कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( ७३ )
चढ़ी निशंक मन मगन रहा था । सो नहिं करै कालके हाथा ॥ जो जिव माया सों लौ लावा । गहे काल मुख बात न आवा ॥ सोई सन्त समाधी मारी । जाके जीव सहिदानी डारी ॥ साखी-गुरुके शब्द साधुकी पूँजी, बणिज जाने जो कोय । कहें कबीर तो बड़े सवाई, हानि न कबहुँ होय ॥
चौपाई
जबलग सार नाम नहिं आवे । तबलग प्राणिमुक्ति ना पावे ॥ सार नाम बिन सौपके मोती । उपजे बहुत बिना हर खेती ॥ साखी-येहि विधि करे किसानी, पोता तल बल होय । भक्त मिले कोइ वीरला, दाम देय सब कोय ॥ मूलहा मोर नाम हैं, दरगाहे गुरु मान । सब सन्तोसों लिये फकीरी, डार सकल अभिमान ॥
चौपाई
आदि नाम जे संतनमाहीं । जमका करे निशंक डरनाहीं ॥ आदि नाम है अक्षर माहीं । गुरु विन नर्क पुन छूटे नाहीं ॥ सोहं मैं निः अक्षर रहाही । विन गुरुके कौन देह लखाई ॥ चीन्हे परे आवे विश्वासा । लोक वेदकी छूटे आसा ॥ चीन्हे आदि निः अक्षर वानी । छूटे भर्म होय ब्रह्म ज्ञानी ॥ कहें कबीर सन्त सोइ भागी । जाके सुर्त निरंतर लागी ॥ नाम चिन्ह पै कहों पुकारी । नातर बूड़े गैल मझधारी ॥ कहों शब्द मानो नर लोई । आदि नाम बिनमुक्ति नहोई ॥ गुरुके कहे मैं कहों संदेश । नाम लेवे सो पहुँचे देशा ॥ गुरुके शब्द जो माने नाहीं । मुक्ति न हो बूड़े भवमाहीं ॥ साखी-जम आसे बल बांधे, कहों पुकार पुकार । गुरुकी त्रास न होती तो, खाते उनको फार ॥
( ७४ )
मुक्तिबोध
चौपाई
जाको होय गुरुको विश्वासा । निश्चय जाय पुरुषके पास ॥ नर प्राणी कीजे इतबारा । गुरुके कहे मैं करें पुकारा ॥ कहे कबीर मिलन बिन आशा । मिलन भये भेटे विश्वासा ॥ निशिदिनरहे निजनामसमाना । तब जाने भजनी परवाना ॥ यह सब कहों परमारथ काजा । यही पाखंड नर अरुझेबाजा ॥ अक्षर आदि निजनाम सुनाऊँ । जरा मरनके भर्म मिटाऊँ ॥ सोहं के संग आये संसारा । सो गुरु दीजे मोहिं उपचारा ॥ ताको भर्म जान जो पावा । सो साधू जगमें नहिं आवा ॥ साखी-यह अवसर नहिं पावहीं, पलमें लेहु उबार । भवसागर तर जायंगे, क्षणमें लेहि उबार ॥
चौपाई
गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज वैरागी होई ॥ अकह वस्तु तब निज के पाई । तब पाखण्ड कछू नहिं आई ॥ अजर पुरुषको खोजहु प्राणी । कहे कबीर कोई सन्तसमानी ॥ आदि नाम सो सुरत समावे । निरभय मुक्ति अमरपद पावे ॥ गुरुके शब्द जीव हृद करई । सोई सन्त भवसागर तरई ॥ मनके सुख बूझे भर्म फांसा । बुझ जाय न हो सुख बासा ॥ सुरत सम्हार कहत हम तोहीं । पीछे दोष न आवे मोहीं ॥ आदि नाम जो अमीरस चाखे । पांच पचीस बांधके राखे ॥ साखी-प्रेम पन्थ जे पगु धरे, देत न शीश डराय । सपने मोह न व्यापे, ताको जन्म नसाय ॥
चौपाई
तन मन धन सन्तन परवारा । सोई सन्त निज हितू हमारा ॥ का कहैं अमर भरी मैं देऊँ । तेहि सन्तनको निकट बोलाऊँ ॥
बोधसागर
( ७६ )
सोइ संत सतगुरु सुखदासा । अजरपुरुषजहांअजरप्रकाशा॥ अनन्तकोटजाकोपार न पावे । को अस दूसरे गुरु कहावे ॥ हम तुम नारि पुर्ण सब मांहीं । जहां है सोहं तहां हम नाहीं ॥ ताहि खसम चीन्हे नर लोई । तन धर प्रगटे पुरुष न होई ॥ अकह अमान पुरुष जब रहेऊ । नाम निःअक्षर तासों भयेऊ ॥ ताहि नाम को सुमरे कोई । सुर नर मुनि इन्द्री वस होई ॥ अधर पियाला पियरस सांचा । ऐसी रहन रहे सो सांचा ॥ पियत अमीरस अधिक सुहाये । अधिक पिये पुनित्रास नसाये ॥
साखी-पांच पचीसों तीन गुण, एक मिहलमें राख ।
आदिनाम अनभय उच्चरो, तन मन धन सो चाख ॥
धन परखे धनवन्त जो, ज्ञान दृष्टि जो होय ।
आंघे गुरु विन ना सुझे, कोटकरे जो कोय ॥
चौपाई
कहे कबीर भर्म जब छूटे । मुक्ति भली सांची कर लूटे ॥
कहेऊं उपचार कछु परदा नाहीं । विन गुरु नरको सूझे नाहीं ॥
कथनी कथे कथे का होई । गुरु विन मुक्ति न कबहुं सोई ॥
शब्द रूप हमहीं होय आये । हमहीं होय कडिहार कहाये ॥
हमहीं नाम प्राण यह माहीं । हमहीं सन्त मर्द तेहि पाहीं ॥
साखी-ज्ञानदीपक सुरतकी वाती, दीनो संतन हाथ ।
दीपकलेके खोलिये, निस दिन सतगुरु साथ ॥
ज्ञान दीपक प्रकाशके, भीतर भवन उजाल ।
तहां बैठ पुरुषको सुमरो, सहजै होय निहाल ।
चौपाई
सो भजनी सबसी से ऊँचा । जोई अमर औ मतका ऊँचा ॥
यहि विधि भजन करे जो कोई । तीन लोकमें वास न होई ॥
( ७६ )
मुक्तिबोध
लोक वेद कर्म भरम नसावे । होय सुदृष्टि प्यासको पावे ॥ यह संसार अस कर जाने । सत्य पुरुषको जो पहचाने ॥ कहैं कबीर या तनको सोधो । पांच पर्चास तीनको बोधो ॥ एक नाम विन जग जस शवाना । कोट करे नहिं मुक्ति निदाना ॥ साखी-कहैं कबीर ये सब सुए, लहिं विषधरकी धार । जो जीव सतगुरु पावैं, ते जीव जगसे उबार ॥
चौपाई
बिरला जन कोई भक्तिहिलहई । जो थिर होय तो भक्तिही कहई ॥ आपही पुरुष और सब नारी । सेवक भये सकल देहधारी ॥ अचल अमान जो अकह कहावा । ताकी गत बिरला जन पावा ॥ आदि पुरुष को बिरला पावा । ब्रह्मा विष्णु शिव पार न पावा ॥ साखी-अमृत वरण ये मूरत, ताहि कहों गुण पेश । गुरुकी दाय़ा सो लखे, सुरत निरतकर देख ॥
चौपाई
निः अक्षर निर्गुण सो जाने । और सकल जग गुण नहिं आने ॥ तीनों गुण लै सर्गुण बोले । निर्गुण तनके माहीं डोले ॥ आदि नामसों सब जग वांधा । आदि नाम जाने सो साधा ॥ आदि नाम तहाँ अक्षर धारा । ताहि नाम लै सब विस्तारा ॥ आदि नाम देव शंकर भयऊ । और नाम है नरके सुभाऊ ॥ पद साखी निश्चै कर जाने । आदि नाम कहैं मूल बखाने ॥ मूल मंत्र जाने सो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ भूलै लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥ प्रेम अभागी मूल नहिं जाने । डार पत्रमें पुरुष बखाने ॥
साखी-अचर पुरुष एकै रहे, अजर दीप है स्थान । कहै कबीर सर्वांग विराजे, ताहि पुरुषको जान ॥
बांधसागर
( ७७ )
चौपाई
निःअक्षर पावे नहीं सोई । कैसे कै स्थिर प्राणी होई ॥ जब लग गुरुओं करे न नेहा । तबलग प्राणी प्रेतकी देहा ॥ आदि नाम अमृत तन पावा । जाति पांति कुलधर्म नसावा ॥ आदि नाम है गुप्त संसारा । जो पावे सो होय हमारा ॥ संत कुल तोर भर्म कुल तोरे । संत साधु सों नाता जोरे ॥ तज पाखण्ड वैरागी होई । अपने पिया को पावे कोई ॥ सार्वी-कहो काल का कर सके, पुरुष नाम जेहि पास ॥ निर्गुण निंदक पच सुए, गुरुका नहीं विश्वास ॥
चौपाई
पुरुष नाम जेहि परिचय होई । सब भेषन में गुरु है सोई ॥ ताकी महिमा अगम अपारा । लोक वेद तज भये नियारा ॥ अचल पुरुष जो अचल है देशा । आदि नाम लेकर परवेशा ॥ जाहि वस्तु में मिटे दुख द्वंद्व । सुख सागर तहां प्रेम अनंद ॥ अगुण सगुण होइ झगरा बाजे । दोष दलतजिके पुरुष विराजे ॥ कहें कबीर या भक्ति के मूला । अकह अमान अचल अस्थूला ॥ अब्रण वरण सो भेद निनारा । घट घट वसे लिप्त तनधारा ॥ ताहि पुरुष को चीन्हें प्राणी । घटमें रहे निकस ना जानी ॥ तबही कहिये खसम खुदाई । कौन कपट से आवे जाई ॥ कौन पुरुष में रहे समाई । सो प्रभु है संतन सुखदाई ॥ यह सब धन अनुभवकी वानी । खोजी होकै सो पावे प्रानी ॥ देख परख आवे विश्वासा । अगुन सगुन के सबै तमाशा ॥ सत्य शब्द कहि दीन्ह सँदेशा । जरा मरण का मिटे अँदेशा ॥ संत संदेशा गुरु मोही दीन्हा । जे जन होय ताहिको चीन्हा ॥ कहै कबीर है वस्तु अपारा । ताहि वस्तु गहि उतरे पारा ॥
( ७८ )
मुक्तिबोध
मूल मंत्र सब मथिके बूझे । अगम अगोचर तब कछु सूझे॥ जो जो वस्तु दृष्टि में आवे । सोइ वस्तु काल धरि खावे ॥ यह धन मिले देखे प्रणधारी । ताको दीजे भेद विचारी ॥
साखी-बिन देखे बोले जस, अंधरा हाथि परेख ।
बलिहारी वहि सन्तकी, निरख परखके देत ॥
चौपाई
तन अभिमान सब सर्वही धरहीं । मूल मन्त्र कैसे लख परहीं ॥ होय नहीं दास धरे अभिमाना । ताहि न दीजे अनुभव ज्ञाना ॥ मुक्ति भये संतन हित कीन्हा । मुक्ति भली प्रकट कहि दीन्हा ॥ कहैं कबीर तेहि की बलिहारी । पुन अनुभव मैं कहों पुकारी ॥
साखी-समझाये समझे नहीं, धरे बहुत अभिमान ।
गुरुके शब्द उच्छेदके, कहत सकल हम जान ॥
चौपाई
बोले बचन बहुत विस्तारा । आदि नामविनघटे अँधियारा ॥ पुरुष न चीन्हें फिरे भुलाना । निश्चय परे सोइ नर्क निदाना ॥ एक नाम बिन पार न पावे । मिथ्या प्राणी जन्म गमावे ॥ देख परे सोई सब भाषा । और कहनकी है अभिलाखा ॥ जाकर सज घट करे समाई । ताते साधू देहि लखाई ॥ अधिक भरे ऊँचे से सीजे । सो माया जो रुच रुच पीजे ॥ और सीचे अनुभव धन देखे । और सकल मिथ्याधनलेखे ॥ हरष शोक दोऊ परिहारे । होय मगन गुरु चरणै धारे ॥ अजर अमर सो अकह कहावे । जो धन मिले सो संत कहावे ॥
साखी-यह धन पूजी गुरुकी, भाग बड़े जिन पाय । कहैं कबीर आय नहीं टोटा, नित खरचे अरु खाय ॥
बोधसागर
( ७९ )
चौपाई
यह ना आवे अमर प्रकाशा । जो धन खोजहु धनके पास ॥ यह धन मिले होय बड़ भागी । सोई सन्त पग वैरागी ॥ करै विवेक वस्तु है न्यारी । यह सब है सपनेकी न्यारी ॥ ताहि गहे नर सुरत सम्हारी । सोई सन्त पूरा हितकारी ॥ बारा राशी मन्त्र चौबीसा । यह सब है सपनेको ईसा ॥ विन परचै नर आह जो करई । निश्चय जाय नरक सो परई ॥ जो नहिं मोक्षके शब्द विचारा । तिनहिं काल ले करै अहारा ॥ सारा नाम विन मुक्ति न पावै । बूड़ मरे पुन थाह न आवे ॥ निंदक नरक पौरे नहिं तरई । चार खूंट में भर्मत फिरई ॥ देह धरे नहिं सुतैं दृढ़ाई । उपजत बिनास चौरासी जाई ॥
साखी-भर्म जाल संसार है, सब अरुझे भव भीत । कोई कहैं जन एक है, मनमें राखो भीत ॥ चरणाभूत जो पायके, दृढ़ राखे विश्वास । निर्भय मुक्ति पाईये, पहुँप दीपकी वास ॥
चौपाई
सुतैं दीपकी अकथ कहानी । अगम अगोचर अनुभव वानी ॥ अकह सुतैं जहैं अगम अपारा । ताहि गहे उतरे भव पारा ॥ लखे अंक जो अकह कहानी । अगम अगोचर अनुभव वानी ॥ तजै पाखण्ड सोई निर्वानी । सोई सन्त कहावे ज्ञानी ॥
साखी-पुरुष सार सों न्यार है, दीखे सबहिन भीत । ज्ञानदृष्टि में जगसों छुटे, जो जन प्रेम पुनीत ॥ कहैं कबीर दरसाये, जाके उर निश दिन रहै । सोई करे गुरुवाय, झक मारे संसार है ॥
( ८० )
मुक्तिबोध
चीठी उतरे दूरसौं, ताके सिर वैराग । नाम गहे पुरुष पावहीं, तब गुरु प्रगटे भाग ॥
चौपाई
पावे वस्तु मगन होय रहई । चढ़े ना उतरे लाख जौं कहई ॥ होय निशंक नहिं चित्त डुलावे । जो जेहि सुर्त धरे सो पावे ॥ अकह अमान पुरुष है सोई । तन धरि प्रगटे पुरुष न होई ॥ मूल वस्तु पावे बड़ भागी । देखिये साखी पदमें नागी ॥ कहि न जाय अकह को देखा । गुरुकी दया सुर्त सो पेखा ॥ साखीपद के तहां न काजा । आप मिले सोइ सेश विराजा ॥ अनुभव शब्द जहाँ ठहराना । को कह सके न जाय बखाना ॥ देख परख आवे परतीती । तब जैहै चौरासी जीती ॥ तहां नहीं तुम दुतिया भाऊ । आप मेड़ तबही सब गाऊ ॥ वहां बैठ अमृत फल पाऊ । जब निःशंक बहुर नहिं आऊ ॥ गुरु के शब्द हृदय मो आना । तानरकी भइ मुक्ति निज जाना ॥ कोटि असुर की राई आवे । हृद विश्वास सन्त जेहि पावे ॥ कहैं कबीर है शब्द सुहेला । गुरु पूरा सूरा होय चेला ॥ साखी-गुरु पूरा शिष्य सूरा, बाग मोरि रन पैठ । सन्तमुक्त कहैं चीन्हके, तब तखत पर बैठ ॥
इति मुक्तिबोध समाप्त
शब्दबोध एवं अलिफनामा (षोडश व सप्तदश तरंग)
सत्यमुक्त, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, मुदर्शन नाम, कुलपति नाम प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी वंश- व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे
★
षोडशस्तरंगः
श्रीग्रन्थ चौकास्वरोदय
★
प्रथम प्राण योग जो भाखा । कारज सिद्ध जो बाहर राखा ॥ प्राणायाम भेद सबहीको सारा । कारज सिद्ध वेद व्यवहारा ॥ वोई सुरूप हम आनि निर्माये । आधेको नर आधकी नारि बनाये ॥
नं. ७ कबीर सागर - ४।
( ८२ )
चौकास्वरोदय
सो स्वरूप हैं आदि निशानी । सत्यस्वरूप सो जीव समानी॥ प्रथमशब्दसुरतिसमृति निर्माया । जितने वेद और लोक बनाया॥ दुतिये इच्छा अंकुरकू कीन्हौ । उत्पतिप्रलयसौपि सब दीन्हौ॥ तृतिये माया मन विस्तारा । तिनके बीज जीव संचारा ॥ चौथे सुर चन्द्रहि परकाशा । शुक्ल भेद तिहिमाँहिनिवासा॥ पाँचयदिवशरातऔरतिथीपसारा । तापर सूर्य चन्द्रकी धारा ॥ एक नारि एक पुरुष कहावा । चन्द्र सूर्यनाम तिन पावा ॥
राखी-तिनको भेद शरीरमें बरतै, पाँच तत्व निजसार । कहैं कबीर सोई लख, पूर मिलै कडिहार ॥
चौपाई
काया भर्म भेद अधिकारा । नीर पवन दोह अस बैठारा ॥ नीर नामते उत्पति होई । नीरहि साथै मरै न कोई ॥ दुसरा पवन अंगकी धारा । तापर सोहैं सुरति बैठारा ॥ पवन भेद है अगम अपारा । आदि अन्त सब कीन्ह पसारा ॥ पवन डारि स्वासा अवगाहा । विन सदगुरु पावै नहि लाहा ॥ तापुर सूर्य चन्द्रकी धारा । सुखग चन्द्र औ सूर्यविचारा ॥ तिनकर भेद जो न्यारे करऊ । सूर्य चंद्र भेद दोई घरऊ ॥ दिनतिथिपक्षसंकांति विचारा । तापर पाँच तत्व विस्तारा ॥ सूर्य उदय संपूरण कहेऊ । भेद अभेद मर्म सब लयेऊ ॥ मंत्र उदौछे हि मासको भाजै । सूर्य सनेह सो तहां विराजै ॥ पृथ्वी तत्त्वपर सूर्य जो आवै । छै मासको शुभ दिखलावै ॥ घरको छाँड़ि तत्त्व जो बोले । प्रलय कालके छत्र जो डोले ॥ जलहि तत्त्वपर अस्थिर होई । ताको कष्ट होय नहि कोई ॥ वायु तत्त्व कीयो विस्तारा । किंचित कारज होय संसारा ॥
बोधसागर
( ८३ )
तेज तत्त्वपर सूर्य सवारा । भीतर बाहर सोग अपारा ॥ जब आकाशतत्त्व जो आवै । होइ भंग सब काज नशावै ॥ शुभहि अशुभ दोही निरतावै । मकर भेद छह मास बतावै ॥ पक्ष भेद कहऊँ अब सोई । अँधियारा पक्ष सूर्यको होई ॥
मकर संक्रांति
तेहि में सूर्य चन्द्रकी धारा । तीन तीन तिथि कीन्ह विचारा ॥ कहिँ अँधियारा कहिँ उजियारा । रवि शशि मंगलसूर्य सम्हारा ॥ चारि अंक गहि भेद विचारो । धरिकै कृष्णपक्ष निर्धारो ॥ फिर काया में बैठो जाई । काया सूर्य लहो निरताई ॥
साखी-काया सूरज जब उगै, होय पृथिवतत्त्व असवार ।
तबहि शुक्र शुभ जानिये, कारज शुभ सौवार ॥ अब मैं कहों चन्द्रकी धारा । कर्क संक्रांति छेमास विचारा ॥ तहां जब उदय चन्द्रको होई । अथवत सूर्य उगै पुनि सोई ॥ चलहि तत्त्वपै सूर्य सवारा । छेह मास आनन्द विचारा ॥ घरहि छाँड़ि जो बोलै आई । तो कारजसिद्ध होय नहिं भाई ॥ घरमें रहै तत्त्व नहिं होई । देश उपद्रव देखो सोई ॥ पृथ्वी तत्त्वपर चन्द्र सवारा । प्रेमानन्द और ज्ञान विचारा ॥ वायुतत्त्वपर चन्द्रकी धारा । किंचित कारज होय संचारा ॥ तेज तत्त्वपर चन्द्र जो आवै । पश्चिम दिशा कलह उपजावै ॥ आकाशतत्त्वपर चन्द्र सवारा । भीतर बाहर कष्ट अपारा ॥ पृथ्वीमें उदय चन्द्रको कहेऊ । शुक्लिहि पक्ष भेद अब रहेऊ ॥ दोई तिथी पक्ष उजियारा । तहांते केवल चन्द्रकी धारा ॥ तामें भेदाभेद विचारा । तीन तिथी चन्द्रसूर्य निर्धारा ॥ सोम शुक्र गुरु बुध जो होई । चन्द्र सनेह चारि दिन सोई ॥ रवि शनि मंगलवार विचारा । तीनहि दिनको सूर्य सिरदारा ॥
( ८४ )
चौकास्वरोदय
साखी-दिन तिथी पक्ष संकांति है, बाहेर चार विचार ।
सबको मूल है याहिमें, सो पूर्ण चन्द्र उजियार ॥
परचै चन्द्र कायामें सोई । जो ऊँगे तौ सब सुख होई ॥
जलके तत्त्व चन्द्र असवारा । भीतर बाहर अनन्द विचारा ॥
पांचतत्व अब भिन्न जो कहेउ । तत्त्व भेद सब न्यारे रहेऊ ॥
जलके तत्त्व सुफल घर चन्द्रा । प्रेम विलास अती आनन्दा ॥
पृथ्वीतत्व चन्द्र जब आवे । सूरज मिले आन उपजावे ॥
वायु तत्त्वपर चन्द्र समाई । चित उदास लै गवन कराई ॥
तेज तत्त्वपर चन्द्र जो होई । उत्तम मध्यम कारज होई ॥
अकास तत्त्वपर चन्द्र सर्वंगा । शुल्ककारज जो होय अभंगा ॥
अकास तेजजल तत्त्वन आवै । करि अकाज तहँ कलह समावै ॥
साखी-एते भेद सर्व हैं, चन्द्र सनेह विचार ।
काया चंप शुभदेखि हो, तो शुभशुद्ध विचार ॥
बानी भेद
अब मैं कहों बानिका लेखा । ह्वानी होय सो करे विवेका ॥
प्रथम बानि की गिनीजो होई । अण्डज बानी समानी सोई ॥
दुसरी बानी विंगन कही । पिंडज बानि मैं बोले सही ॥
तिसरी बानी इंगन जानी । सो उषमजमें जाय समानी ॥
चौथी बानी रिंगन आवै । अजल खानिमें जाय समावै ॥
पांचवी बानी सिंगन होई । नरदेही मैं व्यापक सोई ॥
बानी पांच भेद औ माहा । बिन सतगुरु नहि पावै थाहा ॥
परचै बानी तत्त्वहि होई । पाँचों ध्यान जब आवै सोई ॥
ध्यान भेद
प्रथम प्रान ध्यान है भाई । सो कीगनमें लै नितराई ॥
दूसर आपनो ध्यानको लेखा । विंगल बानी करै विवेका ॥
बोधसागर
( ८५ )
तिसरे समान ध्यान व्यवहारा । रिंजन वानीको करौ विचारा ॥ चौथे उद्याना ध्यानको लेखा । रिंजन वानिको करै विवेका ॥ पाँचई वानी सिंजन लेखा । विद्यान ध्यानसो किन्ह विवेका ॥
साखी-पाँच ध्यान पाँच बानी, पाँचे तत्व विचार ।
पाँच सुद्रा पाँच तत्व, पाँचे लग्न घरसार ॥
लग्न भेद
अब मैं कहों लग्न व्यवहारा । बार लगन कीन्है निरधारा ॥ तिनके लक्षण नाम सुनाऊं । चन्द्र सूर्यको प्रेम बताऊं ॥ कर्म करोर सूर्यके सोईं । शुभ के कर्म चन्द्रते होईं ॥ पाँचौ उदय सूर्य जब आवै । पृथ्वीतत्त्वपर जो घर पावै ॥ क्रूरकर्म सब सिद्ध निवासा । तहाँ चलि चौका भेद प्रकाशा ॥ मक्रहि उदय पक्ष अँघियारा । तिथि सनेह बीती नहिं वारा ॥ काया उदय सूर्य है सारा । पृथ्वीतत्त्व होय असवारा ॥ सोईं लग्न जसुनी है नामा । विगड़ै हंस पहुँचे निज धामा ॥ चन्द्रको वार सूर्य तिथि होईं । तांसो जगपति कहिये सोईं ॥ तन छूटे तहाँ जन्मुनि चहिये । और स्नेह जगपतिके कहिये ॥ ऐसे कर्म क्रूरके कहिये । जेतिक हंसके कारज कहिये ॥ बावड़ी विहार कूप तलाई । भोजन मिथुनहि युद्ध कराई ॥ इतने कर्म मैं तुम्हैं सुनाईं । और कर्म बहुतेरे भाईं ॥ संत साधुको एते कहिये । और कर्म अकर्म सब लहिये ॥ क्रूर कर्म हैं चौका सारा । मृतक कर्मको कीन्ह विचारा ॥ चारहुँ वेद भेद हम कहेऊ । सूर्य सनेह भेद निर्वेहेऊ ॥ जो कोई पिंड मायामें करही । सूर्य सनेह जीव उर धरही ॥ छुटे कर्म जन्म तहाँ धरहीं । दीन मान भोग तहाँ करहीं ॥ चन्द्र सनेह पिंड नहिं पावे । अमृत फिरै अरु काल सतावे ॥
( ८६ )
चौकास्वरोदय
कहाँ गया कहाँ नहीं गंगा । बिना सूर्य सब कारज भंगा ॥ जो कोई होय बहुत कडियारा । तुम सुनियो यह भेद विचारा ॥ इतने सूर्य लग्रके लच्छन । तत्त्व विचार सूर्य यह दीच्छन ॥
सारखी-तत्त्वभेद सब सूर्यको, सो मैं कह्यो बखान ।
कहै कबीर धर्मदास सुन, यह टकसार अमान ॥
, चन्द्रलग्र भेद
सूर्यभेद हम कह्यो विधाना । चन्द्रभेद अब कहाँ प्रमाना ॥ चन्द्रसनेह शुभकर्म विचारा । कर्कसंक्रांतिते चन्द्र निर्धारिा ॥ योगसिद्ध में भेद विचारा । उदयतत्त्व जल चलै मँझारा ॥ छहै मासको शुभ है सोई । इतनो भेद कर्कते होई ॥ पक्ष चन्द्रको है उजियारा । तापर केवल चंद्रकी धारा ॥ दोई तिथि चंद्र सूर्य समई । तीन चन्द्र तिथि सूर्य बताई ॥ चन्द्र सनेह जो वार है चारी । सोम शुक्र गुरु बुद्धि विचारी ॥ कायाचन्द्र जब उगे आई । तब सब उदय चंद्र घर पाई ॥ नाघट उदौ तो सर्व अभंगा । करत कार्य सब होई है भंगा ॥ जल तत्त्वपर चन्द्र असवारा । कार्य सिद्ध होई इसवारा ॥ पाँचों स्नेह चन्द्र घर आवे । तब पूनौ संपूरण पावे ॥ ताहि लग्रको प्रतिमा नाऊ । अखंडित चंद्र बरते सब ठाऊ ॥ ताहि लग्र सिख बोधौ जानी । चौकाविधि कीजे विलखानी ॥ सोई अंकुरि जो हंस हमारा । जिन यह स्नेह चौका विस्तारा ॥ सोई लग्र गहि नरियर मोरौ । जिमि कालसो तिनका तोरौ ॥ शुभकर्मके कहेउ परमाना । और कर्मके कहाँ विधाना ॥ प्रथममें चौका जग विस्तारा । दान पुण्य होम जग सारा ॥ वांग वृक्ष फूलहि फुलवारी । यहि मठ जात्रा सैन्य अचारी ॥ राजदर्शन बनिज व्यवहारा । स्नान ध्यान गुरुनेम अचारा ॥
बोधसागर
( ८७ )
औषध मूरी विवाह सगाई । सर्वं पहेर अरु छत्र बैठाई ॥ शुभही कर्म चन्द्रके ऐसे । लक्षण देखि चलौ तुम तैसे ॥
साखी—चन्द्रकर्म शुभ सब कहे, गुण निर्गुण निर्धार ।
और भाव तो बहुत हैं, कहैं कबीर विचार ॥
चौपाई
अब सुनियो कछु आदि निसानी । चारौं लग्र कहों बिलछानी ॥ प्रतिमा चन्द्र लग्र है सोई । जमुना उदयसूर्य निज होई ॥ जो तिथि चन्द्रसूर्य दिन आवे । निश्चय लग्र जेपति तहाँ पावे ॥ जो तिथि चन्द्रसूर्य है बारा । जगपति लग्र सूर्य संसारा ॥ बार लग्रमें कालको फंदा । धरै नाम जिव करे निकन्दा ॥ सोरहे पारस लगन बिचारा । चौदहकी राति लखि बटपारा ॥ जगपति भेद लग्रसों नेहा । लग्रसूर्यके ग्रहन सनेहा ॥ जगपति लग्रसूर्यके होई । नेहर चन्द्रको प्रासै सोई ॥ दोई लग्रको भेद न पावे । जमुनी प्रतिमा हंस मुक्तावे ॥
चारि चौकाको प्रमान
चौका चारको सुनहु विचारा । भिन्नभिन्नके कहों निरधारा ॥ प्रथम चौका जन्मको कीन्हा । अंश सोरह नारियर लीना ॥ सोरह धोती और असी सुपारी । लौंग इलायची लै समधारी ॥ दो हजार पान बीससेर मिष्ठाना । सोरह हाथ चन्द्रवा ताना ॥ दसै रती सोननके खरीपा । सोरह मासा धरे जो रूपा ॥ दलकी अन्नतिटका सोर भारसेही । भरि भांडे एक थारी लेही ॥ इक लोटा इक बेला लेई । इक झारी आब रखि देई ॥ बच्चा सहित ही गाय सुपेता । इहिविधि चौकाकर बहुहेता ॥ पहिले कर्म सब जाई जराई । इहिविधि चौका करे बनाई ॥ तन मन धनसों पीत लगावे । सोवा सत्यलोकमें जावे ॥
( ८८ )
चौकास्वरोदय
प्रथम चौका विधि
अब मैं कहों एकतरी विधाना । एकोतरिनारियलचौका प्रमाना लौंग इलायची धोति सुपारी । इकतरी सब वस्तु विस्तारी ॥ पान मिठाई अवर पकवाना । इकोतर सह सबको बंधाना ॥ दश अरु कमल आरतीसाजा । मुखसों जपैं इकोत्र समाजा ॥ इकोतर जन्मके पाप नसाई । कर्म अकर्म सबै मिटजाई ॥ निर्मल हंस हिरम्मत देही । पहुँचे जहँही पुरुह विदेही ॥
द्वितीय चौका विधि
अब सहेज चौका कहोप्रमाना । जीवसंग एकनरियल बंधाना ॥ अस नारियल सम धरही । विना मंत्र नहिं चौका करही ॥ छठै मास चौकाकी पूजा । छोंड़ि चौका पूजै नहिं दूजा ॥ छटै मास नहिं पहुँचै भाई । बरस दिनामें विसरिन जाई ॥ जो जीव शिष्य हमारा होई । हमही पूजी पूजै नहिं दोई ॥ दोई पूजी बहुत दुख पावै । तन छूटै जमकाल सतावै ॥ ममता फिरै कहुँ ठौरै न पावै । फिरि फिरि जत्तहि देह धरावै ॥ दुख अरु सुख दोनूं भुगतावै । एकहिनाम पुरुषको गावै ॥ लोकजात बार नहीं लावै । चौका सहजिहि भाँति करावै ॥
चालवा चौकाविधि
चालवा चौका कहौं विचारा । बाहर नरियललै विस्तारा ॥ आठ सुपारी पन्द्रहसौ पाना । लौंग इलायची ले बंधाना ॥ पन्द्रह सेर मिठाई ले आवै । बारह धोती आनि जढ़ावै ॥ पाँच भाँड़ै धातुके होई । सोरह हाथ चन्दोवा सोई ॥ पाँच खंभको मण्डप गढ़ावै । नये पुराने वस्त्र मँगवावै ॥ सो परदा गहिरैकै देई । गीत मंगल कर माटी लेई ॥ तिहि माटीकी वेदि बनावै । वाँछा सहित जुगाय चढावै ॥
बोधसागर
(८९)
साधु सन्तको भोजन करावै । पन्द्रह सेर पकवान चढ़ावै ॥ चार पहर सब साज जो करही । सोरह सुतकी पोसी धरही ॥ चार पहर निस बैठक करही । सूर्यस्नेह चौका विसतरही ॥ सुरती सुरत सूर्यपर जोरे । पृथ्वी तत्त्वमें नारियर मोरे ॥ औरहु भाव बहुत हैं भाई । जो समुझे सो बिचलि न जाई ॥ अमी अंकको वीरा पावै । विगड़े हंस लोक को आवै ॥ पान प्रसादे वंश हेतु लेई । पियेपर नाम हमारा लेई ॥ छूटैं हंस कर्मके पारा । चोर उदय घट सूर्य विचारा ॥ चन्द्र हेतु तिन चौका करहीं । चन्द्र लग्नको काल जिझ डरहीं ॥ चौथा चौका चलवेका एहै । सूर्य लग्न निजही मनमें है ॥ देह धरै नहीं कर्म सतावे । सहजे जाय परम पद पावे ॥ चारों चौका एहि विधि करै । सो हंसा तरहै औ तौर ॥ सहजको चौका वासनमें निरतावे । इतने भेद टकसार लखावे ॥ भेद चुरामणिखण्ड अपारा । चुरामनिबस एहि भेद विचारा ॥ उन्हको नाम प्रताप है सोई । इहतो भेद कडिहारको होई ॥ जोन अंकुरी वोहित कडिहारा । सो यह पावे वंस टकसारा ॥ अंस बँसकी परख न पावै । पढ़ि टकसार काल घर जावै ॥ बिन गुरु भेद गहे टकसारा । बिना पुरुषकी नारि बिचारा ॥ बिन दूलहकी कौन बराता । बिना गुरुझूठ जान जिहिं राता ॥ बिना छत्र ज्यों लशकर फिरहीं । बिन गुरु ज्ञान धीरको धरहीं ॥ हमरे पन्थके गुरु धर्मदासा । तिनके वंशगुरु जक्त प्रकाशा ॥ हमरा ज्ञान वंस अस करई । खोवे आपु नरकमें परई ॥ तजै मनै क्रोधे अहँकारा । सो ये गहैं वंश टकसारा ॥ इतने भेद इहै टकसारा । औरै ज्ञान बहुत असरारा ॥ वंश टकसार कडिहारा जो पावै । सो सौ भवसागर जीवमुक्तावै ॥
( ९० )
चौकास्वरोदय
वंश अस न टकसार होई । सीखसहित गुरुजाय विगोई ॥ इतनौ भेद है अगम अपारा । नीर पवन चन्द्र सूर्यकी धारा ॥ कार्यसिद्ध नीर युक्ति प्रवाना । सद्गुरु बचन शीश परमाना ॥ उत्तर पूरव चन्द्र सनेहा । दक्षिण पश्चिम सूर्यहि देहा ॥
साखी-इतना भेद चन्द्र सूर्यका, पांच तत्व निजसार ।
दिनतिथि पच्छ उदयलों, सो साँचो कडिहार ॥
कहै कबीर सोई लखे, ए सब मिले टकसार ।
चन्द्र सूर्यको भेद जानै, सो झूठो कडिहार ॥
इतिग्रन्थ चौकास्वरोदय संपूर्ण सत्य सही
अथ अलिफनामा
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अलिफ अन्वल एक नाम सही है आप अकेला सॉई ॥ आदि अनादि अनादह अनाहद नहीं वा सॉई ॥१॥ (बे) बंदेको पैदा किया देमका हियां दरूदा ॥ अन्वल कलमा पाक सही है हुकम रब्बमह बूबा ॥२॥ (ते) तनमें दीदार मिलेगा पाक होय वजूदा॥ नूर झलकके सत्य साहबका, सब घट है मौजूदा॥३॥(से)साबित सत्यनाम गोसाईं, सदा जो कायम वाशिद ॥ पूरा होय सत नाम कहावै मिलै जो पूरा मुशिद ॥४॥(जीम)जाहि लघु गुजार जहाँ सग यह तो नेक नजर है॥५॥फेकुन सैयन सुहीत नजलील अलाहक खबर है हे हकाका हुकुम हाकिमका सदा जो कहिये बर ॥ अजकुन फेकुन पेदा गहती सोहं ओहं मुनहक ॥६॥ (खे) खालि कको सुमिरत रहिये, लिखत खूब यही है ॥ खुदाखबीसीछाँडसबी शद साधु खैरतभी है॥७॥(दाल)दया दुवैश दोस्तकर दूर करै सब दर्दा ॥ जिसके दिलमें दर्द नहीं सो मून्जी नामदा ॥८॥ जाल जैहनको पाक साफकर, जिकर कि लज्जत पावो॥जोक शोकसे जिकर लगावो दूर बहावो ॥९॥(रे) रहीम रहमत कर तुझपर रहम करै जो कोई ॥ रामरहीमसे एककर जानै तब जहेमत नहिं होई॥१०॥ (जे) जौरावर कोई न बांचे, रावण था दशकंधा ॥ जोर जुल्म है जहेरका प्याला मत कोई पीवे बन्दा ॥११॥ (सीन) सरासरी सिर साईका सब सीनोंके अन्दर॥ साँचा वचन सुनो साधोजन, स्वाती बरस ससुन्दर ॥१२॥ (शीन) शेहरमें शोर बहा है शुक्र खुदाका कहिये॥ सत्य सुकृत ये कर बासन बिसरे हरदम सुमिरत रहिये ॥१३॥ (स्वाद) सदा सिफत साहबकी कहिये, सदा समीपै भाषो॥ दिल दरदिल सीना दरसीना देखो दिलकी आँखो ॥१४॥ (ज्वाह) जमीर
( ९२ )
अलिफनामा
सुनीर सुवाजे व्यापक सब घट साईं ॥ है हजूर रहिमाना जिह नाकीजै भाई ॥१५॥ (तोय) तालिब मतलूबको पहुँचै तोफ करे दिल अन्द ॥बहुते तौफ जाय तब वायफना देव जाय पहाड़ समुन्दर ॥१६॥ (जोय) जालिम मिलै इजरयाल कबज करै जो जाना ॥ गये जुलमात कोई न बाँचे सिकंदर सुलताना ॥ १७ ॥ (ऐन) इल्म चौदाको पड़ते अमल नहीं जो लावे ॥ अमल नहीं वो इल्म ऐब है दानीश मन्द कहावै ॥ १८ ॥ (गैत) गलत ते वहि नहीं कहिये गुस्से गजबको त्यागै ॥ नाहक सुनके न्यारा रहिये कह सुनके मत भागे ॥ १९ ॥ (फे) फरमान आखिर है फानी फाजिल फहेम कहाया ॥ भिन कुल अलेहफाना कुरानो खबर कहाया ॥ २० ॥ (काफ) कलब है अरस जमीका सुनकर और नकीरा ॥ नेकी करो बदी बिसरावो कुलसे कहत कबीरा ॥२१॥ (लाम) लाहोल उसीपर जो न सुने जुगझाना ॥ साहेब से जो कोल किया था तो काहे बिसराना ॥२२॥ (मीम) मुसल्लममर्द मुसलमान कहत, सुरीद ना करना ॥ रहिये सदाईं मनसलामत जेहि विधिसे निस्तरना ॥२३॥ (नून) नोज बिलाह अलेकुम नेक सरबुनका करना ॥ नैनो अकबर हबलूल बरिद हैं हकका फरमाना ॥२४॥ (वाव) वजूवजेमे गो यमनेकी खरत सुनुफ ॥ रुयाल बदी तुस्वास दिल अन्दर सो है मर्दमुखौबफ ॥ २५ ॥ (हे) है दोनों यक सूरत दोनी ये साँई एक म्यानमें हो दो यम घर कबहु नहीं समाई ॥२६॥ (ये) येक साहब है साँचा सुनो तुम मन चित्त देको ॥ काया कबीर कहत है अन्वल आखिर येको ॥ २७ ॥
इति अलिफनामा । सप्तदशस्तरंगः