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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

होती है। भूमि तो उस बीज को जैसा उसमें बोया गया है उसे अपनी शक्ति से पोषण करती हुई उसी रूप में उत्पन्न कर देती है।

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जनक और जननी

ईश्वर, जीव और प्रकृति, यह तीनों अनादि हैं। इनका कभी नाश नहीं होता और न इनकी किसी ने रचना की है। यह सदा से अनादि हैं।

मृत्यु के पश्चात् जीव अन्तरिक्ष में चला जाता है। वायु द्वारा जीव मेघों में आकर जल वृष्टि द्वारा भूमि पर आता है। उस जल से अन्न में पहुँच कर भोजन द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर वीर्य में पहुँच जाता है।

जनक पिता को कहते हैं। क्योंकि जीव पहले पिता के वीर्य में पहुँच कर पोषित होता है। जननी माता का नाम है। जब पुरुष भोग द्वारा अपना वीर्य स्त्री के गर्भाशय में गिराता है तभी तो गर्भ स्थित होता है। तब वह जीव स्त्री के गर्भाशय में विकास को पाता हुआ समय आने पर बाहर आता है।

पुरुष हवा अयमादितो गर्भो भवति यदेतद्वेतः। तदेतत् सर्वैर्व्योडङ्ग स्युस्तेजः संभूतमात्मन्येवात्मानं विमर्ति तदा यदा स्त्रियां सिञ्च्यत्यथैनञ् जनयति तदस्य प्रथमं जन्म।

ऐतरेय उपनिषद् अ- २

अर्थ- वीर्य पुरुष के शरीर में पहला गर्भ होता है। यह समस्त शरीर का सार होता है। जब यह स्त्री के गर्भाशय में भेज दिया जाता है। तब इसका जन्म होता है।

तमागतं पृच्छति कोसीति। तं प्रतिब्रू यादविचक्षणा दूतवोरेत आभूत पंचदशान् प्रसूतात् पित्र्यावतसूतन् मा पुंसि कर्तरी एयाध्वं पुंसा कर्त्रा मातरिमा निषिञ्च सजाय उपजायमानो

इच्छानुसार सन्तान

८९

वीरेन्द्र गुप्तः

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द्वारशत्रयोदशोपमासे द्वारशत्रयोदशेन पित्रासं तद्विदिदेशुं प्रति तद्विदिदेशुं तन्मन्त्रतवोऽमुत्थव आमरध्व तेन सत्येन तेन तपसा ऋतु रसिम् आर्तवोऽरिम्।

काँचीतकी ब्राह्मणोपनिषद् अ १

अर्थ- जब ब्रह्मचार्यो आता है तो आचार्य पृष्ठता है 'तु कौन है?' ब्रह्मचार्यो उत्तर देता है 'शुक्ल और कृष्ण पक्षों के शासक चन्द्रमा से बीज एकत्र किया गया था जो प्रतिदिन के यज्ञ ने उत्पन्न हुआ था। यह यज्ञ देवों के द्वारा पुरुष में प्रविष्ट हुआ और उस पुरुष ने उसे स्त्री में प्रविष्ट किया उसी स्त्री से मेरा नाशवान् शरीर उत्पन्न हुआ है।'

'वह (जीव) पूर्व शरीर को छोड़ के वायु के साथ रहता है, पुनः जल औषधि वा प्राण आदि में प्रवेश करके वीर्य में प्रवेश करता है, तदनन्तर योनि अर्थात् गर्भाशय में स्थिर हो के पुनः जन्म लेता है।'

ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका पुनर्जन्म अथवा हम पीछे लिख आये हैं कि भूमि की अपेक्षा बीज को महता अधिक है और भोजन से वीर्य किस प्रकार बनता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि अच्छी सन्तान प्राप्ति के लिए पहले माता-पिता को डेढ़ मास पूर्व से ही जिस प्रकार के बच्चे को जन्म देना हो उसी प्रकार के वातावरण भोजन, दिनचर्या आदि को अपने व्यवहार में लाना प्रारम्भ कर दें। जिससे पुरुष के वीर्य में जो जीव है उसके संस्कार बनने प्रारम्भ हो जायें तथा पुष्ट भी होता रहे, क्योंकि हर वस्तु पर मन भावना तथा व्यवहार का तत्काल प्रभाव पड़ता है। साथ में जब तक भूमि भी पहले से जीत कर पटला आदि से तैयार नहीं कर ली जाती तब तक बीज को बीया नहीं जाता। इसी प्रकार स्त्री का रजः भी पुष्ट होकर अनुकूल भावना से संस्कृत हो जाय। क्योंकि बीज अपने पल्लवित काल में भूमि के प्रभाव से रचित नहीं रह पाता।

उच्छा-उत्तरा-सूक्तानि

१०

वीरेन्द्र गन्तः

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जब बीज और भूमि अर्थात् स्त्री और पुरुष दोनों के रजः और वीर्य समान पुष्ट होते हैं तभी श्रेष्ठ सन्तान की उत्पत्ति होती है और जिस वीर्य में सन्तानोत्पादक कीट अर्थात् जीव नहीं होता उस वीर्य से गर्भाधान नहीं हो सकता या वीर्य में जीव भी हो परन्तु वीर्य पुष्ट न हो या स्त्री का रजः पुष्ट न हो तो भी गर्भ नहीं रहेगा। इसीलिए रजः और वीर्य का पुष्ट होना तथा वीर्य में जीव का होना ही उत्तम गर्भाधान के लक्षण हैं।

आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा।

स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥

छांदोग्य उपनिषद् ७/२५/२

अर्थ- जब मनुष्य का आहार शुद्ध हो जाता है, तो स्मृति अटल हो जाती है और जब स्मृति पक्की हो जाती है, तब सारी गाँठें खुल जाती हैं।

दीपो भक्षयति ध्योतं कज्जलं च प्रसूयते।

यदनन् भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥

चारुण्य नीति ८/३

अर्थ- दीपक अन्धकार को खाता है, और काजल को उत्पन्न करता है। मनुष्य जैसा अन्न नित्य खाता है, वैसी ही उसकी सन्तान होती है।

स यामिच्छेत्कांमयेत मेति तस्यामर्थ निष्ठाय

मुखेन मुखध्वं सधायापस्थमस्या अभिमृशप

जपेदङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादिधियासे।

सत्त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्धिविद्वमिव मादयेभामम्॥

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/९

अर्थ- हमारे अंग-अंग तथा हृदय की नाड़ी-नाड़ी से वीर्य रूपी रस उत्पन्न होता है इसलिए इसको सन्तानोत्पत्ति के उपयोग में ही लाना चाहिए व्यर्थ नष्ट करना उचित नहीं, इसलिए तुम शुभ संकल्प से उत्तम सन्तान का ध्यान करो।

इच्छानुसार सन्तान

११

विरेन्द्र गुप्तः

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ऋतुवर्णन

स य इच्छेपुत्रो मे शुल्को जायेत वेद मनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरीदन् पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै॥

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१४

अर्थ- जिनकी यह इच्छा हो कि मेरे गौर वर्ण, एक वेद को जानने वाला पूर्ण सौ वर्ष की आयु का भोगने वाला पुत्र हो तो दम्पति को चाहिए कि वह दूध चावल की खीर बनाकर उसमें घृत डालकर खायें, इस प्रकार के आहार से वह उक्त प्रकार का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।

अथ य इच्छेपुत्रो मे कपिलःपिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदन् पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै।

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१५

अर्थ- जिनकी यह इच्छा हो कि हमारे कपिल, पिंगल भुरे नेत्र वाला, दो वेदों का ज्ञाता और सौ वर्ष की आयु भोगने वाला पुत्र हो तो वह दम्पति चावल पकाकर उसमें दही और घी डालकर भोजन करें। ऐसा करने से वह उक्त पुत्र को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।

अथ य इच्छेपुत्रो मे श्यामो लो हिताक्षो जायेत त्रीन्वेदानुब्रवीत सर्वमायुरियादित्यु दौदन पाचयित्वा सपिष्मन्तमशनीयातामीश्वरो जनयितवै

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१६

अर्थ- जिनकी इच्छा हो कि हमारे श्याम वर्ण, लाल नेत्र वाला तीन वेदों का ज्ञाता और पूर्ण सौ वर्ष की आयु भोगने वाला पुत्र हो तो वह दम्पति केवल जल में चावल पकाकर भात तैयार कर लें, उसमें घी मिलाकर खायें तो वह उक्त पुत्र को उत्पन्न करने में समर्थ होंगे।

इच्छानुसार सन्तान

१२

वीरेन्द्र गुप्तः

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ऋतुकाल वर्णित कर्म

अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत। सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सपिप्पन्तश्नीयातामीश्वरो जनयितवै।

ब्रह्मदण्डकपोनिषद् ६/४/१७

अर्थ- जिनकी इच्छा हो कि हमारी कन्या पण्डिता हो और पूर्ण सौ वर्ष की आयु भोगने वाली हो तो वह दम्पति तिल और चावल की खिचड़ी पकाकर उसमें घी मिलाकर खायें। ऐसा करने से उक्त प्रकार की कन्या को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।

अथ य इच्छेत्युन्नो मे पण्डितो विगीतः समितिगंमः।

शुश्रुषितां वांच भाषिता जायेत सर्वाण्वेदाननु बुवीत॥

सर्वमायुरियादिति माध्वं सौदनं पाचयित्वा सपिप्पन्तः।

न्तमश्नीयातामीश्वरो जनयितवा औक्षेणवासवमेणवा॥

ब्रह्मदण्डकपोनिषद् ६/४/१८

अर्थ- जिसकी यह इच्छा हो कि हमारा पुत्र प्रख्यात पण्डित विद्वान्नों की सभा में निर्भय प्रवेश करने वाला तथा श्रवण सुखद वाणी बोलने वाला हो, चारों वेदों का जानने वाला और पूर्ण सौ वर्ष की आयु का भोगने वाला हो तो वह दम्पति उक्ता तथा ऋषभक औषधियों से निकाला हुआ रस घृत संयुक्त चावलों में मिलाकर खायें तो वह उक्त प्रकार का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होंगे।

व्यवन्प्राश अवलेह में अष्टवर्ग के नाम से आठ औषधियाँ पड़ती हैं, जिनका अभी तक सही पता नहीं चला है। उसी अष्ट वर्ग में उक्ता और ऋषभक नाम की दो बुटियाँ हैं। जो उपरोक्त सेवन के लिए लिखीं हैं। इनकी उपेक्षा में शतावरी तोला, अश्वगन्ध नागीरी १ तोला, लाल इलायची के दाने आधा तोला लेकर कूट लें। इसका चूर्ण ६ माशा पुष्प और ६ माशा स्त्री घृत युक्त चावलों में मिलाकर सेवन करें। यदि किसी कारण से चावल न प्राप्त हो सकें तो दूध के साथ प्रयोग कर सकते हैं।

इच्छानुसार सन्तान

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वैरिन्द्र गुप्तः

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उपरोक्त सारे भोजनों का लाभ तभी प्राप्त होगा जबकि दम्पति कम से कम १॥ मास तक ब्रह्मचर्य से रहते हुए प्रयोग करें, तत्पश्चात् गर्भधान करें तो उत्तम सन्तान लाभ होगा।

यस्मिन्नुणं सन्वयितयेन् चानन्त्यमश्नुते।

स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः॥

मनु ९/१०७

अर्थ- जिसके उत्पन्न होने से (पितृ) ऋण दूर होता है और मोक्ष प्राप्त होता है उसी को धर्मज पुत्र जाने। औरों को कामज कहते हैं।

मनुष्य शरीर को मोक्ष तभी मिलती है जब अच्छे कर्म करे। अपने शरीर द्वारा संसार के कष्ट को दूर करने वाले, विद्वान् और धर्म का सत्य पथ दिखाने वाले पुत्र को जन्म देने से ही मोक्ष मिलती है अर्थात् मन. आत्मा, शरीर को सुख और शान्ति मिले, यही मोक्ष का द्वार है।

★★★

ऋतु वर्णन

ऋतुकाल स्त्रियों के जीवनारम्भ का चिन्ह है। इसी से गर्भ धारण शक्ति का पता चलता है। यह प्रति मांस तीन दिन पर्यन्त प्रत्येक स्त्री की योनि से रजः निकलता है। इसी को स्त्रियों का मासिक धर्म तथा रजस्वला होना भी कहते हैं। रजस्वला स्त्रियों को चाहिए कि वे अपना समय एकान्त में व्यतीत करें। दुःख और क्लेश-जनक वातावरण तथा विचारों को अपने पास न आने दें। घर की किसी वस्तु को हाथ न लगायें। पृथक् मिट्टी के पात्रों में हल्का भोजन करें। भुंजार आदि छोड़ दें। तीन दिन तक स्नान भी न करें। चौथे दिन स्नान से शरीर शुद्ध करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

इच्छानुसार सन्तान

१४

वीरेन्द्र गुप्तः

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अथ यस्य जायामार्तव विन्दत त्र्यहंकष्टसेन पिवेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्प्यपहन्यात् त्रिरावान्त आप्लुत्य ब्रीहीन वद्यातयेत्।।

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१३

अर्थ- जिनकी स्त्री ऋतुमति हो वह स्त्री तीन दिन तक कांस्य के पात्र में पानी, भोजन न पाय और उसको कोई मलीन वस्त्र, मलीन स्त्री व मलीन पुरुष स्पर्श न करे, फिर चौथे दिन स्नान करने के अनन्तर वह सुन्दर वस्त्र पहिन धानों को कूटे। ऋतुमति स्त्री को यदि कोई मैले वस्त्र पहिनने को या मलीन स्त्री या पुरुष से स्पर्श करेगी तो सम्भव है कि उसके शरीर में दूषिन्धित कीटाणु प्रविष्ट होकर उसी को हानि पहुँचावे, इसलिए उस समय किसी मलीन द्रव्य अथवा वस्त्रादिकों को उपयोग में न लावे।


ऋतुकाल वर्जित कर्म

ऋतुमति स्त्री को तीन दिन पर्यन्त न करने वाले कर्म तथा उनको करने से उस मास में गर्भ स्थित हो जाने पर बच्चे को हानियाँ।

दिन में सोने से = सन्तान अधिक सोने वाली।

नेत्रों में अंजत काजल आदि लगाने से = अन्धों

रोने से = विकृत नेत्र तथा विकार युक्त।

स्नान और अनुलेपन करने से = निर्बल, दुबली तथा दुर्बली।

तेल मर्दन से = कुष्ठी (कुष्ठ रोग वाली)

नाखून काटने से = नाखून रहित।

दौड़ने से = चंचल

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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हँसने से = काले दाँत वाली तथा काले ओष्ठ वाली।

अतिभाषण से = बकवादी।

वेग की ध्वनि सुनने तथा बोलने से = बहरी।

लिखने से = मूर्ख।

अतिवायु सेवन से = उन्मत्त सन्तान होती है।

ऋतुभक्ति स्त्री उपरोक्त कार्य जिस ऋतु में करेगी उसके १६ दिन अर्थात् उसी मास में गर्भाधान हो जाने से उस कार्य का दोष सन्तान में अवश्य आ जायेगा। इसी लिए इन कर्मों का निषेध किया है।

नोपगच्छेत्प्रमोदोऽपि स्त्रियमार्तवदर्शने।

समानशयने चैव न शयीत तथा सह॥

मनु ४/४०

अर्थ- कामार्त पुरुष भी रजस्वला स्त्री के पास न जावे और उसके साथ बराबर बिठौने पर भी न सोवे।

अश्रीरा तन्पूर्वति रशती पाप्याभ्युगा।

पतिर्यद्द्वधोऽ वाससा स्वमङ्गमभिधत्सते।

ऋग्वेद १०/८५/३०

अर्थ- रजस्वला स्त्री के सेवन, स्पर्श साथ निद्रा आदि से पुरुष और सन्तान श्री रहित और रोगादि से दूषित हो जाते हैं।

रजसाभिलुप्तां नार्यं नरस्य ह्यु पगच्छतः।

प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुरचैव प्रहीयते॥

मनु ४/४१

अर्थ- रजस्वला स्त्री के पास जाने वाले पुरुष की प्रज्ञा, तेज, बल, नेत्र तथा आयु नष्ट होती है।

उपरोक्त व्याधि रजस्वलागामी पुरुष को होकर अनेक रोग हो जाते हैं। इसलिये रजस्वला स्त्री के साथ चार दिन तक कभी समागम न करे। रजस्वला स्त्री ठंड से बचकर रहे तथा एकान्त वास करे और चौथे दिन स्नान करके अपने पति या पुत्र का दर्शन

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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रति समय वर्णित काल

करे या अपने चेहरे को दर्पण में देखे।

एक बार एक पुरुष ने अपनी पत्नी से कहा कि हमारे चार पुत्र हैं, मैं इस बात की परीक्षा करना चाहता हूँ कि इनमें से मेरा पुत्र कौन-सा है इस बात को सुनकर स्त्री ने कहा नाथ क्या आपको मुझ पर सन्देह है? आप मुझ पर दोष लगाते हैं? नहीं देवी, मैं तुम पर पूरा विश्वास करता हूँ, तुम पतिव्रता हो, निर्दोष हो, पवित्र हो, मैं एक और बात का अनुभव करना चाहता हूँ, जो मैंने नई सुनी है। देखो मैं इस कोठरी में बन्द हो जाता हूँ, तुम अपने शरीर को हल्दी चूना लगा लो, बच्चे पाठशाला से आते होंगे। पूछने पर तुम उनसे कह देना कि तुम्हारे पिता ने मारा है। पहले बड़ा लड़का आया उसने भी से पूछा मैं क्या हो गया? मैं ने कहा- बेटा तुम्हारे पिता ने मारा है। लड़के ने कहा- अच्छा घर आवे तो मैं में उसे कुट्टी की तरह काट डालूँगा कहता हुआ चला गया। अब दूसरा लड़का आया उसने भी प्रश्न किया और उत्तर में कहा मैं मत घबरा बाप को घर आने देने में उसे रुई की तरह धुन डालूँगा। तीसरे लड़के ने भी आकर प्रश्न किया और उत्तर दिया मैं बाप को घर आने देने में उसे मशक (चमड़े की जिसमें पानी भरा- जाता है) की तरह मसल डालूँगा। अब सबसे छोटा लड़का आया उसने भी मैं से पूछा क्या हो गया। उत्तर पाकर कहा मैं तेरी और पिताजी की लड़ाई है मैं क्या जानूँ मुझे भूख लगी है रोटी दे। पिता ने कोठरी से निकलकर बच्चे को उठा लिया और प्यार करता हुआ बोला देखो बस यही मेरा बेटा है। देवी तुम ध्यान करो जिस मास में सबसे पहला गर्भ स्थित हुआ था, क्या उस महीने ऋतु स्नान के पश्चात् किसी कसाई को देखा था? हाँ, कुछ ध्यान पड़ता है नाथ! जब मैं स्नान करके चुकी थी उसी समय किसी ने आपको पुकारा मैंने जाकर देखा कि एक कसाई सामने खड़ा है। बस देवी! यही कारण है कि बड़े लड़के में कुछ कसाई की-सी निर्दयता का आभास होता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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इसी प्रकार तुमने ऋतु स्नान के बाद दूसरी बार धुनें का तीसरी बार में भिन्नता का और चौथी बार में मेरा दर्शन किया होगा।

देवी कल शाम आर्य समाज के उत्सव में एक प्रोफेसर अमरीका का दौरा करके आये थे उन्होंने एक घटना अमरीका के एक दम्पति की सुनाई।

अमरीका के एक दम्पति को घर एक बालक ने जो हब्बी जैसा काला, सारे शरीर पर बड़े-बड़े काले बाल थे जन्म लिया। यह देखकर अमरीकन ने अपनी पत्नी से कहा- यह गर्भ मेरा नहीं। पत्नी- यह आप क्या कह रहे हैं, मैं तो कहँी भी नहीं गई। अमरीकन- तो यह बच्चा हब्बी जैसा क्यों, जबकि हम दोनों बिलकुल ही गोंरे हैं। पत्नी- यह बात मेरी भी समझ में नहीं आती। उन दिनों में अमरीका प्रचार के लिए गया था। उक्त अमरीकन महाशय अपनी शंका लेकर मेरे पास आये। मैंने उनकी शंका का समाधान करते हुए मालूम किया। क्या? आप बता सकते हैं कि आपके कमरे में कुछ चित्र लगे हैं? अमरीकन- हाँ लगे हैं। भारतीय- तो आप अपनी पत्नी से मालूम करें कि इन चित्रों में आपको कौन-सा चित्र प्रिय है और आप उसे नित्य देखती हैं, साथ में यह देखना कि सोते समय वह चित्र किस ओर रहता है और उस चित्र को लेकर आप मुझसे मिलें। अगले दिन जब वह अमरीकन चित्र लेकर मेरे पास आया तो वह चित्र भी काले हब्बी का था। मैंने अमरीकन को समझाया देखो मासिक धर्म के स्नान के पश्चात् भी यही चित्र देखा गया है और गर्भाधान के समय भी आपके कथानानुसार यह चित्र सामने रहा और जब तक बच्चे का जन्म हुआ तब तक नित्य ही इस चित्र को ध्यान पूर्वक देखा गया है जिस कारण आपके इसी चित्र के अनुसार हब्बी जैसे पुत्र का जन्म हुआ। अमरीकन ने घर जाकर पत्नी से मालूम किया तो यह सत्य निकला कि जब वह कमरे में आती थी तो उसका ध्यान इसी चित्र पर जाता था और वह सोचती थी क्या संसार

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अति आवश्यक सावधानियाँ

में ऐसे भी मनुष्य होते हैं?

ऋतुमति स्त्री चौथे दिन स्नान के पश्चात् तत्काल ही जैसे भाव तथा चित्र और पुरुष के दर्शन करेगी तो उस मास में गर्भ स्थित होने पर वैसे ही रंग, रूप विचार और भाव बच्चे में आ जाते हैं। यदि वीर पुत्र चाहे तो वीर योधाओं के चित्र धर्मात्मा पुत्र की इच्छा में महात्माओं के चित्र, रूपवान पुत्र प्राप्त करने के लिए सुन्दर बच्चों के चित्र और विद्वान पुत्र के लिए लेखकों आचार्यों तथा गुरुओं के चित्र देखो।

ऋतु स्नान के पश्चात् स्त्री के नेत्र छाया चित्र (फोटो कैमरा) के लैन्सों का कार्य करते हैं। उस समय जैसा चित्र तथा आकृति को नेत्र देखेंगे वैसा ही प्रतिबिम्ब मन तथा भाव में गुप्त रूप में समाविष्ट हो जाता है। जो गर्भ रहने पर अपनी आकृति में परिवर्तित कर लेता है।


रति समय वर्जित काल

स्त्रियों को स्वाभाविक ऋतुकाल की १६ रात्रि हैं। जिस दिन से ऋतु आरम्भ होता है उसी दिन से १६ रात्रि तक ही गर्भ स्थित होता है। जिसमें पहले चार दिन अच्छे मनुष्यों से निन्दित भी सम्मिलित हैं। इसलिए पहले चार दिनों में स्त्री भोग न करे।

ऋतु कालाभिगानी स्यात्स्वदारनिरतः सदा।

पर्ववर्ज ब्रजेच्छैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया॥

मनु ३/४५

अर्थ- अपनी स्त्री से (अमावस्यादि) पर्व वर्जित दिनों को त्याग कर शेष ऋतुकाल में प्रीतिपूर्वक समागम करे।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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रहस्य तथ्य

तासामाद्याश्चतस्वस्तु निन्दितैकादशी च या। त्रयोदशी च शेषस्तु प्रशस्ता दश रात्रयः॥

मनु ३/४७

अर्थ- उनमें चार प्रथम की और ११वीं और १३वीं ये छः (रात्रि स्त्री भोग में) निषिद्ध हैं और शेष दस रात्रि श्रेष्ठ हैं। 'जिनको पुत्र की इच्छा हो वे छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं, चौदहवीं और सोहलहवीं ये छः रात्रि ऋतुदान में उत्तम जानें, परन्तु इनमें भी उत्तर-उत्तर श्रेष्ठ हैं।'

संस्कार विधि गर्भाधान प्रकारण

इसमें स्वामी जी ने अन्त की दो रात्रियाँ ऋतुदान के लिए ही उत्तम कही हैं जैसे १५ और १६। कन्या के लिए १५ और पुत्र के लिए १६ उत्तम हैं।

अमावास्याष्ठमी च पौर्णमासी चतुर्दशीम्। ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्युत्तोस्नातको द्विजः॥

मनु ४/१२८

अर्थ- अमावास्या, अष्टमी, पौर्णमासी और चतुर्दशी इन तिथियों में पूर्वोक्त स्नातक द्विज और ऋतुकाल में भी भायां के पास न जावे।

तथा ग्रहण समय, संक्रान्ति, दिन, सन्ध्या समय, माता, पिता की मृत्यु तिथि भी वर्जित हैं। स्त्री रक्त वर्ण के वस्त्र पहने हुई, सोते समय परदेश में और दूसरे के गृह पर गर्भाधान नहीं करना चाहिए। इससे सन्तान अल्पानु और दुर्गावती होती है।

पर्वस्वभिगमोऽधन्यो दिवा पापप्रदो नृप। भुवि रोगवहो नृणामप्रशस्तो जलाशयः॥

विष्णु पुराण ३/१२/१२२

अर्थ- पर्व दिनों में स्त्री गमन करने से धन की हानि होती है, दिन में पाप होता है, पृथ्वी पर रोग तथा जलाशय में स्त्री प्रसंग करने से नपुंसकता और अमंगल होता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अतिआवश्यक सावधानियाँ

१- स्त्री के मासिक धर्म समय पर निरन्तर तीन दिन तक औषधि, दूध, दही, चावल, ठण्डा पानी, ठण्डे फल अथवा अन्य कोई ठण्डी वस्तु आदि का भी सेवन नहीं करना चाहिए। इन असावधानियों के कारण ही स्त्रियों में ९० प्रतिशत रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यह सावधानी अवश्य रखनी चाहिए, इन तीन दिनों में स्त्री सेवन से पुरुष को विषैप (आतशक) नाम का रोग लग जाता है।

२- डबल बैड अर्थात् नित्य पति-पत्नी का एक साथ शयन करना बहल भयंकर हो जाता है। एक साथ सोने से मन विवश होकर काम की इच्छा करता है और उपस्थितियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है। इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आते हैं।

३- भोजन के कम से कम दो घण्टे पश्चात् ही स्त्री सेवन करना चाहिये, इससे पूर्व स्त्री सेवन होने से पेट, नाभ, नले आदि दोष युक्त हो जाते हैं।

४- यदि रति समय किसी को भी शौच की इच्छा होने लगे तो पहले शौच जाना चाहिए, नहीं तो पेट में वायु विकार मलावरोध आदि दोष उत्पन्न हो जाते हैं।

५- जुकाम, खाँसी, ज्वर, निर्बलता, शोक अथवा अन्य कोई शारीरिक व्याधि होने पर स्त्री प्रसंग नहीं करना चाहिए, नहीं तो उस व्याधि में अति अधिकता हो जायगी और क्षय रोग भी हो सकता है।

६- बच्चे आपके प्रेमालाप, आर्लिंगन, सहवास आदि के कृत्यों को न देख सकें, अन्यथा वे भी आपस में वैसा ही कृत्य

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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करेंगे, जो आगे चलकर ब्रह्मचर्य के खण्डित होने का कारण भी बन जाते हैं। इसलिए यह कार्य बच्चे जिस कमरे में सो रहे हों उसमें न करें। आप इस भ्रम में न रहें कि बच्चे सो रहे हैं। उनकी किसी भी समय नींद उचट सकती है और वह उस अवस्था को देख सकते हैं। इसलिए यह सब कार्य अन्य एकात्म कमरे में ही हो। जहाँ इस प्रकार की सावधानी नहीं रखी जाती वहाँ पर बच्चे बड़े होकर आपस में भाई-बहिन भी वही कृत्य करने लगते हैं।


रहस्यमय तथ्य

जिस प्रकार पुरुषों को सोते समय स्वप्नदोष हो जाता है, उसी प्रकार स्त्रियों को भी स्वप्नदोष होता है। स्वप्नदोष में पुरुषों का वीर्य और स्त्रियों का रजः स्खलित हो जाता है। जब स्वप्नदोष में स्खलित स्त्री का रजः बाहर न आकर किसी भी कारण से अन्दर प्रवेश कर जाता है तो इससे उस स्त्री को गर्भ स्थित हो जाता है। ऐसे गर्भ को मूक अथवा प्रेत गर्भ कहते हैं और इस अवस्था में उक्त स्त्री को नौ मास तक सारे वही लक्षण उपस्थित हो जाते हैं जो गर्भित स्त्री के होते हैं। समय आने पर प्रसव भी उसी प्रकार होता है, परन्तु उससे उत्पन्न वस्तु अंग-प्रत्यंगों से रहित केवल एक मास पिण्ड मात्र ही होता है। इसे मूक गर्भ इसी कारण कहते हैं कि इसमें आकृति और चेतना का अभाव होता है।

१- मुरादाबाद मौ- साहू में श्री गंगा सहाय जी रहते थे, उनके कोई सन्तान नहीं थी, खिंची अवस्था में अनायास उनकी पत्नी गर्भवती हो गई, नौ मास तक सारे लक्षण सही रहे, समय आने पर महिला चिकित्सालय में प्रसव हुआ परन्तु उत्पन्न बालक

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का धर्म निवारण

के स्थान पर अंग प्रत्यंग रहित केवल मास पिण्ड का जन्म हुआ। यह मूक अथवा प्रेत गर्भ ही था।

२- मुरादाबाद नगरी विलक्षण प्रतिभाओं को जन्म देने में सदैव अग्रणी रही है। संसार प्रसिद्ध दिव्य विभूतियों ने इस भूमि पर जन्म लेकर संसार को नई से नई दिशा दी है। कानूनोंधोयार्थ के निवासी, वयोवृद्ध ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डित श्रद्धेय जसवन्तराय जी के अनेकानेक शिष्य हैं जो ज्योतिष की ज्योति को प्रज्वलित रख कर जन सेवा में लगे हुए हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व के निवास पर उनके सुयोग्य शिष्य विजय कुमार गुप्तः जी के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्री जसवन्त राय जी ने खड़े होकर मेरा स्वागत किया, यह उनकी साधुता और महान उदारता का परिचायक है।

चर्चा के बीच एक प्रसंग छिड़ा कि एक व्यक्ति अपनी पत्नी लेकर मेरे पास कई बार आये; कहा दो बार ऐसा हो चुका है कि मेरी पत्नी को गर्भ होता है और तीन मास होने के पश्चात् अनायास गायब हो जाता है, पता नहीं ऐसा क्यों हो जाता है। क्या कोई ऊपरी हवा तो नहीं जो ले जाती हो? राय साहब जी ने कहा- मेरी समझ में तो कुछ नहीं आया और मुझसे कहा- आप इसमें हमारा मार्ग दर्शन कीजिये कि वास्तविकता क्या है?

मैंने कहा- इसमें ऊपरी हवा अथवा प्रेत आदि कुछ नहीं है, जो ध्रुण को उठा कर ले जाय। 'केशाद' नाम के कीटाणु होते हैं, वह ध्रुण को खा जाता है और ध्रुण समाप्त होकर गर्भाशय खाली हो जाता है। राय साहब जी ने आश्चर्य चकित होकर कहा- आज आपसे चर्चा करके एक नई बात सामने आई, जिसकी जानकारी हमें नहीं थी। इसका कुछ उपचार भी है? मैंने कहा इसका उपचार बहुत सरल है। वह बोले क्या? मैंने कहा- इसका उपचार मैंने 'गर्भ स्थित न होने के कारण और उसका उपचार' प्रकरण में '३-' के क्रम पर आगे लिखा है, वहाँ पर देखें।

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अति सूक्ष्म विचारों का प्रभाव

नगर में तसहुक हुसैन (बाबला) हकीम जी बड़े प्रसिद्ध थे। रामपुर स्टेट में एक पठान दम्पति के घर में उक्त प्रकार की घटना कई बार हो चुकी थी, वह दोनों बहुत चिन्तित थे, उनके एक मित्र जो मुरादाबाद में ही रहते थे, सलाह दी कि तुम हकीम जी को दिखाओ। पठान ने कहा- इसमें हकीम जी क्या करेंगे यह तो किसी 'आसेव' का काम है जो मेरे पीछे पड़ा है। मित्र ने कहा- दिखाने में कोई हर्ज नहीं है। पठान अपनी पत्नी को लेकर आया। हकीम जी ने हाथ देखा, और कहा- इसकी शर्माणाह में मूली चढ़ा दे। यह सुनकर पठान क्रोध से लाल हो उठा, मित्र ने पहचाना और उसी क्षण बाहर ले आया। पठान ने बाहर आकर कहा- इसने यह भयी मजाक क्यों की, रामपुर होता तो मैं इसे उसी समय चौर देता। मित्र ने शान्त किया और घर पर ले आया। समझाया क्रोध को दूर किया। दो-चार दिन के पश्चात् मित्र ने पठान से कहा- देखो वह हकीम है इलाज करता है, कोई पागल नहीं, कुछ करके देखो तो सही पठान की समझ में आया और मूली का प्रयोग किया, और देखा तो उस पर छोटे-छोटे काले कीट लगे थे विश्वास बना दो-चार दिन ऐसा ही किया कीट समाप्त हो गये और गर्भ रुक गया।

वैद्यराज श्री बुद्धासिंह जी ने इस दोष को मुझे बताया और इसकी चिकित्सा से अवगत कराया था।

३- तिलक धर्माथ औषधालय में वैद्य पण्डित बन्नीप्रसाद जी चिकित्सा करते थे। पण्डित गोपीनाथ जी चिकित्सा हेतु औषधालय पहुँचे। देखा वैद्य जी खिन्न मुद्रा में बैठे हैं पण्डित जी ने खिन्नता का कारण जानना चाहा वैद्य जी ने कहा- बच्चे का जन्म हुआ और वह चल बसा, चौथी बार ऐसा हुआ है। पण्डित जी ने कहा- आप चिकित्सक हैं इसकी चिकित्सा कीजिए? वैद्य जी ने- भाग्य की कोई चिकित्सा होती है क्या? पण्डित जी- आप

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शुक्राणुओं का उलझा हुआ प्रश्न

वैद्य होकर ऐसी बात कह रहे हैं? यह रोग है-भाग्य नहीं। वैद्य जी- आप ही कुछ बताइये? पण्डित जी अबकी बार जब गर्भ स्थित हो तब आप मुझे बताना। कुछ समय को परघात् गर्भ स्थित हुआ, वैद्य जी पण्डित गोपीनाथ जी को घर पहुँचे। पंडित जी ने पेड़ की डाल निकाल कर दी और कहा- उसमें से चने बराबर तोड़ कर नित्य प्रातः काल गर्भिणी मुख मे डाल कर चूसती रहे। इसका सेवन प्रसव समय तक किया जायगा। वैद्य जी ने ऐसा ही किया और समय आने पर पुत्र ने जन्म लिया। वैद्य जी ने पंडित गोपीनाथ जी का धन्यवाद किया और इस प्रयोग को जानना चाह। पंडित जी ने बताया यह प्रयोग हमारे बाबा श्री पंडित जानकी दास जी से प्राप्त हुआ और आज तक कभी असफल नहीं हुआ।

प्रयोग- जिस शनिवार के दिन पुष्प नक्षत्र हो उसी दिन काले सिरस के पेड़ की सूखी डाल हाथ से छुटा कर रख लें ध्यान रहे किसी धातु से नहीं छुटानी चाहिए।


शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का

भ्रम निवारण

चन्द्र मास के दो पक्ष होते हैं, अमावस्या के पश्चात् बगले दिन से प्रारम्भ होने वाले पक्ष को शुक्ल पक्ष कहते हैं इसमें चन्द्रमा वृद्धि को प्राप्त होता है और पौर्णमासी के दिन चन्द्रमा पूर्ण हो जाता है इसके अगले दिन से चन्द्रमा का क्षय होने लगता है, इस पक्ष को कृष्ण पक्ष कहते हैं।

स्त्री के मासिक धर्म के भी दो पक्ष होते हैं पहला पक्ष मासिक धर्म को प्रारम्भ होने के दिन से गिना जाता है इसे शुक्ल पक्ष कहते हैं, इस पक्ष के सोलह दिनों में ही गर्भ स्थित होता है इसके पश्चात् १७वें दिन से कृष्ण पक्ष प्रारम्भ हो जाता है और

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यह अगले मासिक धर्म तक चलता है, इस पक्ष में गर्भ स्थित नहीं होता। स्त्री को यही शुक्ल और कृष्ण पक्ष हैं। इसका चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष से कोई सम्बन्ध नहीं है।

यह धारणा बिलकुल निर्मूल और भ्रामक है कि चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष में गर्भ स्थित होने पर पुत्र तथा कृष्ण पक्ष में गर्भ स्थित होने पर पुत्री की प्राप्ति होती है, यह नितान्त गलत है। इसका गर्भ में पुत्र-पुत्री के होने का कोई सम्बन्ध नहीं, इसमें तो केवल मासिक धर्म की 'सम' विषम' रात्रि ही प्रभावकारी होती है न कि चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष। चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का बच्चे के विकासोन्मुख होने में तो अवश्य प्रभाव होता है। जिसे हमने आगे अंकित किया है।

★★★

अति सूक्ष्म विचारों का प्रभाव

आपने अति उत्तम सन्तान को प्राप्त करने के सभी साधनों पर विचार कर आचरण किया। आपने एक मास तक उत्तम भोजन लिया, ब्रह्मचर्य का पालन, मासिक धर्म की सावधानियाँ, उत्तम रात्रि, उत्तम तिथि, उत्तम नक्षत्र आदि सब कुछ विचार कर दिन का निश्चय किया। उस दिन आप आनन्दमन, प्रसन्नचित्त, शुद्ध विचारों के साथ गर्भाधान संस्कार के लिये अन्तापुर में प्रवेश कर कार्य में व्यस्त हो जाते हैं। उसी समय आपके समीपस्थ किसी साहूकार के घर पर डकैती पड़ती है। धीय-धीय बन्दूकों के फायर होने लगते हैं। उसकी भयंकर आवाजें आपके कानों तक भी पहुँची और तत्काल आपके मन में यह विचार उठा कि कहीं डकैती पड़ रही है। यदि उस समय वार्यपात होकर गर्भ स्थित हो जाय तो उस गर्भ से उत्पन्न बालक में दयुराज के विचार अवश्य ही प्रवेश कर जायेंगे। उसे कोई रोक नहीं सकेगा।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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आपका प्रश्न हो सकता है कि इतने लम्बे समय तक के साधन और उत्तम आचरण के ऊपर इस क्षणिक वातावरण के विचारों का प्रभाव क्योंकर हो जायगा? आचरण विचारों की पवित्रता के लिये ही होता है। आकस्मिक घटना से स्थिर विचारों के विचलित हो जाने से उसके प्रभाव को रोका नहीं जा सकता। यही अति सूक्ष्म विचारों के प्रभाव का कारण है। इसका यह अर्थ नहीं कि हमने जो साधन और उत्तम आचरण को अपनाया वह सब व्यर्थ चला गया? नहीं! ऐसा नहीं होगा, जितना आपने तप किया है उसका फल और उत्तम साधनों का प्रभाव भी बच्चे में अवश्य आर्येगे। यदि वह दस्युराज बनता है तो आदर्श दस्युराज बनेगा।


शुक्राणुओं का उलझा हुआ प्रश्न

बहुत पहले से वैज्ञानिक यह मानते चले आ रहे हैं कि वीर्य के अन्दर लाखों शुक्राणु होते हैं। नई खोज के अनुसार अब यह गिनती ५ - ६ करोड़ तक पहुँच गई है। पैथोलॉजिस्ट ६० मिलियन शुक्राणु मानते हैं। यह सभी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि गर्भाधान के समय केवल एक ही शुक्रकीट सक्रिय होता है, और उसी से गर्भ धारण हो जाता है। प्रश्न उठता है कि जब केवल एक ही शुक्रकीट सक्रिय के लिये पर्याप्त उपयोगी होता है, तो प्रकृति ने एक बार के वीर्यपात में ५ - ६ करोड़ शुक्राणु के उपस्थित होने का क्या औचित्य माना है? चिकित्सक यह भी स्वीकार करते हैं कि गर्भाधान के लिये वीर्य में कम से कम ७०% सक्रिय शुक्राणुओं का होना अनिवार्य है।

यदि इससे कम सक्रिय शुक्राणु हैं तो गर्भ स्थिति का होना सम्भव नहीं है।

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आयुर्वेद में गर्भ स्थिति को लिये रजः वीर्य का दोष रहित शुद्ध होना अनिवार्य है। इनमें से किसी एक में अथवा दोनों में कोई भी दोष है तो गर्भ स्थिति नहीं हो सकेगी। यदि गर्भ स्थित हो भी गया तो उस गर्भ से उत्पन्न बालक विकृत होगा अर्थात् अंग बिहेग होगा। आयुर्वेद में पुरुष शुक्राणुओं के न्यूनाधिक होने की और स्त्रियों में अण्डे के उपस्थित होने की कोई चर्चा नहीं है। वहीं पर तो केवल शुक्र और आर्तव की परम शुद्धता का ही उल्लेख है। शुद्ध शुक्र और आर्तव के लक्षण तथा दोष अधिकृत करते हैं।

शुक्र-दोष (वीर्य)

वात पित्त श्लेष्म शोणित कृष्णपग्रन्थि

पूति पूय क्षीण मूत्र पुरीष रेतसः।

सुश्रुत शरीर स्थान २/१

वात, पित्त, कफ, रक्त, दुर्गन्ध, गौंडदार, मवाद युक्त, क्षीण वीर्य, मूत्रगन्धी, मलगन्धी, दोष वाले पुरुष गृहस्थ में असमर्थ होते हैं।

आर्तव-दोष (रजः)

तेषु कृष्णपग्रन्थि पूतियक्षीण मूत्रपुरीष

प्रकाशमसाध्य साध्यमन्यद् भवति॥

सुश्रुत २/२

कृष्णक (सड़े मुर्दे की गन्ध), गौंडदार, मवाद युक्त, क्षीण, मूत्र मल रंग वाला, अथवा छीछड़ेदार, काले रंग का, असाध्य होते हैं।

शुद्ध शुक्र-

स्फटिकाम् द्रवं सिगंधं मधुरं मधुगन्धं च।

शुक्रमिच्छान्ति केचित् तु तैलक्षौद्रनिभं तथा॥

सुश्रुत - २/१३

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वीरेन्द्र गुप्तः

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