कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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खण्ड ९ ] $\quad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\quad$ ५३७ \rule{\linewidth}{0.5pt} करे। (वसु, रुद्र, आदित्य और वषट्कार—ये सब मिलकर बत्तीस हैं। इनका क्रमशः एक-एक दलमें ध्यान एव न्यास करना चाहिये। ध्रुव, धर, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये आठ वसु बताये गये हैं। विष्णु- पुराण ($१$।$१$।$१५$) के अनुसार हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, शम्भु, वृषाकपि, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह रुद्र हैं। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, त्वष्टा तथा विष्णु— ये बारह आदित्य हैं)। उक्त बत्तीस दलोंवाले कमलके भी बहिर्भागमे भूपृह (भूपुर* ) बनाये। उसके चारों दिशाओंमें वज्र तथा कोणोंमें शूलका चिह्न अङ्कित करे। उक्त भूपुरको तीन रेखाओंसे भी संयुक्त करे। ये रेखाएँ सत्त्वादि तीन गुणोंको सूचित करनेवाली होंगी। इसके सिवा—जैसे कुण्डी मण्डपमें द्वार बने होते हैं, उसी प्रकार इसमें भी द्वार बनाये। साथ ही, उस भूपुरको राशि आदिसे भी विभूषित करे। अर्थात् उसे ज्योतिर्मण्डलके आकारका बनाकर उसमे यथास्थान राशि आदि स्थापित करे। उक्त भूपुर-यन्त्रको शेषनागसे युक्त बनाये अर्थात् इस पुरमे प्रदर्शित करे कि इस यन्त्रको शेषनागने धारण कर रक्खा है। (अथवा उसको आठों दिशाओंसे आठों नागोंने धारण कर रक्खा है। उनके नाम इस प्रकार हैं— अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शङ्ख और कुलिक) ॥ १-६ ॥ \begin{center} नवम खण्ड \end{center} \begin{center} पूजा-यन्त्रके शेष भागका वर्णन तथा श्रीरामके माला-मन्त्रका स्वरूप एवं माहात्म्य \end{center} इस प्रकार भूपुर-यन्त्र लिखकर उसकी चारो दिशाओंमें नारसिंह बीज-मन्त्रका और कोणोंमें वाराह बीज मन्त्रका अङ्कन करे। 'क्', 'ष्', 'र्', अनुग्रह (औ), इन्दु (अनुस्वार), नाद (ध्वनि) तथा शक्ति (माया) आदिसे युक्त जो 'क्ष्रौं' मन्त्र है, वही नारसिंह बीज-मन्त्र है। यह ग्रहबाधा-निवारण तथा शत्रुमारण आदि कर्ममें विनियुक्त होकर अभीष्ट सिद्धि दिलानेमें प्रसिद्ध है। अन्त्य वर्ण (हकार) अर्धांग अर्थात् उकारसे युक्त हो, उसमें बिन्दु (अनुस्वार), नाद (ध्वनि) और शक्ति आदिका भी सयोग हो तो वह 'हुम्' इस प्रकार वाराह-बीज होता है। इस यन्त्रमें उस 'हुम्' को भी (कोणोंमे) अङ्कित करना चाहिये। अब श्रीरामसम्बन्धी माला मन्त्रका वर्णन किया जायगा ॥ १-३ ॥ इसमें पहले तो तार (प्रणव) है, फिर 'नमः' पद है। इसके बाद निद्रा (भ), फिर स्मृति (ग), फिर मेद (व), उसके बाद कामिका (तकार) है, जो रुद्र अर्थात् ए से युक्त है। तदनन्तर अग्नि (र), फिर मेधा (घ), जो अमर (उ) से विभूषित है। उसके बाद दीर्घ कला (न) है, जो अक्रूर अर्थात् सौम्य—चन्द्रमा (अनुस्वार) से संयुक्त है। तत्पश्चात् ह्लादिनी (द) है। फिर दीर्घा कला (न) है, जो मानदा कला (आ) से सुशोभित है। उसके बाद क्षुधा (य) है। यहाँतक 'ॐ नमो भगवते रघुनन्दनाय' की सिद्धि हुई। तदनन्तर क्रोधिनी (र), अमोघा (क्ष्) और विश्व (ओ) है, जो मेधा (घ्) से सयुक्त है। फिर दीर्घा (न) है, उसके बाद ज्वालिनी अर्थात् वह्नि-कला (व) है, जो सूक्ष्म—रुद्र (इकारकी मात्रा) से युक्त है। फिर मृत्यु—प्रणवरूपा (श्) है, जो प्रतिष्ठा अर्थात् उच्चारणके आधारस्वरूप 'अ' से सयुक्त है। फिर ह्लादिनी (दा) और त्वक् (य) है। इससे 'रक्षोघ्नविशदाय' इस मन्त्रभाग- का उद्धार हुआ। तदनन्तर श्वेल (म), प्रीति (घ), अमर (उ), ज्योति (र), तीक्ष्णा (पू), जो अग्नि (र), से सयुक्त है, श्वेता (स), जो अनुस्वारसे युक्त है, फिर कामिका अर्थात् तकारसे पाँचवाँ अक्षर (न), फिर 'ल'के बादका अक्षर (व); 'त'के बादवाले 'थ' के पीछेका अक्षर (द), फिर 'ध' के बादका अक्षर (न) है, जो अनन्त (आ) से सयुक्त है। तत्पश्चात् दीर्घस्वरसे युक्त वायु (या), सूक्ष्म (ह्रस्व) इकारसे युक्त विप—मकार (मि), कामिका (त), फिर कामिकामें रुद्र (ए) का सयोग= (ते) है। तदनन्तर स्थिरा (ज) है, उसके बाद 'स' अक्षर और उसमें 'ए'की मात्रा है (से)। इस प्रकार 'मधुरप्रसन्नवदनायामिततेजसे' इस मन्त्रभागका उद्धार हुआ। इसके बाद तापिनी (ब), दीर्घ (ल) और उसमें भू यानी दीर्घ 'आ' की मात्रा है। फिर अनिल (य) है। इस प्रकार 'बलाय' की सिद्धि हुई। तत्पश्चात् अनन्तग अनल अर्थात् 'आ' की मात्रासे युक्त रेफ (रा) है, फिर नारायणामक—अर्थात् आकारकी मात्रासहित काल—मकार (मा) है, उसके बाद प्राण (य) है। इससे 'रामाय' की सिद्धि हुई। तदनन्तर विद्यायुक्त अम्बस् अर्थात् \rule{\linewidth}{0.5pt}
- भूपुर-यन्त्रका लक्षण इस प्रकार दिया गया है—'भूमेरतुरस्रं सवज्रक पीतं च'—चौकोर रेखा, वज्र-चिह्नका संयोग और पीला रंग—यह भूपुर है। उ० अ० ६८—
५३८ * श्रीरामपूर्वतपनीयोपनिषद् * [ खण्ड १०
इकारकी मात्रासे युक्त वकार ( वि ) है । फिर पीता ( ण् ), आचायोंने इसका उपदेश किया है तथा ऋषि महर्षियोंने भी रति ( ण ), और 'ल'के बादका ( व ) है, जो योनि ( ए ) से युक्त इस मन्त्रका सेवन किया है । जो इसका सेवन करते हैं, उन्हें है? इससे 'विष्णवे' की सिद्धि हुई । अन्तमे पुनः नति— यह मोक्ष देता तथा उनकी आयु और आरोग्यकी वृद्धि प्रणामका वाचक 'नम' शब्द और प्रणव है ॥ ४–९ ॥ करता है। इतना ही नहीं, यह पुत्रहीनोको पुत्र भी देता 'ॐ नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोध्नविशदाय मधुर- है। अधिक कहनेसे क्या लाभ; इस मन्त्रके सेवनसे मनुष्य प्रसन्नवदनायामिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः ॐ ॥' सब कुछ बहुत शीघ्र पा जाते हैं। इसके आश्रयसे उपासक यह सैंतालीस अक्षरोंका मालामन्त्र राज्याभिषिक्त भगवान् धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य आदिको भी प्राप्त कर श्रीरामसे सम्बन्ध रखता है। सगुण होनेपर भी उपासकों- सकते हैं ॥ ११-१२ ॥ के तीनो गुणोंका नाशक है (अर्थात् त्रिगुणमयी मायाका बन्धन यह अत्यन्त गोपनीय रहस्य है। इस प्रकार जो यह यन्त्र नष्ट करके उन्हें दिव्य साकेत धामकी प्राप्ति करानेवाला है)। बताया गया है, बिना उपदेशके किसी परम सामर्थ्यशाली पुरुष- इस मन्त्रको पहले बताये हुए क्रमसे ही लिखना चाहिये ॥१०॥ के लिये भी दुर्गम है। प्राकृत जनोंको इसका उपदेश नहीं देना यह उपर्युक्त यन्त्र सर्वात्मक—सर्वस्वरूप है। प्राचीन चाहिये ॥ १३ ॥
दशम खण्ड पूजाकी सविस्तर विधि सर्वप्रथम द्वार पूजा करके पद्मासन आदि आसनसे बैठे, आदि तत्त्वोंको क्रमशः अपने कारणमे लय करते हुए अन्तमें सब फिर प्रसन्नचित्त होकर पञ्चभूत आदिकी शुद्धि करे । (पृथिवी कुछ परमात्मामे लय कर देना ही तत्त्वोंका शोधन है। भूतशुद्धि
१ द्वारपूजाकी विधि इस प्रकार है। आचार्य विधिपूर्वक स्नान करके पूर्वाङ्ग-कृत्य (सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य-नियम) कर लेने- के पश्चात् वस्त्र और माला आदिसे अलङ्कृत हो पूजनादिरूप यज्ञके लिये मौनभावसे यज्ञ-मण्डपमें पदार्पण करे । वहाँ सविधि आचमन करके सामान्यत पूजाके लिये अर्घ्य बनाकर रख ले । फिर मन्त्रयुक्त जलसे द्वारका अभिषेक करके उसका पूजन आरम्भ करे। द्वारके ऊपरी भागमें उदुम्बर (गूलर) का काष्ठ हो, उसमें विघ्न, लक्ष्मी तथा सरस्वतीका ('विं विघ्नाय नम, लं लक्ष्म्यै नम, सं सरस्वत्यै नम'—इन मन्त्रोंसे ) आवाहन-पूजन करे। तत्पश्चात् द्वारकी दक्षिण शाखा में विघ्नका और वाम शाखा में क्षेत्रपालका पूजन करे। इन दोनोंके पार्श्वभागमें क्रमशः गङ्गा- यमुनाका पुष्प और जलसे पूजन करे । (दक्षिण द्वारभागमें गङ्गाका और वाम द्वारभागमें यमुनाका पूजन करना उचित है।) तत्पश्चात् द्वारके निचले भागमें देहलीपर 'अस्त्राय फट्'का उच्चारण करते हुए 'अस्त्र'की पूजा करे। प्रत्येक द्वारपर इसी क्रमसे पूजन करना चाहिये ।
२ पद्मासन लगानेकी विधि यह है। बायीं जाँघपर दाहिना चरण रक्खे और दायीं जाँघपर बायाँ चरण रक्खे । फिर दाहिने हाथ- को पीठकी ओरसे ले जाकर बायें चरणका अँगूठा दृढ़ताके साथ पकड़ ले। इसी प्रकार बायें हाथको पीछेकी ओरसे ले आकर दाहिने चरणका अंगूठा पकड़ ले। फिर गर्दन झुकाकर अपनी ठोढ़ीको छातीमें सटा ले और नेत्रोंसे केवल नासिकाके अग्रभागको ही देखे। यह योगाभ्यासी पुरुषोंके उपयोगमें आनेवाला पद्मासन कहलाता है, यह रोगोंका नाश करनेवाला है। परंतु जो भगवान्की पूजा करने बैठा हो, वह दोनों हाथोंसे अँगूठा पकड़नेका कार्य न करे, क्योंकि वैसे करनेपर हाथ खाली न रहनेसे पूजा सम्भव न होगी।
३ भूतशुद्धिका प्रकार यह है। अपने शरीरमें पैरोंसे लेकर घुटनोंतकका भाग पृथिवीका स्थान है—ऐसी भावना करे। यह पृथिवीका स्थान चौकोर, वज्रके चिह्नसे युक्त और पीतवर्ण है, इसमें 'लं' बीज अङ्कित है। इस प्रकार चिन्तन करे। घुटनोंसे लेकर नाभि- तकके भागको जलका स्थान मानकर यह भावना करे कि इसकी आकृति अर्धचन्द्रके समान और वर्ण शुक्ल है। इसमें कमलका चिह्न है। इस जलमण्डलमें 'वं' बीज अङ्कित है। नाभिसे लेकर कण्ठतकके भागको भावनाद्वारा त्रिकोणाकार अग्निमण्डलके रूपमें देखे । उसका वर्ण लाल है, उसमें स्वास्तिका चिह्न और 'रं' बीज अङ्कित है—इस प्रकार चिन्तन करे। कण्ठसे ऊपर भौंहोंके मध्यतकका भाग वायुमण्डल है। उसका वर्ण कृष्ण है, आकृति षट्कोण है और वह छ विन्दुओंसे चिह्नित है। उसमें 'यं' बीज अङ्कित है। यों ध्यानद्वारा देखे। भौंहोंके मध्यसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतकका भाग आकाशमण्डल है। उसकी आकृति गोल और रंग धूएँके समान है। उसमें ध्वजका चिह्न और 'ह्रं' बीज अङ्कित है। ऐसा ध्यान करे। इस प्रकार चिन्तन करनेके पश्चात् उन भूतोंका लय करे। पृथिवीको जलमें, जलको अग्निमें, अग्निको वायुमें, वायुको आकाशमें तथा आकाशको अव्यक्त प्रकृतिमें विलीन करे। यह प्रकृति ही अपरब्रह्म अथवा माया कहलाती है, इसका परमात्मामें लय करे। इस प्रकार भावनाद्वारा समस्त देहादि प्रपञ्चका परमात्मामें लय करके कुछ क्षणतक परमात्मरूपसे ही स्थित रहे, अर्थात् ध्यानद्वारा यह देखे कि मैं परमात्मामें मिलकर उनसे अभिन्न हो गया हूँ। फिर (ध्यानसे जगनेपर) अपने लिये
खण्ड १०] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५३९ यहाँ प्राण-प्रतिष्ठा और मातृकान्यासका भी उपलक्षण ऊर्ध्वभाग तथा पार्श्वभाग आदिमें भी देव पूजन करनेकी है।) भगवान् श्रीरामके पूजन क्रममें सिंहासनपीठके अधोभाग, विधि है। पीठके ऊपर मध्यभागमें जो अष्टदल कमल है, भावनाद्वारा ही परम पवित्र शरीरकी सृष्टि करे। मानो परमात्मासे शब्द-ब्रह्मात्मिका माया प्रकट हुई है। यही जगन्माता और परा प्रकृति है। इस जगन्मातासे आकाश उत्पन्न हुआ है। आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जलसे पृथिवी प्रकट हुई है। इन विशुद्ध भूतोंसे अपना यह तेजोमय शरीर निर्मित हुआ है, जो परम पवित्र होनेके कारण आराध्यदेवकी आराधनाके सर्वथा योग्य है। उस शरीरमें सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, समस्त देवतारूप, सम्पूर्ण मन्त्रमय एव कल्याणमय परमात्मा ही आत्मा एव कारणरूपसे विराजमान हैं। इस प्रकारकी भावना ही मुख्यत भूतशुद्धि कही गयी है। भूतशुद्धिकी दूसरी प्रक्रिया इस प्रकार है। साधक यह भावना करे कि मेरा हृदय एक प्रफुल्ल कमल है, जो प्रणवके द्वारा विकासको प्राप्त हुआ है। धर्म ही इस हृदय-कमलका मूल और ज्ञान ही नाल (मृणाल) है। यह बहुत ही शोभायमान है। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य ही इसके आठ दल हैं। वैराग्य ही इसकी कर्णिका (मध्यभाग) है। इस कर्णिकामें जीवात्मा विराजमान है, जिसकी आकृति दीपककी ज्योतिके समान है। ऐसी भावनाके साथ साधक उस जीवात्माको सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे ब्रह्मरन्ध्रतक ले जाय और उसे परमात्मामें मिला दे। उस समय वह अपनेको परमात्मासे अभिन्न देखता हुआ 'सोऽहम्' मन्त्रका चिन्तन करता रहे। फिर योगयुक्त विधिसे अन्य सब (पृथिवी आदि) तत्त्वोंको भी वहीं परमात्मामें विलीन कर दे। तत्पश्चात् अनादि जन्मोंमें सञ्चित किये हुए पाप-समुदायका एक पुरुषके रूपमें चिन्तन करे। ब्रह्महत्या उस पापरूपपुरुषका मस्तक है, सुवर्णकी चोरी उसकी दो भुजायें हैं, सुरापानरूपी हृदयसे वह युक्त है। गुरुपत्नी-गमन ही उसके दो कटिभाग हैं। इन पापों और पापियोंका संसर्ग ही उसके युगल चरण हैं। उसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग पातकमय ही है। उपपातक ही उसके रोयें हैं। उसकी मूँछ-दाढ़ीके बाल और नेत्र लाल हैं। उसके शरीरका रंग काला है और वह अपने हाथोंमें ढाल-तलवार लिये हुए है। ऐसे पापमय पुरुषको अपनी कुक्षिक भीतर दाहिने भागमें स्थित देखते हुए चिन्तन करे । तत्पश्चात् पूरक आदिके क्रमसे अर्थात् पूरक, कुम्भक और रेचकरूप प्राणायामके द्वारा प्राणवायुको रोककर 'यं' बीज एव वायुके द्वारा उस पापरूपके शरीरको सुखा दे। फिर अग्नि-बीज 'रं'के द्वारा अग्नि प्रकट करके उससे उसके शुष्क शरीरको जला डाले । तत्पश्चात् उत्तम शुद्धिसे युक्त विद्वान् पुरुष यह चिन्तन करे कि उस पापरूपके दग्ध शरीरका भस्म मेरी नासिकाके मार्गसे बाहर निकल आया है। तदनन्तर 'वं' इस बीजके द्वारा जल प्रकट करके उससे अपने समस्त शरीरको आप्लावित कर दे। इस प्रकार उस भावनामय दिव्य जलमें स्नान करके जब समस्त शरीर निर्मल एव देवोपासनाके योग्य हो जाय, तब अपने साथ परमात्मामें लीन हुए पृथिवी आदि तत्त्वोंको पुन अपनी-अपनी पूर्वावस्थामें पहुँचा दे। फिर जीवात्माको भी परमात्मासे पृथक् करके 'हंस.' इस मन्त्रका जप करते हुए विधिवूर्वक हृदय-कमलपर ले आये। इस प्रकार भूतशुद्धि कर लेना आवश्यक है। भूतशुद्धिके विना की हुई पूजा अभिचार तथा बिना भक्तिके पूजनकी भाँति विपरीत फल दे सकती है। १. इस प्रकार भूतशुद्धि करनेके पश्चात् प्राण-प्रतिष्ठा करनी चाहिये । इसका विनियोग इस प्रकार है- 'अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठा- मन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषय ऋग्यजु सामाथर्वाणि छन्दांसि क्रियामयवपु प्राणाख्या देवता आं बीजं ह्रीं शक्ति क्रों कीलकम्, अस्यां मूर्तौ प्राणप्रतिष्ठापने विनियोग ।' इस प्रकार विनियोग करके भगवान्की प्रतिमा अथवा यन्त्रपर हाथ रखकर निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े- 'ॐ आं ह्रीं क्रों अं यं रं वं शं षं सं हं ळं क्षं अं क्रों ह्रीं आं इस सोऽहम्, अस्यां मूर्तौ अमुष्य प्राणा इह प्राणा ।' इसका उच्चारण करते समय भावना करनी चाहिये कि इस भगवद्विग्रहमैं प्राण-सञ्चार हो रहा है। 'अस्या मूर्ती' के आगे 'अमुष्य' के स्थानमें 'श्रीरामस्य' इत्यादि आवश्यकताके अनुसार जोड़ लेना चाहिये। इसी प्रकार पूर्वोक्त बीजोंको 'ॐ आं से लेकर सोऽहम्' तक पुन पढ़कर 'अस्यां मूर्ती अमुष्य जीव इह स्थित' इस वाक्यका उच्चारण करते हुए यह भावना करनी चाहिये कि इस भगवद्विग्रहमें जीवात्मारूपसे भगवान् स्वय विराजमान हो रहे हैं। इसी प्रकार पुन 'ॐ आ ह्रीं' इत्यादि पढ़कर 'अस्या मूर्तौ अमुष्य सर्वेन्द्रियाणि वाङ्मनस्त्वक्चक्षु श्रोत्रजिह्वाघ्राणपाणिपादपायूपस्थानि इहागत्य सुख चिरं तिष्ठन्तु' इसका उच्चारण-करते हुए विग्रह अथवा यन्त्रमें भगवान्की सम्पूर्ण इन्द्रियोंके आविर्भावकी भावना करे। 'अमुष्य' के स्थानपर सर्वत्र 'आराध्यदेव' के नामका षष्ठ्यन्त रूप लेना चाहिये और प्रत्येक कार्यमें तीन-तीन बार पाठ. करना चाहिये । तत्पश्चात् गर्भाधानादि सस्कारकी सिद्धिके लिये षडङ्ग वार प्रणव-जप करना आवश्यक है। प्राणप्रतिष्ठाके समय भगवद्विग्रहमें ऋषि आदिका न्यास भी करना चाहिये। उसका प्रकार यों है- 'ॐ ब्रह्मविष्णुमहेश्वराषिभ्यो नम' शिरसि । 'ऋग्यजु सामाथर्वच्छन्दोभ्यो नम' मुखे । प्राणदेवतायै नम' हृदि । 'आं बीजाय नम' गुह्ये । 'ह्रीं शक्तये नम' पादयो । 'क्रों कीलकाय नम' नाभौ । इन छह मन्त्रोंका क्रमश उच्चारण करते हुए सिर, मुख, हृदय, गुह्य (गुदा), दोनों पैर और नाभिका दाहिने हाथकी अङ्गुलियोंसे स्पर्श करना चाहिये । किसी- किसीके मतसे प्राणप्रतिष्ठा-मन्त्रमें केवल ब्रह्मा ही ऋषि, विराट् छन्द और प्रणव बीज है। २. मातृकान्यासका क्रम इस प्रकार है। निम्नाङ्कित वाक्यका उच्चारण करके विनियोग करे- 'ॐ अस्य मातृकान्यासमन्त्रस्य ब्रह्मा
५४० * श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ १० उसका भी पूजन करे । रत्नमय सिंहासनपर सुल्यम, चिकनी तथा सिंहासनके आकारकी तूलिका ( रूईदार गद्दी) की भावना करके उसपर भगवत्स्वरूप आचार्यका पूजन करके पीठके अधोभागमें आराध्य देवताके आसनके नीचे आधारशक्ति, कूर्म (कच्छप), नाग (शेषनाग) तथा पृथ्वीमय दो कमलोंकी भावना करके उन सबकी पूजा करे* ॥ १-२ ॥ विघ्न, दुर्गा, क्षेत्रपाल तथा वाणीका इनके नामके आदिमें बीज लगाकर नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग करते हुए पूजन करना चाहिये । (नामके आदि अक्षरोंको ही प्रणव और बिन्दुसे सम्पुटित कर देनेपर वह देवताका बीज- मन्त्र बन जाता है। ऐसा ही बीज लगाकर मण्डपके द्वारदेशमें विघ्न आदिकी पूजा करनी चाहिये । पूजाका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ विं विघ्नाय नमः, ॐ हुं दुर्गायै नमः, ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नम, ॐ वां वाण्यै नमः'। फिर पीठके पायोंने, जो अग्निकोण आदिमें स्थित हैं, क्रमशः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका पूजन करे ।† और पीठके अवयवगत पूर्वादि दिशाओं- में क्रमशः अधर्म, अनर्थ, अकाम और अमोक्षकी पूजा करे। फिर पीठके ऊपर मध्यभागमें उत्तम पुष्पोंद्वारा पूजित सूर्य, चन्द्र एव अग्निका क्रमशः पूजन करे । यन्त्रमें जो बीज (कर्णिका) सहित तीन वृत्तं (गोलाकार चिह्न) हैं, उन्हें क्रमशः सत्त्व, रज और तमका प्रतीक मानकर चिन्तन और पूजन करना चाहिये‡ ॥ ३-४ ॥ ऋषि गायत्री छन्द सरस्वती देवता भगवत्प्रीतये ललाटाद्यङ्गेषु मातृकावर्णानां न्यासे विनियोगः ।' तत्पश्चात् निम्नाङ्कित छ वाक्योंको पढ़कर न्यास करे—१- 'अ क ख ग घ ङ आं' हृदयाय नमः । २- 'इ च छ ज झ ञ ईं' शिरसे स्वाहा। ३- 'उ ट ठ ड ढ ण ऊं' शिखायै वषट् । ४- 'ए त थ द ध न ऐं' कवचाय हुम् । ५- 'ओ प फ ब भ म औं' नेत्रत्रयाय वौषट् । ६- 'अं य र ल व श ष सं हं ळ क्ष अः' अस्त्राय फट् । इनमेंसे पहले तीन वाक्योंको पढ़कर दाहिने हाथकी अँगुलीयोंसे क्रमश हृदय, सिर और शिखाका स्पर्श करना चाहिये । चौथे वाक्यको पढ़कर दाहिने हाथसे बायें और बायें हाथसे दायें कंधेका एक साथ ही स्पर्श करना चाहिये । पाँचवें वाक्यका उच्चारण करके दाहिने हाथकी अङ्गुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रों और ललाट के मध्यभागका स्पर्श करना चाहिये तथा छठे वाक्यको पढ़कर दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर तर्जनी तथा मध्यमा अङ्गुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये । तदनन्तर ध्यान करे—'मै उज्ज्वल कान्ति एव तीन नेत्रोंसे विभूषित माता सरस्वती देवीकी शरण लेता हूँ । उनके मुख, भुजा, चरण, कटिभाग एव वक्ष स्थल आदि अङ्ग पचास अक्षरोंमें विभक्त हैं । मस्तकपर अर्धचन्द्रजटित चमचमाता हुआ किरीट शोभा पा रहा है। उनके उरोज सब ओरसे उभरे हुए—स्थूल एव ऊँचे हैं। वे अपने कर-कमलोंमें मुद्रा, अक्षसूत्र, अमृतपूर्ण कलश और विद्या धारण किये हुए हैं।' इस प्रकार ध्यान करके ललाट, मुख-मण्डल, दोनों नेत्र, दोनों कान, दोनों नासिका, दोनों कपोल, दोनों ओष्ठ, दोनों दन्तपङ्क्ति, मस्तक, मुख, दोनों बाहुमूल, दोनों कूर्पर (कोहनी), दोनों मणिबन्ध (कलाई), दोनों हाथोंके अङ्गुलिमूल, दोनों हाथोंके अङ्गुल्यग्र, दोनों ऊरुमूल, दोनों जानु (घुटने), दोनों गुल्फ (टखने), दोनों पैरोंके अङ्गुलिमूल, दोनों पैरोंके अङ्गुल्यग्र, दोनों पार्श्वभाग, पीठ, नाभि, उदर, हृदय, दायें कधे, ककुद् (गलेके पीछेका भाग), बायें कधे, हृदयादि दक्षिणहस्त, हृदयादि वामहस्त, हृदयादि दक्षिणपाद, हृदयादि वामपाद, हृदयादि उदर तथा हृदयादि मुख—इन अङ्गोंमें 'अ नम, आं नम' इत्यादिरूपसे ५१ मातृका- वर्णोंका न्यास करे ।
- आधारशक्तिका ध्यान एक देवीके रूपमें करना चाहिये । वह अपने दोनों हाथोंमें दो कमल धारण किये हुए है । उस आधारशक्ति के मस्तकपर भगवान् कूर्म विराजमान है, उनकी कान्ति नीले रंगकी है । उनके ऊपर भगवान् अनन्त (शेषनाग) की स्थिति है, जो रत्नमयी शिलापर आसीन हैं । उनके श्रीअङ्ग कुन्दसदृश गौर हैं । उनके हाथमें चक्र है तथा उन्होंने मस्तकपर वसुन्धरा देवीको धारण कर रक्खा है । देवी वसुन्धराकी अङ्गकान्ति तमालके समान श्यामल है । वे नील कमल धारण करती हैं । उनके कटिप्रदेशमें लहराता हुआ समुद्र ही मेखला (करधनी) की शोभा दे रहा है। उक्त वसुन्धरापर एक रत्नमय द्वीप है, जहाँ मणिमय मण्डप शोभा पा रहा है । इस क्रमसे मण्डपतककी पूजा करके उसके प्रवेश-द्वारपर विघ्न आदिकी पूजा करनी चाहिये । † धर्म आदिका ध्यान और पूजन-क्रम इस प्रकार है । साधकको उसकी इच्छाके अनुरूप सिद्धि प्रदान करनेवाले चार कल्पवृक्ष हैं, ऐमी भावना करके उनकी पूजा करे । फिर उनके नीचे मण्डलाकार एव तेजसे जाज्वल्यमान वेदीकी भावना करके उसकी पूजा करे । उस वेदीपर रत्नमय पीठका धर्म आदिके साथ पूजन करे । धर्मका रग लाल है, वह वृषभरूपसे स्थित है । अर्थका रंग साँवला है, वह सिंहकी आकृति धारण किये हुए है । काम का रंग हल्दीके समान पीला है, वह भूतकी आकृतिमें है तथा मोक्षका रग नीला है, उसका आकार हाथी के समान है । पीठके पायोंने अग्निकोण आदिमें धर्म आदिका तथा पीठके अन्य अवयवोंमें पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः अधर्म आदिका पूजन करे । तत्पश्चात् कमलका पूजन आरम्भ करे । ‡ ॐ स सत्त्वाय नम, ॐ र रजसे नम., ॐ त तमसे नम-- इन मन्त्रोंसे सत्त्वादि रूप तीनों वृत्तोंका पूजन करे ।
खण्ड १० ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४१ तत्पश्चात् दिशाओं और कोणोंमें स्थित कमलके आठ दलोंकी पूजा करे । इनमेंसे जो दल मध्यवर्ती दिशा अर्थात् कोणोंमें हैं, उनमें आग्नेय कोणसे आरम्भ करके क्रमशः आत्मा (लिङ्ग), अन्तरात्मा (जीव), परमात्मा (ईश्वर) और ज्ञानात्मा (लीला-पुरुषोत्तम) का पूजन करे¹ तथा पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः- माया-तत्त्व, विद्या-तत्त्व, कला-तत्त्व एव पर-तत्त्वकी पूजा करे² । तदनन्तर विमला आदि शक्तियों- का विधिवत् पूजन करे³ । फिर प्रधान देवताका आवाहन और पूजन करे⁴ । इसके बाद जल आदिसे अङ्गव्यूहोंकी पूजा करके⁵ धृ⁶ष्टि आदि, लोकपालगण, उनके अस्त्र⁷, वसिष्ठ⁸ आदि मुनि तथा नील¹⁰ आदिके साथ चन्दन आदि उपचारों तथा नाना प्रकारके श्रेष्ठ उपहारोंद्वारा श्रीरघुनाथजीकी आराधना करे । उनकी पूजा करके विधिपूर्वक जप आदि भी उन्हें समर्पित करे । 'जो ऐसी महिमावाले, जगत्के आधारभूत और सच्चिदा- नन्दस्वरूप हैं, जिनके करकमलोंमे गदा, चक्र, शङ्ख और पद्म शोभा पा रहे हैं तथा जो भव-बन्धनका नाश करनेवाले हैं, उन भगवान् श्रीरामको मैं प्रणाम करता हूँ'¹¹। यूँ कहकर उनकी वन्दना करे । जो इस प्रकार भगवान् श्रीरामका ध्यान करते हैं, वे सब लोग मोक्ष (भगवान्का परमधाम) प्राप्त कर लेते है। विश्वव्यापी भगवान् श्रीराम लीला-संवरण- कालमें सशरीर अन्तर्धान हो गये थे । (अन्य प्राणियोंकी भाँति उन्होंने देहत्याग नहीं किया था।) शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मरूप उनके आयुध भी साथ ही अन्तर्धान हुए । उन्होंने अपने स्वाभाविक स्वरूपको धारणकर सीताजीके साथ परमधाममें पदार्पण किया । उस समय उनके साथ सारा परिवार—पुरजन, परिजन, समस्त भाई, समस्त प्रजाजन तथा विभीषण आदि शत्रुके वग़ज भी परमधाममें चले गये । जो उनके भक्त होते हैं, वे मनोवाञ्छित भोगोंको पाते हैं, प्राप्त हुए भोगोंका उपभोग करते हैं तथा अन्तमें वे भी भगवान्के परमपदको प्राप्त करते हैं । जो लोग सम्पूर्ण कामनाओं और अर्थोंको देनेवाली इन ऋचाओंका पाठ करते है, वे शुद्धान्तःकरण होकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। जो पाठ करते हैं, वे निर्मल अन्तः- करणवाले होकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ॥ ५-१० ॥ ॥ अथर्ववेदीय श्रीरामपूर्वतपनीयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! —:०:०:— १. पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं— ॐ आत्मने नम, अन्तरात्मने नम, परमात्मने नम, ज्ञानात्मने नम । २ मायातत्त्वाय नम । विद्यातत्त्वाय नम । कलातत्त्वाय नम । परतत्त्वाय नम ॥ ३ विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा—ये पीठकी शक्तियाँ हैं। इनका स्थान अष्टदल कमलके केसरोंमें है। ये वर और अभयकी मुद्राओंसे युक्त होती हैं। ४ 'ॐ नमो भगवते रघुनन्दनाय' इत्यादि मूल-मन्त्रका उच्चारण करके 'आहूतो भव' यों कहकर आवाहनकी मुद्रा दिखाये। दोनों हाथोंकी अञ्जलि बनाकर अनामिका अँगुलियोंके मूलपर्वपर अँगूठेको लगा देना--यह आवाहनकी मुद्रा है। यही अधोमुखी (नीचेकी ओर मुखवाली) कर दी जाय तो स्थापिनी (बिठानेवाली) मुद्रा कहलाती है। अँगूठोंको ऊपर उठाकर दोनों हाथोंकी सयुक्त मुट्ठी बाँध लेनेपर सन्निधापिनी (निकट सपर्कमें लानेवाली) मुद्रा बन जाती है। यदि मुट्ठीके भीतर अँगूठेको डाल दिया जाय तो सन्निरोधिनी (रोक रखनेवाली) मुद्रा कहलाती है। दोनों मुट्ठियोंको उत्तान कर देनेपर इसका नाम सम्मुखीकरणी (सम्मुख करनेवाली) मुद्रा होता है। ५ हृदय, मस्तक आदि भिन्न-भिन्न अङ्गोंकी जल आदिसे पूजा ही अङ्गव्यूहोंकी पूजा है। ६ धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र । ७ इन्द्र, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, चन्द्रमा, ईशान, ब्रह्मा और अनन्त । ८ वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, अङ्कुश, गदा, शूल, चक्र और पद्म—ये क्रमश इन्द्र आदिके आयुध हैं। ९ वसिष्ठ, वामदेव, जाबाल, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र, वाल्मीकि, नारद, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार । १० नील, नल, सुषेण, मैन्द, शरभ, द्विविद, धनद, गवाक्ष, किरीट, कुण्डल, श्रीवत्स, कौस्तुभ, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म--ये सोलह नील आदि हैं। ११. एवम्भूत जगदाधारभूत राम वन्दे सच्चिदानन्दरूपम् । गदारिशङ्खाब्जधर भवार्तिं स यो ध्यायेन्मोक्षमाप्नोति सर्व ॥
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद्
शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
प्रथम खण्ड
काशी एवं तारक-मन्त्रकी महिमा, ॐकाररूप पुरुषोत्तम रामके चार पाद
[बायाँ स्तम्भ] ॐ बृहस्पतिने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'ब्रह्मन् ! जिस तीर्थके सामने कुरुक्षेत्र भी छोटा लगे, जो देवताओंके लिये भी देव पूजनका स्थान हो, जो समस्त प्राणियोंके लिये परमात्म-प्राप्तिका निकेतन हो, वह कौन है ?' यह प्रश्न सुनकर याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया—'निश्चय ही अविमुक्त तीर्थ ही प्रधान कुरुक्षेत्र (सत्कर्मका स्थान) है। वही देवताओंके लिये भी देव पूजाका स्थान है; वही समस्त प्राणियोंके लिये परमात्म-प्राप्तिका निकेतन है। अतः जहाँ कहीं भी जाय, उस अविमुक्त तीर्थको ही प्रधान कुरुक्षेत्र माने। वही देवताओंके लिये भी देवाराधनका स्थान है। वही सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये परब्रह्म-प्राप्तिका स्थान है। यहाँ जीवके प्राण निकलते समय भगवान् रुद्र तारक ब्रह्मका उपदेश करते हैं, जिससे वह अमृतमय होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इसलिये अविमुक्त (काशी) का ही सेवन करे। अविमुक्त तीर्थका कभी परित्याग न करे। ठीक ऐसी ही बात है।' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने समझाया। १।
तदनन्तर भरद्वाजने याज्ञवल्क्यजीसे पूछा—'भगवन् ! कौन तारक (तारनेवाला) है और कौन तरता है ?' इस प्रश्नके उत्तरमें वे प्रसिद्ध याज्ञवल्क्य मुनि बोले—'तारक-मन्त्र इस प्रकार होता है। दीर्घ आकारसहित अनल (रेफ, रकार) हो और वह रेफ बिन्दु (अनुस्वार) से पहले स्थित हो, उसके बाद पुनः दीर्घ स्वरविशिष्ट रेफ हो और उसके अनन्तर 'माय नमः' ये दो पद हों, इस प्रकार 'रा रामाय नमः' यह तारक मन्त्रका स्वरूप है। इसके सिवा 'राम' पदके सहित 'चन्द्राय नम' और 'भद्राय नम' ये दो मन्त्र भी तारक ही
[दायाँ स्तम्भ] हैं। ये तीन मन्त्र क्रमशः ॐकारस्वरूप, तत्स्वरूप और ब्रह्मस्वरूप हैं। ये ही क्रमशः 'सत्', 'चित्' और 'आनन्द' नाम धारण करते हैं। इस प्रकार इनकी उपासना करनी चाहिये। ॐकारमें प्रथम अक्षर अकार है, दूसरा अक्षर उकार है, तीसरा अक्षर मकार है, चौथा अक्षर अर्धमात्रा है, पञ्चम अक्षर अनुस्वार है और छठा अक्षर नाद है। (इस प्रकार छः अक्षरवाला तारक-मन्त्र होता है।) यह सबको तारनेवाला होनेसे तारक कहलाता है। उस ॐकार अथवा 'रा' इस बीज-मन्त्रमय अक्षरको ही तुम 'तारक ब्रह्म' समझो। वही उपासनाके योग्य है—यो जानना चाहिये। वह गर्भ, जन्म, जरावस्था, मृत्यु तथा सांसारिक महान् भयसे भलीभाँति तार देता है। इसलिये 'तारक' इस नामसे उसका कथन किया जाता है। जो ब्राह्मण इस तारक-मन्त्रका सदा जप करता है। वह सम्पूर्ण पापोको पार कर जाता है, वह मृत्युको लाँघ जाता है, वह ब्रह्महत्यासे तर जाता है, वह भ्रूणहत्यासे तर जाता है तथा वह वीर-हत्यासे तर जाता है। इतना ही नहीं, वह सम्पूर्ण हत्याओंसे तर जाता है, वह संसारसे तर जाता है, सबको पार कर जाता है। वह जहाँ कहीं भी रहता हुआ अविमुक्त क्षेत्र (काशीधाम) में ही रहता है। वह महान् होता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ २ ॥
इस विषयमें ये श्लोक हैं— अकाराक्षरसम्भूतः सौमित्रिर्विश्वभावनः । उकाराक्षरसम्भूतः शत्रुघ्नस्तैजसात्मकः ॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण दिया गया है:
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४३
[बायाँ स्तम्भ] प्राज्ञात्मकस्तु भरतो मकाराक्षरसम्भवः । अर्धमात्रात्मको रामो ब्रह्मानन्दैकविग्रहः ॥ श्रीरामसान्निध्यवशाज्जगदानन्ददायिनी । उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणी सर्वदेहिनाम् ॥ सा सीता भवति ज्ञेया मूलप्रकृतिसञ्ज्ञिका । प्रणवत्वात् प्रकृतिरिति वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ “सुमित्रानन्दन लक्ष्मणजी प्रणवके अकार अक्षरसे प्रादुर्भूत हुए हैं। ये जाग्रत्के अभिमानी 'विश्व' के रूपमें भावना करनेयोग्य हैं। (ये ही चतुर्व्यूहोंमें संकर्षणरूप हैं।) शत्रुघ्न स्वप्नके अभिमानी 'तैजस' रूप हैं, इनका आविर्भाव प्रणवके 'उ' अक्षरसे हुआ है। (चतुर्व्यूहोंमें इन्हींकी 'प्रद्युम्न' संज्ञा है।) भरतजी सुषुप्तिके अभिमानी 'प्राज्ञ' रूप हैं। ये प्रणवके 'म' अक्षरसे प्रकट हुए हैं। (चार व्यूहोंमें इन्हीं- को 'अनिरुद्ध' कहा गया है।) भगवान् श्रीराम प्रणवकी अर्धमात्रारूप हैं। ये ही तुरीय पुरुषोत्तम हैं। ब्रह्मानन्द ही इनका एकमात्र विग्रह है। (चतुर्व्यूहोंमें ये ही 'वासुदेव' नामसे प्रसिद्ध हैं।) श्रीरामके सामीप्य मात्रसे जो सम्पूर्ण देहधारियोंकी उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली हैं, वे जगदानन्ददायिनी विदेहनन्दिनी सीता नाद-बिन्दुरूपा हैं। वे ही 'मूल प्रकृति'के नामसे जाननेयोग्य हैं। प्रणवसे अभिन्न होनेके कारण ही उन्हें ब्रह्मवादी जन 'प्रकृति' कहते हैं।” 'ओम्' यह अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है। यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला सम्पूर्ण जगत् उसका ही उपव्याख्यान है—उसीकी महिमाका प्रकाशन करनेवाला है। जो पहले हो चुका है, जो अभी वर्तमान है तथा जो भविष्यमें होने- वाला है, वह सम्पूर्ण जगत् ॐकार ही है, तथा जो ऊपर बताये हुए तीनों कालोंसे अतीत दूसरा कोई तत्त्व है, वह भी ॐकार ही है। (ॐकार नाम है और परमात्मा नामी, नाम और नामीमें कोई अन्तर नहीं है—यह दिखानेके लिये ही यहाँ सब कुछ ॐकार बताया गया है।) निश्चय ही यह सब ब्रह्म है। यह सर्वान्तर्यामी आत्मा भी ब्रह्म है। इस परमात्माके चार पाद हैं। (यद्यपि परमात्मा एक और अखण्ड है, तथापि उसके सम्पूर्ण स्वरूपका बोध करानेके लिये ही उसमें चार पादों—अंगोंकी कल्पना की गयी है। जाग्रत् यानी स्थूल जगत्, स्वप्न अर्थात् सूक्ष्म जगत्, सुषुप्ति—प्रलयावस्था अर्थात् कारण-तत्त्वमें लीन जगत् तथा इन सबसे अतीत विशुद्ध ब्रह्म—ये ही समग्र परमेश्वरके चार पाद अथवा अंश हैं। 'श्रीराम-तत्त्वके वर्णनमें 'रा' यह बीज ही प्रणव
[दायाँ स्तम्भ] है तथा पुरुषोत्तम राम सम्पूर्ण परमेश्वर हैं। इनके चार पाद या अंश हैं—लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत तथा कौसल्यानन्दन श्री- राम। ये चारों मिलकर ही सम्पूर्ण राम हैं। जैसे सब कुछ 'ओम्' है, वैसे ही 'रा' भी है। 'रा' और 'ॐ'में माहात्म्य और महिमाकी दृष्टिसे कोई अन्तर नहीं है। अतः यह सम्पूर्ण जगत् श्रीरामकी ही महत्ताका प्रकाशन कर रहा है।) जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति यह सम्पूर्ण स्थूल जगत् जिसका अवयव-संस्थान (शरीर) है, जो बहिःप्रज्ञ है—जिसका ज्ञान इस बाह्य जगत्में सब ओर फैला हुआ है, भूः, भुव आदि सात लोक ही जिसके सात अङ्ग हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण और चार अन्तःकरण—ये उन्नीस समष्टि करण ही जिसके मुख हैं, जो इस स्थूल जगत्का भोक्ता अर्थात् इसको जानने और अनुभव करनेवाला है—ऐसा वैश्वानर (विश्वरूप पुरुषोत्तम) ही सम्पूर्ण परमेश्वरका पहला पाद है। (लीला- पुरुषोत्तम श्रीरामके चार पादोंमेंसे प्रथम पाद श्रीलक्ष्मणजी हैं। ये शेषनागके रूपमें अखिल विश्वके आश्रय होनेके कारण ही 'विश्व' अथवा 'वैश्वानर' नाम धारण करते हैं तथा श्रीरामकी प्राप्तिके लिये प्रथम उपाय है—श्रीलक्ष्मणजी- की आराधना। अतएव उन्हें प्रथम पाद कहा गया है। वे सदा जागरूक स्थितिमे रहते हैं, अतएव 'जागरितस्थान' हैं। बाहरकी सम्पूर्ण बातोंको जाननेमे सतत सावधान रहनेके कारण उन्हें 'बहिःप्रज्ञ' कहा गया है। भूर्भुव आदि सात लोक अथवा तल-अतल आदि सात पातालोकी स्थिति उनके ही अङ्गोंपर है, अत वे 'सप्ताङ्ग' हैं। पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, कल्प, शिक्षा एवं निरुक्त—ये छ अङ्ग, ऋक्, साम, यजुः एवं अथर्व—ये चार वेद तथा आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, अर्थशास्त्र और दर्शन—ये सब मिलकर उन्नीस विद्याएँ श्रीलक्ष्मणजीके मुखमें स्थित हैं—अर्थात् अपने मुखद्वारा वे इन विद्याओंका वर्णन करनेमें समर्थ हैं, अतएव उन्हें 'एको- नविंशतिमुख' कहा गया है। संकर्षणरूपसे प्रलयकालमें अपनी मुखाग्निद्वारा समस्त स्थूल जगत्को वे ग्रस लेते हैं, अतः स्थूलभुक् हैं।) मनकी सूक्ष्म वासनाद्वारा कल्पित मनोमय जगत् ही स्वप्न कहलाता है, अत 'स्वप्न' पद यहाँ 'सूक्ष्म जगत्' का ही बोधक है। वह सूक्ष्म जगत् ही जिसका स्थान है, जो अन्तःप्रज्ञ है अर्थात् जिसका ज्ञान सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है तथा जो पूर्वोक्त सात अङ्गों और उन्नीस मुखोंसे युक्त है, वह
५४४ * श्रीरामॊत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड १
प्रविविक्त—सूक्ष्म जगत्का भोक्ता (जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव करनेवाला) तैजस (प्रकाशस्वरूप हिरण्यगर्भ) उस पूर्णतम परमेश्वरका द्वितीय पाद है। (श्रीरामपक्षमे श्री-शत्रुघ्न ही पूर्णतम परमात्मा श्रीरामके द्वितीय पाद—अङ्ग हैं। लक्ष्मणजीकी अपेक्षा दूसरे होनेके कारण ये द्वितीय हैं। प्रद्युम्न—कामके अङ्ग होनेसे ये सबके मनमें स्थित रहते हैं। स्वप्नावस्था में अन्य इन्द्रियोंके सुप्त हो जानेपर भी मन अपना कार्य करता रहता है, अतः मनके साथ उसमें निवास करनेवाले मनोभयरूप शत्रुघ्नजीकी भी स्वप्नमे स्थिति रहती ही है, इसलिये उनको 'स्वप्नस्थान' कहा गया है। मनमे स्थिति होनेसे वे अन्तःकरणकी बातोको जानते हैं, इसलिये अन्तःप्रज्ञ हैं। जैसे स्थूल जगत्का भार शेषरूपधारी लक्ष्मणपर है, उसी प्रकार सूक्ष्म लोकोंका भार समष्टि मनमें स्थित 'प्रद्युम्न'—कामपर है। समष्टि मन ही समस्त सूक्ष्म लोकोंका आधार है। उसमें रहनेवाले संकल्पमय प्रद्युम्न ही उस भारको वहन करते हैं। वे शत्रुघ्नसे अभिन्न हैं। अतः भूः आदि सात सूक्ष्म लोकोका भार जिनके अङ्गोंपर है, वे शत्रुघ्न-जी भी 'सप्ताङ्ग' हैं। उन्नीस मुख पूर्ववत् समझने चाहिये। जो सूक्ष्म लोकोंका अधिष्ठाता है, वह सूक्ष्म तत्त्वोंका भोक्ता और अनुभव करनेवाला होगा ही, अतः शत्रुघ्नजी ही 'प्रविविक्त-भुक्' हैं। तैजसका अर्थ यहाँ तेजोमय—परम कान्तिमान् है। प्रद्युम्न—कामके स्वरूप होनेसे शत्रुघ्नका सौन्दर्य अप्रतिम है, अतः वे 'तैजस' कहे गये हैं।)
अवस्थाको ही यहाँ 'सुषुप्ति' कहा है। इसमे सुप्त अर्थात् जितेन्द्रिय पुरुष न तो स्थूल भोगोकी इच्छा करता है और न स्वप्न—सूक्ष्म भोगोंकी ओर ही दृष्टि डालता है। इस जितेन्द्रियता एव स्थिरप्रज्ञतामें ही स्थित होनेके कारण भरतजी 'सुषुप्त-स्थान' कहे गये है। उन्होंने भी पिताकी ओरसे स्वतः प्राप्त हुए राज्यकी कामना नहीं की—स्वप्नमें भी उसका चिन्तन नहीं किया । वे नन्दिग्राममें समाधि लगाकर भगवान्के साथ एकीभूत हो गये थे । यो भी सदा श्रीरघुनाथजीका ही चिन्तन करनेके कारण वे उनके साथ एकरूप हो गये थे। वे प्रज्ञानघन अर्थात् महाप्राज्ञ—परम बुद्धिमान् हैं श्रीरघुनाथजीका अनन्य भक्त होना ही बुद्धिके उत्कर्षका परिचायक है । हर्ष-शोक आदिसे विचलित न होनेके कारण वे सदा 'आनन्दमय' कहे गये हैं । अनिरुद्धस्वरूप होनेके कारण उन्हें आनन्दका भोक्ता कहा गया है । उनमें विवेक शक्तिकी प्रधानता होनेसे ही वे 'चेतोमुख' हैं। 'प्राज्ञ' उनकी सञ्ज्ञा है। परम ज्ञानी—कुशाग्र-बुद्धि होनेके कारण उनको 'प्राज्ञ' कहा गया है।)
जिस अवस्था मे सोया हुआ मनुष्य किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह सुषुप्ति-अवस्था है। सुषुप्ति-अवस्थासे यहाँ प्रलयावस्थाकी ओर सङ्केत किया गया है। उस समय समस्त जगत् अपने कारण तत्त्वमें विलीन हो जाता है। अतः सुपुप्त अर्थात् कारण-तत्त्व ही जिसका संस्थान (शरीर) है, जो एकरूप है, केवल घनीभूत प्रज्ञान ही जिसका स्वरूप है, जो केवल आनन्दमय है, चैतन्य ही जिसका मुख है, जो एकमात्र आनन्दका ही उपभोग करनेवाला है, वह 'प्राज्ञ' ही परब्रह्म परमात्माका तृतीय पाद है। (श्रीराम-पक्षमें श्रीभरतलालजी ही तृतीय पाद हैं । लक्ष्मण और शत्रुघ्नकी अपेक्षासे तो वे तृतीय हैं और श्रीरामकी प्राप्ति करानेवाले होनेके कारण [ श्रीरामं पादयति—गमयति इति पादः', इस व्युत्पत्तिके अनुसार ] 'पाद' कहे गये हैं। जहाँ इन्द्रियवर्ग और मन दोनों सो जाते हैं—दोनोंके अनियन्त्रित व्यापार बद हो जाते हैं, उस शम-दमसे सम्पन्न स्थिरप्रज्ञताकी
यह तीन पादोंके रूपमें वर्णित परमेश्वर (एव लीलापुरुषोत्तम श्रीराम) सबका ईश्वर (शासक) है। यह सबको जाननेवाला है। यही सबका अन्तर्यामी है। यही सम्पूर्ण जगत्का कारण है। तथा यही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति, (स्थिति) और प्रलयका स्थान है । जिसकी प्रज्ञा न तो अन्तर्मुखी है न बहिर्मुखी है, न दोनों ओर मुखवाली ही है; जो न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला ही है, जिसको देखा नहीं गया, व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता और पकड़ा भी नहीं जा सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं, जो चिन्तनमें नहीं आ सकता, जो किसी विशेष सकेतसे भी बतलानेमें नहीं आ सकता, एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका सार है, तथा जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसे सर्वथा शान्त एवं कल्याणमय अद्वैत तत्त्व (परब्रह्म) को ही ज्ञानीजन समग्र परमेश्वरका चतुर्थ पाद मानते हैं। वह परमात्मा है और वही जाननेके योग्य है । (श्रीरामपक्षमें भी 'नान्तःप्रज्ञम्' आदि पदोंका यही अर्थ है । यहाँ श्रुति अनिर्वचनीय एव सर्वथा विलक्षण श्रीराम-तत्त्वका तटस्थभावसे सङ्केतमात्र करती है। स्वरूपतः वर्णन करनेमें तो वह सर्वथा असमर्थ है; क्योंकि वाणीकी वहाँतक पहुँच ही नहीं है ।) वे पूर्ण ब्रह्म परमात्मा (श्रीराम) सदा उज्ज्वल (निर्मल यथार्थ प्रकाशमान) हैं। अविद्या और उसके कार्योंसे सर्वथा
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४५ रहित हैं। अपने भक्तजनोंके आत्माका अज्ञानमय बन्धन वे हर लेते हैं। सर्वदा अद्वैत हैं—उनमें द्वैतका सर्वथा अभाव है। वे आनन्दमूर्ति हैं। सबके अधिष्ठान हैं। सत्तामात्र उनका स्वरूप है। अविद्याजनित अन्धकार और मोह उनमें स्वभावत नहीं हैं, अथवा उनकी शरणमें जाते ही अविद्या- मय अन्धकार और मोहका सर्वथा नाश हो जाता है। ऐसे जो अनिर्वचनीयपरमात्मा श्रीराम हैं, वह मैं ही हूँ—इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये। ॐ, तत्, सत्, यत् और परं ब्रह्म आदि नामोंसे प्रतिपादित होनेवाले जो चिन्मय श्रीरामचन्द्रजी हैं, वह मैं ही हूँ, ॐ—सच्चिदानन्दमय, परम ज्योति स्वरूप जो वे श्रीरामभद्र हैं, वह मैं हूँ, वह मैं ही हूँ—इस प्रकार अपनेको सामने रखकर मनके द्वारा परब्रह्म परमात्मा श्रीरामके साथ एकता करे—भगवान्के साथ अपनी अभिन्नताका चिन्तन करे। जो लोग सदा यथार्थरूपम समझकर 'मैं राम हूँ' यों कहते हैं, वे संसारी नहीं हैं। निश्चय ही वे श्रीरामके ही स्वरूप हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। यह उपनिषद् है। जो इस प्रकार जानता है, वह मुक्त हो जाता है—इस प्रकार याज्ञवल्क्यजीने उपदेश दिया ॥ ३ ॥ तदनन्तर महर्षि अत्रिने इन सुप्रसिद्ध याज्ञवल्क्य मुनिसे प्रश्न किया—'यह जो अनन्त एव अव्यक्त आत्मा (परमात्मा) है, इसे मैं कैसे जानूँ ?' तत्र वे प्रसिद्ध याज्ञवल्क्यजी बोले—उस अव्यक्त परमात्माकी अविमुक्त क्षेत्रमें उपासना करनी चाहिये। यह जो अनन्त एवं अव्यक्त आत्मा है, वह अविमुक्त क्षेत्रमें प्रतिष्ठित है। प्रश्न-किंतु उस अविमुक्त क्षेत्रकी स्थिति कहाँ है ? उत्तर-अविमुक्त क्षेत्र वरणा और नाशीके मध्यमें प्रतिष्ठित है। प्रश्न-'वरणा' नामसे कौन प्रसिद्ध है ? और 'नाशी' किसका नाम है ? उत्तर-सम्पूर्ण इन्द्रियकृत दोषोंका वारण करती है, इससे वह 'वरणा' है, और समस्त इन्द्रियजनित पापोंका नाश करती है, इससे वह 'नाशी' कहलाती है। प्रश्न-इस अविमुक्तक्षेत्रका आध्यात्मिक स्थान कौन है ? उत्तर-भौंहों और नासिकाकी जो सन्धि है (जहाँ इडा और पिङ्गला नामकी दो नाड़ियाँ मिली हुई हैं), वह द्युलोक तथा उससे भी उत्कृष्ट ज्योतिर्मय परमधामकी सन्धिक स्थान है। निश्चय ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस सन्धिकी ही 'सन्ध्या' के रूपमे उपासना करते हैं। अतः उस अव्यक्त परमात्मा श्रीरामकी अविमुक्त क्षेत्रमें रहकर अविमुक्तरूपमे (भांहों और नासिकाकी सन्धिमें) ही उपासना करनी चाहिये। जो उसे इस प्रकार जानता है, अर्थात् जो ऊपर बताये अनुसार यह भलीभाँति समझता है कि 'अव्यक्त परमात्माकी उपासनाका आधिभौतिक स्थान अविमुक्तक्षेत्र (काशी) और आध्यात्मिक स्थान भौंहों एव नासिकाके मध्यका भाग है—यहीं ध्यानद्वारा उस अव्यक्त तत्त्वका चिन्तन करना चाहिये', वही परमात्मासे नित्य संबद्ध (अविमुक्त) ज्ञानका उपदेश कर सकता है। यह अविनाशी, अनन्त, अव्यक्त, परिपूर्णानन्दैकरूचिन्मय- विग्रह परमात्मा अविमुक्तक्षेत्रम प्रतिष्ठित हैं। इसके बाद याज्ञवल्क्यजीने अत्रि मुनिसे यह कथा कही— एक समय भगवान् शङ्करने काशीम एक हजार मन्वन्तर- तक जप, होम और पूजन आदिके द्वारा श्रीरामकी आराधना करते हुए श्रीराम मन्त्रका जप किया। उसमे प्रसन्न होकर भगवान् श्रीरामने शङ्करजीमे कहा—'परमेश्वर ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लो, मैं उसे दूँगा।' तब मन्थानन्द- चिन्मय भगवान् शङ्करने श्रीरामसे कहा—'भगवन् ! मणिकर्णिका तीर्थम, मेरे काशीक्षेत्रमें अथवा गङ्गामे या गङ्गाके तटपर जो प्राण त्याग करता है, उस जीवको आप मुक्ति प्रदान कीजिये। इसके सिवा दूसरा कोई वर मुझे अभीष्ट नहीं है।' तब भगवान् श्रीरामने कहा—'देवेश्वर ! तुम्हारे इस पावन क्षेत्रमे जहाँ कहीं भी प्राण त्याग करनेवाले कीड़े मकोड़े आदि भी तत्काल मुक्त हो जायेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। तुम्हारे इस अविमुक्तक्षेत्रमे सब लोगोंकी मुक्ति सिद्धिके लिये मैं पाषाणकी प्रतिमा आदिम सदा निवास करता रहूँगा। शिवजी! इस काशीधामम मेरे इस षडक्षर तारक मन्त्र (रा रामाय नम ) द्वारा जो भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, मैं उसे ब्रह्महत्या आदि पापोंमे भी मुक्त कर दूँगा, तुम चिन्ता न करो। तुमसे अथवा ब्रह्माजीके मुखसे जो यहाँ षडक्षर मन्त्रकी दीक्षा लेते हैं, वे जीते जी तो मन्त्रसिद्ध होते हैं और मृत्युके बाद जन्म- मरणसे मुक्त हो मुझे प्राप्त कर लेते हैं। शिवजी ! जिस किसी भी मरणासन प्राणीके दाहिने कानमें तुम स्वयं मेरे मन्त्रका उपदेश करोगे, वह निश्चय ही मुक्त हो जायगा।' इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा वरदानसे अनुगृहीत अविमुक्तक्षेत्रका जो दर्शन करता है, वह जन्मान्तरके दोषोंको उ० अ० ६९-७०-
५४६ * श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड १ दूर कर देता है तथा वह जन्मान्तरके पापोंका नाश कर डालता है ॥ ४ ॥ तदनन्तर उन प्रसिद्ध याज्ञवल्क्यजीसे भरद्वाजने पूछा— 'भगवन् ! किन मन्त्रोंद्वारा स्तुति करनेपर भगवान् श्रीराम प्रसन्न होते हैं और अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं? उन मन्त्रोंका आप हमें उपदेश करें।' तब वे प्रसिद्ध महर्षि याज्ञवल्क्यजी बोले—'ब्रह्मन् ! जिस प्रकार भगवान् शङ्करको वरदान देते हुए श्रीरामजीने काशीका महत्त्व बताया था, उसी प्रकार किसी समय ब्रह्माजीको भी उन्होंने वैसा ही उपदेश दिया था। उनके द्वारा ऐसा उपदेश पाकर ब्रह्माजीने निम्नाङ्कित गद्यमयी गाथासे उन्हें नमस्कार किया। जो सम्पूर्ण विश्वके आधार और महाविष्णुरूप हैं, रोग- शोकसे रहित नारायण हैं, परिपूर्ण आनन्द-विज्ञानके आश्रय हैं और परम प्रकाशरूप हैं, उन परमेश्वर श्रीरामका मन ही- मन स्तवन करते हुए ब्रह्माजीने उनकी इस प्रकार स्तुति की—
ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवानद्वैतपरमानन्दात्मा यत् परं ब्रह्म भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्चाखण्डैकरसात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्च ब्रह्मानन्दामृत भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यत् तारक ब्रह्म भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ४ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यो ब्रह्मा विष्णुरीश्वरो य सर्वदेवात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् ये सर्वे वेदा साङ्गाः सशाखाः सपुराणा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यो जीवात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ७ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान्यः सर्वभूतान्तरात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान्ये देवासुरमनुष्यादि- भावा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ९ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् ये मत्स्यकूर्माद्यवतारा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १० ॥
ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्च प्राणो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ११ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् योऽन्त करणचतु- ष्टयात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १२ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्च यमो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्चान्तको भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १४ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यश्च मृत्युर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यच्चामृतं भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यानि पञ्चमहाभूतानि भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १७ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यः स्थावरजङ्गमात्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १८ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् ये च पञ्चाग्नयो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १९ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या सप्तमहा- व्याहृतयो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २० ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या विद्या भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २१ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या सरस्वती भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २२ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या लक्ष्मीर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या गौरी भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २४ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् या जानकी भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यच्च त्रैलोक्यं भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यः सूर्यो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २७ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्रः स भगवान् यः सोमो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २८ ॥
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४७ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यानि च नक्षत्राणि भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २९ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् ये च नवग्रहा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ३० ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् ये चाष्टौ लोकपाला भूर्भुवं स्वस्तस्मै वै नमो नम.॥ ३१ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् ये चाष्टौ वसवो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३२ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् ये चैकादश रुद्रा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् ये च द्वादशादित्या भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम.॥ ३४ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् यच्च भूतं भव्यं भविप्यद् भूर्भुव. स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् यश्च ब्रह्माण्डस्यान्तर्बहि- र्व्याप्नोति विराट् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यो हिरण्यगर्भो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३७ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् या प्रकृतिर्भूर्भुव. स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३८ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् यश्चोङ्कारो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३९ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यश्चतस्रोऽर्द्धमात्रा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ४० ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् य परमपुरुषो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ४१ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यश्च महेश्वरो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ४२ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यश्च महादेवी भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम.॥ ४३ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र. स भगवान् य ओं नमो भगवते वासुदेवाय यो महाविष्णुर्भूर्भुव. स्वस्तस्मै वै नमो नम. ॥४४॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् य परमात्मा भूर्भुव. स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ४५ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यो विज्ञानात्मा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम. ॥ ४६ ॥ ॐ यो वै श्रीरामचन्द्र स भगवान् यः सच्चिदानन्दैक-रसात्मा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ४७ ॥ 'ॐ जो जगत्-प्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे निश्चय ही भगवान् (षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न) हैं, अद्वितीय परमानन्द-स्वरूप हैं। जो सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म तथा भूर्भुवः स्वः—ये तीनों लोक हैं, वह सब भी वे ही हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सर्वत्र विख्यात श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे निश्चय ही भगवान् हैं, तथा जो अखण्डैकरसस्वरूप परमात्मा एव भू', भुवः, स्वः—ये तीनों लोक हैं, वह सब भी वे ही हैं। निश्चय ही उन्हें मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे निश्चय ही भगवान् हैं, तथा जो आनन्दमय, अमृतमय ब्रह्म तथा भू आदि तीनों लोक हैं, वह सब भी उन्हींका स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो तारक ब्रह्म और भूः, भुव, स्व. नामसे प्रसिद्ध तीनों लोक हैं, वह सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं, जो सर्वदेवमय परमात्मा हैं और जो भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेद, उनकी शाखाएँ, पुराण तथा भू आदि तीनों लोक हैं, उन सबके रूपमें भी वे ही हैं। उन भगवान्को निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो जीवात्मा और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान्को निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध ,श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंका अन्तरात्मा और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो देवता, असुर और मनुष्य आदि भाव १ सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री, सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण वैराग्य—इन छ का नाम भग है। जिन पूर्णतम परमेश्वरमें ये छहों परिपूर्णरूपसे नित्य-निरन्तर स्थित रहते हैं, वे 'भगवान्' कहे गये हैं।
५४८ * श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड १
(जातियाँ) तथा भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो मत्स्य, कच्छप आदि अवतार और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। निश्चय ही उन भगवान् श्रीरामको मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो प्राण और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार—इन चार प्रकारके अन्तःकरणोंमें अवस्थित चेतन आत्मा और भू आदि तीनों लोक हैं, वे सब भी उन्हींके स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो यम और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो 'अन्तक' एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो मृत्यु एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है ॥ १-१५ ॥ 'ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो अमृत एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो पाँच महाभूत और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो स्थावर-जङ्गमके आत्मा (अथवा चराचरस्वरूप) एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो आहवनीय आदि पाँच अग्नि एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान्
हैं; तथा जो भू आदि सात महान्व्याहृतियाँ और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो विद्या तथा भू आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो सरस्वती और भू आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप ह। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो लक्ष्मी एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप ह। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो गौरी एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो भगवती जनकनन्दिनी एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो त्रिलोकी- भूः, भुवः और स्वः है, वह सब भी उन्हींका स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो सूर्यदेव और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो चन्द्रमा एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो नक्षत्रगण एव भू आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो नवग्रह और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है ॥ १६-३० ॥ 'ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५४९ भगवान् हैं, तथा जो आठ लोकपाल और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो आठ वसु और भू,- भुव. आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है । ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो ग्यारह रुद्र और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं । उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है । ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो बारह आदित्य और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं । उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो भूत, वर्तमान और भविष्यत्काल एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो विराट् परमेश्वर इस ब्रह्माण्डके भीतर-बाहर व्याप्त हैं, वे और भू आदि तीनों लोक भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) और भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो प्रकृति एव भूः-भुव आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है । ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो ॐकार और भू भुव आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो चार अर्धमात्राएँ और भू आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो परम पुरुष एव भूः भुवः आदि तीनो लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो महेश्वर और भूः भुवः- स्व.-तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप है। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो महादेव एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्रसे नमस्कार करने योग्य महाविष्णु एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप ह । उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं; तथा जो परमात्मा एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो विज्ञानात्मा एवं भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारवार नमस्कार है। ॐ जो सुप्रसिद्ध श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अवश्य ही भगवान् हैं, तथा जो सच्चिदानन्दैकरसात्मा एव भू आदि तीनों लोक हैं, वे भी उन्हींके स्वरूप हैं। उन भगवान् श्रीरामको निश्चय ही मेरा बारंबार नमस्कार है' ॥३१-४७॥ जो ब्रह्मवेत्ता इन (मन्त्रराजके ४७ अक्षरोंके अनुसार) सैंतालीस मन्त्रोंसे प्रतिदिन भगवान् श्रीरामका स्तवन करता है, उसके ऊपर इस स्तुतिसे भगवान् प्रसन्न होते हैं। अतः जो इन मन्त्रोंसे प्रतिदिन भगवान्की स्तुति करता है, वह भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन करता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ तदनन्तर, भरद्वाजने याज्ञवल्क्यकी सेवामें उपस्थित होकर प्रार्थना की- 'भगवन् ! श्रीराम-मन्त्रराजके माहात्म्यका वर्णन कीजिये ।' तब उन प्रसिद्ध महात्मा याज्ञवल्क्यने कहा- स्वयंप्रकाश, परम ज्योतिर्मय तथा केवल अपने ही अनुभवद्वारा गम्य अद्वितीय चिन्मात्रस्वरूप जो परमात्मा है, वही श्रीरामचन्द्रजीके षडक्षर मन्त्रका प्रथम अक्षर ('रा' बीज ) माना गया है । मन्त्रका मध्यभाग जो 'रामाय' पद है, वह अखण्डैकरसानन्दस्वरूप तारक ब्रह्मका वाचक है, उसे सच्चिदानन्दस्वरूप ही समझना चाहिये । मन्त्रका अन्तिम
५५० ⁓ श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् ⁓ [ खण्ड १ भाग जो 'नम' पद है, उसे भी पूर्णानन्दैकविग्रह परमात्म- ज्ञात होता है। वह मानो सम्पूर्ण यज्ञोंके द्वारा भगवान्का स्वरूप ही जानना चाहिये। सम्पूर्ण देवता और मुमुक्षु पुरुष यजन कर लेता है। उसके द्वारा इतिहास-पुराणोंका तथा सदा अपने हृदयमें उसको नमन करते रहते हैं। रुद्र-मन्त्रोंका लक्ष बार जप सम्पन्न हो जाता और उसका फल भी जो श्रीरामचन्द्रके इस षडक्षर मन्त्रराज ('रां रामाय नमः') उसे मिलता है। प्रणवका तो मानो वह सौ अरब जप कर लेता का प्रतिदिन नियमपूर्वक जप करता है, वह अग्निमें तपाकर है। वह अपने पूर्वकी तथा भावी दस दस पीढ़ियोंको पवित्र शुद्ध किया हुआ हो जाता है। वह वायु, सूर्य, चन्द्रमा, कर देता है। वह (समस्त पापोंसे छूटकर) पङ्क्तिपावन बन ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र देवताके द्वारा भी पवित्र कर दिया जाता है। वह महान् हो जाता है और वह अमृतत्वको प्राप्त जाता है। वह सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा 'ब्रह्मवेत्ता' रूपसे होता है।
॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
रोग और मृत्युको तप समझनेसे महान् लाभ एतद् वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परमं हैव लोकं जयति, य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद। (बृहदारण्यक० ५ । ११ । १) ज्वरादि व्याधियोंसे जो कष्ट होता है, उसको निश्चय ही परम तप समझे। जो ऐसा जानता है, वह परम लोक- को ही जीत लेता है। (तपकी भावनाके कारण शारीरिक कष्ट होते हुए भी दुःख नहीं होता और तपका फल प्राप्त होता है।) मृत मनुष्यको जो वनमें जलानेके लिये ले जाते हैं, उसको निश्चय ही परम तप समझे, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको जीत लेता है। मृतक मनुष्यको जो अग्निमें जलाते हैं वह भी निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। (मृत्युमें तपकी भावनासे मरण-कष्ट नहीं होता और अन्तमें मनमें तपरूप परमात्मा- की स्मृति रहनेसे दिव्य धाम या परमात्माकी प्राप्ति होती है।)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ अथर्ववेदीय गोपालपूर्व ाप न्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम उपनिषद् श्रीकृष्णका परब्रह्मत्व, उनका ध्यान करनेयोग्य रूप तथा अष्टादशाक्षर मन्त्र ॐ कृषिर्भूवाचक शब्दो नश्च निर्वृत्तिवाचकः । लेनेसे यह सब कुछ पूर्णतः ज्ञात हो जाता है । ‘स्वाहा’ इस तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥ माया-शक्तिसे ही प्रेरित होकर यह सम्पूर्ण विश्व आवागमनके ॐ सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे । चक्रमें पड़ा रहता है” ॥ ३ ॥ नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥ १ ॥ तब मुनियोंने पूछा—‘श्रीकृष्ण कौन हैं ? और वे गोविन्द ॐ ‘कृष्’ शब्द सत्ताका वाचक है और ‘न’ शब्द कौन हैं ? गोपीजन वल्लभ कौन हैं ? और वह स्वाहा आनन्दका। इन दोनोंकी जहाँ एकता है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप कौन है ?’ ॥ ४ ॥ परब्रह्म ही ‘कृष्ण’ इस नामसे प्रतिपादित होता है। ॐ अनायास ही सब कुछ कर सकनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप यह सुनकर ब्रह्माजीने उन मुनियोंसे कहा—‘‘पापोंका श्रीकृष्णको, जो वेदान्तद्वारा जानने योग्य, सबकी बुद्धिके अपकर्षण ( अपहरण ) करनेवाले ‘कृष्ण’, गौ, भूमि तथा साक्षी तथा सम्पूर्ण जगत्के गुरु हैं, सादर नमस्कार है ॥ १ ॥ वेदवाणीके ज्ञातारूपसे प्रसिद्ध सर्वज्ञ ‘गोविन्द’, गोपीजन ( जीव समुदाय ) की अविद्या-कलाके निवारक अथवा अपनी ही हरिः ॐ । एक समयकी बात है, मुनियोंने सुप्रसिद्ध अन्तरङ्गा शक्तिरूप व्रज सुन्दरियोंमें सब ओरसे सम्पूर्ण विद्याओं देवता ब्रह्माजीसे पूछा—‘कौन सबसे श्रेष्ठ देवता है ? किससे एव चौसठ कलाओंका ज्ञान भर देनेवाले ‘गोपीजनवल्लभ’ मृत्यु भी डरती है ? किसके तत्त्वको भलीभाँति जान लेनेसे तथा इनकी मायाशक्ति ‘स्वाहा’—यह सब कुछ वह परब्रह्म सब कुछ पूर्णत ज्ञात हो जाता है ? किसके द्वारा प्रेरित होकर ही है। इस प्रकार उस श्रीकृष्ण नामसे प्रसिद्ध परब्रह्मका जो यह विश्व आवागमनके चक्रमें पड़ा रहता है ?’ ॥ २ ॥ ध्यान करता है, जप आदिके द्वारा उनके नामामृतका रसास्वादन करता है तथा उनके भजनमें लगा रहता है, वह अमृत- इन प्रश्नोंके उत्तरमें वे प्रसिद्ध ब्रह्माजी इस प्रकार बोले— स्वरूप होता है, अमृतस्वरूप होता है ( अर्थात् भगवद्भावको “निश्चय ही ‘श्रीकृष्ण’ सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। ‘गोविन्द’से मृत्यु ही प्राप्त हो जाता है )” ॥ ५-६ ॥ भी डरती है। ‘गोपीजन-वल्लभ’के तत्त्वको भलीभाँति जान
५५२ * गोपालपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २
तब उन मुनियोंने पुन. प्रश्न किया—'भगवन् ! श्रीकृष्ण- का ध्यान करनेयोग्य रूप कैसा है ? उनके नामामृतका रसास्वादन कैसे होता है ? तथा उनका भजन किस प्रकार किया जाता है ? यह सब हम जानना चाहते हैं, अतः हमें बताइये' ॥ ७ ॥ तब वे हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी स्पष्ट शब्दोंमें उत्तर देते हुए बोले, 'भगवान्का ध्यान करनेयोग्य रूप इस प्रकार है— ग्वाल-बालका सा उनका वेष है, नूतन जलधरके समान श्याम वर्ण है, किशोर अवस्था है तथा वे दिव्य कल्पवृक्षके नीचे विराज रहे हैं।' इसी विषयमे यहाँ ये श्लोक भी हैं—॥ ८ व ९ ॥ सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम् ॥ गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रितम् । दिव्यालङ्करणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ कालिन्दीजलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयन्चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृते ॥ भगवान्के नेत्र विकसित श्वेत कमलके समान परम सुन्दर हैं, उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति मेघके समान श्याम है, वे विद्युत्- के सदृश तेजोमय पीताम्बर धारण किये हुए हैं, उनकी दो भुजाएँ हैं, वे ज्ञानकी मुद्रामें स्थित हैं, उनके गलेमें पैरौतक लबी वनमाला शोभा पा रही है, वे ईश्वर हैं—ब्रह्मा आदि देवताओंपर भी शासन करनेवाले हैं, गोपों तथा गोप सुन्दरीयों- द्वारा वे चारों ओरसे घिरे हुए हैं, कल्पवृक्षके नीचे वे स्थित हैं, उनका श्रीविग्रह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित है, रत्न सिंहासन- पर रत्नमय कमलके मध्यभागमें वे विराजमान हैं। कालिन्दी- सलिलसे उठती हुई चञ्चल लहरोंको चूमकर बहनेवाली शीतल-मन्द सुगन्ध वायु भगवान्की सेवा कर रही है। इस रूपमे भगवान् श्रीकृष्णका मनमे चिन्तन करनेवाला भक्त संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ १०-१२ ॥ अब पुन उनके नामामृतके ग्नास्वादन तथा मन्त्र-जपका प्रकार बतलाते हैं—॥ १३ ॥ जलवाचक 'क्', भूमिता बीज 'ल्', 'ई', तथा चन्द्रमा- के समान आकार धारण करनेवाला अनुस्वार—इन सबका समुदाय है—'क्लीं', यही काम बीज है। इसके आदिमे रखकर 'कृष्णाय' पदका उच्चारण करे। यह 'क्लीं कृष्णाय' सम्पूर्ण मन्त्रका एक पद है। 'गोविन्दाय' यह दूसरा पद है। 'गोपीजन' यह तीसरा पद है। 'वल्लभाय' यह चौथा पद है और 'स्वाहा' यह पाँचवाँ पद है। पाँच पदोका यह 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' मन्त्र 'पञ्चपदी' कहलाता है। आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि— इन सबका प्रकाशक अथवा स्वरूप होनेके कारण यह चिन्मय मन्त्र पाँच अङ्गोंसे युक्त है। अतः— क्लीं कृष्णाय दिवात्मने हृदयाय नम । गोविन्दाय भूम्यात्मने शिरसे स्वाहा। गोपीजनसूर्यात्मने शिखायै वषट् । वल्लभाय चन्द्रात्मने कवचाय हुम्। स्वाहा अग्न्यात्मनेऽस्त्राय फट् । —इस प्रकार पञ्चाङ्गन्यास करके इस पाँच पद और पाँच अङ्गोवाले मन्त्रका जप करनेवाला साधक मन्त्रात्मक होनेसे परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होता है, परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होता है॥ १४ ॥
द्वितीय उपनिषद् श्रीकृष्णोपासनाकी विधि तथा यन्त्र-निर्माणका प्रकार
इस विषयमें यह श्लोक (मन्त्र) है—"जो उपासक 'क्लीं' इस कामबीजको आदिमें रखकर 'कृष्णाय' इस पदका, 'गोविन्दाय' इस पदका तथा 'गोपीजनवल्लभाय' इस पदका 'स्वाहा' सहित एक ही साथ उच्चारण करेगा, उसे शीघ्र ही श्रीकृष्ण-मिलनरूपा सद्गति प्राप्त होगी। उसके लिये दूसरी गति नहीं है।” इन श्रीकृष्ण भगवान्की भक्ति ही भजन है। उस भजनका स्वरूप है—इस लोक तथा परलोकके समस्त भोगोंकी कामनाका सर्वथा परित्याग करके इन श्रीकृष्णमें ही इन्द्रियोंसहित मनको लगा देना। यही नैष्कर्म्य (वास्तविक सन्यास) भी है। उन सचिदानन्द- मय भगवान् श्रीकृष्णका वेदज्ञ ब्राह्मण नाना प्रकारसे यजन करते हैं, 'गोविन्द' नामसे प्रसिद्ध उन भगवान्की अनेक प्रकारसे आराधना करते हैं। वे 'गोपीजनवल्लभ' (जीवमात्रके अकारण सुहृद् एव प्रियतम तथा गोप सुन्दरियोके प्राणाधार) श्यामसुन्दर ही सम्पूर्ण लोकोका पालन करते हैं और सम्यग्- रूप उत्तम वीर्यवाले उन भगवान्ने ही 'स्वाहा' (अपनी माया- शक्ति) का आश्रय लेकर जगत्को उत्पन्न किया है। जैसे सम्पूर्ण विश्वमे फैला हुआ एक ही वायुतत्त्व प्रत्येक शरीरके भीतर प्राण आदि पाँच रूपोंसे अभिव्यक्त हुआ है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण एक होते हुए भी इस उपर्युक्त मन्त्रमें
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