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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

मध्यमे कवीर साहबके अधिकारी आचार्य भिरोमणि श्री १०० पंडित काशीदासजी साहब.

दिल्ली और श्री प्रलानन्दविहारी तथा भण्डारी सोखीदासजी }

बाई और-श्री वासु रामकृष्णदासजी और भाव राम रामकृष्णजी सैयक बंजरो

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सत्यनाम ।

अथ अध्यात्म साधन गुरु पूजा प्रकरण ।

दूसरा भाग ॥

पूर्व विहार विरोधकर दोसखा कबीरमन्दिरमें प्रचलित चौका विधान ग्रन्थः ।

खनो ॥ १ ॥

साखी-चौका चन्दन कीजिये, मलयगिरिके नाम ।

चारो कमल सुधारिये, मध्य ताहिको धाम ॥ १ ॥

प्रथमहि मन्दिर चौका पुराये । उत्तम आसन भेत विछाये ॥ हंसा पगु आसनपर दीन्हा । सत्य कबीर कही कहि लीन्हा ॥ नाम प्रताप हंसपर छाजे । हंसहि भार रती नहि लाजे ॥ भार उतारि आप शिर लीन्हा । हंस छोड़ाय कालसे दीन्हा ॥ साधु सन्त मिलि बैठे आयी । बहु बिधि भक्ति करें चितलायी ॥ पान सुपारी नारियर भेवा । लवंग इलायची किसमिस मेवा ॥ सवा सेर आनो मिष्ठाना । और सवा सौ उत्तम पाना ॥ सात हाथ बसतर परमाना । सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहि भाई । जासे काल दगा मिटि जाई ॥ धन्य सन्त जिन आरति साजा । दुःख दरिद्र वा घरसे भाजा ॥ कहहिं कबीर सुनो धर्मदासा । सोहम् ओहम् शब्द परकासा ❁ ॥ २ ॥

खनो ॥ २ ॥

साखी-चौका चार सुधारहू, चार कमल असथान ।

चारो पवन उरेहिके, देखो तत्व अमान ॥ ३ ॥

  • पुरानी प्रतियोंमें यह पद यों है—कहे कबीर सुनो भाई साधो । सोहँ सोहँ शब्द अराधो ॥

कबीरपंथी शब्दावली ११

(३२२)

कवीरपंथी-

अगर चन्दन घसि चौका दीन्हा । आदि नामका सुमिरण कीन्हा ॥ जब धनी मन चितवन कीन्हा । चौका श्वेत हंस करि लीन्हा ॥ धर्मदास चौका अनुसार । चौका बैठे पुरुष पियारा ॥ साधु सन्त मिलि बैठे आई । सुरत निरतसे शब्द लौ लाई । श्वेत सिंघासन अगम अपारा । सोहँ हंसो बहुत पियारा ॥ कहहिँ कवीर शब्द जो ध्यावै । शब्दै माँहि सो दर्शन पावै ॥ २ ॥

रसैनी ॥ ३ ॥

साखी-यही चाल है हंसकी, नरियर घोती पान । यहि बिधि भेद बिचारई, हंस होई निर्वान ॥ ३ ॥ उत्तम झारी अमृत जल भरिया । लवंग इलायची कपूर अनु- सरिया ॥ मन वच पान वरोना भाखा । तापर पांच सुखरिचा राखा ॥ त्रिगुण खरिचा दीन्ह बताई । दूत भूत सब चले पराई । तब दल तत्व पान जो लीन्हा । तापर अंक अगर को दीन्हा ॥ अगर वास है लोक मँझारा । तौन हंसले करइ अहारा ॥ कहहिँ कवीर सुनो धर्मदासा । हंसा पावहिँ लोक निवासा ॥ ३ ॥ कहहिँ कवीर धर्मनिनागर । अरपो दल पाओ सुखसागर ॥ ३ ॥

रसैनी ॥ ४ ॥

साखी-प्रमथे चौका कीजिये, चार खूंट अनुमान । दीप चौरासि सुधारहु, लोकरंभ सहिदान ॥ ४ ॥ आदिनाम चित चेतहु भाई, । आरति साजहु ज्योति बराई ॥ पाट पटम्बर अम्बर छाया । जहवाँ हंस करे गवनाया ॥ श्वेत सिंहासन अगम अपारा । सत सुकृत तहवाँ पगु धारा ॥ भागा तिमर भया पर- कासा । आदि ज्योति किन्हा रहिवासा ॥ हंस रूपका भेद बताऊँ । कहो तो आपन अंश दिखाऊँ ॥ श्वेतहिँ रूप शब्द है भाई । अग्र वासमें रहे समाई ॥ कहहिँ कविर निज भेद हमारा । सत्य शब्द गहि उतरो पारा ॥ ४ ॥

शब्दावली

(३२३)

खंनी ॥ ५ ॥

साखी-ऊपर पांखुरी द्वीपकी, भीतर चौकाचार । द्वादश दल निर्वाण है, देखो सुरति विचार ॥५॥ केदली दल उत्तम विस्तारा । अति सुन्दर साजो पनवारा ॥ सुघर मिठाई उत्तम पाना । नरियर अंत लेहु पहिचाना ॥ सात पांच नरियरमें नाही । ता जीवका गहो जिन वाहीं ॥ सात पांच नरियरमें रेखा । सम्पुट गुप्त प्रगट होय देखा ॥ सवा सेर आनो मिष्ठाना । सेतु सवा सौ उत्तम पाना ॥ सात हाथ बस्तर परमाना ॥ सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहीं भाई । जासे काल दगा मिटि जाई ॥ लक्ष जीव नित करे अहारा । तासे थाप्यो यह व्यवहारा ॥ और भेद सब राखो गोई । मति सुनिके जिव बिचलेसोई ॥ सतगुरु शरण जीव जो आवे । ताको काल सदाशिर नावे ॥ कहै कवीर सुनु धर्मनि नागर । बीरा नामसे हंस उजागर ॥५॥

खंनी ॥ ६ ॥

सा०-कलश आरति दल शिला, नारियर पान मिष्ठान । पुङ्गी फल फुल श्वेत अरु, शब्द भजन धुन ध्यान ॥ ६ ॥ उग्र ज्ञानका कहौ सन्देशा । धर्मदास मानो उपदेशा ॥ धर्मदास मानो चित लाई । रहो ठिकानिउचट नहीं जाई ॥ अजर लोकमें आरति कीन्हा । सो आरति हम तुमको दीन्हा ॥ जाघर आरति नाहिं न साजी । ता घर धर्म रायकी बाजी ॥ जा घर आरति करे बनाई । निर्भय हंस लोकको जाई ॥ कोटिक ज्ञान कथे नर लोई । बिनु आरति बाँचे नहीं कोई ॥ अजर ज्योति आरती प्रकाशा । दूत भूत यम माने त्रासा ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । हंसा पावे लोक निवासा ॥ ६ ॥

खंनी ॥ ७ ॥

सा०-लौंग इलायचि नारियर, आरति धरो लेसाय । कहैं

(३२४)

कवीरपंथी-

कवीर धर्मदाससे, काल दगा मिटिजाय ॥ ७ ॥ धर्मदास तुम पंथ उजागर । अपोंदल परसो सुख सागर ॥ चन्दन चौका रचो बनाई । सत सुकृत जहाँ बैठे आई ॥ सेत बारिसे फूल मँगावा। सो सतगुरुको आनि चढावा ॥ धर्मदास उठि विनती कीन्हा । हो सतगुरु हम तुमको चीन्हा ॥ जो तुम कहो मानि लेउँ सोई। गुरु छोड़ि और नहिं कोई ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो प्रकासा ॥ ७ ॥

रमैनी ॥ ८ ॥

साखी-अंश रेख स्वर शिष्यको, गुरु शासा घर एक । तामैं नरियर मोरहु, टूटे विघन अनेक ॥ ८ ॥ धर्मदास तुम बीरा लेहु । जम्बू द्वीप जीवन कहैं देहु ॥ मैं का जानों पंथके आदी। जम्बूद्वीप बसे बकवादी ॥ पढै वेद औ करे अचारा । वे नहीं माने शब्द तुम्हारा ॥ जो नहिं माने शब्द हमारा । सो चलि जैहैं यमके द्वारा ॥ जो कोइ माने शब्द हमारा । सो चलि हैं लोक मँझारा ॥ अन्तर कपट करे मन माहीं । सो तो लोक पहुंच नहिं जाहीं ॥ कहहिं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो प्रकासा ॥ ८ ॥

इति चौशाकी रमैनी ॥

शब्द नारियर ।

साखी-कलश आरति दल शिला, चारो अंक सुधार । रेखा लिखि कर पान धर, तहाँ कपूर प्रजार ॥ १ ॥ बनि जारिन विनती करे, संत सुनु साजना । नरियर लीन्हों हाथ, संत सुनु साजना ॥ विना बीजके वृक्ष है, सुनु साजना । विनु धरती अंकूर संत सुनु साजना ॥ जाके मूल पताल है, सुनु साजना । नारियर शीश अकाश, संत सुनु साजना ॥ बिना भेद जनि मोरहु, सुनु साजना । जीव एकोत्तर हानि, संत सुनु साजना ॥

शब्दावली

(३२५)

गुरुके शब्दलै मोरहू सुनु साजना । यम शिर मर्दहु मान, संत सुनु साजना ॥ सखियाँ पांच सहेलरी, सुनु साजना । नौन री विस्तार, संत सुनु साजना ॥ कहहिं कवीर बघेलसे, सुनु साजना। इन्द्रमती शिर ताज संत, सुनु साजना ।

आरती चौकाकी १ ।

सारखी-पुहुप दीपमें बैठिके, सुख सागरमें पान । अंबु दीपमें बैठिके मूल करी पहिचान ॥ २ ॥ आदिनामचित चेतो भाई । आरति साजो जोत बराई ॥ पाट पटम्बर अम्बर छाया । तहवाँ हंसकरे गवनाया ॥ सेत सिघाँसन अगम अपारा । सत- सुकृत तहवाँ पगु धारा ॥ भाजा तिभिर भया परगासा । दूत- भूत जम आगम नासा ॥ बाहँ पकरि जिव सौपो भाई । सत- सुकृतकी फिरी दुहाई ॥ सुरत निरत हैं सतगुरु पासा । जराम- रनकी छूटी आसा ॥ तौन सुरतिले करो विचारा । सोहँ सोहँ हंस उबारा ॥ अहिनिंसि सुभिरे जो कोई । सुख सागर पहुँचे जन सोई ॥ हंस रूपका भेद बताऊँ । कहो तो आपन अंस दिखाऊँ ॥ सुरति हँस सत्य है भाई । अगर बासमें रहे समाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो । पद परचे आरति आराधो ॥

सारखी-आरति चौका कर धरो, जीव उधारन काज । कहैं कवीर धर्मदाससों, जुग जुग अविचल राज ॥ अगर विदेही पायकरि, जगते रहे निनार । सुख सागरमें घर करे, सत्य नाम आधार ॥ ४ ॥

आरती चौकाकी ॥ २ ॥

मृत लोक जम थान सर्वाँरा । तब सत सुकृत जुगति विचारा सावधान बान यक कीन्हा । ताते काल भयो अधीना ॥ ले नरि- यर जब तिलक बनाया । काल शीघ्र शरनागत आया ॥ नरि- यर लीना हाथ उठाई । दूत भूत जग गये पराई ॥ कालहिं

(३२६)

कबीरपंथी—

मारि जगत यसलीन्हा । नरियर मोरि सुरहरि कीन्हा ॥ कहैं कवीर सुन हंसपति राई । धर्मदास आरति सत्तु पाई ॥

साखी-नामी मिलि नामी भया, रही न दूजी आस । सुख सागरमें घर किया, सत्यनाम विस्वास ॥

चौकाकी आरती ॥ ३ ॥

साखी-सत्य पुरुषकी आरती, जा घर होय प्रकास । कहैं कविर सुनु धर्मनि, निर्मल होय सु दास ॥ १ ॥ जाघर आरती दास करतु हैं, जन्म जन्मके पाप हरतु हैं ॥ टेक ॥ केदली दल पुष्पनकी माला । सतसुकृत जाघर पगु चाला ॥ परिमल अगर गुलाल सुवासा । जाघर हंस करे सुख वासा ॥ १ ॥ अनहद ताल पखावज बाजे । श्वेत सिंहासन छत्र विराजे । नाम एको- त्तर सुमिरे तबहीं । सतगुरु बैठे सिंहासन जबहीं ॥ २ ॥ तत्व मता नरियर प्रमाना । सतगुरु कृपा होय निर्वाना ॥ नरियर मोरत बास उड़ाई । पल यक साहिब विलमे आई ॥ ३ ॥ सत- गुरु दया प्रगट जब होई । पाये प्रसाद महाफल सोई ॥ महा- प्रसाद तत्व विधि पावे, कहहिं कविर सतलोक सिधाये ॥ ३ ॥

शब्द भोग

सत्यपुरुषको भोग लागे, सिंगी शब्द अनाहद बाजे ॥ टेका ॥ केदली पत्र साजो पनवारा । शीतल शब्द ज्योति उजियारा । नारियर मोरि सुररुहु कीना । आदि नाम अन्तर घट चीना १ ॥ मधुर मिठाई मधुर मिठाई । प्रीतिभावसे सन्त बोलाई ॥ लौंग इलायची किसमिस मेवा । मधुर मधुर रस दाख घनेवा ॥ २ ॥ सुखसागरके निर्मल नीरा । जापर सतगुरु तृप्त शरीरा ॥ सत्य पुरुषको अर्पण कीना शंख शब्द धुन बाजे वीना ॥ ३ ॥ सो पनवार दासको दीना । जाते काल भयो है अधीना ॥ पान प्रसाद जीवको पाव । अंकुरी सतलोक सिधावे ॥ ४ ॥ ऐसा भेद

शब्दावली

(३२७)

करो प्रकासा । सत्य शब्द मानो विश्वासा ॥ कहहिँ कवीर सुनो धर्मदासा । वीरा नाम करो प्रकासा ॥५॥

साखी-गुरुमुक्तावें जीवको, चौरासी बन्ध छोर ।

मुक्त प्रवाना देहिं गुरु, यमसे तिनुका तोर ॥१॥

शब्द तिनुकाका ॥ १ ॥

जमुनियाकी डार साहेब तोड़ दीजे हो ॥ एक जमुनियाकी चौदह डार । सार शब्दसे मोड़ दीजे हो ॥ १ ॥ सुरति हमारी अजब पियासी, प्रेम अमीरस घोरि दीजे हो ॥२॥ गुरु हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारस मोल दीजे हो ॥ ३ ॥ यह संसार विषय रस माते । भर्म केवरिया खोल दीजे हो ॥४॥ धर्मदासको अरज गोसाई । जीवन बन्ध छोड़ दीजे हो ॥५॥

शब्द तिनकाका ॥ २ ॥

जमुनियाकी डार मोरि तोरदे सतगुरु तोरदे ॥ टेक ॥ काया कंचन अजब प्याला, नाम बूटी रस घोरदे । घोरदे सतगुरु घोरदे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥ १ ॥ सुरति सुहागिन अजब पियासी, अमृत रसमें बोरदे । बोरदे सतगुरु बोरदे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥२॥ तू है सतगुरु ज्ञान जौहरी, रतन पदारथ खोल दे । खोल दे सतगुरु खोल दे, जमुनियाकी डार साहब तोरदे ॥ ३ ॥ धरमदासकी अरज गुसाई, जीवनको बन्धन छोर दे । छोर दे साहब छोर दे, जमुनियाकी डार साहब तोर दे ॥४॥ साखी-धन्य भाग उस दासको, सतगुरु दिये सुसाज ।

माथ नवावे काल तिहीं, पायो नाम जहाज ॥६॥

शब्द नाम लखावन ।

गुरु पैया लागु नाम लखाय दीजे हो ॥ युगन युगनके सोवल मनुआ, दे सत शब्द जगाय दीजे हो ॥१॥ घट अधियार वस्तु

(३२८)

कवीरपंथी—

नहिं सूझे, ज्ञानकी दृष्टि बताय लीजे हो ॥२॥ विषकी लहरि उठे घट भीतर । अमृत घोरि पिलाय दीजे हो ॥३॥ गहिरि नदिया नाव पुरानी, खेड़ेके पार लगाय दीजे हो ॥४॥ धर्मदासको अरज गोसाई, जीवन बन्ध छोड़ाय दीजे हो ॥५॥

शब्द कण्ठी ।

साखी—कण्ठी जाके कण्ठमें, ताही नमे यमराज ।

मारग छोड़े दिखतही, सकलो ताहि समाज ॥१॥

पायो निज नाम गलेको हरिया ॥८६॥ सतगुरु पटवा अजब निह हिया । छोटी मोटि डोलियामें चारि कहरिया ॥१॥ प्रेम प्रीती की पहिरि बुन्दरिया । निहुरि नाचो साहेव दरबरिया ॥२॥ सतगुरु कूंजी दई महलकी । जब चाहो तो खोलौ केवरिया ॥३॥ यही मोरे ब्याह यही मोरे गवना । कहहि कवीर बहुरि नहिं अवना ॥४॥

शब्द उपदेश ।

साखी—सतगुरुके उपदेश हैं, अतिशाय सुखकी, खानि ।

वेद मंत्र सम जानिके, लेहु हृदयमें मानि ॥१॥

धन सतगुरु जिन दियो उपदेश ॥ भव बूडत गहि राख्यो केस ॥८६॥ साकटसे गुरु वैष्णव कीन्ह । सत्यनामका सुमिरण दीन्ह ॥१॥ जाति बरण कुल कर्म नशाय । साधु मिले तब साधु कहाय ॥२॥ जब लगि ममिता मरी न होय । तब लगि काज एको नहिं सोय ॥ ३ ॥ जब ममिता मेरी मिटिजाय । तब प्रभु काज सुधारे धाय ॥४॥ जब लगि सिंह रहे बनमाहिं । तब लगि यहो बन फूले नाहि ॥५॥ उलटा स्यार सिंहको खाय । तब फूले सकलो वनराय ॥६॥ खाती बुन्द केदली परे । रूप वरण कहु और धरे ॥७॥ नाम कपूर वासना होय । केदली वाको कहै न कोय ॥८॥ पारस परसे कंचन होय । लोहा वाको कहे न कोय

शब्दावली

(३२९)

॥१॥ पारसके गुण देखहु जाय । कंचन महाँगे मोल विकाय ॥१०॥ निशिदिन सुमिरो एके नाम । जिहि सुमिरे सिध होवे काम ॥११॥ साहेब कविरके पक्का खेल । तील फूल मिलि भये फुलेल ॥१२॥

साखी-तेल तीलते ऊपजे, जन्म जातिके तेल ।

संगति भई जब फूलकी, नाम धराय फुलेल ॥१॥

शब्द अर्जाँ ।

बहियाँ पकडो समुझिके, अर्ज सुनो गुरु मोर ।

पकडो तो छोडो नहीं, तब बलहारी तोर ॥२॥

समुझि गहो मेरि बाहीं परम गुरु समुझि गहो मेरि बाहीं ॥टेक॥ जो बालक दुनमुनवाखेले, सो बालक हम नहीं । हम तो चाहैं सतके सौदा, पथल पुजनको नहीं ॥ १ ॥ चौदह सो चौरासी चेला, सो चेला हम नहीं । जियत ठिकाना सबहि बतावे मुये ठिकाना नहीं ॥२॥ जो तुमरे घर उद्यम नहीं, भीख मांगि किन खाहीं । मूल सजीवन जानत नहीं, मति प्रबोधो काही ॥३॥ नाव तेरी करुअरिया नहीं, लहरि उठे विकरारा । गुरु सहित चेला सब बूडे, कौन उतारे पारा ॥४॥ सूखल लक- ड़ीमें घून लगतु है, लोहेमें लगु काई । बिनु प्रतीत गुरुका कीजे । काल घसीटे जाई ॥५॥ अमृत कुण्ड सदाकी चौकी, बेली बेला राखे । नेउल देखिके विषहर कम्पे, चपल अमी रस चाखे ॥६॥ माया आय चौकमें बैठी, नवल विवाहन आहीं । देय कपाट महलमें पौढे, अब कछु संशय नहीं ॥७॥ समुझ न होय तो समुझो गुरुजी, न तरु होत बिगारा । कहैं कबीर सुनो गुरु रामा- नन्द, अब सिख लेहु हमारा ॥८॥

साखी-गुरु हमारा शब्द है, सदा रहतु है संग ।

रामानन्दको यु किया, जगत जनावन ढङ्क ॥

(३३०)

कवीरपंथी-

पान परवानाका शब्द ॥

पान छत्रपति कर धरो, अनुभव सन्धि विचार । विषम त्रिच्छ जमकी दशी, रेखगुंज निरुचार ॥१॥ जुगकी रेख सम्हारहु, पान अखण्डित सार । ताते हंस न वीगरे, चन्द्र लगन विस्तार ॥२॥ चार तत्व घटमें धरो, पांचो लेहु समोय । जेहि अक्षरते जिव- भया, जाते हंसा होय ॥३॥ वहि अक्षरते सब भयो, लोकदीप- स्थूल । ताको चान्हो सन्तो, विज अक्षर निजमूल ॥४॥ चार कमल घर भीतरे, परखो संत सुजान । जामे वासा जीवको, तहां सुधारो पान ॥५॥ आन कमलमें जिव बसे, अन्ते पान प्रकाश । अधर पान जमलेत है, जीव परे जम फाँस ॥ ६ ॥ चारो मुहर सुधारहु, अंक छत्रकी छाँह । लच्छन लगन विचारके, देहु हंसको बाँह ॥७॥ सतजुग संधि सम्हारहु, सब विधि पूरन होय । सुरति निरति गहि धर्मनि, देखो शब्द विलोय ॥ ८ ॥ पान छत्रपति साजहु, जुगकी रेख सुधार । कहैं कवीर धर्मदास सो, हंस उतारो पार ॥ ९ ॥

॥ इति आनन्दी चौकाविधान समाप्ता ॥

॥ अथ चलावा चौका ॥

साखी-हंस उबारण कारने, सतगुरु जगमें आय । काशीमें परगट भये, नाम कवीर कहाय ॥१॥

मंगल ।

सतगुरु हंस उबारण जगमें आइयाँ । प्रगट भये निज काशीमें दास कहाइयाँ ॥१॥ रामानन्द गुरु कीन सो शिष्य कहाइयाँ । बुधि बल दीक्षा लीन बहुरि समझाइयाँ ॥ २ ॥ ब्राह्मण औ सन्यासी हांसी कीन्हियाँ । तजि काशी गये मगहर काहु न चिन्हियाँ ॥ ३ ॥ बिजुलीखाँ पैठान तो कबुर खोदाइयाँ । बिरसिह राय बचेल, साजि दल आइयाँ ॥ ४ ॥

शब्दावली

(३३१)

लिखि कमलापति रानि, सो पतिया पठाइयां। मूर्दा न होहिं कवीर, सो बुधि विचराइयां ॥५॥ पर्दा उघारिके देखेउ, कछु नहिं पाइयां। पान फूल लिये द्वाथ, बहुत पछिताइयां ॥६॥ मगहर झगडा निवेरि, दोउ दल राखियां। गढबाँधो धर्म-दास, आपन कर थापियां ॥७॥ अटल बयालिस वंश, राज लिखि दिन्हियां। जस हम तस तुम वंश, दया बहु कीन्हियां ॥८॥ हद बाँधा दरियाव, उड़ीसा जाइके। लक्ष्मी सहित जगन्नाथ, मिले प्रभु धाइके ॥९॥ उहँवाँ सतगुरु जायके, अदल चलाइयां। महा प्रसाद पवायके भ्रम मेटाइयां ॥१०॥ आगम कहाँ पुकारि, सुनो धर्मनिनागरा। बहुत हंस लिये साथ उतरो भव सागरा ॥११॥

साखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड अंश।

मुक्त राज तुमको दियो, अटल बयालिस वंश ॥२॥

॥ अथ दीहल प्रारम्भः ॥

साखी-आमिनिकी विनती यही, सुनिये बन्दी छोर।

भवसागरसे तारहु, पुनि पुनि करौं निहोर ॥१॥

दीहल । (१)

आमिनि विनती विनवई, सुनहु हो बंदी छोर। भवसागरसे मोहि तारहु, इतना मोर निहोर ॥१॥ भवसागर भयावन सूझे, वार न पार। झांझरि नाव पुरातम, खेड़ उतारहु पार ॥२॥ कोटि कर्म छूटे नहीं, यह जिव कीट समान। भुङ्गी होय गुरु तारहु, अधम उधारण नाम ॥३॥ आसन आहीं पुरुषके, धर्म दास को दीन्ह। चार अंश चौका महाँ, तामें लेहु चीन्ह ॥४॥ कहहिं कवीर सुनु आमिनि, रहो हमारी आस। जीवन पार उतारि हौं होइ चुरामणि दास ॥५॥

(३३२)

कवीरपंथी-

दीहल (२)

साखी-मानहु शब्द हमार यह, सतगुरु सुमिरण सार । नतु पाछे पछताइहो, जब पडिहैं जम मार ॥ २ ॥

फेरु पछितायव हे कामिनि, मानहु शब्द हमार ॥ टेक ॥ चन्दन जानि विरछा रोपल, सेहू भेल सेमर पलास । फुलवा देखि धीरज बांधल, फल देखि भयल निरास ॥ १ ॥ बिनारे सोनाके कैसन आभरण, बिन मोती कैसन गरहार । बिनारे मज्याके कैसन नेहर, बिनु स्वामी कैसन सिंगार २ कायारे कंचन गढ टूटल, छूटल कुल परिवार । दशो दुआरिया जमुआ रोकल, कौनेविधि होयब पार ॥ ३ ॥ साहेब कवीर कहि दीहल, शब्द परखु टकसार । बहुरि न यहि जगमें आयब, फिर न मनुष अव- तार ॥ ४ ॥

दीहल (३)

साखी-कामिनि अचरज देखहु, जहँ नहिं धरनि अकाश ।

चान्द सूर जहवाँ नहीं सत्य, शब्द परकाश ॥ ३ ॥

अचरज देखहु कामिनि, कहौं तो को पति आय । अधर साहेब हम देखलौं, सतगुरु डोलिया फनाय ॥ १ ॥ चांद सुरज है वहां नहीं, वहां नहिं धरनि अकाश । तौने पुरुष मोरे प्रिय- तम, केहि विधि करौं निवास ॥ २ ॥ गुरु दर्शनके कारने, सर- वस दियो लुटाय । एक पलकके बीछुडे, अब मोहिं कछु न सोहाय ॥ ३ ॥ गुरु दर्शन हम पायलौं, छूटल कुल परिवार । अब जेहौं पुर आपने, परखु टकसार ॥ ४ ॥ साहिब कवीर कहे दीहल, हृदय करहु विचार । अरस परस करु कामिनि, निर्गुण नाह तुम्हार ॥ ५ ॥

दीहल (४)

सा०-सुमिरहु कामिनि नाह निज, जहँवाँ धूप न छाँहिं ।

देखत अतिसुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाहि ॥ ४ ॥

शब्दावली

(३३३)

सुमिरहु कामिनि सुमिरहु, सुमिरहु आपन नाह । अधर साहिब हम देखिया, जहँवाँ धूप न छाँह ॥ १ ॥ विनारे घटा घन गरजई, विनु जल तिरथ नहाय । देखतहौं सुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाय ॥ २ ॥ विन पानीके जीवन, विनु दीपक उजियार । ऐसो निर्गुण देखिके, पगखु शब्द टकसार ॥ ३ ॥ साहेब कवीर कहैं दीहल, अब सोहंगम फूल । अब मोरे जन्म सुफल भये, पाये मुक्तिके मूल ॥ ४ ॥

दीहल (५)

साखी-मानहु गुरुके वचन पिय, हरदम खबरजु लेय । जो चित अन्ते जाइहैं, तौ गुरु ताजन देव ॥६॥

गुरुके वचन मोरे प्रियतम, हरदम खबर जुलेय । जो चित अन्ते जाइ हैं, हँसि पिय ताजन देय ॥ १ ॥ पार बसे मोर प्रियतम, दुर्बल भइ मोरि देह । पांच भैया संग दारुण, तिनसे छुटल सनेह ॥२॥ जिनके आंगन नदिया वहे, सो कस कुआँमें नहाय । जाघर नारि सुलक्षण, सो कस पर घर जाय ॥३॥ गृहि आंगन नहि भावई, सुख संपत्त नाहि सुहाय । निर्गुन नाह न आवई, सेज गयल कुम्हिलाय ॥४॥ जो साहेब वर पाइहों, नेहर धरे उठाय । सेज बेठे सुख विलसहिं, गुरुमुख मङ्गल गाय ॥५॥ साहेब कवीर कहि दीहल, छुटल कुल पारिवार । चरण कमल चित राखहु, पूरण नाम अधार ॥ ६ ॥

दीहल (६)

सा०-नेहर आपन कोइ नहिं, जासे करूं पहिचान ।

प्रेमसहित सखि मिलिलेहु, निजप्रियसुखप्रदजान ॥६॥

मिलि रहु सखिरी तु मिलि रहु, अपने पिया सुख जान । नेहर आपन कोइ नहीं, जासे करौं पहिचान ॥ १ ॥ मोरे जिवके भावतु, छाय रहो वहि देश । मैं विरहिनि निश दिन फिरोँ, धरि

(३३४)

कवीरपंथी-

योगिनिकी भेस ॥२॥ तात मात कोइ संग नहिं, संग नहीं संग भाय । काम न काहु कुटुम्बसे, चली निसान बजाय ॥३॥ चाँद सूरजकी पालकी, तोह चढ़ि बैठी नार । सुखमनि संग सहेलरी, दुलहिनि उतरी पार ॥४॥ कमल जो फुले अकाशमें, अलि गुंजे चहुँ और । पियाको ले बैठी तहां, ढुरे सोहंगम चौर ॥ ५ ॥ सोहंगम मूरत मोर, हिरदय रही समाय । कहहिं कवीर धर्मदा-ससे, सो लीजे दरसाय ॥ ६ ॥

दीहल (७)

साखी-पांच सखीके संगमें, सासुर झगडा होय ।

भैंसुर घर मूसे सदा, काहि कहों दुख रोय ॥ ७ ॥

पांच सखी संग दुलहिनि, सासुर झगडा होय । भैंसुर चोर घर मूसई, काहि कहों दुख रोय ॥ टेक ॥ वासर चन्दा ऊगई, निशिमें ऊगै सूर । गङ्गा जमुना दोउ संग बहे, हंस गमन बढि दूर ॥ १ ॥ गंगा जमुनाके अन्तरे, पर्वत धवल सुजान । चितवत नजर न आवई, जमके अमल अमान ॥ २ ॥ ध्रुव मण्डल नहीं दरशई, नेत्र गुंज अनुसार । चित गहि चेतहु सन्त हो, मास पडे जम धार ॥ ३ ॥ श्वासा सूर न बन्द हो, केहरि बन्द न लेय । आठ पखहिंके भीतरे, हंस पयाना देय ॥ ४ ॥ कायापुर पाटन परिचय, कायाको एहि सुभाव । चित चेतो कडिहार हो, अवघट लगे न नाव ॥ ५ ॥ जैमुनि लगन सम्हारहु, सुमिरहु निर्गुण सार । पान छत्र पत साजहु, हंस उतारो पार ॥ ६ ॥ पच्छिम लहरि जोगावहु, पूरव चन्दा तान । निर्गुण शब्द उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ ७ ॥ चन्द उदय सुर आवे कूच नगारा होय । साहेब कवीर कहि दीहल, देखहु शब्द बिलोय ॥

दीहल (८)

साखी-आरति साजहु दुलहिनी, आवहि कन्त सनेर । निर्गुन मङ्गल गावहु, अब जनि लावहु बेर ॥ ८ ॥

दीहल (९)

साखी-यहि बिधि श्वास विचार है, सुनहु सन्त मतिधीर । साधन करिके जानि हो, रहे कि जाय शरीर ॥ ९ ॥ ❁

शब्द नारियर ॥ १ ॥

साखी-मोरहु नारियर मोरहु, आपन अंश बचाय । बिना शब्द जो मोरहु, जिव परलय तर जाय ॥

मोरहु नारियर मोरहु, आपन अंश बचाय । बिना शब्द जनि मोरहु, जिव परलय तर जाय ॥ टेक ॥ तीन अंश नरियर महाँ, तामैं एक हमार । आपन अंश बचाय के, यमके अंश निनार ॥ १ ॥ जमके अमल मिटावहु, बत्तिस पवन विलोय । नीर नेह निर्वारहु, चलहु महा तम खोय ॥ २ ॥ धरती रेख सुधारहु, पुरुष पवन अनुमान । बिना भेद जनि मोरहु, जीव एको तर हान ॥ ३ ॥ सोहं को निज गहिरहु, नारियर बास समोय । तीनो तत्व सुधारहु, काल निकट नहिं होय ॥ ४ ॥ धरती गुण गहि प्रगटहु, करौ शब्द परकास । साहिब कवीर कहि दीहल दिठ मानहु धर्मदास ॥ ५ ॥

आरती ॥ १ ॥

साखी-आरति सत्य कवीरकी, जा घर होय प्रकाश ।

दुःख दरिद्र आपे भगे, पूरे मनकी आश ॥ १ ॥

मङ्गल रूप आरति साजे । अभय निशान ज्ञान धुनि बाजे ॥ टेक ॥ अछै वृक्ष जाकी अम्बर छाया । प्रेम प्रताप अमृत फल पाया ॥ १ ॥ निशि वासर जहाँ सूर्य न चन्दा । परम पुरुष जहाँ करहि अनन्दा ॥ २ ॥ तन मन धन जिन अर्पण कीन्हा । परम

  • नोट-इसके आगेके दीहल सब पहिले पृष्ठ ३४३ से आरंभ होकर बहुत आ गये हैं तो देख लेना चाहिये और भी पांचवें छठे खण्डमें आनेवाले हैं वहाँ से देख लेना.

(३३६)

कबीरपंथी—

पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ ३ ॥ जरा मरणके संशय भेटे । सुरत सन्तायन सतगुरु भेटे ॥ ४ ॥ कहहिँ कबीर हिरम्बर होई ॥ निरखि नाम निज सुमिरे सोई हो ॥ ५ ॥ १ ॥

अथ डोरी पद प्रारम्भः ।

चलाना चौकाका पद डोरी ॥ १ ॥

साखी-अबकी बार उबारिये, अर्जी दीन दयाल ।

जगमें कोई है नहीं, तुमरे सरिस कृपाल ॥ १ ॥

अबकी बार उबारिये, मेरी अर्जी दीन दयाल ॥ टेक ॥ आई थी ओहि देशसे, भई परदेशी नारि । वह मारग मैं भूलियाँ, बिसरि गई निज बारि ॥ १ ॥ युगन युगन भ्रमत फिरी, जमके हाथ बिकाय । कर जोरे बिनती कहैं, मोहि मिलि बिछुड़ि जनि जाय ॥ २ ॥ विषम नदी विकराल है, बहुत कटरिया धार । मोह मगरके घाटमें, खाये सुर नर झार ॥ ३ ॥ शब्द जहाज कबीरके सदगुरु खेवन हार । जो कोई हंसा आवई, पलमें लेहि उबार ॥ ४ ॥

साखी-चली पूतली लवणकी, थाह सिन्धुको लैन ।

आपे गलि पानी भई, उलटि कहे को बैन ॥ २ ॥

पद डोरी ॥ २ ॥

उनमुनि चढी अकाशमें, गई गगनमें छूट ।

हंस चला घर आपने, काल रहा शिर कूट ॥ ३ ॥

नाम सनेह न छाड़िये, भावे तन मन धन बर जाय ॥ टेक ॥ पानीसे पैदा किया, नख शिख अंग बनाय । उस साहिबको बिसारिया, ( तेरो ) गाढमें होय सहाय ॥ १ ॥ महल चुने खाई खने, ऊंचे ऊंचे धाम । जब यम बैठे कण्ठमें, कोह न आवे काम ॥ २ ॥ मातु पिता सुत बान्धवा, और दुलारी नारि । यह सब हिलि मिलि बीछुडे, शोभा है दिन चारि ॥ ३ ॥ जैसे लागी

शब्दावली

( ३३७ )

ओरसे, दिन दिन दूनी प्रीत । नाम कवीर न छाड़िये, ( भावे ) हार होय की जीत ॥ ४ ॥

पद डोरी ॥३॥

साखी-हंसा छूटे बाज ज्यों, कोटि सिन्धुके जोर । सुमिरत दीन दयालके, पहुँचि गया निज ठौर ॥ ४ ॥

शब्द सिंहासन पाटमें ( तुम ) हंसा बैठो आय ॥ टेक ॥ कौन नाम सुक्तामणि, कौन नाम वो अंस । कौन नाम वह पुरुष है, कौन नाम वो हंस ॥ १ ॥ अजर नाम सुक्तामणि, ऊग्र नाम वो अंस । ज्ञानी नाम वह पुरुष है, सुरत नाम वह हंस ॥२॥ मूल द्वीप निज द्वीप है, और सुनो हम पाहिँ । बैठे हंस उबारहीं, सोहंगमकी बाँह ॥३॥ जम्बु द्वीपके हंसा भाई, पाँजी बैठो आय । कहहिँ कवीर धर्मदाससे, लावहु बाँह चढाय ॥ ४ ॥

साखी-अस बीरा प्रताप बल, प्रबल काल छय होय । जिहिँ सतगुरु बहियाँ मिले, हंस न जाय विगोय ॥ ५ ॥

पद डोरी ॥ ४ ॥

हंसा दुर्मति छाड़िदे, तू तो निर्मल होय घर आव ॥ टेक ॥ दूधहिसे दधि होतु है, दधि मथि माखन होय । माखनसे घृत होत है, बहुरि न छाँछ समोय ॥ १ ॥ ऊखहिँसे गुड़ होत है, गुड़से खाड़ हो जाय । सतगुरु मिलि मिश्री भई, बहुरि न ऊख समाय ॥ २ ॥ चीनी छिटकी रेतमें, गज मुख चुनी न जाय । जात बरण कुल खोयके, चींटी होय चुनि खाय ॥ ३ ॥ दाग जु लागी नीलकी, नौ मन साबुन धोय । कोटि यतन प्रबोधिये, कागा हंस न होय ॥ ४ ॥ कहहिँ कविर सुनु केसवा, तेरी गती अपार । बाप विनौला होय रहे, पूत भये चौतार ॥ ५ ॥

( ३३८ )

कवीरपंथी—

पद डोरी ॥ ५ ॥

साखी-उत्तर घाटी ऊतरे, पांजी बैठे जाय ।

तहँवाँ सुरति लगायके, पुरुषहि परसे पांय ॥ ६ ॥

शब्द सनेही हँसा, तुम जग तजि होय रहु न्यार ॥ टेक ॥ सत्य निज डोर है, तुम हँसा गहो बनाय । सत बीरा निज नाम है, चाखतही घर जाय ॥ १ ॥ बिना बीजके जामई, बिनु अंकुरके झार । बिनु ढण्डी फल लागिया, साधू करहिं बिचार ॥ २ ॥ अजरहिके अंकुर भये, अजरहिकी लागी डार । अजर फूल फल लागिया, साधू करहिं अहार ॥ ३ ॥ मोहि अजर कर जानहु, अम्बर देउ बताय । जिहि भाण्डे निज साँच है, तामैं रहो समाय ॥ ४ ॥ कहहिं कवीर धर्मदाससे, बेगि जाहु संसार । सोहंगमकी बाँहसे, हँस उतारहु पार ॥ ५ ॥

पद डोरी ॥ ६ ॥

साखी-बीरा बद जिन जानहु, पुरुष नाम निज मूल ।

जा दिन हँसा तन तजे, मेटे संशय शूल ॥ ७ ॥

कौन मिलावे योगिया, योगिया बिनु रहल न जाय ॥ टेक ॥ हौं हरिनी पिया पारधी, मारा शब्दके बान । जाहि लगे सोह जानिया, और दरद नहिं आन ॥ १ ॥ पिया कारण पियरी भई, लोग कहें तन रोग । जप तप लंघन मैं करौं, पिया मिलनके योग ॥ २ ॥ हौं तो पियासी पीवकी, रटौं सदा पिव पीव । पिया मिले तो जीवउँ, (न तु) सहजे त्यागौं जीव ॥ ३ ॥ कहहिं कवीर सुनु योगिनी, तनीमें मनहि समाय । पिछली प्रीतिके कारणे, योगी मिलेंगे आय ॥ ४ ॥

पद डोरी ॥ ७ ॥

साखी-साथी नाद कवीर हौं, विन्दहिं देहु न भार ।

युग युग हँसा हिरम्बर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥