भारतकोश
संग्रह पर लौटें

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

गुना फल मिलता है, जो तीन मिलकर उपासना करते हैं उन्हें हजार गुना फल मिलता है, और जो इससे अधिक मिलकर उपासना करते हैं उनको अनन्त फल मिलता है।

गोलडसटकर साहब पैरिस अर्थात् फ्रांस देश निवासी अपनी (वायविल इन इण्डिया) में लिखते हैं । सब विद्या और भलाई का भण्डार आर्यावर्त देश है। और विद्या तथा मत इस देश से फैले हैं। और परमात्मा की प्रार्थना करते हैं कि हे परमेश्वर ! जैसी उन्नति आर्यावर्त देश की पूर्व काल में थी वैसीही हमारे देश की कीजिये।

जो उन्नति करना चाहो तो 'आर्य समाज' के साथ मिलकर उसके उद्देश्यानुसार आचरण करना स्वीकार कीजिये नहीं तो कुछ हाथ न लगेगा। क्योंकि हम और आपको अति उचित है कि जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना, अब भी पालन होता है, आगे भी होगा, उसकी उन्नति तन, मन, धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें। इसलिये जैसा आर्य समाज आर्यवर्त देश की उन्नति का कारण है वैसा दूसरा नहीं हो सकता।

सत्यार्थ प्रकाश एकादशसमुल्लास सब प्रकार से अपनी उन्नति करना चाहो तो आर्य समाज के सत्संगों में अवश्य जाया करो।

★★★

इच्छानुसार सन्तान

२०२

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

सन्तति निरोध

वर्तमान समय में कई कारणों से सन्तति निरोध का प्रश्न छिड़ा हुआ है। जो कुछ अंशों में आवश्यक भी जान पड़ता है। मैं इससे पूर्व यह स्पष्ट कर देना उचित समझता हूँ कि यह सन्तति निरोध किस आयु में और कितनी सन्तानों के पश्चात् करना उचित है।

एक दम्पति को अधिक से अधिक ३५ या ४० वर्ष की आयु तक ही सन्तान उत्पन्न करनी चाहिये और अधिक से अधिक ३ बच्चे जिसमें २ पुत्र और एक पुत्री।

आप प्रश्न करेंगे कि, ४० वर्ष की ही आयु तक क्यों सन्तान को जन्म दें, और आगे को क्यों नहीं?

इसका उत्तर यह है कि आज संसार में जो मनोवृत्ति, भाई-भाई, तथा भाई-बहिन के मध्य चल रही है। उस दृष्टि से ३५ या ४० वर्ष तक ही सन्तान को जन्म देना उचित है। हर मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि जब मैं धनोपार्जन करता हूँ तो उससे मैं क्यों ना सुख उठाऊँ? वह यह नहीं चाहता कि यदि उसका पिता मर गया है और उसके २ या ३ और छोटे भाई हैं तो वह अपनी आय से माता तथा भाइयों का पोषण करे। हीं करते भी हैं, परन्तु वह सौ में से १,२ इसलिये कम से कम सन्तान, और कम आयु हीं में सन्तान को जन्म दें, ताकि वह अपने ही सामने पढ़ लिखकर सब के सब अपने पैरों पर खड़े हो सकें, ताकि किसी का भार किसी पर न पड़ सके। मान लीजिये आपने अन्तिम बच्चे को ४० वर्ष की आयु में जन्म दिया और आप

इच्छानुसार सन्तान

२०३

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

आश्रम व्यवस्था में पूर्ण आस्था रखते हैं। तो आप ५५ वर्ष की आयु में वानप्रस्थ लेंगे तो उस समय आपका सबसे छोटा बच्चा १५ वर्ष का होगा, जो हर प्रकार अपने को संभाल सकता है और यदि कहीं आपने ४८ या ५० वर्ष की आयु में किसी बच्चे को जन्म दिया तो आप स्वयं ही समझ लें कि उस बच्चे की क्या दशा होगी। मेरे स्वयं देखने में आया है कि पुरुषों ने ६५ वर्ष की आयु में कन्या को जन्म दिया और जन्म देने के पश्चात् उनका स्वास्थ्य इतना थक गया कि वह धनोपार्जन नहीं कर सकते। यह उनका उस कन्या के प्रति अन्याय नहीं तो और क्या है। ६६ वर्ष के आप हैं कन्या १ वर्ष की है वह किसके आसरे पलेगी, कौन उसे शिक्षा दिलायेगा और कौन उसका विवाह करेगा। आज पुत्र सर्विस कर रहा है और आपको भी कुछ धन दे रहा है, यदि कल को उसके भी २,३ बच्चे हो गये तो वह आपको देगा या अपने परिवार का पोषण करेगा। उस समय आप सोचेंगे कि मैंने काम के वशीभूत होकर यह क्या किया। इसीलिये सन्तान को ४० वर्ष की आयु के पश्चात् कभी जन्म न दें।

आज जो सन्तति निरोध का प्रश्न उठा है वह भारत की निर्धनता, अन्न की कमी या भूमि की कमी के कारण नहीं परन्तु इन इन्द्रियों में लिप्त कामी, विषयी पुरुषों के कारण उठा है। जब भारतवर्ष में सन्तति के सम्बन्ध में पूरा ध्यान रखा जाता था उस समय दस मास बच्चे के गर्भ में रहने के, दस मास बच्चे के दूध पीने के और दस मास स्त्री को अपना स्वास्थ्य ठीक करने के लिये छोड़ते थे अर्थात् २१। वर्ष के पश्चात् जब स्त्री पुरुष पुष्ट होते थे तो दूसरी सन्तान के लिए समागम करते थे।

जो वीर्य २१। वर्ष तक शरीर के मध्य समस्त इन्द्रियों द्वारा तप्त होकर कूटनमय बन जाता था, तब उस वीर्य से जो सन्तान होती थी वह भी अनुपम होती थी।

इच्छानुसार सन्तान

२०४

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

सन्तति निरोध के लिये ३५ वर्ष की आयु के पश्चात् ही उपाय करना चाहिए। परन्तु आजकल इसका उलटा हो रहा है। और इस कृत्रिम सन्तति निरोध ने व्यभिचार को इतना बढ़ा दिया है कि जिसकी सीमा नहीं रही।

महात्मा गांधी ने एक लेख में लिखा था—

“इन कृत्रिम साधनों से ऐसे-ऐसे कुपरिणाम आये हैं, जिनसे लोग बहुत कम परिचित हैं। स्कूली लड़के और लड़कियों के गुप्त व्यभिचार ने क्या तूफान मचाया है, यह मैं जानता हूँ। मैं जानता हूँ, स्कूलों में कालिजों में ऐसी अविवाहिता जवान लड़कियाँ भी हैं जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कृत्रिम सन्तति निग्रह का साहित्य और मासिक पत्र बड़े चाव से पढ़ती रहती हैं और कृत्रिम साधनों को अपने पास रखती हैं। इन साधनों को विवाहित स्त्रियों तक ही सीमित रखना असम्भव है और विवाह की पवित्रता तो तभी लोप हो जाती है जब कि उसके स्वभाविक परिणाम सन्तानोत्पत्ति को छोड़ कर महज अपनी पाशविक विषय वासना की पूर्ति ही उसका सबसे बड़ा उपयोग मान लिया जाता है।”

इससे यह सिद्ध हो जाता है कि मनुष्यों के हृदय में कृत्रिम सन्तति निग्रह के इस आन्दोलन से पवित्रता के स्थान पर किस प्रकार निम्न कोर्ट की कामुकता का आधिपत्य हो रहा है और किस प्रकार हमारे अपरिपक्व मति बालक और बालिकायें इसके शिकार होकर अपना सर्वनाश कर रहे हैं।

सन्तति निरोध का सबसे बढ़िया साधन एक मात्र इन्द्रिय संयम है।

हम पिछले पृष्ठों में लिख आये हैं कि स्त्री के मासिक धर्म से १६ दिन तक ही समागम करने पर गर्भ स्थित हो सकता है, इसके पश्चात् नहीं, इसलिये मासिक धर्म के दिन से १८ दिन तक स्त्री समागम न करे। और अन्त में मासिक धर्म प्रारम्भ होने

इच्छानुसार सन्तान

२०५

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

से २ दिन पूर्व भी रति न करे। ऐसा करने से उस मास में गर्भ स्थित नहीं होगा।

आपके समक्ष कुछ अभूतपूर्व एवं नवीनतम अनुसन्धानात्मक प्राकृतिक गर्भ निरोधक साधनों पर प्रकाश डालते हैं, जो अत्यन्त उपयोगी, सुलभ एवं वान्छित फल के दाता हैं, साथ में स्वास्थ्य पर किञ्चित मात्र भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं होने देते अपितु आंशिक रूप से ब्रह्मचर्य के पथ पर अग्रसर होने में सहायक सिद्ध हैं।

प्रथम साधन- हमने अपने पूर्व के साहित्य में अंकित किया है कि स्वर्गों की साधना द्वारा अपनी इच्छा के अनुरूप पुत्र एवं पुत्री को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि शरीर के साथ-साथ वीर्य पर भी स्वर्गों का सीधा प्रभाव पड़ता है।

आप सभी जानते हैं कि बिजली को उपयोग में लाने के लिए दो प्रकार के तारों का प्रयोग होता है। 'निगेटिव और पोजिटिव' एक गर्म तार और दूसरा ठण्डा तार। प्रकाश करने अथवा बिजली के यन्त्र को क्रिया में लाने के लिये इन दोनों ही तारों का प्रयोग होता है। यह असम्भव है कि दोनों तार गर्म हों और प्रकाश हो जाये। इसी प्रकार दोनों तार ठण्डे होने पर भी प्रकाश नहीं हो सकेगा। प्रकाश तो तभी होगा जब एक तार गर्म और दूसरा तार ठण्डा हो।

चुम्बक पत्थर (मैग्नेट) के दो ध्रुव होते हैं। पहला उत्तरी ध्रुव दूसरा दक्षिणी ध्रुव। आप दो चुम्बक पत्थर ले लीजिए, इन दोनों के उत्तरी ध्रुवों को आपस में मिलायें आप देखेंगे की दोनों आपस में मिलने की अपेक्षा दूर भागते हैं। इसी प्रकार दोनों के दक्षिणी ध्रुवों को मिलाने पर भी दूर भागेंगे। यह दोनों आपस में तब मिलेंगे जब एक के उत्तरी ध्रुव और दूसरे के दक्षिणी ध्रुव को मिलाया जाय तब आप देखेंगे कि वह पीछे भागने की अपेक्षा आपस में दौड़कर मिलेंगे।

इच्छानुसार सन्तान

२०६

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

आप ठण्डे पानी में एक ठण्डा ही लोहे का गोला डालकर देखें, कोई भी प्रतिक्रिया नहीं होगी। इसी प्रकार पानी और लोहे के गोले को एक सी ही डिग्री पर गर्म करके मिलाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी। इसमें प्रत्यक्ष प्रक्रिया तब होगी जब पानी ठण्डा और लोहे का गोला गर्म हो।

इस प्रकार रति के समय स्त्री-पुरुष दोनों के गर्म तार हों तो गर्भ स्थित नहीं होगा और न ही दोनों के ठण्डे तार होने पर गर्भ स्थित होगा। गर्भ स्थित तभी हो सकेगा जब एक का गर्म तार हो और दूसरे का ठण्डा।

वेद में कहा है:-

गन्धर्वो अस्वप्या च योषा सानौ।

नाभिः परम जाभि तन्नी॥

अथर्ववेद १८/१/४ ऋग्वेद १०/१०/४

गन्धर्व अर्थात् पुरुष जलीय परमाणुओं से युक्त हो और स्त्री भी जलमयी हो अर्थात् स्त्री और पुरुष अग्नि और जल के स्वभाव से युक्त न होकर दोनों एक ही प्रकृति के हों तो वही हम दोनों में बड़ा दोष है जो सन्तान उत्पन्न होने में बाधक है।

अब यह प्रश्न उठता है कि मनुष्य शरीर में गर्म और ठण्डा तार क्या है। शरीर में गर्म और ठण्डा तार नासिका स्वर हैं। नासिका के दायें स्वर चलने को गर्म तार कहते हैं और नासिका के बायें स्वर चलने को ठण्डा तार कहते हैं। रति समय स्त्री-पुरुष दोनों के दायें स्वर चलते हैं तो गर्भ स्थित नहीं होगा। इसी प्रकार रति समय दोनों के बायें स्वर चलते हैं तो भी गर्भ स्थित नहीं होगा गर्भ स्थित उसी अवस्था में होगा, जब रति समय एक का बायाँ और दूसरे का दायाँ स्वर चल रहा हो। आप कहेंगे कि स्त्री-पुरुष दोनों ही प्राकृतिक रूप से गर्म और ठण्डे तार हैं, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक और पुरुषों में घनात्मक विद्युत शक्ति

इच्छानुसार सन्तान

२०७

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

कुछ अनुभव

होता है। वह तो स्वतः गर्म और ठण्डे तार हैं? फिर यह एक और गर्म ठण्डे तार का फारमूला बीच में कहीं से आ गया।

प्रिय पाठकों! आपका यह विचार सत्य है। लौकिक व्यवहार में ऐसा ही दीख पड़ता है। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो प्रत्येक शरीर में ऋणात्मक और धनात्मक विद्युत धारायें कार्य कर रही हैं। यहीं पर स्त्रियों के ऋणात्मक तथा पुरुषों के धनात्मक विद्युत का केवल इसी प्रकार का सम्बन्ध है जिस प्रकार बिजली का प्रकाश आगे बढ़ाने के लिये वालसाकिट और प्लक होता है। यदि दोनों को सही और सीधा मिलाया जाय तो प्रकाश होता है और उल्टा विपरीत मिलाने पर प्रकाश नहीं होता। इसी प्रकार हम स्त्री को वाल साकिट और पुरुष को प्लक कह सकते हैं। वालसाकिट रूपी स्त्री में प्लक रूपी पुरुष का सही मिलन होने पर जो प्रकाश उत्पन्न होता है वह सन्तान होती है। एक का बायीं नासिका स्वर और दूसरे का दायीं नासिका स्वर चल रहा हो तो सन्तान रूपी प्रकाश होगा। इन दोनों के विपरीत मिलन होने पर अर्थात् दोनों के दायें या बायें नासिका स्वर (दोनों के समान स्वर) चल रहे हों तो सन्तान रूपी प्रकाश नहीं होगा।

क्रिया-स्त्री-पुरुष दोनों के नासिका स्वर एक समान हों अर्थात् दोनों की नाक के दायें नथने से श्वास आती जाती हो अथवा दोनों की नाक के बायें नथने से श्वास आती जाती हो तो ऐसी अवस्था में रति करने पर कदापि गर्भ स्थित नहीं होगा।

द्वितीय साधन-रजोऽदर्शन के समय गर्भाशय का मुख खुलता है। प्रथम के तीन दिन रजः श्राव होने के फलस्वरूप रति के लिये निषिद्ध हैं। इसके पश्चात् शनैः-शनैः गर्भाशय का मुख सिकुड़ने लगता है जो १६ दिन के पश्चात् बन्द हो जाता है। प्रथम के १४ दिन पूर्ण रूपेण अरक्षित हैं, इन दिनों में शत-प्रतिशत गर्भ स्थापित हो सकता है। इसके पश्चात् १५, १६ रात्रियों में ५०

इच्छानुसार सन्तान

२०८

चैरिन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

प्रतिशत गर्भ स्थापित होने की सम्भावना रहती है। १७, १८, १९ रात्रियों में २० प्रतिशत गर्भ स्थापित होने की सम्भावना रहती है। २०, २१, २२, २३, २४ रात्रियाँ पूर्ण रूपेण सुरक्षित हैं इन रात्रियों में कदापि गर्भ स्थापित नहीं होगा। इसके पश्चात् के समय में १५ प्रतिशत गर्भ स्थापित होने की सम्भावना रहती है। उपरोक्त समस्त दिनों की गणना का प्रथम दिन रजः स्नाव के समय से ही समझना चाहिये, उसके २४ घन्टे पश्चात् दूसरा दिन होता है। इसी क्रम से गणना करें। इस विषय को "सीमित परिवार" नामक पुस्तक में विस्तार पूर्वक लिखा है।


इच्छानुसार सन्तान

२०९

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

कुछ अनुभव

  1. १-भोजन पाने के पश्चात् लघुशंका को जाना चाहिए।
  2. २-लघुशंका के पश्चात् तत्काल ही जल पीने से, दूध के पश्चात् जल पीने से तथा रात्रि को जल्दी-जल्दी जल पीने से नजला जुकाम तथा सिर दर्द हो जाता है।
  3. ३-दूध खड़े होकर और जल बैठकर पीना चाहिए।
  4. ४-पैर गरम, पेट नरम, सिर ठण्डा तिस पर वैद्य आये तो दे डण्डा।
  5. ५-रात्रि को सोते समय पैरों के तलबों को सरसों या तिल का तेल मलने से नजला, जुकाम, सिर का चकराना और खुश्की दूर होती है।
  6. ६-भोजन पाने के पश्चात् स्नान करने से मन्दगति उत्पन्न होती है।
  7. ७-गरम तथा ठण्डा जल मिलाकर प्रयोग न करें।
  8. ८-एक बार अग्नि पर पकी हुई वस्तु को दोबारा अग्नि पर गर्म नहीं करना चाहिए। दोबारा गर्म करने से विष सद्दृश हो जाता है।
  9. ९-रात्रि में सोकर उठने पर यदि जल पीने की इच्छा हो तो दीत मीचकर हल्के-हल्के जल पीना चाहिए।
  10. १०-हर वर्ष होली के दिनों में आम का मौल पीस कर सारे शरीर को मल कर ३, ४ मिनट बाद स्नान करें, तो भयंकर लू भी नहीं सताती और लगभग ५ - ६ मास तक किसी विषैले जन्तु के काटे का असर भी नहीं होता।
  11. ११-प्रत्येक विवाहित को उचित है कि प्रत्येक वर्ष शरद ऋतु में कम से कम ४० दिन तक किसी न किसी बाजीकरण (पौष्टिक) पदार्थ का अवश्य सेवन किया करें। ऐसा करने से वृद्धवस्था में शारीरिक कष्ट अधिक नहीं सताते और शरीर

इच्छानुसार सन्तान

२१०

वीरेन्द्र गुप्त

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

भी स्वस्थ रहता है।

१२-वृद्धावस्था में भोजन की मात्रा भूलकर भी कम नहीं करनी चाहिए और ना ही भूखे रहना उचित है। क्योंकि वृद्धावस्था में आई हुई निर्बलता पुनः वापिस नहीं आती। युवाकाल में तो शरीर के सभी यन्त्र दृढ़ होते हैं और भोजन की कमी को कभी भी पूरा कर लेते हैं। परन्तु वृद्धावस्था में तो शरीर यन्त्र भी निर्बल हो जाते हैं इस कारण वह आई हुई निर्बलता को पूर्ण नहीं कर पाते।

१३-१ तोला अर्क गुलाब १ तोला अर्क वेद-मृशक। दोनों को एक चौंटी के पात्र में रखकर उसमें ४० नग हरी किशमिश रात्रि को डालकर खुली हवा में कपड़े से ढक कर रख दें। प्रातः मुख प्रक्षालन करके सुई की नोक से एक-एक किशमिश उठा-उठाकर खा लें और ऊपर से सारा अर्क पी लें ऐसा करने से हृदय के अनेक रोग दूर होकर दृढ़ता मिलती है।

१४-पीपल के पत्तों का अर्क भपारे से निकाला हुआ १ तोला प्रातः १ तोला सायं लेने से हृदय की दुर्बलता को नष्ट करता है।

१५-अर्जुन की छाल का चूर्ण ३ माशा दूध से लेने पर हृदय को बल मिलता है।

१६-बादाम की मींग छिली हुई ५ नग पीस कर १ तोला मक्खन में मिलाकर खाने से मस्तिष्क को बल मिलता है।

१७-ब्रह्मी, स्वरस १ तोला में मधु-मिलाकर पीने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

१८-ब्रह्मी, मुण्डी और शंख पुष्पी का समान भाग चूर्ण ४ माशा दूध से लेने पर मेधा शक्ति बढ़ती है।

१९-एक पाव ब्रह्मी तेल या धुली तिली का तेल एक छंटाक कास्ट्रायल मिलाकर स्नान करने से एक घण्टा पूर्व या रात्रि

इच्छानुसार सन्तान

२११

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

को सोते समय सिर पर मलने से सिर के बाल गिरने से रुक जाते हैं और मजबूत हो जाते हैं।

२०-सौफ एक तोला, गुलाब पुष्प ॥ तोला, मिश्री २ तोला का चूर्ण ३ माशा नित्य सेवन करने से नेत्र ज्योति बढ़ाता है।

२१-त्रिफले के जल से नेत्र धोने पर ज्योति बढ़ती है।

२२-शुद्ध बादाम का तेल सप्ताह में दो बार कान में डालना चाहिए।

२३-तोमड़ के बीज ४ तोला, हल्दी पिसी १ तोला, काली मिर्च २ तोला, फिटकरी की खील १ तोला, नमक १ तोला सबको कूटकर मंजन बना लें दांतों के लिए उत्तम है।

२४-काली मिर्च १ तोला, मिश्री २ तोला कूटकर चूर्ण कर लें इसे मुख में डालने से बैठा कंठ ठीक हो जाता है।

२५-बारी रत्न चूर्ण- सौंठ १ तोला, शतावर १ तोला, असगंध नगीरी १ तोला, अजवायन देसी १ तोला, मिश्री ४ तोला, सबको बारीक कूटकर रख लें मात्रा, ४ माशा नो दूध से दोनों समय। लाभ स्त्रियों के रजः और गर्भाशय सम्बन्धी समस्त रोगों को दूर करता है। प्रभव के पश्चात् २ मास तक सेवन करने से शरीर पुष्ट और निरोगी होता है और दूध अधिक उत्तरता है।

२६-शीशम के हरे पत्ते २ तोले, मिट्टी के पात्र में एक छटांक मल करके उसमें रात्रि को भिगो दें। प्रातः पत्तों को मसल कर उसका जल छान कर एक तोला निकाल लें उसमें थोड़ा मीठा मिलाकर देने से स्त्रियों का प्रदर रोग ठीक होता है।

२७-सुपारी पाक- दक्षिणी सुपारी चिकनी १० तोला को बारीक कूटकर २ सेर गाय के दूध में डालकर मन्द-मन्द आग पर ही पकायें जब सारा दूध सूख जाय तो उसमें छोटी माई, बड़ी माई, कमरकस ५-५ तोला, मिश्री १० तोला इनको बारीक कूटकर उपरोक्त पाक में मिला दें। मात्रा ६ माशा प्रातः, ६ माशा

इच्छानुसार सन्तान

२१२

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

सायं ऊष्ण दूध से स्त्री को देने से प्रदर कमर दर्द, गर्भ स्थित न होना आदि रोगों को दूर कर स्त्री स्वस्थ और सुन्दर बनती है। २८-२ तोला सफेद सुर्मे की डली लेकर अनि में गर्भ करके आधा पाव अर्क गुलाब में बुझाओ तथा बार बार सुर्मे को गर्भ करके बुझाते रहो यही तक बुझाओ कि सारा अर्क समाप्त हो जाय फिर उस सुर्मे को खरल में घोटकर रख लो। एक माशा प्रातः, एक माशा सायं मक्खन या मलाई में देने से प्रदर रोग ठीक होता है।

२९-श्याम तुलसी का १ पत्ता साबुत निगल लें और नित्य एक पत्ता बढ़ाते जायें। ४०वें दिन ४० पत्ते निगल कर अगले दिन से एक पत्ता घटाते जायें। यह श्याम तुलसी का ८० दिन का कल्प है। इससे शरीर रोग रहित होकर पुष्ट होता है, बल, वीर्य बढ़ता है। ध्यान रहे तुलसी पत्र को दौतों से नहीं चबाना चाहिए, क्योंकि इसमें पारद होता है और पारद दौतों को हिला देता है। इसलिये सम्भव है तुलसी पत्र दौत से चबाने पर दौत हिल जायें।

३०-जलजमनी के सूखे पत्ते १ पाव, हर छोटी घी की भुनी १छटीक, मिश्री ५ छटीक सबका चूर्ण कर लें। ८ माशा प्रातः, ८ माशा सायं दूध से लेने पर स्वप्न दोष, निर्बलता, शीघ्र पतन आदि को दूर करता है।

३१-बानरी गुटक- १ पाव काँच के बीजों को काटकर छिलका अलग करके कूटें। १ सेर गाय के दूध में डालकर पकायें जब पकते-पकते हलुआ जैसा हो जाय तो उतार कर बड़े बेर की बराबर गोली बना लें इन गोलियों को गाय के घी में तल कर आधा सेर चीनी की चासनी में डालते जायें। जब चीनी चढ़ जाये तो गोलियाँ निकाल कर किसी चीनी या शीशे के पात्र में रख लें और उसमें ऊपर तक असली मधु भर दें। प्रातः सायं बल के अनुसार सेवन करें। इसके सेवन से वीर्य के समस्त दोष दूर होकर प्राकृतिक सन्तन्मन होता है।

इच्छानुसार सन्तान २१३ वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

३२-अश्वघ (पीपल) के पके फलों को छाया में सुखाकर चूर्ण कर लें। समान भाग मिश्री मिलकर ३ माशा प्रातः, सायं, दूध से लें तो वीर्य पुष्ट हो तथा हृदय की निर्बलता को भी दूर करता है।

३३-सालब मिश्री पंजे वाली १ तोला, सफेद मूसली १ तोला, दोनों को बारीक कूट लें। इसमें १ तोला तुखेरिहॉ सफ करके साबुत ही मिला दें। इसमें से ६ माशा लेकर एक पाव दूध में घोल कर अग्नि पर पकायें। दो उबाल आने पर नीचे उतार लें और मीठा डालकर सेवन करें। इससे वीर्य गाढ़ा होकर सन्तान को जन्म देने की शक्ति वाला हो जाता है। शरद ऋतु में ७ नग बादाम की गिरी और पीसकर मिला लें। ३४-१ पाव चुने को ४ सेर जल में मिलाकर मिट्टी के पात्र में रखें। २४ घण्टे में ४, ५ बार लकड़ी से चला दें। बाद में नितार कर साफ जल निकाल लें।

उपरोक्त चूने का साफ जल २सेर, बायबिडुंग १ छटीक, भारगी १ छटीक, सौफ २ तोला, कासनी २ तोला, दूधिया बघ २ तोला, जायफल २ तोला, अतीस २ तोला। सबको २४ घण्टे भिगोकर पकाएँ चौथाई जल रहने पर छान लें और ३ छटीक चीनी डालकर शर्बत बनालें। यह बच्चों को जल में या दूध में घोलकर देने से बच्चों के हरे पीले दस्त, दूध डालना आदि सभी रोगों को नष्ट करके बच्चों को हृष्ट-पुष्ट करता है।

३५-सुहागा चौकिया की खील १ तोला, नौसादर देसी ॥ तोला, काली मिर्च ॥ तोला, सब का चूर्ण बना लें। यह चूर्ण बच्चों के जिगर, तिल्ली, अपच, अफारा आदि रोगों में लाभदायक है। बड़े व्यक्तियों को भी लाभप्रद है।

३६-चूने का जल ४ माशा बच्चों को देने से, बच्चों की हड्डी आदि दृढ़ होती है। एक छटीक चूने को १॥ सेर जल में

इच्छानुसार सन्तान

२१४

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

भिगो दें। ३, ४ बार चला दें जल टिक जाने पर नितार लें। फिर ४-५ बार कपड़े में छान कर साफ कर लें। यही चुने का जल है।

३७-सोये का अर्क भपारे से निकाला हुआ ॥ तोला दोनों समय बच्चों को देने से बच्चों के सामान्य समस्त रोगों को नष्ट करके स्वस्थ करता है।

३८-पुष्प नक्षत्र में शंख पुष्पी को उखाड़ कर छाया में सुखा लें। यह शंख पुष्पी १ तोला, सत गिलोय ३ माशा, दोनों को मिलाकर कूट छान कर चूर्ण कर लें। यह चूर्ण २ से ४ रंती तक बच्चों को ४ वर्ष की आयु से देना चाहिए।

लाभः- इसके सेवन से बच्चों की बुद्धि स्थिर होकर पढ़ने में रुचि होती है और कण्ठस्थ करने की शक्ति बढ़ती है।

३९-१ रंती स्वर्ण भस्म, ३माशा बंसलोचन अलसी में मिलाकर खरल कर लें। इसकी २० पुड़िया बना लें, एक पुड़िया नित्य मधु, मक्खन या मलाई से २० दिन बराबर दें। बचपन में प्रति वर्ष शरद ऋतु में बच्चों को सेवन करा दिया जावे तो उसकी रोग निरोधक शक्ति बढ़ती है और कोई मर्याकर रोग सहसा आक्रमण नहीं करता। बल बुद्धि को बढ़ाता है।

४०-१ तोला काली मिर्च, २ तोला जीरा भुना हुआ, ३ तोला नौसादर देशी, ३ तोला सेंधा नमक, १॥ माशा हाँग भुनी हुई, ३ माशा टाटरी। सबको कूट कर चूर्ण कर लें। यह स्वादिष्ट और हाजिम है।

४१-हर छोटी, बड़ी इलायची के दाने, तुम्बोरिहों, सौफ, धनियाँ, समान भाग लेकर हल्का-हल्का अग्नि पर भून लें। दरदरा कूट कर सबको बराबर बूरा मिला लें। दिन में चार बार ८-८ माशा जल से दें। इससे आँख, खून के दस्त ठीक होकर पेट ठीक हो जाता है।

इच्छानुसार सन्तान

२१५

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

४२-जामुन की गुठली १ तोला, सौठ १ तोला, गुडमार बूँटी २ तोला, सबका बारीक घूर्ण करके कुहमार पाठा के गूदे में घोटकर बेर की बराबर गोली बनाकर छाया में सुखा लो। १ गोली प्रातः १ सायं गौ दूध में शहद मिला कर लेने से मधुमेह (शकर) रोग के लिये उत्तम है।

४३-प्रायः बच्चों को सुखा रोग हो जाता है। यह रोग एक बच्चे से दूसरे बच्चे को भी लग जाता है। इसके लिये निम्नलिखित तेल का मरदन करना उत्तम है।

शुद्ध सरसों का तेल आधा सेर, आँगा जिसे कुत्ता या अपामार्ग कहते हैं लम्बी शाख वाली जिस पर चावल से लगे होते हैं। उसकी जड़ २ तोला, सिन्दूर असली ४ रत्ती। इन सबको लोहे की कढ़ाई में डालकर रविवार या मंगलवार के दिन तेज धूप में मन्द-मन्द अग्नि पर पकायें। ध्यान रहे पकते समय किसी की छाया न पड़े। जब सब जलकर काला हो जाये तो ठण्डा कर छान लें। और शीशी में भर कर रख लें। तेल तैयार हो गया।

प्रयोग विधिः- यह तेल पहले बच्चे के कान के पीछे मलें, बाद में हाथ की हथेली पर, पैर के तलबे पर, सिर के काग पर, रीढ़ की हड्डी पर मलने के पश्चात् सारे शरीर पर हल्के-हल्के मलें। शरद् ऋतु में धूप में बैठ कर मलें और ग्रीष्म में छाया में मलें। इस क्रम से नित्य तेल मरदन से एक मास में ही बच्चा स्वस्थ होने लगेगा।

४४-गाय का ताजा गोबर लगभग २ तोले बच्चे की कमर पर मलने से कुछ देर पश्चात् बच्चे की कमर पर बारीक-बारीक काले रंग के कीटाणु निकल आर्येंगे इन्हें स्पीट के फोहे से शीघ्रता से साफ कर देना चाहिए। यही सुखा रोग के कीटाणु होते हैं। ध्यान रहे यह कीट किसी अन्य बच्चे को न लग जायें अन्यथा उसे भी सुखा रोग लग जायगा। पीठ पर नित्य

इच्छानुसार सन्तान

२१६

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

गोबर मलते रहें। जब तक कौट निकलने बन्द न हो जायें।

४५-स्वादिष्टि, पाचक, रेचक और दीपक चूर्ण- ३ ग्राम हींग भुनी, ४० ग्राम जौरा भुना, ४० ग्राम अनारदाना, १० ग्राम काली मिर्च, १० ग्राम सनाय, २० ग्राम नौसादर हाँडी का, १० ग्राम काला नमक, १० ग्राम छोटी हर, १० ग्राम साँठ, १० ग्राम पीपल छोटी, १० ग्राम चव, १० ग्राम चौते की छाल, १० ग्राम साँफ, १० ग्राम सैन कचरी, १० ग्राम तेजपात। कूट कर चूर्ण बना लें। सेवन करें।

४६-वात नाशक- साँठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, चव, चौते की छाल, सैनकचरी सब को समान भाग लेकर कूट लें। दाल, शाक, सब्जी आदि में डालकर सेवन करें वात नाशक है।

४७-ठण्ड के लिये- ५ ग्राम जायफल, १० ग्राम जावित्री, २५ ग्राम दारचीनी, २० ग्राम लौंग, २५ ग्राम हरी इलायची, सबको कूट लें २ से ४ रस्ती तक दाल, शाक, सब्जी में डालकर सेवन करें ठण्ड के विकार को दूर करेगा। उत्तम है।

४८-अग्नि मुख रस- शुद्ध वत्सनाभ (सिंगया) १ ग्राम, शुद्ध सिंगरफ २ ग्राम, केशर ४ ग्राम, लौंग ८ ग्राम। सबको बारीक करके देसी पान के रस की सात भावना देकर मूंग के दाने की बराबर गोलियाँ बना लें। एक या दो गोली दूध से, वात कफ नाशक और वीर्य वर्धक है।

४९-आधा शीश दर्द पर- एक रीठे को मुख पर से काट कर गोली निकाल दें। रात्रि को खाली रीठे में पानी भरकर रख दें, प्रातः काल रीठे को पानी की दो, चार बूँदें नाक के उस नथने में डालें जिधर सर में दर्द है। यदि दर्द शेष रहे तो अगले दिन फिर नया रीठा लेकर प्रयोग करें तीन चार दिन में पूर्ण आराम हो जायगा।

५०-बबासीर के मस्तों पर- शौच के लिए ले जाने वाले पानी में डिटोल की दो बूँदें डालकर मल विसर्जन के पश्चात् गुदा

इच्छानुसार सन्तान

२१७

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

को इसी पानी से साफ करें, इस प्रकार ३ या ४ मास में अर्श के मत्से अपने आप सूख कर नष्ट हो जाते हैं। गुदा पर खुरकी मालूम हो तो जूरा-सा देसी घी लगा दें।

५१-नेत्र रोगों पर- २५० ग्राम शुद्ध गुलाब जल, १० ग्राम गुलाबी फिटकरी, २ ग्राम हरी इलायची के दाने कूटकर, २०० मिलीग्राम तूतिया, सबको मिलाकर पक्की शीशे में बन्द करके २० दिन रखा रहने दें। दिन में दोबार हिला दिया करें २० दिन पश्चात् छान कर रख लें नित्य नेत्रों में एक-एक बूँद डालें। नेत्रों के सभी रोगों को दूर करके रोशनी बढ़ाता है, मोतियाबिन्द पर भी लाभ करता है।

५२-नेत्र मणि- मकोय सूखी २५० ग्राम, दारु हल्दी २५० ग्राम, गुलाब के फूल की सूखी पत्तियाँ ५० ग्राम, भीम सैनी कपूर ५ ग्राम, मिश्री ५० ग्राम, शहद २५ ग्राम, पानी ४ लीटर।

विधि- दारुहल्दी की लकड़ी को बारीक कूट लें, मकोय, गुलाब के फूल की पत्तियाँ इनको पानी से धोकर साफ करलें बाद में पीतल के पात्र में ४ लीटर पानी डाल कर उसमें भिगो दें १२ घन्टे के पश्चात् मंद-मंद आग पर पकायें, जब पानी एक लीटर शेष रह जाय तो उतारकर ठण्डा करके छान लें। तौबे के पात्र में उक्त पके पानी को डालकर उसमें मिश्री डाल दें और फिर आग पर पकने रख दें जब शहद की तरह गाढ़ा हो जाय तो उतार कर रखें, शहद में भीम सैनी कपूर डालकर खरल में खूब घोटें जब कपूर का दाना न रहे तो पके हुए पदार्थ को डालकर फिर घोटें तैयार होने पर शीशे में भरकर रख लें।

प्रयोग- इसे नित्य रात्रि में संलाई के साथ आँखों में लगाने से आँखों के सभी रोग दूर होते हैं, रोशनी बढ़ती है।

५३-दीर्ता के लिये- ३० ग्राम पोस्त डोडा, १० ग्राम छाल कीकड़, ५ ग्राम नमक, ५ ग्राम फिटकरी, १ सेर पानी में

इच्छानुसार सन्तान

२१८

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

डालकर पकायें जब १ भाग जलकर तीन भाग शेष रह जाय तो उतार कर रख लें, इससे कुल्ले करें दंतों के दर्द आदि पर लाभ करेगा।

५४-पनीर (तुखें हयात) १० ग्राम को १०० ग्राम पानी में रात को कौंच के पात्र में भिगो दें, प्रातः काल मलछान कर हल्का गर्म करके १० ग्राम शुद्ध देशी घी मिलाकर पी लें इसके सेवन से तीन मास तक दंतों में कोई विकार न होगा। और न फोड़ा फुन्सी निकलेगा, पायरिया में भी लाभ देता है। इसे तीन मास का दंतों के लिए बीमा समझिये।

५५-वीर्य शोधक एवं शक्ति वर्धक- बबूल की कच्ची बिना बीज वाली फली, बबूल की कोपलें, बबूल का गोद तीनों को समान मात्रा में लेकर कूट लें सबके समान मिश्री मिला लें ५ ग्राम प्रातः सारय दूध से लें।

५६-नजला जुकाम- मुण्डी, तोमर के बीज, सौंफ २१।, २१। ग्राम एक पाव जल में डालकर पकायें छान कर पीने से नजला नष्ट होता है।

५७-टिकिया चूर, नरकचूर, काली मिर्च, काला नमक संगम मांझा में सबको कूट कर चूर्ण बना लें भोजन के बाद २१। ग्राम ताजे जल से लें नजला समाप्त हो जायगा।

५८-स्मृति के लिये- बालछड़, ब्राह्मी, शंख पुष्पी, दूधियावच समान मात्रा में चूर्ण बना लें २१। ग्राम दूध से दें।

५९-पेट अफारा पर- कलमी शोरा, नौसादर हाँडी का, काली मिर्च सौदा नमक समान भाग लेकर चूर्ण बनालें। भोजन के बाद १ ग्राम लें।

६०-हर प्रकार की खाँसी के लिये अति उत्तम- छोटी इलायची के दाने ५ ग्राम, तेजपात ५ ग्राम या दालचीनी, ५ ग्राम छोटी पीपल, २० ग्राम मुलेठी, ४० ग्राम मिश्री, ४० ग्राम छुआरा गुठली निकाल कर, ४० ग्राम मुनक्का बीज निकालकर,

इच्छानुसार सन्तान

२१९

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

सबको बारीक कूटकर शहद मिलाकर २, २ रस्ती की गोलियाँ बना लें। १, २ गोली मुख में डालकर चूँसे दिन में ४ बार। खाँसी, कण्ठ बैठ जाना आदि पर उत्तम है। इसे एहलादि वटी कहते हैं।

६१-जिगर के प्रत्येक उपद्रव पर अति उत्तम प्रयोग- देसी पीली हर गुठली रहित, काली हर गुठली रहित, काली हर, नरकचूर, बायबिङग, सौठ, काली मिर्च, चौकिया सुहागे की खील, नौसादर देसी हाँडों का, काला नमक, सागर (साम्पर) नमक, सँदा (लाहौरी) नमक। सब को समान भाग लेकर बारीक कूटकर रख लें, आयु के अनुसार, कम अधिक मात्रा बनाकर भोजन के पश्चात् दोनों समय सेवन करें।

६२-खुनाक टौंसिल पर- गाजवीं २।। ग्राम को १०० ग्राम पानी में शीशे के पात्र में रात को भिगो दें प्रातः एक उबाल देकर छानकर पान करें। इससे जुकाम भी ठीक हो जाता है।

६३-जल जाने पर उपचार- तत्काल धीगवार का गुदा मलने से छाले नहीं पड़ते। गाय का ताजा गोबर भी मलने से लाभ होता है। कबीला, कपूर- देसी, जस्त फूला, मुर्दासींग सबको बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीसकर कपड़छन करलें, चमेली या तिल के तेल में मिलाकर लगाने से तत्काल ठण्डक पड़ती है और विषांश निकलने लगता है यदि खुरन्ट को न छुटाया गया तो जले के चिन्ह भी नहीं रहते और खुरन्ट अपने आप उतर जायगा।

६४-सफेद दाग- १ किलो बापची, २०० ग्राम मेथी, १०० ग्राम हल्दी। सबको बारीक कूट कर चूर्ण बना लें। बापची में तेल होता है इस कारण आग पर गर्म करके भी कूट सकते हैं। जब चूर्ण तैयार हो जाये तो इसमें से ५ ग्राम लेकर, २०० ग्राम पानी में रात को भिगो दें प्रातः काल छान कर पी लें, इसी प्रकार प्रातः काल को भिगो कर रात्रि को पी लें। एक

इच्छानुसार सन्तान

२२०

वीरेन्द्र गुप्त

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

वर्ष तक प्रयोग करें। सफेद दाग दूर हो जाते हैं।

६५-गठिया के दर्द पर तेल- ३०० ग्राम सरसों के तेल में एक नग नागफली के पत्ते को काट कर छोटे छोटे टुकड़े करके तेल में डालकर आग पर पकायें, जब पत्ता जल जाये तो नीचे उतार कर ठण्डा करके छान लें फिर उसमें १ ग्राम अफीम डालकर घोट लें तेल तैयार है। इस तेल को धूप में बैठकर दर्द वाली जगहों पर मलें। सावधानी मलने वाला अपने हाथ पानी से एक घण्टे बाद धोकर कपड़े से साफ कर लें। रोगी को तेल मलने के ३ घण्टे बाद ही पानी लगाने दें।

६६-खौसी- बहेड़ा २० ग्राम, कल्या १० ग्राम, लौंग ५ ग्राम, सबको बारीक कूटकर शहद या पानी डालकर चूने बराबर गोलियाँ बनालें। मूँह में डालकर चूसने से खौसी ठीक होती है।

६७-मासिक धर्म की अधिकता पर- खून खराबा ५ ग्राम, नागकेशर १० ग्राम दोनों को बारीक कूटकर १० पुच्छियाँ बना लें तीन दिन तक ताजे जल से प्रातः सायं, व बाद में एक मात्रा प्रातः काल दें।

६८-मधुमेह- तुलसी, जामुन, बेल, नीम, आम की सूखी पत्तियाँ समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें नित्य दिन में २ बार ३-३ ग्राम जल से लें।

६९-कल्याण अवलेह- हल्दी, बचदूधिया, कूट मीठा, पीपल छोटी, साँठ, काला जीरा, अजवायन, मुलेठी, सेंधा नमक। सबको समान मात्रा में लेकर बारीक कूट लें, गाय का घी मिलाकर १-१ माहो की गोलियाँ बना लें। १ से २ गोली तक दूध से सेवन करें। स्मृति और कण्ठ की मधुरता के लिये यह उपयोगी है।

७०-वासना को कम करने के लिये- शीम सेनी काफूर, सुहागे की खोल समान मात्रा में लेकर पान के साथ सेवन करने से वासना में कमी आती है।

इच्छानुसार सन्तान

२२१

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri