सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्ञानस्थितिबोध

( ९७ )

तुमही माली तुम फुलवारी । तुम हो करता तुमरी बारी ॥
तुम सागर जलहरी तरंगा । तुम मलीन तुम निरमल अंगा ॥
तुम हो उडुगण पर्वत चंदा । मोये तुमये हर्ष अनन्दा ॥
तुम गुपाल तुमहो दिन राती । सुर नर मुनि गंधर्व तुम ज्ञाती ॥
तुमही अलख तुमहि संसारा । तुमही हरि हर विधि अवतारा ॥
तुमही लोप अलोप अलेखा । तुमही गुप्त प्रगट सब देखा ॥
तुमही पुरुष तुमही हो प्रकृति । तुमही योग तुमहि जुगति गति ॥
चारों युग तुम करत निवासा । तुम रमता देहीमें बासा ॥

साखी--तुमहो दूसर अवर नहीं, तुमरा सकल प्रकाश ।
करहु दया अब मोहिपर, सत्य नाम विश्वास ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम विनती कीन्हा । हमरो रूप न काहू चीन्हा ॥
अमरभेद अस्थलकै माहीं । जो पावै अस्थिर मन ताहीं ॥
लीलंगर द्रौप पुरुष अस्थूला । वही द्रौप उत्पतिको मूला ॥
गगन धरनी उत्पति सब नीरा । काया बीर सुनाम कबीरा ॥
याविधि पुरुष हमहि सोंकहिया। विन अंकुर जीव कहाँ रहिया ॥
नाम हमार सुमिरे जो कोई । आवा गमन रहित सो होई ॥
हमरा नाम लेत घर आवै । सुख सागर निर्मल हो जावै ॥
नाम लेत जो काल डराई । सुमिरत नाम हो दूर हो जाई ॥
हमरो नाम सार है भाई । जो चीन्हे तेहि काल न खाई ॥

साखी--नाम हमारा मुक्तामणि, पुरुष आपहि भाखी ।
शब्द शिरोमणि सार यह, हंस सदा चित राखि ॥

चौपाई

येहि नाम लोके पहुँचावै । सुमिरत नाम पुरुष कहैं पावै ॥
अब यह शब्द कहउ सम्भारा । सुनि हृदय महे करो विचारा ॥

नं. ८ कबीरसागर-४

( ९८ )

बोधसागर

जाते दुःख द्वंद मिटि जाई । धर्मराय बैठो पछिताई ॥
यहि नामको शिरहि चढाई । यामें सब सुख विलसे आई ॥
कपट रूप धरिहै जो कोई । भ्रमकी डगर परै पुनि सोई ॥
आदि शब्द सो नाम हमारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥
धन्य भाग्य हंसनके कहिए । जो या नाम मुक्ति मन गहिए ॥
सो करूणाकर बहुत उधारी । एक नाम चित लेय विचारी ॥

पाँच नाम

आदि अजर १ । अदली अदल २ । पुरुष निरक्षर नाम ३ ।
मुक्तामणि प्रभुनाम जो ४ । सुख सागर विश्राम ॥

साखी--ज्ञानस्थितके यह गुण नाम विवेकी पाइ ।

कहे कबीर धर्मदासको, हंस लोकको जाइ ॥

चौपाई

धर्मदास चरण चित धरही । बार बार विनवे अनुसरही ॥
पाँजी नाम मोहि कहो विचारी । जामें होय हंस निस्तारी ॥
बिन पाँजी कहा जाने भेदा । पाँजी नाम गुरु कहीन खेदा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास भल कीन्ह विचारा । हंसराज बड भाग तुम्हारा ॥
नाम सिंधु पायो तुम जब ही । पाँजी निर्भय पहुँचे तब ही ॥
बिन निर्भय कोई भेद न आवे । विना भेद कैसे पहिचाने ॥
कहे कबीर होइ गुरु दाय। तबही हंस अमर घर आया ॥
अब सुनिये पाँजी को द्वारा । ता चढ़ि हंस उतरि है पारा ॥
एक नाम एक चित हो देखा । तहाँ हंसा सुख सागर पेखा ॥
पाँजी अद्भुत कहीं सुमारा । ताते होय मुक्ति व्यवहारा ॥
सोहं शब्द उलली कर देखे । तिल प्रमाण जहाँ द्वारी पेखे ॥
उलटि पवन पश्चिमको घाले । गरजे गगन मेरु तहाँ हाले ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ९९ )

अरध ऊर्ध्वबिच कमल अपारा । दामिनि कोटि होत उजियारा॥
पाजी नाम पंच दिल राखो । हंसा उबारन कहि यह भाखो॥

आकाशपाँजी

आदि अजर अदलीनिर नामा । सप्तसिन्धु है जियको कामा ॥
सप्तसिन्धु पाजी ले नामा । सो यह परब्रह्मको धामा ॥
यही नाम जियको रख वारा । खोलो कुंजी कुलफ केवारा ॥
हंस ले गए पुरुष दर्बारा । झिलमिल ज्योति झलक उजियारा॥
नाभि मण्डल पवन किवारा । दुरे सुनीरी मूलके द्वारा ॥
भए निरन्तर थकित शरीरा । धर्मदास कह मिले कबीरा ॥
धर्मदास यह दिलकी पाँजी । यही नाम धरि बहुऐ साँजी ॥
पिंड नाम सो दिलमें मूला । येहि नाम पहुँचे अस्थूला ॥

सार्वी-ज्ञानस्थितके यह गुन, पुरुष पाजी निज सार ।

यह पाँजी जब पावही, हंस होइ निस्तार ॥

चौपाई

हो सद्गुरुमें तुम बलिहारी । मिटि गइ तिमिर भई उजियारी॥
हों पतंग तुम भुंग गुसाई । आप सरीख कीन्ह एहि ठाई॥
सप्त सिन्धु पृथ्वीमें आहीं । सकल जगत इनहींके माहीं ॥
सप्त सिन्धु जो रहे पताला । सातनाल प्रभु कहौं रिसाला ॥
सातौ नाल कवन विधि हेरा । जामें सुषुमण होइ निवेरा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास यह अकथ कहानी । बिरले हंस कीन्ह पहिचानी ॥
अगम विचार कीन्ह व्यवहारा । जासों भया सकल विस्तारा ॥
जबहीं हंसा तजे शरीरा । शब्द प्रताप होय गंभीरा ॥
सप्त सिंधु नर पावै कोई । सप्त सिंधुमें जाय समोई ॥
सप्त सिंधु आरम्भ न करई । त्यागि शरीर हंस गति धरई ॥
जाय करै मुख सागर बासा । मान सरोवर करहिं निवासा ॥

( १०० )

बोधसागर

सप्त सिन्धुके नाम सुनाऊं । भिन्न भिन्न सब तोहि लखाऊं ॥
सप्त सिन्धु अब लखि पावे कोई । समता सिन्धुमें रहे समोई ॥
योग सिन्धु अब कहों बखानी । अजांवन सिन्धु लेव पहिचानी ॥
अमर सिन्धु हंसा लखि पावे । अकह सिन्धुमें जाय समावे ॥
सुखहिं सिन्धुहि कीन्ह पैठारा । सप्तहि सन्धुहि नाम उचारा ॥

साखी-ज्ञान स्थितको पायके, मन सुस्थिर हो जाय ।
कहे कबीर धर्मदाससों पुरुष नाम समुझाय ॥

चौपाई

पुरुषहि नाम कहौं समुझाई । धर्मदास हिय गहो बनाई ॥
याही कारण अजपा कीन्हा । जीवन संधि परी नहिं चीन्हा ॥
पुरुषहते तब मूलके ठाऊं । तब नहिं दीपलोक अवगाऊं ॥
चौबिश पुत्र तबे नहिं रहिया । तबही वचन अम्र जो कहिया ॥
ता पाछे ओंकार जो कीन्हा । ओंकार सो सब रचि लीन्हा ॥
साहब वचन सत्य फरमाया । सत्य शब्द अक्षर निर्माया ॥
कबहुँ नाहिन अस्थिर होई । बरा बार मन देह बिगोई ॥
काया भीतर आप लखावा । ताते अजपा नाम कहावा ॥
याहि शब्दसे सुद्ध शरीरा । याहि शब्दसे मिले कबीरा ॥
याहि शब्द हृदय सुख होई । निर्मलहोहि विशहिं सबखोई ॥
अस्थिर मनकर प्रफुलित राखे । नाम संधि हृदये महाँ चाखे ॥
निर्मल हंस होत है तबही । अमरलोक पहुँचि है जबही ॥
सातों सुरति तबहि परकाशा । पुरुषहि को राखे विश्वासा ॥
उत्पति शब्द जबे निर्मावा । सो अक्षरमिलिशिवहिं कहावा ॥
शिवहि शब्दसों जीव कहावा । जीव नाम संसार कहावा ॥
सातों नाल वाहिके अंगा । जिहि जग मीतर माडो रंगा ॥
अक्षर शब्दसे शिव जो आवा । वाही अक्षर गुरु कहावा ॥

ज्ञानस्थितिवोध

( १०१ )

काशी मध्य मरे जो कोई । होहि पखान रूप तब सोई ॥
चौरासीसे रहित जो होई । पाहन रूपहि जन्म विगोई ॥
शब्द संपूरन शिव जो जाना । त्यों सुकृतके बहुत परवाना ॥
अक्षत ले आरति कर सोई । उन कर मंत्र कहत सब कोई ॥
तारक मंत्र वयसको नाहीं । पण्डित शब्द गहत मनमाहीं ॥
यही मंत्र कहत सब कोई । साहब चरण न पावैं सोई ॥
क्षमा गुरु निश्चय जो पावा । सद्गुरु शब्द अहर्निश लावा ॥
क्षमा गुरु कहिए अविनासी । मानसरोवर तटके वासी ॥
रचना भेद ले शिव कह दीना । यहि विश्वास मनहि कर लीना ॥
भवसुर केहि शिखावन एहा । सनकादिक कर चरण सनेहा ॥
यही प्रणालि गही सब कोई । गुरु निर्गुणकर भेद समोई ॥
याहीमें सब परै भुलाई । दृढ़तही जग करूप बिताई ॥
जो चाहे सुकृत कर लेखा । आप आप सो करै विवेका ॥
उनकर चीन्हि अमरपद पाई । सूक्ष्म मुक्ति नाम गुण गार्ई ॥

साखी—यह गुण ज्ञानस्थितिके, जो पावैं निज नाम ।
अजपा जपै कबीरको, सो पहुँचे निज धाम ॥

चौपाई

शब्द पाय लोक जिन चीन्हा । नाम अखण्डित जब धरलीन्हा ॥
मुक्तामणि निज नाम हमारा । हंस उबारहि भवसे पारा ॥

साखी—सोहं नाम हृदय धरै, और जपे नहिं जाप ।
मूल शब्दही रटन कर, मूल शब्द हो आप ॥
करै निरूपण शब्दको, कहै कबीर बखान ।
मूल ध्यान गहि पावही, सुख सागर अस्थान ।
मूल शब्दके येह गुन, अमी दीपक कहैं जाइ ॥
कबीर ज्ञानस्थित बिना, मूल नाम नहिं पाइ ।

( १०२ )

बोधसागर

गुरु महिमा प्रारम्भः

चौपाई

गुरु होहि वहि ताहि लखावै । गुरु बिन अंत न कोई पावै ॥
जिन गुरुकी कीन्हरी परतीती । एक नामकर भव जल जीती ॥
गुरु पुरुष जिय करहि मराला । गुरु सनेह बिन काग कराला ॥
गुरु दया गुरु शब्द हमारा । गुरु प्रगट है गुप्त अधारा ॥
गुरु पृथ्वी गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थलमहँ कीन निवासा ॥
चंद्र सूर्य गुरु सब संसारा । गुरु गंधर्व गुरु सब व्यवहारा ॥
गुरु ब्रह्मा और विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥
चराचरहि जहँ लगि सब देखा । गुरु बिना कछू और नहिं पेखा ॥
उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्हे गुरु शरिष्ठा ॥
ये सब जीव गुरुमय जानो । गुरुसे भिन्न अन्य नहिं मानो ॥
कहैं कबीर सो हंस पियारा । येहि भांति गुरु दरश निहारा ॥
साखी-सो गुरु निशिदिन बंदिये, जासों पाये नाम ।
नाम बिना घट अंध है, ज्यों दीपक बिन धाम ॥

चौपाई

गुरु चरण जे राखे ध्याना । अमर लोक वह करत पयाना ॥
अमर कमल ज्यों रहैं लुभाई । या विधि गुरु चरणन लपटाई ॥
तन मन धन न्योछावर राखे । दर्शहि पशं अमी रस चाखे ॥
चरण धोय चरणामृत पावै । पुरुष समीप पहुँच सो जावै ॥
गुरु बिहून अमृत नहिं दीजै । अमृत छांड़ि विषय रस लीजै ॥

साखी-महा पुरुषको नाम है; जा घट मांहि समाय ।
सोई सद्गुरु जानिया, अरु कृत्रिम सब पाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विनती अनुसारी । समरथ खसम जाहि बलिहारी ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १०३ )

जबसे दीन्ह मुक्तिकर बीरा । तीन ताप मिटि गई अधीरा ॥
साहब कहिये शब्द अनन्दा । जाते यमकर छूटै फन्दा ॥
चरणामृत कैसे कर लीजे । तौन शब्द मोसों कहि दीजे ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहों विचारी । चरणामृत शब्दहि निरवारी ॥
यहि पाये निज करहि अहारा । जासों यमकी छूटै धारा ॥
प्रथम भोर मुख उठिके धोवे । काल कष्ट यमद्वार बिगोवे ॥
फेर करहिं शब्दको आशाना । वही शब्दसो मुक्ति निदाना ॥
बहुरि हिये महाँ नामहि आने । नाम विदेह दरश पहिचाने ॥
नाम विदेही कठिन अपारा । ताहि चीन्हि कर करहुँ अहारा ॥
ध्यान बीज गुरुचित महाँ आने । सुरति निरति पुरुषहि पहिचाने ॥
बहुरि शब्द आनंदित भाषे । मुख महाँ धोइ नाम रस चाखे ॥

साखी—इह गुण ज्ञानस्थितहिके, शब्द भेद निजसार ।

गुरुचरणामृत लेहि तब, होवे हंस उवार ॥

स्मरण

श्वेत मिठाई श्वेतहि पाना । श्वेत शब्द लेखनि परवाना ॥
योग सत्य इन दीन्हो बीरा । मनको उलटि खोज लै हीरा ॥
बीरा खाय भयो मुख भारी । प्रथम पुरुष ऊपर उजियारी ॥
दूसर सत्य गुरु नाम जो भावा । तीसर लक्ष्मी लै घर आवा ॥
चौथे जन्म मरण नहिं होई । जो चरणामृत पावै कोई ॥

साखी—कालफाँस नहिं आवही, तन्त्र मंत्र क्षयमान ।

वचन कबीर गुसाँइको, संत्य हि शब्द प्रमान ॥

मंत्रसम्पूर्ण

धर्मदास वचन

चरण टेक कर विनती लाई । कीन्ह कृतार्थ मोकहँ आई ॥

( १०४ )

बोधसागर

सब विधि धर्मदास पर दाय। मुक्ति मुक्ति गुरु सबै बताया ॥
साहिब कहिये शब्द उचारी । जौन शब्द मुखधोय निहारी ॥
सोइ शब्द गुरु कहो बखानी । जाते जरै कालकी खानी ॥

साखी--काल जरै कंटक जरै, राखौ चितमें नाम ।
मनसा वाचा कर्मणा, जाय हंस निज धाम ॥

सदगुरु वचन

धर्मदास यह शब्द उचारी । याही शब्दसों हंस उबारी ॥
काल जँजाल मिटत है जबही । शब्द लेय मुख धोवै तबही ॥
काया शुद्ध होइ निज वारा । मुख धोवै मोहे संसारा ॥
दिन दिन मुख उज्ज्वलतेहिकेरा । रविसमान मुख होय उजैरा ॥
अब मैं शब्द कहत मुख बानी । धर्मदास लीजे पहिचानी ॥

स्मरण

सिंधलद्रीप हंस कहां रहियऊ । पहले पार कबीर कहियऊ ॥
बसले पानी मुख धोय । चंदन काटिके धोय मुख ॥
सुरति करहि अस्नान।तेतिसकोटि सुरदेवता लखे अभ्यंतरधरिध्यान
मुख धोवे मनमोही । औ देह नहि जान ॥
मनमें ध्यान कबीर कहिये । रखे चित्त पहिचान ॥
मोरे माथे मन वसे । अवरहुँ मदिल कोइ ॥
सिंधलद्रीप दिग वैठके । कबहुँ न जाय विगोइ ॥

साखी--ज्ञानस्थितिके यह गुण, मुख धोवे सुर ज्ञान ।
कहे कबीर विचारिके, हंस होहि निर्बान ॥

चौपाई

धर्मदास यह धर्म अपारा । जासों होत दिगंबर भारा ॥
दिगंबर देह होत जब भाई । स्नान शब्द जब गुरुसों पाई ॥
यही शब्द धुंधलको दीन्हा । धुंधल राव मानि शिर लीन्हा ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १०६ )

मृतकहि देह धरे संसारा । बिना शब्द है काल अहारा ॥
स्नान शब्द हृदयमें धरहीं । जीवनमुक्ति होइ भव तरहीं ॥
यही शब्दसो धोवे अंगा । दिव्यदेह जानो परसंगा ॥
जो कोइ करे शब्द असनाना । ताकर धोखा जाय निदाना ॥
लक्षहि दान करै नर कोई । जीव दया बिन मुक्ति न होई ॥
जो धोवे निश्चय करि देहा । तबही कीजे शब्द सनेहा ॥
कहे शब्द अब कहो बखानी । धर्मदास लीजो शिर् मानी ॥
नित्य प्रीतिकर शब्द स्नाना । ताकर दोष न रहै निदाना ॥

स्मरण

साखी-अगम सरोवर विमल जल, हंस बैठिके न्हाइ ।

काया कंचन मनमगन, कर्म भर्म मिटि जाइ ॥

पिंडहिसों ब्रह्मांडहि जाना । मान सरोवर करि असनाना ॥
सोहं सोहं ताको जापा । लिखत न करै पुण्य औ पापा ॥
पुण्य पापसे रहत न न्यारा । पैठि संत जन करो विचारा ॥
याहीविधि जो करि असनाना । सो हंसा करै लोक पयाना ॥
धर्मदास सुन शब्द विशेषा । गंगवारु इतने है लेखा ॥

स्मरण सम्पूर्ण

आदि अंत सब कहों बखानी । धर्मदास कीजो बिलछानी ॥
मूलपुरुष काहू नहिं जाना । सो तुमसो सब कहों बखाना ॥
मूलशब्द तहाँ अग्र कहावा । अग्र विदेह अस्थूल सुभावा ॥
मूलभेद काहू नहिं पावा । मूलनाममें गुप्त छिपावा ॥
कहैं प्रतीत देखी मैं तोरी । तातैं कहों मूल निज डोरी ॥
मूलहि शब्द असंभव नामा । कहैं सुनै नहिं पावै ठाना ॥
चारलोक चार है नाऊँ । चार चार सो बरन सुनाऊँ ॥
सीख गुरु या बिचि जो धरहीं । जैसी विधि तुम हम सो करहीं ॥

( १०६ )

बोधसागर

तन मन शीस न्योछावर डारै । तब गुरु शिष्य हृदय संचारै ॥
रंचक कपट हियेमहैं राखे । गुरुसनेह रस कैसे चाखे ॥
मुखसे बातें मीठी करहीं । अर्थद्रव्य मन कृत्रिम धरहीं ॥
गुरुलोभी शिष्यलालचि जानी । परमारथ नहीं पहिचानी ॥
कैसे ताकर होय उबारा । बूढ़हि भवसागरकी धारा ॥

साखी-युक्ति मुक्तिकी को कहे, नरकहु नहीं ठोर ।
पिशाचरूप भरमत फिरै, बाँधे यमकी पोर ॥

चौपाई

धन्य भाग्य तुम हमको चीन्हा । तन मन धन न्यौछावर कीन्हा ॥
यहि कारण मैं कीन्हो नेहा । मूलशब्दसों करहु सनेहा ॥

साखी-कहियत वचन विचारिके, तुम सुनियो चितलाय ॥
धीरज दृढता ठानिके, अमृत पिये अघाय ॥

चौपाई

जब प्रभु हते मूल अस्थाना । हंस सुजन जन नहिं उत्पाना ॥
सो निज ठांम लखावों तोही । धर्मदास जो पूछै मोही ॥
तब ना हतो अग्रको मूला । तब ना हतो विदेह स्थूला ॥
तब नहिं हंस सुजन जनकीन्हों । तब यह हंस बास कहाँ लीन्हों ॥
तब साहब समसर उपराजा । समसर अग्र कीन्ह सबसाजा ॥
दश ग्यारह नहीं ब्रह्मंडा । तब नहिं हते लोक अरु अंडा ॥
तब नहिं अमी अमी रस छंदा । तब नहिं दिवस रैन अरु चंदा ॥
सो अब कहौं मूल नहिं कन्दा । मूल विदेह नाम आनन्दा ॥
कहेउ भेद लहेउ निज नामा । जासों पूरण है सब कामा ॥
जैसे जलमें दिनकर ज्योती । यों घट भीतर लखिये मोती ॥
धर्म नाम असंभव नाऊं । निरालम्ब अग्रिम है गाऊं ॥
निरालंब आलंब ठिकाना । याविधि साहबको पहिचाना ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १०७ )

सोमैं देखि तोहि समझाऊँ । यह तुम राखो हिय छिपाऊँ ॥
वह प्रभु निरालंब बतलाई । नाम प्रभाव पुरुष लखिपाई ॥
सार नाम जिन हिये समोई । काल जाल सब जाय बिगोई॥
निरालंब है अधर अकाशा । पृथ्वी पवनहि माँहि निवासा॥

सारखी-निरालंबहि प्रभाव यह, सकल सृष्टि बिन नाम ।

अजर अमर विनसे नहि, बिन थूनी बिन धाम ॥

चौपाई

सो विधि ताको मैं समुझाई । अविनाशी या विधि प्रगटाई ॥
बिना तत्त्व तत्त्व जो भयऊ । बिना प्रतीति भेद किमि लहेऊ॥
करि प्रतीति तजि अन्य उपाई । आनंद गांव अनंद कराई ॥
तब हंसा आनंद हो जाई । आनन्द शब्द हृदयलों लाई ॥
जीवतही नर मुक्ति होई । अक्षर गहि निर अक्षर होई ॥
येहि प्रताप अग्रको लहिए । स्थूल विदेह वाहिमो कहिए ॥
निरालम्बसो सो भए अलंबा । शब्द सरूप सृष्टि सब थंभा ॥

सारखी-निरालंबके खोजमें, सब जग परो लुभाइ ।

जब सतगुरु दाय़ा करै, तबही परै लखाइ ॥

चौपाई

धर्मदास जो विनती करही । चरणि पकरि शिर ऊपर धरही॥
तुम समर्थ मैं दास तुम्हारा । चरण प्रसाद भयो बिस्तारा ॥
एक विवेक कही समुझाई । वचन सुधा सुनि तृषा बुझाई॥
अब साहिब कहिये व्यवहारा । मृतक जीव गुरुड संचारा ॥
जेहि विधि जीवहिगुरुडजियावा । सोई भेद गुरु मोहि बतावा ॥
मूलशब्द अक्षर पहिचानी । अगमहि नाम अकाशे जानी ॥
सो कहिए प्रभु भेद बखानी । बाल जिवाइ गुरुड नहि आनी॥

( १०८ )

बोधसागर

सद्गुरु वचन

धर्मदास बूझा व्यवहारा । यहै भेद अति कठिन अपारा ॥
योगी जंगम रहे लखाई । याहि भेदको अंत न पाई ॥
कलियुग महमदको अवतारा । तिनसो होय म्लेच्छ अपारा ॥
वेद अथर्वनको मत लावहिं । मानस मारिसाख बतलावहिं ॥
पीर पैगम्बर अजमत धारी । जीव दया नहिं कीन्ह विचारी ॥
अनकठ वचन कहे दिन राता । माता पिता पूछे नहिं बाता ॥
येहि वचन सुनि हृदय लगावो । समझि बूझिके गुप्त छिपावो ॥
आपा माडि थाप सब कीन्हा । आतम संधि कृष्णकहि दीन्हा ॥
अंबुजते अमृतहो आवा । अंबुजते जल पृथ्वी ठावा ॥

सारखी—कहै कबीर विचारिके, धर्मदास सुनि लेव ।
दृढ़ हो अमृत पीजियो, सब जीवन कहि देव ॥

स्मरण

ॐअकार न्याव सों सारा । अजब अतीत अचिन्त व्यवहारा ॥
अजर अहार अती है उज्ज्वल । स्थित उत्पन्न वही है निर्मल ॥
अर्थ ऊर्ध्व याहिमें सही । बर्कत फर्क याहिमें कही ॥
भयो अलखते सब संसारा । लयो अर्थ ऊर्ध्व पर भारा ॥

सारखी—अर्थ ऊर्ध्व आलेख सब, मैं मैं रहैं समाय ।
कहै कबीर धर्मदाससों, सोहि रहे घर आय ॥

बोल अडोल आप जो कहेऊ । दीप अदीप एक नहिं रहेऊ ॥
अष्ट मुष्टि कहि पंच प्रभाऊ । ये सब वाहीसो होइ आऊ ॥
कस नहिं जीव मुक्तिको लहेऊ । एक घरीक जो बोल कहेऊ ॥
करि प्रणाम देहमें आवा । अजर अमर अटल घर पावा ॥
पुरुष संयोग जो सेय बिछावा । अर्थ ऊर्ध्व ऊपर सच पावा ॥
रसना पाय अमृत जब चापे । तब उठि जीव वचन मुख भापे ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १०९ )

साखी—यह गुन ज्ञानस्थितिके, जीव जीव तन आव ॥
कहे कबीर धर्मदास सों, अर्ध ऊर्ध्व संभाय ॥

सम्पूर्ण स्मरण—चौपाई

भाषों जो प्रभु अमृत कीन्हैं । जेहि विधि अमृत सिरजेलीन्हैं॥
धर्मदास यह कहों बुझाई । जेहि विधि अमृत कीन्ह बनाई॥
आपहि आप अधर जो आवा । अमृत वही कर्म जो पावा ॥
कर्म जाय रीति जेहि बैठ। धर्म सहितसों कीन्हों पैठा ॥
सहज निरंजन भेद बतावा । भाषो भेद बरण सब पावा ॥
धर्मराय कूर्महिपर आए । कूर्मनाथ जहाँ अग्र रहाए ॥
मस्तक काटिय पेट विदारा । कूर्म दुखित भए शक्ति निसारा ॥
प्रकट समुद्र तभीसों भयऊ । जबही पेट विदारि लयेऊ ॥
अमृत धर्मराय कछु पावा । कछु गिरपरा समुद्र समावा ॥
अमृत विष्णु तबही जो लीन्हा । जबही मथन समुद्रहि कीन्हा ॥
अमृत तबहि निरंजन पावा । सोई अग्र सुकृतहि समावा ॥
धर्मशील काट्यो है तबही । विषम सरोवर उपजो जबही ॥
धर्मराय अमृत जो पावा । तेहि कारणसों अलख कहावा ॥
अग्र शीश कूर्मके पाई । ब्रह्मा विष्णु तबै उपजाई ॥
जीव जंतु पृथ्वी उपजावा । यह बल विष्णु राजसों पावा ॥
इंद्र जाय तब सेवा करहीं । भांति भांतिके सुख अनुसरहीं॥
तृप्त कीन्ह देवन सब अंगा । विष्णु दया कीन्ही परसंगा ॥

साखी—सूक्ष्म इंद्र दया करी, इंद्र साजि विस्तार ।

ब्रह्मा विष्णु महेश मिलि, कीन्हों सकल पसार ॥

चौपाई

धर्मदास जो बिनती लावा । गुरुड़ अमृत केहि कारण पावा ॥

सतगुरु वचन

पूर्व कथा अब कहों बखानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥

( ११० )

बोधसागर

नागहि लोक इंद्र जो गयऊ । सुधा हेतु कारज तेहि ठयऊ ॥
डारेउ नाग फाँसते तबहीं । कौन छुड़ावे याते अबहीं ॥
नागदेवके मात रहीया । गरुड मातसोंहीं छल करिया ॥
माथे लीन्ह गरुड़की जीती । छलसों भई दयाकी रीती ॥
गरुड़ मात कहि वचन सुनाई । दासी भाव कहां तुम पाई ॥
तब उठि माता वचन उचारा । सुनो पुत्र एक भेद हमारा ॥
नाग मात मोहि वचन हरावा । यातें दासी भाव रहावा ॥
पीतबरण शशि हम कहि सोई । श्याम बरण उन करो विलोई ॥
यह छल जानि परा नहीं मोही । सुनो तात समुझावों तोही ॥
कोपि गरुड तब गये पताला । नागलोक जहाँ विषकी ज्वाला ॥
देखत गरुड नाग सब भागे । मातासो छल कीन्ह अभागे ॥
माँगो सो हम तुम कह देही । हम कहैं त्रास देव जिन एही ॥
गरुड अहिन तब वचन उचारा । अमृतकुण्ड देव सब धारा ॥
नाग आइ तब कीन्ह निहोरी । गरुड इंद्रकी बंधन छोरी ॥
अमृत लेइ दर्शनको गयऊ । नाग गरुड पहुँचावत भयऊ ॥
गरुड मात नाग जब देखा । दासहि भाव तजब तुम रेखा ॥
अमृत पाइ गरुड बरियाना । तब छल इंद्र गरुसों ठाना ॥
गरुड महाबल सुख लहलीन्हां । बोई बंबूर अमृत किमि चीन्हां ॥
ज्यों मलयागिरि निकट रहावा । तास्वरूप काहू नहीं पावा ॥
कूर्म उदरसे सो चलि आवा । सुधा समुद्र मथे तब पावा ॥
गुरु द्रोहसों जन्म बिगोई । नाम पाइ अस्थिर नहीं होई ॥
चंचरीक चंचल है बहई । मलयागिरिकी सुगँध न लहई ॥
मलयागिरिको यहि प्रकाशू । विष नहीं बेधे वास सुबासू ॥

साखी—मलयागिरिके वाससे, सब दुम होइ सुवास ।

बासन कबहुँ बेधही, सदा रहत है पास ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १११ )

तबहि सुकृत बिनवे करजोरी । कृपासिंधु सुनि बिनती मोरी ॥
प्रथम तत्त्व प्रभु भाषव तुमहीं । सो सब बूझ पुरैगी हमहीं ॥
पाँच प्रगट गुप्त हैं पाचा । प्रगट समझि लीन्हें हम साँचा ॥
पाँच गुप्तको कहिये लेखा । पाँच प्रगट ये सब हम देखा ॥
पृथ्वि तेज जल पवन अकाशा । सो प्रभु मोहि कहो परकाशा ॥
जिहिं विधि ए प्रभु प्रगटे आई । सो प्रभु भाव कहेउ समझाई ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम जो कछु बूझा । सो सब भिन्न २ हम सूझा ॥
पृथ्वी रही गुप्तके नेहा । बहुरि प्रकट हुये शब्द सनेहा ॥
पृथ्वी अंग वैराटहि जानी । पाँव पताल शीस अनुमानी ॥
इच्छा सुरति शक्ति उपजाई । वैराट रूपमें जाय मिलाई ॥
अलख निरंजन यासों कहिये । यहीरूयाल अविगतको लहिये ॥
मन माया जब एके भयऊ । सकल सृष्टि उत्पन्नै लयऊ ॥

साखी-जब दोई एके भये, भयो लीन मन ठौर ।

नाभिकमल ब्रह्मा भए, सब रचनाको मौर ॥

चौपाई

धर्मदास अब कहों बखानी । तुम हिरदै कीजो बिलछानी ॥
पाँच तत्त्व जे गुप्त रहावा । सो सब भेद तोहि समझावा ॥
पाँचहि अमी पुरुषने कीन्हों । पाँच तत्त्व ताही सो चीन्हों ॥
अचल अमी जो अकाश बखानी । शब्द अमी वायु उत्पानी ॥
अजर अमी सो तेज पसारा । अकह अमी जलतत्त्व सम्हारा ॥
रंग अमी सो पृथ्वी भयऊ । रचना सब याही पय ठयऊ ॥
पाँचों अमृत तहँवा छाजै । पाँचतत्त्व तासों उपराजै ॥
पाँच तत्त्व सों देह सँवारी । तीनों गुण तामें अनुसारी ॥

( ११२ )

बोधसागर

देही गति काहू नहिं पावा । देह धरै यम काम सतावा ॥
आतमरूप रंग जिन जाना । प्रफुलित होय कमल विकसाना ॥
हर्षित भयउ बुन्द जो ठारा । परै अगाध सिंधु मझधारा ॥
परतहि बुंद रंग सब छाजा । जलतरंग जल रंग विराजा ॥

सारखी—यह गुण ज्ञानस्थितिहिके, जलतरंग उपजाइ ।

जलसों सब जग ऊपजो, जलधौं कहा समाइ ॥

चौपाई

नाम तत्त्वजल तत्त्वहि कीन्हा । अस्तुति जलहि रंगकर लीन्हा ॥
जल ऊपरहि कूर्म उपराजा । कूर्मपीठि वाराह विराजा ॥
पीठ वराह शेष जो रहई । शेषहि फनपर पृथ्वी धरई ॥
कूर्म सुरति पुरुषकी अहई । उनको अंश कूर्म इह लहई ॥
महापुरुष आसन जहाँ आई । स्वासा शब्द पुरुष उपजाई ॥
बहुरि तेज पुरुष परकाशा । सुरके घर हो तेज निवासा ॥
आनंद रूप लोचन जब कहे । तेज हर्षपर घट हो चहे ॥
हरष तेज सूर्य उतपानी । सो सब जगमें कीन्ह पयानी ॥
तेज अंग सूर्य कर रूपा । शीतलता शशिके रसरूपा ॥
या विधि दो अंश उतपानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥
अंग सूर्य शशि लयो बनाई । तेज हर्ष गुण उभय बताई ॥

सारखी—कूर्म उदरसों प्रगट है, रहे जगतमें छाय ।

बिन सतगुरु नहिं पावही, कहे कबीर समझाय ॥

चौपाई

जो अज्ञान ज्ञान नहिं जाना । तासों भेद न कहब सुजाना ॥
बहे बाये मन थिर नहिं जेही । सार शब्द कहा करै सनेही ॥
स्वासासार पुरुष उपजाई । सुरहो थासहि समसर छाई ॥
समसर भेद जानि नहिं कोई । अग्र थास तेहि कहिए सोई ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ११३ )

वहे गुप्त यह प्रकट बताई । यामें फर्क न जानहु भाई ॥
समसर पवन है सकल सुगंधा । ता बिन जगत आय सब धंधा ॥
गंध विगंध रची यह देही । समसर पवन सुगंध सनेही ॥
समसर अंग अग्रको आहे । समसर गहे पुरुषको लाहै ॥
अग्ररंग बाँए उपराजा । उनसों होत रंगको साजा ॥
रंग रेख सब उनसों होई । मृतकर रंग डार उन खोई ॥
रंग बाँएसे हरियल कीन्ह । हरियल रंग जात सब लीन्ह ॥
जीव जन्तु औ कीट पतङ्गा । दुम औ बेली सबके सङ्ग ॥
घास पात जिव सकल बिहङ्ग । हरियल राखो सबके अङ्ग ॥

सारखी-यह नहिं होतो जगतमें, मरत सकल कुम्हलाय ।

ज्ञानहि अस्थित पुरुषकी, कहै कबीर समुझाय ॥

चौपाई

एहि वायु हरियर जो कही । हरियर वायु तुहांसों सही ॥
अकाशमंदिरमें कीन्ह निवासा । जेहि मंडलते उपजी खासा ॥
याविधि उपजन भौ सब ठौरा । संसारी भेद कहां कहु औरा ॥
कालफंद फाँसी बड़ डारी । तासों परै न वस्तु विचारी ॥
जब स्वासा साहँहि उठाई । मूल दीक्षा प्रथम कहाई ॥
जब बालकको दीक्षा दीजे । बीरा देकर अस्थित कीजे ॥
सार नाम तब देव लखाई । जरा मरण सुस्थित घरपाई ॥
जो निज करै नाममें बासा । जासो स्वासा नाम प्रकाशा ॥
बिना नाम कालकी फाँसी । दीक्षा मूल यही परकाशी ॥

सारखी-मूल दीक्षा संग इह, लेहु संत चित लाय ।

धन्य भाग्य वा हंसके, नाम संधि जो पाय ॥

बिना शब्द संधी बिना, काहु न पाई बास ।

संधि नाम हंसा गहै, करै काल नहिं त्रास ॥

( ११४ )

बोधसागर

सत्य सुकृतकी रहनि रहि, गंह अर्जमन नाम ।
कहै कबीर धर्मदाससों, सत्य शब्द परमान ॥
सत्य सुकृत लों मेंड़ है, ग्यान ध्यान धर धीर ।
शब्द अजानन है वही, सोई संत कबीर ॥
अजर अमर वह पुरुष है, सत्यनाम बैधि छोर ।
कहे कबीर धर्मदाससों, थाह शब्द शिरमोर ॥

चौपाई

अब मैं कहौ अकाश बिचारा । जिहिबिधि भयव तासु विस्तारा ॥
अकाश अंड मध्य जो रहेऊ । अकाश भेद बिरले जन रहेऊ ॥
अकाश अंग सो सब निर्मावा । शून्य मंदिरतें नाभी आवा ॥
पृथिव अकाश योग अब कीन्हौ । शब्द हेतु काहु बिरले चीन्हा ॥
तालमृदंग अकाशते होई । रहित शब्द पुनि सुनी समोई ॥
अकाशबीच असहोय गुजारा । बिना मृदंग शब्द झनकारा ॥
अकाश पेट अकाशहि चीन्हा । सुरति सुनी आकाशहि दीन्हा ॥

सखी—कहै कबीर अकाशगुण, बूझत बिरला कोय ।
लीलारंग अकाशका, सुनिनो सत्य बिलोय ॥

चौपाई

जो मंदिर अकाश नहि देखे । तबलगि शब्द रहत अनपेखे ॥
पाँच अकाश तबै लखिपाई । जबै मंत्र गायत्री आई ॥

सारखी—भेदाकाश गुण अधरहै, ज्यों लखि पावै कोइ ॥
नहिं अक्षर लखि आवही; पहुँचे निज सोइ ॥

मंत्र गायत्री

धर्मदास विनवे करजोरी । भाषों शब्द गायत्री डोरी ॥
भेद गायत्री बालकको दीजे । प्रेम सुफल बालकको कीजे ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ११५ )

यापर कीरत कैसे जाई । प्रकृति अंग मायाको भाई ॥
माया अंग अष्टांगी कीन्हौं । अष्टांगी गायत्री चीन्हौं ॥
यह शब्द हम कहो बुझाई । लीजो संतो शिरहिं चढ़ाई ॥
बारा योजन बुड़े जाइत्री । पल पल छूटे इहीठों गायत्री ॥
भ्रमनाको आगो यह टूटे । ब्रह्म कथौ हिरदय रस लूटे ॥
जार बार कालहिकर छीरा । करकर निर्मल अंग शरीरा ॥
बास अमरपुर शब्द संधाना । कहै कबीर काल पछिताना ॥

सम्पूर्ण

न्यास

रक्षा प्रथम न्यास जो करई । सुर गंधर्व न्याससों डरई ॥
कालजाल निज बंदन होई । निर्मल रहै काल कहैं खोई ॥
भूतहि प्रेत वीर वेताला । वायु बतास और सैताला ॥
साठ तीनसौ ऊखत कहिये । हगन्यास कर एक न रहिये ॥

साखी—यह गुन हग अन्यासके, कहै कबीर बखानि ॥
प्रथम रक्ष या कह पढे, बढ़ि हितचित्त पहिचानि ॥

चौपाई

दुष्टनको बंधन है येही । हंस मुक्त मन मुक्ति सनेही ॥
हगन्यास प्रथम जो पढ़ई । तब रक्षा मन शब्दहि दृढ़ई ॥
हगन्यास बालकको चाही । संशै अंश रहित हो ताही ॥
यही शब्द मैं कहों बखानी । यही भेद बिरले पहिचानी ॥

साखी—उत्तम मध्यम अधम जो, सबहि करै निर्वाह ॥
हगन्यासके यह गुण, कुशल क्षेम प्रवाह ॥

धर्मदान वचन

धर्मदास बिनती उठि कीन्हा । पुरुषहि भेदसकल हम चीन्हा ॥
निश दिन चरण चित्त तव धरहूँ । अन्य उपाय सबै परिहरहूँ ॥

( ११६ )

बोधसागर

येहि वचन प्रभु कहो बुझाई । जाते काल दंड दुख जाई ॥
इंडुमती कह काल सतावा । रहि सचेत शब्द लखि पावा ॥
सो मोहि भेद बतावहु स्वामी । करहु कृपा गुरु अन्तयार्मी ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास भल पूछन कीन्हौ । सो अब भेद तोहिकहि दीन्हौ ॥
रानी काल कीन्ह जब त्रासा । तब हम शब्द कीन्ह परकाशा ॥
साधु संत सेवा चित धरहीं । भक्ति प्रेमबहु बिधि सों करहीं ॥
हमहिं छोड़ि नहि जाने दूजा । कुलकरनीकीं छोड़े पूजा ॥
तजि कुल करनि अमरपदपावा । येही सात नाम चित लावा ॥
तोसों शब्द विरहुली भाखी । तव कारण हिरदेमें राखी ॥
येही शब्द लेहु शिर मानी । मनसा वाचा निश्चय जानी ॥

विरहुली

आदि अन्त तब न हते विरहुली । भूमि अकाशहु न हते विरहुली ॥
तब विष नहि अवतार विरहुली । विषकीकयारितुमबाहिबिरहुली ॥
बिषका कीन्ह अहार विरहुली । सवा लक्ष पर्वत थे विरहुली ॥
तहाँ विषको अवतार विरहुली । गड़िगड़िशंकर बोह विरहुली ॥
पर्वति डारेउ पानि विरहुली । सोविष संतहि खाइ विरहुली ॥
विष माटि होय जाय विरहुली । मउरी संसय करिय विरहुली ॥
आफूयों हरतार विरहुली । सबसों शब्द निरंत विरहुली ॥
भागु विषपैठि पताल विरहुली । बनहि कंदविषविकल विरहुली ॥
पोस्त धतूरा भाँग विरहुली । गुरु वचन धरि बाँध विरहुली ॥
विष न संचरे अंग विरहुली । उदमदविष मदराज विरहुली ॥
यह विष बिरलैसम्हारबिरहुली । जब नहि स्वर्ग पताल विरहुली ॥
तबविष नहि अवतारबिरहुली । दूत भूत सब भगे विरहुली ॥
जहाँ बसे साधू संग विरहुली । भोगा कीयो तैं कहां विरहुली ॥