भारतकोश
संग्रह पर लौटें

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

आश्चर्य चकित हो द्वार पर आये। देखा, भावी दामाद खड़े हैं। लाला श्यामलाल ने चकित होकर रात्रि के समय उपस्थित होने का कारण मालूम किया। उत्तर में वर ने कहा मैं लड़की देखने आया हूँ, मैंने वैसे तो लड़की की बहुत प्रशंसा सुनी है। माता-पिता प्रशंसा करते नहीं थकते। परन्तु फिर भी आप जानते हैं, अपनी-अपनी आँखें हैं और अपनी-अपनी पसन्द। इसमें कोई हर्ज भी नहीं। हर्ज तो तब था जब पर्दे की प्रथा थी। क्योंकि कल को यदि न बने तो दोनों का जीवन नष्ट होने से बचा रहे। लाला श्यामलाल पुराने विचारों के पुरुष थे। उनके लिए प्रथा अटल नियम थी। उन्हें समाज का भय था। इसलिए उन्होंने पहले तो मना कर दिया और कहा मान लो मैंने तुम्हें लड़की दिखा दी और तुमने उसे पसन्द न किया तो क्या विवाह रुक जायगा? तुम कहोगे इसमें हनि ही क्या है। तुम्हारे लिए न होगी हमारी तो नाक कट जायगी। इन बातों का वर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वर ने कहा बिना देखे मैं विवाह न करूँगा, अब तो लाला श्यामलाल बड़ी विपत्ति में पड़ गए। बारत घर पर आ गई थी प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में विवाह होना था, चार घण्टे का अन्तर। आखिर पिता ने लक्ष्मी को कमरे में बुला लिया। वर ने देखा वह वास्तव में वैसी ही सुन्दर है जैसी उसकी प्रशंसा सुनी थी। वर ने प्रश्न किया 'आप इग्लिश पढ़ी हैं?' लक्ष्मी ने संकोच से उत्तर दिया 'पढ़ी हैं'। लक्ष्मी के हाथ में अंग्रेजी का समाचार-पत्र देकर पढ़वाया। वह लक्ष्मी के उच्चारण और मधुर कण्ठ पर मुग्ध हो गए। लक्ष्मी ने संगीत में भी परीक्षा दी और उसमें भी उत्तीर्ण हो गई।

वर ने कहा- 'मुझे लड़की पसन्द है।' लक्ष्मी ने निश्चयात्मक रूप से कहा- 'परन्तु आप मुझे पसन्द नहीं।'

लक्ष्मी ने अपने उक्त शब्दों के समर्थन में जो कहा, वह एक सुशील भारतीय महिला के लिए उपयुक्त है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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मनोवाञ्छित संतान

यदि तुम लड़कों को यह अधिकार है कि विवाह से पूर्व लड़कों को देखें, उसको परीक्षा लें और उसके पश्चात् अपना निर्णय दें। तो हम लड़कियों को भी यह अधिकार है कि तुम्हें देखें, परखें और अपना निर्णय दें। मेरा निर्णय यही है कि मैं तुम्हारे साथ विवाह कदापि नहीं कर सकता। मैं पूर्णरूपेण भारतीय हूँ और आप पूर्णरूपेण पश्चिमी। मैं विवाह को आत्मिक सम्बन्ध मानता हूँ जो मृत्यु के पश्चात् भी नहीं दृढ़ता। तुम्हारे समीप मेरा सबसे बड़ा गुण है मेरा गौरवण, भय कण्ठ। नर्कान कल को यदि मेरे चेचक निकल आये या किसी अन्य रोग के कारण मेरा रूप कुरूप हो जाय तो तुम्हारे नेत्र मुझे देखना भी पसन्द न करेंगे। जिसकी पसन्द ऐसी आँखों और कच्चों नाँवों पर हो, उसका क्या विश्वास? तुम में किताबों की योग्यता होगी, परन्तु मनुष्यत्व की नहीं।

आप कहेंगे तो क्या लड़कों को बिना देखे ही कुरूप आदि के साथ विवाह कर लें? नहीं मैं यह नहीं कहता, परन्तु लड़के लड़की को और लड़कों लड़के को जब तक देख करके दोनों एक दूसरे को सच पूर्वक पसन्द करके उत्तर न दें तब तक विवाह नहीं करना चाहिये। मनु जी कहते हैं कैसे रूप वाली कन्या से विवाह करें-

अव्यङ्गाङ्ग्यौ सौम्यनाम्नी हंसवारणागामिनीम्। तनुलोमकेशदशनां मुदङ्गीमुदहैत्त्रियम्॥

मनु ३/१०

अर्थ- सुन्दर आंगों वाली, अच्छे नाम वाली, हंस और गज के सद्गुण गमन करने वाली, पतले रोमाँचों वाली, बालों वाली, दौनों और कोमल शरीर वाली स्त्री से विवाह करें।

विवाह देशोन्नीति का मुख्य साधन है। क्योंकि भूमि पर जैसा बांया जाता है वैसा ही उत्पन्न होता है। यदि भूमि में उत्तम बीज बांया जायगा तो उत्तम ही अन्न उपजेंगा। इसी प्रकार स्त्री सन्तानोत्पत्ति के लिये भूमि है और पुरुष का वीर्य बीज रूप है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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क्षेत्र भूता स्मृता नारी बीज भूतः स्मृतः पुमान्।

क्षेत्र बीज समायोगत्संबधवः सर्वदेहिनाम्।।

मनु १/१३

अर्थ- खेत रूप स्त्री और बीज रूप पुरुष होता है। इस कारण खेत और बीज के मिलने से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

कामामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यतुमत्यपि।

न चैवैनं प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कहिचित्।।

मनु १/८९

अर्थ- चाहे कन्या ऋतुवाली होकर मरने तक घर में बैठी रहे परन्तु गुणहीन के लिए इसका कभी दान न करे।

गुणहीन को कन्या देने से गुणहीन, दरिद्र सन्तान होगी। देश से दरिद्रता, गुणहीनता दूर करने के लिए गुणवान को ही कन्या का दान करे।

एक ओर पुरुष स्त्रियों को अपने से छोटा और दासी समझते हैं, तो दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने समान अधिकारों की माँग करती हैं। परन्तु दोनों ही बातें मिथ्या हैं। क्योंकि दोनों के क्षेत्र अलग-अलग हैं और दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में बड़े हैं, पर साथ में एक बात और भी है जब तक दोनों रथ के पहियों के समान गृहस्थ रूपी रथ में एक साथ समानता को साथ लेकर नहीं चलेंगे तब तक गृहस्थ रूपी रथ चल नहीं सकता।

प्रजनाथं स्त्रियः सुष्ठः संतानाथं च मानवः।

तस्मात्साधरणो धर्मः श्रुतौपत्यसहोदितः।।

मनु १/९६

अर्थ- गर्भ धारण करने के लिए स्त्रियों को ईश्वर ने उत्पन्न किया है और वीर्य सन्तान के लिए पुरुष उत्पन्न किये हैं। इसी से स्त्री के साथ पुरुष का वेद में समान धर्म कहा है।

इच्छानुसारं सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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धनोपार्जन करना पुरुष का क्षेत्र है। सन्तानोत्पन्न करके उसका पोषण करना स्त्री का क्षेत्र है। गृहस्थ जीवन को सफल बनाने के लिए पुरुष को स्त्री का और स्त्री को पुरुष का मान करना चाहिए। जब तक दोनों के मन समान न होंगे तब तक गृहस्थ जीवन में सुख लाभ नहीं हो सकता। दोनों एक दूसरे को अपने ही समान जानें और देखें।


मनोवांछित सन्तान

सन्तान कितनी प्रिय वस्तु है। जिसके उत्पन्न होने से वंश वृद्धि होती है। आजकल देखने में आता है कि जब सन्तान बड़ी हो जाती है तो वह माता-पिता की आशा नहीं मानती और सामना करने के लिए आ जाती है। क्या कभी हमने बैठकर विचार किया कि इसका क्या कारण है। जब मैंने इस बात को विचारों, तो तत्काल मस्तिष्क में यह प्रश्न उठा कि सन्तान उत्पन्न की जाती है या हो जाती है। खोज करने पर ज्ञात हुआ कि पहले पूर्वज सन्तान को उत्पन्न करते थे, तभी उनके सद्गुण गुण वाली और आशानुसार कार्य करने वाली होती थी।

योगीराज श्रीकृष्ण तथा उनकी पत्नी रुक्मिणी दोनों ने १२ वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके अपने रजः, वीर्य को शुद्ध पवित्र करके अपने सद्गुण प्रद्युम्न पुत्र को जन्म दिया। जिस समय प्रद्युम्न युवाकाल में आया उस समय यदि माता रुक्मिणी के सामने प्रद्युम्न अकेला आता था तो रुक्मिणी भ्रम में पड़ जाती थी कि यह पुत्र है या पति।

परन्तु आजकल सन्तान को कोई भी उत्पन्न नहीं करता। स्त्री पुरुष इन्द्रिय सुख के लिये ही समागम करते हैं और अनायास

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वीरेन्द्र गुप्तः

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ही गर्भस्थ भ्रूण सन्तान के रूप में आकर, माता-पिता की आत्मा के बाहर ही रहता है।

बिना लक्ष्येण शुक्र दानम्।

संसार में कोई भी कार्य ऐसा नहीं, जिसे करने से पूर्व विचारा न जाय परन्तु गर्भाधान का कार्य ऐसा है जिसे बिना विचारों की आजकल किया जाता है।

आपके मन में आया चलो कुछ दिन के लिए कश्मीर की सैर कर आर्य, तत्काल ही दूसरा विचार उठा, वस्त्र नहीं हैं, पहले वस्त्र बनवा लें। वस्त्र बनाने का विचार आते ही आप बजाज की दुकान पर कपड़ा खरीदने चले आये। बजाज ने आपको कपड़ा दिखाने से पूर्व मालूम किया। महाशय जी क्या बनवाना है, तो आप उससे यह नहीं कहते कुछ बनवा लेंगे, तुम कपड़ा दे दो। परन्तु विचारते हो कश्मीर में ठण्ड पड़ती है, कोट नहीं है, कोट बनवाना है और कमीज भी, तो आप कहेंगे लाला जी कोट और कमीज का कपड़ा दिखाइये। अब समस्या हल हुई। इसी प्रकार कपड़ा लेकर जब आप दर्ज़ी के पास गये तो उसने भी प्रश्न किया कि क्या बनेगा तो आप उससे भी यही कहते हैं कि इसका कोट और इसकी कमीज और साथ में यह भी कि कोट अल्वर कट और कमीज टाई कालर की, ना कि यह कुछ सी दे। आपको कपड़ा लेने और दर्ज़ी के पास पहुँचने से पहले ही विचार करना पड़ता है। यही नहीं भोजन, यात्रा आदि सभी कार्यों के करने से पूर्व उसका विचार पहले मन में आता है फिर उसकी रूप-रेखा, तत्पश्चात्, वह कार्य क्रियात्मक रूप में आता है। परन्तु एक सन्तति निर्माण का कार्य ऐसा है कि इसमें न तो कोई पहले विचार करता है, न उसकी रूपरेखा बनाता है। तभी तो कह सकते हैं कि आजकल सन्तान उत्पन्न नहीं की जाती परन्तु हो जाती है। यदि वह सन्तान आपको कष्ट देती है तो उसे नालायक क्यों कहते हो, गलती आप करो और थोपो सन्तान के ऊपर। जब आपने

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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क्रोडा की तब इन्द्रिय सुख के लिए। आपने कभी इस विचार से क्रोडा नहीं की, कि आज हमें धर्मराज युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम और राम, लक्ष्मण जैसे पुत्र को जन्म देना है; पुत्र, पुत्री, ६ पत्नी, पापी, धनी, निर्धनी हर प्रकार की सन्तान उत्पन्न करने की सामर्थ्य परमपिता परमात्मा ने आपके हाथ में सौंपी है।

प्रश्न- क्या वास्तव में इच्छानुसार सन्तान उत्पन्न हो सकती है?

उत्तर- हाँ! हो सकती है। उत्तम सन्तान को बनाने के लिए उत्तमोत्तम संस्कारों की आवश्यकता है। जिस प्रकार एक सुनार सोने की डली को संस्कारों द्वारा सुन्दर आभूषणों में परिवर्तित कर देता है। उसी प्रकार यदि उत्तम रीति से उत्तम संस्कार होंगे तो बच्चा उत्तम होगा यदि संस्कार निकृष्ट होंगे तो बच्चा भी निकृष्ट होगा।

घुड़साल में घोड़े ही बैठेंगे मनुष्य नहीं। कूड़े के ढेर पर मच्छर, भुनगे ही आकर बैठेंगे भले मनुष्य नहीं, तो फिर निकृष्ट रजः - वीर्य से कैसे उत्तम सन्तान को आशा की जा सकती है। उससे तो निकृष्ट सन्तान ही होगी।

पुष्पं दृष्ट्वा फलं दृष्ट्वा

दृष्ट्वा योषित यौवनम्।

त्रीणि रत्नानि दृष्ट्वेव

कस्य नो चंचलते मनः॥

अर्थ- सुन्दर पुष्प को देखकर, सुन्दर फल को देखकर और सुन्दर युवती को देखकर, किसका मन नहीं मचलता।

पिता यस्य शुचिर्भूतो,

माता यस्य पतिव्रता।

द्वार्या यः सुनु रूत्पन्न

स्तस्य नो चंचलते मनः॥

इच्छानुसार सन्तान

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अर्थ- जिस पिता ने पर स्त्री गमन के भावों को स्वप्न में भी नहीं आने दिया और जिस माता ने स्वप्न में भी पर पुरुष को और दृष्टिपात नहीं किया, ऐसे माता-पिता से जो पुत्र उत्पन्न होगा उसका मन इनको देखकर कभी विचलित नहीं होगा।

जिस प्रकार सुदृढ़ भवन बनाने के लिए भवन की नींव भी सुदृढ़ बनानी पड़ती है। जिस भवन की नींव कमजोर टेढ़ी होगी उसके ऊपर का भवन भी कमजोर और टेढ़ा ही रहेगा। चाहे ऊपर कितनी ही लीपा-पोती को जाय परन्तु वह भवन टिकाऊ नहीं हो सकता। इसी प्रकार जब तक यज्ञ कुट्टार के चाक पर घूम रहा है तब तक कुट्टार उसे सीधा कर सकता है और जब वह चाक से नीचे उतर आया और जरा-सा भी सूख गया तो उस घड़े को जो टेढ़ा हो गया है, वह सीधा नहीं कर सकता, उसे तोड़ कर ही दूसरा बनाना पड़ेगा, इस बात को महर्षि दयानन्द सरस्वती ने विचारा। वह यह भी जानते थे कि समाज से व्यक्ति नहीं बनता, परन्तु व्यक्ति से समाज बनता है। इसलिए महर्षि दयानन्द सरस्वती ने व्यक्ति के निर्माण की बात को विचारा। उस विचार को संस्कार विधि के रूप में उधृत किया, साथ ही भवन की नींव के आधार पर सबसे पहला संस्कार गर्भाधान ही रखा, क्योंकि वह जानते थे कि जिस दम्पति का गर्भाधान संस्कार, संस्कार के रूप में उत्तम रीति से होगा तब उस गर्भ से उत्तमोत्तम सन्तान उत्पन्न होगा।

महर्षि के इस महत्त्व को किसी ने नहीं समझा, न संस्कार विधि उठाकर देखी, न उस पर विचार किया, न कभी समझने का प्रयत्न ही किया, और करने भी क्यों? क्योंकि इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी ने प्रेरित भी नहीं किया और इसे अश्लील भी समझा। परन्तु यह विज्ञान अश्लील नहीं, यह परिवार, जाति, देश और संसार को पलट देने की शक्ति रखने वाला ज्ञान है। संसार में देश, जाति को गौरवमय वैभव प्राप्त कराने की इच्छा

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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रखने वाले पुरुषों, आपको इस विज्ञान को अपनाना; समझना और क्रियात्मक रूप देना होगा।

जिस प्रकार उपवन एक ही सुगन्धित पुष्प वाले पौधे से सुवासित हो जाता है उसी प्रकार विद्वान्, सुशील, गुणवान् एक ही पुत्र से सारा परिवार।

एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निगुणैश्च शतैर्वरः।

एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥

चाणक्य नीति ४/६

अर्थ- सैकड़ों गुण रहित पुत्रों के अपेक्षा एक ही गुणवान् पुत्र श्रेष्ठ है, एक ही चन्द्रमा अन्यकार को नष्ट कर देता है, सहस्रों तारे नहीं।

यादृशं तृष्यते बीजं क्षेत्रे कालीपपादिते।

तादृग्रीहति तत्तस्मिन्बीजं स्वैव्यञ्जितं गुणैः॥

मनु ९/३६

अर्थ- जिस प्रकार का बीज उचित समय (वर्षादि ऋतु) में संस्कृत खेत में बोया जाता है उसी प्रकार का ही बीज अपने रंग-रूपादि गुणों से युक्त उस खेत में उत्पन्न होता है।

जिस भावना से जितना पुष्ट और शुद्ध वीर्य को उचित ऋतुकाल में स्त्री रूपी खेत में पुरुष वीर्य सेचन करेगा उसी भावना का बच्चा उत्पन्न होगा। जिस प्रकार भूमि में गेहूँ, चना, जौ, तिल, गन्ना आदि सब जैसे-जैसे बीज होते हैं वैसे ही उत्पन्न होते हैं। यह नहीं होता कि बोया कुछ जाय और उत्पन्न कुछ और हो। जो-जो बोया जाता है वही-वही उत्पन्न होता है। इसी प्रकार यह नहीं हो सकता कि माता-पिता को काम के वशीभूत होकर भोग करें और सन्तान उत्तम, विद्वान् चाहें। भला यह तो किसी बुद्धिहीन से भी मालूम करो तो यही कहैगा कि बबूल बो कर आम खाने को नहीं मिल सकते, मिलेंगे तो कांटे ही मिलेंगे। क्योंकि प्रधानता बीज की होती है न कि भूमि की। बीज से ही सारे जीवों की उत्पत्ति

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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होती है। भूमि तो उस बीज को जैसा उसमें बोया गया है उसे अपनी शक्ति से पोषण करती हुई उसी रूप में उत्पन्न कर देती है।

★★★

जनक और जननी

ईश्वर, जीव और प्रकृति, यह तीनों अनादि हैं। इनका कभी नाश नहीं होता और न इनकी किसी ने रचना की है। यह सदा से अनादि हैं।

मृत्यु के पश्चात् जीव अन्तरिक्ष में चला जाता है। वायु द्वारा जीव मेघों में आकर जल वृष्टि द्वारा भूमि पर आता है। उस जल से अन्न में पहुँच कर भोजन द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर वीर्य में पहुँच जाता है।

जनक पिता को कहते हैं। क्योंकि जीव पहले पिता के वीर्य में पहुँच कर पोषित होता है। जननी माता का नाम है। जब पुरुष भोग द्वारा अपना वीर्य स्त्री के गर्भाशय में गिराता है तभी तो गर्भ स्थित होता है। तब वह जीव स्त्री के गर्भाशय में विकास को पाता हुआ समय आने पर बाहर आता है।

पुरुष हवा अयमादितो गर्भो भवति यदेतद्वेतः। तदेतत् सर्वैर्व्योडङ्ग स्युस्तेजः संभूतमात्मन्येवात्मानं विमर्ति तदा यदा स्त्रियां सिञ्च्यत्यथैनञ् जनयति तदस्य प्रथमं जन्म।

ऐतरेय उपनिषद् अ- २

अर्थ- वीर्य पुरुष के शरीर में पहला गर्भ होता है। यह समस्त शरीर का सार होता है। जब यह स्त्री के गर्भाशय में भेज दिया जाता है। तब इसका जन्म होता है।

तमागतं पृच्छति कोसीति। तं प्रतिब्रू यादविचक्षणा दूतवोरेत आभूत पंचदशान् प्रसूतात् पित्र्यावतसूतन् मा पुंसि कर्तरी एयाध्वं पुंसा कर्त्रा मातरिमा निषिञ्च सजाय उपजायमानो

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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द्वारशत्रयोदशोपमासे द्वारशत्रयोदशेन पित्रासं तद्विदिदेशुं प्रति तद्विदिदेशुं तन्मन्त्रतवोऽमुत्थव आमरध्व तेन सत्येन तेन तपसा ऋतु रसिम् आर्तवोऽरिम्।

काँचीतकी ब्राह्मणोपनिषद् अ १

अर्थ- जब ब्रह्मचार्यो आता है तो आचार्य पृष्ठता है 'तु कौन है?' ब्रह्मचार्यो उत्तर देता है 'शुक्ल और कृष्ण पक्षों के शासक चन्द्रमा से बीज एकत्र किया गया था जो प्रतिदिन के यज्ञ ने उत्पन्न हुआ था। यह यज्ञ देवों के द्वारा पुरुष में प्रविष्ट हुआ और उस पुरुष ने उसे स्त्री में प्रविष्ट किया उसी स्त्री से मेरा नाशवान् शरीर उत्पन्न हुआ है।'

'वह (जीव) पूर्व शरीर को छोड़ के वायु के साथ रहता है, पुनः जल औषधि वा प्राण आदि में प्रवेश करके वीर्य में प्रवेश करता है, तदनन्तर योनि अर्थात् गर्भाशय में स्थिर हो के पुनः जन्म लेता है।'

ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका पुनर्जन्म अथवा हम पीछे लिख आये हैं कि भूमि की अपेक्षा बीज को महता अधिक है और भोजन से वीर्य किस प्रकार बनता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि अच्छी सन्तान प्राप्ति के लिए पहले माता-पिता को डेढ़ मास पूर्व से ही जिस प्रकार के बच्चे को जन्म देना हो उसी प्रकार के वातावरण भोजन, दिनचर्या आदि को अपने व्यवहार में लाना प्रारम्भ कर दें। जिससे पुरुष के वीर्य में जो जीव है उसके संस्कार बनने प्रारम्भ हो जायें तथा पुष्ट भी होता रहे, क्योंकि हर वस्तु पर मन भावना तथा व्यवहार का तत्काल प्रभाव पड़ता है। साथ में जब तक भूमि भी पहले से जीत कर पटला आदि से तैयार नहीं कर ली जाती तब तक बीज को बीया नहीं जाता। इसी प्रकार स्त्री का रजः भी पुष्ट होकर अनुकूल भावना से संस्कृत हो जाय। क्योंकि बीज अपने पल्लवित काल में भूमि के प्रभाव से रचित नहीं रह पाता।

उच्छा-उत्तरा-सूक्तानि

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वीरेन्द्र गन्तः

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जब बीज और भूमि अर्थात् स्त्री और पुरुष दोनों के रजः और वीर्य समान पुष्ट होते हैं तभी श्रेष्ठ सन्तान की उत्पत्ति होती है और जिस वीर्य में सन्तानोत्पादक कीट अर्थात् जीव नहीं होता उस वीर्य से गर्भाधान नहीं हो सकता या वीर्य में जीव भी हो परन्तु वीर्य पुष्ट न हो या स्त्री का रजः पुष्ट न हो तो भी गर्भ नहीं रहेगा। इसीलिए रजः और वीर्य का पुष्ट होना तथा वीर्य में जीव का होना ही उत्तम गर्भाधान के लक्षण हैं।

आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा।

स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥

छांदोग्य उपनिषद् ७/२५/२

अर्थ- जब मनुष्य का आहार शुद्ध हो जाता है, तो स्मृति अटल हो जाती है और जब स्मृति पक्की हो जाती है, तब सारी गाँठें खुल जाती हैं।

दीपो भक्षयति ध्योतं कज्जलं च प्रसूयते।

यदनन् भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥

चारुण्य नीति ८/३

अर्थ- दीपक अन्धकार को खाता है, और काजल को उत्पन्न करता है। मनुष्य जैसा अन्न नित्य खाता है, वैसी ही उसकी सन्तान होती है।

स यामिच्छेत्कांमयेत मेति तस्यामर्थ निष्ठाय

मुखेन मुखध्वं सधायापस्थमस्या अभिमृशप

जपेदङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादिधियासे।

सत्त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्धिविद्वमिव मादयेभामम्॥

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/९

अर्थ- हमारे अंग-अंग तथा हृदय की नाड़ी-नाड़ी से वीर्य रूपी रस उत्पन्न होता है इसलिए इसको सन्तानोत्पत्ति के उपयोग में ही लाना चाहिए व्यर्थ नष्ट करना उचित नहीं, इसलिए तुम शुभ संकल्प से उत्तम सन्तान का ध्यान करो।

इच्छानुसार सन्तान

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विरेन्द्र गुप्तः

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ऋतुवर्णन

स य इच्छेपुत्रो मे शुल्को जायेत वेद मनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरीदन् पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै॥

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१४

अर्थ- जिनकी यह इच्छा हो कि मेरे गौर वर्ण, एक वेद को जानने वाला पूर्ण सौ वर्ष की आयु का भोगने वाला पुत्र हो तो दम्पति को चाहिए कि वह दूध चावल की खीर बनाकर उसमें घृत डालकर खायें, इस प्रकार के आहार से वह उक्त प्रकार का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।

अथ य इच्छेपुत्रो मे कपिलःपिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदन् पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै।

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१५

अर्थ- जिनकी यह इच्छा हो कि हमारे कपिल, पिंगल भुरे नेत्र वाला, दो वेदों का ज्ञाता और सौ वर्ष की आयु भोगने वाला पुत्र हो तो वह दम्पति चावल पकाकर उसमें दही और घी डालकर भोजन करें। ऐसा करने से वह उक्त पुत्र को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।

अथ य इच्छेपुत्रो मे श्यामो लो हिताक्षो जायेत त्रीन्वेदानुब्रवीत सर्वमायुरियादित्यु दौदन पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१६

अर्थ- जिनकी इच्छा हो कि हमारे श्याम वर्ण, लाल नेत्र वाला तीन वेदों का ज्ञाता और पूर्ण सौ वर्ष की आयु भोगने वाला पुत्र हो तो वह दम्पति केवल जल में चावल पकाकर भात तैयार कर लें, उसमें घी मिलाकर खायें तो वह उक्त पुत्र को उत्पन्न करने में समर्थ होंगे।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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ऋतुकाल वर्णित कर्म

अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत। सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सपिप्पन्तश्नीयातामीश्वरो जनयितवै।

ब्रह्मदण्डकपोनिषद् ६/४/१७

अर्थ- जिनकी इच्छा हो कि हमारी कन्या पण्डिता हो और पूर्ण सौ वर्ष की आयु भोगने वाली हो तो वह दम्पति तिल और चावल की खिचड़ी पकाकर उसमें घी मिलाकर खायें। ऐसा करने से उक्त प्रकार की कन्या को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।

अथ य इच्छेत्युन्नो मे पण्डितो विगीतः समितिगंमः।

शुश्रुषितां वांच भाषिता जायेत सर्वाण्वेदाननु बुवीत॥

सर्वमायुरियादिति माध्वं सौदनं पाचयित्वा सपिप्पन्तः।

न्तमश्नीयातामीश्वरो जनयितवा औक्षेणवासवमेणवा॥

ब्रह्मदण्डकपोनिषद् ६/४/१८

अर्थ- जिसकी यह इच्छा हो कि हमारा पुत्र प्रख्यात पण्डित विद्वान्नों की सभा में निर्भय प्रवेश करने वाला तथा श्रवण सुखद वाणी बोलने वाला हो, चारों वेदों का जानने वाला और पूर्ण सौ वर्ष की आयु का भोगने वाला हो तो वह दम्पति उक्ता तथा ऋषभक औषधियों से निकाला हुआ रस घृत संयुक्त चावलों में मिलाकर खायें तो वह उक्त प्रकार का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होंगे।

व्यवन्प्राश अवलेह में अष्टवर्ग के नाम से आठ औषधियाँ पड़ती हैं, जिनका अभी तक सही पता नहीं चला है। उसी अष्ट वर्ग में उक्ता और ऋषभक नाम की दो बुटियाँ हैं। जो उपरोक्त सेवन के लिए लिखीं हैं। इनकी उपेक्षा में शतावरी तोला, अश्वगन्ध नागीरी १ तोला, लाल इलायची के दाने आधा तोला लेकर कूट लें। इसका चूर्ण ६ माशा पुष्प और ६ माशा स्त्री घृत युक्त चावलों में मिलाकर सेवन करें। यदि किसी कारण से चावल न प्राप्त हो सकें तो दूध के साथ प्रयोग कर सकते हैं।

इच्छानुसार सन्तान

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वैरिन्द्र गुप्तः

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उपरोक्त सारे भोजनों का लाभ तभी प्राप्त होगा जबकि दम्पति कम से कम १॥ मास तक ब्रह्मचर्य से रहते हुए प्रयोग करें, तत्पश्चात् गर्भधान करें तो उत्तम सन्तान लाभ होगा।

यस्मिन्नुणं सन्वयितयेन् चानन्त्यमश्नुते।

स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः॥

मनु ९/१०७

अर्थ- जिसके उत्पन्न होने से (पितृ) ऋण दूर होता है और मोक्ष प्राप्त होता है उसी को धर्मज पुत्र जाने। औरों को कामज कहते हैं।

मनुष्य शरीर को मोक्ष तभी मिलती है जब अच्छे कर्म करे। अपने शरीर द्वारा संसार के कष्ट को दूर करने वाले, विद्वान् और धर्म का सत्य पथ दिखाने वाले पुत्र को जन्म देने से ही मोक्ष मिलती है अर्थात् मन. आत्मा, शरीर को सुख और शान्ति मिले, यही मोक्ष का द्वार है।

★★★

ऋतु वर्णन

ऋतुकाल स्त्रियों के जीवनारम्भ का चिन्ह है। इसी से गर्भ धारण शक्ति का पता चलता है। यह प्रति मांस तीन दिन पर्यन्त प्रत्येक स्त्री की योनि से रजः निकलता है। इसी को स्त्रियों का मासिक धर्म तथा रजस्वला होना भी कहते हैं। रजस्वला स्त्रियों को चाहिए कि वे अपना समय एकान्त में व्यतीत करें। दुःख और क्लेश-जनक वातावरण तथा विचारों को अपने पास न आने दें। घर की किसी वस्तु को हाथ न लगायें। पृथक् मिट्टी के पात्रों में हल्का भोजन करें। भुंजार आदि छोड़ दें। तीन दिन तक स्नान भी न करें। चौथे दिन स्नान से शरीर शुद्ध करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

इच्छानुसार सन्तान

१४

वीरेन्द्र गुप्तः

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अथ यस्य जायामार्तव विन्दत त्र्यहंकष्टसेन पिवेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्प्यपहन्यात् त्रिरावान्त आप्लुत्य ब्रीहीन वद्यातयेत्।।

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१३

अर्थ- जिनकी स्त्री ऋतुमति हो वह स्त्री तीन दिन तक कांस्य के पात्र में पानी, भोजन न पाय और उसको कोई मलीन वस्त्र, मलीन स्त्री व मलीन पुरुष स्पर्श न करे, फिर चौथे दिन स्नान करने के अनन्तर वह सुन्दर वस्त्र पहिन धानों को कूटे। ऋतुमति स्त्री को यदि कोई मैले वस्त्र पहिनने को या मलीन स्त्री या पुरुष से स्पर्श करेगी तो सम्भव है कि उसके शरीर में दूषिन्धित कीटाणु प्रविष्ट होकर उसी को हानि पहुँचावे, इसलिए उस समय किसी मलीन द्रव्य अथवा वस्त्रादिकों को उपयोग में न लावे।


ऋतुकाल वर्जित कर्म

ऋतुमति स्त्री को तीन दिन पर्यन्त न करने वाले कर्म तथा उनको करने से उस मास में गर्भ स्थित हो जाने पर बच्चे को हानियाँ।

दिन में सोने से = सन्तान अधिक सोने वाली।

नेत्रों में अंजत काजल आदि लगाने से = अन्धों

रोने से = विकृत नेत्र तथा विकार युक्त।

स्नान और अनुलेपन करने से = निर्बल, दुबली तथा दुर्बली।

तेल मर्दन से = कुष्ठी (कुष्ठ रोग वाली)

नाखून काटने से = नाखून रहित।

दौड़ने से = चंचल

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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हँसने से = काले दाँत वाली तथा काले ओष्ठ वाली।

अतिभाषण से = बकवादी।

वेग की ध्वनि सुनने तथा बोलने से = बहरी।

लिखने से = मूर्ख।

अतिवायु सेवन से = उन्मत्त सन्तान होती है।

ऋतुभक्ति स्त्री उपरोक्त कार्य जिस ऋतु में करेगी उसके १६ दिन अर्थात् उसी मास में गर्भाधान हो जाने से उस कार्य का दोष सन्तान में अवश्य आ जायेगा। इसी लिए इन कर्मों का निषेध किया है।

नोपगच्छेत्प्रमोदोऽपि स्त्रियमार्तवदर्शने।

समानशयने चैव न शयीत तथा सह॥

मनु ४/४०

अर्थ- कामार्त पुरुष भी रजस्वला स्त्री के पास न जावे और उसके साथ बराबर बिठौने पर भी न सोवे।

अश्रीरा तन्पूर्वति रशती पाप्याभ्युगा।

पतिर्यद्द्वधोऽ वाससा स्वमङ्गमभिधत्सते।

ऋग्वेद १०/८५/३०

अर्थ- रजस्वला स्त्री के सेवन, स्पर्श साथ निद्रा आदि से पुरुष और सन्तान श्री रहित और रोगादि से दूषित हो जाते हैं।

रजसाभिलुप्तां नार्यं नरस्य ह्यु पगच्छतः।

प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुरचैव प्रहीयते॥

मनु ४/४१

अर्थ- रजस्वला स्त्री के पास जाने वाले पुरुष की प्रज्ञा, तेज, बल, नेत्र तथा आयु नष्ट होती है।

उपरोक्त व्याधि रजस्वलागामी पुरुष को होकर अनेक रोग हो जाते हैं। इसलिये रजस्वला स्त्री के साथ चार दिन तक कभी समागम न करे। रजस्वला स्त्री ठंड से बचकर रहे तथा एकान्त वास करे और चौथे दिन स्नान करके अपने पति या पुत्र का दर्शन

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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रति समय वर्णित काल

करे या अपने चेहरे को दर्पण में देखे।

एक बार एक पुरुष ने अपनी पत्नी से कहा कि हमारे चार पुत्र हैं, मैं इस बात की परीक्षा करना चाहता हूँ कि इनमें से मेरा पुत्र कौन-सा है इस बात को सुनकर स्त्री ने कहा नाथ क्या आपको मुझ पर सन्देह है? आप मुझ पर दोष लगाते हैं? नहीं देवी, मैं तुम पर पूरा विश्वास करता हूँ, तुम पतिव्रता हो, निर्दोष हो, पवित्र हो, मैं एक और बात का अनुभव करना चाहता हूँ, जो मैंने नई सुनी है। देखो मैं इस कोठरी में बन्द हो जाता हूँ, तुम अपने शरीर को हल्दी चूना लगा लो, बच्चे पाठशाला से आते होंगे। पूछने पर तुम उनसे कह देना कि तुम्हारे पिता ने मारा है। पहले बड़ा लड़का आया उसने भी से पूछा मैं क्या हो गया? मैं ने कहा- बेटा तुम्हारे पिता ने मारा है। लड़के ने कहा- अच्छा घर आवे तो मैं में उसे कुट्टी की तरह काट डालूँगा कहता हुआ चला गया। अब दूसरा लड़का आया उसने भी प्रश्न किया और उत्तर में कहा मैं मत घबरा बाप को घर आने देने में उसे रुई की तरह धुन डालूँगा। तीसरे लड़के ने भी आकर प्रश्न किया और उत्तर दिया मैं बाप को घर आने देने में उसे मशक (चमड़े की जिसमें पानी भरा- जाता है) की तरह मसल डालूँगा। अब सबसे छोटा लड़का आया उसने भी मैं से पूछा क्या हो गया। उत्तर पाकर कहा मैं तेरी और पिताजी की लड़ाई है मैं क्या जानूँ मुझे भूख लगी है रोटी दे। पिता ने कोठरी से निकलकर बच्चे को उठा लिया और प्यार करता हुआ बोला देखो बस यही मेरा बेटा है। देवी तुम ध्यान करो जिस मास में सबसे पहला गर्भ स्थित हुआ था, क्या उस महीने ऋतु स्नान के पश्चात् किसी कसाई को देखा था? हाँ, कुछ ध्यान पड़ता है नाथ! जब मैं स्नान करके चुकी थी उसी समय किसी ने आपको पुकारा मैंने जाकर देखा कि एक कसाई सामने खड़ा है। बस देवी! यही कारण है कि बड़े लड़के में कुछ कसाई की-सी निर्दयता का आभास होता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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इसी प्रकार तुमने ऋतु स्नान के बाद दूसरी बार धुनें का तीसरी बार में भिन्नता का और चौथी बार में मेरा दर्शन किया होगा।

देवी कल शाम आर्य समाज के उत्सव में एक प्रोफेसर अमरीका का दौरा करके आये थे उन्होंने एक घटना अमरीका के एक दम्पति की सुनाई।

अमरीका के एक दम्पति को घर एक बालक ने जो हब्बी जैसा काला, सारे शरीर पर बड़े-बड़े काले बाल थे जन्म लिया। यह देखकर अमरीकन ने अपनी पत्नी से कहा- यह गर्भ मेरा नहीं। पत्नी- यह आप क्या कह रहे हैं, मैं तो कहँी भी नहीं गई। अमरीकन- तो यह बच्चा हब्बी जैसा क्यों, जबकि हम दोनों बिलकुल ही गोंरे हैं। पत्नी- यह बात मेरी भी समझ में नहीं आती। उन दिनों में अमरीका प्रचार के लिए गया था। उक्त अमरीकन महाशय अपनी शंका लेकर मेरे पास आये। मैंने उनकी शंका का समाधान करते हुए मालूम किया। क्या? आप बता सकते हैं कि आपके कमरे में कुछ चित्र लगे हैं? अमरीकन- हाँ लगे हैं। भारतीय- तो आप अपनी पत्नी से मालूम करें कि इन चित्रों में आपको कौन-सा चित्र प्रिय है और आप उसे नित्य देखती हैं, साथ में यह देखना कि सोते समय वह चित्र किस ओर रहता है और उस चित्र को लेकर आप मुझसे मिलें। अगले दिन जब वह अमरीकन चित्र लेकर मेरे पास आया तो वह चित्र भी काले हब्बी का था। मैंने अमरीकन को समझाया देखो मासिक धर्म के स्नान के पश्चात् भी यही चित्र देखा गया है और गर्भाधान के समय भी आपके कथानानुसार यह चित्र सामने रहा और जब तक बच्चे का जन्म हुआ तब तक नित्य ही इस चित्र को ध्यान पूर्वक देखा गया है जिस कारण आपके इसी चित्र के अनुसार हब्बी जैसे पुत्र का जन्म हुआ। अमरीकन ने घर जाकर पत्नी से मालूम किया तो यह सत्य निकला कि जब वह कमरे में आती थी तो उसका ध्यान इसी चित्र पर जाता था और वह सोचती थी क्या संसार

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अति आवश्यक सावधानियाँ

में ऐसे भी मनुष्य होते हैं?

ऋतुमति स्त्री चौथे दिन स्नान के पश्चात् तत्काल ही जैसे भाव तथा चित्र और पुरुष के दर्शन करेगी तो उस मास में गर्भ स्थित होने पर वैसे ही रंग, रूप विचार और भाव बच्चे में आ जाते हैं। यदि वीर पुत्र चाहे तो वीर योधाओं के चित्र धर्मात्मा पुत्र की इच्छा में महात्माओं के चित्र, रूपवान पुत्र प्राप्त करने के लिए सुन्दर बच्चों के चित्र और विद्वान पुत्र के लिए लेखकों आचार्यों तथा गुरुओं के चित्र देखो।

ऋतु स्नान के पश्चात् स्त्री के नेत्र छाया चित्र (फोटो कैमरा) के लैन्सों का कार्य करते हैं। उस समय जैसा चित्र तथा आकृति को नेत्र देखेंगे वैसा ही प्रतिबिम्ब मन तथा भाव में गुप्त रूप में समाविष्ट हो जाता है। जो गर्भ रहने पर अपनी आकृति में परिवर्तित कर लेता है।


रति समय वर्जित काल

स्त्रियों को स्वाभाविक ऋतुकाल की १६ रात्रि हैं। जिस दिन से ऋतु आरम्भ होता है उसी दिन से १६ रात्रि तक ही गर्भ स्थित होता है। जिसमें पहले चार दिन अच्छे मनुष्यों से निन्दित भी सम्मिलित हैं। इसलिए पहले चार दिनों में स्त्री भोग न करे।

ऋतु कालाभिगानी स्यात्स्वदारनिरतः सदा।

पर्ववर्ज ब्रजेच्छैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया॥

मनु ३/४५

अर्थ- अपनी स्त्री से (अमावस्यादि) पर्व वर्जित दिनों को त्याग कर शेष ऋतुकाल में प्रीतिपूर्वक समागम करे।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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रहस्य तथ्य

तासामाद्याश्चतस्वस्तु निन्दितैकादशी च या। त्रयोदशी च शेषस्तु प्रशस्ता दश रात्रयः॥

मनु ३/४७

अर्थ- उनमें चार प्रथम की और ११वीं और १३वीं ये छः (रात्रि स्त्री भोग में) निषिद्ध हैं और शेष दस रात्रि श्रेष्ठ हैं। 'जिनको पुत्र की इच्छा हो वे छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं, चौदहवीं और सोहलहवीं ये छः रात्रि ऋतुदान में उत्तम जानें, परन्तु इनमें भी उत्तर-उत्तर श्रेष्ठ हैं।'

संस्कार विधि गर्भाधान प्रकारण

इसमें स्वामी जी ने अन्त की दो रात्रियाँ ऋतुदान के लिए ही उत्तम कही हैं जैसे १५ और १६। कन्या के लिए १५ और पुत्र के लिए १६ उत्तम हैं।

अमावास्याष्ठमी च पौर्णमासी चतुर्दशीम्। ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्युत्तोस्नातको द्विजः॥

मनु ४/१२८

अर्थ- अमावास्या, अष्टमी, पौर्णमासी और चतुर्दशी इन तिथियों में पूर्वोक्त स्नातक द्विज और ऋतुकाल में भी भायां के पास न जावे।

तथा ग्रहण समय, संक्रान्ति, दिन, सन्ध्या समय, माता, पिता की मृत्यु तिथि भी वर्जित हैं। स्त्री रक्त वर्ण के वस्त्र पहने हुई, सोते समय परदेश में और दूसरे के गृह पर गर्भाधान नहीं करना चाहिए। इससे सन्तान अल्पानु और दुर्गावती होती है।

पर्वस्वभिगमोऽधन्यो दिवा पापप्रदो नृप। भुवि रोगवहो नृणामप्रशस्तो जलाशयः॥

विष्णु पुराण ३/१२/१२२

अर्थ- पर्व दिनों में स्त्री गमन करने से धन की हानि होती है, दिन में पाप होता है, पृथ्वी पर रोग तथा जलाशय में स्त्री प्रसंग करने से नपुंसकता और अमंगल होता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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