कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
विष अण्ड पिंड समस्त है विष बारिमय भव सागरा ॥
बिलगाय विषते कौन ऐसो भवन तीनमें नागरा ।
करि कोटि यतन न ज्ञान रतन है मिटे किमि यह ज्ञागरा ॥
जहाँ कामक्रोध और लोभ मोहते सकल पूरण पावई ।
सब रोम रोममें विष भरा है अमृत नाहि समावई ॥
जग विषम आग है लागि तुम विनु ताहि कौन बुझावई ।
जीव कठिन काल कराल वशते बन्दी छोर छुड़ावई ॥
स्तुति करें और आरति सब हंस मिलि सत लोकमें ।
सतपुरुष आय बचाय खुद जीव जरत यमकी झोकमें ॥
न पाय कोइ उपाय साहब धाय धर जीव शोकमें ।
अरुझा सबहिं सरुझा न कोई जीव लोक वेद अथोकमें ॥
सतलोक हंस विलोक आनन्द बजत अनहद तूर है ।
प्रभु आरति अरु स्तुति करत सब सहज और अंकूर है ॥
इच्छा सोहं अचिन्त अक्षर शिखरे पद धूर है ।
एक रोम जासु प्रकाश ऐसो कोटि चन्दा सूर है ॥
यह तीन लोक सशोक देखिये आय आनन्द कन्द है ।
दशदिशि पसर यम जाल है सब जीव फन्द तेहि फन्द है ॥
गुरु वैद्य साँचा वेदवांचा हर लियो दुख दन्द है ।
भव भीर हरण कबीर दासन दास परमानन्द है ॥
कवित्त—पावन पतित जीव दीननके हितु प्रभु तू है गुरु पुरुष कहाओ
धूँ और है । कहत कबीर धर्म धरत न धीर करे अचल शरीर न लगत हीम
जोर है । पशु पंछी तारत है निगम पुकारत है आरतको देखिके निहार रिम
कोर हैं । पीरो पयम्बर हैं धीर जो दिगम्बर हैं वदे वदे बानीहू विरद बन्दी छोर
है ॥ तजत न बानी सुर मुनिन बखानी प्रभु शरणमें आनी जो करत निहोर है ।
तीन लोक ढूँढ़ जाये दूसरे कहूँ न पाये लगसो चरण दुख हरण जो शोर है ॥
नहीं शुभ करनी है बहु दुख भरनी है उस गुरु शरणी है कलि काल घोर है ।
अधम उधारनको जगत सुधारनको भक्ति मुक्ति धारण कबीर बन्दी छोर है ॥
बूड़े बड़ ज्ञानी सिद्ध साधक जो ध्यानी बिन नाम सहिदानी जिन्हें आशा न तोर है ।
बलबीज चूसत है सिद्ध साधू दूषत है निशि दिन मूसत है अन चीन्ह चोर है ॥
जीवको है ठौर नहीं सुरमुनि दौर नहीं परमानन्द पौर नहीं पाव न जो दौड़ है ।
बन्दी छोर बन्दी छोर बन्दी छोर एक भजू साहब कबीर टेक सोई बन्दी छोर है ॥
ग्रन्थकर्त्ताका अन्तिम निवेदन ।
पाठक गणोंसे निवेदन है कि, दासने यह पुस्तक स्वसम्बेदके अनुसार लिखी है, जिस किसीका मन चाहे कबीरपंथके विद्वानोंसे विचारकरके निश्चय करले। यदि कहीं प्रमाणादिकोंमें कुछ सन्देह अथवा भेद जान पड़े तो कृपा दृष्टिसे मुझे क्षमा करें क्योंकि, मनुष्य जीवनही भूलसे पूर्ण है।
पुस्तक समाप्तिकी तिथि ।
शुक्र बेहद परम गुरु गोविंद । की सरनजाम नुसखये दिल बन्द ॥
करमो फजल उसपै सतगुरुका । जो समझकर पढ़े सुने यह पन्द ॥
इससे शीरीं न कोई शर्बत और । आब हैवों न शूर्ब मिस्त्री कन्द ॥
पाव पहचान जो कोई मुशिदको । हो दफा सब जहाँका दुख दन्द ॥
कर अमल गर निगर न चश्म अपने । राज महरम न हो तो बर मन खन्द ॥
ईस्वी सन अठारह सौ अस्वन । उनीससौसैंतीस बिक्रमाँ सनः हिन्द ॥
मिहर सितम्बर व हिन्दवी अस्वन । खतम तारीख नुसखये चारम चन्द ॥
मैं उसीका हूँ खादमाँ खादिम । जिसके दरगह न पहुँचे कोई परन्द ॥
आजिज बा तख़लुस आजिज । नाम जिसका है दास परमानन्द ॥
है कबीर मन्सूरका, यह अविकल अनुवाद ।
विषम विषय निरधारिके, “माधव” रच्यो अवाद ॥
साहब ग्रन्थन सिन्धुमें, मो मन दुवकी लीन ।
सारशब्द हीरा अजब, तहँते लायो वीन ॥
बुद्धि अनौते भेदि तेहिं, ज्ञान सूत्रमें पोह ।
सन्त पारखिनके गरे, ग्रन्थमाल यह सोह ॥
यदि यह माला धारिके, सन्त भजहिगे राम ।
तो सब सिद्धी शान्ति सुख, पैहँ माधवनाम ॥
श्री कबीर पन्थी स्वामी परमानन्दजी साधु विरचित उर्दू कबीर मन्शूरका संशोधन तथा परिष्कार पूर्वक, सर्व तन्त्र स्वतंत्र भक्तों के चरण रज रिसर्च स्कॉलर पं० माधवाचार्य परिकृत हिन्दी अनुवाद समाप्त हुआ ।
पुस्तके मिलने के स्थान :-
१. इंदमराज श्रीकृष्णदास,
श्रीमं०
कुछ और प्रमाण
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई