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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(७२५)

सहजै रहै समाइ सब रूपैना कहूं जाइ न आवैरे । धरे न ध्यान करे नहिं जप तप राम रहौम न गावैरे ॥ तीरथ वरत दोऊ फल त्यागे सुन्न दौरि नहीं धावैरे । यह संसै जब समझ परैगी पूजै काहि पूजावैरे ॥ जोग जुगतिसौं करम न छूटे जो पै आपा आपन सूझैरे ॥ कहैं कवीर ते जन गहये जे कोई समझै बूझैरे ॥

कहरा २७-मनषा जनम सुधारौ संतो धोखै कहा विगावोरे ॥ गुड गुडीका ख्याल छांडि देहु आतम तत लौ लावैरे । जब लग घटमें परचै नाहीं तब लग कछु न पावैरे ॥ नेम वरत और जप तप संजम यह करनी मति भूलौरे ॥ करम फन्द जुग जुग गल पहिरे फिरि फिरि जोनी झूलौरे ॥ ना कुछ नहाये ना कुछ धोये ना कछु घंट बजायैरे । ना कुछ नेती ना कुछ धोती ना कछु नाचे गायैरे ॥ से लीन सिंगी जटुआ न बटुआ आप स्वांग से न्यारारे । कहैं कवीर मुक्ति तब पावौ गहौ जु सबद हमारारे ॥

कहरा २८-वंझा एक सुपनमें सूती पूत जना अति लोनारे ॥ बहुतक दान दिये विपरनकौं बहु रूपा बहु सोनारे ॥ फिरि सुपनेमें सुपना देखा व्याहि पूत घर आनारे । आवत ही मरिगया पूत हूआ रोवन पीटन ठारीरे ॥ यह संसार सुपनसम देखा कहैं कवीर विचारीरे ॥

कहरा २९-अरे मन महरा करहु सिताबी बिलम किये भल नाहीरे । एक नवरिया पांच खिवटिया घरमराइको साहीपीरे ॥ पहिली धारा वेद कितेबा हिंदू तुरुक मिलि धाईरे । दूजी धारा काम किरोधा ओहीमें बहि जाईरे ॥ तीसरी धारा कर्मकी फांसी जाइ लगा संसारा रे । चौथी धारा नौ औतारा राम किसन गुनवारारे ॥ पचवीं धारा जोतिसरूपा हिंदू तुरुक मिलि धायारे ॥

(७२६)

कवीरपंथी—

घटवरिया मोहि जान न देसी घाटहीमें लेख चुकायारे ॥ कहैं कवीर मेरा साथ विवेकीषी धारासे रहा हुइ न्यारारे ॥

कहरा ३०—वा घरकी कोइ मोहि बतावौ जा घरसैं ब्रह्म आया रे ॥ काया छाँडि चले तब हंसा तब ब्रह्म कहाँ समायारे ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश न होते आदि न होती मायारे । रज वीरज दोनों नहीं होते तब ब्रह्म कहाँ रहायारे ॥ पवन पानी मिलि दही जमाया अग्निका जामन दीयारे । चंद सूरज दोनों करत षवासी घोर मथन घृत कीयारे ॥ मैं मेरी ममताके कारन बारहौं बार ठगायारे । अजहुँ समझि ग्यान मति हीना फिरि फिरि भटका खायारे ॥ सुरति सुहागिन चरन पलौटे धनी आपना पायारे ॥ जिनकी सुरति लगी सत सबदे उलटि निरंतर धायारे ॥ चांदौ सूरज दिवस नहीं रजनी जहाँ सुरति लौलायारे ॥ कहैं कवीर ग्यान धुनि उपजी सहजै सबद समायारे ॥

कहरा ३१—आपही आप इच्छना धारी इच्छा बेल पसारिरे ॥ आप अपारु इच्छा धारु बहु विधि रूप सम्हारीरे ॥ इच्छा माँहि बीज विस्तारा मूल पत्र ओ डालीरे । पेड और डाल फूल फल सबही वा माहीं है सारीरे ॥ चौंसठ चौक पूर जब करकै ले आपुन आप माहीरे । कहैं कवीर यह एकम एका और दूसरा नाहीरे ॥

कहरा ३२—अविगत अगम अपार अशेषा रूप वरन नहीं भेषारे दिष्ट न सुष्ट लषा नहीं जाई न काहुन पेषारे ॥ वाकी महिमा कहाँलौ वरनौ मो पै वरनि न जाईरे ॥ ऐसा अलष लषै नहिं कोई ना काहु दिया दिखाईरे ॥ अपरमपार अपार अखंडा घटमें रहा समाईरे ॥ जिन कछु खोज पिंडका कीया सेनहि सेन बताईरे ॥ ब्रह्मंड नौ षडपिंड माँहि पूरि रहा गुर पूराये ॥ कहैं कवीर गगन धुनि माहीं बाजत अनहद तुरारे ॥

शब्दावली

(७२७)

कहरा ३३-तन धरि सुषिया कोई न देखा जो देखा सो दुखियारे ॥ ऊगन आथनकी बात कहत हौ सबका किया विवे- षारे ॥ ब्रह्मा विष्णु महादेव दुखिया जिन यह राह चलाईरे ॥ सुखदेव आचारी दुखके कारन गरभहि माहि छपाईरे ॥ राजा दुषिया रानी दुषिया एक दुषी धनहीनारे ॥ जोगि दुखी और जंगम दुखिया कपटीको दुख दूनारे ॥ आशा तूष्णा सब घट व्यापै कोइ महल नहीं सूनारे ॥ घाट वाट तो सब जग दुखिया क्या गेही पटगीतारे ॥ कहे कवीर यह सब जग दुखिया कोई संत सुखी मन जीतारे ॥

कहरा ३४-सतगुरु आइ करी निज दाया अब हम आया चीन्हारे ॥ निज बुध रूप पिरापत नितही अचरज सहीछु कीन्हारे ॥ ना हम मनुष देवता नाहीं ना गेही वन पंड़ीरे ॥ ब्राह्मन छत्री वेसहू नाहीं ना हम सूदर डंडीरे ॥ ना हम जोगी ना हस जंगम ना हम तपी सन्यासी रे ॥ ना वैरागी ना ब्रह्मचारी ना हम जपी उदासीरे ॥ ना हम ज्ञानी चतुर न मूरख ना पंडित न पोथीरे ॥ ना हम शायर ना मरजीवा ना हम सीप न मोतीरे ॥ ना हम गगन सुन्न भी नाहीं ना हम तेज न पानीरे ॥ मन बुधि चित अहंकार भी नाहीं ना हम वेद न वानीरे ॥ ना हम अमर मरै नहिं कबहुँ हम कवीर ज्योंका त्योंहीरे ॥ व्यास कपिल और वामदेव ऋषि सबकी अनुभव यौहीरे ॥

कहरा ३५-ग्यान विचारन ग्यान विचारन ग्यान विचारन जोगीरे ॥ रहै उदास सबसे सबहुनमें सुषमनि सुरति संजोगीरे ॥ जैसे कमल रहै जल भीतर जलसे रहत निनारारे ॥ ऐसे साधु रहै जगमाहीं परम तत्व निखारारे ॥ जैसे धाइ बालको पोषै अपनो जानत नाहीरे । करम करै करता न कहावै यौ साधु जग

(७२८)

कबीरपंथी—

माँहोरे ॥ उदैं भयो तिमर सब खोया अंधकार सब नासारे । कहैं कबीर विचार अभै पद निहतत निजवासारे ॥

कहरा ३६—हम तो भरम विसारि डारिकै एक एक करि जानारे । दूजा कहै गहीकै दूजा जिन नाही पहिचानारे ॥ एकै पवन पावक औ पानी और पानी एकै जुत संसारारे ॥ एक खाख गढे बहु भांडे एकै सिरजन हारारे ॥ जैसा बढई काठे काटै अगिनि न काटै कोईरे ॥ ऐसे व्यापि रह्यो अभिअंतर धरैं सरूपा सोईरे ॥ माया मोहकरि जगत भुलाना अर्थ देखि पतियाना रे ॥ होइ निरशंक कछू नहीं व्यापै कहैं कबीर गियानारे ॥

गौरी प्रारम्भ ।

गौरी १—संतो मन चीन्हो रे भाई । मन चिन्है विना परलैतर जैहौ जीवको जमले जाई ॥ टे० ॥ मन चिन्है ते हंस हमारा । तजे खलककी आस ॥ छूटै पिंड काल नहि पावै । पावै मुक्ति निवास ॥ मूल लेखामैं जीव जो आवै । दुविधा दूर बहाइ ॥ पुरुष नामको सुमिरन करिकै । अगर डोरि चढ़ि जाइ ॥ निशि दिन सुरति करै साहिबसों । सबद हेत लिय बोले ॥ कहैं कबीर सुनो भाई संतो । सो जीव कबहुँ न डोले ॥

गौरी २—जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै । तेरो नाम न कोईलैहै ॥ ॥टेका॥ सूखै ताल नीरकै निबडै सूखै कमल कुंमलैहै ॥ सूखै पुरइन सरकी शोभा । जित तित धूर उडैहै ॥ जब लग तेल दीप में बाती । दिष्ट पडे सब कोई ॥ निपटै तेल बीत गइ बाती । जग अंधियारा होई ॥ जा प्रीतमसो प्रीति करत हैं । ताहीको अंग डरिहै ॥ दूर करो मंदिरसों बाहिर । प्रेत भया धरिखैहै ॥

शब्दावली

(७२९)

दिन दोय चार नाम भजि लेहू । काल अचानक खेहै ॥ कहैं कवीर जगतका वासी । निकस पयाना देहै ॥

गौरी ३-मन रे जागत रहिये भाई । गाफल होय वस्तु मत खोवै ॥ चोर सुसे घर जाई ॥ टे० ॥ षड् चक्रकी कनक कोठरी वस्तु भाव है सोई ॥ ताला कुंजी कुलफ कर लागे उघड़त बार न होई ॥ पांच पहरवा सोय गया है वस्ती जगवा जागी ॥ जरा मरन व्यापै कछु नाहिं गगन मंडल लव लागी ॥ कर विचार मन ही मन उपजी ना कहूँ गया न आया ॥ कहै कवीर संशय जब छूटे नाम रतन धन पाया ॥

गौरी ४-डग मग छाड़ि दें मन बौरा ॥ अबतो जै बिन आवै लीन्हो हाथ सिधौरा ॥ टे० ॥ पहिर जंजीर पैठि रन भीतर जूझ मरे नहीं भागे ॥ जन्म मरनकी आशा छोड़ै सो पग धारे आगे ॥ होय निःशंक मग्न होय नाचो लोभ मोह भरम छाड़ो ॥ सूर कहाँ मरन सो डरपै सती न सांचौ मांडौ ॥ अग्नि जै सो सती न कहावे जूझ मरे नहीं सूर ॥ ब्रह्म अग्निमें यह तन होमैं सो पद पावे पूरा ॥ लोक लाज कुलकी मरजादा येही गलेमें फांसी ॥ आगे होय पग पीछे धरि हैं होय जगतमें हांसी ॥ ये संसार सकल जग मैला नाम भजे ते सूचा ॥ कहैं कवीर हरि भक्ति न छांडो गिरत परत चढ़ि उंचा ॥

गौरी ५-नट होय नाच रे मन मेरा जो रीझै साहिब तेरा ॥ टेक ॥ ज्ञानको ढोल बजाय रैन दिन शब्द सुने सब कोई ॥ राह केत गह जब कोपै जम घर बंधन होई ॥ द्वादश तिलक बनाये बांस चढ़ि जग तजि होय रहो न्यारा ॥ सहस्र कला होय नाचे मन मोरा रीझैगा साहेब प्यारा ॥ जो रीझै जगदीश जगतगुरु देगा दान बुलाई ॥ भरी सभामें चोला बकसे फाटि कबू नहिं

(७३०)

कवीरपंथी—

जाई ॥ जो तू कूदि जाये भवसागर कला बता दूँगा तेरी ॥ कहैं कवीर सत ब्रत साधो, नव निधि होय रहै चेरी ॥

गौरी ६—जगमें काहु न मन वश कीन्ह। भारत खंडमें भरतसे ग्यानी भ्रुग सुत मन हर लीन्ह। ॥ टे० ॥ भृंगी ऋषि सो वनमें रहते, विषय विकार न जाने ॥ पठई नारि भूप दसरथने, पकड़ि अजोध्या आने ॥ सूखे पत्र पवन भस्त्रि रहते पाराशरसे ज्ञानी ॥ भरमें रूप देखिकै गनिकाको काम कंदला वानी ॥ जमदग्निकी नारि रेनुका, गयी यमुना जल लेने ॥ भरमि देखि भूपको मन्दिर, थकित भये दो नेने ॥ सोई सुरपति जाके नारी सुचीसी, निश दिनही संग राखी ॥ गौतम घर काम निहोर वसि, निगम कहत है साखी ॥ पार्वतीसी पत्नी जाके, ताके मन क्यों डोले ॥ खलित भये छबि देखि मोहिनी, हाहा कह कह बोले ॥ येक ही नाल कमल हित ब्रह्मा, जग उपराज कहावैं ॥ कहैं कवीर एक मन जीते विना, जीव विसराम न पावे ॥

गौरी ७—मनसा बिन दौड़े न रहैरे । जो मैं राखों जग जुगति सो, छिन छिन मोहि दहैरे ॥ टे० ॥ यह गयंद पांचों मद माते, आँकुशको न सहैरे ॥ नाम सुने रंग राते नाही, विषकी वेल गहैरे ॥ समझत नाहि मूठ मारगको, उबट राह बहैरे ॥ अरध मास भादोंकी नदिया, वे मरजाद बहैरे ॥ सीखे सुने गावे बहु तेरे, कोई यक राह न रहैरे ॥ कहैं कवीर यह भगत दुहेली, विरला जन निबहैरे ॥

गौरी ८—मन तू थकत थकत थकि जाइ । विन थाके तेरा काज ना सरिहै, फिर पाछे पछिताई ॥ टे० ॥ जब लग तू सरजीव रहत है, तब लग परदा भाई ॥ टूटि जाये ओट तिनकाकी, जो मन शिखर दह जाई ॥ सकल तेज तजि होय नपुंसक, या मति

शब्दावली

(७३१)

सुनि तू मेरी ॥ जीवन मृतक दशा विचारे, पावे वस्तु घनेरी ॥ याके परै और कछु नाहिं, यह मत सबसँ पूरा ॥ कहै कवीर मारि मन मैंगल, होय रहै जस धूरा ॥

गौरी ९-मन तू चेतन होरे भाई। जाते काल फांस मिटिजाई ॥ टे० ॥ घटमें सिन्धु सिन्धुमें जल है। तामें कमल विराजे ॥ तामें जोति प्रगट परमेश्वर। सिखर घरावर बाजै ॥ रवि शशि और सकल तारायन। गंगा जमुना दो धारा ॥ तामें जोति करे पावककी। त्रिभुवन भया उजियारा ॥ सात अरु पांच चतुर्दश तामें और बहतर थाना। ज्ञानी गुनी जानि जिव अपना। घटमें सिंधु समाना ॥ तैंतीस तीन चार ताहि खोजै। शंकर पार न पावै ॥ कहैं कवीर बलि बलि सतगुरुकी। घटही माहिं लखावै ॥

गौरी १०-मन तू पार उतारि कहाँ जैहै। आगे पंथी पंथ न कोई, कुछ सुकाम न पैहै ॥ टेक ॥ नहिं तहाँ नीर नाव नहीं खेवट, ना गुन खैचनहारा ॥ धरनि गगन कल्प कछु नाहिं, ना कछु वार न पारा ॥ नहिं तन नहिं मन नहिं अपनपौ, सुन्यमें सुधि न पैहै ॥ विलैमान होय जाय फूटि घट, याहू ठौर विन होयहो ॥ बार बार विचार देखि मन, अन्त कहूँ नहिं जैहो ॥ कहैं कवीर सब छौड़ि कल्पना, ज्योंका त्यों ठहरैहो ॥

गौरी ११-या मनको खोजोरै भाई। तन छूटे मन कहाँ समाई ॥ टे० ॥ शिव विरंचि नारद सुनि ज्ञानी। मनकी गति उन्हुँ नहिं जानी ॥ ध्रुव प्रहलाद विभीषण शेषा। तन भीतर मन उन्हुँ न देशा ॥ सनक सनंदन जय देव नामा। भक्ति करि मन उन्हु न जाना ॥ या मनका कोइ लहै न भेव। रंचक लीन भया मुखदेव ॥ गोरख भरथरी गोपीचंदा। या मनसौ मिलि करै अनंदा ॥ एकलि निरञ्जन सकल शरीरा। या मनसौ मिलि रहा कवीरा ॥

(७३२)

कवीरपंथी—

गौरी १२—है कोई भूला मन समझावे । यह मन चंचल चोर पाहरू छूटा हाथ न आवे ॥ ८० ॥ जोड़ि जोड़ि धन औदे गादे, जहां कोई लेन न पावे ॥ कंठ कपोल आनि जम घेरै, दे दे सैन बतावे ॥ खोटा दाम गांठि लिय डोलै, बडी बडी वस्तु मुलावे ॥ बोवै बबूल दाख फल चाहै, सो फल कैसे पावे ॥ गुरूकी दया साधुकी संगति, ये दोउ मति विसरावे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बहुरि न भौजल आवे ॥

गौरी १३—मन तू क्यों भूला रे भाई, तेरी सुधि बुधि कहाँ हेराई ॥ ८० ॥ जैसे पंछी रैन वसेरा, बसे वृच्छ में आई ॥ भोर भये सब आप आपको, जहां तहां उठि जाई ॥ सुमामें तोहि राज मिल्यो तहाँ है, हाकिम डुकुम दुहाई ॥ जागि पञ्चो जब लावन लसकर, पलक खुले सुधि आई ॥ मात पिता सुत बंधु तिरिया, नाती सगो सगाई ॥ यह तो सब स्वारथके संगी, झूठी लोक बढाई ॥ सागर माहिं लहरि उठत है, गिनती गिनी न जाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, दरिया लहरि समाई ॥

गौरी १४—मनुवा नाहिं मानत मोरा । बार बार मैं कह समझायो, जगमें जीवन थोडा ॥ ८० ॥ या कायाका गर्व न कीजे क्या श्यामल क्या गोरा ॥ भजन विना तन काम न आवे, कोटि सुगन्ध चहोरा ॥ या माया जनि देखत भूलो, क्या हस्ती क्या घोडा ॥ जोड़ि जोड़ि धन बहुत विश्वचै, कोटिक लाख करोड़ा ॥ उवध्या उरमति और चतुराई, जन्म गमायो बौरा ॥ लेत उपाय गिरत भव परियो, जैसे बालक भौरा ॥ अजहुं आय करो सत्संगति, हरि भजि मानि निहोरा ॥ कहैं कवीर मन चितराखो, ज्यों रे सुई बिच डोरा ॥

शब्दावली

(७३३)

गौरी १५—मन तू मानत क्यों न मना रे । कौन कहनको कौन सुननको, दूजा कौन जनारे ॥ टे० ॥ दर्पनमें प्रतिबिंब जु भासे, आप चहुँ दिशि सोई । धोखा मेटि एक जब होवे, जो लखि पावे कोई ॥ जैसे जलते हेम बंधत है, हेम धूम जल सोई ॥ तैसे या तत वा तत सो, फेरि यह अरु वह सोई ॥ जे समझे ते खरी कठिन है, ना समझे तो खोटी ॥ कहैं कवीर दो उपाधि त्यागे, ताकी मति है मोटी ॥

गौरी १६—साधो भाई आत्म सत प्रगासा । ज्यों सूरजमें नहीं अंधेरी, ऐसे सत्य उजासा ॥ टेक ॥ ज्ञान स्वरूप महा अति सूच्छम, करन कहै विज्ञाना ॥ अंधाको सूरज नहीं सुझे, भूल्यो सकल जहाना ॥ बदलीमें सूरज जिमि छिप जाई, माया ब्रह्मलुकाना ॥ ऐसे आत्म सत प्रकाशा विरले साधू जाना ॥ आपहिँ एक अनंत पुनि आपही, नरक स्वर्ग तहां नाही ॥ कौन तरे कौन काको तारे, भूलि रह्यो बाहिर माही ॥ करता काल कर्म नहीं माया, आपही है सब जागा ॥ जन्म मरण नाहिं कछु धोखा, आप चीन्ह अम भागा ॥ विन चीन्है कौनसो कहिये, दुतिया होये बताऊँ ॥ जाकी वस्तु गई सो ढूँढे, गई नहीं क्या पाऊँ ॥ आदि अनादि पार के पारा, वार पार सब एका ॥ कहैं कवीर बूझिये भाई, साधू करै विवेका ॥

गौरी १७—जब ते आत्म तत्त्व विचारा । तब निवैर भया सबहीते, काम कोध गहि डारा ॥ टेक ॥ सबमें आपमें आपमें सबहीं, आप आपमें मेला । नाना भांति घड़े बहु भांजन, रूप धरे धरि खेला ॥ पूरन ब्रह्मा सकल घट कहिये, को पंडित को जोगी । राजा रंक कौनसों कहिये, कौन वैद कौन रोगी ॥ चारहुँ दिशा

(७३४)

कवीरपंथी—

हूँटि हम आये, निरगुन कोइ न बतावे । कहैं कवीर कोई दास निज निर्गुनी, और सब लीला गावे ॥

गौरी १८—आपन पौ आपनहींमें पायो । शब्दही शब्द भयो उजियारा, सतगुरु भेद बतायो ॥ टे० ॥ जैसे सुंदरी सुत लै सुती, स्वप्ने गयो हेराय ॥ जाग परी पलंगपै पायो, ना कहूँ गयो ना आय ॥ जैसे कुँवरि कंठ मनि हीरा, आभूषण विसरायो ॥ संगकी सखी मिलि भेद बतायो, जिवको भरम मिटायो ॥ जैसे मृग नाभि कस्तूरी, हूँदत बन बन धायो । नासा स्वाद भयो जब वाके, उलटि निरंतर आयो ॥ कहा कहूँ वा सुखकी महिमा, ज्यों गुंऐ गुड खायो । कहै कवीर सुनो भाई साधो, ज्योंका त्यों ठहरायो ॥

गौरी १९—राम विना कहु नाहिं साधो, राम विना कहु नाहिं ॥ रामहिं आगे रामहि पीछे, रामहिं बोले माहिं ॥ टे० ॥ उत्तर राम दक्षिण राम, पूर्व राम पश्चिम रामा ॥ स्वर्ग पताल महीतल रामा, राम सकल विसरामा ॥ ऊठत राम बैठत राम, जागत सोवत रामा ॥ राम विना कहु और न दरसे, सकल राम के कामा ॥ सब चराचर सम्पूर्ण रामा, निरखो शब्द सनेहि ॥ कायम सदा कदेहूँ नहि विनासै, बोलन हारा एहि ॥ एक रामको भजे निरंतर, येक राम मिलि गावे ॥ कहैं कवीर रामके परसे, आपा ठौर न पावे ॥

गौरी २०—आये राम भतारा, हम घर आये राम भतारा । ढुलहिन गावो मंगल चारा ॥ टे० ॥ तन रति करहु मन रति करिहु पांचों तत्त्व बराती । राम हमारे पाहुन आये हम जोबन मद माती ॥ शरीर सरोवर वेदी रचिहूँ ब्रह्मा वेद उचारा । राम देव संग भावर फिरहु धनि बड़ भाग हमारा ॥ सुर तैंतीसों

शब्दावली

(७३५)

कौतुक आये मुनि जन कोटि अठासी । कहै कवीर हम व्याह चले हैं पुरुष एक अविनाशी ॥

गौरी २१-आनन्दके घर पायो, अब हम आनंद घर पायो । जबते दया भई सतगुरुकी, अभय निशान बजायो ॥ टेक ॥ काम क्रोधकी गागरि फूटी, ममता मोह बहायो ॥ तजि प्रपंच विविध बिधि किया, चरन कमल चित लायो ॥ प्रेम प्रीति किया तन गुदडी, सुरतिको टोप बनायो ॥ हृद घर छाडि वेहद घर आसन, गगन मंडल मठ छायो ॥ चंद न सूर दिवस नहीं रजनी, जहां जाय लाड-लड़ालाहायो ॥ कहै कवीर कोइ पियाकी प्यारी, पिया पिया रट लायो ॥

गौरी २२-बात लगे मोहि नीकी प्यारी, तेरी बात लगे मो नीकी । जो कोई कोटि भांति सखुझावे, सबही लगे मोहि फीकी ॥ टेक ॥ जलको मीन पलंग ले राख्यो, ले अमृत जल सींची । तलफ तलफ तजत पलंगपै, सुधि बुधि विसरचो जिवकी ॥ स्वातीको स्वाद पपीहा जाने, को जाने वाके जिवकी ॥ पियाको मरम सोइ भल जाने, जाके चोट विरहकी ॥ हीराकी परख जौहरी जाने, चोट सहे सिर घनकी ॥ कहैं कवीर जहैं प्रेम वसतु है, छिपी न रहै वा जनकी ॥

गौरी २३-संतो बोलनहारा राम रजा । पिंड ब्रह्मांड रहे भर पूरा, आप अकेला बांधि धजा ॥ टेक ॥ जैसे बुंद परी जल माही, जलहीते बुद बुद उपजा ॥ मिट गया बुद बुद जलही समाना, होय गया एक सरूप सजा ॥ कोटिक कुम्भ भरे जल झलके, तामैं दीसे चंद सजा ॥ विनशे कुम्भ चंद नहीं विनशे, शब्द स्वरूपी अमर अजा ॥ जामैं हम सोई हम माहीं, मैं ते ते मैं

(७३६)

कवीरपंथी—

गगन गजा ॥ कहैं कवीर कछु संशय नाहिं, तत्त्व लखा जब भ्रम भजा ॥

गौरी २४-संतो भाई हरिसा हीरा लाधा, देखत ही मन मगन भयो है, गिन गिन गांठी बांधा ॥ टेक ॥ पल पल परखों छिन छिन निरखों, राखूं छानै छानै ॥ भेद काहुपै मानू नाहिं, परचो रंककै पानै ॥ तोल न मोल अमोलक कहिये, फोरेहु नहिं फूटे ॥ कहैं कवीर यह खुल गइ गठरी, खोले नहिं खूटे ॥

गौरी २५-जप जप अजपा जाप भला । सुरति न विसहं एक पला ॥ टे० ॥ येही राह वहै सतगुरुकी, पंछी मारग मीन चला ॥ हंसा मारग सोध चले हैं, जा खोजत जम मान दला ॥ सतलोक सतगुरुका आसन, सुरति निरतिकी बांधि कला ॥ अगम डोरि नगरीके निरंतर, मकर तार तहां सोधि चला ॥ भया मुचेत सुरति लव लागी, कहैं कवीर जब होय भला ॥ सतगुरु शब्द विलोय कह्यो है, मन छाडै जब नाम मिला ॥

गौरी २६-साधो भाई नाम ध्वजा फहराई । लोक वेदकी चाल मिटाई, सो निज देखो आई ॥ टे० ॥ कहा पढै पंडित वेद पुराना, भेद न हिरदे समाई ॥ खसम छोड़ि भयी बिबचारिनी, बातें करत बनाई ॥ वेद पढै पुनि भेद न पावे, फिर फिर भटका खाई ॥ कोइ कोइ संत विवेकी विरला, रहै राम लव लाई ॥ नाम प्रताप सदा सिर ऊपर, दर्शन पाय नसाई ॥ जाको काल सदा सिर नावे, दूरि दूरि होय जाई ॥ कहूँ कहा कछु कहत न आवै, सब घट रह्यो समाई ॥ नाम प्रतीति भई जाजनको कहैं कवीर समझाई ॥

गौरी २७-गुनका भेद न्यारा न्यारा, जानगो जानन हारा ॥ टे० ॥ सोई राज राजकुल मंडन, जाके मस्तक मोती ॥ और सकल ये भार लदनियां मैहका सुतके गोती ॥ सोइ भुवंग जाके मस्तक

शब्दावली

(७३७)

मणि हैं, जोति उजारे खेले॥ और सकल सावनका कीड़ा, जगत पावतरि पेलै॥ सोई सुमेर जो उदय उजागर, जामें धातु निवासा॥ और सकल पाषाण बराबर, टांकी अग्नि प्रकासा॥ सोई पतिव्रता पियाव्रत साधे, आज्ञा कानि न लौपे॥ और सकल ये स्वान सूकरी, सुंदर नाम न औपे॥ कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, नाम भजन अधिकारी॥ और सकल साहिबको बाना, देख्यो तत्त्व विचारी॥

गौरी २८-देखे एक सतगुरु संत सिपाई । प्रेम प्रीतिका पटा लिखाया, अभय जगीरी पाई॥ टे० ॥ सुरति सिगड़ी साज समझको, तनकी तुबक बनायी॥ दारू दम सहजका सीसा, ज्ञानको गज ठहकायी । शील सोपता प्रेमकी पथरी, चित चकमक चमकाई । जुगति जाम बुधिका मंदिरा, प्रीति पियालै पाई॥ सतनामका उठत पलीता, हरि ही होत हवाई॥ गम गोला गढ़ भीतर लागा, भरमकी बुरज दहवाई॥ सतसमसेर जुगति जम धर, छमाकी ढाल बनाई॥ मोह मोरचा पहले तोडा, माया भाग नशाई॥ मन मैवासी गठपतिराजा, जाकी फिरत दुहवाई॥ शब्द स्वरूप सदा सिर ऊपर, सुरति सुरंग लगाई॥ अकल गरीबी दावा दीना, लिया विवेक गढ़ आई॥ संत सूरमा गढ़ मेरा डाका, पकड़े गढ़के रोई॥ पकड़ै खान जान नहीं पावे, पकड़ी ममता बाई॥ साहिब कवीर चढ़ै गढ़ ऊपर, जीति निशान बजाई॥

गौरी २९-पूछे कोई संत सुजान सन्देशा । सतगुरु दियो उपदेश सबनको, चलो अपने देसा॥ टे० ॥ अगम संदेश अगोचर महिमा, नहीं जहां रूप निशानी॥ जीवन ब्रह्म सुरति नहीं मन गति, ऐसा पद निरवानी॥ या नगरी कोई रहन न

कवीरपंथी शब्दावली २४

(७३८)

कवीरपंथी-

पावे, भय चिंता दुख खानी ॥ सुन्दर रूप देखि मत भूलो, छिनमे जात विलानी ॥ अब एक शब्द हमार सुनिये, निरखि परखि दिल दीजै ॥ सून्यके मिले सून्य होय जेहो, अजर अमर तहां जीजै ॥ जो कछु तुम्ह तुम बिन कछु नाहिं, सरजीव जमा संभारो ॥ कहैं कवीर एक हम तुमहिं, घट घट रूप निहारो ॥

गौरी ३०-मिलो प्यारे संत सुजान सनेही । बहु दिन बीते तुम विछुडे को, चेतो बेरिया एही ॥ टे० ॥ या अवसर जीव जमा संभालो, डुरलभ मनुखा देही ॥ अबही समझि रहो घट भीतर, जन्म सुफल कर लेही ॥ निरखो शब्द सदा सुखदाई, जुग जुग हम गोहराई ॥ दया सरूप रहो नितसंगही, अन्त कहूँ नाहिं जाई ॥ खोलो दिष्टि उघाडौ निर्मल, चीन्हो वचन हमारा । कहैं कवीर सुखसागर तजिकै, कहा मन लग्यो तुम्हारा ॥

गौरी ३१-सौदा राम निरंतर भाई ॥ टेक ॥ ज्ञानका गोन सुरति बनजारा, लौकी लार लगाई ॥ गमका बैल वालदी मनवा, हरि भजि हा हा हाई ॥ मनसा तोड़ि मोल करि महंगा, हित करि बेच विचाई ॥ जन जन सेती साटन करिये, गाहक लेगा आई ॥ पूरी "....." बनिके उत्तरि, शंका रही न काई ॥ कहैं कवीर सुनौ भाई साधो, सतगुरुकी शरनाई ॥

गौरी ३२-अवसर बहुत भलोरै भाई, मनुषा देह देवनको डुरलभ, सोई देह तैं पाई ॥ टेक ॥ तजि अभिमान झूठ प्रपंच-को, छाड़ु गुमान बडाई । मात-पिता स्वारथके संगी, माया जाल बंधाई ॥ जब लग जरा रोग नाहिं तेरे, ले गुरु ग्यान भलाई ॥ साधु संगति मिलि भजु सतगुरुको, सोई सकल सुख-दाई ॥ कहूँ पुकारि चेत नर अंधा, यह तन आन गवाई । कहैं कवीर देही कांचको रूप, विनशत बार न लाई ॥

शब्दावली

(७३९)

गौरी ३३-बन्दे नाम साहेबको लेरे । नाम विना तेरो काज न सरिहै फिर पीछे पछतैहै रे ॥ टेक ॥ एक लख पुत्र सवा लख नाती, संपति थिर न रहै रे ॥ लंकासे कोट विनसि गये, छिन्नमें ऐसी ब्यार वहै रे ॥ नदी नाव संजोग बनो है, ऐसे मिलना हैरे । ना कोई तेरा ना तू काहूका, पैडे खलक बहैरे ॥ ये तो सब स्वारथके गरजी, गुरु विन सुख न लहैरे ॥ छनिक माहिं तन विनसि जायगा फिर कछु कर न सकेरे ॥ ताते बेगि सम्हार अपनपौ, सत कवीर सत्य कहैरे ॥

गौरी ३४-जिवरा तू जायगो मैं जानी । आवेगी कोई लहर लोभकी, बूढेगो विन पानी ॥ टेक ॥ राजकरंते राजा जायगा, सेज संजती रानी । बेद पठनले पंडित जायगा, कथा सुननते ज्ञानी ॥ जोग करन्ते जोगी जायगा और जायगा अभिमानी । कहैं कवीर सत् भगति न जायगी, आदि अन्त ठहरानी ॥

गौरी ३५-अब तो ऐसेही बनि आई । भावे कोई निंदो भावे कोई वन्दो, छोड़ी लोक बढाई ॥ टेक ॥ कुलसे निकसि भई जब गनिका, बहुरि न कुलै समाई ॥ केहारे कोटि करै जु लंघन, भूखा घास न खाई ॥ भव सागर तरबेके कारन, नामकी नाव बनाई । हलके हलके पार उतारि गये, बूढे मान बढाई ॥ जैसे भृग नाद धुनि सुनिकै, प्रान तजत है आई । जैसे मीन मरै विन नीरा, जल विनु रह्यो न जाई ॥ परगयी छाप भक्ति अनुभवकी, उर अंतर लपटाई ॥ दास कवीर डिगै नहिं कबहुं, वाढी अमिट सगाई ॥

गौरी ३६-धोखा सबको मारे साधो, धोखा सबको मारे ॥ ऐसो है कोई संत विवेकी निरमल ज्ञान विचारे ॥ टेक ॥ कोई खोजै शिव सकतीको कोई खोजै काया ॥ कोई खोजै सून्य

(७४०)

कवीरपंथी—

मंडलको, ऐसे जग भरमाया ॥ कोई मुनिजन मनको खोजै, उलटी पवन चढावे । कोई खोजै भँवर गुफा, अजपा सो लौ लावे ॥ कोई सिद्ध होय आसन साधे, कोई सीख सयाना । कोई देश देशान्तर डोलै, तीरथ व्रत लपटाना ॥ करम भरमकी सांकर काटे, पार ब्रह्मको सेवे । कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, सिरपै बोझ न लेवे ॥

गौरी ३७—साधो भाई मनका धोखा भागा । बहुत दिननका भमरत फिरिया, सोया था अब जागा ॥ टेक ॥ लोग कहैं यह काल बली है, सब काहूको खावे । हम जाने यह अलख पुरुष है, आपा माहिं समावे जैसे बेयार बगूरा होई, धूर उड़ावे भारी । खुली गाँठि जब पवन भई है, सो गति भई हमारी । जैसे लून भया जल सेती, सब कोई कहैं सारा । उलटि जु लून आप संग मिलिया, मिटिगा नाम विकारा ॥ ज्यों वहनी काष्ठमें होई, कर न सके परगासा । जब काष्ठ वहनीमें आया, छूटि गया भरम पास ॥ भरम छाड़ि निह भरम भया है, निज तत्त्वसो पहिचाना । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मिटिगा आवन जाना ॥

गौरी ३८—पंडित सत पद जपरे भाई । चरण कमल विन सब नर बुढे, नरक पडी चतुराई ॥ टेक ॥ ज्ञान न उपज्यो ब्रह्म न चीन्हो, आप कहाँसे आई ॥ एक बुंद सो चारि वरन मै, ब्रह्म देह कहैं पाई ॥ शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर, भिन भाव जहाँ नाही । लख चौरासी जीव जो इनमें, वरत रह्यो सब मांही ॥ नौगुन सूत उरझि नहिं सरुझे, तीन गिरह दे आनी । ताको जनेऊ कबहुँ नहिं टूटे, दिन दिन बारह बानी ॥ ब्रह्म गायत्री गुरु अस्थाना, अजपा जाप थिर माहीं । संज्ञा तरपन तहवां कीजे, कुश पानी जहैं नाही ॥ रिग जजु ग्यान ध्यान धरि

शब्दावली

(७४१)

पशुवा, साम अर्थवन सोई ॥ सुसम वेदको भरम न जाने, कैसे ब्राह्मन होई ॥ कहैं कवीर निज ब्रह्मही चीन्हो, पास जनेऊ सोई । पाखंडकी गति सबही छूटे, तब निज ब्राह्मन होई ॥

गौरी ३९-पंडित अपनी अगिन बुझावो । हम तो अपनी राह चलत हैं, तुम काहे दुख पावो ॥ टे० ॥ को तुम कौन कहाँ से आये, अंत कहाँ तुम जाई । यहाँ तो तुम ब्रह्मन होइ बैठे, चौरासी बिसराई ॥ दशों मास औघें सुख रहिया, सप्त धातु रस पीया ॥ जहाँ तो तुम चौका करि जीमो, वहाँ चौका किन दीया ॥ ना मैं चीन्ह हारि मत चालो, अनंत अनूप उखाडो ॥ कोध चंडाल सदा संग व्यापे, ताको मूल उखाडो ॥ कुल अभिमाना आनकी पूजा, यहाँ विथा तोहि लागी । जो यह जाति बड़ी है पांडे, सुखदेवने क्यों त्यागी ॥ पांच तत्त्वको सकल पसारा, जहवाँ जीव दुख पावे ॥ कहैं कवीर सोई सत ब्राह्मन, उलटा ब्रह्म समावे ॥

गौरी ४०-पांडे बूझि पियो जल पानी, तोही छूति कहाँ लपटानी ॥ टेक ॥ जल सूतक थलभी सूतक, सूतक पवन रसोई ॥ जनम मरण दोऊ भी सूतक, सूचि कहाँते होई ॥ नहाय धोयके चौके बैठा, बहुत करी सुथराई ॥ उडि माखी चौकेमें बैठी, बूडि गई चतुराई ॥ मक्खी एक अखज भखि आयी, हसती ऊँट अरु घोडा ॥ उडि माखी पनवारे बैठी, ताको करो निबेडा ॥ पीर मुये पैगम्बर गाडे, सहस अठासी पांडे ॥ जलि बलि राख भये धरनीपर, उस माटीके भांडे ॥ पाँचो कपडा एक सूतका, जुलहे एक बनाया । कपडा लेकर अलगे राखो, धोती चौके लाया ॥ हाड़ झरे झर चाम झरेझर, दूध वहाँ सो आया ॥ सोई दूध तुम पीवन लागे, चपिया छूत लगाया ॥ नदी एक जो जल बहिआया,

(७४२)

कबीरपंथी—

एक रेत जल सरिया । मगर मच्छ जो जलमें न्याए, जल सूतक से भरिया ॥ तुमतो पहिरि जनेऊ बैठो, मेहरी को क्या पहिराया ॥ वहि कहिये बारैकी सूहर, उन परसी तुम खाया ॥ चार अचार छाडिदे पांडे, रहो तत्त्व लौ लाई । कहै कवीर सुनो हो पांडे, गहो संत सरनाई ॥

गौरी ४१—पांडे ना कर वाद विवाद । या देही विन सबद न स्वांद ॥ टेक ॥ खंड ब्रह्मांड पिंडभी माटी, माटी नय निधि काया । माटी खोजत सतगुरु भेटा, तिन कछु अलख लखाया ॥ जीवत माटी सुए भी माटी देखो ज्ञान विचारी । अंत काल माटीमें बासा, लोटे पांव पसारी ॥ माटीकी भीत पवनका थम्भा, बिंद संजोग उपाया । भांडे गोठे सँवारे सोई, या साहबकी माया ॥ माटीका मन्दिर ज्ञानका दीपक, बाती पवन उजियारी । जाहि जिया सब जग सूझे, कहै कवीर विचारी ॥

गौरी ४२—पंडित मिथ्या करत विचार । नहीं तहां सृष्टि न सिरजनहार ॥ टेक ॥ सुन्न अस्थूल पवन नहीं पावक, रवि शशि धरनि न नीरं । ज्योति स्वरूपी काल न तहिया, नाही वचन शरीरं । भरम करम वहां कछु नाहिं, नाही वेद विचारं । हरि हर ब्रह्मा शिव सकती नाहीं, नाहिं तीरथ आचारं ॥ गोरख राम वहां कछु नाहीं, नहीं मन्त्र नाहिं पूजा ॥ सज्जन असज्जन भावभी नाहीं, कौबू एककि दूजा ॥ माय बाप गुरु नाहिं वाके, ओ तो पुरुष अकेला ॥ कहै कवीर जो अबकी समझे, सो सतगुरुका चेला ॥

गौरी ४३—पंडित कहो मोसो समझाई । अरथ धर्म काम मोक्ष फल, कौन दिशि है भाई ॥ टेक ॥ उत्तर दच्छिन पूरब पच्छिम,

शब्दावली

(७४३)

सरग पाताल भूमाहीं । बिना ब्रह्म खाली नहीं कितहुँ, नरक पड़े सो काहीं ॥ अन समझे को नरक सरग है, ततदरसीको नाहीं । जा डरसो संसार डरत है, सो डर हमरे नाहीं ॥ पाप पून्यकी कहेँ न आशा, सरग नरक नहीं जाऊँ ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, जहाँ पद तहाँ ठहराऊँ ॥

गौरी ४४-भगतकी हांसी करो मत कोई । जाको हँसे महा दुख होई ॥ टेक ॥ पहिली हांसी करी हिरनाकुश, नखसे उदर विदारो । बाँह पकड़ि भुजा उपाडी, ले धरतीमें डारो । दूजो हांसी रावन कीन्ही जनम तीन तिहिँ मारो । भगत विभीषण राज दियो है, अजहुँ टरत न टारो ॥ भीषम करन द्वैत दुयोधन, ये हांसी करि हारे । कौरव कुटुम्ब निकंदन कीन्हो, भगत चक्रसे मारे ॥ जिन जिन हांसी करी भगतकी, सो २ नर नरक सिधारे ॥ तिन पतितनको नरक दियो है, कहैं कवीर पुकारे ॥

गौरी ४५-हरितो भगतनके बस भाई । जाति वरन कुल रीझत नाहीं, ना रीझे चतुराई ॥ टेक ॥ सेवरी जाति भीलनी होती, वेर जूठले आई । प्रीति जानि वाके फल पाये, तीनों लोक बंढाई ॥ करमा कद आचार कियो थो, हरिसे प्रीति लगाई ॥ छप्पन भोग पाछे आरोगे, पहिले खिचडी खाई ॥ तिर लोचन और नामा पीपा, हरि पेठे विकराई । सेन रूप होय मर्दन कीन्हो आप भये हरि नाई ॥ सहस्र अठासी जग्यमें जीमें, तबहुँ घंट नहिरे बाज्यो । कहैं कवीर स्वप्नचके जीमे, संख मगन होय गाज्यो ॥

॥ इति गौरी ॥

(७४४)

कवीरपंथी-

राग कल्याण प्रारम्भः ।

राग कल्याण १-पल पलबलि मैं गुरुके जाऊँ, जिनरे किरपा करि नाम दियो है, गुरुकी पटतर काहि लगाऊँ ॥ टेक ॥ सुखदेव दियो वैकुंठ फेर । बिन गुरु नाहि भयो निवेर । जनकको जाय कियो गुरुदेव । ताहीते पायो अलख अभेव ॥ नारद निंदा गुरुकी कीन्ही । ताहीते चौरासी दीन्ही ॥ रंचक उन गुरु दया जु करी । गुरु प्रताप चौरासी टरी ॥ गुरु समान दाता नहि कोय । भगति दान गुरु दियो मोय ॥ कहैं कवीर सुनो नर लोई । गुरुको भगति विनु मुक्ति न होई ॥

राग कल्याण २-गुरु मेरे बुटिया अजब पिलाई । भया सचेत मिटी दुचित्ताई ॥ टे० ॥ नाम औषधि रसन कटोरी । ताहिके पीवत कुमति गढ़ मोरी ॥ सुषुमनिके घर भयो अनंदा । मिटि गई तिमिर उदय भौ चंदा ॥ सुरति सुहागिनि भरि भरि लाई । पीवत अमृत कबहुँ न अघाई ॥ सुषुमनि सुरति भई मतवारी । कबहुँ न लागे विषय सुमारी ॥ ब्रह्मा नारद रहे लुभाई । खोजत शम्भु ध्यान लगाई ॥ प्रेम प्रीति भरि पिया जु कोई । कहैं कवीर अमर भै सोई ॥

राग कल्याण ३-भाग बडे जाके संत पधारै । करि सुमिरन भवसागर तारे ॥ टे० ॥ आये संतको आदर कीजै चरन धोय चरनामृत लीजै ॥ येही संत हैं पर उपकारी । सरन आयेको लेत उबारी ॥ साहबको घर संतन माँहिं । साहेब संत कछु अन्तर नाहिं ॥ कहैं कवीर संतन भले पधारै । जनम जनमके कारज सारै ॥

राग कल्याण ४-जबते मन प्रतीति भयी । दिन दिन अवगुन छूटन लागे, बाढन लागी प्रीति नयी ॥ टे० ॥ सुखसागर सुख