वह अपनी सम्पूर्ण तथा भूमितल परिव्याप्त हो गया॥४०-४२॥ | अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेगा तथा सर्वत्र विजयी विपरीत दिशामें बहनेवाली नदियाँ पूर्व दिशाकी | होगा॥४५-४६॥ ओर बहनेवाली हो गयीं; और अत्यन्त मंगलकारिणी हो | तदनन्तर इन्द्रने यह कल्याणकारी वर प्राप्तकर उन गयीं; दिशाएँ निर्मल हो उठीं; वायु अत्यन्त सुखप्रद | बालक गणेशको प्रणाम किया, इसके पश्चात् अन्य सभी होकर प्रवाहित होने लगी। अग्नियाँ सभी स्थानोंमें शान्त | जन उन्हें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्वरूपवाली होकर दाहिनी ओर अभिमुख ज्वालाओंवाली | स्थानोंको चले गये॥४७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरित' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥११॥ बारहवाँ अध्याय काशीनरेशका मुनि कश्यपके आश्रममें आगमन और अपने पुत्रका विवाह सम्पादित करवानेकी प्रार्थना करना, मुनि कश्यपद्वारा बालक विनायकको काशिराजके साथ भेजना, मार्गमें विनायकद्वारा धूम्नाक्ष राक्षसका वध एवं उसके दोनों पुत्रोंको उड़ाकर नरान्तकके पास भेजना, नरान्तकका दूतोंको युद्धका आदेश, विनायकद्वारा निशाचरोंका वध ब्रह्माजी बोले - सातवें वर्षमें प्रविष्ट होनेपर | मुख फैला लिया। उछलती हुई बड़ी-बड़ी नदियोंने बालक विनायकने स्नान करनेके अनन्तर सन्ध्यावन्दनादि | अपने जलसे नभोमण्डलको सिंचित कर डाला। उस नित्यकर्म सम्पन्न करके अपने मस्तकपर कान्तिमान् | समय देवी अदिति तथा महर्षि कश्यप दोनों अति मुकुट धारण किया। अपने चारों हाथोंमें अंकुश, परशु, | आनन्दित हो गये॥५-६॥ कमल तथा सभीको भयभीत करनेवाला पाश धारणकर | आज हम धन्य हो गये तथा हमारे पूर्वज भी धन्य वे सिंहके ऊपर विराजमान हुए॥१-२॥ | हो गये हैं - इस प्रकारसे वे अपनी प्रशंसा करने लगे। उन्होंने दण्ड, मृगचर्म, कानोंमें सुवर्णनिर्मित तथा | उसी समय काशीके राजा भी उस आश्रममें प्रविष्ट हुए। रत्नजटित कुण्डल धारण किये। कमण्डलु, कुश तथा | परस्पर आलिंगन करके वे सभी उस समय परम श्रेष्ठ पीताम्बर धारण किया॥३॥ | आनन्दित हुए। वे सभी परस्पर नमस्कार करके आसनपर ललाटमें कस्तूरीका तिलक और अल्प प्रकाशवाले | बैठ गये॥७-८॥ चन्द्रमाको धारण किया। गलेमें मोतीके दानोंकी माला | मुनि कश्यपने उन काशीनरेशको षड्रसोंसे समन्वित और नाभिदेशमें नागराज शेषनागको धारण किया॥४॥ | स्वादिष्ट अन्नका भोजन कराया। थोड़ी देर विश्राम तदनन्तर उन्होंने अपनी लीलासे पृथ्वी तथा | करनेके अनन्तर महर्षि कश्यपने राजासे पूछा - 'आपके आकाशमण्डलको कँपाते हुए उच्च स्वरमें गर्जन किया। | आगमनका क्या कारण है?॥९॥ उस गर्जनको मेघोंकी ध्वनि समझकर चातकोंनें अपना | हे राजन्! बड़े ही पुण्यके प्रभावसे आज हमें आप
२९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] श्रीमान्का दर्शन प्राप्त हुआ है, किंतु आजतक आपने मुझ पुरोहितका कोई भी समाचार क्यों नहीं लिया?' ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोले-महर्षि कश्यपजीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ बोले—'हे ब्रह्मन्! मैं राज्यके संचालनके कार्यमें अत्यन्त व्यस्त मनवाला हो गया था, अतः मेरे अपराधको आप क्षमा कीजिये ॥ ११ ॥ हे प्रभो! मेरे पुत्रका विवाह होना निश्चित हुआ है, अतः मैं आपको ले जानेके लिये आया हूँ। हे मुने! आज आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया ॥ १२ ॥ आप शीघ्र चलें और विवाहका कार्य सम्पन्न करनेके अनन्तर पुनः लौट आयें। आपके आगमनके बिना श्रेष्ठ लोगोंमें मेरी प्रशंसा नहीं हो पायेगी, इसलिये हे महामुने! मैं आपको ही लेने आया हूँ' ॥ १३१/२ ॥ मुनि कश्यप बोले-हे नृपश्रेष्ठ! इस समय मेरा चातुर्मास्य व्रत चल रहा है, इसलिये मैं तो नहीं आ पाऊँगा। हे राजन्! यदि आप इच्छुक हैं तो मेरे पुत्रको ले जाइये, वह सब प्रकारसे समर्थ है ॥ १४१/२ ॥ राजा बोले-हे मुने! आप अपने पुत्रको आज्ञा प्रदान करें, हम दोनों शीघ्र ही यहाँसे चलेंगे ॥ १५ ॥ राजाकी यह बात सुनकर मुनि कश्यप अपने पुत्रसे बोले—'हे विनायक! यद्यपि तुम्हारे जानेसे मैं बहुत दुखी रहूँगा, तथापि इन राजाकी अनुरोधपूर्ण वाणीसे मैं तुम्हें इनके साथ भेज रहा हूँ' ॥ १६१/२ ॥ उस आज्ञाको शिरोधार्यकर तथा माता-पिता दोनोंके चरणोंकी वन्दना करके विनायक बाहर आये और राजाने उन्हें रथपर बिठाया। राजा स्वयं भी उन महर्षि कश्यप और देवी अदितिके चरणोंमें प्रणामकर रथमें आरूढ़ हुए ॥ १७-१८ ॥ उस समय देवी अदिति वहाँपर आयीं और नृपश्रेष्ठ काशिनरेशसे बोलीं—हे राजन्! मेरे इस बालककी निरन्तर रक्षा करनी चाहिये। मेरा यह बालक जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ अनेक उत्पात होते हैं, अतः आपको बड़े ही प्रयत्नपूर्वक इसकी रक्षा वैसे ही करनी होगी, जैसे कि पलकें आँखकी पुतलीकी रक्षा करती हैं ॥ १९-२० ॥ जिस प्रकार आप मेरे पुत्र को ले जा रहे हैं, वैसे
[दायाँ स्तम्भ] ही आप वापस भी लायें। 'ठीक है, ऐसा ही होगा।' अदितिसे इस प्रकार कहकर राजाने प्रणाम करके उन्हें विदा किया। तदनन्तर बालक गणेशके साथ राजा काशीनरेशने वायुके सदृश वेगवान् रथसे प्रस्थान किया। रथके द्वारा मार्गमें जाते हुए राजाको एक घनघोर वन दिखायी दिया ॥ २१-२२ ॥ वह नरान्तकके चाचाका अत्यन्त रमणीय स्थान था। उसका नाम धूम्राक्ष था, वह रौद्रकेतुका भाई तथा बड़ा ही पराक्रमी था। उस धूम्राक्षने दस हजार वर्षतक सहस्र किरणोंवाले भगवान् सूर्यकी प्रसन्नतापूर्वक नित्य आराधना करते हुए अत्यन्त दारुण तप किया था ॥ २३-२४ ॥ वह तीनों लोकोंको अपने वशमें करनेकी इच्छासे सभीका संहार कर सकनेवाले आयुधकी अभिलाषा रखता था। वह वृक्षकी शाखामें दोनों पैरोंको अटकाकर नीचे मुख लटकाये हुए धुएँका पान करता था। इस प्रकार बहुत समयतक साधना करते हुए उसके सामने अमोघ अस्त्र प्रकट हुआ ॥ २५-२६ ॥ तपस्या करनेवाले उस धूम्राक्ष नामक राक्षसके लिये वह अस्त्र भगवान् सूर्यने भेजा था। उस अस्त्रके आकाशतक व्याप्त महान् तेजको बालक विनायकने देखा। उन्होंने शीघ्र ही उछलकर उस तेजोमय अस्त्रको उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है। यह देखकर महामनस्वी काशिराज आश्चर्यमें पड़ गये ॥ २७-२८ ॥ उन्होंने मनमें यह विचार किया कि तीनों लोकोंमें लाभ, हानि तथा जीवनके विषयमें दैवके अतिरिक्त अन्य कोई हेतु नहीं है। इस अस्त्रकी प्राप्ति मुझे नहीं बल्कि सहसा इस बालकको हुई है। तदनन्तर बालक विनायकने उस अस्त्रकी शक्तिको ज्ञात करनेके लिये उसको हाथमें लेकर तोला और फेंका ॥ २९-३० ॥ उसी समय वह अस्त्र भयानक शब्द करता हुआ शीघ्र ही ऊपरको गया और धूम्राक्षके ऊपर गिरा, जिससे उस राक्षसका शरीर तत्काल दो भागोंमें बँट गया ॥ ३१ ॥ गिरते हुए उसके शरीरके दोनों भागोंने बड़ी-बड़ी चट्टानों तथा वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला और दो हजार
क्री०ख०-अ०१२ ] * काशीनरेशका मुनि कश्यपके आश्रममें आगमन * २१७ हाथतककी पृथ्वी उसके गिरनेसे ढक गयी ॥ ३२ ॥ उस राक्षस धूम्राक्षके दो पुत्र जो जघन तथा मनु नामसे विख्यात थे और पिताकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे, वे पिताकी वैसी स्थिति देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उन्होंने पासमें ही स्थित बालक विनायकको भी देखा। तब वे दोनों काल तथा यमके समान अपना मुख खोलकर उसके पास दौड़ पड़े ॥ ३३-३४ ॥ उन जघन तथा मनु नामक राक्षसोंने अत्यन्त क्रोधके आवेशमें होकर काशीनरेशसे कहा कि 'इस बालकको लाकर तुमने हमारे पिताको क्यों मरवाया है ? प्राचीन समयकी बात है, मेरे पिता धूम्राक्षने ही नरान्तकसे तुम्हारी रक्षा की थी, अरे राजन् ! उसे युक्तिपूर्वक मार करके अब तुम जीवित कैसे रह सकते हो?' ॥ ३५-३६ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारका वचन सुनकर वे काशीनरेश अत्यन्त व्याकुल होकर काँपने लगे और अपने मनमें विचार करने लगे कि मैं कश्यपजीके अपस्मार-रोगीके समान इस बालकको अपने साथ क्यों लाया ? यदि नरान्तक क्रुद्ध हो गया तो वह बलपूर्वक मेरे राज्यका हरण कर लेगा, तब मेरी रक्षा कौन करेगा? ऐसा सोचकर राजा शपथपूर्वक बोले- ॥ ३७-३८ १/२ ॥ राजा बोले- अरे निशाचरो! मैं ब्राह्मण तथा ईश्वरकी शपथ लेकर कहता हूँ कि इस निमित्त मैं इस बालकको कदापि नहीं लाया हूँ। यह मेरे पुरोहित महर्षि कश्यपका पुत्र है और विवाहका कार्य सम्पादित करनेके लिये मेरे द्वारा लाया गया है ॥ ३९-४० ॥ आप लोग मेरे पुत्रके विवाहमें विघ्न न करें। इस बालकको ले जायँ। राजाकी इस प्रकारकी बात पूरी हो जानेपर मुनिपुत्र वह विनायक राजासे बोला - ॥ ४१ ॥ बालकको शत्रुके हाथमें क्यों सौंप रहे हैं? आप अदिति तथा कश्यपको क्या उत्तर देंगे? ॥ ४२ ॥ यदि महर्षि कश्यप क्रुद्ध हो जायँगे तो वे आपको भस्म कर डालेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। मुनि कश्यपजीके बालक उन विनायकके इस प्रकार कहनेपर वे दोनों राक्षस उसे खा जानेके लिये उसी प्रकार दौड़ पड़े, जैसे कि विडाल चूहेको खानेके लिये दौड़ पड़ता है। तब बालक विनायकने अपना मुख फैलाकर भयानक गर्जना की ॥ ४३-४४ ॥ उस गर्जनाको सुनकर तीनों लोक काँप उठे। उसके द्वारा छोड़े गये निःश्वाससे वे दोनों राक्षस उड़कर उसी प्रकार बादलोंके बीच पहुँच गये, जैसे कि आँधीके द्वारा कोई तिनका उड़ा दिया जाता है ॥ ४५ ॥ दो मुहूर्त बीत जानेके अनन्तर वे दोनों राक्षस जघन और मनु नरान्तकके नगरमें अलग-अलग स्थानोंमें ऐसे गिरे, जैसे कि आँधी-तूफानके द्वारा पर्वतके शिखरपर दो बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरी हों। उन दोनोंके गिरे शरीरोंसे अनेक घर चूर-चूर हो गये ॥ ४६-४७ ॥ उस समय मुखद्वारा किये गये चीत्कार तथा हाथद्वारा किये गये उरताडनके शब्दोंसे महान् हाहाकार होने लगा। तब 'यह क्या हो गया? यह क्या हो गया'- ऐसा कहते हुए दूत दौड़ते हुए वहाँ आये ॥ ४८ ॥ राक्षस धूम्राक्षके दोनों पुत्र मर गये हैं- ऐसा सुनकर दूतोंने उन दोनोंको ठीकसे देखा तो उन्हें जीवित देखकर उन्होंने उन्हें सावधान किया ॥ ४९ ॥ तदनन्तर उन दोनों जघन और मनुने दूतोंको सारा वृत्तान्त क्रमशः बतलाया कि किस प्रकार कश्यपके पुत्रने पिता धूम्राक्षका वध किया और कैसे वे दोनों उसके श्वास छोड़नेसे यहाँ आ गिरे। साथ ही यह भी बताया कि वह बालक काशिराजके साथ रथमें बैठकर जा रहा है। दूतोंने इस प्रकारकी बात सुनकर नरान्तकसे उस बालकके विषयमें बतलाया ॥ ५०-५१ ॥ अपने निरपराध चाचा धूम्राक्षके वध और कश्यपऋषिके अपराधी पुत्र विनायकका काशिराजके साथ गमनका समाचार सुनकर नरान्तककी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं, तदनन्तर उसने अपने समक्ष हजारकी संख्यामें स्थित निशाचरोंको देखकर उस बालकको पकड़ लानेकी उन्हें आज्ञा दी - ॥ ५२-५३ ॥ 'हे राक्षसो ! मुनि कश्यपके पुत्रको पकड़कर ले आओ। यदि वह युद्ध करे तो उसे मार डालना। अथवा तुम उस काशिराजके रथको ही यहाँ ले आना। अब तुम लोग शीघ्र ही जाओ' ॥ ५४ ॥
२९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- आदेश पाते ही वे सभी राक्षस वायुके समान तीव्र वेगसे शीघ्र ही चल पड़े, वहाँ उन्होंने महर्षि कश्यपजीके पुत्र बालक विनायक तथा काशिराजको देखा, उन दोनोंने भी उन निशाचरोंको देखा। तदनन्तर बालक विनायकने भयभीत कर देनेवाली भीषण गर्जना की, जिसे सुनकर कई निशाचर प्राणोंका परित्यागकर भूमिपर गिर पड़े ॥ ५५-५६ ॥ कुछ राक्षस भाग चले, कुछ पैर टूट जानेपर वहाँसे निकल पड़े, बालक विनायकके बाणोंसे कुछ राक्षसोंके सिर कट गये और कुछ विद्ध उदरवाले हो गये। किसी-किसीके मुख कट गये, किसीकी आँखें फूट गयीं और किन्हींके जंघा तथा बाहुएँ भग्न हो गयीं; कुछ दूसरे निशाचर भाग करके नरान्तकके पास आ पहुँचे और उन्होंने बालक विनायकद्वारा किये गये उत्पातका सारा समाचार नरान्तकको सुनाया ॥ ५७-५८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत विनायककृत निशाचरवध' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय दूतोंका अपने राजा नरान्तकसे बालक विनायकके पराक्रमका वर्णन करना, काशिराजसहित बालक विनायकका काशीनगरीमें प्रवेश, काशिवासियोंको विविध रूपोंमें विनायकका दर्शन, बालक विनायकके वधकी दृष्टिसे वहाँ आये विघण्ट तथा दन्तुर आदि अनेक राक्षसोंका वध, काशिराजद्वारा विनायकका पूजन तथा सत्कार
दूत बोले- [हे स्वामिन् !] आपकी आज्ञा प्राप्त करके हम लोग रथमें स्थित उस विनायकके समीप गये। हम सभीको वह यमराजके समान दिखायी दिया ॥ १ ॥ हे स्वामिन् ! हे अनघ ! उसके भयसे सभी निशाचर मृत्युको प्राप्त हो गये, आपकी कृपासे हम जीवित रह गये और आपके पास आये हैं ॥ २ ॥ जैसे सिंहोंके समूहसे हाथियोंकी रक्षा होती है, वैसे ही ईश्वरकी ही कृपासे हम लोग जीवित बच गये। तीनों लोकोंमें ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो उस बालकके साथ युद्ध कर सके ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले-दूतोंका यह वचन सुनकर नरान्तक बोला-'तुम लोग मूर्खतावश क्या बोल रहे हो, कहाँ वह बालक और कहाँ मैं नरान्तक ! प्रलयकालीन अग्निके सम्मुख एक पतंगा क्या कर सकता है? क्या चूहेके खोदनेसे मेरुपर्वत गिर सकता है?' ॥ ४-५ ॥ तदनन्तर नरान्तकने अपने दूतोंको आज्ञा देते हुए कहा कि काशिराजकी नगरीको लूट डालो और वहाँ कुछ ऐसा करो, जिससे कि वह राजा उद्विग्न हो उठे। उसके व्याकुल हो जानेपर वह कश्यपका पुत्र भी व्यग्र हो उठेगा अथवा सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा उन दोनोंका वध कर डालना ॥ ६-७ ॥ इसके पश्चात् नरान्तकने अपने उन निशाचर दूतोंको अत्यन्त मूल्यवान् अनेकों रत्न, विशिष्ट वस्त्र तथा विविध अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। तब वे सभी निशाचर नरान्तकको प्रणाम करके काशीपुरीको चल पड़े। अपनी सेनाके द्वारा दिशा-विदिशाओंको व्याप्त करके वे परस्पर वार्तालाप भी कर रहे थे ॥ ८-९ ॥ उनका जो महान् सेनापति था, वह निशाचरोंको यह आदेश दे रहा था कि हे दैत्यो ! जिसे भी वह बालक दिखायी पड़े, वह उसे मार डाले ॥ १० ॥ अगर ऐसा नहीं होगा तो वह मेरे लिये दण्डनीय होगा, उसके लिये मैं ही प्राणोंको विनष्ट करनेवाला बन जाऊँगा। इस प्रकारका आदेश प्राप्त करनेवाले वे दैत्य दसों दिशाओंमें फैल गये ॥ ११ ॥ रथमें बैठे हुए उस काशिनरेशके साथ वह विनायक काशीपुरीमें गया। वह काशीनगरी नाना प्रकारके ध्वज
क्री०ख०-अ०१३ ] * दूतोंका अपने राजा नरान्तकसे बालक विनायकके पराक्रमका वर्णन करना * २१९ तथा पताकाओं और अल्पनाओंसे सजी हुई थी ॥ १२ ॥ तदनन्तर मन्त्रीगण तथा काशीनगरीके नागरिकजन विविध वाद्यों एवं दुन्दुभियोंकी ध्वनि करते हुए और अनेक प्रकारके पूजाके उपचारोंको लेकर बालक विनायकके समीपमें गये। उन सभीने सोलह उपचारोंके द्वारा बड़े श्रद्धा-भक्तिपूर्वक विनायकका पूजन किया और राजाका भी पूजन किया, तदनन्तर वे सभी नगरीके अन्दर प्रविष्ट हुए ॥ १३-१४॥ बालक विनायकके नगरीमें प्रवेश करते ही उनको देखनेकी इच्छुक नगरकी सभी स्त्रियाँ भवनोंके ऊपर चढ़ गयीं; कोई उनके दर्शनके लिये आभूषणों तथा वस्त्रोंकी अस्त-व्यस्त स्थितिमें घरसे बाहर निकल पड़ीं। कुछ स्त्रियाँ पिता, भाई, पति, माता तथा सखियोंकी अवहेलनाकर तथा कोई भोजनपात्रका भोजन छोड़कर तथा कोई भोजन करते हुए पतिको छोड़कर बाहर चली आयीं ॥ १५-१६ ॥ एक स्त्रीको जब कुटुम्बीजनोंने बाहर जानेसे रोक दिया तो उसने आँखें बन्दकर वहीं भगवान् विनायकका भक्तिपूर्वक ध्यान करते हुए अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया, यह अद्भुत घटना हुई ! ॥ १७ ॥ कुमारी कन्याओंने बालक विनायकके ऊपर लाजा तथा पुष्पोंकी वर्षा की। विमानपर आरूढ़ होकर देवता उस महोत्सवको देख रहे थे ॥ १८ ॥ ब्राह्मणोंने उन विनायकको परब्रह्म परमात्माके रूपमें देखा। क्षत्रियोंने उन्हें युद्धके लिये उद्यत एक महान् पराक्रमी वीर योद्धाके रूपमें देखा। सभी वैश्योंको वे संहार करनेवाले रुद्रके रूपमें दिखायी दिये। शूद्रोंने उन्हें भगवान् विष्णुके रूपमें तथा राजाके रूपमें देखा ॥ १९-२० ॥ जिस-जिस व्यक्तिकी जैसी भावना थी, उसने उन्हें उसी रूपमें उसी प्रकार देखा, जैसे कि लाल, श्वेत तथा पीत वस्त्रादिपर रखा श्वेत वर्णका स्फटिक वैसा ही लाल, श्वेत तथा पीत रंगका दिखायी देता है। एक ही पुरुष जैसे किसीका पिता होता है, किसीका भाई होता है तथा किसीका साला होता है, उसी प्रकार सभीने विनायकको अपनी भावनाके अनुसार देखा ॥ २१ १/२ ॥ तदनन्तर बालक विनायकने उस पुरीके अन्दर स्थित उन दोनों विघण्ट तथा दन्तुर नामक महान् असुरोंको देखा और उन्हें बालक्रीड़ा करनेके लिये आदरपूर्वक बुलाया। उन दोनों दैत्योंका मनोभाव अत्यन्त दूषित था, वे बालकोंके साथ (बालक बनकर) आये थे॥ २२-२३ ॥ वे दोनों बालकवेशधारी दैत्य जब बालक विनायकका आलिंगन करनेका प्रयत्न करने लगे तो विनायकने उन दोनोंका दुष्ट मनोभाव जान लिया। फिर तो उन्होंने उन दोनोंका आलिंगनकर उन्हें मसलकर वैसे ही चूर-चूर कर दिया, जैसे हाथमें स्थित फूल चूर-चूर कर दिया जाता है। तदनन्तर उन्होंने उन्हें भूमिपर छोड़ दिया, उन राक्षसोंने दस योजनतककी भूमिको ढक लिया। काशिराज तथा अन्य लोग भी यह दृश्य देखकर दंग रह गये ॥ २४-२५ ॥ आकाशमें स्थित देवताओंने उस बालकपर पुष्पोंकी वर्षा की। कुछ लोग 'साधु-साधु, जय हो-जय हो' आदि ध्वनि करने लगे ॥ २६ ॥ मुनियों तथा देवताओंने अपनी मायासे मनुष्यरूप धारणकर बाललीला प्रदर्शित करनेवाले उन विनायककी स्तुति की। वे कहने लगे, जो दोनों असुर इन्द्र आदि
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३०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
देवताओंके लिये भी अजेय थे, उन दोनोंको इन बालक विनायकने चूर्ण-चूर्ण कर डाला ॥ २७१/२ ॥ असुरोंका वध करनेके अनन्तर गलियोंको पार करता हुआ काशिराजका रथ आगे-आगे बढ़ने लगा ॥ २८ ॥ इसके पश्चात् पतंग तथा विधुल नामक दो महान् बलशाली दुष्ट दैत्य वेगशाली आँधीके रूपमें बालक विनायकको मार डालनेकी इच्छासे रथके समीपमें आये। उस धूलभरी आँधीसे भूमिके ढक दिये जानेके कारण सभी लोग अत्यन्त व्याकुल हो उठे। बड़े-बड़े भवन तथा वृक्षोंके समूह टूटकर जमीनपर गिर पड़े ॥ २९-३० ॥ लोगोंके उत्तरीय वस्त्रोंके आकाशमें उड़ा दिये जानेसे वे वस्त्र आकाशमें स्थित पक्षियोंके भाँति दिखायी दे रहे थे। किसी-किसीके सिरसे पगड़ी उड़-उड़कर दसों दिशाओंमें गिर रही थी ॥ ३१ ॥ उस समय महान् कोलाहल व्याप्त हो गया। कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था। प्रचण्ड आँधीसे काशिराजका रथ भी जब आकाशमें उड़ने-जैसा हो उठा तो बालक विनायकने उसे स्तम्भितकर भूमिपर ही रोक दिया। उस वात्याचक्र (बवंडर)-के कारण शक्तिहीन- से हुए लोग वैसे ही भूतलपर गिरने लगे, जैसे सद्योजात शिशु गिर पड़ता है ॥ ३२१/२ ॥ तदनन्तर उन राक्षसोंको अत्यन्त बलवान् जानकर बालक विनायकने अपनी एक ही मुट्ठीसे दोनोंकी शिखाओंके बालोंको पकड़कर बलपूर्वक उन्हें आकाशमें देरतक घुमाया और फिर जमीनपर पटक दिया, तब लोगोंने देखा कि उन दोनोंके प्राण निकल गये हैं। तब वहाँ उपस्थित लोग आपसमें यह कहने लगे कि कश्यपजीका यह पुत्र निश्चित ही कोई बलशाली देवता है; क्योंकि इसने योजनभर विस्तारवाले इन दोनों असुरोंको मार गिराया है ॥ ३३-३५ ॥ इतनी छोटी-सी अवस्थामें इतना पराक्रम किसीमें भी नहीं देखा जाता है। उनका वह महान् सामर्थ्य देखकर काशिराजने भी प्रसन्नता व्यक्त की ॥ ३६ ॥ उन्होंने अपने रथसे उतरकर उन विनायकको प्रणाम किया और वे बोले—हे महायोगिन् ! बालक होनेपर भी आपके कृत्योंके रहस्यको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान सकते हैं, तो चर्म चक्षुवाले हम मनुष्योंको आपकी महिमाका ज्ञान कहाँसे हो सकता ? आप इस जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं और इस जगत्के पालन एवं उसकी रक्षाके लिये आप अनेक रूप धारण करते हैं। हे स्वामिन् ! हे विभो ! आपके अवतारोंकी कोई गणना नहीं है ॥ ३७-३९१/२ ॥ तदनन्तर रथ काशिराजके भवनके लिये आगे चल पड़ा। तभी बालक विनायकने अपने समक्ष एक पाषाणरूपधारी [कूट नामक] दैत्यको देखा। उन्होंने अपने अस्त्र परशुसे उसपर आघात किया, जिससे वह पाषाणरूप दैत्य सौ टुकड़ोंमें विभक्त हो गया ॥ ४० ॥ उसमेंसे एक भयंकर महान् असुर प्रकट हुआ, जो चमकते हुए दाँतों और दाढ़ोंवाला तथा दाढ़ीसे युक्त था, वह विशाल कायावाला पुरुष पिंगल वर्णका था ॥ ४१ ॥ उसे देखकर सभी बालक तथा अन्य लोग भी भाग चले। बालक विनायकने अपनी मुट्ठीके आघातसे उसे भी मार डाला और तब वह भूमिपर गिर पड़ा ॥ ४२ ॥ तब लोगोंने उस बालकको भगवान्का साकार रूप माना। अत्यन्त प्रसन्नचित्त काशिराजने उस बालक विनायकको अपने रथसे नीचे उतारा और शीघ्रतापूर्वक स्वयं उसे लेकर अपने भवनके अन्दर प्रवेश कराया, वहाँ उन्होंने स्वर्णसे निर्मित रत्नजटित अपने सिंहासनपर उन्हें बिठाया। यथाविधि सोलह उपचारों, अत्यन्त मूल्यवान् वस्त्रों, आभूषणों तथा दिव्य सुगन्धित द्रव्योंद्वारा उनकी पूजा की ॥ ४३-४५ ॥ राजा अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गये। उन्होंने उनकी स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने अपने मित्रगणोंके साथ मधुरादि छहों रसोंसे युक्त भोज्य पदार्थों तथा व्यंजनोंसे समन्वित नाना प्रकारके पक्वान्नों और विविध प्रकारकी खीरका उन्हें भोजन कराया। इसके अनन्तर शीघ्र ही राजाने बहुत प्रकारके फल उन्हें समर्पित किये एवं अष्टांग प्रणाम किया और रत्नमय सुवर्णपात्रमें ताम्बूल प्रदान किया। इसके पश्चात् बालकोंके मध्यमें बैठे हुए राजाने भी शीघ्र भोजन किया ॥ ४६-४८ ॥
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चौदहवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०१४] * धर्मदत्त नामक ब्राह्मणका काशिराजके यहाँ आना * ३०१
तदनन्तर काशिराजने सन्ध्योपासना कर चुके उन बालक विनायकको दीपों तथा चँदोवासे सुशोभित और मनको अच्छे लगनेवाले पलंगपर सुलाया ॥ ४९ ॥ राजाने उस पलंगके पास बालककी रक्षा करनेके लिये जागरण करनेवाले चार अत्यन्त विश्वसनीय पुरुषोंको नियुक्त किया और स्वयं भी उन्होंने बालक विनायककी अनुमति प्राप्तकर अपनी भार्याके साथ शयन किया ॥ ५० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'विनायकद्वारा किये गये विघण्ट आदि दैत्योंके वधका वर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय
धर्मदत्त नामक ब्राह्मणका काशिराजके यहाँ आना और विनायककी स्तुति करना, विनायकका धर्मदत्तके साथ उनके घरको प्रस्थान, मार्गमें आये काम-क्रोध नामक राक्षसोंका विनायकद्वारा वध, विनायककी बाललीलाके प्रसंगमें मदोन्मत्त हाथीका वध, धर्मदत्तद्वारा सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओंको विनायकको सौंपना, विनायकद्वारा जृम्भा राक्षसीका वध, विनायकके बालचरितके श्रवणकी महिमा
**ब्रह्माजी बोले—**बालक विनायकने प्रातःकाल उठकर यथाविधि शौच आदि कृत्य करके स्नान किया, तदनन्तर विधिपूर्वक सन्ध्यावन्दन किया। तत्पश्चात् समिधाओंके द्वारा नित्य होम सम्पन्नकर विनायकने शुभ कृष्ण मृगचर्म और दण्डको एक स्थानपर रखकर बालकोंके साथ क्रीड़ा करना प्रारम्भ किया ॥ १-२ ॥
[तभी] वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता और धर्मदत्त नामसे विख्यात ब्राह्मण, जो वहाँ निवास करनेवाले थे, वे बालक विनायककी कीर्तिको सुनकर उन मुनि कश्यपजीके पुत्रके दर्शनकी इच्छासे नृपश्रेष्ठ काशिराजके भवनमें आये। राजासे भलीभाँति सम्मान प्राप्त किये उन ब्राह्मणने नृपश्रेष्ठसे पूछा— ॥ ३-४ ॥
मुझे बतलाइये कि महर्षि कश्यपका वह बलशाली पुत्र कहाँ है ? तब लोगोंने कहा कि वह बालकोंके साथ खेल रहा है। तदनन्तर वे ब्राह्मण धर्मदत्त उठे और उन्होंने बालक विनायकका हाथ पकड़कर उससे कहा—'आप मेरे मित्रके पुत्र हैं, मैंने आपकी कीर्ति सुन रखी है ॥ ५-६ ॥
इसलिये मैं आपको अपने घर ले जानेके लिये आया हूँ, इसमें कोई संशय नहीं है। आप अपने चरणोंकी धूलिसे हमें पवित्र करें और सभी मनोरथोंको पूर्ण करें। आप परब्रह्मस्वरूप हैं, परमात्मा हैं, परसे भी परे हैं, पृथ्वीके भारको हलका करनेके लिये आपने महर्षि कश्यपजीके घरमें जन्म लिया है ॥ ७-८ ॥
आप क्रीडा करनेके लिये मनुष्यरूपमें अवतरित हैं। हे बालक! मैं आपको यथार्थरूपसे जानता हूँ।' तदनन्तर बालक विनायकने उनसे कहा—'आपने क्यों यहाँ आनेका कष्ट किया ? हे तात ! मैं आपकी आज्ञा प्राप्त करते ही क्यों नहीं आपके पास आ जाता', ऐसा कहकर वे विनायक शीघ्र ही ब्राह्मण धर्मदत्तके साथ चल पड़े ॥ ९-१० ॥
उन पराक्रमी विनायकके पीछे-पीछे धूल उड़ाते हुए बालक चल रहे थे। मार्गमें जाते हुए उन विनायकके समीप असुर नरान्तकद्वारा भेजे हुए दो अधम राक्षस आये, जिनका नाम काम और क्रोध था। वे आपसमें [मायामय] युद्ध करते हुए उन बालक विनायकके वधकी इच्छासे आये थे ॥ ११-१२ ॥
गधेका रूप धारण किये हुए और दूषित मनोवृत्तिवाले वे दोनों मदोन्मत्त राक्षस आपसमें युद्ध करते हुए उसी प्रकार उन बालक विनायकके ऊपर गिरे, जैसे कि अग्निमें पतंगा गिर पड़ता है ॥ १३ ॥
तब साथमें आये सभी बालक दसों दिशाओंकी ओर भाग चले। तदनन्तर विनायकने बलपूर्वक उन
३०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
दोनोंके पैरोंको पकड़कर बहुत बार घुमाया और फिर जमीनपर पटक दिया। तब लोगोंने देखा कि जमीनपर गिरे हुए उन दोनोंके प्राण निकल चुके हैं॥ १४-१५॥ उस समय उनके देहपातद्वारा हुई ध्वनिसे तीनों लोक प्रकम्पित हो उठे। उन विनायकके महान् पराक्रमको आज प्रत्यक्ष देखकर महामुनि धर्मदत्तको लोकमें प्रचलित विनायककी प्रसिद्धिकी वार्ताके विषयमें पूर्ण विश्वास हो गया। तदनन्तर ब्राह्मण धर्मदत्त उन बालक विनायकके साथ आगे बढ़े। उसी समय उन्होंने छद्मवेश धारण करनेवाले एक मदोन्मत्त महान् बलशाली हाथी (-के रूपवाले कुण्ड नामक दैत्य)-को देखा, जो इधर-उधर भागते हुए लोगोंको मारनेके लिये उद्यत हो रहा था॥ १६-१८॥ महान् वीर भी उस हाथीको देखकर इधर-उधर भागने लगे। वहाँ उस समय दौड़ते हुए लोगोंका महान् कोलाहल व्याप्त हो गया॥ १९॥ सर्वत्र धूल उसी प्रकार छा गयी, जैसे कि कोहरेके द्वारा पर्वत ढक दिये जाते हैं। तदनन्तर वह महाबलशाली हाथी राजाके मदोन्मत्त हाथियोंको मारने चल पड़ा॥ २०॥ महलके भीतर निवास करनेवाले लोगोंने हाथियोंके उस अत्यन्त भयंकर युद्धको देखा। वहाँ बँधे हुए घोड़ोंको देखकर उन हाथियोंने अश्वशालाको भी तहस- नहस कर दिया॥ २१॥ बन्धनमुक्त हुए घोड़े तथा हाथी दसों दिशाओंमें भाग चले। ब्राह्मण धर्मदत्त उन बालक विनायकको साथ लेकर ज्यों-ही घरके अन्दर जानेको उद्यत हुए, उसी समय बालक विनायकने उस हाथीकी सूँड़को मरोड़ डाला और वे बलपूर्वक उसके ऊपर आरूढ़ हो गये। बालक विनायकने अंकुशके द्वारा उस हाथीके गण्डस्थलको बार-बार वेध डाला॥ २२-२३॥ [उसके कारण] चारों ओर रक्त बहने लगा और वह हाथी सभी लोगोंको भयभीत करनेवाली चिंघाड़की ध्वनि करते हुए भूमितलपर गिर पड़ा॥ २४॥ विशाल शरीरवाले उस हाथीके गिरनेसे सभी सामानोंसहित असंख्य संख्यामें वहाँके भवन टूट गये॥ २५॥ पर्वतों, वनों तथा खानोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। धूलके छा जानेसे हुए अन्धकारके छँट जानेपर नगरमें निवास करनेवाले लोग वहाँ आये। महान् भयंकर आकृतिवाले उस हाथीको मरा हुआ देखकर वे भयसे व्याकुल हो उठे। कुछ बलशाली पुरुष उसके पास गये और उन्होंने बलपूर्वक उस हाथीसे बालकको नीचे उतारा॥ २६-२७॥ ब्राह्मण धर्मदत्तने बालक विनायकको पुनः अपनी गोदमें ले लिया। फिरसे कोई नया उत्पात न हो जाय, इस शंकासे वे शीघ्र ही बालकको घरके अन्दर ले गये। उस अपशकुनके शान्त हो जानेपर ब्राह्मण धर्मदत्तने ब्राह्मणोंको धन प्रदान किया और पृथक्-पृथक् उपचारोंके द्वारा बालक विनायककी पूजा की॥ २८-२९॥ उन्होंने वस्त्र, अलंकार एवं पुष्पोंसे पूजन किया और विविध प्रकारके एकत्रित नैवेद्योंका उन्हें भोग लगाया। दक्षिणाके निमित्त धर्मदत्तने सिद्धि तथा बुद्धि नामक अपनी दो कन्याएँ उन्हें समर्पित कीं और भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया, तदनन्तर प्रसन्न मनवाले ब्राह्मण धर्मदत्तने आनन्दातिरेकसे गद्गद वाणीमें कहा-॥ ३०-३१॥ आज मेरा भाग्य सफल हो गया है, जो कि मैंने आपके चरणाम्बुजका दर्शन किया। आप जगत्के स्वामी हैं, जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, जगत्के साक्षीरूप हैं। समस्त जगत्के गुरु हैं, आप मेरे कहनेसे मेरे पूर्वजोंका उद्धार करनेके लिये यहाँ आये हैं। ऐसा कहते हुए उन मुनि धर्मदत्तको विनायकदेवने एक उत्तम आसनपर बैठाया और [अपने पिता कश्यपजीके मित्र होनेके कारण पितृभावसे स्वयं भी] अत्यन्त भक्तिपूर्वक मुनिकी पूजा की॥ ३२-३३१/२॥ सिद्धि तथा बुद्धिसे समन्वित वे बालक विनायक देवी गंगा तथा पार्वतीसे युक्त, त्रिशूल हाथमें धारण करनेवाले त्रिनेत्र भगवान् शिवके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। उसी समय एक जृम्भा नामक सुन्दरी वहाँ
क्री०ख०-अ०१४] * धर्मदत्त नामक ब्राह्मणका काशिराजके यहाँ आना * ३०३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 आयी ॥ ३४-३५ ॥ वह पीले रंगके वस्त्र धारण की हुई थी, उसने सुन्दर कंकण तथा मनोहर आभूषण पहन रखे थे। वह धूम्राक्ष नामक राक्षसकी पत्नी थी और अत्यन्त दुष्ट मनोभाव रखनेवाली थी ॥ ३६ ॥ वह अत्यन्त मधुरवाणीमें बोली—'यह उत्तम निधान है। यहाँ बहुतसे अरिष्ट हो रहे हैं, उन्हें प्रयत्न करके नष्ट किया जा सकता है। ऐसी स्थितिमें इस बालकको तथा इसके माता-पिताको कैसे सुखभोग हो सकता है?', सभी स्त्रियोंसे ऐसा कहकर वह बालक विनायकसे कहने लगी ॥ ३७-३८ ॥ हे विभो! यह मेरा महान् भाग्य है, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ। हे देवेश्वर! बहुतसे दुष्टोंका वध करते-करते आप थक गये हैं। अतः हे महामते! इस सुगन्धित तैलका उबटन लगाइये। मैं तुम्हारे अंगोंकी मालिश कर दूँगी तथा तेल और उबटन भी लगा दूँगी। तब बालक विनायकके द्वारा 'ठीक है'—ऐसा कहे जानेपर हाथमें विष ली हुई उस स्त्रीने विषके प्रभावकी उत्कटताका वर्धन करनेवाले उस तेलको उनके चरणोंमें लगाया ॥ ३९–४१॥ जँभाई लेती हुई वह जृम्भा उस तेलके द्वारा बालक विनायककी मालिश करने लगी। वहाँ उपस्थित लोगोंने उसे भली स्त्री माना। वह दुष्ट भाववाली स्त्री जृम्भा बालक विनायककी उसी प्रकार सेवा करने लगी, जैसे शुभ भाववाली स्त्री अपने पतिकी सेवा करती है ॥ ४२ ॥ तदनन्तर उस विषमिश्रित तेलके प्रभावसे बालक विनायकके शरीरमें अत्यधिक जलन होने लगी। तब विनायकने ज्ञानयोगके बलपर यह जान लिया कि यह तो दूषित मनोवृत्तिवाली राक्षसी है ॥ ४३ ॥ तब शीघ्र ही विनायकने एक नारियलके फलसे उसके मस्तकपर प्रहार किया, जिससे वह जमीनपर गिर पड़ी और अपने वास्तविक निशाचरीरूपमें आ गयी। अपने शरीरसे बहनेवाले रक्तके मध्यमें वह दो योजन दूरतक फैल गयी। उस समय वे ब्राह्मण धर्मदत्त तथा अन्य सभी उपस्थित लोग अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये ॥ ४४-४५ ॥ तदनन्तर ब्राह्मण धर्मदत्तने बालक विनायककी विधिवत् पूजा की और उन्हें छः रसोंसे समन्वित अत्यन्त स्वादुपूर्ण विविध प्रकारके पक्वान्नोंका भोजन कराया ॥ ४६ ॥ उस अवसरपर देवताओंने पुष्पोंकी वर्षा की तथा स्त्रियोंने उनकी पूजा की, आरती की और लाजाओंकी उनपर वर्षा की ॥ ४७ ॥ तदनन्तर वे काशीनरेश उन विनायकको ले जानेके लिये वहाँ आये और उन्होंने उन्हें रथपर बैठाया। तदुपरान्त विविध वाद्योंकी ध्वनि, गन्धर्वोंके गायन तथा अप्सराओंके द्वारा आगे-आगे किये जाते हुए नृत्यके साथ राजा उन विनायकको सकुशल अपने भवनमें ले गये ॥ ४८-४९ ॥ अनेक वीरोंसे घिरे हुए तथा काशिराजके रथपर विराजमान वे बालक विनायक उसी प्रकार प्रतीत हो रहे थे, मानो सिंहपर आरूढ़ और हाथमें शस्त्र धारण किये हुए एवं देवताओंसे घिरे हुए इन्द्र हों ॥ ५० ॥ उस समय सिद्धि तथा बुद्धिसे समन्वित वे विनायक उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे कि गंगा तथा पार्वतीसे समन्वित शिव सुशोभित होते हैं। अनेक बन्दीजनोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए उन विनायकने राजाके भवनमें प्रवेश किया। जगदीश्वर विनायकके इस प्रकारके बालचरित्रोंका जो श्रवण करेगा, वह सभी प्रकारके मनोरथोंको प्राप्त कर लेगा और कभी भी शत्रुओंके द्वारा प्रपीड़ित नहीं होगा ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'काम-क्रोध आदि दैत्योंके वधका वर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
३०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पन्द्रहवाँ अध्याय काशीनरेशद्वारा अपनी सभामें विनायकके अद्भुत कर्मोंका वर्णन, ज्वालामुख, व्याघ्रमुख तथा दारुण नामक राक्षसोंका काशीपुरीको दग्ध करना, बालक विनायकके द्वारा तीनों असुरोंका वध तथा काशीपुरीको पूर्ववत् बना देना और राजाद्वारा विनायककी स्तुति ब्रह्माजी बोले—दूसरे दिन काशीनरेश बालक विनायकको साथ लेकर अपने मित्रों एवं मन्त्रियोंसे समन्वित होकर लोगोंके साथ सभामण्डपमें आये ॥ १ ॥ उन्होंने गुणोंसे सुसम्पन्न महान् आशयवाले उन सर्वश्रेष्ठ विनायकको आगे करके उन सभीसे बालकके बहुतसे गुणोंका वर्णन किया ॥ २ ॥ राजा बोले—'मैं अपने पुत्रके विवाहको सम्पन्न करानेके लिये महर्षि कश्यपके पास उन्हें बुलानेके लिये गया, तब उन्होंने अपने पुत्र इन विनायकको मेरे साथ भेज दिया। इनके साथ जब मैंने यहाँके लिये प्रस्थान किया ही था कि अनेक अद्भुत प्रकारके राक्षस तथा एक-पर-एक अनेक अरिष्ट उपस्थित हुए, जिन्हें न पहले कभी देखा गया था और न जिनके विषयमें सुना ही गया था ॥ ३-४॥ सर्वप्रथम इन्होंने राक्षसोंके अधिपति धूम्राक्षका वध किया। तदनन्तर उसके जघन तथा मनु नामक दो पुत्रों [-को नरान्तकके पास फेंक दिया] और फिर [उनके सहयोगी] पाँच सौ राक्षसोंका संहार किया ॥ ५ ॥ नगरमें पहुँचनेपर इन्होंने बालकका रूप धारण करके वहाँ आये हुए विघण्ट तथा दन्तुर नामक राक्षसोंका वध किया। जो महाबली विधूल नामक राक्षस आँधी-तूफानके रूपमें होकर इन्हें आकाशमें उड़ाना चाहता था, उसे तथा पतंग नामक राक्षसका भी इन्होंने वहाँ नगरमें संहार किया। वहाँ राजद्वारपर स्थित तथा पाषाणरूपधारी कूट नामक राक्षसको भी इन्होंने मार डाला। काम तथा क्रोध नामक राक्षसोंका भी इन्होंने वध किया, ये दोनों गधेका रूप धारण करके आये थे। इन्होंने हाथीका रूप धारणकर आये हुए कुण्ड नामक निशाचरको मारा ॥ ६-८ ॥ अन्य भी जो अरिष्ट आयेंगे, उन्हें ये विनायक नष्ट कर डालेंगे। इस समय आप लोग ब्राह्मणोंके साथ मन्त्रणा करके मेरे पुत्रके विवाहके विषयमें निश्चय करें। देवताओंकी स्थापना, हरिद्रालेपन, मण्डपकी स्थापना तथा विवाहके लिये सामग्री एकत्र करनेके सम्बन्धमें ज्योतिषशास्त्रके विद्वानोंसे परामर्श करना चाहिये' ॥ ९-१० ॥ ब्रह्माजी बोले—उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर मन्त्रियोंने राजासे कहा—'हे नृपश्रेष्ठ! हमको यह निश्चित रूपसे प्रतीत होता है कि जबतक यह बालक नगरमें रहेगा, तबतक विवाह नहीं हो सकेगा; क्योंकि इसके यहाँ रहनेपर दिन-प्रतिदिन महान् उत्पात होते रहेंगे ॥ ११-१२ ॥ हे राजन्! आप पन्द्रह दिनके बाद अथवा एक मास बीत जानेपर पुत्रका विवाह करें।' राजाके द्वारा 'ठीक है' ऐसा कहे जानेपर वे सभी अपने-अपने घरको चले गये ॥ १३ ॥ तदनन्तर काशिराज तथा विनायक दोनों ही भोजन करनेके पश्चात् सुखपूर्वक सो गये। हे मुनि व्यासजी! जब मध्यरात्रिका समय आया और सभी लोग निद्रामें सो गये, उसी समय ज्वालामुख, व्याघ्रमुख तथा दारुण नामक तीन असुर वहाँ आये, वे पूर्वमें मारे गये दैत्यों और राक्षसोंके वधका बदला लेना चाहते थे ॥ १४-१५ ॥ इन तीनोंमें जो ज्वालामुख नामक पहला राक्षस था, वह सम्पूर्ण काशीनगरीको दग्ध कर देना चाहता था। दारुण नामक राक्षस वायुरूप होकर उसकी सहायताके लिये तैयार था। तीसरा जो व्याघ्रास्य नामक असुर था, वह वहाँसे भागनेवालोंको खा जानेवाला था। इस प्रकारका पहलेसे ही निश्चय करके आये हुए वे राक्षस बड़े ही उच्च स्वरसे चीत्कार करने लगे ॥ १६-१७ ॥ उस आवाजसे तीनों लोक काँप उठे, लोग अत्यन्त संशयग्रस्त हो गये। वे कहने लगे—'क्या यह प्रलयकाल
क्री०ख०-अ०१५ ] * काशीनरेशद्वारा अपनी सभामें विनायकके अद्भुत कर्मोंका वर्णन * ३०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] उपस्थित हो गया है या फिर क्या शत्रुसेना आक्रमणके लिये आ पहुँची है?'॥ १८॥ ज्वालामुख नामक महान् कायावाले उस दैत्यने अपने नीचेके ओष्ठको पृथ्वीपर टिका लिया और ऊपरके ओष्ठको आकाशतक फैला लिया, बीचमें नदीकी भाँति जीभको स्थापित करके वह अपने मुखसे अग्निकी ज्वालाओंको प्रकट करने लगा और आकाशसहित उस काशीनगरीको दग्ध करने लगा। जिस प्रकार हनुमान्जीने अपनी पूँछकी अग्निसे समस्त लंकानगरीको जला डाला था, वैसे ही इस ज्वालामुख नामक दुष्ट राक्षसने अपने मुखकी ज्वालाओंसे काशीनगरीको दग्ध कर डाला, नगरीके वृक्ष, लताएँ, उद्यान तथा भवनोंके समूह जलकर राख हो गये ॥ १९-२१॥ उस समय महान् कोलाहल व्याप्त हो गया। लोग मुख तथा हाथोंको पीटते हुए क्रन्दन करने लगे। अपने- अपने सभी कार्योंको छोड़कर लोग दसों दिशाओंमें भाग चले। नगरसे जो भी बाहर जा रहा था, उसे व्याघ्रास्य नामक राक्षस खाता जा रहा था। वही उसका भोजन था, बालकोंको तो वह अचार-चटनीकी तरह चाट जा रहा था ॥ २२-२३ ॥ कुछ लोग ढीले वस्त्रोंमें तो कुछ बिना वस्त्र पहने
[दायाँ स्तम्भ] ही भाग रहे थे, कुछ स्त्रियाँ केवल उत्तरीय ओढ़े अथवा कुछ अपने पतिके वस्त्रोंको पहनकर ही भाग चलीं॥ २४॥ वे सभी व्याघ्रास्य राक्षसके उस फैले हुए विशाल मुखको कोई गुफा समझकर जान बचानेकी इच्छासे उसमें प्रविष्ट हो जा रहे थे। वे दूसरे लोगोंको भी वहाँ आनेके लिये बुला रहे थे। तब उस असुरने उन सबको खा डाला ॥ २५॥ असमयमें ही प्रलयकी जैसी स्थिति हो जानेपर काशिराज अपने राज्य, धन, स्त्री, पुत्र आदि तथा अन्य सभी वस्तुओंका परित्यागकर केवल उस बालक विनायकको अपने कन्धेपर बैठाकर विभिन्न स्थानोंमें, घर-घरमें भ्रमण करने लगे। वे अत्यन्त दुःखसे संतप्त हो उठे थे तथा उस अग्निके तेजसे व्याकुल थे ॥ २६-२७॥ मेरे द्वारा मूर्खताके कारण यह क्यों लाया गया, यह तो सभी अरिष्टोंका जनक है, सब कुछ हरण करनेवाला तथा अपशकुनोंका कारण है ॥ २८ ॥ यह जीवित नहीं बचेगा तो मैं महर्षि कश्यप तथा अदितिको क्या जवाब दूँगा ? इसने पहले तो सभी बड़े- बड़े अरिष्टोंको दूर कर दिया था, किंतु इस समय यह चुप क्यों बैठा है, मैं इसका कारण नहीं जान पा रहा हूँ। इस प्रकारसे शोक करते हुए काशिराज बालक विनायकको लेकर ऊँचे दुर्गमें चढ़ गये ॥ २९-३०॥ किंतु वहाँ भी वायुकी सहायतासे वह अग्नि आ पहुँची। तब राजाके सेवकोंने आग बुझानेके लिये घड़ों एवं चर्मसे बने (मशक) पात्रोंसे जल छिड़कना शुरू किया ॥ ३१॥ राजाकी रानियाँ लोकलाज छोड़कर अपने बच्चोंको साथ लेकर दुर्गसे बाहर निकल पड़ीं। तदनन्तर विह्वल होकर काशिराज भी दुर्गसे नीचे उतर आये ॥ ३२ ॥ अश्व, खच्चर तथा उनमें सवार वीर सैनिक, रथ, हाथी तथा उनमें सवार वीर सैनिक, पैदल सैनिक और नगरके सभी लोग अपना-अपना गोधन लेकर नगरसे बाहर चले गये। उस महाविनाशके समय सभी लोगोंके पलायन कर जानेपर काशिराज विनायकको तथा विनायक काशिराजको खोजने लगे ॥ ३३-३४॥
३०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 नगरके सभी लोगोंके उस व्याघ्रमुख असुरके | सभी लोगोंको जीवित कर दिया और दग्ध मुखके अन्दर चले जानेपर भी उस असुरने अपना मुख | काशीनगरीको पूर्ववत् ज्यों-का-त्यों बना दिया। तदनन्तर तबतक बन्द नहीं किया, जबतक कि अनन्त गुणोंसे | उन विनायकने शीघ्र ही सिंहके समान गर्जना की। सम्पन्न महान् आत्मावाले वे विनायकदेव उसके मुखके | तब सभी लोगोंने तथा काशिराजने प्रसन्नतापूर्वक उनकी अन्दर प्रविष्ट नहीं हो गये। सूर्यके उदय हो जानेपर देव | स्तुति की॥ ४४-४५॥ विनायकने व्याघ्रके समान मुखवाले उस असुरको, | हे गुणोंके अधीश्वर! आप अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं, ज्वालामुख असुरद्वारा दग्ध किये काशीनगरको तथा | आपको नमस्कार है, अरिष्टोंका विनाश करनेवाले! व्याघ्रमुख नामक असुरके उस मुखको देखा, जो | आपको नमस्कार है, सृष्टिकर्ताको नमस्कार है। विश्वकी काशीपुरीके समस्त लोगोंसे भरा हुआ था॥ ३५-३६॥ | रक्षा करनेवालेको नमस्कार है। विघ्नोंका समूल उच्छेद अग्निकी ज्वालाको अपने समीप आते देख बालक | करनेवालेको नमस्कार है। ज्ञान प्रदान करनेवालेको विनायक बलपूर्वक उस व्याघ्र नामक असुरके मुखमें | नमस्कार है, अज्ञानको दूर करनेवाले आपको नमस्कार प्रविष्ट हो गये। अपने मुखमें विनायकके प्रविष्ट होते ही | है। हे जगत्के स्वामी! हे लीलावतार! हे देव! आपने उस असुरने सभीको मार डालनेकी इच्छासे विशाल | अपनी लीलाके द्वारा असमयमें उत्पन्न प्रलयाग्निसे तथा गुफाके समान अपने मुखको बन्द कर लिया॥ ३७१/२॥ | दैत्योंसे हमारी रक्षा की है॥ ४६-४७॥ बालक विनायकने उसके मुखको फाड़ डालनेके | इस प्रकारकी महाबलशाली अग्निका पान करनेकी लिये तत्क्षण ही अपने आकारको बहुत बड़ा बना लिया | सामर्थ्य और किसमें है? पृथ्वीके समान मुखवाले उस और उस असुरकी देहको फाड़ डाला। उस व्याघ्रास्य | व्याघ्रमुख नामवाले महान् राक्षसको आपके अतिरिक्त असुरकी देहने पृथ्वी तथा आकाशको ढक लिया। उस | और कौन मार सकता है? मरे हुओंको आपके अतिरिक्त असुरकी देहके फटनेसे चट-चटकी वैसी ही आवाज | जीवन प्रदान करनेका साहस और दूसरा कौन कर सकता हुई, जैसे बाँसके फटनेसे होती है॥ ३८-३९॥ | है, हे देव! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं और आप वह असुर दो टुकड़ोंमें बँट गया और शीघ्र ही | ही रक्षा करनेवाले हैं॥ ४८-४९॥ वह प्राणोंसे रहित हो गया। विनायकने उसकी देहके | मेरा महान् भाग्य है और यहाँके लोगोंका भी एक टुकड़ेको आकाशमें फेंक दिया, हवाके द्वारा उड़ाया | महान् भाग्य है, जो कि आपकी सन्निधि हमें प्राप्त हुई जाता हुआ वह टुकड़ा दूर देशमें जा गिरा। उस | है। ऐसा कहकर वे काशिराज अश्वपर तथा वे विनायक आधे खण्डके नीचे गिरनेसे [वहाँका] घनघोर वन | सिंहके यानपर आरूढ़ होकर चल पड़े॥ ५०॥ चूर-चूर हो गया॥ ४०-४१॥ | प्रसन्नतापूर्वक अपने भवनमें पहुँचकर राजाने तथा शरीरका दूसरा जो खण्ड वहीं रह गया, वह | विनायकने सन्ध्यावन्दन आदि नित्य कर्म सम्पन्न किया। बालकोंके लिये आनन्ददायी क्रीडागृह बन गया। तब | सहस्रोंकी संख्यामें अन्य वे सभी वीर भी अपने-अपने उस खण्डमें स्थित लोग जग उठे और वे दूसरोंको भी | वाहनोंमें आरूढ़ होकर अपने-अपने घर गये। सभी जगाने लगे। तदनन्तर बालक विनायकने सम्पूर्ण अग्निको | पुरवासी अत्यन्त प्रसन्न हो गये। उस समय बाजे बजने पी डाला और ज्वालासुरके साथ ही महाकाय विदारण | लगे और बन्दीजन राजाकी स्तुति करने लगे॥ ५१-५२॥ (दारुण) असुरको, अपने पैरके आघातसे चूर्ण-चूर्ण कर | तदनन्तर काशिराजने ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके डाला॥ ४२-४३॥ | दान दिये। स्वस्तिवाचन कराकर शीघ्र ही देवताओंका तथा इस प्रकार उन दुष्ट दैत्योंका वध करनेके अनन्तर | उन विनायकका पूजन किया। लोगोंने विनायकको अनेक बालक विनायकने अपनी योगमायाके बलसे मरे हुए | प्रकारकी भेंट प्रदान की। विनायकने भी उन उपहारोंको
क्री०ख०-अ०१६ ] * काशिराजका दण्डकारण्यमें महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें गमन * ३०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[ऊपरी भाग - बायाँ स्तम्भ] स्वेच्छानुसार ब्राह्मणोंमें वितरित कर दिया ॥ ५३-५४ ॥ राजाने अमात्योंको तथा वीरोंको वस्त्र प्रदान किये। राजाने उन सभीको विदा करके विनायकके साथ भोजन करनेके अनन्तर सुखपूर्वक शयन किया ॥ ५५ ॥
[ऊपरी भाग - दायाँ स्तम्भ] जो व्यक्ति विनायकद्वारा करायी गयी काशीपुरीकी मुक्तिके वर्णनको श्रद्धाभक्तिसे श्रवण करता है, वह अपनी सभी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और कहीं भी अरिष्टोंसे बाधित नहीं होता ॥ ५६ ॥
[अध्याय समाप्ति पुष्पिका] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'ज्वालास्य आदि राक्षसोंका वध करके नगरीको मुक्त करानेका वर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय काशिराजका दण्डकारण्यमें महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें गमन, काशिराज तथा गजाननके अनन्य भक्त भृशुण्डीका वार्तालाप
[मुख्य भाग - बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी ! अब मैं आश्चर्यजनक कथाको सुनाता हूँ, आप श्रवण करें। इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करनेसे मनुष्य अत्यन्त सुख प्राप्त करता है ॥ १ ॥ वे काशिराज प्रातःकाल उठकर नित्य कर्मोंका सम्पादन करनेके अनन्तर महलसे बाहर निकले। उन्होंने बालक विनायकके भवनमें जाकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी पूजा की, तदनन्तर उन्होंने बालक विनायकसे भोजन करनेहेतु प्रार्थना की। विनायकने विविध प्रकारके पकवानोंसे तृप्ति प्राप्त होनेके अनन्तर होनेवाली डकार ली ॥ २-३ ॥ राजाने वहाँपर बचे हुए लड्डुओं, पायस आदि पदार्थों, पुओं, बड़ों, सूपमिश्रित पवित्र भात, दधि, दुग्ध, मधु, घृत तथा क्वथिका अर्थात् कढ़ीसे युक्त पात्रोंको देखा। साथ ही उन विनायकके शरीरपर विद्यमान मणि तथा मुक्तासे बनी माला, अत्यन्त मूल्यवान् तथा नवीन विविध अलंकारोंको देखा। तब काशिराजने उन विनायकको पुनः नमस्कार करके उनसे पूछा— ॥ ४-६ ॥ हे जगदीश्वर ! किस भक्तके द्वारा आपकी यह पूजा की गयी है ? आपकी कृपासे मैं उन्हें जानना चाहता हूँ और उनका दर्शन करना चाहता हूँ ॥ ७ ॥ इस प्रकारसे कहनेवाले अपने भक्त काशिराजसे विनायकदेवने अपने भक्तद्वारा की गयी पूजाके विषयमें इस प्रकार बताया ॥ ८ ॥ विनायकदेव बोले—हे राजन् ! इस समय आपने जो मुझसे पूछा है, उसे मैं बताता हूँ, आप सुनें। हे नृपात्मज ! उसे मैं आपको संक्षेपमें ही बताता हूँ ॥ ९ ॥
[मुख्य भाग - दायाँ स्तम्भ] दण्डकारण्य देशके नामल नामक नगरमें भृशुण्डी नामक मेरा एक भक्त निवास करता है; वह भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालोंको जानता है। वह शीघ्र ही तीनों लोकोंकी सृष्टि करने, उसकी रक्षा करने तथा उसके संहार करनेकी सामर्थ्य रखता है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव उसके दर्शनकी नित्य अभिलाषा रखते हैं ॥ १०-११ ॥ सभी समयोंमें मेरा ध्यान-स्मरण करते रहनेसे उनके समस्त पाप विनष्ट हो गये हैं और उन्होंने अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है। प्राचीन समयकी बात है, जब वे तपस्यामें लीन थे, उसी समय उनकी दोनों भौंहोंके मध्य एक शुण्ड प्रकट हो गया था, तभीसे वे तीनों लोकोंमें भृशुण्डी इस नामसे प्रसिद्ध हो गये। मुझपर अनन्य भक्तिभाव रखनेके कारण मृत्युलोकमें होनेपर भी उन्होंने मेरा सादृश्य प्राप्त कर लिया है ॥ १२-१३ ॥ आज शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथि है, उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मेरा पूजन किया है। हे राजन् ! मेरे शरीरसे टपकते हुए घृत, दुग्ध, दधि तथा मधुको आप देख लें। हे नृपश्रेष्ठ ! मेरे द्वारा भोजन करनेसे जो अन्न बच गया है, उसे तो आपने देख ही लिया है ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर काशिराजने कहा—'हे देवाधिदेव ! हे जगत्के स्वामी ! मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ, वे कैसे यहाँ आयेंगे ?' ॥ १५१/२ ॥ विनायक बोले—हे राजन् ! आप आज ही उनके आश्रम-स्थलको जाइये। उनकी पूजा करके तथा उन्हें