गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
प्रकाशकीय राष्ट्रगुरु श्री पीताम्बरा-पीठाधीश्वर पूज्यपाद श्री स्वामीजी महाराज के शुभाशीर्वाद एवं जगज्जननी भगवती पीताम्बरामाता, की असीम अनुकम्पा से श्री गोरक्षनाथ प्रणीत 'गोरक्ष शतकम्' हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित कर पीताम्बरापीठ अत्यधिक आनन्द का अनुभव कर रही है। प्रस्तुत ग्रन्थ गोरक्ष शतकम् के सौ श्लोकों में हठयोग के गंभीर विषयों को श्री गोरखनाथ ने सरल तथा सहजरूप में अभिव्यक्त किया है वैसा ही सुन्दर अनुवाद पूज्यपाद श्री स्वामीजी महाराज के कृपा पात्र एवं पीठ के अनन्य सेवक डॉ. श्री मोतीलाल खड्डर शास्त्री (मास्टरजी) द्वारा किया गया है, जो हृदयहारी है। आशा है इस ग्रन्थ के प्रकाशन से न केवल विद्वान पाठकों को संतोष होगा अपितु योग साधकों का भी पथ प्रदर्शन होगा। श्रीमती रेणु शर्मा मंत्री श्री पीताम्बरा पीठ दतिया (म.प्र.) शारदीय नवरात्र २८ सितम्बर २०११
१. षडङ्ग योग परिचय एवं आसन-लक्षण
- अनुक्रमणिका - शिवअवतार गुरु गोरखनाथजी चित्र प्रकाशकीय स्वामीजी महाराज चित्र (समर्पणम्) जगज्जननी माँ पीताम्बरा चित्र विषयानुक्रमणिका क्र. विषय पृष्ठ सं. १. उपक्रम एवं शुभाशंसनम् ७ (आचार्य भागवतानन्द सरस्वती) २. शुभाशीर्वाद ८ (स्वामी देवनायकाचार्य समदर्शी) ३. शुभं भवतु ('प्रणव' वानप्रस्थी) ९-११ (प्रो. इच्छाराम द्विवेदी) ४. प्रस्तुति (डॉ. मारुतिनन्दन पाठक) १२-१७ ५. गोरक्षशतकम् १८-३७ संस्कृत श्लोक १ से १०१ तक हिन्दी सानुवाद सहित
ॐ ॐ श्री परमगुरूवे गोरक्षनाथाय नमः गो र क्ष श त क म्
ॐ श्री गुरुवे नमः गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः
अनन्त श्री विभूषित राष्ट्रगुरु पीताम्बरा पीठाधीश्वर परमपूज्य श्री स्वामीजी महाराज, दतिया (म.प्र.) 卐 समर्पणम् 卐 शतशः स्वगुरुं नत्वा तथा पीताम्बराम् जनिम्। यत्कृपातोऽभवत्पूर्णोऽनुवादः शतकस्य च॥ वन्दे स्वगुरुपीठं वै मोतीलालोऽह मानतः। सकृदप्यनुशीलेन सिद्धिर्भवति सर्वदा॥ अनुवादकः
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( ७ ) ♦ उपक्रम एवं शुभाशंसनम् ♦ “गोरक्षनाथप्रणीतः गोरक्षशतकम्” नामक ग्रन्थ केवल संस्कृत में ही उपलब्ध है। इसका अक्षरशः अनुवाद तो नहीं, किन्तु प्रत्येक श्लोक का पद्यार्थ, भावार्थ हमारे डॉ. मोतीलाल खड्डर शास्त्री 'मास्टरजी' ने लिखा है जो विज्ञ सुधी पाठक जनों के लिए बड़ा ही रोचक है। मोतीलाल मास्टरजी शाक्त तन्त्र साधना जैसे तन्त्र के रहस्यात्मक ग्रन्थों के प्रणेता हैं। इस गोरक्ष शतकम् में मुख्य रूप से कुण्डलिनी प्रकरण के सभी चक्रों का वर्णन, अष्टाङ्ग योग का विशद प्रतिपादन किया है। भगवान् विश्वनाथ से मैं प्रार्थना करता हूँ कि माँ जगज्जननी भगवती पीताम्बरा जगदम्बा के पावन चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हमारे मास्टरजी द्वारा लिखित इस गोरक्ष शतकम् को पढ़कर विज्ञ सुधी पाठक जन बहुत लाभान्वित होंगे। उनकी गति, मति, रति, धर्ममय होगी।
- आचार्य भागवतानन्द सरस्वती
( ८ ) !! श्रीमत् रामानुजाय नमः !! श्रीमद्भगवत् गीता साप्ताहिक अखण्ड पाठ एवं प्रवचन के अधिष्ठाता 卐 शुभाशीर्वाद 卐 संस्कृत भाषा हमारी संस्कृति की महान धरोहर है। हमारे जितने भी मनीषी हुये है उन्होंने मानव समुदाय के कल्याण हेतु बड़ा सुन्दर तरीका बताया है। वर्तमान समय में उस (तरीके) तत्व को समझाने वाला नहीं है। सभी कुछ जानकारी के लिये संस्कृत भाषा में उद्धृत श्री गोरक्षनाथ प्रणीत गोरक्ष शतकम् के १०० श्लोकों के विचारों को लेखक डॉ. मोतीलाल खड्डुर शास्त्री (मास्टरजी) ने हिन्दी भाषा में व्यक्त किया है। महर्षि गोरक्षनाथ के विचार और लेखक ने अपने विचार जो उन्होंने हिन्दी भाषा में व्यक्त किये है, जन समुदाय के लिये उपयोगी तथा कर्मकल्याण में सहायक सिद्ध होंगे। मैं लेखक मास्टरजी को आशीर्वाद देता हूँ कि इसी प्रकार से अन्य मुनीषियों की कृतियों को आम समाज में लावें। वर्तमान समय में इसके महती की आवश्यकता है। अस्तु लेखक के दीर्घायु होने की भी मैं सहृदय कामना करता हूँ। स्वामी देवनायकाचार्य (समदर्शी) • दिनांक १९ फरवरी २०११ कम्पिल (फरूखाबांद) उ.प्र.
( ९ ) ★ शुभम् भवतु ★ आचार्य 'प्रणव' वानप्रस्थी, डॉ. इच्छाराम द्विवेदी अध्यक्ष, पुराणेतिहास विभाग, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठम्, नई दिल्ली पीताम्बराचरणपङ्कज चञ्चरीकः लेभे मुदं “प्रणव” संज्ञक एष लब्ध्वा । गोरक्षनाथ रचितम् शतकम् पवित्रम् यत्सानुवाद मतिसुन्दरम द्वितीयम् ।। मोतीलाल विबुधामृत बोधयुक्तम् भाषानुवादमखिलम् बहुशः पठित्वा । आशंसते मम मनः शुभमस्तुनित्यम् गोरक्षनाथ कृपया विबुधस्य तस्य ।। पीताम्बरा पद परागपवित्र देहो यो मन्त्र-तन्त्र-निगमागम-पूतचित्तः । मोतीलाल “शुचि” नामधरो महात्मा योगीश्वरोऽस्तु भुवि साधनचक्रवर्ती ।। निखिल ब्रह्माण्ड वैभवविस्तारिणी चराचर जगतपालनी सकल- पापक्षयकारिणी, भवसागर सन्तारिणी, शत्रुस्तम्भनकारिणी, हरिद्रासरोवर विहारिणी मातृ श्री पीताम्बरा जगदम्बा के चरणारविन्दयुगल में नित्यनिवास से परिवृतान्तःकरण, अनन्त श्री विभूषित, योगीसम्राट पूज्य चरण सद्गुरुदेव राष्ट्रगुरु श्री के अमोघ आशीर्वाद से आप्लावित साधक श्रेष्ठ श्रीयुत डॉ. मोतीलाल खड्डुर शास्त्री (मास्टरजी) द्वारा अनुवादित श्री गोरक्षशतकम् को देखकर अत्यन्त उल्लास हुआ। जैसा महायोगी श्री गोरक्षनाथजी का योगशतक अद्वितीय है वैसाही सुन्दर अनुवाद भी आचार्यवर्य ने किया है। एतदर्थ मैं उनको सहृदय से साधुवाद देता हूँ।
( १० ) “गोरक्षशतकम्” सिद्धयोगी की वाणी है। इसके द्वारा योगमार्ग के अनेक अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर श्री गोरखनाथजी ने दिया है। गोरक्षशतकम् एक सुस्पष्ट तथा निर्भ्रान्ति रचना है। इस रचना ने केवल भारतीय मनीषियों को अपनी ओर आकृष्ट किया है अपितु फर्गुहर तथा ब्रिग्स जैसे पाश्चात्य अन्वेषकों को भी चमत्कृत किया है। मथुरानाथ शुक्ल और शंकर पण्डित की टीकायें इस “गोरक्षशतकम्” पर प्रसिद्ध है। एक छोटी सी रचना में कैसे ज्ञान सिन्धु भरा जा सकता है इसका सुन्दर उदाहरण है यह गोरक्षशतकम्। अनुवादक ने भी बड़े ही सारगर्भित किन्तु सरल शब्दों में इसका राष्ट्रभाषानुवाद किया है जिससे कि यह और भी बोधगम्य हो गया है। सिद्धासन और पद्मासन की व्याख्या करते हुये श्री गोरखनाथजी ने कहा है- आसनेभ्यः समस्तेभ्यः द्वयमेव विशिष्यते । एकम् सिद्धासनम् प्रोक्तम् द्वितीयम् कमलासनम् ।। दोनों आसनों की संरचना पर उनका विवरण अद्वितीय है- योनिस्थानकमंघ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेत् । मेढ्रे पादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम् ।। स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन् भ्रुवोरन्तरम्। एतन्मोक्षकवाटभेद जनकं सिद्धासनं प्रोच्यते ।। वामोरूपरि दक्षिणं हि चरणं संस्थाप्य वामं तथा। दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् ।। अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकयेत् । एतद् व्याधिविकारहारि यमिनां पद्मासनं प्रोच्यते ।। गोरखनाथजी ने अत्यन्त दक्षता से भारतीय योगविद्या का उपदेश किया है। श्रीमद् भागवत महापुराण में शुकदेवजी कहते है- प्राणायामैः दहेद् दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषान् ।। गोरक्षशतकं का कथन तुलनीय है - आसनेन रुजां हन्ति प्राणायामेन पातकम्। विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण सर्वदा ।।
( ११ ) धारणा तत्त्व का जैसा सुन्दर विवेचन गोरक्षशतकम् में है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। योग वस्तुतः इस जगत्प्रपञ्च का तत्त्वज्ञान है। निरातंकं निरालम्बं निष्प्रपंचं निराश्रयम्। निरामयं निराकारं तत्त्वं तत्त्वविदो विदुः॥ जगत प्रपञ्च में रहते हुये भी गुरुकृपा से प्राप्त योग मार्ग का आश्रय लेकर पञ्चतत्व प्रपञ्च का निरास करते हुये योगी सर्वत्र परमेश्वरान्वीक्षा का स्वभाव विकसित कर लेता है। न गंधं न रसं रूपं न स्पर्शं न च निःस्वनम्। आत्मानं न परं वेत्ति योगी युक्तः समाधिना॥ ऐसी सिद्धावस्था में पहुँचते ही योगी जीवन्मुक्त हो जाता है- खाद्यते न च कालेन बाध्यते न च कर्मणा। साध्यते न च केनापि योगी युक्तः समाधिना॥ यही अद्वैत की चरम अनुभूति है- दुग्धे क्षीरं घृते सर्पिरग्नौ वह्नि रिवार्पितः। अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित् परमे पदे॥ योगशतक की भाषा चाहे वह मूल संस्कृत हो या मास्टरजी के द्वारा किया गया भाषानुवाद दोनों ही हृदयहारी है। ऐसे लघुकाय ग्रन्थों की आज मानव समाज को बड़ी आवश्यकता है। आज के युग में जब योग “योगा” बन गया है, योग के कतिपय आसनों का प्रदर्शन करके केवल और केवल धन कमाया जा रहा है, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का उपदेश मात्र इसलिये किया जा सकता है कि भोग की क्षमता बढ़ाई जा सके तब ऐसे समय में जीव और ब्रह्म की एकात्मता को सिद्ध करनेवाले, योग के परम प्रतिपाद्य अद्वैत सिद्धि को देनेवाले गोरक्षशतकम् जैसे ग्रन्थों की महनीय आवश्यकता है। मैं एक बार पुनः आचार्य श्री मोतीलालजी खड्डर शास्त्री (मास्टरजी) को प्रणाम करता हूँ और उन्हें इस ग्रन्थ के अनुवाद के लिए बधाई देता हूँ। यह ग्रन्थ पाठकों और साधकों का पथ प्रदर्शक बने, यही मेरी शुभकामना है। गणेशचतुर्थी भगवच्चरणाश्रित १ सितम्बर २०११ ई. 'प्रणव' वानप्रस्थी नई दिल्ली (प्रो. इच्छाराम द्विवेदी)
( १२ ) प्रस्तुति गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) भारत के एक बहुत महान योगी थे, इतने महान कि उन्हें शिव-रूप ही माना जाता था। ऐसा मानना हमारे देश में आदर और सम्मान देने का एक तरीका है। उनके गुह मत्स्येन्द्रनाथ थे। उनकी प्रतिष्ठा और उनका अवदान ऐसा था कि उनके नाम से योगियों का एक एक सम्प्रदाय- नाथ-सम्प्रदाय-चल पड़ा जिसकी परम्परा आज भी मौजूद है। उनकी एक साधना पद्धति है जो उनकी गुह-परम्परा में निहित है। साधना, पुस्तकों को देखकर होती भी नहीं, क्योंकि पुस्तकें प्रायः सांकेतिक होती हैं और उनमें विशेषतः सिद्धान्तों का प्रतिपादन होता है। दूसरी बात यह कि साधना में दीक्षा की आवश्यकता होती है और उस परम्परा की विधियों को भी सीखना होता है। फिर भी पुस्तके सहायक होती है। एक तो उनसे उनके सिद्धान्त, लक्ष्य और साधन तथा दृष्टिकोण का पता चलता है, दूसरे उनके अवदान की जानकारी के साथ अन्य साधना-पद्धतियों के साथ तुलना में भी सहायता मिलती है। गोरखनाथ की रचनाओं से नाथ सम्प्रदाय की योग-साधना पद्धति को स्थायित्व मिला और वह सुरक्षित भी
( १३ ) है कि गोरक्षपद्धति और गोरक्षशतक गोरखनाथ द्वारा प्रतिपादित योग का प्रामाणिक ग्रन्थ है। गोरक्षशतक की जो पाण्डुलिपियाँ विभिन्न ग्रन्थागारों में उपलब्ध हैं वे सभी छपी भी नहीं है। मुझे दो छपी प्रतियाँ देखने को मिली हैं। एक स्वामी कुवलयानन्द जी द्वारा सम्पादित लोनावाला से छपी है और दूसरी श्री रामलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित गोरखमन्दिर गोरखपुर से छपी है। स्वामी कुवलयानन्द जी योग के अन्वेषक प्रकृति के व्यक्ति थे, जिन्होंने योग से सम्बन्धित कई पुस्तकें प्रकाशित की और हठयोग के मूलग्रन्थ भी प्रकाशित किए। उनके द्वारा स्थापित संस्था लोनावाला में आज भी काम कर रही है। स्वामी कुवलयानन्द जी का गोरक्षशतक का संस्करण समीक्षात्मक है जिसमें पाठ-भेदों का उल्लेख किया गया है। पाठ भेदों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। पुरानी पुस्तकों में पाठ- भेद हो जाना अस्वाभाविक नहीं है, किन्तु ये पाठ-भेद अर्थ-भेद उत्पन्न नहीं करते। श्री रामलाल श्रीवास्तव गोरखनाथ के साहित्य के अधीत व्यक्ति है और गोरखनाथ पर उनकी पुस्तक भी है। वे गोरखनाथ मन्दिर से प्रकाशित होनेवाली योगवाणी पत्रिका के सम्पादक भी है। उनका गोरक्ष शतक का संस्करण समीक्षात्मक तो नहीं है किन्तु किसी एक पाण्डुलिपि का हू-ब-हू रूप है और शुद्ध भी है। संभव है, गोरखनाथ मन्दिर की परम्परा में यह प्रति उपलब्ध रही हो। गोरखपीठाधीश्वर स्वामी अवेधनाथजी महाराज की दृष्टि में यह संस्करण प्रामाणिक है, क्योंकि उन्होंने अपनी भूमिका में इसी का आधार लिया है और इसके मूल से पर्याप्त उद्धरण दिए है। दोनों संस्करणों में श्लोकों की संख्या एक सौ एक है, किन्तु मुख्य भेद यह है कि पचास से अधिक श्लोक एक दूसरे से भिन्न हैं अर्थात् एक दूसरे में नहीं हैं। गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करण में अजपाजप का बहुत अच्छा प्रतिपादन है, किन्तु लोनावाला संस्करण में यह बिल्कुल नहीं है। लोनावाला संस्करण में पंचमहाभूत धारणा का सुन्दर प्रतिपादन है जो गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करणों में नहीं है। ऐसे ही कुछ और अन्तर है। वैसे दोनों संस्करणों में गोरखनाथ की योग पद्धति से असम्बन्ध कुछ नहीं हैं। सभी विषय सम्बन्ध है, किन्तु विषयगत और प्रतिपादनगत थोड़े अन्तर के कारण एक दूसरे में एक अभाव की प्रतीति अवश्य होती है।
२. नाड़ी-शोधन, प्राण-अपान संयोग एवं कुण्डलिनी-प्रबोधन
( १४ ) गोरक्षशतकम् का प्रस्तुत संस्करण जिसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है, वह लोनावाला-संस्करण के आधार पर है, इसका सम्बन्ध गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करण से नहीं हैं इसका हिन्दी अनुवाद किया है- डॉ. मोतीलाल खड्डर शास्त्री (मास्टरजी) ने, जो पीताम्बरापीठ, दतिया से जुड़े हैं यह अनुवाद मूल से यथासंभव सम्बद्ध है इसलिये मूल पाठ को समझने के लिये बहुत अच्छा और बहुत उपयोगी हैं यह टीका या व्याख्या नहीं है, इसमें बहुत विस्तार की आवश्यकता होती है। पहली अपेक्षा होती है मूल से परिचित होने की जिसके लिये मूल से सम्बद्ध अनुवाद अपेक्षित है और विस्तार का द्वार तो कई माध्यमों से खुला रहता है। गोरक्षशतकम् में योग और तंत्र के साधनों का सामञ्जस्य है। इसमें तंत्र के कतिपय योगपरक साधन समाहित हैं अजपाजप और कुण्डलिनी योग वस्तुतः तंत्र की ओर से आये साधन हैं तंत्र और योग में आरम्भ से सामीप्य है जहां भेद करना कठिन होता है जो साधना की पुष्टि की दृष्टि से उत्तम संकेत है। गोरखनाथ का योग जो हठ योग के रूप में भी विकसित हुआ, तंत्रयोग के आधार पर हुआ, यह असंदिग्ध है। गोरक्षशतक में योग के छः अंग माने गये हैं जो आसन से आरम्भ होकर समाधि तक हैं। इसका कारण संभवतः यह है कि विधि रूप में क्रियात्मकता यहीं से आरम्भ होती है। इसका यह अर्थ नहीं कि गोरखनाथ पंतजलि के यम- नियम से अपरिचित है या उसकी मान्यता नहीं देते। सिद्धसिद्धान्त पद्धति में उन्होंने कहा है - यम इति उपरामः सर्वेन्द्रियजयः नियम इति मनोवृत्तीनां नियमनम्- सभी इन्द्रियों का अपने विषयों से हट जाना यम है तथा मन की सभी वृत्तियों का नियमन होना यम है। यम-नियम की उनकी यह परिभाषा बहुत सारगर्भित है, उसके आचारात्मक रूप की अपेक्षा यह अधिक योगपरक है। इसका सीधा सम्बन्ध उसके तात्पर्य से है। इसी तरह उन्होंने वहीं पर आसन से लेकर समाधि तक को तात्पर्यार्थ रूप में परिभाषित किया है।
( १५ ) गोरखनाथ ने यह कहकर कि योग वेद-रूप कल्पतरु का फल है, इसका सेवन करें, इससे सभी भवताप (दुःख) दूर हो जाते हैं। योग की गरिमा इंगित की हैं। द्विजसेवित शाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम् । शमनं भवतापस्य योगं भजति सज्जनः ।। गो.श.३ गोरखनाथ योग में सिद्धि के निमित्त ज्ञातव्य तथ्यों को जानने के लिये जोर देते हैं। उसके योग में साधना के सारे उपादान शरीर में ही है। शरीर एक घर है जिसमें साधना के सारे उपादान (सामग्रियाँ) मौजूद है। जो उपादानों के साथ इस घर को नहीं जानता वह सिद्धि की आशा कैसे कर सकता है ? षट्चक्रं षोडशधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् । स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः ।। गो.श.३ एकस्तम्भं नवद्वारं गृहं पञ्चाधि दैवतम् । स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः ।। (गोर.शत., गोरख-मन्दिर संस्करण, श्लो. : १३-१४) योगी अपनी देह में स्थित षट्चक्र, सोलह आधार, त्रिलक्ष्य (तीन लक्ष्य), पंचव्योम (पाँच आकाश) को नहीं जानते हैं वे कैसे योगसिद्ध हो सकते है ? अपनी ही देह में शरीर रूपी घर को जो एक स्तम्भ, नौ द्वार, पाँच तत्त्व और उनके पाँच अधिदैवत से युक्त या निर्मित है, नहीं जानते हैं, वे योगी कैसे योगसिद्ध हो सकते हैं ? गोरखनाथ की दृष्टि में आभ्यन्तरिक देह-विज्ञान को जानना जरूरी है। यदि इसका ज्ञान तथा उन सभी अंगों की क्रियाओं का ज्ञान नहीं है तो योग की विभिन्न प्रकार की साधनाओं में से किसी एक में भी सफलता प्राप्त करने की आशा दुराशा नहीं है। इस गोरक्षशतक में योग के छः अंगों पर प्रकाश डालकर उनकी साधना का संकेत तो किया ही गया है, इसके अतिरिक्त कुण्डलिनी, षट्चक्र-साधन पंचभूत-धारणा और ध्यानस्थान का परिणाम सहित प्रतिपादन किया गया है। साथ ही, उपाधि और तत्त्व का भेद भी स्पष्ट किया गया है। इन विषयों को मूल पाठ में देखना चाहिए। यहाँ उन्हें स्पष्ट करने पर बहुत विस्तार हो जायेगा।
( १६ ) इस योग में अजपाजप का बहुत महत्व है जिसका निर्देश गोरखनाथ- मन्दिर वाले संस्करण में किया गया है। उस संस्करण में महामुद्रा, खेचरी मुद्रा, शक्तिचालिनी मुद्रा, महाबन्ध और उड्डियान बन्ध इनका फल सहित सुन्दर वर्णन है। शिव और शक्ति के प्रतीक-रूप बिन्दु और रज की शरीर में यौगिक अवस्थिति का भी योग-पद्धति से विश्लेषण किया गया है। कहा है- बिन्दु शिवो रज शक्तिश्चन्द्रो विन्दूरजो रविः । उभयो सङ्गमादेव प्राप्यते परम् पदम् ॥ वायुना शक्तिचारेण प्रेरित तु महारजः । याति विन्दोः सहैकत्वं भवेद् दिव्यवपुस्तदा ।। शुक्र चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्येण संयुतम् । तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगविद् ॥ (गोर.शत., गोरखनाथ-मन्दिर सं., श्लो. : ७४-७६) • बिन्दु (वीर्य) शिव है और रज शक्ति है। बिन्दु चन्द्रमा है और रज सूर्य है। (चन्द्र-स्थान में पाण्डुर वर्ण का बिन्दु (शुक्र) रहता है और सूर्य स्थान (नाभि) में सिन्दूर वर्ण का रज रहता है) इन दोनों के संगम से (योगी को) परम पद की प्राप्ति होती है। • वायु के द्वारा शक्ति के चालन से जब महा रज ऊपर उठकर बिन्दु के साथ मिलकर एक हो जाता है, तब शरीर दिव्य हो जाता है। • शुक्र चन्द्रमा से संयुक्त है और रज सूर्य से संयुक्त है। जो इन दोनों का सामरस्य-ऐक्य जानता है, वह योगवित् है। साधना कुण्डलिनी की हो या चन्द्रमा-सूर्य से सम्बन्धित बिन्दु-रज की, शिव-शक्ति का सामरस्य ही लक्ष्य है। गोरख की योग पद्धति में तन्त्रयोग का अद्भुत सामञ्जस्य है। ऐसा हठयोग में भी है। गोरक्षशतक में गोरख की योग-पद्धति के सिद्धान्त और प्रक्रिया का दिग्दर्शन हो जाता है। जिससे उसके विस्तार का द्वार खुल जाता है। यह गोरख की परम्परा में मान्य पुस्तक है। इन कारणों से इसे पढ़ा जाना चाहिए। मास्टर जी द्वारा हिन्दी अनुवाद उपलब्ध करा देने से उसमें सुविधा होगी।
( १७ ) गोरख के योग का प्रयोजन है, अपने शरीर के भीतर के साधक (सहायक) उपादानों को जानना, दुःख से मुक्त होना, आनन्दमय रहना ब्रह्ममय होना और अन्ततः अद्वैत में प्रतिष्ठित होना। उन्होंने इस शतक के समापन में कहा है- भवभयवनेः वह्निर्मुक्तिसोपानमार्गतः। अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित्परमे पदे॥ (गोरख शतकः १०१) (यह योग) संसार भय के जंगल के लिये अग्नि है और मुक्ति के लिए सोपान-मार्ग है जिससे योगी अद्वयत्व (अद्वैत) में पहुँचकर परम पद में निवास करता है। डॉ. मारुतिनन्दन पाठक पूर्व अध्यक्ष एवं आचार्य संस्कृत विभाग मगध विश्वविद्यालय, बोधगया ◆◆◆
( १८ ) गोरक्षनाथप्रणीतः ॐ गोरक्षशतकम् ॐ श्रीपरमगुरवे गोरक्षनाथाय नमः। ॐ गोरक्षशतकं वक्ष्ये भवपाशविमुक्तये। आत्मबोधकरं पुंसां विवेकद्वारकुञ्चिकाम्॥ १॥ गोरक्षशतकम् कहता हूँ। यह शतक संसार के बन्धन से मुक्त करानेवाला है। यह आत्मा के बोध को उत्पन्न करानेवाला तथा मनुष्यों के विवेक के द्वार को खोलने के लिए एक कुंजिका (चाबी) है॥ १॥ एतद्विमुक्तिसोपानमेतत्कालस्य वंचनम्। यद्ध्यावृत्तं मनो मोहादासक्तं परमात्मनि॥ २॥ यह गोरक्षशतकम् मुक्ति प्राप्ति का सोपान (साधन) है। इससे काल (मृत्यु) का वंचन (उल्लंघन) होता है (मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है, शरीर योगाभ्यास द्वारा स्वस्थ्य एवं परिपक्व हो जाता है और उसमें क्षीणता नहीं आती)। (इस शतक में वर्णित अभ्यास के द्वारा) मन मोह से मुक्त होकर परमात्मा में लग जाता है॥ २॥ द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम्। शमनं भवतापस्य योगं भजति संज्जनः॥ ३॥ वेद कल्पतरु है। वेदरूपी कल्पतरू की शाखाओं का पण्डित जन सेवन (अनुशीलन) करते हैं जिसका फल यह योग है। सत्पुरुष इसका सेवन (साधन) करते है जिससे संसार का ताप (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) शमित (शान्त) हो जाता है॥ ३॥ आसनं प्राणसंयामः प्रत्याहारोऽथ धारणा। ध्यानं समाधिरेतानि योगांगानि भवन्ति षट्॥ ४॥
गोरक्षशतकम् ( १९ ) आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-योग के ये छहः अंग है। (गोरखनाथ के सिद्धसिद्धान्त पद्धति में यम-नियम सहित आठ अंगों की चर्चा की है, किन्तु यहाँ सीधे प्रक्रियागत क्रियात्मक साधना से सम्बन्ध होने के कारण छः अंग माना है।)॥४॥ आसनानि तु तावन्ति यावत्यो जीवजातयः। एतेषामखिलान्भेदान्विजानाति महेश्वरः॥५॥ जितने प्रकार के जीव (प्राणी) हैं उतने ही प्रकार के आसन हैं। उनके सभी भेद शिव जानते है॥५॥ चतुराशीतिलक्षाणामेकमेकमुदाहृतम्। ततः शिवेन पीठानां षोडशोनं शतं कृतम्॥६॥ महेश्वर (शिव) ने चौरासी लाख आसनों में से प्रत्येक का वर्णन किया है। उनमें से चौरासी आसनों को उन्होंने मुख्य बताया है॥६॥ आसनेभ्यः समस्तेभ्यो द्वयमेव विशिष्टते। एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम्॥७॥ उन सभी आसनों में केवल दो आसन प्रधान कहे गये है- एक सिद्धासन और दूसरा पद्मासन॥७॥ योनिस्थानकमंघ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसे न्मेढ्रे पादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम्। स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन्भ्रुवोरंतर मे तन्मोक्षकवाटभेदजनकं सिद्धासनं प्रोच्यते॥८॥ गुदा और मेढ्र (लिंग) के मध्य में योनिस्थान है जिसे कुण्डलिनी-स्थान भी कहा जाता है। साधक इस योनिस्थान को (बांए) पाव की एडी से दबाकर (दाए) पांव की एड़ी को मेढ्र पर लगाए और शरीर को बिल्कुल सीधा रखे। सभी इंद्रियों को वश में रखते हुए भ्रू-मध्य में अचल दृष्टि से देखता रहे तथा स्वयं भी स्थिर एवं अचल रहे। यही मोक्ष के द्वार को खोलनेवाला सिद्धासन कहा गया है॥८॥ वामोरूपरि दक्षिणं हि चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम्।
( २० ) गोरक्षनाथप्रणीतः अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासग्रमालोकये- देतद्व्याधिविकारहारि यमिनां पद्मासनं प्राच्यते ॥ ९ ॥ वाम जंघा (जंघा के मूल में) दाहिना पांव (चरण) स्थापित करे तथा उसी प्रकार दाहिनी जंघा पर वायां पांव स्थापित करें और दोनों हाथों को पीछे से ले जाकर दाहिने हाथ से बाएं पांव के अंगूठे और बाएं हाथ से दाहिने पांव के अंगूठे को दृढ़ता से पकड़कर एवं चिबुक को हृदय से लगाकर नासिका के अग्रभाग को (दोनों नेत्रों से) देखें। इसे समस्त व्याधियों और (शारीरिक एवं ानसिक) विकारों को नष्ट करनेवाला पद्मासन कहा गया है ॥ ९ ॥ आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् । योनिस्थानम् द्वयोर्मध्ये कामरूपम् निगद्यते ॥ १० ॥ आधार (मूलाधार) चक्र पहला है, दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान है। दोनों के मध्य में स्थित योनिस्थान को कामरूप कहा जाता है ॥ १० ॥ आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं यच्चतुर्दलम् । तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवंदिता ॥ ११ ॥ मूलाधार चक्र जो गुदास्थान में है और जो चार (कमल) दलों से युक्त है. उसके मध्य में (त्रिकोणाकार) योनि है। यह (योनि) सिद्धों द्वारा कामाक्षा (कामाक्षा पीठ) कहा गया है ॥ ११ ॥ योनिमध्ये महालिंगं पश्चिमाभिमुखं स्थितम् । मस्तके मणिवद्भिन्नम् यो जानाति स योगवित् ॥ १२ ॥ उस (कामाक्षा) योनि के मध्य में पश्चिमाभिमुख महालिंग स्थित है। उस महालिंग के मस्तक में मणि के सदृश (प्रदीप्त) बिम्ब को जो जानता है वही योगवेत्ता है ॥ १२ ॥ तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् । चतुरस्रं पुरं वन्हेरोधोमेढ्रात्प्रतिष्ठितम् ॥ १३ ॥ मेढ्र से नीचे (मूलाधार पद्म की कर्णिका में) तपे हुये सोने के वर्ण की आभा और विद्युल्लेखा के सदृश ज्योतिर्मय चतुरस्त्राकार अग्निमय (वह योनिस्थान) है। (पाठान्तर त्रिकोणाकार भी है) ॥ १३ ॥