काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( ६५ ) इकतालीस दिन होते हैं । अतः मार्गशीर्ष शुक्ल में युद्धारम्भ से पूर्व एक तिथि की वृद्धि मान लेने पर तिथिक्षय की पूर्ति और श्रीबलदेवजी के अभीष्ट दिनों की सिद्धि संभव है । रही ज्येष्ठा से उत्तराषाढ़ा तक सैन्य शिक्षण की प्रामाणिकता की बात ! भीष्म पर्व के आरम्भ में सैन्य मर्यादा निर्धारण का उल्लेख है । परन्तु उस अध्याय का नाम पुष्पिकानुसार सैन्यशिक्षण है । अतः इससे अनुमान लगाना चाहिये कि इन चार दिनों में युद्धक्षेत्र निर्धारण, मंगलाचरण और सैन्य शिक्षणादि कृत्य सम्पन्न हुए । जैसे यज्ञ का पूर्वरूप भी यज्ञारम्भ के अन्तर्गत ही मान्य है, वैसे ही युद्धारम्भ का पूर्वरूप भी युद्धारम्भ के अन्तर्गत ही मान्य ' होना चाहिये । ज्योतिष के अनुसार श्रवण एवं धनिष्ठा ऊर्ध्वमुख नक्षत्र हैं, अतः इनमें युद्धारम्भ उपयुक्त है— उत्तरा त्रितयं पुष्यो रोहिण्यार्द्रा श्रुतित्रयम् । ऊर्ध्ववक्रोगणो ज्ञेयो नक्षत्राणां मनीषिभिः ॥ प्रासादच्छत्र गेहानि प्राकार ध्वज तोरणम् । नानाभिषेकमश्वं च कुर्यादूर्ध्वमुखे गणे ॥ ( शीघ्रबोध २।८१-८२ ) 'तीनों उत्तरा, पुष्य, रोहिणी, आर्द्रा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिभिषा ये नक्षत्र पण्डितों को ऊर्ध्वमुख जानना चाहिये । महल, छत्र, घर, परकोटा, ध्वजा तोरण, अभिषेक और घोड़े आदि की सवारी ऊर्ध्वमुख में उत्तम हैं ॥' अब विचारणीय विषय यह है कि जैसे मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी में युद्धारम्भ मानने पर 'संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र देवताम्' यह भगवद् वचन बाधित होता है; वैसे ही मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को युद्धारम्भ मानने पर भी होता है । अतः भीष्मपितामह के नेतृत्वकाल में अव- काशयुक्त युद्ध मानने की क्या उपयोगिता है, जबकि 'श्वो योत्स्यामः परैः स' ( भीष्मपर्व ६४।७० ) यह भीष्म वचन भी बाधित ही हो रहा है ? ५
( ६६ ) इसका उत्तर यह है कि जैसे आहुति प्रदान रूप मुख्य यज्ञ नवग्रहादि पूजन रूप कृत्यों का सहिष्णु होता है, वैसे ही अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग रूप मुख्य युद्ध चार दिनों का अतिरिक्त व्यवधान सह सकता है। क्योंकि युद्ध-मर्यादा रूप व्यवधान तो व्यास वचन से ही सिद्ध है। शेष व्यवधान 'सैन्य शिक्षण और स्वस्तिवाचनादि' संकेतों से अनुमेय है। अवकाश-दिन से पूर्व यदि कार्यालय का कोई अधिकारी सेवकों से कहे— “अब आज कार्यालय बन्द कर दो, शेष कार्य 'कल' करूँगा" तो उसके इस वचन का अभिप्राय जैसे एक दिन बाद समझा जायगा, यदि इसी शैली में भीष्मजी का उक्त सामान्य वचन मान्य हो तब तो यह संगति उपयुक्त है। अन्यथा भीष्म प्रतिज्ञा की तरह भीष्म-वचन ही पूर्ण सत्य रहने दिया जाय और अठारह दिन लगातार युद्ध मान कर श्रीनीलकण्ठाचार्य की शैली में श्रीबलभद्र वाक्य के सर्वंथा अनुगुण श्रवण नक्षत्र और उसके अनुकूल तिथि से सत्रह दिन पूर्वं मार्गशीर्ष शुक्ल मृगशिरा नक्षत्र में ही युद्धारम्भ उपयुक्त माना जाय ? रही 'सप्तमाच्चापिदिवसात्' के अनुसार पुष्य के सातवें दिन ज्येष्ठा नक्षत्र की बात ? तो पहले की तरह 'ज्येष्ठा' को ऐन्द्र नक्षत्र मानकर तथा मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी से अमावास्या तक एक तिथि एवं उसके अनुगुण एक नक्षत्र का क्षय मानकर पुष्य से नवें स्थान पर ज्येष्ठा है, अतः 'सप्तमाच्चापि' का 'एक सप्ताह बाद अर्थात् मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी पुष्य के पश्चात् नवें दिन' ऐसा भावार्थ ग्रहण करना चाहिये । अवकाश-रहित अब प्रतिदिन लगातार अठारह दिनों तक युद्ध को प्रमाण मानकर मार्ग- शीर्ष शुक्ल दशमी, द्वादशी या त्रयोदशी तक युद्ध के अनारम्भ की दृष्टि से विचार प्रारम्भ किया जाता है— नवीन पञ्चाङ्गों के अनुसार तथा प्रचलित प्रसिद्धि के अनुसार गीता जयन्ती मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को सिद्ध होती है । नक्षत्र गणना के अनुसार मार्गशीर्ष पूर्णिमा मृगशिरा या आर्द्रा में संभव है, अतः शुक्ल एकादशी को अश्विनी और भरणी नक्षत्र होना चाहिये । अश्विनी
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से युद्धारम्भ मानने पर श्रवण तक बाईस दिन होते हैं । कदाचित् पौषकृष्ण में दो तिथियों का तथा उनके अनुगुण दो नक्षत्रों का क्षय मानें तो भी दो तिथि और नक्षत्र अवशिष्ट रहते हैं । इसलिये बीस दिनों तक युद्ध सिद्ध होता है, जो कि अनवकाश वाले पक्ष में सर्वथा अमान्य है । कदाचित् अश्विनी में ध्वजारोहण, स्वस्तिवाचन और सैन्य शिक्षण तथा युद्ध मर्यादा निर्धारणादि मानें और भरणी में ही एकादशी मानकर, इसी दिन युद्धारम्भ मानें एवं पौष कृष्ण को ही त्रयोदश दिनों का पक्ष मानें तो भी एक तिथि और नक्षत्र अवशेष रहते हैं, इसलिये उन्नीस दिनों तक युद्ध सिद्ध होता है । कदाचित् पौष अमावस्या को ही युद्धान्त और श्रवण का योग मानें तो भी श्रीबलदेव जी के बयालीस दिन न होकर चालीस दिन ही सिद्ध होते हैं । अतः पौषकृष्ण को त्रयोदश दिनों का पक्ष और मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से पौष अमावास्या तक महाभारत युद्धकाल मानना केवल लगातार अठारह दिनों की प्रसिद्धि को देखते हुए उचित प्रतीत होता है । परन्तु महाभारत में जो रेवती, पुष्य, अनुराधा, ज्येष्ठा, मघा और श्रवण के रूप में नामोल्लेख पूर्वक नक्षत्र निर्देश प्राप्त है उसके विरुद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी वाली गणना होने के कारण आंशिक सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं । इसके अतिरिक्त इस द्वितीय पक्ष की भी श्रीनीलकण्ठाचार्यादि के समय में प्रसिद्धि नहीं थी, अतः अर्वाचीन प्रसिद्धि ही सिद्ध होती है । अल्प प्रामाणिकता और अर्वाचीन प्रसिद्धि की अपेक्षा ठोस प्रामाणिकता और पूर्वाचार्यों की अनु- स्मृति का आलम्बन अधिक उत्कृष्ट होता है । हेमन्ते प्रथमे मासे शुक्लपक्षे त्रयोदशी । प्रवृत्तं भारतं युद्धं नक्षत्रं यमदैवतम् ॥ (०भारत सावित्री ६४) "हेमन्त ऋतु के प्रथम मास में शुक्लपक्ष की त्रयोदशी को यमदैवत नक्षत्र में भारत युद्ध प्रारम्भ हुआ ।"
( ६८ ) 'भारत सावित्री' का यह वचन नक्षत्र गणना की दृष्टि से महाभारत के प्रति- कूल है। यद्यपि हेमन्त ऋतु का प्रथम मास मार्गशीर्ष होता है। 'शरदन्ते हिमागमे' ( उद्योग० ८३।७ ) इस पूर्वोक्त वचन के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण ने शरद् ऋतु के अन्त और हेमन्त के शुभागमन पर उपप्लव्य से हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया था। रेवती नक्षत्र को देखते हुए तथा ज्येष्ठा में मार्गशीर्ष की अमावास्या को देखते हुए 'कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे' का अर्थ पूर्वरीत्या मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी सिद्ध होता है। मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष में दो तिथियों का क्षय सिद्ध होने के कारण कार्तिक शुक्ल एकादशी से प्रारम्भ होने वाली हेमन्त ऋतु का प्रथम मास शुक्ल त्रयोदशी को पूर्ण होता है। अतः 'हेमन्ते प्रथमे मासे शुक्लपक्षे त्रयोदशी' यह सावित्री-वचन सर्वथा सत्य है। परन्तु 'प्रवृत्तं भारतं युद्धं नक्षत्रं यम दैवतम्' इस वचन के सम्बन्ध में यह विचार उपस्थित होता है कि यम देवता सम्बन्धी प्रसिद्ध नक्षत्र भरणी है। भरणी से श्रवण इक्कीसवें स्थान पर है। इधर भारत सावित्री को मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी से पौष अमावास्या तक ही युद्ध मान्य है। अस्तु ! अठारह दिनों का लगातार युद्ध भरणी से प्रारम्भ होने पर मूल नक्षत्र में पूर्ण होना चाहिये । मूल में पौष अमावास्या मानने पर पुनर्वसु में पौष पूर्णिमा भी उचित ही है। परन्तु तिथिक्षय अमान्य होने पर तीन नक्षत्रों के क्षय की कल्पना भी सर्वथा अशक्य है। अतः मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी की तरह ही मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी वाला पक्ष भी महाभारत के विपरीत सिद्ध होता है। कहा जा सकता है कि क्योंकि श्रवण से मृगशिरा सत्रहवें स्थान पूर्व है, अतः यम का अर्थ युग्म करके मृगशिरा को ही यम देवता सम्बन्धी नक्षत्र मानकर युद्धारम्भ माना जाय। परन्तु ऐसा मानने पर दो विघ्न उपस्थित होते हैं। प्रथम यह कि मृगशिरा के चन्द्रमा अधिपति हैं। यम से युग्म का यकार और मकार की दृष्टि से पाठ साम्य होने पर भी यम से चन्द्र का पाठतः अथवा अर्थतः साम्य नहीं सिद्ध होता । यदि श्रीनीलकण्ठाचार्य के शब्दों में मृगशिरा का पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध राशिगत दो विभाग कर पूर्वार्द्ध में वृष और
( ६९ ) उत्तरार्द्ध में मिथुन का चन्द्र माना जाय, वृष के शुक्र और मिथुन के बुध अधिपति होने के कारण आसुर शक्ति की पराजय और देवशक्ति का अभ्युदय सूचक मृगशिरा में ही युद्धारम्भ माना जाय तो नक्षत्र के अनुगुण चतुर्दशी या पूर्णिमा तिथि भी मान्य होगी । साथ ही यह प्रश्न उपस्थित होगा कि राशिगत पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध भेद तो पुनर्वसु आदि नक्षत्रों का भी हो सकता है, फिर मृगशिरा का ही क्यों माना जाय ? द्वितीय आपत्ति यह है कि स्वयं भारत सावित्री को भी यमदैवत नक्षत्र—'मृगशिरा' अमान्य है ? 'फाल्गुन्यां निहतो भीष्मः कृष्णपक्षे च सप्तमी ।' इस भारत वचन से तो यही सिद्ध होता है कि फाल्गुनी नक्षत्र में भीष्म पतन हुआ । पूर्वाफाल्गुनी भरणी के बाद ठीक नवें स्थान पर है । अतः ऐसा तभी संभव है जब भरणी में युद्धारम्भ हो । मृगशिरा में युद्धारम्भ मानने पर चित्रा में भीष्म पतन होना चाहिये । अतः दस दिनों के भीतर ही तीन-तीन नक्षत्रों की हानि सर्वथा असंभव है । अस्तु ! युद्धारम्भ के सम्बन्ध में ही नहीं; अभिमन्युवध, जयद्रथवध, भगदत्तवध, वृषसेनवध सम्बन्धी भारत सावित्री का दिन भी मूल के विरुद्ध है । महाभारत के अनुसार अभिमन्युवध तेरहवें दिन के युद्ध में होना चाहिये न कि ग्यारहवें दिन, इसी तरह जयद्रथवध चौदहवें दिन होना चाहिये न कि बारहवें दिन, इसी प्रकार भगदत्तवध बारहवें दिन होना चाहिये न कि तेरहवें दिन, वृषसेनवध सत्रहवें दिन होना चाहिये न कि सोलहवें दिन । श्रीनीलकण्ठाचार्य श्री महाभारत के प्रसिद्ध टीकाकार श्रीनीलकण्ठाचार्य के-मत में महाभारत युद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी मृगशिरा में आरम्भ होता है और पौष शुक्ल प्रतिपदा श्रवण में अन्त होता है । तिथि, नक्षत्र, मास गणना की दृष्टि से यह पक्ष सर्वोत्तम है । यथा स भगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । तथैव सहिताः सर्वे समाजग्मुर्महीक्षितः ॥
( ७० ) मघा विषयगः सोमस्तद्दिनं प्रत्यपद्यत । दीप्यमानाश्च सम्पेतुर्दिवि सप्तमहाग्रहाः ॥ ( भीष्म० १७।१-२ ) यद्यपि प्रथम श्लोक युद्धारम्भ सम्बन्धी है और उससे संलग्न होने के कारण द्वितीय श्लोक का अर्थ मघा नक्षत्र में युद्धारम्भ व्यक्त होता है । परन्तु श्रवण से पूर्व तेरहवें स्थान पर मघा होने के कारण मघा से युद्धारम्भ सभी मतों में अमान्य है । यही कारण है कि श्रीनीलकण्ठाचार्य ने मघा का अभिप्राय मृगशिरा ग्रहण किया है । अथवा 'मघा विषयगः सोमः' का कूटार्थ इस प्रकार ग्राह्य है— मघा के पाँचवें स्थान पूर्व मृगशिरा है, उसके देवता सोम हैं । अतः सोम देवता सम्बन्धी नक्षत्र में युद्धारम्भ हुआ । विषय अर्थात् पाँच और विषयगः अर्थात् पाँचवाँ स्थान । अथवा प्रथम श्लोक से इसका सम्बन्ध न माना जाय, क्योंकि आगे के श्लोक विक्रम ढंग से पृथक्-पृथक् घटनाओं के प्रतिपादक हैं । अतः स्वतन्त्र रीति से ऐसा मानना उचित है कि पुष्य में कुरुक्षेत्र के लिए चली सेना के मघा में कुरुक्षेत्र पहुँचने का संकेत ग्रंथकार ने प्रस्तुत श्लोक में प्रदान किया है । इस दृष्टि से 'दिवि सप्तमहाग्रहाः' का तात्पर्य यह है कि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष ही त्रयोदश दिनो का पक्ष था और उसी में सप्त महाग्रहो का योग भी था । श्रीबलराम जी के बयालीस दिनों की पूर्ति मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में युद्धारम्भ से पूर्व एक तिथि की वृद्धि मानकर सम्भव है । युद्धारम्भ में श्रीनीलकण्ठाचार्य को प्रमाण माननेवाले महाराष्ट्र के भारताचार्य चिन्तामणिराव वैद्य आदि भी हैं । ज्योतिर्विद पंडित देवकीनन्दन खंडेवाल लिखित 'महाभारत युद्धकालनिर्णय' ( पृष्ठ ८ ) तथा 'भारतीय काल गणना' ( पृष्ठ १२६ ) में युद्धारम्भ नक्षत्र भरणी माना है । भारत सावित्री ने भी भरणी में ही युद्धारम्भ माना है । श्री अभ्यंकर के अनुसार युद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी रोहिणी में प्रारंभ हुआ । भीष्म पतन कृष्ण ६ हस्त में हुआ, अभिमन्युवध कृष्ण ९ विशाखा में
( ७१ ) हुआ, जयद्रथवध तथा रात्रियुद्ध कृष्ण १० अनुराधा में, द्रोणवध कृष्ण ११ ज्येष्ठा में, कर्णवध कृष्ण १३ पूर्वाषाढ़ा में, शल्यवध कृष्ण १४ उत्तराषाढ़ा में तथा उसी दिन सायंकाल भीम-दुर्योधन गदायुद्ध हुआ । 'भारतीय युद्धकाल निर्णय' (मराठी) के लेखक प्रो० र० वि० वैद्य (१९६४) पुनर्वसु-पुष्य में युद्धारम्भ मानते हैं। इनके अनुसार युद्ध केवल सोलह दिनों का था। इनका यह भी कहना है कि भीष्म निधन शुक्लपक्ष में कदापि नहीं हो सकता । परन्तु युद्धारम्भ और युद्धान्त में श्रीनीलकण्ठाचार्य का 'स्वमत' ही प्रामाणिक सिद्ध होता है। निष्कर्ष जो महानुभाव भगवान् श्रीकृष्ण के 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भवि- ष्यति । संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र देवताम् ।' ( उद्योग० १४२।१८ ) केवल इस वचन को प्रमाण मानकर मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा में युद्धारम्भ मानकर अठारहवें दिन महाभारत युद्ध की समाप्ति मानते हैं, उनके मत में एक तो 'पुष्येण सम्प्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः' ( शल्य० ३४।६ ) इस बलदेव- वाक्य के अनुसार सैन्य निर्याण से युद्ध समाप्ति तक बयालीस दिनों की पूर्ति नहीं हो पाती, साथ ही श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त नहीं हो पाता और आठवें, नौवें दिन सन्ध्याकाल में अन्धकार सम्बन्धी संकेत एवं चौदहवें दिन रात्रियुद्ध के पश्चात् तीन-चार मुहूर्त्त रात्रि शेष रहने पर चन्द्रोदय का स्पष्ट उल्लेख भी सर्वथा अपूर्ण ही रहता है— ततो मुहूर्ताद् भुवनं ज्योतिर्भूतमिवाभवत् । अप्रख्यमप्रकाशं च जगामाशु तमस्तथा ॥ ( द्रोणपर्व १५४।५२ ) त्रिभागमात्र शेषायां रात्र्यां युद्धमवर्तत । कुरूणां पाण्डवानां च संहृष्टानां विशांपते ॥ ( द्रोणपर्व १८६।१ )
३. तृतीय खण्ड: युगाब्द, मन्वन्तर, प्रलय एवं काल मीमांसा उपसंहार
( ७२ ) जो महानुभाव भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम दोनों के वचन अक्षरशः सत्य सिद्ध करने के उद्देश्य से मार्गशीर्ष अमावस्या से एक-एक दिन अवकाश युक्त किन्तु चौदहवें और पन्द्रहवें दिन का युद्ध लगातार मानते हुए श्रवण में युद्धान्त मानते हैं, वे महाभारत के अत्यन्त प्रामाणिक वचनों के सर्वथा विरुद्ध अवकाश की कल्पना कर वस्तुस्थिति से सुदूर चले जाते हैं । इन सब दृष्टियों से श्रीनीलकण्ठाचार्य का मत नक्षत्र गणना, नक्षत्र के अनुगुण तिथि गणना और युद्धारम्भ एवं युद्धान्त की दृष्टि से सर्वथा निर्दोष परिलक्षित होता है । अवश्य ही आचार्य ने युद्धारम्भ और युद्धान्त को भारत- सावित्री के अनुसार और श्रवण में युद्धान्त को महाभारत के अनुसार सिद्ध करने में समन्वय की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, वह पूर्णरूपेण ग्राह्य नहीं कही जा सकती । गीता जयन्ती जो कि आजकल मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के रूप में प्रसिद्ध है, इसकी प्रामाणिकता भी श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त को देखते हुए खण्डित हो जाती है । भारत सावित्री के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी यद्यपि युद्धारम्भ की तिथि सिद्ध होती है, तथापि श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त की दृष्टि से इसकी भी पूर्ण प्रामाणिकता नहीं सिद्ध होती । केवल भीष्माचार्य के नेतृत्व में अवकाश और अन्यत्र अनवकाश मानकर नक्षत्रादि गणना के सर्वथा अनुरूप मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी से युद्धारम्भ वाला इस ग्रन्थ में निर्दिष्ट पक्ष भी अवकाश-अनवकाश के साङ्कर्य की दृष्टि से सन्दिग्ध कहा जा सकता है । परन्तु यह सर्वथा निर्विवाद है कि महाभारत युद्ध ऐतिहासिक है, काल्प- निक नहीं । साथ ही महाभारत के अनुसार सर्वमान्य युद्धकाल प्राप्त होना भी कठिन है । हाँ इतना ही कहा जा सकता है कि कृष्णादि मासानुसार मार्गशीर्ष में युद्धारम्भ हुआ । यह भी कहा जा सकता है कि द्रोण, कर्ण और शल्य के नेतृत्व काल में अवकाशरहित ही युद्ध हुआ । 'श्वो योत्स्यामः परैः सह' ( भीष्म० ६४।७० ) इस भीष्मवचन के अनुसार यह भी मान्य हो सकता है
कि भीष्म के नेतृत्वकाल में भी लगातार ही युद्ध हुआ । अतः 'सप्तमाच्चापि दिवसात्' ( उद्योग० १४२।१८ ) इस श्रीकृष्णवचन को इस अर्थ में ग्रहण करना आवश्यक है कि युद्धारम्भ सम्बन्धी आवश्यक कृत्यों में उक्त समय का उपयोग हुआ । ऐसा मान लेने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी में युद्धारम्भ हुआ । अतः मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से चतुर्दशी या पूर्णिमा तक गीता जयन्ती के उपलक्ष में महोत्सव मनाये जायें । समय और धनादि के अभाव में एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी किसी एक तिथि में अथवा केवल एकादशी में ही गीता जयन्ती मनाना भी उत्तम है । यद्यपि प्रामाणिक तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी ही सिद्ध होती है । भीष्म निर्वाण सौप्तिक संहार के पश्चात् उषःकाल में दुर्योधन के देह त्याग के अनन्तर संजय हस्तिनापुर गये । पुनः धृतराष्ट्र की प्रेरणा से धर्मराज युधिष्ठिर ने मृतकों के सामूहिक दाह आदि की व्यवस्था की । उन्होंने जलाञ्जलि के पश्चात् मासमात्र गंगा तट पर निवास किया— कृतोदकास्ते सुहृदां सर्वेषां पाण्डुनन्दनाः । विदुरो धृतराष्ट्रश्च सर्वाश्च भारतस्त्रियः ॥ तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन् पाण्डुनन्दनाः । शौचं निर्वर्तयिष्यन्तो मासमात्रं बहिःपुरात् ॥ ( शान्तिपर्व १।१–२ ) पुनः सभी हस्तिनापुर आये । धर्मराज युधिष्ठिर का भगवान् श्रीकृष्ण के नेतृत्व में राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ । यथायोग्य महलों में पाण्डवों ने निवास किया । पुनः भगवान् श्रीहरि की प्रेरणा से भीष्माचार्य के श्रीमुख से उपदेश श्रवण की अभिलाषा से धर्मराज निज परिकर सहित पितामह की सेवा में कुरुक्षेत्र उपस्थित हुए । श्रीभगवान् ने दिव्यशक्ति और दिव्यदृष्टि से देवव्रत
( ७४ ) भीष्मजी को सम्पन्न किया । साथ ही जीवन के शेष दिनों का रहस्योद्घाटन करते हुए श्रीहरि ने पितामह से कहा— पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर शेषं दिनानां तव जीवितस्य । ततः शुभैः कर्मफलोदयैस्त्वं समेष्यसे भीष्म विमुच्य देहम् ॥ ( शान्तिपर्व ५१।१४ ) तत्पश्चात् उसी दिन चन्द्रोदय के दिव्य प्रकाश में सेना सहित पाण्डव हस्तिनापुर के लिये प्रस्थित हुए— ततः पुरस्ताद् भगवान् निशाकरः समुत्थितस्तामभि हर्षयंश्चमम् । दिवाकरा पीतरसा महौषधीः पुनः स्वकेनैव गुणेन योजयन् ॥ ( शान्तिपर्व ५२।३३ ) फिर रात्रि बिता कर उपदेश श्रवण के योग्य परिकर सहित धर्मराज भगवान् श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में भीष्माचार्य के समीप समुपस्थित हुए । कई दिनों तक उपदेश हुआ । पुनः भीष्माचार्य ने युधिष्ठिर से कहा— आगन्तव्यं च भवता समये मम पार्थिव । विनिवृत्ते दिनकरे प्रवृत्ते चोत्तरायणे ॥ ( अनुशा० १६६।१४ ) तत्पश्चात् पाण्डव हस्तिनापुर आकर रहने लगे । यथा समय धर्मराज को भीष्मजी के देह त्याग का स्मरण हो आया । वे सम्बन्धियों सहित पितामह की सेवा में समुपस्थित हुए— उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे । समयं कौरवाग्रस्य सस्मार पुरुषर्षभः ॥
( ७५ ) स निर्ययौ गजपुराद् याजकैः परिवारितः । दृष्ट्वा निवृत्तमादित्यं प्रवृत्तं चोत्तरायणम् ॥ ( अनुशा० १६७।५-६ ) निज सेवा में समुपस्थित धर्मराज से पितामह ने कहा— अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः । शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा ॥ माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥ ( अनुशा० १६७।२७-२८ ) ‘इन तीखे अग्रभाग वाले बाणों की शय्या पर शयन करते हुए आज मुझे अट्ठावन दिन हो गये, किन्तु ये दिन मेरे लिये सौ वर्षों के समान बीते हैं ।’ ‘युधिष्ठिर ! इस समय सौम्य माघ का महीना प्राप्त है । त्रिभाग शेष है, यह शुक्ल पक्ष है ।’ अब विचार करना है कि ‘मास मात्र’, ‘पञ्चाशत षट्’, ‘पञ्चाशत्’ और ‘अष्ट पञ्चाशतं’ ये सब “माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिरः । त्रिभाग- शेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥” इस भीष्मवचन के अनुसार माघ शुक्ल की सीमा में होने पर ही सार्थक हैं । अतः माघ से आगे इनकी गति अमान्य है । इधर ‘पञ्चाशतं’ का प्रसिद्ध अर्थ पचास, ‘पञ्चाशतं षट्’ का छप्पन और ‘अष्टपञ्चाशतं’ का अट्ठावन होता है । ऐसी स्थिति में शरशय्या के तीसरे दिन ही जब श्रीहरि पितामह से उनके छप्पन दिन शेष की बात कर रहे हों तभी वाच्यार्थ में श्रीकृष्ण वचन प्रमाण हो सकता है । परन्तु मूल के अनुशीलन से ही यह सिद्ध होता है कि युद्धान्त तक भीष्मजी के शरशय्या पर कम-से-कम ( बिना अवकाश के ) नौ दिन हुए । पुनः पाण्डवों ने मासमात्र नगर के बाहर नदी तट पर निवास किया । तत्पश्चात् हस्तिनापुर में श्राद्ध एवं राज्या- भिषेकादि में व्यतीत हुआ । कुछ दिन यथायोग्य महलों में निवास किया । अतः कम-से-कम तीन-चार दिन हस्तिनापुर में व्यतीत हुए । इस तरह
( ७६ ) ९ + ३० + ४ = ४३ दिन भीष्माचार्य के पास पहुँचने में लगे । अतः उसके बाद भीष्मजी के छप्पन दिन शेष मानें तो ४३ + ५६ = ९९ दिन होते हैं । इधर माघ की अवधि, उधर पौष में अधिमास असंभव । उत्तरायण की प्रतीक्षा देखते हुए माघ में अधिमास की कल्पना भी निरर्थक । इन सब दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है कि 'मासमात्रं', 'पञ्चाशतं षट्', 'पञ्चाशत्' और 'अष्टपञ्चाशतं' सबको माघोऽयं समनुप्राप्तः मासः सौम्यः' के अनुगुण घटाया जाय ? अथवा 'अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः' का अट्ठावन दिन अर्थ ग्रहण कर उसी के अनुरूप 'मासमात्रं', 'पञ्चाशतं षट्', 'पञ्चाशतं' और 'त्रिभागशेषः' को लगाया जाय । किसी भी दृष्टि से माघ का अतिक्रमण सर्वथा अनुपयुक्त है । अतः माघ की सीमा में रहते हुए भी उक्त पक्षों पर विचार अपेक्षित है । परन्तु किसी भी पक्ष को स्वीकार करने से पूर्व भीष्म पतन की प्रामाणिक तिथि प्राप्त होना परमावश्यक है । श्रीकवीश्वर, जो कि चित्रा को ऐन्द्र नक्षत्र मानकर मार्गशीर्ष अमावास्या से युद्धारम्भ मानते हैं, उनके मत में पौष कृष्ण तृतीया भीष्म पतन की तिथि है । प्रचलित गीता जयन्ती के अनुसार पौषकृष्ण ❀ षष्ठी में भीष्मपतन सिद्ध होता है । भारत सावित्री के अनुसार पौषकृष्ण सप्तमी में भीष्मपतन सिद्ध होता है । श्रीनीलकण्ठाचार्य के अनुसार गीता जयन्ती मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी को भीष्मपतन सिद्ध होता है । मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को युद्धारम्भ मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी में भीष्म- पतन सिद्ध होता है । मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा से भीष्माचार्य के नेतृत्वकाल में अवकाश युक्त युद्ध मानने पर पौषकृष्ण तृतीया को शरशय्या का प्रथम दिन सिद्ध होता है । इस तरह-- ♣ त्रयोदश ( तेरह ) दिन का पक्ष
( ७७ ) मार्गशीर्ष अमावस्या को युद्धारम्भ मानने पर पौषकृष्ण तृतीया, मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी में युद्धारम्भ मानने पर पौष कृष्ण अष्टमी, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को युद्धारम्भ मानने पर पौष कृष्ण षष्ठी, मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी को युद्ध मानने पर पौषकृष्ण सप्तमी और मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को गीता जयन्ती मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी को भीष्मपतन सिद्ध होता है । परन्तु द्रोणाचार्य के नेतृत्व में अवकाश असम्भव होने के कारण पौषकृष्ण तृतीया को भीष्मपतन मानने पर चौदहवें दिन का रात्रि युद्ध पौषकृष्ण सप्तमी को सिद्ध होता है । ऐसा मानने पर उत्तर रात्रि में तीन-चार मुहूर्त रात्रि शेष रहते चन्द्रोदय वाला निर्देश खण्डित होता है । साथ ही पौषकृष्ण एकादशी को युद्धान्त सिद्ध होने पर श्रवण नक्षत्र सम्बन्धी वचन भी निष्फल जाता है । अतः पौष कृष्ण तृतीया को भीष्म पतन मानने वाला पक्ष सर्वथा अमान्य है । एकादशी को युद्धारम्भ असम्भव होने के कारण पौष कृष्ण षष्ठी को भीष्म- पतन वाला पक्ष भी अमान्य सिद्ध होता है । एतावता पौषकृष्ण सप्तमी या अष्टमी भीष्मपतन की प्रामाणिक तिथियाँ हो सकती हैं, यही जयद्रथ वध के बाद उत्तररात्रि में चन्द्रोदय के उपयुक्त तिथियाँ भी हैं । अतः अब इन्हीं दृष्टियों से भीष्म निर्वाण सम्बन्धी विचार कर्तव्य है ।* पौष कृष्ण अष्टमी को भीष्मपतन मानने पर पौष कृष्ण द्वादशी को रात्रि युद्ध सिद्ध होता है । इस दृष्टि से त्रिभागशेष रात्रि में युद्धारम्भ का अभि- प्राय चन्द्रोदय सहित युद्धारम्भ ग्रहण करना चाहिए । प्रथम पक्ष—यद्यपि पौष कृष्ण तृतीया से माघी ( माघपूर्णिमा ) तक भीष्म जी के अट्ठावन दिन पूरे हो जाते हैं । अतः अब विचारणीय पक्ष यह उपस्थित होता है कि माघ की अन्तिम तिथि पूर्णिमा है, इससे आगे भीष्म निर्वाण असंभव है । इधर पौष कृष्ण अष्टमी से पूर्णिमा तक कुल तिरपन दिन होते हैं । ‘अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः’ का प्रसिद्ध अर्थ अट्ठावन है, अतः किस रीति से तिरपन ही अट्ठावन का रूप धारण कर सकता है । * ‘फाल्गुन्यां निहतो भीष्मः कृष्णपक्षे च सप्तमी’ यह भारत सावित्री का मत भी युद्धान्त के अनुरूप नक्षत्र न होने के कारण अमान्य है ।
( ७८ ) यह निर्विवाद सत्य है कि भीष्म निर्वाण सम्बन्धी चारों वचन कूटार्थक हैं। ये कालकूट (काल सम्बन्धी कूट) कालकूट के समान भयंकर हैं। अतः कूटभेदी प्रक्रिया से ही इनका समाधान संभव है। अन्यथा संबन्धित समस्त वचनों का सामञ्जस्य असंभव है। 'तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन् पाण्डुनन्दनाः । शौचं निर्वर्तयिष्यन्तो मास मात्रं बहिः पुरात् ॥' का अन्तरङ्ग तात्पर्य--'युद्धारम्भ से अशौच निवृत्ति और शौच सम्पादन तक कुल तीस दिन व्यतीत हुए' ऐसा व्यक्त करने में है। 'द्वादशाहेन भूमिपः' (मनुस्मृति ५।८३) इस स्मृति वचन के अनुसार क्षत्रियों को शुद्धि प्राप्त करने के लिए बारह दिनों की ही अपेक्षा होती है। अतः महा- भारतकार ने अतिरिक्त ३० - १२ = १८ दिनों का उल्लेख इस महत्त्वपूर्ण अभिप्राय से किया है कि महायुद्ध केवल अठारह दिनों तक हुआ। अभिप्राय यह कि क्षात्रधर्म की रीति से देहत्याग करने वाले वीरों की मृत्यु से प्राप्त अशौच की दैनिक शुद्धि युद्ध काल में ही हो जाती थी— उद्यतैराहवे शस्त्रैः क्षत्रधर्म हतस्य च । सद्यः संतिष्ठते यज्ञस्तथाऽऽशौचमिति स्थितिः ॥ ( मनुस्मृति ५।९८ ) फिर भी सौप्तिक संहार के और पूर्व मृतकों के दाह संस्कार से प्राप्त अशौच की निवृत्ति बारह दिनों में हुई। अतः युद्धान्त के पश्चात् पाण्डव बारह दिनों तक नदी तट पर ही बने रहे। इस तरह पौष शुक्ल द्वितीया से पौष शुक्ल त्रयोदशी तक शौच सम्पादन में व्यतीत हुआ। पौष शुक्ल चतुर्दशी को पाण्डव हस्तिनापुर में प्रविष्ट हुए। पौष पूर्णिमा 'पुष्य' नक्षत्र में श्रीधर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ। माघ कृष्ण प्रतिपदा को अन्यकृत्य तथा यथा योग्य महलों में निवास कर द्वितीया को भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेरणा से पाण्डव भीष्माचार्य की सेवा में कुरुक्षेत्र आये। भगवान् श्रीकृष्ण से प्राप्त दिव्यदृष्टि और दिव्यशक्ति सम्पन्न भीष्माचार्य द्वारा उपदेश की स्वीकृति प्राप्त पाण्डव परिकर सहित हस्तिनापुर लौट आये।
( ७९ ) इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने जो पितामह से ‘पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर, शेषं दिनानां तव जीवितस्य ।’ कहा, उसका रहस्यार्थ इस प्रकार समझना चाहिये-- “सूर्योदय से सूर्यास्त और सूर्यास्त से सूर्योदय तक एक-एक दिन मान कर अट्ठाईस दिन ही छप्पन दिन हो जाते हैं । अतः हे भीष्म ? आपके कुल अट्ठाईस दिन शेष हैं । आज माघ कृष्ण द्वितीया है । आप माघी में देहत्याग कर दिव्य धाम प्राप्त करेंगे ।’ पुनः माघ कृष्ण तृतीया से माघ कृष्ण पञ्चमी तक श्रीभीष्ममुख विनिःसृत दिव्योपदेश श्रवण कर शोकमुक्त पाण्डव रात्रि में हस्तिनापुर आ गये । ‘उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे’ का भाव इस प्रकार हृदयंगम करना चाहिये-- पूर्वरीति से पचीस रातें ही पचास के तुल्य हो जाती हैं । अतः माघ कृष्ण पञ्चमी से माघ शुक्ल चतुर्दशी तक पाण्डव हस्तिनापुर में रहे । पुनः माघी पूर्णिमा को भीष्माचार्य के निर्वाण का समय समुपस्थित जान कर उनकी सेवा में समुपस्थित हुए । तब धर्मराज युधिष्ठिर से महात्मा भीष्म ने कहा-- ‘अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः’ इसका अभिप्राय इस रीति से हृदयंगम करना चाहिये-- जिस दिन आप उपदेश के लिए प्रार्थना करने आये थे और भगवान् श्रीकृष्ण ने आयु के छप्पन दिन शेष बताये थे, उस दिन को लगाकर आज मेरे अट्ठावन दिन पूर्ण हो रहे हैं । अभिप्राय यह कि माघकृष्ण द्वितीया से माघी पूर्णिमा तक उन्तीस दिन होते हैं, कूटार्थक शब्दों में यही अट्ठावन कहे गये हैं । एतावता उक्त प्रक्रिया से पौषकृष्ण अष्टमी से माघी तक भीष्माचार्य के तिरपन दिन होते हैं । अतः माघ पूर्णिमा दिन के मध्याह्न में भीष्मजी का देहत्याग सिद्ध होता है । ‘त्रिभागशेषः’ का अभिप्राय दिन का त्रिभाग शेष है । मध्याह्नोत्तर दिन त्रिभाग शेष होता ही है ।
( ८० ) द्वितीय पक्ष यह सत्य है कि भीष्म निर्वाण से सम्बन्धित 'मास मात्रं' 'पञ्चाशतं षट्' 'पञ्चाशत्' और 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः' इन चारों का निर्विरोध सामञ्जस्य बिठाने के लिए चारों का ही गौणार्थ स्वीकार करना होगा । नहीं तो पौषकृष्ण तृतीया को भीष्मपतन मानकर माघी तक भीष्म जी के अट्ठावन दिन भी पूर्ण होंगे और तीस दिन उसी के अन्तर्गत गंगा तट पर पाण्डवों के यद्यपि पूर्ण हो जायेंगे, परन्तु इस तरह दो वचनों को यथार्थ स्वीकार करने पर 'पञ्चाशतं षट् च' और 'पञ्चाशत्' ये दो वचन पूर्ण रूप से उपेक्षित रह जायेंगे । परन्तु ऐसा अभीष्ट नहीं, अतः चारों का गौणार्थ यद्यपि पूर्व रीति से सुन्दर ढंग से घटित होता है, फिर भी इस सम्बन्ध में यह विचार करना आवश्यक है कि श्रीगीता जयन्ती की प्रसिद्ध तिथि यद्यपि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी है, परन्तु उसकी प्रसिद्धि अर्वाचीन सिद्ध होती है, जब कि माघ शुक्लाष्टमी भीष्माष्टमी के रूप में उसकी अपेक्षा प्राचीन काल से प्रसिद्ध है । 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभागशेषः' का अन्वय करते समम श्रीनीलकण्ठाचार्य ने भी इसे स्वीकार किया है । अतः इसके अनुगुण ही शेष वचनों के समन्वय का सामञ्जस्य बिठाना आवश्यक है, इसी दृष्टि से यह द्वितीय गणना है— माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥ ( अनुशा० १६७।२८ ) इस श्लोक में यद्यपि 'पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति' के साथ 'त्रिभागशेषः' पठित है । इस दृष्टि से माघ शुक्ल दशमी की सिद्धि होती है । क्योंकि दशमी के बाद पक्ष का त्रिभाग ( पाँच दिन ) शेष रहता है । परन्तु माघ शुक्ला दशमी भीष्म जी के देहत्याग की तिथि रूप में प्रसिद्ध नहीं है । साथ ही ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया का अनुशीलन करना चाहिए जिसके द्वारा तिथि एवं दिन दोनों का ग्रहण हो । तिथि का ग्रहण हो जाने से शुक्ल पक्ष के साथ 'त्रिभागशेषः' के अन्वय की आवश्यकता नहीं रह जाती । साथ ही दिन का समय निश्चित हो जाने पर दिवस के साथ 'त्रिभागशेषः' के अन्वय की आवश्यकता नहीं रह
( ८१ ) जाती । 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभागशेषः' का अन्वय करने से एक महीना का साढ़े सात-सात दिन का चार भाग होता है । साढ़े सप्तमी अर्थात् अष्टमी के बाद महीने का त्रिभाग शेष रहता है । 'पक्षोऽयं शुक्लः' का अभिप्राय शुक्लादि माघ महीना स्वीकार करना आवश्यक है । क्योंकि तभी माघ शुक्लाष्टमी के बाद महीने का त्रिभाग शेष सम्भव है । साथ ही साढ़े सप्तमी का अभिप्राय अष्टमी को दिन का त्रिभाग शेष सिद्ध होता है । अतः 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभागशेषः' ग्रहण करने से तिथि एवं दिन दोनों का ग्रहण हो जाता है । साथ ही 'सौम्यः' इस चान्द्रमास की सार्थकता भी हो जाती है । सौम्य का अभिप्राय सुखद अथवा सौम्यायन ( उत्तरायण ) भी है । इस तरह 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभाग शेषः' का अन्वय करने, पर पक्ष और दिवस का मध्यभाग सिद्ध होता है । परन्तु 'पक्षोऽयं' के साथ अन्वय करने पर दिवस का मध्यभाग सिद्ध नहीं होता । 'माघोऽयं' एवं 'पक्षोऽयं' के मध्य 'त्रिभाग शेषः' पठित होने पर भी दिवस का अध्याहार कर उसके साथ 'त्रिभाग शेषः' का अन्वय करने में क्लिष्ट कल्पना करनी पड़ती है, साथ ही दिवस का मध्य भाग सिद्ध होने पर भी पक्ष की तिथि सिद्ध नहीं होती । अस्तु ! माघशुक्लाष्टमी भीष्म निर्वाण की तिथि सिद्ध होती है । अब शेष वचनों की इसी के अनुकूल संगति लगाना आवश्यक है । अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए पद शेष एवं वाक्य शेष का अध्याहार कर सन्दर्भ पूर्ति की प्रथा पूर्वाचार्यों द्वारा अनुमोदित एवं आविष्कृत है । प्रसङ्गानुसार उसी का अनुसरण यहाँ भी अपेक्षित है । 'मासमात्रं' का पूर्व रीति से युद्ध काल के अतिरिक्त बारह दिन अर्थ करना उपयुक्त है । अब क्योंकि पौषकृष्ण अष्टमी से माघशुक्ल अष्टमी तक छियालीस दिन होते हैं; इसलिए 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः' का कूटार्थ 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः, द्वादश न्यूनाः इति शेषः' ग्रहण करना चाहिए । अर्थात् अट्ठावन घटे बारह बराबर छियालीस ( ५८—१२=४६ ) । ६
( ८२ ) इस तरह पौष कृष्ण अष्टमी से पौष शुक्ल प्रतिपदा तक युद्ध काल में पिता- मह के नौ दिन शरशय्या पर हुए । पौष शुक्ला द्वितीया से पौषशुक्ला त्रयोदशी तक बारह दिन शुद्धि काल में शरशय्या पर हुए । पुनः पौष शुक्ला चतुर्दशी से माघ कृष्ण तृतीया तक धर्मराज के राज्याभिषेक काल में भीष्माचार्य के पाँच दिन शरशय्या पर हुए । अब ९ + १२ + ५ = २६ दिन कुल हुए । अतः ४६ — २६ = २० दिन जीवन के शेष रहे । तृतीया से पूर्व राज्याभिषेकादि अत्यावश्यक कृत्यों में लग जाना स्वाभाविक था और भीष्माचार्य से मिलकर पुनः रात्रि विश्राम के उद्देश्य से हस्तिनापुर लौटते समय स्फुट चन्द्रोदय का उल्लेख देखते हुए माघ कृष्ण चतुर्थी के आगे बढ़ना, अधिक रात्रि की क्लिष्ट कल्पना में हेतु होने के कारण अनुपयुक्त है । अस्तु ! माघ कृष्ण चतुर्थी को भगवान् श्रीकृष्ण ने भीष्माचार्य से कहा— पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर शेषं दिनानां तव जीवितस्य । अतः 'षड्विंशत् न्यूनाः षट् पञ्चाशतं' ऐसा भाव ग्रहण करने पर ५६ - ३६ = २० दिन शेष रहे । अब मुख्य प्रश्न उठता है कि बीस दिनों में आदि ( उपदेश आरम्भ के एक दिन पूर्व ) और अन्त ( भीष्म के देह त्याग का दिन ) छोड़कर अठारह दिन रहे । इनमें कितने दिन उपदेश श्रवण में और कितने ही हस्तिनापुर में लगना चाहिए ? वाच्यार्थ में 'पञ्चाशतं षट्' अर्थात् छप्पन दिन शेष रहते हैं और 'पञ्चाशत्' पचास दिन हस्तिनापुर में व्यतीत होते हैं । अतः छप्पन से आदि-अन्त के दो दिन घटा देने पर चौवन दिन शेष रहते हैं । चौवन दिनों में माघकृष्ण पञ्चमी सहित पाँच दिन उपदेश में और नवमी को रात्रि विश्राम हस्तिनापुर में मान लेने पर माघकृष्ण नवमी से माघ शुक्ल सप्तमी तक चौदह रात्रियाँ हस्तिनापुर में व्यतीत होती हैं । माघ शुक्लाष्टमी को भीष्म का निर्वाण सिद्ध होता है ।
( ८३ ) अतः 'पञ्चाशत् नगरोत्तमे' के साथ 'षट् त्रिंशत् न्यूना, इति शेषः' का अध्याहार करने पर ५०-३६=१४ रात्रियां हस्तिनापुर में व्यतीत होती हैं। शुक्लादि एवं कृष्णादि मास में शुक्ल पक्ष में कोई अन्तर न होने पर भी कृष्ण पक्ष में एक महीने का अन्तर हो जाता है। परन्तु इस दृष्टि से भी शुक्लादि मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से माघ शुक्लाष्टमी तक छयालीस दिन ही सिद्ध होते हैं। महाभारत के दाक्षिणात्य प्रतियों में माघशुक्लाष्टमी रोहिणी नक्षत्र और मध्याह्न का वर्णन है-- (शुक्लपक्षस्य चाष्टम्यां माघमासस्य पार्थिवं । प्राजापत्ये च नक्षत्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥ ) निवृत्तमात्रे त्वयन उत्तरे वै दिवाकरे। समावेश यदात्मानमात्मन्येव समाहितः ॥ ( शान्तिपर्व ४७।३ ) उक्त श्लोकों में प्रथम दाक्षिणात्य है। दोनों का सम्मिलित अर्थ इस प्रकार है-- 'राजन् ! जब दक्षिणायन पूर्ण हुआ और सूर्य उत्तरायण में आ गये, तब माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्याह्न काल में भीष्म जी ने ध्यान मग्न होकर ( देह त्याग के अभिप्राय से ) अपने मन को आत्मा में लगा दिया ।।' इस तरह माघ शुक्लाष्टमी को भीष्म निर्वाण और मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को गीता जयन्ती एवं युद्धारम्भ की सिद्धि होती है । भीष्म निर्वाण के सम्बन्ध में भांडारकर संस्था की टिप्पणी के अनुसार भीष्म निधन तिथि--माघ कृष्ण चतुर्थी है। 'त्रिभागशेषः पक्षोऽयं' की संगति इस प्रकार लगाते हैं--उस दिन कृष्ण पक्ष के केवल चार ही 'दिन अर्थात् करीब एक चौथाई हिस्सा ही बीता था तथा तीन चौथाई शेष था, अतः उस समय ( प्रकाश की दृष्टि से ) शुक्ल पक्ष का प्रारंभ माना जा सकता है। श्री के० व्ही० अभ्यंकर ने भीष्म निधन माघ कृष्ण पञ्चमी में माना है ।
( ८४ ) परन्तु महाभारत में शुक्ल पक्ष का स्पष्ट उल्लेख और भीष्माष्टमी की प्रसिद्ध तिथि के सर्वथा विरुद्ध उक्त विचार हैं । टिप्पणी-- सनत्कुमार संहिता के कार्तिक माहात्म्य में बीसवें अध्याय में शुक्ल पक्ष के संदर्भ में लिखा है--'एकादश्यां कार्तिकस्य याचितं च जलं त्वया', इस वचन के अनुसार शरशय्या पर आसीन भीष्मपितामह ने अर्जुन से कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन जल मांगा । महाभारत भीष्मपर्व में ११९ वें अध्याय में श्रीभीष्मपितामह के शरशय्या लाभ का वर्णन है । १२० वें अध्याय में अर्जुन द्वारा उन्हें बाणों की तकिया देने का उल्लेख है । पुनः रात्रि विश्राम के पश्चात् प्रातःकाल उन्हें धनुर्धर धनंजय ( अर्जुन ) द्वारा दिव्य जल प्रदान करने का उल्लेख १२१ वें अध्याय में हैं । व्युष्टायां तु महाराज शर्वर्यां सर्व पार्थिवाः । पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च उपतिष्ठन् पितामहम् ॥ ( भीष्मप० १२१।१ ) आदि उक्तियों में उक्त तथ्य का प्रकाश द्रष्टव्य है । अतः महाभारत के अनुसार कार्तिक शुक्ल दशमी को भीष्म पतन मान्य होगा । ऐसी स्थिति में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से युद्धारम्भ मान्य होगा । शुक्लादि मासानुसार कार्तिक कृष्ण तृतीया में युद्धान्त मान्य होगा । कृष्णादि मासानुसार मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया में युद्धान्त मान्य होगा । ऐसी स्थिति में 'कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे' इस महाभारत वचन का यह अर्थ लगाना पड़ेगा कि श्रीभगवान् ने आश्विन में उपप्लव्य से हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया । फिर 'अमावास्या भविष्यति, संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र देवताम् ।' इस श्रीकृष्ण वचन से संगति लगाने के लिए आश्विन की अमावास्या ज्येष्ठा नक्षत्र में मानना पड़ेगा, परन्तु यह भी उपयुक्त नहीं । साथ ही आश्विन की पूर्णिमा उससे एक पक्ष पूर्व लगभग रोहिणी में मानना होगा, परन्तु यह भी उपयुक्त नहीं । साथ ही कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा मूल नक्षत्र में युद्धारम्भ और कार्तिक कृष्ण तृतीया