भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

श्रीबोधसागरे—

आगमनिगमबोध

भारतपथिक कबीरपंथी

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत

मुद्रक व प्रकाशक—

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष—“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-प्रेस,

कल्याण-बम्बई.


पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार ‘श्रीवेंकटेश्वर’ मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षाधीन है

A circular seal or logo with a gear-like outer border. Inside the circle, there is a central emblem that is difficult to discern due to the low resolution and blurriness of the image.

THE NEW YORK PUBLIC LIBRARY

OF THE CITY OF NEW YORK

LIBRARY

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

OF THE CITY OF NEW YORK

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

सर्वज्ञः

सर्वज्ञः

सत्यमुक्त, आदि अदली, अजर, अचिन्त पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कवीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, मुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दयानामकी दया, वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

आगमनिगमबोधप्रारंभः

त्रयस्त्रिशस्तरंगः

सारखी-वेद शास्त्रको मत अबै, अगम निगम प्रमाण । अब वर्णन सोई लिखो, पढो सकल दे ध्यान ॥

अथ ब्रह्म और जगत उत्पत्ति चौपाई

आदि ब्रह्म अब वर्णन करेऊ । अहंशब्दमें सो थित धरेऊ ॥ ताहि शब्दकरि चित फुरिआया । चित हृदता करि मन प्रकटाया ॥

( २ )

बोधसागर

मनते तन मात्रा भे पांचों । मन स्वरूप ब्रह्माको वांचों ॥ मन ब्रह्मा ब्रह्मा मन सोई । जस संकल्प करे तस होई ॥ रचे अविद्या शक्ति विधाता । जिहि अनात्ममें आत्मलखात ॥ ब्रह्मा सोइ अविद्या कारण । विद्या राचे ताहि निवारण ॥ उठे तरंग सिंधुमें जैसे । बहुरि समाय ताहि पुनि तैसे ॥ ब्रह्माते इमि जगत प्रकटाई । फेरि लीन तामें है जाई ॥ सत्य शुद्धमें मनको फुरना । सो कारण सब दुःखको जुरना ॥ उपै खपै बिधिते जिव कैसे । अग्निते चिनगारी लखि जैसे ॥ दुःख मूल बासना बिकारा । मनही कर्म रूप निज धारा ॥ मन अरु कर्म एकही आहीं । कमलसुगन्धभेद जिमि नाहीं ॥ मनमें जो संकल्प फुराई । सो अँकूर कर्म कहलाई ॥ कर्म कि पूर्व देह मन अहई । मनमय देह कर्मका गहई ॥ जो कछु सत्य असत्य गहोई । मनको कियो सत्य सब होई ॥

इति

अथ चारवर्णकी उत्पत्तिवर्णन—चौपाई

ब्रह्मा मुख ब्राह्मण प्रकटाये । ब्राह्मणको इमि अर्थ बताये ॥ प्रथम अक्षर पवित्रता थापू । द्वितीये अक्षर तेज प्रतापू ॥ द्वितीये बाहुते क्षत्रिय भयेऊ । अक्षर आदि पराक्रम गहेऊ ॥ द्वितीये अक्षर रक्षा कारी । तृतीये वैश्यको अर्थ उचारी ॥ प्रथम शब्द स पति गह सोई । दूजे अर्थ पालना होई ॥ चौथे चरणते शुद्ध उपाये । ताको ऐसे अर्थ बताये ॥ प्रथम शब्द तुच्छता बताई । द्वितीय दीनता अरु सेवकाई ॥ वेद पाठ षट्कर्म जनेऊ । तीन बरणके हेतु बनेऊ ॥ चहुँके संस्कार क्रम न्यारो । ब्राह्मण वर्णको भेद उचारो ॥ ब्राह्मणमें द्वै भेद है सांचो । पंच गौड अरु द्राविण पांचो ॥

आगनिगमबोध

( ३ )

पंच गौडको नाम बखानो । गौडकनौजियासारस्वतिमानो॥ उत्कल मैथिल पांचों गौडा । बहुरिबखानो पंच जो द्रविडा॥ द्राविड गुजराती अरु नागर । महाराष्ट्र तैलंग उजागर ॥ इनते बहुरि अनेकन भयऊ । न्यारे न्यारे नाम सो कहेऊ ॥ वैरागी दश ब्राह्मण जेई । वेदके धर्म ध्वजाधर येई ॥ क्षत्रीमें द्वै भाग प्रशंसी । एक सूर्य द्वितिये शशिवंशी ॥ वैश्यनमें बहु भांतिक भनिया । अग्रवाल आदिक बहु बनिया॥ शूद्र भेष भाषे विधि नाना । तिनको इहां न करौं बखाना ॥ ब्रह्मा चारों वरण बनाई । ताके मन पुनि चिंता आई ॥ बिन लेखक जगकाज न सरिहै । लेखक गणक कर्म को करिहै ॥ यहि विधि ब्रह्म जो करे विचारा । चित्रगुप्त प्रगटे तेहि वारा ॥

इति

अथ चित्रगुप्तजीकी उत्पत्ति कथा वर्णन—चौपाई

लीने कर लेखनि मसिदानी । प्रकटे चित्रगुप्त गुणखानी ॥ ब्रह्माकी अस्तुत उच्चारै । सोधुनिमुनि विधि पलकउधारै॥ ब्रह्माकी तब आज्ञा पाई । तपको चित्रगुप्त बन जाई ॥ वारह वर्ष कीन तप गाढे । पुनि भे ब्रह्मके सन्मुख ठाढे ॥ तब ब्रह्मा निज सभा लगाये । सुरनरमुनिभूपति चलिआये ॥ ऋषी सिसिरसा तहैं पशुधारा । निजकन्या वरहेतु विचारा ॥ कन्या चित्रगुप्त को न्याहा । महिपमन्वंतर पुनि अस चाहा ॥ भूप मन्वंतर सूरजको पोता । ताहि सभा तिहि औसर होता॥ सोऊ अपनी पुत्री देऊ । दोऊ तिय चित्रगुप्त वर गहेऊ॥ पुत्र यउपो दोनों नारी । एकते आठ एकते चारी ॥ माथुर गौड अरु कर्न भनीजै । बालमीक श्रीध्वजहि गनीजै ॥ सकसैना श्रीवास्तव ऐसे । श्रेष्ठाना श्रम सूक हैं तैसे ॥

( ४ )

बोधसागर

भटनागर कुल श्रेष्ठ कहाये । निगम नाम बारह बतलाये ॥ द्वादश चित्रगुप्तके जाये । कायथ लेखक गणक कहाये ॥ चित्रगुप्त धर्मरायके द्वारे । पुण्यपापको लेख उचारे ॥ तिमि ताके सुत पृथ्वी माही । राजद्वार पर लेखक राही ॥

इति

अथ चार आश्रमको वर्णन

दोहा-ब्रह्मचर्य गिरहस्थ पुनि, बानप्रस्थ संन्यास । भिन्न भिन्न इनके धर्म, मरम वेद परकाश ॥

इति

अथ चार वेदोंकी उत्पत्ति कथा वर्णन चौपाई

चौमुह वाक्य ब्रह्ममुख भैऊ । चारों वेद ताहिंते कियऊ ॥ असी सहस्र कमर्कांड प्रमाना । सोलह सहस्र उपाछा जाना ॥ चार हजार कहावै ज्ञाना । यह त्रिकोंडमत वेद बखाना ॥ चारों मम वाक्यको टीका । लक्ष श्लोक व्यास कृत टीका ॥ जेते शास्त्र पुराण कहाये । चारों वेद कि आस गहाये ॥ चारों वेद मूल सब केरा । महाबाक अब करो निबेरा ॥ प्रथमै जो ऋगवेद कहायो । पूरब मुख ब्रह्मा प्रकटायो ॥ ब्रह्मकी बानी भइ येही । प्रज्ञाना ब्रह्म कहि देही ॥ महाज्ञान कहिये प्रज्ञाना । ब्रह्म अर्थ परमेश्वर जाना ॥ यहि महा वाक्य रचे ऋगवेदा । क्रम उपाछा ज्ञान त्रिभेदा ॥ पूरब दिश ऋगकी अधिकाई । द्वितिये यजुर्वेद कहि भाई ॥ दक्षिण मुख ब्रह्मा निज खोले । अहं ब्रह्मा अस्मी सों बोले ॥ अहं अर्थ में ब्रह्म है ईश्वर । हौं अस्मी कह मैं हों ईश्वर ॥ यहि महाँ बाकते यजुर बनाये । दक्षिण देश अधिक फैलाये ॥ सामवेद तृतिये विख्याता । मुख पश्चिम ब्रह्माकी बाता ॥

आगनिगमबोध

( ५ )

महावाक्य ब्रह्माकी येही । तत्त्वमसी ताते कहि देही ॥ तत्त्व ईश्वर त्वं जीव कहाये । हौं पुनि स्मीको अर्थ बताये ॥ पश्चिम दिशतेहिअधिकपसारा । तीनों विधि ताको व्यवहारा ॥ चौथे वेद अथर्वण भाषी । उत्तर सुख ब्रह्माकी साषी ॥ तीनों वेदसे ताहि निकारा । तामें महावाक्य यह धारा ॥ अहं आत्मा ब्रह्म पुकारो । ताका ऐसो अर्थ विचारो ॥ अहं है मैं आत्मम है आपा । ब्रह्म नाम परमेश्वर थापा ॥ मेही हौं परमेश्वर आत्मम । उत्तरमें यहि वेद महात्मम ॥ चार युक्ति चहुँ वेदन माहीं । प्रथमें विधि जिहिकर्मकराही ॥ द्वितीये अर्थ बाद बतलाये । अस्तुति और कर्मफल गाये ॥ तृतिये मंत्र जो देव अराधू । चौथे नाम कथा शुचि साधू ॥ षट प्रकारकी विधि चहुँ वेदा । प्रथमें जग उत्पति निवेदा ॥ द्वितीये प्रलयको व्यौरा ठाना । तृतिये सुरसुनि चरितबखाना ॥ चौथे मन्वन्तर कथ दशचारो । पंचम सुरसुरपति व्यौहारो ॥ छठये धर्मशास्त्र विधिभाषा । तामें कथा भांति बहु राखा ॥ विद्या सकल जगत व्यौहारा । ज्ञान विधान अनेक प्रकारा ॥ ब्रह्मवाद भाषे विधि नाना । जाके पढे लाभ हो ज्ञाना ॥ चार वेद बुधि विद्या मूला । रचे शास्त्र षटतिहिअनुकूला ॥

इति

अथ षट् शास्त्रनको वर्णन चौपाई

अब षट्शास्त्रको वर्णन सुनिये । प्रथम न्याय ऋगवेदतेगुनिये ॥ गौतम न्याय कर्ताको करता । अस विचार ताके उर बरता ॥ सर्वे मई परमेश्वर जाना । एकते बहुरि अनेक बखाना ॥ उत्पति प्रलय कथा बखाने । नित्यानित्य बाद बहु ठाने ॥ द्वितियमीमांसाशास्त्रजोकहिया । यजुर्वेदते ताको गहिया ॥

( ६ )

बोधसागर

जैमिनि मीमांसक रचताही । शिष्य प्रसिद्ध भये बहु बाही ॥ परमेश्वरहि अकर्ता जाना । जक्त अनादि अनंत बखाना ॥ ज्ञान मुक्ति सब कर्मके द्वारा । कर्मके बशी भूत संसारा ॥ मुक्ति होय जिव ज्ञानके मर्मी । ब्रह्मा होय करन भल कर्मी ॥ तृतीय शास्त्र वेदांत बताये । सामवेदेते व्यास बनाये ॥ एक ब्रह्म द्वितीया कछु नाहीं । स्वप्न समान जक्त दरशाहीं ॥ ब्रह्ममें जबही माया डोले । ताको तब ईश्वर कहि बोले ॥ ईश्वर तीन भाग पुनि भयऊ । रज सम तमगुननामसोकहेऊ ॥ जेते जक्त माँह व्यौहारा । यही तीन सबके करतारा ॥ कर्म रहितसो ब्रह्म बखाना । कर्म स्वरूप तीन ये जाना ॥ मायायुक्त भये जब तीनों । तिहि कारण ईश्वर कहि दीनों ॥ ब्रह्म अविद्या युक्त जो होई । ताको जीव कहे सब कोई ॥ त्रिगुणब्रह्म अरु जग जिवसारे । सबही एक स्वरूप विचारे ॥ भिन्न अविद्या करिके माना । द्वै शक्ती तिहि माँह बखाना ॥ यक विशेष शक्ति कहलाये । द्वितीये अबरनशक्ति बताये ॥ शक्ति विशेषते जग उपजाये । अबरन शक्ती ज्ञान दुराये ॥ ज्ञानके उदय मुक्तिपद धरही । वेदांती यह निर्णय करही ॥ चौथे सांख्यशास्त्र मत गाढा । ताहि अथर्वण वेदते काढा ॥ रचे ताहिको कपिल मुनीशा । सोउ अकर्ता कथ जगदीशा ॥ सबही रचना प्रकृति कराये । जक्त अनादि सदा यहिभाये ॥ काहू बस्तूको नाश न होई । करता में करतूत समोई ॥ द्वैविधि भाषे पुरुष महातम । जीव आतमा अरु परमातम ॥ पुरुष प्रकृतको जब हो मेला । होय सकल रचनाको खेला ॥ पुरुष पंगुला परकृत अन्धी । दोहु बिनन्हि जगरचना बंधी ॥ प्रलय कालतिहु गुन समताई । रचनामें सतगुरु अधिकार्ई ॥

आगमनिगमबोध

( ७ )

पुरुषते महातत्त्व प्रकटार्ह । पुनि हंकार इन्द्रीतत्त्व गार्ह ॥ प्रलयको घौस बहुरि जब आवै । इन्द्री तत्त्व सब तहाँ समावै ॥ जिहि क्रमसे जो दियौ देखाई । तिहि क्रम २ सब जाहि लुपाई ॥ पंचम शास्त्र पतंजल कहेऊ । वेद अथर्वणसे सो गहेऊ ॥ ऋषि पातंजलि ताहि बनाई । वर्णन सारुयशास्त्र सम तार्ह ॥ योग युक्ति तिहि माँह बखाना । ज्ञान द्वारते युक्ति प्रमाना ॥ छठे शास्त्र वैशेषिक भाये । मुनि कणाद कर्ता कहलाये ॥ वेद अथर्वणते गहि लीना । यह षट्शास्त्रको वर्णन कीना ॥

इति श्री षट्शास्त्र

अथ चार उपवेद वर्णन

दोहा-आयुर्वेद धनुर्वेद पुनि, गन्धर्ववेद बखान ।

अथर्वेद ये चार हैं, तिनकी निर्णय ठान ॥

चौपाई

प्रथमे आयुर्वेद करतारा । ब्रह्मा प्रजापति अश्वनीकुमारा ॥ धन्वन्तरि आदिक रच ताही । कामशास्त्र वेदादिक जाही ॥ द्वितिये धनुर्वेदके करता । विश्वामित्र नाम सो धरता ॥ ब्रह्मा परजापति से जोई । विश्वामित्र सिखे गुन सोई ॥ सकल युक्ति शिष कीन प्रचारा । परजा पालन कै व्यौहारा ॥ शास्त्र प्रहारकि युक्ति है तामें । युद्धकरनकी बिधि वह वामें ॥ आयुध दोय प्रकारके मुक्ता । एक है मुक्त अरु द्वितिय अमुक्ता ॥ तृतिये मुक्तामुक्त कहाऊ । यंत्र मुक्त चौथेको नाऊ ॥ हाथसे जो चक्रादि चलाये । ताको नाम मुक्त बतलाये ॥ तरवार आदि अमुक्त बखाना । बरछी मुक्तामुक्त प्रमाना ॥ बहुरि तीर आदिक अरु गोली । यंत्र मुक्त तिनको कहि बोली ॥ मुक्त आयुधको अस्त्र कहीजै । अरु अमुक्तको शास्त्र भनीजै ॥

( ८ )

बोधसागर

सने चार प्रकार नाम धर । घोढचढरथचढगजचढपद्मचर॥ असगुन सगुन बहुत विधिभाषा । क्षत्री धर्म सकल तह राखा ॥ तृतिये गन्धर्व वेद बताये । ताहि भरथजीने प्रगटाये ॥ नाद नृत्य सुर ताल अनन्ता । विविधि भांतिसे ताहि बंदता ॥ युक्ति अनेकन देव अराधू । निरविकल्प पुनि कथे समाधू॥ चौथे अर्थवेद विधि कहिये । नाना युक्ते ताहिमें लहिये ॥ नीति शास्त्र अरु अश्चारुढा । शिल्प सूष आदिक मतिगुढा॥ धन उपाय बहु विधि तहलहिये । अर्थ वेद यहि कारण गहिये ॥ द्रव्य उपाजन रीति बनाई । अर्थ वेद पुनि अस अर्थाई ॥ कसेहु निपुण होय नर जोऊ । भाग बिना धन लहै न कोऊ ॥ ताते अन्त कथे बैरागा । सब चातुरी वृथा इमिलागा ॥ चहुँ उपवेदको यह सिद्धांता । सब तजि हो विरक्त बुधवन्ता ॥ वेद उपवेद कि विधिमें पागा । अन्त मुख्य वैराग अरुत्यागा॥

इति

अथ चार उपवेद षट् अंगवर्णन--चौपाई

शिक्षा कल्प व्याकरण वरनो । पुनि निरुक्तियोतिषचितधरनौ॥ पिंगल सहित कहैं षट् अङ्गा । विविधि भांति भाषे परसंगा॥ प्रथमें शिक्षा शास्त्रमें कहेऊ । नाना भांति कि युक्ती गहेऊ ॥ वेदके शब्द न माह बखाना । अक्षरनके अस्थानको ज्ञाना ॥ पाणिनीय है ताके करता । युक्ति चातुरी बहु तहँ धरता ॥ द्वितीये कल्पके सूत्रन माहीं । वेद कि विधिसो कहै तहाहीं ॥ कर्मके अनुष्ठान विधि गायन । पाणिनि पातंजलि कात्यायन ॥ तृतिये कथे व्याकरण जोई । वेदको शब्दबोध तिहि होई ॥ पाणिनीय आदिक बहु तेरे । कर्ता सोई व्याकरण केरे ॥ चौथे निरुक्त शास्त्रके माहीं । ऐसी निर्णय कीनो ताहीं ॥

आगमनिगमबोध

( ९ )

अपर सिद्धपद वेद जो होई। तासु अर्थ बोधक है सोई ॥ यास्क मुनीश्वर कथे बखानी। नाम निरूपन निर्णय ठानी ॥ आदित्य आदिक अरु बहुतेरे। रचित निरुक्त शास्त्र तिन केरे ॥ पंचम पिंगल कीन बखाना। पिंगलमुनिरचि छंद विधाना ॥ छटये ज्योतिष कालको ज्ञाना। आदित्यादिक गर्ग बखाना ॥

इति चार उपवेद

अथ अठारह पुराणोंके नाम-चौपाई

ब्रह्म बहुरि वयवर्त बखानो। बावन अरु ब्रह्मांड प्रमानो ॥ मार्कण्डेय भविष्य कहावै। नारद विष्णु पुराण बतावै ॥ गरुड बराह अरु पद्म गनीजै। भागवत मीन वो कूर्म कहीजै ॥ लिंगो वायु पुराण बताया। फिर अस्कंधो अग्नि कहाया ॥

इति

अथ शास्त्रके अठारह प्रस्थान वर्णन-चौपाई

शास्त्रके हैं प्रस्थान अठारा। या विधि तिनको नाम उचारा ॥ चार वेद उपवेद हैं चारी। वेदनके षट् अंग विचारी ॥ धर्मशास्त्र मीमांसा न्याई। चौथे पुनि पुराण बतलाई ॥ उप पुराण पौराण अनेका। अठारहेंकी नियम न एका ॥ स्मृती महाभारत रामायण। मंत्रशास्त्र नाना विधि गायन ॥ वाम तंत्र देवीके राखा। नारद पंचरात्र पुनि भाषा ॥ देव अराधन विधि बहु भनते। जक्त कार्य ताते भल गनते ॥

इति

अथ चारवेद को बाद वर्णन-चौपाई

प्रथम कहै ऋगवेद बखानी। निराकार परमेश्वर मानी ॥ निरलेपो सो अलख अगोचर। निरालंब सो जान ब्रह्मवर ॥ द्वितीय अथर्वण भाषत होई। निरालम्ब निलैप न कोई ॥

( १० )

बोधसागर

नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण कहेऊ । जो कोइ मरा मुक्त सो भैऊ ॥ जैसे पत्र वृक्ष ते टूटा । फेर न सो तरुवरमें जूटा ॥ ऐसो जीव मरा यकवारा । बहुरि नहीं ताते तन धारा ॥ तृतीय यजुर अस कहे बहोरी । इन दोनोंकी मतिभई भोरी ॥ सर्गुण ब्रह्म नरायण होई । क्षीर समुद्र शयन कर सोई ॥ दश अवतार सोई धरिलीनो । गोपीनके संग कीडा कीनो ॥ चौथेसाम कह पुनि मत अपना । यह सब जानो झूठ कल्पना ॥ नहीं सर्गुण नहीं निरगुण देवा । नहीं दृष्टि गोचरको भेवा ॥ सम्पूर्ण है ब्रह्म अखण्डा । तत्वमसी अद्वैतसे मण्डा ॥

इति

अथ षट्शास्त्रकी बादर्षणन—चौपाई

प्रथम मीमांसा शास्त्र आचारी । कर्म थापि निजु ज्ञान उचारी ॥ जो कछु लाभ जक्तसे कीना । सो सब जान कर्म आधीना ॥ कर्महि अधिष्ठान जिवकेरा । कर्मते करे जक्त में फेरा ॥ कर्म प्रवृत्त कर्म लय पावै । कर्महि दुखसुख जीव भुगावै ॥ भूत भग्य व्रत मानिक जोई । कर्म अधीन जान सब सोई ॥ अज हरि हर सनकादिक जेते । कर्म अधीन जान सब तेते ॥ कर्म अधीन ज्ञान अरु योगा । जो जस करे भोग तसभोगा ॥ कर्म स्वतंत्र सर्वे परगावै । जो जस करै सो तसफल पावै ॥ द्वितीय बाद वयशेष वदंता । कर्म नहीं जानिये सुतंता ॥ कर्मतो कालकि बसमें होई । काल पाय कर्मकरै न कोई ॥ जब कतहुँ परगात न होई । भोर कर्म तब करै न कोई ॥ जौ मध्यान न सन्द्या आवै । बिना काल को कर्म गहावै ॥ बाल कर्म ना हो तरुनाई । युवा कर्म नहीं शिशु करि पाई ॥ युवा कर्म करि सकै न बूढा । वृद्ध कर्म तरुनाई गूढा ॥

आगमनिगमबोध

( ११ )

ताते यह निश्चय करि मानो । कर्म कालकी वश में जानो ॥ कालहि ब्रह्म और नहिं कोई । काल पाय अज हरि हर होई ॥ काल पाय पुनि सो बिनसाही । उतपति प्रलयकाल वश आही ॥ कालहि ते सुख दुख लहंता । काल स्वतन्त्र कर्म परतन्ता ॥ जब चाहे क्रम कर नर लोई । काल किये ते कवहु न होई ॥ ताते काल सत्य करि मानी । कर्म असत्य वैशेषिक बानी ॥ तृतीय न्याय निज मत अर्थाई । काल है छीन छीन है जाई ॥ घटि बटि जाय कालकी बाते । काल कर्म नास्ती दोष ताते ॥ अस्ति एक परमात्म आही । तीन काल आवै अरु जाही ॥ निजु बश ईश्वर कालको धरई । जब जस चाहे तब तस करई ॥ ग्रीषम वर्षा काल बनावै । वर्षाको ग्रीषम दिखलावै ॥ चाहे रंक् रावकरि द्वारी । भूपतिको पुनि करे भिखारी ॥ सकल सूत्रधर ईश्वर ऐसे । नाचे जग कठपुतली जैसे ॥ ताते परमेश्वर है अस्ती । काल वो कर्म सुभाव है नास्ती ॥ चौथे पतञ्जलि कह यह लेखा । कहो कहां तुम ईश्वर देखा ॥ तुम नहिं जौ ईश्वर लखिपाई । तौ पुनि कैसे ताहि बताई ॥ कैसो ईश्वर होइ रे भाई । बिन देखे कह कहो बुझाई ॥ ईश्वर वहां सो कैसे जाना । बिनु अनुभव भाखे अनुमाना ॥ पीतर पाथर प्रथमा पूजो । अनुमानहिते मनमें सूजो ॥ यह सब झूठ भरमको फन्दा । आत्म शुद्ध सच्चिदानन्दा ॥ सो हम जोग मार्ग ते जाना । तुमको नहिं कहु अनुभवज्ञाना ॥ तुम प्रतिमा पूजो यहि लेखे । हम ब्रह्मांड पिंडमें देखे ॥ तुम हो झूठो हम हैं सांचे । ईश्वरकी अनभौ तुम काचे ॥ ताते योग सत्करि जानो । और सकल झूठा करि मानो ॥ पञ्चम सांख्यपती अस बोलो । तुम सब मिथ्या भ्रमयुत डोलो ॥

( १२ )

बोधसागर

यकदेशी अनुभव अरु ज्ञाना । सो कछु कामको नहीं बखाना ॥ ब्रह्म सर्व देशी कह सोई । साक्षी सर्व अकर्ता होई ॥ सब करतूत प्रकृती ठाना । योग समाध साधना नाना ॥ उत्तपति अस्थित परलय कर्मा । सो सबही प्रकृतके धर्मा ॥ पांचों तत्त्व पचीस प्रकृती । चारों देह आदि सब नास्ती ॥ ईश्वरको जो जाननहारा । सर्वसाक्षि सो आस्ति पुकारा ॥ ये सब अनितमें नितको आस्ती । योग आदि सब मिथ्या नास्ती ॥ झूठे वेदान्ती ऐसे कहई । मिथ्यावाद सकल यह अहई ॥ एक अखण्ड ब्रह्म है जोई । तामें अस्ति नास्ति नहिं कोई ॥ आप आप सम्पूर्ण व्यापा । अमकरी त्रिपुटी तामें थापा ॥ ध्याता ध्यान घेय नहिं कोई । ज्ञाता ज्ञान होय नहिं जोई ॥ ब्रह्म अखण्ड अद्वैत एकरस । ताते द्वैत भाष भाषे कस ॥ नित्य नित्य समाधि है जोई । तामें सो सम्भवै न कोई ॥ देखन अरु देखनमें आये । देखनहार ब्रह्म बतलाये ॥ ब्रह्मते इतर और न कोई । नास्ति और सब मिथ्या होई ॥

सोरठा-वाद करे इमि सोय, चार वेद षट् शास्त्र मिलि ।

भेद न पावे कोय, अगम अपार अकथ कथा ॥

सत्य कबीर वचन

सारखी-वेद हमारा भेद है, हम वेदनके माहिं ।

जौन भेदमें मैं बसो, वेदौ जानत नाहिं ॥

अथ विष्णुके चौवीस अवतारको-वर्णन

दोहा-मीन कूर्म बाराह कह, नरहरि बामन बंक ।

परशुराम रघुराम कह, कृष्ण बुद्ध निष्कलंक ॥

व्यासकपिल हयग्रीव पृथु, यज्ञत्रहपभ सनकादि ।

दत्त मन्वतर बद्धिपति, धानन्तर इंसादि ॥

आगमनिगमबोध

( १३ )

चौपाई

हरि औतार बहुत जग माँही । तिनकी कथा कही नहिं जाही ॥ हरि औतार जेते जग भैऊ । राम कृष्ण सर्वोपरि कहेऊ ॥ सुजस जासु जगमाहिं बखाना । गुण गण गावै वेद पुराना ॥ हरिमहैं चक वर्त तिहु पुरके । कोई शत्रु नहिं सम्मुख फरके ॥ ताते तिनकी कथा न लेखो । वेद पुराण न अधनी देखो ॥ जहाँ तहाँ हरिमंदिर सेवा । पूजै विष्णु विश्वंभर देवा ॥ तीन देवमें होइ है सोई । घट घट माह विराजै ओही ॥ चारों विधिकी मुक्ति लहीजै । विष्णु देवकी सेवा कीजै ॥

इति विष्णुके चौबीस अवतार

अथ ब्रह्माके षट् अवतारके नाम

दोहा-गौतम कलि कृपाद मुनि, व्यासो जैमिनि जान । मंडनमिश्र मीमांसकहि, ब्रह्म जग प्रकटान ॥

इति

अथ शिवजीके ग्यारह रुद्रके नाम

दोहा-सर्पकपाली त्र्यंबको, कपि कर्पादि मृग व्याधि । बहुरूपो वृष शम्भु हरि, रैवत वीरभद्रादि ॥

इति ग्यारहरुद्र

अथ ब्रह्माके दैहिक और मानसिक पुत्रनके नाम-चौपाई

ब्रह्मा द्वे सुत प्रथम उपाये । एक दक्ष एक अत्रि कहाये ॥ दक्षते सूर्यको औतारा । अत्रिते बहुरि चन्द तनु धारा ॥ सूर चन्द कुल क्षत्री भैऊ । पुनि सातो ऋषि देही गहेऊ ॥ भृगु अत्री अरु पुलह बतावो । फिर अंगिरा पुलस्त कहावो ॥ नारद और वशिष्ठ उचारा । पुनिकहसनकादिक औतारा ॥ ब्रह्मा मानसी पुत्र बतावो । अत्री और अंगिरा गावो ॥

नं. १० बोधसागर - ७

( १४ )

बोधसागर

पुलह पुलस्ती कृत गनीजै । भृगु प्रचेत वाशिष्ठ कहीजै ॥ पुनि ब्रह्म तनु सुतकह नामा । दक्ष प्रजापति धर्मो कामा ॥ कोथ लोभ मद मोह उपाये । हर्ष मृत्यु दशनाम बताये ॥

इति

अथ चौदह विष्णुके नाम

दोहा-यज्ञ विभू शतसेन हरि, पुनि वैकुंठो होय । पुनि अजितो बामन कहो, सर्वभूमि ऋषि भोय ॥ पुनि अमूर्ति भ्रममें तहै, बहुरि सुधामा जान । योगेश्वर बृहद्दान ये, चौदह विष्णु बखान ॥

अथ चौदह इंद्रके नाम

दोहा-यज्ञो रोचनसतजितो, बहुरित्रिशिखविभु जान । तथा मंत्र दुम जानिये, फेर पुरंदर मान ॥ बलि अद्भुत शंभू कहो, पुनि वैधृत उच्चार । रिनुधामा पुनि धौसपति, श्रुची इंद्रदशचार ॥

अथ चौदह मनुके नाम

दोहा-मनु स्वयंभू सारोचको, उत्तम तामस रैवत् । चाक्षु शतवृत्त सावनीं, दक्ष सवरनी सत् ॥ ब्रह्म सवनीं धर्म सवनीं, रुद्रसावनीं होय । देवसावनीं इन्द्रसावनीं, ये चौदह मनु रोय ॥

इति

अथ सप्तस्वर्गके नाम

दोहा-भुवरलोक अरु स्वर्ग कहैं, महरलोक जनलोक । तपलोक सतलोक है, सात नामको थोक ॥

इति सप्तस्वर्ग

आगमनिगमबोध

( १५ )

अथ सप्त पातालके नाम

दोहा—अतल वितल सुतलोक ही, फेरि तलातल होय । महातला पाताल पुनि, अंत रसातल जोय ॥

इति सप्त पाताल

अथ नौघरोके नाम चौपाई

प्रथम भूमि भूलोक बखानी । दूजे भुवरलोक है पानी ॥ स्वर्गलोक पुनि अग्निको घेरा । पितर लोक पुनि वायू टेरा ॥ पंचम शून्य लोक आकाशा । अन्तर लोक हँकार प्रकाशा ॥ सप्तम सत्यलोक मह तचू । अष्टम लोका लोक कहचू ॥ ॐ शब्द तहवां ते होई । मायाको घेरा है सोई ॥ ताके परे नामै अस्थाना । शुद्ध स्वरूप निरंजन जाना ॥ शब्द निरञ्जन ते उत पानी । ताते तब माया प्रकटानी ॥ मायाते महतत्त्व पसारा । महा तत्त्व से भा हँकारा ॥ अहँकार आकाश उपायो । पुनि आकाश वायू प्रकटायो ॥ वायुते अग्नि अग्निते पानी । ताते यह भूलोक बखानी ॥

इति

अथ सप्तद्वीप और ब्रह्मांडको वर्णन

दोहा—प्रथमै जम्बूद्वीप कह, शाकद्वीप कर फेर । कौंच कुशा शलमरूप पुनि, पुक्षो पुष्कर टेर ॥

चौपाई

ताते परे योजन दश कोरी । कंचनकी पृथ्वी लै जोरी ॥ परम प्रकाश मान महि सोई । तासु परे परवत यक होई ॥ लोकालोक नाम सो भाषा । महाशून्य बन तापर राखा ॥ उग्र उद्दि यक ताते आगे । बहुरि अग्नि ताते पर लागे ॥

( १६ )

बोधसागर

पौन दसगुना पुनि पर ताही । तासु परे दशगुन नभ आही ॥ तासु परे योजन यक लाखा । सघन कंथ ब्रह्मण्डको राखा ॥

इति समद्वीप

अथ अष्टवसुओंके नाम

दोहा-प्रथम द्रौन पुनि प्रानकह, ध्रू अर्क अग्नि प्रमान । दोषा वसू विभावसू, अष्ट वसू ये जान ॥

इति अष्ट वसु

अथ चार युगोंकी आयुस्थितिर्वर्णन चौपाई

चारों युगकर लेखा प्रमाना । कृत त्रेता द्वापर कलि जाना ॥ सतयुगकी आयू इमि कहसे । सत्रह लक्ष अठाइस सहसे ॥ त्रेताकी आयू पुनि भाषा । छानवे सहस्र अरु बारहलाखा ॥ आठ लक्ष चौसठ हजारा । द्वापर आयू करो विचारा ॥ बत्तिस सहस्र चार लक्ष कहिये । कलियुगको यह लेखा लहिये ॥ चारों युग यक ठौर गहीजै । एक महायुग तासु कहीजै ॥ एक सहस्र महा युग होई । कल्प एक मुनि कहिये सोई ॥ चौद मन्वंतर कल्पमें होई । कल्प एक ब्रह्मादिक सोई ॥ ऐसे दिनको लेखा लीये । एकसौ वर्ष लौ ब्रह्मा जीये ॥ एक सहस्र ब्रह्मा है बीते । तब एक घडी विष्णुकी रीते ॥ ताके दिनते करि पुनि लेखो । निजुसौ वर्षविष्णु थित देखो ॥ जबदशलक्ष विष्णु बित जाही । घडी एक तब रुद्र सिराही ॥ ताहि वर्ष पुनि लेखा कीये । निजु सौ वर्ष रुद्र पुनि जीये ॥ ग्यारह रुद्र जो उगि खपिजाना । रमा शिवा यक घडी प्रमाना ॥ निजु सौ वर्ष कि आयू पाई । सहस्रशिवा जबउगिखपजाई ॥ तब मायाको पलभर होई । न्यौरा वेद बखाने सोई ॥ यह लेखा यक भयो प्रमाना । प्रभु माया गति काडुन जाना ॥