भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

प्रथम अध्याय-२ ] [ ३८५ दिखाने का निष्फल प्रयत्न किया ॥३०॥ फिर महाराज दशरथने अयोध्या पहुँच कर अपने मन्त्रियो के परामर्श से सीतापत्ति राम को अयोध्या के राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त करने का विचार किया । अभिषेक के लिए सम्पूर्ण सामग्री एकत्र होकर जब पूर्ण तैयारी हो गई, तब श्रीराम का अभिषेक करने मे तत्पर राजा दशरथ को कैकेयी ने वरदान माँग कर रोक दिया ॥ ३१ ॥ तब महाराज की आज्ञा सुन कर जनक सुता और सुमित्रा पुत्र-लक्ष्मण सहित श्रीराम वन मे गये । साथ चलते हुए पुरवासियो को आगे चल कर छोड़ दिया तथा गुह के घर मे जाकर राजकीय वस्त्राभूषणो का परित्याग कर जटावल्कल धारण कर लिया ॥३२॥ प्रियानुजयुतस्ततो मुनिमतो वने पूजितः स पञ्चवटिकाश्रमे भरतमातुर सगतम् । नि-वार्य मरण पितु समवधार्य्य दुःखानुर- स्तपोवनगतोऽवसद्रघुपतिस्ततस्ता समाः ॥३३॥ दशाननसोदरा विषमबाणवेधातुरां- समीक्ष्य वररूपिणी प्रहसती सती सुन्दरीम् । निजाश्रयमभीप्सती जनकजापतिर्लक्ष्मणा- त्करालकरवालत समकरोद्विरूपा तत ॥३४॥ समाप्य पथि दानव खरशरै शनैर्नाशयन् चतुर्दशसहस्रक समहनन्खर सानुगम् । दशाननवशानुग कनकचारुच्छन्मृग प्रियाप्रियकरो वने समवधीद्बलाद्राक्षसम् ॥३५॥ सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ मुनिवेश धारी श्री राम पूजा-सम्पन्न होकर विविध मे वनो निवास करने लगे । इसके पश्चात् कातरता पूर्वक भरतजी वहाँ आये । उनसे पिता का मरण सुन कर श्रीराम को बडा दुःख हुआ और भरत जी को समझा कर लौटा दिया और तपोवन मे रहने लगे ॥३३॥ फिर कामबाण से बिद्ध

३८६ ] कल्कि पुराण सुन्दर रूप वाली, हास्यवदना, वर की कामना करती हुई रावण की बहिन शूर्पणखा को आते देख कर लक्ष्मण जी को सकेत किया, जिसके अनुसार लक्ष्मण जी ने तीक्ष्ण तलवार से उस राक्षसी का रूप भ्रष्ट कर दिया ॥३४॥ फिर उन्होंने मार्ग मे एक दानव का मार कर, चौदह हजार सेना के अधिपति एव रावण के अनुगामी खरदूषण को सेना सहित नष्ट कर दिया । फिर सीता जी की इच्छा से स्वर्ण-मृग रूपी राक्षस को मार डाला ॥३५॥ ततो दशमुखस्त्वरस्तमभिवीक्ष्य राम रुषा व्रजन्तमन्तुलक्ष्मण जनकजा जहाराश्रमे । ततो रघुपतिः प्रिया दलकुटीरसस्थापिता न वोक्ष्य तु विमूर्च्छितो वह विलप्य सीतेति ताम् ॥३६॥ वने निजगणाश्रमे नगतले जले पल्वले विचित्य पतित खग पथि ददर्श सौमित्रिणा । जटायुवचनोत्ततो दशमुखाद्दता जानकी विविच्य कृतवान्मृते पितरि वत्कृत्य प्रभु ॥३७॥ प्रियाविरहकातराऽनुजपुर सरो राघवो धनुर्धरन्धरो हरिबल नवालापिनम् । ददर्श ऋषभाचलाद्रविजवालिराजानुज- प्रिय पवननन्दनं परिणतं हित प्रेषितम् ॥३८॥ फिर राम लक्ष्मण को गया हुआ देख कर रावण ने उनके आश्रम से अकेली सीताजी का हरण कर लिया । तदनन्तर श्रीराम ने वहाँ आकर जब सीता को न देखा, तब वे 'हा सीते' 'हा सीते' आदि शोक युक्त शब्दो मे विलाप करते हुए मूर्च्छा को प्राप्त हो गये ॥ ३६ ॥ फिर वे ऋषियो के आश्रम, पर्वतो की गुफा, जल और स्थल आदि विविध स्थानो मे सीताजी को ढू ढने लगे । आगे चलने पर उन्हें माग मे जटायु पडा मिला । उससे उन्हे सीता हरण का समाचार प्राप्त हुआ । जटायु के मरने पर उन्होंने अपने पिता के समान उसका

तृतीय-अध्याय-३ ] [ ३८७ मृतक सस्कार किया ॥३७॥ सीताजी के वियोग से व्याकुल हुए धनुर्धरो मे श्रेष्ठ श्रीराम लक्ष्मण के सहित नव-परिचय प्राप्त बानर सेना मे मिले और उनकी सूर्य पुत्र बालि के छोटे भाई सुग्रीव द्वारा भेजे हुए उसके मन्त्री हनुमान से भेट हुई ॥३८॥ ततस्तदुदितं मत पवनपुत्रसुग्रीवयो- स्तृणाधिपतिभेदन निजनृपासनस्थापितम् । विविच्य व्यवसायकैर्निजसखाप्रिय बालिनम् निहत्य हरिभूपति निजसख स रामोऽकरोत् ॥३६॥ अथोत्तरमिमा हरिजजनकजा समन्वेषयन् जटायुसहजोदितैर्जलनिधि तरन्वायुजः । दशाननपुर विशञ्जनकजा समानन्दय न्नशोकवनिकाश्रमे रघुपति पुन प्राययौ ॥४०॥ ततो हनुमता बलादमितरक्षसा नाशन ज्वलज्ज्वलनसकुलज्वलितदग्धलङ्कापुरम् । विविच्य रघुनायको जलनिधि रुषा शोषयन् बबन्ध हरियूथप. परिवृतो नगेरीश्वर ।। बभञ्ज पुरपत्तन विविधसर्व्वदुर्गक्षमम् निशाचरपते. क्रुधा रघुपति' कृतो सद्गति ॥४१॥ फिर सुग्रीव और हनुमान की प्रार्थना पर उन्होने ताल के सात वृक्षो को काट गिराया और बालि का वध करके सुग्रीव को बानरो का राजा बना कर उससे मित्रता स्थापित की ॥३६॥ फिर पवनसुत हनुमान सीता की खोज मे गये और संपाति की प्रेरणा पर लकापुरी मे स्थित अशोक वाटिका पहुँच कर उन्होने सीताजी को राम-सदेश से आनन्दित किया और रामचन्द्रजी के पास लौट आये ॥ ४० ॥ फिर श्रीरामचन्द्र ने हनुमानजी के द्वारा अनेको राक्षसो का मारा जाना और लका का जलाया जाना सुना तो वे शिलाओ द्वारा समुद्र पर सेतु बाँध

३८८ ] [ कल्कि पुराण कर बानरो के सहित लंकापुरी जा पहुंचे और रावण के पुर की प्राचीर आदि को उन्होंने नष्ट कर डाला ॥४१॥ ततोऽनुजयुतो युधि प्रबलचण्डकोदण्डभृत् शरै खरतरै क्रुधा गजरथाश्ववहसाकुल । करालकरवालत प्रबलकालजिह्वाग्रतो निहत्य वरराक्षमान्नरपतिर्बभौ सानुगः ॥४२॥ जघान घनघोषगा़नुगगणीरसृक् प्राशनैः । ततोऽतिबलवानरैर्गिरिमहीरुहोद्यत्करै करा़लतरताडनैर्जनकजारुषा नाशितान् । निजघ्नुनमरादं नान्तिबलान्दशास्यानुगान् नलाङ्गदहरीश्वराऽशुगसुतर्क्षराजादयः ॥४३॥ ततोऽतिबललक्ष्मणास्त्रदशनाथशत्रु रणे प्रहस्त विकटादिकानपि निशाचरान्व्यङ्गनान् निकुम्भ मकराक्षकांन्निशितखड्ग पातैः क्रुधा ॥४४॥ फिर लक्ष्मण के सहित श्रीराम ने अत्यन्त उग्र बाणो को धारण किया और गज, अश्व तथा रथादि से युक्त होकर तीक्ष्ण बाणो और विकराल असि से अनेक राक्षसो का नाश करके कराल काल की जिह्वा के अग्र भाग के समान अपने अनुगामियो सहित शोभा पाने लगे ॥४२॥ फिर सुग्रीव, पवनसुत हनुमान, नल, नील, अंगद और जाम- वन्त आदि परम पराक्रमी बानरो ने वृक्ष और पर्वत शिलाएं उखाड कर उनके प्रहार से देव-शत्रु महाबली रावण के उन सेवको को, जो सीताजी के क्रोध से पहिले ही मरे के समान हो रहे थे, नष्ट कर दिया ॥४३॥ महाबली लक्ष्मण ने अत्यन्त घोर शब्द करने वाले रुधिरपायी राक्षसो से समन्वित इन्द्रजित मेघनाद को मार डाला। फिर क्रोध पूर्वक उन्होने निकुम्भ, मकराक्ष और विकटादि नामक बली निशाचरो का भी संहार कर दिया ॥४४॥

तृतीय अध्याय-३ ] [ ३८६

दतो दशमुखो रणे गजरथाश्वपत्तीश्वरै- रलङ्घ्यगुणकोटिभि परिवृतो युयोभायुधैः । कपीश्वरचमूपते पतिमनन्तदिव्यायुध रघूद्वहमनिन्दितं सपदि सङ्गतो दुर्जय ॥४५॥ दशाननमरिं ततो विधिवरस्मयावर्द्धितम् महाबलपराक्रमं गिरिमिवाचल संयुगे । जघान रघुनायको निशितसायकैरूद्धतम् निशाचरचमूपति प्रबलकुम्भकर्ण ततः ॥४६॥ तयोः खरतरै शरैर्गगनमच्छमाच्छादित बभौ घनघटासमं मुखरमत्तडिद्वन्हिभिः । धनुर्गु रामहाशनिध्वनिभिरावृत भूतलं भयङ्करनिरन्तर रघुपतेश्च रक्षःपतेः ॥४७॥

फिर रावण अपने करोडो गज, रथ, अश्व युक्त तथा पदाति सैनिको के सहित रणभूमि मे उपस्थित हुआ और उसने कपीश्वर सुग्रीव के भी स्वामी दिव्यायुध धारी श्रीराम से घोर संग्राम किया ॥४५॥ तब रघुनायक श्रीराम ने ब्रह्माजी के वर से प्रबल हुए महा पराक्रमी और युद्ध क्षेत्र मे पर्वत के समान अडिग रहने वाले ˝राक्षसपति रावण और उसके भाई कुम्भकर्ण को अपने बाणो से रुद्ध कर दिया ।४६।। फिर राम-रावण के उस युद्ध मे तीक्ष्ण बाणो से गगन मण्डल उसी प्रकार आच्छादित हो गया, जिस प्रकार मेघो की घटा से हो जाता है। बाणो के परस्पर टकराने से जो शब्द युक्त अग्नि की चिंगारियाँ निकलती थी, वह ऐसी प्रतीत होती थी, जैसे गर्जन करती हुई बिजली चमक उठती है । विद्युत-गर्जन के समान धनुष की टकार से व्याप्त हुई रणभूमि अत्यन्त भयानक लगने लगी ॥४७॥

ततो धरणिजारुषा विविधरामबाणौजसा पपात भुवि राणस्त्रिदशनाथविद्रावणः । ततोऽतिकुतुकौ हरिज्वलनरक्षिता जानकी

३६० ] कल्कि-पुराण समर्प्य रघुपूङ्गवे निजपुरी ययौ हर्षितः ॥४८॥ पुरन्दरकथादर सपदि तत्र रक्ष पतिम् । बिभीषणमभीषणं समकरोत्ततो राघव. ॥४६॥ दृगीश्वरगणावृतोऽवनिसुतायुत सानुजा रथे शिवसखेरिते सुविमले लसत्पुष्पके । मुनीश्वरगणार्च्चितो रघुपतिस्त्वयोध्या ययौ विवच्य मुमिलाञ्छन गुहगृहेऽतिसख्य स्मरन् ॥५०॥ फिर इन्द्र को त्रस्त करने वाला रावण जानकी जी के क्रोध से व्याप्त एव श्रीराम के अस्त्रानल से दग्ध होकर धराशायी हो गया । रावण की मृत्यु हो जाने पर वानर श्रेष्ठ हनुमान जानकीजी को शुद्ध करके लाये और उन्हें श्रीराम को समर्पित कर दिया । फिर प्रसन्न चित्त से अपने स्थान को गये ॥४८॥ फिर देवराज के कहने से श्रीराम ने रावण के भाई विभीषण को राक्षसो के राज्य पर अभिषिक्त किया ॥४६॥ फिर भगवान् रामचन्द्र जी वानर आदि तथा सीताजी और लक्ष्मण को साथ लेकर अत्यन्त सुशोभित पुष्पक यान पर चढ कर अयोध्या नगरी के लिए चले । मार्ग मे चलते हुए जब मध्य वन मे पहुँचे तब उन्हें अपने मुनिवेष और गुह के गृह तथा उसकी मित्रता का स्मरण हुआ । तभी मुनियो ने उनके समीप आकर उनका पूजन किया ॥ ५० ॥ ततो निजगणावृतो भरतमातुर सान्त्वयन् स्वमातृगणवाक्यतः पितृनिजासने भूपति । वसिष्ठमुनिपुङ्गवै कृतानिजाभिषेको विभु- समस्त जनपालक. सुरपतिर्यथा सबभौ ॥५१॥ नरा बहुधनाकरा द्विजवरास्तपस्तत्पराः स्वधर्म्मकृतनिश्चवाः स्वजनसङ्गता निर्भयाः । घनाः सुबहुवर्षिणो वसुमती सदा हर्षिता भवत्यतिबले नृपे रघुपतावभूत्सज्जगत् ॥५२॥

तृतीय अध्याय ३ ] [ ३६१ गतायुतसमाः प्रियैर्निजगणै प्रजा रञ्जयन् निजा रघुपति. प्रिया निजमनोभवैर्मोहयन् । मुनीन्द्रगणसयुतोऽप्ययजदादिदेवान्मखै- र्धनैर्विपुलदक्षिणैरतुलवाजिमेधैस्त्रिभि ।।५३।। फिर अपने जनो से आवृत्त होकर दुख से कातर हुए भरतजी को सान्त्वना दी और माताओ की आज्ञा से अपने पिता के राज्य सिहासन पर अभिषिक्त हुए । उस समय वसिष्ठ आदि महर्षियो ने उनका अभिषेक किया और तब वे लोको के स्वामी श्रीराम इन्द्र के समान शोभा पाने लगे ।।५१।। फिर प्रजाजन धन से सम्पन्न हो गए, द्विजवर तपस्या मे मग्न रहने लगे । सभी परस्पर प्रेम-भाव पूर्वक भय-रहित चित्त से रहते हुए अपने-अपने धर्म मे तत्पर हो गए । मेघो द्वारा समय पर वृष्टि होने से पृथिवी मुदित हो गई । इस प्रकार अत्यन्त पराक्रमी श्रीराम के राज्य को प्राप्त होने से सम्पूर्ण विश्व सत्पथ का अनुगामी हो गया । ५२। भगवान् श्रीराम अपने गुणो से प्रजा को प्रसन्न रखने और अपनी प्राणप्रिया सीताजी के मन को भी आनन्दित करने लगे । उन्होने महर्षियो के महयोग से बहुत प्रकार की दक्षिणा और दान-यज्ञादि के द्वारा देवताओ को प्रसन्न करते हुए तीन अश्वमेध यज्ञ निर्विघ्न रूप से पूर्ण किये । इस प्रकार उन्होने दस हजार वर्ष तक राज्य किया ।५३। तत किमपि कारण मनसि भावयन्भूपति- र्जहौ जनकजा वने रघुवरस्तदा निर्घृणः । ततो निजमत स्मरन्गमनयत्प्रचेत. सुतो निजाश्रममुदारधीरघुपते प्रिया 'दुःखिताम् ।।५४।। तत' कुशलवौ सुतौ प्रसुषुबे धरित्रीसुता महाबलपराक्रमौ रघुपतेर्यशोग़ायनौ । स तामपि सुतान्विता मुनिवरस्तु रामान्तिकॆ समर्पयदनिन्दिता सुरवरै सदा वन्दिताम् ।।५५।।

३६२ ] [ कल्कि पुराण ततो रघुपतिस्तु ता सुतयुता रुदन्ती पुरो जगाद दहने पुन प्रविश शोधनायात्मन. । इतीरितमवेक्ष्य सा रघुपते पदाब्जे नता विवेश जनोयुता मणिगणोज्वल भूतलम् ॥५६॥ फिर किसी कारण वश श्रीराम को अपना हृदय कठोर करना पडा और उन्होन जानकीजी को परित्याग का वन मे पहुँचा दिया । तब महर्षि बाल्मीकि अपने द्वारा रचित रामायण का स्मरण करके दु खित चित्त होते हुए जानकीजी का अपने आश्रम मे लिवा लाये ॥५४॥ फिर जानकीजी के कुश और लव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । इन दोनो राज पुत्रो ने श्रीराम के समीप पहुंच कर उनका यश गाया । फिर महर्षि वाल्मीकि ने अनिन्दित एव देव-पूजिता जानकीजी को इन दोनो पुत्रो के सहित श्रीराम को समर्पित कर दिया ॥५५॥ दोनो पुत्रो के सहित रोती हुई जानकी को अपने सामने खडी देख कर श्रीराम उनसे बोले— सीते ! तुम अपनी शुद्धि के लिये पुनः अग्नि-प्रवेश करो । उनके यह वचन सुन कर जानकीजी ने उनके चरणारविन्दो मे प्रणाम किया आदर अपनी माता पृथिवी के साथ पाताल मे प्रविष्ट हो गईं ॥५६॥ निरीक्ष्य रघुनायको जनकजाप्रयाण स्मरन् वन्शिष्ठगुरुयोगतोऽनुजयुतोऽगमरस्व पदम् । पुर.स्थितजन.स्वकै पशुभिरीश्वर सस्पृशन् मुदा सरयुजीवन रथवरे परीतो विभुः ॥५७॥ ये शृण्वन्ति रघूद्वहस्य चरित कर्णामृत सादरात् ससारार्णवशोषणाञ्च पठतामामोदद मोक्षदम् । रोगाणामिह शान्तये धनजनस्वर्गादिसम्पत्तये वंशानामपि वृद्धये प्रभवति श्रीशः परेश प्रभुः ॥५८.। जानकीजी को इस प्रकार पाताल में गई देख कर रामचन्द्र भी उनका स्मरण करते हुए अपने गुरु वसिष्ठ, अनुजगण तथा परिजनो

तृतीया अध्याय-३ ] [ ३६३ और पशुओ के साथ सरयू तट पर गये और प्रसन्न हृदय से जल का स्पर्श करके दिव्य विमान मे आरूढ होकर अपने लोक को गये ॥५७॥ कानो के लिए अमृत के समान इस राम चरितामृत को जो आदर सहित सुनेगे उनकी सभी बाधाएँ श्रीराम-कृपा के दूर हो जायेंगी। रोग नष्ट होगे, वंश-वृद्धि, धन-जन की समृद्धि और स्वर्ग रूप ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। जो इसका पाठ करेगे, उनके लिए यह ससार-सागर शुष्क होकर अत्यन्त आनन्द तथा मोक्ष-रूप परम पुरुषार्थ की प्राप्ति होगी ॥५८॥

तृतीयांश- चतुर्थ अध्याय रामात्कुशोऽभूदतिथिस्ततोऽभून्निषधान्नभ । तस्मादभूत्पुण्डरीक' क्षेमधन्वाऽभवत्तत ।१। देवानीकस्ततो हीन' परिपात्रोऽथ हीनत । बलाहकस्ततोऽकंश्र्च रजनाभस्ततोऽभवत ।२। खगणाद्विधृतस्तस्माद्धिरण्मनाभसङ्गित' । तत पुष्पादध्रुवस्तस्मात्स्यन्दनोऽथा म्नवणक. । ३। तस्माच्छीघ्रोऽभवत्पुत्र पिता मेऽतुलविक्रम. । तस्मान्मरु मां केऽपीह बुधउच्चापि सुमित्रकम् ।४। कलापग्राममासाद्य विद्धि सत्तपसि स्थितम् । तवावतार विज्ञाय व्यासात्सत्यवतीसुतात् । प्रतीक्ष्य काल लक्षाब्द कले प्राप्तस्तवान्तिकम् । जन्मकोट्य घसा राशेर्नाशन वमंशासनम् । वंश'कीर्तिकर सर्वकामपूर परात्मन ।६। उन श्रीराम के पुत्र कुश हुए। कुश के अतिथि, अतिथि के निषध, निषध के नभ, नभ के पुण्डरीक और पुण्डरीक के पुत्र क्षेमधन्वा हुए ॥१॥ क्षेमधन्वा के पुत्र देवानीक, देवानीक के हीन, हीन के परि- पात्र, परिपात्र के बलाहक, बलाहक के अर्क और अर्क के पुत्र रजनाभ हुए ॥ २।। रजनाभ के खगण, खगण के विधृत, विधृत के हिरण्यनाभ, हिरण्यनाभ के पुष्प, पुष्प ध्रुव, के ध्रुव के स्यन्दन और स्यन्दन के पुत्र ३६४

चतुर्थ अध्याय-३ ] [ ३६५ अग्निवर्ण हुए ।३।। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्र हुए, वे अत्यन्त विक्रम वाले ही मेरे पिता थे । मैं उन्हीं शीघ्र का पुत्र मरु हूँ । कुछ लोग मुझे बुद्ध और कुछ सुमित्र कहते है ।।४।। अब तक मैं कलाप ग्राम में निवास करता हुआ तपस्या में रत था । सत्यवती सूनु व्यास जी के मुख से मुझे आपके अवतार का समग्र ज्ञान हुआ और तब मैं कलियुग की एक लाख वर्ष तक प्रतीक्षा करने पश्चात् आपके समीप उपस्थित हुआ हूँ । क्योंकि आप परमात्मा का सामीप्य प्राप्त होने से करोड़ों जन्मों के पापों का नाश हो जाता है तथा धर्म-यश की वृद्धि और सभी कामनाओं की पूर्ति होती है ।।५-६।। ज्ञातस्तवान्वयस्त्वञ्च सूर्यवंशसमुद्भवः । द्वितीय कोऽपर श्रीमान्महापुरुषलक्षण ।७। इति कल्किवचः श्रुत्वा देवापिर्मधुराक्षराम् । वाणी विनयसम्पन्नः प्रवक्तुमुपचक्रमे ।८। प्रलयान्ते नाभिद्मात्तवाभूच्चतुराननः । तदोयत नयादत्रे श्चन्द्रस्तस्मात्ततो बुधः ।६। तस्मात्पुरूरवा जज्ञे ययातिर्नहुषस्ततः . . देवयान्यां ययातिस्तु यदुं तुर्वसुमेव च ।१०। शर्मिष्ठायां दना द्रुह्युञ्चानु पूरुञ्च सतते । जनयामास भूतादिर्भूतानांव सिसृक्षया ।११। पूरोज्जन्मेजयस्तस्मात्प्रविन्वानभवत्ततः । प्रवीरस्तन्मनस्युर्वै तस्माच्चाभयदोऽभवत् ।१२। उरुक्षयाच्च त्रय्यरुणस्ततोऽभूत्सुकरोहरिणः । वृहत्क्षेत्रादभूद्धस्ती यन्नाम्ना हस्तिनापुरम् ।१३। कल्कि बोले—तुम्हारी वंशावली सुनकर मैं यह जान गया कि तुम सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हो । परन्तु तुम्हारे साथ यह महापुरुषों के लक्षणों से सम्पन्न एवं श्रीमान् पुरुष दूसरे कौन हैं ? ।।७।। यह सुन कर देवापि ने विनयपूर्वक मधुर वाणी से निवेदन किया । वे बोले —

३६६ ] [ कल्कि पुराण

हे प्रभो ! प्रलय का अन्त होने पर आपके नाभिकमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई थी । उन ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए । अत्रि के चन्द्रमा, चन्द्रमा के बुध, बुध के पुरूरवा, पुरूरबा के नहुष और नहुष के पुत्र ययाति हुए । उन ययाति ने अपनी पत्नी देवयानी के गर्भ से यदु और तुर्वम नामक दो पुत्रो को जन्म दिया ॥६-१०॥ हे सत्पते ! उन्ही ययाति ने शर्मिष्ठा नाम को पत्नी से द्रह्यु, अनु और पुरु नामक तीन पुत्र उत्पन्न किये । जैसे सृष्टिकाल मे भूतादि के द्वारा पचभूतो की उत्पत्ति होती है, वैसे ही ययाति से इन पाँच पुत्रो की उत्पत्ति हुई ॥११॥ पुरु का पुत्र जन्मेजय हुआ, जन्मेजय के प्रचिन्वान्, प्रचिन्वान् के प्रवीर, प्रवीर के मनस्यु, मनस्यु के अभयदा अभयदा के उरुक्षय उनके त्रयरुणि, त्रयरुणि के पुष्करारुणि, पुष्करारुणि के वृहत्क्षेत्र और वृहत्क्षेत्र, के पुत्र हस्ती हुए । इन हस्ती नामक राजा के नाम पर ही हस्तिनापुर नामक नगर की स्थापना हुई ॥१२-१३॥ अजमीढोऽहिमीढश्च पुरुमीढस्तु तत्सुताः । कजमीढादभूदृक्षस्तस्मात्संवरणात्कुरु ।१४। कुरोः परिक्षित्सुधनुर्जन्हुर्निषध एव च । सुहोत्रोऽभूत्सुधनुषश्चवनाच्च तत कृती ।१५। ततो बृहद्रथस्तस्मात्कुशाग्रादृषभोऽभवत् । तत सत्यजितः पुत्र पुष्पवान्नहुषस्तत ।१४। बृहद्रथान्यभार्यायां जरासन्ध परन्तप । सहदेवस्ततस्मान्सोमापियंच्छु तश्रवा ।१७। सुरथाद्विदूरथस्तस्मात्सार्वभौमोऽभवत्तत । जयसेनाद्रथानोकोऽभूद्यु तायुश्च कोपनः ।१८। हस्ती के तीन पुत्र हुए । उनके नाम अजमीढ, अहिमीढ और पुरुमीढ हुए । अजमीढ़ के पुत्र ऋक्ष, ऋक्ष के सवरण और सवरण के पुत्र कुरु हुए ।१४। कुरु के पुत्र परीक्षित, परीक्षित के सुधनु, जन्हु और निषध—यह तीन पुत्र हुए । सुधनु के पुत्र सुहोत्र और सुहोत्र के पुत्र

चतुर्थ अध्याय-४ ] [ ३६७ च्यवन हुए ।१५। च्यवन के बृहद्रथ बृहद्रथ के कुशाग्र, कुशाग्र के ऋषभ, ऋषभ के सत्यजीत, सत्यजीत के पुष्पवान् तथा पुष्पवान् के पुत्र नहुष हुए ।१६। बृहद्रथ की द्वितीय पत्नी के गर्भ से शत्रु पीडक जरासन्ध हुए । जरासन्ध के सहदेव, सहदेव के सोमापि और सोमापि के पुत्र श्रुतश्रवा हुए ।१७। श्रुतश्रवा के पुत्र सुरथ हुए । सुरथ के विदूरथ, विदूरथ के सार्वभौम, सार्वभौम के जयसेन, जयसेन के रथानीक और रथानीक के पुत्र क्रोधी स्वभाव के युतायु हुए ।१८। तस्माद्देवातिथिस्तस्मादृक्षस्तस्माद्दिलीपकः । तस्मात्प्रतीपकस्तस्य देवापिरहमोश्वर ! ।१६। राज्य शान्तनवे दत्वा तपस्येकधिया चिरम् । कलापग्राममासाद्य त्वा दिदृक्षुरिहागत ।२०। मरुणाऽनेन मुनिभिरेभिः प्राप्य पदाम्बुजम् । तव कालकरालास्याद्यास्याम्यात्मवता पदम् ।२१। तयोरेव वच श्रुत्वा कल्किः कमलोचनः । प्रहस्य मरुदेवापी समाश्वास्य समब्रवीत् ।२२। युवा परमधर्म्मज्ञौ राजानौ विदितावुभौ । मदादेशकरौ भूत्वा निजराज्यं भरिष्यथ . ।२३। युतायु के पुत्र देवातिथि हुए ! देवातिथि के ऋक्ष, ऋक्ष के दिलीप और दिलीप के पुत्र प्रतीपक हुए । हे प्रभो ! मैं उन्ही प्रतीपक का पुत्र देवापि हूँ ।१६। मैंने शान्तनु को अपने राज्य पर आसीन किया और स्वयं कलाप ग्राम मे रह कर एकचित्त हो तपस्या करता था । अब आपके दर्शन की कामना से ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ ।२०। मैंने मरु और मुनिवरो के सहित यहाँ आकर आपके चरणारबिन्द को प्राप्त किया है । इसके फल स्वरूप मैं काल के कराल गाल मे गिरने से बच गया, आत्म तत्वज्ञो का पद हमे मिल जायगा ।२१। मरु और देवापि की बातो को सुन कर पद्माक्ष कल्किजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होने आश्वासन भरे शब्दो मे उनसे कहा । कल्कि बोले—मै जान गया कि

३६८ ] [ कल्कि पुराण आप दोनो परम धर्मज्ञ राजा हैं। इस समय आप मेरे आदेश को मान कर राज्य ग्रहण कर उसका परिपालन करो ।२२-२३। मरो त्वामभिषेक्ष्यामि निजयोध्यापुरेऽधुना । हत्वा म्लेच्छानधर्मिष्ठान्प्रजाभूतविहिंसकान् ।२४। देवापे तव राज्ये त्वा हस्तिनापुरपत्तने । अभिषेक्ष्यामि राज्ये हत्वा पुक्कसकान्रणे ।२५। मथुरायामहं स्थित्वा हरिष्यामि तु वो भयम् । शय्याकर्णानुष्ट्रमुखानेकजङ्घान्विनोदरान् ।२६। हत्वा कृत युगं कृत्वा पालयिष्याम्यहं प्रजाः । तपोवेशं व्रतं त्यक्त्वा समारुह्य रथोत्तमम् ।२७। युवां शस्त्रास्त्रकुशलौ सेनागणपरिच्छदौ । भूत्वा महारथौ लोके मया सह चरिष्यथः ।२८। हे मरो ! अब मैं प्रजाओ का पीडन करने वाले, जीव-हिंसक अधर्मी म्लेच्छों का सहार करके आपको अपनी राजधानी अयोध्या मे अभिषिक्त करूंगा ।२४। हे देवापे ! हे राजन्ये ! युद्ध क्षेत्र मे पुक्कसो को मार कर मैं आपकी राजधानी हस्तिनापुर के राज्य पर आपको अभि- षिक्त करूँगा ।२५। मैं मथुरा नगरी मे निवास करता हुआ तुम्हारे भय को नष्ट करूँगा तथा शय्याकरण, उष्ट्रमुख और एकजघ आदि को मार कर सत्युग की स्थापना और प्रजा की रक्षा करूँगा । तुम अभी इस तपस्वी वेश का त्यागन करो और श्रेष्ठ रथ पर आरोहण करो ।२६-२७। तुम सभी शस्त्रास्त्र विद्या मे पारगत एव महारथी हो, अतः हमारे साथ ही विचरण करो ।२८। विशाखयूपभूपालस्तनयां भिनयान्विताम् । विवाहे रुचिरापाङ्गीं सुन्दरीं त्वा प्रदास्यति ।२६। साधो भूपाल लोकानां स्वस्तये कुरु मे वचः । रुचिराश्वसुतां शान्तां देवापे त्वं समुद्वह ।३०। इत्याश्वासकथां कल्केः श्रुत्वा तौ मुनिभिः सह । विस्मयाविष्टहृदयौ मेनाते हरिमीश्वरम् ।३१। इति ब्रुवत्यभयदे आकाशात्सूर्य्यसंन्निभौ ।

चतुर्थ-अध्याय-४ ] [ ३६६ रथौ नानमणिब्रातघटितौ कामगौ पुरः । समायातौ ज्वलद्दिव्यशस्त्रास्त्रैः परिवारितौ ।३२। ददृशुस्ते सदो मध्ये विश्वकर्म्मविनिर्मितौ । भूपा मुनिगणा सभ्या सहर्षा किमितीरिता ।३३। हे मरो ! विशाखयूप नरेश अपनी परम शीलवती तथा छविरागी कन्या को तुम्हे विवाह देगा । अत तुम ससार का कल्याण करने के उद्देश्य से मेरे वचनो का पालन करो । हे देवापे ! तुम भी रुचिराश्व की शान्त नाम्नी सुपुत्री से विवाह कर लो ॥३०॥ कल्किजी के यह आश्वासन युक्त वचन सुन कर मुनियो के सहित देवापि अत्यन्त विस्मित हुए और फिर सन्देह छोड़ कर यह विश्वास करने लगे कि कल्कि ही भगवान् विष्णु एव साक्षात् ईश्वर हैं ॥३१॥ कल्किजी ने जैसे ही यह अभयप्रद वचन कहे वैसे ही आकाश मार्ग से स्वच्छा पूर्वक चलने वाले अनेक रत्न दि से निर्मित दो रथ अवतीर्ण हुए । सूर्य के समान तेजोमय उन रथो मे उज्ज्वल दिव्य शस्त्रास्त्र भरे हुए थे ।।३२।। उस समय उपस्थित सभी मुनिगण और राजागण विश्वकर्मा द्वारा निर्मित रथो को उतरे हुए देख कर 'यह क्या' —'यह क्या' कहते हुए विस्मय एव हर्ष प्रकट करने लगे ।।३३।। युवामादित्यसोमेन्द्रयमवैश्रवणाङ्गजौ । राजानौ लोकरक्षार्थमाविर्भूतौ विदन्त्यमी ।३४। कालेनाच्छादिताकारौ मय सङ्गादिहोदितौ । युवा रथावारुहतां शकदत्त ममाज्ञया ।३५। एव वदति विश्वेशे पद्मनाथे सनातने । देवा बवर्षु कुसुमंस्तुष्टुतुर्मु नयोऽग्रतः ।३६। गङ्गावारिपरिक्लिन्नशिरोभूतिपरागवान् । शगे पर्व्वतजासङ्गशिववत्पवनो ववौ ।३७। तत्रायातः प्रमुदिततनुस्तप्तचामीकराभौ धर्मावासः सुरुचिरजटाचीरभृद्दण्डहस्तः

४०० ] [ कल्कि पुराण लोकातीतो निजतनूमरुन्नाशिताऽधर्म्मसघ- स्तेजोराशि सनकसदृशो मस्करी पुष्कराक्षः ।३८। तभी कल्किजी ने कहा — यह सभी को विदित है कि तुम दोनो राजवंश मे विश्व-रक्षा और पृथिवी के पालनार्थ उत्पन्न हुए हो । तुम्हारी उत्पत्ति सूर्य, चन्द्र, यम और कुबेर के अंश से हुई है ॥३४॥ अब तक तुम अपने रूप को छिपाये रहे हो । परन्तु अब, जब यहाँ मेरे पास आये हो तो मेरी आज्ञा से इन्द्र द्वारा भेजे गये इन रथो पर आरूढ हो जाओ ॥३५॥ पद्मापति कल्किजी के द्वारा उक्त वचन कहे जाने पर आकाश से देवताओ ने पुष्पवृष्टि और मुनियो ने स्तुति की ॥३६॥ मन्द वायु प्रवाहित होने लगा । शिवजी के जटा जाल से उन्मुक्त गङ्गा- जल के मिलन से विभूति भीग गई । मन्द पवन ने उस विभूति के कण रूपी परागो को उडा कर पार्वती के अंगो मे लगाते हुए कल्याण गुण की प्राप्ति की ॥३७॥ तभी सनक मुनि के समान अत्यन्त तेजस्वी, धर्म भवन रूप सुरुचिर जटाओ को धारण किये और हाथ मे दण्ड लिये एक ब्रह्मचारी वहाँ आये । उनकी देह कान्ति तप्त स्वर्ण के समान चमचमा रही थी । मनोहर वस्त्रधारी उन कमललोचन दिव्य महापुरुष के मुख पर अक्षय भाव परिलक्षित हो रहा था । उनके तेजोमय शरीर का स्पर्श होते ही संसार के सम्पूर्ण पापो का क्षय हो रहा था ॥३८॥ —❀—

तृतीयांश— पंचम अध्याय अथ कल्कि समालोक्य सदसाम्पतिभिः सह । समुत्थाय ववन्दे त पाद्यार्घ्याचमनादिभि. ।१। वृद्ध संवेश्य त भिक्षु सर्वाश्रमनमस्कृतम् । पप्रच्छ को भवानत्र मम भाग्यादिहागतः ।२। प्रायशो मानवा लोके लोकाना पारणेच्छया । चरन्ति सर्वसुहृद. पूर्णा विगतकल्मषा. ।३। अह कृतयुग श्रीश तवादेशकर परम् । तवाविर्भावविभवमीक्षणार्थमिहागतम् ।४ निरुपाधिर्भवान्काल. सोपाधित्वमुपागत. । क्षणदण्डलवाद्यङ्गैर्मयया रचित स्वया ।५। पक्षाहोरात्रमासर्तु' सवत्सरयुगादय । तवेक्षया चरन्त्येते मनवश्च चतुर्दश :६। शुक बोल—इस ब्रह्मचारी को देखते ही भगवान् कल्कि ने अपने सभासदो के सहित उठ कर पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदि से उनका पूजन किया ।१। सभी आश्रमो के द्वारा नमस्कार योग्य उन भिक्षु ब्रह्मचारी को आदर पूर्वक बैठा कर कल्किजी ने प्रश्न किया— आप कौन हैं ? हमारे सौभाग्य से ही आपका यहाँ आगमन हुआ है ।२। पापों से परे रहने वाले जो सत्पुरुष सब के सुहृद है, वे लोक-कल्याणार्थ ही पृथिवी पर विचरण किये करते हैं ।३। भिक्षु ने कहा—हे श्रीपते ! मैं आपका आज्ञाकारी सत्युग हूँ । आपके अवतार का प्रत्यक्ष प्रभाव देखने के निमित्त ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ । ४। आप निरुपाधि एवं ४०१

साक्षात् काल स्वरूप है । परन्तु क्षण, दण्ड और लवादि अ गो के द्वारा इस समय उपाधि सहित हो गए है । यह सम्पूर्ण विश्व आपकी ही माया से प्रकट हुआ है ।५। आपकी ही सत्ता का अनुभव करते हुए यह पक्ष, दिवस, रात्रि, मास, ऋतु, सम्वत्सर, युगादि काल एव चौदहो मनु-यह सभी नियमित रूप से विचरण करते है ।६। स्वायम्भुवस्तु प्रथमस्तत स्वारोचिषो मनु । तृतीय उत्तमस्ताच्चतुर्थस्तामस स्मृत ।७। पञ्चमो रैवत षष्टश्चाक्षुष परिकीर्त्तित । वैवस्वत सप्तमो वै ततः सावर्णिरष्टम ।८। नवमो दक्षसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिकस्तत । दशमो धर्म्मसावर्णिरेकादशः स उच्यते ।६। रुद्रसावर्णिकस्तत्र मनुर्वै द्वादश स्मृत । त्रयोदशमनुर्वेदसावर्णिलोकविश्रुतः ।१०। चतुर्दशेंद्रसावर्णिरेते तव विभूतयः । यान्त्यायान्ति प्रकाशन्ते नामरूपादिभेदत ११। द्वादशाब्दसहस्रेण देवानाञ्च चतुर्युगम् । चत्वारि त्रीणि द्वे चैक सहस्रगणित मतम् ।१२। तावच्छतानि चत्वारि त्रीणि द्वे चैकमेव हि । सन्ध्याक्रमेण तेषान्तु सन्ध्यांशोऽपि तथाविध ।१३। पहले मनु स्वायंभुव, दूसरे स्वारोचिष, तीसरे उत्तम, चौथे तामस, पाँचवे रैवत छठवे चाक्षुष, सातवे वैवस्वत, आठवे सावर्णि, नवे दक्षसावर्णि, दसवे ब्रह्मसावर्णि, ग्यारहवे धर्म सावर्णि, बारहवे रुद्र सावर्णि, तेरहवे वेद सावर्णि और चौदहवे इन्द्र सावर्णि-यह चौदहो मनु आपकी ही विभूति रूप है । यह सब अपने-अपने नाम रूपादि के भेद से चलते हुए प्रकाशित होते हैं ।७-११। बारह हजार दिव्य वर्षो की एक चतुर्युगी होती है, जिसके अनुसार चार हजार दिव्य वर्षो का सत्युग, तीन हजार दिव्य वर्षो का त्रेता, दो हजार दिव्य वर्षो का द्वापर

पंचम अध्याय-३ ] [ ४०३ और एक हज़ार दिव्य वर्षों का कलियुग होता है ।१३। इन चारो युगो का सध्याक्रम ( संधिकाल ) क्रमश चार सौ, तीन सौ, दो सौ, और एक सौ वर्ष का होता है । इन चारो युगो की शेष सध्या का क्रम भी इसी प्रकार समझना चाहिये ।१३। एकसप्ततिकं तत्र युगं भुङ्क्ते मनुर्भुवि । मनूनामपि सर्वेषामेव परिणतिर्भवेत् । दिवा प्रजापतेस्तत्तु निशा सा परिकीर्त्तिता ।१४ अहोरात्रञ्च पक्षस्ते माससंवत्सरर्तवः । सद्गुणाधिकृतं कालो ब्रह्मणो जन्ममृत्युकृत् ।१५। शतसंवत्सरे ब्रह्मा लय प्राप्नोति हि त्वधि । लयान्ते त्वन्नाभिमध्यादुत्थितः सृजति प्रभुः ।१६। तत्र कृतयुगान्तेऽहं कालं सद्धर्म्मपालकम् । कृतकृत्याः प्रजा यत्र तन्नाम्ना मां कृतं विदुः ।१७। इति तद्वच आश्रुत्य कल्किर्निजजनावृतः । प्रहर्षमतुलं लब्धा श्रुत्वा तद्वचनामृतम् ।१८। अवहित्यमुपालक्ष्य युगस्याह जनान्हितान् । योद्धुकामं कलेः पुर्यां हृष्टो विशसने प्रभुः ।१६, गजरथतुरगान्नरराँश्च योधाम्कनकविचित्रविभूषणा- चिताङ्गान् । धृतविविधवरास्त्रशस्त्रशूगान्गुधिनिपु- णानगरायध्वमानयध्वम् ।२०। प्रत्येक मनु इकहत्तर चतुर्र्युगी तक पृथिवी को भोगते है । इसी प्रकार सब मनु बदलते रहते हैं । चौदहवे मनु जितने समय तक पृथिवी का भोग करते हैं, उतना समय ब्रह्मा का एक दिवस होता है । इतने ही परिमाण की ब्रह्मा की एक रात्रि होती ।१४। इसी प्रकार दिवस-रात्रि, पक्ष, मास, सवत्सर और ऋतु आदि की उपाधि से ब्रह्माजी की जन्म-मृत्यु आदि का विधान होता है ।१५। ब्रह्मा अपनी सौ वर्ष की आय पूर्ण होने पर वह स्वय मे लय हो जाते है । फिर

४०४ ] कल्कि-पुराण

जब प्रलय काल बीत जाता है तब आपके नाभि कमल से उनका पुन, उद्भव होता है ।१६। मैं उक्त काल का अ श रूप ही कृतयुग हूँ। मेरे द्वारा श्रेष्ठ धर्म पाला जाता है । मेरे द्वारा सम्पूर्णां प्रजा धर्म का अनुष्ठान करते हुए धन्य हो जाती है इसी लिए ज्ञानीजन मुझे कृतयुग कहते है ।१७। सत्ययुग के इस प्रकार के वचनो को सुन कर अपने जनो के सहित कल्किजी परम हर्षित हुए ।१८। कलियुग के नाश मे समर्थ कल्किजी ने सत्ययुग को आया देख कर कलियुग के शासन मे स्थित विशसन नामक नगरी मे युद्ध करने की इच्छा करते हुए अपने अनुया- यियो से बोले ।१६। हाथी पर आरूढ होकर युद्ध करने वाले, अश्व और रथ पर चढ कर युद्ध करने वाले तथा पदाति सैनिक जो देह पर अद्भुत स्वर्णाभूषण और शस्त्रास्त्रो के धारण करने वाले हैं, ऐमे युद्ध-कुशल वीरो की गणना करो ।२०।