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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

उग्रगीता

( १३ )

अथ तृतीयोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन पूछे सुनु भगवाना । निर्मल ज्ञान सुनावो काना ॥ तुम तो कहौ कि युद्ध मचावौ । सब पलको तुम मारि गिरावौ॥ ज्ञान कही कहि मोहि समझावौ । फिरि कुलधर्म मोहि बतलावौ॥ जेहि ते मोर अकाज न होई । मोहि ज्ञान प्रभु दीजै सोई ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु अर्जुन बीरा । तुम तौ क्षत्रिय हो रणधीरा ॥ मारग दोइ ज्ञान हैं भाई । ताते तेहि कहौ समुझाई ॥ निवृत्ति मारग आहि निरासा । सदा ब्रह्ममें रहैं निवासा ॥ तत्त्व प्रकृति लित नहीं होई । सदा रहै निलेपी सोई ॥ नाम विना कछु बात न बोले । मन वच क्रम अंतरपट खोले ॥ निष्कर्मो निर्मल निर्माही । नहिं इच्छा मननाम समोई ॥ जगमें रहै कमल सम भाऊ । ऐसे लित होइ नहिं काऊ ॥ दान पुण्य जो यह कछु करई । ताकर फल मनमें नहिं धरई ॥ दाता भुक्ता प्रभु कह जानै । कर्म धर्म कछु मनहिं न आनै ॥ मारग निवृत्ति साखि जो अहई । महाकठिन मारग तेहि कहई ॥ कठिन विहंगम मारग होई । पहुँचै कोटिन्ह महाँ पुनि कोई ॥ तेहि मारग कोइ चलने न पावै । काम क्रोध मद लोभ भुलावै ॥ पूरण सिद्ध हुवा नहिं जाई । ताते तोहि प्रवृत्ति दृढाई ॥ कुलके कर्म सदा चित धारै । कबहु न छोड़ै लोकाचारै ॥ दान पुण्य जप तप व्रत करई । संध्या तर्पण मन चित धरई ॥ नियम धर्म औ करै जो स्नाना । सवा सुमिरन धारै ध्याना ॥ उद्यम अपने कुलको करई । यह मारग जौ लागा रहई ॥ सो तो कर्मके कश्मल धावै । धीरा तन मन मैल जो खोवै ॥

१४)

बांधसागर

यह पिपील मत कहिये भाई । हरे हरे वह मार्ग जाई ॥ तेहि मार्ग कोइ विघ्न न लागै । कमहि कम धर्म तब जागै ॥ स्वर्गवास पावै सो प्राणी । कबहीं ताको होय न हानी ॥ तासों मैं बहु प्रीति जनावौं । संशय दुख सब दूरि बहावौं ॥ धनसम्पति सुख बहु विधि देऊँ । आपन करि मैं ता कह लेऊँ ॥ ताते प्रवृति अधिक फल भाई । लोकाचार समीप बताई ॥ तुम क्षत्री रणपति हो आगर । गहो धनुष तुम जक्त उजागर ॥ ऐसो कहो जब कृष्ण सुजाना । अर्जुन पुनि पूछो भगवाना ॥ कैसे कर्म लिप्त नहिं होई । कर्म धर्म तुम थापेउ सोई ॥ कहै कृष्ण अर्जुन सुन लीजै । सेवा सुमिरण मैं चित दीजै ॥ करि करि कर्म मोहि सब अपै । कबहुँ न पाप दोष सो डपै ॥ ताके शिर नहिं लागै भारा । सत्य भाव मो ऐसे विचारा ॥ पांच हत्या नित गेही करई । अंध भावते गेही फिरई ॥ नित नित हत्या शिर पर लेही । बांचे जन कोइ परम सनेही ॥ कहै अर्जुन यह हत्या कैसी । गेहीको तिन लागै सौसी ॥ सो तो वनिकै मोहि सुनावौं । दुविधा भावसो मोहि मिटावौं ॥ कहै कृष्ण अर्जुन सुनु वैना । हत्या पंच निरखि कै लेना ॥ प्रथम हत्या जो पीसेपिसाना । दूसर कुट्टे आनि जो धाना ॥ तिसरै बढ़नी जो घर देई । चौथे कलशा भरै जो कोई ॥ पंचये रसोई चूलहा वारै । हत्या पांच जीवहुँ मारै ॥ कहै अर्जुन यहि विनु को रहई । यह पातक कैसे परिहरई ॥ यह पातक जो देह सनेही । कैसे उधरनी इनसो लेही ॥ सुनु अर्जुन जिव कर्म न लगै । नित नित करि प्रभु चरणन पागै ॥ जो कछु करै सो प्रभुके कारण । ताहक दोष न कछु विचारण ॥ करै रसोई प्रभुके नामा । पुनि अपै जल लै सब सामा ॥

उग्रगीता

( १५ )

अंत कार काहैं परसादा । दीन दुखित जो पोषै सादा ॥ ता पाछे ब्रसाद जो पावै । ताको हत्या निकट न आवै ॥ ऐसे कारज प्रभु सनमानै । ताहि दोष नहि वेद बखानै ॥ त्रै अध्याय तोहि सन कहेऊं । कर्म योग परकट कै सहेऊं ॥ कहै कबीर सुनु धर्मसुनि आगर । सत्य सुकृतको ज्ञान उजागर ॥ यह तौ कर्म ज्ञान दृढ़ावै । फल भोगै फिरि योनिहि आवै ॥ निवृति कहै त्रिवृति ले आवै । फिरि फिरि लेके कर्म दृढ़ावै ॥ ताते मैं संसारहि आवा । सत्य शब्द कहि बहु गोहरावा ॥ बूझेगा कोइ सन्त विवेकी । ज्ञान दृष्टि ते सब कछु छेकी ॥ हम तौ तीनि लोकते न्यारा । जो बूझैं सो हंस हमारा ॥ यह रीझै तौ स्वर्ग देह वासा । कर्म भोगि मृतुलोक निवासा ॥

छन्द-धर्मदास मैं कहौं तोसौं सार शब्द जो भेद है । हंस मन बच गहैं ताकु पालक ना विछुरार है ॥ विश्वास देखो प्रीति करि मैं निकट प्रकटो तासुको । यम फंद शंसा भटी चौथो लोक देख निवासको ॥

सोरठा-अगम भेद है सार, भेद कोइ नहीं पावई । उत्तरे भव जल पार, शब्द गहै विश्वास कै ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

कर्मयोगारूढ्यानां नाम तृतीयोऽध्यायः

अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्री कृष्ण उचाव

अर्जुन सो अस कहेउ भगवाना । अगम भेद बतावै ज्ञाना ॥ यह गीता काहू नहिं पाई । सो मैं तोसों वाक्य सुनाई ॥ प्रथम मैं गीता सूर्य सुनावा । उन वैवस्वत पुत्र पढ़ावा ॥

( १६ )

बोधसागर

ताकर सुत देवसि जो भयऊ । अपना सुतहि पढ़ाया लयऊ ॥ उन्ह लै सुत इक्ष्वाकुहि दीन्हा । प्रगट फिर काहू नहि कीन्हा ॥ यतिक दिवस जो रहेउ समाई । अब तुम कहैं मैं आनि सुनाई ॥ और ज्ञान यहि सम नहि होई । सुरति लौरति लै देखहु सोई ॥ तब अर्जुन पूछेउ अस बाता । तुम तौ भये यहि युग उतपाता ॥ सूर्य को आदि युग गयऊ । तुम सो गयउ उन्ह ज्ञान पयऊ ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु वचन प्रमाना । जो मैं तोहि सुनावों ज्ञाना ॥ मैं तो सदा रहों जगमाहीं । तुमहु रहौ हमारे पाहीं ॥ जन्म अनेक तेरो चलि गयऊ । जन्म अनेक मेगे पुनि भयऊ ॥ तैं अचेत माया में बंधा । मैं निर्मल जस पूरण चन्दा ॥ जन्म जन्म के गुण मैं जानौ । अपनो तेरो गुण पहिचानौ ॥ आदि अंत सकलौ मैं जानौ । ताते यतना भेद बखानौ ॥ तै है काम क्रोध अधिकारा । नहि बूझै तैं चरित हमारा ॥

अर्जुन उवाच

पुनि अर्जुन अस पूछन लयऊ । कारण कवन जन्म तुम धरेऊ ॥ निह इच्छा तुम अंतर््यामी । काहे आवागमन समानी ॥ तुम्हारे दुष्ट मित्र नहि कोई । कारण कवन जन्म धर लेई ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु परम पियारे । धरणी माँह पाप होइ भारे ॥ बहुत अधर्म होन जब लागे । वसुधा भार मही उठि लागे ॥ जब जब देखौं महि पर भारा । तब तब आनि लेउं अवतारा ॥ जन्म कर्म लै खेलौं जगमें । करि संहार जो रहौं अलग में ॥ मेरी गति मति कोइ न जानै । महिमा चारौ वेद बखानै ॥ होइ निष्कपट जो मोहक ध्यावै । महा अनंद परम निधि पावै ॥

उग्रगीता

( १७ )

जो मोसों कोइ अंतर राखै । कै २ दंभ भक्ति मन भाखै ॥ ता कई काल बहुत दुख देई । दंभी भार बहुत शिर लेई ॥ मैं हूँ तासों अंतर राखौं । कबही तासों निकट न भाखौं ॥ ताते तुम मोहक पहिचानौ । मेरो कहा सदा तुम मानौ ॥ तब अर्जुन बोले अस बानी । मर्म तुम्हार न काहू जानी ॥ करन करावन तुमही स्वामी । केहि कारण पृथ्वी अकुलानी ॥ तुम काहेको मारण आवौ । केहि कारण तुम भार चढ़ावौ ॥ तब अस बोले कृष्ण सुजाना । मर्म आपनो कहौं बखाना ॥ तीनि लोक जो राज हमारा । ताते रचौं खेले विस्तारा ॥ बहुत भांतिकै ख्याल बनावौं । खेलि ख्याल पुनि ताहि मिटावौं ॥ तीनि लोक मैं आवौं जावौं । निर्गुण सगुण जु नाम धरावौं ॥ जो जन भक्ति हमारी करई । मन वच कर्म मोहि चित धरई ॥ तेहि कह महु सहायक होऊँ । उन्हके दुष्टहि मारि बिगोऊँ ॥ सदा रहौं भक्तन हितकारी । तारण तरण है नाम सुरारी ॥ अर्जुन बहुरि जो पूछन लागे । इंद्री जीति सबै गुण त्यागे ॥ करन करावन कहवौ स्वामी । तुम पूरण हौ अंतर््यामी ॥ काहे सेवा पूजा लावै । देवि देवता बहुत मनावै ॥ देव पितरको पिण्ड जो भरई । केहि कारण बंधनमें परई ॥ तीरथ व्रत बहुतै तुम धावै । केहि कारण तुम नाम धरावै ॥ सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । मेरी मति गति विरले जानी ॥ जग रचना स्थिर नहि पावै । ब्रह्म अज्ञान विराग उठावै ॥ कोइ काहूकी शंक न मानै । आपु आपुमें ब्रह्म बखानै ॥ सब व्यवहार जगतके चाहौं । राज काजमें वोर निवाहौं ॥ तब यह कर्म दृढावौ आई । तौन सृष्टि तुम कस उरझाई ॥

( १८ )

बोधसागर

चारि चरण तब परकट कीन्हा । कर्म धर्मपुनि ता कह दीन्हा ॥ ताते पूजा हम ही थापो । देवन महाँ हम ही आपो ॥ पूजत मोहि देखै संसारा । बहुते भाँति तब पूजा धारा ॥ तीर्थ व्रत जप तप गहि लीन्हा । ताकर फल संसारहि दीन्हा ॥ फल कारण सब जग अरुझाना । देवी देव रहे लपटाना ॥ जैसा करै तैसा फल पावै । दान पुण्य बहुते मन लावै ॥ ब्रह्म ज्ञान विनु मोहि न जानै । ताते चौरासी अरुझानै ॥ आवै जाई जगत मझारा । पशुवा शूकर श्वान सियारा ॥ चौरासी योनीमें फिरई । बडे भाग नर देही धरई ॥ जो कोइ भक्त मोहि न चितलावै । मोक्ष मुक्ति परम पद पावै ॥ मन संकल्प विकल्प ते त्यागै । तब यह पूरण तंतुहि लागै ॥ यज्ञ कर्म सब विधि व्यवहारा । ताते भव जल उत्तै पारा ॥ द्रादश यज्ञ कर्म है भाई । जेहिते महा परम सुख पाई ॥ सो अब तुमसों कहौ बखानी । यज्ञ कर्म करै जो प्राणी ॥ प्रथमें ब्रह्म यज्ञ है भाई । ब्रह्म सउज लै ब्रह्म अपराई ॥ ब्रह्म अग्नि होम ब्रह्म देई । सब विधि ब्रह्म जानिके लेई ॥ दुतिया यज्ञ देव यज्ञ करावै । देवि देवता बहुत मनावै ॥ सब साउज लै होम करावै । यहि विधि जन्म सफल सो पावै ॥ तीसर यज्ञ संयम करु इंद्री । साधै भूख प्यास औ निंद्री ॥ पांच पचीश गुप्त लिये खेले । मनुवा निशि दिन प्रभु सो मेलै ॥ चौथ यज्ञ संयम औ आतम । अभ्यंतर चीन्है परमातम ॥ आतम परमातम जब जानै । यहि विधि भेटै श्री भगवानै ॥ पँचयें द्रव्य यज्ञ जो होई । करि महि रक्षा साधु रसोई ॥ बहुत भांतिकै साधु जेवावै । तेहि पीछे वह भोजन पावै ॥ जस कीरत होवै संसारा । ताकी गति वैकुंठ सवारा ॥

उग्रगीता

( १९ )

छठये यज्ञ तपस्या भाई । आगिल जन्म राज कर पाई ॥ सतयें यज्ञ योग जो साधै । आसन मूल पवन अपराधै ॥ पूरण योग होइ जो कोई । काल त्रास कह जाने सोई ॥ जब लगि चाहे काया राखै । फिरि जन्मै तो योग अभिलाषै ॥ अठयें योग यज्ञ अधिकाई । गीता कथा पाठ करै भाई ॥ पोथी पढ़ि गुरु मारग गहई । सो भवसागरते निर्वहई ॥ नवयें ज्ञान यज्ञ है भाई । ज्ञान ध्यानमें रहै समाई ॥ दशयें यज्ञ जो प्राण पयाना । यह नारम जो रहै लपटाना ॥ एकादश है संयम सारा । सूक्ष्म भोजन करै जेवनारा ॥ देहीको मिथ्या करि जाने । प्रभु पूरण अन्तर पहिचानै ॥ द्वादश यज्ञ विधि नाम कमावै । योग युक्ति सब जानि जो पावै ॥ यहि विधि द्वादश यज्ञ हैं भाई । जो कोई करै परम हित लाई ॥ सो भावसागरते तरि जाई । विष्णुलोकमें जाइ समाई ॥ अर्जुन तुम तौ भक्त हमारे । बहुत उजागर प्रेम पियारे ॥ माया मोह चितते तुम डारो । धनुष बाण तुम वेगि सम्हारो ॥ चतुर्थाध्याय कहेउ तुम संगा । यज्ञ योग नाम सब अंगा ॥

कबीर उवाच

धर्मदास तुम संत सुजाना । सत्य शब्दका मर्म जो जाना ॥ यह तो धर्म कर्म व्यवहारा । कहा करै जिन शब्द संभारा ॥ शब्द इमार भेद टकसारा । जो बूझै सो उत्तरे पारा ॥ मुक्ति होइ सत्यलोक सिधावै । तीनि लोक बंधन मुक्तावै ॥ तीनि लोक जग आवागवना । अधर लोक है सतगुरु भवना ॥ इच्छा रूप फिरै जन मुक्ता । जहाँ पुरुष समीप संयुक्ता ॥ तहैं कर वर्णन कहा बखानों । गूँगेको सपना सम जानों ॥

( २० )

बोधसागर

छन्द-लोक उपमा कहा दीजै जगतमें कछु नाहिं हो । पुरुष पटतर कहा दीजै ससृजियों मन माहिं हो ॥ नदी अठारह गण्डका रेणुका भरिपूर हो । पुरुष शोभा अग्र आभा एति सूर्य झूर हो ॥

सोरठा-पुरुष रूप अपार, कहतै शोभा ना बने । चीन्हो शब्द हमार, जेहिते पुरुष परसि हो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कवीरधर्मदाससंवादे

द्वादशयज्ञव्याख्यानो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन तुम हो भक्त हमारा । तुम्हरो काज करौ मैं सारा ॥ ज्ञान ध्यानमें मन तन देहू । निशिवासर सुमिरनकै लेहू ॥ ज्ञानवन्त जो है तत्त्वज्ञानी । तिनकी महिमा अवर न जानी ॥ हर्ष शोक जाके नहिं होई । काम क्रोध सो लिप्त न सोई ॥ कर्म करै करता न कहावै । अभ्यन्तर मारग चितलावै ॥ इंद्री आपु आपु सुख चाहै । ताके कबहुँ निकट न बाहै ॥ इंद्री कर्म सदा होय भाई । ताके लिप्त न होवे भाई ॥ तिनसों कर्म करै जो कोई । परमात्म कह लाग न सोई ॥ सम दृष्टी होय सर्व निहारै । सर्व योनिमें ब्रह्म विचारै ॥ ऐसो जो कोइ प्राणी होई । जीवन मुक्त कहावै सोई ॥ काम क्रोधमें यह जग बंदा । ज्ञान न उपजै मूरख अंधा ॥ निशिदिन ताहि मोह भरमावै । बहुरि बहुरि पाछे पछितावै ॥ नारी सुत हित बन्दन लाया । धनसो मन जो बहुत लगाया ॥ अंतकाल कोइ काम न आवै । होइ बिछोह पाछे पछितावै ॥ अन्तकाल जब संकट आवै । कालके हाथ सो कौन बचावै ॥

उग्रगीता

( २१ )

रोवै बहुत भांति तेहि कारण । सुये न जीवै बहुत पुकारण ॥ प्रभु हिरदय नहिं सूरख जाने । मृतक आशा लागि भुलाने ॥ मृतक रोवैं भला न मानै । फिर यमराजा संकट ठानै ॥ लोगन घरतै बाहर कीन्हा । की जारै की माटी दीन्हा ॥ मृतक रूप बनी यह देही । करि ले प्रीतम प्रेम सनेही ॥ जगके बन्धन जगमें छूटै । बहुत त्रास तेहि यम धरि लूटै ॥ इन मों कहा मोह चितलाया । प्रभु इच्छा नहिं सूरख पाया ॥ काकर पिता पुत्रको होई । नारी सुत हित लागे सोई ॥ ता कारण यह दुख सुख मानै । अज्ञानी नहिं प्रभुको जाने ॥ कबहु न सुमिरण प्रभुका करई । निशिदिन ज्ञान ध्यान परिहरई ॥ ताते बहुत भांति दुख पावै । प्रभुकी शरण न कैसेहु आवै ॥ यह तौ लक्षण जग व्यवहारा । ताते बूड़े मूढ गवौरा ॥ अर्जुन कर्म योग है नीका । संशय मेटो सकलौ जीका ॥ कर्म करै शिर अपने लेई । कारण करतामें चित देई ॥ आपन कर्म धर्म नहिं छोडै । दुख सुख प्रभु इच्छा शिर वोडै ॥ सदा अनन्द रहै सुख बासा । अन्तकाल वैकुंठ निवासा ॥ क्षत्रिय धर्म तोहार जौ होई । करौ संहार शत्रु पुनि सोई ॥ तुम्हारे लरे सबै कोइ लगि हैं । ना तो निंदा तुम्हरी करि हैं ॥ धर्म छांड़ि जनि पातक लेहू । युद्ध करनको मन चित देहू ॥ कर्म संन्यास पञ्च अध्यायी । अर्जुन सुनि मन दुविधा आयी ॥ युद्ध करो की ज्ञान विचारौ । केहि विधि अपनो जीव उबारौ ॥

कबीर उवाच

धर्मदास यह काल तमासा । तासो चाहै मुक्ति निवासा ॥ ज्ञानी अज्ञानी भरमावै । धर्म अधर्म दोष ठहरावै ॥ धर्म अधर्म काल की पाशा । ताते न्यारा शब्द प्रकाशा ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । तुम जाने जाने सब कोई ॥

( २२ )

बोधसागर

सद्गुरु संधि लखै को पारा । निराधार है अधर अधारा ॥

छन्द-गमि अगमि सद्गुरु लखायो निअक्षर सो पास है ।

कली फूलैं बास धावै ऐसो शब्द निवास है ॥

फूल तिल जब संग कीन्हों सुवस बासा तब भई ।

हंस बासा शब्द लीन्हो शब्द रूपी सो सही ॥

सोरठा-शब्द मता है सार, सुर नर सुनि जानैं नहीं ।

अंधा अध अचेत, अंधेरे न सुरति आने नहीं ॥

इति श्रीमदुभगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

कर्मसंन्यासग्याख्यानो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

छठे अध्याय ध्याय है योगा । सुनु अर्जुन मैं कहौ संयोगा ॥

जब लगि ध्यान योग नहिं करई । तब लगि निर्मल चित नहिं करई ॥

ध्यान योग योग निजु साधै । मन वच कर्म नाम अवराधै ॥

मन संकल्प विकल्प न जाके । दीन वचन कठोर न ताके ॥

निस्तरंग कछु उठै न इच्छा । सबमें पारब्रह्म उत पेच्छा ॥

पांच पचीश न कबहूँ धावै । निशिबासर प्रभु संग रहावै ॥

पांचौ इंद्रिय लिप्त न होई । ऐसे साधु विरले कोई ॥

गृहस्त जीवन में बासा लेई । उत्तम ठौर कुटी कर देई ॥

मानुष तहां दृष्टि नहिं आवै । आसन उत्तम तहां बिछावै ॥

प्रथम धरणी पर धरे मृगछाला । तापर कुश साथरी रसाला ॥

तेहि पर बैठे हठ करि आसन । कैसो भांति न होइ उदासन ॥

खंभा सम आसब हठ आसन । सुरतिनिरति ले नाम संभारन ॥

जो यतने में आतम दरसइ । सो ज्ञानी प्रभु पूर्ण परसइ ॥

ऐसे जो कोई ध्यान लगावे । बहुरि योनि संकट ना आवे ॥

उग्रगीता

( २३ )

साधै निद्रा हार व्यवहारा । बहुत न मूदे नैन उघारा ॥ संयम कै सो साधन करई । सो साधू आपहि निस्तरई ॥ मन कह ज्ञान ध्यान में राखै । सुरति निरति सो अमृत चाखै ॥ जो मन अन्त न धावा चाहे । घेरि घेरि अभ्यन्तर बाहे ॥ तब अर्जुन अस पूछन लागे । यह मन चञ्चल पल पल भागे ॥ यह तौ काहू जाइ न पकरा । कौन उपाय जाइ मन जकरा ॥ गगन वाइ जो गर्जत आवै । कैसे गगरी माहि समावे ॥ यहि विधि मन चञ्चल यह भाई । तौ कैसे यह पकरन पाई ॥

श्रीभगवानुवाच

कृष्ण अर्जुन सो कहेउ बुझाई । ऐसे चञ्चल अस्थिर भाई ॥ जो यह मनको साधन करई । अभ्यन्तर लै फिरि २ धरई ॥ चारों दिशा चलन नहि पावै । जबै चलै तब माह समावे ॥ पारब्रह्म देखै तब नेता । दोई अनन्द परम सुख चैता ॥ दीन दुखित कह दाया करई । अपनासा दुख चितमें धरई ॥ दया भावसो हितकर बोले । तूस करै साधुन कह सो ले ॥ परका दुःख नेवारै सोई । ऐसी भक्ति परम गति होई ॥

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहै सुनु कृष्ण सुरारी । तारण तरण भक्त हितकारी ॥ ऐसा साधु कोइ ना देखा । आपनसा दुख सब कहपेखा ॥ आपन सुख चाहे सब कोई । औरन दुःख होय सो होई ॥

श्रीभगवानुवाच

अर्जुन जो है परम सनेही । आप निकरि नहि जानहिदेही ॥ पर सुख कारण आपु निरासा । दुख सुख देखै सकल तमाशा ॥ भक्ति करै जो मन चित लाई । ताते परम पदहि में जाई ॥ निर्गुण साधु जो पूर्ण ज्ञानी । ताकी महिमा वेद बखानी ॥ वेद पुराण ते अधिक है सोई । ताकी पटतर वेद न होई ॥

( २४ )

बोधसागर

वेद भाव संसार पसारा । परमभक्ति है अगम अपारा ॥ तुम हू भक्ति करौ मन लाई । छांड़ौ माया मोहहि भाई ॥ छठौ अध्याय इहां लगु कहिया । आतम संयम योग जो रहिया ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर यह आतम जानी । इतने अधिक बखानों ज्ञानी ॥ धर्मदास तुम ज्ञान उजागर । तुम तौ बसि हौ सुखके सागर ॥ यह करनी जो कृष्ण बखानी । यह विधि धरै आतम ज्ञानी ॥ मैं तो ज्ञान अगम तोहि दीन्हा । काल कर्मको पापउ चीन्हा ॥ ताते हंसा हट करि लेऊ । अगम अगोचर दीन्हेट भेऊ ॥ यह मन चञ्चल थिर नहि होई । कैसिहु विधि जो चाहे कोई ॥ ताकी विधि मैं प्रगट सुनाऊँ । मनुवां इस्थिर करि दिखलाऊँ ॥ यह मन पानी रूप सरूपा । बुद्धि धाम पृथ्वी कर रूप ॥ चित जो वाइ सरूपी होई । अहं अज्ञानी रहै समोई ॥ पानी मही बराबरि भाई । चित्त पवन लै आहु उठाई ॥ ज्यों २ पवन चले झक झोलै । त्यों२ मनुवाँ चहुँ दिशि डोलै ॥ ताते यह उपचार सुनाऊँ । मनुवाँ कह अंतर ठहराऊँ ॥ मनु पावना लै त्रिकुटी लेखै । अक्षर सुरति अमीरस चारै ॥ जौ लौ पवन रहित नहि होई । तबलगिमनअस्थिर नहि सोई ॥ गगने पवन रहै पुनि भाई । त्रिकुटी गागरि लेइ समाई ॥ पानी पवन संच जब होई । ब्रह्म अग्नि उपजावै सोई ॥ मन औ पवन होइ जब मेल । परम पुरुष ते होइहि मेल ॥ ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । तब यह मनुवां सहज समाई ॥ छन्द—चलत मनुवाँ अचल कीन्हो पवन अस्थिर जब भई । मन पवन जब मला भया अमृत धारा बर्षही ॥

उग्रगीता

( २६ )

जिन्है सतगुरु शब्द मिलिया अमी सो हंसा पिया । अजर अमर शरीर पायो बास सुख सागर लिया ॥ सोरठा-संत करो विवेक, शब्द सार गहु बूझिकै । सुरति निरति सो देख, सतगुरु शब्द अपार जो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

कृष्ण कहैं अर्जुन सुनि लीजै । भक्ति हमारी मन चित दीजै ॥ सतये अध्याय जो तुमसों कहउँ । भक्तनमें हितकारी रहउँ ॥ मैं ही करौं करावौं भाई । तीनि लोक जहँ लगि निर्माई ॥ मैं संधारौं मैं प्रतिपारौं । चौदह भुवन पलकमें टारौं ॥ जहँ लगि पशु पक्षी जिव होई । मैं सबही मैं रहौं समोई ॥ दानपुण्य आदिक सब माहीं । बनज व्यापार करै सब पाहीं ॥ देवी देव सकलौं मैं सब ही । भवसागर सकलौं जग हम ही ॥ तीनि लोकमें विजय मैं सारौं । जब चाहौं तब बेर संधारौं ॥ करौं संधार सृष्टि पुनि सोई । रहौं अलेप निरंजन होई ॥ सगुणते निर्गुण मैं होइ जाऊं । फिर चाहौं सगुण होइ जाऊं ॥ सगुण औ निर्गुण रूप हमारा । जहिंते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥ अर्जुन सबमें मोही जानो । कहा हमारा निजकै मानो ॥ चारि प्रकार भक्ति जो होई । तामें ज्ञानी अधिक सो होई ॥ रोग दुःखमें भक्ति जो करई । दुख कारण जो मोहि सुमिरई ॥ दीन दुखी निशिदिन लव लावै । कब प्रभु मोकहैं भोग भोगावै ॥ द्रव्य चहै जो द्रव्यहि स्वारथ । ज्ञानी चाहै मुक्ति पदारथ ॥

( २६ )

बोधसागर

ज्ञानी सदा मोहि पहिचानै । मेरी भक्ति सदा सुख मानै ॥ ज्ञानी अधिक ताहिते होई । भक्ति हि हेतु अधिक है सोई ॥ अज्ञानी मोहि नर ही जानै । अलख रूप मोहि नहिं पहिचानै ॥ पूर्ण ज्ञान होइ जब भाई । तब ही निर्गुण अलख लखाई ॥ देवी देवा सब नर पूजै । तिनहींको करता करि बूझै ॥ उनकी प्रीति देव होइ जाऊं । उनकी मनकामना पुराऊं ॥ कोइ न बूझै ख्याल हमारा । रहउँ सृष्टि पुनि करें संघारा ॥ ज्ञान विज्ञान योग जो होई । सतवांध्याय सुनायो सोई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर जगकरता आही । धर्मदास तुम चीन्हौ ताही ॥ पुरुष तीन लोक यह दीन्हा । तीनिहुँ लोक राज इन कीन्हा ॥ सब जग माँहि कर यह राजू । मन इच्छा कर सबका काजू ॥ इनते मुक्ति कहौ कस होई । देखहु आतमज्ञान कैसोई ॥ इनते मुक्ति होइ जो साजा । देह धरावै कवने काजा ॥ धर्म अधर्म जीव अरुझाया । आवागमन महा दुख पाया ॥ आवागमन न छूटै भाई । तीनिलोक राखै लपटाई ॥ धरि अवतार जबै जग आवै । सकल सभा ऐसी हि भरमावै ॥ सृष्टि जहां लगि है संसारा । ऐसी भांति सब अवतारा ॥ काहू मुक्ति होइ नहिं भाई । राम कृष्णते को बड आही ॥ उनहू आवागमन न छूटै । धर्मराज फिरि २ जग लूटै ॥ धर्मराज यह खेल पसारा । औघट घाट मूँदि सब द्वारा ॥ तीन लोक ते जाने न पावै । स्वर्ग मृत्यु पाताल रहावै ॥ धर्म कर्म ते स्वर्ग हि जाई । धर्म घटे मृत्यु मंडल आई ॥ जैसे घरिया रहट सुभाऊ । ऊँचे नीचे फिरि २ आऊ ॥ बन्धनते छूटै नहिं पावै । ऐसे जीव सदा भरमावै ॥

उग्रगीता

( २७ )

सद्गुरु चौथे लोक निवासा । मिलै अँकुरी जो निजदासा ॥ सार शब्द है तेहि पहुँचाऊँ । तीनि लोक बन्धन मुक्ताऊँ ॥ पावै सार शब्द निज बीरा । पहुँचै लोक जब छुटै शरीरा ॥ यमराजा तेहि निकट न आवै । चौरासी ते जीव छोडावै ॥ सार शब्द गहै निज डोरी । उतरे हंसा घाट करोरी ॥

छन्द-धर्म सेवा बहुत कीन्हो पुरुष दीन्हो राज हो ।

लोक तीनों राज पायो गर्वते अति गाज हो ॥

घाट अवघट सबै भूँदो कतहुँ नाहिं निकास हो ।

पुरुषते दुइ ठानिकै सब जीव राखो पास हो ॥

सोरठा-ऐसी युक्ति बनाई, पाप पुण्य फंदा रच्यो ।

चले लोक सो जाइ, सद्गुरु शब्द प्रताप जेहि ॥

इति श्रीमदुग्रगीताज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अथ अष्टमोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहै सुनौ प्रभु मेरे । मैं तो अधीन सदा हौं तेरे ॥

कहौ बखानि ब्रह्मको आही । सो निज भेद कहौ मोहि पाही ॥

अध्यातम तुम कहौ बुझाई । कर्म नाम काहैको रहाई ॥

अदभुत रूप बखानौ सोई । कछु मोसों जनि राखौ गोई ॥

अर्धनाम कहावै सोई । अर्धनाम जग काकर होई ॥

श्रीकृष्ण उवाच

कहैं कृष्ण सुनु अर्जुन भेदा । तुमसों कहौ मैं वेद निषेदा ॥

ब्रह्म सदा जो रहै अविनाशी । और स्मृष्टि सकलौ पुनि नाशी ॥

रहित नाम अविनाशी होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥

( २८ )

बोधसागर

ना कहुँ आवै ना कहुँ जाई । सब घट माही रह्यो समाई ॥ नहीं टण्टि देखन महाँ आवै । सकल सृष्टिके माहिँ रहावै ॥ रूप वरण कछु वरणि न जाई । कोटि सूर्य तेहि तेज समाई ॥ तिनका नाम सदा अविनाशी । रहै निरंतर अंतरबासी ॥ अक्षय है सब जक्त पसारा । व्यापक रूप रहा भरभारा ॥ तिनकी भक्ति करे जो कोई । आवागमन कबहुँ नहिँ होई ॥ अध्यात्म आत्म सो ज्ञानी । सबमें ऐकै ब्रह्म समानी ॥ कर्म नाम करता है सोई । दुख सुख कारण करता होई ॥ अद्भुत रूप सरूप है भाई । तेहि समान रूप नहिँ भाई ॥ कोटि सूर्यको तेज समाही । अर्द्धदेव सब देवन माही ॥ रहो समाइ जो सकलौ छाई । अर्द्धनाम सकलौ जग लेई ॥ व्यापक सदा सकलमें सोई । महा प्रलय जब आवै भाई ॥ लै सौ वर्ष अवधी रहई । रेनि दिवस छै मास जो होई ॥ दिवस एक देवन कर सोई । छः मास अवर जब जाई ॥ राति एक ताकर होइ भाई । ऐसे वर्ष दिवस नर होई ॥ दिवस एक देवनकर सोई । तासे मास वर्ष गनि लेई ॥ ऐसे वर्ष देवकर कहिया । अहनिशि एक ब्रह्म पुनि तहिया ॥ दिवस एक ब्रह्माकर होई । चारि पहर चारिउ युग सोई ॥ रातिउ ऐसे जान सुभाऊ । बरतै चारिउ युग पर भाऊ ॥ दिवस औ राति जब ऐसो जाई । पक्षमास पुनि वर्ष कहाई ॥ सात वर्ष ब्रह्मा पर वानी । काल आइ सो करै तब हानी ॥ ब्रह्म प्रलय जब आवइ भाई । रोमस रोम परै खहराई ॥ जब २ प्रलय काल जब आई । एक रोम रोमस गिरिजाई ॥ बहुत प्रलय ऐसे चलि गयऊ । आदि अंत काहुँ नहिँ पयऊ ॥ अष्ट अध्याय जो कहा बखानी । अक्षर ब्रह्म योग है ज्ञानी ॥

उग्रगोत्रा

( २२ )

कहै कबीर सुनु धर्मनि धीरा । ब्रह्म भेद तुम गहिर गभीरा ॥ जो यह कछु प्रभाव बखाना । पै निर अक्षर भेद न जाना ॥ जो निर अक्षर भेद न जानै । कैसे सार शब्द पहिचानै ॥ जो निर अक्षर भेद हि पावै । सो त्रिलोक बंधन मुक्तवै ॥ अक्षर सार अपार जो होई । बिनु सत गुरु पावै नहि सोई ॥ सतगुरु मिलै शिष्यको जबही । सार शब्द पावै पुनि तबही ॥ हंस रूप ताकर पुनि होई । सो तौ हंस निनारा सोई ॥ यह जाने नहि ताकर भेदा । कितनौ पढ़ै नर चारिउ वेदा ॥ सार शब्दका मर्म न पावै । सो कैसे सत्यलोक सिधवै ॥ जो मानै तेहि लोक पठाऊ । सार निरक्षर अलख लखाऊ ॥ खान प्रवान शब्द टकसारा । यमको चीन्है उत्तरे पारा ॥ घटवारा जब पावै चीन्हा । तब हंसन कह आवै दीन्हा ॥

छन्द--सुरतिमंत जो हंस होवै ताहि दीजै पान हो । नत दशौ दिशा घाट रोकै मागि शब्द निशानि हो । देखि हैं जब शब्द सांचा चीन्ह पावै लोकको । अपने कंधे तेहि उतारैं मेटि संशय शोकको ॥

सोरठा--धर्म हमहि सो कौल, कीन्हो अति आधीन हो । हंस शब्द सत बोल, निमिष माहि पहुँचाइया ॥

इति श्रीभदुग्रगीताम्बराज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादस्य-

रयोगव्याख्यानोनामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

अथ नवमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अर्जुन शास्त्र मतो है नीका । कर्म धर्म सब कारज जीका ॥ शास्त्र वेद पुरान जो आही । मन वच कर्म अर्जुन गहु ताही॥

( ३० )

बोधसागर

बहुत लोग मानुष मोहि जानै । दुख सुख व्यापक माही सानै ॥ बड़े भाग सो प्रानी होई । अन्तर पवन रहौं मैं सोई ॥ पवन सकल में बतै भाई । बाहर भीतर फिरै सदाई ॥ लित होइ पुनि रहै निनारा । ऐसा अदभुत खेल हमारा ॥ बहुत साधु एक करि पूजे । सर्व मध्य आत्म कहबूझै ॥ बहुतक प्रीति भाव जो जानै । साहेब सेवा हित कै मानै ॥ बहुतक तीनो देवन मानै । अवर सकल मिथ्या करि जानै ॥ मोकहयहि बिधि जो कोइ ध्यावै । तेहि विधि माह परम सुख पावै ॥ सर्व व्यापक मैं हौं भाई । मोहि विन दूजा और न कोई ॥ मेरे मित्र दुष्ट नहिं कोई । जो ध्यावै पावै पुनि सोई ॥ एक भाव मैं सबसो रहेऊ । जैसे अग्नि भाव सो कहेऊ ॥ जबै काल जड़ आवै भाई । बैठे लोग तापन कह आई ॥ चहुँदिशि लोग अग्नि बिच होई । सब तापै काया नर लोई ॥ अग्नि काहु कै मित्र न जानै । और न काहु दुष्ट हि मानै ॥ सब कह लागै एक सम भाई । ऐसे रहौं मैं सहज समाई ॥ जो कोइ पूजा देवन लावै । सो नर देव के लोक सिधावै ॥ जो ऐसा होइ भक्त हमारा । ता कह पठवउँ स्वर्ग दुवारा ॥ जो कोइ मोसे चित्त लगावै । सुख संपति बहु शोभा पावै ॥ ऋद्धि सिद्धि बहुतैं कै देऊं । आपन कै मैं ताकह लेऊं ॥ सदा सर्वदा बात न हेरूं । दुख संताप ताहि कर फेरूं ॥ अर्जुन परम भक्ति मोहि भावै । जो कोइ मोसों मन चितलावै ॥ नौ अध्याय इहां लगु होई । राज योग गून है सोई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । बहुविधिकृणजो करै तमासा ॥ कर्म धर्म कहि जग समुझावै । अलक पुरुष कैसे लखि आवै ॥

उग्रगीता

( ३१ )

ज्ञानवंत तुम धर्म निआगर । सत सुकृत गहु परम उजागर ॥ करौ विचार संतकी रीती । मन वच करु सतगुरु परतीती ॥ इन्ह तौ शास्त्र ज्ञान विचारा । कम फंद जीवनह सब डारा ॥ कोइ भक्ति जो इनकी करई । ऋद्धि सिद्धि सुख संपति लहई ॥ बहुत भांति तेहि देइ बड़ाई । राज पाट इन्द्रासन लाई ॥ आवागवन न मेटा जाई । बहुविधि चीन्हो मन चितलाई ॥ दाता भुक्ता होवे आपै । पै कोऊ नहि छूटा पापै ॥ आवै जाइ सकल जग लोई । कबहुँ न छूटै बंधन सोई ॥ बहुविधि चीन्हो मन चितलाई । आवागवन न मेटा जाई ॥ बंधन सतगुरु तुम्हरो तोरा । तुम कह नहि व्यापै यमचोरा ॥ सतगुरुका है पंथ अपारा । जो बूझैं सो उतरे पारा ॥

छन्द-धर्मदास तुम बूझि देखो भेद सतगुरु अगम है ।

तीनि लोक अरुझाइ कारण वेद शास्तर सो कहै ॥

बूझि देखो अंग सब मैं आयों तोरन फंदको ।

हंसको मुक्ताय यमसो मेटिहौ दूख द्वंदको ॥

सोरठा--सतगुरु शब्द अपार; वार पार कोइ ना लहै ।

हंस शब्द आधार, ताहि मुक्ति पाछे फिरै ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

राजदिवाराजगुणयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

महाबाहु अर्जुन सुतु भाई । दस अध्याय कहेउँ अर्थार्ई ॥ विभूति योग मैं तोहि सुनाऊं । सकलरूप तोहि वरनि सुनाऊं ॥ जल थल पूरण मैं ही व्यापो । कीट पतंग सर्वमें आपो ॥

( ३२ )

बोधसागर

मेरी गति मति कोइ न जाने । सबै सृष्टि नारायण मानै ॥ ऋषि मुनि देव देवता भाई । उनहू मेरी गति नहिं पाई ॥ मैं तो गति मति सबकी जानौं । व्यापि रह्यो मैं सकल जहानौं ॥ देवि देवता आदि जो मैं ही । ऋषि मुनि सृष्टि अवतार जु लेही ॥ मोहिते आदि और नहिं कोई । सबके आदि करा रचि सोई ॥ पिताकी खबरि पुत्र नहिं जाने । कैसे पितुकी आदि बखानै ॥ आदि अन्तको मेरी पावै । जग रचना सब पुत्र कहावै ॥ विभूति रूप संक्षेप जो कहिया । अर्जुन पूछ कृष्ण पुनि कहिया ॥ सब व्यवहार विभूति सुनावौ । रंचक मोसे कछु न दुरावौ ॥ कृष्ण कहै सुनु कुंतिकुमारा । तोसों कहौं सकल विस्तारा ॥ पहिले सकल जोति जग जो है । शाशि सूर्यकी कीरनि मोहै ॥ सूर्य रूप मेरो है भाई । दूजा भाव जनावौ जाई ॥ शीतल पूरण निर्मल चंदा । है मेरो यह रूप अनंदा ॥ बलीदान यज्ञ जो ठानो । बावन रूप मेरो पहिचानो ॥ सिरजा पवन सबै सुखदाई । मैं ही पवन रूप हौं भाई ॥ चारि वेदमें साम जो वेदा । मेरो रूप सुनो तुम भेदा ॥ व्यास रूप मेरो है भाई । नारद भाव धरउं मैं आई ॥ देवन माहिं इन्द्र पुनि मैं हौं । दानी बलिराजा सो मैं हौं ॥ विषधर माहिं वासुकी हम ही । ईश्वर माहिं महेश्वर हम ही ॥ इन्द्रिय भुक्तौ मनसो मैं ही । राजन माहिं राज करौं मैं ही ॥ मिरगन्ह मध्य सिंह गति मेरी । वृक्षनमें पिप्पल मोहिं हेरी ॥ नदी माहिं हम ही हैं गंगा । समुद्र रूपमें लहरि उतंगा ॥ मुनिवर कपिल हमी हैं भाई । परशुराम योधा हौं भाई ॥ नरसिंह रूप जो मेरो होई । रामचन्द्र तन रूप जो सोई ॥ दत्तात्रय आनंदित रहऊं । ऋषिन मध्य पाराशर अहऊं ॥