ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१००
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
श्रेयः च प्रेयः च=श्रेय और प्रेय—ये दोनों ही; मनुष्यम् एतः=मनुष्यके सामने आते हैं; धीरः=बुद्धिमान् मनुष्य; तौ=उन दोनोंके स्वरूपपर; सम्परीत्य=भलीभाँति विचार करके; विविनक्ति=उनको पृथक्-पृथक् समझ लेता है; (और) धीरः=वह श्रेष्ठबुद्धिमनुष्य; श्रेयः हि=परम कल्याणके साधनको ही; प्रेयसः=भोग-साधनकी अपेक्षा; अभिवृणीते=श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है (परंतु); मन्दः=मन्दबुद्धिवाला मनुष्य; योगक्षेमात्=लौकिक योगक्षेमकी इच्छासे; प्रेयः वृणीते=भोगोंके साधनरूप प्रेयको अपनाता है ॥ २ ॥
व्याख्या —अधिकांश मनुष्य तो पुनर्जन्ममें विश्वास न होनेके कारण इस विषयमें विचार ही नहीं करते, वे भोगोंमें आसक्त होकर अपने देवदुर्लभ मनुष्य-जीवनको पशुवत् भोगोंके भोगनेमें ही समाप्त कर देते हैं। किंतु जिनका पुनर्जन्ममें और परलोकमें विश्वास है, उन विचारशील मनुष्योंके सामने जब ये श्रेय और प्रेय दोनों आते हैं, तब वे इन दोनोंके गुण-दोषोंपर विचार करके दोनोंको पृथक्-पृथक् समझनेकी चेष्टा करते हैं। इनमें जो श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न होता है, वह तो दोनोंके तत्त्वको पूर्णतया समझकर नीरक्षीर-विवेकी हंसकी तरह प्रेयकी उपेक्षा करके श्रेयको ही ग्रहण करता है। परंतु जो मनुष्य अल्पबुद्धि है, जिसकी बुद्धिमें विवेक-शक्तिका अभाव है, वह श्रेयके फलमें अविश्वास करके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले लौकिक योगक्षेमकी सिद्धिके लिये प्रेयको अपनाता है, वह इतना ही समझता है कि जो कुछ भोगपदार्थ प्राप्त हैं, वे सुरक्षित बने रहें और जो अप्राप्त हैं, वे प्रचुर मात्रामें मिल जायें। यही योगक्षेम है ॥ २ ॥
सम्बन्ध —परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप श्रेयकी प्रशंसा करके अब यमराज साधारण मनुष्योंसे निचेकेताकी विशेषता दिखलाते हुए उसके वैराग्यकी प्रशंसा करते हैं—
स त्वं प्रियान् प्रियरूपाः श्रु कामा- नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्त्राक्षीः । नैताः सृष्ट्वां वित्तमयीमवासे यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥
वल्ल्बी २ ]
कठोपनिषद्
१०१
नचिकेतः=हे नचिकेता! (उन्हीं मनुष्योंमें); सः त्वम्=तुम (ऐसे निःस्पृह हो कि); प्रियान् च=प्रिय लगनेवाले और; प्रियरूपान्=अत्यन्त सुन्दर रूपवाले; कामान्=इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंको; अभिध्यायन्=भलीभाँति सोच-समझकर; अत्यन्तस्वाक्षीः=(तुमने) छोड़ दिया; एताम् वित्तमयीम् सुद्वाम्= इस सम्पत्तिरूप शृङ्खला (बेड़ी) को; न अवाप्तः=(तुम) नहीं प्राप्त हुए (इसके बन्धनमें नहीं फँसे); यस्याम्=जिसमें; बहवः मनुष्याः=बहुत-से मनुष्य; मज्जन्ति=फँस जाते हैं ॥ ३ ॥
व्याख्या—यमराज कहते हैं—‘हे नचिकेता! तुम्हारी परीक्षा करके मैंने अच्छी तरह देख लिया कि तुम बड़े बुद्धिमान्, विवेकी तथा वैराग्यसम्पन्न हो। अपनेको बहुत बड़े चतुर, विवेकी और तार्किक माननेवाले लोग भी जिस चमक-दमकवाली सम्पत्तिके मोहजालमें फँस जाया करते हैं, उसे भी तुमने स्वीकार नहीं किया। मैंने बड़ी ही लुभावनी भाषामें तुम्हें बार-बार पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़े, गौएँ, धन, सम्पत्ति, भूमि आदि अनेकों दुष्प्राप्य और लोभनीय भोगोंका प्रलोभन दिया; इतना ही नहीं, स्वर्गके दिव्य भोगों और अप्रतिम सुन्दरी स्वर्गीय रमणियोंके चिर-भोगसुखका लालच दिया; परंतु तुमने सहज ही उन सबकी उपेक्षा कर दी। अतः तुम अवश्य ही परमात्मतत्त्वका श्रवण करनेके सर्वोत्तम अधिकारी हो ॥ ३ ॥
दूरमेते विपरीते विपूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥
या अविद्या=जो कि अविद्या; च विद्या इति ज्ञाता=और विद्या नामसे विख्यात हैं; एते=ये दोनों; दूरम् विपरीते=परस्पर अत्यन्त विपरीत; (और) विपूची=भिन्न-भिन्न फल देनेवाली हैं; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताको; विद्याभीप्सिनम्
१०२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
मन्ये=मैं विद्याका ही अभिलाषी मानता हूँ (क्योंकि); त्वा बहवः कामाः=तुमको बहुत-से भोग; न अलोल्पन्त=(किसी प्रकार भी) नहीं लुभा सके ॥ ४ ॥
व्याख्या—ये अविद्या और विद्या नामसे प्रसिद्ध दो साधन पृथक्-पृथक् फल देनेवाले हैं और परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं। जिसकी भोगोंमें आसक्ति है, वह कल्याण-साधनमें आगे नहीं बढ़ सकता और जो कल्याणमार्गका पथिक है, वह भोगोंकी ओर दृष्टि नहीं डालता। वह सब प्रकारके भोगोंको दुःखरूप मानकर उनका परित्याग कर देता है। हे नचिकेता! मैं मानता हूँ कि तुम विद्याके ही अभिलाषी हो, क्योंकि बहुत-से बड़े-बड़े भोग भी तुम्हारे मनमें किञ्चिन्मात्र भी लोभ नहीं उत्पन्न कर सके ॥ ४ ॥
अविद्यायामन्तरे
वर्तमानाः
स्वयं
धीराः
पण्डितमन्यमानाः।
दन्द्रम्यमाणाः
परियन्ति
मूढा
अन्धेनैव
नीयमाना
यथान्धाः * ॥ ५ ॥
अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमानाः=अविद्याके भीतर रहते हुए (भी); स्वयं धीराः=अपने-आपको बुद्धिमान् (और); पण्डितम् मन्यमानाः=विद्वान् माननेवाले; मूढाः=(भोगकी इच्छा करनेवाले) वे मूर्खलोग; दन्द्रम्यमाणाः= नाना योनियोंमें चारों ओर भटकते हुए; (तथा) परियन्ति=ठीक वैसे ही ठोकरें खाते रहते हैं; यथा=जैसे; अन्धेन एव नीयमानाः=अन्धे मनुष्यके द्वारा चलाये जानेवाले; अन्धाः=अन्धे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते हैं) ॥ ५ ॥
व्याख्या—जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं पहुँच पाता, बीचमें ही ठोकरें खाता भटकता है और कॉट-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गड़ढे आदिमें
*यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद्में भी आया है। (मु० ३० १।२।८)
बल्ली २ ]
कठोपनिषद्
१०३
गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उन मूर्खोंको भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विविध दुःखपूर्ण योनियोंमें एवं नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पड़ता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझते हैं, विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमें शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करते हैं और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंका भोग करनेमें तथा उनके उपाजनोंमें ही निरन्तर संलग्न रहकर मनुष्य-जीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं ॥५॥
न साम्प्ररायः प्रतिभाति बालं
प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी
पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥६॥
वित्तमोहेन मूढम्=इस प्रकार सम्पत्तिके मोहसे मोहित; प्रमाद्यन्तम् बालम्=निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको; साम्प्ररायः=परलोक; न प्रतिभाति=नहीं सूझता; अयम् लोकः=(वह समझता है) कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है; परः न अस्ति=इसके सिवा दूसरा (स्वर्ग-नरक आदि लोक) कुछ भी नहीं है; इति मानी=इस प्रकार माननेवाला अभिमानी मनुष्य; पुनः पुनः=बार-बार; मे वशम्=मेरे (यमराजके) वशमें; आपद्यते=आता है ॥६॥
व्याख्या—इस प्रकार मनुष्य-जीवनके महत्त्वको नहीं समझनेवाला अभिमानी मनुष्य सांसारिक भोग-सम्पत्तिकी प्राप्तिके साधनरूप धनादिके मोहसे मोहित हुआ रहता है; अतएव भोगोंमें आसक्त होकर वह प्रमादपूर्वक मनमाना आचरण करने लगता है। उसे परलोक नहीं सूझता। उसके अन्तःकरणमें इस प्रकारके विचार उत्पन्न ही नहीं होते कि मरनेके बाद मुझे अपने समस्त
१०४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य होकर बारम्बार विविध योनियोंमें जन्म लेना पड़ेगा। वह मूर्ख समझता है कि बस, जो कुछ यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है, यही लोक है। इसीकी सत्ता है। यहाँ जितना विषय-सुख भोग लिया जाय, उतनी ही बुद्धिमानी है। इसके आगे क्या है। परलोकको किसने देखा है। परलोक तो लोगोंकी कल्पनामात्र है इत्यादि। इस प्रकारकी मान्यता रखनेवाला मनुष्य बारम्बार यमराजके चंगुलमें पड़ता है और वे उसके कर्मानुसार उसे नाना योनियोंमें ढकेलते रहते हैं। उसके जन्म-मरणका चक्र नहीं छूटता ॥ ६ ॥
सम्बन्ध— इस प्रकार विषयासक्त, प्रत्यक्षवादी मूर्खोंकी निन्दा करके अब उस आत्मतत्त्वकी और उसको जानने, समझने तथा वर्णन करनेवाले पुरुषोंकी दुर्लभताका वर्णन करते हैं—
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः
शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः।
आश्रयौ वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-
ऽऽश्रयौ ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥
यः बहुभिः =जो (आत्मतत्त्व) बहतोंको तो; श्रवणाय अपि =सुननेके लिये भी; न लभ्यः =नहीं मिलता; यम् =जिसको; बहवः =बहुत-से लोग; शृण्वन्तः =अपि-सुनकर भी; न विद्युः =नहीं समझ सकते; अस्य =ऐसे इस गूढ़ आत्मतत्त्वका; वक्ता आश्रयः =वर्णन करनेवाला महापुरुष आश्रयमय है (बड़ा दुर्लभ है); लब्धा कुशलः =उसे प्राप्त करनेवाला भी बड़ा कुशल (सफल-जीवन) कोई एक ही होता है; कुशलानुशिष्टः =और जिसे तत्त्वकी उपलब्धि हो गयी है, ऐसे ज्ञानी महापुरुषके द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ; ज्ञाता =आत्मतत्त्वका ज्ञाता भी; आश्रयः =आश्रयमय है (परम दुर्लभ है) ॥ ७ ॥
व्याख्या— आत्मतत्त्वकी दुर्लभता बतलानेके लिये यमराजने कहा—नचिकेता! आत्मतत्त्व कोई साधारण-सी बात नहीं। जगत्में अधिकांश मनुष्य
बल्ली २ ]
कठोपनिषद्
१०५
तो ऐसे हैं—जिनको आत्मकल्याणकी चर्चातक सुननेको नहीं मिलती। वे ऐसे वातावरणमें रहते हैं कि जहाँ प्रातःकाल जागनेसे लेकर रात्रिको सोनेतक केवल विषय-चर्चा ही हुआ करती है, जिससे उसका मन आठों पहर विषय-चिन्तनमें डूबा रहता है। उनके मनमें आत्मतत्त्व सुनने-समझनेकी कभी कल्पना ही नहीं आती और भूले-भटके यदि ऐसा कोई प्रसङ्ग आ जाता है तो उन्हें विषय-सेवनसे अवकाश नहीं मिलता। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो सुनना-समझना उत्तम समझकर सुनते तो हैं, परंतु उनके विषयाभिभूत मनमें उसकी धारणा नहीं हो पाती अथवा मन्दबुद्धिके कारण वे उसे समझ नहीं पाते। जो तीक्ष्णबुद्धि पुरुष समझ लेते हैं, उनमें भी ऐसे आश्चर्यमय महापुरुष कोई विरले ही होते हैं, जो उस आत्मतत्त्वका यथार्थरूपसे वर्णन करनेवाले समर्थ वक्ता हों। एवं ऐसे पुरुष भी कोई एक ही होते हैं, जिन्होंने आत्मतत्त्वको प्राप्त करके जीवनकी सफलता सम्पन्न की हो; और भलीभाँति समझाकर वर्णन करनेवाले सफलजीवन अनुभवी आत्मदर्शी आचार्यके द्वारा उपदेश प्राप्त करके उसके अनुसार मनन-निदिध्यासन करते-करते तत्त्वका साक्षात्कार करनेवाले पुरुष भी जगत्में कोई विरले ही होते हैं। अतः इसमें सर्वत्र ही दुर्लभता है ॥७॥
सम्बन्ध—अब आत्मज्ञानकी दुर्लभताका कारण बताते हैं—
| न | नरेणावरेण | प्रोक्त | एष |
|---|---|---|---|
| सुविज्ञेयो | बहुधा | चिन्त्यमानः। | |
| अनन्यप्रोक्ते | गतिरत्र | नास्ति | |
| अणीयान् | हातकर्मणुप्रमाणात् | ॥ ८ ॥ |
अवरेण नरेण प्रोक्तः=अल्पज्ञ मनुष्यके द्वारा बतलाये जानेपर; बहुधा चिन्त्यमानः=(और उनके अनुसार) बहुत प्रकारसे चिन्तन किये जानेपर भी; एषः=यह आत्मतत्त्व; सुविज्ञेयः न=सहज ही समझमें आ जाय, ऐसा नहीं है; अनन्यप्रोक्ते=किसी दूसरे ज्ञानी पुरुषके द्वारा उपदेश न किये जानेपर; अत्र गतिः
१०६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
न अस्ति=इस विषयमें मनुष्यका प्रवेश नहीं होता; हि अणुप्रमाणात्= क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुसे भी; अणीयान्=अधिक सूक्ष्म है; अतर्क्यम्=(इसलिये) तर्कसे अतीत है ॥८॥
व्याख्या —प्रकृतिपर्यन्त जो भी सूक्ष्मात्सूक्ष्म तत्त्व है, यह आत्मतत्त्व उससे भी सूक्ष्म है। यह इतना गहन है कि जबतक इसे यथार्थरूपसे समझानेवाले कोई महापुरुष नहीं मिलते, तबतक मनुष्यका इसमें प्रवेश पाना अत्यन्त ही कठिन है। अल्पज्ञ—साधारण ज्ञानवाले मनुष्य यदि इसे बतलाते हैं और उसके अनुसार यदि कोई विविध प्रकारसे इसके चिन्तनका अभ्यास करता है, तो उसका आत्मज्ञानरूपी फल नहीं होता, आत्मतत्त्व तनिक-सा भी समझमें नहीं आता। दूसरेसे सुने बिना केवल अपने-आप तर्क-वितर्कयुक्त विचार करनेसे भी यह आत्मतत्त्व समझमें नहीं आ सकता। अतः सुनना आवश्यक है; पर सुनना उनसे है, जो इसे भलीभाँति जाननेवाले महापुरुष हों। तभी तर्कसे सर्वथा अतीत इस गहन विषयकी जानकारी हो सकती है ॥८॥
नैषा | तर्केण | मतिरापनेया | ---|---|---|--- | प्रोक्तान्येनैव | सुज्ञानाय | प्रेष्ठ। यां | त्वमापः | सत्यधूर्तिर्बतासि | | त्वादृक् नो | भूयान्नचिकेतः | प्रष्ठा ॥ ९ ॥
प्रेष्ठ=हे प्रियतम!; याम् त्वम् आपः=जिसको तुमने पाया है; एषा मतिः=यह बुद्धि; तर्केण न आपनेया=तर्कसे नहीं मिल सकती (यह तो); अन्येन प्रोक्ता एव=दूसरेके द्वारा कही हुई ही; सुज्ञानाय=आत्मज्ञानमें निमित्त; [भवति=होती है;] बत=सचमुच ही (तुम); सत्यधूर्तिः=उत्तम धैर्यवाले; असि=हो; नचिकेतः=हे नचिकेता! (हम चाहते हैं कि); त्वादृक्=तुम्हारे-जैसे ही; प्रष्ठा=पूछनेवाले; नः भूयात्=हमें मिला करें ॥९॥
व्याख्या —नचिकेताकी प्रशंसा करते हुए यमराज फिर कहते हैं कि हे प्रियतम! तुम्हारी इस पवित्र मति—निर्मल निष्ठाको देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ऐसी निष्ठा तर्कसे कभी नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १०७
है, जब भगवत्कृपासे किसी महापुरुषका सङ्ग प्राप्त होता है और उनके द्वारा लगातार परमात्माके महत्त्वका विशद विवेचन सुननेका सौभाग्य मिलता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्यको आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करनेमें प्रवृत्त करती है। इतना प्रलोभन दिये जानेपर भी तुम अपनी निष्ठापर दृढ़ रहे, इससे यह सिद्ध है कि वस्तुतः तुम सच्ची धारणासे सम्पन्न हो। नचिकेता ! हमें तुम-जैसे ही पूछनेवाले जिज्ञासु मिला करें ॥ ९ ॥
**सम्बन्ध—**अब यमराज अपने उदाहरणसे निष्कामभावकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—
जानाम्यहꣳ शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत्।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि -
रनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥
**अहम् जानामि=**मैं जानता हूँ कि; **शेवधिः=**कर्मफलरूप निधि; **अनित्यम् इति=**अनित्य है; **हि अध्रुवैः=**क्योंकि अनित्य (विनाशशील) वस्तुओंसे; **तत् ध्रुवम्=**वह नित्य पदार्थ (परमात्मा); **न हि प्राप्यते=**नहीं मिल सकता; **ततः=**इसलिये; **मया=**मेरे द्वारा (कर्तव्यबुद्धिसे); **अनित्यैः द्रव्यैः=**अनित्य पदार्थोंके द्वारा; **नाचिकेतः=**नाचिकेत नामक; **अग्निः चितः=**अग्निका चयन किया गया (अनित्य भोगोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, अतः उस निष्कामभावकी अपूर्व शक्तिसे मैं); **नित्यम्=**नित्य वस्तु परमात्माको; **प्राप्तवान् अस्मि=**प्राप्त हो गया हूँ ॥ १० ॥
**व्याख्या—**नचिकेता ! मैं इस बातको भलीभाँति जानता हूँ कि कर्मोंके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके भोगसमूहकी जो निधि मिलती है, वह चाहे कितनी ही महान् क्यों न हो, एक दिन उसका विनाश निश्चित है, अतएव वह अनित्य है और यह सिद्ध है कि अनित्य साधनोंसे नित्य पदार्थकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस रहस्यको जानकर ही मैंने नाचिकेत अग्निके चयनादिरूपसे जो कुछ यज्ञादि कर्तव्यकर्म अनित्य वस्तुओंके द्वारा
१०८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
किये, सब-के-सब कामना और आसक्तिसे रहित होकर केवल कर्तव्य-बुद्धिसे किये। इस निष्कामभावकी ही यह महिमा है कि अनित्य पदार्थोंके द्वारा कर्तव्य-पालनरूप ईश्वर-पूजा करके मैंने नित्य-सुखरूप परमात्माको प्राप्त कर लिया ॥ १० ॥
सम्बन्ध— नचिकेतामें वह निष्कामभाव पूर्णरूपसे है, इसलिये यमराज उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—
| कामस्यासिं | जगतः | प्रतिष्ठां |
|---|---|---|
| क्रतो रनन्त्यमभयस्य | पारम् । | |
| स्तोममहदुरुगायं | प्रतिष्ठां | |
| दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यन्तस्वाक्षीः ॥ ११ ॥ |
नचिकेतः :-हे नचिकेता!; कामस्य आसिम् -जिसमें सब प्रकारके भोग मिल सकते हैं; जगतः प्रतिष्ठाम् -जो जगत्का आधार; क्रतोः अनन्त्यम् -यज्ञका चिरस्थायी फल; अभयस्य पारम् -निर्भयताकी अवधि (और); स्तोममहत् -स्तुति करनेयोग्य एवं महत्वपूर्ण है (तथा); उरुगायम् -वेदोंमें जिसके गुण नाना प्रकारसे गये गये हैं; प्रतिष्ठाम् -(और) जो दीर्घकालतककी स्थितिसे सम्पन्न है, ऐसे स्वर्गलोकको; दृष्ट्वा धृत्या -देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक; अत्यन्तस्वाक्षीः :-उसका त्याग कर दिया; [अतः=इसलिये;] (मैं समझता हूँ कि) धीरः [असि] -(तुम) बहुत ही बुद्धिमान् हो ॥ ११ ॥
व्याख्या— नचिकेता! तुम सब प्रकारसे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न और निष्काम हो। मैंने तुम्हारे सामने वरदानके रूपमें उस स्वर्गलोकको रखा, जो सब प्रकारके भोगोंसे परिपूर्ण, जगत्का आधारस्वरूप, यज्ञादि शुभकर्मोंका अन्तरहित फल, सब प्रकारके दुःख और भयसे रहित, स्तुति करनेयोग्य और अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वेदोंने भाँति-भाँतिसे उसकी शोभाके गुणगान किये हैं और वह दीर्घकालतक स्थित रहनेवाला है; तुमने उसके महत्त्वको समझकर भी बड़े धैर्यके साथ उसका परित्याग कर दिया, तुम्हारा मन तनिक भी उसमें आसक्त नहीं हुआ,
वल्ल्बी २ ]
कठोपनिषद्
१०९
तुम अपने निश्चयपर दृढ़ और अटल रहे—यह साधारण बात नहीं है। इसलिये मैं यह मानता हूँ कि तुम बड़े ही बुद्धिमान्, अनासक्त और आत्मतत्त्वको जाननेके अधिकारी हो ॥ ११ ॥
सम्बन्ध —इस प्रकार नचिकेताके निष्कामभावको देखकर यमराजने निश्चय कर लिया कि यह परमात्माके तत्त्वज्ञानका यथार्थ अधिकारी है; अतः उसके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करनेके लिये यमराज अब दो मन्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी महिमाका वर्णन करते हैं—
तं दुर्दर्शं गृह्मनुप्रविष्टं गृहाहितं गृह्नेष्टं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥
गृह्म=जो योगमायाके पदमें छिपा हुआ; अनुप्रविष्ट=सर्वव्यापी; गृहाहितम्=सबके हृदयरूप गुफामें स्थित (अतएव); गृह्नेष्टम्=संसाररूप गहन वनमें रहनेवाला; पुराणम्=सनातन है, ऐसे; तम् दुर्दर्शम् देवम्=उस कठिनतासे देखे जानेवाले परमात्मदेवको; धीरः=शुद्ध बुद्धियुक्त साधक; अध्यात्मयोगाधिगमेन=अध्यात्मयोगकी प्राप्तिके द्वारा; मत्वा=समझकर; हर्षशोकौ जहाति=हर्ष और शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥
व्याख्या —यह सम्पूर्ण जगत् एक अत्यन्त दुर्गम गहन वनके सदृश है, परंतु यह परब्रह्म परमेश्वरसे परिपूर्ण है, वह सर्वव्यापी इसमें सर्वत्र प्रविष्ट है (गीता ९।४)। वह सबके हृदयरूपी गुफामें स्थित है (गीता १३।१७; १५।१५; १८।६१)। इस प्रकार नित्य साथ रहनेपर भी लोग उसे सहजमें देख नहीं पाते; क्योंकि वह अपनी योगमायाके पदमें छिपा है (गीता ७।२५), इसलिये अत्यन्त गुप्त है। उसके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। जो शुद्ध-बुद्धिसम्पन्न साधक अपने मन-बुद्धिको नित्य-निरन्तर उसके चिन्तनमें संलग्न रखता है, वह उस सनातन देवको प्राप्त करके सदाके लिये हर्ष-शोकसे
११०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
रहित हो जाता है। उसके अन्तःकरणमेंसे हर्ष-शोकादि विकार समूल नष्ट हो जाते हैं*॥ १२॥
एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयः हि लब्ध्वा विवृतः सच्च नचिकेतसं मन्ये॥ १३॥
मर्त्यः=मनुष्य (जब); एतत्=इस; धर्म्यम्=धर्ममय (उपदेश)-को; श्रुत्वा=सुनकर; सम्परिगृह्य=भलीभाँति ग्रहण करके; प्रवृह्य=(और) उसपर विवेकपूर्वक विचार करके; एतम्=इस; अणुम्=सूक्ष्म आत्मतत्त्वको; आप्य=जानकर (अनुभव कर लेता है, तब); सः=वह; मोदनीयम्=आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; लब्ध्वा=पाकर; मोदते हि=आनन्दमें ही मग्न हो जाता है; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताके लिये; विवृतम् सच्च मन्ये=(मैं) परमधामका द्वार खुला हुआ मानता हूँ॥ १३॥
व्याख्या—इस अध्यात्म-विषयक धर्ममय उपदेशको पहले तो अनुभवी महापुरुषके द्वारा अतिशय श्रद्धापूर्वक सुना चाहिये, सुनकर उसका मनन करना चाहिये। तदनन्तर एकान्तमें उसपर विचार करके बुद्धिमें उसको स्थिर करना चाहिये। इस प्रकार साधन करनेपर जब मनुष्यको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् जब वह आत्माको तत्त्वसे समझ लेता है, तब आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। उस आनन्दके महान् समुद्रको पाकर वह उसमें निमग्न हो जाता है। हे नचिकेता! तुम्हारे लिये उस परमधामका द्वार खुला हुआ है। तुमको वहाँ जानेसे कोई रोक नहीं सकता। तुम ब्रह्मप्राप्तिके उत्तम अधिकारी हो, ऐसा मैं मानता हूँ॥ १३॥
- प्रातःस्मरणीय भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने भी ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें इस प्रकरणको परमात्मविषयक माना है ('प्रकरणं चेद परमात्मनः'—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० २ के १२ वें सूत्रका भाष्य)।
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १११
सम्बन्ध— यमराजके मुखसे परब्रह्म पुरुषोत्तमकी महिमा सुनकर और अपनेको उसका अधिकारी जानकर नचिकेताके मनमें परमात्मतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। साथ ही उसे यमराजके द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर साधु-सम्मत संकोच भी हुआ। इसलिये उसने यमराजसे बीचमें ही पूछा—
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥ १४॥
यत् तत्= जिस उस परमेश्वरको; धर्मात् अन्यत्र= धर्मसे अतीत; अधर्मात् अन्यत्र= अधर्मसे भी अतीत; च= तथा; अस्मात् कृताकृतात्= इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत्से भी; अन्यत्र= भिन्न; च= और; भूतात् भव्यात्= भूत, वर्तमान एवं भविष्यत्—तीनों कालोंसे तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थोंसे भी; अन्यत्र= पृथक्; पश्यसि= (आप) जानते हैं; तत्= उसे; वद= बतलाइये॥ १४॥
व्याख्या— नचिकेता कहता है—भगवन्! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मके सम्बन्धसे रहित, कार्य-कारणरूप प्रकृतिसे पृथक् एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन सबसे भिन्न जिस परमात्मतत्त्वको आप जानते हैं, उसे मुझको बतलाइये* ॥१४॥
सम्बन्ध— नचिकेताके इस प्रकार पूछनेपर यमराज उस ब्रह्मतत्त्वके वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं—
सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति
तपाꣳसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥ १५॥
सर्वे वेदाः= सम्पूर्ण वेद; यत् पदम्= जिस परम पदका; आमनन्ति= बारम्बार
* भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने इस प्रकरणको भी अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें परमेश्वरविषयक ही माना है (‘पृष्टं चेह ब्रह्म’—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० ३ के २४ वें सूत्रका भाष्य)।
११२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
प्रतिपादन करते हैं; च=और; सर्वाणि तपांसि=सम्पूर्ण तप; यत्=जिस पदका; वदन्ति=लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन हैं; यत् इच्छन्तः=जिसको चाहनेवाले साधकगण; ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्यका; चरन्ति=पालन करते हैं; तत् पदम्=वह पद; ते=तुम्हें; (मैं) संग्रहेण=संक्षेपसे; ब्रवीमि=बतलाता हूँ; (वह है) ओम्=ओम्; इति=ऐसा; एतत्=यह (एक अक्षर) ॥ १५ ॥
व्याख्या —यमराज यहाँ परब्रह्म पुरुषोत्तमको परमप्राप्य बतलाकर उसके वाचक अँकारको प्रतीकरूपसे उसका स्वरूप बतलाते हैं। वे कहते हैं कि समस्त वेद नाना प्रकार और नाना छन्दोंसे जिसका प्रतिपादन करते हैं, सम्पूर्ण तप आदि साधनोंका जो एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छासे साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, उस पुरुषोत्तमभगवान्का परमतत्त्व मैं तुम्हें संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है 'अँ' यह एक अक्षर ॥ १५ ॥
सम्बन्ध —नामरहित होनेपर भी परमात्मा अनेक नामोंसे पुकारे जाते हैं। उनके सब नामोंमें 'अँ' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः यहाँ नाम और नामीका अभेद मानकर 'प्रणव' को परब्रह्म पुरुषोत्तमके स्थानमें वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं—
एतद्भ्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्भ्येवाक्षरं परम्।
एतद्भ्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥
एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही तो; ब्रह्म=ब्रह्म है (और); एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही; परम्=परब्रह्म है; हि=इसलिये; एतत् एव=इसी; अक्षरम्=अक्षरको; ज्ञात्वा=जानकर; यः=जो; यत्=जिसको; इच्छति=चाहता है; तस्य=उसको; तत्=वही (मिल जाता है) ॥ १६ ॥
व्याख्या —यह अविनाशी प्रणव—अँकार ही तो ब्रह्म (परमात्माका स्वरूप) है और यही परब्रह्म परमपुरुष पुरुषोत्तम है अर्थात् उस ब्रह्म और परब्रह्म दोनोंका ही नाम अँकार है; अतः इस तत्त्वको समझकर साधक इसके द्वारा दोनोंमेंसे किसी भी अभीष्ट रूपको प्राप्त कर सकता है ॥ १६ ॥
बल्ली २ ]
कठोपनिषद्
११३
एतदालम्बनः श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्। एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥
एतत्=यही; श्रेष्ठम्=अत्युत्तम; आलम्बनम्=आलम्बन है; एतत्=यही (सबका); परम् आलम्बनम्=अन्तिम आश्रय है; एतत्=इस; आलम्बनम्=आलम्बनको; ज्ञात्वा=भलीभाँति जानकर (साधक); ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें; महीयते=महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥
व्याख्या —यह ॐकार ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये सब प्रकारके आलम्बनोंमेंसे सबसे श्रेष्ठ आलम्बन है और यही चरम आलम्बन है। इससे परे और कोई आलम्बन नहीं है अर्थात् परमात्माके श्रेष्ठ नामकी शरण हो जाना ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम एवं अमोघ साधन है। इस रहस्यको समझकर जो साधक श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इसपर निर्भर करता है, वह निस्संदेह परमात्माकी प्राप्तिका परम गौरव लाभ करता है ॥ १७ ॥
सम्बन्ध —इस प्रकार ॐकारको ब्रह्म और परब्रह्म—इन दोनोंका प्रतीक बताकर अब नचिकेताके प्रश्नानुसार यमराज पहले आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—
न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥
विपश्चित्=नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा; न जायते=न तो जन्मता है; वा न म्रियते=और न मरता ही है; अयम् न=यह न तो स्वयं; कुतश्चित्=किसीसे हुआ है; [न=न] (इससे); कश्चित्=कोई भी; बभूव=हुआ है अर्थात् यह न तो किसीका कार्य है और न कारण ही है; अयम्=यह; अजः=अजन्मा; नित्यः=नित्य; शाश्वतः=सदा एकरस रहनेवाला (और); पुराणः=पुरातन है अर्थात्
११४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
क्षय और वृद्धिसे रहित है; शरीरे हन्यमाने=शरीरके नाश किये जानेपर भी (इसका); न हन्यते=नाश नहीं किया जा सकता*॥ १८॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते॥ १९॥
चेत्=यदि कोई; हन्ता=मारनेवाला व्यक्ति; हन्तुम्=अपनेको मारनेमें समर्थ; मन्यते=मानता है (और); चेत्=यदि; हतः=(कोई) मारा जानेवाला व्यक्ति; हतम्=अपनेको मारा गया; मन्यते=समझता है (तो); तौ उभौ=वे दोनों ही; न विजानीतः=(आत्मस्वरूपको) नहीं जानते (क्योंकि); अयम्=यह आत्मा; न हन्ति=न तो (किसीको) मारता है (और); न हन्यते=न मारा ही जाता है†॥१९॥
व्याख्या—यमराज यहाँ आत्माके शुद्ध स्वरूपका और उसकी नित्यताका निरूपण करते हैं; क्योंकि जबतक साधकको अपनी नित्यता और निर्विकारताका अनुभव नहीं हो जाता एवं वह जबतक अपनेको शरीर आदि अनित्य वस्तुओंसे भिन्न नहीं समझ लेता, तबतक इन अनित्य पदार्थोंसे वैराग्य होकर उसके अन्तःकरणमें नित्य तत्त्वकी अभिलाषा उत्पन्न नहीं होती। उसको यह दृढ़ अनुभूति होनी चाहिये कि जीवात्मा नित्य चेतन ज्ञानस्वरूप है; अनित्य, विनाशी
* गीतामें इस मन्त्रके भावको इस प्रकार समझाया गया है—
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(२।२०)
‘यह आत्मा किसी भी कालमें न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।’
† गीतामें इस मन्त्रके भावको और भी स्पष्टरूपसे व्यक्त किया गया है—
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
(२।१९)
‘जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है न किसीके द्वारा मारा जाता है।’
वल्ली २ ] कठोपनिषद् ११५
जड शरीर और भोगोंसे वास्तवमें इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि और अनन्त है; न तो इसका कोई कारण है और न कार्य ही; अतः यह जन्म-मरणसे सर्वथा रहित, सदा एकरस, सर्वथा निर्विकार है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता। जो लोग इसको मारनेवाला या मरनेवाला मानते हैं, वे वस्तुतः आत्मस्वरूपको जानते ही नहीं, वे सर्वथा भ्रान्त हैं। उनकी बातोंपर ध्यान नहीं देना चाहिये। वस्तुतः आत्मा न तो किसीको मारता है और न इसे कोई मार ही सकता है।
साधकको शरीर और भोगोंकी अनित्यता और अपने आत्माकी नित्यतापर विचार करके, इन अनित्य भोगोंसे सुखकी आशाका त्याग करके सदा अपने साथ रहनेवाले नित्य सुखस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त करनेका अभिलाषी बनना चाहिये॥ १८-१९॥
सम्बन्ध— इस प्रकार आत्मतत्त्वके वर्णनद्वारा नचिकेताके अन्तःकरणमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके यमराज अब परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥*
अस्य = इस; जन्तोः = जीवात्माके; गुहायाम् = हृदयरूप गुफामें; निहितः = रहनेवाला; आत्मा = परमात्मा; अणोः अणीयान् = सूक्ष्मसे अतिसूक्ष्म (और); महतः महीयान् = महान्से भी महान् है; आत्मनः तम् महिमानम् = परमात्माकी उस महिमाको; अक्रतुः = कामनारहित (और); वीतशोकः = चिन्तारहित (कोई विरला साधक); धातुप्रसादात् = सर्वाधार परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे ही; पश्यति = देख पाता है॥ २०॥
व्याख्या— इससे पहले जीवात्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन किया गया
* यह मन्त्र श्वेता० उ० (३। २०) में भी है।
११६ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
है, उसीको इस मन्त्रमें ‘जन्तु’ नाम देकर उसकी बद्धावस्था व्यक्त की गयी है। भाव यह कि यद्यपि परब्रह्म पुरुषोत्तम उस जीवात्माके अत्यन्त समीप जहाँ यह स्वयं रहता है, वहीं हृदयमें छिपे हुए हैं तो भी यह उनकी ओर नहीं देखता। मोहवश भोगोंमें भूला रहता है। इसी कारण यह ‘जन्तु’ है— मनुष्य-शरीर पाकर भी कीट-पतङ्ग आदि तुच्छ प्राणियोंकी भाँति अपना दुर्लभ जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहा है। जो साधक पूर्वोक्त विवेचनके अनुसार अपने- आपको नित्य चेतनस्वरूप समझकर सब प्रकारके भोगोंकी कामनासे रहित और शोकरहित हो जाता है, वह परमात्माकी कृपासे यह अनुभव करता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अणुसे भी अणु और महान्से भी महान्—सर्वव्यापी हैं और इस प्रकार उनकी महिमाको समझकर उनका साक्षात्कार कर लेता है। (यहाँ ‘धातुप्रसादात्’ का अर्थ ‘परमेश्वरकी कृपा’ किया गया है। ‘धातु’ शब्दका अर्थ सर्वाधार परमात्मा माना गया है। विष्णुसहस्रनाममें भी ‘अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः’—‘धातु’ को भगवान्का एक नाम माना गया है) ॥२०॥
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः। कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥
आसीनः=(वह परमेश्वर) बैठा हुआ ही; **दूरम् व्रजति=**दूर पहुँच जाता है; **शयानः=**सोता हुआ (भी); **सर्वतः याति=**सब ओर चलता रहता है; तम् **मदामदम् देवम्=**उस ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त न होनेवाले देवको; **मदन्यः कः=**मुझसे भिन्न दूसरा कौन; **ज्ञातुम्=**जाननेमें; **अर्हति=**समर्थ है॥२१॥
**व्याख्या—**परब्रह्म परमात्मा अचिन्त्यशक्ति हैं और विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं। एक ही समयमें उनमें विरुद्ध धर्मोंकी लीला होती है। इसीसे वे एक ही साथ सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् बताये गये हैं। यहाँ यह कहते हैं कि वे परमेश्वर अपने नित्य परमधाममें विराजमान रहते हुए ही भक्ताधीनतावश उनकी पुकार सुनते ही दूर-से-दूर चले जाते हैं। परमधाममें निवास करनेवाले पार्षद भक्तोंकी दृष्टिमें वहाँ शयन करते हुए ही वे सब
वल्ली २ ] कठोपनिषद् ११७
ओर चलते रहते हैं। अथवा वे परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र स्थित हैं। उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं, दूर देशमें चलते भी वही हैं, सोते भी वही हैं और सब ओर जाते-आते भी वही हैं। वे सर्वत्र सब रूपोंमें नित्य अपनी महिमामें स्थित हैं। इस प्रकार अलौकिक परमैश्वर्यस्वरूप होनेपर भी उन्हें अपने ऐश्वर्यका तनिक भी अभिमान नहीं है। उन परमदेवको जाननेका अधिकारी उनका कृपापात्र मेरे (आत्मतत्त्वज्ञ यमराजके सदृश अधिकारियोंके) सिवा दूसरा कौन हो सकता है॥ २१॥
सम्बन्ध— अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझानेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं—
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥ २२॥
अनवस्थेषु=(जो) स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील); शरीरेषु=शरीरोंमें; अशरीरम्=शरीररहित (एवं); अवस्थितम्=अविचलभावसे स्थित है; महान्तम्= (उस) महान्; विभुम्=सर्वव्यापी; आत्मानम्=परमात्माको; मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् महापुरुष; न शोचति=(कभी किसी भी कारणसे) शोक नहीं करता॥ २२॥
व्याख्या— प्राणियोंके शरीर अनित्य और विनाशशील हैं, इनमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। इन सबमें समभावसे स्थित परब्रह्म पुरुषोत्तम इन शरीरोंसे सर्वथा रहित, अशरीरी है। इसी कारण वे नित्य और अचल हैं। प्राकृत देश-काल-गुणादिसे अपरिच्छिन्न उन महान्, सर्वव्यापी, सबके आत्मरूप परमेश्वरको जान लेनेके बाद वह ज्ञानी महापुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता। यही उसकी पहचान है॥ २२॥
सम्बन्ध— अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वरं उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
११८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ २३॥*
अयम् आत्मा = यह परब्रह्म परमात्मा; न = न तो; प्रवचनेन = प्रवचनसे; न मेधया = न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन = न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः = प्राप्त हो सकता है; यम् = जिसको; एषः = यह; वृणुते = स्वीकार कर लेता है; तेन एव लभ्यः = उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एषः आत्मा = यह परमात्मा; तस्य = उसके लिये; स्वाम् तनूम् = अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते = प्रकट कर देता है॥ २३॥
**व्याख्या—**जिन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन मैं कर रहा हूँ, वे न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्मतत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धिके अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है। जो उनके बिना रह नहीं सकता। जो अपनी बुद्धि या साधनापर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमायाका परदा हटाकर उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं॥ २३॥
**सम्बन्ध—**अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते—
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ २४॥
प्रज्ञानेन = सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा; अपि = भी; एनम् = इस परमात्माको; न दुश्चरितात् अविरतः आप्नुयात् = न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे
* यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद् (३।२।३) में भी इसी प्रकार है।
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १११
आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; **न अशान्तः=**न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; **न असमाहितः=**न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं; **वा=**और; **न अशान्तमानसः [ आप्नुयात् ]=**न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है॥ २४॥
**व्याख्या—**जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे विरक्त होकर उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमें भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता, क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है; अतः वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता॥ २४॥
**सम्बन्ध—**उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥ २५॥
यस्य=(संहारकालमें) जिस परमेश्वरके; **ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=**ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणिमात्र; **ओदनः=**भोजन; **भवतः=**बन जाते हैं (तथा); **मृत्युः यस्य=**सबका संहार करनेवाली मृत्यु (भी) जिसका; **उपसेचनम्=**उपसेचन (भोज्य वस्तुके साथ लगाकर खानेका व्यञ्जन, तरकारी आदि); **[ भवति ]=**बन जाता है; **सः यत्र=**वह परमेश्वर जहाँ (और); **इत्था=**जैसा है, यह ठीक-ठीक; **कः वेद=**कौन जानता है॥ २५॥
**व्याख्या—**मनुष्य-शरीरमें भी धर्मशील ब्राह्मण और धर्मरक्षक क्षत्रियका शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये अधिक उत्तम माना गया है; किंतु वे भी उन कालस्वरूप परमेश्वरके भोजन बन जाते हैं, फिर अन्य साधारण मनुष्य-शरीरोंकी तो बात ही क्या है। जो सबको मारनेवाले मृत्युदेव हैं, वे भी