कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(४४६)
कवीरपंथी—
नहिं होते रघुपति रावन । जब नहिं होते कृष्ण बलि बावन ॥ ५ ॥ जब नहिं होते शम्भु गौर । जब नहिं होते दश औतारा ॥ जब नहिं होते कूर्म औ शेष । जब नहिं शारद गौरि गणेशा ॥ ६ ॥ जब नहिं होते निरंजन राया । जिन जीवन कहैं बांधि झुलाया ॥ तेतीस कोट देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥ ७ ॥
समौ-कहैं कविर कछु ना होता, होता आप अलेख । तबका आप कवीर है, धरि धरि खेले भेख ॥
रमनी-एक ओंकार ॥
ऐसा ज्ञान विचारै कोई । सो नर जीवन मुक्तता होई ॥ पाँच तत्त्व गुण तीनों सोई । अविगत सो सब परगट होई ॥ १ ॥ बोलनहारा कहैं सो हूआ । कैसे उपजा कैसे मूआ ॥ पवनकी गाँठ सहज बनि आई । ताका बना बगूला भाई ॥ २ ॥ खुलि गइ गाँठ खोज नहिं पाया । पवनक पुतला पवन समाया ॥ जैसे बादल होत अकारा । तैसे दरसे यह संसारा ॥ ३ ॥ मिट गया बादल रहा अकासा । ऐसे आतमको न विनासा ॥ इस बहुरंगीका पार न पाया । कहैं कवीर गुरु भेद लखाया ॥ ४ ॥ पाया भेद भया उजियारा । साहब दरस्यो पार ओंकारा ॥ यही ज्ञान रतन है भाई । जो पावै सुख विलसे आई ॥ ५ ॥
साखी-ज्ञान रतनकी कोठरी, चुपकर दीजे ताल । पारिख आगे खोलिये, शीतल बचन रिसाल ॥
रमनी-गुरु महिमा ॥
गुरु मिले तो सत्य लखावे । बिन गुरु अन्त न कोऊ पावे ॥ जिन गुरुकी कीन्ही परतीती । एक नाम कर भवजल जीती ॥ १ ॥ गुरु प्रेमते जीव मराला । गुरु स्नेह बिन काग कराला ॥ गुरु दया गुरु शब्द हमारा । गुरु परगट गुरु गुप्त अधारा ॥ २ ॥ गुरु पृथ्वी गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थल महाँ कीन निवासा ॥ चन्द सूर
शब्दावली
(४४७)
गुरु सब संसारा । गुरु विन होय न कोइ व्यवहारा ॥ ३ ॥ गुरु ब्रह्मा औ विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥ चर अचर जहां लगि सब देखा । गुरु विन कछु और नहिं पेखा ॥४॥ उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्है गुरु बरिष्ठा ॥ ये सब जीव गुरु मय जानो । गुरुसे भिन्न और नहिं मानो ॥ ५ ॥ गुप्त प्रगट सबही जग जाया । सबहीमें है सतगुरुकी छाया ॥ कहैं कवीर सो हंस पियारा । यही भांतिते गुरु दरश निहारा ॥ ६ ॥
सा०-सो गुरु निसिदिन बंदिषे, जासो पढ़ये नाम । नाम विना घट अंध है, ज्यों दीपक विन धाम ॥
रत्नो-गृहो रहनी ॥
गृही भाव भक्ति जो साधे । संत साधु सेवा अचराधे ॥ चर तजि बाहर कबहुँ न जाई । गुरु गम भक्ति करै लौलाई ॥ १ ॥ भक्ति करै निर्भय सहदानी । गुरु अरु साधु एक करि जानी ॥ जहां साधु तहैं सतगुरु वासा । जहैं सतगुरु तहैं मुक्ति निवासा ॥ २ ॥ जहां मुक्ति तहैं लोक उजागर । जहां लोक तहैं रह सुख सागर ॥ जहां सुख सागर तहां कवीर । भक्ति मध्य बाहर औ तीर ॥ ३ ॥ जहां मध्य तहैं पुरुष अमान । जहैं बाहर तहैं हंस सुजान ॥ जहां तीर तहैं निर्मल धीर । जहां मरन नहिं व्यापै पीर ॥ ४ ॥ जहां पीर तहैं संशय धीर । संशय मध्य असंशय नीर ॥ जहां नीर तहैं सुख संतोखा । जरा मरण नहिं व्यापै धोखा ॥५॥ जहां धोख तहैं आवै धीर । जहां धीर तहैं गहिर गंभीर ॥ जहां गंभीर तहां स्थिर होइ । जहां थीर तहैं लहरि न कोइ ॥ ६ ॥ लहरि नहीं तहैं आपै आप । आपा मेटि मिटै संताप ॥ आपा मेटे ममिता खोइ । भाव भक्ति करि मानुष होइ ॥ ७ ॥ मानुष होय गहै निरवाना । पावै सत्य सही अस्थाना ॥ मानुष पद छोड़े व्यवहारा । ताते फिरि आवै संसारा ॥ ८ ॥ संसार आइके भक्ति
(४४८)
कवीरपंथी-
कमाई । भक्ति कमाय भक्त कहाई ॥ भक्त कहाइके रहै उदासा । सत्य गुरु मिलै सत्य विश्वासा ॥ ९ ॥ सतगुरु मिलै तो संशय भागे । सो फिरि बहुरि अंक नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥ १० ॥ सतगुरु पाय दुसर घर नाही । आवागमन रहित घर जाहीं ॥ कहैं कवीर सत्य करि माने । साधु गुरु नहीं अन्तर जाने ॥ ११ ॥
सा०-साधु बड़े परमार्थी, चन ज्यों बरषे आय । तपन बुझावैं औरकी, अपनो पारस लाय ॥
रमनी-वैरागी (साधु) रहनी ॥
वैरागी उनमुन घर करई । हर्ष शोक कछु चित्त न धरई ॥ रुखा सूखा करै अहारा । निसि दिन आतम तत्त्व सम्हारा ॥ १ ॥ विकसित बदन भजनके आगर । शीतल सदा प्रेम सुखसागर ॥ रहिता रहै बहै नहीं कबहीं । सो वैरागी पावे हमहीं ॥ २ ॥ हमें पाय हमहीं अस होई । आवागमन मिटावे सोई ॥ आवा-गमन मिटावै काई । रहैं अधीन तत्त्व समाई ॥ ३ ॥ काया धरि काया कहैं बोधे । आवागमन रहित तत सोधे ॥ जीवत मरे मरे पुनि जीवैं । उनमुनि बसे महा रस पीवैं ॥ ४ ॥ महाशून्यमो रहै समाई । मरै न जिवे आवे न जाई ॥ ऐसी विधि वैरागी सोई । हम मिलि रहै हमहि अस होई ॥ ५ ॥ भीतर रहनी कहा बनायी । बाहर रहनी देहुँ बतायी ॥ वैरागी आसन दृढ होई । रहै अजाँच जाँचे नहीं कोई ॥ ६ ॥ वैरागी अस चाल चलावे । तजै अखज तव हंस कहावे ॥ मद्य मांसके निकट न जाई । करै अहार सो काल कसाई ॥ ७ ॥ प्रेम भक्ति आने उर माहीं । द्रोह घात दिसि चित्तवै नाही ॥ जीव दया राखे हिय जानी । मन वच कर्म घात नहीं आनी ॥ ८ ॥ हंस दशा धरि पंथ चलावे । श्रवनि कण्ठी तिलक लगावे ॥ क्रोध
शब्दावली
(४४९)
कपट सब देह बहाई । क्षमा गंगमें पैठि नहाई ॥१॥ विन जाँचे जो कहु आवे । रूखा सुखा ना विलगावे ॥ गृही भक्ति जो सेवा लावे । ताको देखि न मोह बढावे ॥ १० ॥ वर्तमान वरते सो साधा । अधिक चहै तो होय व्याघा ॥ छाड़ि उपाधि रहै लवलीना । कहै कवीर सो हंस परवीना ॥ ११ ॥
सा०-संत सराहिये ताहिको, जाको सतगुरु टेक ।
टेक निवाहे देह भरि, रहै शब्द मिलि एक ॥
रसनी ॥ गुरु शिष्य अविकारी ॥
साहब सेवक एकै होई । सदा बसंत खेले सब कोई ॥ गुरु शिष्य एक जब होई । चिन्ह न परे एककी दोई ॥ १ ॥ साहब सेवक वरण दुहेला । एकै वरण गुरु औ चेला ॥ जैसे फूल बास कहैं तोरी । पाछे तिल संग तेहि जोरी ॥ २ ॥ पाछे फूल सुवासहिं देई । तिल तजि तेल बास गहि लेई ॥ ऐसे गुरु शब्द जो देई । चेला गहे निज हेतु विलोई ॥ ३ ॥ विना प्रेम जिव होय अनेरा । पाछे परे कालके घेरा ॥ गुरु सुवास है फूल सनेही । तिल अनुमान शिष्यकी देही ॥ ४ ॥ प्रेम भक्ति जो गुरु बतावे । करि विश्वास शिष्य तेहि धावे ॥ गुरु शिष्य भेद नहिं ताही । जोइ गुरु सोइ शिष्य निवाही ॥ ५ ॥ गुरु पूरा शिष सूरा होई । तबहि काल रहै मुख गोई ॥ शेष विना गुरु छूटे नाहीं । फिरि फिरि परिहैं भोचक माहीं ॥ ६ ॥ सतगुरु सो सतभाव बतावे । शिष, सोई जो प्रेम लगावे ॥ तीनों लोक एक होय जाई । गुरु शिष अलग होय नहिं भाई ॥ ७ ॥
सा०-गुरु समाना शिष्यमें, शिष कर लीया नेह ।
विलगाये विलगे नहीं, एक प्रान दुइ देह ॥
कर्म बण्डकी रसनी १ ।
कर्म कथा अब कहूँ बखानी । जौन फाँस अटके नर प्रानी ॥
कवीरपंथी शब्दावली १५
(४५०)
कवीरपंथी-
चारों खानि कर्म अधिकाई । चहुँ खानि मिलि कर्म टढाई ॥ कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चन्द्र शूर प्रकाशा ॥ कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महिते भौ गौरि गणेशा ॥ सात बार पन्द्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम कृष्ण अवतारा । कर्महि रावण कंस संहारा ॥ कर्महि ले वसुदेव घर आवा । कर्महि यमुदा गोद खिलावा ॥ कर्महिते वन गऊ चराई । कर्महि गोपी केलि कराई ॥ कौशिल्या तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥ कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह वनवासा ॥ कर्म जाय जब धनुष चढावा । कर्महि जनकसुता सिर नावा ॥ कर्महि हरचो सीता कई आई । दुख सुख कर्म ताहि भुगताई ॥ कर्म रेखते कोइ न सुकता । लछमन राम करम फल भुगता ॥ कर्मसाग बांधेउ तहिया । कर्महि जल जीवन दुख सहिया ॥ रुद्र राम कर्म कीन्ह लडाई । भला मिलाप हना भेट चढाई ॥ कर्मरेख नहि मिटे मिटाई । जीव पपील लङ्का होय आई ॥ कर्म रेख लंकापति गयो । लंकापति विभीषण भयो ॥ कर्म रेख सबहीं पर छाजा । कहाँ राम कहँ रावण राजा ॥ कर्मरेख सबहिन पर होई । देखो शुद्ध विलोय विलोई ॥ कर्मरेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हे चीन्हा ॥
कर्म रेख सागर बँध्यो, सौ योजन मर्याद ।
विन अक्षर कोइ ना छूटे, अक्षर अगम अगाध ॥ १ ॥
रमनी ॥ २ ॥
सागर है भवसागर धारा । नहि कछु सूझे वार न पारा ॥ तहवाँ बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥ कर्म रेख बंधा सब कोई । खानी बानी देखि विलोई ॥ वेद कितेब कर्महीं गाय। कर्महिको निःकर्म बताया ॥ सद्गुरु मिले तो भेद बतावे ।
शब्दावली
(४५१)
कर्म अकर्म मध्य दिखलावे ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥ अक्षरसागर निर्भय वानी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥ गोरख भरथरि गोपी चन्दा । कर्म फाँस सबही पुनी फन्दा ॥ सौ औ सात चौदह इक्कीसा । ब्रह्माके चौरासी भेसा ॥ कर्म फाँस तहवाँ लग राखा । जहाँ लग वेद व्यास कछु भाषा ॥ दश औ द्वादश कर्म बखाना । जिन जाना तिनहीं पहिचाना ॥ कर्म अकर्म मूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥ अक्षर सागर मूल भैंडारा । अक्षर मूल भेद उजियारा ॥ अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥
सा०-कर्महिं डोर चारो युग, सुनो सन्त सब दास ।
तत्त्वभेद निहतत्त्व लहि, जगते रहो उदास ॥ २ ॥
खंनो ॥ ३ ॥
सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारण कर्म नन्द घर गाजा ॥ एक नारि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपी निरमावा ॥ कारण कर्म केलि भव कीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥ जहाँ तहाँ गोरस जाय चुरावा । जहाँ जहाँ कर्म तहाँ ले खावा ॥ कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥ कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥ कर्महि कारण तहाँ सिधारा । कारण कर्म पिवे विषधारा ॥ मारि ताहि कीन्ही गति चारा । कर्म फाँस बोरचो संसारा ॥ कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्हो हाथा ॥ कर्महि मारि विध्वंस जो कीन्हा । कर्म फाँस सबही आधीना ॥ कुब्जा कछु कर्म जो कीन्हा । कारण कर्म कृष्ण गति दीन्हा ॥ कर्म पताल कालेश्वर नाथा । साँवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥ यज्ञ अश्वमेध करत बलि राजा । कर्मते जाय पताल विराजा ॥ कर्महि वामन रूप
(४५२)
कबीरपंथी—
बनाया। बलिराजापै दान दिवाया ॥ कर्म अहूठ नापि पग लीन्ह। तीने पग तीनों पुर कीन्ह। ॥ आधा पाँव कर्म अधिकारी। बाँधि नृपति पतालहिं डारी ॥ जहाँ लगि जीव जन्तु उत्पानी। तहाँ लगि कर्म राय परवानी ॥ कर्म फाँसते कोइ न छूटे। कर्म फाँस सबहिन घर लूटे ॥
सा०—कर्म फाँस छूटे नहीं, केतो करो उपाय।
सद्गुरु मिले तो ऊबै, नहिं तो परलय जाय ॥ ३ ॥
रमैनी ४ ॥
जो कुछ कर्म जगतमें करई। करि करि कर्म बहुरि भव परई ॥ एक न होय यज्ञ व्रत ठाना। एक न पाप पुण्य पहिचाना ॥ एक कर्म कुल लीन्ह उठाई। कर्म अकर्म न जाने भाई ॥ एक छापा और तिलक बनावे। पहिरि मेखला साधु कहावे ॥ वैष्णव होय करै षट्कर्म। वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥ कथा पुराण सुनै चित लाई। कर्महि सुमिरे बहु विधि भाई ॥ विष्णु सुमिरि तप बहु विधि कियो। सो निःकर्म विष्णु नहिं भयो ॥ कर्मक डोरि बँधा संसारा। क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥ एक अभंग एकादशि करई। तन छूटे वैकुण्ठहिं तरई ॥ यह वैकुण्ठ न इस्थिर होई। अन्त कर्मगति परलय सोई ॥ करै कर्म वैकुण्ठहिं जाई। कर्म घटे भव जल फिरि आई ॥ योगी योग कर्मको साधे। किरिया कर्म पवन आराधे ॥ योगी कर्म पवनको किरिया। भुगतै कर्म देह पुनि धरिया ॥ संन्यासी जो बन बन फिरहीं। होय निःकर्म कर्म फिर परहीं ॥ जीयत दग्ध देहको करई। जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥ कोई नम्र कोई वज्र कछोटा। भरमत फिरि सहै पग ठोटा ॥ राजद्वार पावे अवतारा। भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥ पण्डित जन सब कर्म बखाने। नख शिख कर्मफाँस अरुझाने ॥
शब्दावली
(४५३)
कर्म धर्मकी युक्ति बतावै । दान पुण्य बहु विधि अरथावै ॥ वज्र दान लै जन्म गँवावै । होई ऊंट बहु भार लदावै ॥ एक जो करै बरत अवतारा । होइ है सूकर थान सियारा ॥ सूकर थान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होइ हैं सुकता ॥
सा०-बहु बन्धनसे बाँधिया, एक विचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावै पीव ॥
संज्ञी ॥५॥
शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस सुकताओं ॥ निरालम्ब अवलम्ब न जानै । शब्द निरन्तर भेद बखानै ॥ पाप पुण्यकी छोड़े आसा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥ रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निस्तत्त्व समाई ॥ तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको देइ भजाई ॥ सुख सम्पति नहिं विपत्ति विचारे । काम क्रोध तृष्णा परजारे ॥ किया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरुवारे ॥ सो ग्रहे जो निग्रह काया । अभिअन्तरकी मेटे माया ॥ शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥ ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरण परछाले ॥ गहे तत्त्व निस्तत्त्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥ सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥ धन यौवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥ चहुँदिशि मंसा पवन कलोलै । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोलै ॥ उनमुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्त्वभेद निहतत्त्वहिं लहई ॥ जो कोइ आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥ मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरुगम लूटे ज्ञान भँडारा ॥ शूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥ दुखिया होय रेन दिन रोई । भोगी भोग करै सुख सोई ॥ दुख सुख भोग सोग सम जाने । भली बुगी कछु मन नहिं आने ॥ भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय
( ४५४ )
कबीररचनी-
पावे वह बैरागा ॥ सींगी अच्छय रैन दिन बाजे । सिद्ध साधु तहँ आसन छाजे ॥
सा०-आसन साथै आपमें, आपा डारे खोय ।
कहैं कवीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥ ६ ॥
इति कर्मवण्डकी रमनी ।
सत्यनाम ।
अथ पंच' देहकी निर्णय ॥
एक जीवको स्वतः पद, बुद्धि आँति सो काल । काल होइ यह काल रचि, तामें भये बिहाल ॥ १ ॥ बीहालेको मतो जो, देउँ सकल बतलाय । जाते पारख प्रौढ लहि, जीव नष्ट नहिं जाय ॥२॥ करि अनुमान जो शून्य भो, सूझे कतहूँ नाहिं । आपु आप बिसरो जबै, तन विज्ञान कहि ताहि ॥ ३ ॥ ज्ञान भयो जाग्यो जबै, करि आपन अनुमान । प्रतिबिंबित झाई लखै, साक्षी रूप बखान ॥ ४ ॥ साक्षी होय प्रकाश भो, महा कारण त्यहि नाम । मसुर प्रमाण सो विम्ब भो, नील बरण घनइयाम ॥ ५ ॥ बटयो विम्ब अध पर्व भो, शून्याकार स्वरूप । ताको कारण कहत हैं, महाँ अधियारी कूप ॥ ६ ॥ कारण सो आकार भो, श्वेत अँगुष्ठ प्रमान । वेद शास्त्र सब कहत हैं, सूक्ष्म रूप बखान ॥ ७ ॥ सूक्ष्म रूपते कर्म भो, कर्महिते यह अस्थूल । परा जीव या रहटमें, सहे घनेरी शूल ॥ ८ ॥
संतौ षट प्रकारकी देवी ॥
स्थूल सूक्ष्म कारण महाँ कारण केवल हंस कि लेही ॥ साटे तीन हाथ परमाना देह स्थूल बखानी । राता वर्ण बैखरी बाचा जागृत अवस्था जानी ॥ रजो गुणी ओंकार मात्रुका त्रिकुटी है
१ इस प्रन्यमें बटदेहका वर्णन है परन्तु इसका नाम पंचदेहका निर्णय है इसका कारण यह है कि, हंस देहको इसरी बेहोके साथ न मिलाकर अलग माना है । क्योंकि, वह बन्ध और मोक्षते परे मध्यकी भूमिका है ।
शब्दावली
(४५५)
अस्थाना । मुक्ति श्लोक प्रथम पद गायत्री ब्रह्मा वेद बखाना ॥ पृथ्वी तत्त्व खेचरी मुद्रा मग पीपल घट कासा । क्षय निर्णय बङ्गवाग्नि दशेन्द्रि देव चतुर्दश बासा ॥ और अहे ऋग्वेद बतायू अर्द्ध शुक्ति संचारा । सत्यलोक विषयका अभिमानी विषयानंद हंकारा ॥ आदि अंत औ मध्य शब्द या लखे कोइ बुधिवीरा । कहै कवीर सुनो हो संतो इति स्थूल शरीरा ॥ १ ॥
संतौ सूक्ष्म देह प्रमाना ।
सूक्ष्म देह अंगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥ श्वेत वर्ण ओंकार मात्रुका सतो गुण विष्णु देवा । ऊर्ध्व सुन्न औ यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहेवा ॥ मुक्ति समीप लोक वैकुण्ठ पालन किरिया राखी । मार्ग बिहंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥ आव तत्त्व कोहं हंकारा मंदाअग्नी कहिये । पंच प्राण द्वितीया पद गायत्री मध्यम बाणी लहिये ॥ शब्द स्पर्श रूप रस गंध मन बुद्धि चित हंकारा । कहै कवीर सुनौ भाइ संता यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥
संतौ कारण देह सरेखा ।
आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारा वर्ण परेखा ॥ मध्य शून्य मकार मात्रुका हृदया सो अस्थाना । महदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ती जाना ॥ उदराग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कंठ स्थानी । कपि मारग तृतीय पद गायत्री अहे प्राज्ञ अभिमानी ॥ सामवेद पश्यन्ती वाचा मुक्त स्वरूप बखानी । तेज तत्त्व अद्वैतानन्दं अहंकार निरबानी ॥ अहे विशुद्ध महात्म जामे तामे कछु न समाई । कारण देह इती सम्पूर्ण कहै कवीर बुझाई ॥ ३ ॥
सन्तो महकारण तन जाना ।
नील वरण औ ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥ नाभि स्थान
(४५६)
कबीरपंथी-
विकार मात्रुका चिदाकाश परवानी । मारग मीन अगोचर सुद्व्रा वेद अथर्वन जानी ॥ ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति ततु वायु । आश्रय लोक विदेहानंद मुक्ति साजोजि बतायु ॥ नृणै प्रकरशिक तुरी अवस्था प्रत्यज्ञात्मतु अभिमानी । शीव अहंकार महाकारण तन इहो कवीर बखानी ॥ ४ ॥
संतो सुनौ कैवल देह बखाना ।
केवल सकल देहका साक्षी भ्रमर गुफा अस्थाना ॥ निराकाश औ लोक निराश्रय निर्णय ज्ञान वसेखा । सूक्ष्म वेद है उनमुनि सुद्व्रा उनमुन बाणी लेखा ॥ ब्रह्मानंद कहीं हंकारा ब्रह्मज्ञानको माना । पूर्ण बोध अवस्था कहिये ज्योतिस्वरूपी जाना ॥ पुण्य गिरी अरु चारुमात्रुका निरंजन अभिमानी । परमारथ पंचम पद गायत्री परामुक्ति पहिचानी ॥ सदाशीव औ मार्ग सिखा है लहै संत मत धीरा । कालातीत कला सम्पूर्ण केवल कहै कवीरा ॥ ५ ॥
संतो सुनौ हंस तन व्याना ।
अबरण बरण रूप नहिं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥ नहिं ऊपजै नहिं विनशै कबहुं नहिं आवै नहिं जाहीं । इच्छ अनिच्छ न दृष्ट अदृष्टी नहिं बाहर नहिं माहीं ॥ मै तू रहित न करता भोगता नहीं मान अपमाना । नहीं ब्रह्म नहिं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जाना ॥ मन बुधि गुन इन्द्रिय नहिं जाना अलख अकह निर्बाना । अकल अनोह अनादि अभेदा निगम नीति फिरि जाना ॥ तत्त्व रहित रवि चंद्र न तारा नहिं देवी नहिं देवा । स्वयं सिद्धि परकाशक सोई नहिं स्वामी नहिं सेवा ॥ हंस देह विज्ञान भाव यह सकल वासना त्यागे । नहिं आगे नहिं पाछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥ निज प्रकाशमें आप अपनपौ भूलि गये विज्ञानी । उनमत बाल पिशाच मूक जड़ दशा पांच इह लानी ॥ खोये
शब्दावली
(४५७)
आपु अपनपौ सब रस निज स्वरूप नहिं जाने । फिरि कैवल महकारण कारण सूक्ष्म स्थूल समाने ॥ स्थूल सूक्ष्म कारण महाकारण कैवल पुनि विज्ञाना । भये नष्ट ये हेर फेरमें कतौ नहीं कल्याना ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो खोज करो गुरु ऐसा । ज्यहिते आप अपनपौ जानो मेटो षटका रैसा ॥ ६ ॥
निरख प्रबोधको रसैनी ॥ २ ॥
अस सतगुर बोले सत बानी । धन धन सत नाम जिन जानी ॥ नाम प्रतीत भई सब संता । एक जानके मिटे अनंता ॥ १ ॥ अनंत नाम जब एक समाना । तब ही साध परमपद जाना ॥ बिरला संत परम गति जानै । एक अनंत सो कहा बखानै ॥ २ ॥ सबते न्यारा सबके माहीं । माहीं सतगुर दूजा नाहीं ॥ सत्तनाम जाके धन होई । धन जीवन ताहीको सोई ॥ ३ ॥
दोहा-जिनके धन सत्तनाम है, तिनका जीवन धन ।
तिनको सतगुरु तारहीं, बहुर न धरई तन्न ॥ १ ॥
सत्तनामकी महिमा जानै । मन बच करमै सरना आनै ॥ एक नाम मन बच कर लेई । बहुर न या भवजल पग देई ॥ ४ ॥ योग यज्ञ जप तप क्या करई । दान पुत्रतैं काज न सरई ॥ देवी देवा भूत परेता । नाम लेत भागैं तज खेता ॥ ५ ॥ टोना टामन पूजा पाती । नाम लेत सहजै तर जाती ॥ जो इच्छा आवै मन माहीं । पुरवै तुरत बिलम्ब कछु नाहीं ॥ ६ ॥ सो सत्तनाम हृदय अनुरागी । सो कहिये साँचा बैरागी ॥ जब लग नाम प्रतीत न करई । तब लग जनम जनम दुःख भरई ॥ ७ ॥
दोहा-कविरा महिमा नामकी, कहता कही न जाय ।
चार मुक्ति औ चार फल, और परमपद पाय ॥ २ ॥
निरख प्रबोधको पहली रसैनी पृष्ठ ५०८ में आ गयी है ।
(४५८)
कवीरपंथी-
सत्तनाम है सबतें न्यारा । निर्गुन सर्गुन शब्द पसारा ॥ निर्गुन बीज सर्गुन फल फूला । साखा ज्ञान नाम है मूला ॥ ८ ॥ मूल गहेते सब सुख पावै । डाल पातमें मूल गँवावै ॥ सतगुरु कही नाम पहिचानी । निर्गुन सर्गुन भेद बखानी ॥ ९ ॥
दोहा-नाम सत्त संसारमें, और सकल है पोच ।
कहना सुनना देखना, करना सोच असोच ॥ ३ ॥
सबही झूठ झूठ कर जाना । सत्त नामको सत कर माना ॥ निस बासर इक पल नहिं न्यारा । जाने सतगुरु जानन हारा ॥ १० ॥ सुरत निरत ले राखै जहवाँ । पहुँचै अजर अमर घर तहवाँ ॥ सत्तलोकको देय पयाना । चार मुक्ति पावै निर्वाना ॥ ११ ॥
दोहा-सत्तलोकै सब लोक पति, सदा समीप प्रमान ।
परमजोतसो जोत मिलि, प्रेम सरूप समान ॥ ५ ॥
अंस नामतें फिर फिर आवै । पूरन नाम परमपद पावै ॥ नहिं आवै नहिं जाय सो प्रानी । सत्यनामकी जेहि गति जानी ॥ १२ ॥ सत्तनाममें रहै समाई । जुग जुग राज करै अधिकाई ॥ सत्तलोकमें जाय समाना । सत्त पुरुषसों भया मिलाना ॥ १३ ॥ हंस सुजान हंसही पावा । जोग संतायन भया मिलावा ॥ हंस सुघर दरस दिखलावा । जनम जनमकी भूख मिटावा ॥ १४ ॥ सुरत सुहागिन भइ आगे ठाढी । प्रेम सुभाव प्रीति अति बाढी ॥ पुहुपदीपमें जाय समाना । बास सुवास चहुँ दिस आना ॥ १५ ॥
दोहा-सुख सागर सुख बिलसई, मानसरोवर न्हाय ।
कोट काम-सी कामिनी, देखत नैन अघाय ॥ ६ ॥
सुरति नाम सुनै जब काना । हंसा पावै पद निर्वाना ॥ अब तो कृपा करी गुरु देवा । तातें सुफल भई सब सेवा ॥ १६ ॥ नाम दान अब लेय सुभागी । सत्त नाम पावै बड़ भागी ॥ मन बच
कर्म चित्त निश्चय राखै । गुरुके शब्द अमीरस चाखै ॥ १७ ॥ आदि अंत वहाँ भेदै पावै । पवन आड़में ले बैठावै ॥ सब जग झूठ नाम इक साँचा । श्वास श्वासमें साचा राचा ॥ १८ ॥ झूठा जान जगत सुख भोगा । साँचा साधू नाम सँजोगा ॥ यह तन माटी इन्द्री छारी । सत्तनाम साँचा अधिकारी ॥ १९ ॥ नाम प्रताप जुगे जुग भाखी । साध संत ले हिरदे राखी ॥ कहैं कवीर सुन धर्मनि नागर । सत्यनाम है जगत उजागर ॥ २० ॥
दोहा-महिमा बड़ी जो साध की, जाके नाम अधार ।
सतगुर केरी दया ते, उतरे भव जल पार ॥ ७ ॥
निरख प्रबोधको रत्ननी ॥ ३ ॥
प्रथम एक जो आपै आप । निराकार निर्गुन निर्जाप ॥ नहिं तब भूमि पवन अकासा । नहिं तब पावक नीर निवासा ॥ १ ॥ नहिं तब पांच तत्त्व गुन तीनी । नहिं तब सृष्टी माया कीनी ॥ नहिं तब आदि अंत मध धारा । नहिं तब अंध धुंध उजियारा ॥ २ ॥ नहिं तब ब्रह्मा विष्णु महेसा । नहिं तब सूरज चाँद गनेशा ॥ नहिं तब मच्छ कच्छ बाराहा । नहिं तब भादों फागुन माहा ॥ ३ ॥ नहिं तब कंस कृष्ण बलि बावन । नहिं तब रघुपति नहिं तब रावन ॥ नहिं तब सरगुन सकल पसारा । नहिं तब धारे दस औतारा ॥ ४ ॥ नहिं तब सरसृति जमुना गंगा । नहिं तब सागर समुद्र तरंगा ॥ नहिं तब तीरथ व्रत जग पूजा । नहिं तब देव दैत अरु दूजा ॥ ५ ॥ नहिं तब पाप पुत्र गुर सीखा । नहिं तब पठना गुनना लीखा ॥ नहिं तब विद्या वेद पुराना । नहिं तब हते कितेब कुराना ॥ ६ ॥
दोहा-कहैं कवीर विचारके, तब कुछ किरतम नाहिं ।
परमपुरुष तहैं आपही, अगम अगोचर माहिं ॥ १ ॥ करता एक अगम है आप । वाके कोई माय न बाप ॥ करताके
(४६०)
कवीरपंथी-
नहि बंधु औ नारी । सदा अखंडित अगम अपारी ॥७॥ करता कछु खावै नहि पीवै । करता कबहुँ मरे न जीवै ॥ करताके कुछ रूप न रेषा । करताके कुछ बरन न भेषा ॥ ८ ॥ जाके जात गोत कछु नाही । महिमा बरनि न जाय मो पाहीं ॥ रूप अरूप नहीं तेहि नाँव । बर्न अबर्न नहीं तेहि ठाँव ॥ ९ ॥
दोहा-कहै कवीर बिचार के, जाके बरन न गाँव ।
निराकार और निर्गुना, है पूरन सब ठाँव ॥ २ ॥
करता कृत्रिम बाजी लाई । ओंकार तैं सृष्टि उपाई ॥ पांच तत्त्व तीन गुन साजा । ताते सब कृत्रिम उपराजा ॥ १० ॥ कृत्रिम धर्ती कृत्रिम अकाश । कृत्रिम चंदूर परकाश ॥ कृत्रिम पांच तत्त्व गुन तीनी । कृत्रिम सृष्टि जो माया कीनी ॥ ११ ॥ कृत्रिम आदि अंत मध तारा । कृत्रिम अंध रूप उजियारा ॥ कृत्रिम सर्गुन सकल पसारा ॥ कृत्रिम कहिये दस औतारा ॥ ॥१२॥ कृत्रिम कंस कृत्रिम बलि बावन । कृत्रिम रघुपति कृत्रिम रावन ॥ कृत्रिम कच्छ मच्छ बाराहा । कृत्रिम भादों फागुन माहा ॥ ॥ १३ ॥ कृत्रिम सहर समुद्र तरंगा । कृत्रिम सरसुति जमुना गंगा ॥ कृत्रिम स्मृति वेद पुराना । कृत्रिम काजी कितेब कुराना ॥ ॥ १४ ॥ कृत्रिम जोग जोगावत पूजा । कृत्रिम देवी देव जो दूजा ॥ कृत्रिम पाप पुत्र गुर सीखा । कृत्रिम पढना गुनना लीखा ॥१५॥
दोहा-कहैं कवीर बिचारके, कृत्रिम करता नहि होय ।
यह बाजी सब कृत्रिम है, साँच सुनो सब कोय ॥
करता एक और सब बाजी । ना कोई पीर मसायख काजी ॥ बाजी ब्रह्मा विष्णु महेसा । बाजी इन्द्र औ चन्द्र गनेसा ॥१६॥ बाजी जल थल सकल जहाना । बाजी जानो जर्मों असमाना ॥ बाजी बरनो स्मृति वेदा । बाजीगरका लखै न भेदा ॥ १७ ॥ बाजी सिद्ध साधक गुर सीखा । जहाँ तहाँ यह बाजी दीखा ॥
शब्दावली
(४६१)
बाजी जोग यज्ञ व्रत पूजा । बाजी देवी देवल दूजा ॥१८॥ बाजी तीरथ व्रत आचारा । बाजी जोग यज्ञ व्योहरा ॥ बाजी जल थल सकल किवाई । बाजीसों बाजी लिपटाई ॥१९॥ बाजीका यह सकल पसारा । बाजी माहिं रहै संसारा ॥ कहैं कवीर सब बाजी माहीं । बाजीगरको चीन्है नाहीं ॥२०॥
अथ बीजककी रमैनी ।
प्रथम रमैनी १ ॥
अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥१॥ ते तिरिये भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिउ अंता ॥२॥ बाखरि एक विधातै कीन्हा । चौदह ठहर पाटि सो लीन्हा ॥३॥ हरि हर ब्रह्मा महंतौ नाऊँ । ते पुनि तीन बसाबल गाऊँ ॥४॥ ते पुनि रचनि खंड ब्रह्मंडा । छा दर्शन छानवे परखंडा ॥५॥ पेटहि काहु न वेद पढ़ाया । सुनति कराय तुरुक नहि आया ॥६॥ नारी मो चित गर्भप्रसूती । स्वांग धरै बहुतै करतूती ॥७॥ तहिया हम तुम एकै लोहू । एकै प्राण वियापल मोहू ॥८॥ एकै जनी जना संसारा । कौन ज्ञानते भयो निनारा ॥९॥ भा बालक भगद्वारे आया । भग भोगेते पुरुष कहाया ॥१०॥ अविगतिकी गति काहु न जानी । एक जीभ कित कहाँ बखानी ॥११॥ जो सुख होइ जीभ दश लाखा । तौ कोइ आय महंतौ भाखा ॥१२॥
सा०-कहहिं कवीर पुकारिकै, ई लेऊ व्यवहार ।
एक रामनाम जाने विना, भव बूडि मुआ संसार ॥१॥
दूसरी रमैनी २ ॥
जीवरूप यक अन्तर बासा । अन्तर ज्योति कीन परगासा ॥१॥ इच्छारूप नारि अवतरी । तासु नाम गायत्री धरी ॥२॥ तेहि नारीके पुत्र तिन भाऊ । ब्रह्मा विष्णु महेश नाऊ ॥३॥ तब ब्रह्मा
१ काई,
(४६२)
कवीरपंथी—
पूँछल महतारी । को तोर पुरुष तू काकरि नारी ॥४॥ तुम हम हम तुम और न कोई । तुमहिं मोर पुरुष हमहिं तोर जोई ॥२॥
सा०-बाप पूतकी एकै नारी, एकै माय बिआय ।
ऐसा पूत सपूत न देख्यो, बापै चीन्है धाय ॥ २ ॥
तीसरो रमैनी ३ ॥
प्रथम अरंभ कौनके भयऊ । दूसर प्रकट कौन सो ठयऊ ॥१॥
प्रकटे ब्रह्मा विष्णु शिव शक्ती । प्रथमै भक्ति कीन जिव उक्ती ॥२॥
प्रकटे पवन पानी औ छाया । बहु बिस्तारकै प्रकटी माया ॥३॥
प्रकटे अंड पिंड ब्रह्मण्डा । पृथिवी प्रकट कीन नवरंढा ॥४॥
प्रकटे सिध साधक संन्यासी । ये सब लागि रहे अविनासी ॥५॥
प्रकटे सुरनर सुनि सब झारी । तेऊ खोजि परे सब हारी ॥६॥
सा०-जीव सीव प्रकटे सबै, वे ठाकुर सब दास ।
कविर और जाने नहीं, एक रामनामकी आस ॥ ३ ॥
चौथी रमैनी ४॥
प्रथम चरण गुरु कीन बिचारा । करता गावै सिरजनहारा ॥१॥
कहै करिकै जग बौराया । शक्ति भक्ति लै बांधिनि माया ॥२॥
अद्भुत रूप जातिकी वानी । उपजी प्रीति रमैनी ठानी ॥३॥
गुणि अनगुणी अर्थ नहिं आया । बहुतक जने चीन्ह नहिं पाया
॥४॥ जो चीन्है तेहि निर्मल अंगा । अनचीन्है नल भये पतंगा ॥४॥
सा०-चीन्हि चीन्हि कह गावहू, बानी परी न चीन्हि ।
आदि अंत उत्पति प्रलय, सब आपुहि कहि दीन्हि ॥४॥
पांचवी रमैनी ५॥
कहैलौ कहौ जुगनकी बाता । भूले ब्रह्म न चीन्है ज्ञाता ॥१॥
हरिहर ब्रह्माके मन भाई । बिबि अक्षर लै जुगति बनाई ॥२॥
बिबि अच्छरका कीन बैधाना । अनहद शब्द ज्योति परमाना ॥३॥
अच्छर पठि गुनि राह चलाई । सनक सनन्दनके मन भाई ॥४॥
शब्दावली
(४६३)
वेद किताब कीन्ह विस्तारा । फैल गैल मन अगम अपारा ॥५॥ चहुँ जुग भगत बांधल बाटी । समुझि न परी मोटरी फाटी ॥६॥ भैभै पृथ्वी चहुँ दिसि धावै । अस्थिर होय न औषध पावै ॥७॥ होय भिस्त जो चित न डोलावै । खसमहि छोड़ि दोजखको धावै ॥८॥ पूरुब दिशा हंस गति होई । है समीप सँधि बूझै कोई ॥९॥ भगता भगतिन कीन सिगारा । बूड़ि गयल सब माँझहिं धारा ॥ ५ ॥
सा०-विन गुरु ज्ञाने दुन्द भो, खसम कही मिलि बात । जुग जुग कहवैया कहै, काहु न मानी जात ॥ ५ ॥
छठी रमैनी ६ ॥
वर्णहुँ कौन रूप औ रेखा । दूसर कौन आहि जो देखा ॥१॥ ओ ओंकार आदि नहि बेदा । ताकर कहौ कौन कुल भेदा ॥२॥ नहि तारागण नहि रवि चंदा । नहि कछु होत पिताके बिदा ॥३॥ नहि जल नहि थल नहि थिर पवना । को धरै नाम हुकुम को बरना ॥ ४ ॥ नहि कछु होत दिवस अरु राती । ताकर कहहु कौन कुल जाती ॥ ५ ॥
सा०-शून्य सहज मन स्मृतिते, प्रकट भई यक ज्योति । बलिहारी ता पुरुष छवि, निरालंब जो होति ॥ ६ ॥
सातवी रमैनी ७ ।
जहिया होत पवन नहि पानी । तहिया सृष्टि कौन उत्पानी ॥ १ ॥ तहिया होत कली नहि फूला । तहिया होत गर्भ नहि मूला ॥ २ ॥ तहिया होत न विद्या वेदा । तहिया होत शब्द नहि खेदा ॥ ३ ॥ तहिया होत पिंड नहि बासू । ना धर धरणि न गगन अकासू ॥ ४ ॥ तहिया होत गुरु नहि चेला । गम्य अगम्य न पंथ दुहेला ॥ ५ ॥
(४६४)
कवीरपंथी-
सा०-अविगतिकी गति का कहौं, जाके गाँव न ठाँव । गुण विहीना पेखना, का कहि लीजै नाँउ ॥ ७ ॥
आठवीं रसनी । (बेदांत विचार) ८ ।
तत्त्व मसी इनके उपदेशा । ई उपनिषद कहै संदेशा ॥ १ ॥ ऊ निश्चय उनके बड़ भारी । वाहिको वर्ण करे अधिकारी ॥२॥ परमतत्त्वका निज परमाना । सनकादिक नारद सुख माना ॥३॥ याज्ञवल्क्य औ जनक संवादा । दत्तात्रय वहे रसस्वादा ॥४॥ वहे वसिष्ठ राम मिलि गाई । वहे कृष्ण ऊधव ससुझाई ॥५॥ वहे बात जो जनक दिढाई । देहै धरे विदेह कहाई ॥ ८ ॥
सा०-कुल अभिमाना खोयकै, जियत सुवा नहि होय । देखत जो नहि देखिया, अदृष्ट कहावै सोय ॥ ८ ॥
नवीं रसनी ९ ।
बांधे अष्ट कष्ट नौ सुता । यम बांधे अंजनिके पूता ॥ १ ॥ यमके बाहन बांधिनि जनी । बांधे सृष्टि कहालौं गनी ॥२॥ बांधे व तेंतीस करोरी । सुमिरत बँदि लोह गौ तोरी ॥३॥ राजा सुमिरैदे तुरिया चढी । पंथी सुमिरि नाम ले बढी ॥ ४ ॥ अर्थ बिहीना सुमिरे नारी । परजा सुमिरे पुहुमी झारी ॥ ९ ॥
सा०-बँदि मनाय फल पावहीं, बँदि दिया सो देव ।
कह कवीर ते ऊबरे, निसि दिन नामहि लेव ॥ ९ ॥
रसनी दशवीं १० ।
राही ले पिपराही बही । करगी आवत काहु न कही ॥ आई करगी भो अजगूता । जन्म जन्म जम पहिरे बूता ॥ बूता पहिर जम करे पयाना । तीन लोकमें कीन्ह समाना ॥ बांधेउ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर । सुर नर सुनि औ बांध गणेश्वर ॥ बांधे पवन पावक औ नीरू । चन्द्र सूर बांधे दोउ बीरू ॥ सांच मंत्र बांधे सब झारी । अमृत वस्तु न जाने नारी ॥
शब्दावली
(४६५)
सा०-अमृत वस्तु जाने नहीं, मगन भये कित लोय । कहहि कवीर कामो नहीं, जीवहिं मरण न होय ॥११॥
रत्नो ग्यारहवीं ११ ।
आंधरी गुष्ठि सृष्टि भई बौरी । तीन लोक महाँ लागि ठगौरी ॥ ब्रह्महिं ठग्यो नाग संहारी । देवन सहित ठग्यो त्रिपुरारी ॥ राज ठगौरी विष्णुहिं परी । चौदह भुवन केर चौधरी ॥ आदि अन्त जेहि काहु न जानी । ताको डर तुम काहेक मानी ॥ ऊ उतंग तुम जाति पतंगा । यम घर किहेउ जीवको संगा ॥ नीम कीट जस नीम पियारा । विषको अमृत (मान) कहत गवारा ॥ विषके संग कौन गुण होई । किंचित लाभ मूल गौ खोई ॥ विष अमृत गौ एकै सानी । जिन जाना तिन विष के मानी ॥ कंहा भये नर सुय बेसुद्धा । बिन परचय जग बूढ़ न बुद्धा ॥ मतिके हीन कौन गुण कहई । लालच लागे आशा रहई ॥
सा०-भुवा है मरी जाहुगे, भुये कि बाजी ढोल ।
स्वप्न सनेही जग भया, सहिदानी रहिगो बोल ॥ ११ ॥
रत्नो नारहवीं १२ ।
माटिक कोट पषानक ताला । सोई बन सोई रखवाला ॥ सो बन देखत जीव डेराना । ब्राह्मण वैष्णव एक करि जाना ॥ (जोरी) ज्यों किसान किसानी करई । उपजे खेत बीज नहिं परई ॥ छाड़ि देहु नर झोलिक झेला । बूड़े दोऊ गुरु औ चेला ॥ तीसर बूड़े पारथभाई । जिन बन दाहे दवा लगाई ॥ भूंकि भूंकि कूकर मरि गयऊ । काज न एक सियारसे भयऊ ॥
साखी-मूस विलारी एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।
अचरज यक देखो हो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥१२॥
१ कहां भये नल स्रक्ष बेस्रक्ष । बिन परिचय जग मूढ न बूझा ॥