भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

२७४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

सः=वह (निष्कामभाववाला पुरुष); एतत्=इस; परमम्=परम; शुभ्रम्=विशुद्ध (प्रकाशमान); ब्रह्म धाम=ब्रह्मधामको; वेद=जान लेता है; यत्र=जिसमें; विश्रम्=सम्पूर्ण जगत्; निहितम्=स्थित हुआ; भाति=प्रतीत होता है; ये हि=जो भी कोई; अकामाः=निष्काम साधक; पुरुषम् उपासते=परमपुरुषकी उपासना करते हैं; ते=वे; धीराः=बुद्धिमान्; शुक्रम=रजोवीर्यमय; एतत्=इस शरीरको; अतिवर्तन्ति=अतिक्रमण कर जाते हैं ॥ १ ॥

व्याख्या —थोड़ा-सा विचार करनेपर प्रत्येक बुद्धिमान् मनुष्यकी समझमें यह बात आ जाती है कि इस प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले जगत्के रचयिता और परमाधार कोई एक परमेश्वर अवश्य हैं। इस प्रकार जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित हुआ प्रतीत होता है, उन परम विशुद्ध प्रकाशमय धामस्वरूप परब्रह्मपरमात्माको समस्त भोगोंकी कामनाका त्याग करके निरन्तर उनका ध्यान करनेवाला साधक जान लेता है। यह बात निश्चित है कि जो मनुष्य उन परम पुरुष परमात्माकी उपासना करते हैं और एकमात्र उन्हींको चाहते हैं, वे सर्वथा पूर्ण निष्काम होकर रहते हैं। किसी प्रकारके भोगोंमें उनका मन नहीं अटकता, अतः वे इस रजोवीर्यमय शरीरको लाँघ जाते हैं। उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसीलिये उन्हें बुद्धिमान् कहा गया है; क्योंकि जो सार वस्तुके लिये असारको त्याग दे वही बुद्धिमान् है ॥ १ ॥

सम्बन्ध —अब सकाम पुरुषकी निन्दा करते हुए ऊपर कही हुई बातको स्पष्ट करते हैं—

कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र । पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्वि- हैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥

यः=जो; कामान्=भोगोंको; मन्यमानः=आदर देनेवाला मानव; कामयते=(उनकी) कामना करता है; सः=वह; कामभिः=उन कामनाओंके कारण; तत्र तत्र=उन-उन स्थानोंमें; जायते=उत्पन्न होता है (जहाँ वे उपलब्ध हो सकें); तु=परंतु; पर्याप्तकामस्य=जो पूर्णकाम हो चुका है, उस; कृतात्मनः=विशुद्ध अन्तःकरणवाले

खण्ड २]

मुण्डकोपनिषद्

२७५

पुरुषकी; सर्वे=सम्पूर्ण; कामाः=कामनाएँ; इह एव=यहीं; प्रविलीयन्ति=सर्वथा विलीन हो जाती हैं॥ २॥

व्याख्या —जो भोगोंको आदर देनेवाला है, जिसकी दृष्टिमें इस लोक और परलोकके भोग सुखके हेतु हैं, वही भोगोंकी कामना करता है और नाना प्रकारकी कामनाओंके कारण ही जहाँ-जहाँ भोग उपलब्ध हो सकते हैं, वहाँ-वहाँ कर्मानुसार उत्पन्न होता है; परंतु जो भगवान्को चाहनेवाले भगवान्के प्रेमी भक्त पूर्णकाम हो गये हैं, इस जगत्के भोगोंसे ऊब गये हैं, उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले भक्तोंकी समस्त कामनाएँ इस शरीरमें ही विलीन हो जाती हैं। स्वप्नमें भी उनकी दृष्टि भोगोंकी ओर नहीं जाती। फलतः उन्हें शरीर छोड़नेपर नवीन जन्म नहीं धारण करना पड़ता। वे भगवान्को पाकर जन्म-मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छूट जाते हैं॥ २॥

सम्बन्ध —पहले दो मन्त्रोंमें भगवान्के परम दुलारे जिन प्रेमी भक्तोंका वर्णन किया गया है, उन्हींको वे सर्वात्मा परब्रह्म पुरुषोत्तम दर्शन देते हैं—यह बात अब अगले मन्त्रमें कहते हैं—

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तन्मु स्वाम्॥ ३॥*

अयम्=यह; आत्मा=परब्रह्म परमात्मा; न प्रवचनेन=न तो प्रवचनसे; न मेधया=न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन=न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः=प्राप्त हो सकता है; एषः=यह; यम्=जिसको; वृणुते=स्वीकार कर लेता है; तेन एव=उसके द्वारा ही; लभ्यः=प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एषः=यह; आत्मा=परमात्मा; तस्य=उसके लिये; स्वाम् तनुम्=अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते=प्रकट कर देता है॥ ३॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें यह बात समझायी गयी है कि वे परमात्मा न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका

  • यह मन्त्र कठोपनिषद्में भी इसी प्रकार है (१।२।२३)।

२७६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं जो बुद्धिके अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं और न उन्हींको मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है, जो उनके बिना रह नहीं सकता। जो अपनी बुद्धि या साधनपर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमायाका परदा हटाकर उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं ॥ ३ ॥

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वान्- स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥

अयम्=यह; आत्मा=परमात्मा; बलहीनेन=बलहीन मनुष्यद्वारा; न लभ्यः=नहीं प्राप्त किया जा सकता; च=तथा; प्रमादात्=प्रमादसे; वा=अथवा; अलिङ्गात्=लक्षणरहित; तपसः=तपसे; अपि=भी; न [ लभ्यः ]=नहीं प्राप्त किया जा सकता; तु=किंतु; यः=जो; विद्वान्=बुद्धिमान् साधक; एतैः=इन; उपायैः=उपायोंके द्वारा; यतते=प्रयत्न करता है; तस्य=उसका; एषः=यह; आत्मा=आत्मा; ब्रह्मधाम=ब्रह्मधाममें; विशते=प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥

व्याख्या—इस प्रकरणमें बताये हुए सबके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वर उपासनारूप बलसे रहित मनुष्यद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते। समस्त भोगोंकी आशा छोड़कर एकमात्र परमात्माकी ही उत्कट अभिलाषा रखते हुए निरन्तर विशुद्धभावसे अपने इष्टदेवका चिन्तन करना—यही उपासनारूपी बलका संचय करना है। ऐसे बलसे रहित पुरुषको वे नहीं मिलते। इसी प्रकार कर्तव्यत्यागरूप प्रमादसे भी नहीं मिलते तथा सात्त्विक लक्षणोंसे रहित संयमरूप तपसे भी किसी साधकद्वारा नहीं प्राप्त किये जा सकते। किंतु जो बुद्धिमान् साधक इन पूर्वोक्त उपायोंसे प्रयत्न करता है, अर्थात् प्रमादरहित होकर उत्कट अभिलाषाके साथ

खण्ड २ ]

मुण्डकोपनिषद्

२७७

निरन्तर उन परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका आत्मा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रविष्ट हो जाता है ॥४॥

सम्बन्ध— उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंके महत्त्वका वर्णन करते हैं—

सम्प्राप्यैनमृषयोज्ञानतूसाः
कृतात्मानोवीतरागाः प्रशान्ताः ।
ते सर्वगं सर्वतःप्राप्य धीरा
युक्तात्मानःसर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥

वीतरागाः=सर्वथा आसक्तिरहित; कृतात्मानः=(और) विशुद्ध अन्तःकरणवाले; ऋषयः=ऋषिलोग; एनम्=इस परमात्माको; सम्प्राप्य=पूर्णतया प्राप्त होकर; ज्ञानतूसाः=ज्ञानसे तृप्त (एवं); प्रशान्ताः=परम शान्त (हो जाते हैं); युक्तात्मानः=अपने-आपको परमात्मामें संयुक्त कर देनेवाले; ते=वे; धीराः=ज्ञानीजन; सर्वगम्=सर्वव्यापी परमात्माको; सर्वतः=सब ओरसे; प्राप्य=प्राप्त करके; सर्वम् एव=सर्वरूप परमात्मामें ही; आविशन्ति=प्रविष्ट हो जाते हैं ॥५॥

व्याख्या— वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले सर्वथा आसक्तिरहित महर्षिगण उपर्युक्त प्रकारसे इन परब्रह्म परमात्माको भलीभाँति प्राप्त होकर ज्ञानसे तृप्त हो जाते हैं। उन्हें किसी प्रकारके अभावका बोध नहीं होता, वे पूर्णकाम—परम शान्त हो जाते हैं। वे अपने-आपको परमात्मामें लगा देनेवाले ज्ञानीजन सर्वव्यापी परमात्माको सब ओरसे प्राप्त करके सर्वरूप परमात्मामें ही पूर्णतया प्रविष्ट हो जाते हैं ॥५॥

सम्बन्ध— इस प्रकार परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंकी महिमाका वर्णन करके अब ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्तिका वर्णन करते हैं—

वेदान्तविज्ञानमुनिश्चिन्तार्थाः | ---|--- संन्यासयोगाद् | यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु | परान्तकाले परामृताः | परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥

२७८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

[ ये ] वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थः=जिन्होंने वेदान्त (उपनिषद्) शास्त्रके विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्माको पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है (तथा); संन्यासयोगात्=कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे; शुद्धसत्त्वाः=जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; ते=वे; सर्वैः=समस्त; यतयः=प्रयत्नशील साधकगण; परान्तकाले=मरणकालमें (शरीर त्यागकर); ब्रह्मलोकेषु=ब्रह्मलोकमें (जाते हैं और वहाँ); परामृताः=परम अमृतस्वरूप होकर; परिमुच्यन्ति=सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥

व्याख्या —जिन्होंने वेदान्तशास्त्रके सम्यक् ज्ञानद्वारा उसके अर्थस्वरूप परमात्माको भलीभाँति निश्चयपूर्वक जान लिया है तथा कर्मफल और कर्मासक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण सर्वथा शुद्ध हो गया है, ऐसे सभी प्रयत्नशील साधक मरणकालमें शरीरका त्याग करके परब्रह्म परमात्माके परम धाममें जाते हैं और वहाँ परम अमृतस्वरूप होकर संसारबन्धनसे सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥

सम्बन्ध —जिनको परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति इसी शरीरमें हो जाती है, उनकी अन्तकालमें कैसी स्थिति होती है—इस जिज्ञासापर कहते हैं—

गताःकलाःपञ्चदशप्रतिष्ठा
देवाश्चसर्वेप्रतिदेवतासु।
कर्माणिविज्ञानमयश्चआत्मा
परेऽव्ययेसर्वेएकीभवन्ति ॥ ७ ॥

पञ्चदश=पंद्रह; कलाः=कलाएँ; च=और; सर्वे=सम्पूर्ण; देवाः=देवता अर्थात् इन्द्रियाँ; प्रतिदेवतासु=अपने-अपने अभिमानी देवताओंमें; गताः=जाकर; प्रतिष्ठाः=स्थित हो जाते हैं; कर्माणि=(फिर) समस्त कर्म; च=और; विज्ञानमयः=विज्ञानमय; आत्मा=जीवात्मा; सर्वे=ये सब-के-सब; परे अव्यये=परम अविनाशी परब्रह्ममें; एकीभवन्ति=एक हो जाते हैं ॥ ७ ॥

व्याख्या —उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ*

  • पंद्रह कलाएँ ये हैं—श्रद्धा, आकाशादि पञ्च महाभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम। (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)

खण्ड २ ]

मुण्डकोपनिषद्

२७९

और मनसहित सब इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी समष्टि देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं। उनके साथ उस जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसके बाद उसके समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा—सब-के-सब परम अविनाशी परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं ॥७॥

सम्बन्ध— किस प्रकार लीन हो जाते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- उस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८॥

यथा=जिस प्रकार; स्यन्दमानाः=बहती हुई; नद्यः=नदियाँ, नामरूपे=नाम-रूपको; विहाय=छोड़कर; समुद्रे=समुद्रमें; अस्तम् गच्छन्ति=विलीन हो जाती हैं; तथा=वैसे ही; विद्वान्=ज्ञानी महात्मा; नामरूपात्=नाम-रूपसे; विमुक्तः=रहित होकर; परात् परम्=उत्तम-से-उत्तम; दिव्यम्=दिव्य; पुरुषम्=परम पुरुष परमात्माको; उपैति=प्राप्त हो जाता है ॥८॥

व्याख्या— जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महापुरुष नाम-रूपसे रहित होकर परात्पर दिव्य पुरुष परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है— सर्वतोभावसे उन्हींमें विलीन हो जाता है ॥८॥

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥९॥

ह=निश्चय ही; यः वै=जो कोई भी; तत्=उस; परम् ब्रह्म=परमब्रह्म परमात्माको; वेद=जान लेता है; सः=वह महात्मा; ब्रह्म एव=ब्रह्म ही; भवति=हो जाता है; अस्य=इसके; कुले=कुलमें; अब्रह्मवित्=ब्रह्मको न जानेवाला; न भवति=नहीं होता; शोकम् तरति=(वह) शोकसे पार हो जाता है; पाप्मानम्

२८०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मुण्डक ३ ]

तरति=पापसमुदायसे तर जाता है; गुहाग्रन्थिभ्यः=हृदयकी गाँठोंसे; विमुक्तः=सर्वथा छूटकर; अमृतः=अमर; भवति=हो जाता है ॥ ९ ॥

व्याख्या —यह बिलकुल सच्ची बात है कि जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुलमें अर्थात् उसकी संतानोंमें कोई भी मनुष्य ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता। वह सब प्रकारके शोक और चिन्ताओंसे सर्वथा पार हो जाता है, सम्पूर्ण पापसमुदायसे सर्वथा तर जाता है, हृदयमें स्थित सब प्रकारके संशय, विपर्यय, देहाभिमान, विषयासक्ति आदि ग्रन्थियोंसे सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है। जन्म-मृत्युसे रहित हो जाता है ॥ ९ ॥

सम्बन्ध —इस ब्रह्मविद्याके अधिकारीका वर्णन करते हैं—

तदेतद्वाभ्युक्तम्—

क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षि श्रद्धयन्तः।

तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवैद्यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥

तत् =उस ब्रह्मविद्याके विषयमें; एतत् =यह बात; ऋचा अभ्युक्तम् =ऋचाद्वारा कही गयी है; क्रियावन्तः =जो निष्कामभावसे कर्म करनेवाले; श्रोत्रियाः =वेदके अर्थके ज्ञाता (तथा); ब्रह्मनिष्ठाः =ब्रह्मके उपासक हैं (और); श्रद्धयन्तः =श्रद्धा रखते हुए; स्वयम् =स्वयं; एकर्षिम् =एकर्षि' नामवाले प्रज्वलित अग्निमें; जुह्वते =नियमानुसार हवन करते हैं; तु =तथा; वैः =जिन्होंने; विधिवत् =विधिपूर्वक; शिरोव्रतम् =सर्वश्रेष्ठ व्रतका; चीर्णम् =पालन किया है; तेषाम् एव =उन्हींको; एताम् =यह; ब्रह्मविद्याम् =ब्रह्मविद्या; वदेत =बतलानी चाहिये ॥ १० ॥

व्याख्या —जिसका इस उपनिषदमें वर्णन हुआ है, उस ब्रह्मविद्याके विषयमें यह बात ऋचा द्वारा कही गयी है कि जो अपने-अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार निष्कामभावसे यथायोग्य कर्म करनेवाले, वेदके यथार्थ अभिप्रायको समझनेवाले, परब्रह्म परमात्माकी उपासना करनेवाले और उनके जिज्ञासु हैं, जो स्वयं 'एकर्षि' नामसे प्रसिद्ध प्रज्वलित अग्निमें शास्त्र-विधिके अनुसार श्रद्धापूर्वक हवन करते हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया है, उन्हींको यह ब्रह्मविद्या बतलानी चाहिये ॥ १० ॥

खण्ड २]

मुण्डकोपनिषद्

२८१

तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतद्वचीर्णव्रतोऽधीते। नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥

तत्=उसी; एतत्=इस; सत्यम्=सत्यको अर्थात् यथार्थ विद्याको; पुरा=पहले; अङ्गिराः ऋषिः=अङ्गिरा ऋषिने; उवाच=कहा था; अचीर्णव्रतः=जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया है; एतत्=(वह) इसे; न=नहीं; अधीते=पढ़ सकता; परमऋषिभ्यः नमः=परम ऋषियोंको नमस्कार है; परमऋषिभ्यः नमः=परम ऋषियोंको नमस्कार है ॥ ११ ॥

व्याख्या—उस ब्रह्मविद्यारूप इस सत्यका पहले महर्षि अङ्गिराने उपर्युक्त प्रकारसे शौनक ऋषिको उपदेश दिया था। जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं किया हो, वह इसे नहीं पढ़ पाता अर्थात् इसका गूढ़ अभिप्राय नहीं समझ सकता। परम ऋषियोंको नमस्कार है, परम ऋषियोंको नमस्कार है, इस प्रकार दो बार ऋषियोंको नमस्कार करके ग्रन्थसमाप्तिकी सूचना दी गयी है ॥ ११ ॥

॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥

॥ तृतीय मुण्डक समाप्त ॥ ३ ॥

॥ अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णोभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्जत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यौ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

इसका अर्थ इसी उपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

माण्डूक्योपनिषद्

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णोभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षर्भिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिव्यंशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टुनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः!! शान्तिः!! शान्तिः!!!

देवाः=हे देवगण!; [ वयम् ] यजत्राः [ सन्तः ]=हम भगवान्का यजन (आराधन) करते हुए; कर्णोभिः=कानोंसे; भद्रम्=कल्याणमय वचन; शृणुयाम=सुनें; अक्षर्भिः=नैत्रोंसे; भद्रम्=कल्याण (ही); पश्येम=देखें; स्थिरैः=सुदृढ़; अङ्गैः=अङ्गों; तनूभिः=एवं शरीरोंसे; तुष्टुवांसः [ वयम् ]=भगवान्की स्तुति करते हुए हमलोग; यत्=जो; आयुः=आयु; देवहितम्=आराध्यदेव परमात्माके काम आ सके; [ तत् ]=उसका; व्यशेम=उपभोग करें; वृद्धश्रवाः=सब ओर फैले हुए सुयशवाले; इन्द्रः=इन्द्र; नः=हमारे लिये; स्वस्ति दधातु=कल्याणका पोषण करें; विश्ववेदाः=सम्पूर्ण विश्वका ज्ञान रखनेवाले; पूषा=पूषा; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणका पोषण करें; अरिष्टुनेमिः=अरिष्टोंको मिटानेके लिये चक्रसदृश शक्तिशाली; ताक्ष्यो=गरुड़देव; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणका पोषण करें; (तथा) बृहस्पतिः=(बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणकी पुष्टि करें; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो।

व्याख्या —गुरुके यहाँ अध्ययन करनेवाले शिष्य अपने गुरु, सहपाठी तथा मानवमात्रका कल्याण-चिन्तन करते हुए देवताओंसे प्रार्थना करते हैं कि

मन्त्र १ ]

माण्डूक्योपनिषद्

२८३

‘हे देवगण! हम अपने कानोंसे शुभ—कल्याणकारी वचन ही सुनें। निन्दा, चुगली, गाली या दूसरी-दूसरी पापकी बातें हमारे कानोंमें न पड़ें और हमारा अपना जीवन यजन-परायण हो—हम सदा भगवान्की आराधनामें ही लगे रहें। न केवल कानोंसे सुनें, नेत्रोंसे भी हम सदा कल्याणका ही दर्शन करें। किसी अमङ्गलकारी अथवा पतनकी ओर ले जानेवाले दृश्योंकी ओर हमारी दृष्टिका आकर्षण कभी न हो। हमारे शरीर, हमारा एक-एक अवयव सुदृढ़ एवं सुपुष्ट हों—वह भी इसलिये कि हम उनके द्वारा भगवान्का स्तवन करते रहें। हमारी आयु भोग-विलास या प्रमादमें न बीते। हमें ऐसी आयु मिले, जो भगवान्के कार्यमें आ सके। [देवता हमारी प्रत्येक इन्द्रियोंमें व्याप्त रहकर उसका संरक्षण और संचालन करते हैं। उनके अनुकूल रहनेसे हमारी इन्द्रियाँ सुगमतापूर्वक सन्मार्गमें लगी रह सकती हैं; अतः उनसे प्रार्थना करना उचित ही है।] जिनका सुयश सब ओर फैला है, वे देवराज इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनिवारक ताक्ष्य (गरुड़) और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति—ये सभी देवता भगवान्की दिव्य विभूतियाँ हैं। ये सदा हमारे कल्याणका पोषण करें। इनकी कृपासे हमारे साथ प्राणिमात्रका कल्याण होता रहे। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—सभी प्रकारके तापोंकी शान्ति हो।

ओमित्येतदक्षरमिदः सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्वविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव। यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥

ॐ इति एतत्=ओं ऐसा यह; अक्षरम्=अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत्; तस्य=उसका ही; उपव्याख्यानम्=उपव्याख्यान अर्थात् उसीकी निकटतम महिमाका लक्ष्य करानेवाला है; भूतम्=भूत (जो हो चुका); भवत्=वर्तमान (और); भविष्यत्=भविष्यत् (जो होनेवाला है); इति=यह; सर्वम्=सब-का-सब जगत्; ओंकारः एव=ओंकार ही है; च=तथा; यत्=जो; त्रिकालातीतम्=ऊपर कहे हुए तीनों कालोंसे अतीत; अन्यत्=दूसरा (कोई तत्त्व है); तत्=वह; अपि=भी; ओंकारः=ओंकार; एव=ही है ॥ १ ॥

व्याख्या —इस उपनिषद्में परब्रह्म परमात्माके समग्र रूपका तत्त्व समझानेके लिये उनके चार पादोंकी कल्पना की गयी है। नाम और नामीकी

२८४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मन्त्र २ ]

एकताका प्रतिपादन करनेके लिये प्रणवकी अ, उ और म्—इन तीन मात्राओंके साथ और मात्रारहित उसके अव्यक्तरूपके साथ परब्रह्म परमात्माके एक-एक पादकी समता दिखलायी गयी है। इस प्रकार इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माका नाम जो ओंकार है, उसको समग्र पुरुषोत्तमसे अभिन्न मानकर यह कहा गया है कि 'ओम्' यह अक्षर ही पूर्णब्रह्म अविनाशी परमात्मा है। यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला जड़-चेतनका समुदायरूप सम्पूर्ण जगत् उन्हींका उपव्याख्यान अर्थात् उन्हींकी निकटतम महिमाका निदर्शक है। जो स्थूल और सूक्ष्म जगत् पहले उत्पन्न होकर उनमें विलीन हो चुका है और जो इस समय वर्तमान है तथा जो उनसे उत्पन्न होनेवाला है—वह सब-का-सब ओंकार ही है अर्थात् परब्रह्म परमात्मा ही है। तथा जो तीनों कालोंसे अतीत इससे भिन्न है, वह भी ओंकार ही है। अर्थात् कारण, सूक्ष्म और स्थूल—इन तीन भेदोंवाला जगत् और इसको धारण करनेवाले परब्रह्मके जिस अंशकी इसके आत्मारूपमें और आधाररूपमें अभिव्यक्ति होती है, उतना ही उन परमात्माका स्वरूप नहीं है; इससे अलग भी वे हैं। अतः उनका अभिव्यक्त अंश और उससे अतीत भी जो कुछ है, वह सब मिलकर ही परब्रह्म परमात्माका समग्र रूप है।

अभिप्राय यह है कि जो कोई परब्रह्मको केवल साकार मानते हैं या निराकार मानते हैं या सर्वथा निर्विशेष मानते हैं—उन्हें सर्वज्ञता, सर्वधारता, सर्वकारणता, सर्वेश्वरता, आनन्द, विज्ञान आदि कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न नहीं मानते, वे सब उन परब्रह्मके एक-एक अंशको ही परमात्मा मानते हैं। पूर्णब्रह्म परमात्मा साकार भी हैं, निराकार भी हैं तथा साकार-निराकार दोनोंसे रहित भी हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हींका स्वरूप है और वे इससे सर्वथा अलग भी हैं। वे सर्वगुणोंसे रहित निर्विशेष भी हैं और सर्वगुणसम्पन्न भी—यह मानना ही उन्हें सर्वज्ञपूर्ण मानना है॥ १ ॥

सम्बन्ध—सब कुछ ओंकार कैसे हैं, यह कहते हैं—

सर्वःह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २ ॥

हि=क्योंकि; एतत्=यह; सर्वम्=सब-का-सब; ब्रह्म=ब्रह्म है; अयम्=यह; आत्मा=परमात्मा (जो इस दृश्य-जगत्में परिपूर्ण है); ब्रह्म=ब्रह्म है; सः=वह; अयम्=यह; आत्मा=परमात्मा; चतुष्पात्=चार चरणोंवाला है॥ २ ॥

मन्त्र ३ ]

माण्डूक्योपनिषद्

२८५

व्याख्या —यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मसे भिन्न कुछ नहीं है, सब-का-सब ब्रह्म है और ओंकार उनका नाम होनेके कारण नामीसे अभिन्न है, इसलिये सब कुछ ओंकार है—यह बात पहले मन्त्रमें कही गयी है; क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् उन परब्रह्म परमात्माका शरीर है और वे इसके अन्तर्यामी आत्मा हैं (अन्तर्यामिब्राह्मण बृ० उ० ७।२३), इसलिये वे सर्वात्मा ही ब्रह्म हैं। वे सर्वात्मा परब्रह्म आगे बताये हुए प्रकारसे चार पादवाले हैं। वास्तवमें उन अखण्ड निरवयव परब्रह्म परमात्माको चार पादोंवाला कहना नहीं बनता; तथापि उनके समग्र रूपकी व्याख्या करनेके लिये उनकी अभिव्यक्तिके प्रकार-भेदोंको लेकर श्रुतियोंमें जगह-जगह उनके चार पादोंकी कल्पना की गयी है, उसी दृष्टिसे यहाँ भी श्रुति कहती है॥२॥

जागरितस्थानो बहिष्पन्नः समाङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभूवैश्वानरः प्रथमः पादः॥३॥

जागरितस्थानः =जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति यह सम्पूर्ण स्थूल जगत् जिसका स्थान अर्थात् शरीर है; बहिष्पन्नः =जिसका ज्ञान इस बाह्य जगत्में फैला हुआ है; समाङ्गः =भू-, भुवः आदि सात लोक ही जिसके सात अङ्ग हैं; एकोनविंशतिमुखः =पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण और चार अन्तःकरण—ये विषयोंको ग्रहण करनेवाले उन्नीस समष्टि 'करण' ही जिसके उन्नीस मुख हैं; स्थूलभूक् =जो इस स्थूल जगत्का भोक्ता—इसको अनुभव करनेवाला तथा जाननेवाला है, वह; वैश्वानरः =वैश्वानर (विश्वको धारण करनेवाला) परमेश्वर; प्रथमः =पहला; पादः =पाद है॥३॥

व्याख्या —परब्रह्म परमात्माके वे चार पाद कैसे और किस प्रकार हैं—यह बात समझानेके लिये जीवात्मा तथा उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरोंके उदाहरण देते हुए उन परमात्माके तीन पादोंका वर्णन क्रमशः किया गया है। उनमेंसे पहले पादका इस मन्त्रमें वर्णन है। भाव यह है कि जिस प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें इस स्थूल शरीरका अभिमानी जीवात्मा सिरसे लेकर पैरतक सात अङ्गोंसे युक्त होकर स्थूल विषयोंके उपभोगके द्वाररूप दस इन्द्रिय,

२८६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मन्त्र ४ ]

पाँच प्राण और चार अन्तःकरण—इस प्रकार इन उन्नीस मुखोंसे विषयोंका उपभोग करता है और उसका विज्ञान बाह्य जगत्में फैला रहता है, उसी प्रकार सात लोकरूप सात अङ्गों और समष्टि इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरण—इस प्रकार उन्नीस मुखोंसे युक्त इस स्थूल जगत्-रूप शरीरका आत्मा—जो सम्पूर्ण देवता, पितर, मनुष्य आदि समस्त प्राणियोंका प्रेरक और स्वामी होनेके कारण इस स्थूल जगत्का ज्ञाता और भोक्ता है (गीता ५।२९; ९।२४), जिसकी अभिव्यक्ति इस बाह्य स्थूल जगत्में हो रही है—वह सर्वरूप वैश्वानर उन पूर्णब्रह्म परमात्माका पहला पाद है।

जो विश्व अर्थात् बहुत भी हो और नर भी हो, उसे वैश्वानर कहते हैं—इस व्युत्पत्तिके अनुसार स्थूल जगत्-रूप शरीरवाले सर्वरूप परमेश्वरको यहाँ वैश्वानर कहा गया है। ब्रह्मसूत्र अध्याय १, पाद २, सूत्र २४ में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि आत्मा और ब्रह्म—इन दोनोंका वाचक जहाँ 'वैश्वानर' पद आये, वहाँ वह जीवात्माका या अग्निका नाम नहीं है। वह परब्रह्म परमेश्वरका ही वाचक है, यों समझना चाहिये। वैश्वानर-विद्यामें भी इसी प्रकार परमात्माको वैश्वानर बताया गया है (छा० ३० ५।११।१—६); अतः यहाँ 'जागरितस्थानः' इस पदके बलपर जाग्रत्-अवस्थाके अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका पहला पाद या वैश्वानर मानना ठीक नहीं मालूम होता; क्योंकि तीन अवस्थाओंके दृष्टान्तसे ब्रह्मके तीन पादोंका वर्णन करनेके पश्चात् छठे मन्त्रमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जिनको इन तीनों अवस्थाओंमें स्थित बताया गया है, वे सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सम्पूर्ण जगत्के कारण तथा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। लक्षण जीवात्मामें नहीं घट सकते, इसलिये भी यहाँ सर्वात्मा वैश्वानर परमेश्वरको ही परब्रह्मका एक पाद कहा गया है, यही मानना युक्तिसङ्गत मालूम होता है ॥ ३ ॥

स्वप्नस्थानोऽन्तःपन्नः समाङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविचित्कभुकु तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥

स्वप्नस्थानः =स्वप्नकी भाँति सूक्ष्म जगत् ही जिसका स्थान है; अन्तः-

मन्त्र ४]

माण्डूक्योपनिषद्

२८७

प्रज्ञः =जिसका ज्ञान संकल्पमय सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है; समाङ्गः =पूर्वोक्त सात अङ्गोंवाला (और); एकोनविंशतिमुखः =उन्नीस मुखोंवाला; प्रविक्त्तभुक् =सूक्ष्म जगत्का भोक्ता; तैजसः =तैजस—प्रकाशका स्वामी सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ; द्वितीयः पादः =उस परब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है॥४॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें पूर्णब्रह्म परमात्माके दूसरे पादका वर्णन है। भाव यह है कि जिस प्रकार स्वप्न-अवस्थामें सूक्ष्मशरीरका अभिमानी जीवात्मा पहले बतलाये हुए सूक्ष्म सात अङ्गोंवाला और उन्नीस मुखोंवाला होकर सूक्ष्म विषयोंका उपभोग करता है और उसीमें उसका ज्ञान फैला रहता है, उसी प्रकार जो स्थूल अवस्थासे भिन्न सूक्ष्मरूपमें परिणत हुए सात लोकरूप सात अङ्ग तथा इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरणरूप उन्नीस मुखोंसे युक्त सूक्ष्म जगत्-रूप शरीरमें स्थित, उसका आत्मा हिरण्यगर्भ है, वह समस्त जडचेतनात्मक सूक्ष्म जगत्के समस्त तत्त्वोंका नियन्ता, ज्ञाता और सबको अपनेमें प्रविष्ट किये हुए है, इसलिये उसका भोक्ता और जाननेवाला कहा जाता है। वह तैजस अर्थात् सूक्ष्म प्रकाशमय हिरण्यगर्भ उन पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है।

समस्त ज्योतियोंकी ज्योति, सबको प्रकाशित करनेवाले, परम प्रकाशमय हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरका ही वर्णन यहाँ तैजस नामसे हुआ है, ब्रह्मसूत्रके ‘ज्योतिश्चरणाभिधानात्’ (१।१।२४) इस सूत्रमें यह बात स्पष्ट की गयी है कि पुरुषके प्रकरणमें आया हुआ ‘ज्योतिः’ वा ‘तेजः’ शब्द ब्रह्मका वाचक ही समझना चाहिये। जहाँ ब्रह्मके पादोंका वर्णन हो, वहाँ तो दूसरा अर्थ—जीव या प्रकाश आदि मानना किसी तरह भी उचित नहीं है। उपनिषदोंमें बहुत जगह परमेश्वरका वर्णन ‘ज्योतिः, (अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते—छा० उ० ३।१३।७) और ‘तेजस्’ (येन सूर्यस्तपति तेजसेन्द्रः—तै० ब्रा० ३।१२।१।७) के नामसे हुआ है। इसलिये यहाँ केवल ‘स्वप्नस्थानः’ पदके बलपर स्वप्नावस्थाके अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका दूसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता। इसमें तीसरे मन्त्रकी व्याख्यामें बताये हुए कारण तो हैं ही। उनके सिवा यह एक कारण और भी है कि स्वप्नावस्थामें जीवात्माका ज्ञान जाग्रत्-

२८८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मन्त्र ५ ]

अवस्थाकी अपेक्षा कम हो जाता है; किंतु यहाँ जिसका वर्णन तैजसके नामसे किया गया है, उस दूसरे पादरूप हिरण्यगर्भका ज्ञान जाग्रत्की अपेक्षा अधिक विकसित होता है। इसलिये इसको तैजस अर्थात् ज्ञानस्वरूप बतलाया है और दसवें मन्त्रमें ओंकारकी दूसरी मात्रा 'उ' के साथ इसकी एकता करते हुए इसको उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) बताया है और इसके जाननेका फल ज्ञान-परम्पराकी वृद्धि और जाननेवालेकी संतानका ज्ञानी होना कहा है। स्वप्नाभिमानी जीवात्माके ज्ञानका ऐसा फल नहीं हो सकता, इसलिये भी तैजसका वाच्यार्थ सूक्ष्म जगत्के स्वामी हिरण्यगर्भको ही मानना युक्तिसंगत प्रतीत होता है ॥ ४ ॥

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम्। सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्तेतमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥

यत्र=जिस अवस्थामें; सुप्तः=सोया हुआ (मनुष्य); कञ्चन=किसी भी; कामम् न कामयते=भोगकी कामना नहीं करता; कञ्चन=कोई भी; स्वप्नम्=स्वप्न; न=नहीं; पश्यति=देखता; तत्=वह; सुषुप्तम्=सुषुप्ति-अवस्था है; सुषुप्तस्थानः=ऐसी सुषुप्तिकी भाँति जो जगत्की प्रलय-अवस्था अर्थात् कारण-अवस्था है, वही जिसका शरीर है; एकीभूतः=जो एकरूप हो रहा है; प्रज्ञानघनः एव=जो एकमात्र घनीभूत विज्ञानस्वरूप है; आनन्दमयः हि=जो एकमात्र आनन्दमय अर्थात् आनन्दस्वरूप ही है; चेतोमुखः=प्रकाश ही जिसका मुख है; आनन्दभुक्=जो एकमात्र आनन्दका ही भोक्ता है (वह); प्राज्ञः=प्राज्ञ; तृतीयः पादः=(ब्रह्मका) तीसरा पाद है ॥ ५ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें जाग्रत्की कारण और लय-अवस्थारूप सुषुप्तिके साथ प्रलयकालमें कारणरूपसे स्थित जगत्की समानता दिखानेके लिये पहले सुप्रसिद्ध सुषुप्ति-अवस्थাকে लक्षण बतलाकर उनके बाद पूर्णब्रह्म परमात्माके तीसरे पादका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि जिस अवस्थामें सोया हुआ मनुष्य किसी प्रकारके किसी भी भोगकी न तो कामना करता है और न अनुभव

मन्त्र ५]

माण्डूक्योपनिषद्

२८९

ही करता है तथा किसी प्रकारका स्वप्न भी नहीं देखता, ऐसी अवस्थाको सुषुप्ति कहते हैं। इस सुषुप्ति-अवस्थाके सदृश जो प्रलयकालमें जगत्की कारण-अवस्था है, जिसमें नाना 'रूपों'का प्राकट्य नहीं हुआ है—ऐसी अव्याकृत प्रकृति ही जिसका शरीर है तथा जो एक अद्वितीयरूपमें स्थित है, उपनिषदोंमें जिसका वर्णन कहीं सत्के नामसे ('सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' छा० उ० ६।२।१) और कहीं आत्माके नामसे (आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्—ऐ० उ० १।१।१) आया है, जिसका एकमात्र चेतना (प्रकाश) ही मुख है और आनन्द ही भोजन है, वह विज्ञानधन, आनन्दमय प्राज्ञ ही उन पूर्ण ब्रह्मका तीसरा पाद है।

यहाँ प्राज्ञ नामसे भी सृष्टिके कारण सर्वज्ञ परमेश्वरका ही वर्णन है। ब्रह्मसूत्र प्रथम अध्यायके चौथे पादके अन्तर्गत पाँचवें सूत्रमें 'प्राज्ञ' शब्द ईश्वरके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है, इसके सिवा और भी बहुत-से सूत्रोंमें ईश्वरके स्थानपर 'प्राज्ञ' शब्दका प्रयोग किया गया है। पूज्यपाद स्वामी शङ्कराचार्यने तो ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें स्थान-स्थानपर परमेश्वरके बदले 'प्राज्ञ' शब्दका ही प्रयोग किया है। उपनिषदोंमें भी अनेक स्थलोंपर 'प्राज्ञ' शब्दका परमेश्वरके स्थानमें प्रयोग किया गया है (बृ० उ० ४।३।२१ और ४।३।३५)। प्रस्तुत मन्त्रमें साथ-ही-साथ ईश्वरसे भिन्न शरीराभिमानी जीवात्माका भी वर्णन है। यहाँ प्रकरण भी सुषुप्तिका है; इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी दृष्टिसे 'प्राज्ञ' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। ब्रह्मसूत्र (१।३।४२) के भाष्यमें स्वयं शङ्कराचार्यजीने लिखा है कि 'सर्वज्ञतारूप प्रज्ञासे नित्य संयुक्त होनेके कारण 'प्राज्ञ' नाम परमेश्वरका ही है, अतः उपर्युक्त उपनिषद्-मन्त्रमें परमेश्वरका ही वर्णन है। इसके सिवा प्राज्ञके विशेषणोंमें 'प्रज्ञानधन' और 'आनन्दमय' शब्दोंका प्रयोग है जो कि जीवात्माके वाचक हो ही नहीं सकते (देखिये ब्रह्मसूत्र १।१।१२ और १६-१७), इसलिये यहाँ केवल 'सुषुप्तिस्थानः' पदके बलपर सुषुप्ति-अभिमानी जीवात्माको ब्रह्मका तीसरा पाद मान लेना उचित नहीं मालूम होता; क्योंकि इसके बाद अगले मन्त्रमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इन तीनों अवस्थाओंमें स्थित तीन पादोंके नामसे जिनका वर्णन हुआ है, वे सर्वेश्वर, सर्वज्ञ अन्तर््यामी, सम्पूर्ण जगत्के कारण और

२९०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मन्त्र ६-७ ]

समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। इसके सिवा ग्यारहवें मन्त्रमें ओंकारकी तीसरी मात्राके साथ तीसरे पादकी एकता करके उसे जाननेका फल सबको जानना और सम्पूर्ण जगत्को विलीन कर लेना बताया है; इसलिये भी 'प्राज्ञः' पदका वाच्यार्थ कारण-जगत्के अधिष्ठाता परमेश्वरको ही समझना चाहिये। वह प्राज्ञ ही पूर्णब्रह्म परमात्माका तीसरा पाद है ॥५॥

सम्बन्ध— ऊपर बतलाये हुए ब्रह्मके पाद वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ किसके नाम हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभावप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥

एषः =यह; सर्वेश्वरः =सबका ईश्वर है; एषः =यह; सर्वज्ञः =सर्वज्ञ है; एषः =यह; अन्तर्यामी =सबका अन्तर्यामी है; एषः =यह; सर्वस्य =सम्पूर्ण जगत्का; योनिः =कारण है; हि =क्योंकि; भूतानाम् =समस्त प्राणियोंका; प्रभावप्ययौ =उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है ॥६॥

व्याख्या— जिन परमेश्वरका तीनों पादोंके रूपमें वर्णन किया गया है, वे सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं। ये ही सर्वज्ञ और सबके अन्तर्यामी हैं। ये ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं; क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान ये ही हैं। प्रश्नोपनिषद्में तीनों मात्राओंसे युक्त ओंकारके द्वारा परम पुरुष परमेश्वरका ध्यान करनेकी बात कहकर उसका फल समस्त पापोंसे रहित हो अविनाशी परात्पर पुरुषोत्तमको प्राप्त कर लेना बताया गया है (५।५)। अतः पूर्ववर्णित वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ परमेश्वरके ही नाम हैं। अलग-अलग स्थितिमें उन्हींका वर्णन भिन्न-भिन्न नामोंसे किया गया है ॥६॥

सम्बन्ध— अब पूर्णब्रह्म परमात्माके चौथे पादका वर्णन करते हैं—

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७ ॥

मन्त्र ७ ]

माण्डूक्योपनिषद्

२९१

न अन्तःप्रज्ञम्=जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है; न बहिष्प्रज्ञम्=न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है; न उभयतःप्रज्ञम्=न दोनों ओर प्रज्ञावाला है; न प्रज्ञानघनम्=न प्रज्ञानघन है; न प्रज्ञम्=न जाननेवाला है; न अप्रज्ञम्=न नहीं जाननेवाला है; अदृष्टम्=जो देखा नहीं गया है; अव्यवहार्यम्=जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता; अग्राह्यम्=जो पकड़नेमें नहीं आ सकता; अलक्षणम्=जिसका कोई लक्षण (चिह्न) नहीं है; अचिन्त्यम्=जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता; अव्यपदेश्यम्=जो बतलानेमें नहीं आ सकता; एकात्मप्रत्ययसारम्=एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका सार (प्रमाण) है; प्रपञ्चोपशमम्=जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा; शान्तम्=सर्वथा शान्त; शिवम्=कल्याणमय; अद्वैतम्=अद्वितीय तत्त्व; चतुर्थम्=(परब्रह्म परमात्माका) चौथा पाद है; मन्यन्ते=(इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं; सः आत्मा=वह परमात्मा (है); सः विज्ञेयः=वह जाननेयोग्य (है) ॥ ७ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें निर्गुण-निराकार निर्विशेष स्वरूपको पूर्णब्रह्म परमात्माका चौथा पाद बताया गया है। भाव यह है कि जिसका ज्ञान न तो बाहरकी ओर है, न भीतरकी ओर है और न दोनों ही ओर है; जो न ज्ञानस्वरूप है, न जाननेवाला है और न नहीं जाननेवाला ही है; जो न देखनेमें आ सकता है, न व्यवहारमें लाया जा सकता है, न ग्रहण करनेमें आ सकता है, न चिन्तन करनेमें, न बतलानेमें आ सकता है और न जिसका कोई लक्षण ही है, जिसमें समस्त प्रपञ्चका अभाव है, एकमात्र परमात्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसमें सार (प्रमाण) है—ऐसा सर्वथा, शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व पूर्णब्रह्मका चौथा पाद माना जाता है। इस प्रकार जिनका चार पादोंमें विभाग करके वर्णन किया गया, वे ही पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हींको जानना चाहिये।

इस मन्त्रमें 'चतुर्थम् मन्यते' पदके प्रयोगसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ परब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना केवल उनका तत्त्व समझानेके लिये ही की गयी है; वास्तवमें अवयवरहित परमात्माके कोई भाग नहीं है। जो पूर्णब्रह्म परमात्मा स्थूल जगत्में परिपूर्ण हैं, वे ही सूक्ष्म और कारण जगत्के

२९२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ मन्त्र ८-९ ]

अन्तर्यामी और अधिष्ठाता भी हैं; तथा वे ही इन सबसे अलग निर्विशेष परमात्मा हैं। वे सर्वशक्तिमान् भी हैं और सब शक्तियोंसे रहित भी हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। वे साकार भी हैं और निराकार भी। वास्तवमें वे हमारी बुद्धि और तर्कसे सर्वथा अतीत हैं ॥७॥

सम्बन्ध— उक्त परब्रह्म परमात्माकी उनके वाचक प्रणवके साथ एकता करते हुए कहते हैं—

सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥८॥

सः =वह (जिसको चार पादवाला बताया गया है); अयम् =यह; आत्मा =परमात्मा; अध्यक्षरम् =(उसके वाचक) प्रणवके अधिकारमें (प्रकरणमें) वर्णित होनेके कारण; अधिमात्रम् =तीन मात्राओंसे युक्त; ओंकारः =ओंकार है; अकारः =‘अ’; उकारः =‘उ’ (और); मकारः =‘म’; इति =ये (तीनों); मात्राः =मात्राएँ ही; पादाः =(तीन) पाद हैं; =और; पादाः =(उस ब्रह्मके तीन) पाद ही; मात्राः =(तीन) मात्राएँ हैं ॥८॥

व्याख्या— वे परब्रह्म परमात्मा, जिनके चार पादोंका वर्णन किया गया है, यहाँ अक्षरके प्रकरणमें अपने नामसे अभिन्न होनेके कारण तीन मात्राओंवाला ओंकार हैं। ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’—ये तीनों मात्राएँ ही उनके उपर्युक्त तीन पाद हैं और उनके तीनों पाद ही ओंकारकी तीन मात्राएँ हैं। जिस प्रकार ओंकार अपनी मात्राओंसे अलग नहीं है, उसी प्रकार अपने पादोंसे परमात्मा अलग नहीं हैं। यहाँ पाद और मात्राकी एकता ओंकारके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी उपासनाके लिये की गयी है—ऐसा मालूम होता है ॥८॥

सम्बन्ध— ओंकारकी किस मात्रासे ब्रह्मके किस पादकी एकता है और वह क्यों है? इस जिज्ञासापर तीन मात्राओंका रहस्य समझानेके लिये प्रथम पहले पाद और पहली मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं—

जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽसे- रादिमत्त्वाद्वाऽऽज्जोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥

मन्त्र १० ]

माण्डूक्योपनिषद्

२९३

प्रथमाः=(औंकारकी) पहली; मात्रा=मात्रा; अकारः=अकार ही; आसेः=(समस्त जगत्के नामोंमें अर्थात् शब्दमात्रमें) व्यास होनेके कारण; वा=और; आदिमत्त्वात्=आदिवाला होनेके कारण; जागरितस्थानः=जगत्की भाँति स्थूल जगत्-रूप शरीरवाला; वैश्वानरः=वैश्वानर नामक पहला पाद है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है; [ सः ] ह वै=वह अवश्य ही; सर्वान्=सम्पूर्ण; कामान्=भोगोंको; आप्नोति=प्राप्त कर लेता है; च=और; आदिः=सबका आदि (प्रधान); भवति=बन जाता है ॥ ९ ॥

व्याख्या —परब्रह्म परमात्माके नामात्मक औंकारकी जो पहली मात्रा ‘अ’ है, यह समस्त जगत्के नामोंमें अर्थात् किसी भी अर्थको बतलानेवाले जितने भी शब्द हैं, उन सबमें व्यास है। स्वर अथवा व्यञ्जन—कोई भी वर्ण अकारसे रहित नहीं है। श्रुति भी कहती है—‘अकारो वै सर्वा वाक्’ (ऐतरेय आरण्यक० २।३।६)। गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि अक्षरोंमें (वर्णोंमें) मैं ‘अ’ हूँ (१०।३३) तथा समस्त वर्णोंमें ‘अ’ ही पहला वर्ण है। इसी प्रकार इस स्थूल जगत्-रूप विराट् शरीरमें वे वैश्वानररूप अन्तर््यामी परमेश्वर व्यास हैं और विराट्-रूपसे सबके पहले स्वयं प्रकट होनेके कारण इस जगत्के आदि भी वे ही हैं। इस प्रकार ‘अ’ की और जगत्की भाँति प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले इस स्थूल जगत्-रूप शरीरमें व्यास वैश्वानर नामक प्रथम पादकी एकता होनेके कारण ‘अ’ ही पूर्णब्रह्म परमेश्वरका पहला पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार अकार और विराट् शरीरके आत्मा परमेश्वरकी एकताको जानता है और उनकी उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको अर्थात् इच्छित पदार्थोंको पा लेता है और जगत्में प्रधान—सर्वमान्य हो जाता है ॥ ९ ॥

सम्बन्ध —अब दूसरे पादकी और दूसरी मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं—

स्वजस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्दोत्कर्षति ह वै ज्ञानसंततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥