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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

[ ३५ ] मुसलमान जब मुसलमानों या हिन्दुओं के साथ लड़ते थे तो वे भी इसी नीति को ग्रहण करते थे । पुर्तगेज़, अंग्रेज़ और राष्ट्र, चाहे वे एशिया में हों या यूरोप में इस बात को सब उचित समझते थे कि जिन मुल्कों को वे विजय करें उन पर लड़ाई का चन्दा लगायें । दूसरा कारण यह भी था कि मरहठे, जिन्हें कई शत्रुओं से, जिनमें अधिकतर विदेशी और अन्यायी थे, एक ही साथ लड़ना पड़ता था, उनके मुक़ाबले के लिये वे इतनी बड़ी सेना, जो कि एक ही साथ अपने सैनिक-आधार पूना से एक ओर पंजाब तथा दूसरा ओर अरकाट तक लड़ रही थी, अपने धन से किसी भी प्रकार नहीं रख सकते थे, वे अपनी इस लड़ाई की प्रणाली को भी नहीं बदल सकते थे, क्योंकि ये इसके द्वारा शत्रुओं की युद्धनीति को छिन्न-भिन्न कर देते थे, जिससे शत्रु किसी और नीति की अपेक्षा अल्प समय मे मरहठों के आगे झुकने के लिये बाध्य हो जाया करते थे । मरहठों की इसी लड़ाई की प्रणाली को उनके शत्रु लूट या निर्दयतापूर्वक डाके के नाम से प्रख्यात करते हैं । मरहठे अगर इस अपराध के अपराधी ठहराये जा सकते हैं तो इस सिद्धांत के अनुसार सभी राष्ट्रों को अपराधी मानना पड़ेगा क्योंकि बोअरों तथा जर्मनी की लड़ाई में, लार्ड डलहौज़ी के अन्य राज्यों को अंग्रेज़ी राज्य में मिलाने के समय और सन् १८५७ ई० में नील की लड़ाई में यही नीति काम में लाई गई थी। तब इस नीति का उपयोग करते समय यह बात कही गई कि युद्ध के सिद्धांतों के अन्दर ऐसी नीति का उपयोग युक्तिसंगत है । इसलिये वही सिद्धांत हिन्दू-जाति की स्वतन्त्रता प्राप्त करने के सम्बन्ध मे लागू हो सकता है और विशेषतः उस अवस्था में जब कि औरंगज़ेब, टीपू और गुलामकादिर जैसे व्यक्तियों के साथ सामना था। लड़ाई में विजय पाने के लिये हरएक उपाय उचित ही था । इस कथन की पुष्टि करने के लिये, कि धार्मिक लड़ाई में सब कुछ उचित है, और दूसरी बातों में पड़कर हम

[ ३६ ] व्यर्थ समय खोना उचित नहीं समझते और शिवाजी के उस उत्तर को लिख देना पर्याप्त समझते हैं, जिसे उन्होंने अपने शत्रुओं के पास लिख भेजा था। शिवा जी ने लिखा था—"आपके शहंशाह ने मुझे विवश कर दिया है कि मैं अपने देश और प्रजा की रक्षा के लिये सेना रक्खूं। अब इस सेना का व्यय उसकी प्रजा को ही देना पड़ेगा।" उस समय के अंग्रेज़ लेखकों ने भी शिवाजी के सम्बन्ध में यह स्वीकार किया है कि— "जहां कहीं वे जाते थे जनता को विश्वास दिलाते थे कि जो उनकी आज्ञाओं का पालन करेंगे उन्हें वह या उनके सिपाही किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचायेंगे और इस बात पर वे अटल रहे।" इसके साथ हम यह भी कह सकते हैं कि उसी तरह की प्रतिज्ञा मरहठे-सेनापतियों ने निज़ाम के साथ की और अपनी उस प्रतिज्ञा को उन्होंने उसके साथ अन्तिम लड़ाई तक, जो कि सन १७९५ ई० में खारडा में हुई थी और जिसमें मरहठे विजयी हुए, निभाया। यह सच है कि ऐसे युद्धों में शत्रु की हिन्दू-प्रजा की भी हानि हुई, किन्तु हमें युद्ध में घटने वाली निर्दयतापूर्ण आवश्यक घटनाओं के कारणों के विषय में इससे अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है कि ऐसी परिस्थितियों में हिंदू-मुसलमानों को पृथक् २ पहचानना असंभव था और न ही मुनासिब ही था। जैसे मुसलमान और दूसरे शत्रुओं को मरहठों को हर्जाना देना पड़ा उसी प्रकार हिन्दुओं को भी देना पड़ा। वास्तव में उन्हें कार्यरूप में मरहठों का साथ देना चाहिये था तो भी वे उदासीन हो कर ही बैठे रहे। नहीं नहीं बल्कि वे तो मरहठों ही के शत्रु बन गये और राष्ट्रीय लड़ाई में उनका साथ नहीं दिया। इसीलिये उन्हें भी लड़ाई का हर्जाना देना पड़ा। यह लड़ाई का टैक्स था जो कि साधारणतः सब हिन्दुओं से हिंदू-साम्राज्य की उस सेना के व्यय के लिये एकत्र किया जाता था, जिसकी वीरता के कारण हिंदू-धर्म, हिंदू-मन्दिर, हिंदू-जाति और हिंदू- सभ्यता शेष रहगई, नहीं तो सारे हिंदू मुसलमान बना लिये गये होते और

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हिंदुओं का नाम भी शेष रहता या न, यह अनुमान करना असम्भव है। कहीं २ पर मरहठे सिपाहियों ने कुछ कुछ अनुचित कार्य भी किया है; किंतु हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि ये अपराध उन अपराधों के सामने कुछ भी नहीं हैं जिन्हें मुसलमानों, पूर्वगों और दूसरे राष्ट्रों ने, जिन से मरहठों को लड़ना पड़ा, किये और जो क्षमा योग्य समझे गये थे, और कभी कभी तो वे उचित भी माने गये थे। मरहठों ने तो उन मौलवियों को भी, जो कि हिंदुओं को बलात् मुसलमान बनाने के अप- राधी थे, कभी ज़बरदस्ती हिंदू-धर्म ग्रहण करने के लिये बाधित नहीं किया यद्यपि उस समय उनमें भी ऐसा कर सकने की शक्ति थी। यद्यपि वे इस बात को भली भांति जानते थे कि उनके देवमन्दिर 'अल्लाह' की शक्ति दिखलाने के लिये गिराये गये थे, तथापि उन्होंने उनके बदले में राम और कृष्ण की शक्ति दिखलाने के लिये मसजिदों और गिरजाघरों को गिराना पाप समझा। जहां तक उनके धार्मिक अत्याचारों का सम्बन्ध है उनका कट्टर से कट्टर शत्रु भी उन्हें कत्ले आम का दोषी नहीं ठहरा सकता। न तो उन्होंने स्त्रियों के सतीत्व ही भ्रष्ट किये और न हठधर्मी बनकर लोगों को दुःख ही दिये और न शत्रुओं के धार्मिक ग्रन्थों ही को जलाया। हां, उन्होंने लड़ाई का खर्च शत्रुओं के मुल्कों से अवश्य ही वसूल किया, और सैनिक आवश्यकता के अनुसार भोजन सामग्री इत्यादि का नाश अवश्य किया और मुल्कों को उजाड़ा। इन ही बातों को शत्रुओं ने लूट का नाम दिया। केवल यह ही दोष शत्रु उनके विरुद्ध लगा सकते हैं। यह साधन उनके लिये कितना आवश्यक शस्त्र था यह इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि जब विदेशियों ने आक्रमण किया तब वे इस शस्त्र को अपने प्रति भी काम में लाने के लिये उद्यत हो गये थे। महाराज राजाराम के समय में जब औरंगज़ेब ने आक्रमण किया और दो बार अंग्रेजों ने पुनः ले लेने का प्रयत्न किया तो उन्हें बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी क्योंकि मरहठों ने अपने देश छोड़ देने तथा उन्हें उजाड़

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देने में जरा भी आगा पीछा नहीं सोचा था, बल्कि उन्होंने तो यहां तक ठान लिया था कि यदि अंग्रेज़ पूना तक आ गये तो वे इसे भी जला देंगे। इसलिये यह भली भांति स्पष्ट हो गया कि वे शत्रुओं के राज्य पर इस लिये आक्रमण कभी नहीं करते थे कि वे दूसरे देशों के हिन्दुओं से घृणा करते थे अथवा उन्हें किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाना चाहते थे। यह भी बात तभी तक रहती थी जब तक कि मरहठों की मांग पूरी नहीं होती थी, या युद्ध समाप्त न हो जाता था। ज्यों ही कोई प्रांत ठीक प्रकार से हिंदू-साम्राज्य में मिला लिया जाता अथवा कर देने वाला राज्य बना दिया जाता था, मरहठे आक्रमण करना बन्द कर देते थे। जिस स्थान के लोगों ने मरहठों को मुसलमान या अंग्रेजों के बन्धन से अपने को मुक्त कराने के लिये बुलाया या जहां के निवासी मरहठों के साथ विदे- शियों के विरोध में खड़े हुए, मरहठों ने उनका पूरा साथ दिया तथा उनके साथ सदैव बड़े प्रेम का बर्ताव करते रहे। कहीं कहीं पर मरहठों ने अति की। उसकी हमें अवश्य निंदा करनी होगी; किन्तु हमें विचार करना चाहिये कि ऐसी ज़्यादतियां गेरीवाल्डी के रोम से लौटने पर, फ्रांस की राष्ट्रीय क्रांति में, आयरलैंड के सीनफीन में, अमेरिका की स्वतन्त्रता की लड़ाई और जर्मनी के आज़ादी के युद्ध में अनेकों पाई जाती हैं। जिस प्रकार उपरोक्त घटनाओं के कारण यूरोपीय देशों का राष्ट्रीय गौरव कुछ भी कम नहीं हुआ, उसी प्रकार मरहठों ने भी कहीं कहीं पर जो अनुचित व्यवहार किये हैं, उनके कारण महाराष्ट्र का गौरव कम समझना भूल है। कारण कुछ तो ऊपर बतला ही दिया गया है और विशेष यह है कि जो अत्याचार विदेशियों ने हिन्दुओं तथा मरहठों पर किये, उनके सामने मरहठों द्वारा किये गये अत्याचार कुछ भी नहीं। जिस आन्दोलन ने शताब्दियों से दासता की धूल में पड़े हुए हिन्दुओं की ध्वजा को उठाकर खड़ा किया; राजाओं, महाराजाओं, नवाबों और बादशाहों का प्रबल सामना करके अटक में

[ ३६ ] उसे गाड़ा और शत्रुओं को विवश किया कि उनके सामने घुटने टेकें और उसकी प्रतिष्ठा करें. उस आन्दोलन और उस हिन्दू साम्राज्य के प्रति प्रत्येक हिन्दू देशभक्त सदा कृतज्ञता प्रकट करता रहेगा। ५. हिन्दू-जाति का काया-कल्प । "शास्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिंता प्रवर्तते" ॐ यद्यपि मरहठों की जागृति के कारण हिन्दुओं के पुनरुद्धार की ख्याति हुई तो भी इसे सर्वप्रथम हिन्दुओं की राजनैतिक और सैनिक परिधि में जीवन डालकर एक विशाल राष्ट्रीय राज्य स्थापित करना परमा- वश्यक था जिससे कि हिन्दुओं के जीवन का प्रत्येक भाग प्रगतिशील होता, ज्योंही मरहठाशक्ति की रक्षा में हिन्दुओं को पूर्णतया राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो गई उन्होंने एक राष्ट्रीय राज्य स्थापित कर दिया । महाराष्ट्र का हिन्दूराज्य कई महत्वपूर्ण कार्यों और सुधारों को, जो इस पुनरुद्धार के आन्दोलन के कारण हिन्दुओं में प्रचलित हुए, अपने हाथों में लेकर उनको उन्नतिशील दशा में लाया । शत्रुओं में जो गुण थे उन्हें अपनाकर विदेशियों के आतङ्क के पंजे से हिन्दू जीवन को स्वतन्त्र और मुक्त करने के लिये मरहठों ने बड़ा ही प्रयत्न और परिश्रम किया। हिन्दुओं की भाषा के ऊपर अरबी और फारसी का इतना अधिकार हो गया था कि राज्य के सारे कार्य फारसी भाषा में किये जाते थे । पर ज्यों ही मरहठों ने हिन्दू राज्य की स्थापना कर ली उन्होंने सारा राज्य-कार्य फारसी में करना बन्द करा दिया । फिर उन्हों ने पहले अपनी भाषा को शुद्ध करने का ॐ शस्त्रों द्वारा देश की रक्षा होती है, इस लिये शस्त्रों को ठीक रखना उचित है ।

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प्रयत्न किया । यदि उन्होंने ऐसा न किया होता तो उसका अन्त हो जाता और उसके स्थान पर अरबी या उर्दू का प्रचार हो गया होता जैसा कि पंजाब और सिन्ध में हो गया है पर राष्ट्रीय साम्राज्य ने राष्ट्रीय भाषा को पुनर्जीवित किया । एक विद्वान पण्डित नियुक्त किया गया जिसने राज्यव्यवहार-कोष बनाया, जिस में प्रत्येक विदेशी मुसलमानी भाषा के शब्द के लिए, जो कि उस समय की जनता के विचारों और सरकारी काग़ज़ों पर छाये हुए थे, समानार्थक शब्द ढूँढ़ कर एकत्र किये गये और साथ ही लोगों को भी विदेशी शब्दों को प्रयोग में न लाने के लिये प्रोत्साहित किया गया । इस सुधार का मरहठी भाषा पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा । राजनैतिक पत्रों के पढ़ने से ज्ञात होता है कि विदेशी भाषा के बहिष्कार के लिये पूर्ण परिश्रम किया गया । साहित्य, इतिहास, राजनीति, कविता इत्यादि सब धीरे २ सुधरने लगे और अन्त में हम मोरोपन्त की महान् कृति “महाभारत” देखते हैं, जिस में एक दर्जन भी विदेशी शब्द नहीं पाये जाते । ‘बखर” भी कोई मध्यम श्रेणी का ग्रन्थ नहीं है । इतना ही नहीं, बल्कि मरहठे लेखक ऐसी पुस्तकें मरहठी भाषा में लिखने लगे जिन की भाषा अद्वितीय प्रभावशाली होती थी और लोगों के भीतर नव- जीवन का संचार कर दिया करती थी । उस समय के राजनैतिक जीवन ने भारत के इतिहास से और शूरवीरों के गुणों की कथा ने भाषा में जीवन डाल दिया । एक आज यह समय आ गया है कि हम लोग बिना वीरता के कार्य किये ही वीर रस का इतिहास लिखने बैठ जाते हैं, यद्यपि हमें उनका ठीक अनुभव करने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ । केवल मराठी ही नहीं वरन् हिन्दुओं की पवित्र भाषा संस्कृत भी मरहठों के शासनकाल में बड़ी उन्नत दशा को प्राप्त हुई । वेद, वेदाङ्ग, शास्त्र, पुराण, ज्योतिष, वैद्यक और काव्य का भी पुनरुद्धार हुआ । हिन्दुओं की दर्जन से अधिक राजधानियां भारत के भिन्न २ भागों में

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शिक्षा के केन्द्र बन गईं और हिन्दू विद्वानों और विद्यार्थियों का संरक्षण करने लगीं, तथा पाठशालाओं और महाविद्यालयों की स्थापना करके उनको सुचारु रूप से चलाने लगीं। धार्मिक शिक्षा की ओर भी पूर्ण ध्यान दिया जाता था। साधु सन्त स्वेच्छापूर्वक मरहटों द्वारा सुरक्षित रह कर हरिद्वार से रामेश्वर और द्वारिका से जगन्नाथ तक स्त्री पुरुषों को हिन्दू धर्म, हिन्दू-दर्शन और पुराणों की शिक्षा देते हुए भयरहित भ्रमण करते थे। इनके पालन और सहायता के लिये और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये राजे, वाइसराय, गवर्नर और सैनिक बराबर ध्यान देते थे। स्वामी रामदास जी के स्थापित किये गए मठों के अनुरूप देश में बहुत से मठ स्थापित हो गए, जिनकी रक्षा का भार राज्य के सिर पर था और उन मठों के द्वारा राजनैतिक और धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार होता था। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष श्रावण में भारतवर्ष के सारे विद्वान पूना में एकत्र हुआ करते थे और पेशवा की संरक्षता में उनकी विद्याओं की परीक्षा हुआ करती थी। लोगों को पद, पुरस्कार दिये जाते थे और योग्य विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति भी दी जाती थी। हिन्दू धर्म की शिक्षा के प्रोत्साहन और इनामों के लिए हर वर्ष इस अवसर पर १०,००,००० रुपये से कम व्यय नहीं किया जाता था। इस प्रकार विद्वानों के एकत्र हो जाने से यह लाभ होता था कि लोगों के भिन्न २ विचार और धार्मिक सिद्धान्त एक दूसरे में परि- वर्तित हो जाया करते थे और फिर सर्वसाधारण में फैल जाते थे। लोग यह अनुभव करने लग जाते थे कि यद्यपि हमारे भीतर धार्मिक और जातीय विभिन्नतायें हैं किन्तु फिर भी हम सब हिन्दू हैं और एक राष्ट्रीय ध्वजा के नीचे एकत्र हुए हैं, जिस ने शत्रुओं का नाश कर दिया है और जो हमारे देश, धर्म और सभ्यता की हर प्रकार से रक्षा कर रही है। सर्वसाधारण के हित के कामो पर भी पेशवा और इस के अधिकारी-वर्ग उचित ध्यान देते थे। यदि कटक और रामेश्वर से कर

[ ४२ ] रूप में धन बह कर पूना में आया तो वह कृपणता के साथ जमा नहीं किया गया और न ही मनमाने भोग विलासों में ही व्यय किया गया वरन् वह अन्त में उपयोगी स्रोतों द्वारा बह कर भारत के तीर्थों और क्षेत्रों में चला गया । भारतवर्ष में कोई भी ऐसी पवित्र नदी न रही जिस पर घाट न बने हों, और कोई ऐसा घाट न रहा जहां पर एक बड़ी धर्म- शाला या ऊँचे कलशों वाले सुन्दर मन्दिर न बने हों और ऐसा कोई मन्दिर नहीं रहा जिस के लिये वृत्ति न लगाई गई हो । ये सब महा- राष्ट्र-हिन्दू साम्राज्य की दान वीरता और उदारता की साक्षी ही तो देते हैं । यद्यपि मरहठे रात दिन शत्रुओं का सामना करने के लिये लड़ते रहते थे तथापि जिंजी से लेकर तंजौर और ग्वालियर तक तथा द्वारका से जगन्नाथ तक का देश, जो मरहठों के शासन के भीतर था, शान्ति का जीवन व्यतीत कर रहा था । राज्यकर भी साधारण था और शासन न्याययुक्त हो रहा था । प्रजा अन्य किसी राज्य की प्रजा से अधिक सुखी और सम्पत्तिशाली थी। मरहठों के राज्य में सड़कें, डाक- विभाग, जेल, हस्पताल और इंजिनियरिंग विभाग का प्रबन्ध उस समय के अन्य राज्यों के प्रबन्ध से कहीं उत्तम था । इन बातों की सत्यता के लिये बहुत से प्रमाण विद्यमान हैं। यद्यपि कभी २ अशान्ति हो जाया करती थी, फिर भी लोग स्वतन्त्रता के सुख का अनुभव कर रहे थे और अपने राज्य को केवल प्रेम और श्रद्धा की दृष्टि से ही न देखते थे, वरन उस के लिये उन्हें अभिमान भी था और उस समय अपने जन्म के लिये परमात्मा को धन्यवाद देते थे । इन बातों की सच्चाई हम उस समय के पत्र-व्यवहारों, कविताओं, वीर रस की कथाओं, बखरों और साहित्य के द्वारा अच्छी प्रकार देख सकते हैं। और भी बड़े २ आंदोलनों की कमी न थी । बहुत सी रीतियां या झूठे विश्वास, जिन के कारण राष्ट्रीय या सामाजिक उन्नति में बाधा पड़ती थी, वे या तो साधारण बना दी गईं या उन का एक दम त्याग

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कर दिया गया। नये ढंग की पूजा, भिन्न २ वर्गों का आपस में विवाह और सामुद्रिक यात्रा का प्रबन्ध किया गया। जो लोग विदेशों को जाने के कारण जातिच्युत किये गये थे या जिन को पुर्तगेजों या मुसलमानों ने बलपूर्वक या धोखा दे कर अपने धर्म में मिलाया था, फिर' से हिन्दू धर्म में लाये गये। अन्तिम आंदोलन अर्थात् शुद्धि का प्रश्न हमारे पूर्वजों में मरहठा-काल ही में आरम्भ हो चुका था। पुर्तगेजों के लिखित प्रमाणों से पता चलता है कि बड़े २ ब्राह्मण, पुर्तगेजों द्वारा बलपूर्वक ईसाई धर्म में मिलाये गये हिन्दुओं को, फिर से छिप २ कर पवित्र जल में स्नान कराकर शुद्ध करके हिन्दू बना लिया करते थे। एक बार इस छिपी हुई शुद्धि की प्रथा का समाचार पुर्तगेजों को भी मिल गया। उन्होंने जा कर उस स्थान को, जहां शुद्धि हो रही थी, घेर लिया और बन्दूकों के डर से लोगों को भगा दिया पर एक गोस्वामी ने एक इंच भी हटने से इन्कार कर दिया और मार डाला गया। निम्बालकर नामी मरहठा सरदार को बीजापुर के नवाब ने जबर्दस्ती मुसलमान बना लिया और अपनी लड़की का उसके साथ ब्याह कर दिया। लेकिन अन्त में वह भाग कर मरहठों के पास आया और ब्राह्मणों की आज्ञानुसार शिवाजी की माता जीजाबाई की संरक्षता और इच्छा से उसे शुद्ध करके हिन्दू धर्म में लाया गया और कट्टर सनातनधर्मी भावों को मिटा देने के लिये उसके बड़े लड़के का विवाह महाराज शिवाजी की पुत्री से करा दिया। दूसरी बड़ी मश- हूर शुद्धि नेताजी पालकर की हुई। वह बहादुर मरहठा-सेनापति— जो दूसरा शिवाजी कहलाता था—मुसलमानों के हाथ में फंस गया और औरङ्गजेब बादशाह ने आज्ञा दी कि इसे मुसलमान बना कर सीमांत प्रदेश की असभ्य जातियों में रहने के लिये भेजा जाय। ऐसा ही हुआ, परन्तु किसी प्रकार से बहादुर सेनापति भाग कर महाराष्ट्र पहुंचा और उसने लोगों से प्रार्थना की कि मुझे हिन्दू-धर्म में स्थान दो। पण्डितों ने उसकी सिफारिश महाराज शिवाजी के पास की और इस प्रकार उसे

[ ४४ ] हिंदू धर्म में ले लिया गया। पेशवा भी इस कार्य को नाना फड़नवीस के समय तथा इसके बाद तक करते आये। 'पेशवाओं की डायरी' नामक पुस्तक को, जिसमें मूल आज्ञाएं और लिखित प्रमाण प्रकाशित हुए हैं, देखने से प्रकट हो जाता है कि ऐसी बहुत सी घटनाएं हुई हैं कि कई लोग बलपूर्वक मुसलमान अथवा ईसाई बनाये गये, किन्तु प्रायश्चित करने पर उन लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में शरण दी गई और उनके सजातीय लोग उनके साथ पहिले की भांति सामाजिक सम्बन्ध रखने लगे। उदाहरण के लिये पुनाजी को लीजिये। पुनाजी एक सिपाही थे और सूरत ज़िला स्थित सेना में काम करते थे। किसी प्रकार वे मुसलमानों के हाथ में फंस गये और मुसलमान बना लिये गये। लेकिन जब बालाजी बाजीराव दिल्ली से लौट कर आ रहे थे वह भाग कर किसी प्रकार मरहठा-सेना से मिल गया। उसके सब सजातीय लोगों ने एकत्र होकर उसे अपनी जाति में ले लेने का विचार प्रकट किया और पेशवा की आज्ञा लेकर उसे अपनी जाति में मिला लिया [ पृष्ठ २१५-२१६] । तुलाजी भट ने, जो प्रलोभनों द्वारा मुसलमान हो गया था, ब्राह्मण- मंडली के सामने खड़े हो कर अपने किये पर पश्चाताप किया। अपने अपराध को स्वीकार कर उसके लिए क्षमा की प्रार्थना की। उसे भी हिन्दू-धर्म में स्थान दिया गया और राजाज्ञा निकली कि चूंकि ब्राह्मण मण्डली ने भटजी को स्वीकार कर लिया है इसलिये उसे सजातीय सब सुविधायें दी जांय। महाराज सम्भाजी के अशान्त शासन-काल में भी इस प्रकार के उदाहरण पाये जाते हैं। उनके शासन काल में गङ्गाधर कुलकर्णी की शुद्धि हुई, जो कि ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया गया था। इस के सम्बन्ध में सम्भाजी ने यह घोषणा कर दी थी कि गंगाधर हिन्दू-धर्म में सम्मिलित किया जा रहा है। जो मनुष्य उसके साथ खान- पान का भेद भाव रक्खेगा वह देव धर्म के सिद्धांतों की अवहेलना करने का अपराधी समझा जायगा और वह स्वयं भी पापी समझा जायगा।

[ ४५ ] हम यहां पर जोधपुर की राजकुमारी इन्द्राकुमारी की घटना का उल्लेख भी कर देना अनुचित नहीं समझते । उसका विवाह मुग़ल सम्राट् के साथ हुआ था । पर जब वह कई सालों के पश्चात् वापिस आई तो राजपूतों ने उसे शुद्ध करके हिंदू धर्म मे मिला लिया था । यह स्वाभाविक बात थी कि जिन लोगों ने राजनैतिक बुराईयों को—जिसने कि हमारी मातृभूमि को इतना पीड़ित किया था—दूर करने का कार्य अपने हाथ मे लिया था वे उसके साथ-साथ धार्मिक और सामाजिक बुराईयों को भी दूर करें, क्योंकि वे राजनैतिक बुराइयों से अधिक हानिकारक थीं । हिन्दुओं की स्वतन्त्रता और हिंदुओं के पुनरु- द्धार के जिस आन्दोलन ने राजनैतिक और सैनिक क्षेत्रों में इतनी सफ- लता प्राप्त की उसने हमारे धार्मिक, सामाजिक पवित्रता और सभ्यता सम्बन्धी कार्यों को भी, जो शताब्दियों से बिगड़ते चले आते थे, ठीक रास्ते पर लाने मे कुछ उठा नहीं रक्खा । मुसलमान लोगों ने केवल एक सौ वर्ष के भीतर सारे दक्षिण मे अपने धर्म और राज्य को फैलाया, लाखों मनुष्यों को मुसलमान बनाया, परन्तु खेद का विषय है कि हिन्दू- जाति, हिन्दू-साम्राज्य रहने पर भी दो-चार सौ भी मुसलमानों को हिन्दूधर्म में नहीं ला सकी; किन्तु यदि उन्होंने ऐसा करना चाहा होता और इसके यहां यदि ऐसी प्रथा प्रचलित होती तो वे अवश्य सफलीभूत हुए होते । इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्यों की दासता की राजनैतिक बेड़ी कभी २ शीघ्र तोड़ी जा सकती है, किन्तु अन्धविश्वास को मनुष्यों के भीतर से हटाना एक बड़ा ही कठिन कार्य है । इसके साथ-ही-साथ इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिये कि मरहठों की सारी शक्ति पहले हिन्दुओं की राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने में और हिन्दू-साम्राज्य स्थापित करने ही मे लग गई, इसलिये उन्होंने यदि सामाजिक सुधारों की ओर, जो परमावश्यक थे, यदि विशेष उन्नति नहीं की तो हमे इसके ऊपर कोई आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है ।

[ ४६ ] किन्तु आश्चर्यजनक बात तो यह है कि उन्होंने झूठे अंधविश्वासों को, जो हिन्दुओं के मस्तिष्कों में भरे हुए थे, हटाकर उनकी जगह पर शुद्धि की प्रथा को उनके भीतर स्थान दिलाया, जिसकी स्थापना करना उस समय कठिन ही नहीं वरन् असम्भव था । ६. प्रेम और कृतज्ञता का ऋण । ॐ सौख्य स्मरुनि राज्याचें मीनापरि अखंड तळमलती --प्रभाकर अब हमारे अंतिम और--जहां तक हमारी जाति के भूतकालिक इतिहास का सम्बन्ध है--हमारे हिन्दू साम्राज्यों में से सर्वश्रेष्ठ साम्राज्य पर एकाएक पर्दा गिरता है । जिस अशुभ दिन सिन्ध नदी के किनारे, हमारे शूरवीर सिन्धराज दाहिर की पराजय हुई, उसी दिन हमारे भाग्य की भी पराजय हो गई । काबुल के हिंदू महाराज त्रिलोचनपाल, पंजाब के राजा जैपाल और अनंगपाल, दिल्ली के महाराज पृथ्वीराज और कन्नौज के जयचंद, चित्तौर के महाराना सांगा, बंगाल के महाराजा लक्ष्मण सेन, रामदेव राव्रो और देवगिरि के राजा हरपाल, विजयनगर के सारे राजे और रानियां, राज- सिंहासन और मुकुट--सिंध से लेकर समुद्र पर्यंत एक-एक करके सब मिट्टी में मिल गये । निडर, धृष्ट और अजेय शत्रु हमारी हिंदू-जाति की हांपती हुई छाती को अपने घुटने से दबाये हुए खड़ा हो गया । चित्तौर ही नहीं, किन्तु सारे भारतवर्ष की हिंदू-राजधानियां राख की ढेर बन गईं । कभी-कभी उसी राख के ढेर से बलिदान की चिनगारियां एक क्षण के लिये प्रज्वलित हो उठती थीं । शाही तख्तताऊस पर ॐ राज्य के वैभव को देख कर ( शत्रु ) मछली की तरह तड़पते थे ।

[ ४७ ] औरङ्गजेब बादशाह हमारी जाति की सारी आशाओं को पायों तले रौंदे हुए निश्चिन्त बैठा हुआ था और लाखों तलवारें उसके क्रोध भरे पैरों की ठोकर के इशारे पर मृत्यु की भयंकर लीला रचाने के लिये सदा तय्यार रहती थीं। ठीक उसी समय 'या सकल भूमंडलाचिये ठायीं, हिन्दू ऐसा उरला नाहीं' ❄ हिन्दू युवकों का एक दल 'एका लहानशा कोनात' एक कोने में गुप्तसभा मे एकत्रित हुआ, और अपने स्वर्गीय राजाओं और रानियों, धूल में मिले उन सिंहासनों और राज्यमुकुटों तथा अपनी जाति की स्मारक राख की ढेर को साक्षी करके उन्होंने अपने धर्म और जाति के ऊपर किये गये अपमान का बदला लेने तथा हिन्दूशास्त्रों और ध्वजा का मान रखने के लिये उस अजेय शत्रु के विरुद्ध विद्रोह करने की शपथ खाई। जिस समय नवयुवकों का यह झुंड बाहर निकला तो उनके पास कुछ जंग (मुर्चा) लगी तलवारों के अतिरिक्त कुछ न था। दुनियां ने उनकी अवस्था का अनुमान करके कहा--'यह मूर्खतापूर्ण कार्य है'। बुद्धिमानों ने कहा "यह आत्महत्या है" और औरंगजेब ने कहा "छिः, छिः"। इन का अनुमान गलत नहीं था क्योंकि शिवाजी पहला व्यक्ति न था जिस ने विद्रोह किया हो । उससे पहले कई साहसी वीरों ने विद्रोह किया था पर वे असफल रहे जिस के कारण उन को विद्रोह का भयङ्करतम मूल्य देना पड़ा था। पर इस दल ने बदला लेने का दृढ़ निश्चय किया । उनका यह दृढ़ विश्वास था कि यदि ये अपने उद्देश्य मे सफल भी न हो सके और विद्रोह के परिणाम स्वरूप उन्हें बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति डालनी पड़ी तो वे अपने बलिदान द्वारा एक ऐसा बीज बो जाएगे कि आने वाली संताने देश को मुक्त कराने का अविश्रांत प्रयत्न करती रहेगी और सदैव दासता की बेड़ी मे न पड़ी रहेगी । ❄ जब कि एक भी ऐसा हिन्दू भूमण्डल पर न बचा था (जो मुसल- मानों से पद-दलित न हुआ हो)।

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बीस वर्ष बीत गये। अब औरंगज़ेब का चेहरा मलिन और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। वह मरहठों के नवयुवकों का झुंड हिन्दू-राज्य का हृदय बन गया। औरङ्गजेब बादशाह ने फिर प्रण किया 'मैं काफ़िरों के झुंड को पहाड़ ही में नष्ट कर दूंगा'। सहस्रों चमचमाती हुई तलवारों के साथ क्रोध से भरे हुए औरङ्गजेब बादशाह ने शिवाजी के छोटे से राज्य पर आक्रमण कर ही दिया और उस देश को पावों तले कुचल दिया पर इसके कारण वहां ऐसे विद्रोह को जन्म मिला जो उसके पावों को चिपट गया। शक्तिशाली मुसलमानी राज्य लड़खड़ाया। अब वह न तो स्थिर ही रह सकता था और न ही उन से पीछा छुड़ा सकता था। इस प्रकार खाई चौड़ी और गहरी होती गई। बाहर निकलने के लिये वह जितना ज़ोर लगाता उतना नीचे धंसता जाता। अंत में वह ऐसा फंसा कि वह फिर कभी उभर न सका। उसकी मृत्यु तथा लाखों चमकती हुई तलवारों की समाप्ति होने के बाद मरहठों ने फिर शक्ति ग्रहण की और उस शाही मक़बरे के समीप हिंदुओं का छोटा सा राज्य एक महान् हिन्दू- साम्राज्य में परिणत हो गया। क्योंकि अब शीघ्र ही मरहठों का झुंड अपनी गेरुआ ध्वजा लिये बाहर निकला और हिन्दू-धर्म की स्वतन्त्रता की लड़ाई को सारे भारत- वर्ष में फैला दिया। मरहठों ने गुजरात, खानदेश, मालवा और बुन्देल- खंड में प्रवेश किया, उन्होंने चम्बल, गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्रा नदियों को पार किया। उन्हों ने चित्तौड़, नागपुर, उड़ीसा को अधीन किया और धीरे २ बढ़ कर एक २ पत्थर जोड़ कर यमुना से तुंगभद्रा तक और द्वारिका से जगन्नाथ तक तमाम देश को मुसलमानों के शासन से मुक्त करा कर शक्तिशाली हिन्दू-राज्य में परिणत कर दिया। वे यमुना, गंगा और गंडकी आदि नदियों को पार करके पटना पहुंचे, जो महाराज चन्द्रगुप्त की राजधानी थी, कलकत्ता में काली जी की और काशी में विश्वनाथ जी की पूजा की। इन दस, बारह नवयुवकों के उत्तराधिकारी

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अब लाखों की संख्य, में अपने झंडे को फहराते हुए और बाजा बजाते हुए मुसलमानी राज्य की राजधानी की ओर चल पड़े और उसके फाटकों को जा खटखटाया। उन्हें देख कर मौलवी और मौलाने आश्चर्य में पड़ गये। अभी तक उनका यही दृढ़ विचार था और वे दूसरों को भी यही विश्वास करने पर बाध्य कर रहे थे कि कुरान सच्चा है क्यों इस्लामी सेनाओं द्वारा पुराणों के मानने वाले हिन्दुओं पर राजनैतिक विजय प्राप्त हुई है। पर अब जब उन्हों ने देखा कि पुराणों के मानने वाले हिन्दू भिन्न २ सम्प्रदाय और जाति में विभक्त, मूर्ति-पूजक और बिना दाढ़ी के होते हुए भी, असीम सेना के साथ दिल्ली की ओर बढ़ रहे हैं और उन्होंने अपना गेरुआ झंडा मुसलमानी क़िलों पर गाड़ दिया है, तो ये निराशा के सागर मे डूब गये। इस बार जब्राईल कुरान के विरुद्ध 'पुराण' की सफलता देख कर लड़ने को न आया। उनका विश्वास था कि भूतकाल मे वह ऐसे समयों पर आया करता था अब कोई यह नहीं कह सकता कि क्योंकि मुसलमान धर्म सच्चा है इसी लिये उस की विजय होती रही है; और क्योंकि हिन्दू-मन्दिर गिराये गये थे इसलिये उनका धर्म झूठा है। मुसलमानों का वह ऊपरिलिखित दावा, जिस पर कि वे असंख्य हिन्दुओं को मुसलमान बनाते थे, अब झूठा प्रमाणित हुआ। अब मन्दिरों की चोटियां मसजिदों से ऊपर उठी दिखाई देने लगीं। चांद की रोशनी फ़ीकी पड़ गई और उनका झंडा अन्तिम सांस लेने लगा और हिन्दू राज्य का सुनहरा झंडा फहराने लगा। दिल्ली पर फिर पृथ्वीराज के वंशजो का शासन हो गया और हस्तिनापुर फिर एक बार हिन्दुओं के हाथ में आ गया। औरङ्गज़ेब ने शिवाजो को चूहा कहा था, लेकिन उसी चूहे ने शेर को उस की मांद में जा ललकारा और उसके पंजे और दांतों को एक २ करके उखाड़ लिया। गुरु गोविन्दसिंह जी के "चिड़ियों से मैं बाज मरवाऊं" कथनानुसार गौधों ने गौ-वधिकों को मार डाला।

[ ५० ] वे शूरवीर कुरुक्षेत्र में स्नान करके अपनी विजयी सेना को लाहौर ले गये। अफ़गानों ने उन्हें रोकना चाहा, पर अटक के पार भगा दिये गये। वहां पर मरहठा वीर ने लगामें खींची और घोड़े से उतर कर थोड़ा विश्राम किया क्योंकि उसके सेनापति और नेता पूना में एकत्र होकर काबुल पार के हिन्दूकुश के ऊपर आक्रमण करने का विचार कर रहे थे। फ़ारस, इंगलैंड, पुर्तगाल, फ्रांस, हालैंड और आस्ट्रिया के राजदूत पूना में पहुंचे और उन्होंने प्रार्थना की कि वे लोग अपने राष्ट्रों की ओर से महाराष्ट्र के शाही दरबार में राजदूत बन कर रहना चाहते हैं। बंगाल के मुसलमान नवाब, लखनऊ के मुस्लिम वायसराय, मैसूर के मुसलमान सुलतान, हैदराबाद के मुस्लिम निज़ाम और रुहेलखंड और अर्काट इत्यादि के छोटे बड़े सरदार अब मरहठों को कर, “चौथ” और “सर- देशमुखी”–देने लगे। और भी सब कुछ देने को तय्यार थे। वे तो अब केवल जीना ही चाहते थे। निज़ाम अब नाममात्र के निज़ाम रह गये और जो कुछ मालगुज़ारी राज्य में एकत्र करते थे, वह किसी न किसी प्रकार मरहठा-राजकोष में आ ही जाया करती थी। मरहठों के शत्रु भारतवर्ष के यवन ही नहीं थे, वरन् हम देखते हैं कि ईरानी, काबुली, तुर्क, मुग़ल, रुहेले और पठान, पुर्तगेज़, फ्रेंच, इंगलिश और अबेसीनियन लोग सभी एक-एक करके मरहठों से स्थल और जल पर लड़े, किन्तु हिन्दू-सेना ने देश और धर्म के नाम पर लड़कर उन्हें पराजित कर दिया। रंगाना, विशालगढ़, चाकन, राजापुर वैनगुरला, बरसीनूर, पुरंधर, सिंहगढ़, साल्हेर, ऊम्बरानी, सवनूर, संगमनेर, फोंडा, वाई, फाल्टन, जिनजी, सितारा, दिनदोरी, पालखेड़, पेटलाद, चिपलून, विजयगढ़,

[ ५१ ] श्रीगांव, थाना, तारापुर, वसाई, सरंगपुर, जैतपुर, दिल्ली, दुगई, सेराई, भूपाल, अरकाट, त्रिचनापली, फादिग्गंज, फरुखाबाद, उद्रिग, कुञ्जपुर, पानीपत, राक्षसभुवन, उनावदी, मोतीतलाओ, धारवाड़, शुकताल, नसीबगढ, बडगाओं, घोरघाट, बादामी, आगरा, सास्डा, इत्यादि स्थानों में मरहठों की स्थल और समुद्र में ऐसी भारी विजय हुई कि यदि ऐसी हमारे पुराने इतिहास में हुई होती या किसी दूसरे देश के राष्ट्र की हुई होती तो वहां पर उन्हें स्मरण करने के लिये विजय-स्तम्भ खड़ा किया गया होता । शिवाजी के जन्म से लेकर नाना फड़नवीस के समय तक हरिभक्तों को कहीं पराजय नहीं हुई। ज्यों २ वे उन्नति करते गये, छोटी २ जागीरें, जितने बड़े कि दूसरे देशों में बहुत से राज्य हैं, देते गये, सतारा, नागपुर, कोल्हापुर, तंजोर, मांगली. मिराज, गुन्नी, बड़ौदा, धार, इंदौर, झांसी, ग्वालियर, और भी बहुत से स्थान सूत्रों की राज- धानियां थीं; जो कि इतने बड़े २ हैं जितने बड़े यूरोप में बहुत से राज्य हैं। उन्होंने हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, मथुरा, डाकोर, आबु और अवन्ती, परशुराम और प्रभास, नासिक, त्र्यम्बक, द्वारिका, जगन्नाथ, मालिकार्जुन, मदुरा, गोकुल, गोकर्ण इत्यादि स्थानों को विदेशियों के पंजे से मुक्त किया। काशी, प्रयाग और रामेश्वर फिर से गर्वपूर्ण से निर्भय होकर अपने कलस उठाने के योग्य बन गये और वे मन में परमात्मा को धन्यवाद देने लगे कि एक हिन्दू-राज्य अब भी उनके शत्रुओं से बदला लेने के लिये जीवित है। इस हिन्दू साम्राज्य में पुराने समय के मउखरि, चालुक्य, पल्लव, पांड्य, चोल, केराल, राष्ट्रकूट, अंध्रा, केसरी, भोज, मालवा, हर्ष और पुलकेशिन के राज्य, राठोड़ और च्यवन आदि सभी पुराने वंशों के राज्य सम्मिलित थे। इनके गवर्नर और सेनापति इतने बड़े २ देशों पर शासन करते थे कि पुराने समय में उतने बड़े राज्य पर शासन करने वाले अश्वमेध यज्ञ किया करते थे। पहले और दूसरे चन्द्रगुप्त के राज्यों को छोड़ कर कोई हिंदूराज्य इतना विशाल और विस्तृत नहीं हुआ,

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और न उतना गौरव प्राप्त कर सका । और जहां तक जातीय सेवाओं, आत्म बलिदानों का संबंध है, किसी को भी मरहठों की तरह भयंकर आपदाओं और विपत्तियों का सामना नहीं करना पड़ा और ऐसी कठि- नाइयों का सामना करते रहने पर भी कोई भी राज्य मरहठा राज्य की तुलना नहीं कर सकता । शायद हमारे इतिहासों में, जो मनुष्य सब हिंदू राजाओं को परास्त कर देता था, वह चक्रवर्त्ती कहलाता था और जो विदेशियों से देश और धर्म की रक्षा करता था उसे 'विक्रमादित्य' कहा करते थे । पहले विक्र- मादित्य ने सीदियन लोगों को देश से निकाला, दूसरे ने शक लोगों को और तीसरे ने, जिन्हें यशोधर्मा विक्रमादित्य कहते हैं; हूण लोगों को हटाकर उनके राजा को एक महान् युद्ध में मार डाला । यदि हमारी यह कल्पना सत्य है कि विक्रमादित्य का महान् पद उसे ही मिलता था जो धर्मयुद्ध में लड़कर विदेशियों को मार भगाता था, तो जो दिग्विजय करने के लिये अपनी सैनिक शक्ति के उत्कर्ष के लिये नहीं अपितु देश और धर्म दोनों को विदेशियों की पराधीनता से स्वतन्त्रता कराने के लिये लड़े हों और उन्होंने उन पर विजय पाई हो तब उनके कार्य, जिन्होंने यह सब से आखिरी हिन्दू-साम्राज्य स्थापित किया, कई प्राचीन चक्रवर्तियों और विक्रमादित्यों के कार्यों और उनके उद्देश्यों की दृष्टि से किसी प्रकार भी कम महत्त्वशाली नहीं। इसलिये वे भी चक्रवर्ती और विक्रमादित्य दोनों पदों से विभूषित किये जाने के अधिकारी हैं और प्रत्येक हिन्दू का धर्म है कि वह उनके प्रति वही भाव रक्खे जो पुराने भारतीय अपने चक्रवर्ती राजाओं और विक्रमादित्य राजाओं के प्रति रखा करते थे। क्योंकि उन्होंने जातीय पताका राजपूतों के शिथिल हाथों से पकड़ी और हिंदुओं से घृणा करने वाले सभी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी तथा दाहिर, अनंगपाल, जैपाल, पृथ्वीराज, हरपाल, प्रताप इत्यादि राजाओं के बलि -

[ ५३ ] दानों और चित्तौड़ और विजयनगर की राजधानियों पर किये गये अत्या- चारों का बदला अच्छी तरह लिया । मरहठों ने छः शताब्दियों में प्राप्त की हुई मुमलमलानों की विजय को एक शताब्दी में मिटा दिया । यदि वे पूर्ण रीति से जगे होते तो अर्द्ध-शताब्दी भी न लगी होती । अब हम हिन्दुओं को उचित है कि इन शूरवीरों के द्वारा किये गये हिंदू-जाति के उपकारों के लिये सदैव उन्हें श्रद्धाभक्ति की दृष्टि से देखते रहें, सदैव कृतज्ञता प्रकट करते रहें और जिस बड़े राज्य को उन्होंने स्थापित किया था उसपर एक बार दृष्टिपात करलें, क्योंकि शीघ्र ही और अकस्मात् इस विशाल साम्राज्य के ऊपर परदा पड़ने वाला है और यह हम लोगों के सजल नेत्रों से ओझल हो जाने वाला है । ७. पटाक्षेप ॐ हिंमत सोडू नये सूर्य पुन्हा येइल उदयाला" —प्रभाकर यह सिंहावलोकन हमने सन् १७९५ ई० अर्थात् खारदा की लड़ाई तक किया है । पहले के सब वर्णन इसी काल से सम्बन्ध रखते हैं । हमारा उद्देश्य घटनाओं की गणना करने का नहीं था । हमारा उद्देश्य यही रहा है कि मरहठों के मुख्य - आदर्शों और सिद्धान्तों को जनता के सामने लायें और उनके उन मनोरथों और उद्देश्यों का पता लगायें जिनके लिये मरहठे देश की धर्मवेदी पर बलिदान देने के लिये प्रस्तुत हुए । और इन ही आदर्शों के प्रकाश में हिंदू जाति के इतिहास में मरहठों के इतिहास का स्थान निश्चित करें । यह कार्य समाप्त होगया। ॐ इस आशा को दृष्टि में रख कर कि भले दिन फिर कभी न कभी अवश्य उदय होंगे, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए ।

[ ५४ ] उसपर भी सन् १७९५ ई० से लेकर १८१८ ई० तक का समय, जिसमें महाराष्ट्र राज्य का विध्वंस हुआ, अभी शेष रह गया है और वह ऐसा रोमाञ्चकारी है कि उसका वर्णन बिना आंसू बहाये नहीं हो सकता। हम ऊपर देख आये हैं कि मरहठे, मुसलमानों के छः शताब्दियों के बढ़े हुए प्रभाव को सत्यानास करके थके हुए हैं और आराम करने के लिये जा रहे हैं। ठीक इसी समय एक शक्तिशाली राष्ट्र उसपर आक्रमण करता है जो पहले दो बार नीचा देखकर चुप होगया था। मरहठे तीसरी बार भी उन पर विजित हुए होते या उन्हें अवश्य भगा देते, किन्तु अभाग्यवश उसी समय नाना फड़नवीस मर गया और बाजीराओ दूसरा मरहठों का पेशवा हुआ जो कि शत्रुओं का निस्सन्देह दास था। यह दो व्यक्ति-नाना और बाजीराओ-द्वितीय परस्पर विरुद्ध वृत्तियों के प्रतीक थे—सारे महाराष्ट्र आन्दोलन में इन दो परस्पर विरुद्ध वृत्तियों का सदा संघर्ष चलता रहा है--एक वृत्ति तो स्वार्थ और राष्ट्रीय हित विरोधी आत्म-उन्नति की ओर बढ़ाती रही और दूसरी वृत्ति स्वार्थ त्याग तथा परोपकार का पाठ पढ़ाती रही जिस में मनुष्य आप राज्य मुकुट प्राप्त न करके अपने देश के गौरव के उत्कर्ष बढ़ाने और अपनी जाति को स्वतन्त्र कराने में सफल होता था। यद्यपि मरहठे इस कुवृत्ति को पूर्णतया नष्ट न कर सके तो भी उन्होंने नाना फड़नवीस के समय तक इसे विकसित नहीं होने दिया--इसी के फलस्वरूप वे हिन्दू-पद- पादशाही की स्थापना कर सके थे। बाजीराव द्वितीय अति स्वार्थी पेशवा था और किसी प्रकार और मरहठों से मेल और सहानुभूति नहीं रखता था। ज्योंही शासन की बागडोर इसके हाथ में पहुंची, इस पर विदेशी राष्ट्र के द्वारा आक्रमण हुआ। यदि वह राष्ट्र भारतवर्ष का होता या एशिया महाद्वीप के अन्तर्गत किसी राष्ट्र का होता तो मरहठे अवश्य विजयी हुए होते, क्योंकि एशिया के राज्यों में मरहठे सब से