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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

( ३२४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

होती है ॥ ६२ ॥ दाह तथा भ्रमवाली घोर पित्तकी छर्दिको देखि तहां अमलतासके पत्तोंकें रसमें शहद और खांड मिला पीना ॥ ६३ ॥ तथा नागरमोथा, खांड ये मिला दूधका पीना श्रेष्ठ कहां है ॥ ६४ ॥ अथ कफकी छर्द्दिकी चिकित्सा । जम्बूवाम्रकप्रवालानि दाडिमामलकं तथा॥ मस्तुनापोषितं पानं हन्त्याच्छ्लेष्मवमिं नृणाम् ॥६५॥ सर्ज्जार्जुनंधवकदम्बकलोलचूर्णं धान्याकशुण्ठिसहितं सगुडं प्रदद्यात् ॥ श्लेष्मोद्भवं वमनमाशु निहन्ति पुंसां लेहस्तथा मधुकणाक्रिमिहाशटीनम् ॥ ६६ ॥ जामुन, आंब इनके कोमल पत्ते, अनारदाना, आंवला, इनको दहीके मस्तुमें पीस पीनेसे मनुष्योंको कफसे उत्पन्न हुई छर्दि दूर होती है ॥ ६५ ॥ और रालवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, धव कदंब, कंक़ोल, सूंठ, धनियां इनका क्वाथ बना गुड़ मिला पीनेसे कफसे उपजी छर्दि दूर होती है और कचूर, पीपल, शहद, वायविडंग इनका अवलेह बना चाटना हित है ॥ ६६ ॥ अथ एलादिचूर्णं । एलालवङ्गगजकेसरकोलसर्ज्जालाजाप्रियङ्गुघनचन्दनपिप्पली- नाम्॥चूर्णानि मार्कवसितासहितानि लीह्वा छर्दि निहन्ति कफ- मारुतपित्तजाञ्च॥६७॥एलादलानि गजकेसरकत्वगेलालाम- ज्जकं च दहनं च घनं प्रियङ्गुम्॥सचन्दनं मगधजासमचूर्णितञ्च लीह्वा सितासमत्रिदोषवर्मि जघान ॥ ६८ ॥ इलायची, लौंग, नागकेसर, चव्य, रालवृक्ष, धानकी खील, गोंदी, नागरमोथा, चन्दन, पीपल, भांगरा इनके चूर्णमें मिसरी मिला चाटनेसे कफवात पित्त इन दोषोंसे उपजी हुई छर्दि दूर होती है ॥ ६७ ॥ और इलायचीके पत्ते, नागकेशर, दालचीनी, इलायची, रोहिषतृण, चीता, नागरमोथा, गोंदी, चंदन, पीपल इनको समानभाग ले चूर्ण बना मिश्री मिला खानेसे त्रिदोषसे उपजी छर्दिका निवारण होता है ॥ ६८ ॥ अथ छर्दीकी शमनक्रिया । उर्ध्वभागगते दोषे रेचनं तु प्रशस्यते॥ तस्मिञ्झातेऽप्यधोभागं वमनं शाम्यति ध्रुवम् ॥६९॥ अथवा द्विभागगते तदा देया- भया मधु ॥ क्रिमिजं वमनं ज्ञात्वा क्रिमीणां शमनक्रिया ७० वमन व खांसीमें जो दोष उर्ध्वभागोंमें स्थित हो तो जुलाब दिवानी चाहिये और जो

मं० १३ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३५ ) अधोभागमें अर्थात् नीचेके स्थानोंमें दोष प्राप्त होवें तो वमन कराना श्रेष्ठ है ॥ ६९ ॥ और जो नीचे तथा ऊपर दोनों भागोंमें दोष स्थित हों तो हरडै, शहद देने चाहिये और कृमियोंसे उपजे वमनको जानके क्रिमियोंको शांत करनेवाली क्रिया करनी चाहिये ॥ ७० ॥ अथ छर्दिरोगमें पथ्यापथ्य । न चोष्णं नातिचाम्लं च न तीक्ष्णं न तथा लघु॥तण्डुलीय- कशाकं वा न मद्यं काञ्जिकं न तु॥७१॥ वमिदोषे च कथितं पथ्यं चात्र शृणुष्व मे ॥ अनूपं शालिभक्तं च शतपुष्पा च वास्तुकम् ॥७२॥ आढकी मुद्गयूषञ्च दधि गुडघृतान्वितम् ॥ अंगारमण्डका चाथ वमौ पथ्यं प्रशस्यते ॥ ७३ ॥ यथाबलं यथाकालं यथारोगं यथानलम्॥तथा दृष्ट्वा प्रकुर्वन्ति पथ्यानां समुपक्रमम्॥७४॥ दिवा निद्रां प्रयुञ्जीयाद्वमौ श्वासेऽतिसा- रके॥हिक्काशोषे तथाजीर्णे वमिक्लेदेऽथवा पुनः ॥ ७५ ॥ न चोष्णतोयपानञ्च नातिभोजनमेव च ॥ न धावनं न कर्त्तव्यं वर्जयेद्वमनार्दिते ॥७६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीय- स्थाने छर्दिचिकित्सा नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ गरम, अत्यंत खट्टा, तीक्ष्ण तथा हलका, चौलाईका शाक, मदिरा, कांजी इनको वमन रोगमें नहीं खावे ॥ ७१ ॥ अब वमनमें पथ्य कहते हैं सुनो । अनूपदेशके जीवोंका मांस, शालिसंज्ञक चावल, सोंफ, बथुवा ॥७२॥ तुरीधान्य, मूंगोंका यूष, दही, गुड़, घृत, अङ्गारोंमें सेके हुंए मांडे ये वमनमें भोजन करने श्रेष्ठ हैं ॥७३॥ जैसा बल हो जैसा समय हो जैसा रोग हो जैसी जठराग्नि हो तैसे ही पथ्य भोजनोंको विचारके देवे ॥ ७४ ॥ वमन, श्वास, अतीसार इन रोगोंवाले पुरुषों- को दिनमें सुवावे और हिचकी, शोष, अजीर्ण, वमन, ग्लानि इन रोगोंमें भी दिनमें सोना श्रेष्ठ है ॥ ७५ ॥ गरम जल नहीं पीवे, ज्यादे भोजन नहीं करे और वमनसे पीड़ित पुरुषको दांतून नहीं करनी चाहिये ॥ ७६ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता- भाषाटीकायां तृतीयस्थाने छर्दिचिकित्सानाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ त्रयोदशोऽध्यायः १३. अथ तृषा और तालुशोषकी संप्राप्ति । आत्रेय उवाच ॥ भयश्रमाद्गलहीनाद्विदलारूक्षसेवनात् ॥ आतपे

( ३२६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- वा ज्वरे जीर्णे क्षयाच्च क्षतजातथा ॥ १ ॥ एतैः संकुपिता दोषा वातपित्तकफास्त्रयः॥ चतुर्थी क्षतजा प्रोक्ता पञ्चमी क्षयजा स्मृता ॥ २ ॥ अजीर्णात्षष्ठी संप्रोक्ता सप्तमी रूक्षसेवनात् ॥ अष्टमी स्याज्ज्वरोत्पन्ना लक्षणानि शृणुष्व मे ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-भय, श्रम, बलकी हीनता इनसे, विदल संज्ञक अर्थात् कुलथी आदि अन्नको सेवनेसे, घामसे और ज्वरसे, अजीर्ण और क्षतसे तथा क्षयसे ॥ १ ॥ इनसे कुपित हुए वातपित्त कफसे तीन प्रकारकी तृषा होती है और घावके होनेसे चौथी और क्षयसे उपजी पांचवीं तृषा होती हैं ॥ २ ॥ अजीर्णसे छठी और रूक्षपदार्थको सेवनेसे सातवीं और ज्वरसे उपजी आठवीं ऐसे तृषा कही हैं उनके लक्षणको मुझसे सुनो ॥ ३ ॥ अथ वातआदि दोषोंसे उपजी तृषाके क्रमसे लक्षण । क्षामः श्यावास्यता चाथ वैरस्यं वेपथुस्तथा ॥ वातेन सा भवे- त्तृष्णा विज्ञेया भिषजां वरैः॥४॥शीततोयाभिलाषश्च भ्रमदा- हप्रलापतः ॥ मूर्च्छा च लोहिते नेत्रे तृष्णा पित्तोद्भवा मता ॥ ॥५॥ निद्रा श्यावास्यतालस्यं बलासोषणाभिलाषता ॥ घन- श्यावांगशैत्यं च श्लेष्मणो जायते तृषा ॥ ६ ॥ कृश शरीर हो जावे और मुख काला हो जावे,मुखमें स्वाद आवे नहीं और कंप उपजे ये लक्षण होवें तब वातकी तृषा जाननी ॥ ४ ॥ शीतल पानीकी इच्छा रहे, भ्रम, दाह, प्रलाप, ये उपजे, मूर्च्छा हो, नेत्र लाल होजावें तब पित्तकी तृषा जाननी ॥५॥ नींद हो,मुख काला हो, कफ पडे, गरम चीजकी इच्छा रहे, कठिन और काला और शीतल ऐसा अंग होजावे तब कफकी तृषा जाननी ॥ ६ ॥ अथ त्रिदोषकी तृषाका लक्षण । दृक्शूलं वमते दाहो भ्रमो वा शिरसो व्यथा ॥ वेपथुश्चाङ्गशैत्यञ्च त्रिदोषप्रभवा तृषा ॥ ७ ॥ नेत्रोंमें शूल चले, छर्दि आवे, दाह और भ्रम हो, शिरमें पीड़ा रहे, कंप हो, अंगोंमें शीत- लता हो, तब त्रिदोषकी तृषा जाननी ॥ ७ ॥ अथ अन्यतृषाओंके लक्षण । वक्त्रशोषो भवेज्जृम्भा शिरोऽर्त्तिर्गुरुतोदरे॥अजीर्णेनाथ मनुजे तृष्णा संलक्ष्यते गदः ॥८॥ रसक्षये यदा तृष्णा तथाक्षमक्षुधा-

तुरः ॥ ग्लानिः शोषो भ्रमः श्वासो दैन्यमाशु प्रवर्त्तते ॥ ९ ॥ क्षतक्षयेषु या तृष्णा तस्यां नान्‍नाभिनन्दनम् ॥ अन्या ज्वरात्तुरे प्रोक्ता तृष्णा सा ज्वरवेगजा ॥ १० ॥ अन्यातिसारे शूूले वा तृष्णा ज्ञेया भिषग्वरैः ॥ ११ ॥ मुखमें शोष हो और जँभाई आवे, शिरमें पीड़ा हो, पेट भारी रहे तब अजीर्णकी तृषा जाननी ॥ ८ ॥ शरीर कृश हो, भूखसे पीडित रहे, ग्लानि, शोष, भ्रम, दीनपना ये शीघ्र उपजें तब रसके क्षयसे उपजी तृषा जाननी ॥९॥ घावसे उपजी तृषामें अन्नमें रुचि न हो, ज्वररोगवालेके ज्वरके वेगसे उपजी तृषा होती है ॥ १० ॥ अतीसारसे और शूलसे भी उपजी तृषा जाननी ॥ ११ ॥ अथ असाध्यतृष्णाका लक्षण । तृष्णातिसारवमनदाहमूर्च्छाभ्रमशोषोद्भवा ॥ तोयेन न याति तृप्तिमसाध्यां तां विजानीहि ॥ १२ ॥ अतीसार, छर्दि, दाह, मूर्च्छा, भ्रम, शोष इनसे उपजी जो तृषा पानीसे शांत नहीं होवे, तब वह असाध्य जाननी ॥ १२ ॥ अथ वातकी तृषाकी चिकित्सा । तृष्णां वातोद्भवां दृष्ट्वा शस्यते सगुडं दधि॥सगुडं वामृताक्वा- थ पीतं वाततृषापहम् ॥ १३ ॥ शुण्ठी च जीर्णा सह शृङ्गवेरं जलेन सौवर्चलयुक्तकल्कः ॥ पिबेत्कषायं च सुशीतलं वा वातोद्भवां चाशु निहन्ति तृष्णाम् ॥ १४ ॥ वातकी तृषा देख गुड़सहित दही हित है अथवा गिलोयके क्वाथमें गुड मिला पीवे । यह बातकी तृषा शांत होती है ॥ १३ ॥ सूंठ, जीरा, अदरख, कालानमक इनका पानीसे पीस कल्क बनावे अथवा क्वाथ बना पीनेसे बातकी तृषा शांत हो जाती है ॥ १४ ॥ अथ पित्तकी तृषाकी चिकित्सा । काश्मर्यं पद्मकोशीरं द्राक्षा मधुकचन्दनम् ॥ वालकं शर्करायु- क्तं क्वाथं पित्ततृषापहम् ॥ १५॥ वटद्रुमो रोध्रसिता च चन्दनं सदाडिमं तण्डुलधावनेन ॥ पिष्ट्व च शीतेन जलेन वापि पीतं च पित्तोत्थतृषापहञ्च ॥ १६ ॥ कुष्ठमुत्पललाजां च न्यग्रोधस्य प्ररोहकान् ॥ संचूर्ण्य शर्करायुक्ता गुटिका तृणिवारणी ॥१७॥

( ३२८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

द्राक्षोत्पलं सयष्टीकं शस्तं चेक्षुरससेवनात् ॥ पीतं पित्तोद्भवां तृष्णां हन्ति दाहञ्च पित्तजम् ॥ १८ ॥ आकण्ठं शर्करायुक्तं तथा क्षीरं पिबेन्नरः॥ वमनञ्चतदा कुर्याद्धन्ति तृष्णां सपैत्ति- कीम् ॥ १९ ॥ लोष्टप्रतप्ततोयञ्च निर्वाप्य शीतलं कृतम् ॥ पिबेत्तृष्णाविनाशाय जलं वा चन्दनान्वितम् ॥ २० ॥ कंभारी, कमल, खस, दाख, मुलहटी, चंदन, नेत्रवाला इनके क्वाथमें खांड़ मिला पीवे यह पित्तकी तृषाको हरता है ॥ १५ ॥ वडके कोंपल, लोध, मिश्री, चंदन, अनारदाना इनको चावलोंके पानीसे अथवा शीतल पानीसे पीस पीवे । यह पित्तकी तृषाको हरता है ॥१६॥ कूठ,नीला- कमल, धानकी खील, वडकी कोंपल इनके चूर्णमें खांड मिला गोली बांधै । ये गोली पित्तकी तृषाको हरती है ॥ १७.॥ दाख, नीलाकमल, इनका और मौरेठीका चूर्ण अथवा ईखका रस सेवनेसे पित्तकी तृषा और पित्तका दाह शांत होता है ॥ १८ ॥ खांडसे युक्त किये दूधको कंठतक पीवे पीछे वमन करे तब पित्तकी तृषा शांत होती है ॥ १९ ॥ जलीहुई माटीको या राखको, लोहको या वाळूरेतको गरम कर पानीमें बुझावे पीछे शीतल कर पीवे अथवा चंदनसे युक्त किये पानीको पीवे तब पित्तकी तृषा शांत होती है ॥ २० ॥ अथ कफकी तृषाकी चिकित्सा । जम्ब्वाम्रकप्रवालानि तथा लाजा च चन्दनम् ॥ धातकीकुसु- मानि स्युः पिष्ट्वासारसंयुतः ॥२१॥ ॥ श्लेष्मतृष्णापहो लेहो दाहमूर्च्छाभ्रमापहः ॥ पिबेच्चाढकीयूषञ्च लाजाशर्करयान्वितम् ॥२२॥ क्षीरपानं समरिचं जलं वा मरिचान्वितम् ॥ श्लेष्म- तृष्णाविनाशाय पिबेद्वा कोलकं पयः ॥ २३ ॥ जामुन और आंबकी कोंपल, धानकी खील, चंदन, धवके फूल इनको वांसाके रसमें पीस चाटे । यह अवलेह कफकी तृषा, दाह, मूर्च्छा, भ्रम इनको नाशता है ॥ २१ ॥ धानकी खीलोंसे संयुक्त किये अरहरके यूषमें खांड़ मिला पीवे अथवा मिरचोंसहित दूधको पीवे ॥ २२ ॥ अथवा मिरचोंसहित पानीको पीवे अथवा वड़वेरीके पत्तोंके रसको पीवे तब कफकी तृषा नष्ट होजाती है ॥ २३ ॥ अथ त्रिदोषकी तृषाकी चिकित्सा । दुरालभा पर्पटकं प्रियङ्गु लोध्रद्रुमं त्र्यूषणकं सकुष्ठम् ॥ क्वाथः सुशीतो मधुशर्करायास्तृष्णां त्रिदोषप्रभवां निहन्ति ॥ २४ ॥

अ० १३] भाषाटीकासमेता। (३२९) कालदाडिमवृक्षाम्लाः सारिवा समशर्करा ॥ पथ्या दाडिमचूर्णं वा मातुलुङ्गरसान्वितम् ॥ २५ ॥ जवासा, पित्तपापडा, कांगनी, लोध, सूंठ, मिर्च, पीपल, कूट इनके काथको शीतल बन उसमें शहद और खांड़ मिला पीवे यह त्रिदोषकी तृषाको नष्ट करता है। कालाअनार, वृक्षाम्ल और सारिवा इनके समान भाग शर्कराका चूर्ण खावे अथवा सूंठ और अनारका चूर्ण बिजौराके रसके साथ खावे ॥ २५ ॥ अथ तालुशोषकी चिकित्सा। काष्ठपात्रे शृतं सम्यक्शीतलं सलिलं तथा ॥ मर्दितं बहुवेलां तु तत्पानीयंच पाययेत् ॥ २६ ॥ तालुशोषे घृतं तच्च दापयेच्च भिषग्वरः॥तृष्णादाहभ्रमच्छर्दिशोषमूर्च्छा व्यपोहति ॥ २७ ॥ क्षतजां क्षयजां तृष्णां वारयत्याशु निश्चितम् ॥ २८ ॥ गरम किये पानीको काष्ठके पात्रमें घाल बहुत देरतक मर्दितकर पीवे ॥ २६ ॥ और उसी पानीमें घृतको सिद्धकर वैद्य तालुशोषमें देवे यह तृषा, दाह, भ्रम, छर्दि, शोष, मूर्च्छा इनको नाशता है ॥ २७ ॥ क्षतसे और क्षयसे उपजी तृषाको शीघ्र दूर करता है ॥ २८ ॥ अथ दाडिमकोल । दाडिमं कोल चुक्रीका वृक्षाम्लं चाम्लवेतसम् ॥ रसं चैव तथा पथ्यायुक्तं तालुप्रलेपनम् ॥ २९ ॥ अनार, बेर, चूका, बिजौरा, अम्लवेतसके रसमें हरडेका चूर्ण मिला तालूपर लेप करै ॥ २९ ॥ अथ तृष्णाआदिकोंकी साधारण चिकित्सा । वारयत्याशु शोषं च तृष्णां हन्ति च सज्वराम्॥केसरं मातुलु- ङ्गस्य पिष्टं तण्डुलवारिणा ॥३०॥ प्रतप्तमधुना तालुलेपो मुख- शोषापहः ॥ मधुशर्करया तालुलेपो शोषनिवारणः ॥ ३१ ॥ पद्मकन्दशृतालेपः शीतः शीतलवारिणा ॥ तालुशोषं निह- न्त्याशु जम्ब्वाम्रपल्लवानि च ॥ ३२ ॥ निम्बान् वा मातुलु- ङ्गान् वा सौवीरं नागराणि च ॥ तृषार्त्तपुरतो भक्ष्यन्न देयं तस्य धीमता॥३३॥ दर्शनात्तस्य चास्ये च लाला प्रस्रवते भृशम् ॥

( ३३० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- तेनास्य शोषं हरति तृष्णामपि नियच्छति ॥३४॥ रक्तशाल्यो- दनं शस्तं दधिशर्करयान्वितम्॥भोजनञ्च प्रशस्तं च न क्षारं कटुकं पुनः॥३५॥शोषे च च्छर्दितृष्णायां श्रमे पानात्ययेऽपि च॥अतीसारे च शोषे च दिवा निद्रा सुखावहा ॥३६॥ इत्या- त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने तृष्णालुशोषचिकित्सा नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ विजौराकी केशरको चावलोंके पानीसे पीस पीनेसे तालुशोष और ज्वरसहित तृषा शांत होती है ॥ ३० ॥ गरम किये शहदसे तालुपर लेप करे यह मुखशोषको नाशता है, शहद और खांडसे तालुपर लेप करे यह मुखके शोषको दूर करता है ॥ ३१ ॥ कमल कंदको शीतल पानीसे पीस लेप करे अथवा जामन और आंबके पत्तोंको पीस लेप करे तब तालुशोष शांत होता है ॥ ३२ ॥ नींबू, विजौरा, कांजी, सूंठ, इनको इस रोगवालेके आगे खावे परंतु उस रोगीको नहीं देना ॥ ३३ ॥ इनके देखनेसे रोगीके मुखमें अत्यंत लाल झिरने लगती है उससे तृषा और शोष दूर होता है ॥ ३४ ॥ दही और खांडसे संयुक्त किये लाल शालिचावल इसरोगमें भोजन करने श्रेष्ठ हैं, खारा और चरचरेको फिर नहीं खावे ॥ ३५ ॥ शोष, छर्दि, तृषा, परिश्रम, पानात्यय इन रोगोंमें दिनकी नींद सुखको देती है ॥ ३६ ॥ इति वेरिनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने तृषातालुशोषचिकित्सानाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ चतुर्दशोऽध्यायः १४. अथ मूर्च्छाकी संप्राप्ति । आत्रेय उवाच॥वेगाभिघातातिनिरोधकेन क्षीणक्षताच्च तृषि- तेन वापि॥विरुद्धयुक्तान्नविभक्षणेन दोषःप्रदुष्टःप्रकरोति मूर्च्छा म्॥१॥ पञ्चेन्द्रियाणां संलग्नाः प्रत्येके द्वादशादयः ॥ पञ्चे- न्द्रियाणां सहिता नाडिकाः षष्टिसंख्यया॥२॥रुन्धंति नाडि- काद्वारं तेन चेतो विमूर्च्छति॥संज्ञानाशाद्भवेच्छीघ्रं निश्चेताश्च सदा नरः॥३॥पतति काष्ठवत्तूर्णं मोहोन्मूर्च्छा निगद्यते ॥ सा षड्विधा समुद्दिष्टा वातपित्तकफात्तथा॥४॥ शोणितादभिघा-

तन मद्येनाथ विषेण वा॥एतेषां कोपयेत्पित्तं मरुद्रक्तं समीरि- तम् ॥५॥ संख्यादौर्बल्यकं तेन मूर्च्छा मोहःप्रकथ्यते ॥ कथ- यामि समासेन लक्षणानि पृथक्पृथक् ॥ ६ ॥ आत्रेय कहते हैं-विषयआदि वेगके अभिघातसे,मूत्रआदिको रोकनेसे, क्षीण छतसे, तृषाकी पीडासे, विरुद्ध अन्नको सेवनेसे दुष्टहुआ वातआदि दोष मूर्च्छाको करता है ॥ १ ॥ अलग २ बारहनाड़ी पांचों इन्द्रियोंमें लगीहुई हैं एसे साठ नाड़ी जाननी ॥ २ ॥ जब दुष्ट हुए दोष नाड़ियोंके द्वारको रोकते हैं तब मनुष्य मूर्च्छाको प्राप्त होते हैं । संज्ञाके नाश होनेसे शीघ्रही जड़रूप मनुष्य होजाता है ॥ ३ ॥ और काष्ठकी तरह मनुष्य शीघ्र गिर पड़ता है उसको मोहमूर्च्छा कहते हैं वह छःप्रकारकी कही है ॥ ४ ॥ वातकी, पित्तकी, कफकी, रक्तकी, चोटकी, मदिराकी अथवा विषकी, ऐसे मूर्च्छा हैं। वायु और रक्तसे प्रेरित किया पित्त इन मूर्च्छाओंको कोपित करता है ॥ ५ ॥ ऐसे गिनती है अब इस मोहमूर्च्छाके लक्षणोंको विस्तारसे पृथक् २ कहता हूं ॥ ६ ॥ अथ मूर्च्छाका लक्षण । नीलं कृष्णारुणं पश्येत्तमः प्रविशति क्षणात् ॥ कम्पो मार्दवमेतासां क्षणेन प्रतिबुध्यति ॥ ७ ॥ नीला, काला,लाल ऐसे रंगको देखे और क्षणभरमें अंधेरीको प्राप्त होवे,कंप हो और शरीर शिथिल होजावे और क्षणभरमें जागे ये मूर्च्छाके लक्षण हैं ॥ ७ ॥ अथ वातजआदिमूर्च्छालक्षण । वातेन मूर्च्छा भवति कृशता विकृतास्यता ॥ नेत्रस्रावश्च मृष्टिश्च आध्मानञ्च भवेत्क्षणम् ॥ ८ ॥ शरीर कृश होवे, मुख विकारको प्राप्त हो, नेत्रोंमें पानी झिरे और शरीरमें हड़फूटन होवे और क्षणभरमें पेटपर अफारा हो तब वातकी मूर्च्छा जाननी ॥ ८ ॥ अथ पित्तजमूर्च्छा । पीतञ्च नीलहरितं तमः प्रविशते भृशम् ॥ सन्तापश्च पिपासा च रक्ते पीते च लोचने ॥९॥ सस्वेदं शरीरं चापि श्रमःसंभि- न्नवर्चसाम्॥पित्ताद्भवति मूर्च्छार्तत्वं जायते च शिरोव्यथा॥१०॥ पीला, नीला, हरा ऐसे अंधेरेमें प्राप्त हो, संताप और पिपासा हो, लाल और पीले नेत्र हो जावें ॥ ९ ॥ पसीना आवे, श्रम हो,पतला मल उतरे और शिरमें पीडा हो तब पित्तका मूर्च्छा जाननी ॥ १० ॥

( ३३२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ कफजमूर्च्छा । धूमाकुलां दिशं पश्येत्तमः पश्यति यः पुरः ॥ नेत्राकुलत्वं मन्दाग्निस्तमोऽङ्गेषु च शीतता ॥ ११ ॥ चिरात्प्रबुध्यते- ऽत्यर्थं कण्ठश्च घुर्घूरायते ॥ हल्लासमूर्च्छा भवति कफजा च विलक्षणैः ॥ १२ ॥ धूमासे व्याप्त हुई दिशाको देखे और आगे अंधेरीको देखे, नेत्र व्याकुल होवें,मदाग्नि हो, अंगोंमें भी मन्दपना और शीतलपना हो ॥ ११ ॥ बहुत देरमें जागे, कंठमें घुर्घुर शब्द होवे, थुकथुकी होवे तब कफकी मूर्च्छा जाननी ॥ १२ ॥ अथ सन्निपातजमूर्च्छा । सन्निपातादपस्मारो दृश्यते भिषजांवर ॥ स प्राणिनां घातयति रक्तेन सहितो यदि ॥ १३ ॥ हे वैद्यवर ! सन्निपातसे मृगी रोग दीखता है वह रक्तसे मिलके जीवोंको नाशता है॥१३॥ अथ रक्तगन्धजमूर्च्छा । रक्तगन्धेन मूर्च्छन्ति तेन मूर्च्छा शिरोव्यथा ॥ कम्पते नष्टचेष्टत्वं जलपते वमते पुनः ॥ १४ ॥ रक्तकी गन्धसे उपजी मूर्च्छामें शिरपीड़ा होती है, रोगी कांपता है, चेष्टा नष्ट हो जाती है, ज्यादे बोलता है और वमन करता है ॥ १४ ॥ अथ मद्यादिजन्यमूर्च्छा । विभ्रान्तचेता रक्ताक्षः स्वप्नशीलः सुरावशः ॥१५॥ क्षतक्षया- द्ववेच्चान्या कोद्रवान्ननिषेवणात् ॥ जायते मोहमूर्च्छा च तेन निद्राति दुर्मनाः ॥ १६ ॥ मदिरासे उपजी मूर्च्छामें भ्रमते हुए चित्तवाला और लाल नेत्रोंवाला और शयन करनेको चाहनेवाला ऐसा मनुष्य होजाताहै ॥ १५ ॥ क्षतक्षयसे और कोदूआदि अन्नसे उपजी मूर्छामें अत्यंत नींद आती है और मन बिगड़ जाता ॥ १६ ॥ मूर्च्छा, भ्रम, निद्रा और तंद्रा इन्होंका हेतु । पित्तोत्तमाद्भवति वै मनुजस्य मूर्च्छा पित्तप्रभञ्जनभवं भ्रममेव पुंसाम् ॥वातात्कफात्तमयुता मनुजस्य तन्द्रा निद्रा कफानि- लतमा भजते नरस्य ॥ १७ ॥

अ० १४ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३३ ) मनुष्यको पित्तके अत्यंतपनेसे मूर्च्छा होती है और मनुष्योंके पित्त और वातसे उपजा भ्रम होता है, वात और कफसे अंधेरी करके युक्तहुई तंद्रा होती है और कफ वात और तम इनसे ही नींद होती है ॥ १७ ॥ अथ मूर्च्छाकी चिकित्सा । स्वेदाभिषङ्गविधिमर्द्दनवातशान्त्यै शीतान्नपानव्यजनानिलपि- त्तशान्त्यै॥कषायबहुलस्य सदा प्रशस्तं श्लेष्मोद्भवा विनि- हिता भ्रममूर्च्छना वा ॥१८॥ पाययेत्त्रिफलाक्वाथं शीतं शर्क- रया युतम्॥दुरालभायाःक्वाथञ्च पाययेच्छर्करान्वितम्॥१९॥ पसीना, मालिस, मर्दन ये वातकी मूर्च्छामें हित हैं, शीतल अन्न और पान, बीजनाकी पवन ये सब पित्तकी मूर्च्छामें हित हैं, कसेला पदार्थका पान कफकी मूर्च्छामें हित है ॥१८॥ त्रिफलाके शीतलक्वाथमें खांड़ मिला पीवे अथवा जवासाके क्वाथमें खांड़ मिला पीवे ये दोनों क्वाथ मूर्च्छाको हरते हैं ॥ १९ ॥ अथ रक्तमूर्च्छाआदिकोंको उपाय । कणां कोलस्य मज्जाञ्च केशरोशीरचन्दनम्॥पिष्ट्वा शीताम्बुना खण्डपानं हन्ति विमूर्च्छितम् ॥२०॥रक्तजां मूर्च्छनां दृष्ट्वा विधेयः शीतलो विधिः॥क्षयजे दुर्बले क्षीणे मूर्च्छापोषणकार- णम्॥२१॥ नष्टचेष्टात्वमापन्ने नरे संचेतनक्रिया ॥ संपीड्य च नवाङ्गुष्ठं नासिकां च प्रपीडयेत् ॥ २२ ॥ दन्तैर्वा सन्दंशैर्वा- पि शनैर्गात्रं प्रपीडयेत् ॥ दाहयेद्वा ललाटे तु पृष्ठदेशे च भालके ॥ २३ ॥ एवं न सिध्यते वापि तदा चान्दोलनं हितम् ॥ २४ ॥ पीपल, बेरकी मज्जा, नागकेसर, खस, चंदन इनको शीतल पानीसे पीस और खांड मिला पीवे यह मूर्च्छाको नाशता है ॥ २० ॥ रक्तसे उपजी मूर्च्छाको देखके शीतल विधि करनी चाहिये । क्षयवाला, दुर्बल,क्षीण इनके मूर्च्छाकी रक्षाका कारण करना ॥ २१॥ जब मूर्च्छासे मनुष्यकी संज्ञा जाती रहे तब मनुष्यको चेतन करानेकी क्रिया करे. अँगूठेको पीडित कर पीछे नासिकाको पीडित करना ॥ २२ ॥ दांतोंसे अथवा नखआदिसे धीरेधीरे शरीरको पीडित करना अथवा मस्तकमें और पृष्ठभागमें दाग देवे ॥ २३ ॥ जो ऐसे भी सिद्धि नहीं होवे तो आंदोलन क्रिया करनी हित है अर्थात् हिंडोलेसे झुलाना हित है ॥ २४ ॥

( ३३४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ नष्टसंज्ञमूर्च्छितकी चिकित्सा । मूर्च्छातुरं सकलशीतजलेन सिञ्चेत्संवीजयेच्च शिखिपिच्छकवी- जनैस्तु॥दोलायनं हि विहितं मनुजस्य मूर्च्छा मोहं भ्रमञ्च हरते च मदात्ययं वा ॥ २५ ॥ मूर्च्छासे पीडित हुए मनुष्यको शीतल पानीसे सींचे और मोरकी पंखोंके वीजनेसे हवा करे और दोलायन अर्थात् हिंडोलाके द्वारा झुलानेसे मूर्च्छा, मोह, भ्रम, मदात्यय इनका नाश होता है ॥ २५ ॥ अथ मूर्च्छा मद भ्रम इनकी चिकित्सा । करञ्जबीजं सह सैन्धवेन रसोनपत्रस्य रसं च यत्र ॥ मार्कं च पथ्यञ्च वचां जलेन पिष्ट्वाञ्जनं हन्ति दिनस्य तन्द्राम् ॥२६॥ घोटकलालारमरिचं लवणयुतं नेत्रयोरञ्जनं शस्तम्॥ विनिहन्ति दिनशतं तन्द्रां निद्रां वा मानुषस्य ॥२७ ॥ सुगन्धं सुकषा- योपयुक्ता रसस्त्रिफला गुडार्द्रकं प्रातः ॥ सप्ताहान्मधुरजलं हन्ति मदमूर्च्छाकरानुन्मादान् ॥ २८ ॥ रक्तकर्षणमिच्छन्ति मोहमूर्च्छाप्रशान्तये ॥ तस्मादवहितः कुर्य्यात्तासु रक्तावसेच- नम् ॥ २९ ॥ करंजुआके बीज, सेंधानमक, लहसनके पत्ताका रस, भंगरा, हरड़ै, बच, इनको पानीसे पीस अंजन करनेसे तंद्रा दूर होती है ॥ २६ ॥ घोड़ाकी लालोंसे काली मिर्च और सेंधा- नमकको पीस नेत्रोंमें आँजनेसे सौ १०० दिनोंतक मनुष्यकी तंद्रा और नींद दूर हो जाती है ॥ २७ ॥ चंदन, हरड़ै, बहेड़ा, आंवला, गुड़, अदरक इनको प्रभातमें खाके ऊपर मधुर जलको पीनेसे मद और मूर्च्छाको करनेवाले उन्माद दूर होते हैं ॥ २८ ॥ कुशल वैद्य मोह और मूर्च्छाकी शांतिके लिये रक्तको घटाना चाहते हैं इसवास्ते मोह मूर्च्छारोगमें सावधान मनुष्य रक्तको निकसावे ॥ २९ ॥ अथ मूर्च्छादिकोंके साधारण उपाय । शीतसेकावगाहाद्यान्श्रीखण्डं व्यजनानिलान् ॥ शीतानि चान्नपानानि सर्वमूर्च्छासु योजयेत् ॥ ३० ॥ शर्करैक्षुरसद्राक्षा- वातमूर्च्छाप्रपानकैः॥काश्मर्य्यमधुकैरेव पित्तमूर्च्छा जयेन्नरः ॥ ॥ ३१ ॥ यष्ट्याः क्वाथं शृतं सर्पिः शृतं वामलकीरसम् ॥ पिबे-

अ० १५] भाषाटीकासमेता । ( ३३५)

द्रसं सितालाजायुक्तं चोष्णं च शीतलम् ॥३२॥ मधुना हन्ति च मूर्च्छामालेपैश्च प्रबोधयेत् ॥३३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने मूर्च्छाचिकित्सा नाम चतुर्दशोऽध्यायः १४॥ शीतल पानीकी सेक, शीतल पानीमें स्नान करना, सफेद चंदन, बीजनाकी पवन, शीतल अन्न और पान ये सब प्रकारकी मूर्च्छामें योजित करने ॥ ३० ॥ खांड, ईखका रस, दाख, इनसे वायुकी मूर्च्छाको दूर करे, खँभारी और मुलहटीसे पित्तकी मूर्च्छाको दूर करे । ॥ ३१ ॥ मुलहटीके क्वाथमें पकाया हुआ घृत अथवा आंवलोंके रसमें धानकी खीलोंका चूर्ण और मिश्री मिला पीवे ॥ ३२ ॥ अथवा शहद मिला पीवे तो मूर्च्छा दूर होती है और मूर्च्छारोगीको सुन्दर आलापोंसे जगाना श्रेष्ठ है ॥ ३३ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्य- नुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

पञ्चदशोऽध्यायः १५. अथ निद्राचिकित्सा ।

आत्रेय उवाच॥दिवा निद्रा तथा तंद्रा धुरिणां नृत्यहास्यभिः। गीतैश्च शान्तिमायाति नात्र कार्या विचारणा॥ यदा रात्रौ न निद्रा स्यात्तदा कुर्य्यादिमां क्रियाम् ॥ १ ॥ काकमाच्यास्तु मूलञ्च शिखां बद्ध्वा भिषग्वरः॥अधोमुखीं शिखां बद्ध्वा निद्रां जनयति निशि ॥ २ ॥ मस्तुना पादतलको मर्दयेन्निद्रया- र्थिनाम् ॥ यस्य नो दिवसे निद्रा तस्य निद्रा निशासु च ॥ ३ ॥ भयचिन्तया च लोभेन या निद्रा न भवेन्निशि ॥ तां चिन्तां च परित्यज्य निद्रा संजायते क्षणात् ॥ ४ ॥ सिंही व्याघ्री सिंहमुखी काकमाची पुनर्नवा॥वार्त्ताकीनां च मूलानां क्वाथो निद्राकरो नृणाम् ॥ ५ ॥ काकजंघा चापामार्गः कोकिलाक्षः सुपर्णिका ॥ क्वाथो निद्राकरः शीघ्रं मूलं वा बन्धयेच्छिखाम् ॥ ६ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने निद्राचिकित्सा नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

( ३३६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आत्रेयजी कहते हैं-बैल और घोड़ाआदिके बोलनेसे, नाचनेसे, हास्य करनेसे दिनकी नींद और तंद्रा दूर होती हैं और जो रात्रिमें नींद नहीं आवे तब इस क्रियाको करना ॥ १ ॥ काकमाचीकी जड़को चोटीपर बंधानेसे अथवा चोटीके मुखको नीचेकी तर्फ कर बांधनेसे रात्रिको नींद आ जाती है ॥ २ ॥ नींदकी इच्छावालोंके पैरोंके तलुवोंको दहीके पानीसे मर्दित करे और जिसको दिनमें नींद नहीं आती है उसको रात्रिमें नींद आजाती है ॥ ३॥ भय, चिंता, लोभ, इनसे जो रात्रिमें नींद नहीं आवे तब भय, चिंता, लोभ इनको त्यागनेसे नींद आती है ॥४॥ कटेहली, बड़ी कटेहली, वांसा, मकोहविशेष, सांठी, वार्ताकुनामक कटेहलीका भेद इनकी जड़ोंका क्वाथ मनुष्योंको नींद प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ काकजंघा, ऊंगा, तालमखाना, सालवण, इनका क्वाथ बना पीवे अथवा इनकी जड़ोंको शिखा अर्थात् चोटीपर बंधावे ॥ ६ ॥ इति धैरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने निद्राचिकित्सानाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ षोडशोऽध्यायः १६. अथ मदात्ययचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ हालाहलाहलसमं भजते वियोगात् तत्सेवया तु मनुजस्य महापकारः ॥ तृष्णा वमिः श्वसनमोहनदाहतृष्णा संजायतेऽतिसरणं विकलेन्द्रियत्वम् ॥ १ ॥ ये नित्यं सेव- नाद्दुष्टा मद्यस्य मनुजा भृशम् ॥ विषमाहारसदृशी सुरा मोहन- कारिणी ॥२॥ यथा विषं प्राणहरं वियोगाद्योगेन तं चाप्यमृतं वदन्ति॥ तथा सुरा योग्युता हिता स्यादयोगतश्चारभतेऽतिक- ष्टम् ॥३॥ क्षुधातुरे तृषाक्रान्ते सुरा वा भोजनं विना ॥ न च क्षीणैर्विना भक्ता विनाहारातिपानकम् ॥४॥ अत्यशनेऽप्यजी- र्णेऽपि सुरा पीता रुजाकरी ॥ ५ ॥ विशेषयोगसे मदिरा हलाहलविषके समान फलको देती है और मदिराको अत्यन्त पीनेसे तृप्ता, छर्दि, श्वास, मोह, दाह, अतिशारणपना, इन्द्रियोंका विकलपना ये उपजते हैं ॥१॥ जो नित्य मदिराको पीते हैं उनको जो समयपर नहीं मिले तब वह मदिरा विषमभोजनके समान हो जाती है और मोहको करती है ॥२॥ जैसे बुरे योगसे विष प्राणोंको हरता है और अच्छे योगसे विष १ तृष्णा पिपासा तथा अप्राप्ताभिलाषा च ।

अ० १६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३७ ) अमृतके समान हो जाता है वैसे ही योगसे युक्तकरी मदिरा हित है और अयोगसे युक्तकरी अत्यन्त कष्टको करती है ॥ ३ ॥ क्षुधासे पीडितको, तृषासे पीडितको, भोजनसे रहितको, क्षीणको, आहार और पानसे वर्जितको ॥ ४ ॥ भोजनपर भोजन करनेवालेको और अजीर्णवालेको पानकरी मदिरा रोगको करती है ॥ ५ ॥ अथ वातादिदोषजन्य मदात्यय । यस्य प्रलपनं चापि वाचा वातमदात्ययः॥दाहमूर्च्छातिसारश्च ज्वरः पित्तमदात्यये ॥६॥ छर्द्यरोचकहृल्लासतन्द्रास्तैमित्यगौ- रवम् ॥शीतता च प्रतिश्यायः कफजे च मदात्यये ॥७॥ त्रिषु दोषेषु समता लिंगैर्यैषामुपक्रमः॥स त्रिदोषसमुद्भूतो मदात्ययो भिषग्वर ॥ ८ ॥ जिसके बहुत प्रलाप उपजे उसके वातका मदात्यय जानना और जिसके दाह, मूर्च्छा, अती- सार, ज्वर ये उपजें उसके पित्तका मदात्यय जानना ॥ ६ ॥ जिसके छर्दि, अरोचक, थुकथुकी, तंद्रा, शरीरका गीलापन, भारीपन, शीतलपना, जुखाम ये उपजें उसके कफका मदात्यय जानना ॥ ७ ॥ जिसके तीन दोषोंके लक्षण मिलें उसके सन्निपातका मदात्यय जानना ॥ ८ ॥ मदात्ययकी चिकित्सा । वमनं च प्रशस्तं च निद्रासंसेवनं पुनः ॥ स्नानं हितं पयःपानं भोजने सगुडं दधि॥ ९॥मस्तुखण्डं सखर्जूरं मृद्वीका सारि- वाम्लिका ॥ आमला च परूषं च लेहो हन्ति मदात्ययम् ॥ १० ॥ द्राक्षामलकखर्जूरपरूषकरसेन वा ॥ कल्कयेत्पयसा तत्तु पानं सर्वमदात्यये ॥११॥ पथ्याक्वाथेन संयुक्तं पयःपानं मदात्यये ॥ १२ ॥ वमन, नींदको सेवना, स्नान, दूधका पीना, भोजनमें गुड़ सहित दही ये मदात्ययमें हित हैं ॥ ९ ॥ दहीका पानी, खांड़, छुहारा, मुनक्का, सारिवा, अमली, आंवला, फालसा, इनकी चटनी मदात्ययको नाशती है ॥ १० ॥ दाख, आंवला अथवा छुहारा, फालसा इनके रस करके बनायी चटनी मदात्ययको नाशती है ॥ ११ ॥ सब प्रकारके मदात्ययमें दूधसे कल्क बना पीवे और मदात्ययरोगमें हरडैके क्वाथसे संयुक्त किये दूधको पीना हित है ॥ १२ ॥ २२

( ३६८ ) \qquad हारीतसंहिता । \qquad [ तृतीयस्थाने- अथ सुपारीके मदका निदान और चिकित्सा । पूगीफलमदे कम्पो मोहो मूर्च्छा क्लमस्तमः ॥ प्रस्वेदो विधुरत्वं च लालास्रावश्च जायते ॥ १३॥ भ्रमक्लमपरीतत्वं विज्ञेयं पूग- मूर्च्छिते ॥ मानवो लक्षणैरेभिर्ज्ञेयः पूगविमूर्च्छितः ॥ १४॥ तस्य शीतं जलं पीतं बस्तिर्वा तु हितं भवेत् ॥ शर्करा भक्षणे देया मुस्ता वा शर्करान्विता ॥ १५ ॥ सुपारीके मदमें कंप, मोह, मूर्च्छा, ग्लानि, अँधेरी, पसीना, लारका पड़ना ये उपजते हैं ॥ १३ ॥ इन लक्षणोंके होनेसे मनुष्य सुपारीसे मूर्च्छित हुआ जानना । उसको शीतल पानीका पीना और बस्तिकर्म्म हित कहा है ॥ १४ ॥ इस रोगीको खानेवास्ते अकेली खांड़ अथवा नागरमोथासहित खांड़का देना हित है ॥ १५ ॥ अथ कोदूआदिसे उपजे मदात्ययकी चिकित्सा । कोद्रवाणां भवेन्मूर्च्छा देयं क्षीरं सुशीतलम् ॥ धत्तूरकमदे देयं शर्करासहितं दधि ॥ १६॥ हलिनी करवीरं च मोहिनी मद्य- न्तिका ॥ अन्येषामपि कन्दानां वमनं चाशु कारयेत् ॥ १७॥ पाययेच्छर्करायुक्तं क्षीरं वा दधि शर्कराम् ॥ १८ ॥ इत्यात्रेय- भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने मदात्ययचिकित्सा नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ कोदूसे उपजी मूर्च्छामें अच्छीतरह शीतल किया दूध हित है, धतूराके मदमें खांड़सहित दही हित है ॥ १६ ॥ कलहारी, कनेर, भांग, मोगरी, अन्य प्रकारके सब कंद इनके मदोंमें शीघ्र वमनको करवावे ॥ १७ ॥ अथवा खांड़से युक्त किये दूधको अथवा खांड़ते युक्त करी दहीको पान करावे ॥ १८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशा- स्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ सप्तदशोऽध्यायः १७. अथ दाहकी संप्राप्ति आदिक । आत्रेय उवाच ॥ समानः संक्रुद्धो रुधिरमपि पित्तं त्वचि गतं नरस्याङ्गे दाहं भवति नितरां घोरमपि च ॥ कदा दन्तोद्धर्षो Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० १७ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३९ ) भवति मनुजां दाहउदये भवेच्छीतस्यार्त्तिः श्वसनमपि वा शो- षमरतिः ॥ १ ॥ पित्तज्वरसमानानि लक्षणानि भिषग्वर ॥ पित्तज्वरवदारभ्य क्रिया दोषोपशान्तये ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-जब समान वायु और रक्त कुपित होता है और पित्त त्वचामें प्राप्त होता है तब मनुष्यके अंगोंमें घोर दाह उपजता है और दाहके उदयमें कभी २ दंतोंको घसता है और शीतलकी भी पीड़ा होती है, शोष और ग्लानि उपजती है ॥ १ ॥ हे वैद्यवर ! दाहरोगके लक्षण पित्तज्वरके समान होते हैं इस कारणसे दोषकी शांतिके लिये पित्तज्वरकी तरह क्रिया करनी चाहिये ॥ २ ॥ अथ दाहकी चिकित्सा । कुशकासेक्षुमूलानामुशीरं घनवालकौ ॥ क्वाथः शर्करया युक्तः शीतदाहं नियच्छति ॥३॥ पर्पटः सघनोशीरः क्वथितः शर्करा- न्वितः॥शीतपानं निहन्त्याशु दाहं पित्तज्वरं नृणाम् ॥४॥लाम- ज्जचन्दनोशीरैर्लेपनं दाहशान्तये ॥वीजयेत्तालवृन्तैश्च कदलय- म्भोजसंस्तरे॥५॥कालीयकरसोपेतं दाहे शस्तं प्रलेपनम् ॥श- स्यते शीतलं वारि दाहतृष्णानिवारणम्॥६॥उत्तानस्य प्रसुप्तस्य नाभेरुपार संदधेतू॥कांस्यपात्रमये सौख्यं धाराभिःशीतवारिणा ७पूरयेत्सुरतं यत्नात्तेन सौख्यं समाप्नुते॥शतधौतं घृतमपि तद्दा- होपरि धारयेत्॥८॥मतिर्धात्रीफलं वापि जलशीतेन लेपनम्॥ दाहशोषातुरस्यापि लेह्यं वा सुखकारकम्॥९॥जम्ब्वाम्रपल्लवा निम्बं बीजपूररसेन तु॥पिष्ट्वा प्रलेपनं दाहेशीघ्रं सुखमभीप्सते ॥१०॥धारागारमथापि शीतलशशी ज्योत्स्ना तु पानानि च वातः शीतलचन्दनं च कमलं प्रेमानुबन्धस्तथा॥रामागूहनम- र्दनं स्तनयुगे शुक्लाद्ववस्त्राणि च क्षीरं शर्करशङ्खलोहरजतं दाहप्र- शान्त्यै हितम् ॥११॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीय- स्थाने दाहचिकित्सा नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ डाभकी जड़, कांसकी जड़, ईखकी जड़, खस, नागरमोथा, नेत्रवाला इनके क्वाथमें खांड मिला पीवे यह शीतसहित दाहको नाशता है ॥ ३ ॥ पित्तपापड़ा, नागरमोथा, खस इनके

( ३४० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- क्वाथमें खांड मिला पीवे परन्तु यह शीतकषाय बनाके पीना चाहिये । यह मनुष्योंके दाहको और पित्तज्वरको नाशता है ॥ ४ ॥ रोहिषतृण, चन्दन, खस इनका लेप दाहकी शांतिके लिये हित है और दाहवालेको केलाके या कमलपत्तोंकी सेजपर शयन करा ताड़के यामलके वीजनेसे हवा करवावे ॥५॥ दारुहलदीके रससे लेप करना दाहरोगमें हित है और शीतल पानी भी श्रेष्ठ है। वह तृषाको और दाहको निवारण करता है॥६॥ दाहवाले मनुष्यको सीधा शयन करा उसकी नाभिके ऊपर कांसीके पात्रको धर उसमें शीतल पानीकी धारा देनेसे सुख उपजता है ॥ ७ ॥ सुन्दर स्त्रीसे मिलाप होनेसे भी दाह दूर होता है और सौ सौ वार धोये हुए घृतकी मालिस करनेसे भी दाह दूर होता है ॥ ८ ॥ मचकनको अथवा आंवलाको शीतल पानीसे पीस लेप करावे अथवा चटावे तब दाहमें सुख होता है ॥ ९ ॥ जामन, आंव, नींव इनके पत्तोंको बिजौराके रससे पीस लेप करनेसे दाहरोगीको सुख मिलता है ॥ १० ॥ फुहारेका स्थान, चन्द्रमाकी शीतल चांदनी, शीतल पन्ने, शीतल वायु, सफेद चन्दन,कमल, प्रेमका होना, स्त्रीका मिलाप और स्त्रीकी चूंथियोंको मसलना, सफेद वस्त्रको गीला बना धारण करना, दूब, खांड, शंख, लोहा, चांदी ये सब दाहकी शांतिके लिये हित हैं ॥ ११ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविद्वत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने दाहचिकित्सा नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

अष्टादशोऽध्यायः १८.

अथ मृगीरोगकी संप्राप्ति आदिक । आत्रेय उवाच॥पित्तं मरुच्च श्लेष्मा च उदानः कुपितो भृशम् ॥ प्राणः शिरसि संकुप्य कुरुते नष्टचेष्टताम् ॥१॥ प्राणाश्नयत्यचै- तन्यं नाडीं चेन्द्रियरोधनम्॥पतते काष्ठवल्लोको मुखे लालां विमुञ्चति ॥ २ ॥ कण्ठञ्च घुर्घुरोयेत फेनमुद्गिरतेऽथवा॥कम्पेते हस्तपादौ च रक्तव्यावर्त्त लोचनम् ॥ ३ ॥ अपस्मारे च लिङ्गानि जायन्ते भिषजां वर ॥ व्यावृत्तं लोचनं क्षामं तमो दाहः शिरोव्यथा ॥ ४ ॥ हताभेन्द्रियसञ्ज्ञश्चापस्मारी विनश्यति ॥ ५ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-पित्त, वात, कफ, उदानवायु ये अत्यन्त कुपित होके और प्राण- १ यह एक तरहका शाक होता है ।

अ० १८ ] भाषाटीकासमेता । ( ३४१ ) वायु शिरमें कुपित होके चेष्टाको नष्ट करते हैं ॥१॥ तब चेतन नहीं रहता और नाड़ी भी अचेत हो जाती है और इन्द्रियां रुक जाती हैं और काष्ठकी तरह मनुष्य गिर जाता है और मुखसे लार पड़ती है ॥ २ ॥ कण्ठमें घुर्घुर शब्द होता है अथवा झागको मुखसे गेरता है, हाथ और पैर कंपते हैं और रक्तसे विशेषकरके आवृत हुए नेत्र हो जाते हैं ॥ ३ ॥ हे वैद्यवर ! मृगीरोगमें ये लक्षण होते हैं ॥ ४ ॥ जिसके नेत्र पलट जावें और शरीर कृश हो जावे और अन्धेरी,दाह, शिरमें पीड़ा ये उपजें, इन्द्रियोंकी कांति और संज्ञा जाती रहे ऐसा अपस्मारी अर्थात् मृगी रोगी मर जाता है ॥ ५ ॥ अथ मृगीरोगकी चिकित्सा । तस्य पानाञ्जनालेपमर्द्दनं पानमेव च ॥ अपस्मारे चोपचार्य्य घृतं तैलं च धीमता ॥६॥ अगस्तिपत्रं मरिचं मूत्रेण परिपेषि- तम्॥नस्ये शस्तमपस्मारं हन्ति शीघ्रं नरस्य तु ॥७॥वन्ध्या- कर्कोटिकामूलं घृतं शर्करयान्वितम्॥नस्ये वापि प्रयोक्तव्यम- पस्मारप्रशान्तये ॥ ८ ॥ इस रोगवालेके लिये कुशल वैद्यको पान करनेके पदार्थ, अंजन, आलेप, मर्दन, घृत, तैल, इनसे इलाज करना चाहिये ॥ ६ ॥ अगस्ति वृक्षके पत्तेको और काली मिर्चको गोमूत्रमें पीस नासिकामें चढ़ानेसे मृगीरोग शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ ७ ॥ वांझककोड़ी की जड़के रसमें घृत और खांड़ मिला नासिकामें चढ़ानेसे मृगीरोग शांत होता है ॥ ८ ॥ अथ कूष्माण्डलेह । कूष्माण्डखण्डांश्च रसेन पाचिताः सञ्यूषणैलादलनागकेशरम्॥ कुमेथिकाग्रन्थकधान्यकानां समांशकेनापि सिता प्रयोज्या॥ ॥ ९॥ उषस्सु वै भक्षणकं विधेयं तस्योपरि क्षीरमितं प्रशस्तम्॥ विहन्त्यपस्मारविकारमाशु विनाशयेच्छीघ्रमसृग्विकारम्॥१०॥ जलसे पके हुए कोहलेके टुकड़े ले उसमें सोंठ, मिर्च, पीपल, इलायची, तेजपात, नागकेशर, रानीमेथी, पीपलामूल, धनियां इन सबोंके चूर्ण मिला सबोंके समान मिश्री मिलावे, पीछे प्रभातमें खावे और उसके ऊपर प्रमाणसे दूधको पीवे । यह मृगी रोगको और रक्तके विकारको शीघ्र हरता है ॥ ९ ॥ १० ॥ अथ कूष्मांडघृत । कूष्मांडब्राह्मी षड्ग्रन्था शंखपुष्पी पुनर्नवा ॥ सुरसासहितं

( ३४२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- चूर्णं शर्करामधुसंयुक्तम् ॥ ११ ॥ अपस्मारविनाशाय भक्षणे हितमेव च॥ उन्मादे पित्तरक्ते तु वन्ध्याया गर्भदायकम्॥१२॥ कोहला, ब्राह्मी, वच, शंखपुष्पी, सांठी,तुलसी इनके चूर्णमें खांड और शहद मिला ॥११॥ खानेसे मृगीरोग, उन्माद, रक्तपित्त इनका नाश होता है और वन्ध्याके गर्भ ठहरता है ॥१२॥ अथ दीपघृत । रास्नामागाधिकामूलं दशमूलं शतावरी ॥ शणत्रिवृत्तथैरण्डो भागान्द्विपलिकान्क्षिपेत् ॥१३॥ यष्टीमधुकमृद्वीका शंखपुष्पी शतावरी ॥ रास्ना समङ्गा शृतकं त्रिसुगन्धञ्च भीरुकम् ॥ १४॥ कुष्ठं वैतद्दीपकं च घृतं योज्यं भिषग्वरैः॥ हन्त्यपस्मारमुन्मादं रक्तपित्तं गुदामयम् ॥ १५ ॥ रास्ना, पीपलामूल, शतावरी, शण, निशोत, अरंड ये सब आठ २ तोले लेने ॥ १३ ॥ मुलहठी, मुनक्का, शंखपुष्पी, शतावरी, रायसन, मंजीठ, दालचीनी, इलायची, तेजपात, शतावरीका भेद ॥ १४ ॥ कूठ इनमें घृतको पकावे । यह घृत मृगी रोग, उन्माद, रक्तपित्त, गुदाका रोग इनको नाशता है ॥ १५ ॥ अथ ब्राह्मीघृत । ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशंखपुष्पीभिरेव च ॥ पचेद्घृतं पुराणं च अपस्मारं नियच्छति ॥ १६ ॥ ब्राह्मीका रस, वच, कूठ, शंखपुष्पी इनमें पुराने घृतको पकावे । यह मृगी रोगको नाशता है ॥ १६ ॥ अथ अन्य उपाय । महाबलाद्यं तैलं च बस्तौ नस्ये प्रशस्यते ॥ शतावर्यादिकं चापि सदैव च हितं भवेत् ॥ १७ ॥ चन्दनाद्यं घृतं चैव प्रयोज्यं चात्र चोत्तमैः ॥ अपस्मारे वाप्युन्मादे वातरोगे- ऽथवा हितम् ॥ १८ ॥ महाबलादि तैल और शतावर्यादि तैल नस्यकर्म्ममें और बस्तिकर्म्ममें सदा हित है ॥१७॥ मृगीरोग, उन्माद, वातरोग इनमें चन्दनादि घृत युक्त करना ॥ १८ ॥ अथ त्र्यूषणादि गुटिका। त्र्यूषणं त्रिफला हिङ्गु सैन्धवं कटुका वचा ॥ नक्तमालकबी-

अ० १८ ] भाषाटीकासमेता । ( ३५३ ) जानि तथा च गौरसर्षपाः ॥ १९ ॥ बस्तमूत्रेण पिष्टैस्तु गुटिका छायाशोषिता ॥ अञ्जनं हन्त्यपस्मारमुन्मादं चैव दारुणम् ॥२०॥ स्मृतिभ्रंशभ्रमीदोषभूतदोषविनाशनम्॥ ऐका- हिकं द्व्याहिकञ्च चातुर्थिकं ज्वरं हरेत् ॥ २१ ॥ हन्ति तिमिर- पटलं रात्र्यान्ध्यंच शिरोरुजम्॥सन्निपातविस्मरणं चेतयत्याशु मानवम् ॥ २२ ॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, हरडै, बहेडा, आंवला, हींग, सेंधानमक, कुटकी, वच, करंजुवाके बीज, सपेद सरसों ॥ १९ ॥ इनको बकरेके मूत्रमें पीस गोलियां बना छायामें सुखावे । पीछे गोलीको घिस नेत्रोंमें आंजनेसे मृगीरोग, दारुणरूप उन्माद ॥ २० ॥ स्मृतिभ्रंश, भ्रम, भूतदोष, ऐकाहिकज्वर, द्व्याहिकज्वर चातुर्थिकज्वर ॥ २१ ॥ तिमिर, पटलगतरोग, रतौंध, शिरकी पीडा इनका नाश होता है और सन्निपातसे मूर्च्छित हुआ रोगी जागता है ॥ २२ ॥ चन्दनादि चूर्ण । चन्दनं तगरं कुष्ठं यष्टीत्रिसुगन्धवासकम्॥मञ्जिष्ठाभीरुमृद्वीका- पाठाश्यामाप्रियङ्गुभिः ॥ २३ ॥ स्वयंगुप्ता पीलुपर्णी विषा रास्ना गवादिनी ॥ काकोल्यौ जीरकं मेदे पुष्करं घनवालुकम् ॥ ॥ २४ ॥ विदारी वासुमन्ती च वृद्धदन्ती विडङ्गकम् ॥ पद्मकं चैन्द्रवृक्षश्च तथारग्वधचित्रकम् ॥ २५ ॥ धान्यकं पञ्चजीरेण तथा तालीसपत्रकम् ॥ खदिरं निर्यासतगरं कालीयकं च कै- थकम् ॥ २६ ॥ नागकेसरं परूषञ्च खर्जूरं चैकत्र मर्दयेत् ॥ भावितं पुनरेवं च मधुना सघृतेन च ॥२७ ॥ लेहोऽयञ्च सदा शस्तश्चापस्मारेऽति दारुणे॥उन्मादे कामलारोगे पांडुरोगे हली- मके ॥ २८ ॥ राजयक्ष्मे रक्तपित्ते पित्तातीसारपीडिते ॥ रक्तातिसारे शोषे च शिरोरोगे सदाज्वरे ॥२९ ॥ तमकभ्रमके छर्दिर्दाहे च समदात्यये ॥ अश्मर्य्याञ्च प्रमेहेषु कासे श्वासे च पीनसे ॥ ३० ॥ एतेषां च प्रयोक्तव्यः सर्वरोगनिवारणः ॥ वन्ध्यानां च प्रयोक्तव्यो वृद्धानां च विशेषतः ॥३१॥ बालानां Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu