हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
५६ हर्षचरितम् मालती, किमर्थमेवमभिदधासि ? काहमवधानदानस्य शरीरस्य प्राणानां वा ? सर्वस्याप्रार्थितोऽपि प्रभवत्येवातिवेलं चक्षुष्यो जनः। सा न काचिद्या न भवसि मे स्वसा सखी प्रणयिनी प्राणसमा च। नियुज्यतां यावतः कार्यस्य क्षमं क्षोदीयसो गरीयसो वा शरीरकमिदम्। अनवस्करमा- श्रवं मे त्वयि हृदयम्। प्रीत्या प्रतिसरा विधेयास्मि ते। व्यावूणु वरवर्णिनि, विवक्षितम्' इति। सा त्ववादीत्- 'देवि, जानास्येव माधुर्यं विषयाणाम्, लोलुपतां चेन्द्रियग्रामस्य, उन्मादितां च नवयौवनस्य, पारिप्लवतां च मनसः। प्रख्यातैव मन्मथस्य दुर्निवारता। अतो न मामुपालम्भे- नोपस्थातुमर्हसि। न च बालिशता चपलता चारणता वा वाचालतायाः कारणम्। न किंचिन्न कारयत्यसाधारणा स्वामिभक्तिः। सा त्वं देवि, यदैव दृष्टासि देवेन तत एवारभ्यास्य कामो गुरुः, चन्द्रमा जीवितेशः, मलयमरुदुच्छ्वासहेतुः, आध्योऽन्तरङ्गस्थानेपु, संतापः परमसुहृत्, प्रजागर आप्तः, मनोरथाः सर्वगताः, निःश्वासा विग्रहाग्रेसराः, मृत्युः पार्श्ववर्ती, रणरणकः संचारकः, संकल्पा बुद्ध्युपदेशवृद्धाः। किंच विज्ञा- पयामि। अनुरूषो देव इत्यात्मसंभावना, शीलवानिति प्रक्रमाविरुद्धम, धीर इत्यवस्थाविपरीतम्, सुभग इति त्वदायत्तम्, स्थिरप्रीतिरिति निपुणोपक्षेपः, जानाति सेवितुमित्यस्वामिभावोचितम्, इच्छति दास- भावमामरणात्कर्तुमिति धूर्तालापः, भवनस्वामिनी भवेत्युपलोभनम्, पुण्यभागिनी भजति भर्तारं तादृशमिति स्वामिपक्षपातः, त्वं तस्य मृत्यु- रित्यप्रियम्, अगुणज्ञासीत्यधिक्षेपः, स्वप्नेऽप्यस्य बहुशः कृतप्रसादासी- त्यासाक्षिकम्, प्राणरक्षार्थमर्थयत इति कातरता, तत्र गम्यतामित्याज्ञा, वारितोऽपि बलादागच्छतीति परिभवः। तदेवमगोचरे गिराम्सीति श्रुत्वा देवी प्रमाणम्' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत्। आकूतमभिप्रायः। रहस्येकान्ते। सरस्वतीत्यादौ। सरस्वती कुसुमशयनीयादु- दगादुदतिष्ठदिति संबन्धः। अवतंसपल्लवेन गलतेतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया। संदोहः समूहः। संज्वरः संतापः। उपांश्वनुक्तम्। अतिवेलमतिमात्रम्। 'अतिपेशलः' इति पाठे पेशलः। सुन्दरः। चक्षुष्योऽनुकूलः। त्वमिव व्यक्तम्। चक्षुष्य इति भङ्ग्वा दधीच इति ध्वनति। स्वसा भगिनी। प्रणयिनी विश्वास्ता। अतिशयेन क्षुद्रमल्पं क्षोदीयः। 'ज्ञेयं गुह्यमनवस्करम्' । आश्रवं वचसि स्थितम् । प्रतिसरानुकूला । विधेया
प्रथम उच्छ्वासः ५७ वश्या । व्यावृणु प्रकटय । वरवर्णिनि वरारोहे । लोलुपतां साभिलाषत्वम् । 'चलार्थको निगद्येते पारिप्लवपरिप्लवौ' । बालिशोऽज्ञः । चारणता धूर्तता । असा- धारगानन्यसदृशी । देवी देवेनेति च परस्परसमगुणयोगित्वमभिव्यनक्ति । गुर्वा- रीयान्, उपदेष्टा वा । तद्वशवर्तित्वात् । यश्च देवस्तस्य गुरुराचार्यः कश्चिदवश्यं सम्भवति । जीवितस्येश्वरः स्वामी जीवितेशः । शिशिरतया मदनदाहप्रशमनहे- तुत्वात् । अमृतमयत्वेन च जीवितसन्धारणशक्तत्वात् । अथ च जीवितेशो मृत्युः । चन्द्रादयो ह्यापातत एव तापं शमयन्ति, अनवरतं सेव्यमानाः पुनः कामोद्दीप- कत्वेन मृत्युं दिशन्ति । राजपक्षे जीवितेशः कश्चित्पुरोहितप्रायः । उच्छ्वसनमुच्छ्वा- सस्तत्र हेतुः । अथ च श्वासोत्क्रान्तौ कारणम्, इतरत्र सचिवप्राया विश्वसनीयाः । आधयश्चित्तपीडाः । अत एवान्तरङ्गमन्तःशरीरं यानि स्थानानि तेषु, इतरत्रान्त- रङ्गान्तर्वशिकास्तत्स्थानेषु विश्वसनीयजनाधिकारेषु । परं प्रकृष्टम् । असुहरोऽमित्रो वा । अभ्यन्त्र-परमसुहृन्मित्रं च । आप्तः प्राप्तो बान्धवप्रायः कश्चित् । सर्वगताश्चारा अपि संस्थाख्याः । विग्रहो विरोधः, देहश्च । मृत्युरिति । त्वदनङ्गीकारेण निश्चितं म्रियते । राज्ञोऽपि पार्श्वे मृत्युस्तिष्ठत्येव । रणरणको दुःखमरतिकृतम् । अत एव संचारक एकत्र नरे सम्भवदितरत्र संचारयति, चरितं वस्तु यः प्रापयते सः । द्विविधा हि चाराः-संस्थाः, संचारकाश्च । वृद्धा महान्तः, स्थविराश्च । अनुरूप इत्यादिनेदमिदं तन्नास्तीति वक्रोक्त्या सातिशयं मालती वैदग्ध्येनाह । प्रक्रम आरम्भः । निपुणोपलेपो बुद्धिमत्प्रक्रमः । धूर्तालापः प्रतारणावचनम् । याग्नि इति । भव्येयेवेत्यर्थात् । बातचीत में दिन चढ़ गया । तब सावित्री उधर शोण में स्नान करने उतरी । इधर मौका पाकर मालती परिजनों को वहाँ से अलग करके फूल के बिस्तर पर लेटी हुई सरस्वती के पास आकर बोली-'देवि, एकान्त में कुछ मुझे आपको सूचित करना है, इसलिए चाहती हूँ कि क्षणभर आप प्रसन्नता से ध्यान देकर सुनें ।' दधीच के संदेश की आशंका से 'न मालूम क्या कहेगी' सरस्वती यह सोचने लगी । छाती पर रखे हुए उसके बायें हाथ के नख की किरणें ऐसी लग रही थीं मानों कुतूहल का अंकुर हृदय से निकल रहा हो । वह ऐसे हृदय को दुकूल वल्कल के अँचरे के खूँट से ढँक रही थी । कान में लगा हुआ पल्लव गिरने लगा, मानों उसका कान ही सुनने के कुतूहल से दौड़ पड़ा हो । निरन्तर साँस के झूले पर बैठी हुई जीविताशा को समीप के तरुण वृक्ष पर मानों अवलम्बित करने के लिए सहारा ले रही थी । खिलखिलाए हुए मुखचन्द्र के लावण्य की धारा से श्रृंगार रस के रूप में प्रवाहित करके मानों समस्त जीवलोक को भरने लगी । शय्या के फूल के रस पीने में लगे हुए, मदनाग्नि से जले उसके मनोरथ के रूप में श्यामवर्ण वाले भौरों ने उसे झटका दिया और कामज्वर से पीड़ित वह अपने
[५८] हर्षचरितम्
पुष्पशयन से धीरे धीरे उठो। 'धीरे बोल' यह कहती हुई सरस्वती अपने कपोल पर प्रतिबिम्बित मालती को लज्जा से मानों अपने कानों में पहुँचाती हुई मधुर आवाज से धीरतापूर्वक बोली—'सखी मालती, कैसी बात कर रही है ? मैं क्या अवधान देकर सुनूँ ? शरीर और प्राण पर भी मेरा वश नहीं। प्रार्थना के बिना ही प्रियजन का प्रभुत्व सब पर व्याप्त हो रहा है। तू तो मेरी सब कुछ है, बहन तू, सखी तू, प्रणयिनी तू, और प्राणसमा भी तू। छोटे-बड़े किसी योग्य काम के लिए इस शरीर को नियुक्त कर। मेरा हृदय तेरे प्रति निर्मल और बात पर अटल रहने वाला है। तू प्रेम से मुझे अनुकूल और अपने वश में कर ले। री मालती, कह, क्या कहना चाहती है ?' वह बोली— 'देवि, तू जानती ही है कि विषय मधुर लगते हैं, इन्द्रियाँ लोलुप होती हैं, नई जवानी मतवाली होती है, मन चञ्चल रहता है। काम को रोकना कठिन है यह बात प्रसिद्ध ही है। तो मुझे तू उपालम्भ न देना। मेरी इस वाचालता का कारण मूर्खता, चपलता या धूर्तता नहीं है। स्वामी की भक्ति क्या नहीं कराती ? जब से तुम्हें उन्होंने देखा है तभी से कामदेव उनका आचार्य बन बैठा है, चन्द्रमा उनके प्राणों का अधिपति हो गया, मलयामिल उनके उच्छ्वास का कारण बन गया, मन की व्यथाएँ अन्तरंग बन गईं, सन्ताप परममित्र बन गया, जागरण आत्मीय हो गया, मनोरथ अव्यवस्थित हो गए, निश्वास विरह के आगे चलने लगे, मृत्यु पार्श्वचर हो गई, मानसिक दुःख ही सचारक बने, संकल्प ही बुद्धि के उपदेशक वृद्ध बने। और क्या कहूँ ? अगर कहती हूँ 'देव दधीच सुयोग्य हैं, तो अपने सम्मान की बात होती है; 'वे सुशील हैं' तो बात प्रसंग के विरुद्ध होती है; 'धीर हैं' यह बात मदनावस्था से विपरीत है, 'सुभग हैं' यह तो तुम कह सकती हो; 'उनकी प्रीति स्थिर है' यह चतुरता की बात होती है; 'सेवा करना वे जानते हैं' यह कहना स्वामी के लिए उचित नहीं; 'मरने तक तुम्हारी दासता चाहते हैं' यह प्रलोभन हुआ; 'धन्यभाग नारी ही ऐसे पति को प्राप्त करती है' यह स्वामी के प्रति मेरा पक्षपात करना है; 'तू उसकी मृत्यु है' यह बात अप्रिय होती है; 'तू गुणों को नहीं समझती' यह निन्दा की बात होती है; 'स्वप्न में भी तुमने इस पर बहुत बार प्रसन्नता की' इस बात में कोई साक्षी नहीं; 'अपने प्राणों की भीख माँगता है' यह कातरता है; 'वहाँ जाओ' यह आज्ञा होती है; 'रोकने पर भी हठपूर्वक आता है' यह अनादर की बात है। इस प्रकार तुमसे मैं कुछ नहीं कह पातीं। बस मुझे यही कहना है।' यह कहकर मालती चुप हो गई। अथ सरस्वती प्रीतिविस्फारितेन चक्षुषा प्रत्यवादीत्—'अयि, न शक्नोमि बहु भाषितुम् । एषास्मि ते स्मितवादिनि वचसि स्थिता । गृह्य- न्ताममी प्राणाः' इति। मालती तु 'देवि, यदाज्ञापयसि, अतिप्रसादाय' इति व्याहृत्य प्रहर्षपरवशा प्रणम्य प्रजविना तुरगेण ततार शोणम्।
प्रथम उच्छ्वासः ५१ अगाव दधीचमानेतुं च्यवनाश्रमपदम् । इतरा तु सखीस्नेहेन सावित्री- मपि विदितवृत्तान्तामकरोत् । उत्कण्ठाभारभृता च ताम्यता चेतसा कल्पायितं कथंकथमपि दिवसशेषमनैषीत् , अस्तमुपगते च भगवति गभस्तिमति, स्तिमिततरमवतरति तमसि, प्रहसितामिव सितां दिशं पौरंदरीं दरीमिव केसरिणि मुञ्चति चन्द्रमसि सरस्वती शुचिनि चीनां- शुकसुकुमारतरे तरङ्गिणि दुगूलकोमलशयने इव शोणसैकते समुपविष्टा स्वप्रकृतप्रार्थना पादपतनलभ्रां दधीचचरणनखचन्द्रिकामिव ललाटिकां दधाना, गण्डस्थलादर्शप्रतिबिम्बितेन 'चारुहासिनि, अयमसावाहूतो हृदयदयितो जनः' इति श्रवणसमीपवर्तिना निवेद्यमानमदनसंदेशेनेन्दुना, विकीर्यमाणनखकिरणचक्रवालेन बालव्यजनीकृतचन्द्रकलाकलापेनेव करेण वीजयन्ती स्वेदिनं कपोलपट्टम् , 'अत्र दधीचादृते न केनचित्प्र- वेष्टव्यम्' इति तिरश्चीनं चित्तभुवा पातितां विलासवेत्रलतामिव बाल- मृणालिकामधिस्तनं स्तनयन्ती कथमपि हृदयेन वहन्ती प्रतिपालया- मास । आसीच्चास्या मनसि- 'अहमपि नाम सरस्वती यत्रामुना मनो- जन्मना जानत्येव परवशीकृता । तत्र का गणनेतरासु तपस्विनीष्वति- तरलासु तरुणीषु' इति । प्रजविनेति साभिप्रायम् । अस्तमित्यादौ सरस्वती प्रतिपालयामासेति संबन्धः । गभस्तिमान्रविः । पौरंदर्यैन्द्री । दरी गुहा । चीनेत्यादि सैकतविशेषणम् । उपमा- नस्य तु दुगूलकोमल इत्युक्तम् । तरङ्गिणी प्रतिदिनं क्षीयमाणेन वारिणा कृतलेखे भङ्गियुक्ते च । चन्द्रिका कान्तिरत्र । ललाटालंकारो ललाटिका । चक्रवालं समूहः । बालव्यजनं चामरम् । स्तनमध्ये प्रवेशाभावात्तिरश्चीनमित्युक्तम् । यश्च वेत्री प्रवेश- निषेधननिमित्तं वेत्रलतां पातयति स तिरश्चीनः । स्तनयोरधिस्तनम् । विभक्त्य- र्थेऽव्ययीभावः । कुचपृष्ठ इत्यर्थः । स्तनयन्ती कलयन्ती । स्तनिः शब्दार्थश्चौरा- दिकः । 'स्तनन्ती' इति वा पाठः । तपस्विनीषु वराकीषु । तब सरस्वती उसे प्रसन्नता से घूर कर देखती हुई बोली- 'सखी मालती, मैं बहुत बात नहीं कर सकती । मैं तेरी बात मान जाती हूं। मेरे प्राणों को तू ग्रहण कर ।' मालती ने कहा-'देवि, आपकी प्रसन्नता के लिए आज्ञा शिरोधार्य्य है ।' मालती यह कह और अपने तेज घोड़े पर चढ़ सोन के उस पार चली गई और दधीच को लाने के लिए च्यवनाश्रम पहुँची । सरस्वती ने इस वृत्तान्त को सखी के स्नेह से सावित्री को भी सुना दिया । चित्त में उत्सुकता का बोझ लिए किसी-किसी प्रकार खिन्न होकर दिन को व्यतीत किया ।
६० हर्षचरितम् जब भगवान् सूर्य अस्त हो गए, धीरे धीरे अन्धकार भी उतरने लगा और चन्द्रमा जैसे सिंह गुफा से निकलता है वैसे ही हँसती हुई उज्ज्वल पूर्व दिशा को छोड़ने लगा, तब सरस्वती पवित्र चीनांशुक के समान कोमल, और तरंगों के चिन्ह वाली मानों चादर से युक्त कोमल शय्या के सदृश सोन की रेत पर आकर बैठी और प्रतीक्षा करने लगी। वह ललाट का आभूषण धारण कर रही थी, मानों वह स्वप्न में प्रार्थना करने के लिए पैरों पर गिरने से दधीच के नखों की ज्योत्स्ना हो। उसके गालों के आइने में चन्द्रमा प्रतिबिम्बित हो रहा था, मानों वह उसके कान के पास आकर काम का यह संदेश उसे सुना रहा था कि 'हे चारुहासिनी, देख, मैंने तेरे हृदय दयित दधीच को तेरे पास पहुंचा दिया।' हाथ के नखों की किरणें चारों ओर फैल रही थीं, मानों उसने चन्द्र की कलाओं को ही चंवर बना दिया हो, ऐसे हाथ को वह पसीने से तर अपने गालों पर झल रही थी वह अपने स्तनों पर किसी प्रकार बाल मृणालिकाओं को धारण किए थी। 'यहाँ दधीच के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रवेश न करे' इसलिए काम ने मानों अपनी वेत्रलता वहाँ छोड़ दी थी। उसने मन में सोचा-'सरस्वती होकर भी मैं जब इस काम द्वारा सब कुछ समझते हुए भी परवश कर दी गई, तो उन बेचारी अतिचपल स्वभाव वाली तरुण नारियों की क्या गणना ?' आजगाम च मधुमास इव सुरभिगन्धवाहः, हंस इव कृतमृणाल- धृतिः, शिखण्डीव घनप्रीत्युन्मुखः, मलयानल इवाहितसरसचन्दनधव- लतनुलतोत्कम्पः, कृष्यमाण इव कृतकचकचग्रहेण ग्रहपतिना, प्रेर्यमाण इव कंदर्पोद्दीपन्ददक्षेण दक्षिणानिलेन, उह्यमान इवोत्कलिकाबहुलेन रति- रसेन, परिमलसंपातिना मधुपपटलेन पटेनेव नीलेनाच्छादिताङ्गयष्टिः, अन्तःस्फुरता मन्मदनकरिकर्णशङ्खायमानेन प्रतिमेन्दुना प्रथमसमागम- विलासविलक्षस्मितेनेव धवलीक्रियमाणैककपोलोदरो मालतीद्वितीयो दधीचः। आगत्य च हृदयगतदयितानूपुररवविमिश्रयेव हंसगद्गदया गिरा कृतसंभाषणो यथा मन्मथः समाज्ञापयति, यथा यौवनमुपदिशति, यथा विदग्धताध्यापयति, यथानुरागः शिक्षयति, तथा तामभिरामां राममूर- मयत्। उपजातविश्रम्भा चात्मानमकथयदस्य सरस्वती। तेन तु सार्ध- मेकदिवसमिव संवत्सरमधिकमनयत्। आजगामेत्यादौ आजगामेति सम्बन्धः। सुरभिगन्धवाहो वातः सुरभिगन्धं च यो वहति। धृतिर्धारणम्, प्राणयात्रा च। घनः। सरसं सान्द्रं यच्चन्दनं तेन धवलया तनुलतयाहितश्च उत्कम्पः कामधर्म्मो यस्य। अन्यत्र-चन्दनांश्च धवांश्च
प्रथम उच्छ्वासः ६१ म्लान्ति श्रयन्ति यास्तमभ्यो लतास्तासामाहित उत्कम्पः कम्पनं येनेति । क्षुभ्यमाण इत्युद्दीपनकारणत्वात् । करा रश्मयः, हस्तश्च करः । हस्तस्य कर्षणं समुचितम् । ग्रहपतिश्चन्द्रः । प्रेर्यमाण इति । अनिलस्योचितमेतत्कर्म । उह्यमान इति । जलस्यो- चितमेतत् । उत्कलिका रहुरुहिका, ऊर्मयश्च । रसोऽभिलाषः, जलं च । परिमल आमोदः । पटलं समूहः । प्रतिमा प्रतिच्छन्दकम् । यथा मन्मथ इति । मन्मथस्य प्रभवनशीलत्वेनाज्ञादानमुचितम् । एवं सर्वत्रोपदिशतीति । इत्थमित्थं वर्तस्वेत्यु- पदेशः । देवताविषयं सम्भोगशृङ्गारवर्णनममुचितमिति न तत्र विस्तरः प्रवर्तते । कुमारीत्वे च गान्धर्वविवाहो विस्तरेण न तथा वर्णितः शापनिर्वाहणमात्रपरत्वा- दिति । वृत्तस्यान्यथा निजभर्तृत्यागो दोषावहः किमर्थं कृत इत्यादिकाः कुविकल्पा उत्पद्येरन्निति । तब वसन्त के समान सुगन्धि से भरे हुए, हंस के समान मृणाल धारण किए हुए, मयूर के समान घन ( दृढ़ या मेघ में ) प्रीति करने वाले, मलयानल के समान सरस चन्दन के लेप से उज्ज्वल काँपते हुए शरीर वाले दधीच मालती के साथ आए। मानों चन्द्र उन्हें किरण रूपी हाथों से बाल पकड़ कर खींच लाया हो। काम को उद्दीत करने वाले दक्षिणानिल ने मानों उन्हें प्रेरित किया हो । अभिलाषाओं की तरंगों से भरा रतिरस मानों उन्हें ढो लाया हो । सुगन्ध पर लुझते हुए भौंरे उन पर छा रहे थे, मानों उनके अङ्ग नीले वस्त्र से ढँक रहे हों। उनके एक कपोल के भीतर चन्द्र प्रतिबिम्बित होकर चमक रहा था, मानों मतवाले मदन रूपी हाथी के कान का वह शङ्ख हो। या प्रथम मिलन के विलास स्वरूप स्मित से उनके कपोल के मध्यभाग की कान्ति और भी निखर गई थी। आकर उन्होंने हृदय में पहुंची हुई प्रिया के नूपुर की आवाज से मिली हुई हंस के समान गद्गद वाणी से बातचीत की। काम जो आज्ञा देता, यौवन जो उपदेश देता, अनुराग जो शिक्षा देता, विदग्धता जो समझाती, उसी प्रकार अपनी प्रियतमा के साथ वे बिहार करने लगे। जब पूरा विश्वास हो गया तब सरस्वती ने अपने आपको उनसे स्पष्ट कह दिया (कि मैं दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होकर मर्त्यलोक में आई हुई सरस्वती हूं)। दधीच ने सरस्वती के साथ-साथ रह कर एक वर्ष से अधिक समय को एक दिन के समान व्यतीत किया । अथ दैवयोगात्सरस्वती बभार गर्भम् । असूत चानेहसा सर्वलक्षणा- भिरामं तनयम् । तस्मै च जातमात्रायैव 'सम्यक्सरहस्याः सर्वे वेदाः सर्वाणि च शास्त्राणि सकलाश्च कला मत्प्रभावात्स्वयमाविर्भविष्यन्ति' इति वरमदात् । सद्भर्तृश्लाघया दर्शयितुमिव हृदयेनादाय दधीचं पिता- महादेशात्समं सावित्र्या पुनरपि ब्रह्मलोकमारुरोह । गतायां च तस्यां
६२ हर्षचरितम् दधीचोऽपि हृदये ह्रादिन्येवाभिहतो भार्गववंशसंभूतस्य भ्रातुर्ब्राह्मणस्य जायामक्षमालाभिधानां मुनिकन्यकामात्मसूनोः संवर्धनाय नियुज्य विर- हातुरस्तपसे वनमगात् । यस्मिन्नेवावसरे सरस्वत्यसूत तनयं तस्मिन्ने- वाक्षमालापि सुतं प्रसूतवती । तौ तु सा निर्विशेषं सामान्यस्तन्यादिना शनैः शनैः शिशू समवर्धयत् । एकस्तयोः सारस्वताख्य एवाभवत् , अपरोऽपि वत्सनामासीत् । आसीच्च तयोः सोदर्ययोरिव स्पृहणीया प्रीतिः । अनेहसा कालेन । रहस्यं ज्ञानभागः । ह्रादिनी वज्रम् । तत्पश्चात् दैवयोग से सरस्वती ने गर्भ धारण किया और समय से सब लक्षणों वाले सुन्दर पुत्र को उत्पन्न किया । जन्म लेते ही सरस्वती ने उसे वर दिया—'मेरे प्रभाव से इसमें सम्यक् प्रकार से रहस्यों के साथ वेद, समस्त शास्त्र, समस्त कलाएँ स्वयं आविर्भूत हों ।' उत्तम पति के गौरव से दिखाने के लिए हृदय में दधीच को रख कर ब्रह्मा जी के आदेश के अनुसार फिर सरस्वती सावित्री के साथ ब्रह्मलोक को चली गई । उसके चले जाने से दधीच के हृदय पर गहरा वज्रपात-सा हुआ । तब दधीच ने अपने पुत्र को पालने-पोसने के लिए भार्गववंश में उत्पन्न किसी ब्राह्मण भाई की पत्नी अक्षमाला नामक मुनिकन्या के पास रख दिया और स्वयं सरस्वती के विरह में आतुर होकर तपस्या करने के लिये वन में चले गए । जब सरस्वती ने पुत्र पैदा किया था तभी अक्षमाला को भी एक पुत्र हुआ था । उन दोनों को एक भाव से दूध पिलाकर उसने पाला पौसा और बढ़ाया । उनमें से एक का नाम सारस्वत रखा गया और दूसरे का नाम वत्स । दोनों में भाई के समान प्रेम भाव स्पृहणीय रहा । अथ सारस्वतो मातुर्महिम्ना यौवनारम्भ एवाविर्भूताशेषविद्यासंभा- रस्तस्मिन्सवयसि भ्रातरि प्रेयसि प्राणसमे सुहृदि वत्से वाङ्मयं समस्त- मेव संचारयामास । चकार च कृतदारपरिग्रहस्यास्य तस्मिन्नेव प्रदेशे प्रीत्या प्रीतिकूटनामानं निवासम् । आत्मनाप्याषाढी, कृष्णाजिनी, अक्ष- वलयी, वल्कली, मेखली, जटी च भूत्वा तपस्यतो जनयितुरेव जगा- मान्तिकम् । वाक्प्रस्तुता यत्र तद्वाङ्मयम् । 'आषाढसंज्ञो दण्डः स्यात्पालाशो व्रतचारिणाम् । वृक्षत्वङ्निर्मितं वस्त्रं वल्कलं समुदाहृतम् ॥' मेखला मुञ्जतृणादिरचितं कटिसूत्रम् । जटा रूक्षसंहतकेशाः । माता के प्रभाव से सारस्वत में यौवन के आरम्भ होते ही सारी विद्याएँ प्रकट हो गईं तो उसने प्राण के समान प्रिय अपने समवयस्क भाई और मित्र वत्स में भी समस्त
बान्धव को उड़ेल दिया और वत्स का विवाह करा उसी प्रदेश में प्रीतिकूट नाम का निवास बनवाया। और खुद वह पलाश का डंडा, कृष्ण मृगचर्म, अक्षवलय, वल्कल, मेखला और जटा धारण करके तपस्या में लगे हुए पिता दधीच के पास चला गया।
अथ वत्सात्प्रवर्धमानादिपुरुषजनितात्मचरणोन्नतिनिर्गतप्रघोषः, पर- मेश्वरशिरोधृतः, सकलकलागमगम्भीरः, महामुनिमान्यः, विपक्षक्षोभ- क्षमः, क्षितितललब्धायतिः, अस्खलितप्रवृत्तो भागीरथीप्रवाह इव पावनः प्रावर्तत विमलो वंशः । यस्मादजायन्त वात्स्यायना नाम गृहमुनयः, आश्रितश्रौता अप्यनालम्बितालीकबककाकवः, कृतकुक्कुटव्रता अप्यबेडा- लवृत्तयः, विवर्जितजनपङ्कयः, परिहृतकपटकोरुकुचीकूर्चाकूताः, अगृहीत- गह्बराः, न्यक्कृतनिकृतयः, प्रसन्नप्रकृतयः, विहतविकृतयः, परपरीवाद- पराचीनचेतोवृत्तयः, वर्णत्रयव्यावृत्तिविशुद्धान्धसः, धीरधिषणाः, विधूता- ध्येष्णाः, असङ्कुसुकस्वभावाः, प्रणतप्रणयिनः, शमितसमस्तशाखान्तर- संशीतयः, उद्घाटितसमग्रग्रन्थार्थग्रन्थयः, कवयः, वाग्मिनः, विमत्सराः, परसुभाषितव्यसनिनः, विदग्धपरिहासवेदिनः, परिचयपेशलाः, नृत्यगी- तवादितेष्वबाह्याः, ऐतिहास्यावितृष्णाः, सानुक्रोशाः, सर्वातिथयः, सर्व- साधुसंमताः, सर्वसत्त्वसाधारणसौहार्दद्रवार्द्रीकृतहृदयाः, तथा सर्वगुणो- पेता राजसेनानभिभूताः, क्षमाभाज आश्रितनन्दनाः, अनिस्त्रिंशा विद्या- धराः, अजडाः कलावन्तः, अदोषास्तारकाः, अपरोपतापिानो भास्वन्तः, अनुष्माणो हुतभुजः, अकुसृतयो भोगिनः, अस्तम्भाः पुण्यालयाः, अलु- प्तक्रतुक्रिया दक्षाः, अव्यालाः कामजितः, असाधारणा द्विजातयः ।
अथेत्यादौ । वत्सात्प्रावर्तत विमलो वंश इति संबन्धः । प्रवर्धमानाः संताना- दिना वृद्धिं गच्छन्तो य आदिपुरुषाः पूर्वबान्धवाः शुक्राद्यास्तैः कृताः स्वेषां चरणानां कठादिशाखाध्यायिनामुन्नतिरुत्कर्षो यस्य सः । अन्यत्र-प्रवर्धमानस्तु वामनरूपो य आदिपुरुषो हरिस्तेन जनिता स्वपदोन्नतिर्माहात्म्यं यस्य स इति । किल त्रैलो- क्याक्रान्तिक्राले ब्रह्मलोकप्राप्ताद्विष्णुपदाद्ब्रह्मणा कमण्डलुजलक्षालिता गङ्गा सम- भवदिति वार्ता। प्रघोषो यशः, शब्दश्च । परमेश्वरो राजा, हरश्च । सकलानां कलानां वृत्ताद्यानामागमस्तेन सहकलकलेन च सकलकलं यदागमनं तेन च । महामुनिर्ज- ह्नुरपि । विपक्षाः शत्रवः, शैलाश्च । वीनां पक्षिणां वा पक्षच्छेदेषु सहिष्णुः । आयतिः प्रतापः, विस्तारश्च । स्खलितं स्वाचारच्युतिः । प्रवृत्तः प्रकृष्टवृत्तः । अस्खलितं असंग्रहं कृत्वा गतम्र । श्रौतं वेदभवम्, चिरवृत्तं च । 'भिन्नो भयाद्द्वा शोकाद्वा
६४ हर्षचरितम् ध्वनिः काकुरुदाहृता' । अत्र च क्षुद्र लक्ष्यते । बकस्य काकुः । बकच्छद्मा यैश्च चिरवृत्तमाश्रितं ते क्षुद्रचारित्वादाम्रितबककाकवो भवन्त्येव । अमी तु न तथेति विरोधः । कुक्कुटव्रतं नियमविशेषः । यत्र कुक्कुटाण्डप्रमाणग्रासभोजनम् । न बैडालो हिंसावृत्तिर्येषां तैः, विरोधे तु कुक्कुटानां व्रतं भक्षणं येन कृतं स कथं बिडालवृत्तिर्न स्यात् ? पङ्क्तिर्लोकप्रसिद्धो व्यवहारः, पाको वा । कपटो व्याजवृत्तिः । कूर्चाः स्फुटाः । आत्ममहिम्ना व्यवहारः, समूह इत्यन्ये । एतेष्वाकूतं परिहृतं यैः । गहरं पापम् । निकृतिः शाठ्यम् । प्रकृतिः स्वभावः । पराचीनं पराङ्मुखम् । अन्धोऽञ्झम् । धीरा स्थिरा । धिषणा बुद्धिः । अध्येषणा याच्ञा । असङ्गसुकः स्थिरः, मृदुर्वा । शाखाः कठाद्याः । संशीतिः संशयः । ग्रन्थिर्दुर्बोधः प्रदेशः । परिहासं विदन्ति, न तु स्वयं कुर्वन्ति । परिचयः संस्तवः । सुकुमाराः, अङ्गन्द्भूटा इत्यर्थः । अबााद्याः, न तु तदेकनिष्ठाः । ऐतिह्यमागमः । अनुक्रोशो दया । संमता इष्टाः । सौहार्दं प्रीतिः । सर्वे गुणा धैर्याद्याः । राज्ञां सेनया चानभिभूता ये च सर्वैर्गुणैः सत्त्वरजस्तमोभिर्यु- क्तास्ते कथं राजसेन गुणेनानभिभूता भवन्तीति विरोधः । एवमुत्तरत्र विरोध उद्भा- वनीयः । क्षमा क्षान्तिः, भूश्च । आश्रितानां नन्दना नन्दयितारः, देवोद्यानं नन्दनं च । न निस्त्रिंशा अक्रूराः । विद्यां धारयन्तीति विद्याधराः पण्डिताः, निस्त्रिंशाश्च खड्गा एव । ये च विद्याधरा देवभूतास्ते सखङ्गा एव । न त्वनिस्त्रिंशा इति माला- खड्गगुलिकाञ्जनादिना भेदेन भिन्नानामपि विद्याधराणां खड्गहस्तत्वं न व्यभिच- रति । अजडा अमन्दधियः, अशीताश्च । कलावन्तो गीताभिज्ञाः, कलावांश्चन्द्रः स चाजडोऽशीत इति विरोधः । दोषा द्वेषाद्याः, रात्रिश्च । तारयन्तीति तारका आचार्याः, नक्षत्राणि च । उपतापः पीडा, उष्णत्वं च । भास्वन्तस्तेजस्विनः, आदि- त्याश्च । ते परांस्तापयन्ति । ऊष्मा स्मयः, दाहिकाशक्तिश्च । हुताशशब्देन हुतमिष्ट- मुच्यते । हुतं भुञ्जते हुतभुजः, आहिताग्नयो वह्नयश्च । कुसृतिः शाठ्यम्, कौ भूमौ सृतिः सरणम् । भोगिनः सुखिनः, सर्पाश्च । स्तम्भः स्तब्धता, सात्त्विको भावभे- दश्च, अप्रणतिर्वा, गृहधारणकाष्ठं च । पुण्यालयाः सुकृतिनः, मठादिस्थानानि च । दक्षाश्वतुराः, प्रजापतिभेदश्च दक्षः । स च लुप्तक्रतुक्रियो हररोषजेन वीरभद्रेण । व्यालाः शठाः, सर्पाश्च । कामजितः संतुष्टाः, हरश्च कामजित् । असाधारणाः सर्वो- त्कृष्टाः । द्विजातयो विप्राः । येषां च द्वे जाती तेषां कथं नासादृश्यम् । वत्स से विमल वंश का प्रादुर्भाव हुआ । वैदिक शाखाओं का अध्ययन करने वाले सर्वत्र फैले हुए अपने पूर्वपुरुषों से वह वंश उत्कृष्ट था । सम्राट् उसका सम्मान करते थे । महामुनियों का भी बह मान्य था । विरोधियों को क्षुब्ध करने में वह समर्थ था । सारी पृथिवी में वह फैल गया था । उसके कार्यों में कोई स्खलन नहीं था । इस प्रकार वह गंगा के प्रवाह के समान था । उस वंश में वात्स्यायन नामक गृह मुनि अर्थात् गृहस्थ होते हुए
प्रथम उच्छ्वासः ६५ भी मुनिवृत्ति रखने वाले असाधारण ब्राह्मण उत्पन्न हुए। श्रौत आचारों का उन्होंने आश्रय लिया था। झूठ और छल-छद्म को पास न आने देते थे। कुक्कुट के अंडे की मात्रा के अनुसार भोजन करते थे। उनमें बैडाली वृत्ति (अर्थात् हिंसा की भावना) न थी। उन्होंने समाज के व्यवहार या पंक्ति भोजन को छोड़ रखा था। कपट, कुटिलता और शेखी बघारने की आदत उनमें न थी। पापों से वे बचते थे। शठता को दूर करके अपने स्वभाव को प्रसन्न रखते थे। उनमें किसी तरह का विकार न था। दूसरे की निन्दा करने में उनकी चित्तवृत्ति पराङ्मुख रहती थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीनों वर्णों से अलग स्वयंपाकी होकर विशुद्ध भोजन करते थे। उनमें धीरता थी, अतः किसी से याचना नहीं करते थे। स्वभाव के मृदु और प्रणयिजनों में अनुकूल थे। अपने दर्शन के अतिरिक्त अन्य दर्शनों में भी जो शंकाएँ उठाई जाती थीं उनका समाधान भी वे करते थे। समस्त ग्रन्थों में जो अर्थ की ग्रन्थियाँ थीं उनको उद्घाटित करते थे। वे कवि, वाग्मी, सरस भाषण में प्रीति रखने वाले, विदग्धों के अनुरूप हास-परिहास में चतुर, मिलने-जुलने में कुशल, नृत्य गीत-वादित्र को अपने जीवन में स्थान देने वाले, इतिहास में अतुल रुचि रखने वाले, दयावान्, सत्य से निखरे हुए, साधुओं को इष्ट, सब तत्त्वों के प्रति सौहार्द और करुणा से द्रवित, रजोगुण से अस्पृष्ट, क्षमावन्त, कलाओं में विज्ञ, दक्ष एवं अन्य सब गुणों से युक्त थे। तेषु चैवमुत्पद्यमानेषु, संसरति च संसारे, यात्सु युगेषु, अवतीर्णे कलौ, वहत्सु वत्सरेषु, व्रजत्सु वासरेषु, अतिक्रामति च काले प्रसवपर- म्पराभिरनवरतमापतति विकाशिनि वात्स्यायनकुले, क्रमेण कुबेरनामा वैनतेय इव गुरुपक्षपाती द्विजो जन्म लेभे। तस्याभवन्नच्युत ईशानो हरः पाशुपतश्चेति चत्वारो युगारम्भा इव ब्राह्मतेजोजन्यमानप्रजाविस्तारा नारायणबाहुदण्डा इव सञ्चक्रनन्दकास्तनयाः। तत्र पाशुपतस्यैक एवा- भवद्भूभार इवाचलकुलस्थितिः स्थिरश्चतुरुदधिगम्भीरोऽर्थपतिरिति नाम्ना समग्राग्रजन्मचक्रचूडामणिर्महात्मा सूनुः। सोऽजनयद्भृगुं हंसं शुचिं कविं महीदत्तं धर्मं जातवेदसं चित्रभानुं त्र्यक्षं महिदत्तं विश्वरूपं चेत्येका- दश रुद्रानिब सोमामृतरसशीकरच्छुरितमुखान्पवित्रान्पुत्रान्। अलभत च चित्रभानुस्तेषां मध्ये राजदेव्यभिधानायां ब्राह्मण्यां बाणमात्मजम्। स बाल एव बलवतो विधेर्वशादुपसंपन्नया व्ययुज्यत जनन्या। जातस्ने- हस्तु नितरां पितैवास्य मातृतामकरोत्। अवर्धत च तेनाधिकतरमाद्रीय- मानधृतिर्वाभिर् निजे। ५ ह० च०
६६ हर्षचरितम् काल इति पूर्वोक्ते। अन्यथैतत्पुनरुक्तं स्यात्। पक्षपातो अक्षिर्यस्यास्ति सः, पक्षैश्च यो याति सः। द्विजो विप्रः, विधुः, पक्षी च। युगारम्भा अपि चत्वारः। अङ्गा वेदादि, जटा च मङ्गा। सचक्रस्य साधुवृन्दस्य नन्दकास्तोषयितारः। चक्रं सुदर्शनं च। नन्दकः खङ्गश्च। बाहवोऽपि चत्वारः। अचलकुलस्थितिरभिन्नवर्षम- र्यादः। अचलानां गिरीणां कुलैर्वृन्दैः स्थितिर्यस्य। चतुरुदधिवत्सैश्च गम्भीरः। अग्र- जन्मानो द्विजाः। सोमस्तृणभेदः, इन्दुश्च। उपसंपन्ना मृता। निजे धाम्नि स्वे गृहे। इस प्रकार उस वंश में ब्राह्मण उत्पन्न होने गए, संसार-चक्र सरकता गया, युग बीते, कलिकाल आया, साल के साल गुजरे, दिन बीते, समय बहुत चला गया। वात्स्यायन कुल निरन्तर विकसित होता गया। इसी क्रम में गुरु में पक्षपात करने वाले कुबेर नामक ब्राह्मण गरुड़ के समान हुए। उनके चार पुत्र हुए—अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत, जो चार युगारम्भ के समान थे, जिनके ब्राह्म तेज से सन्तति चारों ओर फैल रही थी, जो साधु वृन्द को सन्तुष्ट करते थे। उनमें पाशुपत के एक ही अर्थपति नामक पुत्र हुए जो कुल-मर्यादा को अचल रखने वाले, स्थिर, समुद्र की भाँति गम्भीर, समस्त ब्राह्मणों के चूड़ामणि एवं महात्मा थे। अर्थपति ने रुद्रों के समान ग्यारह पुत्र उत्पन्न किए—भृगु, हंस, शुचि, कवि, महीदत्त, धर्म, जातवेदस् , चित्रभानु, त्र्यक्ष, महिदत्त और विश्वरूप। जो सोमरस के शीकर से सिक्त मुख वाले और पवित्र थे। उनमें से चित्रभानु ने राजदेवी नामक ब्राह्मणी में बाण नामक पुत्र को पाया। दैवयोग से बाण बाल्यकाल में ही माता के मर जाने से मातृहीन हो गया। पिता ने ही स्नेहपूर्वक बड़े यत्न से उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। वह अपने ही घर पर धीरतापूर्वक रहता हुआ बढ़ा। कृतोपनयनादिक्रियाकलापस्य समावृत्तस्य चास्य चतुर्दशवर्षदेशी- यस्य पितापि श्रुतिस्मृतिविहितं कृत्वा द्विजजनोचितं निखिलं पुण्यजातं कालेनादशमीस्थ एवास्तमगमत्। संस्थिते च पितरि महता शोकेनामी- लमनुप्राप्तो दिवानिशं दह्यमानहृदयः कथंकथमपि कतिपयान्दिवसाना- त्मगृह एवानैषीत्। गते च विरलतां शोके शनैः शनैरविनयनिदानतया स्वातन्त्र्यस्य, कुतूहलबहुलतया च बालभावस्य, धैर्यप्रतिपक्षतया च यौवनारम्भस्य, शैशवोचितान्यनेकानि चापलान्याचरन्नितरो बभूव। अभवंश्चास्य सवयसः समानाः सुहृदः सहायाश्च। तथा च। भ्रातरौ पारशवौ चन्द्रसेनमातृषेणौ, भाषाकविरीशानः परं मित्रम्, प्रणयिनौ रुद्रनारायणौ, विद्वांसौ वारबाणवासबाणौ, वर्णकविर्वेणीभारतः प्राकृतकृ- त्कुलपुत्रो वायुविकारः, बन्दिनावनङ्गबाणसूचीबाणौ, कात्यायनिका चक्र-
वाकिका, जाङ्गुलिको मयूरकः, ताम्बूलदायकश्चण्डकः, भिषक्पुत्रो मन्दा- रकः, पुस्तकवाचकः सुदृष्टिः, कलादश्चामीकरः, हैरिकः सिन्धुषेणः, लेखको गोविन्दकः, चित्रकृद्वीरवर्मा, पुस्तककृत्कुमारदत्तः, मार्दङ्गिको जीमूतः, गायनौ सोमिलग्रहादित्यौ, सैरन्ध्री कुरङ्गिका, वांशिकौ मधुकर- पारावतौ, गान्धर्वोपाध्यायो दर्दुरकः, संवाहिका केरलिका, लासकयुवा ताण्डविकः, आक्षिक आखण्डलः, कितवो भीमकः, शैलालियुवा शिख- ण्डकः, नर्तकी हरिणिका, पाराशरी सुमतिः, क्षपणको वीरदेवः, कथको जयसेनः, शैवो वक्रघोणः, मन्त्रसाधकः करालः, असुरविवरव्यसनी लोहिताक्षः, धातुवादविद्विहंगमः, दार्दुरिको दामोदरः, ऐन्द्रजालिकश्चको- राक्षः, मस्करी ताम्रचूडकः । स एभिरन्यैश्चानुगम्यमानो बालतया निम्न- तामुपेगतो देशान्तरावलोकनकौतुकाक्षिप्तहृदयः सत्स्वपि पितृपितामहो- पात्तेषु ब्राह्मणजनोचितेषु विभवेषु सति चाविच्छिन्ने विद्याप्रसङ्गे गृहान्नि- रगात् । अगाच्च निरवग्रहो ग्रहवानिव नवयौवनेन स्वैरेणा मनसा महता- मुपहास्यताम् ।
उपनयनं मेखलादानम् । समावृत्तो निष्पादितवृत्तः । स्नातक इत्यर्थः । वेदवे- दाङ्गपाठक इत्यन्ये । ईषदसमाप्तश्चतुर्दशवर्षश्चतुर्दशवर्षदेशीयः । 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' । दशामुपेतॊ दशमीस्थ उदाहृतः, न दशमीस्थः । अपूर्णायुरित्यर्थः । संस्थितो मृतः । आभीलं कष्टम् । इत्वरो गमनशीलः । 'अभ्रंवंश्च' इत्यादिनात्मनस्तथाभूतकलावित्संपर्कमैश्वर्यातिशयं दर्शयति । पारशवो द्विजः शूद्रायां जातः । 'परञ्च परश्चम' इति विडाद्यम् परश्चादेशश्च । भाषागेयवस्तु- वाचस्तेषु वर्णकविः । गाथादिषु गीतिद् इत्यर्थः । अपभ्रष्टगीतविदः । 'पञ्चाश- द्वर्षदेशीयां वीरां संस्थितभर्तृकाम् । वदन्ति कात्यायनिकां धृतकाषायवाससम्' ॥ जाङ्गुलिको गारुडिकः । भिषग्वैद्यः । 'स्वर्णकारः कलादः स्यात्तद्दण्ड्यवस्तु हैरिकः' । पुस्तककृल्लेप्यकारः । 'प्रसाधनोपचारज्ञा सैरन्ध्री स्ववशा स्मृता' । संवाहिका या पादादिमर्दनं विधत्ते । लासको नर्तयति यः । युवेत्यादिना वयसः समानत्वमुच्यते । अक्षैर्दीव्यतीत्याक्षिको द्यूतकारः । कितवो धूर्तः । शैलाली स्वयं यो नृत्यति नटः । पाराशरी भिक्षुः । असुरविवरव्यसनी पातालाभिलाषी । धातुवादविद्रसवादज्ञः । मस्करी परिव्राट् । निम्नतामस्वातन्त्र्यम् । कौतुकेति । न पुनरर्थाभिलिप्सया । एत- देव सत्स्वपीत्यादिना प्रकाशयति । निरवग्रहः स्वतन्त्रः । ग्रहवाम्भूतगृहीतः । स्वैरेणा स्वतन्त्रेण ।
६८ हर्षचरितम्
बाण के उपनयन आदि संस्कार ब्राह्मण जाति की प्रथा के उचित और श्रुति.स्मृति के विधानों के अनुसार हुए और उसका समावर्त्तन-संस्कार भी हो चुका। बाण की आयु चौदह वर्ष की भी पूरी नहीं होने पाई थी कि उसके पिता भी बिना वृद्धावस्था को प्राप्त हुए गत हो गए। पिता के मरने से उसे महान् शोक के कारण कष्ट हुआ और दिन-रात हृदय में खोलते हुए उसने अपने घर पर कुछ दिन बिताए। धीरे धीरे जब उसका शोक कम हुआ तब उसे वह स्वतंत्रता मिल गई जिससे अविनय या अनुशासनहीनता बढ़ती गई। लड़कपन में स्वभाव से ही बहुत से कुतूहल उत्पन्न हो जाते हैं। यौवन का आरम्भ धैर्य को नहीं रहने देता। फलतः बाण शैशव-काल के उचित अनेक चपलताओं में पड़ कर आवारा (इत्वर) हो गया। अब तो उसके बहुत से सुहृद् और सहायक मिल गए जो उसकी अवस्था के थे और उसी के समान आवारा थे। उसका मित्र-मण्डल चवालीस व्यक्तियों का बना जिनके नाम इस प्रकार हैं— चन्द्रसेन और मातृषेण, जो शूद्रा माता से उत्पन्न द्विजपुत्र थे, इनसे बाण का भाईचारे का सम्बन्ध था; भाषा कवि ईशान, जो बाण का परम मित्र था; रुद्र और नारायण, जो बाण के स्नेही थे; वर्ण कवि वेणी भारत; प्राकृत भाषा में रचना करने वाला कुलपुत्र वायुविकार; अनङ्ग बाण और सूची बाण, जो बन्दीजन थे; कात्यायनिका (बौद्धभिक्षुणी) चक्रवाकिका; जाङ्गुलिक (विषवैद्य या गारुड़ी) मयूरक; पान की खिल्ली लगा कर देने वाला चंडक, भिषकपुत्र मन्दारक, पुस्तकवाचक सुदृष्टि, स्वर्णकार चामीकर, सुनारों का अध्यक्ष या हीरा काटने वाला सिन्धुषेण, लेखक गोविन्दक, चित्रकार वीरवर्मा, मिट्टी के खिलौने बनाने वाला (पुस्तकृत्) कुमारदत्त, मृदंग बजाने वाला जीमूत, गायक सोमिल और ग्रहादित्य, सैरन्ध्री (प्रसाधिका) कुरंगिका, वांशिक (वंशी बजाने वाले) मधुकर और पारावत, गान्धर्वोपाध्याय दर्दुरक, संवाहिका केरलिका, नृत्य करने वाला ताण्डविक, आक्षिक (पासा खेलने वाला) शिखंडक, नर्तकी हरिणिका, पाराशरी (संन्यासी) सुमति, क्षपणक (जैन साधु) वीरदेव, कथक (कथावाचक) जयसेन, शैव वक्रघोण, मन्त्रसाधक कराल, पाताल में घुस कर यक्ष या राक्षस को सिद्ध करने वाला लोहिताक्ष, रसायन बनाने की विद्या जानने वाला विहंगम, दर्दुर नामक घटवाद्य बजाने वाला दामोदर, ऐन्द्रजालिक चकोराक्ष, मस्करी (परिव्राजक) ताम्रचूड़। ये मित्र तथा कुछ और भी लोग बाण के साथ चलते थे। उसने अपनी बालसुलभ प्रकृति के कारण अपने आपको इन मित्रों के ऊपर छोड़ रखा था। उसके मन में देशान्तरों को देखने की बड़ी उत्कण्ठा थी। यद्यपि पिता-पितामह द्वारा उपार्जित ब्राह्मणजन के उचित धन-सम्पत्ति उसके घर थी और विद्या का अविच्छिन्न प्रसंग भी प्राप्त था तथापि वह घर से निकल पड़ा। जैसे किसी पर ग्रहों की बाधा सवार हो वैसे ही स्वच्छन्द मन और नवयौवन के कारण वह बिल्कुल स्वतंत्र हो गया। गांव के बड़े-बड़े लोगों ने भी इसकी खिल्ली उड़ाई।
प्रथम उच्छ्वासः ६५ अथ शनैः शनैरत्युदारव्यवहृतिमनोहृन्ति बृहन्ति राजकुलानि वीक्ष- माणः, निरवद्यविद्याविद्योतितानि गुरुकुलानि च सेवमानः, महार्हालाप- गम्भीरगुणवद्गोष्ठीश्चोपनिष्ठमानः, स्वभावगम्भीरधीर्धनानि विदग्धमण्ड- लानि च गाहमानः, पुनरपि तामेव वैपश्चितीमात्मवंशोचितां प्रकृतिम्- भजत् । महतश्च कालात्तमेव भूयो वात्स्यायनवंशाश्रममात्मनो जन्मभुवं ब्राह्मणाधिवासमगमत् । तत्र च चिरदर्शनादभिनवीभूतस्नेहसद्भावैः ससं- स्तवप्रकटितज्ञातेयैराप्तैरूत्सवदिवस इवानन्दितागमनो बालमित्रमण्डल- मध्यगतो मोक्षसुखमिवान्वभवत् । इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते वात्स्यायनवंशवर्णनं नाम प्रथम उच्छ्वासः ।
अत्युदारेत्यादिः प्रकृतोपयोगी, यस्मात्कविना तथाविधवस्तुवेदिनावश्यमेव भवितव्यम् । वीक्षमाण इत्यनेनात्मनः किमपि प्रकृष्टमुत्कर्षातिशययोगित्वमाह । अथ च वीक्षमाणो न तु गुरुकुलवत्सेवमानः । गाहमान इत्यनेन तेजस्वित्वमाहा- त्मनः। वैपश्चितीं विद्वज्जनोचिताम्। संस्तव आदरः। ज्ञातीनां कर्म ज्ञातेयं बन्धुत्वम् । 'कपिशात्योर्ठक्' । आप्तैरिति । बन्धुभिर्योगिभिश्च । योगिपक्षे बाल इव बालो मित्रो रविर्निस्तेजस्त्वात् । उक्तं च—'तपस्यन्तं रविं दृष्ट्वा निस्तेजा जायते रविः । मोक्षमार्गप्रयत्ने तु तेजो नैवास्य विद्यते ॥' इति । मित्रं सखा, सूर्यश्च मित्रः । मण्डलं समूहः । बिम्बम् । मोक्षसुखमपि सूर्यबिम्बगतैरनुभूयत इति । आख्या- यिकासु कविभिर्निजवंशवर्णनं कानने तथा वंशः स्थापितः स्यादिति । आत्मनश्च विटवर्णनम् । सकलकलाकौशलं ममास्तीति हर्षस्य चरिते च वर्णयितव्ये नाप्रस्तुतं चैतदिति शिवम् ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते प्रथम उच्छ्वासः ।
तब उसने धीरे-धीरे चारों ओर घूम कर बड़े-बड़े राजकुलों को देखा जिनमें होने वाले उदार व्यवहारों ने उसके मन को हर लिया। अनिन्द्य विद्याओं के अध्ययन- अध्यापन से उद्भासित गुरुकुलों में रहा। बड़ी-बड़ी गोष्ठियों में बैठने लगा जहां गुणी जन
बहुमूल्य और गम्भीर आलाप करते थे। बाण स्वयं स्वभाव से गम्भीर था। उसने राजकुलों से भी और विद्वानों के बीच रह कर सरस्वती को प्राप्त किया। अन्त में फिर वह अपने कुल और खान्दान के योग्य विद्वान् बन गया। बहुत समय के बाद फिर वह अपनी जन्मभूमि और वात्स्यायन वंशी ब्राह्मणों के गांव प्रीतिकूट में पहुँचा। बहुत दिनों के बाद आए हुए बाण को देख कर उसके बालमित्रों के स्नेह और सद्भाव हृदय में उमड़ आए और अपना-अपना सबने परिचय दिया। इस प्रकार अपने बचपन के साथियों के बीच में उत्सव के दिन की तरह अपने आगमन से आनन्दित करता हुआ बाण मानों मोक्ष सुख का अनुभव करने लगा।
प्रथम उच्छ्वास समाप्त।
द्वितीय उच्छ्वासः अतिगम्भीरे भूपे कूप इव जनस्य निरवतारस्य । दधति समीहितसिद्धिं गुणवन्तः पार्थिवा घटकाः ॥ १ ॥ रागिणि नलिने लक्ष्मीं दिवसो निदधाति दिनकरप्रभवाम् । अनपेक्षितगुणदोषः परोपकारः सतां व्यसनम् ॥ २ ॥ अथ तत्रानवरताध्ययनध्वनिमुखराणि, भस्मपुण्ड्रकपाण्डुरललाटैः कपिलशिखाजालजटिलैः कृशानुभिरिव ऋतुलोभागतैर्बटुभिरभ्यास्यमा- अतीत्यादि । यस्य क्रोधादिभाववर्गो इङ्गितादिना परेण न चेत्यते स गम्भीरः । उक्तं च-‘यस्य प्रसादादाकारात्क्रोधहर्षभयादयः । भावस्थानोपलभ्यन्ते तद्गाम्भी- र्य्यमुदाहृतम् ॥’ इति । अगाधश्च । अवतरणमवतारः, प्रवेशनम् । अवतरन्ति येने- त्यवतारः, सोपानादिश्च । समीहितसिद्धिं राजगृह आत्मनः प्रवेशलक्षणम्, जल- ग्रहणलक्षणं च । गुणा औदार्यादयः, आकर्षणरज्जवश्च । पार्थिवा राजानः, पृथ्वी- विकाराश्च । घटयन्ति वाञ्छितेन प्रयोजयन्तीति घटकाः, कुम्भाश्च । अनेन तादृशे राज्ञि बाणस्य कृष्ण एव समीहितसिद्धीराधास्यत इति सूचितम् ॥ १ ॥ रागिणि रक्ते, विषयाभिसङ्गिणि च । लक्ष्मीं शोभाम्, समृद्धिं च । अत्र नलिनादिकमप्रस्तुतम्, बाणाद्यास्तु प्रस्तुताः । अनेन कृष्ण ईदृशे बाणे राज- प्रभवां श्रियं निधास्यतीत्युक्तम् ॥ २ ॥ अथेत्यादि । बाणो बान्धवानां भवनानि भ्रमन्सुखमतिष्ठदिति संबन्धः । शिखा चूडा, ज्वाला च । सोमो यज्ञियं द्रव्यम् । केदारिका स्वल्पं क्षेत्रम् । प्रघटनेषु तथो- चितत्वात् । अहरिता हरिताः संपद्यमाना हरितायमानाः लोहितादित्वात्क्यङ् । जैसे किसी गहरे कूँप से जल लेने के लिए सोपान आदि के अभाव में उतरना कठिन है ऐसी स्थिति में डोर के साथ घड़े की सहायता से ही जल निकालते हैं, उसी प्रकार अत्यन्त गम्भीर स्वभाव वाले राजा के पास न पहुंच पाया हुआ व्यक्ति गुणवान् संयोजक लोगों की सहायता से ही अपनी इष्ट-सिद्धि कर पाता है ॥ १ ॥ राग से भरे हुए कमल में दिन सूर्य से उत्पन्न शोभा-सम्पत्ति को आहित कर देता है । दूसरे का उपकार करना सज्जनों का एक स्वाभाविक व्यसन होता है, जिसमें वे किसी के गुण-दोष की ओर ध्यान नहीं देते ॥ २ ॥ वहाँ तब बाण स्नेहपूर्वक अपने चिरदृष्ट बन्धु-बान्धवों के घर जा-जाकर मिलता हुआ
७२ हर्षचरितम् नानि, सेकसुकुमारसोमके दारिकाहरितायमानप्रघनानि, कृष्णाजिनवि- कीर्णशुष्यत्पुरोडाशीय श्यामाकतण्डुलानि, बालिकाविकीर्यमाणनीवारब- लीनि, शुचिशिष्यशतानीयमानहरितकुशपूली पलाशसमिन्धि, इन्धनगो- मयपिण्डकूटसंकटानि, आमिक्षोयक्षीरक्षारिणीनामग्निहोत्रधेनूनां खुरवल- यैर्विलिखिताजिरवितर्दिकानि, कमण्डलव्यमृत्पिण्डमर्दनव्यग्रयतिजनानि, वैतानवेदीशङ्कव्यानामौदुम्बरीणां शाखानां राशिभिः पवित्रितपर्यन्तानि वैश्वदेवपिण्डपाण्डुरितप्रदेशानि, हविर्धूमधूसरिताङ्गणविटपिकिसलयानि, वत्सीयबालकलालितललत्तरलतर्णकानि, क्रीडत्कृष्णसारच्छागशावकप्र- प्रघनान्यङ्गणानि। 'उशन्ति प्रघनामभ्य्यामेकदेशे तु वेश्मनः'। पुरोडाशीयेत्यादि सहितेत्यर्थे ईयंः। बालिकाः कुमार्यः। नीवारा अकृष्टपच्या व्रीहयः। कूटो राशिः। आमिक्षीयमिति। तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवामिक्षा। 'आमिक्षा सा शृतोष्णं या क्षीरे स्याद्दधियोगतः' इति। तस्यै हितमामिक्षीयम्। आमिक्षाप्रकृतित्वमस्य च योग्यत्वात्। अग्निहोत्रेषु तस्या अनाम्नातत्वात्, यद्वा,-यदन्नस्य जुहुयादिति। नस्या अपि हबनं भवत्येव। वलयैः समूहैः वितर्दिका वेदिका। कमण्डलुर्मुनिकरदस्तस्मै हिताः कमण्डलव्याः। 'उगवादिभ्यो यत्'। यतीनां निष्किञ्चनत्वादादरस्वाच्च स्वयंक रणम्। वितानो यज्ञः, तत्र भवा वैतानी यज्ञाग्निकार्यभूः। शङ्कुः कीलकः, तस्मै हितः शङ्कव्यः। औदुम्बरीणामिति। तासां यज्ञियत्वात्। वत्सेभ्यो हिता वत्सीयाः वत्सपरिचर्याचतुराः। तर्णकाः सद्योजाता वत्साः। कृष्णसारेति छाग- सुख से रहने लगा। ब्राह्मणों के वे घर निरन्तर अध्ययन की ध्वनि से मुखरित हो रहे थे। त्रिपुण्ड भस्म से मस्तक को उज्ज्वल किए हुए सोमयज्ञों के लोभी वटु वहाँ इकट्ठा थे जो कपिल वर्ण वाली ज्वाला की जटाओं से शोभित अग्नि के समान प्रतीत होते थे। घरों के सामने सोम की क्यारियाँ सींचने से हरी हो रही थीं। बिछे हुए कृष्णाजिन पुरोडाश बनाने के लिए साँवा पसार कर सुखाया जा रहा था। कुमारी कन्याएँ बिना जोत के पके हुए नीवारों की बलि से पूजा कर रही थीं। सैकड़ों शिष्य पवित्र होकर कुशा की हरी आंटियों और पलाश की समिधाएँ इकट्ठी कर रहे थे। जलावन के लिए गोबर के कंडों का ढेर लगा था। आमिक्षा बनाने के योग्य दूध देने वाली गौएँ अपने खुरों से आँगन की बेदियाँ कोड़ रही थीं। यती लोग कमण्डलुओं को मिट्टी से मलने में व्यग्र थे। वैतान अग्नियों की वेदी में लगाए जाने वाले शंकुओं के लिए गूलर की शाखाएँ किनारे रखी थीं। स्थान-स्थान पर वैश्वदेवों के उजले पिण्डे रख दिए गए थे। आँगन के पेड़ के पत्ते यज्ञ- धूम से बिलकुल धूमिल हो रहे थे। देख-रेख करने वाले लड़के उचकते हुए सद्योजात
द्वितीय उच्छ्वासः ७३ कटितपशुबन्धप्रबन्धनानि, शुकसारिकारुद्धाध्ययनदीयमानोपाध्यायविश्रा- न्तिसुखानि, साक्षात्त्रयीतपोवनानीव चिरदृष्टानां बान्धवानां प्रीयमाणो भ्रमन्भवनानि, बाणः सुखमतिष्ठत् । तत्रस्थस्य चास्य कदाचित्कुसुमसमययुगमुपसंहरञ्जृम्भत ग्रीष्मा- भिधानः संफुल्लमल्लिकाधवलाट्टहासो महाकालः । प्रत्यग्रनिर्जितस्यास्तमु- पगतवतो वसन्तसामन्तस्य बालापत्येष्विव पयःपायिषु नवोद्यानेषु दर्शि- तस्नेहो मृदुरभूत् । अभिनवोदितश्च सर्वस्यां पृथिव्यां सकलकुसुमबन्ध- विशेषणम् । तदुक्तम्- 'लोहितसारङ्गः कृष्णसारङ्गो वा' इति; सारङ्गशब्दः शबले वर्तते । कृष्णसारा मृगा इति केचित् । तन्न । तेषां तदानुपयुक्तत्वात् । पशुबन्धा यज्ञाः । कुसुमसमयो वसन्तः, स एव युगं कल्पस्तल्लक्षणं वा युगं मासद्वयम् । समुत्फु- ल्लमल्लिकाभिर्धवला अट्टा विक्रयस्थानानि तेषां विकासो यत्र, अन्यत्र-तद्वदह- हास उद्धतं हसितं यस्य । शब्दशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्यरूपो ध्वनिञ्च । प्रकृतवर्णने ऽन्यदप्यत्र प्रतीयते । न वाच्यतया । तथा च-महाकालः साट्टहासः कल्पमुप- संहरञ्जृम्भते मुखं च विदारयति । महाकालो ग्रीष्माख्यः, भैरवश्च । पयो जलम्, क्षीरं च । बालापत्यपक्षे-नवमुद्यानमुद्गमनं येषां तेषु । इदम्प्रथमतयागमनप्रवृत्ते- ष्वित्यर्थः दर्शितस्नेह इत्यनेनास्य विजिगीषुव्यवहार आरोपितः । निर्जितस्य च पुनः प्रतिष्ठापनमेव युक्तम् । स्नेहः आर्द्रता, प्रीतिश्च । मृदुरकठोरः, सदयश्च । अभिन- वोदित इति साधारणं विशेषणम् । वासन्तिकपुष्पाभिप्रायेण सकलपदबन्धनं वृन्तकारी च । प्रतपम्प्रकर्षेण तपन्; अन्यत्र, -शत्रुहृदयेषु प्रतापं जनयन् । अभिन- वोदितश्च राजा बन्धनमोक्षं करोति । उक्तं हि-'युवराजाभिषेके वा परचक्रावरो- पणे । पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य विधीयते ॥' इति । आदरप्रतिपादनाय बछड़ों को प्यार कर रहे थे। कलोल करते हुए काले छाग शावक को देखकर वहाँ पशु- बंध की तैयारी मालूम हो रही थी । शुक-सारिकाएँ स्वयं अध्ययन कराकर गुरुओं को विश्राम का सुख दे रही थीं, मानों ब्राह्मणाधिवास के वे भवन श्रयीविद्या के साक्षात् तपोवन हो रहे थे। वहाँ बाण के रहते हुए वसन्त के दो महीनों का उपसंहार करता हुआ महाकाल ग्रीष्म फूली हुई चमेली के अट्टहास के साथ जंभाई लेने लगा । अभी अभी पराजित होकर अस्तंगत होते हुए वसन्त रूपी सामन्त के दुधमुँहे बाल-बच्चों के समान जल से सींचे जाने वाले नये-नये उद्यानों पर वह ग्रीष्म स्नेह दिखलाता हुआ मृदु व्यवहार करने लगा और समस्त पृथिवी पर नवोदित होकर उसने फूलों के बन्धन खोले, जैसे राजा बन्दीगृह से
७४ | हर्षचरितम् नमोक्षमकरोत्प्रतपन्नुष्णसमयः। स्वयमृतुराजस्याभिषेकार्द्राश्चामरकलापा इवागृह्यन्त कामिनीचिकुरचयाः कुसुमायुधेन, हिमदग्धसकलकमलिनी- कोपेनेव हिमालयाभिमुखीं यात्रामदादंशुमाली। अथ ललाटंतपे तपति तपने चन्दनलिखितललाटिकापुण्ड्रकैरलकची- रचीवरसंवीतैः स्वेदोदबिन्दुमुक्ताक्षवलयवाहिभिर्दिनकराराधननियमा इवागृह्यन्त ललनाललाटेन्दुद्युतिभिः। चन्दनधूसराभिरसूर्यंपश्याभिः कुमु- दिनीभिरिव दिवसमसुप्यत सुन्दरीभिः। निद्रालसा रत्नालोकमपि नास- हन्तः दृशः, किमुत जरठमातपम्। अशिशिरसमयेन चक्रवाकमिथुना- स्वयंशब्दः । अभिषेकः स्नानम् । अन्यत्र, - मङ्गलजलपातनं तत्संपर्कवशाच्चार्द्रत्वम् । चिकुराः केशाः । ते हि तदा स्नानाद्र्रतया संयमनास्रुन्दरतया विशेषतः शृङ्गार- मुदीपयन्ति। तथा च महाकवेः कालिदासस्य- 'स्नानाद्र्रमुक्तेष्वनुधूपवासं विन्य- स्तसायंतनमल्लिकेषु । कामो वसन्तात्ययमन्दवीर्यः केशेषु लेभे रतिमङ्गनानाम्' ॥ यथा वा राजशेखरस्य- 'तदा ते स्नातानां दरदलितमल्लीमुकुरिणाम्' इत्यादि । हिमाभिप्राये च हिमालयग्रहणम् । अंशुन्मलति धारयतीत्यनेन हिमं प्रतिभवन्- शीतलत्वमस्योच्यते । ललाटं तपतीति ललाटंतपः इति खश् । खरतर इत्यर्थः । ललाटेऽलंकारो ललाटिका । 'कर्णललाटात्कनलंकारे' । ललाटिकैव पुण्ड्रकं तिलकमिति सर्वत्र रूप- कम् । संवीतैः प्रावृतैः । चन्दनेन च तद्भूधूसराः । असूर्यं पश्याभिरिति । आतपासहिष्णु तया । अन्यत्र, - स्वभावात् । दिवसं सुप्यत इति द्रव्यकर्मणि लादि- विधानात्कर्मणि द्वितीयेव । भावे लः । यदा तु कर्माप्याख्याततया विवक्ष्यते तदा दिवसः सुप्यत इति भाष्यमिति निर्णीतम् । स्वापो निद्रा, मुकुलता च । जरठं कठोरम् । यतो ग्रीष्मेण तनुकृता अत आह-चक्रवाकेत्यादि । रात्री किल बन्दियों को छोड़ता है। ऋतुराज वसन्त के अभिषेक द्वारा आर्द्र हुए सुन्दरियों के चामर- कलाप के समान केशपाश में कुसुमायुध कामदेव ने साक्षात् निवास किया। सूर्य ने मानों हिम के कारण जली-कटी समस्त कमलिनियों के कोप से हिमालय की ओर यात्रा की। अब सूर्य का ताप तीखा हो गया। कमलिनियों के ललाट रूपी चन्द्रमा चन्दन के तिलक लगा, बालों के वस्त्रखण्ड पहन और पसीना के कणों की मुक्ता से बनी जपमालिका धारण कर सूर्य की नियमित रूप से उपासना करने लगे। चन्दन के लेप से धूसर वर्ण वाली सुन्दरियाँ कुमुदिनियों के समान सूर्यातप के न सहन करने से दिन में ही शयन करने लगीं। निद्रा से अलसाई हुई आँखें रत्नों के तेज को भी नहीं सहन कर सकती थीं, कठोर आतप की तो बात ही क्या ? ग्रीष्मकाल में चक्रवाक पक्षियों के जोड़ों से अभि-
भिनन्दिताः सरित इव तनिमानमानीयन्त सोडुपाः शर्वर्यः। अभिनव- पटुपाटलामोदसुरभिपरिमलं न केवलं जलम् , जनस्य पवनमपि पातु- मभूदभिलाषो दिवसकरसंतापात् । क्रमेण च खरखसमयूखे, खण्डितशैशवे, शुष्यत्सरसि, सीदत्स्रोतसि, मन्दनिर्झरे, झिल्लिकाझांकारिणि, कातरकपोतकूजितानुबन्धबधिरितविश्वे, श्वसत्पतत्रिणि, करीषकषमरुति, विरलवीरुधि, रुधिरकुतूहलिकेसरिकि- शारकलिह्यमानकठोरघातकीस्तबके, ताम्यत्स्तम्बेरमयूथवमथुतिम्यन्महा- महोधरनितम्बे, दिनकरदूयमानद्विरददीनदानाश्यानदानश्यामिकाली- नमूकमधुलिहि, लोहितायमानमन्दारसिन्दूरितसीम्नि, सलिलस्यन्दसन्दो- हसंदेहमुह्यन्महामहिषविषाणकोटिविलिख्यमानस्फुटस्फटिकदृषदि, धर्म- चक्रवाकानां वियोगो भवतीत्यशपतया ताँस्ता अभिनन्दन्ते । सरितश्च वृत्तिकारि- कास्तेषामिति तदभिनन्दनम् । उडुपः शशी, प्लवश्च । क्रमेण चेत्यादौ । एवंविधे निदाघकाले कठोरीभवति सण्युन्मत्ता मातरिश्वानः प्रावर्तन्तेति संबन्धः । खगो रविः । शुष्यदिति साभिप्रायम् । स्रोतसश्च प्रस- रणधर्मत्वादाह—सीददिति । समन्तादावेगगामिनः । झिल्लिका चीरीनामकः प्राणी यो वर्षासु तरुषु सीत्कारसुखैः करोति । कातरेति । कपोता हि मेदो- मयस्वाङ्गितान्तं धर्मासहाः । अत एव पतत्रित्वेऽपि पृथगुपादानम् । पतत्रित्वार्भा- प्रायेण श्वासमित्येतावदेव समुचितम् । एषां तथाभूतरुजाभावात् । करीषो गोमयम् । वीरुत्सपर्णशाखाजटिलं कुप्यकादि । कशोरकेति । बालत्वेन तृष्णाद्यसहिष्णुता, मुग्धतातिशयश्च द्योत्यते । धातकी लताभेदः । स्तवकः पुष्पगुच्छः । स्तम्बेरमो हस्ती । वमथुः करिकरशीकरः । तिम्यन्त आर्दीभवन्तः । नितम्बाः सानवः । द्विरदाः करिणः । दीनं क्षीणम् । आश्याना अप्रसरणधर्मकत्वादीषच्छुष्कश्यामिका मदलेखासंबन्धिनी । लीना अतितर्षाच्छ्लिष्टाः । मूका गुञ्जितहीनाः । अलोहिता लोहिता भवन्तो लोहितायमानाः । मन्दाराः पारिभद्रद्रुमाः । सिन्दूरिता आहितसि- नन्वित तारों भरी रातें नदियों की भाँति छोटी होने लगीं। सूर्य का सन्ताप इतना बढ़ गया कि लोग न केवल नए खिले हुए पाटल के पुष्पों से सुगन्धित जल को पीना चाहते थे, बल्कि इस तरह की सुगन्ध से भरी हवा को भी पीते थे । क्रमशः निदाघकाल कठोर होता गया । सूर्य तीखा होने लगा । तालाब सूखने लगे । प्रवाह शान्त होने लगे । झरने मन्द पड़ गए । झिल्लियाँ झंकारने लगीं । कपोतों के निरन्तर आर्त स्वर से सारा विश्व भर गया । पक्षी हाँफने लगे । कूड़ा-कर्कट बटोरने वाली हवाएँ