भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ
१८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

होते हैं। अतः ये दोनों पुत्र अपने पिताके लिये पिण्डदान कर सकते हैं।

परिवेत्ता<sup></sup> एवं परिवित्ति (बड़े भाईद्वारा अपने विवाहकी अस्वीकृति देनेवाला)-को अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। इसी प्रकार कन्याको भी कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। ऐसी कन्याके दान देनेवालेको अतिकृच्छ्रव्रत तथा विवाह-विधि सम्पन्न करानेवालेको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये।

यदि बड़ा भाई कुबड़ा, बौना, नपुंसक, हकलाने-वाला, मूर्ख, जन्मान्ध, बहरा तथा गूँगा हो तो छोटे भाईके द्वारा विवाह कर लेनेमें कोई दोष नहीं होता।

जिसे वाग्दानमात्र किया गया है ऐसा भावी पति यदि परदेश चला जाय, मर जाय, संन्यास-धर्मका अवलम्बन कर ले, नपुंसक हो अथवा पतित हो गया हो तो इन पाँच आपदाओंमें वाग्दत्ता कन्या दूसरे पतिका वरण कर सकती है। अपने पतिके साथ सतीधर्मके अनुसार अग्निमें प्रवेश करनेवाली स्त्री शरीरमें स्थित रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करती है।

कुत्ता आदिके काटनेपर मनुष्यको गायत्री-मन्त्रके जपसे शुद्धि करनी चाहिये। जिसे स्वयं गायत्री-जपका अधिकार नहीं है, उसे ब्राह्मणद्वारा गायत्री-जप कराना चाहिये। चाण्डाल आदिके द्वारा मारा गया अग्निहोत्री ब्राह्मण लौकिक अग्निसे जलाने योग्य होता है। [उस अग्निसे जलाये गये] ब्राह्मणकी अस्थियोंको दूधमें प्रक्षालित करके पुनः विधिवत् मन्त्रपूर्वक अपने अग्निहोत्रशालाकी अग्निसे प्रदग्ध करना चाहिये। यदि मृत्यु प्रवासकालमें होती है तो परिजनको अपने घरपर उस मृत व्यक्तिका कुशसे शरीर बनाकर पुनः अग्निदाह करना चाहिये।

कृष्णमृगचर्मपर छः सौ पलाशपत्रोंको (मृतककी आकृतिके समान) बिछाकर अथवा कुशमय शरीरका निर्माण करके शिश्न-भागपर शमी तथा वृषण-भागपर अरणिके काष्ठको स्थापित करे। उसके दायें हाथके स्थानपर कुण्ड (स्थाली) और बायें हाथके स्थानपर उपभृत [यज्ञियपात्र], पार्श्वभागमें उलूखल तथा पीठकी ओर मूसल रखे। तत्पश्चात् उस शवके वक्षःस्थलपर [सोमरस तैयार करनेके लिये प्रयोगमें आनेवाले] पत्थरको रखकर उसके मुखभागमें घृत-तण्डुल और तिल डालना चाहिये। कानके पास प्रोक्षणीपात्र और नेत्रोंके संनिकट आज्यस्थाली रखे। कान, नेत्र, मुख तथा नासिका-भागमें स्वर्ण-खण्ड रखनेका विधान है। इस प्रकार अग्निहोत्रके समस्त उपकरणोंके सहित उस अग्निहोत्रीका शवदाह करनेसे वह (मृत अग्निहोत्री) ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। 'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' इस मन्त्रसे घृतकी एक आहुति देनी चाहिये।

हंस, सारस, क्रौँच, चक्रवाक, कुक्कुट, मयूर और मेषका वध करनेवाला मनुष्य एक दिन तथा एक रात्रिके उपवासके पश्चात् पापसे शुद्ध हो जाता है। अन्य सभी पक्षियोंका वध करनेपर एक अहोरात्रमें शुद्धि होती है।

सभी प्रकारके चतुष्पद पशुओंका वध करनेपर जो पाप मनुष्यको लगता है, उसका अवमोचन खड़े होकर एक अहोरात्र उपवास कर [गायत्री] मन्त्रका जप करनेसे होता है।

शूद्रका वध करनेपर कृच्छ्रव्रत, वैश्यकी हत्या करनेपर अतिकृच्छ्रव्रत, क्षत्रियका वध करनेपर बाईस चान्द्रायणव्रत एवं ब्राह्मणकी हत्या करनेपर तीस चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। (अध्याय १०७)


१-ज्येष्ठ भ्राताके अविवाहित रहते हुए अपना विवाह कर लेनेवाला छोटा भाई 'परिवेत्ता' कहा जाता है और परिवेत्ताका अविवाहित बड़ा भाई 'परिवित्त' कहा जाता है।

९२- राजनीति-निरूपण

काण्ड ] बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार १८९

बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार

सूतजीने कहा— हे ऋषियो ! अब मैं 'अर्थशास्त्र' आदिपर आश्रित नीतिसार कह रहा हूँ, जो राजाओंके साथ ही अन्य सभीके लिये भी हितकर तथा पुण्य, आयु और स्वर्गादिको प्रदान करनेवाला है।

जो मनुष्य [धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस पुरुषार्थचतुष्टयकी] सिद्धि चाहता है, उसको सदैव सज्जनोंकी ही संगति करनी चाहिये। दुर्जनोंके साथ रहनेसे इस लोक अथवा परलोकमें हित सम्भव नहीं है—

सद्भिः सङ्गं प्रकुर्वीत सिद्धिकामः सदा नरः।
नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम्॥
(१०८।२)

क्षुद्रके साथ वार्तालाप और दुष्ट व्यक्तिका दर्शन नहीं करना चाहिये। शत्रुसे सेवित व्यक्तिके साथ प्रेम न करे और मित्रके साथ विरोध न करे। मूर्ख शिष्यको उपदेश देनेसे, दुष्ट स्त्रीका भरण¹-पोषण करनेसे तथा दुष्टोंका किसी कार्यमें सहयोग लेनेसे विद्वान् पुरुष भी अन्तमें दुःखी हो जाता है। मूर्ख ब्राह्मण, युद्ध-पराङ्मुख क्षत्रिय, विवेकरहित वैश्य और अक्षरसंयुक्त शूद्रका परित्याग तो दूरसे ही कर देना चाहिये। कालकी प्रबलतासे शत्रुके साथ संधि और मित्रसे विग्रह (शत्रुता) हो जाता है। अतः कार्य-कारण-भावका विचार करके ही पण्डितजन अपना समय व्यतीत करते हैं।

समय प्राणियोंका पालन करता है। समय ही उनका संहार करता है। उन सभीके सोनेपर समय (काल) जागता रहता है। अतः समय बड़ा ही दुरतिक्रम है (अर्थात् समयको जीतना बड़ा ही कष्टसाध्य है)। समयपर ही प्राणीके पराक्रमका क्षरण होता है। समय आनेपर ही प्राणी गर्भमें आता है। समयके आधारपर उसकी सृष्टि होती है और पुनः समय ही उसका संहार भी करता है। काल निश्चित ही नियमसे नित्य सूक्ष्म गतिवाला ही होता है तब भी हमारे अनुभवमें उसकी गति दो प्रकारसे होती है, जिसका अन्तिम परिणाम जगत्का संग्रह ही होता है। यह गति स्थूल एवं सूक्ष्म-रूपमें दो प्रकारकी होती है।

ऋषियो! बृहस्पतिने इन्द्रसे इस नीतिसारका वर्णन किया था, जिसके कारण सर्वज्ञ होकर इन्द्रने दैत्योंका विनाश करके देवलोकका आधिपत्य प्राप्त किया था।

ब्राह्मणकल्प राजर्षियोंको नित्य देवता एवं ब्राह्मण आदिका पूजन करना चाहिये तथा महान् पातकोंको नष्ट करनेवाले अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान करना चाहिये।

उत्तम प्रकृतिवाले सज्जनोंकी संगति, विद्वानोंके साथ सत्कथाका श्रवण और लोभरहित मनुष्यके साथ मैत्रीसम्बन्ध स्थापित करनेवाला पुरुष दुःखी नहीं होता²।

[दूसरेकी] निन्दा, दूसरेका धन-ग्रहण, परायी स्त्रीके साथ परिहास तथा पराये घरमें निवास कभी नहीं करना चाहिये। हितकारी अन्य व्यक्ति भी अपने बन्धु हैं और यदि बन्धु अहितकर है तो वह भी अपने लिये अन्य है। शरीरसे ही उत्पन्न हुई व्याधि अहितकर होती है, किंतु वनमें उत्पन्न हुई औषधि उस व्याधिका निराकरण करके मनुष्यका हित-साधन करती है। जो मनुष्य सदैव हितमें तत्पर रहता है, वही बन्धु है। जो भरण-पोषण करता है, वही पिता है। जिस व्यक्तिमें विश्वास रहता है, वही मित्र है और जहाँपर मनुष्यका


¹ यथाशक्ति भरण-पोषणका प्रयास करना चाहिये और यदि स्त्रीके दुष्ट स्वभाववश भरण-पोषण कदाचित् अशक्य हो रहा है या पारिवारिक-सामाजिक व्यवस्था उच्छिन्न हो रही है, तब इस व्यवस्थाको ध्यानमें रखना चाहिये।
² उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥ (१०८।१२)

१९०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

जीवन-निर्वाह होता है, वही उसका देश है<sup></sup>

जो आज्ञापालक है, वही वास्तविक भृत्य (सेवक) है; जो बीज अंकुरित होता है, वही बीज है; जो पतिके साथ प्रिय सम्भाषण करती है, वही वास्तविक भार्या है। पिताके जीवनपर्यन्त पिताके भरण-पोषणमें जो पुत्र लगा रहता है, वही वास्तवमें पुत्र है। जो गुणवान् है, उसीका जीवन वास्तवमें सार्थक है। जो धर्ममें प्रवृत्त है, वही जीवित है; जो गुण-धर्मविहीन है, उसका जीवन निष्फल है।

जो भार्या गृहकार्यमें दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है वास्तवमें वही भार्या है<sup></sup>। जो नित्य स्नान करके अपने शरीरको सुगन्धित द्रव्य-पदार्थोंसे सुवासित करनेवाली है, प्रियवादिनी है, अल्पाहारी है, मितभाषिणी है, सदा सब प्रकारके मङ्गलोंसे युक्त है, जो निरन्तर धर्मपरायण है, निरन्तर पतिकी प्रिय है, सदा सुन्दर मुखवाली है तथा जो ऋतुकालमें ही पतिके सहगमनकी इच्छा रखती है, वही भार्या है।

—इन लक्षणोंसे समन्वित स्त्री समस्त सौभाग्योंकी अभिवृद्धिकारिणी होती है। जिस मनुष्यकी ऐसी भार्या है वह मनुष्य नहीं देवराज इन्द्र है।

जिस मनुष्यकी भार्या विरूप नेत्रोंवाली, पापिनी, कलहप्रिय और विवादमें बढ़-चढ़कर बोलनेवाली है, वह पतिके लिये वास्तवमें वृद्धावस्था ही है, वास्तविक वृद्धावस्था वृद्धावस्था नहीं है। जिसकी भार्या परपुरुषका आश्रय ग्रहण करनेवाली है, दूसरेके घरमें रहनेकी आकांक्षा रखती है, कुकर्ममें संलग्न है तथा निर्लज्ज है, वह (पतिके लिये) साक्षात् वृद्धावस्था-स्वरूप है।

जिस पुरुषकी भार्या गुणोंका महत्त्व समझनेवाली, पतिका अनुगमन करनेवाली और स्वल्पसे भी स्वल्प वस्तुसे संतुष्ट रहनेवाली है; पतिके लिये वही सच्ची प्रियतमा है, सामान्य प्रिया नहीं है।

दुष्ट पत्नी, दुष्ट मित्र तथा प्रत्युत्तर देनेवाला भृत्य और सर्पयुक्त घरमें निवास साक्षात् मृत्यु ही है।

मनुष्यको दुर्जनोंकी संगतिका परित्याग करके साधुजनोंकी संगति करनी चाहिये और दिन-रात्रि पुण्यका संचय करते हुए नित्य अपनी अनित्यताका स्मरण रखना चाहिये—

त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्।
कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम्॥ (१०८।२६)

जो स्त्री सर्पके कण्ठमें रहनेवाले विषके समान है, जो सर्पके फणोंके सदृश भयंकर है, जो रौद्ररसकी साक्षात् मूर्ति है, जो शरीरसे कृष्णवर्णकी है, जो रक्तके सदृश लाल-लाल नेत्रोंके द्वारा दूसरेके हृदयको भयभीत कर देनेवाली है, जो व्याघ्रके समान भयानक है, जो क्रोधवदना एवं प्रचण्ड अग्निकी ज्वालाकी भाँति धधकनेवाली और काकके समान जिह्वालोलुप है, अपने पतिसे प्रेम न रखनेवाली है, भ्रमितचित्तवाली तथा दूसरेके पुर (घर-नगर) आदिमें जानेवाली अर्थात् परपुरुषकी इच्छा रखनेवाली है, वह स्त्री कदापि सेव्य नहीं है।

दैववश कभी अल्प सामर्थ्यवान् व्यक्ति भी शक्तिशाली हो सकता है, कृतघ्न व्यक्ति भी कभी सुकृत कर सकता है, अग्निमें कभी शीतलता भी आ सकती है, हिममें उष्णता भी आ सकती है; किंतु वेश्यामें [पुरुषविषयक] अनुराग नहीं हो सकता।

घरके अंदर भयंकर सर्प देख लिये जानेपर, चिकित्सा होनेपर भी रोग बने ही रहनेपर, बाल्य-युवा आदि अवस्थासे युक्त यह शरीर कालसे आवृत है। यह समझनेपर भी कौन ऐसा व्यक्ति है, जो धैर्य धारण कर सकता है? (अध्याय १०८)


१-परोऽपि हितवान् बन्धुर्बन्धुरप्यहितः परः। अहितो देहजो व्याधिर्हितमारण्यमौषधम्॥
स बन्धुर्यो हिते युक्तः स पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः स देशो यत्र जीव्यते॥ (१०८। १४-१५ )
२-सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता॥ (१०८। १८)

९३- राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण

काण्ड ] नीतिसार-निरूपण १९१


नीतिसार-निरूपण

सूतजीने कहा—आपत्तिकालके लिये धनका संरक्षण करना चाहिये, स्त्रियोंकी रक्षाके लिये धनका उपयोग करना चाहिये एवं अपनी रक्षामें स्त्री एवं धन दोनोंका उपयोग करना चाहिये।

कुलकी रक्षाके लिये एक व्यक्तिका, ग्रामकी रक्षाके लिये कुलका, जनपदके हितके लिये ग्रामका और अपने वास्तविक कल्याणके लिये पृथिवीका भी परित्याग कर देना चाहिये—

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
(१०९।२)

नरकमें निवास करना अच्छा है, किंतु दुश्चरित्र व्यक्तिके घरमें निवास करना उचित नहीं है। नरकवासके कारण पाप विनष्ट हो जाता है, किंतु दुश्चरित्र व्यक्तिके घरमें निवास करनेसे पापकी निवृत्ति नहीं होती। बुद्धिमान् पुरुष एक पाँवको स्थिर करके ही दूसरे पाँवको आगे बढ़ाता है। इसीलिये अगले स्थानकी परीक्षाके बिना पूर्वस्थानका परित्याग नहीं करना चाहिये<sup></sup>

दुष्टजनोंसे व्याप्त देश, उपद्रवग्रस्त निवासभूमि, कृपण राजा तथा मायावी मित्रका परित्याग कर देना चाहिये।

कंजूसके हाथमें पहुँचे हुए धन, अत्यन्त दुष्ट और आग्रही व्यक्तिके पास संचित ज्ञान, गुण एवं पराक्रमसे रहित रूप तथा आपत्तिकालमें पराङ्मुख मित्रसे मनुष्यको क्या लाभ हो सकता है? जो पदासीन (अधिकारयुक्त) व्यक्ति है, उसके कभी न देखे गये बहुत-से व्यक्ति भी सहायक हो जाते हैं और सभी व्यक्ति मित्र हो जाते हैं। परंतु जब वही व्यक्ति पदच्युत और अर्थहीन हो जाता है तो उसके असमयमें स्वजन भी शत्रु हो जाते हैं<sup></sup>

आपत्कालमें मित्र, युद्धमें वीर, एकान्त स्थानमें शुचिता, विभवके क्षीण हो जानेपर पत्नी तथा दुर्भिक्षके समय अतिथप्रियताकी पहचान होती है—

आपत्सु मित्रं जानीयाद्रणे शूरं रहः शुचिम्।
भार्यां च विभवे क्षीणे दुर्भिक्षे च प्रियातिथिम्॥
(१०९।८)

पक्षीगण फलरहित वृक्षोंका परित्याग कर देते हैं। सारस पक्षी सूखे हुए सरोवरको छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं। वेश्याएँ धनसे रहित होनेपर पुरुषको छोड़ देती हैं। मन्त्री भ्रष्ट राजाका त्याग कर देते हैं। भौंरे बासी पुष्पको त्यागकर नवविकसित कुसुमपर चले जाते हैं और मृग जले हुए वनका परित्याग कर अन्यत्र आश्रय लेते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि स्वार्थवश ही सभी प्राणी एक-दूसरेसे प्रेम करते हैं। वास्तवमें कौन किसका प्रिय है<sup></sup>?

अर्थप्रदानके द्वारा लोभी मनुष्यको, करबद्ध-प्रणाम निवेदनसे उदारचेता व्यक्तिको, प्रशंसा करनेसे मूर्ख व्यक्तिको और तात्त्विक चर्चासे विद्वान् पुरुषको


१-वरं हि नरके वासो न तु दुश्चरिते गृहे। नरकात् क्षीयते पापं कुगृहात्र निवर्तते ॥
चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान् । न परीक्ष्य परं स्थानं पूर्वमायतनं त्यजेत् ॥ (१०९।३-४)
२-अर्थेन किं कृपणहस्तगतेन केन ज्ञानेन किं बहुशठाग्रहसंकुलेन।
रूपेण किं गुणपराक्रमवर्जितेन मित्रेण किं व्यसनकालपराङ्मुखेन ॥
अदृष्टपूर्वा बहवः सहायाः सर्वे पदस्थस्य भवन्ति मित्राः।
अर्थैर्विहीनस्य पदच्युतस्य भवत्यकाले स्वजनोऽपि शत्रुः॥ (१०९।६-७)
३-वृक्षं क्षीणफलं त्यजन्ति विहगाः शुष्कं सरः सारसा निर्द्रव्यं पुरुषं त्यजन्ति गणिका भ्रष्टं नृपं मन्त्रिणः।
पुष्पं पर्युषितं त्यजन्ति मधुपाः दग्धं वनान्तं मृगाः सर्वः कार्यवशाज्जनो हि रमते कस्यास्ति को वल्लभः ॥ (१०९।९)

१९२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

संतुष्ट किया जा सकता है। सद्भाव रखनेसे देवगण, सज्जनवृन्द एवं द्विजाति संतुष्ट होते हैं। इनके अतिरिक्त साधारण लोग खान-पान तथा पण्डितजन मान-सम्मानसे संतुष्ट हो जाते हैं—

लुब्धमर्थप्रदानेन श्लाघ्यमञ्जलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च याथातथ्येन पण्डितम्॥
सद्भावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषा द्विजाः।
इतरे खाद्यपानेन मानदानेन पण्डिताः॥
(१०९।१०-११)

प्रणिपात-निवेदनसे उत्तम प्रकृतिवाले सज्जन पुरुषको, भेद-नीतिसे धूर्त तथा अपनी अपेक्षा कम पराक्रमवाले व्यक्तिको थोड़ा-बहुत देकर और अपने समान पराक्रमवालेको अपनी अपेक्षाके अनुकूल धन देकर वशमें किया जा सकता है। जिसका जैसा स्वभाव हो, उसके अनुरूप वैसा ही प्रिय वचन बोलते हुए उसके हृदयमें प्रवेशकर चतुर व्यक्तिको यथाशीघ्र उसे अपना बना लेना चाहिये।

नदी, नख तथा शृंग धारण करनेवाले पशु, हाथमें शस्त्र धारण किये हुए पुरुष, स्त्री और राजपरिवार विश्वास करनेयोग्य नहीं होते। जो मनुष्य बुद्धिमान् है, उसको अपनी धनक्षति, मनस्ताप, घरमें हुए दुश्चरित्र, वञ्चना तथा अपमानकी घटनाको दूसरेके समक्ष प्रकाशित नहीं करना चाहिये—

नदीनां च नखीनां च शृङ्गिणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च॥
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान् न प्रकाशयेत्॥
(१०९।१४-१५)

नीच और दुर्जन व्यक्तिका सांनिध्य, अत्यन्त विरह तथा सम्मान, दूसरेके प्रति स्नेह एवं दूसरेके घरमें निवास—ये सभी नारीके उत्तम शीलको नष्ट करनेवाले हैं।

किसके कुलमें दोष नहीं है, रोगसे कौन पीडित नहीं है, कौन दुःखी नहीं है और किसकी धन-सम्पत्तियाँ सदैव विद्यमान रही हैं? इस पृथिवीपर धन प्राप्त कर कौन अहंकारसे भरा नहीं है, किसपर विपत्तियाँ आयी नहीं हैं, स्त्रियोंके द्वारा किसका मन क्षुब्ध नहीं किया गया है और राजाओंका कौन प्रिय रहा है? कौन कालकवलित नहीं हुआ है, किस याचकका स्वाभिमान नष्ट नहीं हुआ है, कौन दुर्जनके जालमें फँसकर कुशलपूर्वक जीवनयापन कर सकता है? (अर्थात् कोई नहीं कर सकता।)

जिस मनुष्यके मित्र, स्वजन, बन्धु-बान्धव नहीं हैं, जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं है, वह कैसे अपने जीवनमें सफल हो सकता है और जिस कर्मके सम्पन्न होनेपर भी फलका उदय नहीं दीख रहा है, उस कर्मके अनुष्ठानसे क्या लाभ? ऐसे ही जो सम्पत्ति परिणाममें बहुत बड़ा दुःख देनेवाली है, उसका संग्रह कौन बुद्धिमान् व्यक्ति करेगा?

जिस देशमें व्यक्तिको सम्मान न मिले, आदर भी न मिले, अपने बन्धु-बान्धव भी सुलभ न हों और विद्या-लाभकी भी सम्भावना न बनती हो, उस देशका परित्याग कर देना चाहिये।

जिस धनके लिये राजा और चोरसे भय नहीं है, जो धन मरनेपर भी मनुष्यका साथ नहीं छोड़ता, उस धनका उपार्जन करना चाहिये। प्राणोंको भी संकटमें डाल देनेवाले परिश्रमसे जिस धनका अर्जन किया जाता है, उस धनको तो उत्तराधिकारी


१-कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः। केन न व्यसनं प्राप्तं श्रियः कस्य निरन्तराः॥
कोऽर्थं प्राप्य न गर्वितो भुवि नरः कस्यापदो नागताः स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः।
कः कालस्य न गोचरान्तरगतः कोऽर्थी गतो गौरवं को वा दुर्जनवागुरानिपतितः क्षेमेण यातः पुमान्॥(१०९।१७-१८)

९४- नीतिसार

काण्ड ] नीतिसार-निरूपण १९३

लोग यथोचित विभागके साथ अपने काममें ले लेते हैं; परंतु प्राणोंको संकटमें डालकर धनार्जनके लिये परिश्रम करनेवाला व्यक्ति धनके लोभमें जिन पापोंको करता है, वे पाप ही उसकी धरोहर बनकर उसकी नरक-यातनाके अथवा कुत्सित योनिके कारण बनते हैं।

संचित किया हुआ तथा बार-बार विचार करके सुरक्षित रखा हुआ, कदर्य (कृपण)-का धन चूहेके द्वारा एकत्रित किये गये धनके तुल्य है। ऐसा धन दुःख देनेके लिये ही होता है। उपार्जनकर्ताको उससे कोई भी सुख प्राप्त नहीं होता। ऐसा व्यक्ति मात्र धनार्जनका कष्ट ही भोगता है।

ऐसे ही व्यक्ति जन्मान्तरमें दरिद्र होनेके कारण नग्न होकर अनेक प्रकारके व्यसनसे त्रस्त हो रूखे स्वभाववाले हो जाते हैं तथा हाथमें खप्पर लेकर घर-घर भीख माँगते हैं और यह लोगोंको बताते हैं कि दान न देनेवालेको ऐसा ही फल मिलता है। ऐसे भिक्षुक कुछ दीजिये, कुछ दीजिये—ऐसी बार-बार याचना करते हुए संसारको यह शिक्षा प्रदान करते हैं कि दान न देनेवाले मनुष्यकी यही दशा होती है। आपकी भी मेरी-जैसी दुर्दशा न हो, इसलिये आपको दान देना चाहिये*।

कृपण अपने द्वारा संचित धन यज्ञोंमें नहीं लगा पाता है और अपने द्वारा माँगकर इकट्ठा किये धनको गुणवानोंको भी नहीं देता है। इस प्रकारका कृपणके द्वारा सुरक्षित धन चोर और राजाके काममें ही आता है। कृपणका धन देवता, ब्राह्मण, बन्धु तथा आत्महितके लिये नहीं होता, वह तो अग्नि, चोर अथवा राजाके लिये होता है। अत्यन्त कष्टसे अर्जित किया गया धन, धर्मका अतिक्रमण करके अर्जित किया गया धन अथवा शत्रुको साष्टाङ्ग प्रणाम करके और उसकी अधीनता स्वीकार करके प्राप्त किया गया धन—इस प्रकारका धन तुझे कभी प्राप्त न हो।

विद्याका अभ्यास न करनेसे वह विनष्ट हो जाती है। शक्ति रहते हुए फटे-पुराने, मैले-कुचैले वस्त्रोंको धारण करनेवाली स्त्रियाँ सौभाग्यकी रक्षा नहीं कर पातीं, सुपाच्य भोजनसे रोग नष्ट हो जाता है और चातुर्यपूर्ण नीतिसे शत्रु़का विनाश हो जाता है।

चोरका वध ही उसका दण्ड है। दुष्ट मित्रके लिये समुचित दण्ड उसके साथ अल्प वार्तालाप करना है। स्त्रियोंका दण्ड उनसे पृथक् शय्यापर शयन करना तथा ब्राह्मणके लिये दण्ड निमन्त्रण न देना है।

दुर्जन, शिल्पकार, दास तथा दुष्ट एवं ढोलक आदि वाद्य और स्त्री आदि सम्यक् अनुशासनसे ही मृदु-स्वभावको प्राप्त करते हैं। ये सत्कारमात्रसे मृदु स्वभाववाले नहीं हो पाते।

कार्यमें संलग्न करनेसे भृत्य, दुःख होनेपर बन्धु-बान्धव, विपत्तिकालमें मित्र तथा ऐश्वर्यके नष्ट होनेपर स्त्रीके स्वभावकी परीक्षा करनी चाहिये—

जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे।
मित्रमापदि काले च भार्यां च विभवक्षये॥
(१०९।३२)

पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका आहार दुगुना, बुद्धि चौगुनी, कार्यकी क्षमता छःगुनी और कामवासना आठगुनी अधिक मानी गयी है। स्वप्नसे निद्राको नहीं जीता जा सकता, कामवासनासे स्त्रीपर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती, ईंधनसे अग्निको तृप्त नहीं किया जा सकता तथा मद्यसे प्यास नहीं बुझायी जा सकती। मांसयुक्त स्निग्ध भोजन, नाना प्रकारकी मदिराओंका पान, सुगन्धित द्रव पदार्थोंका


* शिक्षयन्ति च याचन्ते देहीति कृपणा जनाः। अवस्थेयमदानस्यः मा भूदेवं भवानपि ॥ (१०९।२५)

१९४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

विलेपन, सुन्दर वस्त्र और सुवासित माल्याभरण— ये स्त्रियोंकी कामवासनाकी अभिवृद्धि करते हैं। जैसे लकड़ियोंके अधिक-से-अधिक ढेरको प्राप्त करके भी अग्नि संतुष्ट नहीं होती; नदीसमूहके मिलनेपर भी समुद्र तृष्णारहित होकर संतृप्त नहीं होता; यमराज सभी प्राणियोंका संहार करके भी आत्मसंतुष्टि प्राप्त करनेमें असमर्थ हैं; ऐसे ही नारी असंख्य पुरुषोंके साथ सम्पर्क करके भी संतृप्त नहीं होती।

शिष्ट व्यक्ति (सुशील), अभीष्ट-सिद्धि, प्रियवचन, सुख, पुत्र, जीवन और देवगुरुसे प्राप्त आशीर्वचनसे मनुष्यकी इच्छाएँ परिपूर्ण नहीं होतीं, इनके लिये अभिलाषा बढ़ती ही रहती है। धनके संग्रहसे राजा, नदियोंकी जलराशिसे समुद्र, सम्भाषणसे विद्वान् एवं राजदर्शनसे प्रजाके नेत्र संतुष्ट नहीं हो पाते।

अपने विहित कर्म तथा धर्माचरणका पालन करते हुए जीविकोपार्जनमें तत्पर, सदैव शास्त्र-चिन्तनमें रत तथा अपनी स्त्रीमें अनुरक्त, जितेन्द्रिय और अतिथिसेवामें निरत श्रेष्ठ पुरुषोंको तो घरमें भी मोक्ष प्राप्त हो जाता हैं।

जिस सत्कर्मनिरत पुरुषके पास मनोऽनुकूल, सुन्दर वस्त्राभूषणसे अलंकृत स्त्री है, यदि वह व्यक्ति उसके साथ अपने भवनकी अटारीपर सुखपूर्वक निवास करता है तो उसके लिये यहींपर स्वर्गका सुख है।

जो स्त्रियाँ स्वभावसे ही धर्म-विरुद्ध आचरण करनेवाली एवं पतिके प्रतिकूल व्यवहार रखनेवाली हैं, वे स्त्रियाँ न धन आदिके दान, न सम्मान, न सरल व्यवहार, न सेवाभाव, न शस्त्र-भय और न शास्त्रोपदेशसे ही अनुकूल की जा सकती हैं, वे तो सदा प्रतिकूल ही रहती हैं²।

विद्यार्जन, अर्थ-संग्रह, पर्वतारोहण, अभीष्ट-सिद्धि तथा धर्माचरण—इन पाँचोंको धीरे-धीरे प्राप्त करना चाहिये।

देवपूजनादिक कर्म, ब्राह्मणको दान, गुणवती विद्याका संग्रहण तथा सन्मित्र—ये सदा सहायक होते हैं। जिन्होंने बाल्यकालसे विद्यार्जन नहीं किया है, जिनके द्वारा युवावस्थामें धन और स्त्रीकी प्राप्ति नहीं की जा सकी है, वे इस संसारमें शोकके पात्र हैं और मनुष्यरूप धारण करके पशुवत् विचरण करते हुए दुःखसे परिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।

विद्याके उपासकको अध्ययन-कालमें भोजनकी चिंता नहीं करनी चाहिये। विद्यार्थीको विद्यार्जनके लिये गरुडके समान सुदूर देशको यथाशीघ्र पार कर लेना चाहिये।

जो बाल्यावस्थामें विद्याध्ययन नहीं करते हैं और फिर युवावस्थामें कामातुर होकर यौवन तथा धनको नष्ट कर देते हैं, वे वृद्धावस्थामें चिंतासे जलते हुए शिशिरकालमें कुहरेसे झुलसनेवाले कमलके समान संतप्त जीवन व्यतीत करते हैं।

शुष्क तर्क स्वयंमें अप्रतिष्ठित है, अतः किसी सिद्धान्तकी स्थापना केवल तर्कके द्वारा नहीं हो सकती। श्रुतियाँ भी अनेक प्रकारकी हैं। ऐसा कोई भी ऋषि नहीं है जो भिन्न-भिन्न प्रसंगोंमें विभिन्न सिद्धान्तोंका निर्देश न करे। इसीलिये धर्मका तत्त्व न तर्कोंमें निहित है, न श्रुतियोंमें निहित है, अपितु आप्तोंकी प्रज्ञामें निहित है। फलतः शिष्ट लोग जिस मार्गका अनुसरण करते हैं, उसी मार्गको अपना


१-स्वकर्मधर्मार्जितजीवितानां शास्त्रेषु दारेषु सदा रतानाम्॥
जितेन्द्रियाणामतिथिप्रियाणां गृहेऽपि मोक्षः पुरुषोत्तमानाम्॥ (१०९।४३)
२-न दानेन न मानेन नार्जवेन न सेवया। न शस्त्रेण न शास्त्रेण सर्वथा विषमाः स्त्रियः॥ (१०९।४५)

काण्ड ] नीतिसार १९५


धर्म समझना चाहिये<sup></sup>
आकार, संकेत, गति, चेष्टा, वाणी, नेत्र और मुखकी भावभंगिमासे प्राणीके अन्तःकरणमें छिपा हुआ भाव प्रकट होता रहता है<sup></sup>। विद्वान् वह है जो दूसरेके द्वारा अकथित विषयको भी जान लेता है। बुद्धि वह है जो दूसरोंके संकेतमात्रसे भी वास्तविकताको समझ ले। कथित शब्दका अर्थ तो पशु भी जान लेते हैं। मनुष्यके दिखाये गये मार्गका अनुसरण तो हाथी और घोड़े भी करते हैं।
(अध्याय १०९)


नीतिसार

श्रीसूतजीने कहा—जो व्यक्ति सुनिश्चित अर्थका परित्याग कर अनिश्चित पदार्थोंका सेवन करता है, उसका सुनिश्चित अर्थ विनष्ट हो जाता है और अनिश्चित पदार्थ तो नष्ट होता ही है—
यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवाणि निषेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति ह्यध्रुवं नष्टमेव च॥
(११०।१)

वाग्वैभवसे रहित व्यक्तिकी विद्या और कायर पुरुषके हाथमें विद्यमान अस्त्र वैसे ही उन्हें संतुष्टि नहीं प्रदान करते, जैसे अपने अंधे पतिके साथ रहती हुई उसकी स्त्री अपने रूप-लावण्यसे पतिको संतृप्त नहीं कर पाती।

सुन्दर भोज्य पदार्थ भी उपलब्ध हो और भोजनकी शक्ति भी हो, रूपवती स्त्री भी हो और सहवास करनेकी क्षमता भी हो तथा धन-वैभव भी हो और दान करनेकी सामर्थ्य भी हो—ये अल्प तपके फल नहीं हैं।

वेदोंका फल अग्निहोत्र है, विद्याका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्रवान् होना है तथा धनका फल है दान और भोग।

विद्वान् व्यक्तिको श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न कुरूप कन्याके साथ भी विवाह कर लेना चाहिये, किंतु रूपवती एवं अच्छे लक्षणोंवाली उत्तम कुलसे हीन कन्या उसके लिये कभी भी ग्राह्य नहीं है। मनुष्यको उस अर्थसे क्या लाभ है, जिस अर्थका साथ अनर्थसे होता है? क्योंकि कोई व्यक्ति सर्पके फणपर विद्यमान मणिको प्राप्त करना नहीं चाहता।

अग्निहोत्रके लिये हविष्यान्न दुष्ट कुलसे भी ग्राह्य है। बालकसे भी सुभाषित ग्रहण करना उचित है। अमेध्य अर्थात् अपवित्र स्थानसे स्वर्ण और हीन कुलसे स्त्रीरूपी रत्न भी मनुष्यके लिये संग्राह्य है। विषसे अमृत ग्राह्य है, अपवित्र स्थलसे भी स्वर्ण ग्राह्य है तथा नीच व्यक्तिसे श्रेष्ठ विद्या भी ग्रहण करने योग्य है और दुष्कुलसे भी स्त्री-रत्न ग्राह्य है।

राजाके साथ मित्रभाव और सर्पका विषहीन होना सम्भव नहीं है। वह कुल पवित्र नहीं रहता, जिस कुलमें स्त्रियाँ ही उत्पन्न होती हैं। अपने कुलके साथ भगवद्भक्तका सम्पर्क कर देना चाहिये, पुत्रको विद्याध्ययनमें लगाना चाहिये, शत्रुको व्यसनमें जोड़ देना चाहिये तथा जो अपने इष्टपुरुष हैं, उन्हें धर्ममें नियोजित करना चाहिये।

विद्वान् मनुष्यको नौकर और आभूषणोंको यथोचित स्थानपर नियुक्त करना चाहिये, क्योंकि चूड़ामणि कभी चरणमें सुशोभित नहीं होती है। चूड़ामणि, समुद्र, अग्नि, घण्टा, अखण्ड अम्बर और राजा—ये सिरपर धारण करने योग्य होते हैं अर्थात् आदरणीय हैं। प्रमादवश भी इन्हें चरणमें स्थान नहीं देना चाहिये। मनस्वी व्यक्तिकी पुष्प-स्तबकके


१-तर्कोऽप्रतिष्ठा श्रुतयो विभिन्नाः नासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥ (१०९।५१)
२-अकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च। नेत्रवक्त्रविकाराभ्यां लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः॥ (१०९।५२)

१९६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

समान दो ही स्थितियाँ होती हैं—या तो वह सबके सिरपर ही रहता है अथवा वनमें ही चला जाता है। मणि स्वर्णाभूषणमें संनिविष्ट करनेके योग्य होती है। यदि वह मणि लाखसे निर्मित आभूषणमें संनिहित की जाती है तो उस कुसंगतिके कारण वह न स्वयं संक्षुब्ध होकर विलाप करती है और न सुशोभित ही होती है। अश्व, गज, लौह, काष्ठ, पाषाण, वस्त्र, नारी, पुरुष तथा जल—इनमें परस्पर बहुत बड़ा अन्तर है।

तिरस्कृत होनेपर भी धैर्यसम्पन्न सज्जन व्यक्तिके गुण कभी भी आन्दोलित नहीं होते। दुष्टके द्वारा नीचे कर दी गयी अग्निकी भी शिखा कभी नीचे नहीं जाती।

उत्तम जातिका अश्व अपने स्वामीका चाबुक-प्रहार, सिंह-हाथीकी गर्जना और वीर पुरुष शत्रुपक्षकी भयंकर गर्जना सहन नहीं कर सकता।

यदि सज्जन मनुष्य दुर्भाग्यवश कदाचित् वैभवरहित हो जाता है तो भी वह न तो दुष्ट जनोंकी सेवा करनेकी अभिलाषा रखता है और न नीच जनोंका सहारा लेता है। भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेपर भी सिंह घास नहीं खाता, अपितु हाथियोंके गर्म रक्तका ही पान करता है।

जिस मित्रमें एक बार भी दुष्ट भाव परिलक्षित हो जाता है और पुनः उसीसे मैत्री सम्बन्ध स्थापित करनेकी जो इच्छा करता है, वह मानो अश्वतरी (खच्चरी)-के द्वारा धारण किये गये गर्भके सदृश मृत्युको ही प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है।

शत्रुकी मृदुभाषी संतानोंकी उपेक्षा करना बुद्धिमान् जनोंके लिये उचित नहीं है; अर्थात् प्रिय बोलनेवाले शत्रुपुत्रोंसे भी सावधान रहना चाहिये; क्योंकि समय आनेपर वे ही असह्य दुःख-प्रदाता एवं विषपात्रके समान भयंकर विपत्ति उत्पन्न करनेवाले हो जाते हैं।

उपकारके द्वारा वशीभूत हुए शत्रुसे अन्य शत्रुको समूल उखाड़ फेंकना चाहिये, क्योंकि पैरमें गड़े हुए काँटेको मनुष्य हाथमें लिये हुए काँटेसे ही निकालता है।

सज्जन व्यक्तिको अपकारपरायण मनुष्यके नाशकी चिंता कभी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह नदीके तटपर अवस्थित वृक्षोंकी भाँति स्वयं ही नष्ट हो जाता है।

अर्थका रूप धारण करनेवाले अनर्थ और अनर्थका रूप धारण करनेवाले अर्थ—ये दैवाधीन पुरुषके विनाशके लिये होते हैं। कभी-कभी कार्यकालके भेदसे निष्पाप बुद्धि उत्पन्न हो जाती है; क्योंकि दैवके अनुकूल रहनेपर पुरुषका सर्वत्र कल्याण ही होता है। धनार्जन करते समय, किसी भी प्रकारका प्रयोग करते समय, अपने कार्यको सिद्ध करते समय, भोजनके समय और सांसारिक व्यवहारके समय मनुष्यको लज्जाका परित्याग कर देना चाहिये।

जिस देश, प्रान्त, नगर एवं ग्राममें धनवान्, श्रोत्रिय, राजा, नदी तथा वैद्य—ये पाँच नहीं रहते हैं, वहाँ बुद्धिमान् व्यक्तिका रहना उचित नहीं है*। जहाँ आना-जाना न हो, जहाँ अनुचित आचरणको रोकनेके लिये भयकी सम्भावना न हो, लज्जा न हो तथा दानकी प्रवृत्ति न हो, वहाँ तो एक भी दिन निवास नहीं करना चाहिये। जिस देश-प्रान्तादिमें दैवज्ञ, वेदज्ञ, राजा, नदी एवं सज्जन व्यक्ति—इन पाँचका निवास नहीं है, वहाँपर निवास नहीं करना चाहिये।

हे शौनक! एक ही व्यक्तिमें सभी ज्ञान प्रतिष्ठित रूपमें नहीं रहते हैं। इसलिये यह सर्वमान्य है कि सभी व्यक्ति सब कुछ नहीं जानते हैं और कहींपर भी सभी सर्वज्ञ नहीं हैं। इस संसारमें न तो कोई सर्वविद् है और न कोई अत्यन्त मूर्ख ही है। उत्तम, मध्यम तथा निम्नस्तरीय ज्ञानसे जो व्यक्ति जितना जानता है, उसे उतनेमें विद्वान् समझा जाना चाहिये।

(अध्याय ११०)


* धनिनः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संस्थितिम्॥ (११०। २६)

काण्ड ] राजनीति-निरूपण [ १९७

राजनीति-निरूपण

सूतजीने कहा—राजाको चाहिये कि वह सदैव सबकी भलीभाँति परीक्षा करता रहे। सत्यपरायण तथा धर्मपरायण राजा ही नित्य राज्यका पालन करनेमें समर्थ होता है, उसे चाहिये कि वह शत्रुसेनाओंको जीतकर धर्मपूर्वक पृथिवीका पालन करे।

राजाको जंगलमें मालीके समान पुष्पवृक्षसे पुष्प ग्रहण करना चाहिये, किंतु कोयला बनानेवालेके समान वृक्षका मूलोच्छेद नहीं करना चाहिये। अर्थात् राज्यरूपी वनमें राजाको अपनी प्रजासे कर ग्रहण करते समय मालीके सदृश आचरण करना चाहिये, वृक्ष काटकर कोयला बनानेवाले अंगारकका आचरण उसके लिये सर्वथा त्याज्य है।

जिस प्रकार दूध दुहनेवाले दुग्धका पान करते हैं, किंतु विकृत हो जानेपर उसका उपभोग नहीं करते, उसी प्रकार राजाओंको चाहिये कि वे परराष्ट्रका उपभोग तो करें, किंतु उसको दूषित न करें।<sup></sup> जिस प्रकार दुग्ध-प्राप्तिके इच्छुक मनुष्य गौके स्तनसे दुग्ध तो निकाल लेते हैं, परंतु उसके स्तनको काटते नहीं; इसी प्रकार राजाके द्वारा प्रयुक्त इस नीतिसे अर्थात् कर-रूपमें सम्पूर्ण धन ग्रहण करनेसे पीड़ित राष्ट्र अभ्युदयको प्राप्त नहीं करता है। अतएव राजाको सब प्रकारसे पृथिवीका पालन करना चाहिये; क्योंकि ऐसे राजाके पास ही भूमि, कीर्ति, आयु, प्रतिष्ठा और पराक्रम विद्यमान रहते हैं।

नित्य भगवान् विष्णुकी पूजा करके जो धार्मिक राजा गौ-ब्राह्मणके हितमें रत रहता है, वही जितेन्द्रिय राजा प्रजाके पालनमें समर्थ हो सकता है।

ऐश्वर्य अस्थायी होता है। अतः प्राप्त हुए अस्थिर ऐश्वर्यमें आसक्त न होकर राजाको धर्माचरणमें अपनी बुद्धिको लगाना चाहिये। धन-सम्पत्ति आदि तो क्षणभरमें ही नष्ट हो जाता है, क्योंकि धन आदि अपने अधीन नहीं हैं।<sup></sup> मनको रमणीय लगनेवाली स्त्रियाँ सत्य हो सकती हैं, विभूतियाँ (धन-सम्पत्ति) भी सत्य हो सकती हैं, किंतु यह जीवन तो स्त्रीके कटाक्षपातकी भाँति चंचल (असत्य) है। शरीरमें स्थित वृद्धावस्था सिंहनीके समान भयभीत करती रहती है, रोग शत्रुकी भाँति शरीरमें उत्पन्न होते रहते हैं। आयु फूटे हुए घड़ेसे निकलते हुए जलके सदृश क्षीण होती जाती है, फिर भी इस संसारमें कोई भी मनुष्य आत्महित-चिन्तनमें प्रवृत्त नहीं होता।<sup></sup>

हे मनुष्यो! इस क्षणभंगुर जीवनमें आप सब निश्चिन्त क्यों हैं? दूसरेका हित करना ही उचित है, जो बादमें कल्याणकारी है। इस परोपकार-धर्मसे विपरीत कामिनियोंके मन्द-मन्द कटाक्षपातसे कामपीड़ित आप सबके द्वारा जो आनन्द प्राप्त किया जाता है, क्या उसीमें आप सभीका हित संनिहित है? ऐसे आचरणमें तो कभी भी हित सम्भव नहीं है। अतः इस प्रकारका पाप न करें। आप सभीको सदैव ब्राह्मण, विष्णु और उस परात्पर ब्रह्मका विधिवत् निरन्तर भजन करना चाहिये; क्योंकि जलमें डूबे हुए घटके समान आयु मृत्युके बहाने एक दिनमें ही समाप्त हो सकती है,


१-दोग्धारः क्षीरभुञ्जाना विकृतं तन्न भुञ्जते। परराष्ट्रं महीपालैर्भोक्तव्यं न च दूष्येत्॥ (१११।४)
२-ऐश्वर्यमध्रुवं प्राप्य राजा धर्मे मतिं चरेत्। क्षणेन विभवो नश्येन्नात्मायत्तं धनादिकम्॥ (१११।८)
३-सत्यं मनोरमाः कामाःसत्यं रम्या विभूतयः। किंतु वै वनितापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम्॥
व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती रोगाश्च शत्रव इव प्रभवन्ति गात्रे।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो लोको न चात्महितमाचरतीह कश्चित्॥ (१११।९-१०)

९५- नीतिसार

१९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अथवा वह धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है।

जो मनुष्य परायी स्त्रियोंमें मातृभाव रखता है, जो दूसरेके द्रव्योंको मिट्टी-पत्थरके ढेलेके समान नगण्य समझता है और सभी प्राणियोंमें अपने ही स्वरूपका दर्शन (आत्मदर्शन) करता है, वही विद्वान् है—

मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥
(१११।१२)

हे ब्राह्मणो! सत्य तो यही है कि राजागण अपनी आत्माके लिये ही राज्यप्राप्तिकी कामना करते हैं और इसीलिये सभी कार्योंमें अपनी वाणीका उल्लंघन भी सहन नहीं करते हैं तथा धनका संचय भी इसीके लिये करते हैं, किंतु राजाको भी अपनी रक्षा करके शेष बचे हुए धनका उपयोग द्विजातियोंके भरण-पोषणमें करना चाहिये।

ब्राह्मणोंका मूल मन्त्र ॐकार है। इस ॐकारकी उपासनासे राष्ट्रकी अभिवृद्धि होती है और योगसे राजा वृद्धिको प्राप्त करते हैं और किसी भी प्रकारकी व्याधियाँ उसे बाँध नहीं सकतीं।

सब प्रकारसे असमर्थ मुनिजन भी द्रव्योपार्जन करते हैं, फिर पुत्रवत् प्रजाका पालन करते हुए अर्थका संग्रह करनेवाले राजाके विषयमें क्या कहा जा सकता है? धनसंचय करना तो उसके लिये आवश्यक ही है।

जिसके पास धन है, उसीके मित्र एवं बन्धु-बान्धव हैं। वही इस संसारमें पुरुष है और वही धन-सम्पन्न व्यक्ति विद्वान् है। धनरहित होनेपर मनुष्यको मित्र, पुत्र, स्त्री तथा परिजन छोड़ देते हैं। धनवान् होनेपर पुनः वे सभी उसीका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं; क्योंकि इस संसारमें धन ही पुरुषका बन्धु है—

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
ते चार्थवन्तं पुनराश्रयन्ति ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः॥
(१११।१७-१८)

जो राजा शास्त्रोंके ज्ञानसे शून्य है, वह नेत्रोंके रहते हुए भी अन्धेके समान है; क्योंकि अन्धा व्यक्ति तो अपने गुप्तचरके द्वारा देख सकता है, किंतु शास्त्र-ज्ञानसे रहित राजा देखनेमें असफल ही रहता है—

अन्धो हि राजा भवति यस्तु शास्त्रविवर्जितः।
अन्धः पश्यति चारेण शास्त्रहीनो न पश्यति॥
(१११।१९)

जिस राजाके पुत्र, भृत्य, मन्त्री एवं पुरोहित तथा इन्द्रियाँ प्रसुप्त रहती हैं अर्थात् अपने-अपने कर्तव्यके पालनमें सावधान नहीं रहती हैं, उसका राज्य निश्चित ही चिरस्थायी नहीं होता। जिस [ज्ञान-सम्पन्न] व्यक्तिने [बुद्धिमान् तथा आलस्यरहित] पुत्र, भृत्य एवं परिजन—इन तीनोंको योग्यरूपमें प्राप्त किया है, वह राजाओंके सहित चारों समुद्रसे संयुक्त पृथिवीपर विजय प्राप्त कर लेता है।

जो राजा शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त सिद्धान्तोंका उल्लंघन करता है, वह निश्चित ही इस लोक एवं परलोक—दोनोंमें नष्ट हो जाता है<sup></sup>

आपत्कालके आनेपर राजाको दुःखी नहीं होना चाहिये, उसे समबुद्धि, प्रसन्नात्मा तथा सुख-दुःखमें समान रहना चाहिये। धैर्यवान् मनुष्य कष्ट प्राप्त करके भी दुःखी नहीं होते हैं, क्योंकि राहुके मुखमें प्रविष्ट होकर चन्द्र क्या पुनः उदित नहीं होता?<sup></sup> शरीरके लालन-पालनमें अनुरक्त जनोंके


१-लंघयेच्छास्त्रयुक्तानि हेतुयुक्तानि यानि च। स हि नश्यति वै राजा इह लोके परत्र च॥ (१११।२२)
२-धीराः कष्टमनुप्राप्य न भवन्ति विषादिनः। प्रविश्य वदनं राहोः किं नोदेति पुनः शशी॥ (१११।२४)

काण्ड ] राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण १९९

प्रति धिक्कार है! धिक्कार है!! मनुष्यको धनहीन होनेसे क्षीण हुए शरीरके प्रति भी खेद नहीं करना चाहिये। यह तो सुना ही गया है कि [पतिव्रता] पत्नीसहित पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर आदिने आपत्कालके दुःखसे मुक्त होकर पुनः सुख प्राप्त किया था। अतः अनुकूल समयकी प्रतीक्षा धैर्यके साथ करनी चाहिये।

गन्धर्व-विद्या, वाद्य, गणिकागण, धनुर्वेद और अर्थशास्त्रकी रक्षा राजाको करनी चाहिये, क्योंकि ये सभी अपनी-अपनी जगह राष्ट्रके लिये उपयोगी हैं। जो राजा भृत्यपर अकारण क्रोध करता है, वह काले भयंकर नागसे छोड़े गये विषसे ग्रस्त उन्मादको प्राप्त करता है।

राजाको कभी भी श्रोत्रियके प्रति, भृत्यके प्रति किं बहुना मानवमात्रके प्रति न कभी चपलदृष्टि रखनी चाहिये और न कभी भी मिथ्या वाक्यका प्रयोग करना चाहिये। जो राजा अपने योग्य भृत्य एवं योग्य स्वजनके बलपर गर्वित होकर शासनकी उपेक्षा करता है और मदान्ध होकर विलासी जीवन व्यतीत करता है, वह अति शीघ्र शत्रुओंसे पराजित हो जाता है।

राजाको क्रोधातुर होकर अहंकारमें भृकुटि टेढ़ी नहीं करनी चाहिये। जो राजा दोषरहित भृत्योंपर अधर्मपूर्वक शासन करता है, इस लोकमें उसके सभी विलासपूर्ण सुखोपभोग नष्ट हो जाते हैं। राजाको विलासी वस्तुओंका परित्याग कर देना चाहिये, परंतु धार्मिक राजाके सुखमें प्रवृत्त होनेपर भी उसके शत्रु युद्धमें पराजित हो जाते हैं।

उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम—ये छः प्रकारके जो साहस कहे गये हैं, इनसे समन्वित राजासे देवता भी सशंकित रहते हैं। उद्योग करनेपर यदि व्यक्तिको कार्यमें सफलता प्राप्त नहीं होती है तो उसमें भाग्य ही कारण है, तथापि मनुष्यको सदा पुरुषार्थ करते रहना चाहिये। प्रयत्नसे विरत नहीं होना चाहिये, क्योंकि इस जन्मका ही पौरुष अगले जन्ममें भाग्य बनता है।*

(अध्याय १११)


राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण

श्रीसूतजीने कहा—उत्तम, मध्यम और अधम-भेदसे भृत्योंके तीन प्रकार जानना चाहिये। अतः उनकी योग्यताके अनुसार ही उन्हें विभिन्न कार्योंमें लगाना चाहिये।

सर्वप्रथम भृत्योंकी परीक्षण-विधिको कहा जा रहा है, साथ ही जिस-जिस भृत्यका जो गुण है, उसका भी वर्णन किया जा रहा है।

घर्षण, छेदन, तापन और ताडन—इन चार विधियोंसे जिस प्रकार सुवर्णकी परीक्षा की जाती है, उसी प्रकार राजाको व्रत, शील, कुल तथा कर्म—इन चार प्रकारोंसे भृत्यकी परीक्षा करनी चाहिये।

कुल, शील तथा सद्गुणसे सम्पन्न, सत्य-धर्मपरायण, रूपवान् तथा प्रसन्नचित्त मनुष्यको कोषाध्यक्षके पदपर नियुक्त करना चाहिये। द्रव्योंके मूल्य और रूपकी परीक्षा करनेमें कुशल व्यक्तिको रत्न-परीक्षकके पदपर नियुक्त करना चाहिये। जो सैन्य-शक्तिके बलाबलका परिज्ञान प्राप्त करनेमें


* उद्योगः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षड्विधो यस्य उत्साहस्तस्य देवोऽपि शंकते ॥
उद्योगेन कृते कार्ये सिद्धिर्यस्य न विद्यते। दैवं तस्य प्रमाणं हि कर्तव्यं पौरुषं सदा ॥ (१११।३२-३३)

२००संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

निपुण हो, उसीको सेनाध्यक्ष बनाना चाहिये।

जो व्यक्ति संकेतमात्रसे स्वामीके अभिप्रायको समझनेमें समर्थ है, बलवान् तथा सुन्दर शरीरवाला है, प्रमादहीन एवं जितेन्द्रिय है, उसको प्रतीहारके पदपर नियुक्त करनेके लिये कहा गया है। जो मेधावी, वाक्पटु, विद्वान्, सत्यवादी, जितेन्द्रिय और सभी शास्त्रोंकी सम्यक् आलोचना करनेवाला हो, वही सज्जन व्यक्ति लेखकके पदका अधिकारी है। जो बुद्धिमान्, विवेकशील, दूसरेके चित्तका परिज्ञाता, शूर तथा यथोक्तवादी है, उसे दूतके पदपर नियुक्त करना चाहिये। जो मनुष्य समस्त स्मृतियों और शास्त्रोंका पण्डित है, जितेन्द्रिय, शौर्य एवं पराक्रमादि गुणोंसे सम्पन्न है, उसे धर्माध्यक्षके पदपर नियुक्त करना चाहिये।

जिसके पितृ-पितामह आदिकी परम्परामें रसोइयेका ही काम होता रहा हो और जो विशेषरूपसे पाकशास्त्रका जाननेवाला, सत्यवादी, पवित्र एवं दक्ष हो, ऐसा पुरुष रसोइयेके लिये उचित होता है।

जो आयुर्वेदशास्त्रका सम्यक् ज्ञान रखनेवाला, सौम्य स्वरूपसे सम्पन्न, सभीके लिये देखनेमें प्रिय लगनेवाला, आयु, शील और गुणोंसे सम्पन्न हो, वह वैद्यके पदका अधिकारी होता है। वेद-वेदाङ्गके तत्त्वोंको जाननेमें समर्थ, जप-होमपरायण, नित्य आशीर्वाद देनेमें तत्पर (अर्थात् राजाकी मङ्गलकामनामें अहर्निश दत्तचित्त) विद्वान् राजपुरोहितके योग्य होता है।

यदि लेखक, पाठक, गणक, प्रतिरोधक (प्रतीहार) आदि पदाधिकारी कार्य करनेमें आलस्य करते हों तो राजा सदैव उनको उस कार्यसे पृथक् कर दे।

जो दो प्रकारकी बात करता है, उद्वेगकर वाणी बोलता है, क्रूरकर्मा है तथा अत्यन्त दारुण है, ऐसे दुष्ट व्यक्ति और सर्पका मुख—ये मात्र दूसरेके अपकारके लिये ही होते हैं। विद्यासे सुशोभित होनेपर भी दुर्जन व्यक्तिका परित्याग कर देना चाहिये, मणिसे अलंकृत सर्प क्या भयंकर नहीं होता?<sup></sup>

अकारण क्रोध करनेवाले दुष्टसे किस व्यक्तिको भय नहीं रहता? अर्थात् ऐसे दुष्टसे सभी भयभीत रहते हैं; क्योंकि महाभयंकर नागराजका विष तथा दुष्टका कुत्सित वचन दूसरेके लिये असहनीय होता ही है।

राजाको अपने समान धन-वैभवसे सम्पन्न, पौरुष और ज्ञानमें समकक्ष एवं अपने रहस्यको जाननेवाले और उद्योगशील भृत्यको पूर्णरूपसे निष्प्रभावी बना देना चाहिये, अन्यथा राजा निश्चित ही अपने राज्यसे भ्रष्ट हो जाता है; क्योंकि ऐसा भृत्य राज्यका अपहारक ही होता है।

आरम्भमें जो भृत्य शूरता दिखाये, मधुर और धीमे वाक्य बोले, जितेन्द्रियके रूपमें स्वयंको प्रदर्शित करे और साथ ही पराक्रमशीलता भी प्रदर्शित करे पर बादमें इसके विपरीत आचरण करे, ऐसे भृत्य हितैषी नहीं होते। आलस्यरहित, अच्छी तरहसे संतुष्ट, अनिद्रारोगसे रहित, सदा सजग रहनेवाले, सुख-दुःखमें स्थिर-मतिवाले तथा धैर्यसम्पन्न भृत्य इस जगत्में दुर्लभ हैं।<sup></sup> क्षमासे रहित, सत्यविहीन, क्रूरबुद्धि, निन्दक, अहंकारी, कपटी, शठ, लोभी, पौरुषहीन और भयभीत होनेवाला भृत्य राजाके लिये त्याज्य है। ऐसे व्यक्तिको किसी भी राज्य-कार्यमें नियुक्त नहीं करना चाहिये।

राजाको दुर्ग (किले)-में संधान किये जाने योग्य अस्त्र तथा विविध प्रकारके शस्त्रोंका अच्छी प्रकारसे


१-दुर्जनः परिहर्त्तव्यो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्। मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः ॥ (११२। १५)
२-निरालस्याः सुसंतुष्टाः सुस्वप्नाः प्रतिबोधकाः। सुखदुःखसमा धीरा भृत्या लोकेषु दुर्लभाः॥ (११२।१९)

काण्ड ] नीतिसार २०९


संग्रह करना चाहिये। ऐसा करनेसे राजा शत्रुको पराजित कर सकता है। परिस्थितिके अनुसार संधिकी अनिवार्यता होनेपर राजाको शत्रुके साथ छः मास अथवा एक वर्षपर्यन्त ही संधि करनी चाहिये। उसके बाद अपनी संचित सामर्थ्यको देखते हुए शत्रुको पराजित करना चाहिये। जो राजा राज्यकार्यमें मूर्ख व्यक्तिको नियोजित करता है, उस राजाको अपयश, धन-विनाश तथा नरकभोग-ये तीन प्राप्त होते हैं।

जो राजा भृत्योंकी सूक्ष्म कार्यप्रणालीके द्वारा जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म करता है, उसीके अनुसार ही वह भविष्यमें अभिवृद्धि या ह्रासको प्राप्त करता है। अतः राजाको धर्म-अर्थ तथा काम-इस त्रिवर्गकी साधना एवं गौ-ब्राह्मणकी अभिरक्षाके लिये राज्यकार्यमें सर्वगुणसम्पन्न विद्वान् व्यक्तिको ही नियुक्त करना चाहिये।
(अध्याय ११२)


नीतिसार

श्रीसूतजीने कहा-राजाको राज्यकार्यमें गुणवान् पुरुषकी नियुक्ति और गुणहीनका परित्याग करना चाहिये। विद्वान् व्यक्तिमें सभी गुण विद्यमान रहते हैं, किंतु मूर्ख व्यक्तिमें तो केवल दोष ही रहते हैं।

निरन्तर सज्जनोंके साथ रहना चाहिये और सज्जनोंकी ही संगति करनी चाहिये। विवाद एवं मैत्री भी सज्जनोंके साथ ही करनी चाहिये। दुर्जनोंके साथ कुछ भी नहीं करना चाहिये। पण्डित, विनीत, धर्मज्ञ एवं सत्यवादी जनोंके साथ बन्धनमें भी रहना श्रेयस्कर है, किंतु दुष्टोंके साथ राज्यका भी उपभोग करना उचित नहीं है-

सद्बिरासीत सततं सद्भिः कुर्वीत संगतिम्।
सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किंचिदाचरेत् ॥
पण्डितैश्च विनीतैश्च धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः।
बन्धनस्थोऽपि तिष्ठेच्च न तु राज्ये खलैः सह ॥
(११३।२-३)

सभी कार्योंको पूर्ण कर लेना चाहिये। कोई काम अधूरा नहीं छोड़ना चाहिये। इससे सभी प्रकारके अर्थोंकी प्राप्ति हो जाती है।

जिस प्रकार भ्रमर पुष्पके परागको ग्रहण कर लेता है, किंतु पुष्पको नष्ट नहीं करता; जैसे दूध दुहनेवाला व्यक्ति बछड़ेके हितको ध्यानमें रखते हुए दूधको दुहता है, वैसे ही राजाको प्रजाहितका ध्यान रखते हुए प्रजासे करका दोहन करना चाहिये। जिस प्रकार मधुमक्खी एक-एक पुष्पसे मधुको ग्रहण कर उसे एकत्र करती है, उसी प्रकार राजाको भी प्रजासे धन-संग्रह करना चाहिये।<sup></sup> जैसे वल्मीक (बाँबी), मधुमक्खीका छत्ता तथा शुक्लपक्षका चन्द्रमा प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ता रहता है, वैसे ही राजाका द्रव्य तथा भिक्षा भी धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा धर्मपूर्वक संग्रह करनेसे बढ़ते रहते हैं।

समुचित रीतिसे अर्जित किये गये धनका भी क्षय होता ही है और श्रद्धापूर्वक दीयमान दान कोटिगुणित होकर यथासमय मिलता ही है—इस वास्तविकताको ध्यानमें रखते हुए अपना कोई भी दिन दान, अध्ययन या सत्कर्मसे विहीन नहीं होने देना चाहिये।<sup></sup> रागी व्यक्तिसे वनमें भी दोष हो जाते हैं। अतः घरमें मनुष्यके द्वारा किया गया पञ्चेन्द्रियोंका निग्रह तप ही है। जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर अनिन्दित कर्मोंमें प्रवृत्त हो सन्मार्गकी ओर


१-मधुहेव दुहेत् सारं कुसुमं च न घातयेत्। वत्सापेक्षी दुहेत् क्षीरं भूमिं गां चैव पार्थिवः ॥
यथा क्रमेण पुष्पेभ्यश्चिनुते मधु षट्पदः। तथा वित्तमुपादाय राजा कुर्वीत संचयम् ॥ (११३।५-६)
२-अर्जितस्य क्षयं दृष्ट्वा सम्प्रदत्तस्य संचयम्। अवन्ध्यं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु ॥ (११३।८)

९६- नीतिसार

२०२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

बढ़ता जाता है, उस विषयवासनाओंसे दूर निवृत्तमार्गवालेके लिये उसका घर ही तपोवन है।<sup></sup>

सत्यके पालनसे धर्मकी रक्षा होती है। सदा अभ्यास करनेसे विद्याकी रक्षा होती है। मार्जनके द्वारा पात्रकी रक्षा होती है और शीलसे कुलकी रक्षा होती है—

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते पात्रं कुलं शीलेन रक्ष्यते॥
(११३।१०)

विन्ध्याटवीमें निवास करना मनुष्यके लिये अच्छा है, बिना भोजन किये ही मर जाना श्रेयस्कर है, सर्पसे परिव्याप्त भूमिपर सोना तथा कुएँमें गिरकर मृत्युको प्राप्त करना उचित है, जलके आवर्तयुक्त भयंकर भँवरमें डूब मरना श्रेष्ठ है; किंतु अपने ही पक्षके आत्मीय जनसे 'थोड़ा धन मुझे दे दें' इस प्रकार याचना करना अच्छा नहीं है।<sup></sup> भाग्यका ह्रास होनेसे मनुष्यकी सम्पदाओंका विनाश होता है, न कि उपभोग करनेसे। पूर्वजन्ममें यदि पुण्य अर्जित है तो सम्पत्तिका नाश कभी नहीं हो सकता।

ब्राह्मणोंका आभूषण विद्या, पृथिवीका आभूषण राजा, आकाशका आभूषण चन्द्र एवं समस्त चराचरका आभूषण शील है—

विप्राणां भूषणं विद्या पृथिव्या भूषणं नृपः।
नभसो भूषणं चन्द्रः शीलं सर्वस्य भूषणम्॥
(११३।१३)

इतिहासप्रसिद्ध ये जो भीमसेन, अर्जुन आदि राजपुत्र हैं—ये सभी चन्द्रके समान कान्तिसम्पन्न, पराक्रमशील, सत्यप्रतिज्ञ, सूर्यके सदृश प्रतापशाली और स्वयं विष्णुके अवतारस्वरूप भगवान् कृष्णसे अभिरक्षित थे, फिर भी इन लोगोंको कृपण धृतराष्ट्रकी परवशताके कारण भिक्षाटन करना पड़ा। इस संसारमें कौन ऐसा है, जिसमें ऐसी सामर्थ्य है, जिसको भाग्यके वशीभूत होनेके कारण कर्मरेखा नहीं घुमाती ?<sup></sup>

जिस पूर्वसंचित कर्मके अधीन होकर ब्रह्मा कुम्भकारके समान ब्रह्माण्डरूपी इस महाभाण्डके उदरमें चराचर प्राणियोंकी सृष्टिमें नियमतः लगे रहते हैं, जिस कर्मसे अभिभूत होकर विष्णु दशावतारके कालमें परिव्याप्त असीमित महासंकटमें अपनेको डाल देते हैं, जिस कर्मके अनुसार ही सदाशिव रुद्र हाथमें कपाल धारणकर भिक्षाटन करते हैं और जिस कर्मसे सूर्य नित्य आकाशमें ही चक्कर काटते हैं—उस कर्मको मैं नमस्कार करता हूँ।<sup></sup>

राजा बलि उत्कृष्ट कोटिके दाता थे और याचक स्वयं भगवान् विष्णु थे। विशिष्ट ब्राह्मणोंके समक्ष पृथिवीका दान दिया गया, फिर भी दानका फल बन्धन प्राप्त हुआ। यह सब दैवका खेल है, ऐसे इच्छानुसार फल देनेवाले दैवको नमस्कार है।<sup></sup>

यदि प्राणीकी माता स्वयं लक्ष्मी हों, पिता साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु हों, उसके बाद भी प्राणीको यदि कुबुद्धिमें ही विश्वास है तो उसको दण्ड भोगना ही पड़ेगा।

पूर्वजन्ममें प्राणीने जैसा कर्म किया है, उसी कर्मके


१-वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः।
अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम्॥ (११३।९)
२-वरं विन्ध्याटव्यां निवसनमभुक्तस्य मरणं वरं सर्पकीर्णे शयनमथ कूपे निपतनम्।
वरं भ्रान्तावर्ते सभयजलमध्ये प्रविशनं न तु स्वीये पक्षे हि धनमणु देहीति कथनम्॥ (११३।११)
३-एते ते चन्द्रतुल्याः क्षितिपतितनया भीमसेनार्जुनाद्याः शूराः सत्यप्रतिज्ञा दिनकरवपुषः केशवेनोपगूढाः।
ते वै दुष्टग्रहस्थाः कृपणवशगता भैक्ष्यचर्यां प्रयाताः को वा कस्मिन् समर्थो भवति विधिवशाद्भ्रामयेत् कर्मरेखा॥ (११३।१४)
४-ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे॥ (११३।१५)
५-दाता बलिर्याचकको मुरारिर्दानं महीं विप्रमुखस्य मध्ये। दत्त्वा फलं बन्धनमेव लब्धं नमोऽस्तु ते दैव यथेष्टकारिणे॥ (११३।१६)

काण्ड ] नीतिसार २०३


अनुसार वह दूसरे जन्ममें फल भोगता है। अतः स्वयमेव प्राणी अपने भोग्य फलका निर्माण करता है, अर्थात् वह कर्मफलका स्वयं ही विधाता है।

हम अपने सुख या दुःखके स्वयं ही हेतु हैं। माताके गर्भाशयमें आकर अपने पूर्वदेहमें किये गये कर्मोंके फल ही हमें भोगने पड़ते हैं। आकाश, समुद्र, पर्वतीय गुफा तथा माताके सिरपर और माताकी गोदमें अवस्थित रहते हुए भी मनुष्य निश्चित ही उन अपने पूर्वसंचित कर्मफलका परित्याग करनेमें समर्थ नहीं होता।

जिसका दुर्ग ही त्रिकूट पर्वत था, जिसकी परिखा समुद्र ही था, राक्षसगणसे जो अभिरक्षित था, स्वयं जो परम विशुद्ध आचरण करनेवाला था, जिसको नीतिशास्त्रकी शिक्षा शुक्राचार्यसे प्राप्त हुई थी, वह रावण भी काल-वश नष्ट हो गया।

जिस अवस्था, जिस समय, जिस दिन, जिस रात्रि, जिस मुहूर्त अथवा जिस क्षण जैसा होना निश्चित है; वह वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं हो सकता—

यस्मिन् वयसि यत्काले यद्दिवा यच्च वा निशि।
यन्मुहूर्ते क्षणे वापि तत्तथा न तदन्यथा॥
(११३।२२)

सभी अन्तरिक्षमें जा सकते हैं या भूगर्भमें प्रवेश कर सकते हैं अथवा दसों दिशाओंको अपने ऊपर धारण कर सकते हैं, किंतु अप्रदत्त वस्तुको प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

पूर्वजन्ममें अर्जित की गयी विद्या, दिया गया धन तथा सम्पादित कर्म ही दूसरे जन्ममें आगे-आगे मिलते जाते हैं। अर्थात् प्राणीने पूर्वजन्ममें जैसा कर्म किया है, उसको इस जन्ममें वैसा ही प्राप्त होता है<sup></sup>। इस संसारमें कर्म ही प्रधान है। सुन्दर नक्षत्र था, ग्रहोंका योग था, स्वयं वसिष्ठ मुनिके द्वारा निर्धारित लग्नमें विवाह-संस्कार कराये जानेपर भी जानकी—सीताको [पूर्वजन्ममें संचित कर्मके अनुसार] दुःख भोगना पड़ा। विशाल जंघाओंवाले श्रीराम, शब्दकी गतिसे चलनेवाले श्रीलक्ष्मण तथा सघन केशवाली शुभलक्षणा श्रीसीताजी—ये भी तीनों जब अपने कर्मके अनुसार दुःखके भाजन हो गये तो सामान्य जनके विषयमें कुछ कहना ही व्यर्थ है। न पिताके कर्मसे पुत्रको सद्गति मिल सकती है और न पुत्रके कर्मसे पिताको सद्गति मिल सकती है। सभी लोग अपने-अपने कर्मसे ही अच्छी गति प्राप्त करते हैं<sup></sup>

पूर्वजन्ममें अर्जित कर्मफलके अनुसार प्राप्त शरीरमें शारीरिक और मानसिक रोग उसी प्रकार आकर अपना दुष्प्रभाव प्रकट करते हैं, जिस प्रकार कुशल वीर धनुर्धरोंके द्वारा छोड़े गये बाण लक्ष्यको बेधकर कष्ट पहुँचाते हैं। बाल-युवा तथा वृद्ध जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, वह जन्म-जन्मान्तरमें उसी अवस्थाके अनुसार उस फलका भोग करता है। उस पूर्वार्जित फलको न देखनेवाला एवं विदेशमें रहता हुआ भी मनुष्य अपने कर्मरूपी जहाजके संयमित पवन-वेगके द्वारा उस फलतक पहुँचा दिया जाता है<sup></sup>

मनुष्य अपने प्रारब्धका फल प्राप्त करता है। देवता भी उस फलभोगको रोकनेमें समर्थ नहीं हैं।


१-पुराधीता च या विद्या पुरा दत्तञ्च यद्धनम्। पुरा कृतानि कर्माणि ह्यग्रे धावति धावति॥ (११३।२४)
२-कर्माण्यत्र प्रधानानि सम्यगृक्षे शुभग्रहे। वसिष्ठकृतलग्नाऽपि जानकी दुःखभाजनम्॥
स्थूलजंघो यदा रामः शब्दगामी च लक्ष्मणः। घनकेशी यदा सीता त्रयस्ते दुःखभाजनम्॥
न पितुः कर्मणा पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा। स्वयं कृतेन गच्छन्ति स्वयं बद्धाः स्वकर्मणा॥ (११३।२५–२७)
३-बालो युवा च वृद्धश्च यः करोति शुभाशुभम्। तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि॥
अनीक्षमाणोऽपि नरो विदेशस्थोऽपि मानवः। स्वकर्मपोतवातेन नीयते यत्र तत्फलम्॥ (११३।३०-३१)

२०४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

इसीलिये मैं कर्मफलके विषयमें चिन्ता नहीं करता हूँ और न मुझे आश्चर्य ही है, क्योंकि जो मेरा है, उसे दूसरा कोई नहीं ले सकता—

प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपि तं वारयितुं न शक्तः। अतो न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न तु तत्परेषाम्॥ (११३।३२)

जैसे साँप, हाथी और चूहा—ये शीघ्रतावश क्रमशः कुआँ, अपने वासस्थान तथा बिलतक ही भाग सकते हैं, इससे आगे कहाँतक जा सकते हैं ? इसी तरह अपने कर्म अथवा भाग्यसे कौन भाग सकता है? सब तो उसीके अधीन हैं।

सद्विद्या देनेसे उसी प्रकार बढ़ती रहती है कम नहीं होती, जिस प्रकार कुएँसे जल ग्रहण कर लेनेपर भी कुएँका जल बढ़ता ही रहता है [घटता नहीं]। जो धन धर्मानुसार अर्जित किया जाता है वही [वास्तविक] धन है। अधर्मसे प्राप्त हुआ धन तो मनुष्यके ऐश्वर्यका नाशक होता है। इस संसारमें धर्मार्थी ही महान् होता है। धनकी अपेक्षा करनेवाले मनुष्यको निश्चित ही श्रेष्ठजनोंके दृष्टान्तोंको स्मरण करके धनोपार्जनमें तत्पर होना चाहिये। अन्नार्थी कृपण व्यक्ति जिन दुःखोंको भोगता है, यदि धर्मार्थी होकर वह उन दुःखोंका चिन्तन करे तो पुनः उसको दुःखका पात्र होना ही न पड़े। सभी प्रकारकी शुचितामें अन्नकी शुचिता ही प्रधान है। जो मनुष्य अन्न और अर्थसे पवित्र है [वही शुचि है]। केवल मिट्टी और जलसे शुचिता नहीं आती।*

सत्यपालनमें शुचिता, मनःशुद्धि, इन्द्रियनिग्रह, सभी प्राणियोंमें दया और जलसे प्रक्षालन—ये पाँच प्रकारके शौच माने गये हैं। जिसमें सत्यपालनकी शुचिता है, उसके लिये स्वर्गकी प्राप्ति दुर्लभ नहीं है। जो मनुष्य सत्य ही सम्भाषण करता है, वह अश्वमेधयज्ञ करनेवाले व्यक्तिसे भी बढ़कर है—

सत्यं शौचं मनःशौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। सर्वभूते दया शौचं जलशौचं च पञ्चमम्॥ यस्य सत्यं हि शौचं च तस्य स्वर्गो न दुर्लभः। सत्यं हि वचनं यस्य सोऽश्वमेधाद्विशिष्यते॥ (११३।३८-३९)

दुष्ट स्वभावसे अपनी आत्माको दबाकर रखनेवाला दुराचारी पुरुष हजारों बार मिट्टीके लेप तथा सैकड़ों बार जलके प्रक्षालनसे पवित्र नहीं हो सकता। जिसके हाथ-पैर एवं मन सुसंयत हैं, जिसे अध्यात्म-विद्या प्राप्त है, जो धर्मपालनके लिये कष्ट सहन करता है तथा जिसने सत्कीर्ति अर्जित की है, वही तीर्थोंका यथार्थ फल भी भोगता है—

यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्। विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते॥ (११३।४१)

जो मनुष्य सम्मानसे प्रसन्न नहीं होता, अपमानसे क्रुद्ध नहीं होता एवं क्रोधके आनेपर मुँहसे कठोर वाक्य नहीं निकालता, ऐसे ही मनुष्यको साधुपुरुष समझना चाहिये—

न प्रहृष्यति सम्मानैर्नावमानैः प्रकुप्यति। न क्रुद्धः परुषं ब्रूयादेतत् साधोस्तु लक्षणम्॥ (११३।४२)

विद्वान्, मधुरभाषी भी कोई व्यक्ति यदि दरिद्र है तो उसके समयोचित हितकारी वचनको सुनकर भी कोई संतुष्ट नहीं होता है। यदि कोई मनुष्य


* येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण गताः श्रियः। धर्मार्थी च महाँल्लोके तत् स्मृत्वा ह्यर्थकारणात्॥
अन्नार्थी यानि दुःखानि करोति कृपणो जनः। तान्येव यदि धर्मार्थी न भूयः क्लेशभाजनम्॥
सर्वेषामेव शौचानामन्नशौचं विशिष्यते। योऽन्नार्थैः शुचिः शौचान्न मृदा वारिणा शुचिः॥ (११३।३५-३७)

काण्ड ] नीतिसार २०५


मन्त्र या बलके प्रभावसे अथवा बुद्धि और पौरुषके बलपर अलभ्य-अदृष्ट वस्तुको प्राप्त नहीं कर पा रहा है तो उस विषयमें मनुष्यको किसी प्रकारका खेद नहीं करना चाहिये।

अयाचित कोई वस्तु मुझे प्राप्त हो और पुनः वह मेरे पाससे चली जाय तो कष्ट होता है, किंतु जो जहाँसे आयी थी वह पुनः वहीं चली गयी तो उसमें कैसा दुःख? दुःख करनेका कोई औचित्य ही नहीं है। रात्रिमें सदैव एक ही वृक्षपर नाना प्रकारके पक्षियोंका समूह शरण लेता है, किंतु प्रातःकाल होते ही वे सभी भिन्न-भिन्न दिशाओंमें चले जाते हैं। उस आश्रयके विषयमें उन लोगोंको कौन-सा दुःख होता है? इसी दृष्टान्तको ध्यानमें रखकर मनुष्योंको वियोगजन्य दुःखमें खिन्न नहीं होना चाहिये। एक साथ सामूहिक रूपमें चलनेवालोंमें यदि कोई एक त्वरित गतिसे चल रहा है तो उससे ईर्ष्या क्यों की जाय?

हे शौनक! सभी प्राणियों या पदार्थोंकी उत्पत्तिके पूर्वमें स्थिति नहीं थी और निधनके अन्तमें भी उनकी स्थिति नहीं रहेगी। सभी पदार्थ मध्यमें ही विद्यमान रहते हैं। इसमें दुःख करनेकी क्या बात है—

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि शौनक।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
(११३।४८)

समय प्राप्त न होनेसे पहले प्राणी सैकड़ों बाण लगनेपर भी नहीं मरता और समयके आ जानेपर कुशकी नोंक लग जानेसे भी वह जीवित नहीं रहता¹। प्राप्त होने योग्य वस्तु ही प्राप्त होती है, गन्तव्य स्थानपर ही व्यक्ति जाता है। अतः प्राणीको जो दुःख-सुख प्राप्त होने योग्य है वही उसको प्राप्त होता है।

मनुष्य प्राप्त होने योग्य अमुक-अमुक वस्तुको ही प्राप्त करता है तो वह अभिलषित वस्तुके लिये नाना प्रकारसे प्रयास करके क्या प्राप्त कर लेगा? उसका तो अपनेको अभावग्रस्त समझकर प्रलाप करना व्यर्थ ही है।

जिस प्रकार प्रार्थना आदिके बिना ही यथासमय वृक्षके द्वारा प्राणीको अपने समयपर ही फल-फूलकी प्राप्ति हो जाती है, उसी प्रकार पूर्वजन्मकृत कर्म भी अपने समयके अनुसार यथोचित फल देता है। व्यक्तिमें अवस्थित शील, कुल, विद्या, ज्ञान, गुण तथा कुल-शुद्धि उसको कुछ देनेमें समर्थ नहीं हैं। पूर्वजन्मकृत तपसे प्राप्त हुआ उसका भाग्य ही समयके अनुसार वृक्षकी भाँति उसे फल देता है²।

प्राणीकी मृत्यु वहाँ होती है, जहाँ उसका हन्ता विद्यमान रहता है। लक्ष्मी वहीं निवास करती है, जहाँ सम्पत्तियाँ रहती हैं। ऐसे ही अपने कर्मसे प्रेरित होकर प्राणी स्वयं ही उन-उन स्थानोंपर पहुँच जाता है। पूर्वजन्ममें किया गया कर्म कर्ताके पीछे-पीछे वैसे ही रहता है, जैसे गोष्ठमें हजार गायोंके रहनेपर भी बछड़ा अपनी माताको प्राप्त कर लेता है—

तत्र मृत्युर्यत्र हन्ता तत्र श्रीर्यत्र सम्पदः।
तत्र तत्र स्वयं याति प्रेर्यमाणः स्वकर्मभिः॥
भूतपूर्वं कृतं कर्म कर्तारमनुतिष्ठति।
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्॥
(११३।५३-५४)

हे मूर्ख प्राणी! इस प्रकार जब पूर्वजन्मकृत कर्म कर्तामें ही अवस्थित रहता है तो अपने


१-नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि। कुशाग्रेण तु संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति॥
२-आचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च। स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम्॥ (११३।४९)
शीलं कुलं नैव च चैव विद्या ज्ञानं गुणा नैव न बीजशुद्धिः।
भाग्यानि पूर्वं तपसार्जितानि काले फलन्त्यस्य यथैव वृक्षाः॥ (११३।५१-५२)

२०६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

पुण्यका फल भोगो। तुम क्यों संतप्त हो रहे हो ? जैसा पूर्वजन्ममें शुभ अथवा अशुभ कर्म किया गया है, वैसा ही फल जन्मान्तरमें कर्ताका अनुसरण करता है, उसके पीछे-पीछे चलता है।

नीच व्यक्ति दूसरेमें सरसोंके बराबर भी स्थित दोष-छिद्रोंको देखता है, किंतु अपनेमें बेल (फल)-के समान अवस्थित दोषोंको देखते हुए भी नहीं देखता<sup></sup>। हे द्विज! राग-द्वेषादिक दोषोंसे युक्त प्राणियोंको कहींपर भी सुख नहीं है। मैं भली प्रकारसे विचार करके यह देखता हूँ कि जहाँ संतोष है, वहाँ सुख है। जहाँ स्नेह है, वहीं भय है। अतः स्नेह ही दुःखका कारण है। प्राणियोंमें स्नेह उत्पन्न करनेके जो मूल हैं, वे ही दुःखके कारण हैं। अतः उनका परित्याग कर देनेपर अर्थात् उनके प्रति अपनी आसक्तिको समाप्त कर देनेसे प्राणीको महान् सुखकी प्राप्ति होती है<sup></sup>। यह शरीर ही दुःख और सुखका घर है। उत्पन्न हुए शरीरके साथ ही वह दुःख-सुख भी उत्पन्न होता है।

पराधीनता ही दुःख है और स्वाधीनता ही सुख है। संक्षेपमें यही सुख-दुःखका लक्षण समझना चाहिये। प्राणीको सुखभोगके पश्चात् दुःख और दुःखके बाद सुखका भोग प्राप्त होता है। इस तरह मनुष्योंके सुख-दुःख चक्रके समान परिवर्तित होते रहते हैं। जो मनुष्य भूतकालिक विषयवस्तुको समाप्त हुआ मान लेता है और भविष्यमें होनेवालेको बहुत दूर समझता है एवं वर्तमानमें अनासक्त-भावसे रहता है, वह किसी भी प्रकारके शोकसे दुःखी नहीं होता<sup></sup>

(अध्याय ११३)


नीतिसार

श्रीसूतजीने पुनः कहा— न कोई किसीका मित्र है और न कोई किसीका शत्रु। कारणविशेषसे ही लोग एक-दूसरेके मित्र और शत्रु होते हैं। यह दो अक्षरोंवाला रत्नरूपी 'मित्र' शब्द किसने बनाया? यह दुःख एवं भयसे प्राणियोंका अभिरक्षक है तथा प्राणिमात्रमें प्रेम और विश्वासको उत्पन्न करनेवाला है।

जिस व्यक्तिने एक बार भी 'हरि' इस दो अक्षरसे युक्त शब्दका उच्चारण कर लिया है, वह अपने कटिप्रदेशमें परिकर (फेंटा) बाँधकर मुक्ति प्राप्त करनेके लिये तैयार रहता है। अर्थात् ऐसा मनुष्य मोक्षका अधिकारी हो जाता है—

सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्।
बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥
(११९।३)

माता, पत्नी, सहोदर बन्धु तथा पुत्रमें पुरुषोंको वैसा विश्वास नहीं होता है, जैसा विश्वास उन्हें स्वाभाविक मित्रमें होता है। यदि मनुष्य किसीके साथ शाश्वत प्रेम करना चाहता है तो उसे उसके साथ द्यूत, अर्थ-व्यवहार (धनका लेन-देन) एवं परोक्षरूपमें उसकी स्त्रीका दर्शन—इन तीन दोषोंका परित्याग कर देना चाहिये। माता, भगिनी अथवा पुत्रीके साथ एकान्तमें एक साथ नहीं बैठना


१-नीचः सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति । आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ॥ (११३।५७)
२-रागद्वेषादियुक्तानां न सुखं कुत्रचिद् द्विज । विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः ॥
यत्र स्नेहो भयं तत्र स्नेहो दुःखस्य भाजनम् । स्नेहमूलानि दुःखानि तस्मिंस्त्यक्ते महत्सुखम् ॥ (११३।५८-५९)
३-सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । सुखं दुःखं मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्तते ॥
यदगतं तदतिक्रान्तं यदि स्यात् तच्च दूरतः । वर्तमानेन वर्तेत न स शोकेन बाध्यते ॥ (११३।६१–६३)

काण्ड ] नीतिसार २०७


चाहिये, क्योंकि इन्द्रियोंका समूह बलवान् होता है, वह विद्वान्‌को भी [दुराचरणकी ओर] खींच लेता है—

मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो वसेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ (११४।६)

हे शौनक ! उपयुक्त अवसर न होनेसे, एकान्त स्थान न होनेसे तथा प्रार्थयिता व्यक्तिके सुलभ न होनेसे ही स्त्रियोंमें सतीत्व पाया जाता है।

जो मधुर पदार्थोंसे बालकको, विनम्रभावसे सज्जन पुरुषको, धनसे स्त्रीको, तपस्यासे देवताको और सद्‌व्यवहारसे समस्त लोकको अपने वशमें कर लेता है, वही पण्डित है। जो लोग कपटसे मित्र बनाना चाहते हैं, पापसे धर्म कमाना चाहते हैं, दूसरेको संतप्त करके धन-संग्रह करना चाहते हैं, बिना परिश्रमके ही सुखपूर्वक विद्या-अर्जन करना चाहते हैं और कठोर व्यवहारके द्वारा स्त्रियोंको वशमें रखनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे पण्डित (कुशल) नहीं हैं।

फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य यदि फल-समन्वित वृक्षका ही मूलोच्छेद कर डालता है तो वह दुर्बुद्धि है। उसे फल कभी नहीं प्राप्त हो सकता। अविश्वसनीय व्यक्तिका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। मित्रका भी [अधिक] विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि कदाचित् क्रुद्ध होनेपर मित्र भी समस्त गोपनीयताको प्रकट कर सकता है—

न विश्वसेदविश्वस्ते मित्रस्यापि न विश्वसेत्।
कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत्॥ (११४।२२)

सभी प्राणियोंमें विश्वास करना, सभी प्राणियोंके प्रति सात्त्विक भाव रखना एवं अपने सत्-स्वभावकी रक्षा करना—ये सज्जन पुरुषके लक्षण हैं।

दरिद्रके लिये गोष्ठी* विषके समान है और वृद्ध व्यक्तिके लिये युवती विषके समान है। भलीभाँति आत्मसात् न की गयी विद्या विष है तथा अजीर्ण-दशामें किया गया भोजन विषके समान (अनिष्टकारी) है। अकुण्ठित व्यक्तिको गायन, नीच व्यक्तिको उच्च आसनकी प्राप्ति, दरिद्रको दान तथा युवकको तरुणी प्रिय होती है।

अधिक मात्रामें जलका पीना, गरिष्ठ भोजन, धातुकी क्षीणता, मल-मूत्रका वेग रोकना, दिनमें सोना एवं रात्रिमें जागरण करना—इन छः कारणोंसे मनुष्योंके शरीरमें रोग निवास करने लगते हैं—

अत्यम्बुपानं कठिनाशनं च
धातुक्षयो वेगविधारणं च।
दिवाशयो जागरणं च रात्रौ
षड्भिर्नराणां निवसन्ति रोगाः॥ (११४।२८)

प्रातःकालीन धूप, अतिशय मैथुन, श्मशान-धूमका सेवन, अग्निमें हाथ सेंकना और रजस्वला स्त्रीका मुख-दर्शन—ये दीर्घ आयुका विनाश करनेवाले हैं। शुष्क मांस, वृद्धा स्त्री, बालसूर्य, रात्रिमें दहीका प्रयोग, प्रभातकालमें मैथुन एवं [प्रभातकालीन] निद्रा—ये छः सद्यः प्राणविनाशक होते हैं।

तत्काल पकाया गया घृत (ताजा घी), द्राक्षाफल, बाला स्त्री, दुग्ध-सेवन, गरम जल तथा वृक्षोंकी छाया—ये शीघ्र ही प्राण (शक्ति) प्रदान करनेवाले हैं। कुएँका जल और वटवृक्षकी छाया शीतकालमें गरम तथा गर्मीमें शीतल होते हैं। तैलमर्दन और सुन्दर भोजनकी प्राप्ति—ये सद्यः शरीरमें शक्तिका संचार करते हैं, किंतु


* मित्रोंको आमन्त्रित कर उनके साथ भोजन-जलपानादिकी व्यवस्था वहन कर मनोरंजन करना आदि।