भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] द्वाविंशोऽध्यायः [ ८०५

एवं शूद्रा विसर्पन्तो भुवि कात्स्न्येन जन्मना ।
नासंस्कृतेन धर्मेण वेदप्रोक्तेन कर्मणा ॥ १७ ॥
जैसे अरणीका मन्थन करनेसे प्रकट हुई अग्निमें धूमका समुदाय उत्पन्न होकर बहुत दूरतक फैल जाता है तो भी अग्निहोत्री (यज्ञ करनेवाले) द्विज यज्ञकर्ममें उस धूमका उपयोग नहीं करते हैं, इसी प्रकार पृथ्वीपर जन्म लेकर पूर्णतः सब ओर फैले हुए शूद्र संस्कारहीन होनेके कारण वेदोक्त धर्म-कर्मके उपयोगमें आने योग्य नहीं हैं ॥ १६-१७ ॥

ततोऽन्ये दक्षपुत्राश्च सम्भूता ब्रह्मयोनयः ।
बलवन्तो महोत्साहा महावीर्या महौजसः ॥ १८ ॥
तदनन्तर दक्षके और भी बहुत-से पुत्र, जो वेदके स्थानभूत ब्राह्मण थे, वे बलवान्, महान् उत्साहसे सम्पन्न, महान् पराक्रमी तथा महान् तेजस्वी थे ॥ १८ ॥

पित्रा प्रोक्ता महात्मानो दक्षिणा यज्ञकर्मणा ।
अन्तमिच्छाम्यहं श्रोतुं धात्र्याः पुत्रा बलो ह्यहम् ॥ १९ ॥
उन सामर्थ्यशाली महात्मा पुत्रोंसे यज्ञकर्मपरायण पिता दक्षने कहा—'पुत्रो ! मैं तुम्हारे मुखसे धात्री (पृथ्वी) का अन्त सुनना चाहता हूँ; क्योंकि मैं बलवान् हूँ (अतः धात्रीका अन्त जानता हूँ) ॥ १९ ॥

ततो विधास्ये तत्त्वज्ञाः प्रजानां विपुलं बलम् ।
विपुलत्वाद्धि क्षेत्राणां ममापि विपुलाः प्रजाः ॥ २० ॥
'तत्त्वज्ञ पुत्रो ! तुमसे धात्रीका अन्त सुनकर तुम्हारे बलका ज्ञान हो जानेके पश्चात् मैं प्रजाओंके लिये विपुल बलकी सृष्टि करूँगा, क्योंकि क्षेत्रों (शरीरों) की विशालतासे ही मेरी प्रजा भी अधिक बलशालिनी हो सकती है' ॥ २० ॥

न तेषां दर्शयाद् देवी चक्षुषा रूपमात्मनः ।
प्रजापतिसुतानां वै विपुलासारमिच्छताम् ॥ २१ ॥
विशाल पृथ्वीका अन्त जाननेकी इच्छावाले उन प्रजापति-पुत्रोंको पृथ्वीदेवीने अपने आधिदैविक रूपका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कराया ॥ २१ ॥

आत्मनो भावनिर्वृत्ते भावे कृतयुगे तदा ।
जनित्री सर्वभूतानामण्डजानुद्भिज्जांस्तथा ॥ २२ ॥
संवेदजननी धात्री चेति मात्रा प्रचोदिता ।
अणुतां तनुतां चैव जन्तूनां कर्मभोगिनाम् ॥ २३ ॥
तदनन्तर जब स्वभावसिद्ध कृतयुग (विशुद्ध सत्त्वमय भाव) आया, तब (उन प्रजापति पुत्रोंके अपने अभिप्रायकी सिद्धि हो जानेपर) प्रमाता चेतन (परमात्मा विष्णु) से प्रेरित हो धात्री, जो अपने सच्चिदानन्दस्वरूपसे सम्यग् ज्ञानकी जननी है, समस्त प्राणियोंकी जन्मदायिनी हुई । उसीने अण्डजों और स्वेदजोंको भी उत्पन्न किया तथा उसीने कर्मफल-भोग करनेवाले प्राणियोंके शरीरोंको लघु, सूक्ष्म एवं विशाल रूप प्रदान किया ॥ २२-२३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥


द्वाविंशोऽध्यायः

दक्षका अपने आधे अङ्गसे स्त्रीरूप होकर बहुत-सी कन्याओंको उत्पन्न करना और उनका धर्म, कश्यप एवं सोमको दान कर देना, कश्यप और दक्षकन्याओंकी संतानोंका वर्णन तथा देवलोकमें उत्पन्न होनेवालोंकी योग्यता

जनमेजय उवाच
साध्वहं श्रोतुमिच्छामि त्रेतायां ब्राह्मणोत्तम ।
यज्ज्ञात्वा सर्वविद्यानां परं पश्येयमव्ययम् ॥ १ ॥
जनमेजय बोले—ब्राह्मणशिरोमणे ! त्रेतायुगके प्रवृत्तिरूप (यज्ञादि) धर्ममें जो समीचीन तत्त्व है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ, जिसे जानकर (आचरणमें लाकर) मैं समस्त विद्याओंके परम लक्ष्य अविनाशी ब्रह्मका साक्षात्कार कर सकूँ ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
दक्षस्तु पुनरालम्ब्य स्त्रीभावं पुरुषोत्तमः ।
योगाद् योगेश्वररात्मानं निषण्णो गिरिमूर्धनि ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! पुरुषोत्तम दक्ष योगबलसे स्त्रीशरीरको प्राप्त हो गये । वह स्त्रीशरीर उन योगेश्वर दक्षका अपना ही स्वरूप था। उस स्वरूपका अवलम्बन करके वे एक पर्वतके शिखरपर बैठे थे ॥ २ ॥

सुजानुः पीनजघना सुभ्रूः पद्मनिभानना ।
रक्तान्तनयना कान्ता सर्वभूतमनोरमा ॥ ३ ॥
उस स्त्रीके घुटने सुन्दर, जघनप्रदेश स्थूल, भौंहें मनोहर, मुख प्रफुल्ल कमलके समान कान्तिमान् तथा दोनों नेत्रोंके कोये लाल थे । वह समस्त भूतोंके मनको मोहनेवाली नारी कमनीय कान्तिसे युक्त थी ॥ ३ ॥

८०६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

दक्षः प्राचेतसस्तस्यां कन्यायां जनयत् प्रभुः ।
देहार्धयोगविधिना कन्याः पद्मनिभाननाः ॥ ४ ॥
भगवान् प्राचेतस दक्षने देहार्ध-संयोगकी विधिसे उस अर्धाङ्गजजनित नारीके गर्भसे प्रफुल्ल कमलके समान मनोहर मुखवाली बहुत-सी कन्याओंको उत्पन्न किया ॥ ४ ॥

दक्षः पुरुषरूपेण स्त्रीरूपमपहाय वै।
दर्शने सर्वभूतानां कान्तः कान्ततरोऽभवत् ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् उस स्त्रीरूपका परित्याग करके दक्ष पुनः पुरुष-रूपसे स्थित हो गये। उस समय वे समस्त प्राणियोंकी दृष्टिमें परम कान्तिमान् एवं कमनीय प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥

ताः कन्याः प्रददौ दक्षः स्वयं प्राचेतसः प्रभुः ।
ब्रह्मदेयेन विधिना ब्रह्मप्राप्तेन भारत ॥ ६ ॥
भारत ! इसके बाद स्वयं प्राचेतस भगवान् दक्षने उन कन्याओंका वेदोक्त ब्राह्मविधिसे विवाह कर दिया ॥ ६ ॥

प्रददौ दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सप्तविंशति सोमाय पत्नीहेतोः समाहितः ॥ ७ ॥
उन्होंने एकाग्रचित्त होकर धर्मको दस, कश्यपको तेरह और सोमको सत्ताईस कन्याएँ इसलिये दीं कि वे इन्हें अपनी धर्मपत्नी बना लें ॥ ७ ॥

दक्षो दत्त्वाथ ताः कन्या ब्रह्मक्षेत्रं प्रपद्य च ।
ब्रह्मणाध्युषितं पुण्यं समाहितमना मुनिः ॥ ८ ॥
उन कन्याओंका दान करनेके पश्चात् दक्ष मुनि ब्रह्माजी-के क्षेत्र प्रयागमें आये, जहाँ ब्रह्माजी पहले निवास करते थे और इसीलिये जो परम पुण्यदायक तीर्थ हो गया था। वहाँ आकर वे मनको एकाग्र करके परमात्माका चिन्तन करने लगे ॥ ८ ॥

तप्यमानो मृगैः सार्धं चचार वसुधां नृप ।
तृणमूलफलैर्वृद्धो वृद्धश्च तपसासकृत् ॥ ९ ॥
नरेश्वर ! तदनन्तर दक्ष तपस्यामें संलग्न हो मृगोंके साथ इस वसुधापर विचरने लगे। वे तृण और फल-मूलसे ही अपने शरीरका पोषण करते थे। उनके तपकी निरन्तर वृद्धि हो रही थी ॥ ९ ॥

मृगास्तु तस्य मोदन्ति फलं मोदन्ति ब्राह्मणाः ।
दीक्षिताः पुण्यकर्माणस्तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥ १० ॥
उनकी तपस्याके प्रभावसे मृग बड़े प्रसन्न थे (क्योंकि उस तपसे सर्वत्र अहिंसा-भावका प्रसार हो रहा था)। यज्ञमें दीक्षित हो पुण्य कर्म करनेवाले तथा तपस्यासे अपने पापोंको दग्ध कर देनेवाले ब्राह्मण दक्षके उस अहिंसाप्रधान तपका वैर-त्यागरूप फल प्रत्यक्ष देखकर आनन्दमग्न रहते थे ॥

संग्रामकाले कालज्ञः शरीरादिपतिर्मुनिः ।
कर्मयज्ञकृतां तात सिद्धिं पश्यति लक्षणात् ॥ ११ ॥
योगीको अपने चित्तपर विजय प्राप्त करनेके लिये जो संग्राम (तत्परतापूर्ण साधन) करना पड़ता है, उसका अवसर आनेपर कालगतिके ज्ञाता तथा शरीर, इन्द्रिय आदिपर शासन करनेवाले मुनिवर दक्षको कर्मयज्ञजनित सिद्धि निकट दिखायी देने लगी; क्योंकि उस सिद्धिका सूचक लक्षण प्रकट हो रहा था ॥ ११ ॥

दानमानप्रवीराश्च निरुद्वेगा निरामियाः ।
मृगैः सह जरां यान्ति सपत्नीकाः सुपुत्रिणः ॥ १२ ॥
जो दूसरोंको दान और मान देनेमें प्रमुख वीर हैं, जिनका उद्वेग सर्वथा शान्त हो गया है, जो आमिष आदि भोगोंका परित्याग कर चुके हैं तथा जो श्रेष्ठ पुत्रोंके पिता हैं, ऐसे गृहस्थ द्विज अपनी पत्नीके साथ उस वनमें जाकर मृगोंके साथ वृद्धावस्थाको प्राप्त होते थे ॥ १२ ॥

ब्राह्मणाः स्तोत्रसंसिद्धा जनित्रे प्रथमे पदे ।
ब्रह्मणाध्युषितत्वाच्च ब्रह्मक्षेत्रमिहोच्यते ॥ १३ ॥
वेदाध्ययनसे सिद्ध हुए ब्राह्मण वहाँ सबके उत्पादक प्रथम पद—परब्रह्म परमात्मामें प्रतिष्ठित होते थे और ब्रह्माजी भी उस स्थानमें निवास कर चुके थे; इसीलिये यहाँ प्रयागको ब्रह्मक्षेत्र कहते हैं (आध्यात्मिक दृष्टिसे ब्रह्मकी उपलब्धिक स्थान होनेके कारण यह शरीर ही ब्रह्मक्षेत्र है) ॥ १३ ॥

यतिभिः कर्मभिर्मुक्तैर्जितक्रोधैर्जितेन्द्रियैः ।
चरद्भिर्वसुधां विप्रैरकिंचनपथैषिभिः ॥ १४ ॥
जो कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हैं, क्रोधपर विजय पा चुके हैं और इन्द्रियोंको वशमें कर चुके हैं, वे अकिंचन (परिग्रहशून्य) पथपर चलनेकी इच्छावाले और भूतलपर विचरते रहनेवाले संन्यासी ब्राह्मण इस क्षेत्र (प्रयाग अथवा शरीर) को ब्रह्मक्षेत्र कहते हैं ॥ १४ ॥

या प्रजा सर्वमारूढा मानसी ब्रह्मचारिणी ।
सैवैया व्यक्तिमापन्ना स्वभावदुरतिक्रमा ॥ १५ ॥
जो प्रजा हृदयाकाशमें स्थित सर्वस्वरूप ब्रह्ममें आरूढ थी, ब्रह्ममें ही विचरनेके कारण ब्रह्मचारिणी कहलाती थी और मानसिक संकल्पमें स्थित होनेसे मानसी कही जाती थी, वही यह स्वभाव (संस्कार या प्रारब्ध) से दुर्लङ्घ्य होकर अव्यक्तावस्थासे व्यक्तावस्थाको प्राप्त हुई है ॥ १५ ॥

अव्यक्ता व्यक्तमापन्ना स्वभावादुरतिक्रमा ।
व्यक्ताव्यक्तगतिश्चैषा कालधर्मान्महीपते ॥ १६ ॥
जो अव्यक्त थी, वही स्वभावसे दुर्लङ्घ्य होकर व्यक्ता-वस्थाको प्राप्त हो गयी। राजन् ! कालधर्मसे यह सारी प्रजा व्यक्त और अव्यक्त रूपमें परिणत होती रहती है ॥ १६ ॥

स्थावरा जङ्गमाश्चैव स्थूलसूक्ष्माश्च भारत ।
कालयोगेन योगज्ञा भवन्ति न भवन्ति च ॥ १७ ॥
भारत ! कालयोंगसे स्थावर-जंगम, स्थूल और सूक्ष्म सभी प्राणी योगज्ञ होते हैं और नहीं भी होते हैं ॥ १७ ॥

भविष्यपर्व ]त्रयोविंशोऽध्यायः८०७

एताश्चैताः प्रजाः सर्वा दक्षकन्यासु जज्ञिरे ।
कश्यपेनाव्ययेनेह संयुक्ताः कालधर्मणा ॥ १८ ॥
ये सारी प्रजाएँ महर्षि कश्यपके द्वारा दक्षकन्याओंके गर्भसे उत्पन्न हुई हैं। ये सब-की-सब कालरूप धर्मवाले अक्षय स्वभावसे संयुक्त हैं ॥ १८ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।
नागाश्चानेकशिरसः साध्या वै पन्नगास्तथा ॥ १९ ॥
गन्धर्वाः किन्नरा यक्षाः सुपर्णाश्च तथापरे ।
गरुत्मन् सह यक्षैश्च किन्नराश्च सुवाससः ॥ २० ॥
गावः पशुगणैः सार्धं नराश्च वसुधाधिप ।
चराचराश्च वसुधाधातारश्च धराधराः ॥ २१ ॥
गजाः सिंहाश्च व्याघ्राश्च हयाः पक्षधरास्तथा ।
खङ्गा विषाणिनश्चैव वृषभाश्च मृगास्तथा ॥ २२ ॥
चतुर्विषाणा नागेन्द्राः पद्माभा वर्णतः शुभाः ।
सर्वलक्षणसम्पन्नाः प्राणिनः कामरूपिणः ॥ २३ ॥
राजन् ! आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, अनेक सिरवाले नाग, साध्य, सर्प, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, सुपर्ण, गरुड़, सुन्दर वस्त्रधारी किन्नर, अन्यान्य पशुगणोंके साथ गौएँ, मनुष्य, चराचर प्राणी, पृथ्वीको धारण करनेवाले पर्वत, हाथी, सिंह, व्याघ्र, पंखधारी घोड़े, गैंडे, सींगवाले बैल और मृग, चार दाँतवाले तथा कमलकी-सी कान्तिवाले शुभलक्षण गजराज, समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले अन्यान्य प्राणी—इन सबकी उत्पत्ति महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दक्षकन्याओंसे हुई है ॥ १९–२३ ॥

तेषां रूपैस्तथा गात्रैस्तैः शीलैस्तैः पराक्रमैः ।
मुनयः पुनरुद्भूता धर्मक्षेत्रे सनातने ॥ २४ ॥
धर्मकी सनातन प्रसवभूमि भारतवर्षमें जो मुनि पुनः उत्पन्न हुए, वे पूर्व-कल्पके ऋषि-मुनियोंके रूप, शरीर, शील और पराक्रमसे सम्पन्न हुए ॥ २४ ॥

क्षेत्रज्ञा मानसे लोके धर्मिणो वेदगोचराः ।
यत्रोद्भूताः सुराः सर्वे दिवि लोके प्रतिष्ठिताः ॥ २५ ॥
वेदोक्त मार्गपर चलनेवाले धर्मात्मा क्षेत्रज्ञ (आत्मनिष्ठ) पुरुष मानस लोक (मनःकल्पित, बाह्य या आभ्यन्तर जगत्) में देवरूपसे प्रकट हुए होते हैं और वे सब-के-सब दिव्य-लोकमें प्रतिष्ठित हो जाते हैं ॥ २५ ॥

ये चान्ये तपसा सिद्धा गृहस्था मनुजाधिप ।
ब्रह्मचर्येण संसिद्धाः परिचर्या गता गुरोः ॥ २६ ॥
ये च योगगतिं प्राप्ताः सिद्धिहेतोर्महीपते ।
क्लेशाधिकैः कर्मजन्यैर्वृत्तिं लप्स्यन्ति वै द्विजाः ॥ २७ ॥
शिलोञ्छवृत्तयः ख्याताः सपत्नीका दृढव्रताः ।
सर्वे त्वेते दिविचरा भवन्ति चरितव्रताः ॥ २८ ॥
नरेश्वर ! जो दूसरे गृहस्थ तपस्यासे सिद्ध होते हैं अथवा जो ब्रह्मचारी गुरुकी सेवा करके ब्रह्मचर्य-पालनके द्वारा सिद्धिलाभ करते हैं और पृथ्वीनाथ ! जो सिद्धिके लिये योग-मार्गको अपनाये हुए हैं, जो द्विज सत्कर्मके लिये अधिक क्लेश सहन करके जीविका पाते हैं, जो खेतोंमें बाल बीनकर या बाजार उठ जानेपर वहाँ गिरे हुए अन्नके दाने चुनकर जीवन-निर्वाह करनेके लिये विख्यात हैं और पत्नीके साथ रहकर दृढ़तापूर्वक धर्मके पालनमें लगे रहते हैं; इन सबने उत्तम व्रतका पालन किया है; अतः ये सब-के-सब आकाशचारी देवता होते हैं ॥ २६–२८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥


त्रयोविंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीके महायज्ञका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

पितामहं पुरस्कृत्य मेरुपृष्ठे समाहिताः ।
जटाजिनधरा विप्रास्त्यक्तक्रोधा जितेन्द्रियाः ॥ १ ॥
पर्वतान्तरसंसिद्धे बहुपादपसंवृते ।
धातुसंरञ्जितशिले समे निस्तृणकण्टके ॥ २ ॥
त्रयाणां ब्रह्मवेदानां पञ्चस्वरविराजिते ।
मन्त्रयज्ञपरा नित्यं नित्यं व्रतहिते रताः ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! मेरुपर्वतकी घाटीपर पितामह ब्रह्माजीको आगे करके कुछ एकाग्रचित्त ब्राह्मण विराजमान हुए, जो जटा और मृगचर्म धारण किये हुए थे । उन्होंने क्रोधको त्याग दिया था और इन्द्रियोंपर विजय पा ली थी ॥ १ ॥

पर्वतकी वह घाटी दूसरे पर्वतोंसे घिरी हुई थी । वहाँ बहुत से वृक्ष शोभा दे रहे थे । वहाँकी शिलाएँ अनेक प्रकारकी धातुओंसे रँगी हुई थीं । उस समतल प्रदेशमें तृण और कण्टकोंका सर्वथा अभाव था । ब्रह्मका ज्ञान करानेवाले

८०८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तीनों वेदोंके पाँच स्वरोंसे उस पर्वतशिखरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँ बैठे हुए वे ब्राह्मण मन्त्रजपरूपी यज्ञमें सदा तत्पर रहनेवाले थे। व्रतके पालन और परहितके साधनमें उनकी सदा ही प्रवृत्ति थी ॥ २-३ ॥

एकमेवाग्निमाधाय सर्वे ब्राह्मणपुङ्गवाः ।
बिभिदुर्मन्त्रविषयैः सुसमाहितमानसाः ॥ ४ ॥
वे समस्त ब्राह्मणशिरोमणि वहाँ एक ही अग्निकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी उपासना करते थे। उन्होंने मन्त्रप्रतिपाद्य विषयोंकी दृष्टिसे उस अग्निके अनेक भेद किये ॥ ४ ॥

त्रिधा प्रणीतो ज्वलनो मुनिभिर्वेदपारगैः ।
अतस्ते तत्त्वमापन्ना यदेकस्त्रिविधः कृतः ॥ ५ ॥
वेदोंके पारङ्गत विद्वान् मुनियोंने उस अग्निको तीन भागोंमें विभक्त करके स्थापित किया (उन तीनों अग्नियोंके नाम ये हैं—आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि)। उनके द्वारा एक ही अग्निकी तीन स्वरूपोंमें अभिव्यक्ति हुई, इसलिये उन्हें तत्त्वका बोध प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥

एक एव महानग्निर्हविषा सम्प्रवर्तते ।
स्वधाकारेण धर्मज्ञ मन्त्राणां कार्यसिद्धये ॥ ६ ॥
धर्मज्ञ जनमेजय ! एक ही अग्नि मन्त्रोक्त कार्योंकी सिद्धिके लिये स्वधारूप हविष्यके सेवनसे महान् होकर सम्यक्-रूपसे प्रज्वलित होता है ॥ ६ ॥

स्वयं च दक्षः सम्प्राप्तो भगवान् भूतसत्कृतः ।
ब्रह्मा ब्राह्मणनिर्माता सर्वभूतपितामहः ॥ ७ ॥
वहाँ समस्त प्राणियोंद्वारा सम्मानित स्वयं भगवान् दक्ष पधारे, जो ब्रह्मा अर्थात् ब्राह्मण हैं। उन्होंने ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है तथा वे सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ॥ ७ ॥

दण्डी चर्मी शरी खड्गी शिखी पद्मनिभाननः ।
अभवन्न्यस्तसंतापो जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥
उनके हाथोंमें दण्ड, बाण, ढाल और तलवार—ये आयुध शोभा पाते थे। उन्होंने शिखा धारण कर रखी थी। उनका मुख कमलके समान कान्तिमान् था। वे संतापरहित, क्रोधको जीतनेवाले तथा जितेन्द्रिय थे ॥ ८ ॥

यजते पुष्करे ब्रह्मा मेधया सह संगतः ।
इन्द्रप्रोक्तानि सामानि गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ ९ ॥
वहाँ पुष्करतीर्थमें ब्रह्माजी मेधाके साथ बैठकर यज्ञ करने लगे और बहुत-से ब्रह्मवादी मुनि इन्द्रकथित साममन्त्रोंका गान करने लगे ॥ ९ ॥


१. वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी विधिमें स्वरप्रदर्शनके पाँच प्रकार ही यहाँ पाँच स्वर कहे गये हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, एकश्रुति और प्रचय ।


घृतं क्षीरं यवा व्रीहिः सर्वं परमकं हविः ।
वेदप्रोक्तं मखे न्यस्तं कल्पितं ब्रह्मणः पदे ॥ १० ॥
उस यज्ञमें घृत, खीर, जौ, चावल आदि सब उत्तमोत्तम हविष्य, जिसका वेदमें वर्णन किया गया है, ब्रह्माजीके निकट सजाकर रखा गया था ॥ १० ॥

निर्मथ्यारणिमाग्नेयीं शमीगर्भसमुत्थिताम् ।
स ब्रह्मा प्रथमं तस्मिन्नग्निमग्र्यं प्रवर्तयत् ॥ ११ ॥
शमीके गर्भसे उत्पन्न हुई अग्निसम्बन्धिनी अरणीका मन्थन करके ब्रह्माजीने उस यज्ञमें एक दूसरे ही प्रधान अग्निको प्रकट किया ॥ ११ ॥

न ह्यल्पं विहितं द्रव्यं यथानिर्यक्षकर्मणि ।
प्रवर्तयेद् विभागैर्वा हुतद्रव्यमयं बलम् ॥ १२ ॥
जैसे यक्षकर्ममें मन्थनसे प्रकट हुए अग्निदेवको स्थापित करके उन्हें ही हवनीय पदार्थकी आहुति देनेका विधान है, उसी प्रकार वहाँ अल्प द्रव्य देनेकी विधि नहीं है । यज्ञ करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह हुत द्रव्यमय बलको विभागपूर्वक प्रकट करे ॥ १२ ॥

फलानि तैः प्रयुक्तानि हवींषि विततेऽध्वरे ।
प्रयुञ्जते प्रयोगज्ञा मुनयो ब्रह्मवादिनः ॥ १३ ॥
उस विशाल यज्ञमें जिन-जिन विहित हविष्योंका उपयोग किया गया उनके द्वारा उनके यथायोग्य फल भी प्रकट हुए। प्रयोगके ज्ञाता ब्रह्मवादी मुनि ही उन हविष्योंका प्रयोग करते थे ॥ १३ ॥

षण्मासांश्चतुरो वेदान् सम्बभाषे बृहस्पतिः ।
ब्रह्मणो वितते यज्ञे परया ब्रह्मसम्पदा ॥ १४ ॥
उत्तम ब्रह्म-सम्पत्तिसे युक्त ब्रह्माजीके उस विस्तृत यज्ञमें देवगुरु बृहस्पतिने छः मासतक चारों वेदोंका प्रवचन किया ॥

शिक्षाक्षरसमेताया मधुरायाः समन्ततः ।
सानुखरितरामायाः सरस्वत्याः प्रभाषते ॥ १५ ॥
वे उपनिषद् और कर्मकाण्डके द्वारा अत्यन्त रमणीय तथा शिक्षाके अक्षरोंसे युक्त मधुर वेदवाणीका सब ओर प्रवचन करते थे ॥ १५ ॥

तेन ब्राह्मणशब्देन ब्रह्मप्रोक्तेन भारत ।
विभाति स मखो व्यक्तं ब्रह्मलोक इवापरः ॥ १६ ॥
भारत ! ब्राह्मण-मन्त्रोंके पाठ और वेदोंके उस प्रवचनसे वह विशाल यज्ञमण्डप निश्चय ही दूसरे ब्रह्मलोकके समान शोभा पाता था ॥ १६ ॥

मखो ब्रह्ममुखोत्तीर्णो ब्रह्मशब्दैरनामयैः ।
प्रयोगैः सम्प्रयुक्तः स जहपन्निव विवर्धते ॥ १७ ॥
ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट (अथवा ब्रह्माजीकी प्रधानतामें सम्पादित) हुआ वह यज्ञ अनामय (अप्रामाणिकताकी

भविष्यपर्व ] त्रयोविंशोऽध्यायः ८०९


आशङ्कासे रहित) वेदके शब्दों और श्रुतिके अनुसार विनि-युक्त (प्रयुक्त) हुए मन्त्रोंद्वारा सम्यक्रूपसे अनुष्ठानमें लाया जाकर बोलता हुआ-सा उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त हो रहा था ॥ १७ ॥

समिद्भिः सोमकलशैः पात्रैश्चैव वहिश्चरैः।
यवैव्रीहिभिराज्यैश्च पूर्णैश्च जलभाजनैः ॥ १८ ॥

उस यज्ञमे समिधाएँ, सोमरस रखनेके लिये कलश, स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञपात्र, बाह्यपात्र, जौ, व्रीहि, घृत तथा जलसे भरे हुए पात्र रखे हुए थे, जिनसे उस यज्ञकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १८ ॥

कर्म प्राप्तैश्च वसुभिः कर्मभिश्च परान्वितैः।
गोभिः पयस्विनीभिश्च परिवत्सैश्च कोमलैः ॥ १९ ॥

सब ओरसे प्राप्त हुए सुवर्ण आदि रत्नों, परमात्माको समर्पित करके किये गये इष्टि आदि कर्मों, दूधके लिये लायी गयी दुधारू गोओं और उनके कोमल बछड़ोंसे सुशोभित हुए उस यज्ञकी उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही थी ॥ १९ ॥

ब्रह्मवृद्धो वयोवृद्धस्तपोवृद्धश्च भारत।
ब्रह्मज्ञानमयो देवो विद्यया सह संगतः ॥ २० ॥

भारत ! वेदमन्त्रोंकी ध्वनिसे, दक्षिणारूपी वयसे तथा तपस्या (ज्ञान) से बढ़े हुए वे ब्रह्मज्ञानमय यज्ञदेव विद्या (यज्ञकर्मकी अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी उपासना) से संयुक्त हो उत्तरोत्तर बढ़ रहे थे ॥ २० ॥

मानसैश्च क्रियामूर्त्तिर्यै च भूताः स्वयं नृप।
ग्रहा जुहोति तांस्तत्सान्मरुद्भिः सहितस्तदा ॥ २१ ॥

नरेश्वर ! उस समय यज्ञात्मा ब्रह्मा मरुद्गणोंके साथ रहकर मनःकल्पित समिधा आदि उपकरणोंसे युक्त जो स्वयं उनसे प्रकट हुए घृत आदि हवनीय पदार्थ थे, उनकी अग्निमें आहुति देने लगे ॥ २१ ॥

तेजोमूर्तिधरै रूपैर्न च तत्कर्मणास्पृशत्।
वेदप्रोक्तेन विधिना सर्वप्राणभृतां नृप ॥ २२ ॥

जनमेजय ! वेदोक्त विधिसे किया गया और तेजोमय (चिन्मय) मूर्ति धारण करनेवाले द्रव्य-देवता आदि याग-सम्बन्धी रूपोंसे युक्त हुआ ब्रह्माजीका वह यज्ञ समस्त प्राणियोंके कर्मसे अछूता रह गया (अर्थात् उनका यज्ञकर्म सबसे उत्कृष्ट था) ॥ २२ ॥

निर्मथ्यारणिमाग्नेयीं शमीगर्भसमुत्थिताम्।
ऋतुना यजते पूर्णमग्निष्टोमेन स प्रभुः ॥ २३ ॥

वे भगवान् ब्रह्मा शमीगर्भ (अश्वत्थ) से उत्पन्न हुई अग्निसम्बन्धिनी अरणीका मन्थन करके (प्रकट की हुई अग्निमें ही) अग्निष्टोम यागद्वारा पूर्ण विधिके साथ यजन कर रहे थे ॥ २३ ॥


सदस्यैस्तत्सदो व्यक्तं शुशुभे यज्ञकर्मणि।
जल्पन्ति मधुरा वाचः सानुसाराः क्रियास्तथा ॥ २४ ॥

उस यज्ञकर्मके सम्पादनकालमें सदस्योंसे भरा हुआ वह यज्ञसभाका मण्डप बड़ी शोभा पा रहा था। वहाँ सब लोग बड़ी मधुर वाणी बोलते थे तथा सहायकोंसहित सारी क्रियाएँ सम्पन्न हो रही थीं ॥ २४ ॥

कर्मभिश्च तपोयुक्तैर्वेदवेदाङ्गपारगैः।
सूर्येन्दुसदृशै राजन् विरराज महाक्रतुः ॥ २५ ॥

राजन् ! वह महायज्ञ वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् तथा सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी ब्राह्मणोंद्वारा किये गये तपोयुक्त कर्मोंद्वारा बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २५ ॥

ब्रह्मघोषेण महता ब्रह्मावास इवापरः।
वसुधामिव सम्प्राप्तैः सर्वैरेव दिवौकसैः ॥ २६ ॥

वेदोंके महान् घोषसे वह यज्ञशाला दूसरे ब्रह्मलोककी भाँति जान पड़ती थी। उस समय सारे देवता भूतलपर आये प्रतीत होते थे ॥ २६ ॥

वेदवेदाङ्गविद्विद्भिस्त्रिनीतैर्ब्रह्मवादिभिः।
गतागतैस्तपःश्रान्तैः स्वर्गलोके महीयते ॥ २७ ॥

वेदवेदाङ्गोंके ज्ञाता, विनयशील एवं ब्रह्मवादी ऋषि, जो तपस्या करते-करते दुर्बल हो गये थे, उस यज्ञमें आते-जाते दिखायी देते थे। उनके कारण वह यज्ञ ऐसी शोभा पाता था मानो स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हुआ हो ॥ २७ ॥

ज्वलद्भिरिव विप्रैस्तैस्त्रिभिरेवाध्वरेऽग्निभिः।
ब्रह्मलोक इवाभाति ब्रह्मणः स महाक्रतुः ॥ २८ ॥

ब्रह्माका वह महान् यज्ञ तेजस्वी ब्राह्मणों और यज्ञस्थलमें प्रज्वलित होनेवाली त्रिविध अग्नियोंसे ब्रह्मलोककी भाँति प्रकाशित हो रहा था ॥ २८ ॥

इन्द्रप्रोक्तानि सामानि गायन्ति ब्रह्मवादिनः।
वचनानि प्रयुक्तानि यजूंषि विततेऽध्वरे ॥ २९ ॥

उस विस्तृत यज्ञमें ब्रह्मवादी मुनि इन्द्रकथित साममन्त्रोंका गान और यजुर्वेदके वाक्योंका पाठ कर रहे थे ॥ २९ ॥

तपःशान्ता ब्रह्मपराः सत्यव्रतसमाहिताः।
आययुर्मुनयः सर्वे मनोभिः श्रोत्रवादिभिः ॥ ३० ॥

वहाँ तपस्यासे शान्त, ब्रह्मपरायण तथा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर रहनेवाले समस्त मुनि सुनी हुई बातोंका अनुसरण करनेवाले मानसिक संकल्पके द्वारा आ पहुँचे थे ॥ ३० ॥

होता चैवाभवद्राजन् ब्रह्मत्वे च बृहस्पतिः।
सर्वधर्मविदां श्रेष्ठः पुराणो ब्रह्मसम्भवः ॥ ३१ ॥

राजन् ! उस यज्ञमें सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा ब्रह्मपुत्र अङ्गिराके आत्मज पुरातन ऋषि बृहस्पति होता थे और वे ही ब्रह्माके पदपर भी प्रतिष्ठित थे ॥ ३१ ॥

८१० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


यजमानश्च यज्ञान्ते विष्णोः पूजां प्रयुज्य च।
अदित्याः पश्चिमे गर्भे तपसा सम्भृते नृप ॥ ३२ ॥
नरेश्वर ! यज्ञके अन्तमें भगवान् विष्णुकी पूजा करके यजमान ब्रह्मा तपस्यासे पुष्ट हुए अदिति देवीके पिछले गर्भमें अवतीर्ण हुए ॥ ३२ ॥

पदं विष्णुरजो ब्रह्मा निर्द्वन्द्वं निष्परिग्रहम्।
यतः पदसहस्राणि भविष्यन्त्युद्भवन्ति च ॥ ३३ ॥
परम पद विष्णु हैं। अजन्मा ब्रह्मा उस विष्णुसंज्ञक निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य पदको प्राप्त होते हैं, जहाँसे सहस्रों इन्द्रादि पद प्रकट होते हैं और होते रहेंगे ॥ ३३ ॥

अवन्ध्यं चाप्रमेयं च व्यतिरिक्तं च कर्मभिः।
आत्मापि यस्य मुनयो भवन्ति निष्परिग्रहाः ॥ ३४ ॥
वह विष्णुपद अवन्ध्य है, अर्थात् उसकी प्राप्तिसे समस्त कर्मोंका फल मिल जाता है। वह अप्रमेय (अनन्त) तथा कर्मोंसे असङ्ग है। परिग्रहशून्य मुनि उस विष्णुपदके आत्मा ही होते हैं ॥ ३४ ॥

परिग्रहाश्च विषया दोषप्राप्ता महीपते।
दोषाश्च युगपत् सर्वे छादयन्ति मनो बलात् ॥ ३५ ॥
पृथ्वीनाथ ! सब ओरसे बाँधनेवाले रूप आदि विषय राग आदि दोषोंसे ही प्राप्त होते हैं। समस्त दोष पूर्व संस्कारके बलसे मनको आच्छादित कर लेते हैं ॥ ३५ ॥

इन्द्रियग्रामविषये चरन्तो निष्परिग्रहाः।
परिग्रहं शुभं धर्ममविद्यालक्षणं विदुः ॥ ३६ ॥
मुनिगण इन्द्रिय-समूहोंके विषयोंमें विचरते हुए भी परिग्रहशून्य ही होते हैं (वे उनमें कभी आसक्त नहीं होते)। ज्ञानी पुरुष वेदबोधित धर्मको शुभ मानते हैं, किंतु परिग्रह को अविद्या (अज्ञान) का लक्षण समझते हैं ॥ ३६ ॥

विद्यालक्षणसंयोगान्न मनश्छाद्यते नृप।
यदि चेन्मुनिशब्देन गृह्यते ब्रह्मवादिभिः ॥ ३७ ॥
नरेश्वर ! यदि ब्रह्मवादी पुरुष मुनित्वकी प्राप्ति करानेवाले शब्द (तत्त्वमसि आदि वाक्य अथवा प्रणवके उपदेश) से साधकको अनुगृहीत कर लेते हैं तो (वह उसके मननसे तत्त्वज्ञानी हो जाता है, उस दशामे) विद्याके लक्षणसे संयुक्त होनेके कारण उसके मनको राग आदि दोष नहीं आच्छादित करते हैं ॥ ३७॥

वेदविद्याव्रतस्नातैर्नियतैः कुरुसत्तम।
दिवि लोकाः सतां स्थानं लोकानां लोक उच्यते ॥ ३८ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! जो वेदविद्या एवं ब्रह्मचर्य-व्रतको पूर्ण करके उसमें निष्णात हो चुके हैं तथा शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनमें तत्पर रहते हैं, वे कर्मठ पुरुष स्वर्गमें सत्पुरुषोंके रहनेके लिये जो लोक या स्थान हैं, उन्हींको-लोक कहते हैं ॥

यत्र देवा हव्यपुष्टा न क्षयं यान्ति भारत।
यजमानश्च भोगैः स्वैः कर्मप्राप्तोदिते पदे।
मोदते सह पत्नीभिर्निर्ज्वरो वसुधाधिप ॥ ३९ ॥
भारत ! उनकी दृष्टिमें लोक वही है, जहाँ हविष्यसे पुष्ट हुए देवता कभी नष्ट नहीं होते हैं। पृथ्वीनाथ ! यज्ञ करनेवाला यजमान भी वहाँ कर्मानुसार प्राप्त और वहाँके अधिकारियोंद्वारा अनुमोदित पदपर प्रतिष्ठित हो अपने लिये नियत भोगों एवं पत्नियोंके साथ निश्चिन्त होकर सुख भोगता एवं आनन्दमग्न रहता है ॥ ३९ ॥

यज्ञावसाने शैलेन्द्रं द्विजेभ्यः प्रददौ प्रभुः।
दयया सर्वभूतानां निर्मलेनान्तरात्मना ॥ ४० ॥
यज्ञके अन्तमें सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्माने अपने निर्मल अन्तःकरणसे समस्त प्राणियोंपर दया करके वह श्रेष्ठ पर्वत द्विजोंको दे दिया ॥ ४० ॥

तं शैलं सर्वगात्राणि परस्परविशेषिणः।
न शेकुः प्रविभागार्थं भेत्तुं सर्वोद्यमैरपि ॥ ४१ ॥
एक-दूसरेकी अपेक्षा विशिष्ट योग्यतावाले वे ब्राह्मण आपसमें बाँटनेके लिये उस पर्वतके सभी अङ्गोंका भेदन करनेको उद्यत हुए; परंतु सब प्रकारसे उद्योग करके भी उसे तोड़नेमें समर्थ न हो सके ॥ ४१ ॥

ततस्ते ब्राह्मणगणा निषेदुर्वसुधातले।
श्रमेणाभिहताः सर्वे विवर्णवदना नृप ॥ ४२ ॥
नरेश्वर ! तब परिश्रमके मारे हुए वे समस्त ब्राह्मण थककर पृथ्वीपर बैठ गये। उस समय उनके मुख कान्तिहीन (उदास) हो गये थे ॥ ४२ ॥

सुपार्श्वो गिरिमुख्यस्तु वाग्भिर्मधुरभाण्डता।
अब्रवीत् प्रणतः सर्वाञ्छिरसा तान् द्विजोत्तमान् ॥ ४३ ॥
तब पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुपार्श्व, जो मीठे वचन बोलनेवाला था, उन समस्त ब्राह्मणशिरोमणियोंको मस्तक नवाकर प्रणाम करके बोला—॥ ४३ ॥

न हि शक्यो बलाद् भेत्तुं युष्माभिरसुसङ्गिभिः।
अपि वर्षशतैर्दिव्यैः परस्परविरोधिभिः ॥ ४४ ॥
'ब्राह्मणो ! आपलोग प्राणों (इन्द्रियों) में आसक्त हैं, अतएव एक दूसरेके विरोधी हो रहे हैं। आप-जैसे लोग सौ दिव्य वर्षोंतक प्रयत्न करते रहें तो भी इस पर्वतका बलपूर्वक भेदन नहीं कर सकते ॥ ४४ ॥

एकीभूता यदा सर्वे भविष्यथ समाहिताः।
अविरोधेन युगपद् विभजिष्यथ निर्वृताः ॥ ४५ ॥
'जब सब लोग एकीभूत एवं एकाग्रचित्त हो जायेंगे और पारस्परिक विरोधको हटाकर एक साथ प्रयत्न करेंगे, तब सुखपूर्वक इस पर्वतका विभाजन कर सकेंगे ॥ ४५ ॥

भविष्यपर्व ] चतुर्विंशोऽध्यायः ८११

बलं हि रागद्वेषाभ्यां वर्धते ब्रह्मसत्तमाः।
विमुक्तं रागदोषाभ्यां ब्रह्म वर्धति शाश्वतम् ॥ ४६ ॥

'ब्राह्मणशिरोमणियो ! राग और द्वेषसे बलका नाश होता है, परंतु यदि अपना चित्त राग और द्वेषसे मुक्त हो तो सनातन ब्रह्मके प्रति साधककी निष्ठा बढ़ती है ॥ ४६ ॥

यदाहं भेदयिष्यामि खर्गभिन्नैः शिलाशतैः।
धातुभिश्च विसर्पद्भिः शिखरैश्चानुपातिभिः ॥ ४७ ॥
विशीर्णैः पार्श्वविवरैर्नागैश्च गलितैर्भुवि।
बहुभिर्व्यालरूपैश्च चोद्यमानो गुहाशयैः ॥ ४८ ॥

'जब मैं इस पर्वतकी गुफामें शयन करनेवाले बहुसंख्यक हिंसक जन्तुओं—व्याघ्र, सिंह और सर्प आदिसे प्रेरित होकर आपलोगोंको इस पर्वतके भेदनमें लगाऊँगा, तभी आपलोग इसके भेदनमें समर्थ हो सकेंगे। उस समय स्वर्गसे भिन्न इसकी सैकड़ों शिलाएँ बिखर जायँगी। लगातार गिरते हुए शिखरोंके साथ सरकती हुई धातुएँ भी छिन्न-भिन्न हो जायँगी। जीर्ण-शीर्ण हुए पार्श्ववर्ती विवरोंके साथ उनमें रहनेवाले नाग भी पृथ्वीपर गिरते दिखायी देंगे। (आध्यात्मिक दृष्टिसे यहाँ सुपार्श्व पर्वत सद्गुरु है; जिसका भेदन करना है, वह पर्वत अभिमान है। वे ब्राह्मण ज्ञानयोगी साधक हैं तथा पर्वतकी गुफामें शयन करनेवाले हिंसक जन्तु अन्तःकरणमें संचित हुए नाना प्रकारके संस्कार हैं) ॥ ४७-४८ ॥

प्रतिगृह्य च तद् वाक्यं शैलेन्द्रस्य सुभाषितम्।
तूष्णीं बभूवुस्ते सर्वे तदा ब्राह्मणसत्तमाः ॥ ४९ ॥

शैलराज सुपार्श्वका कहा हुआ वह उत्तम वचन ग्रहण करके वे समस्त ब्राह्मणशिरोमणि उस समय चुप हो गये ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥


चतुर्विंशोऽध्यायः

चारों आश्रमोंमें स्थित हुए ब्राह्मणोंकी ब्रह्माजीके यज्ञस्थलके पुण्य-प्रदेशमें निवासकी इच्छा

वैशम्पायन उवाच
बलिहोमाश्च वर्धन्ते अह्न्यहनि भारत।
द्विजानां तपसाढ्यानां गृहधर्मेषु तिष्ठताम् ॥ १ ॥
देवतार्थाश्च पूज्यन्ते तदा प्रभृति भारत।
तेषां ब्रह्मविदां राजन् पृथिव्यां ब्रह्मवादिभिः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन ! तभीसे वे तपोधन ब्रह्मवेत्ता द्विज गृहस्थ-धर्ममे स्थित हो गये। उनके घरमे प्रतिदिन बलिवैश्वदेव और होम आदि कर्मोंका विस्तार होने लगा। राजन्! तभीसे उन ब्रह्मवादियोंद्वारा भूतलपर देव-प्रतिमाओंकी पूजा भी की जाने लगी ॥ १-२ ॥

तत्रैव ब्रह्मसदने समे निस्तृणकण्टके।
प्राज्येन्धनतृणे देशे पुण्ये पर्वतरोधसि ॥ ३ ॥
वासं तत्र प्रकुर्वन्ति दृष्ट्वा भगवतः क्रियाम्।
तपोऽर्थिनो महाभागा ब्रह्मचर्यव्रते स्थिताः ॥ ४ ॥
गृहस्थधर्मनिरता दानप्राप्तेन चेतसा।
यतयश्चापि काङ्क्षन्ति धर्मेणेह विकाङ्क्षिणः ॥ ५ ॥

ब्रह्माजीके निवासस्थानभूत उस पुण्य प्रदेशमें ही पूर्वोक्त पर्वतके समतल तटपर, जहाँ काँटेदार तृणोंका अभाव है तथा ईंधन और घास आदि प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते हैं; भगवान् ब्रह्माका वह यज्ञकर्म देखकर वे तपस्याकी कामनावाले महाभाग ब्राह्मण ब्रह्मचर्य-व्रतके पालनमें तत्पर रहकर निवास करने लगे। कुछ ब्राह्मण शुद्ध चित्तसे गृहस्थ-धर्मके अनुष्ठानमें संलग्न हो वहाँ वास करने लगे तथा आकाङ्क्षाका परित्याग करनेवाले यतियोंके मनमें भी वहाँ धर्मपूर्वक निवास करनेकी अभिलाषा जाग्रत् हो गयी ॥ ३-५ ॥

वन्यैः कर्मफलैश्चैव रता ब्राह्मणपुङ्गवाः।
अग्निहोत्रव्रतस्नाता जितक्रोधाः समाहिताः ॥ ६ ॥

जो जंगली फल-मूलोंसे जीवन-निर्वाह करते हुए वानप्रस्थोचित कर्म करते थे, अग्निहोत्रके नियममें निष्णात थे, क्रोधको जीतकर चित्तको एकाग्र रखनेवाले थे, वे ब्राह्मण-शिरोमणि भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे ॥ ६ ॥

दैवयुक्तेन वा युक्ताः कर्मणा ब्रह्मसत्तमाः।
चीरवल्कलसंवीता नियता नियतेन्द्रियाः ॥ ७ ॥
चरन्तो ब्रह्मचर्यं च व्रतमास्थाय दारुणम्।

जो दैवात् प्राप्त हुए (बिना माँगे मिले हुए) अथवा याचनाकर्मसे उपलब्ध हुए अन्नसे जीवन-निर्वाह करते थे, चीर और वल्कल पहनते थे तथा नियमपरायण होकर इन्द्रियोंको संयममें रखते थे, वे श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे। जो कठोर व्रतका आश्रय ले ब्रह्मचर्यका पालन करते थे, उन्हे भी वहीं रहनेकी इच्छा हुई ॥

अनेन विधिना राजन् कर्मप्राप्तेन सर्वशः ॥ ८ ॥
क्रमाद् वेदसंस्कारं पुण्यं प्राप्ताः सनातनम्।
पूर्वैराचरितं राजन् मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ९ ॥

राजन् ! इस विधिसे क्रमशः प्राप्त आश्रमधर्मका पूर्णतः पालन करते हुए जिन लोगोंने प्राचीन ब्रह्मवादी मुनियोंद्वारा

८१२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आचरणमें लाये हुए पवित्र सनातन वेद-संस्कारको क्रमसे उपलब्ध किया था, वे भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे ॥

नावेदविद्वानागच्छेन्नापि रौद्रं व्रतं चरेत्।
न च त्यागेन गच्छेत गृहधर्मं न च त्यजेत् ॥ १० ॥

सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त किये बिना मनुष्यको ( ब्रह्मचर्याश्रमसे ) गृहस्थाश्रममें नहीं आना चाहिये। वह कठोर व्रत ( वानप्रस्थोचित तप ) भी न करे। संन्यास-मार्गका भी अवलम्बन न करे और न गृहस्थधर्मका परित्याग ही करे ( वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके विवेकपूर्वक ही उसे एक आश्रमका त्याग और दूसरेका ग्रहण करना चाहिये ) ॥ १० ॥

नैव गच्छेत दुःस्थानमप्राप्तो वेदसंचयम्।
ऋचश्च संचयः पूर्वः सामगानां च भारत ॥ ११ ॥

भारत ! वैदिक ज्ञानराशिको उपलब्ध किये बिना किसीको, जिसमें स्थिर रहना कठिन है, उस चतुर्थ आश्रममें भी नहीं जाना चाहिये। बह्वृचों, सामगों और यजुर्वेदियोंको भी पहले ऋचाओंके ही ज्ञानका संचय करना चाहिये ॥ ११ ॥

ये चापि पुत्रिणो न स्युः श्रुत्वापि प्राप्नुयुः फलम्।
ब्राह्मणास्तपसा श्रान्ता गुरोश्च परिचर्यया ॥ १२ ॥

जो लोग पुत्रवान् नहीं हुए हैं अर्थात् जिन्होंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश नहीं किया है, वे लोग वेदान्त श्रवण करके भी उसके फलस्वरूप ज्ञानको प्राप्त कर सकते हैं। तपस्या तथा गुरुकी सेवाका श्रम स्वीकार करनेवाले ब्राह्मण भी वेदान्त श्रवण करके उसके फलस्वरूप ज्ञानको पा सकते हैं ॥ १२ ॥

यस्य नैव श्रुतं ब्रह्म न गृहीतं विशाम्पते।
कामं तं धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् ॥ १३ ॥

प्रजानाथ ! जिसने गुरुके मुखसे वेदका श्रवण और उसके ज्ञानको श्रवण नहीं किया, उस ब्राह्मणसे धर्मात्मा राजा अपनी इच्छाके अनुसार शूद्रोचित कर्म करावे ॥ १३ ॥

अथवा नैव विद्येत यद् ब्रह्म नाद्रियेद् द्विजः।
द्वाभ्यां तु श्रोत्रविषये मनः पूर्वं समाहितम् ॥ १४ ॥

अथवा यदि द्विज ब्राह्मण होकर भी वेदका आदर न करे तो उसमें ब्राह्मणत्व है ही नहीं। जिसने ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य दोनों अवस्थाओंमें श्रवण करने योग्य धर्म एवं ब्रह्ममें पहलेसे ही ( अध्ययनाध्यापनके समयसे ही ) मन एकाग्र किया है, वही ब्राह्मण है ( अतः राजाको उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये ) ॥ १४ ॥

एवं सर्वेन्द्रियारम्भान् वेदपूर्वान् समाचरेत्।
ब्राह्मणो भूतिसम्पन्नो य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ १५ ॥

अतः जो वैभवसम्पन्न ब्राह्मण अपना कल्याण चाहता हो, वह इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे आरम्भ होनेवाले कार्योंको वेदाध्ययनपूर्वक ही करे ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥


पञ्चविंशोऽध्यायः

नारद आदिके द्वारा ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजीका सत्कार, ब्रह्माजीके द्वारा कश्यपको यज्ञका आदेश, देवता-दानव-युद्ध तथा विष्णुके द्वारा मधुकी पराजय

वैशम्पायन उवाच

ते तु गोब्राह्मणा नागाश्चन्द्रादित्यपुरस्कृताः।
ब्राह्मणान् पूजयन् देवान् वसुभिर्ब्रह्मसम्भवैः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! चन्द्रमा और सूर्यको आगे करके उपस्थित हुए नागों, गौओं और ब्राह्मणोंने ब्रह्मसम्पत्तिके द्वारा देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥

नारदप्रमुखाश्चैव गन्धर्वा ऋषयो नृप।
कुर्वन्ति सततं यज्ञे क्रमप्राप्तं पितामहम् ॥ २ ॥

नरेश्वर ! उस यज्ञमें नारद आदि गन्धर्व एवं ऋषि सदा ब्राह्मणपूजाके क्रममें आये हुए ब्रह्माजीकी भी पूजा करते थे ॥

वचोभिर्मधुराभाषैः पञ्चेन्द्रियनिवासिभिः।
सर्वभूतप्रियकरैः सर्वभूतहितैषिभिः ॥ ३ ॥
स्तूयमानश्च यज्ञान्ते पञ्चेन्द्रियसमाहितैः।
प्रोवाच भगवान् ब्रह्मा दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत ॥ ४ ॥

भारत ! यज्ञके अन्तमें पाँचों इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, समस्त प्राणियोंका प्रिय करनेवाले, सब भूतोंका हित चाहनेवाले तथा पाँचों इन्द्रियोंको एकाग्र करके योगयुक्त होनेवाले मधुरभाषी ब्राह्मणोंके वचनोंसे प्रशंसित हुए भगवान् ब्रह्मा कहने लगे--'अहो भाग्य ! अहो भाग्य !' ॥ ३-४ ॥

ततः कश्यपमाभाष्य प्रोवाच भगवान् प्रभुः।
भवानपि सुतैः सार्धं यक्ष्यते वसुधातले ॥ ५ ॥
क्रतुभिः परमप्राप्तैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः।

तदनन्तर सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्माने कश्यपजीको सम्बोधित करके कहा--'तुम भी अपने पुत्रोंके साथ भूतलपर पूर्ण एवं उत्तम दक्षिणावाले श्रेष्ठ यज्ञोंका अनुष्ठान करोगे' ॥

भविष्यपर्व ] पञ्चविंशोऽध्यायः ८१३

यक्षाः सुराश्च ते सर्वे यथा प्रतिगुणैः प्रभो ॥ ६ ॥
वयं यक्ष्यामहे पूर्वं पूर्वं यक्ष्यामहे वयम् ।
एवमन्योन्यसंरम्भाद् विद्यन्ते बलदर्पिताः ॥ ७ ॥

प्रभो ! उस समय यक्ष और समस्त देवता परस्पर विरोधी गुणोंद्वारा प्रेरित हो इस प्रकार कहने लगे, ‘पहले हम यज्ञ करेंगे, पहले हम यज्ञ करेंगे।’ इस तरह एक दूसरेके प्रति रोषमें भरकर वे बलके घमंडसे उन्मत्त हो गये थे ॥

दैतेयाश्चाप्यदैतेयाः परस्परजयैषिणः ।
युद्धायैव प्रतिष्ठन्ति प्रगृह्य विपुलौ भुजौ ॥ ८ ॥

दैत्य और देवता एक दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अपनी विशाल भुजाओंको उठाकर युद्धके लिये ही प्रस्थान करने लगे ॥ ८ ॥

निवार्यमाणा ऋषिभिस्तपसा दग्धकिल्बिषैः ।
अन्यैश्च विविधैर्विप्रैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ९ ॥
निवार्यमाणा युध्यन्ते वृषभा इव गोकुले ।
प्रयुद्धा युद्धसंक्रान्ताः सर्वे प्राणजयैषिणः ॥ १० ॥

तपस्यासे जिनके पाप दग्ध हो गये थे, उन ऋषियों तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी विद्वान् अन्यान्य अनेकों ब्राह्मणोंके मना करनेपर भी वे गोशालामें परस्पर भिड़नेवाले साँड़ोंके समान एक-दूसरेसे युद्ध करने लगे। धीरे-धीरे उनके युद्धने जोर पकड़ लिया। वे सब-के-सब युद्धकी ज्वालासे आक्रान्त हो परस्पर प्राण लेनेके लिये उतारू हो गये ॥ ९-१० ॥

पश्यतां सर्वभूतानां मृत्योर्विषयमागताः ।
ततः शब्देन महता परं कृत्वा महाबलाः ॥ ११ ॥
रुन्धन्ति बाहुभिः क्रुद्धाः सपक्षा इव पक्षिणः ।

सब प्राणियोंके देखते-देखते वे मृत्युके राज्यमें आ गये। फिर तो महान् सिंहनाद करके वे महाबली देवता, दानव परस्पर कुपित हो पंखधारी पक्षियोंके समान अपनी भुजाओं-द्वारा एक दूसरेको रोकने लगे ॥ ११३ ॥

चचाल वसुधा चैव पादाक्रान्ता च रोषिभिः ॥ १२ ॥
नौर्यथा पुरुषाक्रान्ता निषीदति महाजले ।

रोषमें भरे हुए उन योद्धाओंके पैरोंसे आक्रान्त हो सारी पृथ्वी विचलित हो उठी। जैसे बहुसंख्यक पुरुषोंके भारसे दबी हुई नौका गहरे जलमें डगमगाने लगती है, वही दशा पृथ्वीकी हुई ॥ १२३ ॥

पर्वताश्च विशीर्यन्ते नर्दमाना गजा इव ॥ १३ ॥
चुक्षुभुश्च महानद्यस्ताडिता मातरिश्वना ।

चिंघाड़ते हुए हाथियोंके समान भारी आवाजके साथ बड़े-बड़े पर्वत विदीर्ण होकर ढहने लगे। वायुके झोंके खाकर बड़ी-बड़ी नदियां विक्षुब्ध हो उठीं ॥ १३३ ॥

ततः समभवद् युद्धं मधोर्विष्णोश्च भारत ॥ १४ ॥
युगान्तकरणं घोरं सर्वप्राणिभयंकरम् ।

भारत ! तब मधु और विष्णुका युगान्तकारी घोर युद्ध होने लगा, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर था ॥ १४३ ॥

प्रममाथ मधोर्विष्णुः समग्रं बलपौरुषम् ॥ १५ ॥
वह्नेरिव बलं दीप्तं शमयत्यम्बुना यथा ।
तथा प्रशमितं तेन प्रभुणा ह्युपकारिणा ॥ १६ ॥

भगवान् विष्णुने मधुके समस्त बल-पौरुषको मथ डाला। जैसे अग्निका प्रज्वलित हुआ तेजरूपी बल जलसे बुझ जाता है, उसी प्रकार सबका उपकार करनेवाले भगवान् विष्णुने मधुके बल-पराक्रमको शान्त कर दिया ॥ १५ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥


षड्विंशोऽध्यायः

मधु और विष्णुका घोर युद्ध, देवताओं और ऋषियोंद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति, हयग्रीवरूपधारी विष्णुद्वारा मधुका वध और पृथ्वीको मेदिनी नामकी प्राप्ति

वैशम्पायन उवाच
बलवान् स तु दैतेयो मधुर्भीमपराक्रमः ।
बबन्ध पाशैर्निशितैर्महेन्द्रं पर्वतान्तरे ॥ १ ॥
तं वै प्रह्लादवचनाल्लक्षणज्ञश्च भारत ।
ऐश्वर्यमैन्द्रमाकाङ्क्षन् भविष्यं बुद्धिसंक्षयात् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भयंकर पराक्रमी बलवान् मधु दैत्यने प्रह्लादके कहनेसे देवराज इन्द्रको पर्वतके भीतर तीखे पाशोंसे बाँध लिया। भारत ! वह लक्षणोंका ज्ञाता था, परंतु उसकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये उसने भविष्यमें इन्द्रके ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखकर उन्हें बाँधा था ॥ १-२ ॥

बद्ध्वेन्द्रं सहसा मध्ये पाशैर्मर्मविर्जितैः ।
आयसैर्बहुभिश्चित्रैर्बलवद्भिर्विदारणैः ॥ ३ ॥
विष्णुमेवाग्रणी रुद्रमाह्वयद् युद्धकोविदः ।
मध्ये गणानां सर्वेषां कालस्य वशमागतः ॥ ४ ॥

लोहेके बने हुए बहुसंख्यक विचित्र प्रबल और विदीर्ण

८१४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करनेवाले मर्मरहित पाशोंमें इन्द्रकी कमरको सहसा बाँधकर दैत्योंके अगुआ युद्धकुशल मधुने, जो कालके वशीभूत हो गया था, समस्त गणोंके बीच रुद्रस्वरूप भगवान् विष्णुको ही ललकारा ॥ ३-४ ॥

द्वैधीभूताः काश्यपेया मधोर्वशमुपागताः ।
युद्धार्थमभ्यधावन्त प्रगृह्य विपुला गदाः ॥ ५ ॥

कश्यपके पुत्र दो भागोंमें विभक्त हो मधुके वशमें आकर बड़ी-बड़ी गदाएँ हाथमें लिये देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये दौड़े ॥ ५ ॥

गन्धर्वाः किन्नराश्चैव वाद्ये गीते च कोविदाः ।
प्रनृत्यन्ति प्रगायन्ति प्रहसन्ति च सर्वशः ॥ ६ ॥

वाद्य और गीतमें कुशल गन्धर्व और किन्नर सब प्रकारसे नाचते, गाते तथा हँसते थे ॥ ६ ॥

तन्त्रीभिः सुप्रयुक्ताभिर्मधुराभिः स्वभावतः ।
मनो मधोर्विधुन्वन्ति युध्यमानस्य रागिणः ॥ ७ ॥

स्वभावतः मधुर एवं सुन्दर ढंगसे बजायी गयी वीणाके तारोंसे मोहक ध्वनि उत्पन्न करके वे युद्धमें लगे हुए रागी मधुके मनको विचलित कर देते थे ॥ ७ ॥

मधोर्बलार्थे मधूनो नियोगात् पद्मयोनिनः ।
एतान् विकारान् कुर्वन्ति गन्धर्वाः सत्यवादिनः ॥ ८ ॥

तमःप्रधान मधुका बल क्षीण करनेके लिये पद्मयोनि ब्रह्माजीकी आज्ञासे सत्यवादी गन्धर्व ये विकार प्रकट करते थे ॥ ८ ॥

तत्र शक्तो हि गान्धर्वे तस्मिञ्छब्दे मधुर्मनः ।
दानवाश्चासुराश्चैव प्रत्यक्षं यान्ति प्राणदन् ॥ ९ ॥

शक्तिशाली मधुने उस संगीतके शब्दमें मन लगाया । दानव और असुर उसके सामने जाते और गर्जना करते थे ॥

मधोश्च मन आक्षिप्य पश्यन् योगेन चक्षुषा ।
मन्दरं प्रयते विष्णुर्गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ १० ॥

इस प्रकार मधुके मनको विषयोंमें विक्षिप्त करके योग-दृष्टिसे देखनेवाले भगवान् विष्णु सहसा मन्दराचलकी ओर चल दिये, मानो अग्नि काष्ठोंमें छिप गयी हो ॥ १० ॥

ऋषयो दीप्तमनसं किंचिद् व्यथितमानसाः ।
पितामहं पुरस्कृत्य क्षणेनान्तरधीयत ॥ ११ ॥

उस समय ऋषियोंके मनमें कुछ व्यथा हुई । वे संतत-चित्त पितामहको आगे करके क्षणभरमें वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ११ ॥

विष्णुं सोऽभ्यहनत् क्रुद्धो मधुर्मधुनिभेक्षणः ।
भुजेन शङ्खदेशान्ते न चकम्पे पदान्पदम् ॥ १२ ॥

इधर क्रोधमें भरे हुए मधु जैसे पिङ्गल नेत्रवाले मधुने भगवान् विष्णुके पास पहुँचकर अपने हाथसे उनकी कनपटी-पर प्रहार किया; परंतु वे एक पग भी विचलित नहीं हुए ॥

विष्णुश्चाप्यहनद् दैत्यं कराग्रेण स्तनान्तरे ।
स पपात महीं तूर्णं जानुभ्यां रुधिरं वमन् ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने भी अपने हाथके अग्रभागसे उस दैत्यकी छातीमें चोट की; फिर तो वह रक्त वमन करता हुआ घुटनोंके बल तुरंत पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १३ ॥

न चैनं पतितं हन्ति विष्णुर्युद्धविशारदः ।
बाहुयुद्धे हि समयं मत्वाचिन्त्यपराक्रमः ॥ १४ ॥

अचिन्त्यपराक्रमी युद्धविशारद भगवान् विष्णुने बाहु-युद्धका अवसर उपस्थित जानकर पृथ्वीपर गिरे हुए उस दैत्यको नहीं मारा ॥ १४ ॥

इन्द्रध्वज इवोत्क्षिप्तो जानुभ्यां स महीतलात् ।
मधू रोषपरीतात्मा निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ १५ ॥

तदनन्तर मधुका हृदय रोषसे भर गया । वह घुटनोंके सहारे पृथ्वीतलसे उठकर खड़ा हो गया, मानो किसीने इन्द्रध्वज फहरा दिया हो । उस समय वह विष्णुकी ओर इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रसे उन्हें जला देगा ॥

परुषाभिस्ततो वाग्भिरन्योन्यमभिगर्जतुः ।
समीयतुर्बाहुयुद्धे परस्परवधैषिणौ ॥ १६ ॥
उभौ तौ बाहुबलिनावुभौ युद्धविशारदौ ।
उभौ च तपसा शान्तावूभौ सत्यपराक्रमौ ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् वे दोनों कठोर बातें कहते हुए एक-दूसरेके सामने गर्जने लगे; फिर दोनों दोनोंके वधकी इच्छासे बाहु-युद्धमें परस्पर गूँथ गये । वे दोनों ही बाहुबलसे युक्त और युद्धकला-के विशेषज्ञ थे । दोनों तपस्याके प्रभावसे शान्तचित्त हो गये थे और दोनों ही यथार्थरूपमे पराक्रम प्रकट कर रहे थे ॥

दृढप्रहारिणौ वीरावन्योन्यं विचकर्षतुः ।
शैलेन्द्राविव युद्ध्यन्तौ पक्षैः पाषाणसंनिभैः ॥ १८ ॥

दृढ़तापूर्वक प्रहार करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेको खींचने लगे, मानो पाषाण-सदृश पंखोंसे युक्त दो पर्वतराज परस्पर युद्ध कर रहे हों ॥ १८ ॥

विकर्षन्तौ वमन्तौ च अन्योन्यं बहुधाहवे ।
गजाविव विषाणाग्रैर्नखाग्रैश्च विचेरतुः ॥ १९ ॥

जैसे दो हाथी अपने दाँतों और नखोंके अग्रभागसे परस्पर प्रहार करते हुए युद्ध-स्थलमें विचरते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर मधु और श्रीविष्णु एक-दूसरेको खींचते और रक्त-वमन करते हुए भूतलपर विचर रहे थे ॥ १९ ॥

ततो व्रणमुखैश्चैव सुस्राव रुधिरं बहु ।
ग्रीष्मान्ते धातुसंसृष्टं शैलेभ्य इव काञ्चनम् ॥ २० ॥

भविष्यपर्व ] पञ्चविंशोऽध्यायः ८१५


तदनन्तर एक-दूसरेके प्रहारसे जो घाव हो गये थे, उनके छिद्रोंसे बहुत रक्त बहने लगा। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाऋतुमे पर्वतोंसे गैरिक धातुमिश्रित काञ्चन-रस झरता हो ॥ २० ॥

संसिक्तौ रुधिरौघैश्च स्रवद्भिः समरंजितौ ।
अथायतैः पदाग्रैश्च तौ व्यदारयतां महीम् ॥ २१ ॥

वे दोनों झरते हुए रक्तके प्रवाहोंसे भीगकर समानरूपसे रक्तरंजित हो गये। फिर उठते-गिरते हुए पैरोंके अग्रभागोंसे उन दोनोंने वहाँकी भूमि विदीर्ण कर डाली ॥ २१ ॥

अभिहत्य तु तौ वीरौ परस्परमनेकधा ।
पतङ्गाविव युध्येतां पक्षाभ्यां मांसगृद्धिनौ ॥ २२ ॥

एक दूसरेपर बारंबार चोट करके वे दोनों वीर पंखोंसे लड़नेवाले दो मांसलोलुप पक्षियोंकी भाँति युद्ध करने लगे ॥

शुश्रुवुश्चान्तरिक्षेऽथ सर्वभूतानि पुष्करे ।
सिद्धानां वदनोन्मुक्ताः परया वर्णसम्पदा ॥ २३ ॥
स्तुतयो विष्णुसंयुक्ताः सत्याः सत्यपराक्रमे ।

इसी समय पुष्करके आकाशमें सम्पूर्ण भूतोंने भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली स्तुतियाँ सुनीं, जो उन सत्यपराक्रमी भगवान्‌मे यथार्थ रूपसे घटित हो रही थीं। वे स्तुतियाँ सिद्धोंके मुखोंसे निकली थीं और उत्तमोत्तम वर्ण-सम्पत्तिसे सुशोभित थीं ॥ २३३ ॥

शरीरं धातुसंयुक्तं संयुक्तं चेतनेन च ॥ २४ ॥
तद् ब्रह्म इन्द्रियैर्युक्तं तेजोभूतं सनातनम् ।

यह शरीर तेज, जल और अन्न—इन तीन धातुओंका अथवा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र—इन सात धातुओंका संयोगरूप है। यह चेतनसे संयुक्त है। वह चेतन तेजोभूत सनातन ब्रह्म ही है। जो इन्द्रियोंसे युक्त होकर जीव कहलाता है ॥ २४३ ॥

ध्रुवं तिष्ठन्ति भूतास्ते सूक्ष्मे प्रलयतां गते ॥ २५ ॥
पुनश्चोद्भवते सूक्ष्मं बहुरूपमनेकधा ।

शरीरका आरम्भ करनेवाले वे स्थूलभूत प्रलयके अधिष्ठानभावको प्राप्त हुए सूक्ष्म-कारणमें निश्चय ही स्थित होते हैं। फिर सूक्ष्म ही अनेक रूप धारण करके वारंवार प्रकट होता है ॥ २५३ ॥

प्रबोध्य भावं भूतानां त्रिषु लोकेषु कामदः ॥ २६ ॥
सुरूपो बहुरूपांस्तांल्लोकान् संचरते वशी ।

सबकी कामनाओंको देनेवाले तथा सबको वशमें रखनेवाले असङ्ग परमात्मा तीनों लोकोंमें भूतोंको उनके स्वरूपका बोध कराकर स्वयं सुन्दर रूप धारण करके उन अनेक रूपवाले लोकोंमें विचरते रहते हैं ॥ २६३ ॥

मानसीं तनुमास्थाय बहुभिः कारणान्तरैः ॥ २७ ॥
योगात्मा धारयन्नुर्वी नागात्मानं दिवंधरः ।
ब्रह्म भूतं परं चैव सूक्ष्मेणात्मानमीश्वरः ॥ २८ ॥

योगात्मा ईश्वर, जो देवलोकको धारण करनेवाले हैं, सूक्ष्मरूपसे अपने आपको शेषनागके रूपसे प्रकट करके पृथ्वीको धारण करते हुए विचरते हैं। वे दुष्टनिग्रह और साधु-संरक्षण आदि अनेक कारणोंसे मानसशरीर—शेष, कूर्म आदि रूप धारण करके जगत्‌की रक्षा करते हैं। वे ही वेद, जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणिसमुदाय तथा दूसरे जडभूतोंको धारण करते हैं ॥ २७-२८ ॥

ब्राह्मेण विप्रान् वसति युद्धेनैव च क्षत्रियान् ।
प्रदानकर्मणा वैश्याञ्छूद्रान् परिचरेण च ॥ २९ ॥

वे भगवान् वेदमयरूपसे ब्राह्मणोंका आश्रय लेकर रहते हैं। युद्धरूपसे क्षत्रियोंमें स्थित होते हैं। दानकर्म अथवा वस्तु आदिके आदान प्रदानवाले वाणिज्य कर्मके रूपमें वैश्योंमें निवास करते हैं तथा त्रैवर्णिकोंकी सेवाके रूपमें वे शूद्रोंका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ २९ ॥

गावः क्षीरप्रदानेन अश्वान् यज्ञेषु प्रोक्षणैः ।
पितरश्चोष्मपेनैव हविर्भागेन देवताः ॥ ३० ॥

वे गौओंका आश्रय लेकर दुग्ध प्रदानके द्वारा तुम सबकी रक्षा करते हैं । यज्ञोंमें अश्वों ( यज्ञसम्बन्धी उपकरणों ) का आश्रय लेकर प्रोक्षण ( फलरूप अमृतके अभिषेक ) द्वारा तुमलोगोंकी रक्षा करते हैं। पकाये जाने-वाले हविष्यके गर्म-गर्म भापसे पितरोंको तथा यज्ञोंमें हविष्यका भाग अर्पित करके देवताओंको तृप्त करते हैं॥३०॥

चतुर्भिर्व्यतिरिक्ताङ्गैस्त्रिभिरन्यैश्च धातुभिः ।
सप्तभिः पितृभिर्नित्यैर्युक्तैस्त्रैँल्लोकान् परिरक्षति ॥ ३१ ॥

पृथक्-पृथक् अङ्गवाले चार धातुओं ( दर्श, पौर्णमास, पितृयज्ञ तथा साधारण चार प्रकारके अन्नों ) से तथा दूसरे तीन धातुओं ( मन, वाक् और प्राण ) से—इस तरह सात प्रकारके नित्य अर्पण करने योग्य अन्नोंद्वारा वे भगवान् विष्णु पितरोंसहित तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं ( अथवा उक्त अन्नों तथा कव्यवाट्, अनल, यम, सोम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, सोमप तथा बर्हिषद्—इन सात प्रकारके नित्य तर्पणीय पितरोंद्वारा वे तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं ) ॥३१॥

चन्द्रसूर्यात्मकं नित्यं यथात्मनिहितात्मकम् ।
प्रकाशं चाप्रकाशं च निगूढं स्वेन तेजसा ॥ ३२ ॥

इन सातोंका समुदाय चन्द्रसूर्यात्मक है अर्थात् उनमेंसे तीन सूर्यस्वरूप और चार चन्द्रस्वरूप हैं। ये यथायोग्य प्रकाश ( शुक्ल मार्ग ) तथा अप्रकाश ( धूम या कृष्ण मार्ग) रूप हैं, ये कष्टसाध्य होनेके कारण शरीरको संकटमें डाले

८१६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

रहते हैं, ये सभी अपने तेज (चिन्मय प्रकाश) से व्याप्त हैं ॥ ३२ ॥

त्रयस्तु पितरो नित्यं वर्धयन्ति दिवाकरम् ।
चतुर्भिः पितृभिश्चैव चन्द्रो वर्धति मण्डले ॥ ३३ ॥

तीन पितर सदा सूर्यदेवकी वृद्धि करते हैं और चार पितरोंके साथ चन्द्रमा अपने मण्डलमें बढ़ते हैं ॥ ३३ ॥

त्रयः पितृगणा नित्यं पिण्डान् पश्चाददन्ति ते ।
चत्वारोऽन्ये पितृगणाः सिद्धाः पञ्च क आददे ॥ ३४ ॥

तीन पितृगण सदा फलभोगके पश्चात् पिण्डों (स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों) का संहार करते हैं और चार अन्य पितृगण सिद्धरूप हो पञ्चविषय आदि हो जाते हैं, जिन्हें यजमान प्रजापतिने स्वीकार किया है ॥ ३४ ॥

त्वमेव पञ्च तान् घर्मांस्त्वमेवापञ्च तान् विभो ।
सनातनमयो दिव्यः शाश्वतो ब्रह्मसम्भवः ॥ ३५ ॥

प्रभो ! आप ही उन पाँच धर्मों (पञ्चीकृत भूतों) को और आप ही अपञ्चीकृत भूतोंको प्रकट करते हैं। आप सनातनमय, दिव्य, शाश्वत एवं वेदोंके आविर्भावके स्थान हैं ॥ ३५ ॥

यस्मात्त्वत्तेज आदत्ते अग्निर्वायुश्च सर्वशः ।
अतस्त्वं कर्मणा तेन आदित्यः समपद्यत ॥ ३६ ॥

अग्नि और वायु भी सब प्रकारसे आपके ही तेजका आदान (ग्रहण) करते हैं। इसलिये उस आदानरूप कर्मसे आप 'आदित्य' कहलाते हैं (आप ही सबके प्रकाशक स्वयं प्रकाशरूप हैं) ॥ ३६ ॥

यदादत्सि जगत् सर्वं रश्मिभिः प्रदहन्निव ।
युगान्तकाले सम्प्राप्ते परां सिद्धिमुपागतः ॥ ३७ ॥

आप युगान्तकाल आनेपर अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्‌को दग्ध करते हुए-से उसका आदान (ग्रहण) करते हैं, इसलिये भी 'आदित्य' कहलाते हैं। आप सदा परम सिद्धिको प्राप्त हैं ॥ ३७ ॥

पक्षसंधावमावास्यां लोकं चरसि मानुषम् ।
ऋषिभिः सह गूढात्मा सूर्येन्दुवसुसम्भवैः ॥ ३८ ॥

आप अपने स्वरूपको छिपाकर सूर्य, चन्द्रमा और वसुओंसे उत्पन्न हुए ऋषियोंके साथ पूर्णिमा और अमावास्या-को (पूर्णमास और दर्श नामक यागोंको ग्रहण करनेके लिये) मनुष्यलोकमें विचरते हैं ॥ ३८ ॥

सफलं कर्म कर्तॄणां यजतां पुष्टिवर्धनः ।
हेतूनामविकाराय मा भूत् कर्मविपर्ययः ॥ ३९ ॥

आप सकल कर्म करनेवाले यजमानोंकी पुष्टि (सुख-समृद्धि) को बढ़ानेवाले हैं। स्वर्ग आदिके साधनभूत जो कर्म हैं। उनमें विकृति न हो—वे व्यर्थ न होने पावें और काललोपसे धर्म सम्बन्धी कृत्योंका लोप न हो जाय, इसकी देख-भालके लिये भी आप मनुष्यलोकमें विचरते हैं ॥ ३९ ॥

वनस्पत्योषधीश्चैव युगपत् प्रतिपद्यसे ।
बालभावाय वसुधां पक्षे पक्षे जनिस्तव ॥ ४० ॥

आप ही अमावास्याको चन्द्रमारूपसे एक ही साथ वनस्पतियों, ओषधियों और वसुधामें वास करते हैं। पुनः बालरूपसे उत्पन्न होनेके लिये ही आप ऐसा करते हैं। प्रत्येक शुक्लपक्षमें आपका नूतन जन्म होता है ॥ ४० ॥

भूतानां भुवि भूतेश भाव्यर्थे वसुधातले ।
वसु यद् भुवि किंचिच्च सर्वं तत्त्वन्मयं विभो ॥ ४१ ॥

भूतेश्वर ! विभो ! इस भूतलपर भूत और भविष्य प्राणियोंकी पुष्टिके लिये जो कुछ भी धन संचित है, वह सब आपका ही स्वरूप है ॥ ४१ ॥

त्वमेव विविधं धर्मं शाश्वतं वसुधातले ।
देवयज्ञं मन्त्रवाक्यमात्मयज्ञं समानुपम् ॥ ४२ ॥

आप ही भूतलपर नाना प्रकारके सनातनधर्म सम्बन्धी कर्म हैं और आप ही देवयज्ञ, मन्त्रवाक्य, आत्मयज्ञ तथा उसके अधिकारी मनुष्य हैं ॥ ४२ ॥

द्विविधः स्वर्गमार्गश्च सूर्यश्चन्द्रश्च निर्मलः ।
चन्द्रमाः पितृयानश्च देवयानश्च भास्करः ॥ ४३ ॥

आप ही स्वर्गलोकके द्विविध मार्ग निर्मल सूर्य और चन्द्रमा हैं। इनमें चन्द्रमा पितृयान (धूममार्ग) हैं और सूर्य देवयान (शुक्लमार्ग) हैं ॥ ४३ ॥

त्वमेव वसुधायुक्तो विश्वं चरसि सीमया ।
एकीकृत्य गणान् सर्वान् संक्षिप्यामुत्र सम्भवः ॥ ४४ ॥

आप ही इन्द्रिय आदि गणोंको एक करके-देहमात्ररूपसे संक्षिप्त करके भूमिवासी प्राणियोंके रूपमें वसुधासे संयुक्त होकर विश्वमें विचरते और मर्यादापूर्वक वहाँके विषयोंका सेवन करते हैं। परलोकमें भी आप ही विविध रूपोंमें प्रकट हैं ॥ ४४ ॥

एकस्त्वमसि सम्भूतः पुराणपुरुषो विराट् ।
अक्षयश्चाप्रमेयश्च कर्मकारकरो वशी ॥ ४५ ॥

एकमात्र आप पुराण-पुरुष ही विराट्रूपमें प्रकट हैं। आप अविनाशी, अप्रमेय, सबको वशमें रखनेवाले और नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हैं ॥ ४५ ॥

मूर्तस्तेजसि सम्भूतो वायुः पर्यति खेचरः ।
सप्तमी रूपसंस्थानैर्नित्यमावृत्य तिष्ठति ॥ ४६ ॥

आप ही तेजस्तत्त्वमें 'रूप' होकर प्रकट हुए हैं, (इसीलिये तैजस नेत्रके द्वारा रूपका ग्रहण होता है); आप

भविष्यपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ८१७


ही वायु बनकर आकाशमें सब ओर विचरण करते हैं। महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्च तन्मात्रा—इन सात रूपसंस्थानोंके द्वारा आप सदा सबको व्याप्त करके स्थित हैं॥ ४६॥

साधने चापि निर्वाणे संहारे प्रलये तथा। धाता धारणकाले च दिशश्चक्षुषि धारिणि ॥ ४७॥

साधनकालमें जीवरूपसे, निर्वाण (कैवल्य मोक्ष) की अवस्थामें शुद्धरूपसे, दैनिक और ब्राह्म प्रलयमें रुद्ररूपसे तथा धारण (पोषण) कालमें धाता (पालक) विष्णुरूपसे आप ही स्थित हैं। दिशाएँ—वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादाएँ, आप ही विषयोंको धारण करनेवाली नेत्र आदि इन्द्रियोंमें इनके अधिष्ठाता चेतनके रूपमें विराजमान हैं॥ ४७॥

सेव्यमानो मुनिगणैर्नित्यं विगतकल्मषैः। कर्मभिः सत्यमापन्नैः समरागैर्जितेन्द्रियैः ॥ ४८ ॥ स्तूयमानश्च विबुधैः सिद्धैर्मुनिवरैस्तथा। सस्मार विपुलं देहं हरिर्हयशिरो महान् ॥ ४९॥

इस प्रकार नित्य पापरहित, जितेन्द्रिय, शत्रु और मित्रमें समान भावसे स्नेह रखनेवाले तथा सत्कर्मोंद्वारा सत्यको प्राप्त हुए मुनिगण जब श्रीहरिकी सेवा कर रहे थे और देवता तथा सिद्ध महर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे, उस समय महान् देव श्रीहरिने अपने हयग्रीव नामक विशाल शरीरका स्मरण किया॥ ४८-४९॥

कृत्वा वेदमयं रूपं सर्वदेवमयं वपुः। शिरोमध्ये महादेवो ब्रह्मा तु हृदये स्थितः ॥ ५०॥

सर्वदेवमय वेदमय रूप धारण करके भगवान् श्रीहरि वहाँ शोभा पाने लगे। उनके मस्तकमें महादेव शिव और हृदयमे ब्रह्मा विराजमान थे॥ ५०॥

आदित्यरश्मयो बालाश्चक्षुषी शशिभास्करौ। जङ्घे तु वसवः साध्याः सर्वसंधिषु देवताः ॥ ५१॥

सूर्यकी किरणें उनकी रोमावलियाँ थीं। चन्द्रमा और सूर्य उनके नेत्रके स्थानमें प्रकाशित हो रहे थे। उनकी दोनों पिण्डलियोंकी जगह वसु और साध्यगण विराज रहे थे तथा समस्त संधि-स्थानोंमें देवताओंका वास था॥ ५१॥

जिह्वा चैश्वानरो देवः सत्या देवी सरस्वती। मरुतो वरुणश्चैव जानुदेशे व्यवस्थिताः ॥ ५२ ॥

जिह्वाके स्थानमें अग्निदेव थे। सत्या (वेदवाणीस्वरूपा) देवी सरस्वती उनकी वाणी थी। मरुद्गण और वरुण देवता उनके जानुदेश (घुटनों) में स्थित थे॥ ५२॥

एवं कृत्वा तथा रूपं सुराणामद्भुतं महत्। असुरं पीडयामास क्रोधाद् रक्तान्तलोचनः ॥ ५३॥

इस प्रकार सर्वदेवमय महान् एवं अद्भुत रूप धारण करके, जिनके नेत्रोंके कोये लाल थे, उन भगवान् हयग्रीवने क्रोधपूर्वक उस असुरको दबाया (इससे मधुका मेदा बाहर निकल आया)॥ ५३॥

मधोर्मेदोऽम्बुपूर्णा च पृथिवी समदृश्यत। प्रमदेव घना चैव शुक्लांशुकनिवासिनी ॥ ५४॥

उस समय मधुके मेदरूपी जलसे आच्छादित हुई यह सारी पृथ्वी ऐसी दिखायी देती थी, मानो श्वेत रंगकी साड़ी पहने हुए कोई हृष्ट-पुष्ट युवती शोभा पा रही हो॥ ५४॥

मेदिनीत्येव शब्दश्च लब्धः पृथ्व्या नरोत्तम। नामासुरसहस्रेण धरण्यां सम्प्रतिष्ठितम् ॥ ५५ ॥

नरश्रेष्ठ! उस मेदके कारण ही पृथ्वीको 'मेदिनी' नाम प्राप्त हुआ। सहस्रों असुरोंके द्वारा यह नाम भूतलपर प्रतिष्ठित एवं प्रचारित हो गया॥ ५५॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥


सप्तविंशोऽध्यायः

मधुके पतनसे समस्त प्राणियोंको हर्ष, वहाँ एकत्र हुए पर्वतों और वसन्त ऋतुका वर्णन, मधुवाहिनी नदीका प्राकट्य और गौरीसिद्धाका माहात्म्य

वैशम्पायन उवाच मधोर्निपतनं दृष्ट्वा सर्वभूतानि पुष्करे। प्रहृष्टानि प्रगायन्ति प्रनृत्यन्ति च सर्वशः ॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मधुका पतन हुआ देख पुष्करमें समस्त प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हो उच्चस्वरसे गाने और नृत्य करने लगे॥ १॥

सुपार्श्वो गिरिमुख्यस्तु काञ्चनैः शिखरोत्तमैः। बहुधातुविचित्रैश्च खं लिखन्निव चाबभौ ॥ २.॥

पर्वतोंमें प्रधान सुपार्श्व अपने सुवर्णमय श्रेष्ठ शिखरोंसे आकाशमें रेखा खींचता-सा प्रतीत होता था। उसके वे शिखर अनेक धातुओंके कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे॥ २॥

गिरयश्चाभिशोभन्ते धातुभिः समरञ्जिताः। प्रांशुभिः शिखराग्रैश्च सविद्युत इवाम्बुदाः ॥ ३ ॥

अन्य पर्वत भी नाना प्रकारकी धातुओंसे रञ्जित हो

८१८श्रीमद्भारते खिलभागे-[ हरिवंशे

अपने ऊँचे शिखरोंसे बिजलियोंसहित मेघोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३ ॥
पक्षवातोद्धतो रेणुश्चूर्णैः साञ्जनवालुकैः ।
छादयन् पर्वताग्राणि महामेघ इवावभौ ॥ ४ ॥
पंखोंकी हवासे ऊपरको उठी हुई धूल अंजन (कोयले) और बालुकासहित चूर्णोंके साथ पर्वतोंके शिखरोंको ढकती हुई महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ती थी ॥ ४ ॥
मेघसंश्लिष्टशिखराः पक्षविक्षिप्तपादपाः ।
काञ्चनोद्भेदबहुलाः खे तिष्ठन्तीव पर्वताः ॥ ५ ॥
उनके शिखर मेघोंसे आलिङ्गित हो रहे थे। वे अपने पंखोंकी वायुसे वृक्षोंको बिखेर रहे थे और उनमें सोनेकी बहुत-सी खानें प्रकट हुई थीं। इस प्रकार वे पर्वत आकाशमें खड़े हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥
पक्षवन्तः सशिखरा हेमधातुभिरञ्जिताः ।
पवनेन समुद्धूतास्त्रासयन्ति विहङ्गमान् ॥ ६ ॥
पंखों और शिखरोंसे सुशोभित, सुवर्णमय धातुओंसे अभिरञ्जित और वायुके वेगसे प्रताड़ित हुए वे पर्वत आकाश-चारी पक्षियोंको भी भयभीत कर देते थे ॥ ६ ॥
काञ्चनाः पर्वताः सर्वे स्फाटिकैर्मणिभिश्चिताः ।
सूर्यकान्तैश्च बहुभिश्चन्द्रकान्तैश्च निर्मलाः ॥ ७ ॥
वहाँ सभी पर्वत सुवर्णमय थे। सबपर स्फटिकमणियोंकी राशि संचित थी और वे सभी बहुसंख्यक सूर्यकान्त तथा चन्द्रकान्त मणियोंके कारण निर्मल प्रभासे उद्भासित हो रहे थे ॥ ७ ॥
हिमवांश्च महाशैलः श्वेतैर्धातुभिराचितः ।
काञ्चनैः शिखराग्रैश्च सूर्यपादप्रकाशितैः ॥ ८ ॥
मणिभिश्च प्रकाशाद्भिः पक्षान्तरविनिःसृतैः ।
ताम्रपुष्पैश्च शिखरैर्दीप्यमानैः स्वतेजसा ॥ ९ ॥
महापर्वत हिमवान् श्वेत धातुओंसे व्याप्त था । उसके शिखरोंके अग्रभाग सूर्यकी किरणोंमे प्रकाशित हो सुवर्णमय दिखायी देते थे । उसके पंखोंके भीतरसे प्रकट हुई प्रकाश-मान मणियाँ उसके शिखरोंको प्रकाशित कर रही थीं। लाल रंगके फूलोंसे सुशोभित तथा अपने तेजसे देदीप्यमान शिखर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ८-९ ॥
मन्दरश्चोग्रशिखरः स्फाटिकैर्मणिभिश्चिताः ।
वज्रगर्भो निरालम्बैः स्वर्गोपम इवावभौ ॥ १० ॥
भयंकर शिखरोंवाला मन्दराचल स्फटिक मणियोंकी राशिसे सम्पन्न था । उसके भीतर वज्रमणि (हीरा) छिपी हुई थी। वह अपने निरवलम्ब शिखरोंसे स्वर्गके समान सुशोभित होता था ॥ १० ॥
सहस्रशृङ्गः कैलासः शिलाधातुविभूषितः ।
तोरणैश्चैव निबिडैः प्रांशुभिश्चैव पादपैः ॥ ११ ॥
शिलाओं और धातुओंसे विभूषित सहस्र शिखरोंवाला कैलासपर्वत फाटकोंके समान ऊँचे और घने वृक्षोंसे सुशोभित हो रहा था ॥ ११ ॥
प्रवादयद्भिर्गन्धर्वैः किन्नरैश्च प्रगायिभिः ।
देवकन्याङ्गरागैश्च प्रक्रीडाद्रिरिवावभौ ॥ १२ ॥
भाँति-भाँतिके बाजे बजानेवाले गन्धर्वों, मधुर गीत गानेवाले किन्नरों तथा देवकन्याओंके अङ्गरागोंसे शोभा पानेवाला कैलास क्रीडापर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ १२॥
मधुरैर्वाद्यगीतैश्च नृत्यैश्चाभिनयोद्गतैः ।
शृङ्गारैः साङ्गहारैश्च कैलासो मदनायते ॥ १३ ॥
मधुर वाद्ययुक्त गीतों, अभिनयपूर्ण नृत्यों, शृङ्गारमयी क्रीड़ाओं तथा नृत्यकालमें किये गये अङ्गविक्षेपों (चटकने-मटकने आदि) से कैलासपर्वत मूर्तिमान् कामदेवके समान रसका उद्दीपक हो रहा था ॥ १३ ॥
आदित्याभासिभिः शृङ्गैर्भिन्नाञ्जनचयोपमैः ।
विन्ध्यो नीलाम्बुदश्यामो विभिन्न इव तोयदः ॥ १४ ॥
कटे हुए कोयलोंकी राशिके समान काले और सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित शिखरोंसे युक्त विन्ध्यपर्वत नील मेघके समान श्याम कान्ति धारण किये खण्डित हुए मेघके समान प्रतीत होता था ॥ १४ ॥
धात्वर्थे सर्वभूतानां मेरुपुष्टे महाबले ।
निर्वैमुर्विमलं तोयं मेघजालैरिवोत्तमैः ॥ १५ ॥
समस्त प्राणियोंके जीवन-धारणके लिये उन सभी पर्वतों-ने महान् शक्तिशाली मेरुप्रष्ठपर उत्तम मेघसमूहोंके समान निर्मल जलकी वर्षा की ॥ १५ ॥
शिलाभिर्बहुचित्राभिर्धातुभिर्बहुरूपिभिः ।
प्रस्रवद्भिर्गुहाद्वारैः सलिलं स्फटिकप्रभम् ॥ १६ ॥
बहुत-सी विचित्र शिलाओं, अनेक रूपवाली धातुओं तथा स्फटिकके समान निर्मल जलका स्रोत बहानेवाले गुफा-द्वारोंसे उस पर्वतकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १६ ॥
ग्रीष्मान्ते वायुसंगूढा घना इव सविद्युतः ।
चित्रैः पुष्पैस्तरुगणाः शोभन्त इव भूषिताः ॥ १७ ॥
नागाः कनकसंभूतैर्विचित्रैरिव भूषिताः ।
विचित्र पुष्पोंसे विभूषित हुए वृक्षगण वर्षा ऋतुमें वायुसे आच्छादित हुए बिजलीसहित मेघोंके समान शोभा पाते थे अथवा सोनेके विचित्र अलंकारोंसे अलंकृत हुए हाथियोंके समान सुशोभित होते थे ॥ १७ ॥
विहंगमाभिलीनाश्च लतास्तरुसमाश्रिताः ॥ १८ ॥
विलम्बन्त्यः सपुष्पाश्च नृत्यन्ते वायुघट्टिताः ।

भविष्यपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ८१९


जिनमें पक्षी छिपे हुए थे, वे वृक्षोंके सहारे फैली और लटकी हुई पुष्पित लताएँ वायुके झोंके खाकर नृत्य सा कर रही थीं ॥ १८ ॥

पवनेन समुद्धूता महता माधवेऽहनि ॥ १९॥
मुमुचुः पुष्पसंघातं तोयं वेलेव वर्षति।
वैशाखके दिनोंमें महान् वायुसे कम्पित हुई वे लताएँ उसी प्रकार पुष्प-समूहोंकी वर्षा कर रही थीं, जैसे लहरोंसे टकरायी हुई समुद्रकी तटभूमि जलकी बूँदें बिखेरती है ॥

फलवद्भिश्च विपुलैः शाखास्कन्धावरोहिभिः।
पादपैर्र्वर्णबहुलेर्ध्रियेत च वसुंधरा ॥ २०॥
जिसमें बहुत-सी शाखाएँ, तने और वरोहें (जटाएँ) शोभा पाती हैं, ऐसे अनेक रंगवाले विशाल एवं फले हुए वृक्ष मानो वसुधाको सहारा दे रहे थे ॥ २० ॥

मधुप्रिया मधुकरा मधुमत्ता विहंगमाः।
घोषयन्तीवं गायन्तः कामस्यागमसम्भवम् ॥ २१॥
जिन्हें मकरन्द प्रिय है, वे मधुमत्त मधुकर (भ्रमर) और कोकिल आदि पक्षी कलगान करते हुए कामदेवके आगमनकी घोषणा-सी कर रहे थे ॥ २१ ॥

विष्णुर्मधोर्निहन्ता च चकार मधुवाहिनीम्।
नदीं प्रस्रवनिर्भेदां सुतीर्थां बहुलोदकाम् ॥ २२॥
अंगारवर्णसिकतां मधुतीर्थां मनोरमाम्।
विमलैरम्बुभिः पूर्णां पुष्पसंचयवाहिनीम् ॥ २३ ॥
मधु दैत्यका नाश करनेवाले भगवान् विष्णुने वहाँ मधुवाहिनी नामक नदी प्रकट की, जिसका स्रोत फूटकर बह रहा था। वह उत्तम तीर्थवाली नदी प्रचुर जलसे भरी हुई थी। उसकी वालुका अङ्गारके समान वर्णवाली थी। वह मधुतीर्थस्वरूपा नदी मनको मोहे लेती थी। उसमें निर्मल जल भरा हुआ था और वह ढेर-के ढेर फूलोंको बहाये लिये जाती थी ॥ २२-२३ ॥

विवेश पुष्करं सा तु ब्रह्मणो वाक्यनोदिता।
ऋषिभिश्चानुचरिता ब्रह्मतन्त्रनिषेविभिः ॥ २४ ॥
ब्रह्माजीके वाक्यसे प्रेरित हो उसने पुष्करमें प्रवेश किया। ब्रह्मतन्त्रसेवी ऋषि भी उसके पीछे-पीछे गये ॥ २४ ॥

धात्री कपिलरूपेण गोर्भूत्वा क्षरते पयः।
मधुरं वितते यज्ञे ब्रह्मणाऽवाप्यचोदिता ॥ २५ ॥
तदनन्तर विशाल यज्ञ चालू होनेपर ब्रह्माजीके कहनेसे पृथ्वी गायका रूप धारण करके वहाँ मधुर दूधकी धारा बहाने लगी ॥ २५ ॥

सरश्च पृथिवीभूतं संधातुं प्राप्तवन्महीम्।
शुद्धं च भजते लोकं शाश्वतं परमाद्भुतम् ॥ २६ ॥
उस दूधसे जो सरोवर परिपूर्ण हुआ, वह पृथिवीस्वरूप है। वही प्राणिसमुदायको धारण करनेके लिये भूतलपर आकर प्रतिष्ठित हुआ। वह अपने परम अद्भुत शुद्ध शाश्वतस्वरूपको भी धारण करता है ॥ २६ ॥

सरस्वत्याः समुद्भूतं ब्रह्मक्षेत्रे तमोनुदम्।
मरुतीर्थमतिक्रम्य पुष्करेषु विसर्पति ॥ २७ ॥
सरस्वतीसे प्रकट हुआ वह दुःख एवं अन्धकारका नाश करनेवाला पुण्यतीर्थ मरुतीर्थको लाँघकर ब्रह्माजीके क्षेत्रभूत पुष्करतीर्थमें फैला हुआ है ॥ २७ ॥

सुचारुरूपा धर्मज्ञा अजा रूपेण छादयन्।
रूपं कनकवर्णाभं तपोयुक्तेन चेतसा ॥ २८ ॥
परम मनोहर रूपवाली धर्मज्ञा अजन्मा सरस्वती माया-रूपसे उस तीर्थके सुवर्णोपम दिव्य रूपको ढके रहती है। आलोचनायुक्त चित्तसे ही उसके यथार्थस्वरूप चिन्मय ब्रह्म-का साक्षात्कार होता है ॥ २८ ॥

अजगन्धकृतोन्मुक्तः सम्भूतः पर्वतो महान्।
गुरुद्वारगुणप्राणः शाश्वतः सिद्धसेवितः ॥ २९ ॥
वहाँ एक महान् पर्वत प्रकट हुआ, जो स्वाभाविक सुगन्धसे युक्त एवं उन्मुक्त है। उसका द्वार बहुत विशाल है तथा गुण ही उसके प्राण हैं। (अथवा गुरु ही उस अहंकाररूपी पर्वतपर चढ़नेके लिये द्वार है। गुरुके उपदेशसे ही उसके तत्त्वका ज्ञान होता है। तीनों गुण ही उसके जीवन हैं।) वह अनादि होनेके कारण सनातन कहा गया है। सिद्ध पुरुष भी उसका सेवन करते हैं। फिर मूढ़ोंकी तो बात ही क्या है ॥ २९ ॥

वेदिकाभिः सुचित्राभिः काञ्चनाभिर्विराजितः।
पुष्कराणि परीतानि त्वष्ट्रा विपुलदक्षिण ॥ ३० ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले जनमेजय ! सुवर्णमयी विचित्र वेदिकाओंसे वह पर्वत सुशोभित होता है। पुष्करतीर्थ-विचित्र जगत्का निर्माण करनेवाले शिल्पी ब्रह्माजी (अथवा परमेश्वर) से व्याप्त है ॥ ३० ॥

महामेरोर्यथा रूपं पञ्चभिर्धातुभिर्वृतः।
चेतना याभिसम्पन्नो रूपेणाद्भुतदर्शनः ॥ ३१ ॥
जैसे महामेरुगिरिका स्वरूप पाँच धातुओंसे युक्त होता है, उसी प्रकार वह पर्वत पाँच धातुओं (भूतों) से घिरा हुआ है। रूपसे वह अद्भुत दिखायी देता है तथा जो सुप्रसिद्ध चेतना है उससे वह सम्पन्न जान पड़ता है ॥ ३१ ॥

करिष्याम्यहमप्येतन्मनसा धर्मचारिणम्।
रूपं बहुविधं लोके पार्थिवीं चेतनां तथा ॥ ३२ ॥
(अब अपनेको परमात्मासे अभिन्न मानकर

८२० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'मैं ही सब कुछ करता हूँ' इस भावसे तत्त्वका निरूपण कर रहे हैं।) मैं ही धर्माचरण करनेवाले इस शरीरका मानसिक संकल्पसे निर्माण करता हूँ। लोकमें जो नाना प्रकारका रूप दिखायी देता है, उसकी भी मैं ही अपने मनसे सृष्टि करता हूँ। इस पार्थिव शरीरमें जो चेतना है, उसको भी मैं ही अभिव्यक्त करता हूँ ॥ ३२ ॥

त्रींश्च लोकान् प्रपद्येयं पञ्चभिर्धातुलक्षणैः । षष्ठेन च ससर्जैयं मनसा धर्मचारिणीम् ॥ ३३ ॥

मैं पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंसे तीनों लोकोंकी बातें जान सकता हूँ। छठी इन्द्रिय मनके द्वारा धर्मचारिणी वृत्तिकी रचना कर सकता हूँ ॥ ३३ ॥

सङ्गेषु भावमोहाभ्यां पश्यन्ति च समृद्धयः । विमुक्ताः सर्वसङ्गेभ्यो धारयन्ति परिग्रहान् ॥ ३४ ॥

जो समृद्धिशाली पुरुष समृद्धियोंका सङ्ग प्राप्त होनेपर भाव और मोहसे (संकल्पमात्र और भ्रमरूपसे) उन्हें देखते हैं तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हो विषय संग्रह करनेवाले मन, बुद्धि, इन्द्रिय और प्राणोंको काबूमें करते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानके अधिकारी हैं ॥ ३४ ॥

न च विन्देत मां कश्चिन्मनसा कामरूपिणम् । पञ्चधातुनिबद्धश्च नानाभाषितचोदनः ॥ ३५ ॥

प्रायः सब लोग पाञ्चभौतिक शरीरमें बँधे रहकर नाना प्रकारके फलोंकी चर्चा करनेवाली वेदवाणीसे प्रेरित हो सकाम कर्मोंमें लगे रहते हैं, अतः कोई भी मनसे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले मुझ परमात्माको नहीं उपलब्ध कर पाता ॥

ये च विष्णुमधीयन्ते बहुधा कामविग्रहैः । ते मां पश्येयुरव्यक्तं तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥ ३६ ॥

जो इच्छानुसार ग्रहण किये गये श्रीराम-कृष्ण आदि विग्रहोंसे उपलक्षित भगवान् विष्णुका नाम जप-कीर्तन आदिके द्वारा वारंवार स्मरण करते हैं, वे तपस्यासे अपने पापोंको दग्ध कर देनेवाले उपासक मुझ अव्यक्त परमात्माका साक्षात्कार कर सकते हैं ॥ ३६ ॥

ये च मामभिरोहेयुर्नरा धर्मपथे स्थिताः । तेऽपि स्वर्गजितः सन्तः पश्येयुर्मां गतक्लमाः ॥ ३७ ॥

जो मनुष्य धर्मके मार्गपर स्थित हो उक्त साधनसोपानके द्वारा मुझ निर्गुण ब्रह्मरूपी प्रासादपर आरोहण करते हैं, वे साधुपुरुष भी पाप-तापसे रहित हो स्वर्गपर विजय पा जाते और मेरा साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ ३७ ॥

यश्चैव पर्वतः प्रांशुर्मेरुष्पृष्ठे व्यवस्थितः । एतमारुह्य युध्येयुः प्राणत्यागे सुनिर्मलाः ॥ ३८ ॥

मेरुपृष्ठपर जो ऊँचा पर्वत खड़ा है, उसपर आरूढ़ होकर निर्मल अन्तःकरणवाले पुरुष प्राणों (इन्द्रियों) की आसक्तिका त्याग करनेके लिये युद्ध-संघर्ष (उग्र साधना) करते हैं ॥ ३८ ॥

अप्सरोभिः समागम्य विचरेयुर्मनोजवाः । नन्दनं वनमारुह्य काम्यकं च महद्वनम् ॥ ३९ ॥

सिद्धिके पथपर बढ़नेवाले साधक मनके समान वेगशाली हो नन्दनवन और विशाल काम्यकवनमें पहुँचकर अप्सराओं-से मिलते और उनके साथ विहार करते हैं ॥ ३९ ॥

इमां विद्यां समास्थाय मद्भक्ताः पुष्करेष्विह । शरीरं क्षपयिष्यन्ति व्रतैर्बहुविधैः कृतैः ॥ ४० ॥

मेरे भक्त इस विद्याको पाकर पुष्करतीर्थमें नाना प्रकार-के व्रतोंका अनुष्ठान करके अपने शरीरको क्षीण कर देंगे ॥

सिद्धिं प्राप्य क्रमेयुस्ते कामैर्बहुविधैर्नराः । इमं लोकममुं चैव सम्पतेयुर्यथासुखम् ॥ ४१ ॥

वे मनुष्य सिद्धि पाकर नाना प्रकारकी कामनाओंसे सम्पन्न हो क्रमशः ऊपर उठते और आनन्दपूर्वक इहलोक तथा परलोकमें घूमते-फिरते हैं ॥ ४१ ॥

गौरी सिद्धेतिव्याख्याता त्रिषु लोकेषु विद्यया । प्रभावं तपसा वृत्तं दर्शयन्ती समाहिताः ॥ ४२ ॥

जब एकाग्रचित्त योगी तपस्यासे प्राप्त हुए पूर्वोक्त प्रभावको दिखाते हैं, तब विद्या (शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे प्राप्त हुए ज्ञान) से सिद्ध हुई गौरीदेवी दर्शन देती हैं, जो तीनों लोकोंमें सिद्धाके नामसे विख्यात हैं ॥ ४२ ॥

षण्णां ज्ञानाभिसंधीनामभिज्ञानात् ससंग्रहाः । भवेयुस्ते निरारम्भा धातुनिर्मुक्तबन्धनाः ॥ ४३ ॥

कर्माङ्ग, वाह्य और आभ्यन्तर भेदसे भगवन्मूर्तिके दो प्रतीक, विराट्, सूत्रात्मा और अन्तर्यामी—ये सब मिलकर छह ज्ञानाभिसंधियां (संयमके स्थान) हैं। इनका जो सम्पूर्ण रूपसे अनुभव है, उससे कामनाका अभाव हो जानेके कारण साधकोंको अक्षीण योगैश्वर्य प्राप्त होते हैं। वे किसी भी कार्यका आरम्भ नहीं करते और पाञ्चभौतिक बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ४३ ॥

सहस्रगुणमप्यत्र दत्त्वा दानफलादिव । अविमानेन विप्राणां मनःशुद्धेन कर्मणा ॥ ४४ ॥ सर्वत्रैवाप्रमेयेण अत्यन्तं फलमाप्नुयुः । अमुष्मिंल्लोके धर्मज्ञाः सह सर्वकुलोद्भवैः ॥ ४५ ॥

जैसे यहाँ कोई अपराधी राजाको सहस्रगुना कर देकर उस करदानके फलसे राजाकी प्रसन्नता पाकर उस अपराधसे मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार धर्मज्ञ पुरुष सर्वत्र ही असंकुचित भावसे ब्राह्मणोंका सम्मान और शुद्धभावसे निष्काम-कर्मका अनुष्ठान एवं दान करके अपने समस्त पूर्वजोंके साथ

भविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः [ ८२१


ब्रह्मलोकमें जाकर आत्यन्तिक दुःखका निवारण करनेवाले अक्षय फलको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४४-४५ ॥

येषामिह च सांनिध्यं यज्ञे ब्राह्मणसंकुले।
ते भूयो यजमानाद्या अभिषिच्य पुनः पुनः॥ ४६ ॥

जिन यजमानों और ऋत्विजोंका ब्राह्मणोंसे भरे हुए यज्ञमें सांनिध्य है (यज्ञाङ्ग देवता आदिमें चित्तकी एकाग्रता है), वे यजमान आदि बारंबार बहुतसे यज्ञोंमें अवभृथस्नान करके पुनः पूर्वोक्त फल प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४६ ॥

तथा तां मन्यसे गौरीं मनसा धर्मचारिणीम्।
अनुग्रहाय भूतानां तन्ममाग्रे तपोधने ॥ ४७ ॥

राजन्! तुम दान और यज्ञकी सम्पत्तिको जैसे मेरे सामने स्थित समझते हो, उसी प्रकार पूर्वोक्त गौरी (ब्रह्मविद्या) को भी यदि तुम मुझ तपोधनके समीप—मेरे सम्मुख उपस्थित मानते हो तो अबसे ऐसा न मानना; क्योंकि वे गौरीदेवी सम्पूर्ण प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये मनसे निरन्तर धर्मका आचरण करती हैं (यह बाह्य सम्पत्ति तो परिमित है, परंतु वे आन्तरिक ज्ञान-सम्पत्ति होनेके कारण अनन्त हैं।) ॥ ४७ ॥

सत्य एष परोऽविद्ये भविता नात्र संशयः।
नाफलो विद्यते धर्मश्चरितो धर्मचारिणा ॥ ४८ ॥

यह आत्मा अबाधित सत्य है; परंतु विद्यारहित पुरुषसे बहुत दूर हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। निष्काम धर्मका आचरण करनेवाले पुरुषके द्वारा आचरित हुआ धर्म कभी निष्फल नहीं होता (अतः धर्मसे भी चित्तशुद्धिके द्वारा आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो सकता है) ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥


अष्टाविंशोऽध्यायः

पुष्करमें श्रीविष्णु आदिकी तपस्या और उसके प्रभावका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

दिशां जिगमिषुर्विष्वग्यामुत्तरां सत्यसाधनः।
तथा स धातुनिचये पुण्ये पर्वतरोधसि ॥ १ ॥
विष्णुः परमधर्मात्मा एकपादेन तिष्ठति।
दशवर्षसहस्राणि पुष्करे पुष्करेक्षणः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सत्य ही जिनका साधन है, उन परम धर्मात्मा भगवान् विष्णुने उत्तर दिशा (सिद्धिकी पराकाष्ठा मोक्ष) को जानेकी इच्छा की। वे कमलनयन श्रीहरि पुष्करतीर्थमें धातुओंकी राशिसे परिपूर्ण एक पर्वतके पवित्र तटपर एक ही पैरसे दस हजार वर्षोंतक खड़े रहे !। १-२ ॥

आत्मन्यात्मानमाधाय तपसा ब्रह्मसम्भवः।
घटते कर्मणोग्रेण लोकमुत्थानकारणात् ॥ ३ ॥

ब्रह्माको भी जन्म देनेवाले वे भगवान् विष्णु अपने चित्तको विशुद्ध आत्मामें विचारद्वारा विलीन करके उत्थान (मोक्ष) के लिये उग्रकर्म (घोर तपस्या) करने लगे। साक्षात् परमेश्वर होकर भी उन्होंने जगत्को शिक्षा देनेके लिये ऐसा किया ॥ ३ ॥

भासुरो भस्मनाऽऽच्छाद्य गात्राणि स्वयमात्मनः।
अष्टौ वर्षसहस्राणि सहस्रं च तपोधनः ॥ ४ ॥

इसी प्रकार प्रकाशमान सोम भी स्वयं ही अपने अङ्गोंको भस्मसे आच्छादित करके आठ हजार वर्षोंतक तपस्यारूपी धनके संचयमें लगे रहे ॥ ४ ॥

तेजसा तेन ज्योतींषि विभाव्य ब्राह्मणर्षभः।
तिष्ठते नभसो मध्ये योगात्मा भावयञ्जगत् ॥ ५ ॥

तपस्याद्वारा प्राप्त हुए उस प्रसिद्ध तेजसे समस्त ग्रहनक्षत्रोंको तिरस्कृत करके योगात्मा ब्राह्मणशिरोमणि सोम सम्पूर्ण जगत्‌को आह्लाद प्रदान करते हुए आकाशके मध्यभागमें प्रकाशित होते हैं ॥ ५ ॥

सोमो विषयसंक्षिप्य मनसा धारयन्मनः।
युक्तः परमधर्मात्मा ब्राह्मीं सिद्धिमुपागतः ॥ ६ ॥

परम धर्मात्मा सोमने बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके विषयोंपर अधिकार कर लिया और योगयुक्त होकर वे ब्राह्मी सिद्धिको प्राप्त हुए ॥ ६ ॥

सम्प्रदृश्यत सर्वत्र दिवि भुव्यन्तरे तथा।
ज्योतिष्णु कर्म कुर्वाणो बहुरूपः स सम्पदा ॥ ७ ॥

वे प्रकाश फैलानेका कार्य करते हुए स्वर्ग, पृथ्वी और दोनोंके मध्यभाग अन्तरिक्षमें सर्वत्र दिखायी देते हैं तथा अपनी योग-सम्पत्तिसे नाना प्रकारके रसरूप बहुत-से स्वरूप धारण कर लेते हैं ॥ ७ ॥

महेश्वरोऽतिगुह्यात्मा वृषरूपेण तिष्ठति।
उद्धृत्य दक्षिणं पादं वायुभक्षः समाहितः ॥ ८ ॥
अष्टौ वर्षसहस्राणि सहस्रं शतमेव च।
महायोगी महादेवो नियमाद् ब्रह्मसम्भवः ॥ ९ ॥

अपने स्वरूपको अत्यन्त गुप्त रखनेवाले भगवान् महेश्वर

८२२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


वृषभरूपसे तपस्याके लिये अपना दाहिना पैर उठाकर नौ हजार एक सौ वर्षोंतक खड़े रहे । उन दिनों केवल वायु ही उनका आहार था। वे मनको ध्येय वस्तुमें निरन्तर एकाग्र रखते थे । ब्रह्माजीके उत्पत्तिस्थान महायोगी महादेवजी नियमपूर्वक तपस्यामें लगे रहे ॥ ८-९ ॥

अथ वायुर्घनीभूतो अन्ते चरति गोपतेः ।
फेनीभूतं समुद्गारैः पवनं निर्गिरन्मुखात् ॥ १० ॥

तदनन्तर एक दिन इन्द्रियोंका निग्रह करनेवाले भगवान् महेश्वरके निकट घनीभूत वायु विचरण करने लगी । उस समय वृषभरूपधारी महादेवजीने अपने उद्गारों (लार आदि) के द्वारा फेनके रूपमें परिणत हुई उस वायुको भीतर खींचकर फिर मुखसे बाहर निकाला ॥ १० ॥

स निष्क्रान्तस्ततो वक्त्रात् प्राणेन परमाप्तवान् ।
निर्यासमूतः पतितो नैवार्द्रो नैव पार्थिवः ॥ ११ ॥

उद्गारवायुके साथ उनके मुखसे निकली हुई वह वायु रूपान्तरको प्राप्त हो वृक्षोंकी गोंदके समान नीचे गिर पड़ी । उस समय वह न तो गीली थी और न पार्थिव—पाषाण आदिके समान सूखी ही ॥ ११ ॥

स फेनो वारिणाऽऽविश्य चचार वसुधातले ।
नैवार्द्रो नैव शुष्काङ्गो वायुसंघातमागतः ॥ १२ ॥

वायुका वह रूप फेनके नामसे प्रसिद्ध हुआ । वह फेन जलसे आविष्ट हो भूतलके समीपवर्ती अन्तरिक्षमें विचरने लगा । वह न गीला था न सूखा । वायुके ही घनीभूत स्वरूप-को प्राप्त हो गया था ॥ १२ ॥

तत्काले फेनमुत्क्षिप्य पवनः सह वारिणा ।
निरालम्बे निरालम्बस्त्वभ्राणि समपद्यत ॥ १३ ॥

उस समय जलसहित फेनको ऊपर उछालकर निराधार आकाशमें निराधार रुकी हुई वह वायु मेघोंके रूपमें परिणत हो गयी ॥ १३ ॥

ते क्षिपन्ति पयो भूमावात्मानं स्वेन घट्टिताः ।
नीलमेघारुणप्रख्या नैवार्द्रा नैव पार्थिवाः ॥ १४ ॥

वे ओलोंके समान अपने ही स्वरूपसे घनीभावको प्राप्त हो नील मेघ बनकर अपने आत्मा जलको ही इधर उधर बरसाते थे । सूर्यसारथि अरुणकी कान्ति पड़नेसे वे लाल रंगके भी दिखायी देते थे । वे भी न तो गीले थे और न मिट्टीके ढेलोंके समान सूखे ही ॥ १४ ॥

ब्राह्मीं मूर्तिं समाधाय वायुः सर्वत्रगो वशी ।
समाः सहस्रं सम्पूर्णं चचार विपुलं तपः ॥ १५ ॥

तदनन्तर सर्वत्र विचरनेवाले वायुदेवने ब्राह्मणका शरीर धारण करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए पूरे एक सहस्र वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की ॥ १५ ॥

वहिर्बहुजटी भूत्वा चीरवल्कलवासभृत् ।
तपस्तप्यदनाहारो मौनमास्थाय पौष्करे ॥ १६ ॥
वर्षाणां च सहस्राणि त्रीणि चैकं च यत्नतः ।

अग्निदेव भी बहुत-सी जटाएँ बढ़ाये चीर और वल्कल वस्त्र धारण किये बिना कुछ खाये-पीये मौन हो पुष्कर तीर्थमें चार हजार वर्षोंतक यत्नपूर्वक तपस्यामें लगे रहे ॥ १६३ ॥

तस्याग्नेस्तेजः सम्भूतो महानग्निः प्रवर्तते ॥ १७ ॥
स्वर्गप्रकाशं कृत्वा च स्वर्गवासी तमोनुदः ।
दिवि भूतप्रकाशाख्यस्तपसा ब्रह्मसम्भवः ॥ १८ ॥

उस अग्निके तेजसे एक महान् अग्निका प्रादुर्भाव हुआ, जो स्वर्गमें प्रकाश फैलाकर वहीं रहने और वहाँके अन्धकारको दूर करने लगी । (वही सूर्य आदिके रूपमें प्रसिद्ध है ।) वह ब्राह्मण अग्नि अपनी तपस्याके प्रभावसे स्वर्गमें 'भूतप्रकाश' नामसे प्रसिद्ध हुई ॥ १७-१८ ॥

तत्तमो भुवि राजेन्द्र मानुषेषु प्रतिष्ठितम् ।
भास्करस्तेजसंहारस्ततो भवति सत्तमः ॥ १९ ॥

राजेन्द्र ! वह अन्धकार भूतलपर मनुष्योंमें प्रतिष्ठित हुआ । (यहाँ अन्धकारका अर्थ धूम तथा उससे उपलक्षित धूम मार्ग है, जो वर्णाश्रमाभिमानी मनुष्योंमें प्रतिष्ठित है ।) तेजःपुञ्ज सूर्य उस पूर्व अग्निकी अपेक्षा अत्यन्त उत्कृष्ट हैं ॥ १९ ॥

मर्त्यानां सर्वभूतानां तेज आच्छिद्य वर्तते ।
न तु योगबले राजन् ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
तत् तमो नाशयेद् रात्रौ नाप्यहो भविताद्वयम् ॥ २० ॥

राजन् ! योगबलके होनेपर सूर्यदेव मर्त्यलोकके अन्य समस्त प्राणियोंके तेजको तिरस्कृत कर देते या छीन लेते हैं । परंतु ब्राह्मणके तेजका वे संहार नहीं करते हैं। उसपर विशेष ध्यान रखते हैं । जो सूर्यदेवका उपासक है, उसके तम (धूम मार्ग) का वे रातमें भी नाश कर देते हैं (अर्थात् सूर्योपासककी रातमें मृत्यु हो तो भी उसे अर्चि आदि मार्ग ही मिलता है )। परंतु जो सकाम कर्मोंमें लगा हुआ है, उसकी दिनमें मृत्यु हो तो भी वह दिन उसे अद्वय (मोक्ष) पदकी प्राप्ति करानेवाला नहीं होता ॥ २० ॥

पुष्पमित्रो महातेजा यक्षः सर्वत्रगो वशी ।
तपश्चरति धर्मात्मा पुष्करेषु समाहितः ॥ २१ ॥

सर्वत्र जानेमें समर्थ और जितेन्द्रिय यक्ष महातेजस्वी धर्मात्मा पुष्पमित्र एकाग्रचित्त हो पुष्करमें तपस्या करते हैं ॥ २१ ॥

महेन्द्रशिखराद्धारा यावन्त्यो यान्ति मेदिनीम् ।
तावत्स्वरूपमास्थाय तिष्ठते निखिलाः समाः ॥ २२ ॥

महेन्द्रपर्वतके शिखरसे जलकी जितनी धाराएँ पृथ्वीपर

भविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ८२३


जाती हैं, उतने स्वरूप धारण करके वे सारे वर्षोंतक तपस्यामें ही लगे रहते हैं ॥ २२ ॥ जानुभ्यां पतितो भूमौ ज्योतिर्नभसि पश्यति । समाः सहस्रं निखिलं नेत्रैरनिमिषैर्जगत् ॥ २३ ॥ वे पृथ्वीपर घुटने टेककर पड़ जाते हैं (अर्थात् सूर्य- देवको नमस्कार करते हैं) । इसका फल यह होता है कि सूर्यमण्डलके मध्यभागमें जो आकाश-सा प्रकाशित होता है, उसमें एकटक आँखें लगाकर वे सहस्रों वर्षोंतक सम्पूर्ण जगत्‌को देखते रहते हैं ॥ २३ ॥ नेत्राणि बहुधा तस्य नेत्रान्तैरभिनिःसृताः । मध्यन्दिनकरे प्राप्ते रश्मिवान् सपरिग्रहे ॥ २४ ॥ ते रश्मयः प्रभानेत्रैः शतशोऽथ सहस्रशः । रराज तेजःसंयोगाद् विद्वद्भिरिव पावकः ॥ २५ ॥ सूर्यमण्डलके मध्यभागमें दृष्टि डालनेपर अंशुमाली सूर्य परिवेष (घेरे) की भाँति प्रतीत होते हैं और मध्यभागमें गोल दर्पणके समान दिखायी देते हैं । जब पुष्पमित्रके नेत्र- प्रान्त सूर्यमण्डलमें पहुँचते, तब सूर्यकी प्रभासे मिले हुए नेत्रोंके साथ वे सुप्रसिद्ध सूर्य‌रश्मियाँ वहाँसे निकलकर ऊपर- नीचे इधर-उधर सब ओर फैल जातीं और सूर्यकी धारणा करनेवाले उन यक्षराजके लिये बहुसंख्यक—सैकड़ों और हजारों नेत्र बन जाती थीं। वे उन अनेक नेत्रोंके तेजसे संयुक्त होकर ऐसी शोभा पाते थे, जैसे विद्वान् ऋत्विजोंसे घिरे हुए अग्निदेव सुशोभित होते हैं ॥ २४-२५ ॥ स विस्फुलिङ्‌गैर्नेत्रान्तैरादित्यमनुवर्तते । कर्मणोऽन्ते युगान्ते वा जगतो बहुरूपिणः ॥ २६ ॥ जब देहारम्भके कर्मोंका क्षय हो जाता है अथवा अनेक रूपवाले जगत्‌का प्रलयकाल उपस्थित होता है, उस समय वे पुष्पमित्र अथवा भावी कुबेर आगकी चिनगारियोंके समान प्रकाशित होनेवाले अपने नेत्रकोणोंके द्वारा सूर्यदेवका अनुवर्तन करते हैं ॥ २६ ॥ बहुतापः पुनर्भूत्वा निषण्णो वसुधातले । समाः सहस्रं सम्पूर्णं तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ २७ ॥ निगृहीतेन्द्रियो भूत्वा अप्सरोभिर्ललाम ह । मेरोः शिखरमासाद्य कामं कामेन निर्वमन् ॥ २८ ॥ अपनी तपस्याका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जानेपर वे पृथ्वीतलपर बैठ गये और इन्द्रियोंको काबूमें करके पूरे एक सहस्र वर्षोंतक पुनः अत्यन्त दारुण तपस्या करते रहे । तत्पश्चात् मेरु‌पर्वतके शिखरपर जाकर भोगके द्वारा ही काम‌का परित्याग करते हुए उन्होंने अप्सराओंके साथ रमण किया ॥ २७ २८ ॥ तपःकामः स यक्षस्तु कुबेरो नरवाहनः । विष्णुरेव तपोऽध्यक्षस्तेजसोऽन्ते विजृम्भति ॥ २९ ॥ तपस्याकी कामनावाला जो पुष्पमित्र नामक यक्ष था, वही नरवाहन कुवेर हुआ । उसके रूपमें तपस्याके अध्यक्ष भगवान् विष्णु ही थे; जो तपके अन्तमें तेजवृद्धि‌को प्राप्त हुए ॥ २९ ॥ न हि कश्चित् पुमानस्ति य एवं तप आचरेत् । त्रिषु लोकेषु राजेन्द्र ऋते विष्णुं सनातनम् ॥ ३० ॥ राजेन्द्र ! तीनों लोकोंमें सनातन भगवान् विष्णुको छोड़- कर दूसरा कोई पुरुष ऐसा नहीं है, जो ऐसी कठोर तपस्या कर सके ॥ ३० ॥ वासुकिर्बहुशीर्षस्तु नागेन्द्रो मौनमास्थितः । तप आचरते सम्यङ् निधाय मनसा मनः ॥ ३१ ॥ अनेक सिरवाले नागराज वासुकि भी मौन हो बुद्धिके द्वारा मनको सम्यकरूपसे ब्रह्ममें लगाकर तपस्या करते थे ॥ ३१ ॥ शेषः सत्यधृतिर्नागो बलवान् ब्रह्मसम्भवः । वृक्षमारुह्य धर्मात्मा अवाक्‌छीर्षोऽवलम्बते ॥ ३२ ॥ जिह्वाभिर्लेलिहानाभिर्गात्रजं विषमुत्सृजन् । समाः सहस्रं सम्पूर्णं निराहारस्तपोधनः ॥ ३३ ॥ सत्यको धारण करनेवाले ब्राह्मणपुत्र कश्यपनन्दन बलवान् नाग धर्मात्मा शेष एक वृक्षपर चढ़कर नीचेको सिर किये लटक रहे थे तथा लपलपाती हुई जिह्वाओंसे अपने शरीरका विष त्याग रहे थे । तपस्याके धनी शेषने पूरे एक सहस्र वर्ष निराहार रहकर बिताये ॥ ३२-३३ ॥ कालकूटं विषं तद्धि सुमहत् समपद्यत । येन लोको ह्यभिग्रस्तो न सुखं विन्दते नृप ॥ ३४ ॥ उनका छोड़ा हुआ वह विष ही महान् कालकूट नामक विष हो गया । नरेश्वर ! उस विषसे ग्रस्त हुआ लोक कभी सुख नहीं पाता है ॥ ३४ ॥ सर्वत्रानुगतं तीक्ष्णं भुजङ्गेषु महीपते । जङ्गमं स्थावरं चैव सर्वत्रानुगतं विषम् ॥ ३५ ॥ पृथ्वीनाथ ! वह तीक्ष्ण विष सर्पोंमें सर्वत्र व्याप्त है । स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंमें अनुगत है ॥ ३५ ॥ परस्परविवृद्धेन हिंसायुक्तेन भारत । नाशयत्यात्मनोऽङ्गानि तेन तीक्ष्णेन भारत ॥ ३६ ॥ भारत ! एक-दूसरेके प्रति बढ़े हुए हिंसाभावसे युक्त तीव्र क्रोधके रूपमें परिणत हुआ तप तामस होकर साधकके अपने ही अङ्गोंका नाश कर डालता है ॥ ३६ ॥ अथ ब्रह्मा महाभागो भूतानां हितकाम्यया । मन्त्रं विसृजते राजन् ब्रह्माक्षरमहिंसकम् ॥ ३७ ॥ राजन् ! हिंसक विषकी उत्पत्तिके अनन्तर महाभाग ब्रह्माने सम्पूर्ण भूतोंके हितकी कामनासे हिंसाका निवारण

८२४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करनेवाले—विषनाशक मन्त्रकी सृष्टि की, जो ब्रह्माक्षरमय (वेदाक्षरमय) है ॥ ३७ ॥

गरुत्मान् विततैः पक्षैर्नखाग्रैः सलिलं महीम्।
समाः सहस्रं सम्पूर्णं चूलाग्रेणावलम्बिना ॥ ३८ ॥

गरुड़ अपने फैले हुए पंखों, नखाग्रों (पञ्जाग्रों) तथा लटकती हुई शिखाके अग्रभागसे जल (जीवन) और पृथ्वी (शरीर) की पूरे सहस्र वर्षोंतक रक्षा करें *॥ ३८ ॥

पर्णभारैश्च विकचैर्विस्तीर्णैर्वसुधातले।
रराज वसुधा चैव पर्णैर्बहुविचित्रितैः ॥ ३९ ॥

वे अपने फैले हुए विकसित पङ्खोंके भारसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हैं, इस वसुधापर (तथा शरीरमें भी अन्तर्यामीरूपसे) विराजमान हैं; तथा उनके बहुसंख्यक एवं विचित्र पङ्खोंसे पृथ्वीतलकी बड़ी शोभा होती है। (यह गरुडजीका ध्यान है) ॥ ३९ ॥

येन वृत्तेन जीवेयुः सर्वभूतानि भारत।
इह लोके मनुष्येन्द्र देवलोके च भारत।
द्यौरिवाचितनक्षत्रा मही तलविसर्पिभिः ॥ ४० ॥

(अब मन्त्रका माहात्म्य बताते हैं—) भरतनन्दन! नरेन्द्र! गरुडमन्त्रके जपसे इहलोक तथा देवलोकके भी सभी प्राणी जीवित हो सकते हैं। नीचेकी ओर जानेवाले प्राणियों (तथा इन्द्रिय आदि) के साथ यह पृथ्वी (एवं देह) विषरहित हो नक्षत्रोंसे व्याप्त हुए आकाशकी भाँति शोभा पाती है ॥ ४० ॥

हिमवान् हिमसंम्पाते भवत्येकचरो वशी।
पुष्कराम्भसि धर्मात्मा मत्स्योल्लिखितमूर्धजः ॥ ४१ ॥

धर्मात्मा हिमवान् भी हेमन्त और शिशिर ऋतुमें पुष्करके जलमें खड़े हो तपस्या करते थे, उस समय उस सरोवरके मत्स्य उनके सिरके बालोंमें उलझ जाते थे। वे मन और इन्द्रियोंको वशमें करके अकेले ही वहाँ विचरते और तप करते थे ॥ ४१ ॥

अथ खबलमाक्रम्य पृथिवीं प्रांशुद्वाहिनीम्।
तपश्चरति धर्मात्मा बाहुमुद्यम्य दक्षिणम् ॥ ४२ ॥

वे धर्मात्मा हिमवान् अपने बलसे ऊँचे शरीरवाली पृथिवीको दबाकर दाहिनी बाँह ऊपर उठाये तपस्यामें संलग्न रहते थे ॥ ४२ ॥


* यहाँ मूलमें मन्त्रका विशेषण 'ब्रह्माक्षरमहिंसकम्' आया है। इसमें ब्रह्मसे प्रणव लिया गया है। 'अहिंसक अक्षर' से अमृत बीज 'वं' को ग्रहण किया गया है। इस बीजको विततपक्ष अर्थात् दीर्घस्वरसे युक्त कहा गया है। इसके बाद 'गरुत्मान्' पद आता है। इसका उपयोग पञ्चाङ्गन्यासमें किया जाता है। यथा—'ॐ वाँ गरुत्मान् हृदयाय नमः अङ्गुष्ठयोः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंकी तर्जनी अङ्गुलियोंसे दोनों अङ्गुष्ठोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वीं गरुत्मान् शिरसे स्वाहा तर्जन्योः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंके अङ्गुष्ठोंसे दोनों तर्जनी अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वूँ गरुत्मान् शिखायै वषट् मध्यमयोः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंके अङ्गुष्ठोंसे दोनों मध्यमा अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वैं गरुत्मान् कवचाय हुम् अनामिकयोः' (पूर्ववत् अङ्गुष्ठोंसे अनामिका अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वौं गरुत्मान् नेत्रत्रयाय वौषट् कनिष्ठयोः' (अङ्गुष्ठोंसे कनिष्ठिका अङ्गुलियोंका स्पर्श।) 'ॐ वः गरुत्मान् अस्त्राय फट् करतलकरपृष्ठयोः' (ऐसा कहकर हथेलीका और उसके पृष्ठभागसे पृष्ठभागका स्पर्श करे।) यह करन्यास हुआ। अङ्गन्यास भी इन्हीं मन्त्रोंसे करना चाहिये। यहाँ करन्यास वाक्योंमेंसे अङ्गुलियोंके नाम हटा देनेपर वे ही अङ्गन्यास वाक्य हो जायेंगे। अङ्गन्यासमें क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्रत्रय—इन पाँच अङ्गोंमें न्यास किया जाता है। इसीमें छठा अस्त्रन्यास है। अंगूठेको अलग करके सीधी अङ्गुलियोंसे हृदय और सिरमें न्यास करना चाहिये। अंगूठेको अंदर करके मुट्ठी बाँधकर शिखाका स्पर्श करना चाहिये। कोई-कोई केवल अंगूठेसे शिखाका स्पर्श बताते हैं। कवचन्यासमें दायें हाथकी सभी अङ्गुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी सभी अङ्गुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करना चाहिये। दो नेत्रोंके अतिरिक्त तीसरा नेत्र ललाटमें होता है। इसका न्यास करते समय तर्जनी और अनामिकासे दोनों नेत्रोंका और मध्यमासे ललाटका एक साथ स्पर्श करना चाहिये। अस्त्रन्यासमें दाहिने हाथको बायीं ओरसे सिरके ऊपरसे ले आकर बायीं हथेलीपर ताली बजायी जाती है। कुछ लोगोंका मत है कि नाराचमुद्रासे दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर अंगूठे और तर्जनीके द्वारा मस्तकके चारों ओर करतल ध्वनि करनी चाहिये।

३८ वें श्लोकके 'सलिलं मही'से लेकर ... ... 'वलम्बिना' तक तान्त्रिक पद्धतिसे मूलमन्त्रका वर्णन है। आचार्य नीलकण्ठने उसका उद्धार करके इस पञ्चाक्षर मन्त्रका स्वरूप यों निश्चित किया है—'वं हस्रः लं वषट्'। इस मन्त्रका विनियोग इस प्रकार है—ॐ अस्य श्रीगरुत्मन्मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः गरुत्मान् देवता वं बीजं हस्रः शक्तिः लं कीलकं विषनाशने विनियोगः। विनियोगके पश्चात् गरुडका निम्नाङ्कित रूपसे ध्यान करना चाहिये—

पर्णभारैश्च विकचैर्विस्तीर्णैर्वसुधातले।
रराज वसुधा चैव पर्णैर्बहुविचित्रितैः ॥

जो विस्तृत एवं विकसित पंखोंके भारसे सारी पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हैं, जो भूतलपर (और शरीरके भीतर भी अन्तर्यामीरूपसे) विराजमान हैं तथा जिनके बहुत विचित्र पंखोंसे पृथिवीकी बड़ी शोभा हो रही है (उन गरुडदेवका मैं चिन्तन करता हूँ)।

इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रका ५ लाख जप करनेसे यह सिद्ध हो जाता है।