ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अनु० ७ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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है। इस प्रकार इस विद्याका वास्तविक फल बताकर मनुष्योंको उस साधनकी ओर लगानेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे अन्न, प्राण आदि समस्त तत्त्वोंके रहस्य विज्ञानपूर्वक ब्रह्मको जाननेवाले ज्ञानीके शरीर और अन्तःकरणमें जो स्वाभाविक विलक्षण शक्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, उनको भी श्रुति बतलाती है। वह अन्नवान् अर्थात् नाना प्रकारके जीवन-यात्रोपयोगी भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है और उन सबको सेवन करनेकी सामर्थ्य भी उसमें आ जाती है। अर्थात् उसके मन, इन्द्रियाँ और शरीर सर्वथा निर्विकार और नीरोग हो जाते हैं। इतना ही नहीं, वह संतानसे, पशुओंसे, ब्रह्मतेजसे और बड़ी भारी कीर्तिसे समृद्ध होकर जगत्में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है।
॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥
सप्तम अनुवाक
सम्बन्ध— छठे अनुवाकमें ब्रह्मज्ञानीके अन्न और प्रजा आदिसे सम्पन्न होनेकी बात कही गयी; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि ये सब सिद्धियाँ भी क्या ब्रह्मसाक्षात्कार होनेपर ही मिलती हैं या इन्हें प्राप्त करनेका दूसरा उपाय भी है। इसपर इन सबकी प्राप्तिके दूसरे उपाय भी बताये जाते हैं—
अन्नं न निन्द्यात्। तद्भुतम्। प्राणो वा अन्नम्। शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरं प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।
अन्नम् न निन्द्यात्=अन्नकी निन्दा न करे; तत्=वह; व्रतम्=व्रत है; प्राणः=प्राण; वै=ही; अन्नम्=अन्न है; (और) शरीरम्=शरीर; (उस प्राणरूप अन्नसे जीनेके कारण) अन्नादम्=अन्नका भोक्ता है; शरीरम्=शरीर; प्राणे=प्राणके आधारपर; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो रहा है; (और) शरीरे=शरीरके आधारपर; प्राणः=प्राण;
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
प्रतिष्ठितः=स्थित हो रहे हैं; तत्=इस तरह; एतत्=यह; अत्रे=अत्रमें ही; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो रहा है; यः=जो मनुष्य; अत्रे=अत्रमें ही; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हो रहा है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=जानता है; सः=वह; प्रतिष्ठितः=उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है; (अतः) अत्रवान्=अत्रवाला; (और) अत्रादः=अत्रको खानेवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=प्रजासे; पशुभिः=पशुओंसे; ब्रह्मवर्चसेन=(और) ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; (तथा) कीर्त्या=कीर्तिसे (सम्पन्न होकर भी); महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।
व्याख्या —इस अनुवाकमें अत्रका महत्त्व बतलाकर उसे जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अत्रादिसे सम्पन्न होना चाहे, उसे सबसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये कि ‘मैं कभी अत्रकी निन्दा नहीं करूँगा।’ यह एक साधारण नियम है कि जिस किसी वस्तुको मनुष्य पाना चाहता है, उसके प्रति उसकी महत्त्वबुद्धि होनी चाहिये; तभी वह उसके लिये प्रयत्न करेगा। जिसकी जिसमें हेयबुद्धि है, वह उसकी ओर आँख उठाकर देखेगा भी नहीं। अत्रकी निन्दा न करनेका व्रत लेकर अत्रके इस महत्त्वको समझना चाहिये कि अत्र ही प्राण है और प्राण ही अत्र है; क्योंकि अत्रसे ही प्राणोंमें बल आता है और प्राणशक्तिसे ही अत्रमय शरीरमें जीवनी शक्ति आती है। यहाँ प्राणको अत्र इसलिये भी कहा है कि यही शरीरमें अत्रके रसको सर्वत्र फैलाता है। शरीर प्राणके ही आधार टिका हुआ है, इसीलिये वह प्राणरूप अत्रका भोक्ता है। शरीर प्राणमें स्थित है अर्थात् शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन है और प्राण शरीरमें स्थित है—प्राणोंका आधार शरीर है, यह बात प्रत्यक्ष है ही। इस प्रकार यह अत्रमय शरीर भी अत्र है। यह अनुभवसिद्ध विषय है कि प्राणोंको आहार न मिलनेपर वे शरीरकी धातुओंको ही सोख लेते हैं। और शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन होनेसे प्राण भी अत्र ही हैं। अतः शरीर और प्राणका अन्योन्याश्रयसम्बन्ध होनेसे यह कहा गया है कि अत्रमें ही अत्र स्थित हो रहा है। यही इसका तत्त्व है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है, वही शरीर और प्राण—इन दोनोंका
अनु० ८]
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ठीक-ठीक उपयोग कर सकता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह शरीर और प्राणोंके विज्ञानमें पारङ्गत हो जाता है और इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीसे युक्त और उसे उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे भी सम्पन्न होकर महान् बन जाता है। उसकी कीर्ति, उसका यश जगत्में फैल जाता है और उसके द्वारा भी वह जगत्में महान् हो जाता है।
॥सप्तम अनुवाक समाप्त॥ ७॥
अष्टम अनुवाक
अत्रं न परिच्छीत। तद् व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतिष्ठिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।
अन्नम् न परिच्छीत=अन्नकी अवहेलना न करे; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; आपः=जल; वै=ही; अन्नम्=अन्न है; (और) ज्योतिः=तेज; अन्नादम्=(रसस्वरूप) अन्नका भोक्ता है; अप्सु=जलमें; ज्योतिः=तेज; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; ज्योतिषि=तेजमें; आपः=जल; प्रतिष्ठिताः=प्रतिष्ठित है; तत्=वही; एतत्=यह; अन्ने=अन्नमें; अन्नम्=अन्न; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; यः=जो मनुष्य; (इस प्रकार) अन्ने=अन्नमें; अन्नम्=अन्न; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=भलीभाँति समझता है; सः=वह; (अन्तमें) प्रतिष्ठिष्ठति=(उस रहस्यमें) परिनिष्ठित हो जाता है; (तथा) अन्नवान्=अन्नवाला; (और) अन्नादः=अन्नको खानेवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=(वह) संतानसे; पशुभिः=पशुओंसे; (और) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्म-तेजसे; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; (तथा) कीर्त्या=कीर्तिसे (सम्बद्ध होकर भी); महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
व्याख्या —इस अनुवाकमें जल और ज्योति—दोनोंको अन्नरूप बताकर उन्हें जाननेका फल बतलाया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यकी अन्नादिसे सम्पन्न होनेकी इच्छा हो, उसे यह नियम ले लेना चाहिये कि ‘मैं कभी अन्नकी अवहेलना नहीं करूँगा अर्थात् अन्नका उल्लङ्घन, दुरुपयोग और परित्याग नहीं करूँगा एवं उसे जूठा नहीं छोड़ूँगा।’ यह साधारण नियम है कि जो जिस वस्तुका अनादर करता है, उसके प्रति उपेक्षाबुद्धि रखता है, वह वस्तु उसका कभी वरण नहीं करती। किसी भी वस्तुको प्राप्त करनेके लिये उसके प्रति आदरबुद्धि रखना परमावश्यक है। जिसकी जिसमें आदर बुद्धि नहीं है, वह उसे पानेकी इच्छा अथवा चेष्टा क्यों करेगा। इस प्रकार अन्नकी अवहेलना न करनेका व्रत लेकर फिर अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि जल ही अन्न है; क्योंकि सब प्रकारके अन्न अर्थात् खाद्य वस्तुएँ जलसे ही उत्पन्न होती हैं और ज्योति अर्थात् तेज ही इस जलरूप अन्नको भक्षण करनेवाला है। जिस प्रकार अग्नि एवं सूर्यरश्मियाँ आदि बाहरके जलका शोषण करती हैं, उसी प्रकार शरीरमें रहनेवाली जठराग्नि शरीरमें जानेवाले जलीय तत्त्वोंका शोषण करती है। जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है। यद्यपि जल स्वभावतः ठंडा है, अतएव उसमें उष्ण ज्योति कैसे स्थित है—यह बात समझमें नहीं आती, तथापि शास्त्रोंमें यह माना गया है कि समुद्रमें बड़वानल रहता है तथा आजकलके वैज्ञानिक भी जलमेंसे बिजली-तत्त्वको निकालते हैं। इससे यह बात सिद्ध होती है कि जलमें तेज स्थित है। इसी प्रकार तेजमें जल स्थित है, यह तो प्रत्यक्ष देखनेमें आता ही है; क्योंकि सूर्यकी प्रखर किरणोंमें स्थित जल ही हमलोगोंके सामने वृष्टिके रूपमें प्रत्यक्ष होता है। इस प्रकार ये जल और तेज अन्योन्याश्रित होनेके कारण समस्त अन्नरूप खाद्य पदार्थोंके कारण हैं; अतः ये ही उनके रूपमें परिणत होते हैं; इसलिये दोनों अन्न ही हैं। इस प्रकार अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस तत्त्वको समझ लेता है, वह इन दोनोंके विज्ञानमें प्रतिष्ठित अर्थात् सिद्ध हो जाता है; क्योंकि वही इन दोनोंका ठीक उपयोग कर सकता है। इसीके
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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फलस्वरूप वह अत्रसे अर्थात् सब प्रकारकी भोग-सामग्रीसे सम्पन्न और उन सबको यथायोग्य उपभोगमें लानेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है और इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो महान् हो जाता है। इतना ही नहीं, इस समृद्धिके कारण उसका यश सर्वत्र फैल जाता है, वह बड़ा भारी यशस्वी हो जाता है और उस यशके कारण भी वह महान् हो जाता है।
॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥
नवम अनुवाक
अत्रं बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अत्रम् । आकाशोऽत्रादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदत्रमत्रे प्रतिष्ठितम् । स य एतदत्रमत्रे प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अत्रवानत्रादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ।
अत्रम्=अत्रको; बहु कुर्वीत=बढ़ाये; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; पृथिवी=पृथ्वी; वै=ही; अत्रम्=अत्र है; आकाशः=आकाश; अत्रादः=पृथ्वीरूप अत्रका आधार होनेसे (मानो) अत्राद है; पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; आकाशः=आकाश; प्रतिष्ठितः=प्रतिष्ठित है; आकाशे=आकाशमें; पृथिवी=पृथ्वी; प्रतिष्ठिता=प्रतिष्ठित है; तत्=वही; एतत्=यह; अत्रे=अत्रमें; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; यः=जो मनुष्य; (इस प्रकार) अत्रे=अत्रमें; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=भलीभाँति जान लेता है; सः=वह; (उस विषयमें) प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित हो जाता है; अत्रवान्=अत्रवाला; (और) अत्रादः=अत्रको खानेवाला अर्थात् उसे पचानेकी शक्तिवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=(वह) प्रजासे; पशुभिः=पशुओंसे; (और) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्मतेजसे; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; कीर्त्या=कीर्तिसे; [ च ]=भी; महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
व्याख्या —इस अनुवाकमें पृथ्वी और आकाश दोनोंको अनरूप बताकर उनके तत्त्वको जाननेका यह फल बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यको अत्रादिसे समृद्ध होनेकी इच्छा हो, उसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये—यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि ‘मैं अत्रको खूब बढ़ाऊँगा।’ किसी वस्तुका अभ्युदय—उसका विस्तार चाहना ही उसे आकर्षित करनेका सबसे श्रेष्ठ उपाय है। जो जिस वस्तुको क्षीण करनेपर तुला हुआ है, वह वस्तु उसे कदापि नहीं मिल सकती और मिलनेपर टिकेगी नहीं। इसके बाद अत्रके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि पृथ्वी ही अत्र है—जितने भी अत्र हैं, वे सब पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वीको अपनेमें विलीन कर लेनेवाला इसका आधारभूत आकाश ही अत्राद अर्थात् इस अत्रका भोक्ता है। पृथ्वीमें आकाश स्थित है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है; और आकाशमें पृथ्वी स्थित है—यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है। ये दोनों ही एक-दूसरेके आधार होनेके कारण अत्रस्वरूप हैं। पाँच भूतोंमें आकाश पहला तत्त्व है और पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है; बीचके तीनों तत्त्व इन्हींके अन्तर्गत हैं। समस्त भोग्यपदार्थरूप अत्र इन पाँच महाभूतोंके ही कार्य हैं; अतः ये ही अत्रके रूपमें स्थित हैं। इसलिये अत्रमें ही अत्र प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस बातको तत्त्वसे जानता है कि पृथ्वीरूप अत्रमें आकाशरूप अत्र और आकाशरूप अत्रमें पृथ्वीरूप अत्र प्रतिष्ठित है, वही आकाश आदि पाँचों भूतोंका यथायोग्य उपयोग कर सकता है और इसीलिये वह इस विषयमें सिद्ध हो जाता है। इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह अत्रसे अर्थात् सब प्रकारके भोग्य पदार्थोंसे और उनको उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और विद्याके तेजसे समृद्ध हो महान् बन जाता है। उसका यश समस्त जगत्में फैल जाता है, अतः वह यशके द्वारा भी महान् हो जाता है।
॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
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अनु० १० ]
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दशम अनुवाक
न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्। तस्माद्यया कया च विधया बह्व्रं प्राप्नुयात्। आराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते। एतद्वै मुखतोऽन्नः राह्मम्। मुखतोऽस्मा अन्नः राध्यते। एतद्वै मध्यतोऽन्नः राह्मम्। मध्यतोऽस्मा अन्नः राध्यते। एतद्वा अन्ततोऽन्नः राह्मम्। अन्ततोऽस्मा अन्नः राध्यते। य एवं वेद।
वसतौ=अपने घरपर (ठहरनेके लिये आये हुए); कञ्चन=किसी (भी अतिथि) को; न प्रत्याचक्षीत=प्रतिकूल उत्तर न दे; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; तस्मात्=इसलिये; (अतिथि-सत्कारके लिये) यया कया च विधया=जिस किसी भी प्रकारसे, बहु=बहुत-सा; अन्नम्=अन्न; प्राप्नुयात्=प्राप्त करना चाहिये; (क्योंकि सदगृहस्थ) अस्मै=इस (घरपर आये हुए अतिथि) से; अन्नम्=भोजन; आराधि=तैयार है; इति=यों; आचक्षते=कहते हैं; (यदि यह अतिथिको) मुखतः=मुख्यवृत्तिसे अर्थात् अधिक श्रद्धा, प्रेम और सत्कारपूर्वक; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=निश्चय ही; अस्मै=इस (दाता)को; मुखतः=अधिक आदर-सत्कारके साथ ही; अन्नम्=अन्न; राध्यते=प्राप्त होता है; (यदि यह अतिथिको) मध्यतः=मध्यम श्रेणीकी श्रद्धा और प्रेमसे; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=निःसंदेह; अस्मै=इस (दाता) को; मध्यतः=मध्यम श्रद्धा और प्रेमसे ही; अन्नम् राध्यते=अन्न प्राप्त होता है; (और यदि यह अतिथिको) अन्ततः=निकृष्ट श्रद्धा-सत्कारसे; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=अवश्य ही; अस्मै=इस (दाता) को; अन्ततः=निकृष्ट श्रद्धा आदिसे; अन्नम्=अन्न; राध्यते=मिलता है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=इस रहस्यको जानता है (वह अतिथिके साथ बहुत उत्तम बर्ताव करता है)।
व्याख्या —दसवें अनुवाकके इस अंशमें अतिथि-सेवाका महत्त्व और फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अतिथि-सेवाका पूरा लाभ
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[ वल्ली ३ ]
उठाना चाहे, उसको सबसे पहले तो यह नियम लेना चाहिये कि 'मेरे घरपर जो कोई अतिथि आश्रयकी आशासे पधारेगा, मैं कभी उसको सूखा जवाब देकर निराश नहीं लौटाऊँगा।' 'अतिथिदेवो भव'—अतिथिकी देवताबुद्धिसे सेवा करो—यह उपदेश गुरुके द्वारा स्नातक शिष्यको पहले ही दिया जा चुका है। इस प्रकारका नियम लेनेपर ही अतिथि-सेवा सम्भव है। यह व्रत लेकर इसका पालन करनेके लिये—केवल अपना तथा कुटुम्बका पोषण करनेके लिये ही नहीं—जिस किसी भी न्यायोचित उपायसे बहुत-से अन्नका उपार्जन करे। धन-सम्पत्ति और अन्नदि, जो शरीरके पालन-पोषणके लिये उपयोगी सामग्री हैं, उन्हें प्राप्त करनेके लिये जितने भी न्यायोचित उपाय बताये गये हैं तथा पूर्वके तीन अनुवाकोंमें भी जो-जो उपाय बताये गये हैं, उनमेंसे किसीके भी द्वारा बहुत-सा अन्न प्राप्त करना चाहिये। अर्थात् अतिथि-सेवाके लिये आवश्यक वस्तुओंका अधिक मात्रामें संग्रह करना चाहिये; क्योंकि अतिथि-सेवा गृहस्थोचित सदाचारका एक अत्यावश्यक अङ्ग है। अच्छे प्रतिष्ठित मनुष्य घरपर आये हुए अतिथिसे यही कहते हैं—'आइये, बैठिये, भोजन तैयार है, भोजन कीजिये' इत्यादि। वे यह कदापि नहीं कहते कि हमारे यहाँ आपकी सेवाके लिये उपयुक्त वस्तुएँ अथवा रहनेका स्थान नहीं है। जो मनुष्य अपने घरपर आये हुए अतिथिकी अधिक आदर-सत्कारपूर्वक उत्तम भावसे विशुद्ध सामग्रियोंद्वारा सेवा करता है—उसे शुद्धतापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन देता है, उसको भी उत्तम भावसे ही अन्न प्राप्त होता है अर्थात् उसे भोग्य-पदार्थोंके संग्रह करनेमें कठिनाईका सामना नहीं करना पड़ता। अतिथि-सेवाके प्रभावसे उसे किसी बातकी कमी नहीं रहती। अनायास उसकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण होती रहती हैं। यदि वह आये हुए अतिथिकी मध्यमभावसे सेवा करता है, साधारण रीतिसे भोजनादि तैयार करके विशेष आदर-सत्कारके बिना ही अतिथिको भोजन आदि कराके उसे सुख पहुँचाता है, तो उसे भी साधारण रीतिसे ही अन्न प्राप्त होता है। अर्थात् अन्न-वस्त्र आदि पदार्थोंका संग्रह करनेमें उसे साधारणतया
अनु० १० ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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आवश्यक परिश्रम करना पड़ता है। जिस भावसे वह अतिथिको देता है, उसी भावसे उतने ही आदर-सत्कारके साथ उसे वे वस्तुएँ मिलती हैं। इसी प्रकार यदि कोई अन्तिम वृत्तिसे अर्थात् बिना किसी प्रकारका आदर-सत्कार किये तुच्छ भावसे भाररूप समझकर अतिथिकी सेवा करता है—उसे निकृष्ट भावसे अश्रद्धापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन आदि पदार्थ देता है, तो उसे वे पदार्थ वैसे ही भावसे प्राप्त होते हैं। अर्थात् उनकी प्राप्तिके लिये उसे अधिक-से-अधिक परिश्रम करना पड़ता है, लोगोंकी खुशामद करनी पड़ती है। जो मनुष्य इस प्रकार इस रहस्यको जानता है, वह उत्तम रीतिसे और विशुद्धभावसे अतिथिसेवा करता है; अतः उसे सर्वोत्तम फल, जो पहले तीन अनुवाकोंमें बताया गया है, मिलता है।
सम्बन्ध— अब परमात्माका विभूतिरूपसे सर्वत्र चिन्तन करनेका प्रकार बताया जाता है—
क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे ।
[ सः परमात्मा ]=वह परमात्मा; वाचि=वाणीमें; क्षेमः इति=रक्षाशक्तिके रूपसे है; प्राणापानयोः=प्राण और अपानमें; योगक्षेमः इति=प्राप्ति और रक्षा—दोनों शक्तियोंके रूपमें है; हस्तयोः=हाथोंमें; कर्म इति=कर्म करनेकी शक्तिके रूपमें है; पादयोः=पैरोंमें; गतिः इति=चलनेकी शक्तिके रूपमें स्थित है; पायौ=गुदामें; विमुक्तिः इति=मलत्यागकी शक्ति बनकर है; इति=इस प्रकार (ये); मानुषीः समाज्ञाः=मानुषी समाज्ञा अर्थात् आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं; अथ=अब; दैवीः=दैवी उपासनाओंका वर्णन करते हैं; (वह परमात्मा) वृष्टौ=वृष्टिमें; तृप्तिः इति=तृप्ति शक्तिके रूपमें है; विद्युति=बिजलीमें; बलम् इति=बल (पावर) बनकर स्थित है; पशुषु=पशुओंमें; यशः इति=यशके रूपमें स्थित है; नक्षत्रेषु=ग्रहों और
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नक्षत्रोंमें; ज्योतिः इति=ज्योतिरूपसे स्थित है; उपरस्थे =उपस्थमें; प्रजातिः =प्रजा उत्पन्न करनेकी शक्ति; अमृतम् =वीर्यरूप अमृत (और); आनन्दः इति=आनन्द देनेकी शक्तिके रूपमें स्थित है; आकाशे =(तथा) आकाशमें; सर्वम् इति=सबका आधार बनकर स्थित है।
व्याख्या —दसवें अनुवाकके इस अंशमें परमेश्वरकी विभूतियोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया है। भाव यह है कि सत्यरूप वाणीमें आशीर्वाददिके द्वारा जो रक्षा करनेकी शक्ति प्रतीत होती है, उसके रूपमें वहाँ परमात्माकी ही स्थिति है। प्राण और अपानमें जो जीवनोंपयोगी वस्तुओंको आकर्षण करनेकी और जीवन-रक्षाकी शक्ति है, वह भी परमात्माका ही अंश है। इसी प्रकार हाथोंमें काम करनेकी शक्ति, पैरोंमें चलनेकी शक्ति और गुदामें मलत्याग करनेकी शक्ति भी परमात्माकी ही हैं। ये सब शक्तियाँ उन परमेश्वरकी शक्तिका ही एक अंश हैं। यह देखकर मनुष्यको परमेश्वरकी सत्तापर विश्वास करना चाहिये। यह मानुषी समाजा बतायी गयी है, अर्थात् मनुष्यके शरीरमें प्रतीत होनेवाली परमात्माकी शक्तियोंका संक्षेपमें दिग्दर्शन कराया गया है। इसीको आध्यात्मिक (शरीर-सम्बन्धी) उपासना भी कह सकते हैं। इसी प्रकार दैवी पदार्थोंमें अभिव्यक्त होनेवाली शक्तिका वर्णन करते हैं। यह दैवी अथवा आधिदैविक उपासना है। वृष्टिमें जो अन्नदिको उत्पन्न करने तथा जल-प्रदानके द्वारा सबको तृप्त करनेकी शक्ति है, बिजलीमें जो बल (पावर) है, पशुओंमें जो स्वामीका यश बढ़ानेकी शक्ति है, नक्षत्रोंमें अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा और तारागणोंमें जो प्रकाश है, उपस्थमें जो संतानोत्पादनकी शक्ति, वीर्यरूप अमृत* और आनन्द देनेकी शक्ति है तथा आकाशमें जो सबको धारण करनेकी और सर्वव्यापकताकी एवं अन्य सब प्रकारकी शक्ति है—ये सब उन परमेश्वरकी अचिन्त्य एवं अपार शक्तिके ही किसी एक अंशकी अभिव्यक्तियाँ हैं। गीतामें भी कहा है कि इस जगत्में जो
- शरीरका रक्षक एवं पोषक तथा जीवनका आधार होनेसे वीर्यको अमृत कहा गया है। इसकी सावधानीके साथ रक्षा करनेसे अमृतत्वकी प्राप्ति भी सम्भव है।
अनु० १० ]
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कुछ भी विभूति, शक्ति और शोभासे युक्त है, वह मेरे ही तेजका एक अंश है (गीता १०।४१)। इन सबको देखकर मनुष्यको सर्वत्र एक परमात्माकी व्यापकताका रहस्य समझना चाहिये।
सम्बन्ध— अब विविध भावनासे की जानेवाली उपासनाका फलसहित वर्णन करते हैं—
तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत। प्रतिष्ठावान् भवति। तन्मह इत्युपासीत। महान् भवति। तन्मन इत्युपासीत। मानवान् भवति। तन्नम इत्युपासीत। नम्यन्तेऽस्मै कामाः। तद् ब्रह्मेत्युपासीत। ब्रह्मवान् भवति। तद् ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत। पर्येणं प्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः। परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः।
तत्=वह (उपास्यदेव); प्रतिष्ठा='प्रतिष्ठा' (सबका आधार) है; इति=इस प्रकार; उपासीत=(उसकी) उपासना करे तो; प्रतिष्ठावान् भवति=साधक प्रतिष्ठावाला हो जाता है; तत्=वह (उपास्यदेव); महः=सबसे महान् है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उपासना करे तो; महान्=महान्; भवति= हो जाता है; तत्=वह (उपास्यदेव); मनः='मन' है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उसकी उपासना करे तो; (ऐसा उपासक) मानवान्=मननशक्तिसे सम्पन्न; भवति=हो जाता है; तत्=वह (उपास्यदेव); नमः='नम' (नमस्कारके योग्य) है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उसकी उपासना करे तो; अस्मै=ऐसे उपासकके लिये; कामाः=समस्त काम—भोग पदार्थ; नम्यन्ते=विनीत हो जाते हैं; तत्=वह (उपास्यदेव); ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उसकी उपासना करे तो; (ऐसा उपासक) ब्रह्मवान्=ब्रह्मसे युक्त; भवति=हो जाता है; तत्=वह (उपास्यदेव); ब्रह्मणः=परमात्माका; परिमरः=सबको मारनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उसकी उपासना करे तो; एनम् परि=ऐसे उपासकके प्रति; द्विषन्तः=द्वेष रखनेवाले; सपत्नाः=शत्रु; प्रियन्ते=मर जाते हैं; ये=जो; परि=(उसका) सब
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[ वल्ली ३ ]
प्रकारसे; अप्रियाः भ्रातृव्याः=अनिष्ट चाहनेवाले अप्रिय बन्धुजन हैं; [ ते अपि प्रियन्ते ]=वे भी मर जाते हैं।
व्याख्या —इस मन्त्रमें सकाम उपासनाका भिन्न-भिन्न फल बताया गया है। भाव यह है कि प्रतिष्ठा चाहनेवाला पुरुष अपने उपास्यदेवकी प्रतिष्ठाके रूपमें उपासना करे, अर्थात् 'वे उपास्यदेव ही सबकी प्रतिष्ठा—सबके आधार हैं' इस भावसे उनका चिन्तन करे। ऐसे उपासककी संसारमें प्रतिष्ठा होती है। महत्त्वकी प्राप्तिके लिये यदि अपने उपास्यदेवको 'महान्' समझकर उनकी उपासना करे तो वह महान् हो जाता है—महत्त्वको प्राप्त कर लेता है। यदि अपने उपास्यदेवको महान् मनस्वी समझकर मनन करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे तो वह साधक मनन करनेकी विशेष शक्ति प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो अपने उपास्यदेवको नमस्कार करनेयोग्य शक्तिशाली समझकर वैसी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे, वह स्वयं नमस्कार करनेयोग्य बन जाता है, समस्त कामनाएँ उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। समस्त भोग अपने-आप उसके चरणोंमें लोटने लगते हैं। अनायास ही उसे समस्त भोग-सामग्री प्राप्त हो जाती है। जो अपने उपास्यदेवको सबसे बड़ा—सर्वाधार ब्रह्म समझकर उन्हींकी प्राप्तिके लिये उनकी उपासना करे, वह ब्रह्मवान् बन जाता है, अर्थात् सर्वशक्तिमान् परमेश्वर उसके अपने बन जाते हैं—उसके वशमें हो जाते हैं। जो अपने उपास्यदेवको ब्रह्मके द्वारा सबका संहार करनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी देवता समझकर उनकी उपासना करता है, उससे द्वेष करनेवाले शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं तथा जो उसके अपकारी एवं अप्रिय बन्धुजन होते हैं, वे भी मारे जाते हैं। वास्तवमें किसी भी रूपमें किसी भी उपास्यदेवकी उपासना की जाय, वह प्रकारान्तरसे उन परब्रह्म परमेश्वरकी ही उपासना है, परंतु सकाम मनुष्य अज्ञानवश इस रहस्यको न जाननेके कारण भिन्न-भिन्न शक्तियोंसे युक्त भिन्न-भिन्न देवताओंकी भिन्न-भिन्न कामनाओंकी सिद्धिके लिये उपासना करते हैं, इसलिये वे वास्तविक लाभसे वञ्चित रह जाते हैं (गीता ७। २१, २२,
अनु० १० ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
४२७
२३, २४; ९।२२, २३)। अतः मनुष्यको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर सब देवोंके देव सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासना उन्हींकी प्राप्तिके लिये करे, उनसे और कुछ न चाहे।
सम्बन्ध —सर्वत्र एक ही परमात्मा परिपूर्ण हैं, इस बातको समझकर उन्हें प्राप्त कर लेनेका फल और प्राप्त करनेवालेकी स्थितिका वर्णन करते हैं—
स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। स य एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य इमाल्लोकात्कामात्री कामरूप्यनुसंचरन्। एतत्साम गायन्नास्ते।
सः =वह (परमात्मा); यः =जो; अयम् =यह; पुरुषे =इस मनुष्यमें है; च =तथा; यः =जो; असौ =वह; आदित्ये च =सूर्यमें भी है; सः =वह (दोनोंका अन्तर्यामी); एकः =एक ही है; यः =जो (मनुष्य); एवंवित् =इस प्रकार तत्त्वसे जाननेवाला है; सः =वह; अस्मात् =इस; लोकात् =लोक (शरीर) से; प्रेत्य =उत्क्रमण करके; एतम् =इस; अन्नमयम् =अन्नमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; एतम् =इस; प्राणमयम् =प्राणमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; एतम् =इस; मनोमयम् =मनोमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; एतम् =इस; विज्ञानमयम् =विज्ञानमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; एतम् =इस; आनन्दमयम् =आनन्दमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; कामात्री =इच्छानुसार भोगवाला; (और) कामरूपी =इच्छानुसार रूपवाला हो जाता है; (तथा) इमान् =इन; लोकान् अनुसंचरन् =सब लोकोंमें विचरता हुआ; एतत् =इस (आगे बताये हुए); साम गायन् =साम (समतायुक्त उद्धारों) का गायन करता; आस्ते =रहता है।
व्याख्या —वे परमात्मा, जिनका वर्णन पहले सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण कहकर किया जा चुका है और जो परमानन्दस्वरूप हैं, वे इस
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
पुरुषमें अर्थात् मनुष्योंमें और सूर्यमें एक ही हैं। अभिप्राय यह है कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एक ही परमात्मा है। नाना रूपोंमें उन्हींकी अभिव्यक्ति हो रही है। जो मनुष्य इस तत्त्वको जान लेता है, वह वर्तमान शरीरसे अलग होनेपर उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है जिनका वर्णन अत्रमय आत्मा, प्राणमय आत्मा, मनोमय आत्मा, विज्ञानमय आत्मा और आनन्दमय आत्माके नामसे पहले किया गया है। इन सबको पाकर अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म भेदसे जो एककी अपेक्षा एकके अन्तरात्मा होकर नाना रूपोंमें स्थित हैं और सबके अन्तर्यामी परमानन्दस्वरूप हैं, उनको प्राप्त करके मनुष्य पर्याप्त भोग-सामग्रीसे युक्त और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। साथ ही वह इन लोकोंमें विचरता हुआ आगे बताये जानेवाले साम (समतायुक्त भावों)का गान करता रहता है।
सम्बन्ध— उसके आनन्दमय मनमें जो समता और सर्वरूपताके भाव उठा करते हैं, उनका वर्णन करते हैं—
हा३वु हा३वु हा३वु। अहम॒त्रम॑हम॒त्रम॑हम॒त्रम्। अहम॒त्रादो॑३- ऽहम॒त्रादो॑३ॽहम॒त्रादः। अह॒ः श्लोक॑क॒कृदह॒ः श्लोक॑क॒कृदह॒ः श्लोक॑क॒कृत्। अहम॑स्मि प्रथम॒जा ऋता॑ऽस्य। पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भाधि। यो मा ददाति स इदेव मा३ वाः। अहम॒त्रम॑त्रम॒दन्तमा॑ऽचि। अहं विश्वं भुवनम॑भ्य॒भवा॑३म्। सुवर्णं ज्योतीः। य एवं वेद। इत्युपनिषत्।
हावु हावु हावु=आश्चर्य! आश्चर्य!! आश्चर्य!!!; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्=इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्= इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्=इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; ऋतस्य=सत्यका अर्थात् प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्की अपेक्षासे; प्रथम॒जा=सबमें प्रधान होकर उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ); [ च ]=और;
अनु० १० ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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देवेभ्यः=देवताओंसे भी; पूर्वम्=पहले विद्यमान; अमृतस्य=अमृतका; नाभाधि (नाभि)=केन्द्र; अस्मि=हूँ; यः=जो कोई; मा=मुझे; ददाति=देता है; सः=वह; इत्=इस कार्यसे; एव=ही; मा आवाः=मेरी रक्षा करता है; अहम्=मैं; अन्नम्=अन्नस्वरूप होकर; अन्नम्=अन्न; अदन्तम्=खानेवालेको; अच्चि=निगल जाता हूँ; अहम्=मैं; विश्वम्=समस्त; भुवनम् अभ्यभवाम्=ब्रह्माण्डका तिरस्कार करता हूँ; सुवः न ज्योतिः=मेरे प्रकाशकी एक झलक सूर्यके समान है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है (उसे भी यही स्थिति प्राप्त होती है); इति=इस प्रकार; उपनिषत्=यह उपनिषद्—ब्रह्मविद्या समाप्त हुई।
व्याख्या —उस महापुरुषकी स्थिति शरीरमें नहीं रहती। वह शरीरसे सर्वथा ऊपर उठकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है। यह बात पहले कहकर उसके बाद इस साम-गानका वर्णन किया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि परमात्माके साथ एकताकी प्राप्ति कर लेनेवाले महापुरुषके ये पावन उद्धार उसके विशुद्ध अन्तःकरणसे निकले हैं और उसकी अलौकिक महिमा सूचित करते हैं। 'हावु' पद आश्चर्यबोधक अव्यय है। वह महापुरुष कहता है—बड़े आश्चर्यकी बात है! वे सम्पूर्ण भोग-वस्तुएँ, इनको भोगनेवाला जीवात्मा और इन दोनोंका संयोग करानेवाला परमेश्वर एक मैं ही हूँ। मैं ही इस प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्में समस्त देवताओंसे पहले सबमें प्रधान होकर प्रकट होनेवाला ब्रह्म हूँ; और परमानन्दरूप अमृतके केन्द्र परब्रह्म परमेश्वर भी मुझसे अभिन्न हैं, अतः वे भी मैं ही हूँ। जो कोई मनुष्य किसी भी वस्तुके रूपमें मुझे किसीको प्रदान करता है, वह मानो मुझे देकर मेरी रक्षा करता है। अर्थात् योग्य पात्रमें भोग्य पदार्थोंका दान ही उनकी रक्षाका सर्वोत्तम उपाय है। इसके विपरीत जो अपने ही लिये अन्नरूप समस्त भोगोंका उपभोग करता है, उस खानेवालेको मैं अन्नरूप होकर निगल जाता हूँ। अर्थात् उसका विनाश हो जाता है—उसकी भोग-सामग्री टिकती नहीं। मैं समस्त ब्रह्माण्डका तिरस्कार करनेवाला हूँ। मेरी महिमाकी तुलनामें यह सब तुच्छ है। मेरे प्रकाशकी एक झलक भी सूर्यके समान है। अर्थात् जगत्में जितने भी प्रकाशयुक्त पदार्थ
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
हैं, वे सब मेरे ही तेजके अंश हैं। जो कोई इस प्रकार परमात्माके तत्त्वको जानता है, वह भी इसी स्थितिको प्राप्त कर लेता है। उपर्युक्त कथन परमात्मामें एकीभावसे स्थित होकर परमात्माकी दृष्टिसे है, यह समझना चाहिये।
॥ दशम अनुवाक समाप्त ॥ १० ॥
॥ भृगुवल्ली समाप्त ॥ ३ ॥
॥ कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्यर्चमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः।* नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ शीक्षावल्लीके द्वादश अनुवाकमें दिया गया है।
- यह मन्त्र ऋग्वेद १।१०।९, यजुर्वेद ३६।९ में आया है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्वेताश्वतरोपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
ॐ=पूर्णब्रह्म परमात्मन्; (आप) नौ=हम दोनों (गुरु-शिष्य) की; सह=साथ-साथ; अवतु=रक्षा करें; नौ=हम दोनोंका; सह=साथ-साथ; भुनक्तु=पालन करें; सह=(हम दोनों) साथ-साथ ही; वीर्यम्=शक्ति; करवावहै=प्राप्त करें; नौ=हम दोनोंकी; अधीतम्=पढ़ी हुई विद्या; तेजस्वि=तेजोमयी; अस्तु=हो; मा विद्विषावहै=हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।
व्याख्या—हे परमात्मन्! आप हम गुरु-शिष्य दोनोंकी साथ-साथ सब प्रकारसे रक्षा करें, हम दोनोंका आप साथ-साथ समुचितरूपसे पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकारसे बल प्राप्त करें, हम दोनोंकी अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो—कहीं किसीसे हम विद्यामें परास्त न हों और हम दोनों जीवनभर परस्पर स्नेह-सूत्रसे बँधे रहें, हमारे अन्दर परस्पर या अन्य किसीसे कभी द्वेष न हो। हे परमात्मन्! तीनों तापोंकी निवृत्ति हो।
प्रथम अध्याय
हरिः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति—
किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता
जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः।
अधिष्ठिताः केन सुखेतेषु
वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १ ॥
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
‘हरिः ओम्’ इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके उस परब्रह्म परमेश्वरका स्मरण करते हुए यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है—
ब्रह्मवादिनः=ब्रह्मविषयक चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु; वदन्ति=आपसमें कहते हैं; ब्रह्मविदः=हे वेदज्ञ महर्षियो!; कारणम्=इस जगत्का मुख्य कारण; ब्रह्म=ब्रह्म; किम्=कौन है; कृतः=(हमलोग) किससे; जाताः स्म=उत्पन्न हुए हैं; केन=किससे; जीवाम=जी रहे हैं; च=और; वक्=किसमें; सम्प्रतिष्ठाः=हमारी सम्यक् प्रकारसे स्थिति है; (तथा) केन अधिष्ठिताः=किसके अधीन रहकर; [ वयम् ]=हमलोग; सुखेतरेषु=सुख और दुःखोंमें; व्यवस्थाम्=निश्चित व्यवस्थाके अनुसार; वर्तामहे=बर्त रहे हैं ॥ १ ॥
व्याख्या—परब्रह्म परमात्माको जानने और प्राप्त करनेके लिये उनकी चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु पुरुष आपसमें कहने लगे—‘हे वेदज्ञ महर्षिगण! हमने वेदोंमें पढ़ा है कि इस समस्त जगत्के कारण ब्रह्म हैं; सो वे ब्रह्म कौन हैं! हम सब लोग किससे उत्पन्न हुए हैं—हमारा मूल क्या है? किसके प्रभावसे हम जी रहे हैं—हमारे जीवनका आधार कौन है? और हमारी पूर्णतया स्थिति किसमें है? अर्थात् हम उत्पन्न होनेसे पहले—भूतकालमें उत्पन्न होनेके बाद—वर्तमानकालमें और इसके पश्चात्—प्रलयकालमें किसमें स्थित रहते हैं? हमारा परम आश्रय कौन है? तथा हमारा अधिष्ठता—हमलोगोंकी व्यवस्था करनेवाला कौन है? जिसकी रची हुई व्यवस्थाके अनुसार हमलोग सुख-दुःख दोनों भोग रहे हैं, वह इस सम्पूर्ण जगत्की सृज्यवस्था करनेवाला इसका संचालक स्वामी कौन है?’* ॥ १ ॥
कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या ।
- इस प्रकार परब्रह्म परमात्माकी खोज करना; उन्हें जानने और पानेके लिये उत्कट अभिलाषाके साथ उत्साहपूर्वक आपसमें विचार करना, परमात्माके सत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंसे उनके विषयमें विनयभाव और श्रद्धापूर्वक पूछना, उनकी बतायी हुई बातोंको ध्यानपूर्वक सुनकर काममें लाना—इसीका नाम ‘सत्सङ्ग’ है। इस उपनिषद्के प्रथम मन्त्रमें सत्सङ्गका ही वर्णन है। इससे सत्सङ्गकी अनादिता और अलौकिक महत्ता सूचित होती है।
अध्याय १ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४३३
संयोग एषां न त्वात्मभावा- दात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥
(क्या) कालः=काल; स्वभावः=स्वभाव; नियतिः=निश्चित फल देनेवाला कर्म; यदृच्छा=आकस्मिक घटना; भूतानि=पाँचों महाभूत; (या) पुरुषः=जीवात्मा; योनिः=कारण है; इति चिन्त्या=इसपर विचार करना चाहिये; एषाम्=इन काल आदिका; संयोगः=समुदाय; तु-भी; न=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता; आत्मभावात्=क्योंकि वे चेतन आत्माके अधीन हैं (जड़ होनेके कारण स्वतन्त्र नहीं हैं); आत्मा=जीवात्मा; अपि=भी; [ न ]=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता; सुखदुःखहेतोः=(क्योंकि वह) सुख-दुःखोंके हेतुभूत प्रारब्धके; अनीशः=अधीन है, स्वतन्त्र नहीं है ॥ २ ॥
व्याख्या—वे कहने लगे कि वेद-शास्त्रोंमें अनेक कारणोंका वर्णन आता है। कहीं तो कालको कारण बताया है; क्योंकि किसी-न-किसी समयपर ही वस्तुओंकी उत्पत्ति देखी जाती है, जगत्की रचना और प्रलय भी कालके ही अधीन सुने जाते हैं। कहीं स्वभावको कारण बताया जाता है; क्योंकि बीजके अनुरूप ही वृक्षकी उत्पत्ति होती है—जिस वस्तुमें जो स्वाभाविक शक्ति है, उसीसे उसका कार्य उत्पन्न होता देखा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तुगत शक्तिरूप जो स्वभाव है, वह कारण है। कहीं कर्मको कारण बताया है; क्योंकि कर्मानुसार ही जीव भिन्न-भिन्न योनियोंमें भिन्न-भिन्न स्वभाव आदिसे युक्त होकर उत्पन्न होते हैं। कहीं आकस्मिक घटनाको अर्थात् होनहार (भवितव्यता)-को कारण बताया है। कहीं पाँचों महाभूतोंको और कहीं जीवात्माको जगत्का कारण बताया गया है। अतः हमलोगोंको विचार करना चाहिये कि वास्तवमें कारण कौन है। विचार करनेसे समझमें आता है कि कालसे लेकर पञ्चमहाभूतोंतक बताये हुए जड़ पदार्थोंमेंसे कोई भी जगत्का कारण नहीं है। वे अलग-अलग तो क्या, सब मिलकर भी जगत्के कारण नहीं हो सकते; क्योंकि ये सब जड़ होनेके कारण चेतनके अधीन हैं, इसमें स्वतन्त्र कार्य करनेकी शक्ति नहीं है। जिन जड़ वस्तुओंके मेलसे कोई नयी चीज उत्पन्न
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
होती है, वह उसके संचालक चेतन आत्माके ही अधीन और उसीके भोगार्थ होती है। इनके सिवा पुरुष अर्थात् जीवात्मा भी जगत्का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि वह सुख-दुःखके हेतुभूत प्रारब्धके अधीन है, वह भी स्वतन्त्ररूपसे कुछ नहीं कर सकता। अतः कारण-तत्त्व कुछ और ही है ॥ २ ॥
सम्बन्ध —इस प्रकार विचार करके उन्होंने क्या निर्णय किया, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
| ते | ध्यानयोगानुगता | अपश्यन् |
|---|---|---|
| देवात्मशक्तिं | स्वगुणैर्निगूढाम् । | |
| यः | कारणानि निखिलानि तानि | |
| कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः | ॥ ३ ॥ |
ते=उन्होंने; ध्यानयोगानुगता:=ध्यानयोगमें स्थित होकर; स्वगुणैः=अपने गुणोंसे; निगूढाम्=ढकी हुई; देवात्मशक्तिम् अपश्यन्=(उन) परमात्मदेवकी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिका साक्षात्कार किया; यः=जो (परमात्मदेव); एकः=अकेला ही; तानि=उन; कालात्मयुक्तानि=कालसे लेकर आत्मातक (पहले बताये हुए); निखिलानि=सम्पूर्ण; कारणानि अधितिष्ठति=कारणोंपर शासन करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या —इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब युक्तियोंद्वारा और अनुमानसे वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके, तब वे सब ध्यानयोगमें स्थित हो गये अर्थात् अपने मन और इन्द्रियोंको बाहरके विषयोंसे हटाकर परब्रह्मको जाननेके लिये उन्हींका चिन्तन करनेमें तत्पर हो गये। ध्यान करते-करते उन्हें परमात्माकी महिमाका अनुभव हुआ। उन्होंने उन परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी स्वरूपभूत अचिन्त्य दिव्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे—सत्त्व, रज, तमसे ढकी है, अर्थात् जो देखनेमें त्रिगुणमयी प्रतीत होती है, परंतु वास्तवमें तीनों गुणोंसे परे है। तब वे इस निर्णयपर पहुँचे कि कालसे लेकर आत्मातक जितने कारण पहले बताये गये हैं, उन समस्त कारणोंके जो अधिष्ठाता—स्वामी हैं, अर्थात् वे सब जिनकी आज्ञा और प्रेरणा पाकर, जिनकी