भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ८८ )

बोधसागर

सोही अंक कही अब तुमसों । अंक प्रभाव सुनो तुम हमसों ॥ अमी अंक तुम राखि छिपाई । सुरतिवंत कहैं देहु लखाई ॥ अंक बिना पारस नहिं जोई । पारस बिना मुक्ति नहिं होई ॥ पारस लोहा कंचन सोई । पारस विन पहुँचे नहिं कोई ॥ पारस परस गुरु शिर नावा । गुरु पारस परसे सतभावा ॥ सार शब्द है बीजक ध्याना । पारस आहि मूल रथाना ॥ तब सुकृत मिलि सत्य समाना । सत्य शब्द निश्चय करिजाना ॥ सिखापन मानि पुरुषकर लीन्हा । बलि तुम्हार हम पारस दीन्हा ॥ नाम तुम्हार न धोखे डारों । घट भीतर सो कबहुँ न टारों ॥

साखी—सब धोखा कौ मेटिके, पारस परसे संत ।

कबीर कहै धर्मदाससो, मेटों भवका अंत ॥

धर्मदास

धर्मदास चित बहुत हुलासा । ज्यों रविउदय कमल परकाशा ॥ दयासिन्धु पूरण गुरु स्वामी । कीन्ह कृतारथ अन्तर्यामी ॥ अविचल नाम मोहिं कहदीना । सकल जीव आपन कर लीन्हा ॥ जो जिय नाम तुम्हारा पावै । अवागमन रहित घर जावै ॥ साहेब कहिये शब्द विचारी । जाते छूटै भ्रमकी बारी ॥ अन्त समै बालक कर आही । तब यम सूझ परै कहि नाही ॥ समय साधिबालक नहिं जानैं । कैसे बाचै जीव आपनै ॥ यमकी घरी पहुँचे जब आई । तहाँको भेद कहों समुझाई ॥ वह बाचै यम जाइ हँराई । कष्ट परै सब सुधि बिसराई ॥ जड़ चेतनको है यह चारो । कैसे भवसे होत उबेरो ॥

सद्गुरु वचन

पुरुष अंश सुकृत तुम आगर । भलमति पूछब धर्मनि नागर ॥ सो समुझाइ कहुँ तोहि रंगू । जाहि रंगभौ यमको अंगू ॥

ज्ञानास्थितिबोध

( ८९ )

जब आवै बालकके पाहा । पलटे देह धरै निजु नाहा ॥ भक्तिरूप धरि आवै सोई । मस्तक श्याम फेर नहिं होई ॥ जब जिय नाम करै सम्भारा । तब यमकी जड़ होवे छारा ॥ शब्द सिंधुमें रहै समाई । तहांयम कबहु निकट नहिं आई ॥ शब्दविचार बारि टढ़ करहीं । मूल हंस रखवारी धरहीं ॥ जब फिर चाहे करन पयाना । अग्रज नाम करी संधाना ॥

साखी-वंश छांय बीरा लिखो, नाम सन्धि चित लाय । कहै कबीर निःशंक हो, हंस लोक कहैं जाय ॥

जब सठहार चले लै हंसा । सत सिंधु पहुँचत गइ संसा ॥ सत सिंधु आसन जो करहीं । हृदय रूप हंसा सब धरहीं ॥ आगे लेन हंस तहैं आवहि । आरति साजि चीर पहिरावहि ॥ कुशल क्षेम पूछे सब कोई । यमकी लज्जा किहि विधि खोई ॥ कहि प्रसाद आइ यदि ठाऊं । केहिं करनी पहुँची इहिं गंजि ॥ तबै हंस उठि बोले बैना । गुरुप्रसाद पाया निज नैना ॥ गुरु मोहि वह नाम सुनाई । तेहि प्रताप आये इहि ठाई ॥ तबही हंस पुरुष सौ कहई । हंसन चाह दर्शकी अहई ॥

साखी-नाम महात्म कबीरको, तेहि प्रसाद सो आइ । बिनय करत अभिलाष चित, पुरुषहि दरस कराइ ॥

चौपाई

पुरुष बुलाइ हंस कह लीन्हा । हंसन सकल डण्डवत कीन्हा ॥ दीन सिंहासन क्षत्र जु धरहीं । हंस सुजन जन दर्शन करहीं ॥ सिंहासन बैठी सुख पावा । शब्द अहार पुरुष संग आवा ॥ जन्म मरनकी भूख बुझाई । सब सुख भुगते अग्र अघाई ॥ निरंजन सुख सुधि नहिं पावा । ब्रह्मा विष्णु बैठि पछितावा ॥ वहतो हंस कहाँ उड़ि गयऊ । आदि अंत काहू नहिं लयहू ॥

( ९० )

बोधसागर

सारखी—यह सुख ज्ञान स्थितहिमें; जो कोइ भुगते आय ।

धन्य भाग्य वा हंसके, कहै कबीर समुझाय ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनवै करजोरी । देह विदेह कहिब कछु थोरी ॥

कवने कमल उठत है बानी । कवने कमल शब्द सहिदानी ॥

कवने कमल मूल अस्थाना । कवने कमल सुरति पहिचाना ॥

कवने कमल ब्रह्मालिय वासा । कवन कमल है जीव निवासा ॥

सद्गुरु वचन

अक्षय कमल सुशब्द उचारी । सुरति कमल वानी अनुसारी ॥

श्वेत कमल निर्गुण अस्थाना । भँवर गुहा मूलहि पहिचाना ॥

कंबु नाल मूलके पास । तहवां ब्रह्म लीन है बासा ॥

अष्टकमलते उठे जो बानी । कुसुमहि दल ताके परवानी ॥

बंकहि नाल बंक है घाटा । जो हंसा चीन्है वह बाटा ॥

सारखी—बंक नालनी नवरिके, भिन्न भिन्न कर लेख ।

भँवर गुहामें पैठिके, घरियारी कर पेख ॥

सुरति कमलके बीचमें, सद्गुरुको विश्राम ।

सहस्र जाप अजपा कही, पूरुषको निज धाम ॥

चौपाई

द्वान्छ कमलमें झिलमिल तारा । अलख सरूपहिको विस्तारा ॥

विषम सरोवर है तेहि ठाई । मान सरोवर परै रहाई ॥

मान सरोवर दहिनो देही । सद्गुर पंथ तहां हो लेही ॥

आप कमल तेहिकहीं बखानी । विरले जन कीन्हहीं पहिचानी ॥

पारब्रह्म बस अधर अटारी । जगमग ज्योति जहां उजियारी ॥

हीरा रतन जटित बहु भांती । लाल अमोल गने को पांती ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ९१ )

रत्न कमल पै सत्य विराजे । हिरमर हंस संग बहु छाजे ॥ गोरख दंत पहुँचि नहिं कोई । पारब्रह्म अस भवन है सोई ॥ ये सब अटकहिं सुनि मंझारा । सत्य पुरुष नहिं कीन्ह विचारा ॥ चउदा कमल महुं सुत्र विराजे । द्वादश कमल गगन धुनि गजै ॥ भर्म भूलि अटके तहां ज्ञानी । भर्महिं भर्म भर्म लपटानी ॥ सुर नर मुनि पवनहि अवराधे । सिद्धहु बारे उनमनि साधे ॥ नाभी मण्डल पवन किवारा । तहैं लगि गमी कीन्ह टकसारा ॥ हमरा घर कहैं विरलन बूझा । ऊर्ध्व कमलका पंथ न सूझा ॥

साखी-सुरति कमलपर बैठिके, अमी सरोवर चाखि । कहै कबीर विचारिके, संत विवेकहि भाखि ॥ ऊर्ध्व कमलकै उपरै, परिमल बास सुवास । अमी कमल महुं बैठिके, दर्शन दर्श हुलास ॥

चौपाई

उत्पतिको वह वृक्ष बखानी । प्रलय कबहुं होवे नहिं हानी ॥ पिण्ड मांह वह वृक्ष बताऊं । अगम अगोचर गम नहिं पाऊं ॥ अगम गोष्ठि तुम पूछन लाई । सुनो धर्म अब कहौ बुझाई ॥ अगम गोष्ठि अगम व्यवहारा । अगम पंथ हम कहौ विचारा ॥ अब मैं कहौ जो गम्य बखानी । अगम गोष्ठि काहू नहिं जानी ॥ उत्पति सब मैं तुम्हैं सुनावा । ये हमते कोउ जानि न पावा ॥ उत्पति सुनु वा वृक्षकी भाई । प्रलय तेरे वह कबहुँ न आई ॥ जासों कहों अमरपुर गाऊं । बिना बीज वह वृक्ष रहाऊं ॥ बिन धरती अंकूरहि आनी । पानी रंग नहीं उत पानी ॥ मूलवृक्ष वह पुरुष बखानी । शाखा तासु निरंजन जानी ॥ डाली ब्रह्मा विष्णु मधेश्वर । पत्र तासु संसार नरेश्वर ॥ सत्य सुकृत जहँ कर विश्रामा । अछय वृक्ष जाकर है नामा ॥ पत्ररूप संसार बखाना । धर्मदास लखवो यह ज्ञाना ॥

( ९२ )

बोधसागर

साखी-पानीमें सबउपजहि, पानि जान सब कोइ । जासों पानी ऊपजा, सो रँग कैसो होइ ॥

चौपाई

रंगहि रंग रंग उपजाया । एक रंगसे सब रँग आया ॥ बहुरंगीसे पानी भयऊ । पानी रंग नाद जो कियऊ ॥ नाद रंगसे वेद उचारा । वेद रंगसे भयो संसारा ॥

साखी-हीर डोरको भाव यह संत सुजाना देखि । कहै कबीर विचारिके रंगहि रंग विशेखि ॥ पुरुष डोर तुमसों कही, सुनो संत चित लाइ । धन्य भाग्य वह जीवके, ज्ञान स्थित जो पाइ ॥

चौपाई

सो सब तोहि कहिव चित लाई । परखि लेहु हियको समुझाई ॥ पांच तत्त्व जो प्रकटे आई । पांच तत्त्व वे गुणत रहाई ॥ सोह तत्त्व तुमको न सुनावा । हृदये भीतर गुप्त छिपावा ॥ कौन शब्दसे तत्त्व जो आऊ । सो अनुसार तोहि समुझाऊ ॥ विदेह तत्त्व अगरको मूला । सोम तत्त्व आही अस्थूला ॥ अनुम तत्त्व सब दीप बखानी । अनुप तत्त्व सब दीप बखानी ॥ अंकुर तत्त्वसों सब कछु कीन्हा । ताको मरम न काहू चीन्हा ॥ पाच तत्त्व प्रगटे दुनियाई । तामहँ जीव रहै अरुझाई ॥ आप तेज वायु तत्त्व बखानी । पृथ्वी अकाश देह सब जानी ॥

धर्मदास वचन

कौने तत्त्व सो रची है देही । कौन तत्त्व है फूल सनेही ॥ कौन तत्त्व सो देहमें आवा । कौन तत्त्व निज मूल कहावा ॥

सत्गुरु वचन

अजर तत्त्व निःस्वादी कहेऊ । पुढुपतत्त्व निजमूलहि लहेऊ ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ९३ )

अमी तत्त्वकी देह बखानी । अजर तत्त्वमूल पहिचानी ॥ साखी-अमरपुरीको यह गुन, अमर हंस होजाइ । कबीर ज्ञान स्थिति बिना, जीव प्रलय तर जाइ॥

चौपाई

नाद प्रकट बिंदुहिं सो भयऊ । बिन्दु प्रकट नादहि जो लहिऊ॥ शब्द भेदते श्वास जो जानी । श्वासरूप शब्दहि पहिचानी ॥ नाद बिंदु जब नाहीं रहिया । तबकी बात तुमहिंसों कहिया॥ अमी अघर कीनी जब ग्रामा । नीर ब्रह्म लीनो विश्रामा ॥ नाद निरञ्जन प्रगटे जबही । श्वास प्रेम गुरु कीन्हो तबही ॥ बिन्दु सकलसे भयो पसारा । देह बिदेह सो रहत न न्यारा ॥ जब नहिं धरती नहिं आकाशा । तब नहिं सहज कूर्म परकाशा॥ चकित अण्ड चौँकरे मुचंदा । हमें देखि करि सहज अनंदा ॥ सारशब्द कबीरहि जाना । अंगहि अंग आहि बिहराना ॥ फूटा अंड कटे तब अंशा । योग जीत उपजे निःसंशा ॥ नहिं तब धरती नहिं आकाशा । साखी शब्द नहीं परकाशा ॥ तबही पुरुष कहां धौं रहेऊ । कौन तत्त्वमें वासा लहेऊ ॥ गुप्तहि तत्त्व गुप्त अस्थाना । गुप्त वस्तुमें रहे निदाना ॥ गुप्त हते तब प्रकटे भयऊ । अमर दीप उच्चारण लयऊ ॥ शब्द उचारो अमर अखंडा । बीरा सार बिदेही पंडा ॥ तादिन पुरुष आप जो रहते । कौन पिंडमें वासा करते ॥

साखी-राईभसा जो वस्तु थी, राई मर अस्थूल । लहर लहर दिल अंदरा, तहाँ पुरुषको मूल ॥

चौपाई

जब नहिं हते कूर्म नहिं कामा । आदि पुरुष कीन्हो निज नामा ॥ नाम सार हंसा जेहि पावा । वो जन चार काल पहुँचावा ॥

( ९४ )

बोधसागर

पहुँचावतमें कछु दिल मोरा । वारी लांघि सकै नहिं चोरा ॥ जो बोले तो शिर छिन जाई । खूट गहे तो अंग नशाई ॥ सारनाम सतगुरुने दीना । ताते धर्म शीस पर लीना ॥ जो कोइ करै नाम महाँ वासा । ताकहँ होइ न काल तरासा ॥ नाम प्रताप काल नश जाई । काले खेले पुरुष जाई ॥ नौ दल गुप्त हृदयमें टीका । अमर मोक्षपद पावै नीका ॥ नौदल नाम जो कहौं बिचारी । षट्दल काटि जो बाहर डारी ॥ शुभ दल शुभचित बन भरमा । भये दल क्रोध संत तज करमा ॥ अस्थित दल राखे निज मनको । पहुँचे हँस लोक सुरजनको ॥

सार्वी-यहि गुण ज्ञान स्थितिहिमें, शब्द सिंहासन सार । केहे कवीरा नाम बल, पहुँचि पुरुषके द्वार ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास बिनवे कर जोरी । साहब कहौं नामकी डोरी ॥ अगम निगम शारद औ शेशा । तुम दातामांगन सब देशा ॥ कहो बचन प्रभु हृदय विचारी । कैसे कूर्म लीन अवतारी ॥ आदि ब्रह्मका कहौं निवासा । केहिविधि लीन कमलमें बासा ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास मैं कहौं बुझाई । अकथ कथा कछु कही न जाई ॥ आदि अन्तको नाहिं निवासा । आसा सार पुरुष परकाशा ॥ बिना नालको कमल अनूपा । पूरुष तामहँ कही सरूपा ॥ तबही भई अधर सों बानी । बिन रसनावह अगम निशानी ॥ बिनहि बिन्दु जिद एक कियऊ । अजय अपार सरोवर लियऊ ॥ अष्ट कमल तहां कीन्ह प्रकाशा । अष्ट पुत्र को तहां निवासा ॥ अष्टताल सुत नाम धरावा । अब मैं कहौं नाम परभावा ॥ मनसा बुद्धि निरञ्जन कीन्हा । सहज सुरतिसों उत्पति लीन्हा ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १६ )

रंग रेख कर्म उपराज् । सरवन सुरति वहे गुण छाज् ॥ योग संत इनको विरमाए । तिनको अंत न काहू पाए ॥ सुकृत अंश भये तेहि ठाऊँ । सोहँ सुरति अचित बनाऊँ ॥ आठ अंश ये उपजे भाई । ज्यों दर्पण प्रतिबिंब समाई ॥ पुरुष सहज सो भाषे लीना । दीप एक तुमहुँ कहँ दीना ॥ अंमो दीप प्रदीप निवासा । गर्भते कूर्म तहाँ परकाशा ॥ तबही पुरुष कूर्म उपराजा । बाहर पलंग रूप तेहि छाजा ॥ उपजे कूर्म पृथ्वीको भारा । सोरह पलंग दीप विस्तारा ॥ रचना सबहि कूर्मकह दीना । इहतो चरित सहज नहि चीन्हा ॥ साहब चरित लखे नहि कोई । सुरति पुत्र उपराजे सोई ॥ महा अपर्वल है अधिकारी । पुरुषके कहिये भण्डारी ॥ दया करी सुरतीको जबही । सुरति अंश उपराजे सबही ॥

साखी- ज्ञानस्थतिके यह गुण, सुरति कूर्म उपजाइ ।

कहै कबीरा नाम बिन, जीव अकारथ जाइ ॥

चौपाई

कूरम उदर बिदारी जबहीं । चारों अंड फूट गये तबहीं ॥ चारों अंड ब्रह्मांड सम्हारा । कृत्रिम वस्तु कीन्ह संसारा ॥ कर्ता आदिपुरुष कर नाऊ । सोई नाम निरंजन पाऊ ॥ फूटि अंड चौभंगा भयऊ । पाँचो तत्त्व तीन गुण ठयऊ ॥ पंच अमीसे सब संसारा । पंच अमीका है विस्तारा ॥ पंच अमीकर नाम न जाने । सो मन आन केल तन ठाने ॥ अमी दहे है सकल जहाना । अमी रंगसे कीन्ह ठिकाना ॥ अमी वस्तु जिनही पहिचाना । पंच अमीको सकल जहाना ॥ पंच अमीको नाम सुनाऊँ । भिन्न भिन्न सब तोहि बताऊँ ॥

( ९६ )

बोधसागर

अमीके नाम

सिंधु सुअंशहि । १ । सुरंगको नाम । २ ॥ सहजसुतमूलको नाम । ३ । अकहअमी । ४ । अंकअमी । ५ ।

सार्षी-कही कबीर धर्मदाससों, पंच अमीको नाम ।

शब्द अमीसों जानियो, प्रकट भये गुणधाम ॥

चौपाई

अमी शब्द सुमिरे जो कोई । अमीस्वरूप होहि पुनि सोई ॥ अमी शब्द जिन नाहीं पायब । सोई जीव प्रलय तर आयब ॥ मूल शब्द राखे चित सानी । अमी शब्द मृष बोले वानी ॥ पाँच बेर सुमिरे नर कोई । ताको आवा गौन न होई ॥ एहि शब्द मैं कहीं बखानी । ब्रह्मा विष्णु महेश न जानी ॥ इह पुनि नहीं निरंजन पावा । धर्मदास मैं तुमहिं बतावा ॥ शब्द अमी सुपुरुष लिख दीन्हा । एकहुअंक परै नहिं चीन्हा ॥

सार्षी-कमल अंक पंखुरि अरु, सुरति बंध सुखसेज ।

कहि कबीर संशय गई, महापुरुषके एज ॥

ज्ञानस्थितके यही गुण, अमी अमी होजाइ ।

कहे कबीर धर्मदाससों, देह हिरण्मय पाइ ॥

चौपाई

धर्मदास उठ बिनती कीन्हा । तुमरी दया पन्यो सब चीन्हा ॥ अपनो भेद कहीं विलछानी । जाते परै दरस पहिचानी ॥ वहै शब्द गुरु कहीं प्रकाशा । जामैं हवै सुकृतको वासा ॥ वही शब्दमें दर्शन होई । भिन्न भिन्न मोहि कहो बिलोई ॥ तुमहिं सगुण तुम निर्गुण रूपा । कारण कारज कहिये भूषा ॥ तुम धरती तुम पवन अकाशा । तुमहीं चांद सूरज परकाशा ॥ जलथल भीतर कीन्ह निवासा । लोकद्वीप तुमहीं परकाशा ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ९७ )

तुमही माली तुम फुलवारी । तुम हो करता तुमरी बारी ॥ तुम सागर जलहरी तरंगा । तुम मलीन तुम निरमल अंगा ॥ तुम हो उडुगण पर्वत चंदा । मोये तुमये हर्ष अनन्दा ॥ तुम गुपाल तुमहो दिन राती । सुर नर मुनि गंधर्व तुम ज्ञाती ॥ तुमही अलख तुमहि संसारा । तुमही हरि हर विधि अवतारा ॥ तुमही लोप अलोप अलेखा । तुमही गुप्त प्रगट सब देखा ॥ तुमही पुरुष तुमही हो प्रकृति । तुमही योग तुमहि जुगति गति ॥ चारों युग तुम करत निवासा । तुम रमता देहीमें बासा ॥

साखी--तुमहो दूसर अवर नहीं, तुमरा सकल प्रकाश । करहु दया अब मोहिपर, सत्य नाम विश्वास ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम विनती कीन्हा । हमरो रूप न काहू चीन्हा ॥ अमरभेद अस्थलकै माहीं । जो पावै अस्थिर मन ताहीं ॥ लीलंगर द्रौप पुरुष अस्थूला । वही द्रौप उत्पतिको मूला ॥ गगन धरनी उत्पति सब नीरा । काया बीर सुनाम कबीरा ॥ याविधि पुरुष हमहि सोंकहिया। विन अंकुर जीव कहाँ रहिया ॥ नाम हमार सुमिरे जो कोई । आवा गमन रहित सो होई ॥ हमरा नाम लेत घर आवै । सुख सागर निर्मल हो जावै ॥ नाम लेत जो काल डराई । सुमिरत नाम हो दूर हो जाई ॥ हमरो नाम सार है भाई । जो चीन्हे तेहि काल न खाई ॥

साखी--नाम हमारा मुक्तामणि, पुरुष आपहि भाखी । शब्द शिरोमणि सार यह, हंस सदा चित राखि ॥

चौपाई

येहि नाम लोके पहुँचावै । सुमिरत नाम पुरुष कहैं पावै ॥ अब यह शब्द कहउ सम्भारा । सुनि हृदय महे करो विचारा ॥

नं. ८ कबीरसागर-४

( ९८ )

बोधसागर

जाते दुःख द्वंद मिटि जाई । धर्मराय बैठो पछिताई ॥ यहि नामको शिरहि चढाई । यामें सब सुख विलसे आई ॥ कपट रूप धरिहै जो कोई । भ्रमकी डगर परै पुनि सोई ॥ आदि शब्द सो नाम हमारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥ धन्य भाग्य हंसनके कहिए । जो या नाम मुक्ति मन गहिए ॥ सो करूणाकर बहुत उधारी । एक नाम चित लेय विचारी ॥

पाँच नाम

आदि अजर १ । अदली अदल २ । पुरुष निरक्षर नाम ३ । मुक्तामणि प्रभुनाम जो ४ । सुख सागर विश्राम ॥

साखी--ज्ञानस्थितके यह गुण नाम विवेकी पाइ ।

कहे कबीर धर्मदासको, हंस लोकको जाइ ॥

चौपाई

धर्मदास चरण चित धरही । बार बार विनवे अनुसरही ॥ पाँजी नाम मोहि कहो विचारी । जामें होय हंस निस्तारी ॥ बिन पाँजी कहा जाने भेदा । पाँजी नाम गुरु कहीन खेदा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास भल कीन्ह विचारा । हंसराज बड भाग तुम्हारा ॥ नाम सिंधु पायो तुम जब ही । पाँजी निर्भय पहुँचे तब ही ॥ बिन निर्भय कोई भेद न आवे । विना भेद कैसे पहिचाने ॥ कहे कबीर होइ गुरु दाय। तबही हंस अमर घर आया ॥ अब सुनिये पाँजी को द्वारा । ता चढ़ि हंस उतरि है पारा ॥ एक नाम एक चित हो देखा । तहाँ हंसा सुख सागर पेखा ॥ पाँजी अद्भुत कहीं सुमारा । ताते होय मुक्ति व्यवहारा ॥ सोहं शब्द उलली कर देखे । तिल प्रमाण जहाँ द्वारी पेखे ॥ उलटि पवन पश्चिमको घाले । गरजे गगन मेरु तहाँ हाले ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ९९ )

अरध ऊर्ध्वबिच कमल अपारा । दामिनि कोटि होत उजियारा॥ पाजी नाम पंच दिल राखो । हंसा उबारन कहि यह भाखो॥

आकाशपाँजी

आदि अजर अदलीनिर नामा । सप्तसिन्धु है जियको कामा ॥ सप्तसिन्धु पाजी ले नामा । सो यह परब्रह्मको धामा ॥ यही नाम जियको रख वारा । खोलो कुंजी कुलफ केवारा ॥ हंस ले गए पुरुष दर्बारा । झिलमिल ज्योति झलक उजियारा॥ नाभि मण्डल पवन किवारा । दुरे सुनीरी मूलके द्वारा ॥ भए निरन्तर थकित शरीरा । धर्मदास कह मिले कबीरा ॥ धर्मदास यह दिलकी पाँजी । यही नाम धरि बहुऐ साँजी ॥ पिंड नाम सो दिलमें मूला । येहि नाम पहुँचे अस्थूला ॥

सार्वी-ज्ञानस्थितके यह गुन, पुरुष पाजी निज सार ।

यह पाँजी जब पावही, हंस होइ निस्तार ॥

चौपाई

हो सद्गुरुमें तुम बलिहारी । मिटि गइ तिमिर भई उजियारी॥ हों पतंग तुम भुंग गुसाई । आप सरीख कीन्ह एहि ठाई॥ सप्त सिन्धु पृथ्वीमें आहीं । सकल जगत इनहींके माहीं ॥ सप्त सिन्धु जो रहे पताला । सातनाल प्रभु कहौं रिसाला ॥ सातौ नाल कवन विधि हेरा । जामें सुषुमण होइ निवेरा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास यह अकथ कहानी । बिरले हंस कीन्ह पहिचानी ॥ अगम विचार कीन्ह व्यवहारा । जासों भया सकल विस्तारा ॥ जबहीं हंसा तजे शरीरा । शब्द प्रताप होय गंभीरा ॥ सप्त सिंधु नर पावै कोई । सप्त सिंधुमें जाय समोई ॥ सप्त सिंधु आरम्भ न करई । त्यागि शरीर हंस गति धरई ॥ जाय करै मुख सागर बासा । मान सरोवर करहिं निवासा ॥

( १०० )

बोधसागर

सप्त सिन्धुके नाम सुनाऊं । भिन्न भिन्न सब तोहि लखाऊं ॥ सप्त सिन्धु अब लखि पावे कोई । समता सिन्धुमें रहे समोई ॥ योग सिन्धु अब कहों बखानी । अजांवन सिन्धु लेव पहिचानी ॥ अमर सिन्धु हंसा लखि पावे । अकह सिन्धुमें जाय समावे ॥ सुखहिं सिन्धुहि कीन्ह पैठारा । सप्तहि सन्धुहि नाम उचारा ॥

साखी-ज्ञान स्थितको पायके, मन सुस्थिर हो जाय । कहे कबीर धर्मदाससों पुरुष नाम समुझाय ॥

चौपाई

पुरुषहि नाम कहौं समुझाई । धर्मदास हिय गहो बनाई ॥ याही कारण अजपा कीन्हा । जीवन संधि परी नहिं चीन्हा ॥ पुरुषहते तब मूलके ठाऊं । तब नहिं दीपलोक अवगाऊं ॥ चौबिश पुत्र तबे नहिं रहिया । तबही वचन अम्र जो कहिया ॥ ता पाछे ओंकार जो कीन्हा । ओंकार सो सब रचि लीन्हा ॥ साहब वचन सत्य फरमाया । सत्य शब्द अक्षर निर्माया ॥ कबहुँ नाहिन अस्थिर होई । बरा बार मन देह बिगोई ॥ काया भीतर आप लखावा । ताते अजपा नाम कहावा ॥ याहि शब्दसे सुद्ध शरीरा । याहि शब्दसे मिले कबीरा ॥ याहि शब्द हृदय सुख होई । निर्मलहोहि विशहिं सबखोई ॥ अस्थिर मनकर प्रफुलित राखे । नाम संधि हृदये महाँ चाखे ॥ निर्मल हंस होत है तबही । अमरलोक पहुँचि है जबही ॥ सातों सुरति तबहि परकाशा । पुरुषहि को राखे विश्वासा ॥ उत्पति शब्द जबे निर्मावा । सो अक्षरमिलिशिवहिं कहावा ॥ शिवहि शब्दसों जीव कहावा । जीव नाम संसार कहावा ॥ सातों नाल वाहिके अंगा । जिहि जग मीतर माडो रंगा ॥ अक्षर शब्दसे शिव जो आवा । वाही अक्षर गुरु कहावा ॥

ज्ञानस्थितिवोध

( १०१ )

काशी मध्य मरे जो कोई । होहि पखान रूप तब सोई ॥ चौरासीसे रहित जो होई । पाहन रूपहि जन्म विगोई ॥ शब्द संपूरन शिव जो जाना । त्यों सुकृतके बहुत परवाना ॥ अक्षत ले आरति कर सोई । उन कर मंत्र कहत सब कोई ॥ तारक मंत्र वयसको नाहीं । पण्डित शब्द गहत मनमाहीं ॥ यही मंत्र कहत सब कोई । साहब चरण न पावैं सोई ॥ क्षमा गुरु निश्चय जो पावा । सद्गुरु शब्द अहर्निश लावा ॥ क्षमा गुरु कहिए अविनासी । मानसरोवर तटके वासी ॥ रचना भेद ले शिव कह दीना । यहि विश्वास मनहि कर लीना ॥ भवसुर केहि शिखावन एहा । सनकादिक कर चरण सनेहा ॥ यही प्रणालि गही सब कोई । गुरु निर्गुणकर भेद समोई ॥ याहीमें सब परै भुलाई । दृढ़तही जग करूप बिताई ॥ जो चाहे सुकृत कर लेखा । आप आप सो करै विवेका ॥ उनकर चीन्हि अमरपद पाई । सूक्ष्म मुक्ति नाम गुण गार्ई ॥

साखी—यह गुण ज्ञानस्थितिके, जो पावैं निज नाम । अजपा जपै कबीरको, सो पहुँचे निज धाम ॥

चौपाई

शब्द पाय लोक जिन चीन्हा । नाम अखण्डित जब धरलीन्हा ॥ मुक्तामणि निज नाम हमारा । हंस उबारहि भवसे पारा ॥

साखी—सोहं नाम हृदय धरै, और जपे नहिं जाप । मूल शब्दही रटन कर, मूल शब्द हो आप ॥ करै निरूपण शब्दको, कहै कबीर बखान । मूल ध्यान गहि पावही, सुख सागर अस्थान । मूल शब्दके येह गुन, अमी दीपक कहैं जाइ ॥ कबीर ज्ञानस्थित बिना, मूल नाम नहिं पाइ ।

( १०२ )

बोधसागर

गुरु महिमा प्रारम्भः

चौपाई

गुरु होहि वहि ताहि लखावै । गुरु बिन अंत न कोई पावै ॥ जिन गुरुकी कीन्हरी परतीती । एक नामकर भव जल जीती ॥ गुरु पुरुष जिय करहि मराला । गुरु सनेह बिन काग कराला ॥ गुरु दया गुरु शब्द हमारा । गुरु प्रगट है गुप्त अधारा ॥ गुरु पृथ्वी गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थलमहँ कीन निवासा ॥ चंद्र सूर्य गुरु सब संसारा । गुरु गंधर्व गुरु सब व्यवहारा ॥ गुरु ब्रह्मा और विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥ चराचरहि जहँ लगि सब देखा । गुरु बिना कछू और नहिं पेखा ॥ उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्हे गुरु शरिष्ठा ॥ ये सब जीव गुरुमय जानो । गुरुसे भिन्न अन्य नहिं मानो ॥ कहैं कबीर सो हंस पियारा । येहि भांति गुरु दरश निहारा ॥ साखी-सो गुरु निशिदिन बंदिये, जासों पाये नाम । नाम बिना घट अंध है, ज्यों दीपक बिन धाम ॥

चौपाई

गुरु चरण जे राखे ध्याना । अमर लोक वह करत पयाना ॥ अमर कमल ज्यों रहैं लुभाई । या विधि गुरु चरणन लपटाई ॥ तन मन धन न्योछावर राखे । दर्शहि पशं अमी रस चाखे ॥ चरण धोय चरणामृत पावै । पुरुष समीप पहुँच सो जावै ॥ गुरु बिहून अमृत नहिं दीजै । अमृत छांड़ि विषय रस लीजै ॥

साखी-महा पुरुषको नाम है; जा घट मांहि समाय । सोई सद्गुरु जानिया, अरु कृत्रिम सब पाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विनती अनुसारी । समरथ खसम जाहि बलिहारी ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १०३ )

जबसे दीन्ह मुक्तिकर बीरा । तीन ताप मिटि गई अधीरा ॥ साहब कहिये शब्द अनन्दा । जाते यमकर छूटै फन्दा ॥ चरणामृत कैसे कर लीजे । तौन शब्द मोसों कहि दीजे ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं कहों विचारी । चरणामृत शब्दहि निरवारी ॥ यहि पाये निज करहि अहारा । जासों यमकी छूटै धारा ॥ प्रथम भोर मुख उठिके धोवे । काल कष्ट यमद्वार बिगोवे ॥ फेर करहिं शब्दको आशाना । वही शब्दसो मुक्ति निदाना ॥ बहुरि हिये महाँ नामहि आने । नाम विदेह दरश पहिचाने ॥ नाम विदेही कठिन अपारा । ताहि चीन्हि कर करहुँ अहारा ॥ ध्यान बीज गुरुचित महाँ आने । सुरति निरति पुरुषहि पहिचाने ॥ बहुरि शब्द आनंदित भाषे । मुख महाँ धोइ नाम रस चाखे ॥

साखी—इह गुण ज्ञानस्थितहिके, शब्द भेद निजसार ।

गुरुचरणामृत लेहि तब, होवे हंस उवार ॥

स्मरण

श्वेत मिठाई श्वेतहि पाना । श्वेत शब्द लेखनि परवाना ॥ योग सत्य इन दीन्हो बीरा । मनको उलटि खोज लै हीरा ॥ बीरा खाय भयो मुख भारी । प्रथम पुरुष ऊपर उजियारी ॥ दूसर सत्य गुरु नाम जो भावा । तीसर लक्ष्मी लै घर आवा ॥ चौथे जन्म मरण नहिं होई । जो चरणामृत पावै कोई ॥

साखी—कालफाँस नहिं आवही, तन्त्र मंत्र क्षयमान ।

वचन कबीर गुसाँइको, संत्य हि शब्द प्रमान ॥

मंत्रसम्पूर्ण

धर्मदास वचन

चरण टेक कर विनती लाई । कीन्ह कृतार्थ मोकहँ आई ॥

( १०४ )

बोधसागर

सब विधि धर्मदास पर दाय। मुक्ति मुक्ति गुरु सबै बताया ॥ साहिब कहिये शब्द उचारी । जौन शब्द मुखधोय निहारी ॥ सोइ शब्द गुरु कहो बखानी । जाते जरै कालकी खानी ॥

साखी--काल जरै कंटक जरै, राखौ चितमें नाम । मनसा वाचा कर्मणा, जाय हंस निज धाम ॥

सदगुरु वचन

धर्मदास यह शब्द उचारी । याही शब्दसों हंस उबारी ॥ काल जँजाल मिटत है जबही । शब्द लेय मुख धोवै तबही ॥ काया शुद्ध होइ निज वारा । मुख धोवै मोहे संसारा ॥ दिन दिन मुख उज्ज्वलतेहिकेरा । रविसमान मुख होय उजैरा ॥ अब मैं शब्द कहत मुख बानी । धर्मदास लीजे पहिचानी ॥

स्मरण

सिंधलद्रीप हंस कहां रहियऊ । पहले पार कबीर कहियऊ ॥ बसले पानी मुख धोय । चंदन काटिके धोय मुख ॥ सुरति करहि अस्नान।तेतिसकोटि सुरदेवता लखे अभ्यंतरधरिध्यान मुख धोवे मनमोही । औ देह नहि जान ॥ मनमें ध्यान कबीर कहिये । रखे चित्त पहिचान ॥ मोरे माथे मन वसे । अवरहुँ मदिल कोइ ॥ सिंधलद्रीप दिग वैठके । कबहुँ न जाय विगोइ ॥

साखी--ज्ञानस्थितिके यह गुण, मुख धोवे सुर ज्ञान । कहे कबीर विचारिके, हंस होहि निर्बान ॥

चौपाई

धर्मदास यह धर्म अपारा । जासों होत दिगंबर भारा ॥ दिगंबर देह होत जब भाई । स्नान शब्द जब गुरुसों पाई ॥ यही शब्द धुंधलको दीन्हा । धुंधल राव मानि शिर लीन्हा ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १०६ )

मृतकहि देह धरे संसारा । बिना शब्द है काल अहारा ॥ स्नान शब्द हृदयमें धरहीं । जीवनमुक्ति होइ भव तरहीं ॥ यही शब्दसो धोवे अंगा । दिव्यदेह जानो परसंगा ॥ जो कोइ करे शब्द असनाना । ताकर धोखा जाय निदाना ॥ लक्षहि दान करै नर कोई । जीव दया बिन मुक्ति न होई ॥ जो धोवे निश्चय करि देहा । तबही कीजे शब्द सनेहा ॥ कहे शब्द अब कहो बखानी । धर्मदास लीजो शिर् मानी ॥ नित्य प्रीतिकर शब्द स्नाना । ताकर दोष न रहै निदाना ॥

स्मरण

साखी-अगम सरोवर विमल जल, हंस बैठिके न्हाइ ।

काया कंचन मनमगन, कर्म भर्म मिटि जाइ ॥

पिंडहिसों ब्रह्मांडहि जाना । मान सरोवर करि असनाना ॥ सोहं सोहं ताको जापा । लिखत न करै पुण्य औ पापा ॥ पुण्य पापसे रहत न न्यारा । पैठि संत जन करो विचारा ॥ याहीविधि जो करि असनाना । सो हंसा करै लोक पयाना ॥ धर्मदास सुन शब्द विशेषा । गंगवारु इतने है लेखा ॥

स्मरण सम्पूर्ण

आदि अंत सब कहों बखानी । धर्मदास कीजो बिलछानी ॥ मूलपुरुष काहू नहिं जाना । सो तुमसो सब कहों बखाना ॥ मूलशब्द तहाँ अग्र कहावा । अग्र विदेह अस्थूल सुभावा ॥ मूलभेद काहू नहिं पावा । मूलनाममें गुप्त छिपावा ॥ कहैं प्रतीत देखी मैं तोरी । तातैं कहों मूल निज डोरी ॥ मूलहि शब्द असंभव नामा । कहैं सुनै नहिं पावै ठाना ॥ चारलोक चार है नाऊँ । चार चार सो बरन सुनाऊँ ॥ सीख गुरु या बिचि जो धरहीं । जैसी विधि तुम हम सो करहीं ॥

( १०६ )

बोधसागर

तन मन शीस न्योछावर डारै । तब गुरु शिष्य हृदय संचारै ॥ रंचक कपट हियेमहैं राखे । गुरुसनेह रस कैसे चाखे ॥ मुखसे बातें मीठी करहीं । अर्थद्रव्य मन कृत्रिम धरहीं ॥ गुरुलोभी शिष्यलालचि जानी । परमारथ नहीं पहिचानी ॥ कैसे ताकर होय उबारा । बूढ़हि भवसागरकी धारा ॥

साखी-युक्ति मुक्तिकी को कहे, नरकहु नहीं ठोर । पिशाचरूप भरमत फिरै, बाँधे यमकी पोर ॥

चौपाई

धन्य भाग्य तुम हमको चीन्हा । तन मन धन न्यौछावर कीन्हा ॥ यहि कारण मैं कीन्हो नेहा । मूलशब्दसों करहु सनेहा ॥

साखी-कहियत वचन विचारिके, तुम सुनियो चितलाय ॥ धीरज दृढता ठानिके, अमृत पिये अघाय ॥

चौपाई

जब प्रभु हते मूल अस्थाना । हंस सुजन जन नहिं उत्पाना ॥ सो निज ठांम लखावों तोही । धर्मदास जो पूछै मोही ॥ तब ना हतो अग्रको मूला । तब ना हतो विदेह स्थूला ॥ तब नहिं हंस सुजन जनकीन्हों । तब यह हंस बास कहाँ लीन्हों ॥ तब साहब समसर उपराजा । समसर अग्र कीन्ह सबसाजा ॥ दश ग्यारह नहीं ब्रह्मंडा । तब नहिं हते लोक अरु अंडा ॥ तब नहिं अमी अमी रस छंदा । तब नहिं दिवस रैन अरु चंदा ॥ सो अब कहौं मूल नहिं कन्दा । मूल विदेह नाम आनन्दा ॥ कहेउ भेद लहेउ निज नामा । जासों पूरण है सब कामा ॥ जैसे जलमें दिनकर ज्योती । यों घट भीतर लखिये मोती ॥ धर्म नाम असंभव नाऊं । निरालम्ब अग्रिम है गाऊं ॥ निरालंब आलंब ठिकाना । याविधि साहबको पहिचाना ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १०७ )

सोमैं देखि तोहि समझाऊँ । यह तुम राखो हिय छिपाऊँ ॥ वह प्रभु निरालंब बतलाई । नाम प्रभाव पुरुष लखिपाई ॥ सार नाम जिन हिये समोई । काल जाल सब जाय बिगोई॥ निरालंब है अधर अकाशा । पृथ्वी पवनहि माँहि निवासा॥

सारखी-निरालंबहि प्रभाव यह, सकल सृष्टि बिन नाम ।

अजर अमर विनसे नहि, बिन थूनी बिन धाम ॥

चौपाई

सो विधि ताको मैं समुझाई । अविनाशी या विधि प्रगटाई ॥ बिना तत्त्व तत्त्व जो भयऊ । बिना प्रतीति भेद किमि लहेऊ॥ करि प्रतीति तजि अन्य उपाई । आनंद गांव अनंद कराई ॥ तब हंसा आनंद हो जाई । आनन्द शब्द हृदयलों लाई ॥ जीवतही नर मुक्ति होई । अक्षर गहि निर अक्षर होई ॥ येहि प्रताप अग्रको लहिए । स्थूल विदेह वाहिमो कहिए ॥ निरालम्बसो सो भए अलंबा । शब्द सरूप सृष्टि सब थंभा ॥

सारखी-निरालंबके खोजमें, सब जग परो लुभाइ ।

जब सतगुरु दाय़ा करै, तबही परै लखाइ ॥

चौपाई

धर्मदास जो विनती करही । चरणि पकरि शिर ऊपर धरही॥ तुम समर्थ मैं दास तुम्हारा । चरण प्रसाद भयो बिस्तारा ॥ एक विवेक कही समुझाई । वचन सुधा सुनि तृषा बुझाई॥ अब साहिब कहिये व्यवहारा । मृतक जीव गुरुड संचारा ॥ जेहि विधि जीवहिगुरुडजियावा । सोई भेद गुरु मोहि बतावा ॥ मूलशब्द अक्षर पहिचानी । अगमहि नाम अकाशे जानी ॥ सो कहिए प्रभु भेद बखानी । बाल जिवाइ गुरुड नहि आनी॥