ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
मन्त्र ५ ] ईशावास्योपनिषद् ३१
तथापि मनसे भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता। वे सबके आदि और ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं। पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्णरूपसे नहीं जान सकते (गीता १०।२)। जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी शक्तिभर परमेश्वरके अनुसंधानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं; परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं। वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग सकता है। बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण, प्रकाशन, प्राणिप्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है। उनका सहयोग मिले बिना ये सब कुछ भी नहीं कर सकते॥ ४॥
सम्बन्ध— अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकता प्रकारान्तरसे पुनः वर्णन करते हैं—
तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥ ५॥
तत्=वे; एजति=चलते हैं; तत्=वे; न एजति=नहीं चलते; तत्=वे; दूरे=दूरसे भी दूर हैं; तत्=वे; उ अन्तिके=अत्यन्त समीप हैं; तत्=वे; अस्य=इस; सर्वस्य=समस्त जगत्के; अन्तः=भीतर परिपूर्ण हैं; (और) तत्=वे; अस्य=इस; सर्वस्य=समस्त जगत्के; उ बाह्यतः=बाहर भी हैं॥ ५॥
व्याख्या— वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते; एक ही कालमें परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमें रह सकती है, वे ही तो परमेश्वर हैं। यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परमधाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण-साकार रूपमें प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है; और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा
३२ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ६-७
अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से-दूर हैं; और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोंके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप-से-समीप हैं। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वे ही हैं और समीप-से-समीप भी वे ही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं (गीता १३। १५)। वस्तुतः वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण वे ही हैं; इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं (गीता ७। ७) ॥ ५ ॥
सम्बन्ध— अब अगले दो मन्त्रोंमें इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है—
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥
**तु=**परन्तु; **यः=**जो मनुष्य; **सर्वाणि=**सम्पूर्ण; **भूतानि=**प्राणियोंको; **आत्मनि=**परमात्मामें; **एव=**ही; **अनुपश्यति=**निरन्तर देखता है; **च=**और; **सर्वभूतेषु=**सम्पूर्ण प्राणियोंमें; **आत्मानम्=**परमात्माको (देखता है); **ततः=**उसके पश्चात् (वह कभी भी); **न विजुगुप्सते=**किसीसे घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥
व्याख्या— इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है। वह तो सदा-सर्वत्र अपने परम प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०)। मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकारसे सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है ॥ ६ ॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥
मन्त्र ८ ] ईशावास्योपनिषद् ३३
यस्मिन्=जिस स्थितिमें; विजानतः=परब्रह्म परमेश्वरको भलीभाँति जाननेवाले महापुरुषके (अनुभवमें); सर्वाणि=सम्पूर्ण; भूतानि=प्राणी; आत्मा=एकमात्र परमात्मस्वरूप; एव=ही; अभूत्=हो चुकते हैं; तत्र=उस अवस्थामें (उस); एकत्वम्=एकताका—एकमात्र परमेश्वरका; अनुपश्यतः=निरन्तर साक्षात् करनेवाले पुरुषके लिये; कः=कौन-सा; मोहः=मोह (रह जाता है और); कः=कौन-सा; शोकः=शोक। (वह शोक-मोहसे सर्वथा रहित, आनन्दपरिपूर्ण हो जाता है) ॥ ७ ॥
व्याख्या— इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, जब उसकी सर्वत्र भगवद्दृष्टि हो जाती है—जब वह प्राणिमात्रमें एकमात्र तत्त्व श्रीपरमात्माको ही देखता है, तब उसे सदा-सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं। उस समय उसके अन्तःकरणमें शोक, मोह आदि विकार कैसे रह सकते हैं ? वह तो इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं उसके चित्तप्रदेशमें नहीं रह जाती। लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी वस्तुतः अपने प्रभुमें ही क्रीडा करता है (गीता ६। ३१)। उसके लिये प्रभु और प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता ॥ ७ ॥
सम्बन्ध— अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हैं—
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण- मस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतो- ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥
सः=वह महापुरुष; शुक्रम्=(उन) परम तेजोमय; अकायम्=सूक्ष्मशरीरसे रहित; अव्रणम्=छिद्ररहित या क्षतरहित; अस्नाविरम्=शिराओंसे रहित—स्थूल पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित; शुद्धम्=अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप; अपापविद्धम्=शुभाशुभकर्म-सम्पर्कशून्य परमेश्वरको; पर्यगात्=प्राप्त हो जाता है;
३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ९
(जो) कविः=सर्वद्रष्टा; मनीषी=सर्वज्ञ एवं ज्ञानस्वरूप; परिभूः=सर्वोपरि विद्यमान एवं सर्वनियन्ता; स्वयम्भूः=स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं (और); शाश्वतीभ्यः=अनादि; समाभ्यः=कालसे; याथातथ्यतः=सब प्राणियोंके कर्मानुसार यथायोग्य; अर्थान्=सम्पूर्ण पदार्थोंकी; व्यदधात्=रचना करते आये हैं॥ ८॥
**व्याख्या—**उपर्युक्त वर्णनके अनुसार परमेश्वरको सर्वत्र जानने-देखनेवाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वरको प्राप्त होता है, जो शुभाशुभ कर्मजनित प्राकृत सूक्ष्म देह तथा पाञ्चभौतिक अस्थि-शिरा-मांसादिमय षड्विकारयुक्त स्थूल देहसे रहित, छिद्ररहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्दघन हैं; एवं जो क्रान्तदर्शी—सर्वद्रष्टा हैं, सबके ज्ञाता, सबको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले सर्वाधिपति हैं; और कर्मपरवश नहीं वरं स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं तथा जो सनातन कालसे सब प्राणियोंके लिये उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थोंकी यथायोग्य रचना और विभागव्यवस्था करते आये हैं॥ ८॥
सम्बन्ध— अब अगले तीन मन्त्रोंमें विद्या और अविद्याका तत्त्व समझाया जायगा। इस प्रकरणमें परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिके साधन 'ज्ञान' को विद्याके नामसे कहा गया है और स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति अथवा इस लोकके विविध भोगैश्वर्यकी प्राप्तिके साधन 'कर्म'को अविद्याके नामसे। इन ज्ञान और कर्म—दोनोंके तत्त्वको भलीभाँति समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ही इन दोनों साधनोंके द्वारा सर्वोत्तम तथा वास्तविक फल प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं—इस रहस्यको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—
अन्धंतमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया ँ रताः॥ ९॥
ये=जो मनुष्य; अविद्याम्=अविद्याकी; उपासते=उपासना करते हैं, (वे); अन्धम्=अज्ञानस्वरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं; (और) ये=जो मनुष्य; विद्यायाम्=विद्यामें; रताः=रत हैं अर्थात् ज्ञानके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उससे; उ=भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं)॥ ९॥
मन्त्र १० ] ईशावास्योपनिषद् ३५
व्याख्या—जो मनुष्य भोगोंमें आसक्त होकर उनकी प्राप्तिके साधनरूप अविद्याका—विविध प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे उन कर्मोंके फलस्वरूप अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण विविध योनियों और भोगोंको ही प्राप्त होते हैं। वे मनुष्य-जन्मके चरम और परम लक्ष्य श्रीपरमेश्वरको न पाकर निरन्तर जन्म-मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें पड़े हुए विविध तापोंसे संतप्त होते रहते हैं।
दूसरे जो मनुष्य न तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्तापनके अभिमानसे रहित कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और न विवेक-वैराग्यादि ज्ञानके प्राथमिक साधनोंका ही सेवन करते हैं; परंतु केवल शास्त्रोंको पढ़-सुनकर अपनेमें विद्याका—ज्ञानका मिथ्या आरोप करके ज्ञानाभिमानी बन बैठते हैं, ऐसे, मिथ्या ज्ञानी मनुष्य अपनेको ज्ञानी मानकर, ‘हमारे लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है’ इस प्रकार कहते हुए कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर देते हैं और इन्द्रियोंके वशमें होकर शास्त्रविधिसे विपरीत मनमाना आचरण करने लगते हैं। इससे वे लोग सकामभावसे कर्म करनेवाले विषयासक्त मनुष्योंकी अपेक्षा भी अधिकतर अन्धकारको—पशु-पक्षी, शूकर-कूकर आदि नीच योनियोंको और रौरव-कुम्भीपाकादि घोर नरकोंको प्राप्त होते हैं॥ ९॥
सम्बन्ध—शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर ज्ञान तथा कर्मका अनुष्ठान करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, उसका संकेतसे वर्णन करते हैं—
अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १०॥
विद्यया=ज्ञानके यथार्थ अनुष्ठानसे; अन्यत् एव=दूसरा ही फल; आहुः=बतलाते हैं; (और) अविद्यया=कर्मोंके यथार्थ अनुष्ठानसे; अन्यत्=दूसरा (ही) फल; आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; (हमने) धीराणाम्=(उन) धीर पुरुषोंके; शुश्रुम=वचन सुने हैं; ये=जिन्होंने; नः=हमें; तत्=उस विषयको; विचचक्षिरे=व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १०॥
व्याख्या—सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले ज्ञानका यथार्थ स्वरूप है—
३६ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ११
नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गुर विनाशशील अनित्य ऐहलौकिक और पारलौकिक भोग-सामग्रियों और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमपूर्ण पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमें अखण्ड संलग्नता। इस यथार्थ ज्ञानके अनुष्ठानसे प्राप्त होता है—परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता १८।४९—५५)। यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल, ज्ञानाभिमानमें रत स्वेच्छाचारी मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है—कर्ममें कर्तापनके अभिमानका अभाव, राग-द्वेष और फल-कामनाका अभाव एवं अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित कर्मोंका यथायोग्य सेवन। इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष-शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो पुनर्जन्मरूप फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म-सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इस प्रकार हमने उन परम ज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १०॥
सम्बन्ध— अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म—दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं—
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँसह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥
यः=जो मनुष्य; तत् उभयम्=उन दोनोंको; (अर्थात्) विद्याम्=ज्ञानके तत्त्वको; च=और; अविद्याम्=कर्मके तत्त्वको; च=भी; सह=साथ-साथ; वेद= यथार्थतः जान लेता है; अविद्यया=(वह) कर्मोंके अनुष्ठानसे; मृत्युम्=मृत्युको; तीर्त्वा=पार करके; विद्यया=ज्ञानके अनुष्ठानसे; अमृतम्=अमृतको; अश्नुते=
मन्त्र ११ ]
ईशावास्योपनिषद्
३७
भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥
व्याख्या— कर्म और अकर्मका वास्तविक रहस्य समझनेमें बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी भूल कर बैठते हैं (गीता ४।१६)। इसी कारण कर्म-रहस्यसे अनभिज्ञ ज्ञानाभिमानी मनुष्य कर्मको ब्रह्मज्ञानमें बाधक समझ लेते हैं और अपने वर्णाश्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मोंका त्याग कर देते हैं; परंतु इस प्रकारके त्यागसे उन्हें त्यागका यथार्थ फल—कर्मबन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता (गीता १८।८)। इसी प्रकार ज्ञान (अकर्मवस्था—नैष्कर्म्य)—का तत्त्व न समझनेके कारण मनुष्य अपनेको ज्ञानी तथा संसारसे ऊपर उठे हुए मान लेते हैं। अतः वे या तो अपनेको पुण्य-पापसे अलिस मानकर मनमाने कर्मचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मोंको भाररूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलस्य, निद्रा तथा प्रमादमें अपने दुर्लभ मानव-जीवनके अमूल्य समयको नष्ट कर देते हैं।
इन दोनों प्रकारके अनर्थोंसे बचनेका एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञानके रहस्यको साथ-साथ समझकर उनका यथायोग्य अनुष्ठान करना ही है। इसीलिये इस मन्त्रमें यह कहा गया है कि जो मनुष्य इन दोनोंके तत्त्वको एक ही साथ भलीभाँति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थितिके अनुरूप शास्त्रविहित कर्मोंका स्वरूपतः त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापनके अभिमानसे तथा रागद्वेष और फलकामनासे रहित होकर उनका यथायोग्य आचरण करता है। इससे उसकी जीवनयात्रा भी सुखपूर्वक चलती है और इस भावसे कर्मानुष्ठान करनेके फलस्वरूप उसका अन्तःकरण समस्त दुर्गुणों एवं विकारोंसे रहित होकर अत्यन्त निर्मल हो जाता है और भगवत्कृपासे वह मृत्युमय संसारसे सहज ही तर जाता है। इस कर्मसाधनके साथ-ही-साथ विवेक-वैराग्यसम्पन्न होकर निरन्तर ब्रह्मविचाररूप ज्ञानाभ्यास करते रहनेसे श्रीपरमेश्वरके यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर वह शीघ्र ही परब्रह्म परमेश्वरको साक्षात् प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥
३८ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १२
सम्बन्ध— अब अगले तीन मन्त्रोंमें असम्भूति और सम्भूतिका तत्त्व बतलाया जायगा। इस प्रकरणमें 'असम्भूति' शब्दका अर्थ है— जिनकी पूर्णरूपसे सत्ता न हो, ऐसी विनाशशील देव, पितर और मनुष्यादि योनियाँ एवं उनकी भोग-सामग्रियाँ। इसीलिये चौदहवें मन्त्रमें 'असम्भूति' के स्थानपर स्पष्टतया 'विनाश' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार सम्भूति शब्दका अर्थ है—जिसकी सत्ता पूर्णरूपसे हो वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाला अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता ७। ६-७)।
देव, पितर और मनुष्यादिकी उपासना किस प्रकार करनी चाहिये और अविनाशी परब्रह्मकी किस प्रकार—इस तत्त्वको समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य ही उनके सर्वोत्तम फलोंको प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं। इस भावको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँरताः॥ १२॥
ये=जो मनुष्य; असम्भूतिम्=विनाशशील देव-पितर-मनुष्य आदिकी; उपासते=उपासना करते हैं; (ते)=वे; अन्धम्=अज्ञानरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं; (और) ये=जो; सम्भूत्याम्= अविनाशी परमेश्वरमें; रताः=रत हैं अर्थात् उनकी उपासनाके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उनसे; उ=भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं)॥ १२॥
**व्याख्या—**जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोककी भोग-सामग्रियोंमें आसक्त होकर उन्हींको सुखका हेतु समझते हैं तथा उन्हींके अर्जन-सेवनमें सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग-सामग्रियोंकी प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धिके लिये उन विभिन्न देवता, पितर और मनुष्यादिकी उपासना करते हैं, जो स्वयं जन्म-मरणके चक्रमें पड़े हुए होनेके कारण अभावग्रस्त और शरीरकी दृष्टिसे विनाशशील हैं, उनके उपासक वे भोगासक्त मनुष्य अपनी उपासनाके फलस्वरूप विभिन्न देवताओंके
मन्त्र १३ ] ईशावास्योपनिषद् ३९
लोकोंको और विभिन्न भोगयोनियोंको प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है। (गीता ७।२० से २३)
दूसरे जो मनुष्य शास्त्रके तात्पर्यको तथा भगवान्के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको न समझनेके कारण न तो भगवान्का भजन-ध्यान ही करते हैं और न श्रद्धाका अभाव तथा भोगोंमें आसक्ति होनेके कारण लोकसेवा और शास्त्रविहित देवोपासनामें ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त मनुष्य झूठ-मूठ ही अपनेको ईश्वरोपासक बतलाकर सरलहृदय जनतासे अपनी पूजा कराने लगते हैं। ये लोग मिथ्याभिमानके कारण देवताओंको तुच्छ बतलाते हैं और शास्त्रानुसार आवश्यकर्तव्य देवपूजा तथा गुरुजनोंका सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरोंको भी अपने वाग्जालमें फँसाकर उनके मनोंमें भी देवोपासना आदिके प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपनेको ही ईश्वरके समकक्ष मानते-मनवाते हुए मनमाने दुराचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं। ऐसे दम्भी मनुष्योंको अपने दुष्कर्मोंका कुफल भोगनेके लिये बाध्य होकर कूकर-शूकर आदि नीच योनियोंमें और रौरव-कुम्भीपाकादि नरकोंमें जाकर भीषण यन्त्रणाएँ भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओंकी उपासना करनेवालोंकी अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है (गीता १६। १८-१९) ॥ १२ ॥
**सम्बन्ध—**शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर सम्भूति और असम्भूतिकी उपासना करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, अब संकेतसे उसका वर्णन करते हैं—
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥
सम्भवात्=अविनाशी ब्रह्मकी उपासनासे; अन्यत् एव=दूसरा ही फल; आहुः=बतलाते हैं; (और) असम्भवात्=विनाशशील देव-पितर-मनुष्य आदिकी उपासनासे; अन्यत्=दूसरा (ही) फल; आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; (हमने) धीराणाम्=(उन) धीर पुरुषोंके; शुश्रुम=वचन सुने हैं; ये=जिन्होंने; नः=हमें; तत्=उस विषयको; विचचक्षिरे=व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १३॥
४० ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १४
व्याख्या— अविनाशी ब्रह्मकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है—परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्को सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सर्वमय, सम्पूर्ण संसारके कर्ता, धर्ता, हर्ता, नित्य अविनाशी समझना और भक्ति, श्रद्धा तथा प्रेमपरिपूरित हृदयसे नित्य-निरन्तर उनके दिव्य परम मधुर नाम, रूप, लीला, धाम तथा प्राकृत गुणरहित एवं दिव्य गुणगणमय सच्चिदानन्दघन स्वरूपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करते रहना। इस प्रकारकी सच्ची उपासनासे उपासकको शीघ्र ही अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्ति हो जाती है (गीता ९।३४)। ईश्वरोपासनाका मिथ्या स्वाँग भरनेवाले दम्भियोंको जो फल मिलता है, उससे इन सच्चे उपासकोंको मिलनेवाला यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इसी प्रकार विनाशशील देवता, पितर, मनुष्य आदिकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है—शास्त्रों एवं श्रीभगवान्के आज्ञानुसार (गीता १७।१४) देवता, पितर, ब्राह्मण, माता-पिता, आचार्य और ज्ञानी महापुरुषोंकी सेवा-पूजादि अवश्य-कर्तव्य समझकर करना और उसको भगवान्की आज्ञाका पालन एवं उनकी परम सेवा समझना। इस प्रकार निष्कामभावसे देव-पितर-मनुष्य आदिकी सेवा-पूजा करनेवालोंके अन्तःकरणकी शुद्धि होती है तथा उनको श्रीभगवान्की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त होती है, जिससे वे मृत्युमय संसारसागरसे तर जाते हैं। विनाशशील देवता आदिकी सकाम उपासनासे जो फल मिलता है, उससे यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इस प्रकार हमने उन धीर तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १३॥
सम्बन्ध— अब उपर्युक्त प्रकारसे सम्भूति और असम्भूति दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट बतलाते हैं—
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयँ सह। विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते॥ १४॥
यः=जो मनुष्य; तत् उभयम्=उन दोनोंको; (अर्थात्) सम्भूतिम्=अविनाशी परमेश्वरको; च=और; विनाशम्=विनाशशील देवादिको; च=भी; सह=साथ-साथ;
मन्त्र १५ ] ईशावास्योपनिषद् ४१
वेद=यथार्थतः जान लेता है; विनाशेन=(वह) विनाशशील देवादिकी उपासनासे; **मृत्युम्=**मृत्युको; **तीर्त्वा=**पार करके; **सम्भूत्या=**अविनाशी परमेश्वरकी उपासनासे; **अमृतम्=**अमृतको; **अश्नुते=**भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है॥ १४॥
व्याख्या— जो मनुष्य यह समझ लेता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम नित्य, अविनाशी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वाधिपति, सर्वात्मा और सर्वश्रेष्ठ हैं, वे परमेश्वर नित्य निर्गुण (प्राकृत गुणोंसे सर्वथा रहित) और नित्य सगुण (स्वरूपभूत दिव्यकल्याण-गुणगण-विभूषित) हैं और इसीके साथ जो यह भी समझ लेता है कि देवता, पितर, मनुष्य आदि जितनी भी योनियाँ तथा भोगसामग्रियाँ हैं, सभी विनाशशील, क्षणभङ्गुर और जन्म-मृत्युशील होनेके कारण महान् दुःखके कारण हैं; तथापि इनमें जो सत्ता-स्फूर्ति तथा शक्ति है, वह सभी भगवान्की है और भगवान्के जगच्चक्रके सुचारुरूपसे चलते रहनेके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ ही इनकी यथायोग्य सेवा-पूजा आदि करनेकी शास्त्रोंने आज्ञा दी है और शास्त्र भगवान्की ही वाणी हैं, वह मनुष्य ऐहलौकिक तथा पारलौकिक देव-पितरादि लोकोंके भोगोंमें आसक्त न होकर कामना-ममता आदि हृदयसे निकालकर इन सबकी यथायोग्य शास्त्रविहित सेवा-पूजादि करता है। इससे उसकी जीवन-यात्रा सुखपूर्वक चलती है और उसके आभ्यन्तरिक विकारोंका नाश होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है एवं भगवत्कृपासे वह सहज ही मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। विनाशशील देवता आदिकी निष्काम उपासनाके साथ-ही-साथ अविनाशी परात्पर प्रभुकी उपासनासे वह शीघ्र ही अमृतरूप परमेश्वरको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है॥ १४॥
सम्बन्ध— श्रीपरमेश्वरकी उपासना करनेवालेको परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, यह कहा गया। अतः भगवान्के भक्तको अन्तकालमें परमेश्वरसे उनकी प्राप्तिके लिये किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥ १५॥
४२ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १६
**पूषन्=**हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर; **सत्यस्य=**सत्यस्वरूप आप सर्वेश्वरका; **मुखम्=**श्रीमुख; **हिरण्मयेन=**ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलरूप; **पात्रेण=**पात्रसे; **अपिहितम्=**ढका हुआ है; **सत्यधर्माय=**आपकी भक्तिरूप सत्यधर्मका अनुष्ठान करनेवाले मुझको; **दृष्टये=**अपने दर्शन करानेके लिये; **तत्=**उस आवरणको; **त्वम्=**आप; **अपावृणु=**हटा लीजिये॥ १५॥
**व्याख्या—**भक्त इस प्रकार प्रार्थना करे कि 'हे भगवन् ! आप अखिल ब्रह्माण्डके पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्यधर्म है और मैं उसमें लगा हुआ हूँ; अतएव मेरी पुष्टि—मेरे मनोरथकी पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। आपका दिव्य श्रीमुख—सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय सूर्यमण्डलकी चमचमाती हुई ज्योतिर्मयी यवनिकासे आवृत्त है। मैं आपका निरावरण—प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ, अतएव आपके पास पहुँचकर आपका निरावरण—दर्शन करनेमें बाधा देनेवाले जितने भी, जो भी आवरण—प्रतिबन्धक हों, उन सबको मेरे लिये आप हटा लीजिये! अपने सच्चिदानन्दस्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट कीजिये'॥ १५॥
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजा-
पत्य व्यूह रश्मीन्समूह।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥ १६॥
**पूषन्=**हे भक्तोंका पोषण करनेवाले; **एकर्षे=**हे मुख्य ज्ञानस्वरूप; **यम=**हे सबके नियन्ता; **सूर्य=**हे भक्तों या ज्ञानियों (सूरियों) के परम लक्ष्यरूप; **प्राजापत्य=**हे प्रजापतिके प्रिय; **रश्मीन्=**इन रश्मियोंको; **व्यूह=**एकत्र कीजिये या हटा लीजिये; **तेजः=**इस तेजको; **समूह=**समेट लीजिये या अपने तेजमें मिला लीजिये; **यत्=**जो; **ते=**आपका; **कल्याणतमम्=**अतिशय कल्याणमय; **रूपम्=**दिव्य स्वरूप है; **तत्=**उस; **ते=**आपके दिव्य स्वरूपको; **पश्यामि=**मैं आपकी कृपासे ध्यानके द्वारा देख रहा हूँ; **यः=**जो; **असौ=**वह (सूर्यका आत्मा) है;
मन्त्र १७ ] ईशावास्योपनिषद् ४३
असौ=वह; पुरुषः=परम पुरुष (आपका ही स्वरूप है); अहम्=मैं (भी); सः अस्मि=वही हूँ॥ १६ ॥
व्याख्या—भगवन्! आप अपनी सहज कृपासे भक्तोंके भक्ति-साधनमें दृष्टि प्रदान करके उनका पोषण करनेवाले हैं; आप समस्त ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, परम ज्ञानस्वरूप तथा अपने भक्तोंको अपने स्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं (गीता १०। ११); आप सबका यथायोग्य नियमन, नियन्त्रण और शासन करनेवाले हैं; आप ही भक्तों या ज्ञानी महापुरुषोंके लक्ष्य हैं और अविज्ञेय होनेपर भी अपने भक्तवत्सल स्वभावके कारण भक्तिके द्वारा उनके जाननेमें आ जाते हैं; आप प्रजापतिके भी प्रिय हैं। हे प्रभो! इस सूर्यमण्डलकी तप्त रश्मियोंको एकत्र करके अपनेमें लुप्त कर लीजिये। इसके उग्र तेजको समेटकर अपनेमें मिला लीजिये और मुझे अपने दिव्यस्वरूपके प्रत्यक्ष दर्शन कराइये। अभी तो मैं आपकी कृपासे आपके सौन्दर्य-माधुर्य-निधि दिव्य परम कल्याणमय सच्चिदानन्दस्वरूपका ध्यान-दृष्टिसे दर्शन कर रहा हूँ; साथ ही बुद्धिके द्वारा समझ भी रहा हूँ कि जो आप परम पुरुष इस सूर्यके और समस्त विश्वके आत्मा हैं, वही मेरे भी आत्मा हैं; अतः मैं भी वही हूँ॥ १६॥
सम्बन्ध—ध्यानके द्वारा भगवान्के दिव्य मङ्गलमय स्वरूपके दर्शन करता हुआ साधक अब भगवान्की साक्षात् सेवामें पहुँचनेके लिये व्यग्र हो रहा है और शरीरका त्याग करते समय सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरके सर्वथा विघटनकी भावना करता हुआ भगवान्से प्रार्थना करता है—
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त ूँ शरीरम्।
ॐक्रतो स्मर कृत ूँ स्मर क्रतो स्मर कृत ूँ स्मर ॥ १७ ॥
अथ=अब; वायुः=ये प्राण और इन्द्रियाँ; अमृतम्=अविनाशी; अनिलम्=समष्टि वायु-तत्त्वमें; (प्रविशतु)=प्रविष्ट हो जायें; इदम्=यह; शरीरम्=स्थूल शरीर; भस्मान्तम्=अग्निमें जलकर भस्मरूप; (भूयात्)=हो जाय; ॐ=हे सच्चिदानन्दघन;
४४ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १८
क्रतो=यज्ञमय भगवन्; स्मर=(आप मुझ भक्तको) स्मरण करें; कृतम्=मेरे द्वारा किये हुए कर्मोंका; स्मर=स्मरण करें; क्रतो=हे यज्ञमय भगवन्; स्मर=(आप मुझ भक्तको) स्मरण करें; कृतम्=(मेरे) कर्मोंको; स्मर=स्मरण करें ॥१७॥
व्याख्या—परमधामका यात्री वह साधक अपने प्राण, इन्द्रिय और शरीरको अपनेसे सर्वथा भिन्न समझकर उन सबको उनके अपने-अपने उपादान तत्त्वमें सदाके लिये विलीन करना एवं सूक्ष्म और स्थूल शरीरका सर्वथा विघटन करना चाहता है। इसलिये कहता है कि प्राणादि समष्टिवायु आदिमें प्रविष्ट हो जायँ और स्थूल शरीर जलकर भस्म हो जाय। फिर वह अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीभगवान्से प्रार्थना करता है कि ‘हे यज्ञमय विष्णु—सच्चिदानन्द विज्ञानस्वरूप परमेश्वर! आप अपने निजजन मुझको और मेरे कर्मोंको स्मरण कीजिये। आप स्वभावसे ही मेरा और मेरे द्वारा बने हुए भक्तिरूप कार्योंका स्मरण करेंगे; क्योंकि आपने कहा है, ‘अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्’ मैं अपने भक्तका स्मरण करता हूँ और उसे परम गतिमें पहुँचा देता हूँ, अपनी सेवामें स्वीकार कर लेता हूँ, क्योंकि यही सर्वश्रेष्ठ गति है।’
इसी अभिप्रायसे भक्त यहाँ दूसरी बार फिर कहता है कि ‘भगवन्! आप मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण कीजिये। अन्तकालमें मैं आपकी स्मृतिमें आ गया तो फिर निश्चय ही आपकी सेवामें शीघ्र पहुँच जाऊँगा॥ १७॥
सम्बन्ध—इस प्रकार अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्से प्रार्थना करके अब साधक अपुनरावर्ती अर्चि आदि मार्गके द्वारा परम धाममें जाते समय उस मार्गके अग्निअभिमानी देवतासे प्रार्थना करता है—
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम*॥ १८॥
* यजुर्वेद ५। ३६। १७। ४३, ४०। १६ और ऋग्वेद १। १८९। १ में भी यही मन्त्र है।
मन्त्र १८ ] ईशावास्योपनिषद् ४५
अग्ने = हे अग्निके अधिष्ठातृ देवता!; अस्मान् = हमें; राये = परम धनरूप परमेश्वरकी सेवामें पहुँचानेके लिये; सुपथा = सुन्दर शुभ (उत्तरायण) मार्गसे; नय = (आप) ले चलिये; देव = हे देव; (आप हमारे) विश्वानि = सम्पूर्ण; वयुनानि = कर्मोंको; विद्वान् = जाननेवाले हैं; (अतः) अस्मत् = हमारे; जुहुराणम् = इस मार्गके प्रतिबन्धक; एनः = (जो) पाप हों (उन सबको); युयोधि = (आप) दूर कर दीजिये; ते = आपको; भूयिष्ठाम् = बार-बार; नमउक्तिम् = नमस्कारके वचन; विधेम = (हम) कहते हैं—बार-बार नमस्कार करते हैं॥ १८॥
**व्याख्या—**साधक कहता है—हे अग्निदेवता ! मैं अब अपने परम प्रभु भगवान्की सेवामें पहुँचना और सदाके लिये उन्हींकी सेवामें रहना चाहता हूँ। आप शीघ्र ही मुझे परम सुन्दर मङ्गलमय उत्तरायणमार्गसे भगवान्के परमधाममें पहुँचा दीजिये। आप मेरे कर्मोंको जानते हैं। मैंने जीवनमें भगवान्की भक्ति की है और उनकी कृपासे इस समय भी मैं ध्याननेत्रोंसे उनके दिव्य स्वरूपके दर्शन और उनके नामोंका उच्चारण कर रहा हूँ। तथापि आपके ध्यानमें मेरा कोई ऐसा कर्म शेष हो, जो इस मार्गमें प्रतिबन्धकरूप हो, तो आप कृपा करके उसे नष्ट कर दीजिये। मैं आपको बार-बार विनयपूर्वक नमस्कार करता हूँ*॥ १८॥
यजुर्वेदीय ईशावास्योपनिषद् समाप्त
* इस उपनिषद्का पंद्रहवाँ और सोलहवाँ मन्त्र सबके लिये मननीय है। इन मन्त्रोंके भावके अनुसार सबको भगवान्से दर्शन देनेके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। ‘सत्यधर्माय दृष्टये’ का यह भाव भी समझना चाहिये कि ‘भगवन्! आप अपने स्वरूपका वह आवरण—परदा हटा दीजिये, जिससे सत्यधर्मरूप आप परमेश्वरकी प्राप्ति तथा आपके मङ्गलमय श्रीविग्रहका दर्शन हो सके। इसी प्रकार सत्रहवें और अठारहवें मन्त्रके भावका भी प्रत्येक मनुष्यको विशेषतः मुमूर्षु-अवस्थामें अवश्य स्मरण करना चाहिये।
४६ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १८
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः
इसका अर्थ इस ग्रन्थके प्रारम्भमें दिया जा चुका है।
इन मन्त्रोंके अनुसार अन्तकालमें भगवान्की प्रार्थना करनेसे मनुष्यमात्रका कल्याण हो सकता है। भगवान्ने स्वयं भी गीतामें कहा है—
अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
(८।५)
मुमूर्षुमात्रके लाभके लिये इन दो मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है—हे परमात्मन्! मेरे ये इन्द्रिय और प्राण आदि अपने-अपने कारण तत्त्वोंमें लीन हो जायँ और मेरा यह स्थूल शरीर भी भस्म हो जाय। इनके प्रति मेरे मनमें किञ्चित् भी आसक्ति न रहे। हे यज्ञमय विष्णो! आप कृपा करके मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण करें। आपके स्मरण कर लेनेसे मैं और मेरे कर्म सब पवित्र हो जायँगे। फिर तो मैं अवश्य ही आपके चरणोंकी सेवामें पहुँच जाऊँगा॥ १७॥ हे अग्निस্বরূপ परमेश्वर! आप ही मेरे धन हैं—सर्वस्व हैं, अतः आपकी ही प्राप्तिके लिये आप मुझे उत्तम मार्गसे अपने चरणोंके समीप पहुँचाइये। मेरे जितने भी शुभाशुभ कर्म हैं, वे आपसे छिपे नहीं हैं, आप सबको जानते हैं, मैं उन कर्मोंके बलपर आपको नहीं पा सकता। आप स्वयं ही दया करके मुझे अपना लीजिये। आपकी प्राप्तिमें जो भी प्रतिबन्धक पाप हों, उन सबको आप दूर कर दें; मैं बारम्बार आपको नमस्कार करता हूँ॥ १८॥
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
केनोपनिषद्
यह उपनिषद् सामवेदके 'तलवकार ब्राह्मण' के अन्तर्गत है। तलवकारको जैमिनीय-उपनिषद् भी कहते हैं। 'तलवकार ब्राह्मण' के अस्तित्वके सम्बन्धमें कुछ पाश्चात्त्य विद्वानोंको संदेह हो गया था, परंतु डॉ० बर्नेलको कहींसे एक प्राचीन प्रति मिल गयी, तबसे वह संदेह जाता रहा। इस उपनिषद्में सबसे पहले 'केन' शब्द आया है, इसीसे इसका 'केनोपनिषद्' नाम पड़ गया। इसे 'तलवकार-उपनिषद्' और 'ब्राह्मणोपनिषद्' भी कहते हैं। तलवकार ब्राह्मणका यह नवम अध्याय है। इसके पूर्वके आठ अध्यायोंमें अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये विभिन्न कर्म और उपासनाओंका वर्णन है। इस उपनिषद्का प्रतिपाद्य विषय परब्रह्म-तत्त्व बहुत ही गहन है, अतएव उसको भलीभाँति समझानेके लिये गुरु-शिष्य-संवादके रूपमें तत्त्वका विवेचन किया गया है।
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
ॐ=हे परब्रह्म परमात्मन्; मम=मेरे; अङ्गानि=सम्पूर्ण अङ्ग; वाक्=वाणी; प्राणः=प्राण; चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=कान; च=और; सर्वाणि=सब; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; अथो=तथा; बलम्=शक्ति; आप्यायन्तु=परिपुष्ट हों; सर्वम्=(यह जो) सर्वरूप; औपनिषदम्=उपनिषत्-प्रतिपादित; ब्रह्म=ब्रह्म है; अहम्=मैं; ब्रह्म=इस ब्रह्मको; मा निराकुर्याम्=अस्वीकार न करूँ; (और) ब्रह्म=ब्रह्म; मा=मुझको; मा
४८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ खण्ड १ ]
निराकरोत्=परित्याग न करे; अनिराकरणम्=(उसके साथ मेरा) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो; मे=मेरे साथ; अनिराकरणम्=(उसका) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो; उपनिषत्सु=उपनिषदोंमें प्रतिपादित; ये=जो; धर्माः=धर्मसमूह हैं; ते=वे सब; तदात्मनि=उस परमात्ममें; निरते=लगे हुए; मयि=मुझमें; सन्तु=हों; ते=वे सब; मयि=मुझमें; सन्तु=हों। ॐ=हे परमात्मन्; शान्तिः शान्तिः शान्तिः=त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो।
व्याख्या —हे परमात्मन् ! मेरे सारे अङ्ग, वाणी, नेत्र, श्रोत्र आदि सभी कर्मन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणसमूह, शारीरिक और मानसिक शक्ति तथा ओज—सब पुष्टि एवं वृद्धिको प्राप्त हों। उपनिषदोंमें सर्वरूप ब्रह्मका जो स्वरूप वर्णित है, उसे मैं कभी अस्वीकार न करूँ और वह ब्रह्म भी मेरा कभी परित्याग न करे। मुझे सदा अपनाये रखे। मेरे साथ ब्रह्मका और ब्रह्मके साथ मेरा नित्य सम्बन्ध बना रहे। उपनिषदोंमें जिन धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, वे सारे धर्म, उपनिषदोंके एकमात्र लक्ष्य परब्रह्म परमात्मामें निरन्तर लगे हुए मुझ साथकमें सदा प्रकाशित रहें, मुझमें नित्य-निरन्तर बने रहें। और मेरे त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो।
प्रथम खण्ड
सम्बन्ध—शिव्य गुरुदेवसे पूछता है—
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥
केन=किसके द्वारा; इषितम्=सत्तापूर्ति पाकर; (और) प्रेषितम्=प्रेरित—संचालित होकर; (यह) मनः=मन (अन्तःकरण); पतति=अपने विषयोंमें गिरता है—उनतक पहुँचता है; केन=किसके द्वारा; युक्तः=नियुक्त होकर; प्रथमः=अन्य सबसे श्रेष्ठ; प्राणः=प्राण; प्रैति=चलता है; केन=किसके द्वारा; इषिताम्=क्रियाशील की हुई; इमाम्=इस; वाचम्=वाणीको; वदन्ति=लोग बोलते हैं; कः=(और) कौन;
खण्ड १ ] केनोपनिषद् ४१
उ=प्रसिद्ध; देवः=देव; चक्षुः=नेत्रेन्द्रिय (और); श्रोत्रम्=कर्णेन्द्रियको; युनक्ति=नियुक्त करता है (अपने-अपने विषयोंके अनुभवमें लगाता है) ॥ १ ॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें चार प्रश्न हैं। इनमें प्रकारान्तरसे यह पूछा गया है कि जडरूप अन्तःकरण, प्राण, वाणी आदि कर्मेन्द्रियों और चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियोंको अपना-अपना कार्य करनेकी योग्यता प्रदान करनेवाला और उन्हें अपने-अपने कार्यमें प्रवृत्त करनेवाला जो कोई एक सर्वशक्तिमान् चेतन है, वह कौन है? और कैसा है?॥ १॥
**सम्बन्ध—**इसके उत्तरमें गुरु कहते हैं—
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाच ँ स उ प्राणस्य प्राणः।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥
यत्=जो; मनसः=मनका; मनः=मन अर्थात् कारण है; प्राणस्य=प्राणका; प्राणः=प्राण है; वाचः=वाक् इन्द्रियका; वाचम्=वाक् है; श्रोत्रस्य=श्रोत्रेन्द्रियका; श्रोत्रम्=श्रोत्र है; उ=और; चक्षुषः=चक्षु इन्द्रियका; चक्षुः=चक्षु है; सः=वह; ह=ही (इन सबका प्रेरक परमात्मा है); धीराः=ज्ञानीजन (उसे जानकर); अतिमुच्य=जीवन्मुक्त होकर; अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; प्रेत्य=जानेके बाद (मृत्युके अनन्तर); अमृताः=अमर (जन्म-मृत्युसे रहित); भवन्ति=हो जाते हैं॥ २॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें गुरु शिष्यके प्रश्नोंका स्पष्ट उत्तर न देकर 'जो श्रोत्रका भी श्रोत्र है' इत्यादि शब्दोंके द्वारा संकेतसे समझा रहे हैं कि जो इन मन, प्राण और सम्पूर्ण इन्द्रियोंका—समस्त जगत्का परम कारण है, जिससे ये सब उत्पन्न हुए हैं, जिसकी शक्तिको पाकर ये सब अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ हो रहे हैं और जो इन सबको जाननेवाला है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तम ही इन सबका प्रेरक है। उसे जानकर ज्ञानीजन जीवन्मुक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करनेके अनन्तर अमृतस्वरूप—विदेहमुक्त हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मृत्युसे सदाके लिये छूट जाते हैं॥ २॥
५०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ खण्ड १ ]
सम्बन्ध— वह मन, प्राण और इन्द्रियोंका प्रेरक ब्रह्म ‘ऐसा’ है—इस प्रकार स्पष्ट न कहकर संकेतसे ही क्यों समझाया?—इस जिज्ञासापर पुनः गुरु कहते हैं—
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्यो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । इति शृश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ३ ॥
तत्र=वहाँ (उस ब्रह्मतक); न=न तो; चक्षुः=चक्षु-इन्द्रिय (आदि सब ज्ञानेन्द्रियाँ); गच्छति=पहुँच सकती हैं; न=न; वाक्=वाक्-इन्द्रिय (आदि कर्मेन्द्रियाँ); गच्छति=पहुँच सकती हैं; (और) नो=न; मनः=मन (अन्तःकरण) ही; (अतः) यथा=जिस प्रकार; एतत्=इस (ब्रह्मके स्वरूप) को; अनुशिष्यात्=बतलाया जाय कि वह ऐसा है; न विद्याः=(इस बातको) न तो हम स्वयं अपनी बुद्धिसे जानते हैं; (और) न विजानीमः=न दूसरोंसे सुनकर ही जानते हैं; (क्योंकि) तत्=वह; विदितात्=जाने हुए (जाननेमें आनेवाले) पदार्थसमुदायसे; अन्यत् एव=भित्र ही है; अथो=और; अविदितात्=(मन-इन्द्रियोंद्वारा) न जाने हुए (जाननेमें न आनेवाले) से (भी); अधि=ऊपर है; इति=यह; पूर्वेषाम्=अपने पूर्वार्चार्याके मुखसे; शृश्रुम=सुनते आये हैं; ये=जिन्होंने; नः=हमें; तत्=उस ब्रह्माका तत्त्व; व्याचचक्षिरे=भलीभाँति व्याख्या करके समझाया था ॥ ३ ॥
व्याख्या—उन सच्चिदानन्दधन परब्रह्मको प्राकृत अन्तःकरण और इन्द्रियाँ नहीं जान सकतीं। ये वहाँतक पहुँच ही नहीं पातीं। उस अलौकिक दिव्य तत्त्वमें इनका प्रवेश ही नहीं हो सकता। बल्कि इनमें जो चेतना और क्रिया प्रतीत होती है, यह उसी ब्रह्मकी प्रेरणासे और उसीकी शक्तिसे होती है। ऐसी अवस्थामें मन-इन्द्रियोंके द्वारा कोई कैसे बतलाये कि वह ब्रह्म ‘ऐसा है’। इस प्रकार ब्रह्मतत्त्वके उपदेशका कोई तरीका न तो हमने किसीके भी द्वारा समझा है और न हम स्वयं अपनी बुद्धिसे ही विचारके द्वारा समझ रहे हैं। हमने तो जिन महापुरुषोंसे इस गूढ़ तत्त्वका उपदेश प्राप्त किया है, उनसे यही सुना है कि वह परब्रह्म परमेश्वर जड-चेतन दोनोंसे ही भिन्न है—जाननेमें आनेवाले सम्पूर्ण दृश्य