हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
( ४१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ गोजिह्वक कुष्ठ लक्षण । यद्रूक्ष्यपारुष्यसकर्कशञ्च गोजिह्वकं स्यात्खलु भेद्योग्यम् ॥ यवासरक्तानि च मण्डलानि सकण्डुकानि व्रणसंयुतानि॥ ९ ॥ जो रूषा हो कठोर हो कड़ा हो गौकी जिह्वाके समान वर्णवालाहो वह गोजिह्वककुष्ठ कहाता है और रक्त मंडलहो कुंडलसरीखेहों व्रणसे संयुक्तहो वह लोहित मंडल कुष्ठ जानना ॥ ९ ॥ अथ विपादिका कुष्ठ लक्षण । ज्ञेयं तु तल्लोहितमण्डलञ्च रक्तोद्भवं तद्रुधिराश्रितञ्च ॥ सवेदनार्त्तस्य परिस्फुटञ्च विपादिका सा कथिता विधेया १०॥ जो रक्तसे उत्पन्न हो रक्तके आश्रय हो पीड़ायुक्त हो प्रकटहो वह विपादिका कुष्ठ कहाता है॥१०॥ कोपेन रक्तानिलयोश्चजातातथैवविस्फोटकसन्निभा वा॥तथापरं नाम बहुव्रणं च सूक्ष्मा च सा वै विदिता नरस्य॥११॥ कण्डू- र्विचर्चीभुवने प्रतीता श्वेतानि सूक्ष्माणि च पाटलानि॥विसर्पते यस्य नरस्य रक्तं युवा न केनापि भवेच्च सिद्धः ॥ १२ ॥ जो रक्तवातके कुपित होनेसे उत्पन्न हो और विस्फोटके समान हो और बहुतसे व्रण हों वह सूक्ष्मा विपादिका नामक कुष्ठ जानना ॥ ११ ॥ कंडू विचर्चिका ये संसारमें प्रसिद्ध हैं और जिसके सूक्ष्मवर्णवाले तथा सफेदवर्णवाले और पीले वर्णवाले ऐसे चिह्न दीखें, रक्त दुष्ट होके फैलाता है ऐसा तरुणरोग किसी प्रकारसेभी सिद्ध नहीं होता है ॥ १२ ॥ अथ वातादिजन्य कुष्ठका लक्षण । शिरीषपुष्पाणि शिरीषकाणि सन्त्यक्तभावः पुरुषश्च सूक्ष्मः॥ तोदस्तथा वेपथुवातलिङ्गं पित्तेन शोषभ्रमदाहतृष्णाः ॥१३॥ श्लेष्मोद्भवे कठिनशीतलपाण्डुरञ्च नेत्रे नखेषुचवपुष्यभिलाषता च॥ मित्रेण संश्रुतभवानि भवन्ति यस्य स्यात्सान्निपातिकभवं बहुभिश्च लिङ्गैः ॥ १४ ॥ शिरसके पुष्पोंके समान और शिरसके समान वर्ण हो, कठोर हो, सूक्ष्म हो, व्यथा हो कंपना हो ये वातसे उपजे कुष्ठके लक्षण हैं और पित्तसे उपजे कुष्ठमें शोषहो, भ्रम हो दाह हो तृषाहो ॥ १३ ॥ कफसे उपजा कुष्ठ कठिन, शीतल होता है और नेत्र, नख, शरीर ये पीले होजाते हैं इनमें खाज करनेकी इच्छा रहे और सब मिलेहुए दोषोंसे मिलेहुए लक्षण होते हैं, सन्निपातसे उपजे कुष्ठमें बहुतसे लक्षण मिलते हैं ॥ १४ ॥
॰अ० ३९] भाषाटीकासमेता । (४१५) अथ रक्तस्थ कुष्ठ । रूक्षं तथा सकण्डु त्वक्स्थितञ्च मृदु शीतलम् ॥ आस्रावदाहरक्ताभं रक्तस्थं रक्तगं विदुः ॥ १५ ॥ जो रूखाहो, खाजहो, कोमलहो, शीतलहो वह त्वचा में स्थित कुष्ठ जानना और जिसमें झिरनाहो, रक्तसरीखी कांतिहो वह रक्तमें स्थित हुआ कुष्ठ जानना ॥ १५ ॥ अथ मांसस्थ मेदःस्थ तथा अस्थिस्थ कुष्ठ । सुस्निग्धं तोदगम्भीरं मांसगञ्च विनिर्दिशेत्॥मेदःस्थं तोदवेष्टत्वं सुस्निग्धं रक्तलोचनम् ॥अस्थिसंस्थञ्च गम्भीरं विसर्पे नासि- कामुखे ॥ १६ ॥ स्निग्धहो गम्भीर व्यथावाला वह मांसमें प्राप्त हुआ कुष्ठ जानना जो मेदमें स्थितहो उसमें पीडाहो और ऐंठन चिकनाहो, रक्तनेत्रहों और जो अस्थिमें स्थितहो वह गंभीर होता है मुखमें तथा नासिकामें विसर्परोग दीखता है ॥ १६ ॥ अथ मज्जास्थ तथा शुक्रस्थ कुष्ठ । मज्जसंस्थश्च विकलो मज्जास्रावश्च जायते॥विशीर्यते च सर्वाङ्गे तथैव शुक्रगं विदुः ॥ १७ ॥ अतो वक्ष्ये समासेन प्रतिकर्म भिषग्वर ॥ १८॥ मज्जामें स्थितहोनेसे विकल होजावे, और मज्जास्राव होता है और जिसमें सब अंग शिथिल होजावें वह वीर्यमें प्राप्त हुआ कुष्ठ जानना ॥ १७ ॥ हे उत्तम वैद्य ! अब संक्षेप मात्रसे इनकी चिकित्साको कहेंगे ॥ १८ ॥ अथ कुष्ठचिकित्सा । त्वक्स्थे स्वेदस्तथालेपो रक्तस्रावश्च रक्तगे॥विरेकं मांसगे प्रोक्तं मेदोगे क्वाथपाचनम् ॥१९॥ अथ तानि च त्रीण्येवमस्थिमज्जा- गतानि च ॥ वातिके स्वेदनं पथ्यं पित्त शीतोपचारणम्॥२०॥ कष्टसाध्यमिदं प्रोक्तमसाध्यं सान्निपातिकम् ॥ रोगकारणमा- लोच्य तदा कम समारभेत् ॥ २१ ॥ त्वचामें स्थितहुए कुष्ठमें पसीना दिलावे, लेप करे, रक्तमें प्राप्तहुएमें स्राव करावे, मांसमें प्राप्तहुए कुष्ठमें जुलाब देवे और मेदमें प्राप्तहुएमें क्वाथ पाचन देवे ॥ १९ ॥ और यही उप- चार अस्थि, मज्जा, इनमें प्राप्तहुएमें भी करना चाहिये, वातसे उपजे कुष्ठमें पसीना दिवाना
(४१६) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- पथ्य है, पित्तसे उपजेमें शीतल उपचार करना श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ यह कुष्ठरोग कष्टसाध्य कहा है और सन्निपातसे उपजा असाध्य होता है, पहले रोगके कारणको जानके पीछे कर्म कर- नेका आचरण करे ॥ २१ ॥ पक्षान्नपक्षाञ्छोधनं पाचनञ्च मासान्मासान्कारयेद्रेचनञ्च ॥ मासान्कुष्ठे शोधनाय प्रकर्षात्तिष्ठे षष्ठ मास्यसृग्मोक्षणञ्च ॥ २२ ॥ वासापटोलफलिनीलवणं वचाञ्च निम्बत्वचं क्वथि- तमाशु पिबेत्कषायम्॥ कुष्ठे करोति वमनं मदनान्विते च पथ्याकषायवमने मदनान्वितेषु ॥ २३ ॥ फलत्रिकं त्रिवृद्दन्ती भिषग्वर विरेचकम् ॥ क्वाथो वचोष्णतोयेन पाने स्याद्भिषगु- त्तम॥२४॥ श्वासप्रश्वासयोर्वेध्या शिरा शिरसि चेद्वहिः ॥ ततः प्रयोजनीयश्च क्वाथस्नेहस्य भोजनम् ॥ २५ ॥ पक्षपक्षको प्रति शोधन और पाचनकर्म करे । महीना २ को प्रति जुलाव दिलानी चाहिये और कुष्ठरोगमें छठे २ महीनेके प्रति रक्तको निकसावे ॥ २२ ॥ वांसा, परवल, मालकांगनी, नमक, वच, नींबकी त्वचा, इनका काथ बना मैनफल मिला कुष्ठमें पीनेसे वमन होता है और पंचवृक्षोंका काथ बना मैनफूल मिला वमनके वास्ते देना चाहिये ॥ २३ ॥ हे वैद्य ! त्रिफला, निशोत, इनसे जुलाव दिलानी श्रेष्ठ है और वचका काथ बना गरम २ जलके संग पीना श्रेष्ठ है ॥ २४ ॥ कुष्ठमें जो ज्यादा श्वास होवे तो शिरमें रहनेवाली वाहिरकी नस वींधनी चाहिये, पीछे क्वाथ और स्नेह अर्थात् घृत आदिक भोजन करवाना चाहिये ॥ २५ ॥ अथ शुण्ठ्यादिक्वाथ । शुण्ठीकणाखदिरपाटलिकापटोलीमञ्जिष्ठकंटविषबिल्वयवानि- कानाम्॥वासाफलत्रिकजलेन कषायसिद्धः पानान्निहन्ति मनु- जस्य च कुष्ठदोषम् ॥२६॥ वासाविडङ्गपिचुमन्दपटोलपाठा- शुण्ठीसुदारुतरुपञ्चमूलपथ्याः ॥ क्वाथो निहन्ति च मरुत्प्र- भवं सुकुष्ठं त्रिःसप्तकेऽहनि महौषधमेव योज्यम् ॥ २७ ॥ सूंठ, पीपल, खैर, पाड़लवृक्ष, परवल, मँजीठ, लघुगोखरू, अतीस, बेलगिरी, अजवायन, वांसा, त्रिफला, इनका काथ बना पीनेसे मनुष्यका कुष्ठरोग दूर होता है ॥ २६ ॥ वांसा, वायविडंग, नींव, परवल, पाठा, सूंठ, देवदार, बड़ आदि पंचवृक्ष, लाख, मूली,
अ० ३९] भाषाटीकासमेता । ( ४१७ ) हरडै इनके काथसे वातसे उपजा कुष्ठका नाश होता है, इक्कीस दिनतक यह महान् औषध पीना चाहिये ॥ २७ ॥ गुडूच्यादि क्वाथ । नित्यं छिन्नोद्भवाचूर्णं तस्याः क्वाथसमन्वितम् ॥ पीतं जीर्णे सघृ- तञ्च पीतञ्च षाष्टिकं पयः ॥ २८ ॥ हन्ति कुष्ठानि सर्वाणि सप्त- धातुगतानि च ॥ २९ ॥ गिलोयके क्वाथके संग गिलोयके चूर्णको नित्य पीवे । जर जावे तब घृत सहित सांठि चावलोंके मांडको पीवे ॥ २८ ॥ यह सातों धातुओंमें प्राप्त हुए सब कुष्ठोंको नाशता है ॥ २९ ॥ अथ कुष्ठरोगमें लेपविधि । रसेन्द्रकाश्मर्यघनञ्च कुष्ठं निशाद्वयं काञ्जिककुष्ठमेतत् ॥ लेपे प्रशस्तं विनिहन्ति कुष्ठं विचर्चिकां चापि विसर्पदोषम् ॥३०॥ पिष्टानि तत्र मधुकाञ्जिकमूत्रपिष्टलेपेन कुष्ठमपि दुष्टविचर्चि- काञ्च ॥ ३१ ॥ विसर्पदोषे प्रोक्तानि धावनानि च कारयेत् ॥ सौवीरकरसेनापि धावनं त्रिफलाम्बुना ॥ ३२ ॥ वातिके चैव कुष्ठे च प्रशस्तं कथितं बुधैः॥ निम्बपत्रकषाये च यष्टीमधुक- कल्कितम् ॥ ३३ ॥ दुग्धेन शीतलेनापि विदार्याः क्वाथके- न वा ॥ हन्ति कुष्ठं महाघोरं धावनं न प्रशस्यते ॥३४॥ अग्नि- मन्थपटोलानि मातुलुङ्गदलानि च॥शटीपर्पटकःक्वाथो धावनं श्लेष्मरोगिणाम् ॥ ३५ ॥ विपादिकां नवनीतेन क्षालयित्वा विदांवर ॥ स्वेदयित्वार्कदुग्धैश्च मधुतैलेन लेपनम् ॥ ३६ ॥ खंभारी, सिंगरफ, नागरमोथा, कूठ, दोनों हलदी, कांजीमें शोधा हुआ लोहा, इनको पीस कुष्ठपै लेप करना श्रेष्ठ कहा है और विचर्चिका, विसर्पदोष, इनका नाश होता है ॥३०॥ सीसाकी रजको शहद, कांजी, गोमूत्र इनमें पीस लेप करनेसे कुष्ठ, दुष्ट विचर्चिका इनका नाश होता है ॥ ३१ ॥ विसर्प दोषमें कहेहुए धोवनेके कर्म यहां करने चाहिये और कांजी, त्रिफलाका रस इनसे धोना श्रेष्ठ है ॥ ३२ ॥ यह इलाज वैद्यजनोंने वातसे उपजे कुष्ठमें श्रेष्ठ कहा है और नींबके पत्तोंके काथमें मुलहटीका कल्क बना ॥ ३३ ॥ शीतल दूधमें मिला अथवा विदा- रीकंदके काथमें मिला उससे धोवनेसे महाघोर कुष्ठका नाश होता है ॥ ३४ ॥ अरणी, पर- २७
( ४१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- बल, बिजौराके पत्ते, कचूर, पित्तपापडा इनका काथ बना कफसे उपजें कुष्ठको धोना श्रेष्ठ है ॥ ३५ ॥ विपादिका कुष्ठको नौनी घृतसे संयुक्त कर तहां आकके दूधसे पसीना दिया शहद और तैलका लेप करे ॥ ३६ ॥ अथ खदिरआदि क्वाथ । खदिरनिम्बकदम्बकमर्जुनमथ च पाटलिका च शिरीषकम् ॥ कुटजकिंशुकवासुसमोरटो वटकुटं नटपिप्पलिपीलुकम् ॥३७॥ धवमुदुम्बरवेतसमेकतः कथितपानविधानघृतेन तु ॥ सकल- कुष्ठविनाशनकारकं भवति चेन्दुसमानवपुर्नरः ॥ ३८ ॥ खैर, नींव, कदंब, अर्जुनवृक्ष, पाडलवृक्ष, शिरस, कूडाकी छाल, टेशू, वांसा, मोर अर्थात् खैरका भेद, वड, टेंटूवृक्ष, पीलूवृक्ष ॥ ३७ ॥ धव, गूलर, वैत, इनको एक जग- हकर काथ बना घृत मिला पीनेसे संपूर्ण कुष्ठोंका नाश होता है और चंद्रमाके समान सुन्दर शरीर होजाता है ॥ ३८ ॥ अथ आरग्वधआदिक्वाथ । आरग्वधाधातकिर्काणकारधवार्जुनैः सज्जककिंशुकानाम् ॥ कदम्बनिम्बाकुटजाटरूषा मूर्वा च युक्ता खदिरेण चैषा ॥ ॥३९॥मूलानि चैषामुपहृत्य सम्यगष्टावशेषे कथितः कषायः॥ घृतेन तुल्यं प्रतिमानवस्य निहन्ति सर्वाणि शरीरजानि ॥ ॥ ४० ॥ कुष्ठानि सर्वाणि विसर्पदद्रुविचर्चिका हन्ति नरस्य शीघ्रम् ॥ ४१ ॥ अमलतास, धाय, कनेर, धववृक्ष, अर्जुनवृक्ष, रालवृक्ष, टेशू, कदंब, नींव, कूडाकी छाल, वांसा, खैर, मूर्वा ॥ ३९ ॥ इनकी जडको ले काथ बना लेवे पीछे अष्टमांश बाकी रहे तब उतार उसमें समान भाग घृत मिला खानेसे मनुष्यके शरीरके सब प्रकारके कुष्ठोंका नाश होता है ॥ ४० ॥ सबप्रकारके कुष्ठ, विसर्परोग, दाद, विचर्चिका इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥ ४१ ॥ अथ खदिरादिघृतपानक । खदिरकदरमूर्वावालकं कर्णिकारः कुटजसपरिभद्रारग्वधाभिश्च पिष्टाः॥कथितमिति समांशं पीतमाज्येन युक्तं जयति सकल- कुष्ठान् वै विसर्पस्य दोषान् ॥ ४२ ॥
५. पञ्चम व षष्ठ स्थान: शारीर स्थान, विष-चिकित्सा व उपसंहार
अ० ३९ ] भाषाटीकासमेता । (४१९) खैर, सफेद खैर, मूर्वा, नेत्रवाला, वडा अमलतास, कुडाकी छाल, नींव, अमलतासको पीस इन्हींके समान घृत मिला काथ बना पीनेसे संपूर्ण कुष्ठरोग विसर्पदोष इनका नाश होता है॥४२॥ अथ भल्लातक तैल । भल्लातकत्र्यूषणमक्षचूर्णं कुष्ठञ्च गुञ्जालवणानि पञ्च ॥ फलत्रिकं तैलविपाचितानि चाभ्यञ्जनं हन्ति च दद्रुकुष्ठम् ॥४३ ॥ भिलावा, त्र्यूषण अर्थात् सोंठ, मिर्च, पीपल, बहेडा, कूठ, घोंवचिल, पांचों नमक, त्रिफला इनको समान भाग ले चूर्ण बना तेलमें पकावे पीछे इस तेलकी मालिस करनेसे दद्रुकुष्ठका नाश होता है ॥ ४३ ॥ अथ तिलतैल । अश्वघ्नमूलं मलिनं समङ्गा निशाद्वयं सर्षपचित्रकञ्च ॥ सभृङ्ग- राजं कटुतुम्बिका च कुष्ठं विडङ्गं मगधा च चूर्णम् ॥४४॥ स्नु- ह्यर्कदुग्धेन विपाचितं तु तैलं तिलानां परिपक्वमेतत् ॥ अभ्यञ्जनं चैव नरस्य नूनं दद्रूणि कण्डूनि विनाशयेच्च ॥ ४५ ॥ कनेरकी जड, अगर, मंजीठ, दोनों हलदी, सरसों, चीता, भंगरा, कुटकी, तुंबी, कूठ, वायविडंग, पीपली ॥ ४४ ॥ इनको थोहरके और आकके दूधमें पका पीछे इसमें तिलोंके तेलको पकावे इसकी मालिस करनेसे मनुष्यके दद्रुकुष्ठोंका नाश शीघ्र ही होता है ॥ ४५ ॥ अथ हरिद्रादि तैल । हरिद्रा समङ्गा सुराह्वं सचित्राविडङ्गानि कृष्णा विशालाम्बु कुष्ठम् ॥ तथा लाङ्गली चक्रमर्दं च गुञ्जा विशाला तथारिष्ट- पत्राणि चैतत् ॥४६॥ सुचूर्णीकृतं भावितं वै तथैतद्गुडैनैव सर्वं हि घर्मे विपाच्यम् ॥ हितं लेपने कुष्ठपामाविचर्चीर्नरस्याति शीघ्रं निहन्तीति शल्यम् ॥ ४७ ॥ हलदी, मंजीठ, देवदार, चीता, वायविडंग, पीपली, इंद्रायण, नेत्रवाला, कूठ, कलहारी, चकौंडी, घोंवचिल, इंद्रायण, नींवके पत्ते ॥ ४६ ॥ इनको समान भाग ले चूर्ण बना गुड़के रसमें भावना दें । घाममें धरके पका लेप करना हित है । कुष्ठ, पामा, विचर्चिका इन रोगोंका शीघ्र ही नाश होता है ॥ ४७ ॥ अथ निंबादिघृत । निम्बं पटोलं च किरातकञ्च जाती विशाला सपुनर्नवा च ॥
( ४२० ) हारितसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पयोदलाक्षारसमेव वासा त्रायन्तिका बिल्वककुष्ठयष्टिः ॥४८॥ संचूर्णितं क्षीरदधिसमेतं घृतं विपक्वं परिषेचने च ॥ हितञ्च कुष्ठ- क्षतदद्रुरक्तं पामाविचर्चीर्विनिहन्ति कण्डूम् ॥ ४९ ॥ नींव, परवल, चिरायता, जावित्री, इंद्रायण, सांठी, नागरमोथा, लाखका रस, वांसा, त्रायमाण, बिल्व, कूठ, मुलहठी ॥ ४८ ॥ इनका चूर्ण बना दही और दूध मिलावे उसमें घृत मिला सिद्ध करे पीछे इस घृतसे सेक करनेसे कुष्ठक्षत, दद्रुरक्त, पामा, विचर्चिका कंडू इनका नाश होता है ॥ ४९ ॥ अथ पांडुरकुष्ठकी चिकित्सा । पित्तञ्चैव गदं भूत्वा वातेनैव समीरितम् ॥ सरक्तञ्च प्रकुपितं कुरुते पाण्डुरच्छविम् ॥ ५० ॥ स्तब्धचित्तं विरूपञ्च शृणु तस्य च लक्षणम् ॥ असाध्यं कुष्ठं साध्यं वा विज्ञेयं तद्भिषग्वरैः ॥५१॥ ईषद्रक्तं भवेत् पाण्डु सन्निपातेन जायते ॥ असाध्यं तच्च सर्वाङ्गचित्रं स्निग्धं तदेव तु ॥ ५२ ॥ पीतच्छविं पाण्डुररूक्षमेव उपागतं साध्यतमं प्रतीतम् ॥ संपाचनं शोधनमेव शस्तं विरे- चनं रक्तविमोक्षणञ्च ॥ ५३ ॥ वासागुडूचित्रिफलाकरञ्जपटोल- निम्बार्जुनवेतसानाम् ॥ कृष्णासमङ्गासहितं च कल्कं पाने हितं चित्रकमण्डले च ॥५४॥ खदिरवासकनिम्बपटोलकैर्धवयवास- कमेव फलत्रिकैः ॥ सकलकुष्ठविसर्पमण्डलं विजयते मनुजस्य च पाण्डुरम् ॥५५॥ पाठाविडङ्गमगधासुरदारुचित्रं दद्रुघ्नरात्रि- युगलं च तथा समङ्गा॥ कुष्ठं वचामधुकसैन्धवकाञ्जिकेन मूत्रेण पिष्टमथ रक्तरसेन वापि ॥ ५६ ॥ प्रलेपने चित्रमथैव सिद्धं वि- नाशमायाति च कण्डुकुष्ठम् ॥ विचार्चिकां नाशयते च कण्डूं विस्फोटमाशु प्रतिसर्पणानि ॥५७॥ भृङ्गराजो हरिद्रा च दूर्वा जाती विडङ्गकाः॥कृष्णास्तिलाश्चित्रकाणि तथैव हरिचन्दनम् ॥५८॥ मूत्रेण पेषितं तत्तु लेपनं चित्रकुष्ठिनि ॥ हन्ति दद्रूणि सर्वाणि कुष्ठं दद्रूविचर्चिकाः ॥ ५९ ॥ न विदाहीनि चाम्लानि
अ० ४० ] भाषाटीकासमेता । (४२१) वातलानि तथैव च ॥ ज्वरे प्रोक्तानि पथ्यानि तानि चात्र प्रयोजयेत् ॥ व्रणेषु कुष्ठराजीषु हितमेवोपचारिणाम् ॥ ६०॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने कुष्ठचिकित्सानामै- कोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ इति कायतन्त्रं समाप्तम् ॥ वातसे प्रेरा हुआ पित्त रोगरूप होके रक्तके संग कुपित हो शरीरको पांडुर अर्थात् कुछ पीला सहित सफेद वर्णवाला करदेता है ॥ ५० ॥ चित्त दुखी रहे विरूप होजावे ऐसे लक्ष- णोंको सुनो, यह कुष्ठ असाध्य और साध्य दो प्रकारका होता है ॥ ५१ ॥ जो कुछ लाल वर्णसे युक्त पीला वर्णवाला कुष्ठ हो वह सन्निपातसे उपजा जानना वह असाध्य होता है उसमें सब अंगमें चिकने और चितले होते हैं ॥ ५२ ॥ जो रूखा तथा पीला वर्ण- वाला पांडुरकुष्ठ हो वह साध्य होता है उसमें पाचन और शोधन करना तथा जुलाब दिलानी और फस्त खुलानी श्रेष्ठ है ॥ ५३ ॥ वांसा, गिलोय, त्रिफला, करंजुवा, परवल, नींव, अर्जुनवृक्ष, बेंत, पीपल, मँजीठ, इन्होंका कल्क बना चित्रकमंडल कुष्ठमें पीना हित है ॥ ५४ ॥ खैर, वांसा, नींव, परवल, धव, जवांसा, त्रिफला, इनका कल्क बना पीनेसे सबप्रकारके कुष्ठ, विसर्प, मंडल, पांडुरकुष्ठ, इनका नाश होता है ॥ ५५ ॥ पाठा, वायविडंग, पीपल, देवदार, चीता, पुआड, दोनों हलदी, मँजीठ, कूठ, वच, मुलहटी, सेंधानमक, इनको कांजीमें अथवा गोमूत्रमें अथवा रुधिरके रसमें पीसि ॥ ५६ ॥ लेप करनेसे चित्रकुष्ठका नाश होता है और खाजवाला कुष्ठ, विचार्चिका, कंडू, विस्फोटक, विसर्प इनका नाश होता है ॥ ५७ ॥ भंगरा, हलदी, दूब, जीरा, वायविडंग, कोले तिल, चीता, लाल चंदन ॥ ५८ ॥ इनको गोमूत्रमें पीस लेप करनेसे चित्रकुष्ठका नाश होता है और सबप्रकारके दाद, दद्रुकुष्ठ, विचार्चिका, विस्फोटक और विसर्प इनका नाश होता है ॥ ५९ ॥ कुष्ठरोगमें विदाही, खट्टा, वातवाला ऐसा भोजन नहीं करना चाहिये, और ज्वरमें कहेहुए जो पथ्य हैं वे यहाँ करने चाहिये और व्रणोंमें कुष्ठोंमें, यही उपचार करना श्रेष्ठ है ६० ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने कुष्ठचिकित्सानाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ चत्वारिंशोऽध्यायः ४०. अथ शालाक्य तंत्र । अथ शिरोरोगचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अतिभाषातियोगेन अतितीक्ष्णोष्णभावतः॥
विनाभ्यङ्गेन वा शैत्यात्पित्तेनातिविशेषतः ॥१॥ क्रिमिदोषेण वा पुंसां जायते च शिरोगदः॥वातरक्तकफात्पित्तात्पित्तेनापि विशेषतः॥२॥सन्निपातेन विज्ञेयाः क्रिमिजाश्च तथापरे॥अर्द्ध- शीर्षविकारश्च दिनवृद्धिकरस्तथा ॥ ३ ॥ वातेन रात्रौ भवते व्यथा च अथातुरस्य व्यथते शिरश्च ॥ सौख्यं लभेत्स्वेदन- मर्दनेन वातेन सा विड्वृषणे रुजा वा॥४॥यस्योष्णमङ्गं भवते शिरस्यं घर्मे संतापे च दिने च रात्रौ ॥ स धूमतो वा कटुको बलाशे शीतात्सुखं वा निशि स्वास्थ्यमेति ॥५ ॥ शीतात्सुख वा प्रथमश्च तृष्णा सतीव्रापित्ताद्भवते रुजा च॥ सूर्योदये वा भवते दिनान्ते भ्रमश्च तृष्णा भवते सुतीव्रा॥६॥सजाड्य- मुण्डं भवते च शीतं स्वेदेन युक्तं युगलञ्च नूनम् ॥ सुदृश्यनेत्रं नयते च तद्वा कफे यदीष्टः शिरसो विकारः॥७॥रक्तेन नासा- पुटकेऽपि जालं निरेति शेषा वदने च तृष्णा ॥ रक्ताक्षमन्द्या जठरे च यस्य तमाहू रक्तोद्भवशीर्षरोगम् ॥८॥ मध्यं प्रदूष्य प्रतनोति पीता नासापरिस्रावि सविड्जलञ्च॥सजाड्यमोहश्व- सनं च यस्य त्रिदोषरोधाद्भवते शिरोऽर्त्तिः॥९ ॥ यस्यातिमात्रं शिरसि प्रतोदो विभज्यमानेऽपि च मस्तकान्ते ॥घ्राणे परि- स्रावि सरक्तपूयं क्रिमिप्रसूता च शिरोव्यथा च ॥१०॥क्रोधा- च्छोकाद्भवेच्चान्या व्यायामेऽतिश्रमेषु च ॥ सा वातेन शिरः- पीडा सरुजे च नृणामपि ॥ ११ ॥ अतिलेखनपाठेन तथा सूक्ष्मान्निरिक्षणात्॥ दूरदृष्टेक्षणेनापि वेदना वातरक्तजा ॥१२॥ नासिकाद्धे व्यथा तस्य व्यथाभ्रूयुगले भवेत् ॥ नीलं कृष्णञ्च पश्येत वेदना मस्तके भवेत् ॥ १३ ॥ न रक्तेन विना पित्तं रक्तं पित्तेन चाल्यते ॥ न पित्तेन शिरोऽर्त्तिः स्यात्पित्तं वातेन चाल्यते ॥ १४ ॥
अ० ४०.] भाषाटीकासमेता । ( ४२३ ) आत्रेयजी कहते हैं—अतिभारके अत्यन्त योगसे अतितीक्ष्ण भावसे तैलादिकी मालिस करे बिना शीतलता लगनेसे अत्यंत पित्तसे ॥ १ ॥ अथवा क्रिमि दोषसे पुरुषोंके शिरो- रोग होता है और वातरक्त, कफपित्त, पित्त ॥ २ ॥ अथवा सन्निपात, इनसे उत्पन्न होने- वाले शिरोरोग क्रिमिन शिरोरोग ऐसे होते हैं, और अधशिरका विकार तथा दिनके चढ़नेके समय शिरोरोग होता है ॥ ३ ॥ वातदोषसे उपजे शिरोरोगमें रात्रिमें पीडा हो, और पीड़ित हुएका शिर दुखे और पसीना दिलाने तथा मर्दन करनेसे सुख होवे । विष्ठा उतरनेके समय अथवा वृषणस्थानमें दुःखहो वह वातसे उपजी पीडा जाननी ॥ ४ ॥ जिसका शिर गर्म रहे और घामसे संतापमें दिनमें अथवा रात्रिमें धुवांसे शिरमें पीड़ाहो, कडू कफ भिरे वह पित्तसे उपजा शिरोरोग जानना जिसमें रात्रिमें सुख होता है ॥ ५ ॥ और शीतलतासे सुख हो, तृषा लगे, तीव्र पीड़ाहो, वह पित्तसे उपजी पीडा जाननी और जो सूर्योदयमें अथवा दिनके अंतमें शमहो तृणाहो पीड़ाहो ॥६॥ शिरमें जड़ताहो शीतलहो पसीनेसे युक्त दोनों नेत्रहों और सुंदर नेत्रहों वह कफसे उपजा शिरोविकार जानना ॥ ७ ॥ और रक्तसे उपजे शिरके विकारसे नासिकासे रक्त झिरे, मुखमें तृषा रहे, और जिसके कंघा, कंघाके समीप मन्यास्थान, पैर, ये लाल हों उसको कफसे उपजा शिरोरोग कहते हैं ॥ ८ ॥ मध्यमें दूषित हो, पीली नासिका होजावे, दुर्गंधि सहित जल झिरे, जड़ता हो, मोहहो, श्वासहो वह त्रिदोषसे उपजी शिरकी पीड़ा जाननी ॥ ९ ॥ जिसके शिरमें अत्यंत व्यथा हो और मस्तक फटाजावे नासिकासे रक्त और राध झिरे वह क्रिमियोंसे उपजी शिरकी पीड़ा जाननी ॥ १० ॥ और क्रोध, शोक, कसरत, अत्यंत परिश्रम इनसे उपजी हुई पीड़ा वातके कोपसे होती है वहां व्यथा होती है ॥ ११ ॥ अत्यंत लिखना, पढ़ना, सूक्ष्म देखना, दूरसे दृष्टिदेके देखना इनसे उपजी पीडा वात रक्तके कोपसे जाननी ॥ १२ ॥ उसकी आधी नासिकामें और दोनों भुकुटियोंके आधे भागमें पीडा हो, नीला और काला वर्ण सरीखा दीखे, मस्त- कमें पीड़ाहो ॥ १३ ॥ रक्तके बिना पित्त नहीं होती है और रक्त, पित्तसे चलायमान होता है और पित्तसे विना शिरमें पीडा नहीं होती है, पित्त वातसे चलायामान होता है ॥१४॥ तस्माद्वक्ष्याम्युपचारं शृणु भेषजलक्षणम् ॥ स्वेदः प्रलेपनं नस्यं पानाभ्यङ्गश्च मर्दनम् ॥ १५ ॥ स्वेदनं वातकफजे चाभिघाते तथा पुनः॥ पित्तजे रक्तजे वापि न कुर्यात्स्वेदनं तयोः॥१६॥ रक्तजे च शिरा वेध्या पित्तजे वापि कुत्रचित्॥ कोकिलाख्या च तर्कारि कटुका निम्बपत्रकैः ॥ १७ ॥ शोभाञ्जनकपत्रैस्तु क्वाथं वा तेन स्वेदयेत् ॥ अमीषाञ्च प्रलेपेन सौख्यं चास्य प्रजायते ॥१८॥ संशीतपरिषेकैश्च यष्टीमधुकचन्दनैः ॥ केसरै-
( ४२४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- मातुलुङ्गैश्च पित्तजे शीतलेपनम् ॥ १९ ॥ कदम्बार्जुनसिन्धूश्च लेपनार्थे भिषग्वर ॥ गुडेन नागरा वापि पथ्यां वापि गुडेन वा ॥२०॥ गुडशोभाञ्जनरसैर्नस्ययोगात्पृथक्पृथक् ॥ नस्येन बस्तमूत्रेण शिरोऽर्त्तिश्चोपशाम्यति ॥२१॥ मरिचं पथ्या कट्- फलं मूत्रेणोष्णोदकेन वा ॥ नस्यं कफोद्भवे घोरे शिरोरोगे भिषग्वर ॥२२॥ वचामधुकसारं वा मूलं वा गिरिकर्णिका ॥ नस्यप्रयोगे विहितं सन्निपाते शिरोगदे ॥ २३ ॥ वन्ध्याकर्कोट- कीमूलं पिष्टमूष्णेन वारिणा ॥ मितं नस्ये प्रयुञ्जीत क्रिमिजे च शिरोगदे ॥ २४ ॥ इसवास्ते इसके उपचारको कहते हैं औषधोंको सुनो-पसीना दिवाना, लेप करना, नस्य दिवानी, पान कराना, मालिस मर्दन कराना ॥ १५ ॥ वात कफसे उपजे तथा चोट आदिसे उपजे शिरोरोगमें पसीना दिवावे और पित्तसे तथा रक्तसे उपजेमें पसीना नहीं दिवावे ॥ १६ ॥ रक्तसे उपजे शिरोरोगमें फस्त खुलावे और कहींक पित्तसे उपजेमेंभी शिरावेध श्रेष्ठ है और कंकोल, अरणी, कुटकी, नींवके पत्ते ॥ १७ ॥ सहिजनके पत्तेका काथ बना उससे पसीना दिवावे अथवा इनके लेप करनेसे सुख होता है ॥ १८ ॥ पित्तके शिरोरोगमें मुलहटी, महुआवृक्ष, चंदन, इनके शीतल काथसे परिषेक करे और बिजौरेकी केशरसे शीतल २ लेप करे ॥ १९ ॥ और हे उत्तमवैद्य ! कदंब, अर्जुनवृक्ष, सेंधानमक, इनका लेप करना श्रेष्ठ है और गुडके संग सोंठ, तथा हरडैका लेप श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ और गुड़ सहिज- नेका रस इनकी पृथक् २ नस्य देनी श्रेष्ठ है और बकरेके मूत्रकी नस्य देनेसे शिरकी पीडाका नाश होता है ॥ २१ ॥ और कफसे उपजे घोर शिरोरोगमें मिर्च, हरड़ै, कायफल, इनको पीस गरम २ गोमूत्रके संग नस्य देना श्रेष्ठ है ॥ २२ ॥ वच, महुआ, मूली, अमलतास, इनको नस्यमें देनेसे सन्निपातसे उपजा शिरोरोग नाश होता है ॥ २३ ॥ बांझ कक्रोडीकी जडको पीस गरम जलके संग नस्य देनेसे कृमिसे उपजा शिरोरोग नाश होता है ॥ २४ ॥ अथ षड्बिन्दुनामकतैल । भृङ्गराजरसं चैकं द्विभागं काञ्जिकेन च ॥ शोभाञ्जनं भागत्रयं सर्वं तत्र विनिक्षिपेत् ॥२५॥ सौवीरकरसं पञ्च षड्भागं तुम्बि- कारसम्॥ शुण्ठी सैन्धवमम्लीका पटोलं वासकं शिवा॥२६॥ अभया सुरसा चैव तैलञ्च चतुरंशकम् ॥ पाचितं तन्तु नस्येन
०अ० ४० ] भाषाटीकासमेता । ( ४२५ ) योजयेच्च षड्बिन्दुकम्॥२७॥ तथैव मस्तकाभ्यङ्गे हितं स्यात् कर्णपूरके॥हितं वातादिजे रोगे शिरोऽत्तौं क्रिमिजे तथा ॥२८॥ भांगरेका रस एक भाग, कांजीदो भाग, हिंसजना ३ भाग॥२५॥बेरोंका रस पांच भाग तुम्बीका रस ६ भाग इनको एक जगह मिला सोंठ, सेंधानमक, अमली, परवल, वांसा, हलदी ॥२६॥ हरडै, तुलसी इनको मिला पीछे इन सब रसोंसे चतुर्थांश तैल मिला उसको पकाके उस तैलकी छह बूंद नस्यमें देनेसे ॥ २७ ॥ तथा मस्तकपर लेप करनेसे अथवा कानमें पूरनेसे वातादिक शिरोरोग तथा क्रिमियोंसे उपजा शिरके रोगका नाश होता है ॥ २८ ॥ अथ बिन्दुत्रयतैल । करञ्जबीजस्य विभीतकानां पुटेन तैलं परिस्रुत्य धीमन् ॥ बिन्दुत्रयं नस्यविधौ प्रयोज्यं जघान कुष्ठं क्रिमिजं विकारम्॥२९ करंजुवाके बीज, बहेड़ा, इनको पुटपाकमें धर तैल निकास उसकी तीन बूँद नस्यमें देवे यह तैल कुष्ठ, क्रिमिसे उपजा विकार इनका नाश करता है ॥ २९ ॥ अथ कुष्ठादिघृत । कुष्ठं च यष्टीमधुकं च नीत्वा पटोलजातीसुरसारसञ्च॥ विपा- चितं तन्नवनीतकञ्च घृतेन नूनं च सरक्तपित्ते ॥३०॥ सशर्क- रायुक्तमिदं दिवा च गव्यं प्रवृद्धप्रभवे च दोषे ॥ ३१ ॥ कूंठ, मुलहटी, परवल, जावित्री, तुलसी रस, नौनी घृत इन्होंको पकालेये पीछे इस घृतकी नस्य रक्तपित्तसे उपजें शिरके रोगमें देवे ॥३०॥ और दिनके बढ़नेके समय जो दर्द बढ़ाता है ऐसे रोगमें इस घृतमें खांड मिलाके नस्य देना हित है ॥ ३१ ॥ अथ लाक्षादितैल । लाक्षारसं चन्दनयष्टिकानां पटोलधात्रीफलशर्कराणाम् ॥दधि सदुग्धं नवनीतकञ्च विपाचिते नस्यविधौ प्रयुज्यते ॥ ३२ ॥ भ्रूदोषशङ्खक्षतजक्षये वा दिनादिवृद्धया प्रभवेऽपि दोषे ॥३३॥ लाखका रस, चंदन, मुलहटी, परवल, आंवला, खांड, दही, दूध, नौनीघृत इनको पका नस्य देनेसे ॥३२॥ भ्रूदोष कनपटीस्थानका दर्द चोटसे तथा क्षयरोगसे उपजा तथा दिनवृद्धिके अनु- सार शिरोरोग इनका नाश होता है ॥ ३३ ॥ अथ कुंकुमादिघृत । कुङ्कुमं यष्टिमधुकं कुष्ठं च शर्करासमम्॥पक्वञ्च नवनीतेन घृतं
( ४२६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- नस्ये प्रयोजयेत् ॥३४॥ नश्यन्ति पित्तजा रोगा दिनवृद्धयो- पवर्जनात् ॥ अर्द्धशीर्षविकारश्च प्रशमं याति सत्वरम् ॥३५॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने शिरोरोगचिकित्सा नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ केशर, मुलहटी, कूट, खांड, नौनीघृत इनको समान भाग ले पकाके नस्य देनेसे ॥ ३४ ॥ पित्तसे उपजे तथा दिनवृद्धि, शिरोरोग, अधसिरा इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥३५॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने शिरोरोगचिकित्सानाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ एकचत्वारिंशोऽध्यायः ४१. अथ भ्रूदोषलक्षण । आत्रेय उवाच॥अतिपठनशीलस्य सूक्ष्मवस्त्रेक्षणेन वा॥दूरालो- केन चोष्णेन भ्रूदोषश्चोपजायते ॥ १ ॥ रक्तवाताश्रितो दोषः पित्तेन सह मूर्च्छितः ॥ अन्यथा च प्रभवति नासावंशोद्भवा शिरा ॥ २ ॥ व्यथते चोष्णवेलासु शीतेन स्याद्विशेषतः ॥ नेत्रमध्ये नीलपीतमण्डलानि च पश्यति ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अत्यंत पढ़नेसे सूक्ष्म वस्त्र आदिके देखनेसे दूरसे देखनेसे गरम वस्तुके सेवनेसे भ्रूदोष रोग होजाता है ॥१॥ रक्त वातके आश्रयहुआ दोष पित्तके संग मूर्च्छित भ्रुकुटियोंमें पीड़ाकर देता है और नासिकाकी डंडीपर होनेवाली नस ॥ २ ॥ पीड़ित होती है गरमीके समय पीड़ा होती है और ठंडकमें ज्यादे पीड़ा होती है और नेत्रोंके मध्यमें नीले और पीले मंडल दीखे ॥ ३ ॥ भ्रूदोषकी चिकित्सा । तस्यादौ च क्रियां कुर्याच्छिरा वेध्या प्रयत्नतः॥पूर्वोक्तं स्वेदनं कार्य नस्ये षड्बिन्दुकादिकम् ॥ ४ ॥ देवदारु रजनी घनं शटी पुष्करं कुटजबीजमागधी ॥ कुष्ठरोध्रचविकायवासकं क्वाथितं च पुनरेव विस्रुतम् ॥ ५ ॥ तत्र गुग्गुलमपि क्षिपेत्पुनः
शुण्ठिसैन्धवफलत्रिकं हितम् ॥ चूर्णितं दधिपयोविमिश्रितं पाचितं च नवनीतक च तत् ॥६॥सिद्धमेव विदधीत शीतलं शर्करायुतमिदं च नस्यदम्॥नस्यकर्म शिरसो रुजापहं भ्रूल- लाटभुजशंखमूलकम् ॥ ७ ॥ शर्षिरोगमपि चार्द्धशीर्षकं तो- दने च विहिते न केवलम् ॥ कर्णरोगमपि वारयत्यपितैलमाशु किल साधितं सुत ॥८॥ ताम्बूलपत्रस्य रसं विडङ्गं सिन्धूद्भवं हिङ्गुगुडेन युक्तम्॥जलेन पिष्टं विहितं च नस्यं भ्रूशंखदोषांश्च क्रिमीन्निहन्ति ॥९ ॥इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने भ्रूढोषचिकित्सानामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस रोगकी आदिमें यत्नसे सिरोवेध कर्म करे और पहले कहाहुआ पसीनेका कर्म करवावे और नस्यमें षड्बिंदुक आदि तैलको देवे ॥ ४ ॥ और देवदार, हलदी, नागर- मोथा, कचूर, पोहकरमूल, कूड़ाका बीज, पीपल, कूट, लोध, चव्य, जवासा इनका काथ बना उसको छान ॥ ५॥ पीछे उसमें गूगल, सूंठ, सेंधानमक, त्रिफला इनका चूर्ण मिला दही दूध ये मिला और नौनीघृत मिला ॥ ६ ॥ पीछे इसको पकावे । सिद्ध होजावे तब शीतल कर खांड़ मिला इसकी नस्य देनेसे शिरके रोगका नाश और भ्रुकुटि, मस्तक, भुजा, कनपटीका स्थान ॥ ७ ॥ शिरोरोग, अधशिरका रोग इन और सब रोगोंकी पीडाका नाश होता है और इसीप्रकारसे सिद्ध किये हुए तेलसे कानके रोगकी पीड़ा दूर होती है और शिरके रोग हर- नेमें अति श्रेष्ठ है ॥ ८ ॥ नागर पानका रस, वायविडंग, सेंधानमक, हींग, गुड़ इनको जलमें पीस नस्य देनेसे भ्रुकुटी, कनपटी इनकी पीड़ा, क्रिमियोंसे उपजी शिरकी पीडा, इनका नाश होता है ॥ ९ ॥ इति बेरीनिवासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रदोष- चिकित्सानाम एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ४२. अथ नासारोग लक्षण । आत्रेय उवाच॥नासारोगो भवद्धीमन् क्रिमिजो दोषजः पुनः॥ रक्तजश्च भिषक्श्रेष्ठ लक्षणञ्च शृणुष्व मे ॥१॥ वाताच्छिरोऽर्त्तिः
( ४२८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शोफश्च सदोषे वातपैत्तिकम् ॥ कफजे सघनं शीतं क्रिमिजेऽसृग्- प्रवाहनम् ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे बुद्धिमान् वैद्य ! नासिकाका रोग क्रिमिन और दोषज तथा रक्तज होता है उनके लक्षणोंको सुनो ॥ १ ॥ वातसे उपजेमें शिरमें पीड़ा होती है और वातपित्तसे उपजेमें शोजा होता है, कफके नासा रोगमें कड़ाई और ठंढकपना होती है, क्रिमिसे उपजे नासारोगमें रुधिर बहता है ॥ २ ॥ अथ नासारोगचिकित्सा । नासापाके गुडशुण्ठ्या वातिके नस्यमेव च ॥ शर्कराघृतयष्ट्या च पैत्तिके नस्यमेव च ॥ ३॥ श्लैष्मिके सुरसावासारसेन विहि- तञ्च तत् ॥ विडङ्गहिङ्गुमगधाः क्रिमिदोषे हिता मताः ॥ ४ ॥ रक्तजेऽसृग्विरेकश्च शिरोरोगस्योपक्रमे ॥ ५ ॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने नासारोगचिकित्सानाम द्विच- त्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ वातके नासापाक रोगमें गुड, सूंठ इनकी नस्य देवे, पित्तके रोगमें खांड़, घृत, मुल- हटी, इनकी नस्य देनी श्रेष्ठ है ॥ ३ ॥ कफके नासारोगमें तुलसी, वांसा, इनके रसकी नस्य देनी श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ क्रिमिदोषके रोगमें वायविडंग, हींग पीपली, इनकी नस्य देनी श्रेष्ठ है, रक्तसे उपजे नासारोगमें रुधिरकी फस्त खुलावे, शिरोरोगके अनु- सार कर्म करे ॥ ५ ॥ इति बेरीनिवा० हारीतसंहिताभाषाटीकायां नासारोगचिकित्सा- नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ४३. अथ इन्द्रलुप्तरोगका लक्षण । आत्रेय उवाच ॥ केशघ्नस्य चिकित्सां तु शृणु हारीत साम्प्र- तम् ॥ रूक्षं सपाण्डुरं वातात्पित्ताद्रक्तं सदाहकम् ॥ १ ॥ कफा- न्वितं भवेत् स्निग्धं रक्तात् पाकं व्रजन्ति तत्॥सन्निपातेन सदृशं जायते सर्वलक्षणम् ॥ २ ॥
अ० ४३ ] भाषाटीकासमेता । ( ४२९ ) आत्रेयजी कहते हैं-हे हारीत ! अब इंद्रलुप्त अर्थात् बालोंका नाश होता है उसकी चिकित्सा कहते हैं, वातदोषसे रूखा और पांडुवर्ण होजाता है पित्तसे रक्तवर्ण और दाह होती है ॥ १ ॥ कफसे चिकना वर्ण होता है और रक्तदोषसे स्थान पकजाता है सन्निपातके इंद्रलु- समें सब लक्षण मिलते हैं ॥ २ ॥ इंद्रलुप्तरोगकी चिकित्सा । गुडेन सुरसाशुण्ठीमातुलुङ्गरसेन तु ॥ केशघ्ने वातसम्भूते धाव- नञ्च प्रशस्यते ॥३॥ त्रिफलावचारोहीतं गुडेनापि प्रपेषितम्॥ धावनं कफसम्भूते चैन्द्रलुप्ते प्रशस्यते ॥ ४ ॥ पैत्तिके च हितं दुग्धं नवनीतान्वितं तथा॥शिताशिवाफलं यष्टी पैत्तिके धावनं मतम् ॥५॥ भृङ्गराजरसं ग्राह्यं शृंगवेररसं तथा ॥ सौवीरकरसे- नापि तिलान् पिष्ट्वा प्रलेपनम् ॥ पश्चात्कार्यं पुरुषेण स्नानमु- ष्णेन वारिणा ॥६॥ धवार्जुनकदम्बस्य शिरीषमपि रोहितम् ॥ क्वाथमेषां शिरोदग्धं शमयेदिन्द्रलुप्तकम् ॥ ७ ॥ कुरबकस्य पुष्पेण जपायाःकुसुमेन च॥घृष्टस्य चेन्द्रलुप्तस्य कृतमेव निवा- रणम् ॥८॥ पैत्तिकानि च लिङ्गानि दृष्ट्वा दुग्धेन धावनम् ॥ शीतलानि प्रदेयानि पैत्तिकेन विधीयते ॥९॥ धत्तूरपत्राणि च मागधीनां निशाविशालागृहधूमकुष्ठम् ॥ घृतेन युक्तञ्च जलेन पिष्टं शिरःप्रलेपे क्षतवारणं स्यात् ॥१०॥पित्तैःकृते दोषयुते च रोगे पटोलपत्रं पिचुमन्दकं वा ॥ तथामलक्याः फलमेव पिष्ट्वा घृतेन खण्डेन प्रलेपनञ्च ॥ ११ ॥ निवार्य्यते मस्तकजं क्षतञ्च शिरोऽर्त्तिसंघान्विनिहन्ति चैतत् ॥ गजेन्द्रदन्तस्य मषीं गृहीत्वा प्रलेपनं वा नवनीतकेन ॥ १२ ॥ तिलार्क- भल्लातकदग्धमाषक्षारस्य लेपो नवनीतकेन॥ सर्पस्य क्षारस्य तथा प्रयोगः खल्लाटके केशचयं करोति ॥ १३ ॥ इत्यात्रेय- भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने इन्द्रलुप्तचिकित्सा नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( ४३० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- वातसे उपजे इन्द्रलुप्त रोगमें गुड, तुलसी, सूंठ, बिजौराका रस, इनका लेप करना चाहिये ॥ ३ ॥ त्रिफला, वच, बहेडा, गुड़, इनको पीस कफसे उपजे इंद्रलुप्तको धोवना श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ पित्तके इंद्रलुप्तमें दूध, नौनीघृत, मिसरी, आंवला, मुलहटीको पीस धोना श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥ भंगराका रस, अदरखका रस, कांजीका रस, इन्होंमें तिलोंको पीस लेप कर पीछे गरम जलसे स्नान करे ॥ ६ ॥ धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, शिरस, बहेडा, इनका काथ बना धोनेसे शिरके दाद, इन्द्रलुप्त इनकी शांति होती है ॥ ७ ॥ रक्तकोरंटा, जासवंद, इनके पुष्पों- को घिस लेप करनेसे इन्द्रलुप्तका नाश होता है॥८॥ पित्तसे उपजे इंद्रलुप्तमें दूधसे धोवना श्रेष्ठ है और शीतल वस्तु देवे पित्तको करनेवाले इलाज नहीं करे ॥ ९ ॥ धतूराके पत्ते, पीपल, हलदी, इंद्रायण, वरका धूवां, कूठ इनको जलमें पीस घृतमें मिला शिरपे लेप करनेसे इन्द्रलुप्तक नाश होता है ॥ १० ॥ पित्त दोषसे उपजे इंद्रलुप्त रोगमें परवलके पत्ते, नींव, आँवलाका फल, इनको पीस घृत और खांड मिला लेप करनेसे ॥ ११ ॥ मस्तकपै उपजा केशनाशरोग दूर होता है और यह लेप शिरकी पीडाओके समूहोंका नाश करता है और हस्ती दांतको फूकि उसकी स्याहीको नौनीघृतमें मिला लेप करनेसे ॥ १२ ॥ अथवा तिल, आक, भिलावा, उड़द इनको दग्ध करि इनके खारको नौनीघृतमें मिला लेप करनेसे तथा विधिसे निकासा हुआ सर्पके खारका लेप करनेसे गंजे शिरपे केशोंके समूह बढ़ जाते हैं ॥ १३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्त० हारीतसंहिताभाषाटीकायां इन्द्रलुप्तचिकित्सानाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ४४. अथ कर्णरोगलक्षण । आत्रेय उवाच ॥ शेषेण वा तोयभृतेन वापि मलेन वा चाति भवेद्रुजा च ॥ उच्छ्वासरोधाद्भवते तथापि वातादिकैर्वा कुपितै- रथापि ॥ १ ॥ संसर्गदोषैरपि सर्वदोषैः क्रिमिव्रणेनापि तथैव चान्या ॥ संजायते कर्णरुजा नरस्य शृणोति तेनापि बहुस्वनां- श्च ॥२॥निःस्वानमेघध्वनिदन्तशब्दान् शूलं सदाहं च शिरो- व्यथा च ॥ वेणुस्वनं वत्स शृणोति सर्वं पित्तेन तं विद्धि भिषग्वरिष्ठ ॥ ३ ॥ तथा च मूर्च्छा प्रतनौति शब्दं मेघस्वनं वा कफजे शृणोति ॥ ४ ॥ क्रिमिदोषे स्रवेत्पूयं सरक्तं वाति
अ० ४४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४३१ ) सत्तम ॥ तथाचैवाभिघातेन जायते तीव्रवेदना ॥ ५ ॥ क्षतेन पूयं स्रवते बाल्याद्भवति चापरः ॥ तश्चापि लूतिदोषेण जायते कर्णजा रुजा ॥ ६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--कानमें शोथ हो, जल शेष रहजावे और मैल हो उससे अति पीडा होनेसे ऊंचे श्वासके रोकनेसे तथा वातादिक दोषोंके कुपित होनेसे संसर्गदोषोंसे, सन्निपातसे अथवा क्रिमियोंसे उपजे व्रण होनेसे मनुष्यके कानमें अत्यंत पीडा हो जाती है उससे बहुतसे शब्दोंको सुनता है॥२॥शब्दोंको मेघके गर्जनके समान और दांतोंके चाबनेके शब्दके समान सुनै शूल हो दाहहो शिरमें पीडा हो वह सब कुछ वीनके शब्दके समान सुनता है हे उत्तम वैद्य ! उसरोगको पित्तसे उपजा जानो ॥३॥शब्द सुननेसे मूर्च्छासीहो और मेघके गर्जनेसरीखा शब्द सुनै ये कफसे उपजे कर्णरोगके लक्षण हैं ॥ ४ ॥ क्रिमिदोषसे उपजे कर्णरोगमें रक्त सहित पीव गिरे और चोटसे उपजेमें तीव्र पीडा होती है ॥५॥ क्षतसे उपजेमें पीव गिरे और बालअवस्थामें लूतिरोगसे उपजे कर्णरोगमें पीडा उत्पन्न होती है ॥ ६ ॥ अथ कर्णरोगकी चिकित्सा । न कर्णरोगे जलपूरणञ्च न चूर्णमेतत्कथितं विधिज्ञैः॥तैलं हितं स्वेदनमेव कर्णे सबाष्पबिन्दुश्च हितो मतश्च ॥ ७ ॥ सैन्धवं समुद्रफेनश्च सूक्ष्मचूर्णं च कारयेत् ॥ सौवीरकरसेनापि वातिके कर्णपूरणम् ॥ ८ ॥ आर्द्रसौवीररसं शुण्ठीसैन्धवगुग्गुलम् ॥ माषकुलमाषरसेन तैलं पक्वातिचोष्णकम् ॥ ९ ॥ कटुतुम्बेन- धार्येत कर्णरोगे प्रशस्यते ॥१०॥ यष्टीमधुकुष्ठमरिष्टपत्रं निशा विशालासुमनःप्रवालाः॥विपाचितं कर्णभवे च शूले सपैत्तिके वा घृतमेव शस्तम् ॥ ११॥ ब्राह्मीरसं सैन्धवकं विडङ्गं सभृङ्गराजस्य घृतेन युक्तम्॥तथैव सौवीररसञ्च पथ्या शृतं च वस्त्रे परिपूर्ण- मेतत् ॥ १२ ॥ हितं भवेत्तच्छ्रुतिपूरणाय पूयं सरक्तं क्रिमिजं निहन्ति ॥ १३ ॥ सर्वे प्रोक्ताः शिरोरोगास्तैलानि च घृतानि च ॥ जात्यादिकान्वा युञ्जीत शिरोरोगविदांवरः॥१४॥वात- १ 'सौवीरं काञ्जिके स्रोतोऽञ्जने च बदरीफले' इति मेदिनी ।
( ४३२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- हारीणि पथ्यानि विदाहीनि गुरुणि च ॥ १५ ॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने कर्णरोगचिकित्सानाम चतुश्चत्वा- रिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ कानके रोगमें जल पूरना और चूर्ण पूरना हित नहीं कहा है। कानरोगमें तैल पूरना और पसीना दिवाना हित है और भाफ दिवानेका कर्म हित कहा है ॥ ७ ॥ सेंधानमक, समुद्रफेन, इनका बारीक चूर्ण बना कांजीके रसमें मिला वातसे उपजे कानके रोगमें हित है ॥ ८ ॥ ओदेवेरोंका रस, सोंठ, सेंध्वानमक, गूगल, उड़दोंके बाकले इनमें तेलको पका गरम गरम ॥ ९ ॥ उस तेलके पुरानेसे कानका रोग दूर होता है इस तेलको कडुई तुंबीमें घालके घरे ॥ १० ॥ मुलहटी, कूंठ, नींवके पत्ते, हलदी, इन्द्रायणके पुष्प तथा कोमल २ पत्ते, इनमें घृतको पका पित्तसे उपजे कर्णशूलमें पूरण करना श्रेष्ठ है ॥ ११ ॥ ब्राह्मीका रस सेंधानमक, वायविडंग, मंगरेका रस, घृत, कांजीका रस, हरडै, इनको पका पीछे वस्त्रमें छान कानमें पूरनेसे ॥ १२ ॥ क्रिमियोंसे उपजी कानमें रक्तसहित पीवका नाश होता है और कानमें पूरन करनेमें यह हित कहा है ॥ १३ ॥ जितने शिरके रोग कहे हैं उनमें तैल और घृतमें सिद्ध किये हुए औषधोंको बरते ॥ १४ ॥ वातको हरनेवाले विदाही तथा भारी ऐसे भोजन पथ्य कहे हैं ॥ १५ ॥ इति चेरीनिवासिबुधाशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने कर्णरोगचिकित्सानाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ४५. 𑁍⊱•••⊰𑁍⊱•••⊰𑁍 अथ नेत्ररोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच॥ उष्णतिक्षारकटुकैरभिघातेन वा पुनः॥ सूक्ष्म- वस्त्रेक्षणेनापि दोषाः कुप्यन्ति नेत्रजाः॥ १॥ सहजा य पराजेया वक्ष्यामि शृणु लक्षणम्॥ रूक्षः कण्डूश्च तोदश्च शुष्कशीतास्रस- न्ततिः ॥ २ ॥ वातिकं तं विजानीयात्पैत्तिकं शृण्वतः परम् ॥ ॥३॥ सरक्ते सदाहे नेत्र उष्णस्रावश्च पैत्तिके ॥ शोफकण्डू सन्नि- पाते शीतजाड्ये कफात्मके ॥४॥ द्वन्द्वजो मिश्रालिङ्गैश्च सर्वैस्तैः सान्निपातिके ॥ एतद्धि लक्षणं ज्ञात्वा चोपचारं शृणुष्व मे ॥५॥
अ० ४९] भाषाटीकासमेता । (४३३) आत्रेयजी कहते हैं-गरम, अतिखारा, चर्चरा ऐसे भोजनोंसे तथा अभिघातसे और सूक्ष्म वस्त्र देखनेसे नेत्रमें रहनेवाले दोष कुपित हो जाते हैं ॥ १ ॥ जो स्वभावसे ही उत्पन्न होते हैं वे कष्टसाध्य होते हैं । अब उनके लक्षणोंको सुनो । नेत्र रूखा हो, खाज हो, पीडा हो, शुष्क हो और शीतल रुधिर झिरे ॥ २ ॥ वह वातका नेत्ररोग जानना । अब पित्तके लक्षणोंको सुन ॥ ३ ॥ पित्तसे उपजे नेत्ररोगमें गरम २ जल गिरे और लाल तथा दाह सहित नेत्र हों,कफके नेत्ररोगमें शीतल और जडता हो, सन्निपातके नेत्ररोगमें शोजा और खाज होती है॥४॥दो दोषोंसे उपजे नेत्ररोगमें मिले हुए लक्षण होते हैं और सन्निपातके नेत्ररोगमें सब लक्षण मिलते हैं, ऐसे विलक्षण रोगको जानके उसकी चिकित्साको मुझसे सुनो ॥ ५ ॥ अथ नेत्ररोगकी चिकित्सा । शुण्ठीसुराह्वसुरसाः सह काञ्जिकेन चोष्णेन धावनमिदं सह पै- त्तिकेच॥श्लेष्मोद्भवे त्रिफलकल्कमिदं समूत्रं शस्तं जनैश्च कथितं न विचिन्तनीयम् ॥ ६ ॥ शुण्ठी शटी च रजनी त्रिफला सनिम्बा पत्राणि सैन्धवयुतानि तुषाम्लकेन ॥ शस्तं वदन्ति नयनेषु स- सन्निपाते रक्तोद्भवे च सरुजे च तथा च शस्तम् ॥७॥ फलत्रिकं चारुनिशासु धूमो वचासु वर्षाभवसैन्धवेन ॥ प्रलेपनं श्लेष्मभवे विकारे सवातिके वा हितमेव शस्तम् ॥८॥ शुण्ठीसैन्धवतक्रेण ताम्रभाण्डे विघर्षितम् ॥ अपामार्गस्य मूलं वा मूलं धत्तूरकस्य वा ॥ ९ ॥ अञ्जनञ्च हितं तेषां वातनेत्रामयापहम् ॥१०॥ दुग्धो- त्पन्नं नवनीतं यष्टी निम्बस्तिलाश्च संयोज्याः ॥ त्रिफला गुडसं- युक्ता लेपनं कफनेत्ररोगघ्नम् ॥ ११ ॥ शुण्ठी सैन्धवतुत्थं मा- गधिका ताम्रभाजने घृष्टम् ॥ दध्ना घृतेनाञ्जनकं निहन्ति सर्वांश्च नेत्ररोगान्वै ॥ १२ ॥ वातपित्तकफदोषसम्भवान्नेत्रयोर्बहुव्यथां विनाशकः ॥ एक एव हरति प्रयोजितः शिग्रुपल्लवरसः स- माक्षिकः ॥ १३ ॥ सोंठ, देवदार, तुलसी इनको कांजीमें काथ बना गरम २ से पित्तके उपजे नेत्ररोगमें नेत्रोंका धोवना श्रेष्ठ है और कफसे उपजे नेत्ररोगमें त्रिफलाके कल्कको गोमूत्रमें पका धोवना श्रेष्ठ है ऐसे अन्य वैद्योंने भी कहा है ॥ ६ ॥ सोंठ, कचूर, हलदी, त्रिफला, नीमके पत्ते, सेंधानमक, इनको जवोंकी कांजीमें सिद्ध कर सन्निपातसे उपजे नेत्ररोग तथा रक्तसे उपजे हुए पीडासहित २८