जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
˙ २७२ [ २.४.१८६ उस समय एक बनिया गधे पर बोझा लाद कर व्यापार करता हुआ घूमता था। वह जहाँ जहाँ जाता वहाँ वहाँ गधे की पीठ पर से सामान उतार, गधे को सिंह की खाल पहना, धान तथा जौ के खेत में छोड़ देता। खेत की रखवाली करने वाले उसे देख, शेर समझ, पास न जा सकते थे। एक दिन उस बनिए ने एक ग्राम-द्वार पर ठहर प्रात काल का भोजन पकाते समय गधे को सिंह की खाल पहना जौ के खेत में छोड़ दिया। खेत की रखवाली करने वालो ने उसे शेर समझ पास न जा सकने के कारण घर जाकर खबर दी। सारे ग्रामवासी आयुध ले, शङ्ख फूंकते तथा ढोल बजाते हुए खेत के समीप पहुँच चिल्लाने लगे। गधे ने मृत्युभय से डर गधे की तरह आवाज की। वह गधा है जान बोधिसत्व ने पहली गाथा कही— नेतं सीहस्स नदित न व्याग्घस्स न दीपिनो, पारुतो सीहचम्मेन जम्मो नदति गद्दभो ॥ [ न यह शेर की आवाज है, न व्याघ्र की, न चीते की, शेर की खाल पहन कर दुष्ट गधा चिल्लाता है।] जम्मो, नीच। ग्रामवासयो ने भी यह जान कि यह गधा है, उसकी हड्डियाँ तोड़ते हुए उसे पीटा और सिंह की खाल लेकर चले गए। उस बनिए ने आकर जब विपत्ति में पड़े उस गधे को देखा तो दूसरी गाथा कही— चिरम्पि खो तं खादेय्य गद्दभो हरितं यवं, पारुतो सीहचम्मेन रवमानोव दूसयि ॥ [सिंह की खाल पहन कर तू चिरकाल तक हरे जौ खाता। हे गधे तूने बोल कर ही अपने को नष्ट किया।] तं निपात मात्र है। यह गद्दभो अपने गधेपन को छिपा सीहचम्मेन पारुतो चिरम्पि देर तक हरितं यवं खादेय्य अर्थ है। रवमानोव दूसयि अपने गधे की
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
सीलानिसंस ] २७३ आवाज करके ही अपने को विपत्ति में डाला। इसमें सिंह की खाल का दोष नहीं। उसके ऐसा कहते ही गधा वहीं गिर कर मर गया। बनिया भी उसे छोड़कर चला गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गधा कोकालिक था। पण्डित काश्यप तो मैं ही था। १६०. सीलानिसंस जातक "पस्स सद्धाय सीलस्स...." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक श्रद्धावान् उपासक के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रद्धावान् प्रसन्नचित्त आर्य-श्रावक था। एक दिन जेतवन जाते समय उसने शाम को अचिरवती नदी के किनारे पर जाकर देखा कि नाविक नौकाओं को किनारे पर छोड़ धर्म सुनने के लिए चले गए। वह घाट पर नौका न देख, बुद्ध की याद से मन को प्रसन्न कर नदी में उतर पड़ा। पाँव पानी में नहीं भीगे। पृथ्वीतल पर चलते हुए की तरह बीच में पहुँचने पर उसने लहर को देखा। उसकी बुद्ध-भक्ति मन्द पड़ गई थी; इससे उसके पैर डूबने लगे। उसने बुद्ध-भक्ति को दृढ़ कर पानी पर ही चल, जेतवन में प्रवेश कर शास्ता को प्रणाम किया। वह एक ओर बैठा। शास्ता ने उसके साथ बात- चीत करते हुए पूछा—"उपासक ! क्या रास्ते में आते हुए अधिक कष्ट तो १८
की।" इतना कह, उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही-
२७४ नहीं हुआ ?" "भन्ते ! बुद्ध की याद से मन को प्रीति-युक्त कर, पानी के प्रतिष्ठित हो मैं पृथ्वी को मर्दन करते हुए की तरह आया हूँ।" "उ: न केवल तूने ही बुद्ध के गुणों का स्मरण कर रक्षा प्राप्त की है। प समुद्र में नौका के टूटने पर उपासकों ने बुद्ध के गुणों की याद कर रक्ष की।" इतना कह, उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्वं काल में काश्यप सम्यक् सम्बुद्ध के समय में एक स्रोतापन्न श्रावक, एक नाई गृहस्थ के साथ नौका पर चढ़ा। उस नाई की भार्य्या नाई को उपासक को सौंपा-आर्य ! इसके सुख दुःख का भार आप र सातवें दिन वह नौका समुद्र के बीच में टूट गई। वे दोनो जने एक से चिमटे, एक द्वीप पर पहुँचे। यह नाई पक्षियों को मार कर, पका कर के समय उपासक को भी देता। यह उपासक 'मुझे नहीं चाहिए" क न खाता। वह सोचता त्रिरत्न की शरण को छोड़ कर हमारे लिए यह दूसरा सहारा नहीं। उसने त्रिरत्न के गुणों का स्मरण किया। उसके स्मरण करते करते उस द्वीप के नागराज ने अपने शरीर की नौका बनाई। समुद्र-देवता नौका चलाने वाला बना। नौका सात र भरी गई। तीन मस्तूल थे। इन्द्रनीलमणि की जोतें। सोने के चप्पू। देवता ने नौका में खड़े होकर घोषणा की—क्या कोई जम्बूद्वीप जाने है ? उपासक बोला-हम जाएँगे ? तो आ नौका पर चढ़। उसने पर चढ़ नाई को आवाज दी। समुद्रदेवता ने कहा-तुझे ही जाना मिल इसे नहीं। क्या कारण है ? कारण यही है कि यह शीलवान् नहीं है नौका तेरे लिए लाया हूँ। इसके लिए नहीं। "रहो ! मैं अपने दिए दान का, रक्षा किए गए शील का, तथा भावन गई भावना का इसे हिस्सेदार बनाता हूँ।" "स्वामी ! मैं अनुमोदन करता हूँ।" "अब ले चलूँगा" कह देवता ने उसे भी चढ़ा, दोनों जनों को समुद्र निकाल, नदी से वाराणसी पहुँचा अपने प्रभाव से उन दोनों के घर पर धन प
¸ सीलानिसंस ] २७५ दिया। फिर, 'पण्डित की ही संगति करनी चाहिए। यदि इस नाई की इस उपासक के साथ संगति नहीं होती, तो यह समुद्र के बीच म ही नष्ट हो जाता, कहते हुए देवता न पण्डित की संगति की महिमा बखानते हुए यह दो गाथाएँ कहीं— पस्स सद्धाय सीलस्स चागस्स च अय फल नागो नावाव वण्णेन सद्ध वहति उपासक ॥ सद्धिरेव समासेय सन्भि कुब्बेथ सय्यव सत हि सन्निवासेन सोत्थि गच्छति नहापितो ॥ [ श्रद्धा, शील और त्याग के इस फल को देखो । नाग नौका की शक्ल बना कर श्रद्धावान् उपासक का वहन करता है। सत्पुरुष के साथ रहे, सत्पुरुष के ही साथ दोस्ती कर । सत्पुरुष के साथ रहन से नाई कल्याण को प्राप्त होता है । ] पस्स किसी विशष को सम्बोधा न कर केवल देखने को कहता है। सद्धाय लौकिक तथा लोकोत्तर श्रद्धा स । शील में भी इसी प्रकार । चगस्स दान का त्याग तथा चित्तमैल का त्याग। अय फल यह फल। गुण या परि- णाम अर्थ है। अथवा त्याग के फल को देखो। यह नाग नौका की शक्ल में, यह अर्थ भी समझना चाहिए। नावाव वण्णेन नौका के आकार से। सद्ध तीन रत्नो में प्रतिष्ठित श्रद्धा । सन्भिरेव पण्डितो के ही साथ। समासेय एक साथ रह निवास कर यही अर्थ है। कुब्बेथ, कर। सन्थव मित्रता, तृष्णा-पूर्ण दोस्ती तो किसी से न करनी चाहिए। नहापितो—नाई गृहस्थ। न्हापितो यह भी पाठ है। इस प्रकार समुद्र देवता आकाश में ठहर, धर्मोपदेश दे तथा नसीहत कर, नागराजा को साथ ल अपने विमान को ही चला गया। शास्ता न यह धर्मदेशना ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। आर्य-सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर उपासक सकृदा- गामीफल म प्रतिष्ठित हुआ । तब स्त्रोतापन्न उपासक परिनिर्वाण को प्राप्त हुआ। नागराजा सारिपुत्त ! समुद्रदेवता तो मैं ही था।
१६१. रूहक जातक
दूसरा परिच्छेद ५. रूहक वर्ग १६१. रूहक जातक "अम्भो रूहक ! छिन्नापि .." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय पहली स्त्री से लुभाए जाने के बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह कथा आठवें परिच्छेद की इन्द्रिय जातक¹ में आएगी। शास्ता ने उस भिक्षु को कहा— "भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अनर्थ करने वाली है। पहले भी इसने तुझे राजा सहित परिषद के बीच में लज्जित कर घर से बाहर निकलने के योग्य नहीं रक्खा।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। बड़े होने पर, पिता के मरने के बाद राजा बन धर्म से राज्य करने लगे। उसका रूहक नाम का पुरोहित था। रूहक की पुराणी नाम की भार्या थी। राजा ने ब्राह्मण को, साज से सजाकर एक घोड़ा दिया। वह उस घोड़े पर चढ़ कर राजा की सेवा में आता था। उसे अलङ्कृत घोड़े की पीठ पर आते जाते देखकर जहाँ तहाँ खड़े आदमी घोड़े की प्रशंसा करते थे—अहो ! ¹ इन्द्रिय जातक (४२३)
रुहक ] २७७ अश्व का रूप कैसा है ! ओह ! अश्व कितना सुन्दर है ! उसने घर आ प्रासाद पर चढ भार्य्या को बुलाया—'भद्रे ! हमारा घोडा बडा सुन्दर लगता है। दोनो ओर खडे आदमी हमारे घोडे की ही प्रशंसा करते हैं। वह ब्राह्मणी थोडी धूर्त थी। उसने उसे कहा—'आर्य ! तू घोडे के सौन्दर्य के कारण को नही जानता। यह घोडा अपने साज के कारण शोभा देता है। यदि तू भी अश्व की तरह सुन्दर लगना चाहता है, तो घोडे का साज पहन, बाजार में उतर, अश्व की तरह पैरो की टाप देते हुए, जाकर राजा को देख । राजा भी तेरी प्रशंसा करेगा । आदमी भी तेरी ही प्रशंसा करेगे। उस पगले ब्राह्मण ने उसकी बात सुन, अमुक कारण से यह ऐसा कहती है न समझ, उसकी बात में विश्वास कर वैसा किया। जो जो देखते वे वे मजाक करते हुए कहते—'आचार्य्य ! खूब शोभा देते है। राजा न उससे पूछा—"आचार्य्य ! क्या पित्त प्रकोप हुआ है ? क्या तू पगला हो गया है ?” इस प्रकार लज्जित किया। उस समय ब्राह्मण ने सोचा 'मैने अनुचित किया।' यह लज्जित हुआ। ब्राह्मणी से क्रुद्ध हो, 'उसने मुझे राजा सहित सेना के बीच में लज्जित किया' सोच उसे पीट कर घर से निकालने दे लिए घर गया। धूर्त ब्राह्मणी को जब मालूम हुआ कि वह उस पर क्रोधित होकर आया है, तो वह पहले ही छोटे दरवाजे से निकल राज-महल में जा पहुँची। वह चार पाँच दिन वही रही। राजा ने वह समाचार जान पुरोहित को बुला कर कहा— “आचार्य्य ! स्त्री से दोष होता ही है। ब्राह्मणी को क्षमा करना चाहिए।” उसे क्षमा दिलाने के लिए पहली गाथा कही— अम्भॊ रुहक छिन्नापि जिया सन्धीयते पुन, सन्धीयस्सु पुराणिया मा क्रोधस्स वस गमि ॥ [ भो रुहक ! धनुष की डोरी टूट कर फिर भी जुड जाती है। पुराणि के साथ मेल कर लो। क्रोध के वशीभूत मत हो । ]
२७८ [ २५।१६२ संक्षेपार्थ—भो रुहक ! छिन्नापि धनुष की डोरी जुड ही जाती है। इसी प्रकार तू भी पुराणी के साथ सन्धीयस्सु कोधस्स वस मा गमि। उसे सुनकर रुहक ने दूसरी गाथा कही— विज्जमानासु मरुवासु विज्जमानेसु कारिसु अञ्ञं जियं करिस्साम अलञ्चेव पुराणिया ॥ [ मरुव नाम की छाल के रहते और बनाने वालो के रहते में दूसरी डोरी बनवा लूंगा । मुझे पुरानी की जरूरत नही । ] महाराज ! मरुव छाल और डोरी बनाने वाले मनुष्यों के रहते दूसरी डोरी बनवा लूंगा । इस टूटी हुई पुरानी डोरी की मुझे जरूरत नही । ऐसा कह उसे निकाल दूसरी ब्राह्मणी को ले आया । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न चित्त भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय पुराणि पूर्व-भार्या थी । रुहक उद्विग्न-चित्त भिक्षु था । बाराणसी राजा तो मै ही था । १६२. सिरिकालकण्णि जातक “इत्थी सिया रूपवती ” यह सिरिकालकण्णि जातक महाउम्मग्ग जातक¹ में आएगी । ¹ महाउम्मग्ग जातक (५४६)
१९३. चुल्लपदुम जातक
चुल्लपदुम ] २७१ १९३. चुल्लपदुम जातक "अयमेव सा अहमपि सो अनञ्जो...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते हुए, उद्विग्नचित्त भिक्षु के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा यह कथा उम्मद्दन्ति जातक¹ में आयेगी। शास्ता ने पूछा-"भिक्षु ! क्या तू सचमुच उद्विग्न-चित्त है ?" "भगवान् ! सचमुच ।" "तुझे किसने उद्विग्न किया है ?" "भन्ते ! मै एक अलङ्कृत सजीधजी स्त्री को देख कर आसक्त होने के कारण उद्विग्न हुआ हूँ।" "भिक्षु ! स्त्री अकृतज्ञ होती है, मित्रद्रोही होती है, कठोर हृदया होती हैं। पुराने पण्डित दाहिनी जांघ का लहू पिलाकर भी, जीवनदान देकर स्त्री का चित्त न जीत सके।" शास्ता ने यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। नामकरण के दिन उसका नाम पदुम- कुमार रक्खा गया। उसके और छ भाई थे। यह सातो जने क्रम से बडे हो, विवाह कर राजा के मित्रो की तरह रहने लगे। ¹ उम्मद्दन्ति जातक (५२७)
२८० [ २.५ १६१ एक दिन राजा ने राजागण में खड़े होकर उन्हें बड़े ठाट बाट से राजा की सेवा में आते देख, सोचा—यह मुझे मारकर राज्य भी ले सकते हैं। इस शङ्का से सदाद्विग्न हो उसने उन्हें बुलाकर कहा—तात ! तुम इस नगर में नहीं रह सकते। दूसरी जगह जाओ। मेरे मरने पर आकर कुल-प्राप्त राज्य ग्रहण करना। ये पिता का कहना मान रोते पीटते घर गए। अपनी अपनी स्त्रियो को ले, जहाँ कही जाकर जीवन बिताने के लिए नगर से निकले। रास्ते चलते हुए वे एक कान्तार में पहुँचे। वहाँ खाना पीना न मिला। भूख न सह सकने के कारण उन्होने सोचा, जीते रहेंगे तो स्त्रियां मिलेंगी। सबसे छोटे भाई की स्त्री को मारकर उसके तेरह टुकड़े कर उसका मास खाया। बोधिसत्त्व ने अपने और भार्या के लिए मिले दो हिस्सो में से एक रख छोड़ा, एक को दोनो ने खाया। इस प्रकार छ दिनो में छ स्त्रियो का मास खाया गया। बोधिसत्त्व ने एक एक करके छ दिनो में छ टुकड़े रख छोड़े। सातवें दिन 'बोधिसत्त्व की भार्या को मारेंगे' कहने पर बोधिसत्त्व ने वे छ टुकड़े उन्हें देकर कहा कि आज यह खाओ। कल देखेंगे। जिस समय वह मास खाकर सो रहे थे, बोधिसत्त्व अपनी भार्या को लेकर भाग निकले। उसने थोडी दूर चलकर कहा स्वामी ! चल नही सकती हूँ। बोधिसत्त्व उसे कन्धे पर लेकर सूर्योदय के समय कान्तार से निकले। सूर्यो- दय होने पर उसने कहा—स्वामी ! प्यास लगी है। बोधिसत्त्व ने कहा— भद्रे ! पानी नही है। लेकिन बार बार माँगने पर बोधिसत्त्व ने अपनी दाहिनी जाँघ में तलवार का प्रहार कर कहा—भद्रे ! पानी नही है। यह मेरी दाहिनी जाँघ का लहू पी ले। उसने वैसा किया। वे क्रम से महानदी पर आए। पानी पी, नहा कर फलमूल खाते हुए, आराम करने की एक जगह पर विश्राम किया। फिर गङ्गा के मोड की जगह पर आश्रम बनाकर रहने लगे। गङ्गा के ऊपर के हिस्से में किसी राज्यापराधी चोर को हाथ पाँव तथा नाक काट कर बोरे में बिठा गङ्गा में बहा दिया गया था। वह बहुत चिल्लाता हुआ उस जगह आ लगा। बोधिसत्त्व ने उसकी करुणापूर्ण रोने पीटने की आवाज सुन 'मेरे रहते कोई दुख प्राप्त प्राणी नष्ट न हो' सोच गङ्गा किनारे
चुल्लपदुम ] [Page Header Left] २८१ [Page Header Right]
जा, उसे उठा आश्रम पर ला, काषाय से धो लेप कर उसके जखमो की चिकित्सा की। उसकी भार्य्या घृणा से उस पर थूकती हुई फिरती थी—इस प्रकार के लुञ्जे को गङ्गा से लाकर उसकी सेवा करते हैं ।।। उसके जखम ठीक होने पर बोधिसत्त्व उसे और अपनी भार्य्या को आश्रम पर छोड़, जगल से फलमूल लाकर उसका तथा भार्य्या का पालन करने लगे। उनके इस प्रकार रहते हुए वह स्त्री उस लुञ्जे से आकृष्ट हो गई। उसने उसके साथ अनाचार किया। फिर किसी उपाय से बोधिसत्त्व को मार डालना चाहिए, सोच बोली—"स्वामी ! मैने, तुम्हारे कन्धे पर बैठे हुए जिस समय कान्तार से निकल रही थी इस पर्वत को देख कर एक मिन्नत मानी थी— हे पर्वतनिवासी देवता ! यदि मैं और मेरा स्वामी सकुशल जीते निकल जाएंगे तो मैं तुम्हारी बलि चढाऊँगी। सो, वह देवता जिसकी मिन्नत मानी थी तग करता है। उसकी बलि दे।" बोधिसत्त्व उसकी माया नही जानते थे। उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया, और बलिकर्म तैयार कर उससे बलि-पात्र उठवा पर्वत पर चढे। उस स्त्री ने बोधिसत्व से कहा—"स्वामी ! देवता से भी बढकर तुम ही उत्तम देवता हो। इसलिए पहले तुम्हें ही वन-पुष्पों से पूज, प्रदक्षिणा कर, वन्दना कर पीछे देवता की बलि दूँगी।" उसने बोधिसत्त्व को प्रपात की ओर कर वन-पुष्पों से पूजा की। फिर प्रदक्षिणा कर, प्रणाम करने वाली की तरह हो, पीछे जा, पीठ में धक्का दे, प्रपात से गिरा दिया। 'शत्रु की पीठ देख ली' सोच सन्तुष्ट हो, वह पर्वत से उतर लुञ्जे के पास गई। बोधिसत्त्व भी प्रपात के किनारे से पर्वत से गिरते हुए, एक गूलर के वृक्ष पर पत्तो से ढके कष्टकररहित गुच्छ में जा लग। पर्वत से नीचे उतरने में असमर्थ थे। वह गूलर खाकर शाखाओ के बीच में बैठे रहे। एक गोह, जिसका शरीर बडा था पर्वत के नीचे से उस गूलर के पेड़ पर चढ फल खाता था। वह उस दिन बोधिसत्त्व को देखकर भाग गया। अगल दिन आया और एक ओर से फल खाकर चला गया। इस प्रकार बार बार आने से जब वह बोधिसत्त्व का विश्वासी हो गया तो उसने पूछा—"तं इस जगह कैसे आया ?" "इस कारण से" बताने पर उसने कहा—"तो मत डर।" उसने बोधिसत्त्व को अपनी पीठ पर लिटा, उतार कर जगल से निकल, महामार्ग
२८२ [ २५.१६३ पर ले जाकर कहा—"इस मार्ग से जा।" बोधिसत्त्व को उत्साहित कर वह स्वयं जगल में चला गया। बोधिसत्त्व एक गामडे में जाकर रहने लगे। वहाँ रहते हुए, पिता के मरने का समाचार मिला। वह वाराणसी पहुँच, कुलागत राज्य पर अधिकार कर, पदुमराजा नाम से, दस राजधर्मों से विरुद्ध न जा धर्म से राज्य करने लगे। चारो नगर-द्वारो पर, नगर के बीच में तथा महल के द्वार पर छ दानशालाएँ बनवा प्रति दिन छ हजार खर्च कर दान देते। वह पापी स्त्री भी उस लुञ्जे को कन्धे पर बिठा जगल से निकल बस्तियो मे भिक्षा मांग कर यागु-भात इकट्ठा कर उस लुञ्जे को पोसती थी। उससे यदि कोई पूछता कि यह तेरा क्या लगता हैं, सो वह उत्तर देती—"मैं इसके मामा की लडकी हूँ और यह मेरी बुआ का लडका है। मैं इसीको दी गई। सो में अपने स्वामी को—जो इस तरह दण्डित भी किया गया है—उठाए लिए फिर कर, भीख मांग कर पालती हूँ।" मनुष्यों ने समझा—यह पतिव्रता है। उसके बाद और भी यवागु भात देने लगे। दूसरो ने कहा—"तू इस तरह मत घूम। पदुमराज वाराणसी में राज्य करता है। सारे जम्बूद्वीप को उद्वेलित कर दान देता है। वह तुझे देखकर प्रसन्न होगा। बहुत धन देगा।" उन्होने उसे एक बेंत की टोकरी दी और कहा कि अपने स्वामी को इसमें बिठा कर ले जा। वह अनाचारिणी उस लुञ्जे को बेंत की टोकरी में बिठा, टोकरी को उठा, वाराणसी पहुँच वहाँ दानशालाओ में खाती हुई घूमने लगी। बोधिसत्त्व अलङ्कृत हाथी के कन्धे पर बैठ, दानशाला जा, वहाँ आठ या दस को अपने हाथ से दान देकर घर जाते। वह अनाचारिणी उस लुञ्जे को टोकरी में बिठा, टोकरी उठा, राजा के रास्ते में खडी हुई। राजा ने देखकर पूछा—"यह क्या है?" 'देव! एक पतिव्रता है।" उसे बुलवा कर, पहचान कर, लुञ्जे को टोकरी से निकलवा कर पूछा— "यह तेरा क्या लगता है?" 'देव! यह मेरी बुआ का लडका है। कुलवालो ने मुझे इसे सौंपा है। यह मेरा स्वामी है।" मनुष्य उनके बीच के भेद को न जानते थे। वे उस अनाचारिणी की
कुल्लपदुम ] २८३ प्रणाम करने लगे—ओह ! पतिदेवता ! राजा ने फिर उससे पूछा—"तुझे कुलवालो ने इसे सौंपा है ? यह तेरा स्वामी है ?" उसने राजा को न पहचानते हुए धीर बन कर कहा—"देव ! हाँ।" तब राजा ने उसे पूछा—"क्या यह वाराणसी राजा का पुत्र है ? क्या तू पदुमकुमार की भार्या अमुक राजा की अमुक नाम की लडकी नही है ? मेरी जाँघ का लहू पीकर इस लुञ्जे के प्रति आसक्त हो मुझे प्रपात से गिरा दिया। यह तू अब अपने सिर पर मृत्यु ले मुझे मरा समझ यहाँ आई है ? मैं जीता हूँ।" इतना कह, अमात्यो को बुला राजा ने कहा—"अमात्यो ! क्या मैने तुम लोगो के पूछने पर यह नहीं कहा था कि मेरे छ छोटे भाइयो ने छ स्त्रियो को मार कर मास खाया। लेकिन मैने अपनी स्त्री को सकुशल गङ्गा किनारे लाकर एक आश्रम में रहते हुए, एक दण्ड-प्राप्त लुञ्जे को (पानी से) निकाल सेवा की। उस स्त्री ने उस आदमी के प्रति आसक्त हो मुझे पर्वत पर से गिरा दिया। मै अपने मैत्रीचित्त के कारण नही मरा। जिसने मुझे पर्वत से गिराया था, वह कोई और नहीं थी, यही दुराचारिणी थी। जो दण्ड-प्राप्त लुञ्जा था, वह भी कोई दूसरा न था, यही था।" यह कह यह गाथाएँ कही— अयमेव सा अहमपि सो अनञ्ञो, अयमेव सो हत्थच्छिन्नो अनञ्ञो; यमाहु कोमारपती ममन्ति, वज्झित्थियो नत्थि इत्थीसु सच्चं ॥ इमञ्च जम्म मुसलेन हन्त्वा, लूदं छव परदारूपसेविं; इमिस्सा च न पापपतिव्वताय, जीवन्तिया छिन्दथ कण्णनासं ॥ [ यही वह है। मैं भी वही हूँ। यह हाथ कटा भी वही है। दूसरा नही है जिसे 'यह मेरा कोमारपति' कहती है। स्त्रियाँ वध्य करने योग्य हैं। उनमें सत्य नहीं होता ।
' * २८४ [ २.५.१६३ इस नीच-लोभी, मृतसदृश, पराई स्त्री का सेवन करने वाले को मूसल से मार डालो। और इस पापी पति-व्रता के जीते जी (इसके) कान नाक काट डालो। ] यमाहु कोमारपती ममं, जिसे यह मेरा कोमारपति, जिसे मैं कुल द्वारा सौंपी गई, स्वामी कहती हूँ। अयमेव सो न अञ्ञो। यमाहु कुमारपति, यह भी पाठ है। यही पुस्तको मे लिखा है। उसका भी यही अर्थ है। वचन-भेद मात्र है। जो राजा ने कहा, वही यहाँ आ गया। वज्झित्थियो, स्त्रियाँ वध्य होती है, वध करने के योग्य ही होती हैं। नत्थि इत्थीसु सच्चं, इनका स्वभाव एक नही रहता। इमञ्च जम्मं, यह उन दोनो को दण्डाज्ञा देने के लिए कहा। जम्मं नीच। मूसलेन हन्त्वा, मूसल से मारकर, पीटकर, हड्डियो को तोडकर, चूर्ण विचूर्ण करके। लुद्दं कठोर। छवं निर्गुण होने से निर्जीव मृत- सदृश। इमिस्सा च नं, इसमें नं निपातमात्र है। इसके पापपतिव्वताय अनाचारिणी दुःशीला के जीवन्तियाव कण्णं नासं छिन्दथ। बोधिसत्त्व ने क्रोध को न सम्भाल सकने के कारण उनको ऐसे दण्ड की आज्ञा दे दी; लेकिन वैसा करवाया नही। क्रोध को कम करके उसने टोकरी को उसके सिर पर ऐसे कसकर बँधवाया कि वह उतार न सके। फिर उस लुञ्जे को उसमें फिंकवा उसे अपने राज्य से निकलवा दिया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न-चित्त भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय छ भाई कोई स्थविर थे। भार्या चिञ्चामाणविका थी। लुञ्जा देवदत्त था।, गोहराज आनन्द था। पदुमराज तो मैं ही था।
१९४. मणिचोर जातक
मणिचोर ] २८५ १९४. मणिचोर जातक "न सन्ति देवा पयसन्ति नून..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय वध का प्रयत्न करने वाले देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय शास्ता ने यह सुन कर कि देवदत्त मेरे वध के लिए प्रयत्न करता है, 'भिक्षुओ, न केवल अभी, पहले भी देवदत्त ने मेरे वध का प्रयत्न किया ही है, लेकिन सफल नहीं हुआ" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व वाराणसी के समीप के एक गामड़े में गृहपति कुल में पैदा हुए। उसके बड़े होने पर उसके लिए वाराणसी से एक लड़की लाई गई। वह प्रिया थी, सुन्दर थी, दर्शनीय थी देवाप्सराओं के समान वा पुष्पित लता के समान। वह मस्त किन्नरी की तरह क्रीडा करने वाली थी। नाम था सुजाता। पतिव्रता थी; सदाचारिणी थी और थी कर्त्तव्यपरायणा। पति की सेवा तथा सास ससुर की सेवा वह नित्य करती थी। वह बोधिसत्त्व को प्रिय थी, मन के अनुकूल थी। वे दोनो प्रसन्नतापूर्वक एक चित्त हो मेल से रहते थे। एक दिन सुजाता ने बोधिसत्त्व से कहा—मैं मातापिता को देखना चाहती हूँ। उसने कहा—भद्रे ! अच्छा पर्याप्त पाथेय तैयार करो। खाद्य-पक्वान पक्वा, खाद्य आदि गाड़ी पर रखवा, गाड़ी को हाँकता हुआ वह स्वयं आगे बैठा। वह पीछे बैठी। नगर के समीप पहुँच गाड़ी खोल नहा कर उन्होने खाया। फिर बोधिसत्त्व ने गाड़ी जोती और स्वयं आगे बैठा।
२८६ [ २.५.१६४ सुजाता कपडे बदल अलङ्कृत हो पीछे बैठी। जिस समय गाड़ी ने नगर में प्रवेश किया, उसी समय हाथी के कन्धे पर बैठ नगर की प्रदक्षिणा करता हुआ वाराणसी नरेश उधर आ निकला। सुजाता उतर कर गाड़ी के पीछे पीछे पैदल चल रही थी। राजा ने उसे देख, उसके सौन्दर्य पर ऐसे मुग्ध हो मानो वह उसकी आँखें खींच ले रहा हो, एक अमात्य को भेजा कि पता लगाए कि उसका स्वामी है वा नही ? उसने जाकर पता लगाया कि उसका स्वामी है और आकर निवेदन किया—'देव ! यह विवाहिता है। गाड़ी में बैठा हुआ आदमी उसका स्वामी है।" राजा अपनी आसक्ति को हटाने में असमर्थ था। उसने कामातुर हो सोचा, किसी उपाय से इस आदमी को मरवा कर स्त्री को लूंगा; और एक आदमी को बुलाकर कहा—"अरे ! यह चूडामणि ले जाकर रास्ते चलते हुए की तरह जाते हुए इसे इस आदमी की गाड़ी में फेंक कर आओ।" उसे चूडामणि देकर भेजा। उसने "अच्छा" कह उसे ले जाकर गाड़ी में डाल आकर कहा—'देव ! मैने डाल दी।" राजा ने कहा—मेरी चूडामणि खो गई। लोगो ने शोर मचा दिया। राजा ने आज्ञा दी—"सब दरवाजो को बन्द कर, रास्ते रोक कर चोर का पता लगाओ।" राजपुरुषो ने वैसा ही किया। नगर एक सिरे से क्षुब्ध हो गया। एक जन आदमियो को लेकर बोधिसत्त्व के पास जा बोला—"अरे ! गाडी रोको। राजा की चूडामणि खो गई है। गाड़ी की तलाशी लेगे।" उसने गाड़ी की तलाशी लेते हुए अपनी रक्खी हुई मणि उठा, बोधिसत्त्व को पकड, 'यह मणि-चोर है' कहते हुए हाथों और पाँवों से पीट, उसके हाथो को पिछली तरफ बाँध उसे ले जाकर राजा के सामने पेश, किया—यह मणि-चोर है। राजा ने आज्ञा दी—इसका सिर काट डालो। राजपुरुष उसे चार चार बेतो से पीटते हुए नगर से बाहर ले गए। सुजाता भी गाड़ी छोड़ दोनो हाथ उठा 'मेरे कारण स्वामी इस दुःख का प्राप्त हुए' कह रोती पीटती उसके पीछे पीछे चली। राज पुरुषो ने बोधिसत्व का सिर काटने के लिए उसे सीधे लिटाया। उसे देख सुजाता ने अपने सदा- चार का ध्यान कर “मालूम होता है इस लोक में कोई ऐसा देवता नही है जो पापी दुत्साहसियो को सदाचारियो पर अत्याचार करने से रोक सके" कह, रोते पीटते पहली गाथा कही—
मणिचोर ] २८७ न सन्ति देवा पवसन्ति नून नहूनून सन्ति इध लोकपाला सहसा करोन्तान असञ्ञतान नहूनून सन्ति पटिसेधितारो ॥ [ असयमी, दुस्साहसिक दुष्कर्म करने वालो को रोकने वाले न देवता हैं (यदि हैं तो समय पर चले जाते हैं) न ही यहाँ लोकपाल हैं—उन्हें रोकने वाला कोई नहीं । ] न सन्ति देवा इस लोक में सदाचारियों की देख भाल करने वाले तथा पापियो को रोकने वाले देवता नही है। पवसन्ति नून, अथवा इस प्रकार के मौको पर वह निश्चय से प्रवास को चले जाते हैं। इध लोकपाला इस लोक में लोकपाल कहलाने वाले श्रमण-ब्राह्मण भी सदाचारियो पर अनुग्रह करने वाले नहू नून सन्ति। सहसा करोन्तान असञ्ञतान, सहसा बिना विचारे दुस्साहस, कठोर-कर्म करने वाले दुराचारियो को। पटिसेधितारो इस प्रकार का कर्म मत करो। ऐसा करना नही मिलेगा--इस प्रकार रोकने वाले नहीं। इस प्रकार उस सदाचारिणी के रोने पीटने से देवेन्द्र शक्र का आसन गर्म हुआ। शक्र ने सोचा कौन है जो मुझे मेरे आसन से गिराना चाहता है ? पता लगाने से जब उसे यह कारण मालूम हुआ तो उसने सोचा—'वाराणसी नरेश अत्यन्त निर्दयता का काम कर रहा है। सदाचारिणी सुजाता को कष्ट दे रहा है। अब मुझ पहुँचना चाहिए।' उसने देवलोक से उतर अपने प्रताप से हाथी की पीठ पर जाते हुए उस पापी राजा को उतार सीस काटने की जगह पर सीधा लिटा, बोधिसत्त्व को उठा सब अलङ्कारो से अलङ्कृत कर राजवेष पहना हाथी के कन्धे पर बिठाया। फरसा उठा कर खड़े सीस काटने वालो ने राजा का सिर काट दिया। सीस कट जाने पर ही उन्हें पता लगा कि यह राजा का सिर था। देवेन्द्र शक्र ने दिखाई देने वाले शरीर से बोधिसत्त्व के पास जा बोधिसत्त्व को राज्याभिषेक तथा सुजाता को अग्रमहिषीपद दिलवाया। अमात्य तथा
२८८ [ २.५.१९४ ब्राह्मण-गृहपति आदि देवेन्द्र शक्र को देखकर प्रसन्न हुए—अधार्मिक राजा मारा गया। अब हमें शक्र का दिया हुआ धार्मिक राजा प्राप्त हुआ। शक्र ने भी आकाश में खड़े हो कहा—"यह शक्र का बनाया हुआ राजा अब से धर्मपूर्वक राज्य करेगा। यदि राजा अधार्मिक होता है तो वर्षा असमय होती है, समय पर नहीं होती है, अकाल-भय, रोग-भय तथा शस्त्र-भय बना ही रहता है।" इस प्रकार उपदेश देते हुए शक्र ने दूसरी गाथा कही— अकाले वस्सति तस्स काले तस्स न वस्सति सग्गा च चवतिट्ठना ननु सो तावता हतो ॥ [ उसके राज्य में असमय वर्षा होती है, समय पर नहीं होती। वह स्वर्ग- स्थान से गिरता है। निश्चय से वह उतने से मारा गया।] अकाले, अधार्मिक राजा के राज्य करने के समय—अनुचित समय पर खेती के पकने के समय या कटाई तथा मर्दन करने के समय देव वस्सति। काले, योग्य समय पर, बोने के समय, खेती छोटी रहने के समय वा दाना पड़ने के समय न वस्सति। सग्गा च चवतिट्ठना, स्वर्ग-स्थान से अर्थात् देवलोक से। अधार्मिक राज अप्रतिलाभ होने से देवलोक से च्युत होता है। यह भी अर्थ है कि स्वर्ग में भी राज्य करता हुआ अधार्मिक राजा वहाँ से च्युत होता है। ननु सो तावता हतो, निश्चय से वह अधार्मिक राजा इस से मारा जाता है। अथवा "नु" यहाँ एकान्तवाची है, न केवल वह इतने से मारा गया, बल्कि वह आठ महा नरकों में तथा सोलह उस्सद नरकों में चिरकाल तक भाग जाएगा। इस प्रकार शक्र जन-समूह को उपदेश दे अपने देवस्थान को ही चला गया। बोधिसत्व ने भी धर्म से राज्य करते हुए स्वर्ग-मार्ग को भरा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय अधार्मिक राजा देवदत्त था। शक्र अनुरुद्ध था। सुजाता राहुल-माता थी। शक्र का बनाया हुआ राजा तो मैं ही था।
१६५. पब्बतूपत्थर जातक
पब्बतूपत्थर ] २८६ १६५. पब्बतूपत्थर जातक ' "पब्बतूपत्थरे रम्मे. " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कोशल राजा के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कोशल राजा के एक अमात्य ने रनिवास को दूषित किया। राजा ने खोज करके उसे ठीक ठीक जान शास्ता को निवेदन करने की इच्छा से जेतवन जा, शास्ता को प्रणाम कर पूछा- भन्ते ! हमारे रनिवास को एक अमात्य ने दूषित किया है। उसको क्या करना चाहिए ?" शास्ता ने पूछा-"महा- राज ! वह अमात्य उपकारी है ? वह स्त्री प्रिया है ?" "हाँ भन्ते ! बहुत उपकारी है। सारे राजकुल को सँभालता है। वह स्त्री भी मेरी प्रिया है। "महाराज ! अपने उपकारी सेवकों के प्रति तथा प्रिया स्त्री के प्रति बुरा व्यवहार नही किया जा सकता। पूर्व समय में भी राजा लोग पण्डितो की बात सुन उपेक्षावान् हो गए थे।" उनके याचना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही- ख. अतीत कथा : पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व अमात्यकुल में पैदा हो बड होने पर उस राजा के अर्थधर्मानुशासक हुए। उस राजा के एक अमात्य ने रनिवास दूषित किया। राजा ने उसका ठीक ठीक पता लगा सोचा-अमात्य भी मेरा बहुत उपकारी है। वह स्त्री भी प्रिया है। मैं इन दोनो को नष्ट नहीं कर सकता। पण्डित-अमात्य से प्रश्न पूछकर १६
२६० [ २.५.१६५ यदि सहन करने योग्य होगा तो सहन कर लूंगा; नही सहन करने योग्य होगा तो नही सहन करूँगा।" उसने बोधिसत्त्व को बुला, आसन दे पूछा— "पण्डित ! प्रश्न पूछता हूँ।" "महाराज ! पूछें, उत्तर दूँगा।" राजा ने प्रश्न पूछते हुए यह पहली गाथा कही— पब्बतूपत्थरे रम्मे जाता पोक्खरणी सिवा तं सिगालो अपापासि जानं सीहेन रक्खितं ॥ [ पर्वत के रम्य दामन में सुन्दर पुष्करिणी रही। यह जानते हुए भी कि इसे सिंह ने अपने लिए सुरक्षित रखा है, उसमें शृगाल ने पानी पिया। ] पब्बतूपत्थरे हिमालय पर्वत के दामन में फैले हुए आँगन में जाता पोक्ख- रणी सिवा, शीतल, मधुर जल वाली पुष्करिणी पैदा हुई। कमल से ढकी हुई नदी भी पुष्करिणी ही। अपापासि, अप उपसर्ग है अपासि अर्थ है। जानं सीहेन रक्खितं यह पुष्करिणी सिंह के परिभोग की है, सिंह के द्वारा रक्षित है; उस शृगाल ने यह जानने हुए ही कि यह सिंह द्वारा रक्षित है जल पिया ! तू क्या समझता है ? शृगाल सिंह का भय न मान कर इस प्रकार की पुष्करिणी से जल पिए ? बोधिसत्त्व ने यह समझ कर कि निश्चय से इसके रनिवास को किसी अमात्य ने दूषित किया होगा, दूसरी गाथा कही— पिपन्ति वे महाराज ! सापदानि महानदिं न तेन अनदी होति खमस्सु यदि ते पिया ॥ [ महाराज ! महानदी पर सभी प्राणी जल पीते हैं। उससे नदी अनदी नही होती। यदि वह प्रिया है, तो क्षमा करें। ] सापदानि न केवल गीदड ही किन्तु चीते, कुत्ते, खरगोश, बिल्ले, हिरन आदि सभी प्राणी कमल से ढकी हुई होने के कारण पुष्करिणी कहलाने वाली
धासाहस्स ] २६१ नदी पर पानी पीते ही हैं। न तेन अनदी होति नदी पर दो पैरो वाले, चार पैरो वाले, साँप-मत्स्य आदि सभी प्यासे पानी पीते हैं। उससे वह न अनदी होती है, न जूठी। क्यों? सब के लिए साधारण होने से। जिस प्रकार नदी जिस किसी के पानी पीने से दूषित नहीं होती, उसी प्रकार स्त्री भी कामुकता के वशीभूत हो अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे से सहवास करने से अनिस्त्री नहीं होती। क्यों? सब के लिए साधारण होने से। न हि स्त्री जूठी होता है। क्यों? जल-स्नान से शुद्ध हो सकने के कारण। खमस्सु यदि ते पिया, यदि वह स्त्री तुझे प्रिया है तथा वह अमात्य बहुत उपकारी है; उन दोनों को क्षमा कर। उपेक्षावान् हो। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने राजा को उपदेश दिया। राजा ने उसका उप- देश मान 'फिर ऐसा पापकर्म न करना' कह दोनों को क्षमा किया। उसके बाद से वह विरत रहे। राजा भी दानादि पुण्य कर्म करते हुए मरने पर स्वर्ग सिधारे। कागल नरेश भी यह धर्मदेशना सुन उन दोनों को क्षमा कर उपेक्षावान् हुआ। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पण्डित अमात्य तो मैं ही था। १६६. वालाहस्स जातक "ये न काहन्ति ओवाद..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय.एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा- "क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?" "सच- मुच" कहने पर पूछा-किस कारण से उत्कण्ठित है ? उसने उत्तर दिया-