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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

राजाका शिकार खेलने जाना - पानी न मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर साहबका बाग प्रगट करके राजाका सेनासहित प्राण बचाना

बोधसागर

(१०५)

राजा वीरसिंह वचन

तब राजा अस वचन उच्चार । हम सँग साहिब चलो शिकारा ॥
आगे सेना सबही ठाडे । हस्ती घोडा बाहर काटे ॥
आगे चले निशान नगारा । सवा लक्ष सँग चले असवारा ॥
सवा लक्ष द्रव्य प्यादा दौरा । ठाडे भौंट करत बड शोरा ॥
हरनी स्वान लीन सँग चीता । कोइ सचान वाज कर लीता ॥
बहु दल हस्ती लीनी साथा । यहि विधि चले शिकार नरनाथा
भौंतिन भौंति खिलौना लीना । आयसु सकल लोक कहँ दीना ॥
आगे सेन चली सब साजा । हस्ती बैठि चले गुरु राजा ॥

कवीर वचन

जबही राजा चले रिगायी । तब हम तासों बात सुनायी ॥
राजा संग मोहि ले जाओ । जीव एक मारन नहि पाओ ॥
कोटिक यतन करो तुम राजा । जीवन मिलै होय तोहि लाजा ॥

राजा वीरसिंह वचन

तत्क्षण राजा वचन सुनावें । मारन कहौ तोहि जाइ चुकावें ॥
तब हम कहा हमका कहहीं । यह नहि धर्म मनुषकर अहहीं ॥
यह सुनि राजा घोड कुदावा । शेर शिकारी रूप बतावा ॥
एको जीव फन्द ना परई । क्रोध अग्नि घट भूपति जरई ॥
खेलेत रमत दूर होय गयऊ । कितहुँ न भेंट जीवसे भयऊ ॥
फिरत अहेरे परे भुलाई । कतहुँ न ठौर नीर कहँ पाई ॥
विना नीर सो तडपे राजा । व्यापी तृषा बने नहि काजा ॥

साखी-बहुत दूर राजा गये, पीछे फिरे भुआर ॥

कटक सकल सबही फिरे, व्याकुल सबै अपार ॥

ग्रंथकर्ता अथवा परचात् के लेखक महाशयकी बलिहारी है, शिकारके लिये इतनी तैयारी
बतलायी है ।

(१०६)

बीरसिंह बोध

पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥
राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥
बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥
ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥
राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥
पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥
जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥
सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥
अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥
व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥
तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥

साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥
छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥

चौपाई

तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥
बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥
विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥
विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥
विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥
मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥
करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥
गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥

बोधसागर

(१०७)

गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥
याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥
सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥
नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥
नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥
नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥

छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥

चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥

खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥

कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥

सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥

बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥

चौपाई

ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥
इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥
तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥
उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥
कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥
यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥
बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥
साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥

१ महल

(१०८)

बीरसिंह बोध

दीवान वचन

राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥
कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥
का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥
जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥

कबीर वचन

तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥
सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥
राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥
चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥
दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥
राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥
सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥
अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥
भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥
ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥
हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥
बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥
पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥
सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥
अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥

बोधसागर

(१०९)

साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥
गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥

चौपाई

करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥
कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥
मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥
राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥
जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥
खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥
लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥
फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥
परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥
ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥

साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥
मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥

कबीर वचन-चौपाई

तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥
होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥
अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥
वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥
सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥
हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥

राजा बीरसिंह

राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥
अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥

राजाका कबीर साहबका शिष्य होना

(११०)

बोरसिंह बोध

अब मन जनि दाय करि जानो । हम सेवक तुम निज कै मानो ॥
राय प्रतीति बहुत मन भाई । देखि प्रीति चलन फरमाई ॥
कुंजर राय भये असवारा । ले हमहीं पुनि तहाँ बैठारा ॥
सब सेनाकी भयी तैयारी । बजा निशान लगी नहिं बारी ॥
ततक्षण राय वचन कहि दीना । भरि भरि वर्तन सबही लीना ॥
छोड़ि सरोवर चले रिंगायी । क्षणहि सरोवर छार उडायी ॥
जब राजा पुनि पाछे निहारा । नहीं सरोवर उड़ैं तहाँ छारा ॥
देखत राजा चकित न थोरा । मँम पद गहि चित्त बहु मोरा ॥

साखी-धन्य कवीर सरोवर रची, दलहिं लीन ज़िवाय ॥

जहवाँको जल लायक, तहाँको दीन पठाय ॥

चौपाई

आगे मोहि करि जबही लीन्हा । तब पीछे राजा पग दीन्हा ॥
चले राय महल पग दियऊ । सतगुरुको आगे करि लयऊ ॥
मन्दिर कञ्चन पलंग बिछावा । लै सतगुरुहि तहाँ बैठवा ॥
मानिक देह रानी चली आयी । कहै राय रानी गहु पायी ॥

राजा बोरसिंह वचन रानी प्रति

चरण टेकि चरणामृत लीजै । गुरुकी दया अमृत रस पीजै ॥
लोक लाज तुम तजहु बडाई । गुरु कवीरकी शरणे आई ॥
गुरु कृपा होय दास पर जबहीं । काल त्रास ना ब्यापे तबहीं ॥
ज्ञान भक्ति विन गुरु न पावै । काल फन्द स्वपने नहिं जावै ॥
सर्गुण भक्ति जगत बतलावे । निर्गुण भक्ति गुरुसे पावे ॥
विन निर्गुण नहिं जीव छुटावे । बार बार यम फन्द परावे ॥
छन्द-गुरु कृपा होय जेहि दासपै तेहि काल त्रास न ब्यापई ॥
गुरु भक्ति मुक्ति दाता भक्त त्राता छुटै जीव तहाँ तापई ॥

१ मेरे पग पर पड़कर मनके अभिमानको छोड़ दिया ॥

बोधसागर

(१११)

संशय हरन अघ कर्म दाहन है सदा हंस सहाय हो ॥
गुरु पह मते अपवर्ग वासा पुरुष लोक सिधाय हो ॥

चौपाई

सरवर एक रचे गुरु तहवाँ । पर्वत ऊपर जल नहिं जहवाँ ॥
बाग एक रच्यो तेहिके तीरा । निर्मल जल बहै त्रिविध समीरा ॥
नाना भांती तरु जेहि माहीं । सुर पादप तेहि देखि लजाहीं ॥
कदम्ब निम्ब अम्ब कचनारी । वडहल बेल बदाम सुपारी ॥
नाना रंग फुली फुलवारी । फल रस भरे झुकी सब डारी ॥
रानीसे अस कहि सो राजा । विन्ती करन लगा जिवकाजा ॥

राजा बीरसिंह वचन

चरण टेकि राजा कहे बाता । भये दयाल दयानिधि दाता ॥
आवागमन रहित करु मोही । अब मैं खसम चरण गह्यो तोही ॥
मो कहैं अपना लोक दिखाओ । अब हम धरयो तुम्हारो पाओ ॥

कबीर वचन

सत्य प्रतीति जब राजहिं देखा । बहु विधि ताकी कीन परेखा ॥
श्रवण लागि निज नाम सुनाया । तुरतहिं राजा लेइ सिधाय ॥
तबहीं दूत रोक गहि बाटा । छलन दूत बैठा तहाँ नाटा ॥

दूत वचन

साहब तुम निर्मल असवारा । भुईं तरे कहवाँ पगु धारा ॥

कबीर वचन

तबै हम दूतनसे कहेऊ । यह जिव नाम खसम कर रहेऊ ॥
इतना सुनत दूत उठि भागा । देखत नृपति भयो अनुरागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

धन्य सतगुरु धन्य भक्ति तुम्हारी । धन्य हंसा जेहि शब्द उचारी ॥
चले हम अरु राय तेहि ठौरा । जहँवा गम पावत नहिं चौरा ॥
पहुँचे मानसरोवर जायी । शोभा कामिनि बहुत सुहायी ॥

(११२)

बीरसिंह बोध

युत्थ युत्थ बैठी सब पाँती । एक रूप तहवाँ नहिं जाती ॥
चार भानु कामिनिकी काँती । नहिं तहँ दिवस नहिं तहँ राती ॥
राजा परे चरणतर आयी ।

राजा बीरसिंह वचन

। दयावंत भल कोक दिखायी ॥

कबीर वचन

देखिनि राय लोककी शोभा । चकित होय राजा मन लोभा ॥
पुनि राजा कहन अस लागा । देखि लोक लोभ महाँ पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब जनि लेह चलो संसारा । राखो लोक शरण मंझारा ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनु राय सुजाना । तुम राजा सत्यलोक भुलाना ॥
राजा मानो कहा हमारा । चलो तहाँ जहाँ राज तुम्हारा ॥
बरबस बाहँ गही तब राई । ले राजा तहँवा बैठाई ॥
छिन यक गहर तहाँ नहिं कियऊ । देह जायके जागृत भयऊ ॥
दोय कर जोरि राय रहे ठाढे । बहुत प्रेम हरष मन बाढे ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब लगि साहब मैं नहिं जाना । सकल भक्त सम तुमको माना ॥
अब हम जाना भेद तुम्हारा । सोई करहु जेहि हंस उबारा ॥
राजा कहे कौन विधि करऊँ । सकल द्रव्य गुरु चरणे धरऊँ ॥
जाते जीव कालते बांचे । सोई जतन करो गुरु सांचे ॥

कबीर वचन

तब हम कहा होहु निर्वाना । राय मँगाव मिठाई पाना ॥
चौका जुगति करो सब साजा । देउ सार पद मेटो लाजा ॥
नरियर धोती पान मँगाओ । महा कन्द ले तहाँ धराओ ॥

राजा वीरसिंहका गुरुस्तुति करना

बोधसागर

(११३)

कलश ले अरु पांचो बाती । साधु संत बैठे बहु भांती ॥
कंचन झारी जल धरवाई । तापर खरचा सात चढाई ॥
स्वेत चँदेवा स्वेत कनाता । सत्यपुर कह सूकृत वाता ॥
सत्यलोक स्वेत है फूला । स्वेत सब देह जीवका मूला ॥
स्वेत सिंहासन चौका चारी । सतगुरु बैठे आसन मारी ॥
कदली पत्र मेवा संयूता । चन्दन श्वेत सुगन्ध बहूता ॥
राजा सकल साज लइ आये । साधु संत बैठे सब आये ॥
विधिपूर्वक शुभ चौक पुराया । हाथ जोरि ठाढा भयो राया ॥
बोले साधु शब्द धुनि तबहीं । रानी राय चरण गहे जबहीं ॥

राजा बीरसिंहका सतगुरुकी स्तुति करना

राजा लीन्ह नारियर हाथा । बहुत जीव तहाँ भये सनाथा ॥
करी दंडवत विन्ती कीना । हंस राज मोहि दर्शन दीना ॥
धन्य भाग मम काह सराहू । हे प्रभु तुम हौ सत्य मम नाहू ॥
छन्द-आनन्द कन्द सर्वज्ञ रूप अखिल ज्ञाता अविगतं ॥
दास जानि दीजै अभय पद ज्ञानदाता अस्थितं ॥
अविनाश सागर-दयाके आगर धर्म कंटक मर्दनं ॥
संशय खण्डन रिपुविहंडन अजर वीरा सुमिरावैनं ॥
सोरठा-अमर पुरी तुव बास, अमर स्वरूपी हंस जहँ ॥
वास दीजिये दास, सुरतिवंत प्रभु कीजिये ॥

कबीर वचन-चौपाई

करि चौका तब नरियर मोरा । करि आरती भयो पुनि भोरा ॥
तिनका तोरि पान लिखि दयऊ । रानी राय अपन करि लयऊ ॥
बहुतक जीव पान मम पाये । ताघट पुरुष नाम सात आये ॥
जो कोइ हमारा बीरा पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥
बीरा पावे भवते छूटे । विनु बीरा यम धरि २ लूटे ॥

कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त राजासे कहना

(११४)

बीरसिंह बोध

सत्य कहूँ सुनु धर्मदासा । विनु बीरा पावै यम फांसा ॥
बीरा पाय राय भय भागा । सत्य ज्ञान हृदयमें जागा ॥
काल जाल तब सबै पराना । जब राजा पायो परवाना ॥
गद्गद् कंठ हरष मन बाढा । विनती करै राजा होय ठाढा ॥
प्रेमाश्रु दोइ नयन ढरावै । प्रेम अधिकता वचन न आवै ॥

राजा बीरसिंहका स्तुति करना

करुणारमन सद्वरु अभय मुक्तिधामी नाम हो ॥
पुलकि सादर प्रेम वश होय सुधरे सो जीवन काम हो ॥
भवसिन्धु अति विकराल दारुण तासु तत्त्व बुझायऊ ॥
अजर बीरा नाम दै मोहि पुरुष दरश करायऊ ॥
सोरठा-राय चरण गहे धाय, चलिये वहि लोकको ॥
जहवाँ हंस रहाय, जरा मरण जेहि घर नहीं ॥

कबीर वचन

आदि अन्त जब नहीं निवासा । तब नहिँ दूसर हते अवासा ॥
तौन नाम राजा कहँ दीना । सकल जीव आपन करि लीना ॥
रायं श्रवण जब नाम सुनायी । तब प्रतीति राया जिव आयी ॥
सत्यपुरुष सत्य है फूला । सत्य शब्द है जीवको मूला ॥
सत्य द्वीप सत्य है लोका । नहीं शोक जहाँ सदा अशोका ॥
सत्यनाम जीव जो पावै । सोई जीव तेहि लोक समावै ॥
ऐसो नाम सुहेला भाई । सुनतहिँ काल जाल नशि जाई ॥
सोई नाम राजा जो पाये । सत्य पुरुष दरशन चित लाये ॥
साखी-ऐसो नाम है खसमका, राय सुरति करि लीन ॥
दर्षित पहुँचे पुरुष घर, यमहिँ चुनौती दीन ॥

चौपाई

जब हंसा यम छेके आयी । चलत बेर निज मना सुनायी ॥
मंडल अखण्ड ब्रह्मण्डे बासा । नीर पवन हंस रहिवासा ॥

बोधसागर

(११५)

सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥
फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥
हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥
तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥

साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥
दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥

चौपाई

धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥
तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥
युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥
प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥
तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥
पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥
जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥
नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥

साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥
तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥

राजा बीरसिंह बचन-चौपाई

साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥
औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥
दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥
महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥
ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥
भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥

राजाका अजर नाम चौका करनेके लिये ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना और अजर चौका वर्णन

(११६)

अमरसिंह बोध

कबीर वचन

अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥
गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥
बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥
सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥
ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥

कबीर वचन

तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥
पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥
राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥
माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥
भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥

राजा बीरसिंह वचन

राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥
सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥
एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥

बोधसागर

(११७)

ब्राह्मणी वचन

छन्द-माइ पुत्री करइ विन्ती धोती नाथ अनाथकी ॥
गाव सुल्क नहिं चाहीं मोहि धोती अहे जगन्नाथकी ॥
हम दीन हैं आधीन भिक्षुक शीस बरु मम लीजिये ॥
करि जोडि विन्ती मैं कहूं जस चाहिये अब कीजिये ॥

कबीर वचन

सोरठा-राजा घरहिं सिधाइ, टेके चरण तहैं खसम कर ॥
कहे उत्तर समुझाय, धोती मांगे न दीनेऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन-बीपाई

साहिब ब्राह्मणी लग हम गयऊ । धोती माँगत हम नहिं पयऊ ॥
कहे धोती मोहि देइ न जायी । जगन्नाथ हेतु धोती बनायी ॥
कहे बरु शीस लेहु तुम राजा । धोती देत होय व्रत अकाजा ॥

कबीर वचन

एती सुनतै हम विहँसाये । राजा कहँ एक वचन सुनाये ॥
छरीदार दोउ देउ पठायी । ब्राह्मणी संग क्षेत्रहीं जायी ॥
यहि प्रतीति लेहु तुम जाका । हम विन धोती लेइ को ताका ॥
राजा छडीदार पठवाये । ब्राह्मणी संग क्षेत्र चलि जाये ॥
नरियर लेइ ब्राह्मणी हाथा । करि अस्नान परसि जगन्नाथा ॥
लै धोती जब परस्यो जायी । तब धोती बाहर परि आयी ॥

ब्राह्मणी वचन

अब यह धोती काम न आयो । धोती फेरि कहो कस लायो ॥

जगन्नाथ वचन

जाके व्रत तुम काति बनायी । सो घर बैठे माँगि पठायी ॥
अब तुम अपने घर लै जाहू । लै धोती दै डालो काहू ॥

१ जगन्नाथपुरीको ।

(११८)

बीरसिंह बोध

ब्राह्मणी वचन

तबै ब्राह्मणी कहै कर जोरी । ठाकुर सुनिये विन्ती मोरी ॥
राय बीरसिंह मो घर आये । धोती माँगि कवीर पठाये ॥
उनके मांगे मैं नहिं दीना । हम कहि जगन्नाथ व्रत कीना ॥
तब राजा अपने घर गयऊ । हम ले धोती इहाँ सिधयऊ ॥

जगन्नाथ वचन

जगन्नाथ तब कहि समझायो । तुम अपनी भल भाँति नशायो ॥
उनके मांगे धोती देती । आपन जनम सुफल कर लेती ॥

कबीर वचन

जगन्नाथ जस कहि समझायी । छडीदार तब लिये अर्थायी ॥
छडीदार अरु ब्राह्मणी आये । जहाँ राय अरु हम बैठाये ॥
ब्राह्मणी ले धोती घर दीनी । दोय कर जोरि सो विन्ती कीनी ॥

ब्राह्मणी वचन

हम अजान कछु जान न जायी । धोती नहिं दीनी मम पायी ॥

छडीदार वचन

छडीदार तब शीस नवाये । राजासे उठि विन्ती लाये ॥
जगन्नाथ धोती नहिं लीना । मंडप बाहर धोती कीना ॥
जगन्नाथ अस वचन सुनावा । यह धोती हम काम न आवा ॥
जब राजा से मांग पठाई । कस ना धोती दीनेउ माई ॥
जब हम मांगा तब ना दियऊ । अब कस देन यहाँ चलि अयऊ ॥

कबीर वचन

छडीदार उत्तर जब कहेऊ । तब मम चरण राय शिर लयऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सांचे सदगुरु हैं तुव वचना । सत्य लोककी सत्य है रचना ॥
अब मोहि धनी सिखापन दीजै । हम पुरुषा आपन करि लीजै ॥
जाते अजर अमर पद पाई । सोई विधि तुम करो गुसाई ॥

बोधसागर

(११९)

कबीर वचन

जब हम राजहिं दीन बुझाईं । अजर आरती साज मँगाईं ॥
वीरसिहराय तब साज मँगावा । बहुत भांति पकवान बनावा ॥
मेवा भांति भांति मँगवायी । भांतिन भांति सुगन्ध धरायी ॥
सकल सुगन्ध खोजकर आने । फूलन माला बहुत बखाने ॥
चौका विस्तार थार मँगवायी । कोरा वासन आनि धरायी ॥
ततक्षण मन्दिर नये सँवारी । नये चन्दोवा कंचन झारी ॥
पाँचो बाती कलस धरायी । तत्छिन सकल साज बनवायी ॥
अगर चौका तब करि दीना । मन प्रतीति राजा गहि लीना ॥
तब राजा अस्तुति अनुसारा । बहुविधि विन्ती करे प्रचारा ॥
छन्द-अजरनामको कीन्ह चौका दिवस चारि विराजिके ॥
अजर सुमिरन कीन्ह ततक्षण पुरुष प्रकटे आनिके ॥
धनी जब ठाढे भये नृप दर्शन तबही लीन हो ॥
धाय राजा चरण गहे प्रभु अधम पावन कीन हो ॥

राजावीरसिंह वचन

सोरठा-तुव चरण बलिहार, पाछिल पुरुषा मम तरे ॥
धनि २ धनी हमार, कागाते हंसा किये ॥

कबीर वचन-चौपाई

यहि विधि प्राणी चौका करईं । कुलमाहीं बहु हंसा तरईं ॥
दिवस चारि चौका विस्तारे । तहँवा आप खसम पगु धारे ॥
निशि वासर सुमिरे निज नामा । छूटे पिण्ड चले निज धामा ॥
रहिहो राजा सुरति लगायी । यकटक ध्यान शब्द मन लायी ॥
शशि चकोर सम गुरु पद लागे । छूटे जनम मरण भ्रम भागे ॥
यही सिखापन राजहिं दीना । मन बच करम राय शिर लीना ॥

राजा वीरसिंह वचन

राजा रहे दोउ कर जोरी । साहब सुनियो विन्ती मोरी ॥

कबीर साहबका मगहरमें बिजुलीखाँके घर शरीर छोड़ना और राजा वीरसिंहका फौज लेकर बिजुलीखाँसे युद्धको जाना

(१२०)

बीरसिंह बोध

पुत्र व्याह कहैं आयसु पाऊँ । तौ साहब हम व्याह कराऊँ ॥
महा कठिन दोनो दिशि धारा । पुत्र काज हम तहाँ विचारा ॥

कबीर वचन

आज्ञा लेइ राय दल साजा । साजि कटक बहु ठाढ भे राजा ॥
तब मम चरण शीस नृप लाये । करन विनय टेके गहि पाये ॥

राजा बीरसिंह वचन

विन्ती कीन भरि करुणा । नहि जानू होय धोखे मरणा ॥
साहब रहिहो सदा सहाई । देह विदेह हंस मुकताई ॥

कबीर वचन

तब हम हाथ सीस तेहि दीना । करुणा कहा राय तुम कीना ॥
तुम तौ राय हंस मम आहू । दीन आशीष निडर होय जाहू ॥
चरण टेकि नृप भये असवारा । चले कटक जब पेलिनकारा ॥
बाजत बंब चले नृप जबहीं । भांति भांति बाजा बाजे तबहीं ॥
साजि बरात राजा चलि गयऊ । लीला एक रचत हम भयऊ ॥
तब हम तन तजि भये न्यारी । रानी चिता रचन मन धारी ॥
रानी बहुत शोच मन कीन्हा । राजा गये गुरु अस लीन्हा ॥
विजलीखाँ सुनि आतुर धाये । चिता माँझते सुरदा लाये ॥
गोर बनाय उन कीन निवाजा । कीन कटोरी बहुविधि साजा ॥

विजलीखाँ वचन

कहत पठान पीर भल लाये । ना तो रानी देत जराये ॥

कबीर वचन

यहवाँ रानी हिय अकुलाती । बीरसिंह देवको भेजी पाती ॥
छन्द-भेजी रानी रायको पाती सदगुरु गये लोक सो ॥
नृप जात गुरु तन तजे मोहि देख भो बड शोक सो ॥
चिता रची मुर्दा धरी तब आय विजलीखान हो ॥
जोर करि करि हमसो ले गये ले गाडि गोरहि दीन हो ॥

बोधसागर

(१२१)

सोरठा-वेगि नृपति चलि आव, सतगुरु काया लीजिये ॥
हँसे लोक बड चाव, नृप गुरु कहिकै म्लेच्छ सब ॥

कबीर बचन

पाती गही देखु जब राया । महाकोध आतुर चलि आया ॥
डारत घृतहि ढुताशन जैसे । रोम रोम पावक वरु तैसे ॥
चले सकल दल छोडि वराता । ब्याकुल राय कहे तब वाता ॥

राजा बीरसिंह बचन

अरे दिवान सुनो मतिवाना । वेगि चलौ गुरु कैसे ठाना ॥
विजुली मारहु शत्रु हमारा । करी विचार बैठ हंकारा ॥

कबीर बचन

आतुर चले बाजि गज धाये । कूड़ुक बाण गहि लीन चढाये ॥
खड्गतुपक औ सेल कटारा । धनुष बान करि वेगि सवारी ॥
कुड़ुक बाण हाथ करि लीना । अगनित बाजा बाजत दीना ॥
ठाढा भांट अनेक पुकारे । गुण वरने चारन बहु पारे ॥
भेजे राय पाँति तेहि बारा । खोदि कबर गुरु देहु हमारा ॥
नहि तो विजली बचे न पाई । एक एकको मारि गिराई ॥
आई पाँति तब कहे पठाना । सुनि विजली गहि लीन कमाना ॥

विजलीखाँ बचन

हिन्दू काफिर पीर न पावे । जान माल जो सब गलि जावे ॥

कबीर बचन

विजली खान सेना ले ठाढा । आपुन दीस बहुत बड गाढा ॥
पीर आपना हम नहि देते । विरसिंह राय करेगा केते ॥
तब हम रानी दर्शन दीना । मानिक दे चरणामृत लीना ॥
छोटी है कमलापति रानी । सो मम चरण पखारे आनी ॥
रानी राय कहा मोहि चीन्हा । मानुष विधि तुम हमकूँ कीना ॥
हाड मांस हमरे नहि काया । काहे दोनों रार बढाया ॥

पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके समयके मार्गका वर्णन

(१२२)

बीरसिंह बोध

राय पठान दोनों गुरु भाई । काहे दोनों करे लड़ाई ॥
पाती भेजहु राय पठाना । खोदि कबर देखो मतिवाना ॥
गोर मांहि सुरदा जो होई । राय पठान लड़ो तुम दोई ॥
जो मुर्दा तुम दूँठ न पाओ । काहेको तुम रार बढाओ ॥
मथुरा रतना कदोइन नारी । तिन बड प्रीति हमारी धारी ॥
सात दिवस लगि अन्न न पावा । हमरे दरस को सुरति लगावा ॥
ताको दर्शन दिये हम जाई । काहे मरो दोऊ गुरु भाई ॥
अन्तर्धान तब हम होइ गयऊ । तत्क्षण रतना दर्शन पयऊ ॥
यहाँ राना पाती पठवायी । राय देखि अचरज मन लायी ॥
गये बाँचि जहाँ रहै पठाना । सुनत पठान अचम्भो माना ॥
सुनत सलाह कीन पुनि दोई । राय पठान आये सब कोई ॥
आइ पठान गोर खुदवाई । देखो तहाँ देह नहीं पाई ॥
भये अधीन देख सब लोगा । करुणा करहि सकल भयो सोगा ॥
छन्द-भये सुकृत उदास सबहीं रंक निधि जैसे हरयो ॥
धन्य गुरु कहा बंदना तब चीन्ह गुरु मम ना परयो ॥
अमी पाय गुरु पंकज गहेसो काग होय मराल हो ॥
पाय अस्थिर सदन निर्बध हंस होय बड भाग हो ॥
अखंड धर्म विराज सतगुरु जहाँ काल नहीं पहुँच है ॥
असंख्य रवि अरु कोटि दामिनि अग्र शोभा तहाँ सहे ॥
दयासागर असहि विराजत पुष्प सज्या सोहहीं ॥
करहि कलोहल हंस सबहीं पुरुष दरश विलोकहीं ॥
सोरठा-षोडश रवि प्रभाव, चकोर उडगन पोहिया ॥
श्रवण आहि रवि भाव, अमृत फल हंसा चुगे ॥

चौपाई

गोर बनाय चले सब कोई । हिन्दू मुसलमान पुनि दोई ॥
नाना भाँति करत सब सोभा । कंठी तिलक देखि सब लोभा ॥

बोधसागर

(१२३)

धन्य राय धन्य पठाना । ऐसे गुरु पाये मतिवाना ॥
ऐसे बहुत दिन गये बिताई । रानी केरि अवधि नियराई ॥
सुन्दरदेह रानी कर नाऊ । पाये शब्द न प्रीति लगाऊ ॥
शब्द पाइ गुरु प्रीति न लागी । विना प्रीति सतभक्ति न जागी ॥
पाय शब्द नहिं कीन कमाई । ताते यम बहुते दुख लाई ॥
चारि दूत हरि तबहि बुलावा । तासे सकल मता समुझावा ॥
नगर गहो जाय नृप रानी । तहँवा जाय वेगि तुम आनी ॥
तब यमदूत गहि राजा गयऊ । जाय ठाढ़ मन्दिरमें भयऊ ॥
घट घट यम देखा व्योहारा । काया पैठि सो कीन विचारा ॥
तब रानीके वेदन भयऊ । व्याकुल करी दूत चित रहऊ ॥
राजा बूझे रानी बाता । कहे रानी मोहि नाहि सुहाना ॥
एक बात सुनिये मम राई । साधु संत सब देहु बुलाई ॥
राजा सकल साधु बुलवाये । सतगुरु भक्ति करो चित लाये ॥
बाढ़ विथा रानीकी काया । ततक्षिन आप पुरुष होय आया ॥
तबहीं यम जिव घेरे आयी । अरध अरध स्वासा चलि धायी ॥
भागि हंस त्रिकुटी में गयऊ । तहवाँ यम जिव घेरे लयऊ ॥
चारो जीव यम घेरे लायी । काहे बल तुम बचिहो जायी ॥
चलो हंस हरि कीन बुलाऊ । तब हंसा यक वचन सुनाऊ ॥
यहवाँ कस आये बटपारा । हमरे हैं समरथ रखवारा ॥
हम घर गुरु खसम यक आही । सो मोहि नाम दीन बतलाही ॥
दूत भूत यम तोहि चिन्हाई । आज्ञा देह खसम घर जाई ॥
जे साहेब मोहि नाम सुनाया । सो आवे गुरु जाय लिवाया ॥

साखी—तबही यम अस बोलिया, कहँ है धनी तुम्हार ॥
ताकहँ वेगि बुलावहू, नहिं चलु हरि दरबार ॥

(१२४)

बीरसिंह बोध

चौपाई

तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥
निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥
धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥
जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥
अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥
चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥
तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥
मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥

छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥

बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥

काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥

करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥

सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥

कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥

चौपाई

तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥

आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥

साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥

हरिहर वचन

हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥

दूत वचन

कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥

वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥

आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥