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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

१० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

वैशम्पायन उवाच

प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।
यथा ससर्ज भूतानि तथा शृणु महीपते ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी बोले--राजन् ! पहले स्वयम्भू ब्रह्माजीने दक्षको आज्ञा दी कि 'तुम प्रजाओंकी सृष्टि करो'। उस समय दक्षने (जरायुज आदि) प्राणियोंकी सृष्टि जिस प्रकार की थी, उसे सुनो ॥ २ ॥

मानसान्येव भूतानि पूर्वमेवासृजत् प्रभुः।
ऋषीन् देवान् सगन्धर्वांस्तुरगानथ राक्षसान्।
यक्षभूतपिशाचांश्च वयःपशुसरीसृपान् ॥ ३ ॥

प्रभु दक्षने पहले ऋषि, देवता, गन्धर्व, असुर, राक्षस, यक्ष, भूत, पिशाच, पशु, पक्षी और सर्पोंकी मानसी सृष्टि रची अर्थात् इनको अपने संकल्पमात्रसे ही उत्पन्न कर दिया ॥

यदास्य तास्तु मानस्यो न व्यवर्द्धन्त वै प्रजाः।
अपध्याता भगवता महादेवेन धीमता ॥ ४ ॥
ततः संचिन्त्य तु पुनः प्रजाहतोः प्रजापतिः।
स मैथुनेन धर्मेण सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥ ५ ॥
असिक्नीमावहत् पत्नीं वीरणस्य प्रजापतेः।
सुतां सुतपसा युक्तां महतीं लोकधारिणीम् ॥ ६ ॥

परंतु (पूर्वकल्पके वैरको स्मरणकर) बुद्धिमान् भगवान् महादेवने जब यह विचार किया कि दक्षकी मानसी प्रजाएँ न बढ़ें, और तदनुसार जब उनकी मनसे उत्पन्न की हुई प्रजाएँ अधिक उन्नति न कर सकीं, तब दक्ष प्रजापति विचारमें पड़ गये और फिर उन्होंने प्रजाकी वृद्धि करनेके लिये मैथुनधर्मसे अनेक प्रकारकी प्रजाओंको रचनेका विचार किया। इस विचारके अनुसार वे परम तप करनेके कारण संसारको धारण करनेमें समर्थ वीरण प्रजापतिकी महामहिम पुत्री असिक्नीको पत्नीरूपमें विवाह कर लाये ॥ ४-६ ॥

अथ पुत्रसहस्राणि वीरण्यां पञ्च वीर्यवान्।
असिक्न्यां जनयामास दक्ष एव प्रजापतिः ॥ ७ ॥

इसके बाद वीर्यवान् दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्री असिक्नीमें पाँच हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ७ ॥

तांस्तु दृष्ट्वा महाभागान् संविवर्धयिषून् प्रजाः।
देवर्षिः प्रियसंचारो नारदः प्राब्रवीदिदम्।
नाशाय वचनं तेषां शापायैवात्मनस्तथा ॥ ८ ॥

परंतु उन महाभाग्यवान् दक्षपुत्रोंको प्रजाकी वृद्धि करनेके लिये उत्सुक देख प्रियवादी देवर्षि नारदजीने उनको (ज्ञानका अधिकारी समझकर आत्मज्ञानका) उपदेश दिया। नारदजीके उस वचनसे दक्षपुत्र नष्ट हो गये (अथवा उनकी संसारमें आसक्ति नष्ट हो गयी), परंतु नारदजीका यह ज्ञानोपदेश देना स्वयं शाप पानेमें ही एक कारण बन गया ॥ ८ ॥

यं कश्यपः सुतवरं परमेष्ठी व्यजीजनत्।
दक्षस्य वै दुहितरि दक्षशापभयान्मुनिः ॥ ९ ॥

ब्रह्माजीने जिन श्रेष्ठ पुत्र नारदको उत्पन्न किया था, उनको ही कश्यप मुनिने दक्षके शापके भयसे (दक्षकी पत्नीकी छोटी बहिन अतएव) उनकी (पुत्रीके समान) कन्यामें उत्पन्न किया था ॥ ९ ॥

पूर्वं स हि समुत्पन्नो नारदः परमेष्ठिना।
असिक्न्यामथ वीरण्यां भूयो देवर्षिसत्तमः।
तं भूयो जनयामास पितेव मुनिपुङ्गवम् ॥ १० ॥

नारदजी पहले ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए थे, फिर वे ही देवर्षिसत्तम नारद वीरणकी पुत्री असिक्नी (की छोटी बहिन) में उत्पन्न हुए थे। उन मुनिपुङ्गव नारदजीको कश्यपने ब्रह्माजीके समान ही फिर प्रकट किया था ॥ १० ॥

तेन दक्षस्य पुत्रा वै हर्यश्वा इति विश्रुताः।
निर्मथ्य नाशिताः सर्वे विधिना च न संशयः ॥ ११ ॥

(इस घटनाको स्पष्ट करते हैं--) दक्षके हर्यश्व नामसे प्रसिद्ध (जो पाँच हजार) पुत्र थे, नारदजीने उनको शास्त्रोक्त रीतिसे देहाभिमानसे मुक्त कर इस संसारसे नष्ट कर दिया था (अर्थात् वे सब नारदजीसे चेतावनी पाकर संसारको त्याग परमात्माकी खोज करनेके लिये वनमें चले गये), इसमें कुछ संदेह नहीं है ॥ ११ ॥

तस्योद्यतस्तदा दक्षो नाशायमितविक्रमः।
महर्षीन् पुरतः कृत्वा याचितः परमेष्ठिना ॥ १२ ॥

तब अनुपम पराक्रमी दक्ष प्रजापति नारदजीको नष्ट करनेके लिये उद्यत हो गये। उस समय ब्रह्माजीने मरीचि आदि महर्षियोंके साथ जाकर दक्षसे ऐसा न करनेके लिये प्रार्थना की ॥

ततोऽभिसंधिं चक्रुस्ते दक्षस्तु परमेष्ठिना।
कन्यायां नारदो मह्यं तव पुत्रो भवेदिति ॥ १३ ॥

तब महर्षियोंने दक्ष और ब्रह्माजीमें संधि करा दी। दक्षने कहा कि 'आपका पुत्र नारद मेरी पुत्री (अर्थात् छोटी साली) का पुत्र बनकर उत्पन्न हो' ॥ १३ ॥

ततो दक्षस्तु तां प्रादात् कन्यां वै परमेष्ठिने।
स तस्यां नारदो जज्ञे दक्षशापभयादृषिः ॥ १४ ॥

तब दक्षने प्रजापति कश्यपको (तेरह कन्याएँ अर्पण करते समय) उस कन्याका दान कर दिया था। इस प्रकार दक्षके शापके भयसे नारद ऋषि उस कन्यासे फिर उत्पन्न हुए थे ॥

जनमेजय उवाच

कथं विनाशिताः पुत्रा नारदेन महर्षिणा।
प्रजापतेर्द्विजश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १५ ॥

हरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः ११


**जनमेजयन पृच्छा—**द्विजश्रेष्ठ ! महर्षि नारदने प्रजापति दक्षके पुत्रोंको किस प्रकार नष्ट किया था ? इसको मैं स्पष्ट-रूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

दक्षस्य पुत्रा हर्यश्वा विवर्धयिषवः प्रजाः ।
समागता महावीर्या नारदस्तानुवाच ह ॥ १६ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन् ! दक्षके हर्यश्व नामक पुत्र महावीर्यवान् थे, जब वे प्रजाओंकी वृद्धिका विचार करनेके लिये उद्यत हुए, तब नारदजीने उनसे कहा—॥ १६ ॥

बालिशा बत यूयं वै नास्या जानीथ वै भुवः ।
प्रमाणं स्रष्टुकामाः स्म प्रजाः प्राचेतसात्मजाः ।
अन्तरूर्ध्वमधश्चैव कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः ॥ १७ ॥

‘प्राचेतस (दक्ष) के पुत्रो ! खेदके साथ कहना पड़ता है कि तुम बड़े नादान हो। तुम्हें प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई है; किंतु तुम इतना भी नहीं जानते कि जहाँ सृष्टि करनी है, उस पृथ्वीकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है ? यह ऊपर-नीचे और भीतरसे कैसी है ? ऐसी दशामें तुमलोग प्रजाओंकी सृष्टि कैसे करोगे ?’ ॥ १७ ॥

ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम् ।
प्रमाणं द्रष्टुकामास्ते गताः प्राचेतसात्मजाः ॥ १८ ॥

नारदजीकी इस बातको सुनकर वे प्राचेतस दक्षके पुत्र (इस पृथ्वीका) प्रमाण अर्थात् माप देखनेके लिये सब दिशाओंकी ओर चल दिये ॥ १८ ॥

वायोरनशनं प्राप्य गतास्ते वै पराभवम् ।
अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः ॥ १९ ॥

प्राणवायुके लिये आहार न पाकर वे सबके सब पराभव (विनाश) को प्राप्त हो गये। जैसे नदियाँ समुद्रमें मिल जानेपर फिर वहाँसे पीछे नहीं लौटती हैं, उसी प्रकार वे जाकर अबतक नहीं लौटे ॥ १९ ॥

हर्यश्वेष्वथ नष्टेषु दक्षः प्राचेतसः पुनः ।
वैरण्यामेव पुत्राणां सहस्रमसृजत् प्रभुः ॥ २० ॥

प्रचेताओँके पुत्र प्रभु दक्षने हर्यश्वोंके नष्ट हो जानेपर वैरण-की पुत्रीमे ही फिर सहस्र पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ २० ॥

विवर्धयिषवस्ते तु शबलाश्वाः प्रजास्तदा ।
पूर्वोक्तं वचनं तात नारदेनैव नोदिताः ॥ २१ ॥

तात ! वे दक्षके पुत्र शबलाश्व जब प्रजाकी वृद्धिके लिये इच्छुक हुए, तब नारदजीने पूर्वोक्त वचन कहकर उनको भी पृथ्वीका प्रमाण जाननेके लिये प्रेरित किया ॥ २१ ॥

अन्योन्यमूचुस्ते सर्वे सम्यगाह महामुनिः ।
भ्रातॄणां पदवीं ज्ञातुं गन्तव्यं नात्र संशयः ॥ २२ ॥

तब वे सब आपसमें कहने लगे—‘महामुनि नारदजी ठीक कहते हैं, अपने भाइयोंके मार्गको जाननेके लिये निःसंदेह हमें भी अवश्य प्रयत्न करना चाहिये ॥ २२ ॥

ज्ञात्वा प्रमाणं पृथ्व्याश्च सुखं स्रक्ष्यामहे प्रजाः ।
एकाग्राः स्वस्थ्यमनसा यथावदनुपूर्वशः ॥ २३ ॥

‘हम पृथ्वीके प्रमाणको जानकर एकाग्र और स्वस्थ-चित्तसे सुखपूर्वक प्रजाओंकी क्रमानुसार सृष्टि करेंगे ॥ २३ ॥

तेऽपि तेनैव मार्गेण प्रयाताः सर्वतोदिशम् ।
अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः ॥ २४ ॥

ऐसा निश्चय करके वे भी उसी मार्गसे चारों दिशाओंकी ओर चल दिये और समुद्रोंसे उनमें मिली हुई नदियोंके समान अभीतक नहीं लौटे ॥ २४ ॥

नष्टेषु शबलाश्वेषु दक्षः क्रुद्धोऽवदद् वचः ।
नारदं नाशमेहीति गर्भवासं वसेति च ॥ २५ ॥

शबलाश्वोंके भी नष्ट हो जानेपर दक्ष प्रजापतिने क्रोधमें भरकर, नारदजीसे यह बात कही कि ‘तुम्हारी देह नष्ट हो जाय और तुम फिर गर्भमें निवास करो’ ॥ २५ ॥

तदाप्रभृति वै भ्राता भ्रातुरन्वेषणं नृप ।
प्रयातो नश्यति क्षिप्रं तन्न कार्यं विपश्चिता ॥ २६ ॥

राजन् ! उस दिनसे जो भाई भाईको खोजनेके लिये जाता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है, अतएव विद्वान्को ऐसा न करना चाहिये अर्थात् भाईको ढूँढ़नेके लिये भाईको नहीं जाना चाहिये ॥ २६ ॥

तांश्चापि नष्टान् विज्ञाय पुत्रान् दक्षः प्रजापतिः।
षष्टिं भूयोऽसृजत् कन्या वीरण्यामिति नः श्रुतम् ॥

हमने सुना है कि अपने उन पुत्रोंको भी नष्ट हुआ जान-कर दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्रीमें फिर साठ कन्याओंको उत्पन्न किया (क्योंकि कन्याएँ स्त्री होनेसे नारदजीके आत्म-ज्ञानके उपदेशकी पात्र नहीं थीं ) ॥ २७ ॥

तास्तदा प्रतिजग्राह भार्यार्थे कश्यपः प्रभुः ।
सोमो धर्मश्च कौरव्य तथैवान्ये महर्षयः ॥ २८ ॥

कुरुकुलोत्पन्न जनमेजय ! उन (मेसे कुछ कन्याओं) को प्रभु कश्यपजीने अपनी पत्नीके रूपमे स्वीकार कर लिया एवं चन्द्रमा, धर्म तथा दूसरे महर्षियोंने भी उन (मेसे कितनी ही कन्याओ) को अपनी पत्नीके रूपमें स्वीकार कर लिया ॥ २८ ॥

ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सप्तविंशतिं सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने ॥ २९ ॥
द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा ।
द्वे कृशाश्वाय विदुषे तासां नामानि मे शृणु ॥ ३० ॥

दक्षने धर्मको दस, कश्यपजीको तेरह, चन्द्रमाको सत्ताईस, अरिष्टनेमिको चार, भृगुपुत्रको दो, अङ्गिराको दो

१२श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंश

और विद्वान् कृशाश्व ऋषिको दो कन्याएँ दीं, उनके नामों-
को मुझसे सुनो—॥ २९-३० ॥
अरुन्धती वसुर्यामी लम्बा भानुर्मरुत्वती ।
संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भारत ।
धर्मपत्न्यो दश त्वेतास्तास्वपत्यानि मे शृणु ॥ ३१ ॥
भरतवंशी राजन् ! अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या तथा विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियां हैं। इनमें जो संतान उत्पन्न हुई, उनके नामोंको मुझसे सुनो—॥ ३१ ॥
विश्वेदेवाश्च विश्वायाः साध्यान् साध्या व्यजायत ।
मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा ॥ ३२ ॥
विश्वाने विश्वेदेव नामक पुत्रोंको और साध्याने साध्य नामवाले पुत्रोंको उत्पन्न किया, मरुत्वतीसे मरुत्वान् और वसुसे वसु प्रकट हुए ॥ ३२ ॥
भानोस्तु भानवस्तात मुहूर्ताया मुहूर्तजाः ॥ ३३ ॥
और तात ! भानुसे भानुदेवता और मुहूर्तासे ( क्षण, लव आदि कालाभिमानी देवता ) मुहूर्तज उत्पन्न हुए ॥३३॥
लम्बायाश्चैव घोषोऽथ नागवीथी च यामिजा ।
पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यां व्यजायत ॥ ३४ ॥
घोष नामक ( मन्त्राभिमानी ) देवता लम्बासे उत्पन्न हुआ तथा यामीसे ( स्वर्गाभिमानिनी ) नागवीथी उत्पन्न हुई तथा अरुन्धतीमें ( धृत, पशु, औषध आदि ) सब पृथ्वीके विषय उत्पन्न हुए ॥ ३४ ॥
संकल्पायास्तु सर्वात्मा जज्ञे संकल्प एव हि ।
नागवीथ्याश्च यामिन्या वृषलम्बा व्यजायत ॥ ३५ ॥
तथा संकल्पासे सर्वात्मा संकल्प अर्थात् मानसक्रियाभिमानी देवता उत्पन्न हुआ और यामिपुत्री नागवीथीसे वृषलम्बा ( कालान्तरमें फलवृष्टि करनेवाले धर्म या ईश्वरका अवलम्बन करनेवाला देवता ) उत्पन्न हुआ ॥ ३५ ॥
या राजन् सोमपत्न्यस्तु दक्षः प्राचेतसो ददौ ।
सर्वा नक्षत्रनामन्यस्ता ज्योतिषे परिकीर्तिताः ॥ ३६ ॥
राजन् ! प्राचेतस दक्षने चन्द्रमाको जो कन्याएँ दी थीं, वे सब सोमपत्नियां नक्षत्रोंके नामसे ज्योतिषशास्त्रमे प्रसिद्ध हैं ॥ ३६ ॥
ये त्वन्ये ख्यातिमन्तो वै देवा ज्योतिःपुरोगमाः ।
वसवोऽष्टौ समाख्यातास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ॥३७॥
अब जो ज्योति आदि दूसरे प्रसिद्ध देवता हैं और जो विख्यात आठ वसु देवता हैं, उनका विस्तृत वर्णन मैं आपसे करूँगा ॥ ३७ ॥
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलानलौ ।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवो नामभिः स्मृताः ॥ ३८ ॥
आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास (—ये आठ ) वसु नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ३८ ॥
आपस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः शान्तो मुनिस्तथा ।
ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः ॥ ३९ ॥
आपके वैतण्ड्य, श्रम, शान्त और मुनिनामक पुत्र उत्पन्न हुए और संसारको अपने अंकुशमें रखनेवाले भगवान् काल ध्रुवके पुत्र हैं ॥ ३९ ॥
सोमस्य भगवान् वर्चो वर्चस्वी येन जायते ।
धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा ।
मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा ॥ ४० ॥
और सोम नामक वसुके पुत्र भगवान् वर्चो हैं, जिन ( का पूजन करने ) से मनुष्य वर्चस्वी हो जाता है। धर वसुके द्रविण और हुतहव्यवह नामक दो पुत्र हुए तथा ( धरकी दूसरी पत्नी ) मनोहरासे शिशिर, प्राण और रमण नामक पुत्र हुए ॥ ४० ॥
अनिलस्य शिवा भार्या यस्याः पुत्रो मनोजवः ।
अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥ ४१ ॥
अनिलकी पत्नीका नाम शिवा था, उसके पुत्र मनोजव और अविज्ञातगति थे, ये दोनों अनिलके पुत्र थे ॥ ४१ ॥
अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे श्रियान्वितः ।
तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः ॥ ४२ ॥
अग्निके पुत्र श्रीमान् कुमार सरकंडोंके झुंडमें प्रकट हुए थे । उनके पीछे शाख, विशाख और नैगमेय हुए ( इस प्रकार अग्निके चार पुत्र थे ) ॥ ४२ ॥
अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्तिकेय इति स्मृतः ।
स्कन्दः सनत्कुमारश्च सृष्टः पादेन तेजसः ॥ ४३ ॥
(ये कुमार ही) कृत्तिकाओंकी संतान कार्तिकेय (और ) स्कन्द कहलाते हैं और ये ही सनत्कुमार हैं। अग्निने इन्हें अपने तेजके एक अंशसे प्रकट किया है ( और शाख आदि तीनको भी अपने तेजके एक-एक चौथाई अंशसे प्रकट किया है । छान्दोग्य-उपनिषद्में लिखा है कि 'तं स्कन्द इत्याचक्षते' यह सनत्कुमार ही स्कन्द हैं। इससे प्रतीत होता है कि सनत्कुमार इनका उपनाम है ) ॥ ४३ ॥
प्रत्यूषस्य विदुः पुत्रमृषिं नाम्ना च देवलम् ।
द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ तपस्विनौ ॥ ४४ ॥
प्रत्यूषके पुत्रका नाम देवल और ( पुत्रीका नाम ) ऋषि था। देवलके भी दो पुत्र थे, जो क्षमावान् तथा तपस्वी थे ॥ ४४ ॥

हरिवंशपर्व] तृतीयोऽध्यायः ३७


बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी।
योगसिद्धा जगत् कृत्स्नमसक्ता विचचार ह॥ ४५॥

बृहस्पतिकी बहिनका नाम ब्रह्मचारिणी था, वह योग-सिद्ध श्रेष्ठ स्त्री आसक्तिको त्यागकर सारे संसारमें विचरण किया करती थी॥ ४५॥

प्रभासस्य च सा भार्या वसूनामष्टमस्य च।
विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः॥ ४६॥

वह प्रभास नामवाले आठवें वसुकी भार्या बन गयी। उसके गर्भसे विश्वकर्मा नामवाले महाभाग्यवान् प्रजापति उत्पन्न हुए॥ ४६॥

कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः।
भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः॥ ४७॥

उन्होंने हजारों शिल्पो (कलाओं) की रचना की है और वे देवताओंके बढ़ई हैं तथा वे शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्मा सब आभूषणोंके बनानेवाले हैं॥ ४७॥

यः सर्वासां विमानानि देवतानां चकार ह।
मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः॥ ४८॥

उन्होंने सब देवताओंके विमानोंको बनाया है और उन महात्माके शिल्पसे मनुष्य भी अपनी आजीविका चलाते हैं॥

सुरभी कश्यपाद् रुद्रानैकादश विनिर्ममे।
महादेवप्रसादेन तपसा भाविता सती॥ ४९॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च भारत।
त्वष्टुश्चैवात्मजःश्रीमान् विश्वरूपो महायशाः॥ ५०॥

(अब दक्षने कश्यप मुनिको जो तेरह कन्याएँ दी थीं, उनमेंसे सुरभिकी संतानका वर्णन करते हैं—) तपमें मग्न हुई सुरभिने महादेवजीसे वर पाकर कश्यपजीके द्वारा ग्यारह रुद्रोंको उत्पन्न किया था। भरतवंशी राजन्! अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा तथा रुद्र—ये सब सुरभिकी ही संतानें हैं। त्वष्टाके महा-यशस्वी और श्रीमान् पुत्रका नाम विश्वरूप था॥ ४९-५०॥

हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः।
वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा॥ ५१॥
मृगव्याधश्च सर्पिश्च कपाली च विशांपते।
एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ ५२॥

राजन्! हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्प और कपाली—ये तीनों भुवनोंके ईश्वर ग्यारह रुद्र कहे गये हैं॥ ५१-५२॥

शतं त्वेवं समाख्यातं रुद्राणाममितौजसाम्।
पुराणे भरतश्रेष्ठ यैर्व्याप्ताः सचराचराः॥ ५३॥
लोका भरतशार्दूल कश्यपस्य निबोध मे।
अदितिर्दितिर्दनुश्चैव अरिष्टा सुरसा खशा॥ ५४॥
सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा।
कद्रुर्मुनिश्श्व राजेन्द्र तारूपत्यानि मे शृणु॥ ५५॥

भरतश्रेष्ठ! पुराणोंमें इन अमित पराक्रमी रुद्रोंके सैकड़ों रूप बताये गये हैं। इनसे चराचर लोक भरे हुए हैं। भरतशार्दूल! अब तुम मुझसे कश्यपकी (स्त्रियोंके नाम) सुनो। (वे हैं—) अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खशा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि। राजेन्द्र! अब इनसे जो संतानें उत्पन्न हुईं, उनका वर्णन मुझसे सुनो—॥ ५३-५५॥

पूर्वमन्वन्तरे श्रेष्ठा द्वादशासन् सुरोत्तमाः।
तुषिता नाम तेऽन्योन्यमूचुर्वैवस्वतेऽन्तरे॥ ५६॥
उपस्थितेऽतियशसि चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।
हितार्थं सर्वसत्त्वानां समागम्य परस्परम्॥ ५७॥

पहले चाक्षुष मन्वन्तरमें तुषित नामवाले बारह श्रेष्ठ देवता थे। वे उस अत्यन्त यशस्वी मन्वन्तरका अन्त आनेपर वैवस्वत मन्वन्तरके आरम्भमें सब प्राणियोंका हित करनेके लिये परस्पर मिलकर कहने लगे—॥ ५६-५७॥

आगच्छत द्रुतं देवा अदितिं सम्प्रविश्य वै।
मन्वन्तरे प्रसूयामस्तन्नः श्रेयो भविष्यति॥ ५८॥

'देवताओ! शीघ्र आओ! हम अदितिमें प्रवेश करके अगले (वैवस्वत) मन्वन्तरमें उत्पन्न होंगे, यह कार्य हमारे लिये श्रेयस्कर होगा'॥ ५८॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।
मारीचात् कश्यपाज्जातास्तेऽदित्या दक्षकन्यया॥ ५९॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—वे सभी देवता चाक्षुष मन्वन्तरके अन्तमें इस प्रकार वार्तालाप कर मरीचिपुत्र कश्यप-से दक्षकी कन्या अदितिके गर्भसे उत्पन्न हो गये॥ ५९॥

तत्र विष्णुश्च शक्रश्च जज्ञाते पुनरेव हि।
अर्यमा चैव धाता च त्वष्टा पूषा च भारत॥ ६०॥
विवस्वान् सविता चैव मित्रो वरुण एव च।
अंशो भगश्चातितोजा आदित्या द्वादश स्मृताः॥ ६१॥

भारत! वहाँ विष्णु और इन्द्र फिर उत्पन्न हुए। वे तथा अर्यमा, धाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान्, सविता, मित्र, वरुण, अंश और परम तेजस्वी भग—ये बारह आदित्य कहलाते हैं॥ ६०-६१॥

चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासन् ये तुषिताः सुराः।
वैवस्वतेऽन्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृताः॥ ६२॥

पहले चाक्षुष मन्वन्तरमें जो तुषित नामवाले देवता थे, वे अब वैवस्वत मन्वन्तरमें बारह आदित्य कहलाते हैं॥ ६२॥

सप्तविंशतिर्याः प्रोक्ताः सोमपत्न्योऽथ सुव्रताः।
तासामपत्यान्यभवन् दीप्तान्यमिततेजसाम्॥ ६३॥

२५श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

और जो सुन्दर व्रत धारण करनेवाली चन्द्रमाकी सत्ताईस पत्नियाँ कही गयी हैं, उन अमित तेजस्विनी पत्नियोंकी ज्योतिर्मयी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ६३ ॥
अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ।
बहुपुत्रस्य विदुषस्तस्रो विद्युत: स्मृताः ॥ ६४ ॥
अनेक पुत्रवाले विद्वान् अरिष्टनेमिकी विद्युत् नामवाली चार पत्नियाँ थीं । उनसे सोलह संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ६४ ॥
प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठा ऋचो ब्रह्मर्षिसत्कृताः।
कृशाश्वस्य तु राजर्षेर्देवप्रहरणानि च ॥ ६५ ॥
राजर्षि कृशाश्वके ब्रह्मर्षियोंसे सत्कृत श्रेष्ठ प्रत्यङ्गिरसजा ऋचाएँ और देवताओंके आयुध प्रकट हुए ॥ ६५ ॥
एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि ।
सर्वैदेवगणास्तात त्रयस्त्रिंशत् तु कामजाः ॥ ६६ ॥
तात ! ईश्वरकी कामनासे उत्पन्न होनेवाले तैंतीस देवता सत्ययुग आदि चारों युगोंके एक हजार बार बीतनेपर (प्रत्येक कल्पमें) पुनः उत्पन्न हुआ करते हैं ॥ ६६ ॥
तेषामपि च राजेन्द्र निरोधोत्पत्तिरुच्यते ॥ ६७ ॥
राजेन्द्र ! उन देवताओंकी भी उत्पत्ति और नाशका वर्णन उपलब्ध होता है ॥ ६७ ॥
यथा सूर्यस्य गगने उदयास्तमने इह।
एवं देवनिकायास्ते सम्भवन्ति युगे युगे ॥ ६८ ॥
जैसे आकाशमें सूर्यका उदय और अस्त बारंबार होता रहता है, इसी प्रकार ये देवताओंके समूह प्रत्येक युगमें उत्पन्न ( तथा नष्ट ) होते हैं ॥ ६८ ॥
दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् ।
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान् ॥ ६९ ॥
(इस प्रकार आदित्योंका वर्णन करके अब दैत्योंका वर्णन करते हैं—) हमने सुना है, कश्यप ऋषिसे दितिके दो पुत्र उत्पन्न हुए थे, (उनमेंसे एक) हिरण्यकशिपु और (दूसरा) वीर्यवान् हिरण्याक्ष था ॥ ६९ ॥
सिंहिका चाभवत् कन्या विप्रचित्तेः परिग्रहः।
सैंहिकेया इति ख्यातास्तस्याः पुत्रा महाबलाः।
गणैश्च सह राजेन्द्र दशसाहस्रमुच्यते ॥ ७० ॥
(इन कश्यप और दितिकी) एक सिंहिका नामवाली कन्या भी थी, वह विप्रचित्तिको विवाही गयी थी। उसके महाबली पुत्र सैंहिकेय नामसे प्रसिद्ध हैं। राजेन्द्र ! वे अपने गणोंसहित दस हजार हैं ॥ ७० ॥
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
असंख्याता महाबाहो हिरण्यकशिपोः श्रृणु ॥ ७१ ॥
और उनके सैकड़ों पुत्र और हजारों पौत्र हैं, उनकी गिनती नहीं की जा सकती । महाबाहो ! अब हिरण्यकशिपु-की (संतानोंका वर्णन) सुनो ॥ ७१ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः प्रथितौजसः ।
अनुह्लादश्च ह्लादश्च प्रह्लादश्चैव वीर्यवान् ॥ ७२ ॥
संह्लादश्च चतुर्थोऽभूद्ध्लादपुत्रो हृदस्तथा ।
संह्लादपुत्रः सुन्दश्च निसुन्दस्तावुभौ स्मृतौ ॥ ७३ ॥
हिरण्यकशिपुके अनुह्लाद, ह्लाद, वीर्यवान् प्रह्लाद और चौथा संह्लाद—ये चार प्रसिद्ध पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए। ह्लादका पुत्र हृद हुआ। सुन्द और निसुन्द—ये दोनों संह्लादके पुत्र कहलाते हैं ॥ ७२-७३ ॥
अनुह्लादसुतौ ह्यायुः शिविकालस्तथैव च ।
विरोचनश्च प्राह्लादिर्बलिर्जज्ञे विरोचनात् ॥ ७४ ॥
अनुह्लादके आयु और शिविकाल नामक दो पुत्र थे। प्रह्लादके विरोचन नामक पुत्र हुआ और विरोचनसे बलि नामवाला पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ७४ ॥
बलेः पुत्रशतं त्वासीद् बाणज्येष्ठं नराधिप ।
धृतराष्ट्रश्च सूर्यश्च चन्द्रमाश्चेन्द्रतापनः ॥ ७५ ॥
कुम्भनाभो गर्दभाक्षः कुक्षिरित्येवमादयः ।
बाणस्तेषामतिबलो ज्येष्ठः पशुपतेः प्रियः ॥ ७६ ॥
बलिके सौ पुत्र थे। उनमें बाण (सबसे) बड़ा था। राजन् ! धृतराष्ट्र, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रतापन, कुम्भनाभ, गर्दभाक्ष और कुक्षि आदि (बलिके सौ पुत्र थे)। इनमें अतिबली बाण बड़ा था और वह शिवका प्रिय भक्त था ॥ ७५-७६ ॥
पुराकल्पे हि बाणेन प्रसाद्योमापतिं प्रभुम् ।
पार्श्वतो विहरिष्यामि इत्येवं याचितो वरः ॥ ७७ ॥
पहले कल्पमें बाणासुरने उमापति शंकरको प्रसन्न करके यह वर माँगा था कि 'मैं आपके पास विहार करूँ' ॥ ७७ ॥
बाणस्य चेन्द्रदमनो लोहित्यामुपपद्यत ।
गणस्तस्यासुरा राजञ्छतसाहस्रसम्मिताः ॥ ७८ ॥
बाणके लोहिती नामकी पत्नीमें इन्द्रदमन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजन् ! लाखों असुर उसके गण थे ॥ ७८ ॥
हिरण्याक्षसुताः पञ्च विद्वांसः सुमहावलाः।
झर्झरः शकुनिश्चैव भूतसंतापनस्तथा ।
महानाभश्च विक्रान्तः कालनाभस्तथैव च ॥ ७९ ॥
हिरण्याक्षके झर्झर, शकुनि, भूतसंतापन, महानाभ और पराक्रमी कालनाभ नामक पाँच पुत्र हुए, वे विद्वान् और परम पराक्रमी थे ॥ ७९ ॥
अभवन् दनुपुत्राश्च शतं तीव्रपराक्रमाः ।
तपस्विनो महावीर्याः प्राधान्येन निबोध तान् ॥ ८० ॥
(अब दनुके वंशका वर्णन करते हैं—) दनुके सौ पुत्र हुए। वे सब परम पराक्रमी, तपस्वी और महावीर्यवान् थे। उनमेंसे मुख्य-मुख्य असुरोंका वर्णन सुनिये ॥ ८० ॥

[ हरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः १५


द्विमूर्धा शकुनिश्चैव तथा शङ्कुशिरा विभुः।
शङ्कुकर्णो विराघश्च गवेष्ठी दुन्दुभिस्तथा।
अयोमुखः शम्बरश्च कपिलो वामनस्तथा ॥ ८१ ॥
मरीचिर्मघवांश्चैव इरा शङ्कुशिरा वृकः।
विक्षोभणश्च केतुश्च केतुवीर्यशतह्रदौ ॥ ८२ ॥
इन्द्रजित् सत्यजिच्चैव वज्रनाभस्तथैव च।
महानाभश्च विक्रान्तः कालनाभस्तथैव च ॥ ८३ ॥
एकचक्रो महाबाहुस्तारकश्च महाबलः।
वैश्वानरः पुलोमा च विद्रावणमहासुरौ ॥ ८४ ॥
स्वर्भानुर्वृषपर्वा च तुहुण्डश्च महासुरः।
सूक्ष्मश्चैवातिचन्द्रश्च ऊर्णनाभो महागिरिः ॥ ८५ ॥
असिलोमा च केशी च शठश्च बलको मदः।
तथा गगनमूर्धा च कुम्भनाभो महासुरः ॥ ८६ ॥
प्रमदो मयश्च कुपथो हयग्रीवश्च वीर्यवान्।
वैसृपः सविरूपाक्षः सुपथोऽथ हराहरौ ॥ ८७ ॥
हिरण्यकशिपुश्चैव शतमायश्च शम्बरः।
शरभः शलभश्चैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवान् ॥ ८८ ॥
एते सर्वे दनोः पुत्राः कश्यपादभिजज्ञिरे।
विप्रचित्तिप्रधानास्ते दानवाः सुमहाबलाः ॥ ८९ ॥

द्विमूर्धा, शकुनि तथा विभु, शङ्कुशिरा, शङ्कुकर्ण, विराध और गवेष्ठी, दुन्दुभि तथा अयोमुख, शम्बर और कपिल, वामन तथा मरीचि, मघवान् और इरा, शङ्कुशिरा, वृक; विक्षोभण और केतु तथा केतुवीर्य, शतह्रद, इन्द्रजित्, सत्यजित् और वज्रनाभ तथा महानाम और विक्रान्त, कालनाम, महाभुज एकचक्र और महाबली तारक, वैश्वानर, पुलोमा, विद्रावण और महासुर, स्वर्भानु, वृषपर्वा और महान् असुर तुहुण्ड, सूक्ष्म और अतिचन्द्र तथा ऊर्णनाभ, महागिरि, असिलोमा और केशी एवं शठ तथा बलक, मद तथा गगनमूर्धा और महान् असुर कुम्भनाभ, प्रमद, मय और कुपथ, हयग्रीव और वीर्यवान् वैसृप, विरूपाक्षसहित सुपथ और हर, अहर, हिरण्यकशिपु तथा सैकड़ों प्रकारकी माया जाननेवाला शम्बर, शरभ, शलभ और वीर्यवान् विप्रचित्ति—ये सब दनुके पुत्र कश्यपजीसे उत्पन्न हुए थे। इनमें विप्रचित्ति प्रधान था। ये सब दानव बड़े बलवान् थे॥८१-८९॥

एतेषां यदपत्यं तु तन्न शक्यं नराधिप।
प्रसंख्यातुं महीपाल पुत्रपौत्रायनन्तकम् ॥ ९० ॥

नराधिप ! इनकी जो संतानें हुईं, उनकी गिनती नहीं की जा सकती। महीपाल ! इनके अनन्त पुत्र-पौत्र उत्पन्न हुए ॥ ९० ॥

स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या पुलोम्नश्च सुतात्रयम्।
उपदानवी हयशिराः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ९१ ॥

उपदानवी, हयशिरा ( तथा शची ) तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं। वृषपर्वाके शर्मिष्ठा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई ॥ ९१ ॥

पुलोमा कालिका चैव वैश्वानरसुते उभे।
बह्वपत्ये महावीर्ये मारीचेस्तु परिग्रहः ॥ ९२ ॥

वैश्वानर दानवकी पुलोमा और कालिका नामकी दो पुत्रियाँ हुईं। ये दोनों मरीचिनन्दन कश्यपको विवाही गयीं, ये बड़ी शक्तिशालिनी थीं। इन कन्याओंके बहुत-सी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ९२ ॥

तयोः पुत्रसहस्राणि षष्टि दानवनन्दनान्।
चतुर्दशशतान्यान्य हिरण्यपुरवासिनः ॥ ९३ ॥
मारीचिर्जनयामास महता तपसान्वितः।
पौलोमाः कालकेयाश्च दानवास्ते महाबलाः ॥ ९४ ॥
अवध्या देवतानां च हिरण्यपुरवासिनः।
कृताः पितामहेनाजौ निहताः सव्यसाचिना ॥ ९५ ॥

परम तपस्वी मारीचि ( कश्यप ) ने उन दोनों स्त्रियोंमें दानवोंको आनन्द देनेवाले साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया। फिर चौदह सौ पुत्र और उत्पन्न किये। ये सब हिरण्यपुरमें रहते थे। इन हिरण्यपुरमें रहनेवाले महाबली पौलोम और कालकेय दानवोंको ब्रह्माजीने ( वर देकर ) देवताओंसे भी अवध्य ( न मारे जानेयोग्य ) कर दिया था। अर्जुनने इनको रणमें मार डाला था ॥९३-९५॥

प्रभाया नहुषः पुत्रः संजयश्च शचीसुतः।
पूरूं जज्ञेऽथ शर्मिष्ठा दुष्मन्तमपदानवी ॥ ९६ ॥

प्रभाके नहुष नामक पुत्र हुआ और शचीके संजय। शर्मिष्ठाने पूरुको उत्पन्न किया और उपदानवीने दुष्मन्तको ॥

ततोऽपरे महावीर्या दानवास्त्वतिदारुणाः।
सिंहिकायामथोत्पन्ना विप्रचित्तेः सुतास्तदा॥ ९७ ॥
दैत्यदानवसंयोगाज्जातास्तीव्रपराक्रमाः।
सैंहिकेया इति ख्यातास्त्रयोदश महाबलाः ॥ ९८ ॥

तदनन्तर और भी बहुत-से महावीर्यवान् अतिदारुण दानव सिंहिकामें विप्रचित्तिसे उत्पन्न हुए, फिर दैत्य-दानवोंके संयोगसे विप्रचित्तिके बहुत-से तीव्र पराक्रमी पुत्र हुए। इनमें तेरह महाबली दानव 'सैंहिकेय' नामसे प्रसिद्ध हैं ॥९७-९८॥

व्यंशः शल्यश्च बलिनौ नभश्चैव महाबलः।
वातापिर्नमुचिश्चैव इल्वलः खसृमस्तथा ॥ ९९ ॥
आञ्जिको नरकश्चैव कालनाभस्तथैव च।
शुकः पोतरणश्चैव वज्रनाभश्च वीर्यवान् ॥ १०० ॥

( उनके नाम इस प्रकार हैं—) बलवान् व्यंश और शल्य, महाबली नभ, वातापि और नमुचि, इल्वल तथा खसृम, आञ्जिक और नरक तथा कालनाभ, शुक और पोतरण तथा वीर्यवान् वज्रनाभ ॥ ९९-१०० ॥

१४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंश

राहुर्ज्येष्ठस्तु तेषां वै सूर्यचन्द्रविमर्दनः।
मूकश्चैव तुहुण्डश्च ह्रादपुत्रौ बभूवतुः॥१०१॥

हिन्दी टीका: इनमें राहु सबसे बड़ा है, जो सूर्य तथा चन्द्रमाको पीड़ा देता रहता है। ह्रादके मूक और तुहुण्ड नामवाले दो पुत्र उत्पन्न हुए॥ १०१ ॥

मारीचः सुन्दपुत्रश्च ताड़कायां व्यजायत।
शिवमाणस्तथा चैव सुरकल्पश्च वीर्यवान् ॥१०२॥

हिन्दी टीका: सुन्दके ताड़कामें मारीच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ तथा (सुन्द और ताड़काके) शिवमाण और वीर्यवान् सुरकल्प नामक पुत्र भी उत्पन्न हुए॥ १०२ ॥

एते वै दानवाः श्रेष्ठा दनुवंशविवर्द्धनाः।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥१०३॥

हिन्दी टीका: ये सभी दानव श्रेष्ठ और दनुके वंशका विस्तार करनेवाले हैं, इनके सैकड़ों पुत्र और हजारों पौत्र हैं॥१०३॥

संह्रादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले।
समुत्पन्नाः सुतपसा महान्तो भावितात्मनः॥१०४॥

हिन्दी टीका: संह्राद दैत्यके कुलमें निवातकवच उत्पन्न हुए, वे सब उदार थे और उन्होंने बड़ा भारी तप करके अपने चित्तको पवित्र कर लिया था॥ १०४ ॥

तिस्रः कोट्यः सुतास्तेषां मणिमत्यां निवासिनाम्।
तेऽप्यवध्यास्तु देवानामर्र्जुनेन निपातिताः॥१०५॥

हिन्दी टीका: वे मणिमती नगरीमें निवास करते थे। उनके तीन करोड़ पुत्र थे। वे भी देवताओंसे अवध्य थे, उनको भी अर्जुनने मार डाला था॥ १०५ ॥

षट् सुताः सुमहामत्त्वास्ताम्रायाः परिकीर्त्तिताः।
काकी श्येनी च भासी च सुग्रीवी शुचि गृध्रिका॥१०६॥

हिन्दी टीका: ताम्राके काकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, शुचि और गृध्रिका नामकी अत्यन्त बलशालिनी छः पुत्रियाँ कही जाती हैं॥ १०६॥

काकी काकानजनयदुलूकी प्रत्युलूककान्।
श्येनी श्येनांस्तथा भासी भासान् गृध्रांश्च गृध्र्यपि॥
शुचिरौदकान् पक्षिगणान् सुग्रीवी तु परंतप।
अश्वानुष्ट्रान् गर्दभांश्च ताम्रावंशः प्रकीर्तितः॥१०८॥

हिन्दी टीका: परंतप ! काकीने कौओंको, उलूकीने उल्लुओंको, श्येनीने श्येनों (बाजों) को, भासीने भास नामक पक्षियोंको और गृध्रीने गीधोंको उत्पन्न किया। शुचिने जलमें रहनेवाले पक्षियोंको और सुग्रीवीने घोड़े, ऊँट तथा गधोंको जन्म दिया। यह मैंने ताम्राके वंशका वर्णन किया है॥१०७-१०८॥


विनतायास्तु पुत्रौ द्वावरुणो गरुडस्तथा।
सुपर्णः पततां श्रेष्ठो दारुणः स्वेन कर्मणा ॥१०९॥

हिन्दी टीका: विनताके अरुण और गरुड नामक दो पुत्र हुए। इनमेंसे पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड अपने कर्मके कारण बड़े दारुण माने गये हैं॥ १०९ ॥

सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणाममितौजसाम्।
अनेकnames/अनेकnames अनेकnames/अनेकशिरसां तात खेचराणां महात्मनाम् ॥११०॥

हिन्दी टीका: सुरसाके हजारों सर्प उत्पन्न हुए। तात ! वे सब सर्प अमितपराक्रमी, अनेक फनोंवाले, आकाशमें विचरण करनेवाले तथा विशालकाय हैं॥ ११० ॥

काद्रवेयाश्च बलिनः सहस्रममितौजसः।
सुपर्णवशगा नागा जज्ञिरेऽनेकमस्तकाः ॥१११॥
तेषां प्रधानाः सततं शेषवासुकितक्षकाः।
ऐरावतो महापद्मः कम्बलाश्वतरावुभौ ॥११२॥
एलापत्रस्तथा शंखः कर्कोटकधनंजयौ।
महानीलमहाकर्णौ धृतराष्ट्रबलाहकौ ॥११३॥
कुहरः पुष्पद्रंष्ट्रश्च दुर्मुखः सुमुखस्तथा।
शङ्खश्च शङ्खपालश्च कर्पलो वामनस्तथा ॥११४॥
नहुषः शङ्खरोमा च मणिरित्येवमादयः।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च गरुडेन निपातिताः ॥११५॥

हिन्दी टीका: कद्रूके भी परम पराक्रमी हजारों सर्प उत्पन्न हुए। उन बलवान् सर्पोंके अनेक मस्तक हैं और वे सर्वदा गरुडके अधीन रहते हैं। उनमें शेष, वासुकि, तक्षक, ऐरावत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एलापत्र, शङ्ख, कर्कोटक, धनंजय, महानील, महाकर्ण, धृतराष्ट्र, बलाहक, कुहर, पुष्पद्रंष्ट्र, दुर्मुख, सुमुख, शङ्ख, शङ्खपाल, कपिल, वामन, नहुष, शङ्खरोमा तथा मणि आदि प्रधान हैं। इनके पुत्र और पौत्रोंको गरुडने मार डाला था॥ १११-११५ ॥

चतुर्दश सहस्राणि क्रूराणां पवनाशिनाम्।
गणं क्रोधवशं विद्धि तस्य सर्वे च दंष्ट्रिणः ॥११६॥

हिन्दी टीका: वायु पीकर रहनेवाले चौदह हजार क्रूर सर्पोंका क्रोधवश नामवाला एक गण है। उस गणके समस्त सर्प दाढ़ोंवाले हैं॥ ११६ ॥

स्थलजाः पक्षिणोऽब्जांश्च धरायाः प्रसवाः स्मृताः।
गास्तु वै जनयामास सुरभिर्महिषांस्तथा ॥११७॥

हिन्दी टीका: थल और जलके पक्षी धराकी संतान कहलाते हैं। सुरभिने गौ, बैल और भैंसोंको उत्पन्न किया॥ ११७ ॥

इरा वृक्षलतावल्लीस्तृणजातींश्च सर्वशः।
खशा तु यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा ॥११८॥

हरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः १७


[ बायाँ स्तम्भ ]

इराने वृक्ष, लता, बेल तथा सर्व प्रकारकी घासोंको उत्पन्न किया। खशाने यक्षों और राक्षसोंको तथा मुनिने अप्सराओंको जन्म दिया॥ ११८॥

अरिष्टा तु महासत्त्वान् गन्धर्वानमितौजसः।
एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजंगमाः ॥११९॥

अरिष्टाने महासत्त्ववाले अमित पराक्रमी गन्धर्वोंको उत्पन्न किया। यह कश्यप ऋषिकी स्थावर और जंगम संतानोंका वर्णन हुआ॥ ११९॥

तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः।
एष मन्वन्तरे तात सर्गः स्वारोचिषे स्मृतः ॥१२०॥

इनके सैकड़ों पुत्र और हजारों पौत्र हुए। तात! यह स्वारोचिष मन्वन्तरकी सृष्टिका वर्णन है॥ १२०॥

वैवस्वते तु महति वारुणे वितते क्रतौ।
जुह्वानस्य ब्रह्मणो वै प्रजासर्ग इहोच्यते ॥१२१॥

जब वैवस्वत मन्वन्तरमें वरुणदेवतासम्बन्धी बड़ा भारी यज्ञ चल रहा था, तब ब्रह्माजीके आहुति देते समय प्रजाओंको रचनेका जो क्रम चला था, उसका यहाँ वर्णन किया जाता है॥ १२१॥

पूर्वं यत्र तु ब्रह्मर्षीनुत्पन्नान् सप्त मानसान्।
पुत्रत्वे कल्पयामास स्वयमेव पितामहः ॥१२२॥

उस समय पितामह ब्रह्माजीने पहले अपने मनके संकल्पसे उत्पन्न हुए सात ब्रह्मर्षियोंको स्वयं ही अपने औरस पुत्रके रूपमें स्वीकार किया॥ १२२॥

ततो विरोधे देवानां दानवानां च भारत।
दितिर्विंनष्टपुत्रा वै तोषयामास कश्यपम् ॥१२३॥

भारत! तदनन्तर जब देवता और दैत्योंमें विरोध होनेपर दितिके पुत्र नष्ट हो गये, तब उसने (महर्षि) कश्यपको (फिर) प्रसन्न किया॥ १२३॥

तां कश्यपः प्रसन्नात्मा सम्यगाराधितस्तया।
वरेण च्छन्दयामास सा च वव्रे वरं ततः ॥१२४॥
पुत्रमिन्द्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्।
स च तस्यै वरं प्रादात् प्रार्थितं सुमहातपाः ॥१२५॥

उसके भलीभाँति आराधना करनेपर कश्यपजीका चित्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने उससे वर माँगनेके लिये कहा। तब उस दितिने वर माँगा कि 'मुझे इन्द्रका वध करनेके लिये अमित पराक्रमी पुत्र दीजिये।' यह सुनकर उन महातपस्वी कश्यपने उसका माँगा हुआ वर उसको दे दिया॥ १२४-१२५॥

दत्त्वा च वरमव्यग्रो मारीचस्तामभाषत।
भविष्यति सुतस्तेऽयं यद्येवं धारयिष्यसि ॥१२६॥
इन्द्रं सुतो निहन्ता ते गर्भं वै शरदां शतम्।
यदि धारयसे शौचं तत्परा व्रतमास्थिता ॥१२७॥


[ दायाँ स्तम्भ ]

वह वर देकर कश्यप मुनि उससे शान्तभावसे बोले—'यदि तुम इस (गर्भ) को मेरी बतायी हुई विधिसे धारण कर सकोगी तो तुम्हारा पुत्र इन्द्रको मारनेवाला होगा। तुम्हें पवित्रतापूर्वक रहनेका व्रत लेकर सौ वर्षतक अपने उदरमें इस गर्भको धारण करना पड़ेगा। यदि तुम ऐसा कर सकोगी तो वह पुत्र इन्द्रको मारनेवाला होगा'॥ १२६-१२७॥

तथेत्यभिहितो भर्त्रा तया देव्या महातपाः।
धारयामास गर्भं तु शुचिः सा वसुधाधिप ॥१२८॥

तब उस देवीने अपने महातपस्वी स्वामीसे कहा कि 'अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगी।' राजन्! फिर वह गर्भको धारण कर पवित्रतापूर्वक रहने लगी॥ १२८॥

ततोऽभ्युपागमद् दित्यां गर्भमाधाय कश्यपः।
रोचयन् वै गणश्रेष्ठं देवानामितौजसाम् ॥१२९॥
तेजः सम्भृत्य दुर्धर्षमवध्यममरैरपि।
जगाम पर्वतायैव तपसे शंसितव्रतः ॥१३०॥

अमितपराक्रमी देवताओंके श्रेष्ठ गणको प्रकाशित करनेवाले कश्यपजी इस प्रकार दितिमें गर्भको स्थापित कर वहाँसे चल दिये। वे प्रशंसित तपवाले (महर्षि दितिमें) देवताओंसे भी अवध्य अपने दुर्धर्ष तेजको स्थापित करके तप करनेके लिये पर्वतपर चले गये॥ १२९-१३०॥

तस्याश्चैवान्तरप्रेप्सुरभवत् पाकशासनः।
ऊने वर्षशते चास्या ददर्शान्तरमच्युतः ॥१३१॥

(इधर) इन्द्र उसके छिद्रको ढूँढ़ने लगे और अच्युत इन्द्रने सौ वर्ष पूर्ण होनेसे पहले ही उसका दोष देख लिया॥ १३१॥

अकृत्वा पादयोः शौचं दितिः शयनमाविशत्।
निद्रां च कारयामास तस्याः कुक्षिं प्रविश्य सः॥१३२॥

(एक बार) दिति बिना पैर धोये ही शयन करनेके लिये चली गयी। इसी समय इन्द्रने उसकी कोखमें घुसकर उसे (अपनी मायासे) निद्राके अधीन कर दिया॥ १३२॥

वज्रपाणिस्ततो गर्भं सप्तधा तं न्यकृन्तत।
स पाट्यमानो वज्रेण गर्भस्तु प्ररुरोद ह ॥१३३॥

फिर वज्रपाणि इन्द्रने उस गर्भके सात टुकड़े कर डाले, वज्रसे काटे जानेपर वह गर्भ जोर-जोरसे रोने लगा॥ १३३॥

मा रोदीरिति तं शक्रः पुनः पुनरथाब्रवीत्।
सोऽभवत् सप्तधा गर्भस्तमिन्द्रो रुषितः पुनः॥१३४॥
एकैकं सप्तधा चक्रे वज्रेणैवारिकर्शनः।
मरुतो नाम देवास्ते बभूवुर्भरतर्षभ ॥१३५॥

तब उस गर्भसे इन्द्रने बार-बार 'मा रोदीः-मत रो' इस प्रकार कहा और उस गर्भके सात टुकड़े हो गये, तब

१८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

शत्रुओंको नष्ट करनेवाले इन्द्र फिर क्रोधमें भरकर वज्रद्वारा उस प्रत्येक टुकड़ेके भी सात-सात टुकड़े कर डाले। भरतर्षभ ! वे मरुत् नामक (उनचास) देवता हुए ॥

यथोक्तं मघवता तथैव मरुतोऽभवन्।
देवा एकोनपञ्चाशत् सहाया वज्रपाणिना ॥ १३६॥

इन्द्रने चूँकि (मा रोदीः) कहा था, इसलिये वे मरुत् नामक देवता हो गये। वे उनचास हैं और वज्रपाणि इन्द्रकी सहायता करते हैं ॥ १३६ ॥

तेषामेवं प्रवृद्धानां भूतानां जनमेजय।
रोचयन् वै गणश्रेष्ठं देवानामितौजसाम् ॥ १३७॥
निकायेषु निकायेषु हरिः प्रादात् प्रजापतीन्।
क्रमशस्तानि राज्यानि पृथुपूर्वाणि भारत ॥ १३८॥

जनमेजय ! जब वे प्राणी इस प्रकार बढ़ गये, तब अमितपराक्रमी देवताओंकी श्रेष्ठ मण्डलीको प्रकाशित करनेवाले हरिने उनकी टोलियोंमें प्रजापति नियुक्त कर दिये। भारत ! फिर उन्होंने पृथुको पहले राज्य अर्पण किया, तबसे ये राज्य क्रमशः चले आ रहे हैं॥ १३७-१३८॥

स हरिः पुरुषो वीरः कृष्णो जिष्णुः प्रजापतिः।
पर्जन्यस्तपनोऽव्यक्तस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥ १३९॥

वे हरि पुरुष, वीर, कृष्ण, जिष्णु और प्रजापति हैं तथा वे ही मेघ, सूर्य और अव्यक्त हैं एवं यह सब जगत् उन्हींका है ॥ १३९ ॥

भूतसर्गमिमं सम्यग्जानतो भरतर्षभ।
मरुतां च शुभं जन्म शृण्वतः पठतोऽपि वा।
नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कुतः ॥ १४०॥

भरतर्षभ ! इस भूतसृष्टिको पूर्णरूपसे जाननेवाले और मरुतोंके शुभ जन्मको सुनने या पढ़नेवालेको जन्म-मरणका भय नहीं रहता, फिर परलोकका भय तो होगा ही कहाँसे ? ॥ १४० ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि मरुदुत्पत्तिकथने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें मरुतोंकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥


चतुर्थोऽध्यायः

पृथुका उपाख्यान, राज्यवितरण और दिक्पालोंकी प्रतिष्ठा

वैशम्पायन उवाच

अभिषिच्याधिराज्ये तु पृथुं वैन्यं पितामहः।
ततः क्रमेण राज्यानि व्यादेष्टुमुपचक्रमे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! पितामह (में विराजमान हरि) ने राजाओंके ऊपर भी अधिराजारूपसे वेनके पुत्र पृथुका अभिषेक किया, फिर (उन प्रजापतिने) क्रमशः राज्यका वितरण आरम्भ किया ॥ १ ॥

द्विजानां वीरुधां चैव नक्षत्रग्रहयोस्तथा।
यज्ञानां तपसां चैव सोमं राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ २ ॥

(प्रजापतिने) द्विज, लता, नक्षत्र, ग्रह, यज्ञ और तपके राज्यपर चन्द्रमाका अभिषेक किया ॥ २ ॥

अपां तु वरुणं राज्ये राज्ञां वैश्रवणं प्रभुम्।
बृहस्पतिं तु विश्वेषां ददावाङ्गिरसं पतिम् ॥ ३ ॥

जलके राज्यपर वरुणका तथा राजाओं (और यक्षों) के राज्यपर विश्रवाके पुत्र कुबेरका अभिषेक कर दिया। विश्वेदेवोंपर अङ्गिरागोत्री वृहस्पतिको राजा बना दिया ॥ ३ ॥

भृगूणामधिपं चैव काव्यं राज्येऽभ्यषेचयत्।
आदित्यानां तथा विष्णुं वसूनामथ पावकम् ॥ ४ ॥

भृगुवंशियोंके स्वामीरूपसे शुक्राचार्यका राज्याभिषेक कर दिया। आदित्योंके ऊपर विष्णुको और वसुओंके ऊपर अग्नि-को (राजा बना दिया) ॥ ४ ॥

प्रजापतीनां दक्षं तु मरुतामथ वासवम्।
दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादममितौजसम् ॥ ५ ॥
वैवस्वतं च पितॄणां यमं राज्येऽभ्यषेचयत्।

दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुतोंका तथा अमित पराक्रमी प्रह्लादको दैत्य और दानवोंका राजा बना दिया एवं पितरोंके राज्यपर विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र यमका अभिषेक कर दिया ॥ ५ १/२ ॥

मातृणां च व्रतानां च मन्त्राणां च तथा गवाम् ॥ ६ ॥
यक्षाणां राक्षसानां च पार्थिवानां तथैव च।
नारायणं तु साध्यानां रुद्राणां वृषभध्वजम् ॥ ७ ॥

षोडशमातृका, व्रत, मन्त्र, गौ, यक्ष, राक्षस, पार्थिव पदार्थ और साध्य देवताओंके राज्यपर नारायणका अभिषेक कर दिया और रुद्रोंके राज्यपर वृषभध्वज (शंकरजी) अभिषिक्त हुए ॥ ६-७॥

विप्रचित्तिं तु राजानं दानवानांमथादिशत्।
सर्वभूतपिशाचानां गिरिशं शूलपाणिनम् ॥ ८ ॥

विप्रचित्तिको दानवोंका राजा बननेका आदेश दे

[ हरिवंशपर्व ] चतुर्थोऽध्यायः १९


दिया और सकल भूत-पिशाचोंका शूलपाणि महादेवजीको राजा बना दिया ॥ ८ ॥

शैलानां हिमवन्तं च नदीनामथ सागरम् ।
गन्धानां मरुतां चैव भूतानामशरीरिणाम् ।
शब्दाकाशवतां चैव वायुं च वलिनां वरम् ॥ ९ ॥

हिमाचलको पर्वतोंका और समुद्रको नदियोंका राजा बना दिया । गन्धद्रव्यों, मरुद्गणों, अमूर्त भूतों तथा शब्द और आकाशवाली वस्तुओंके राज्यपर भी बलवानोंमें श्रेष्ठ वायुका अभिषेक कर दिया ॥ ९ ॥

गन्धर्वाणामधिपतिं चक्रे चित्ररथं प्रभुम् ।
नागानां वासुकिं चक्रे सर्पाणामथ तक्षकम् ॥ १० ॥

प्रभावशाली चित्ररथको गन्धर्वोंका स्वामी बना दिया, वासुकिको नागोंका और तक्षकको सर्पोंका राजा बनाया ॥

वारणानां च राजानमैरावतमथादिशत् ।
उच्चैःश्रवसमश्वानां गरुडं चैव पक्षिणाम् ॥ ११ ॥

हाथियोंका ऐरावतको, घोड़ोंका उच्चैःश्रवाको और पक्षियोंका गरुड़को राजा बना दिया ॥ ११ ॥

मृगाणामथ शार्दूलं गोवृषं च गवां पतिम् ।
वनस्पतीनां राजानं प्लक्षमैवादिशत् प्रभुम् ॥ १२ ॥

वनचारी पशुओंपर सिंहको तथा गौओंपर साँड़को स्वामी बनाया और पाकड़को वृक्षोंका प्रभावशाली राजा बना दिया ॥ १२ ॥

सागराणां नदीनां च मेघानां वर्षणस्य च ।
आदित्यानामधिपतिं पर्जन्यमभिषिक्तवान् ॥ १३ ॥

सागर, नदी, मेघ, वर्षा और सूर्यकी किरणोंके अधिपति-पदपर पर्जन्यका अभिषेक कर दिया ॥ १३ ॥

सर्वेषां दंष्ट्रिणां शेषं राजानमभ्यषेचयत् ।
सरीसृपाणां सर्पाणां राजानं चैव तक्षकम् ॥ १४ ॥

दाढ़वाले समस्त सर्पोंके ऊपर शेषको, (निर्षिष डुण्डुभ आदि) सर्पों और सरीसृपों (पेटके बलपर चलनेवाले जीवों) के ऊपर तक्षकको राजा बना दिया ॥ १४ ॥

गन्धर्वाप्सरसां चैव कामदेवं तथा प्रभुम् ।
ऋतूनामथ मासानां दिवसानां तथैव च ॥ १५ ॥
पक्षाणां च क्षपाणां च मुहूर्तातिथिपर्वणाम् ।
कलाकाष्ठाप्रमाणानां गतेरयनयोस्तथा ॥ १६ ॥
गणितस्याथ योगस्य चक्रे संवत्सरं प्रभुम् ।

गन्धर्व और अप्सराओंके ऊपर ऐश्वर्यशाली कामदेवका अभिषेक कर दिया। ऋतु, मास, दिन, पक्ष, रात्रि, मुहूर्त, तिथि, पर्व, कला-काष्ठाके प्रमाण—उत्तरायण और दक्षिणायनकी गति तथा उपराग अर्थात् ग्रहण (के अभिमानी देवताओं) पर प्रभु संवत्सरका अभिषेक कर दिया ॥ १५-१६३ ॥

एवं विभज्य राज्यानि क्रमेण स पितामहः ॥ १७ ॥
दिशापालानथ ततः स्थापयामास भारत ।

भारत ! पितामहने इस प्रकार क्रमपूर्वक राज्योंका विभाग करके फिर दिक्पालोंकी स्थापना की थी ॥ १७३ ॥

पूर्वस्यां दिशि पुत्रं तु वैराजस्य प्रजापतेः ॥ १८ ॥
दिशापालं सुधन्वानं राजानं चाभ्यषेचयत् ।

उन्होंने वैराज प्रजापतिके पुत्र राजा सुधन्वाको पूर्व दिशाके दिक्पालपदपर अभिषेक कर दिया ॥ १८३ ॥

दक्षिणस्यां महात्मानं कर्दमस्य प्रजापतेः ॥ १९ ॥
पुत्रं शङ्खपदं नाम राजानं सोऽभ्यषेचयत् ।

कर्दम प्रजापतिके पुत्र महात्मा राजा शङ्खपदको दक्षिण दिशाके दिक्पाल-पदपर अभिषिक्त किया ॥ १९३ ॥

पश्चिमायां दिशि तथा रजसः पुत्रमच्युतम् ॥ २० ॥
केतुमन्तं महात्मानं राजानं सोऽभ्यषेचयत् ।

इसी प्रकार पश्चिम दिशामे रजसके पुत्र अच्युत महात्मा केतुमान्का राजा (दिक्पाल) के पदपर अभिषेक कर दिया ॥ २०३ ॥

तथा हिरण्यरोमाणं पर्जन्यस्य प्रजापतेः ॥ २१ ॥
उदीच्यां दिशि दुर्धर्षं राजानं सोऽभ्यषेचयत् ।

इसी प्रकार उत्तर दिशामें पर्जन्य प्रजापतिके पुत्र दुर्धर्ष हिरण्यरोमाका राजपद (दिक्पाल-पद) पर अभिषेक कर दिया ॥ २१३ ॥

तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता ॥ २२ ॥
यथाप्रदेशमद्यापि धर्मेण परिपाल्यते ।

उन पुरुषोंद्वारा सातों द्वीप और पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी और उसके वे-वे प्रदेश आज भी धर्मानुसार पालित हो रहे हैं ॥ २२३ ॥

राजसूयाभिषिक्तस्तु पृथुरेभिर्नराधिपैः ।
वेददृष्टेन विधिना राजराज्ये नराधिप ॥ २३ ॥

जनेश्वर ! इन राजाओंने वेदमें वर्णित विधिसे राजसूय यज्ञमे राजाओंके भी राजाके पदपर पृथुका अभिषेक किया था ॥ २३ ॥

ततो मन्वन्तरेऽतीते चाक्षुषेऽमिततेजसि ।
वैवस्वताय मनवे ब्रह्मा राज्यमथादिशत् ।
तस्य विस्तरमाख्यास्ये मनोर्वैवस्वतस्य ह ॥ २४ ॥
तवानुकूल्याद् राजेन्द्र यदि शुश्रूषसेऽनघ ।
महद्ध्येतदधिष्ठानं पुराणं परिकीर्तितम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्गवासकरं शुभम् ॥ २५ ॥

तदनन्तर अमिततेजस्वी चाक्षुष मनुके मन्वन्तरके बीतनेपर 'ब्रह्माजीने वैवस्वत मनुको राज्य दे दिया था । निष्पाप राजेन्द्र ! यदि आप अनुकूल रहकर सुनना चाहेंगे

२०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तो मैं आपसे वैवस्वत मनुके विस्तारका वर्णन करूँगा। मैंने आपको यह बड़ा भारी प्राचीन इतिहास कह सुनाया। इसको सुननेसे प्रतिष्ठा बढ़ती है, धन मिलता है, यश मिलता है, आयुकी वृद्धि होती है और इस शुभ आख्यानको सुननेसे (अन्तमें) स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥ २४-२५ ॥

जनमेजय उवाच
विस्तरेण पृथोर्जन्म वैशम्पायन कीर्तय।
यथा महात्मना तेन दुग्धा चेयं वसुंधरा ॥ २६ ॥

**जनमेजयने कहा—**वैशम्पायनजी ! आप पृथुके जन्मका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, उन महात्माने इस पृथ्वीको किस प्रकार दुहा था ? ॥ २६ ॥

यथा च पितृभिर्दुग्धा यथा देवैर्यथर्षिभिः।
यथा दैत्यैश्च नागैश्च यथा यक्षैर्यथा द्रुमैः ॥ २७ ॥
यथा शैलैः पिशाचैश्च गन्धर्वैश्च द्विजोत्तमैः।
राक्षसैश्च महासत्त्वैर्यथा दुग्धा वसुंधरा ॥ २८ ॥
तेषां पात्रविशेषांश्च वैशम्पायन कीर्तय।
वत्सान् क्षीरविशेषांश्च दोग्धारं चानुपूर्वशः ॥ २९ ॥

पितरोंने इस पृथ्वीको जिस प्रकार दुहा था, देवता तथा ऋषियोंने, दैत्यों और नागोंने, यक्षों और वृक्षोंने इस पृथ्वीको जिस प्रकार दुहा था तथा पर्वत, पिशाच, गन्धर्व, द्विजोत्तम और महान् शक्तिशाली राक्षसोंने इस वसुंधरा पृथ्वीको जिस प्रकार दुहा था, वह बताइये। वैशम्पायनजी ! इन सबके पास कैसे-कैसे पात्र थे, कैसे-कैसे बछड़े थे, कैसा-कैसा दूध दुहा गया था और कौन-कौन दुहनेवाले थे ? इन सबका क्रमपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ २७-२९ ॥

यस्माच्च कारणात् पाणिर्वेनस्य मथितः पुरा।
क्रुद्धैर्महर्षिभिस्तात कारणं तच्च कीर्तय ॥ ३० ॥

तात ! प्राचीनकालमे महर्षियोंने जिस कारणसे वेनके हाथका मन्थन किया था और महर्षियोंने जिस कारण क्रोध किया था, उस कारणका भी आप वर्णन कीजिये ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि पृथोर्वैन्यस्य विस्तरम्।
एकाग्रः प्रयतश्चैव शृणुष्व जनमेजय ॥ ३१ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय ! मैं तुमसे वेनके पुत्र पृथुका चरित्र अब विस्तारपूर्वक कहता हूँ, इस चरित्रको एकाग्र और सावधान होकर सुनो ॥ ३१ ॥

नाशुचेः क्षुद्रमनसः कुशिष्यायाव्रताय च।
कीर्तनीयमिदं राजन् कृतघ्नायाहिताय वा ॥ ३२ ॥

राजन् ! जिसका मन तुच्छ हो, जो अपवित्र हो, जो कुशिष्य हो और जो व्रत न करता हो तथा जो कृतघ्न हो एवं जो संसारका अहित करनेवाला हो, उससे इस चरित्रका वर्णन नहीं करना चाहिये ॥ ३२ ॥

स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं धर्म्यं वेदेन सम्मितम्।
रहस्यमृषिभिः प्रोक्तं शृणु राजन् यथातथम् ॥ ३३ ॥

राजन् ! यह (इतिहास) स्वर्ग, यश, आयु तथा धर्मकी प्राप्ति करानेवाला और वेदके समान है। ऋषियोंने इस रहस्यका वर्णन किया है, इसे तुम यथार्थ रीतिसे सुनो ॥ ३३ ॥

यश्चैनं कथयेन्नित्यं पृथोर्वैन्यस्य विस्तरम्।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य न स शोचेत् कृताकृतैः॥ ३४ ॥

जो पुरुष ब्राह्मणोंको प्रणाम करके वेनके पुत्र पृथुके इस चरित्रको विस्तारपूर्वक कहता है, उसे कार्यकार्याके (मैंने सदा पाप कर्म किये, धर्म कभी नहीं किया, ऐसे) पश्चात्तापसे शोक नहीं करना पड़ता अर्थात् इस चरित्रको सुननेसे सब प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं और सब यज्ञोंके फल प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पृथूपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पृथुका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥


पञ्चमोऽध्यायः

पृथुका उपाख्यान—वेनका अत्याचार करके नष्ट होना और पृथुका जन्म तथा चरित्र

वैशम्पायन उवाच
आसीद् धर्मस्य गोप्ता वै पूर्वमत्रिसमः प्रभुः।
अत्रिवंशसमुत्पन्नस्त्वङ्गो नाम प्रजापतिः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! प्राचीन कालकी बात है, धर्मके रक्षक अत्रिके वंशमें एक प्रजापति उत्पन्न हुए, जिनका नाम था अङ्ग। वे अत्रिके ही समान प्रभावशाली थे ॥१॥

तस्य पुत्रोऽभवद् वेनो नात्यर्थं धर्मकोविदः।
जातो मृत्युसुतायां वै सुनीथायां प्रजापतिः ॥ २ ॥

उनका पुत्र वेन हुआ, परंतु उसे धर्मके रहस्यका पता न था। वह राजा वेन मृत्युकी पुत्री सुनीथाके गर्भसे उत्पन्न हुआ था ॥ २ ॥

स मातामहदोषेण वेनः कालात्मजाऽऽत्मजः।
स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा कामाल्लोभेऽन्ववर्तत ॥ ३ ॥

कालकी पुत्री सुनीथाका पुत्र वह वेन नानाके दोषसे अपने धर्मकी उपेक्षा कर कामके कारण लोभमें फँस गया ॥३॥

मर्यादां स्थापयामास धर्मापेतां स पार्थिवः।

हरिवंशपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः २१

वेदधर्मानतिक्रम्य सोऽधर्मनिरतोऽभवत् ॥ ४ ॥
वह राजा धर्मविहीन मर्यादाको स्थापित करने लगा और वेदोक्त धर्मोंका उल्लङ्घन कर अधर्ममें फँस गया ॥ ४ ॥

निःस्वाध्यायवषट्कारास्तस्मिन् राजनि शासति।
प्रवृत्तं न पपुः सोमं हुतं यज्ञेषु देवताः ॥ ५ ॥
उस राजाके शासनकालमे देवतालोग (उनकी तृप्तिके लिये किये जानेवाले) स्वाध्याय और वषट्कारसे वञ्चित हो गये थे; इसलिये अपने उद्देश्यसे अर्पित तथा यज्ञकुण्डोंमें होमे गये सोमका भी वे पान नहीं करते थे ॥ ५ ॥

न यष्टव्यं न होतव्यमिति तस्य प्रजापतेः।
आसीत् प्रतिज्ञा क्रूरेयं विनाशे प्रत्युपस्थिते ॥ ६ ॥
उसका विनाशकाल समीप आ गया था, अतः उस प्रजापतिने यह क्रूर प्रतिज्ञा घोषित की कि 'मेरे राज्यमें कोई यज्ञ और हवन न करे' ॥ ६ ॥

अहमिज्यश्च यष्टा च यज्ञश्चेति कुरुद्वह।
मयि यज्ञो विधातव्यो मयि होतव्यमित्यपि ॥ ७ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! (वह कहता था कि) 'मैं ही यज्ञोंद्वारा आराध्य और मैं ही यज्ञ करनेवाला हूँ तथा यज्ञ भी मैं ही हूँ। मेरे लिये ही यज्ञ और हवन करना चाहिये' ॥ ७ ॥

तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम्।
ऊचुर्महर्षयः सर्वे मरीचिप्रमुखास्तदा ॥ ८ ॥
जब वह इस प्रकार मर्यादाको तोड़ने लगा और अनुचितरूपसे (कर आदि लगाकर) सब कुछ लूटने लगा, तब जो मरीचि आदि बड़े-बड़े ऋषि थे, उन्होंने उससे कहा—॥८॥

वयं दीक्षां प्रवेक्ष्यामः संवत्सरगणान् बहून्।
अधर्मं कुरु मा वेन नैष धर्मः सनातनः ॥ ९ ॥
'हम बहुत वर्षोंमें पूर्ण होनेवाली दीक्षामें प्रवेश करेंगे। वेन ! अब तुम अधर्म न करो; क्योंकि यह सनातन धर्म नहीं है ॥ ९ ॥

निधनेऽत्र प्रसूतस्त्वं प्रजापतिरसंशयम्।
प्रजाश्च पालयिष्येऽहमिति ते समयः कृतः ॥ १० ॥
'निःसंदेह तुम इस वंशमें प्रजापतिके रूपमें उत्पन्न हुए हो और तुमने प्रतिज्ञा की थी कि 'मैं प्रजाका पालन करूँगा' ॥१०॥

तांस्तदा ब्रुवतः सर्वान् महर्षीनब्रवीत् तदा।
वेनः प्रहस्य दुर्बुद्धिरिममर्थमनर्थवित् ॥ ११ ॥
जब महर्षि इस प्रकार कह रहे थे, उस समय अनर्थको अपनानेवाले दुर्बुद्धि वेनने हँसकर उन लोगोंसे ये बातें कहीँ ॥

वेन उवाच
स्रष्टा धर्मस्य कश्चान्यः श्रोतव्यं कस्य वै मया।
श्रुतवीर्यतपःसत्यैर्मया वा कः समो भुवि ॥ १२ ॥
वेनने कहा—धर्मका रचनेवाला मेरे सिवा और कौन है ? मैं किसकी बात सुनूँ ? इस पृथ्वीपर वेद, वीर्य, तप और सत्यमें मेरे समान दूसरा कौन है ? ॥ १२ ॥

प्रभवं सर्वभूतानां धर्माणां च विशेषतः।
सम्मूढा न विदुर्नूनं भवन्तो मामचेतसः ॥ १३ ॥
आपलोग मूर्ख हैं और अचेत हो रहे हैं, अतः सब भूतोंके और विशेषतः धर्मोंके उत्पत्तिस्थान मुझ वेनको नहीं जानते ॥ १३ ॥

इच्छन् दहेयं पृथिवीं प्लावयेयं तथा जलैः।
खं भुवं चैव रुन्धेयं नात्र कार्या विचारणा ॥ १४ ॥
मैं चाहूँ तो पृथ्वीको भस्म कर दूँ अथवा इसको जलमें डुबो दूँ और पृथ्वी तथा आकाशको भी (अपने तेजसे) ढक दूँ; इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है ॥ १४ ॥

यदा न शक्यते मोहादवलेपाच्च पार्थिवः।
अनुनेतुं तदा वेनस्ततः क्रुद्धा महर्षयः ॥ १५ ॥
गर्व और मोहके वशमें पड़े हुए उस राजा वेनको जब वे ऋषि अधर्म करनेसे न रोक सके, तब वे क्रोधमें भर गये ॥

निगृह्य तं महात्मानो विस्फुरन्तं महाबलम्।
ततोऽस्य सव्यमूरुं ते ममन्थुर्जातमन्यवः ॥ १६ ॥
फिर तो वे महात्मा उस उछल-कूद मचाते हुए महाबली राजाको बलपूर्वक पकड़कर क्रोधमें भर उसकी दाहिनी जाँघको मथने लगे ॥ १६ ॥

तस्मिंस्तु मथ्यमाने वै राज्ञ ऊरौ प्रजज्ञिवान्।
ह्रस्वाऽतिमात्रः पुरुषः कृष्णाभ्रश्चाति बभूव ह ॥ १७ ॥
राजाकी उस जङ्घाके मथे जानेपर उसमेंसे बहुत ठिगना और बहुत ही काला एक पुरुष निकला ॥ १७ ॥

स भीतः प्राञ्जलिर्भूत्वा स्थित्वाञ्जनमेजय।
तमत्रिर्विह्वलं दृष्ट्वा निषीदेत्यब्रवीत् तदां ॥ १८ ॥
जनमेजय ! वह डरा हुआ था, अतः हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब अत्रिने उसे भयसे विह्वल देखकर उससे कहा 'निषीद—बैठ जा' ॥ १८ ॥

निषादवंशकर्तासौ बभूव वदतां वर।
धीवरानसृजच्चाथ वेनकल्मषसम्भवान् ॥ १९ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! वह निषादोंके वंशका चलानेवाला हुआ और उसने धीवरोंको जन्म दिया। ये सभी वेनके पापसे उत्पन्न हुए थे ॥ १९ ॥

ये चान्ये विन्ध्यनिलयास्तुषारास्तुम्बुरास्तथा।
अधर्मरुचयो ये च विद्धि तान् वेनसम्भवान् ॥ २० ॥

२२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

इन धीवरोंके अतिरिक्त और भी जो विन्ध्यमें रहनेवाले तुषार, तुम्बर तथा अधर्मसे प्रेम करनेवाले वनवासी ( गोण्ड-कोल आदि ) हैं, इन सबको तुम वेन ( के पाप ) से उत्पन्न हुआ समझो ॥ २० ॥

ततः पुनर्महात्मानः पाणिं वेनस्य दक्षिणम्।
अरणीमिव संरुद्धा ममन्थुस्ते महर्षयः ॥ २१ ॥

तदनन्तर वे क्रोधमें भरे हुए महात्मा महर्षि वेनके दाहिने हाथको अरणीके समान मथने लगे ॥ २१ ॥

पृथुस्तस्मात् समुत्तस्थौ कराज्ज्वलनसंनिभः ।
दीप्यमानः स्ववपुषा साक्षादग्निरिव ज्वलन् ॥ २२ ॥

तब उस हाथसे अग्निके समान पृथु उत्पन्न हुए, वे अपने शरीरसे साक्षात् प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २२ ॥

स धन्वी कवची जातः पृथुरेव महायशाः ।
आद्यमाजगवं नाम धनुर्गृह्य महारवम् ।
शरांश्र्च दिव्यान् रक्षार्थं कवचं च महाप्रभम् ॥ २३ ॥

महायशस्वी पृथु हाथमें धनुष और बाणको धारण किये हुए और रक्षाके लिये महाकान्तिमान् कवच और दिव्य बाणोंको धारण किये हुए ही उत्पन्न हुए। वे हाथमें महान् शब्द करनेवाले प्राचीन आजगव नामक धनुषको धारण किये हुए थे ॥ २३ ॥

तस्मिञ्जातेऽथ भूतानि सम्प्रहृष्टानि सर्वशः ।
समापेतुर्महाराज वेनश्च त्रिदिवं गतः ॥ २४ ॥

महाराज ! उनके उत्पन्न होनेपर सब प्राणी प्रसन्न होकर उनके पास दौड़ आये और वेन स्वर्गको चला गया ॥ २४ ॥

समुत्पन्नेन कौरव्य सत्पुत्रेण महात्मना ।
त्रातः स पुरुषव्याघ्र पुन्नाम्नो नरकात् तदा ॥ २५ ॥

पुरुषव्याघ्र कौरव ! उस महात्मा सत्पुत्रके उत्पन्न होनेपर उस वेनकी 'पुं' नामक नरकसे रक्षा हो गयी ॥ २५ ॥

तं समुद्राश्च नद्यश्च रत्नान्यादाय सर्वशः ।
तोयानि चाभिषेकार्थं सर्व एवोपतिष्ठिरे ॥ २६ ॥

उन पृथुका अभिषेक करनेके लिये सब समुद्र और नदियाँ चारों ओरसे जल और रत्न लेकर वहाँ उपस्थित हुईं ॥

पितामहश्च भगवान् देवैराङ्गिरसैः सह ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ २७ ॥
समागम्‍य तदा वैन्यमभ्यषिञ्चन्नराधिपम् ।
महता राजराज्येन प्रजापालं महाद्युतिम् ॥ २८ ॥

भगवान् पितामह भी अङ्गिराके पुत्र, पौत्रों तथा सभी देवताओंके साथ वहाँ आये और स्थावर-जङ्गम प्राणियोंने भी वहाँ आकर महाकान्तिमान् वेनके प्रजापालक पुत्र पृथुका बड़े भारी राजाधिराज-पदपर अभिषेक कर दिया ॥ २७-२८ ॥

सोऽभिषिक्तो महातेजा विधिवद्धर्मकोविदैः ।
आदिराज्ये तदा राज्ञां पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ॥ २९ ॥
पित्रापरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः ।
अनुरागात् ततस्तस्य नाम राजेत्यजायत ॥ ३० ॥

जब धर्मके जाननेवालोंने महातेजस्वी और प्रतापी वेनके पुत्र पृथुका राजाओंके आदिराज्य ( साम्राज्य )-पदपर विधिवत् अभिषेक कर दिया, तब उन्होंने पिताद्वारा पीड़ित की हुई प्रजाको अपनी सेवाओंसे खूब प्रसन्न किया। इस प्रकार प्रजासे अनुराग करनेके कारण उनका नाम राजा पड़ गया ॥

आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ ३१ ॥

जब ये समुद्रपर चलते थे, तब जल स्तम्भित हो जाता था ( अर्थात् समुद्रका जल स्थलकी तरह कड़ा हो जाता था ) और जब ये आकाशमें चलते थे, तब पर्वत इनके लिये मार्ग छोड़ देते थे। इस कारण इनके रथकी ध्वजा वृक्ष आदिसे कभी नहीं टूटती थी ॥ ३१ ॥

अकृष्टपच्या पृथिवी सिध्यन्त्यन्नानि चिन्तया ।
सर्वकामदुघा गावः पुटके पुटके मधु ॥ ३२ ॥

( उनके शासनकालमें ) पृथ्वी बिना जोते हुए ही अन्न देती थी। चिन्तनमात्रसे ही अन्न ( भोज्य पदार्थ ) तैयार हो जाते थे, गौएँ कामधेनुके समान सब कामनाओंको पूर्ण करती थीं और वृक्षोंके पत्ते-पत्तेमें मधुर रस भरा रहता था ॥ ३२ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु यज्ञे पैतामहे शुभे ।
सूतः सूत्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः॥ ३३ ॥

इन्हींके ( राज्यत्व ) कालमें पितामहके शुभ यज्ञमें सोमको निकालनेके दिन सोमका अभिषव करते समय अर्थात् रस निकालनेके लिये सोमलताको कूटते समय महाबुद्धिमान् सूतकी उत्पत्ति हुई थी ॥ ३३ ॥

तस्मिन्नेव महायज्ञे जज्ञे प्राज्ञोऽथ मागधः ।
पृथोः स्तवार्थं तौ तत्र समाहूतौ सुरर्षिभिः ॥ ३४ ॥

तदनन्तर उसी महायज्ञमें बुद्धिमान् मागध प्रकट हुआ। देवता और ऋषियोंने पृथुकी स्तुति करनेके लिये उन दोनोंका वहाँ आवाहन किया था ॥ ३४ ॥

तावुचुऋषयः सर्वे स्तूयतामेष पार्थिवः ।
कर्मैतदनुरूपं वां पात्रं चायं नराधिपः ॥ ३५ ॥

सब ऋषियोंने उन दोनोंसे कहा कि तुम दोनों इन पृथिवीपतिकी स्तुति करो, यह कर्म तुम्हारे अनुरूप है और ये राजा भी स्तुतिके पात्र हैं ॥ ३५ ॥

तावूचतुस्तदा सर्वोस्तानृषीन् सूतमागधौ ।
आवां देवानृषींश्चैव प्रीणयावः स्वकर्मभिः ॥ ३६ ॥

उस समय सूत और मागधने उन सब ऋषियोंसे कहा,

हरिवंशपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः [ २३


'हम अपने कर्मोंसे देवता और ऋषियोंको प्रसन्न करेंगे ॥ ३६॥

न चास्य विद्मो वै कर्म न तथा लक्षणं यशः ।
स्तोत्रं येनास्य कुर्याम राज्ञस्तेजस्विनो द्विजाः॥ ३७॥

'परंतु ब्राह्मणो ! इन तेजस्वी राजाके कर्म, लक्षण और यशको तो हम जानते ही नहीं, जिससे इनकी स्तुति करें' ॥ ३७॥

ऋषिभिस्तौ नियुक्तौ च भविष्यैः स्तूयतामिति।
यानि कर्माणि कृत्वाम् पृथुः पश्चान्महाबलः ॥ ३८ ॥

तब ऋषियोंने उन्हें यह कहकर स्तुति-कार्यमें नियुक्त किया कि 'तुम दोनों इनके भविष्यमे होनेवाले गुणोंका उल्लेख करते हुए स्तवन करो।' उन्होंने वैसा ही किया। सूत और मागधने जो-जो कर्म बताये, उन्हींको महाबली पृथुने पीछेसे पूर्ण किया ॥ ३८॥

'सत्यवाग् दानशीलोऽयं सत्यसंधो नरेश्वरः ।
श्रीमाञ्जैत्रः क्षमाशीलो विक्रान्तो दुष्टशासनः ॥ ३९ ॥

(सूत और मागधने राजा पृथुकी स्तुति इस प्रकार आरम्भ की—) 'ये नरेश्वर सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, सत्यवादी, दान देनेवाले, लक्ष्मीवान् और विजयी हैं। ये क्षमा करनेवाले, पराक्रमी तथा दुष्टोंका शासन करनेवाले हैं॥ ३९॥

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च दयावान् प्रियभाषणः ।
मान्यो मानयिता यज्वा ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः ॥ ४० ॥

'ये धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयावान् और प्रिय भाषण करनेवाले हैं। ये माननीय हैं और (दूसरोंका) मान करनेवाले हैं। यज्ञ करनेवाले, ब्राह्मण-भक्त तथा सत्यप्रतिज्ञ हैं॥ ४०॥

शमः शान्तश्च निरतो व्यवहारस्थितो नृपः ।
ततः प्रभृति लोकेषु स्तवेषु जनमेजय ।
आशीर्वादाः प्रयुज्यन्ते सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४१ ॥

'ये राजा शमसम्पन्न, शान्त, कार्यतत्पर तथा अपने व्यवहारमें संलग्न रहनेवाले हैं।' जनमेजय ! उसी समयसे लोगोंमे स्तुतिके अवसरोंपर सूत, मागध और वन्दियोंके द्वारा आशीर्वाद दिलानेकी प्रथा प्रचलित हुई ॥ ४१ ॥

तयोः स्तवैस्तैः सुप्रीतः पृथुः प्रादात् प्रजेश्वरः।
अनूपदेशं सूताय मगधान् मागधाय च ॥ ४२ ॥

प्रजाओके ईश्वर पृथुने उन दोनोंके इन स्तोत्रोंसे प्रसन्न होकर सूतको अनूपदेश और मागधको मगध देश दे दिया ॥ ४२ ॥

तं दृष्ट्वा परमप्रीताः प्रजाः प्राहर्महर्षयः ।
वृत्तीनामेष वो दाता भविष्यति जनेश्वरः ॥ ४३ ॥

इस बातको देखकर महर्षि परम प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रजाओसे कहा, 'ये जनेश्वर (राजा) तुम्हें वृत्ति-आजीविका देनेवाले होंगे' ॥ ४३ ॥

ततो वैन्यं महाराज प्रजाः समभिदुद्रुवुः ।
त्वं नो वृत्तिं विधत्स्वेति महर्षिवचनात् तदा ॥ ४४ ॥

महाराज ! महर्षियोंके ऐसा कहनेपर प्रजा वेनपुत्र राजा पृथुके पास दौड़-दौड़कर आने और कहने लगी कि 'आप हमारी वृत्तिका प्रबन्ध कीजिये' ॥ ४४॥

सोऽभिद्रुतः प्रजाभिस्तु प्रजाहितचिकीर्षया ।
धनुर्गृह्य पृषत्कांश्च पृथिवीमाद्रवद् बली ॥ ४५ ॥

जब प्रजा उनके पास इस प्रकार दौड़कर आयी, तब वे महाबली नरेश प्रजाका हित करनेकी इच्छासे अपने धनुष और बाण लेकर पृथिवीको लक्ष्य करके दौड़े॥४५॥

ततो वैन्यभयन्त्रस्ता गौर्भूत्वा प्राद्रवन्मही ।
तां पृथुर्धनुरादाय द्रवन्तीमन्वधावत ॥ ४६ ॥

तब तो पृथिवी वेन-कुमार पृथुके भयसे त्रस्त हो गौका रूप धारणकर भागने लगी। पृथु भी धनुष लेकर उस भागती हुई पृथिवीके पीछे दौड़ने लगे ॥ ४६॥

सा लोकान् ब्रह्मलोकादीन् गत्वा वैन्यभयात् तदा।
प्रददर्शाग्रतो वैन्यं प्रगृहीतशरासनम् ॥४७॥

पृथिवी राजा पृथुके भयसे ब्रह्मलोक आदि लोकोंमे गयी; परन्तु (उसने सर्वत्र ही) वेनपुत्र पृथुको हाथमें धनुष-बाण धारण किये अपने सामने खड़ा हुआ देखा ॥ ४७ ॥

ज्वलद्भिर्निशितैर्बाणैर्दीप्तस्तेजसमच्युतम् ।
महायोगं महात्मानं दुर्धर्षममरैरपि ॥ ४८ ॥
अलभन्ती तु सा त्राणं वैन्यमेवान्वपद्यत ।
कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पूज्यालोकैस्त्रिभिः सदा ॥ ४९ ॥
उवाच वैन्यं नाधर्म्यं स्त्रीवधं कर्तुमर्हसि ।
कथं धारयिता चासि प्रजा राजन् विना मया ॥ ५० ॥

अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले पृथु प्रज्वलित तीखे बाणोंद्वारा और भी तेजसे उद्भासित हो रहे थे। वे महान् योगबलसे सम्पन्न महात्मा नरेश देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष थे। जब पृथिवीको कहीं भी शरण न मिली, तब वह पृथुकी ही शरणमें पहुँची और तीनों लोकोंकी सदासे पूजनीया पृथिवी दोनों हाथ जोड़कर वेनपुत्र पृथुसे कहने लगी—'आपको स्त्रीवधरूप अधर्मका काम करना उचित नहीं है। राजन् ! (पहले आप यह तो सोचिये कि) मेरे बिना इन प्रजाओको कहाँ स्थापित करेंगे ? ॥ ४८-५०॥

मयि लोकाः स्थिता राजन् मयेदं धार्यते जगत् ।
मद्विनाशे विनश्येयुः प्रजाः पार्थिव विद्धि तत् ॥ ५१ ॥

'राजन् ! ये सब लोक मुझपर ही स्थित हैं, मैं ही इस जगत्‌को धारण कर रही हूँ; (अतः) भूपाल ! आप इस बातको जान रक्खें कि मेरा विनाश होनेपर ये सब प्रजा भी नष्ट हो जायँगी ॥ ५१ ॥

२४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

न त्वमर्हसि मां हन्तुं श्रेयश्चेत् त्वं चिकीर्षसि ।
प्रजानां पृथिवीपाल शृणु चेदं वचो मम ॥ ५२ ॥
'पृथ्वीपाल ! यदि आप प्रजाका कल्याण करना चाहते हैं तो आपको मेरा वध करना उचित नहीं है। साथ ही आप मेरी इस बातको भी सुनिये ॥ ५२ ॥

उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः ।
उपायं पश्य येन त्वं धारयेथाः प्रजा नृप ॥ ५३ ॥
'प्रायः सब कार्य ठीक उपायसे आरम्भ किये जानेपर ही सिद्ध होते हैं; अतः राजन् ! उस उपायका विचार कीजिये, जिससे कि आप प्रजाका पालन कर सकें ॥ ५३ ॥

हत्वापि मां न शक्तस्त्वं प्रजा धारयितुं नृप ।
अनुभूता भविष्यामि यच्छ कोपं महाद्युते ॥ ५४ ॥
'राजन् ! आप मेरा वध करके भी प्रजाका पालन एवं धारण न कर सकेंगे। अतः महाद्युते ! आप अपने क्रोधको शान्त करें, मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगी ॥ ५४ ॥

अवध्याश्च स्त्रियः प्राहुस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि ।
सत्त्वेषु पृथिवीपाल न धर्मं त्यक्तुमर्हसि ॥ ५५ ॥
'भूपाल ! तिर्यक्-योनिके प्राणियोंमें भी स्त्रियोंको अवध्य कहा है, अतः आप धर्मका परित्याग न करें' ॥ ५५ ॥

एवं बहुविधं वाक्यं श्रुत्वा राजा महामनाः ।
कोपं निगृह्य धर्मात्मा वसुधामिदमब्रवीत् ॥ ५६ ॥
ऐसे ही और बहुत-से (अनुनय-विनयके) वाक्योंको सुनकर धर्मात्मा और उदार मनवाले राजा पृथु अपने क्रोधको रोककर वसुधासे इस प्रकार बोले ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पृथूपाख्याने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पृथुका उपाख्यानविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥


षष्ठोऽध्यायः

पृथुका उपाख्यान—पृथ्वीका 'पृथुकी पुत्री' बनकर अनेक प्रकारके दूध देना तथा अनेक पात्रों एवं दुहनेवालोंका वर्णन

पृथुरुवाच

एकस्यार्थाय यो हन्यादात्मनो वा परस्य वा ।
बहून् वै प्राणिनो लोके भवेत् तस्येह पातकम् ॥ १ ॥
पृथुने कहा—वसुधे ! जो पुरुष इस संसारमें अपने या पराये किसी भी एक व्यक्तिके लिये बहुत-से जीवोंका वध करता है, उसे ही यहाँ पाप लगता है ॥ १ ॥

सुखमेधन्ति बहवो यस्मिंस्तु निहतेऽशुभे ।
तस्मिन् नास्ति हते भद्रे पातकं चोपपातकम् ॥ २ ॥
भद्रे ! जिस पापी व्यक्तिके मारे जानेसे बहुत-से प्राणियोंको सुख मिलता हो, उसको मारनेसे न तो पाप लगता है और न उपपातक ही ॥ २ ॥

एकस्मिन् यत्र निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि ।
बहूनां भवति क्षेमं तत्र पुण्यप्रदो वधः ॥ ३ ॥
जहाँ दुष्टताका व्यवहार करनेवाले एक व्यक्तिका वध करनेसे बहुत-से मनुष्योंका कल्याण होता हो, वहाँ उसका वध करना पुण्यप्रद ही है ॥ ३ ॥

सोऽहं प्रजानिमित्तं त्वां हनिष्यामि वसुंधरे ।
यदि मे वचनं नाद्य करिष्यसि जगद्धितम् ॥ ४ ॥
अतः वसुंधरे ! यदि आज तू जगत्‌का हित करनेवाले मेरे वचनको नहीं मानती है तो मैं प्रजाके हितके लिये तेरा अवश्य वध कर डालूँगा ॥ ४ ॥

त्वां निहत्याद्य बाणेन मच्छशासनपराङ्मुखीम् ।
आत्मानं प्रथयित्वाहं प्रजा धारयिता चिरम् ॥ ५ ॥
तू आज मेरे शासनसे पराङ्मुख हो रही है, अतः आज तुझे बाणसे मारकर अपने देहको ही फैलाकर मैं उसपर प्रजाको धारण करूँगा ॥ ५ ॥

सा त्वं शासनमास्थाय मम धर्मभृतां वरे ।
संजीवय प्रजाः सर्वाः समर्था ह्यसि धारणे ॥ ६ ॥
अतएव धर्मचारियोंमें श्रेष्ठ देवि ! तू मेरे शासनको मानकर सारी प्रजाको जीवित रख; क्योंकि तू प्रजाको धारण करने—जीवित रखनेमें समर्थ है ॥ ६ ॥

दुहितृत्वं च मे गच्छ तत एनमहं शरम् ।
नियच्छेयं त्वद्वधार्थमुद्यतं घोरदर्शनम् ॥ ७ ॥
साथ ही तू मेरी पुत्री बन जा, तब मैं तेरे वधके लिये उठाये हुए इस भयंकर दीखनेवाले बाणको रोक लूँगा ॥ ७ ॥

पृथिव्युवाच

सर्वमेतदहं वीर विधास्यामि न संशयः ।
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः ॥ ८ ॥
पृथ्वीने कहा—वीर ! मैं निस्संदेह यह सब कुछ करूँगी, परंतु ठीक उपायसे आरम्भ करनेपर ही सब कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ८ ॥

उपायं पश्य येन त्वं धारयेथाः प्रजा इमाः ।
वत्सं तु मम सम्पश्य क्षरेयं येन वत्सला ॥ ९ ॥

हरिवंशपर्व ] षष्ठोऽध्यायः [ २५


अतः आप उस उपायको देखिये या ढूँढ़ निकालिये, जिससे आप इन प्रजाओंको पुष्ट करके धारण कर सकें। (इसकी युक्ति मैं बताती हूँ) आप मेरे लिये एक बछड़ेकी खोज कीजिये, जिससे मैं (स्नेहसे) पेम्हाकर दूध दूँ ॥ ९ ॥

समां च कुरु सर्वत्र मां त्वं धर्मभृतां वर ।
यथा विस्पन्दमानं मे क्षीरं सर्वत्र भावयेत् ॥ १० ॥

धर्मचारियोंमें श्रेष्ठ ! आप मुझे सर्वत्र सम (चौरस) कीजिये, जिससे कि मेरा झरता हुआ दूध सर्वत्र (व्याप्त) हो जाय ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच
तत उत्सारयामास शैलाञ्छतसहस्रशः ।
धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्धिताः ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय ! तब वेनपुत्र पृथुने धनुषके कोनेसे सैकड़ों और सहस्रों पर्वतोंको उठाकर (ईंटोंकी दीवार-के समान) खड़ा कर दिया, इससे पर्वत बड़े हो गये ॥ ११ ॥

इत्थं वैन्यस्तदा राजा महीं चक्रे समां ततः ।
मन्वन्तरेष्वतीतेषु विषमासीद् वसुंधरा ॥ १२ ॥

इस प्रकार वेनपुत्र राजा पृथुने पृथ्वीको सम (चौरस) कर दिया। पिछले मन्वन्तरोंमें यह पृथ्वी ऊँची-नीची थी ॥ १२ ॥

स्वभावेनाभवन् ह्यस्याः समानि विषमाणि च ।
चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासीदेवं तदा किल ॥ १३ ॥

पहले चाक्षुष मन्वन्तरमे इस पृथ्वीके प्रदेश स्वभावतः ऊँचे-नीचे थे ॥ १३ ॥

न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले ।
प्रविभागः पुराणां च ग्रामाणां वा तदाभवत् ॥ १४ ॥

पहले सर्गमें पृथ्वीके विषम होनेके कारण नगर और ग्रामोंका विभाग नहीं हुआ था ॥ १४ ॥

न सस्यानि न गोरक्षा न कृषिनं वणिक्पथः ।
नैव सत्यानृतं तत्र न लोभो न च मत्सरः ॥ १५ ॥

उस समय न किसी प्रकारका धान्य होता था, न गोरक्षा होती थी और न खेती होती थी तथा न सत्य एवं मिथ्यासे मिला हुआ (वाणिज्य) होता था, उस समय न लोभ था न मत्सर ॥ १५ ॥

वैवस्वतेऽन्तरे चास्मिन् साम्प्रतं समुपस्थिते ।
वैण्यात् प्रभृति राजेन्द्र सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ १६ ॥

राजेन्द्र ! इस वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तरके आनेपर वेनपुत्र पृथुके समयसे ही इन सभी वस्तुओंकी उत्पत्ति हुई है ॥ १६ ॥

यत्र यत्र समं त्वस्य भूमेरासीद्विदांपत ।
तत्र तत्र प्रजाः सर्वाः संवासं समरोचयन् ॥ १७ ॥

निष्पाप नरेश ! जहाँ-जहाँ यह भूमि सम हो गयी, वहाँ प्रजाने रहना पसंद किया ॥ १७ ॥

आहारः फलमूलानि प्रजानामभवत् तदा ।
कृच्छ्रेण महता युक्त इत्येषमनुशुश्रुम ॥ १८ ॥

हमने ऐसा सुना है कि (वेनपुत्र पृथुद्वारा भूमिको दोहन होनेसे) पहले प्रजाओंका आहार फल और मूल था तथा वह भी उन्हें बड़ी कठिनतासे मिलता था ॥ १८ ॥

संकल्पयित्वा वत्सं तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुम् ।
स्वपाणौ पुरुषश्रेष्ठ दुदोह पृथिवीं ततः ।
सस्यजातानि सर्वाणि पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ॥ १९ ॥
तेनान्नेन प्रजास्तात वर्तन्तेऽद्यापि नित्यशः ।

पुरुषश्रेष्ठ ! वेन-पुत्र प्रतापी पृथुने प्रभु स्वायम्भुव मनुको बछड़ा बनाकर पृथ्वीसे सब प्रकारके धान्योंको अपने हाथमें ही दुहा। तात ! उस दिनसे सब प्रजा उसी अन्नसे आजतक बढ़ रही है ॥ १९ ॥

ऋषिभिः श्रूयते चापि पुनर्मुग्धा वसुंधरा ॥ २० ॥
वत्सः सोमोऽभवत् तेषां दोग्धा चाङ्गिरसः सुतः।
बृहस्पतिर्महातेजाः पात्रं छन्दांसि भारत ।
क्षीरमासीदनुपमं तपो ब्रह्म च शाश्वतम् ॥ २१ ॥

भारत ! सुना है, फिर ऋषियोंने भी भूमिको दुहा था, उस समय सोम उनका बछड़ा हुआ, अङ्गिराके पुत्र महातेजस्वी बृहस्पति दुहनेवाले बने और छन्द (वेद) पात्र बने थे। तपोमय शाश्वत ब्रह्म अनुपम दुग्धके रूपमें प्रकट हुआ था ॥ २०-२१ ॥

पुनर्देवगणैः सर्वैः पुरंदरपुरोगमैः।
काञ्चनं पात्रमादाय दुग्धेयं श्रूयते मही ॥ २२ ॥

(यह भी) सुना जाता है कि फिर इन्द्र आदि सब देवताओंने भी सुवर्णका पात्र लेकर इस पृथ्वीको दुहा था ॥ २२ ॥

वत्सस्तु मघवानासीद् दोग्धा च सविता प्रभुः ।
क्षीरमूर्जस्करं चैव वर्तन्ते येन देवताः ॥ २३ ॥

(उस समय) इन्द्र बछड़ा और भगवान् सूर्य दुहनेवाले बने तथा पुष्टिकारक अमृतरूपी क्षीर प्रकट हुआ, जिससे देवता सदा जीवित रहते हैं ॥ २३ ॥

पितृभिः श्रूयते चापि पुनर्मुग्धा वसुंधरा ।
रजतं पात्रमादाय स्वधाममितविक्रमैः ॥ २४ ॥

सुना है कि फिर अतुल पराक्रमी पितरोंने भी पृथ्वीको दुहा था, उन्होंने चाँदीका पात्र लेकर स्वधा (रूपी दूध) का दोहन किया था ॥ २४ ॥

यमो वैवस्वतस्तेषामासीद् वत्सः प्रतापवान् ।
अन्तकश्चाभवद् दोग्धा कालो लोकप्रकालकः ॥ २५ ॥

२६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


प्रतापी विवस्वान्-पुत्र यम उनका बछड़ा बने और लोकोंका अन्त करनेवाला काल-अन्तक उनका दुहनेवाला बना था॥२५॥

नागैश्च श्रूयते दुग्धा वत्सं कृत्वा तु तक्षकम्।
अलाबुं पात्रमादाय विषं क्षीरं नरोत्तम ॥ २६ ॥

नरोत्तम ! (फिर यह भी) सुना जाता है कि नागोंने तक्षकको वत्स बनाकर अलाबु (तूम्बी) के पात्रको लेकर विषरूपी दूध दुहा था ॥ २६ ॥

तेषामैरावतो दोग्धा धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।
नागानां भरतश्रेष्ठ सर्पाणां च महीपते ॥ २७॥

भरतश्रेष्ठ भूपाल ! उस समय दुहनेवाला नाग ऐरावत था और सर्पोंने प्रतापी धृतराष्ट्रको दुहनेवाला बनाया था ॥

तेनैव वर्तयन्त्युग्रा महाकाया विषोल्बणाः ।
तदाहारास्तदाचारास्तद्वीर्यास्तदुपाश्रयाः ॥ २८ ॥

जिनमें स्पष्टरूपसे विष झलकता है, ऐसे ये विशाल शरीरवाले सर्प उस विषसे अपनी आजीविका चलाते हैं। ये उस विषको खाते हैं और इस विषका प्रयोग कर दूसरा आहार प्राप्त करते हैं तथा ये इस विषरूपी बलका सहारा लेकर इस संसारमें अपनी प्रतिष्ठा बनाये हुए हैं ॥ २८ ॥

असुरैः श्रूयते चापि पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
आयसं पात्रमादाय मायां शत्रुनिबर्हिणीम् ॥ २९॥

सुना जाता है कि असुरोंने भी लोहेका पात्र लेकर शत्रुओंको नष्ट करनेवाली माया (रूपी दूध) को इस पृथ्वीसे दुहा था ॥ २९ ॥

विरोचनस्तु प्राह्लादिर्वत्सस्तेषामभूत् तदा।
ऋत्विग्द्विमूर्द्धा दैत्यानां मधुर्दोग्धा महाबलः ॥ ३० ॥

उस समय प्रह्लादका पुत्र विरोचन उनका बछड़ा बना था और दैत्योंका ऋत्विक् दो सिरोंवाला महाबली मधु उनका दुहनेवाला था ॥ ३० ॥

तयैते माययाद्यापि सर्वे मायाविनोऽसुराः ।
वर्तयन्त्यमितप्रज्ञास्तदेषाममितं बलम् ॥ ३१ ॥

अमित बुद्धिवाले मायावी असुर आजकल भी उसी मायासे काम लेते हैं, यह माया ही उनका अपार बल है ॥ ३१ ॥

यक्षैश्च श्रूयते तात पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
आमपात्रे महाराज पुरान्तर्द्धानमक्षयम् ॥ ३२ ॥

तात ! यह भी सुना जाता है कि इसके बाद उस प्राचीन कालमें यक्षोंने भी पृथ्वीको दुहा था । महाराज ! उन्होंने कच्चे पात्रमें अन्तर्धान (गुप्त) होनेकी अक्षय विद्याको दुहा था ॥ ३२ ॥

वत्सं वैश्रवणं कृत्वा यक्षैः पुण्यजनैस्तदा ।
दोग्धा रजतनाभस्तु पिता मणिवरस्य यः ॥ ३३ ॥

उस समय यक्ष और राक्षसोंने विश्रवाके पुत्र कुबेरको बछड़ा तथा मणिवरके पिता रजतनाभको दुहनेवाला बनाया था ॥ ३३ ॥

यक्षानुजो महातेजास्त्रिशीर्षः सुमहातपाः ।
तेन ते वर्तयन्तीति परमर्षिरुवाच ह ॥ ३४ ॥

उन यक्षोंके छोटे भाई महातेजस्वी और महातपस्वी रजतनाभके तीन सिर हैं। इस अन्तर्धान-विद्यासे वे यक्ष जीविका चलाते हैं, इस प्रकार परमर्षि (व्यासदेव) ने कहा था ॥३४॥

राक्षसैश्च पिशाचैश्च पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
शार्वं कपालमादाय प्रजा भोक्तुं नरर्षभ ॥ ३५ ॥

नरश्रेष्ठ ! फिर राक्षसों और पिशाचोंने मुर्देकी खोपड़ी लेकर अपनी संतानको तृप्त करनेके लिये इस वसुन्धराको दुहा था ॥ ३५ ॥

दोग्धा रजतनाभस्तु तेषामासीत् कुरुद्वह ।
वत्सः सुमाली कौरव्य क्षीरं रुधिरमेव च ॥ ३६ ॥

कुरुवंशधर ! उस समय रजतनाभ उनका दुहनेवाला था और सुमाली उनका बछड़ा था। कौरव्य ! उस समय उन्होंने रक्तरूपी दूध दुहा था ॥ ३६ ॥

तेन क्षीरेण यक्षाश्च राक्षसाश्चामरोपमाः ।
वर्तयन्ति पिशाचाश्च भूतसंघास्तथैव च ॥ ३७॥

देवताओंकी ही भाँति यक्ष, राक्षस, पिशाच और भूतोंकी भी मण्डलियाँ उस दूधसे अपनी-अपनी आजीविका चलाती हैं ॥ ३७॥

पद्मपत्रे पुनर्दुग्धा गन्धर्वैः साप्सरोगणैः ।
वत्सं चित्ररथं कृत्वा शुचीन् गन्धान्नरर्षभ ॥ ३८ ॥

नरर्षभ ! फिर अप्सराओं और गन्धर्वोंने भी चित्ररथको बछड़ा बनाकर पद्मपत्रमें वसुधासे पवित्र गन्धोंको दुहा था ॥

तेषां च सुरुचिस्त्वासीद् दोग्धा भरतसत्तम ।
गन्धर्वराजोऽतिबलो महात्मा सूर्यसंनिभः ॥ ३९ ॥

भरतसत्तम ! उस समय सूर्यके तुल्य तेजस्वी और अत्यन्त बलवान् महात्मा गन्धर्वराज सुरुचि उनका दुहनेवाला था ॥ ३९॥

शैलैश्च श्रूयते राजन् पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
ओषधीर्वे मूर्तिमती रत्नानि विविधानि च ॥ ४० ॥

राजन् ! सुना जाता है कि पर्वतोंने भी पृथ्वीसे मूर्तिमती ओषधियों और नाना प्रकारके रत्नोंको दुहा था ॥ ४० ॥

वत्सस्तु हिमवानासीन्मेरुर्दोग्धा महागिरिः ।
पात्रं तु शैलमेवासीत् तेन शैला विवर्धिताः ॥ ४१ ॥

उस समय हिमाचल बछड़ा बना था, महागिरि मेरु दुहनेवाला था तथा पत्थरके पात्रकी दोहनी बनी थी । उस दूधसे पर्वतोंकी वृद्धि हुई ॥ ४१ ॥

हरिवंशपर्व ] षष्ठोऽध्यायः २७


वीरूद्भिः श्रूयते राजन् पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
पालाशं पात्रमादाय दग्धच्छिन्नप्ररोहणम् ॥ ४२ ॥

राजन् ! सुना जाता है कि इसके बाद पलाशके पत्तेका पात्र (दोना) लेकर वृक्षोंने भी पृथ्वीका दोहन किया। जल जाने या कट जानेपर जो पुनः अंकुरित होनेकी शक्ति है, वही उन्हें दूधके रूपमें प्राप्त हुई थी ॥ ४२ ॥

दुदॊह पुष्पितः सालो वत्सः प्लक्षोऽभवत् तदा ।
सेयं धात्री विधात्री च पावनी च वसुंधरा ॥ ४३ ॥

उस समय खिले हुए साल वृक्षने इस पृथ्वीको दुहा था और पाकड़का वृक्ष बछड़ा बना था। इस प्रकार यह पृथ्वी धात्री-विधात्री (माताके समान सबका धारण-पोषण करनेवाली) तथा पवित्र है ॥ ४३ ॥

चराचरस्य सर्वस्य प्रतिष्ठा योनिरॆव च ।
सर्वकामदुघा दोग्ध्री सर्वसस्यप्ररोहिणी ॥ ४४ ॥

यह पृथ्वी समस्त चराचर प्राणियोंका आश्रय-स्थान और उत्पत्ति-स्थान है। यह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनु है तथा यही सब प्रकारके सस्यों (अन्नके पौधों) को अंकुरित करनेवाली है ॥ ४४ ॥

आसीदियं समुद्रान्ता मेदिनीति परिश्रुता ।
मधुकैटभयोः कृत्स्ना मेदसाभिपरेप्लुता ।
तेनेयं मेदिनी देवी प्रोच्यते ब्रह्मवादिभिः ॥ ४५ ॥

पहले यह समुद्रतककी सारी पृथ्वी मधु और कैटभके मेद (चरबी) से भर गयी थी, इसलिये 'मेदिनी' नामसे विख्यात हुई; अतएव यह देवी ब्रह्मवादियोंद्वारा मेदिनी कही जाती है ॥ ४५ ॥

ततोऽभ्युपगमाद् राज्ञः पृथोर्वैन्यस्य भारत ।
दुहितृत्वमनुप्राप्ता देवी पृथ्वीति चोच्यते ।
पृथुना प्रविभक्ता च शोधिता च वसुंधरा ॥ ४६ ॥
सस्याकरवती स्फीता पुरपत्तनमालिनी ।
एवं प्रभावो वैन्यः स राजासीद् राजसत्तमः ॥ ४७ ॥

भरतवंशी राजन् ! फिर वेनपुत्र राजा पृथुके पुत्रीरूपमे अङ्गीकार करनेपर यह देवी उनकी पुत्री बन गयी, इससे यह पृथ्वी कहलाती है। इस पृथ्वीको पृथुने अनेक भागोंमें विभक्त एवं शुद्ध किया, इसको अन्न आदिकी खान बना दिया और समृद्धिशालिनी बनाकर इसे ग्रामों और नगरोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित कर दिया। नृपश्रेष्ठ ! महाराज पृथु ऐसे प्रभावशाली थे ॥ ४६-४७ ॥

नमस्यश्चैव पूज्यश्च भूतग्रामैर्न संशयः ।
ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ४८ ॥
पृथुरेव नमस्कार्यो ब्रह्मयोनिः सनातनः ।

अतएव सभी प्राणियोंको निःसंदेह उनकी पूजा तथा वन्दना करनी चाहिये । वेद-वेदाङ्गके पारगामी महात्मा ब्राह्मणोंको भी (अत्रिकुलमें उत्पन्न होनेके कारण) ब्रह्म-योनि एवं सनातन पुरुष (विष्णुरूप) पृथुके प्रति निश्चय ही नमस्कार करना चाहिये ॥ ४८॥

पार्थिवैश्च महाभागैः पार्थिवत्वमभीप्सुभिः ॥ ४९ ॥
आदिराजो नमस्कार्यः पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।

पृथ्वीके स्वामित्वको चाहनेवाले महाभाग्यवान् राजाओंको भी आदि राजा वेनपुत्र प्रतापी पृथुको प्रणाम करना चाहिये ॥ ४९॥

योधैरपि च विक्रान्तैः प्राप्तुकामैर्जयं युधि ।
पृथुरेव नमस्कार्यो योधानां प्रथमो नृपः ॥ ५० ॥

जो पराक्रमी राजा युद्धमे विजय चाहते हों उनको भी योद्धाओंमें अग्रणी राजा पृथुको अवश्य प्रणाम करना चाहिये ॥

यो हि योद्धा रणं याति कीर्तयित्वा पृथुं नृपम् ।
स घोररूपान् संग्रामान् क्षेमी तरति कीर्तिमान् ॥ ५१ ॥

जो योद्धा राजा पृथुका कीर्तन करके युद्धमें जाता है, वह भयङ्कर संग्रामको कुशलपूर्वक तर जाता (उसमें विजय प्राप्त करता) और यशस्वी होता है ॥ ५१ ॥

वैश्यैरपि च वित्तार्थैः पण्यवृत्तिमधिष्ठितैः ।
पृथुरेव नमस्कार्यो वृत्तिदाता महायशाः ॥ ५२ ॥

वाणिज्य आदिसे आजीविका चलानेवाले धनवान् वैश्यों-को भी चाहिये कि वे वृत्ति (आजीविका) प्रदान करनेवाले महायशस्वी पृथुको अवश्य प्रणाम करें ॥ ५२ ॥

तथैव शूद्रैः शुचिभिस्त्रिवर्णपरिचारिभिः ।
आदिराजो नमस्कार्यः श्रेयः परमभीप्सुभिः ॥ ५३ ॥

इसी प्रकार परम कल्याण चाहनेवाले एवं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णोंकी सेवामे परायण रहनेवाले पवित्र शूद्रों-को भी आदि राजा पृथुको प्रणाम करना चाहिये ॥ ५३ ॥

एते वत्सविशेषाश्च दोग्धारः क्षीरमेव च ।
पात्राणि च मयोक्तानि किं भूयो वर्णयामि ते ॥ ५४ ॥

मैंने तुमसे इन बछड़ोंका, पात्रोंका, दुहनेवालोंका और दुग्धोंका वर्णन कर दिया। अब मैं तुमसे और क्या कहूँ ॥ ५४॥

य इदं शृणुयान्नित्यं पृथोरैश्वर्यमादितः ।
पुत्रपौत्रसमायुक्तो मोदते सुचिरं भुवि ॥ ५५ ॥

जो पुरुष (प्रत्येक कल्पमें होनेवाले अतएव) नित्य इस पृथु-चरित्रको आदिसे (अन्ततक) सुनता है, वह पुरुष पुत्र-पौत्रोंके साथ इस पृथ्वीपर चिर-कालतक आनन्द करता है ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पृथूपाख्याने षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पृथुके उपाख्यानकी समाप्तिविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

२८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


सप्तमोऽध्यायः

मन्वन्तर, मनु, देवता और ऋषियोंका पृथक्-पृथक् वर्णन

जनमेजय उवाच
मन्वन्तराणि सर्वाणि विस्तरेण तपोधन।
तेषां सृष्टिं विसृष्टिं च वैशम्पायन कीर्तय ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**तपोधन वैशम्पायनजी ! सभी मन्वन्तरों तथा उनकी सृष्टि और विलीन होनेका वृत्तान्त अब आप विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥

यावन्तो मनवश्चैव यावन्तं कालमेव च।
मन्वन्तरं तथा ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २ ॥
ब्रह्मन् ! जितने मनु होते हैं और जितने समयतक एक मन्वन्तर रहता है, उसको मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच
न शक्यो विस्तरस्तात वक्तुं वर्षशतैरपि।
मन्वन्तराणां कौरव्य संक्षेपं त्वेव मे शृणु ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तात ! कौरव्य ! मन्वन्तरोंके विस्तारका तो सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता, अतः उसे संक्षेपमें ही मुझसे सुनो ॥ ३ ॥

स्वायम्भुवो मनुस्तात मनुः स्वारोचिषस्तथा।
उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥ ४ ॥
वैवस्वतश्च कौरव्य साम्प्रतो मनुरुच्यते ।
सावर्णिंश्च मनुस्तात भौत्यो रौच्यस्तथैव च ॥ ५ ॥
तथैव मेरुसावर्णाश्चत्वारो मनवः स्मृताः।
अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये॥ ६ ॥
कीर्तिता मनवस्तात मयैते तु यथाश्रुतम्।
ऋषींस्तेषां प्रवक्ष्यामि पुत्रान् देवगणांस्तथा ॥ ७ ॥
तात ! कौरव्य ! स्वायम्भुव मनु, स्वारोचिष मनु, उत्तम मनु, तामस मनु, रैवत मनु एवं चाक्षुष मनु (बीत गये हैं) और वर्तमान (सातवें) मनुका नाम वैवस्वत मनु है। (अब भविष्यके मन्वन्तरोंका वर्णन करते हैं—) तात ! सावर्णि मनु, भौत्य मनु और रौच्य मनु एवं चार मेरुसावर्णि (ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, मेरुसावर्णि, दक्षसावर्णि—ये चारों मेरु पर्वतपर तप करके सिद्ध हो गये हैं, अतएव ये चारों मेरुसावर्णि कहलाते हैं, ) कहे गये हैं। तात ! मैंने भूत, भविष्यत् और वर्तमान (चौदह) मनुओंका गुरुओंसे जिस प्रकार सुना था वैसा वर्णन किया, अब मैं उनके ऋषि, पुत्र और देवताओंका वर्णन करता हूँ ॥ ४-७ ॥

मरीचिरत्रिर्भगवानङ्गिराः पुलहः क्रतुः।
पुलस्त्यश्च वसिष्ठश्च सप्तैते ब्रह्मणः सुताः ॥ ८ ॥
उत्तरस्यां दिशि तथा राजन् सप्तर्षयोऽपरे।
देवाश्च शान्तरजसस्तथा प्रकृतयः परे।
यामा नाम तथा देवा आसन् स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥ ९ ॥
आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च मेधा मेधातिथिर्वसुः।
ज्योतिष्मान् द्युतिमान् हव्यः सवनः पुत्र एव च ॥ १० ॥
मनोः स्वायम्भुवस्यैते दश पुत्रा महौजसः।
एतत् ते प्रथमं राजन् मन्वन्तरमुदाहृतम् ॥ ११ ॥
राजन् ! स्वायम्भुव मन्वन्तरमें वर्तमान मन्वन्तरसे भिन्न मरीचि, भगवान् अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य और वसिष्ठ—ये ब्रह्माजीके सात पुत्र सप्तर्षि होकर उत्तर दिशामें रहते थे। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें शान्तरजा, प्रकृति तथा याम नामक देवता पूजित होते थे। स्वायम्भुव मनुके आग्नीध्र, अग्निबाहु, मेधा, मेधातिथि, वसु, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हव्य, सवन और पुत्र—ये दस महाबली पुत्र थे। राजन् ! मैंने तुमसे यह पहले मन्वन्तरका वर्णन किया ॥ ८-११ ॥

और्वो वसिष्ठपुत्रश्च स्तम्बः काश्यप एव च।
प्राणो बृहस्पतिश्चैव दत्तो निश्च्यवनस्तथा ॥ १२ ॥
एते महर्षयस्तात वायुप्रोक्ता महाव्रताः।
देवाश्च तुषिता नाम स्मृताः स्वारोचिषेऽन्तरे ॥ १३ ॥
तात ! वायुने स्वारोचिष मन्वन्तरमें वसिष्ठके पुत्र और्व, स्तम्ब, काश्यप, प्राण, बृहस्पति, दत्त और निश्च्यवन—ये सात महाव्रतधारी ऋषि बताये हैं और देवताओंका नाम तुषित कहा है ॥ १२-१३ ॥

हविर्ध्रः सुकृतिर्ज्योतिरापोमूर्तिरयस्मयः।
प्रथितश्च नभस्यश्च नभ ऊर्जस्तथैव च ॥ १४ ॥
स्वारोचिषस्य पुत्रास्ते मनोस्तात महात्मनः।
कीर्तिताः पृथिवीपाल महावीर्यपराक्रमाः ॥ १५ ॥
द्वितीयमेतत् कथितं तव मन्वन्तरं मया।
तात ! महात्मा स्वारोचिष मनुके महावीर्यवान् और पराक्रमी हविर्ध्र, सुकृति, ज्योति, आप, मूर्ति, अयस्मय, प्रथित, नभस्य, ऊर्ज और नभ—ये (दस) पुत्र थे, उनका वर्णन कर दिया । पृथ्वीपाल ! यह मैंने तुमसे दूसरे मन्वन्तरका वर्णन कर दिया ॥ १४-१५½ ॥

इदं तृतीयं वक्ष्यामि तन्निबोध नराधिप ॥ १६ ॥
वसिष्ठपुत्राः सप्तासन् वासिष्ठा इति विश्रुताः।
हिरण्यगर्भस्य सुता ऊर्जा नाम सुतेजसः ॥ १७ ॥
ऋषयोऽत्र मया प्रोक्ताः कीर्त्यमानान् निबोध मे।
औत्तमेयान् महाराज दश पुत्रान् मनोरमान् ॥ १८ ॥
इष ऊर्जस्तनूजश्च मधुर्माधव एव च।

हरिवंशपर्व ] सप्तमोऽध्यायः २५

शुचिः शुक्रः सहश्चैव नभस्यो नभ एव च ॥ १९ ॥
भानवस्तत्र देवाश्च मन्वन्तरमुदाहृतम् ।

राजन् ! अब मैं तीसरे मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ, सुनो। उत्तम नामक मन्वन्तरमें वासिष्ठ नामसे प्रसिद्ध वसिष्ठजीके सात पुत्र (सप्तर्षि) थे। वे पहले हिरण्यगर्भके पुत्र थे। उनके नाम ऊर्ज थे, तथा वे बड़े तेजस्वी थे। इस प्रकार मैंने ऋषियोंका वर्णन कर दिया। महाराज ! अब मैं उत्तम मनुके दस मनोहर पुत्रोंका वर्णन करता हूँ; सुनो— इष, ऊर्ज, तनूज, मधु, माधव, शुचि, शुक्र, सह, नभस्य और नभ (ये दस उत्तम मनुके पुत्र थे) और उस मन्वन्तरमें भानु नामक देवता थे। (इस प्रकार यह तीसरा) मन्वन्तर बताया गया ॥ १६-१९॥

मन्वन्तरं चतुर्थं ते कथयिष्यामि तच्छृणु ॥ २० ॥
काव्यः पृथुस्तथैवाग्निर्जन्मुर्धाता च भारत ।
कपीवानकपीवांश्च तत्र सप्तर्षयोऽपरे ॥ २१ ॥
पुराणे कथितास्तात पुत्राः पौत्राश्च भारत ।
सत्या देवगणाश्चैव तामसस्यान्तरे मनोः ॥ २२ ॥
पुत्रांश्चैव प्रवक्ष्यामि तामसस्य मनोर्नृप ।
द्युतिस्तपस्यः सुतपास्तपोमूलस्तपोधनः ॥ २३ ॥
तपोरतिरकल्माषस्तन्वी धन्वी परंतपः ।
तामसस्य मनोरेते दश पुत्रा महाबलाः ॥ २४ ॥

भारत ! अब मैं चौथे मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ, सुनो। तामस नामक मन्वन्तरमें काव्य, पृथु, अग्नि, जन्यु, धाता, कपीवान् और अकपीवान्—ये सात सप्तर्षि थे। तात ! पुराणोंमें इनके बहुत-से पुत्र-पौत्रोंका वर्णन है। तामस मन्वन्तरमें सत्य नामक देवता थे। भारत ! अब मैं तामस मनुके पुत्रोंका वर्णन करता हूँ। राजन् ! तामस मनुके द्युति, तपस्य, सुतपा, तपोमूल, तपोधन, तपोरति, कल्माष, तन्वी, धन्वी और परंतप—ये दस महाबली पुत्र थे ॥ २०-२४॥

वायुप्रोक्ता महाराज पञ्चमं तदनन्तरम् ।
वेदबाहुर्यदुध्रश्च मुनिर्वेदशिरास्तथा ॥ २५ ॥
हिरण्यरोमा पर्जन्य ऊर्ध्वबाहुश्च सोमजः ।
सत्यनेत्रस्तथाऽऽत्रेय एते सप्तर्षयोऽपरे ॥ २६ ॥
देवाश्चाभूतरजसस्तथा प्रकृतयोऽपरे ।
पारिप्लवश्च रैभ्यश्च मनोरन्तरमुच्यते ॥ २७ ॥
अथ पुत्रानिमांस्तस्य निबोध गदतो मम ।
धृतिमानव्ययो युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ॥ २८ ॥
अरण्यश्च प्रकाशश्च निर्मोहः सत्यवाक् कविः ।
रैवतस्य मनोः पुत्राः पञ्चमं चैतदन्तरम् ॥ २९ ॥

इन सबका वायुने वर्णन किया है। महाराज ! अब पाँचवें (रैवत मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ।) उस मन्वन्तरमे वेदबाहु, यदुध्र, वेदशिरा मुनि, हिरण्यरोमा, पर्जन्य, सोमपुत्र ऊर्ध्वबाहु और अत्रिपुत्र सत्यनेत्र—ये सात ऋषि थे। उस मन्वन्तरमें भूतरजा, प्रकृति, पारिप्लव और रैभ्य नामक देवगण थे। यह सब (पञ्चम) मन्वन्तरका वर्णन है। अब मैं रैवत मनुके पुत्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। धृतिमान्, अव्यय, युक्त, तत्त्वदर्शी, निरुत्सुक, अरण्य, प्रकाश, निर्मोह, सत्यवाक् और कवि—ये रैवत मनुके पुत्र हैं। यह पञ्चम मन्वन्तरका वर्णन हुआ ॥ २५-२९ ॥

षष्ठं ते सम्प्रवक्ष्यामि तन्निबोध नराधिप ।
भृगुर्नभो विवस्वांश्च सुधामा विरजास्तथा ॥ ३० ॥
अतिनामा सहिष्णुश्च सप्तैते वै महर्षयः ।
चाक्षुषस्यान्तरे तात मनोर्देवानिमाञ्शृणु ॥ ३१ ॥
आद्याः प्रभूता ऋभवः पृथग्भावा दिवौकसः ।
लेखाश्च नाम राजेन्द्र पञ्च देवगणाः स्मृताः ।
ऋषेराङ्गिरसः पुत्रा महात्मानो महौजसः ॥ ३२ ॥
नड्वलेया महाराज दश पुत्राश्च विश्रुताः ।
ऊरुप्रभृतयो राजन् षष्ठं मन्वन्तरं स्मृतम् ॥ ३३ ॥

नराधिप ! अब मैं छठे (चाक्षुष मन्वन्तर) का वर्णन करता हूँ, सुनो। तात ! चाक्षुष मन्वन्तरमें भृगु, नभ, विवस्वान्, सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु—ये सात महर्षि थे। राजेन्द्र ! अब (इस मन्वन्तरके) देवताओंका परिचय सुनो। आद्य, प्रभूत, ऋभु, पृथग्भाव और लेखा नामवाले देवताओंके पाँच गण थे, ये स्वर्गमें रहते थे। ये सब अङ्गिरा ऋषिके पुत्र थे और सभी परम तेजस्वी महात्मा थे। इनकी माताका नाम नड्वला था। महाराज ! (चाक्षुष मनुके) ऊरु आदि दस प्रसिद्ध पुत्र थे। राजन् ! यह छठे मन्वन्तरका वर्णन किया गया ॥ ३०-३३ ॥

अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपश्च महानृषिः ।
गौतमोऽथ भरद्वाजो विश्वामित्रस्तथैव च ॥ ३४ ॥
तथैव पुत्रो भगवानृचीकस्य महात्मनः ।
सप्तमो जमदग्निश्च ऋषयः साम्प्रतं दिवि ॥ ३५ ॥

(अब सप्तम मन्वन्तरका वर्णन करते हैं—) इस वर्तमान समयमें स्वर्गमें स्थित अत्रि, भगवान् वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र और सातवें महात्मा ऋचीकके पुत्र भगवान् जमदग्नि—ये सप्तर्षि हैं ॥ ३४-३५ ॥

साध्या रुद्राश्च विश्वे च मरुतो वसवस्तथा ।
आदित्याश्चाश्विनौ चैव देवौ वैवस्वती स्मृतौ ॥ ३६ ॥
मनोर्वैवस्वतस्यैते वर्तन्ते साम्प्रतेऽन्तरे ।
इक्ष्वाकुप्रमुखाश्चैव दश पुत्रा महात्मनः ॥ ३७ ॥

साध्य, रुद्र, विश्वेदेव, मरुत्, वसु, आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार, जो कि सूर्यके पुत्र कहलाते हैं,