गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| १७६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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ग्रहशान्ति-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे मुनियो! लक्ष्मी एवं सुख-शान्तिके इच्छुक तथा ग्रहोंकी दृष्टिसे दुःखित जनोंको ग्रहशान्तिके लिये तत्सम्बन्धित यज्ञ करना चाहिये। विद्वानोंके द्वारा सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इनकी अर्चाके लिये इनकी मूर्ति क्रमशः इन द्रव्योंसे बनानी चाहिये—ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, स्वर्ण, सुवर्ण, रजत, अयस् (लोहा), सीसा तथा कांस्य। अर्थात् सूर्यग्रहके लिये ताम्र धातु, चन्द्रके लिये स्फटिक, मंगलके लिये रक्तचन्दन, बुध एवं बृहस्पतिके लिये स्वर्ण, शुक्रके लिये रजत, शनिके लिये लोहा, राहुके लिये सीसा तथा केतुके लिये कांस्य धातु प्रशस्त है।
सूर्यका वर्ण लाल, चन्द्रमाका सफेद, मंगलका लाल, बुध तथा बृहस्पतिका पीला, शुक्रका श्वेत, शनि, राहु और केतुका काला वर्ण होता है। इसी वर्णके इनके द्रव्य भी होते हैं। एक पाटेपर वस्त्र बिछाकर ग्रहवर्णोंके अनुसार निर्दिष्ट द्रव्योंके द्वारा विधिपूर्वक उनकी स्थापना तथा पूजा-होम करे। उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा पुष्प समर्पित करे। उनके लिये गन्ध, बलि, धूप, गुग्गुल भी देना चाहिये। तत्पश्चात् मन्त्रोंके द्वारा प्रत्येक ग्रह-देवताके निमित्त चरु पदार्थ अर्पित करना चाहिये।
उसके बाद यथाक्रम ‘ॐ आकृष्णेन रजसा०’ इस मन्त्रके द्वारा सूर्य, ‘ॐ इमं देवा०’ मन्त्रसे चन्द्र, ‘ॐ अग्निमूर्धादिवः ककुत्०’ मन्त्रके द्वारा मंगल, ‘ॐ उद्बुध्यस्व०’ मन्त्रसे बुध, ‘ॐ बृहस्पते०’ इस मन्त्रके द्वारा बृहस्पति, ‘ॐ अन्नात्परिस्रुतम०’ मन्त्रसे शुक्र, ‘ॐ शं नो देवी०’ मन्त्रके द्वारा शनि, ‘ॐ कयानश्चि०’ मन्त्रसे राहु तथा ‘ॐ केतुं कृण्वन्०’ मन्त्रके द्वारा केतु ग्रहके लिये आहुति देनी चाहिये।
इन ग्रहोंके लिये इसी क्रमसे मन्दार, पलाश, खैर, अपामार्ग (चिचड़ा), पिप्पल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशकी समिधाएँ विहित हैं। इन समिधाओंको घृत, दधि तथा मधुसे मिश्रितकर हवन करना चाहिये। तदनन्तर क्रमानुसार उपर्युक्त मन्त्रोंके द्वारा पदार्थोंकी आहुति प्रदान करे। यथा—सूर्यके लिये गुड़, चन्द्रके लिये भात, मंगलके लिये पायस, बुधके लिये साठी चावलकी खीर, बृहस्पतिके लिये दही-भात, शुक्रके लिये घृत, शनिके लिये अपूप (पुआ), राहुके लिये फलका गूदा और केतुके लिये अनेक वर्णके पकाये हुए धान्यकी आहुति देनी चाहिये।
द्विजको चाहिये कि इसी क्रमसे प्रत्येक ग्रहके लिये अन्न भी दानरूपमें दे। तदनन्तर प्रत्येक ग्रहके निमित्त यथाक्रम—धेनु, शंख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, कृष्णा गौ, अयस् (शस्त्र आदि) तथा छागकी दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार ग्रहोंकी सदैव पूजा करनेसे मनुष्यको राज्यादि फल प्राप्त होते हैं।
(अध्याय १०१)
वानप्रस्थ-धर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे महर्षियो! अब मैं वानप्रस्थाश्रमके धर्मका वर्णन कर रहा हूँ, आप सभी इसका श्रवण करें।
वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट पुरुषको अपनी पत्नीके संरक्षणका भार पुत्रोंके ऊपर छोड़कर अथवा पत्नीके सहित वनमें जाना चाहिये।
वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाला ब्रह्मचर्य-व्रतका निर्वाह करते हुए अपनी श्रौत-अग्नि एवं
काण्ड ] * संन्यास-धर्म-निरूपण * १७७
गृह-अग्निके साथ वनमें जाय। शान्त एवं क्षमावान् रहकर वह अहर्निश देवोपासनामें निमग्न रहे। वह बिना जोती हुई भूमिसे उत्पन्न अन्नके द्वारा अग्निदेव, पितरों, देवताओं, अतिथियों तथा भृत्योंको तृप्त (संतुष्ट) करे। आत्मज्ञानमें तत्पर रहनेवाला वह वानप्रस्थी दाढ़ी, जटा तथा लोमराशिको धारण करे, इन्द्रियोंका दमन करे, त्रिकाल स्नान करे एवं अपनेको प्रतिग्रह अर्थात् दान-ग्रहणसे दूर रखे।
ऐसे व्यक्तिको स्वाध्यायवान्, भगवद्ध्यानपरायण तथा सभी लोगोंके हितसाधनमें लगे रहना चाहिये। उसको जीवनयापनके लिये सीमित अर्थ-संग्रह करना चाहिये।
उसके पास जो कुछ शेष सामग्री हो, उसका आश्विन-मासमें परित्यागकर वह व्रतादिके द्वारा ही समय व्यतीत करे। यदि शक्ति हो तो एक मास या एक पक्षका व्रतकर मास या पक्षके अन्तमें ही भोजन करे। ऐसे व्रती अपने दाँतोंको ही उलूखल मानकर उन्हींसे अन्नको तुषसे विहीनकर अपनी प्राण-रक्षाके लिये उपयोगमें लाते हैं।
वानप्रस्थीको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये, भूमिपर सोना चाहिये और वह अपने सभी धार्मिक कृत्योंका सम्पादन यथासम्भव फलसे करे (अन्नसे नहीं)। वह ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्निके^१ मध्य स्थित रहे, वर्षा-ऋतुमें स्थण्डिल (खुले चबूतरे)-पर शयन करे तथा हेमन्त-ऋतुमें आर्द्रवस्त्रोंको धारण करके योगाभ्यासके द्वारा अपने दिन व्यतीत करे।
जो काँटोंसे उसे पीड़ा पहुँचाये उसके प्रति भी क्रोध न करे और जो अङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन करे उसपर भी प्रसन्न न हो, उन दोनोंके प्रति वह समान भाव रखे। वानप्रस्थियोंमें दुःख और सुख भोगनेकी एक समान ही क्षमता होनी आवश्यक है। (अध्याय १०२)
संन्यास-धर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा—हे सज्जनवृन्द! अब मैं भिक्षु-धर्म (संन्यास-धर्म)-का वर्णन करूँगा। आप सब उसका ज्ञान प्राप्त करें।
गृहस्थाश्रम एवं वानप्रस्थाश्रममें विहित सभी श्रौत इष्टियोंको सम्पन्नकर सर्व वेद-सम्बन्धी दक्षिणा जिस इष्टिमें विहित है, उस प्राजापत्य इष्टिको भी सम्पन्न करके अन्तमें वेद-विहित विधानसे समस्त श्रौताग्नियोंको अपनेमें आरोपित करके संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। संन्यासीको चाहिये कि वह सभी प्राणियोंका हितैषी हो, शान्त हो, त्रिदण्डी हो, (संन्यासीके लिये बाँसके बने तीन दण्ड धारण करनेका विधान है।) वह कमण्डलु धारण करे। सभी प्रकारके सुख-साधनयुक्त भवनोंका परित्यागकर भिक्षार्थी होकर ग्रामका आश्रय ग्रहण करे। प्रमादरहित होकर भिक्षाटन करे और सायंकाल ग्राममें न दिखलायी पड़े। जो ग्राम भिक्षुकोंसे^२ रहित हो, वहाँपर वह लोभशून्य होकर प्राणधारणमात्रके लिये भिक्षा माँगे।
यम-नियमका पालन करते हुए योग-सिद्ध होकर संन्यासीको एकदण्डी^३ अथवा परमहंस^४ बनना चाहिये। इस प्रकार रहता हुआ संन्यासी शरीरका परित्यागकर इसी लोकमें अमरत्व प्राप्त कर लेता है। दान देनेवाला, अतिथिका आदर करनेवाला, ब्रह्मज्ञ, यथाविधि श्राद्ध करनेवाला गृहस्थ भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १०३)
१-चार दिशाओंमें चार अग्नि और ऊपर सूर्य।
२-व्यवसायकी दृष्टिसे अनेक प्रकारके पाखण्डके साथ भिक्षा माँगनेवाले यहाँ 'भिक्षुक' शब्दसे अभिप्रेत हैं।
३-बाँसके बने हुए तीन दण्डोंके विकल्पमें बाँसके एक दण्डके धारणका भी विधान है। अतः संन्यासी बाँसके एक दण्डको भी धारण कर सकता है। ऐसे संन्यासीको 'एकदण्डी' कहते हैं।
४-परमहंस उस अवधूतको कहते हैं, जो अपने शरीरकी ममतासे सर्वथा विनिर्मुक्त हो। ये यथेच्छ सवस्त्र-निर्वस्त्र आदि किसी भी रूपमें रह सकते हैं। इसके लिये कोई बन्धन नहीं होता।
८८- महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण
१७८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
कर्मविपाक-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा—पापकर्मसे उत्पन्न होनेवाली नारकीय यातनाओंको भोगनेसे उस पापकर्मका क्षय होता है। शेष बचे हुए पापोंका शमन करनेके निमित्त प्राणी पुनः विभिन्न योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। यथा—
ब्रह्महन्ता नरकभोगके पश्चात् श्वान, गर्दभ और ऊँट-योनिमें उत्पन्न होता है। मदिरापायी व्यक्ति मेढक और जुआँ होता है। सुवर्णका चोर कृमि-कीट तथा गुरुतल्पगामी घास-फूसादिको योनिमें जन्म लेता है। इन योनियोंमें पाप-शमन होनेके पश्चात् वे ब्रह्महत्यादिके पापी पुनः यथाक्रम क्षयरोगी, काले दाँतवाले, कुत्सित नखवाले तथा शिपिविष्टक (कुष्ठरोगी) होकर जन्म ग्रहण करते हैं अथवा ये सभी दोष उक्त प्राणियोंकी संततिमें प्रकट होते हैं।
अन्नकी चोरी करनेवाला रोगी, वचन देकर उसका पालन न करनेवाला गूँगा, धान्यका अपहरणकर्ता अधिक अङ्गोंवाला, चुगलखोर दुर्गन्धसे युक्त नाकवाला, तेलका चोर तैलपायी अर्थात् तिलचट्टा कीट, अविद्यमान दोषकी सूचना देनेवाला दुर्गन्धयुक्त मुखवाला होता है।
ब्राह्मणके धनका हरण करनेवाला तथा कन्याको खरीदनेवाला व्यक्ति वनमें राक्षस तथा बैल होता है। रत्नका अपहरणकर्ता हीनजाति और शाक-पातका चोर मयूर-योनिमें जन्म लेता है। पुष्पका चोर छछुन्दरी, धान्यापहारी मूषक, फलका चोर वानर, पशुओंका हरण करनेवाला बकरी तथा दूधहर्ता काकयोनिमें उत्पन्न होता है।
मांस, वस्त्र और नमककी चोरी करनेवाले मनुष्य यथाक्रम—गृध्र, श्वेतकुष्ठी तथा चीरी<sup>१</sup> की योनि प्राप्त करते हैं। उस फलको भोगकर वे तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होते हैं।
इस प्रकार भोग भोगनेके पश्चात् ये लक्षणभ्रष्ट पतितजन दूसरे जन्ममें दरिद्र या पुरुषाधम होते हैं। तत्पश्चात् अपने सत्कर्मोंसे निष्कलुष होकर वे योगोके महान् कुलमें जन्म लेते हैं और सुलक्षणोंसे युक्त होते हुए वे धन-धान्यसे सम्पन्न हो जाते हैं। (अध्याय १०४)
प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप
याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा—हे मुनियो ! विहित कर्म न करनेसे, निन्दित (निषिद्ध) कर्मका आचरण करनेसे एवं इन्द्रिय-निग्रह न करनेके कारण मनुष्य अधोगतिको प्राप्त करता है<sup>२</sup>। अतएव आत्मशुद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिये। इस प्रकार प्रायश्चित्त-कर्म करनेसे उसकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो जाती है और लोक भी उसके साथ प्रसन्नतापूर्वक व्यवहार करता है। प्रायश्चित्तसे पापका विनाश भी हो जाता है। प्रायश्चित्त न करनेवाले तथा पश्चात्तापसे रहित पापीजन पापके प्रभावसे महारौरव नरकसे भी महाभयंकर तामिस्र, लोहशंकु, पूतिगन्ध, हंसाभ, लोहितोद, संजीवन, नदीपथ, महानिलय, काकोल, अन्धतामिस्र तथा तापन नामक नरकमें जाते हैं।
ब्रह्महन्ता, मद्यपी, ब्राह्मणके सुवर्णका<sup>३</sup> चोर, गुरुपत्नीगामी तथा इनका संसर्ग करनेवाले मनुष्य अपने पापके कारण अवीचि तथा कुम्भीपाक नामक महाभयानक नरकका भोग करते हैं।
गुरु एवं वेदकी निन्दा करना ब्रह्महत्याके
<sup>१-</sup> ऊँची आवाजवाला कीटविशेष (या० मिताक्षरा, प्रायश्चित्त प्रकरण श्लोक २१५)<br> <sup>२-</sup> विहितस्याननुष्ठानान्निन्दितस्य च सेवनात्। अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति॥ (१०५।१)<br> <sup>३-</sup> या० मिताक्षरा प्रा०प्र० श्लोक २२७।
काण्ड ] प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप १७९
समान हैं। निषिद्ध पदार्थका भक्षण, कुटिलतापूर्वक आचरण और रजस्वला स्त्रीका अधरपान मदिरापान नामक महापातकके सदृश माना जाता है। अश्व तथा रत्नादिका अपहरण, सुवर्ण-चोरीके महापापकी भाँति होता है। मित्रकी पत्नी, अपनी अपेक्षा उत्तम जातिकी कन्या, चाण्डाली और बहन तथा पुत्रवधूके साथ सहवास करना गुरुपत्नी-गमनके समान महापाप स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार माता-पिताकी बहन, मामी, विमाता, आचार्यपुत्री, आचार्यपत्नी तथा पुत्रीके साथ रमण करनेवाला व्यक्ति भी गुरुपत्नीगामीके समान ही महापातकी होता है।
ऐसा महापापी मनुष्य लिंग-छेदनके पश्चात् वध करनेके योग्य होता है। इस प्रकारके पापमें यदि स्त्री सकाम होकर संश्लिष्ट होती है तो उसके लिये भी इसी प्रकारका प्रायश्चित्त-विधान कहा गया है।
गोहत्या, व्रात्यता (समयपर यज्ञोपवीत-संस्कार न होना अर्थात् सावित्रीच्युत होना), चोरी (ब्राह्मणका सुवर्ण अथवा सुवर्ण-सदृश अन्य द्रव्यका हरण करना), ऋण न लौटाना तथा देव, ऋषि एवं पितृ-ऋणसे मुक्त होना, अधिकारी होते हुए भी अग्न्याधान न करना, विक्री न करने योग्य लवण आदिका विक्रय करना, परिवेदन<sup>१</sup>, रुपये लेकर अध्ययन करानेवालेसे अध्ययन करना, रुपये लेकर अध्यापन करना, परस्त्रीके<sup>२</sup> साथ सहवास, परिवित्त्यै<sup>३</sup>, प्रतिषिद्ध सूदसे जीविकायापन, नमकका उत्पादन, स्त्रीवध, शूद्रवध, अधेक्षित वैश्य तथा क्षत्रियका वध करना और निन्दित धनसे जीविका चलाना, नास्तिकता, व्रतका लोप, सुत-विक्रय, माता-पिता तथा मित्रका परित्याग, तालाब-उद्यानका विक्रय, कन्याको दूषित करना, बड़े भाईकी उपेक्षा करके अग्न्याधान तथा विवाह करनेवालेको यजन कराना तथा ऐसे व्यक्तिको कन्यादान करना, गुरुसे अतिरिक्तके साथ कुटिलता करना, व्रतका लोप, केवल अपने लिये भोजन बनानेवाला, मद्यपान करनेवाली स्त्रीका सम्पर्क, स्वाध्याय, अग्नि, पुत्र तथा बन्धुका परित्याग, असत्-शास्त्रका अध्ययन, भार्या एवं अपना विक्रय—ये सभी निन्दित कर्म उपपातक कहे गये हैं। हे मुनियो ! आप अब इनके प्रायश्चित्तका ज्ञान प्राप्त करें—
ब्रह्महत्या करनेपर पापी व्यक्ति शिरःकपाल (खर्पर-खोपड़ी)-को हाथमें लेकर तथा दूसरा एक शिरःकपाल ध्वजके समान दण्डमें लगाकर चले और भिक्षामात्रसे जीविका-निर्वाह करता हुआ अपने पापकर्मका उद्घोष करते हुए बारह वर्षतक अल्प भोजन कर आत्मशुद्धि करे अथवा जानते हुए इच्छापूर्वक ब्रह्महत्या करनेपर ‘लोमभ्यः स्वाहा’ इत्यादि मन्त्रके अनुसार लोमसे शरीरके अवयवोंके प्रतिनिधिस्वरूप यथाविहित विभिन्न द्रव्योंकी आहुति देकर अन्तमें अपने शरीरका भी प्रायश्चित्त-विधानमें निर्दिष्ट विधानके अनुसार अग्निमें प्रक्षेप करे। अपने प्राणोंका त्याग करके ब्राह्मणकी रक्षा करनेसे भी ब्रह्महत्याकी शुद्धि हो जाती है।
अत्यधिक कष्ट देनेवाले दुःसह बहुकालव्यापी रोग या अन्य किसी प्रकारके भयरूप आतंकसे ग्रस्त ब्राह्मणको अथवा मार्गमें पड़ी हुई ऐसी ही गायको निरोग या निरान्तक करके भी ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति पायी जा सकती है। यदि कदाचित् प्रमादवश ऐसे ब्राह्मणकी हत्या किसीके द्वारा होती है, जो ब्राह्मणके लिये अपेक्षित गुणोंसे युक्त नहीं है
१-सहोदर ज्येष्ठ भाईके अविवाहित रहते हुए छोटा भाई यदि विवाह एवं अग्निहोत्र ग्रहण करता है तो वही परिवेदन नामक पाप है।
२-गुरु एवं गुरुके समान श्रेष्ठजनोंके अतिरिक्त स्त्री।
३-छोटे भाईके विवाह कर लेनेपर ज्येष्ठके द्वारा विवाह न करनेपर होनेवाला दोष पारिवित्य कहलाता है।
१८० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
तो इस हत्यासे होनेवाले पापसे मुक्तिके लिये यह प्रायश्चित्त है—वनमें रहकर मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदका तीन बार पारायणकर अथवा सरस्वती (वेदविद्या)-की सेवामें अपना पूर्ण समर्पण करनेके साथ अपना सब कुछ धन (सर्वस्व) योग्य पात्रमें समर्पित करके अपनेको शुद्ध किया जाय। सोमयाग प्रयोगमें वर्तमान क्षत्रिय और वैश्यका वध करनेपर ब्रह्महत्याके लिये जो प्रायश्चित्त है, उसे करे। गर्भहत्या करनेवाले पापीने जिस वर्णका गर्भ नष्ट किया हो, उसी वर्णके अनुसार उसको उस पापका प्रायश्चित्त करना चाहिये। रजस्वला होनेके बाद ऋतुस्नान की हुई स्त्रीकी हत्या करनेवाला जिस वर्णकी स्त्रीकी हत्या की है, उस वर्णके अनुसार प्रायश्चित्त करे। हत्या करनेके लिये उद्यत होनेपर यदि हत्यारेको उस कृत्यमें सफलता नहीं प्राप्त होती है तो भी वह हत्याके पापसे मुक्त नहीं है, उसको उस पापका प्रायश्चित्त करना चाहिये।
सोमयागके लिये दीक्षित ब्राह्मणकी हत्या करनेपर ब्रह्महत्याके लिये विहित प्रायश्चित्तका दुगुना प्रायश्चित्त-व्रत करे। मदिरापान करनेवालेका प्रायश्चित्त, अग्निके समान तप्त मदिरा एवं गोमूत्रका अथवा अग्निके समान लाल-लाल खौलता हुआ गोघृतपान एवं गोदुग्धपान करनेसे होता है और जल समझकर भूलसे मदिरा पी लेनेपर जटाधारण करके मलिन वस्त्र धारणकर अग्निके समान तप्त घृत पीते हुए ब्रह्महत्याके लिये विहित व्रत करे तथा पुनः सवर्णोचित संस्कार करे तब शुद्धि होती है।
वीर्य, विष्ठा, मूत्रका पान करनेवाली ब्राह्मणी एवं सुरा पीनेवाली ब्राह्मणी पातकी हो जाती है। पतिलोकसे परिभ्रष्ट होकर वह क्रमशः गृध्री, सूकरी तथा कुतियाकी योनिमें जन्म लेती है।
ब्राह्मणके सुवर्णकी चोरी करनेवाले द्विजको चाहिये कि वह राजाको मूसल समर्पित करके अपने चौर्य-कर्मका उद्घोष करे। तत्पश्चात् उस मूसलके आघातसे वह मृत्युको प्राप्त हो या जीवित दोनों दशामें पवित्र हो जाता है। ऐसा द्विज अपनी तौलके बराबर सुवर्ण देकर भी आत्मशुद्धि कर सकता है।
जो गुरु-पत्नीके साथ सहवास करता है, उसको दहकती हुई लौहमयी स्त्री-प्रतिमाके साथ शयन करके अपने शरीरका परित्याग करना चाहिये अथवा अपना लिंग और अण्डकोश काटकर नैर्ऋत्य दिशामें फेंक देना चाहिये और शरीरपर्यन्त पीछे मुँह करके चलता रहे अथवा वह दुरात्मा तीन वर्ष प्राजापत्य तथा कृच्छ्रव्रतका पालन करे या तीन मासतक चान्द्रायणव्रत एवं वेद-संहिताका पाठ करके भी वह उस पापसे विमुक्त हो सकता है।
गो-वध करनेवाले पापीको पञ्चगव्य पानकर एक मासतक संयमित जीवन व्यतीत करना चाहिये। वह गोष्ठमें निवास करते हुए गौओंका अनुगमन तथा गौका दान करे।
चान्द्रायणव्रत करनेसे उपपातकोंकी शुद्धि होती है। एक मासतक दुग्ध-पान अथवा पराक नामक व्रत करके उन उपपातकोंसे शुद्धि प्राप्त की जा सकती है।
क्षत्रिय-वध करनेपर मनुष्यको एक बैल और एक हजार गायोंका दान देना चाहिये अथवा वह तीन वर्षतक ब्रह्महत्याके लिये विहित व्रतका पालन करे। वैश्यका वध करनेवाले मनुष्यको एक वर्षतक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त-व्रत अथवा एक सौ गायोंका दान करना चाहिये। शूद्रकी हत्या करनेपर छः मासतक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त अथवा दस सवत्सा दूध देनेवाली गायोंका दान दे।* अदुष्ट अर्थात् सुशीला सच्चरित्र स्त्रीका वध करनेपर मनुष्यको शूद्र-वध-विहित प्रायश्चित्तव्रतका पालन करना चाहिये।
*ये सभी प्रायश्चित्त अज्ञानपूर्वक वधके लिये विहित हैं।
८९- बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार
काण्ड ] प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप १८१
मार्जार (बिल्ली), गोह, नेवला, साधारण पशु तथा मेढककी हत्या करनेपर पापी व्यक्ति तीन रात्रितक दुग्धपानके साथ ही पाद कृच्छ्रव्रतका पालन करे। हाथीका वध करनेपर मनुष्यको पाँच नील¹ बैलोंका दान देना चाहिये। शुक पक्षीकी हत्या करनेपर दो वर्षका बछड़ा तथा क्रौंच पक्षीका वध करनेपर तीन वर्षका बछड़ा दान देना चाहिये। गधा, बकरा और भेड़की हत्या करनेपर भी एक बैलका दान दे। वृक्ष, गुल्म, लता तथा झाड़ीको काटनेपर सौ बार गायत्री-जप करे।
मधु और मांसका भक्षण करनेपर कृच्छ्रव्रत तथा अन्य शेष व्रतोंका पालन करना चाहिये। यदि गुरुके द्वारा प्रेषित शिष्यकी मृत्यु मार्गमें हो जाती है तो गुरु तीन कृच्छ्रव्रतका पालन करे, किंतु गुरुके प्रतिकूल कार्य करनेपर शिष्यके द्वारा उन्हें प्रसन्न करनेसे ही शुद्धि हो जाती है।
शत्रुओंको धान्य आदि तथा प्रीति आदिके द्वारा प्रसन्न करे। यदि किये जा रहे उपकारके बीच ही ब्राह्मणकी मृत्यु हो जाती है तो उपकारी व्यक्तिको पाप नहीं लगता।
जो मनुष्य दूसरेको महापापी तथा उपपातकीका मिथ्या दोष लगाता है, ऐसा मनुष्य जितेन्द्रिय रहकर एक मासतक केवल जल पीकर रहे और पापमोचनमन्त्रका जप करे।
असत्-प्रतिग्रह लेनेसे जो पाप होता है, उससे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये एक मासपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पयोव्रत करे। गोष्ठमें निवासकर गायत्री-मन्त्रके जपमें परायण रहे। ऐसा करनेसे मनुष्य पापविमुक्त हो जाता है।
(यथासमय यज्ञोपवीत-संस्कारादिसे वञ्चित) व्रात्यका यजन करानेवाला तीन कृच्छ्रव्रतका आचरण करके अपने उस पापसे मुक्त हो सकता है। ऐसे ही अभिचारक क्रिया करनेवालेके लिये भी यही प्रायश्चित्त है। वेद²प्लावी वर्षपर्यन्त जौका भक्षण करे। शरणमें आये हुएका परित्याग करनेवाला भी वर्षपर्यन्त जौका भक्षण करे।
गर्दभयान तथा उष्ट्रयानसे गमन करनेवाला तीन प्राणायाम करे। इसी प्रकार नग्नस्नान, नग्न-शयन और दिनमें स्त्रीगमन करनेपर भी तीन प्राणायामसे शुद्धि होती है।
गुरुजनोंको 'तू' कहने तथा 'हूँ' इस प्रकार कहनेसे तथा वाद-प्रतिवादमें ब्राह्मणपर विजय प्राप्त करनेसे मनुष्यको जो पाप लगता है, उससे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये पापी मनुष्यको उस गुरु या ब्राह्मणको प्रसन्नकर एक दिनका उपवास करना चाहिये। ब्राह्मणपर प्रहार करनेके लिये उद्यत होनेपर कृच्छ्रव्रत तथा प्रहार कर देनेपर अतिकृच्छ्रव्रतका पालन करना चाहिये।
जिस निन्दित आचरणके लिये प्रायश्चित्त-विधान निर्दिष्ट नहीं है, उसके लिये देश, काल, आयु, शक्ति और पापपर सम्यक् विचार करके ही प्रायश्चित्तका निर्णय करना चाहिये। शास्त्रकारोंने पाप-विमुक्तिका यही समुचित नियम कहा है।
गर्भपात तथा पतिनिन्दा करना स्त्रियोंके पतनके कारण हैं। ऐसी स्त्रियाँ अपने दोषके अनुसार शास्त्रविहित प्रायश्चित्त नहीं करती हैं तो उनका परित्याग ही उचित है अन्यथा उन्हें अपने घरमें जीवनयापनके लिये आवश्यक सामान देकर रखना चाहिये।
जो पाप विख्यात हो चुका है, उसका प्रायश्चित्त गुरुजनोंके (परिषद्के)³ अभिमतके अनुसार ही
१. नील-वृष एक विशिष्ट लक्षणवाले बैलको कहते हैं।
२. या० स्मृति श्लोक २८८ की मिताक्षरा व्याख्याके अनुसार प्रकृतमें विप्लव शब्दके तीन अर्थ हैं—१-जो व्यक्ति वेदकी रक्षा कर सकता है, यदि वह वेदरक्षा नहीं करता तो यह वेदका विप्लव है। २-अनध्यायकालमें वेदका अध्ययन विप्लव है। ३-वेदाध्ययनमें समर्थ अथवा वेदाध्ययन करके उत्कर्ष प्राप्त करनेवाले अधिकारीको वेदाध्ययनके प्रति अनुत्साहित करना विप्लव है। इनमेंसे किसी एक दोषसे युक्त व्यक्ति भी वेदप्लावी कहा जाता है।
३. वेद एवं धर्मके विज्ञाता चार ब्राह्मणों अथवा तीन ब्राह्मणों या ब्रह्मवेत्ता धर्मशास्त्रज्ञ एक ब्राह्मणकी भी परिषद् हो सकती है। (या० स्मृति; आचाराध्याय श्लोक ९)
| १८२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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करना चाहिये, किंतु जो पाप विख्यात नहीं है, उसका प्रायश्चित्त गुप्तरूपसे करना चाहिये।
गुप्तरूपसे किये जानेवाले कुछ प्रायश्चित्त इस प्रकार समझना चाहिये—ब्रह्महत्या करनेवाला पापी तीन रात्रियोंतक उपवास रखकर विशुद्ध जल (नदी आदिके जलमें निमग्न होकर)-के मध्य अघमर्षण-मन्त्रका जप करे और दूध देनेवाली गायका दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है। किंतु यह प्रायश्चित्त अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके लिये विहित है। अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके निमित्त यह प्रायश्चित्त भी किया जा सकता है कि ब्रह्महत्याकर्ता अहोरात्रपर्यन्त वायुपान करते हुए जलमें रहनेके बाद प्रातःकाल जलसे बाहर आकर 'लोमभ्य स्वाहा॑०' इत्यादि आठ मन्त्रोंसे पाँच-पाँच आहुतियाँ यथाविधान अग्निमें दे।
मद्यपी एवं सुवर्णकी चोरी करनेवाले पापीको जलके मध्य स्थित होकर रुद्रदेवके मन्त्रका जप करते हुए तीन दिनका उपवास और कुष्माण्डी ऋचासे घृतकी आहुतियाँ देकर आत्मशुद्धि करनी चाहिये। गुरु-पत्नीके साथ सम्पर्क करनेवाला पापी 'सहस्त्रशीर्षा०' मन्त्रका जप करके पापसे विमुक्त हो जाता है।
सौ बार प्राणायाम करनेपर मनुष्य सर्वविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। अज्ञानवश किये गये पापकी शान्ति त्रैकालिक संध्योपासनासे हो जाती है। ब्राह्मणोंके द्वारा एकादश आवृत्ति रुद्रानुवाकोंका जप करवानेसे भी पापका शमन होता है। वेदाभ्यास करनेवाले, शान्तिपरायण और पञ्चयज्ञके अनुष्ठाताको पापका स्पर्शतक नहीं होता। वायुमात्रका भक्षण करते हुए पूरे दिन सूर्यदर्शनके साथ एवं पूरी रात्रि जलमें रहकर एक सहस्र गायत्री-मन्त्रका जप करनेसे ब्रह्महत्यासे होनेवाले पापके अतिरिक्त अन्य समस्त पापोंसे मुक्ति हो जाती है।
ब्रह्मचर्य, दया, क्षमा, भगवद्ध्यान, सत्य, निष्कपटता, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), माधुर्य और दम—ये दस यम माने गये हैं। स्नान, मौन, उपवास, यज्ञ, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, तपस्या, अक्रोध, गुरुभक्ति और पवित्रता—ये दस नियम कहे जाते हैं।
गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमूत्र तथा गोमयको 'पञ्चगव्य' कहते हैं। इस पञ्चगव्यका कुशोदकके साथ पान कर व्रती दूसरे दिन उपवास करे। इस तरह दो रात्रिका कृच्छ्र-सान्तपनव्रत होता है। पहले दिन गोदुग्ध, दूसरे दिन गोदधि, तीसरे दिन गोघृत, चौथे दिन गोमूत्र, पाँचवें दिन गोमय, छठें दिन कुशोदक मात्र और सातवें दिन कुछ भी न लेकर शुद्ध उपवास कर जो व्रत पूर्ण किया जाता है, वही महासान्तपन नामक व्रत कहा जाता है।
पलाश, गूलर, कमल, बिल्वपत्र इनमेंसे एक-एकको एक-एक दिन जलमें पकाकर उसी जलको क्रमशः एक-एक दिन पीकर चार दिन रहे एवं पाँचवें दिन कुशोदकमात्र पीकर जिस व्रतका पालन किया जाता है, उसको पर्णकृच्छ्रव्रत कहते हैं। तप्तकृच्छ्रव्रतमें व्रतीको पहले दिन गरम गोदुग्ध, दूसरे दिन गरम घृत, तीसरे दिन गरम जलका प्राशन चौथे दिन उपवास करना चाहिये। यह पवित्र (शुद्ध) करनेवाला महातप्तकृच्छ्रव्रत है।
पहले दिन एकभक्तव्रत (चौबीस घण्टेमें मध्याह्नमें केवल एक बार भोजन करना), दूसरे दिन नक्तव्रत अर्थात् चौबीस घण्टेमें एक बार (रात्रिमें), तीसरे दिन अयाचित (बिना याचनासे प्राप्त) अन्नका भोजन करना, चौथे दिन पूर्ण
१- 'ऋतं च सत्यं०' आदि मन्त्र अघमर्षण है।
२- या० स्मृतिमें श्लोक २४७ में इन मन्त्रोंको दिया गया है।
९०- नीतिसार-निरूपण
काण्ड ] अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण १८३
उपवास करनेपर पादकृच्छ्रव्रत होता है। इसी पादकृच्छ्रव्रतको तीन बार करनेसे प्राजापत्यकृच्छ्रव्रत होता है। प्राजापत्यव्रतके अनुसार भोजन और उपवासका नियम किया जाय परंतु भोजनके रूपमें उतना ही अन्न ग्रहण किया जाय, जितना एक हाथमें आता हो। इस तरह चार दिनका उपवास करनेसे अतिकृच्छ्रव्रत हो जाता है। इक्कीस दिनतक जल या दूधमात्र लेकर अतिकृच्छ्रव्रतका पालन करनेसे वह कृच्छ्रातिकृच्छ्रव्रत होता है। बारह दिन पूर्ण उपवास करनेपर एक पराकव्रत होता है।
पहले दिन जिनसे तेल निकाल लिया गया है ऐसे तिल, दूसरे दिन माँड़, तीसरे दिन मट्ठा, चौथे दिन जल तथा पाँचवें दिन सत्तूका आहारकर छठें दिन उपवास करना सौम्यकृच्छ्रव्रत कहलाता है। इस सौम्यकृच्छ्रव्रतमें बताये गये पदार्थोंका एक दिनके स्थानपर तीन-तीन दिनतक क्रमशः पंद्रह दिनतक चलनेवाला तुलापुरुषसंज्ञक कृच्छ्रव्रत होता है अर्थात् इस व्रतमें (प्रथम) तीन रात्रियोंतक निःसृत तेलवाले तिल, (द्वितीय) तीन रात्रियोंतक माँड़, (तृतीय) तीन रात्रियोंतक मट्ठा, (चतुर्थ) तीन रात्रियोंतक जल तथा (पञ्चम) तीन रात्रियोंतक सत्तूका भोजन करके एक दिनका उपवास करना चाहिये।
शुक्लपक्षमें तिथि-वृद्धि-क्रमसे मयूरके अण्डेके समान मात्रावाले एक-एक भोजन-ग्रासका अधिक आहार करते हुए पूर्णिमा तिथिको यह क्रम समाप्त करके पुनः कृष्णपक्षमें प्रतिदिन एक-एक अन्न-ग्रासका भक्षण-क्रमसे घटाते हुए चतुर्दशी तिथिको एक ग्रास भोजन करे एवं अमावास्याको उपवास करे, यह चान्द्रायणव्रत है। चान्द्रायणका अन्य प्रकार यह है—पूरे मासमें दो सौ चालीस ग्रास मात्र हविष्यान्न ग्रहण किया जाय। इन व्रतोंमें यह आवश्यक है कि प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन स्नान करके पवित्र-संज्ञक विशेष मन्त्रोंका जप करे तथा गायत्री-मन्त्रसे पिण्डग्रासको अभिमन्त्रित कर उसे ग्रहण करे।
जिन पापोंका प्रायश्चित्त शास्त्रोंमें नहीं बताया गया है, उन पापोंसे भी शुद्धि चान्द्रायणव्रतसे हो जाती है। किसी पापके निवारणके लिये प्रायश्चित्तरूपमें नहीं, अपितु पुण्य प्राप्त करनेकी दृष्टिसे जो इस चान्द्रायणव्रतका अनुष्ठान करता है, उसको चन्द्रलोककी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार पुण्य प्राप्त करनेके लिये ही जो कृच्छ्रव्रत करता है, वह महान् ऐश्वर्यका लाभ प्राप्त करता है। (अध्याय १०५)
अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण
**याज्ञवल्क्यजीने कहा—**हे यतियो! अब मैं मृत्युके पश्चात् होनेवाले मरणाशौचका वर्णन करता हूँ, उसका श्रवण करें।
दो वर्षसे कम आयुवाले बालककी मृत्यु होनेपर उसको मिट्टीमें गाड़ देना चाहिये।<sup>१</sup> उसके लिये जलाञ्जलि न दें। दो वर्षसे अधिक आयुके बालककी मृत्यु होनेपर उसे सभी बन्धुगण मिलकर श्मशानभूमिमें ले जाकर लौकिक अग्निसे 'यमसूक्त' का पाठ करते हुए चितामें जला दें। यज्ञोपवीत होनेके अनन्तर मृत्यु होनेपर सभी क्रियाएँ आहिताग्निके समान करे। मरणतिथिके सातवें दिन अथवा दसवें दिनके पहले अपने कुल एवं गोत्रमें आनेवाले परिजन<sup>२</sup> 'अप नः शोशुचदघम्<sup>३</sup>' मन्त्रसे दक्षिण दिशाकी ओर अभिमुख होकर यथासम्भव
<sup>१-ऐसे शवको गन्ध, माल्य, अनुलेपन आदिसे अलंकृत करके श्मशानसे अन्यत्र हड्डियोंके समूहसे रहित, ग्राम या नगरके बाहरकी भूमिमें गड्ढा खोदकर रखना चाहिये। (मनुस्मृति ५। ६८-६९)</sup>
<sup>२-समानगोत्र, समानपिण्ड एवं समानोदकवाले लोग।</sup>
<sup>३-ऋग्वेद १। ९७। १-८।</sup>
| १८४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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घरसे बाहर जलाशयपर जाकर जलाञ्जलि दे। इसी प्रकार मातामह तथा आचार्य-पत्नी आदिकी भी उदकक्रिया करनी चाहिये।
मित्र, विवाहित स्त्री (लड़की, बहन आदि), भागिनेय, श्वशुर और ऋत्विक्का यदि मरण हुआ है तो इनके अभ्युदयके लिये इन्हें सविधि जलाञ्जलि देनी चाहिये और वह जलाञ्जलि इनके नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए एक ही बार देनी चाहिये। पाखण्डी एवं पतितजनोंकी मृत्यु होनेपर उनकी उदकक्रिया नहीं होती। ब्रह्मचारी, व्रात्य तथा स्वेच्छाचारिणी स्त्रीके लिये भी उदकक्रियाका निषेध है। मद्यपी और आत्महत्या करनेवाले अशौच और उदकक्रियाके पात्र नहीं होते।
व्यक्तिके निधनपर रोना निषिद्ध है, क्योंकि जीवोंकी स्थिति अनित्य होती है। यथाशक्ति श्मशानभूमिमें दाहादिक क्रिया करके स्वजनोंको घर आना चाहिये। द्वारपर पहुँचकर वे सबसे पहले निम्बकी पत्ती चबाकर, तदनन्तर आचमन करके अग्नि, जल, गोबर और श्वेत सरसोंका स्पर्श कर पत्थरपर पैर रखकर धीरेसे घरमें प्रवेश करें। प्रेतका संस्पर्श करनेपर भी मनुष्यको घरमें प्रविष्ट होनेके पूर्व उक्त विहित-कर्म कर लेना चाहिये। सपिण्डमें आनेवाले जो लोग पुण्यप्राप्त करनेमात्रकी दृष्टिसे प्रेतका अनुगमन अर्थात् उसकी दाह-क्रिया आदिमें सम्मिलित होते हैं और वे यदि तत्काल अपनी शुद्धि चाहते हैं तो दाह-क्रिया सम्पन्न करानेके अनन्तर उन्हें स्नान एवं प्राणायाम कर लेना चाहिये।
उस दिन खरीदे हुए पदार्थोंका भोजन करके* सभी परिजनोंको अलग-अलग भूमिपर सोना चाहिये। पिण्डयज्ञके पश्चात् मृत व्यक्तिके उद्देश्यसे विहित पिण्डदानकी प्रक्रियाके अनुसार अपसव्य आदिके रूपमें तीन दिनतक पिण्डरूप अन्न पृथ्वीपर मौन धारण करते हुए दे। श्राद्धके लिये अधिकृत व्यक्ति खुले हुए आकाशके नीचे एक शिक्य आदिके मिट्टीके पात्रमें जल और दूसरे मिट्टीके पात्रमें दूध उस प्रेतात्माको समर्पित करे। श्राद्धकर्ताको अशुचि होनेपर भी श्रौत अग्नि एवं स्मार्त अग्निमें किये जानेवाले नित्यकर्म (अग्निहोत्र, दर्श पूर्णमास, स्मार्त अग्निमें विहित सायं-प्रातः होम)-का अनुष्ठान श्रुतिकी आज्ञाके अनुसार करना ही चाहिये।
यदि जन्मके पश्चात् और दाँत निकलनेके पूर्व बालककी मृत्यु हो जाती है तो उनके सम्बन्धियोंकी सद्यः शुद्धि हो जाती है। दाँत निकलनेके पश्चात् चूड़ाकरणतक एक अहोरात्रका अशौच होता है और उपनयन-संस्कारके पहले और चूड़ाकरणके बाद बालककी मृत्यु होनेपर तीन रात्रिके बाद अशौच समाप्त होता है। उपनयन-संस्कारके पश्चात् मृत्यु होनेपर दस रात्रियोंका अशौच होता है। सपिण्डोंके लिये दस रात्रिका एवं समानोदक लोगोंके लिये तीन रात्रिका अशौच होता है।
दो वर्षसे कम आयुवाले पुत्र एवं पुत्रीकी मृत्युपर माता-पिता दोनोंको दस रात्रिका अशौच होता है। यदि इस मरणाशौचके मध्य परिवारमें किसी बालकका जन्म या किसीकी मृत्यु होती है तो प्रथम अशौचके शेष दिनोंके पश्चात् ही शुद्धि हो जाती है।
सपिण्डकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये क्रमशः—दस, बारह, पंद्रह तथा तीस दिनोंका अशौच माना गया है। पाणिग्रहण-संस्कारके पूर्व और वाग्दानके पूर्व तथा चूड़ाकरणके बाद कन्याकी मृत्यु होनेपर एक अहोरात्रमें ही शुद्धि हो जाती है। या० स्मृति २४वें श्लोककी मिताक्षराके अनुसार दाँत निकलनेके पूर्व यदि
* बिना माँगे हुए अन्नमात्रका भोजन करना चाहिये।
काण्ड ]
अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण
१८५
बालकका मरण हुआ और उसका अग्नि-संस्कार किया गया तो एक दिनमें शुद्धि हो जाती है। गुरु<sup>१</sup> और अन्तेवासी (शिष्य) वेदाङ्गोंका प्रवक्ता, मामा<sup>२</sup>, श्रोत्रिय<sup>३</sup> एवं अनौरस<sup>४</sup> पुत्र, अपनी वह भार्या जो प्रतिलोम संकरसे अतिरिक्त किसी अन्यके आश्रयमें रह रही है, उसके तथा अपने देशके राजाकी मृत्युपर एक दिनका अशौच होता है। राजा (अभिषिक्त क्षत्रिय आदि राजा), गौ (पशुमात्र), ब्राह्मण (मनुष्यमात्र)-के द्वारा जो आहत होता है, उसके सम्बन्धियोंकी स्नानमात्रसे तत्काल शुद्धि हो जाती है। ऐसे ही जिसने विष या बन्धन आदिके द्वारा बुद्धिपूर्वक आत्मघात कर लिया है, उसके सम्बन्धियोंकी भी तत्काल स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है और समस्त पृथ्वी या पृथ्वीके एक देशके अभिषिक्त अधिपति क्षत्रिय आदिको मरण या उत्पत्तिनिमित्तिक अशौच नहीं होता। सत्री (लगातार अन्नसत्र चलानेवाले), व्रती (कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि व्रतमें प्रवृत्त), ब्रह्मचर्यव्रतमें प्रवृत्त, दाता (वह वानप्रस्थाश्रमी जो केवल दान ही देता है, प्रतिग्रह कभी भी नहीं करता), ब्रह्मविद् (संन्यासी) किसी भी प्रकारके अशौचसे ग्रस्त नहीं होते। दान (किसीको देनेके लिये पूर्वमें संकल्पित द्रव्य), विवाह (विवाहके निमित्त एकत्रित सामग्री), यज्ञ आदि विशेष कृत्योंके लिये एकत्रित सामग्री, संग्राम (युद्धकाल)-में, देशमें अतिभयंकर या राजभयसे उत्पन्न विप्लवकी दशामें, अतिकष्टकर आपत्तिमें किसी भी प्रकारके अशौचकी निवृत्ति तत्काल ही हो जाती है अर्थात् अशौच नहीं होता।
जो अकार्यकारी अर्थात् निषिद्ध कार्य करनेवाले हैं, उनकी शुद्धि दान देनेसे होती है। ग्रीष्म-ऋतु आदिके प्रभावसे जो नदी अत्यल्प जलवाली हो जाती है और उसके किनारे आदि अपवित्र वस्तुओंसे उपहत हो जाते हैं वह नदी जलके वेगपूर्ण उस प्रवाहसे शुद्ध हो जाती है जो प्रवाह नदीको जलमय बना दे और उसके किनारोंको काट देनेमें समर्थ हो।
आपत्कालमें ब्राह्मणको क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णकी वृत्तिसे जीविकाका निर्वाह करना चाहिये, किंतु वैश्यवृत्ति करनेवाले ब्राह्मणके लिये फल, सोमलता, क्षौमवस्त्र (सभी वस्त्र), वेत्र आदिकी लताएँ, औषधि लता, दधि, दुग्ध, घृत, जल, तिल, ओदन, रस, क्षार, मधु, लाक्षा, पकाया हुआ हविष्यान्न, वस्त्र, मणि आदि प्रस्तरमात्र, आसव, पुष्प, शाक, मिट्टी, चर्म, पादुका, मृगचर्म, कौशेय (वस्त्र), लवण, मांस, तिलकुट (पिण्याक), मूल और सुगन्धित द्रव्य-पदार्थोंका विक्रय वर्जित है।
ब्राह्मणके द्वारा अपने श्रौत-स्मार्त-यज्ञकी पूर्णताके लिये अपेक्षित धान्य या अन्य किसी अत्यावश्यक औषधि आदिकी व्यवस्थाके लिये अपेक्षित धान्यके बराबर तिलका विक्रय करके धान्यका संग्रह किया जा सकता है। किंतु आपत्कालमें भी लवणादिका व्यापार ब्राह्मणके लिये अवश्य वर्जित है। (आपत्तियोंके कारण नमकादिके अतिरिक्त) ब्राह्मण अन्य जो कुछ हीन आवैश्यवृत्ति करता है, उसमें वह उसी प्रकार निष्कलुष रहता है जैसे सूर्य। आपत्कालमें ब्राह्मण कृषि एवं पशुपालनादि कार्य कर सकता है, किंतु उसके द्वारा अश्वोंका विक्रय त्याज्य है।
१-पिता ही यदि गुरु होते हैं तो उनकी मृत्युपर पिताकी मृत्युपर होनेवाला अशौच होगा।
२-यहाँ मामा मात्रको नहीं लेना है, अपितु मातृ-पक्ष एवं पितृ-पक्षके जितने भी बन्धु हैं उन सबको लेना है।
३-वेदकी एक शाखामात्रका अध्येता।
४-औरसके अतिरिक्त क्षेत्रज, दत्तक आदि पुत्र।
| १८६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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यदि किसी कारण ब्राह्मण कृषि आदिसे भी अपने जीवनकी रक्षा न कर सके तो तीन दिन बुभुक्षित ही रहे। तदनन्तर ब्राह्मणके अतिरिक्त और किसीके यहाँसे केवल एक दिनके लिये धान्य प्राप्त करे तथा अब्राह्मणसे प्राप्त इस धान्यका उपभोग करते समय वह प्रकाशित भी करे कि मैंने अब्राह्मणसे धान्य लेकर आज जीवन-निर्वाह किया है। ऐसे वृत्तिसंकरसे ग्रस्त ब्राह्मणके वृत्त, कुल, रीति, शास्त्राध्ययन, वेदाध्ययन और तप आदि विशेषताओंको जानकर राजाका यह कर्तव्य होता है कि वह उस ब्राह्मणके लिये धर्मानुकूल जीवन-यापनकी व्यवस्था करे। (अध्याय १०६)
महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण
सूतजीने कहा—महर्षि पराशरने वेदव्यासजीसे वर्णाश्रमादिके धर्मका वर्णन किया था। [उनका यही कहना है कि] कल्प-कल्पमें उत्पत्ति और विनाशके कारण प्रजाएँ आदि क्षीण होती रहती हैं। कल्पके प्रारम्भमें मन्वादि ऋषि वेदोंका स्मरण करके ब्राह्मणादि वर्णोंके धर्मोंका पुनः निरूपण करते हैं।
कलियुगमें दान ही धर्म है। कलियुगमें केवल पाप करनेवालेका परित्याग करना चाहिये<sup>१</sup>। कलियुगमें पाप तथा शाप—ये दोनों एक वर्षमें फलीभूत हो जाते हैं।
मनुष्य आचार (सदाचार तथा शौचाचार)-से ही सब कुछ प्राप्त करे। संध्या, स्नान, जप, होम, देव और अतिथिपूजन—इन षट्कर्मोंको प्रतिदिन करना चाहिये। आचारवान् ब्राह्मण तथा संन्यासी इस कलियुगमें दुर्लभ हैं। क्षत्रियको चाहिये कि वह शत्रुसेनाओंको जीतकर पृथिवीका भलीभाँति पालन करे। वैश्य कृषि एवं पशुपालन तथा व्यापारादि करे और शूद्र इन तीन द्विजवर्णोंकी सेवामें अनुरक्त रहे। व्यक्तिका पतन अभक्ष्य-भक्षण (शास्त्र-निषिद्ध भोजन), चोरी और अगम्यागमन करनेसे हो जाता है। यदि द्विज कृषिकार्य करता है तो वह थके हुए बैलसे हल न खिंचे तथा उसे भार ढोनेके कार्यमें नियोजित न करे। स्नान और योगादि कार्योंसे निवृत्त होकर पञ्चयज्ञ करे। मध्याह्नकालमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये और क्रूरकर्मोंकी निन्दा करे।
तिल तथा घृतका विक्रय नहीं करना चाहिये। पञ्चसूनाजनित<sup>२</sup> दोषके निवारणार्थ [बलिवैश्वदेव] होम करे। कृषिकर्ता द्विजद्वारा अपनी उपजका क्रमशः छठा भाग राजा, बीसवाँ भाग देवता और तैंतीसवाँ भाग ब्राह्मणोंको देय है, इससे (कृषिजनित) पाप नहीं लगता। कृषिकार्य करनेवाले क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र यदि खलिहानमें उक्त निर्धारित भाग राजा आदिको प्रदान नहीं करते हैं तो वे चोरके समान पापके भागी होते हैं।
मृत्युका अशौच होनेपर [सामान्यतः] ब्राह्मण तीन दिनके पश्चात् शुद्ध हो जाता है<sup>३</sup>। इसी प्रकार
<sup>१</sup>—त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत्। द्वापरे कुलमेकं तु कर्तारं तु कलौ युगे ॥
‘सत्ययुगमें जिस देशमें पाप होता हो उस देशका, त्रेतामें जिस ग्राममें पाप होता हो उस ग्रामका, द्वापरमें जिस कुलमें पाप होता हो उस कुलका और कलियुगमें केवल पाप करनेवालेका त्याग कर देना चाहिये।’
<sup>२</sup>—सूनाका अर्थ है—पशुके वधका स्थान। यहाँ सूनाका अर्थ है—हिंसाका स्थान। गृहस्थके घरमें हिंसाके पाँच स्थान होते हैं—चूल्हा, पेषणी (कूटने-पीसनेका साधन, खल-बट्टा, सिल आदि), मार्जनी (झाडू आदि), ऊखल, मूसल और जलका कलश—ये ही पाँच सूना हैं।
<sup>३</sup>—यहाँपर ब्राह्मण आदिकी अशौच-निवृत्तिके लिये दो प्रकारके वचन दिये गये हैं। पहलेके अनुसार तीन दिनमें तथा दूसरेके अनुसार दस दिनमें शुद्धि लिखी है। कलियुगमें दूसरा वचन ही मानकर अशौच-निवृत्तिकी व्यवस्था समझनी चाहिये।
९१- नीतिसार
काण्ड ] महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण १८७
क्षत्रिय दस दिन, वैश्य बारह दिन और शूद्र एक मासके पश्चात् शुद्ध होता है। ब्राह्मण दस दिन, क्षत्रिय बारह दिन, वैश्य पंद्रह दिन तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होते हैं। जो सपिण्ड-कुल-परम्परासे प्राप्त होनेवाली भू-सम्पत्ति आदिके हिस्सेदार हैं। और पृथक् आवास बनाकर रहनेवाले बन्धु-बान्धव हैं, उन्हें जन्म तथा मृत्यु आदिकी विपत्तिमें अशौच होता है। चौथी पीढ़ीतक दस दिन, पाँचवीं पीढ़ीमें छः दिन, छठीं पीढ़ीमें चार दिन, सातवीं पीढ़ीमें तीन दिन मरणाशौच होता है। देशान्तरमें बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः स्नानमात्रसे शुद्धि होती है।
जो बालक जन्म होनेके पश्चात् दाँत निकलनेके पूर्व ही मर जाते हैं या जिनकी मृत्यु गर्भसे बाहर होनेके समय हो जाती है, उन सबका अग्नि-संस्कार, पिण्डदान तथा जल-संतर्पण-कार्य नहीं होता है। यदि स्त्रीका गर्भस्राव हो जाता है अथवा गर्भपात हो जाता है तो जितने मासका वह गर्भ होता है, उतने दिनतक सूतक मानना चाहिये। जन्मसे लेकर नामकरणतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः स्नानमात्रसे शुद्धि होती है। यदि नामकरणके पश्चात् चूडाकरण-संस्कारके मध्य बालककी मृत्यु होती है तो एक दिन और एक रात्रिका अशौच होता है। यदि उपनयन-संस्कारके पूर्व बालककी मृत्यु हो जाती है तो तीन रात्रियोंतक और तत्पश्चात् उसकी मृत्यु होनेपर दस रात्रियोंका अशौच होता है।
चार मासतकके गर्भके नष्ट होनेपर गर्भस्राव तथा पाँच और छः मासके गर्भके गिरनेको गर्भपात कहा जाता है।
जो ब्रह्मचर्यव्रतके अग्निहोत्रकी दीक्षामें है अथवा अनासक्त-भावसे जीवन व्यतीत करनेवाले हैं, उनके लिये जन्म एवं मृत्युका अशौच नहीं होता। शिल्पकार, कारुकर्म करनेवाला (चटाई बनानेवाला), वैद्य, दास-दासी-भृत्य-अग्निहोत्री तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण और राजा—ये सद्यः शौचवाले कहे गये हैं।
जन्मका अशौच होनेपर माता दस दिनमें तथा पिता स्नान करनेके बाद शुद्ध हो जाता है। सूतिका-गृहमें प्रसूता स्त्रीके स्पर्शसे पिताको अशौच हो जाता है। आचमनसे पिता इस अशौचसे शुद्ध हो जाता है।
यदि विवाहोत्सव तथा यज्ञादिक कार्योंके सम्पादन-कालमें ही मृत्यु या जन्मका अशौच हो जाता है तो पूर्वसंकल्पित कार्यसे अन्य कार्यके निषेधका विधान है। अर्थात् पूर्वसंकल्पित कार्यके लिये अशौच नहीं होता। बादके कार्यमें अशौच होगा।
अनाथ व्यक्तिके शवको वहन करनेपर प्राणायाममात्रसे ही मनुष्यकी शुद्धि हो जाती है, किंतु शूद्रका शव उठानेपर तीन रात्रियोंके पश्चात् शुद्धि होती है।
आत्मघात, विषपान, फाँसी तथा कृमिदंशसे मृत्यु होनेपर उसका संस्कार यथाविधान विशेष प्रायश्चित्तके बिना नहीं होता है। गौके द्वारा आहत होनेसे अथवा कृमिदंशके कारण मरे हुए व्यक्तिका स्पर्श करनेपर कृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है, यह शुद्धि अशौच-निमित्तक है।
जो पत्नी यौवनावस्थामें अपने निर्दुष्ट एवं सच्चरित्रवान् पतिका परित्याग कर देती है, वह सात जन्मोंतक स्त्रीयोनिको प्राप्त कर बार-बार विधवा होती है। ऋतुकालमें पत्नीके साथ संसर्ग न करनेके कारण पुरुषको बालहत्याका पाप लगता है। जो स्त्री अन्न-पानादिकी दृष्टिसे भ्रष्ट होती है, वह अगम्या होती है तथा जन्मान्तरमें सूकरयोनि प्राप्त करती है।
औरस और क्षेत्रज पुत्र एक ही पिताके पुत्र
| १८८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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होते हैं। अतः ये दोनों पुत्र अपने पिताके लिये पिण्डदान कर सकते हैं।
परिवेत्ता<sup>१</sup> एवं परिवित्ति (बड़े भाईद्वारा अपने विवाहकी अस्वीकृति देनेवाला)-को अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। इसी प्रकार कन्याको भी कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। ऐसी कन्याके दान देनेवालेको अतिकृच्छ्रव्रत तथा विवाह-विधि सम्पन्न करानेवालेको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये।
यदि बड़ा भाई कुबड़ा, बौना, नपुंसक, हकलाने-वाला, मूर्ख, जन्मान्ध, बहरा तथा गूँगा हो तो छोटे भाईके द्वारा विवाह कर लेनेमें कोई दोष नहीं होता।
जिसे वाग्दानमात्र किया गया है ऐसा भावी पति यदि परदेश चला जाय, मर जाय, संन्यास-धर्मका अवलम्बन कर ले, नपुंसक हो अथवा पतित हो गया हो तो इन पाँच आपदाओंमें वाग्दत्ता कन्या दूसरे पतिका वरण कर सकती है। अपने पतिके साथ सतीधर्मके अनुसार अग्निमें प्रवेश करनेवाली स्त्री शरीरमें स्थित रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करती है।
कुत्ता आदिके काटनेपर मनुष्यको गायत्री-मन्त्रके जपसे शुद्धि करनी चाहिये। जिसे स्वयं गायत्री-जपका अधिकार नहीं है, उसे ब्राह्मणद्वारा गायत्री-जप कराना चाहिये। चाण्डाल आदिके द्वारा मारा गया अग्निहोत्री ब्राह्मण लौकिक अग्निसे जलाने योग्य होता है। [उस अग्निसे जलाये गये] ब्राह्मणकी अस्थियोंको दूधमें प्रक्षालित करके पुनः विधिवत् मन्त्रपूर्वक अपने अग्निहोत्रशालाकी अग्निसे प्रदग्ध करना चाहिये। यदि मृत्यु प्रवासकालमें होती है तो परिजनको अपने घरपर उस मृत व्यक्तिका कुशसे शरीर बनाकर पुनः अग्निदाह करना चाहिये।
कृष्णमृगचर्मपर छः सौ पलाशपत्रोंको (मृतककी आकृतिके समान) बिछाकर अथवा कुशमय शरीरका निर्माण करके शिश्न-भागपर शमी तथा वृषण-भागपर अरणिके काष्ठको स्थापित करे। उसके दायें हाथके स्थानपर कुण्ड (स्थाली) और बायें हाथके स्थानपर उपभृत [यज्ञियपात्र], पार्श्वभागमें उलूखल तथा पीठकी ओर मूसल रखे। तत्पश्चात् उस शवके वक्षःस्थलपर [सोमरस तैयार करनेके लिये प्रयोगमें आनेवाले] पत्थरको रखकर उसके मुखभागमें घृत-तण्डुल और तिल डालना चाहिये। कानके पास प्रोक्षणीपात्र और नेत्रोंके संनिकट आज्यस्थाली रखे। कान, नेत्र, मुख तथा नासिका-भागमें स्वर्ण-खण्ड रखनेका विधान है। इस प्रकार अग्निहोत्रके समस्त उपकरणोंके सहित उस अग्निहोत्रीका शवदाह करनेसे वह (मृत अग्निहोत्री) ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। 'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' इस मन्त्रसे घृतकी एक आहुति देनी चाहिये।
हंस, सारस, क्रौँच, चक्रवाक, कुक्कुट, मयूर और मेषका वध करनेवाला मनुष्य एक दिन तथा एक रात्रिके उपवासके पश्चात् पापसे शुद्ध हो जाता है। अन्य सभी पक्षियोंका वध करनेपर एक अहोरात्रमें शुद्धि होती है।
सभी प्रकारके चतुष्पद पशुओंका वध करनेपर जो पाप मनुष्यको लगता है, उसका अवमोचन खड़े होकर एक अहोरात्र उपवास कर [गायत्री] मन्त्रका जप करनेसे होता है।
शूद्रका वध करनेपर कृच्छ्रव्रत, वैश्यकी हत्या करनेपर अतिकृच्छ्रव्रत, क्षत्रियका वध करनेपर बाईस चान्द्रायणव्रत एवं ब्राह्मणकी हत्या करनेपर तीस चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। (अध्याय १०७)
१-ज्येष्ठ भ्राताके अविवाहित रहते हुए अपना विवाह कर लेनेवाला छोटा भाई 'परिवेत्ता' कहा जाता है और परिवेत्ताका अविवाहित बड़ा भाई 'परिवित्त' कहा जाता है।
९२- राजनीति-निरूपण
काण्ड ] बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार १८९
बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार
सूतजीने कहा— हे ऋषियो ! अब मैं 'अर्थशास्त्र' आदिपर आश्रित नीतिसार कह रहा हूँ, जो राजाओंके साथ ही अन्य सभीके लिये भी हितकर तथा पुण्य, आयु और स्वर्गादिको प्रदान करनेवाला है।
जो मनुष्य [धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस पुरुषार्थचतुष्टयकी] सिद्धि चाहता है, उसको सदैव सज्जनोंकी ही संगति करनी चाहिये। दुर्जनोंके साथ रहनेसे इस लोक अथवा परलोकमें हित सम्भव नहीं है—
सद्भिः सङ्गं प्रकुर्वीत सिद्धिकामः सदा नरः।
नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम्॥
(१०८।२)
क्षुद्रके साथ वार्तालाप और दुष्ट व्यक्तिका दर्शन नहीं करना चाहिये। शत्रुसे सेवित व्यक्तिके साथ प्रेम न करे और मित्रके साथ विरोध न करे। मूर्ख शिष्यको उपदेश देनेसे, दुष्ट स्त्रीका भरण¹-पोषण करनेसे तथा दुष्टोंका किसी कार्यमें सहयोग लेनेसे विद्वान् पुरुष भी अन्तमें दुःखी हो जाता है। मूर्ख ब्राह्मण, युद्ध-पराङ्मुख क्षत्रिय, विवेकरहित वैश्य और अक्षरसंयुक्त शूद्रका परित्याग तो दूरसे ही कर देना चाहिये। कालकी प्रबलतासे शत्रुके साथ संधि और मित्रसे विग्रह (शत्रुता) हो जाता है। अतः कार्य-कारण-भावका विचार करके ही पण्डितजन अपना समय व्यतीत करते हैं।
समय प्राणियोंका पालन करता है। समय ही उनका संहार करता है। उन सभीके सोनेपर समय (काल) जागता रहता है। अतः समय बड़ा ही दुरतिक्रम है (अर्थात् समयको जीतना बड़ा ही कष्टसाध्य है)। समयपर ही प्राणीके पराक्रमका क्षरण होता है। समय आनेपर ही प्राणी गर्भमें आता है। समयके आधारपर उसकी सृष्टि होती है और पुनः समय ही उसका संहार भी करता है। काल निश्चित ही नियमसे नित्य सूक्ष्म गतिवाला ही होता है तब भी हमारे अनुभवमें उसकी गति दो प्रकारसे होती है, जिसका अन्तिम परिणाम जगत्का संग्रह ही होता है। यह गति स्थूल एवं सूक्ष्म-रूपमें दो प्रकारकी होती है।
ऋषियो! बृहस्पतिने इन्द्रसे इस नीतिसारका वर्णन किया था, जिसके कारण सर्वज्ञ होकर इन्द्रने दैत्योंका विनाश करके देवलोकका आधिपत्य प्राप्त किया था।
ब्राह्मणकल्प राजर्षियोंको नित्य देवता एवं ब्राह्मण आदिका पूजन करना चाहिये तथा महान् पातकोंको नष्ट करनेवाले अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान करना चाहिये।
उत्तम प्रकृतिवाले सज्जनोंकी संगति, विद्वानोंके साथ सत्कथाका श्रवण और लोभरहित मनुष्यके साथ मैत्रीसम्बन्ध स्थापित करनेवाला पुरुष दुःखी नहीं होता²।
[दूसरेकी] निन्दा, दूसरेका धन-ग्रहण, परायी स्त्रीके साथ परिहास तथा पराये घरमें निवास कभी नहीं करना चाहिये। हितकारी अन्य व्यक्ति भी अपने बन्धु हैं और यदि बन्धु अहितकर है तो वह भी अपने लिये अन्य है। शरीरसे ही उत्पन्न हुई व्याधि अहितकर होती है, किंतु वनमें उत्पन्न हुई औषधि उस व्याधिका निराकरण करके मनुष्यका हित-साधन करती है। जो मनुष्य सदैव हितमें तत्पर रहता है, वही बन्धु है। जो भरण-पोषण करता है, वही पिता है। जिस व्यक्तिमें विश्वास रहता है, वही मित्र है और जहाँपर मनुष्यका
¹ यथाशक्ति भरण-पोषणका प्रयास करना चाहिये और यदि स्त्रीके दुष्ट स्वभाववश भरण-पोषण कदाचित् अशक्य हो रहा है या पारिवारिक-सामाजिक व्यवस्था उच्छिन्न हो रही है, तब इस व्यवस्थाको ध्यानमें रखना चाहिये।
² उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥ (१०८।१२)
| १९० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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जीवन-निर्वाह होता है, वही उसका देश है<sup>१</sup>।
जो आज्ञापालक है, वही वास्तविक भृत्य (सेवक) है; जो बीज अंकुरित होता है, वही बीज है; जो पतिके साथ प्रिय सम्भाषण करती है, वही वास्तविक भार्या है। पिताके जीवनपर्यन्त पिताके भरण-पोषणमें जो पुत्र लगा रहता है, वही वास्तवमें पुत्र है। जो गुणवान् है, उसीका जीवन वास्तवमें सार्थक है। जो धर्ममें प्रवृत्त है, वही जीवित है; जो गुण-धर्मविहीन है, उसका जीवन निष्फल है।
जो भार्या गृहकार्यमें दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है वास्तवमें वही भार्या है<sup>२</sup>। जो नित्य स्नान करके अपने शरीरको सुगन्धित द्रव्य-पदार्थोंसे सुवासित करनेवाली है, प्रियवादिनी है, अल्पाहारी है, मितभाषिणी है, सदा सब प्रकारके मङ्गलोंसे युक्त है, जो निरन्तर धर्मपरायण है, निरन्तर पतिकी प्रिय है, सदा सुन्दर मुखवाली है तथा जो ऋतुकालमें ही पतिके सहगमनकी इच्छा रखती है, वही भार्या है।
—इन लक्षणोंसे समन्वित स्त्री समस्त सौभाग्योंकी अभिवृद्धिकारिणी होती है। जिस मनुष्यकी ऐसी भार्या है वह मनुष्य नहीं देवराज इन्द्र है।
जिस मनुष्यकी भार्या विरूप नेत्रोंवाली, पापिनी, कलहप्रिय और विवादमें बढ़-चढ़कर बोलनेवाली है, वह पतिके लिये वास्तवमें वृद्धावस्था ही है, वास्तविक वृद्धावस्था वृद्धावस्था नहीं है। जिसकी भार्या परपुरुषका आश्रय ग्रहण करनेवाली है, दूसरेके घरमें रहनेकी आकांक्षा रखती है, कुकर्ममें संलग्न है तथा निर्लज्ज है, वह (पतिके लिये) साक्षात् वृद्धावस्था-स्वरूप है।
जिस पुरुषकी भार्या गुणोंका महत्त्व समझनेवाली, पतिका अनुगमन करनेवाली और स्वल्पसे भी स्वल्प वस्तुसे संतुष्ट रहनेवाली है; पतिके लिये वही सच्ची प्रियतमा है, सामान्य प्रिया नहीं है।
दुष्ट पत्नी, दुष्ट मित्र तथा प्रत्युत्तर देनेवाला भृत्य और सर्पयुक्त घरमें निवास साक्षात् मृत्यु ही है।
मनुष्यको दुर्जनोंकी संगतिका परित्याग करके साधुजनोंकी संगति करनी चाहिये और दिन-रात्रि पुण्यका संचय करते हुए नित्य अपनी अनित्यताका स्मरण रखना चाहिये—
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्।
कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम्॥ (१०८।२६)
जो स्त्री सर्पके कण्ठमें रहनेवाले विषके समान है, जो सर्पके फणोंके सदृश भयंकर है, जो रौद्ररसकी साक्षात् मूर्ति है, जो शरीरसे कृष्णवर्णकी है, जो रक्तके सदृश लाल-लाल नेत्रोंके द्वारा दूसरेके हृदयको भयभीत कर देनेवाली है, जो व्याघ्रके समान भयानक है, जो क्रोधवदना एवं प्रचण्ड अग्निकी ज्वालाकी भाँति धधकनेवाली और काकके समान जिह्वालोलुप है, अपने पतिसे प्रेम न रखनेवाली है, भ्रमितचित्तवाली तथा दूसरेके पुर (घर-नगर) आदिमें जानेवाली अर्थात् परपुरुषकी इच्छा रखनेवाली है, वह स्त्री कदापि सेव्य नहीं है।
दैववश कभी अल्प सामर्थ्यवान् व्यक्ति भी शक्तिशाली हो सकता है, कृतघ्न व्यक्ति भी कभी सुकृत कर सकता है, अग्निमें कभी शीतलता भी आ सकती है, हिममें उष्णता भी आ सकती है; किंतु वेश्यामें [पुरुषविषयक] अनुराग नहीं हो सकता।
घरके अंदर भयंकर सर्प देख लिये जानेपर, चिकित्सा होनेपर भी रोग बने ही रहनेपर, बाल्य-युवा आदि अवस्थासे युक्त यह शरीर कालसे आवृत है। यह समझनेपर भी कौन ऐसा व्यक्ति है, जो धैर्य धारण कर सकता है? (अध्याय १०८)
१-परोऽपि हितवान् बन्धुर्बन्धुरप्यहितः परः। अहितो देहजो व्याधिर्हितमारण्यमौषधम्॥
स बन्धुर्यो हिते युक्तः स पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः स देशो यत्र जीव्यते॥ (१०८। १४-१५ )
२-सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता॥ (१०८। १८)
९३- राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण
काण्ड ] नीतिसार-निरूपण १९१
नीतिसार-निरूपण
सूतजीने कहा—आपत्तिकालके लिये धनका संरक्षण करना चाहिये, स्त्रियोंकी रक्षाके लिये धनका उपयोग करना चाहिये एवं अपनी रक्षामें स्त्री एवं धन दोनोंका उपयोग करना चाहिये।
कुलकी रक्षाके लिये एक व्यक्तिका, ग्रामकी रक्षाके लिये कुलका, जनपदके हितके लिये ग्रामका और अपने वास्तविक कल्याणके लिये पृथिवीका भी परित्याग कर देना चाहिये—
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
(१०९।२)
नरकमें निवास करना अच्छा है, किंतु दुश्चरित्र व्यक्तिके घरमें निवास करना उचित नहीं है। नरकवासके कारण पाप विनष्ट हो जाता है, किंतु दुश्चरित्र व्यक्तिके घरमें निवास करनेसे पापकी निवृत्ति नहीं होती। बुद्धिमान् पुरुष एक पाँवको स्थिर करके ही दूसरे पाँवको आगे बढ़ाता है। इसीलिये अगले स्थानकी परीक्षाके बिना पूर्वस्थानका परित्याग नहीं करना चाहिये<sup>१</sup>।
दुष्टजनोंसे व्याप्त देश, उपद्रवग्रस्त निवासभूमि, कृपण राजा तथा मायावी मित्रका परित्याग कर देना चाहिये।
कंजूसके हाथमें पहुँचे हुए धन, अत्यन्त दुष्ट और आग्रही व्यक्तिके पास संचित ज्ञान, गुण एवं पराक्रमसे रहित रूप तथा आपत्तिकालमें पराङ्मुख मित्रसे मनुष्यको क्या लाभ हो सकता है? जो पदासीन (अधिकारयुक्त) व्यक्ति है, उसके कभी न देखे गये बहुत-से व्यक्ति भी सहायक हो जाते हैं और सभी व्यक्ति मित्र हो जाते हैं। परंतु जब वही व्यक्ति पदच्युत और अर्थहीन हो जाता है तो उसके असमयमें स्वजन भी शत्रु हो जाते हैं<sup>२</sup>।
आपत्कालमें मित्र, युद्धमें वीर, एकान्त स्थानमें शुचिता, विभवके क्षीण हो जानेपर पत्नी तथा दुर्भिक्षके समय अतिथप्रियताकी पहचान होती है—
आपत्सु मित्रं जानीयाद्रणे शूरं रहः शुचिम्।
भार्यां च विभवे क्षीणे दुर्भिक्षे च प्रियातिथिम्॥
(१०९।८)
पक्षीगण फलरहित वृक्षोंका परित्याग कर देते हैं। सारस पक्षी सूखे हुए सरोवरको छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं। वेश्याएँ धनसे रहित होनेपर पुरुषको छोड़ देती हैं। मन्त्री भ्रष्ट राजाका त्याग कर देते हैं। भौंरे बासी पुष्पको त्यागकर नवविकसित कुसुमपर चले जाते हैं और मृग जले हुए वनका परित्याग कर अन्यत्र आश्रय लेते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि स्वार्थवश ही सभी प्राणी एक-दूसरेसे प्रेम करते हैं। वास्तवमें कौन किसका प्रिय है<sup>३</sup>?
अर्थप्रदानके द्वारा लोभी मनुष्यको, करबद्ध-प्रणाम निवेदनसे उदारचेता व्यक्तिको, प्रशंसा करनेसे मूर्ख व्यक्तिको और तात्त्विक चर्चासे विद्वान् पुरुषको
१-वरं हि नरके वासो न तु दुश्चरिते गृहे। नरकात् क्षीयते पापं कुगृहात्र निवर्तते ॥
चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान् । न परीक्ष्य परं स्थानं पूर्वमायतनं त्यजेत् ॥ (१०९।३-४)
२-अर्थेन किं कृपणहस्तगतेन केन ज्ञानेन किं बहुशठाग्रहसंकुलेन।
रूपेण किं गुणपराक्रमवर्जितेन मित्रेण किं व्यसनकालपराङ्मुखेन ॥
अदृष्टपूर्वा बहवः सहायाः सर्वे पदस्थस्य भवन्ति मित्राः।
अर्थैर्विहीनस्य पदच्युतस्य भवत्यकाले स्वजनोऽपि शत्रुः॥ (१०९।६-७)
३-वृक्षं क्षीणफलं त्यजन्ति विहगाः शुष्कं सरः सारसा निर्द्रव्यं पुरुषं त्यजन्ति गणिका भ्रष्टं नृपं मन्त्रिणः।
पुष्पं पर्युषितं त्यजन्ति मधुपाः दग्धं वनान्तं मृगाः सर्वः कार्यवशाज्जनो हि रमते कस्यास्ति को वल्लभः ॥ (१०९।९)
१९२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
संतुष्ट किया जा सकता है। सद्भाव रखनेसे देवगण, सज्जनवृन्द एवं द्विजाति संतुष्ट होते हैं। इनके अतिरिक्त साधारण लोग खान-पान तथा पण्डितजन मान-सम्मानसे संतुष्ट हो जाते हैं—
लुब्धमर्थप्रदानेन श्लाघ्यमञ्जलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च याथातथ्येन पण्डितम्॥
सद्भावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषा द्विजाः।
इतरे खाद्यपानेन मानदानेन पण्डिताः॥
(१०९।१०-११)
प्रणिपात-निवेदनसे उत्तम प्रकृतिवाले सज्जन पुरुषको, भेद-नीतिसे धूर्त तथा अपनी अपेक्षा कम पराक्रमवाले व्यक्तिको थोड़ा-बहुत देकर और अपने समान पराक्रमवालेको अपनी अपेक्षाके अनुकूल धन देकर वशमें किया जा सकता है। जिसका जैसा स्वभाव हो, उसके अनुरूप वैसा ही प्रिय वचन बोलते हुए उसके हृदयमें प्रवेशकर चतुर व्यक्तिको यथाशीघ्र उसे अपना बना लेना चाहिये।
नदी, नख तथा शृंग धारण करनेवाले पशु, हाथमें शस्त्र धारण किये हुए पुरुष, स्त्री और राजपरिवार विश्वास करनेयोग्य नहीं होते। जो मनुष्य बुद्धिमान् है, उसको अपनी धनक्षति, मनस्ताप, घरमें हुए दुश्चरित्र, वञ्चना तथा अपमानकी घटनाको दूसरेके समक्ष प्रकाशित नहीं करना चाहिये—
नदीनां च नखीनां च शृङ्गिणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च॥
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान् न प्रकाशयेत्॥
(१०९।१४-१५)
नीच और दुर्जन व्यक्तिका सांनिध्य, अत्यन्त विरह तथा सम्मान, दूसरेके प्रति स्नेह एवं दूसरेके घरमें निवास—ये सभी नारीके उत्तम शीलको नष्ट करनेवाले हैं।
किसके कुलमें दोष नहीं है, रोगसे कौन पीडित नहीं है, कौन दुःखी नहीं है और किसकी धन-सम्पत्तियाँ सदैव विद्यमान रही हैं? इस पृथिवीपर धन प्राप्त कर कौन अहंकारसे भरा नहीं है, किसपर विपत्तियाँ आयी नहीं हैं, स्त्रियोंके द्वारा किसका मन क्षुब्ध नहीं किया गया है और राजाओंका कौन प्रिय रहा है? कौन कालकवलित नहीं हुआ है, किस याचकका स्वाभिमान नष्ट नहीं हुआ है, कौन दुर्जनके जालमें फँसकर कुशलपूर्वक जीवनयापन कर सकता है? (अर्थात् कोई नहीं कर सकता।)
जिस मनुष्यके मित्र, स्वजन, बन्धु-बान्धव नहीं हैं, जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं है, वह कैसे अपने जीवनमें सफल हो सकता है और जिस कर्मके सम्पन्न होनेपर भी फलका उदय नहीं दीख रहा है, उस कर्मके अनुष्ठानसे क्या लाभ? ऐसे ही जो सम्पत्ति परिणाममें बहुत बड़ा दुःख देनेवाली है, उसका संग्रह कौन बुद्धिमान् व्यक्ति करेगा?
जिस देशमें व्यक्तिको सम्मान न मिले, आदर भी न मिले, अपने बन्धु-बान्धव भी सुलभ न हों और विद्या-लाभकी भी सम्भावना न बनती हो, उस देशका परित्याग कर देना चाहिये।
जिस धनके लिये राजा और चोरसे भय नहीं है, जो धन मरनेपर भी मनुष्यका साथ नहीं छोड़ता, उस धनका उपार्जन करना चाहिये। प्राणोंको भी संकटमें डाल देनेवाले परिश्रमसे जिस धनका अर्जन किया जाता है, उस धनको तो उत्तराधिकारी
१-कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः। केन न व्यसनं प्राप्तं श्रियः कस्य निरन्तराः॥
कोऽर्थं प्राप्य न गर्वितो भुवि नरः कस्यापदो नागताः स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः।
कः कालस्य न गोचरान्तरगतः कोऽर्थी गतो गौरवं को वा दुर्जनवागुरानिपतितः क्षेमेण यातः पुमान्॥(१०९।१७-१८)
९४- नीतिसार
काण्ड ] नीतिसार-निरूपण १९३
लोग यथोचित विभागके साथ अपने काममें ले लेते हैं; परंतु प्राणोंको संकटमें डालकर धनार्जनके लिये परिश्रम करनेवाला व्यक्ति धनके लोभमें जिन पापोंको करता है, वे पाप ही उसकी धरोहर बनकर उसकी नरक-यातनाके अथवा कुत्सित योनिके कारण बनते हैं।
संचित किया हुआ तथा बार-बार विचार करके सुरक्षित रखा हुआ, कदर्य (कृपण)-का धन चूहेके द्वारा एकत्रित किये गये धनके तुल्य है। ऐसा धन दुःख देनेके लिये ही होता है। उपार्जनकर्ताको उससे कोई भी सुख प्राप्त नहीं होता। ऐसा व्यक्ति मात्र धनार्जनका कष्ट ही भोगता है।
ऐसे ही व्यक्ति जन्मान्तरमें दरिद्र होनेके कारण नग्न होकर अनेक प्रकारके व्यसनसे त्रस्त हो रूखे स्वभाववाले हो जाते हैं तथा हाथमें खप्पर लेकर घर-घर भीख माँगते हैं और यह लोगोंको बताते हैं कि दान न देनेवालेको ऐसा ही फल मिलता है। ऐसे भिक्षुक कुछ दीजिये, कुछ दीजिये—ऐसी बार-बार याचना करते हुए संसारको यह शिक्षा प्रदान करते हैं कि दान न देनेवाले मनुष्यकी यही दशा होती है। आपकी भी मेरी-जैसी दुर्दशा न हो, इसलिये आपको दान देना चाहिये*।
कृपण अपने द्वारा संचित धन यज्ञोंमें नहीं लगा पाता है और अपने द्वारा माँगकर इकट्ठा किये धनको गुणवानोंको भी नहीं देता है। इस प्रकारका कृपणके द्वारा सुरक्षित धन चोर और राजाके काममें ही आता है। कृपणका धन देवता, ब्राह्मण, बन्धु तथा आत्महितके लिये नहीं होता, वह तो अग्नि, चोर अथवा राजाके लिये होता है। अत्यन्त कष्टसे अर्जित किया गया धन, धर्मका अतिक्रमण करके अर्जित किया गया धन अथवा शत्रुको साष्टाङ्ग प्रणाम करके और उसकी अधीनता स्वीकार करके प्राप्त किया गया धन—इस प्रकारका धन तुझे कभी प्राप्त न हो।
विद्याका अभ्यास न करनेसे वह विनष्ट हो जाती है। शक्ति रहते हुए फटे-पुराने, मैले-कुचैले वस्त्रोंको धारण करनेवाली स्त्रियाँ सौभाग्यकी रक्षा नहीं कर पातीं, सुपाच्य भोजनसे रोग नष्ट हो जाता है और चातुर्यपूर्ण नीतिसे शत्रु़का विनाश हो जाता है।
चोरका वध ही उसका दण्ड है। दुष्ट मित्रके लिये समुचित दण्ड उसके साथ अल्प वार्तालाप करना है। स्त्रियोंका दण्ड उनसे पृथक् शय्यापर शयन करना तथा ब्राह्मणके लिये दण्ड निमन्त्रण न देना है।
दुर्जन, शिल्पकार, दास तथा दुष्ट एवं ढोलक आदि वाद्य और स्त्री आदि सम्यक् अनुशासनसे ही मृदु-स्वभावको प्राप्त करते हैं। ये सत्कारमात्रसे मृदु स्वभाववाले नहीं हो पाते।
कार्यमें संलग्न करनेसे भृत्य, दुःख होनेपर बन्धु-बान्धव, विपत्तिकालमें मित्र तथा ऐश्वर्यके नष्ट होनेपर स्त्रीके स्वभावकी परीक्षा करनी चाहिये—
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे।
मित्रमापदि काले च भार्यां च विभवक्षये॥
(१०९।३२)
पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका आहार दुगुना, बुद्धि चौगुनी, कार्यकी क्षमता छःगुनी और कामवासना आठगुनी अधिक मानी गयी है। स्वप्नसे निद्राको नहीं जीता जा सकता, कामवासनासे स्त्रीपर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती, ईंधनसे अग्निको तृप्त नहीं किया जा सकता तथा मद्यसे प्यास नहीं बुझायी जा सकती। मांसयुक्त स्निग्ध भोजन, नाना प्रकारकी मदिराओंका पान, सुगन्धित द्रव पदार्थोंका
* शिक्षयन्ति च याचन्ते देहीति कृपणा जनाः। अवस्थेयमदानस्यः मा भूदेवं भवानपि ॥ (१०९।२५)
| १९४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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विलेपन, सुन्दर वस्त्र और सुवासित माल्याभरण— ये स्त्रियोंकी कामवासनाकी अभिवृद्धि करते हैं। जैसे लकड़ियोंके अधिक-से-अधिक ढेरको प्राप्त करके भी अग्नि संतुष्ट नहीं होती; नदीसमूहके मिलनेपर भी समुद्र तृष्णारहित होकर संतृप्त नहीं होता; यमराज सभी प्राणियोंका संहार करके भी आत्मसंतुष्टि प्राप्त करनेमें असमर्थ हैं; ऐसे ही नारी असंख्य पुरुषोंके साथ सम्पर्क करके भी संतृप्त नहीं होती।
शिष्ट व्यक्ति (सुशील), अभीष्ट-सिद्धि, प्रियवचन, सुख, पुत्र, जीवन और देवगुरुसे प्राप्त आशीर्वचनसे मनुष्यकी इच्छाएँ परिपूर्ण नहीं होतीं, इनके लिये अभिलाषा बढ़ती ही रहती है। धनके संग्रहसे राजा, नदियोंकी जलराशिसे समुद्र, सम्भाषणसे विद्वान् एवं राजदर्शनसे प्रजाके नेत्र संतुष्ट नहीं हो पाते।
अपने विहित कर्म तथा धर्माचरणका पालन करते हुए जीविकोपार्जनमें तत्पर, सदैव शास्त्र-चिन्तनमें रत तथा अपनी स्त्रीमें अनुरक्त, जितेन्द्रिय और अतिथिसेवामें निरत श्रेष्ठ पुरुषोंको तो घरमें भी मोक्ष प्राप्त हो जाता हैं।
जिस सत्कर्मनिरत पुरुषके पास मनोऽनुकूल, सुन्दर वस्त्राभूषणसे अलंकृत स्त्री है, यदि वह व्यक्ति उसके साथ अपने भवनकी अटारीपर सुखपूर्वक निवास करता है तो उसके लिये यहींपर स्वर्गका सुख है।
जो स्त्रियाँ स्वभावसे ही धर्म-विरुद्ध आचरण करनेवाली एवं पतिके प्रतिकूल व्यवहार रखनेवाली हैं, वे स्त्रियाँ न धन आदिके दान, न सम्मान, न सरल व्यवहार, न सेवाभाव, न शस्त्र-भय और न शास्त्रोपदेशसे ही अनुकूल की जा सकती हैं, वे तो सदा प्रतिकूल ही रहती हैं²।
विद्यार्जन, अर्थ-संग्रह, पर्वतारोहण, अभीष्ट-सिद्धि तथा धर्माचरण—इन पाँचोंको धीरे-धीरे प्राप्त करना चाहिये।
देवपूजनादिक कर्म, ब्राह्मणको दान, गुणवती विद्याका संग्रहण तथा सन्मित्र—ये सदा सहायक होते हैं। जिन्होंने बाल्यकालसे विद्यार्जन नहीं किया है, जिनके द्वारा युवावस्थामें धन और स्त्रीकी प्राप्ति नहीं की जा सकी है, वे इस संसारमें शोकके पात्र हैं और मनुष्यरूप धारण करके पशुवत् विचरण करते हुए दुःखसे परिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।
विद्याके उपासकको अध्ययन-कालमें भोजनकी चिंता नहीं करनी चाहिये। विद्यार्थीको विद्यार्जनके लिये गरुडके समान सुदूर देशको यथाशीघ्र पार कर लेना चाहिये।
जो बाल्यावस्थामें विद्याध्ययन नहीं करते हैं और फिर युवावस्थामें कामातुर होकर यौवन तथा धनको नष्ट कर देते हैं, वे वृद्धावस्थामें चिंतासे जलते हुए शिशिरकालमें कुहरेसे झुलसनेवाले कमलके समान संतप्त जीवन व्यतीत करते हैं।
शुष्क तर्क स्वयंमें अप्रतिष्ठित है, अतः किसी सिद्धान्तकी स्थापना केवल तर्कके द्वारा नहीं हो सकती। श्रुतियाँ भी अनेक प्रकारकी हैं। ऐसा कोई भी ऋषि नहीं है जो भिन्न-भिन्न प्रसंगोंमें विभिन्न सिद्धान्तोंका निर्देश न करे। इसीलिये धर्मका तत्त्व न तर्कोंमें निहित है, न श्रुतियोंमें निहित है, अपितु आप्तोंकी प्रज्ञामें निहित है। फलतः शिष्ट लोग जिस मार्गका अनुसरण करते हैं, उसी मार्गको अपना
१-स्वकर्मधर्मार्जितजीवितानां शास्त्रेषु दारेषु सदा रतानाम्॥
जितेन्द्रियाणामतिथिप्रियाणां गृहेऽपि मोक्षः पुरुषोत्तमानाम्॥ (१०९।४३)
२-न दानेन न मानेन नार्जवेन न सेवया। न शस्त्रेण न शास्त्रेण सर्वथा विषमाः स्त्रियः॥ (१०९।४५)
काण्ड ] नीतिसार १९५
धर्म समझना चाहिये<sup>१</sup>।
आकार, संकेत, गति, चेष्टा, वाणी, नेत्र और मुखकी भावभंगिमासे प्राणीके अन्तःकरणमें छिपा हुआ भाव प्रकट होता रहता है<sup>२</sup>। विद्वान् वह है जो दूसरेके द्वारा अकथित विषयको भी जान लेता है। बुद्धि वह है जो दूसरोंके संकेतमात्रसे भी वास्तविकताको समझ ले। कथित शब्दका अर्थ तो पशु भी जान लेते हैं। मनुष्यके दिखाये गये मार्गका अनुसरण तो हाथी और घोड़े भी करते हैं।
(अध्याय १०९)
नीतिसार
श्रीसूतजीने कहा—जो व्यक्ति सुनिश्चित अर्थका परित्याग कर अनिश्चित पदार्थोंका सेवन करता है, उसका सुनिश्चित अर्थ विनष्ट हो जाता है और अनिश्चित पदार्थ तो नष्ट होता ही है—
यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवाणि निषेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति ह्यध्रुवं नष्टमेव च॥
(११०।१)
वाग्वैभवसे रहित व्यक्तिकी विद्या और कायर पुरुषके हाथमें विद्यमान अस्त्र वैसे ही उन्हें संतुष्टि नहीं प्रदान करते, जैसे अपने अंधे पतिके साथ रहती हुई उसकी स्त्री अपने रूप-लावण्यसे पतिको संतृप्त नहीं कर पाती।
सुन्दर भोज्य पदार्थ भी उपलब्ध हो और भोजनकी शक्ति भी हो, रूपवती स्त्री भी हो और सहवास करनेकी क्षमता भी हो तथा धन-वैभव भी हो और दान करनेकी सामर्थ्य भी हो—ये अल्प तपके फल नहीं हैं।
वेदोंका फल अग्निहोत्र है, विद्याका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्रवान् होना है तथा धनका फल है दान और भोग।
विद्वान् व्यक्तिको श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न कुरूप कन्याके साथ भी विवाह कर लेना चाहिये, किंतु रूपवती एवं अच्छे लक्षणोंवाली उत्तम कुलसे हीन कन्या उसके लिये कभी भी ग्राह्य नहीं है। मनुष्यको उस अर्थसे क्या लाभ है, जिस अर्थका साथ अनर्थसे होता है? क्योंकि कोई व्यक्ति सर्पके फणपर विद्यमान मणिको प्राप्त करना नहीं चाहता।
अग्निहोत्रके लिये हविष्यान्न दुष्ट कुलसे भी ग्राह्य है। बालकसे भी सुभाषित ग्रहण करना उचित है। अमेध्य अर्थात् अपवित्र स्थानसे स्वर्ण और हीन कुलसे स्त्रीरूपी रत्न भी मनुष्यके लिये संग्राह्य है। विषसे अमृत ग्राह्य है, अपवित्र स्थलसे भी स्वर्ण ग्राह्य है तथा नीच व्यक्तिसे श्रेष्ठ विद्या भी ग्रहण करने योग्य है और दुष्कुलसे भी स्त्री-रत्न ग्राह्य है।
राजाके साथ मित्रभाव और सर्पका विषहीन होना सम्भव नहीं है। वह कुल पवित्र नहीं रहता, जिस कुलमें स्त्रियाँ ही उत्पन्न होती हैं। अपने कुलके साथ भगवद्भक्तका सम्पर्क कर देना चाहिये, पुत्रको विद्याध्ययनमें लगाना चाहिये, शत्रुको व्यसनमें जोड़ देना चाहिये तथा जो अपने इष्टपुरुष हैं, उन्हें धर्ममें नियोजित करना चाहिये।
विद्वान् मनुष्यको नौकर और आभूषणोंको यथोचित स्थानपर नियुक्त करना चाहिये, क्योंकि चूड़ामणि कभी चरणमें सुशोभित नहीं होती है। चूड़ामणि, समुद्र, अग्नि, घण्टा, अखण्ड अम्बर और राजा—ये सिरपर धारण करने योग्य होते हैं अर्थात् आदरणीय हैं। प्रमादवश भी इन्हें चरणमें स्थान नहीं देना चाहिये। मनस्वी व्यक्तिकी पुष्प-स्तबकके
१-तर्कोऽप्रतिष्ठा श्रुतयो विभिन्नाः नासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥ (१०९।५१)
२-अकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च। नेत्रवक्त्रविकाराभ्यां लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः॥ (१०९।५२)