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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

३९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * घूमना *। वह प्राणोंका अधिपति जीवात्मा जबतक मुक्त नहीं हो जाता, तबतक अपने किये हुए कर्मोंसे प्रेरित होकर नाना लोकोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारकी योनियोंको ग्रहण करके इस संसार-चक्रमें घूमता रहता है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-जीवात्माका स्वरूप कैसा है, इस जिज्ञासापर कहते हैं— अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहंकारसमन्वितो यः । बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ ८॥ यः = जो; अङ्गुष्ठमात्रः = अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; रवितुल्यरूपः = सूर्यके समान प्रकाशस्वरूप, (तथा) संकल्पाहङ्कारसमन्वितः = सङ्कल्प और अहङ्कारसे युक्त है, बुद्धेः = बुद्धिके; गुणेन = गुणोंके कारण; च = और; आत्मगुणेन = अपने गुणोंके कारण; एव = ही; आराग्रमात्रः = आरेकी नोकके जैसे सूक्ष्म आकारवाला है, अपरः = ऐसा अपर (अर्थात् परमात्मासे भिन्न जीवात्मा), अपि = भी; हि = निःसन्देह, दृष्टः = (ज्ञानियोंद्वारा) देखा गया है ॥ ८ ॥ व्याख्या—मनुष्यका हृदय अँगूठेके नापका माना गया है और हृदयमें ही जीवात्माका निवास है। इसलिये उसे अङ्गुष्ठमात्र-अँगूठेके नापका कहा जाता है। उसका वास्तविक स्वरूप सूर्यकी भाँति प्रकाशमय (विज्ञानमय) है। उसे अज्ञानरूपी अन्धकार छूंतक नहीं गया है। वह सङ्कल्प और अहंकार-इन दोनोंसे युक्त हो रहा है, अतः सङ्कल्प आदि बुद्धि- के गुणोंसे अर्थात् अन्तःकरण और इन्द्रियोंके धर्मोंसे तथा अहंता, ममता और आसक्ति आदि अपने गुणोंसे सम्बद्ध होनेके कारण सूजेकी नोकके समान सूक्ष्म आकारवाला है और परमात्मासे भिन्न है। जीवके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंने गुणोंसे युक्त हुए जीवात्माका स्वरूप ऐसा ही देखा है †। तात्पर्य यह कि आत्माका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त सूक्ष्म है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म जड पदार्थ उसकी तुलनामें स्थूल ही ठहरता है। उसकी सूक्ष्मता किसी भी जड पदार्थके परिमाणसे नहीं मापी जा सकती। केवल उसका लक्ष्य करानेके लिये उसे सम्बद्ध वस्तुके आकारका बताया जाता है। हृदय-देशमें स्थित होनेके कारण उसे अङ्गुष्ठपरिमाण कहा जाता है और बुद्धिगुण तथा आत्मगुणोंके सम्बन्धसे उसे सूजेकी नोकके आकारका बताया जाता है। बुद्धि आदिको सूईकी नोकके समान कहा गया है, इसीसे जीवात्माको यहाँ सूजेकी नोकके सदृश बताया गया है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-पूर्वमन्त्रमें जो जीवात्माका स्वरूप सूजेकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है, उसे पुन स्पष्ट करते हैं— वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९॥ वालाग्रशतभागस्य = बालकी नोकके सौवें भागके, च = पुन, शतधा = सौ भागोंमें, कल्पितस्य = कल्पना किये जानेपर, भागः = जो एक भाग होता है, सः = वही (उसीके बराबर), जीवः = जीवका स्वरूप, विज्ञेयः = समझना चाहिये; च = और, सः = वह, आनन्त्याय = असीम भाववाला होनेमे, कल्पते = समर्थ है ॥ ९ ॥ व्याख्या-पूर्वमन्त्रमें जीवात्माका स्वरूप सूजेकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है, उसको समझनेमें भ्रम हो सकता है, अतः उसे भलीभाँति समझानेके लिये पुनः इस प्रकार कहते हैं। मान लीजिये, एक बालकी नोकके हम सौ टुकड़े कर लें, फिर उसमेंसे एक टुकड़ेके पुनः सौ टुकड़े कर लें। वह जितना सूक्ष्म हो सकता है, अर्थात् बालकी नोकके दस हजार भाग करनेपर उसमेंसे एक भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, उसके समान जीवात्माका स्वरूप समझना चाहिये। यह कहना

  • छान्दोग्य उपनिषद्में ५। १०। २ से ८ तक और बृहदारण्यक ६। २। १५-१६ में इन तीन मार्गोंका वर्णन आया है। देवयान-मार्गसे जानेवाले ब्रह्मलोकतक जाकर वहाँसे लौटते नहीं, ब्रह्माके साथ ही मुक्त हो जाते हैं, पितृयानसे जानेवाले स्वर्गमें जाकर चिरकालतक वहाँके दिव्य सुखोंका उपभोग करते हैं और पुण्य क्षीण हो जानेपर पुन' मृत्युलोकमें ढकेल दिये जाते हैं, और तीसरे मार्गसे जानेवाले कीट-पतङ्गादि क्षुद्र योनियोंमें भटकते रहते हैं। † गीतामें भी कहा है कि एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले, शरीरमें स्थित रहनेवाले अथवा विषयोंको भोगनेवाले इस गुणान्वित जीवात्माको मूर्ख नहीं जानते, ज्ञानरूप नेत्रोंवाले ज्ञानी जानते हैं ( १५। १०)।
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९५ भी केवल उसकी सूक्ष्मताका लक्ष्य करानेके लिये ही है । वास्तवमें चेतन और सूक्ष्म वस्तुका स्वरूप जड और स्थूल वस्तुकी उपमासे नहीं समझाया जा सकता, क्योंकि बालकी नोकके दस हजार भागोंमेंसे एक भाग भी आकाशमें जितने देशको रोकता है, उतना भी जीवात्मा नहीं रोकता । चेतन और सूक्ष्म वस्तुका जड और स्थूल देहके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; वह सूक्ष्म होनेपर भी स्थूल वस्तुमें सर्वत्र व्याप्त रह सकता है । इसी भावको समझानेके लिये अन्तमें कहा गया है कि वह इतना सूक्ष्म होनेपर भी अनन्त भावसे युक्त होनेमें अर्थात् असीम होनेमें समर्थ है । भाव यह कि वह जड जगत्‌में सर्वत्र व्याप्त है । केवल बुद्धिके गुणोंसे और अपने अहंता, ममता आदि गुणोंसे युक्त होनेके कारण ही एकदेशीय बन रहा है ॥ ९ ॥ नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥१०॥ एषः = यह जीवात्मा; न = न, एव = तो; स्त्री = स्त्री है; न = न; पुमान् = पुरुष है, च = और; न = न; अयम् = यह, नपुंसकः एव = नपुंसक ही है, सः = वह; यत् यत् = जिस-जिस, शरीरम् = शरीरको, आदत्ते = ग्रहण करता है, तेन तेन = उस-उससे, युज्यते = संवद्ध हो जाता है ॥ १० ॥ व्याख्या—जीवात्मा वास्तवमें न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है । यह जब जिस शरीरको ग्रहण करता है, उस समय उससे संयुक्त होकर वैसा ही बन जाता है । जो जीवात्मा आज स्त्री है, वही दूसरे जन्ममें पुरुष हो सकता है; जो पुरुष है, वह स्त्री हो सकता है । भाव यह कि ये स्त्री, पुरुष और नपुंसक आदि भेद शरीरको लेकर हैं; जीवात्मा सर्वभेदशून्य है, सारी उपाधियोंसे रहित है ॥ १० ॥ सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर्ग्रासाम्बुवृष्ट्या चात्मविवृद्धिजन्म । कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसम्प्रपद्यते ॥११॥ सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैः = संकल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोहसे; च = तथा; ग्रासाम्बुवृष्ट्या = भोजन, जलपान और वर्षाके द्वारा, आत्मविवृद्धिजन्म = ( प्राणियोंके ) सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं; देही = यह जीवात्मा; स्थानेषु = भिन्न-भिन्न लोकोंमें; कर्मानुगानि = कर्मानुसार मिलनेवाले, रूपाणि = भिन्न-भिन्न शरीरोंको, अनुक्रमेण = क्रमसे, अभिसंप्रपद्यते = बार-बार प्राप्त होता रहता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टि—इन सबसे सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं । इसका एक भाव तो यह है कि स्त्री-पुरुषके परस्पर मोहपूर्वक संकल्प, स्पर्श और दृष्टिपातके द्वारा सहवास होनेपर जीवात्मा गर्भमें आता है; फिर माताके भोजन और जलपानसे बने हुए रसके द्वारा उसकी वृद्धि होकर जन्म होता है । दूसरा भाव यह है कि भिन्न-भिन्न योनियोंमें जीवोंकी उत्पत्ति और वृद्धि भिन्न-भिन्न प्रकारसे होती है । किसी योनिमें तो संकल्पमात्र- से ही जीवोंका पोषण होता रहता है, जैसे कछुएके अंडोंका; किसी योनिमें आसक्तिपूर्वक स्पर्शसे होता है, जैसे पक्षियोंके अंडोंका, किसी योनिमें केवल आसक्तिपूर्वक दर्शनमात्रसे ही होता है, जैसे मछली आदिका; किसी योनिमें अन्नभक्षणसे और जलपानसे होता है, जैसे मनुष्य-पशु आदिका, और किसी योनिमें वृष्टिमात्रसे ही हो जाता है, जैसे वृक्ष-लता आदिका । इस प्रकार नाना प्रकारसे सजीव शरीरोंका पालन-पोषण, तुष्टि-पुष्टिरूप वृद्धि और जन्म होते हैं । जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उनका फल भोगनेके लिये इसी प्रकार विभिन्न लोकोंमें गमन करता हुआ एकके बाद एकके क्रमसे नाना शरीरोंको बार-बार धारण करता रहता है ॥ ११ ॥ सम्बन्ध—उसका बार-बार नाना योनियोंमें आवागमन क्यों होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं— स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति । क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥१२॥ देही = जीवात्मा, क्रियागुणैः = अपने कर्मोंके ( संस्काररूप ) गुणोंसे, च = तथा, आत्मगुणैः = शरीरके गुणोंसे ( युक्त होनेके कारण ), स्वगुणैः = अहंता ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर, स्थूलानि = स्थूल, च = और, सूक्ष्माणि =

३९६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

सूक्ष्म, बहूनि एव=बहुत-से; रूपाणि=रूपों (आकृतियों, शरीरों) को; वृणोति=स्वीकार करता है; तेषाम्=उनके; संयोगहेतुः=संयोगका कारण; अपरः=दूसरा; अपि=भी; दृष्टः=देखा गया है ॥ १२ ॥ व्याख्या-जीवात्मा अपने किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे और बुद्धि, मन, इन्द्रिय तथा पञ्चभूत-इनके समुदाय- रूप शरीरके धर्मोंसे युक्त होनेके कारण अहंता-ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर अनेकानेक शरीर धारण करता है । अर्थात् शरीरके धर्मोंमें अहंता-ममता करके तद्रूप हो जानेके कारण नाना प्रकारके स्थूल और सूक्ष्म रूपोंको स्वीकार करता है-अपने कर्मानुसार भिन्न भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है । परंतु इस प्रकार जन्म लेनेमें यह स्वतन्त्र नहीं है; इसके संकल्प और कर्मोंके अनुसार उन-उन योनियोंसे इसका सम्बन्ध जोड़नेवाला कोई दूसरा ही है । वे हैं पूर्वोक्त परमेश्वर, जिन्हें तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंने देखा है । वे इस रहस्यको भलीभाँति जानते हैं । यहाँ कर्मोंके संस्कारोंका नाम क्रिया-गुण है, समस्त तत्त्वोंके समुदायरूप शरीरकी देखना, सुनना, समझना आदि शक्तियोंका नाम आत्मगुण है और इनके सम्बन्धसे जीवात्मामें जो अहंता, ममता, आसक्ति आदि आ जाते हैं-उनका नाम स्वगुण है ॥ १२ ॥ सम्बन्ध-अनादिकालसे चले आने हुए इस जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटनेका क्या उपाय है, इस जिज्ञासापर कहा जाता है- अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ कलिलस्य=कलिल (दुर्गम संसार) के; मध्ये=भीतर व्याप्त; अनाद्यनन्तम्=आदि-अन्तसे रहित; विश्वस्य स्रष्टारम्=समस्त जगत्की रचना करनेवाले; अनेकरूपम्=अनेकरूपधारी; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्= समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरे हुए; एकम्=एक (अद्वितीय); देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥ व्याख्या-पूर्वेमन्त्रमें जिनको इस जीवात्माका नाना योनियोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाला बताया गया है, जो अन्तर्यामी- रूपसे मनुष्यके हृदयरूप गुहामें स्थित तथा निराकाररूपसे इस समस्त जगत्‌में व्याप्त हैं, जिनका न तो आदि है और न अन्त ही है अर्थात् जो उत्पत्ति, विनाश और वृद्धि-क्षय आदि सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य-सदा एकरस रहनेवाले हैं, तथापि जो समस्त जगत्‌की रचना करके विविध जीवोंके रूपमें प्रकट होते हैं और जिन्होंने इस समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेर रक्खा है, उन एकमात्र सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्, सबका शासन करनेवाले, सर्वेश्वर परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानकर यह जीवात्मा सदाके लिये समस्त बन्धनोंसे सर्वथा छूट जाता है ॥ १३ ॥ सम्बन्ध-अब अध्यायके उपसहारमें ऊपर कही हुई बातको पुन स्पष्ट करते हुए परमात्माकी प्राप्तिका उपाय बताया जाता है- भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥१४॥ भावग्राह्यम्=श्रद्धा और भक्तिके भावसे प्राप्त होने योग्य; अनीडाख्यम्=आश्रयरहित कहे जानेवाले; (तथा) भावाभावकरम्=जगत्‌की उत्पत्ति और सहार करनेवाले; शिवम्=कल्याणस्वरूप; (तथा) कलासर्गकरम्= सोलह कलाओंकी रचना करनेवाले; देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ये=जो साधक; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; तनुम्= शरीरको; (सदाके लिये) जहुः=त्याग देते हैं-जन्म-मृत्युके चक्करसे छूट जाते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म परमेश्वर आश्रयरहित अर्थात् शरीररहित हैं, यह प्रसिद्ध है, तथा वे जगत्‌की उत्पत्ति और सहार करनेवाले तथा (प्रश्नोपनिषद् ६।६।४ में बतायी हुई) सोलह कलाओंको भी उत्पन्न करनेवाले हैं। ऐसा होनेपर भी वे कल्याणस्वरूप आनन्दमय परमेश्वर श्रद्धा, भक्ति और प्रेमभावसे पकड़े जा सकते हैं, जो मनुष्य उन परमदेव परमेश्वरको जान लेते हैं, वे शरीरसे अपना सम्बन्ध सदाके लिये छोड़ देते हैं अर्थात् इस संसार-चक्रसे सदाके लिये छूट जाते हैं।

॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९७ इस रहस्यको समझकर मनुष्यको जितना शीघ्र हो सके, उन परम सुहृद्, परम दयालु, परम प्रेमी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वेश्वर परमात्माको जानने और पानेके लिये व्याकुल हो श्रद्धा और भक्तिभावसे उनकी आराधनामें लग जाना चाहिये ॥१४॥ ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥ ❖ अध्याय स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥ एके = कितने ही; कवयः = बुद्धिमान् लोग; स्वभावम् = स्वभावको; वदन्ति = जगत्का कारण बताते हैं; तथा = उसी प्रकार; अन्ये = कुछ दूसरे लोग; कालम् = कालको जगत्का कारण बतलाते हैं; [ एते ] परिमुह्यमानाः [ सन्ति ] = ( वास्तवमे ) ये लोग मोहग्रस्त हैं (अतः वास्तविक कारणको नहीं जानते ), तु = वास्तवमे तो; एषः = यह; देवस्य = परमदेव परमेश्वरकी, लोके = समस्त जगत्में फैली हुई, महिमा = महिमा है; येन = जिसके द्वारा; इदम् = यह; ब्रह्मचक्रम् = ब्रह्मचक्र; भ्राम्यते = घुमाया जाता है ॥ १ ॥ व्याख्या—कितने ही बुद्धिमान् लोग तो कहते हैं कि इस जगत्का कारण स्वभाव है। अर्थात् पदार्थोंमें जो स्वाभाविक शक्ति है—जैसे अग्निमें प्रकाशन-शक्ति और दाह-शक्ति, वही इस जगत्का कारण है। कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि काल ही जगत्का कारण है, क्योंकि समयपर ही वस्तुगत शक्तिका प्राकट्य होता है, जैसे वृक्षमें फल आदि उत्पन्न करनेकी शक्ति समयपर ही प्रकट होती है। इसी प्रकार स्त्रियोंमें गर्भाधान ऋतुकालमें ही होता है, असमयमें नहीं होता—यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। परंतु अपनेको पण्डित समझनेवाले ये वैज्ञानिक मोहमें पड़े हुए हैं, अतः ये इस जगत्के वास्तविक कारणको नहीं जानते। वास्तवमे तो यह परमदेव सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ही महिमा है, जगत्की विचित्र रचनाको देखने और उसपर विचार करनेपर उन्हींका महत्त्व प्रकट होता है। वे स्वभाव और काल आदि समस्त कारणोंके अधिपति हैं और उन्हींके द्वारा यह संसार-चक्र घुमाया जाता है। इस रहस्यको समझकर इस चक्रसे छुटकारा पानेके लिये उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। संसार-चक्रकी व्याख्या १। ४ में की गयी है ॥ १ ॥ येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २ ॥ येन = जिस परमेश्वरसे; इदम् = यह, सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्; नित्यम् = सदा; आवृतम् = व्याप्त है, यः = जो, ज्ञः = ज्ञानस्वरूप परमेश्वर; हि = निश्चय ही; कालकालः = कालका भी महाकाल; गुणी = सर्वगुणसम्पन्न, (और) सर्वविद्यः = सबको जाननेवाला है, तेन = उससे; ह = ही, ईशितम् = शासित हुआ, कर्म = यह जगत्रूप कर्म, विवर्तते = विभिन्न प्रकारसे यथायोग्य चल रहा है, (और ये) पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि = पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश भी ( उसीके द्वारा शासित होते हैं); [ इति = इस प्रकार, ] चिन्त्यम् = चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ व्याख्या—जिन जगन्नियन्ता जगदाधार परमेश्वरसे यह सम्पूर्ण जगत् सदा—सभी अवस्थाओंमें सर्वथा व्याप्त है, जो कालके भी महाकाल हैं—अर्थात् जो कालकी सीमासे परे हैं, जो ज्ञानस्वरूप चिन्मय परमात्मा सुहृदता आदि समस्त दिव्य गुणोंसे नित्य सम्पन्न हैं, समस्त गुण जिनके स्वरूपभूत और चिन्मय हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डोंको भली प्रकारसे जानते हैं, उन्हींका चलाया हुआ यह जगत्-चक्र नियमपूर्वक चल रहा है। वे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंपर शासन करते हुए इनको अपना-अपना कार्य करनेकी शक्ति देकर इनसे कार्य करवाते हैं। उनकी शक्तिके बिना ये कुछ भी नहीं कर सकते, यह बात केनोपनिषद्में यक्षके आख्यानद्वारा भलीभाँति समझायी गयी है। इस रहस्यको समझकर मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका उपर्युक्तभावसे चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयस्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम् । एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मः ॥ ३ ॥

३९८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * (परमात्माने ही) तत्=उस (जडतत्त्वोंकी रचनारूप), कर्म=कर्मको; कृत्वा=करके; विनिवर्त्य=उसका निरीक्षण कर, भूयः=फिर; तत्त्वस्य=चेतन तत्त्वका, तत्त्वेन=जड तत्त्वसे, योगम्=सयोग; समेत्य=कराके, वा=अथवा यों समझिये कि, एकेन=एक (अविद्या) से, द्वाभ्याम्=दो (पुण्य और पापरूप कर्मों) से, त्रिभिः=तीन गुणोंसे; च=और, अष्टभिः=आठ प्रकृतियोंके साथ, च=तथा, कालेन=कालके साथ, एव=और, सूक्ष्मैः आत्मगुणैः= आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंके साथ, [ एव=भी, ] [ योगम् समेत्य=इस जीवका सम्बन्ध कराके ] (इस जगत्की रचना की है) ॥ ३ ॥ व्याख्या—परमेश्वरने ही अपनी शक्तिभूता मूलप्रकृतिसे पाँचों स्थूल महाभूत आदिकी रचनारूप कर्म करके उसका निरीक्षण किया, फिर जड तत्त्वके साथ चेतन तत्त्वका सयोग कराके नाना रूपोंमें अनुभव होनेवाले विचित्र जगत्की रचना की।* अथवा इस प्रकार समझना चाहिये कि एक अविद्या, दो पुण्य और पापरूप सचित कर्म-सस्कार, सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण और एक काल तथा मन, बुद्धि, अहकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृतिभेद, इन सनसे तथा अहता, ममता, आसक्ति आदि आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंसे जीवात्माका सम्बन्ध कराके इस जगत्की रचना की । इन दोनों प्रकारके वर्णनोंका तात्पर्य एक ही है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—इस रहस्यको समझकर साधकको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है— आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः । तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥४॥ यः=जो साधक; गुणान्वितानि=सत्त्वादि गुणोंसे व्याप्त; कर्माणि=कर्मोंको, आरभ्य=आरम्भ करके; (उनको) च=तथा, सर्वान्=समस्त, भावान्=भावोंको; विनियोजयेत्=परमात्मामें लगा देता है—उसीके समर्पण कर देता है, (उसके इस समर्पणसे) तेषाम्=उन कर्मोंका, अभावे=अभाव हो जानेपर; (उस साधकके) कृतकर्मनाशः=पूर्वसंचित कर्म-समुदायका भी सर्वथा नाश हो जाता है, कर्मक्षये=(इस प्रकार) कर्मोंका नाश हो जानेपर, सः=वह साधक; याति=परमात्माको प्राप्त हो जाता है, (क्योंकि वह जीवात्मा) तत्त्वतः= वास्तवमें, अन्यः=समस्त जड-समुदायसे भिन्न (चेतन) है ॥ ४ ॥ व्याख्या—जो कर्मयोगी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे व्याप्त अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुकूल कर्तव्यकर्मोंका आरम्भ करके उनको और अपने सब प्रकारके अहता, ममता, आसक्ति आदि भावोंको उस परब्रह्म परमेश्वरमें लगा देता है, उनके समर्पण कर देता है, उस समर्पणसे उन कर्मोंके साथ साधकका सम्बन्ध न रहनेके कारण वे उसे फल नहीं देते । इस प्रकार उनका अभाव हो जानेसे पहले किये हुए सचित कर्म-सस्कारोंका भी सर्वथा नाश हो जाता है। इस प्रकार कर्मोंका नाश हो जानेसे वह तुरत परमात्माको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि यह जीवात्मा वास्तवमें जड-तत्त्वसमुदायसे सर्वथा भिन्न एव अत्यन्त विलक्षण है। उनके साथ इसका सम्बन्ध अज्ञानजनित अहता-ममता आदिके कारण ही है, स्वाभाविक नहीं है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—कर्मयोगका वर्णन करके अब उपासनारूप दूसरा साधन बताया जाता है— आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः। तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥ ५॥ सः=वह, आदिः=आदि कारण (परमात्मा), त्रिकालात् परः=तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत; (एव) अकलः= कलारहित (होनेपर), अपि=भी, संयोगनिमित्तहेतुः=प्रकृतिके साथ जीवका सयोग करानेमें कारणोंका भी कारण; दृष्टः=देखा गया है, स्वचित्तस्थम्=अपने अन्तःकरणमें स्थित; तम्=उस; विश्वरूपम्=सर्वरूप, (एव) भवभूतम्=

  • इसका वर्णन तैत्तिरीय उपनिषद् (ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक १ और ६) में, ऐतरेयोपनिषद् (अध्याय १ के तीनों खण्डों) में, छान्दोग्योपनिषद् (अध्याय ६, खण्ड २-३) में और बृहदारण्यकोपनिषद् (अध्याय १, ब्राह्मण २ ) में भी विस्तारपूर्वक आया है।
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९९ जगत्रूपमें प्रकट, ईड्यम्=स्तुति करने योग्य, पूर्वम्=पुराणपुरुष, देवम् उपास्य=परम देव (परमेश्वर) की उपासना करके (उसे प्राप्त करना चाहिये) ॥ ५ ॥ व्याख्या-वे समस्त जगत्‌के आदि कारण सर्वशक्तिमान् परमेश्वर तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत हैं। उनमें कालका कोई भेद नहीं है, भूत और भविष्य भी उनकी दृष्टिमें वर्तमान ही है। वे (प्रश्नोपनिषद्‌में बतायी हुई) सोलह कलाओंसे रहित होनेपर भी अर्थात् संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित होते हुए भी प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेवाले कारणके भी कारण हैं। यह बात इस रहस्यको जाननेवाले ज्ञानी महापुरुषोंद्वारा देखी गयी है। वे ही एकमात्र स्तुति करने योग्य हैं। उन्हें ढूँढनेके लिये कहीं दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है। वे हमारे हृदयमें ही स्थित हैं। इस बातपर दृढ विश्वास करके सब प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा जगत्रूपमें प्रकट हुए, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान् परम देव पुराणपुरुष परमेश्वरकी उपासना करके उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब ज्ञानयोगरूप तीसरा साधन बताया जाता है- स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम् । धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥ यस्मात्=जिससे, अयम्=यह; प्रपञ्चः=प्रपञ्च (संसार); परिवर्तते=निरन्तर चलता रहता है, सः=वह (परमात्मा); वृक्षकालाकृतिभिः=इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे, परः=सर्वथा अतीत; (एव) अन्यः=भिन्न है; (उस) धर्मावहम्=धर्मकी वृद्धि करनेवाले, पापनुदम्=पापका नाश करनेवाले, भगेशम्=सम्पूर्ण ऐश्वर्यके अधिपति; (तथा) विश्वधाम=समस्त जगत्‌के आधारभूत परमात्माको, आत्मस्थम्=अपने हृदयमें स्थित; ज्ञात्वा=जानकर, (साधक) अमृतम् [प्रति]=अमृतस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-जिनकी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे यह प्रपञ्चरूप संसार निरन्तर घूम रहा है-प्रवाहरूपसे सदा चलता रहता है, वे परमात्मा इस संसार-वृक्ष, काल और आकृति आदिसे सर्वथा अतीत और भिन्न हैं। अर्थात् वे संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित, कालका भी ग्रास कर जानेवाले एव आकाररहित हैं। तथापि वे धर्मकी वृद्धि एव पापका नाश करनेवाले, समस्त ऐश्वर्योंके अधिपति और समस्त जगत्‌के आधार हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींके आश्रित है, उन्हींकी सत्तासे टिका हुआ है। अन्तर्यामीरूपसे वे हमारे हृदयमें भी हैं। इस प्रकार उन्हें जानकर ज्ञानयोगी उन अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥६॥ सम्बन्ध-पहले अध्यायमें जिनका वर्णन आया है, वे ध्यानके द्वारा प्रत्यक्ष करनेवाले महात्मालोग कहते हैं- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥ तम्=उस, ईश्वराणाम्=ईश्वरोंके भी; परमम्=परम, महेश्वरम्=महेश्वर, देवतानाम्=सम्पूर्ण देवताओंके, च=भी; परमम्=परम, दैवतम्=देवता, पतीनाम्=पतियोंके भी, परमम्=परम, पतिम्=पति, (तथा) भुवनेशम्= समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी, (एव) ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य, तम्=उस, देवम्=प्रकाशस्वरूप परमात्माको, (हमलोग) परस्तात्=सबसे परे, विदाम=जानते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म पुरुषोत्तम समस्त ईश्वरोंके-लोकपालोंके भी महान् शासक हैं, अर्थात् वे सब भी उन महेश्वरके अधीन रहकर जगत्‌का शासन करते हैं। समस्त देवताओंके भी वे परम आराध्य हैं, समस्त पतियों-रक्षकोंके भी परम पति हैं तथा समस्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी हैं। उन स्तुति करनेयोग्य प्रकाशस्वरूप परम देव परमात्माको हमलोग सबसे पर जानते हैं। उनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ और कोई नहीं है। वे ही इस जगत्‌के सर्वश्रेष्ठ कारण हैं और वे सर्वरूप होकर भी सबसे सर्वथा पृथक हैं ॥ ७ ॥ न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ८॥

३०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तस्य=उसके; कार्यम्= (शरीररूप) कार्य; च=और; करणम्=अन्तःकरण तथा इन्द्रियरूप करण; न=नहीं; विद्यते=है, अभ्यधिकः=उससे बढ़ा, च=और; तत्समः= उसके समान; च=भी; (दूसरा) न=नहीं; दृश्यते= दीखता; च=तथा; अस्य=इस परमेश्वरकी; ज्ञानबलक्रिया=ज्ञान, बल और क्रियारूप; स्वाभाविकी=स्वाभाविक; परा=दिव्य; शक्तिः=शक्ति; विविधा=नाना प्रकारकी; एव=ही; श्रूयते=सुनी जाती है ॥ ८ ॥ व्याख्या-उन परब्रह्म परमात्माके कार्य और करण-शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं। अर्थात् उनमें देह, इन्द्रिय आदिका भेद नहीं है। तीसरे अध्यायमें यह बात विस्तारपूर्वक बतायी गयी है कि वे इन्द्रियोंके बिना ही समस्त इन्द्रियोंका व्यापार करते हैं। उनसे बड़ा तो दूर रहे, उनके समान भी दूसरा कोई नहीं दीखता; वास्तवमे उनसे भिन्न कोई है ही नहीं। उन परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वरूपभूत दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी सुनी जाती है ॥ ८ ॥ न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥९॥ लोके=जगत्में; कश्चित्=कोई भी, तस्य=उस परमात्माका; पतिः=स्वामी; न=नहीं; अस्ति=है; ईशिता= उसका शासक, च=भी; न=नहीं है; च=और; तस्य=उसका; लिङ्गम्=चिह्नविशेष भी; न एव=नहीं है; सः=वह; कारणम्=सबका परम कारण; (तथा) करणाधिपाधिपः=समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है; कश्चित्= कोई भी; न=न; च=तो; अस्य=इसका, जनिता=जनक है; च=और; न=न; अधिपः=स्वामी ही है ॥ ९॥ व्याख्या-जगत्में कोई भी उन परमात्माका स्वामी नहीं है। सभी उनके दास और सेवक हैं। उनका शासक- उनपर आज्ञा चलानेवाला भी कोई नहीं है। सब उन्हींकी आज्ञा और प्रेरणाका अनुसरण करते और उनके नियन्त्रणमें रहते हैं। उनका कोई चिह्नविशेष भी नहीं है, क्योंकि वे सर्वत्र परिपूर्ण, निराकार हैं। तथा वे सबके परम कारण-कारणोंके भी कारण और समस्त अन्तःकरण और इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके भी अधिपति-शासक हैं। इन परब्रह्म परमात्माका न तो कोई जनक-अर्थात् इन्हें उत्पन्न करनेवाला पिता है और न कोई इनका अधिपति ही है। ये अजन्मा, सनातन, सर्वथा स्वतन्त्र और सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ९ ॥ यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतो देव एकः स्वमावृणोत् । स नो दधाद्ब्रह्माप्ययम् ॥ १० ॥ तन्तुभिः=तन्तुओं द्वारा, तन्तुनाभः इव=मकड़ीकी भाँति; यः एकः देवः=जिस एक देव (परमात्मा) ने; प्रधानजैः=अपनी स्वरूपभूत मुख्य शक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योंद्वारा, स्वभावतः=स्वभावसे ही; स्वम्=अपनेको; आवृणोत्=आच्छादित कर रक्खा है; सः=वह परमेश्वर; नः=हमलोगोंको, ब्रह्माप्ययम्=अपने परब्रह्मरूपमे आश्रय; दधात्=दे ॥ १० ॥ व्याख्या-जिस प्रकार मकड़ी अपनेसे प्रकट किये हुए तन्तुजालसे स्वय आच्छादित हो जाती है-उसमें अपनेको छिपा लेती है, उसी प्रकार जिन एक देव परमपुरुष परमेश्वरने अपनी स्वरूपभूत मुख्य एव दिव्य अचिन्त्यशक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योंद्वारा स्वभावसे ही अपनेको आच्छादित कर रक्खा है, जिसके कारण संसारी जीव उन्हें देख नहीं पाते, वे सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा हमलोगोंको सबके परम आश्रयभूत अपने परब्रह्मस्वरूपमें स्थापित करें ॥ १० ॥ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥११॥ एकः=(वह) एक; देवः=देव ही; सर्वभूतेषु=सब प्राणियोंमें; गूढः=छिपा हुआ; सर्वव्यापी=सर्वव्यापी; (और) सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है; कर्माध्यक्षः=(वही) सबके कर्मोंका अधिष्ठाता; सर्वभूताधिवासः=सम्पूर्ण भूतोंका निवासस्थान, साक्षी=सबका साक्षी; चेता=चेतनस्वरूप, केवलः=सर्वथा विशुद्ध; च=और; निर्गुणः=गुणातीत है ॥ ११ ॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ दिया गया है:


श्वेताश्वतरोपनिषद्४०१ **व्याख्या—**वे एक ही परमदेव परमेश्वर समस्त प्राणियोके हृदयरूप गुहामे छिपे हुए हैं, वे सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमात्मा है। वे ही सबके कर्मोंके अधिष्ठाता—उनको कर्मानुसार फल देनेवाले और समस्त प्राणियोंके निवासस्थान—आश्रय हैं, तथा वे ही सबके साक्षी—शुभाशुभ कर्मको देखनेवाले, परम चेतनस्वरूप तथा सबको चेतना प्रदान करनेवाले, सर्वथा विशुद्ध अर्थात् निर्लेप और प्रकृतिके गुणोंसे अतीत है ॥ ११ ॥ एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१२॥ यः= जो; एकः= अकेला ही; बहूनाम्= बहुत-से; निष्क्रियाणाम्= वास्तवमें अक्रिय जीवोंका; वशी= शासक है; ( और ) एकम्= एक; बीजम् = प्रकृतिरूप बीजको; बहुधा = अनेक रूपोंमें परिणत; करोति = कर देता है; तम् = उस; आत्मस्थम् = हृदयस्थित परमेश्वरको; ये = जो; धीराः = धीर पुरुष; अनुपश्यन्ति = निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम् = उन्हींको; शाश्वतम् = सदा रहनेवाला; सुखम् = परमानन्द प्राप्त होता है; इतरेषाम् = दूसरोको; न = नहीं ॥ १२ ॥ **व्याख्या—**जो विशुद्ध चेतनस्वरूप परमेश्वरके ही अंग होनेके कारण वास्तवमे कुछ नहीं करते, ऐसे अनन्त जीवात्माओंके जो अकेले ही नियन्ता—कर्मफल देनेवाले है, जो एक प्रकृतिरूप बीजको बहुत प्रकारसे रचना करके इस विचित्र जगत्के रूपमे बनाते है; उन हृदयस्थित सर्वशक्तिमान् परम सुहृद् परमेश्वरको जो धीर पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, निरन्तर उन्हींमे तन्मय हुए रहते हैं; उन्हींको सदा रहनेवाला परम आनन्द प्राप्त होता है दूसरोको, जो इस प्रकार उनका निरन्तर चिन्तन नहीं करते, वह परमानन्द नहीं मिलता—वे उसमे वञ्चित रह जाते हैं ॥ १२ ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ यः = जो; एकः = एक; नित्यः = नित्य; चेतनः = चेतन ( परमात्मा ); बहूनाम् = बहुत से; नित्यानाम् = नित्य; चेतनानाम् = चेतन आत्माओंके; कामान् विदधाति = कर्मफलभोगोंका विधान करता है; तत् = उस; सांख्ययोगाधि- गम्यम् = ज्ञानयोग और कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य- कारणम् = सबके कारणरूप; देवम् = परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा = जानकर, ( मनुष्य ) सर्वपाशैः = समस्त बन्धनोसे; मुच्यते = मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥ **व्याख्या—**जो नित्य चेतन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा अकेले ही बहुत से नित्य चेतन जीवात्माओंके कर्मफल- भोगोका विधान करते है; जिन्होंने इस विचित्र जगत्की रचना करके समस्त जीवसमुदायके लिये उनके कर्मानुसार फलभोगकी व्यवस्था कर रक्खी है, उनको प्राप्त करनेके दो साधन हैं—एक ज्ञानयोग; दूसरा कर्मयोग; भक्ति दोनोंमें ही अनुस्यूत है; इस कारण उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। उन ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य सबके कारणरूप परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जो उन्हें जान लेता है और प्राप्त कर लेता है, वह कभी किसी भी कारणसे जन्म-मरणके बन्धनमे नहीं पड़ता। अतः मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको प्राप्त करनेके लिये अपनी योग्यता और रुचिके अनुसार ज्ञानयोग या कर्मयोग—किसी एक साधनमें तत्परतापूर्वक लग जाना चाहिये ॥ १३ ॥ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१४॥ तत्र = वहाँ; न = न तो; सूर्यः = सूर्य; भाति = प्रकाश फैला सकता है; न = न; चन्द्रतारकम् = चन्द्रमा और तारागणका समुदाय ही; ( और ) न = न; इमाः = ये; विद्युतः = बिजलियाँ ही; भान्ति = वहाँ प्रकाशित हो सकती हैं; अयम् = (फिर) यह; अग्निः = लौकिक अग्नि तो; कुतः = कैसे प्रकाशित हो सकता है, (क्योकि) तम् भान्तम् एव = उसके प्रकाशित होनेपर ही ( उसीके प्रकाशसे ), सर्वम् = बतलाये हुए सूर्य आदि सब; अनुभाति = उसके पीछे प्रकाशित होते हैं; तस्य = उसके; भासा = प्रकाशसे; इदम् = यह; सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्; विभाति = प्रकाशित होता है ॥ १४ ॥ उ० सं० ५१—

४०२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य अपना प्रकाश नहीं फैला सकता, जिस प्रकार सूर्यके प्रकाशित होनेपर जुगनूका प्रकाश लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार सूर्यका भी तेज वहाँ लुप्त हो जाता है । चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ अपना प्रकाश नहीं फैला सकते, फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है ! क्योंकि इस जगत्में जो कोई भी प्रकाशशील तत्त्व है, वे उन परम प्रकाशस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्रकाशशक्तिके किसी अंशको पाकर ही प्रकाशित होते हैं । फिर वे अपने प्रकाशकके समीप कैसे अपना प्रकाश फैला सकते हैं। अतः यही समझना चाहिये कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे ही प्रकाशित हो रहा है ॥ १४ ॥ एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१५॥ अस्य = इस, भुवनस्य = ब्रह्माण्डके; मध्ये = बीचमें, ( जो ) एकः = एक; हंसः = प्रकाशस्वरूप परमात्मा ( परिपूर्ण है ), सः एव = वही, सलिले = जलमें, संनिविष्टः = स्थित, अग्निः = अग्नि है, तम् = उसे, विदित्वा = जानकर; एव = ही, ( मनुष्य ) मृत्युम् अत्येति = मृत्युरूप संसार-समुद्रसे सर्वथा पार हो जाता है, अयनाय = दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये, अन्यः = दूसरा, पन्थाः = मार्ग, न = नहीं, विद्यते = है ॥ १५ ॥ व्याख्या—इस ब्रह्माण्डमे जो एक प्रकाशस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सर्वत्र परिपूर्ण हैं, वे ही जलमें प्रविष्ट अग्नि हैं । यद्यपि शीतल स्वभावयुक्त जलमे उष्णस्वभाव अग्निका होना साधारण दृष्टिसे समझमें नहीं आता, क्योंकि दोनोंका स्वभाव परस्पर विरुद्ध है, तथापि उसके रहस्यको जाननेवाले वैज्ञानिकोंको वह प्रत्यक्ष दीखता है, अतः वे उसी जलमेंसे बिजलीके रूपमे उस अग्नितत्त्वको निकालकर नाना प्रकारके कार्योंका साधन करते हैं । शास्त्रोंमें भी जगह-जगह यह बात कही गयी है कि समुद्रमें बड़वानल अग्नि है । अपने कार्यमें कारण व्याप्त रहता है—इस न्यायसे भी जलतत्त्वका कारण होनेसे तेजस्तत्त्व का जलमें व्याप्त होना उचित ही है । किंतु इस रहस्यको न जाननेवाला जलमें स्थित अग्निको नहीं देख पाता । इसी प्रकार परमात्मा इस जड जगत्से स्वभावत' सर्वथा विलक्षण हैं, क्योंकि वे चेतन, ज्ञानस्वरूप और सर्वज्ञ हैं तथा यह जगत् जड और ज्ञेय है । इस प्रकार जगत्से विरुद्ध दीखनेके कारण साधारण दृष्टिसे यह बात समझमें नहीं आती कि वे इसमें किस प्रकार व्याप्त हैं और किस प्रकार इसके कारण है । परंतु जो उन परब्रह्मकी अचिन्त्य अद्भुत शक्तिके रहस्यको समझते हैं, उनको वे प्रत्यक्षवत् सर्वत्र परिपूर्ण और सबके एकमात्र कारण प्रतीत होते हैं । उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको जानकर ही मनुष्य इस मृत्युरूप संसारसमुद्रसे पार हो सकता है—सदाके लिये जन्म मरणसे सर्वथा छूट सकता है । उनके दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। अतः हमें उन परमात्माका जिज्ञासु होकर उन्हें जाननेकी चेष्टामें लग जाना चाहिये ॥ १५ ॥ सम्बन्ध—जिनको जाननेसे जन्म-मरणसे छूटनेकी बात कही गयी है, वे परमेश्वर कैसे हैं—इस जिज्ञासापर उनके स्वरूपका वर्णन किया जाता है— स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥१६॥ सः = वह, ज्ञः = ज्ञानस्वरूप परमात्मा, विश्वकृत् = सर्वस्रष्टा, विश्ववित् = सर्वज्ञ, आत्मयोनिः = स्वयं ही अपने प्राकट्य- का हेतु, कालकालः = कालका भी महाकाल, गुणी = सम्पूर्ण दिव्यगुणोंसे सम्पन्न, (और ) सर्ववित् = सबको जाननेवाला है यः = जो; प्रधानक्षेत्रज्ञपतिः = प्रकृति और जीवात्माका स्वामी, गुणेशः = समस्त गुणोंका शासक, ( तथा ) संसारमोक्ष- स्थितिबन्धहेतुः = जन्म-मृत्युरूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है ॥ १६ ॥ व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे ज्ञानस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम सम्पूर्ण जगत्‌की रचना करनेवाले, सर्वज्ञ और स्वयं ही अपनेको प्रकट करनेमें हेतु हैं । उन्हें प्रकट करनेवाला कोई दूसरा कारण नहीं है। वे कालके भी महाकाल हैं, कालकी भी उनतक पहुँच नहीं है। वे कालातीत हैं। कठोपनिषद्‌में भी कहा है कि सबका संहार करनेवाला मृत्यु उन महाकालरूप परमात्मा- का उपसेचन—खाद्य है ( कठ० १।२।२४ ) । वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सौहार्द, प्रेम, दया आदि समस्त कल्याणमय दिव्य गुणोंसे

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ४०३

सम्पन्न हैं, संसारमें जितने भी शुभ गुण देखनेमें आते हैं, वे उन दिव्य गुणोंके किसी एक अंशकी झलक हैं। वे समस्त जीवोंको, उनके कर्मोंको और अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तीनों कालोंमें घटित होनेवाली छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी घटना- को भलीभाँति जानते हैं। वे प्रकृति और जीव समुदायके (अपनी अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके) स्वामी हैं, तथा कार्य-कारणरूपमें स्थित सत्त्व आदि तीनों गुणोंका यथायोग्य नियन्त्रण करते हैं। वे ही इस जन्म मृत्युरूप संसार-चक्रमें जीवोंको उनके कर्मानुसार बाँधकर रखते, उनका पालन पोषण करते और इस बन्धनसे जीवोंको मुक्त भी करते हैं। उनकी कृपासे ही जीव मुक्तिके साधनमे लगकर साधनके परिपक्व होनेपर मुक्त होते हैं ॥ १६ ॥ स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता। य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥ सः हि=वही, तन्मयः=तन्मय, अमृतः=अमृतरूप, ईशसंस्थः=ईश्वरों (लोकपालों) मे भी आत्मरूपसे स्थित, ज्ञः=सर्वज्ञ, सर्वगः=सर्वत्र परिपूर्ण, (और) अस्य=इस, भुवनस्य=ब्रह्माण्डका, गोप्ता=रक्षक है, यः=जो, अस्य= इस, जगतः=सम्पूर्ण जगत्‌का; नित्यम्=सदा, एव=ही, ईशे=शासन करता है, (क्योंकि) ईशनाय=इस जगत्‌पर शासन करनेके लिये, अन्यः=दूसरा कोई भी, हेतुः=हेतु, न=नहीं, विद्यते=है ॥ १७ ॥ व्याख्या—जिनके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमे वर्णन हुआ है, वे परब्रह्म परमेश्वर ही तन्मय—स्व-स्वरूपमें स्थित, अमृत- स्वरूप—एकरस हैं; इस जगत्‌के उत्पत्ति-विनाशरूप परिवर्तनसे उनका परिवर्तन नहीं होता। वे समस्त ईश्वरोंमें—समस्त लोकोंका पालन करनेके लिये नियुक्त किये हुए लोकपालोंमें भी अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे सर्वज्ञ, सर्वत्र परिपूर्ण परमेश्वर ही इस समस्त ब्रह्माण्डकी रक्षा करते हैं, वे ही इस सम्पूर्ण जगत्‌का सदा यथायोग्य नियन्त्रण और सञ्चालन करते हैं। दूसरा कोई भी इस जगत्‌पर शासन करनेके लिये उपयुक्त हेतु नहीं प्रतीत होता, क्योंकि दूसरा कोई भी सबपर शासन करनेमें समर्थ नहीं है ॥ १७ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त परमेश्वरको जानने और पानेके किये साधनके रूपमें उन्हींकी शरण लेनेका प्रकार बताया जाता है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥१८॥ यः=जो परमेश्वर, वै=निश्चय ही, पूर्वम्=सबसे पहले; ब्रह्माणम्=ब्रह्माको, विदधाति=उत्पन्न करता है, च=और, यः=जो, वै=निश्चय ही, तस्मै=उस ब्रह्माको, वेदान्=समस्त वेदोंका ज्ञान, प्रहिणोति=प्रदान करता है; तम् आत्मबुद्धिप्रकाशम्=उस परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले, ह देवम्=प्रसिद्ध देव परमेश्वरको, अहम्=मैं, मुमुक्षुः=मोक्षकी इच्छावाला साधक, शरणम्=शरणरूपमे, प्रपद्ये=ग्रहण करता हूँ ॥ १८ ॥ व्याख्या—उन परमेश्वरको प्राप्त करनेका सार्वभौम एव सुगम उपाय सर्वतोभावसे उन्हींपर निर्भर होकर उन्हींकी शरणमें चले जाना है। अतः साधकको मनके द्वारा नीचे लिखे भावका चिन्तन करते हुए परमात्माकी शरणमें जाना चाहिये । जो परमेश्वर निश्चय ही सबसे पहले अपने नाभि कमलमेसे ब्रह्माको उत्पन्न करते हैं, उत्पन्न करके उन्हें निःसन्देह समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करते हैं तथा जो अपने स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपने भक्तोंके हृदयमे तदनुरूप विशुद्ध बुद्धिको प्रकट करते हैं (गीता १०। १०), उन पूर्वमन्त्रोंमें वर्णित सर्वशक्तिमान् प्रसिद्ध देव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी मै मोक्षकी अभिलाषासे युक्त होकर शरण ग्रहण करता हूँ—वे ही मुझे इस संसार-बन्धनसे छुड़ायें ॥ १८ ॥ निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥१९॥ निष्कलम्=कलाओंसे रहित, निष्क्रियम्=क्रियारहित, शान्तम्=सर्वथा शान्त, निरवद्यम्=निर्दोष; निरञ्जनम्=निर्मल, अमृतस्य=अमृतके, परम्=परम; सेतुम्=सेतुरूप, (तथा) दग्धेन्धनम्=जले हुए ईंधनसे युक्त, अनलम् इव=अग्निकी भाँति (निर्मल ज्योतिःस्वरूप उन परमात्माका मैं चिन्तन करता हूँ ) ॥ १९ ॥

५०४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-निर्गुण-निराकार परमात्माकी उपासना करनेवाले साधकको इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये कि जो (पहले बतायी हुई) सोलह कलाओंसे अर्थात् संसारके सम्बन्धसे रहित, सर्वथा क्रियाशून्य, परम शान्त और सब प्रकारके दोषोंसे रहित है, जो अमृतस्वरूप मोक्षके परम सेतु है अर्थात् जिनका आश्रय लेकर मनुष्य अत्यन्त सुगमतापूर्वक इस संसार-समुद्रसे पार हो सकता है, जो लकड़ीका पार्थिव अंश जल जानेके बाद धधकते हुए अंगारोंवाली अग्निकी भाँति सर्वथा निर्विकार, निर्मल प्रकाशस्वरूप, ज्ञानस्वरूप परम चेतन हैं, उन निर्विशेष निर्गुण निराकार परमात्माको तत्त्वसे जाननेके लिये उन्हींको लक्ष्य बनाकर उनका चिन्तन करता हूँ ॥ १९ ॥ सम्बन्ध-पहले जो यह बात कही गयी थी कि इस संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये उन परमात्माको जान लेनेके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है, उसीको दृढ़ किया जाता है— यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥२०॥ यदा=जब; मानवाः=मनुष्यगण; आकाशम्=आकाशको; चर्मवत्=चमड़ेकी भाँति; वेष्टयिष्यन्ति=लपेट सकेंगे; तदा=तब; देवम्=उन परमदेव परमात्माको; अविज्ञाय=बिना जाने भी; दुःखस्य=दुःख-समुदायका; अन्तः=अन्त; भविष्यति=हो सकेगा ॥ २० ॥ व्याख्या-जिस प्रकार आकाशको चमड़ेकी भाँति लपेटना मनुष्यके लिये सर्वथा असम्भव है, सारे मनुष्य मिलकर भी इस कार्यको नहीं कर सकते; उसी प्रकार परमात्माको बिना जाने कोई भी जीव इस दुःख-समुद्रसे पार नहीं हो सकता। अतः मनुष्यको दुःखोंसे सर्वथा छूटने और निश्चल परमानन्दकी प्राप्तिके लिये अन्य सब ओरसे मनको हटाकर एकमात्र उन्हीं को जाननेके साधनमें तीव्र इच्छासे लग जाना चाहिये ॥ २० ॥ तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान्। अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम् ॥२१॥ ह=यह प्रसिद्ध है कि; श्वेताश्वतरः=श्वेताश्वतर नामक ऋषि; तपःप्रभावात्=तपके प्रभावसे, च=और; देवप्रसादात्=परमदेव परमेश्वरकी कृपासे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विद्वान्=जान सका; अथ=तथा; (उसने) ऋषिसङ्घ- जुष्टम्=ऋषि-समुदायसे सेवित; परमम्=परम; पवित्रम्=पवित्र (इस ब्रह्मतत्त्वका); अत्याश्रमिभ्यः=आश्रमके अभिमानसे अतीत अधिकारियोंको; सम्यक्=उत्तमरूपसे; प्रोवाच=उपदेश किया था ॥ २१ ॥ व्याख्या-यह बात प्रसिद्ध है कि श्वेताश्वतर ऋषिने तपके प्रभावसे अर्थात् समस्त विषय-सुखका त्याग करके संयम- मय जीवन बिताते हुए निरन्तर परमात्माके ही चिन्तनमें लगे रहकर उन परमदेव परमेश्वरकी अहैतुकी दयासे उन्हें जान लिया था। फिर उन्होंने ऋषि-समुदायसे सेवित—उनके परम लक्ष्य इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका आश्रमके अभिमानसे सर्वथा अतीत हुए देहाभिमानशून्य अधिकारियोंको भलीभाँति उपदेश किया था। इससे इस मन्त्रमें यह बात भी दिखला दी गयी कि देहाभिमानशून्य साधक ही ब्रह्मतत्त्वका उपदेश सुननेके वास्तविक अधिकारी हैं ॥ २१ ॥ वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्। नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥२२॥ [इदम्=यह;] परमम्=परम; गुह्यम्=रहस्यमय ज्ञान; पुराकल्पे=पूर्वकल्पमें; वेदान्ते=वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में; प्रचोदितम्=भलीभाँति वर्णित हुआ; अप्रशान्ताय=जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको; न दातव्यम्=इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; पुनः=तथा; अपुत्राय=जो अपना पुत्र न हो; वा= अथवा; अशिष्याय=जो शिष्य न हो; उसे; न (दातव्यम्)=नहीं देना चाहिये ॥ २२ ॥ व्याख्या-यह परम रहस्यमय ज्ञान पूर्वकल्पमें भी वेदके अन्तिम भाग—उपनिषदोंमें भलीभाँति वर्णित हुआ था। भाव

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ४०५ यह कि इस ज्ञानकी परम्परा कल्प कल्पान्तरसे चली आती है, यह कोई नयी बात नहीं है। इसका उपदेश किसे दिया जाय और किसे नहीं, ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—'जिसका अन्तःकरण विषय-वासनासे शून्य होकर सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको इस रहस्यका उपदेश नहीं देना चाहिये, तथा जो अपना पुत्र न हो अथवा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना चाहिये।' भाव यह है कि या तो जो सर्वथा शान्तचित्त हो, ऐसे अधिकारीको देना चाहिये अथवा जो अपना पुत्र या शिष्य हो, उसे देना चाहिये; क्योंकि पुत्र और शिष्यको अधिकारी बनाना पिता और गुरुका ही काम है, अतः वह पहलेसे ही अधिकारी हो, यह नियम नहीं है ॥ २२ ॥ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः। प्रकाशन्ते महात्मनः ॥२३॥ यस्य = जिसकी, देवे = परमदेव परमेश्वरमे; परा = परम, भक्तिः = भक्ति है; (तथा) यथा = जिस प्रकार; देवे = परमेश्वरमें है, तथा = उसी प्रकार, गुरौ = गुरुमे भी है, तस्य महात्मनः = उस महात्मा पुरुषके हृदयमे, हि = ही; एते = ये; कथिताः = बताये हुए, अर्थाः = रहस्यमय अर्थ, प्रकाशन्ते = प्रकाशित होते हैं, प्रकाशन्ते महात्मनः = उसी महात्माके हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ २३ ॥ व्याख्या-जिस साधककी परमदेव परमेश्वरमे परम भक्ति होती है तथा जिस प्रकार परमेश्वरमे होती है, उसी प्रकार अपने गुरुमे भी होती है, उस महात्मा—मनस्वी पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते ह । अतः जिज्ञासु- को पूर्ण श्रद्धालु और भक्त बनना चाहिये । जिसमे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति है, उसी महात्माके हृदयमे ये गूढ अर्थ प्रकाशित होते हैं। इस मन्त्रमे अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २३ ॥ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ छान्दोग्योपनिषद् यह उपनिषद् सामवेदकी तलवकार शाखाके अन्तर्गत छान्दोग्य ब्राह्मणका भाग है । छान्दोग्य ब्राह्मणमे कुल दस अध्याय हैं, उनमेंसे पहले और दूसरे अध्यायोंको छोड़कर शेष आठ अध्यायोंका नाम छान्दोग्योपनिषद् है । शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौ- पनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ केनोपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है । प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड ओंकारकी व्याख्या

ॐ-रूप इस अक्षरकी उद्गीथ शब्द-वाच्य परमात्माके रूपमे उपासना करनी चाहिये । क्योंकि यज्ञमें उद्गाता 'ॐ' इस अक्षरका ही सर्व प्रथम उच्चस्वरसे गान करता है। उस ओङ्कारकी व्याख्या आरम्भ की जाती है ॥ १ ॥ इन चराचर जीवोंका रस—आधार पृथ्वी है, पृथ्वीका रस—आधार अथवा कारण जल है, जलका रस—उसपर निर्भर करनेवाली ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस—उनसे पोषण पानेवाला मनुष्य शरीर है, मनुष्यका रस—प्रधान अङ्ग वाणी है, वाणीका रस—सार ऋचा * है, ऋचाका रस साम है और सामका रस उद्गीथ (ओंकार) है । इनमें जो आठवाँ (सबसे अन्तिम) रस उद्गीथरूप ओंकार है, वह समस्त रसोंमें उत्कृष्ट रस है, अतः यह सर्वश्रेष्ठ एव परब्रह्म परमात्माका धाम—आश्रय है । अब कौन-कौन ऋचा है, कौन कौन साम है तथा कौन कौन उद्गीथ है—यह विचार किया जाता है । वाणी ही ऋचा है, प्राण साम है, 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है । जो वाणी और प्राण तथा ऋचा और साम ह, यह एक ही जोड़ा है—दो नहीं हैं । अर्थात् वाणी अथवा ऋचा तथा प्राण अथवा साम एक दूसरेके पूरक हैं । वाणी और प्राणका अथवा ऋचा और सामका यह जोड़ा ॐ-रूप इस अक्षरमें भलीभाँति सयुक्त किया जाता है । जिस समय स्त्री और पुरुष आपसमे प्रेमपूर्वक मिलते हैं, उस समय वे अवश्य ही एक दूसरेकी कामना पूर्ण करते हैं । इसी प्रकार यह वाणी और प्राणका जोड़ा जब ओंकारमे लगाया जाता है, तब वह सदाके लिये पूर्णकाम—कृतकृत्य हो जाता है । इस रहस्यको जानने- वाला जो कोई उपासक इस उद्गीथस्वरूप अविनाशी परमेश्वरकी उपासना करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ होता है ॥ २-७ ॥ यह ॐ-रूप अक्षर अनुज्ञा अर्थात् अनुमतिसूचक भी है, क्योंकि मनुष्य जब किसी बातके लिये अनुमति देता है तब 'ओम्' इस शब्दका ही उच्चारण करता है । किसीको कुछ

  • जिनके अक्षर, पाद और समाप्ति—ये नियत सख्याके अनुसार होते हैं, उन मन्त्रोंको 'ऋक्' कहते हैं, जिनके अक्षर आदिकी कोई नियत सख्या या क्रम न हो, उन्हें 'यजु' कहते हैं । 'ऋक्' सज्ञक मन्त्रोंमें ही जो गीतप्रधान हैं—गाये जा सकते हैं, उनकी 'साम' सज्ञा है । साम-मन्त्रोंद्वारा विभिन्न देवताओंकी स्तुति की जाती है ।

खण्ड २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४०७ करनेके लिये जो यह अनुज्ञा—अनुमति देना है, वही समृद्धि— बड़प्पनका लक्षण है, अतः इस रहस्यको जाननेवाला जो साधक उद्गीथके रूपमें उस परम अक्षर परमात्माकी उपासना करता है, वह अपनी और दूसरोंकी समस्त कामनाओं—भोग्यवस्तुओं- को बढानेमें समर्थ होता है। ओंकारसे ही ऋक्, यजुः और साम—ये तीनों वेद अथवा इन तीनों वेदोंमें वर्णित यज्ञादि कर्म आरम्भ होते है। इस ओंकाररूप अक्षरकी अर्थात् इसके अर्थभूत अविनाशी परमात्माकी पूजा—प्रीतिकाके लिये, इसीकी महिमा (प्रभाव) एव रस (शक्ति) से 'ॐ' इस प्रकार कहकर 'अध्वर्यु' नामक ऋत्विक् 'आश्रावण' करता है—मन्त्र सुनाता है, 'ॐ' यों कहकर ही होता नामका ऋत्विक् 'शसन' करता है—मन्त्रोंका पाठ करता है और 'ॐ' यों कहकर ही 'उद्गाता' उद्गीथका गान करता है। जो इस रहस्यको इस प्रकार जानता है और जो नहीं जानता, दोनों इस ओंकारसे ही यज्ञादि कर्म करते हैं, परंतु जानना और न जानना दोनों अलग-अलग हैं । साधक जो कुछ भी श्रद्धापूर्वक, उसके वास्तविक रहस्यको बतानेवाली विद्याके द्वारा अर्थात् उसके तत्त्वको समझकर करता है, वही अधिक-से-अधिक सामर्थ्ययुक्त होता है। यही इस ओंकाररूप अक्षरकी प्रसिद्ध व्याख्या— उसकी महिमाका वर्णन है ॥ ८–१० ॥

द्वितीय खण्ड ओंकारकी आध्यात्मिक उपासना

यह प्रसिद्ध है कि प्रजापतिकी संतान—देवता और असुर दोनों जब आपसमें लड़ रहे थे, उसी समय देवताओंने उद्गीथ (ओंकार) को ध्येय बनाकर उसकी उपासनारूप यज्ञ किया। उनका उद्देश्य यह था कि 'इस अनुष्ठानद्वारा हमलोग इन असुरोंको परास्त कर देंगे।' उन्होंने नासिकामें रहनेवाले घ्राणेन्द्रियरूप प्राणको उद्गीथ बनाकर उपासना की। तब उस घ्राणेन्द्रियको असुरोंने राग-द्वेषरूप पापसे युक्त कर दिया। घ्राणेन्द्रिय राग-द्वेषसे युक्त है, इसीलिये उसके द्वारा यह जीव अच्छी और बुरी—दोनों प्रकारकी गन्धको ग्रहण करता है। तदनन्तर उन प्रसिद्ध देवताओंने उद्गीथरूपसे वाणीकी उपासना की। असुरोंने उसे भी राग द्वेषसे कलुषित कर दिया। वाणी राग-द्वेषसे कलुषित है, इसीलिये उसके द्वारा मनुष्य सत्य और झूठ दोनों बोलता है। इसके बाद देवताओंने उद्गीथरूपसे नेत्रकी उपासना की। उसे भी असुरोंने राग-द्वेषसे मलिन कर दिया। चक्षु-इन्द्रिय राग-द्वेषसे मलिन हो रही है, इसीलिये उसके द्वारा मनुष्य देखनेयोग्य और न देखनेयोग्य—शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके दृश्य देखता है। अबकी बार देवताओंने श्रोत्रकी उद्गीथरूपसे उपासना की। उसे भी असुरोंने राग द्वेषसे दूषित कर दिया। श्रोत्र इन्द्रिय राग- द्वेषसे दूषित है, इसीलिये मनुष्य उसके द्वारा सुननेयोग्य और न सुननेयोग्य—दोनों प्रकारके शब्द सुनता है। फिर देवताओंने मनकी उद्गीथरूपसे उपासना की। उसे भी असुरोंने राग- द्वेषसे अभिभूत कर दिया। मन राग-द्वेषसे अभिभूत है, इसीलिये उसके द्वारा मनुष्य मनमें लानेयोग्य और मनमें न लानेयोग्य—दोनो प्रकारके सकल्प करता है। तब देवताओं- ने जो यह मुख्य प्राण है, उसीकी उद्गीथरूपसे उपासना की। उसे भी असुरोंने राग द्वेषसे युक्त करना चाहा, परंतु उसके समीप जाते ही वे उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हो गये, जैसे खोदे न जा सकनेवाले सुदृढ पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला चूर-चूर हो जाता है। जिस प्रकार अच्छेद्य पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला छिन्न-भिन्न हो जाता है, ठीक वैसे ही वह मनुष्य भी विध्वस हो जाता है, जो उद्गीथका रहस्य जाननेवालेके विषयमें अहित कामना करता है तथा जो उसे पीड़ा पहुँचाता है, क्योंकि उद्गीथके रहस्यको जाननेवाला मनुष्य मानो अच्छेद्य पत्थर ही है ॥ १–८ ॥ प्राणके द्वारा मनुष्य न तो सुगन्धका अनुभव करता है और न दुर्गन्धका ही, क्योंकि इसके सम्पर्कमें आकर तो राग-द्वेष नष्ट हो जाते हैं। इसके द्वारा मनुष्य जो कुछ खाता और जो कुछ पीता है, उससे वह मन-इन्द्रियादि अन्य प्राणोंकी भी रक्षा करता है। अन्तकालमें इसीको न पाकर अर्थात् इसके न रहनेपर इसके साथ ही अन्य सब प्राणोंको लेकर जीवात्मा भी शरीरसे उत्क्रमण कर जाता है—उसे छोड़कर अन्यत्र चला जाता है। इसीलिये अन्त समयमे जीव अपना मुँह अवश्य खोल देता है। यही प्राणकी महिमा है ॥ ९ ॥ यह प्रसिद्ध है कि अङ्गिरा ऋषिने प्राणको ही प्रतीक बना- कर ओंकारस्वरूप परमात्माकी उपासना की थी। अतः लोग इसीको 'आङ्गिरस'—अङ्गिराका उपास्य मानते हैं, क्योंकि यह समस्त अङ्गोंका रस—पोषक है । इसीसे बृहस्पतिने भी प्राणरूपसे उद्गीथकी—ओंकारवाच्य परमात्माकी उपासना की थी। परंतु लोग प्राणको ही 'बृहस्पति' मानते हैं, क्योंकि वाणीका एक नाम बृहती भी है और उसका यह पति—रक्षक है। इसीसे आयास्य नामके प्रसिद्ध ऋषिने भी प्राणके रूपमे

४०८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ १ उद्गीथकी उपासना की थी । परंतु लोग इस प्राणको ही 'आयास्य' मानते हैं, क्योंकि यह आस्य अर्थात् मुखके द्वारा आता-जाता है । दल्भके पुत्र वक नामक ऋषिने प्राणकी उपासनारूप साधनसे उद्गीथ अर्थात् ओंकारके अर्थरूप परमात्माको जाना था । वे प्रसिद्ध ऋषि नैमिषारण्यमे यज्ञ करनेवाले ऋषियोंके उद्गाता हुए थे और उन्होंने इन यज्ञ करनेवालोंके लिये उनकी कामना पूर्तिके उद्देश्यसे उद्गीथका गान किया था । प्राणके महत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला जो उपासक अक्षर- ओंकाररूप उद्गीथकी उपासना करता है, वह निस्संदेह ओंकारके गानद्वारा अपनी मनोवाञ्छित वस्तुको आकर्षित करनेमें समर्थ होता है । इस प्रकार अध्यात्मविषयक--शरीरसे सम्बन्ध रखने- वाली उपासनाका प्रकरण समाप्त हुआ ॥ १०-१४ ॥ तृतीय खण्ड ओंकारकी आधिदैविक उपासना अब ओंकारकी आधिदैविक उपासनाका वर्णन किया जाता है। जो यह सूर्य तपता है, उसीकी उद्गीथके रूपमे उपासना करनी चाहिये । यह सूर्य उदय होते ही मानो समस्त प्रजाके लिये अन्न आदिकी उत्पत्तिके उद्देश्यसे उद्गान करता है-उनकी उन्नतिमें कारण बनता है, इसीलिये यह 'उद्गीथ' है । इतना ही नहीं, यह उदय होते ही अन्धकार और भयका नाश कर देता है । अतः जो इस प्रकार सूर्यके प्रभावको जानता है, वह स्वयं जन्म मृत्युके भय एव अज्ञानरूप अन्धकारका नाशक बन जाता है ॥ १ ॥ यह प्राण और वह सूर्य दोनों समान ही हैं; क्योकि यह मुख्य प्राण उष्ण है और सूर्य भी गरम है । इस प्राणको लोग 'स्वर' ( क्रियाशक्तिसम्पन्न ) कहकर पुकारते हैं और उस सूर्यको 'स्वर' ( स्वयं क्रियाशक्तिवाला ) एव 'प्रत्यास्वर' ( दूसरोंको क्रियाशक्ति प्रदान करनेवाला ) दोनो नामोसे पुकारते हैं । इसीलिये इस प्राण एव उस सूर्यके रूपमें उस उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये ॥ २ ॥ इसके बाद दूसरे प्रकारकी उपासना बतलायी जाती है । व्यानके रूपमें भी उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये । मनुष्य जो श्वासके द्वारा भीतरकी वायुको बाहर निकालता है, वह प्राण है, और जो बाहरकी वायुको भीतर ले जाता है, वह अपान है । तथा जो प्राण और अपानकी संधि है, अर्थात् जिसमें ये दोनों मिल जाते हैं, वह व्यान है । जो व्यान है, वही वाणी है* । इसीलिये मनुष्य श्वासको बाहर निकालने और भीतर खींचनेकी क्रिया न करता हुआ ही वाणीका स्पष्ट उच्चारण करता है । अर्थात् सामान्यतया बोलते समय श्वास- प्रश्वासकी क्रिया बंद हो जाती है ॥ ३ ॥ जो वाणी है, वही ऋचा है, इसलिये मनुष्य प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ही वेदकी ऋचाओका भली- भाँति उच्चारण करता है । जो ऋचा है, वही साम है, क्योंकि 'ऋक्'का ही अशविशेष साम है । इसलिये मनुष्य प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ही सामका गान करता है । जो साम है, वही उद्गीथ है; क्योंकि सामका ही मुख्य भाग 'उद्गीथ' है । इसलिये मनुष्य प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ही उच्चस्वरसे उद्गीथका गान करता है । अर्थात् तीनोंमे ही व्यानकी ही प्रधानता है । व्यान ही तीनोंका आधार है । इनके अतिरिक्त जो विशेष सामर्थ्यकी अपेक्षा रखनेवाले कर्म है--जैसे काष्ठ मन्थनद्वारा अग्निको प्रकट करना, एक नियत सीमातक दौड़ लगाना, कठोर धनुषको खींचना इत्यादि- इन सबको मनुष्य प्राण और अपानकी क्रियाको रोककर व्यानके बलसे ही करता है । इस प्रकार व्यानकी श्रेष्ठता सिद्ध हो जानेके कारण व्यानके रूपमें ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये ॥ ४-५ ॥ अब एक और प्रकारकी उपासना बतायी जाती है। वह यह है कि 'उद्गीथ' शब्दके जो तीन अक्षर हैं, उनके रूपमें उद्गीथ शब्दवाच्य परमात्माकी उपासना करनी चाहिये । इनमें पहला 'उत्' ही प्राण है, क्योंकि मनुष्य प्राणसे ही उत्थान करता है और 'उत्' उत्थानका वाचक है । दूसरा 'गी' वाणीका द्योतक है, क्योकि वाणीको 'गीः' इस नामसे पुकारते हैं । और तीसरा 'थ' अन्नका वाचक है, क्योंकि यह समस्त जगत् अन्नके ही आधार स्थित है और 'थ' स्थितिका बोधक है । 'उत्' ही स्वर्गलोक है, 'गी' अन्तरिक्षलोक है और 'थ' भूलोक है । 'उत्' ही आदित्य है, 'गी' वायु है और 'थ' अग्नि है । 'उत्' ही सामवेद है, 'गी' यजुर्वेद है और 'थ' ऋग्वेद है । इस

  • प्रथम खण्डमें जिस प्राणकी वाणी और ऋचाके साथ एकता की गयी है, वही प्राण यहाँ व्यानके नामसे कहा गया है । वहाँ 'प्राण' शब्दसे प्राणके समष्टिरूपका वर्णन है, केवल श्वासको बाहर निकालनेकी क्रियाका नाम ही वहाँ प्राण नहीं है-यह बात ध्यानमें रखनी चाहिये ।

खण्ड ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४०९ प्रकार जाननेवाला जो साधक 'उद्गीथ' शब्दके इन तीनों अक्षरोंकी उद्गीथ—ओंकारवाच्य परमात्माके रूपमें उपासना करता है, उसके लिये वाणी अपना सारा रहस्य प्रकट कर देती है, अर्थात् उसके सामने समस्त वेदोंका तात्पर्य अपने-आप प्रकट हो जाता है । तथा वह सब प्रकारकी भोग सामग्रीसे एव उसे भोगनेकी शक्तिसे भी सम्पन्न हो जाता है ॥ ६-७ ॥ अब कामनाओंकी उत्तम सिद्धिका निश्चित साधन बताया जाता है । इसके लिये उपासनाके जो सात अङ्ग आगे बताये जानेवाले हैं, उन्हें ध्यानमें रखना चाहिये । उनमेंसे पहला अङ्ग यह है कि जिस सामके द्वारा साधक अपने इष्टदेवकी स्तुति करना चाहता हो, उसे सदा याद रक्खे । दूसरी बात यह है कि वह साम—गाये जानेवाला मन्त्र जिस ऋचामे प्रतिष्ठित हो, उस ऋचाको भी ध्यानमें रक्खे । तीसरी बात यह है कि जिस ऋषिके द्वारा उस मन्त्रका साक्षात्कार किया गया हो, उस ऋषिको स्मरण रक्खे । चौथी बात यह है कि उस सामगानके द्वारा जिस देवताकी स्तुति करना उपासकको अभीष्ट हो, उस देवताका भलीभाँति स्मरण रक्खे । पाँचवीं बात यह है कि जिस छन्दवाले मन्त्रसे वह स्तुति करना चाहता हो, उस छन्दको स्मरण रक्खे और छठी बात यह है कि सामवेदके जिस स्तोत्र-समूहसे स्तुति की जानेवाली हो, उस स्तुति-समूहको भी ध्यानमें रक्खे । सातवीं बात यह है कि जिस ओर मुख करके स्तुति करनेका विचार हो, उस दिशाका भी ध्यान रक्खे। अन्तमें प्रमादरहित अर्थात् सावधान होकर अपनी अभिलाषाको याद रखते हुए परमात्माके समीप जाकर अर्थात् ध्यानके द्वारा उनमें स्थित होकर स्तुति करनी चाहिये। क्योंकि इस प्रकार स्तुति करनेवाला उपासक जिस कामनासे स्तुति करता है, उसकी वह कामना शीघ्र ही पूर्णतया सफल हो जाती है ॥ ८-१२ ॥ चतुर्थ खण्ड ओंकारके आश्रयसे अमृतत्वकी प्राप्ति 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है, यों समझकर उसकी उपासना करनी चाहिये, क्योंकि यज्ञमें उद्गाता नामक ऋत्विज् 'ॐ' इस अक्षरका ही उच्चस्वरसे गान करता है । उस ओंकारकी व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥ यह प्रसिद्ध है कि मृत्युसे डरते हुए देवताओंने ऋक्, यजुः और सामरूप तीनों वेदोंमें प्रवेश किया—उनका आश्रय लिया । उन्होंने गायत्री आदि भिन्न-भिन्न छन्दोंके मन्त्रोंसे अपनेको ढक लिया—उन्हें अपना कवच बनाया। उन्होंने जो भिन्न भिन्न छन्दोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा अपनेको आच्छादित कर लिया, इसीसे वे 'छन्द' कहलाये । जो आच्छादन करे, वही छन्द—यह 'छन्दस्' शब्दकी व्युत्पत्ति है ॥ २ ॥ जिस प्रकार मछली पकड़नेवाला धीवर जलके भीतर भी मछलीको देख लेता है, उसी प्रकार देवताओंको मृत्युने उन ऋक्, साम एव यजुर्वेदके मन्त्रोंकी ओटमें भी देख लिया— वहाँ भी उसने इनका पिण्ड नहीं छोड़ा । वे देवतालोग भी इस बातको जान गये, अतः ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंसे ऊपर उठकर वे स्वरमें अर्थात् ओंकारमें ही प्रविष्ट हो गये ॥ ३ ॥ जब कोई ऋक्‌का—ऋग्वेदके मन्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब वह निःसन्देह 'ॐ' इस प्रकार ही उच्चस्वरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार सामको और वैसे ही यजुर्वेदको जाननेवाला भी 'ॐ' का ही गान करता है । इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जो यह ओंकाररूप अक्षर अर्थात् उसका वाच्यभूत परमात्मा है, वही ऊपर बताया हुआ स्वर है, वही अमृत—मृत्युसे छुड़ानेवाला एव भयरहित स्थान है । उसका आश्रय लेकर देवतालोग अमर और निर्भय हो गये । जो ओंकारको इस रूपमें जानकर उसके अर्थभूत अविनाशी परमेश्वरकी स्तुति एव उपासना करता है तथा एकमात्र इसी अमृतरूप, सर्वथा भयरहित एव अविनाशी परमात्माके स्वरूपभूत इस स्वरमें प्रविष्ट हो जाता है—उसकी शरणमें चला जाता है, वह उसमें प्रवेश करके उसी अमृतको प्राप्त कर लेता है, जिस अमृतको पूर्वोक्त प्रकारसे देवताओंने प्राप्त किया था ॥ ४-५ ॥ पञ्चम खण्ड सूर्य एवं प्राणके रूपमें ओंकारकी उपासना अब ओंकारकी उपासनाका अन्य प्रकार बताया जाता है। निश्चय ही जो उद्गीथ—गाने योग्य परमात्मा है, वही प्रणव— ओंकार है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है—यों समझना चाहिये, क्योंकि नाम और नामीमें कोई भेद नहीं होता । उ० अ० ५२—५३—

४१० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १

४१० * छान्दोग्योपनिषद् * [अध्याय १ वह आकाशमें विचरनेवाला सूर्य ही उद्गीथ है और यही प्रणव भी है। अर्थात् सूर्यमें ही परमात्मा और उनके वाचक 'ॐ' की भावना करनी चाहिये, क्योंकि यह 'ॐ' इस प्रकार उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है। यहाँ 'स्वरन् एति' (उच्चारण करता हुआ गमन करता है)—इस प्रकार 'सूर्य' शब्दकी व्युत्पत्ति की गयी है ॥ १ ॥ एक बार कौषीतकि ऋषिने अपने पुत्रसे इस प्रकार कहा—'बेटा ! मैने इसी सूर्यको लक्ष्य करके ओंकारका भली- भाँति गान किया था, इसलिये मेरे तू एक पुत्र है। तू सूर्यकी किरणोंका सब ओरसे आवर्तन कर—उन सबके रूपमें ओंकारका बार-बार चिन्तन कर; निःसन्देह तेरे बहुत-से पुत्र हो जायेंगे।' इस प्रकार यह आधिदैविक—देवतासम्बन्धी उपासना है ॥ २ ॥ अब पुनः आध्यात्मिक (शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली) उपासनाका प्रकार बताया जाता है। जो यह श्वासके रूपमें चलनेवाला मुख्य प्राण है, उसीके रूपमें उद्गीथकी—गानेयोग्य परमात्माकी उपासना करनी चाहिये, क्योंकि वह 'ॐ' इस प्रकार उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है। प्राण सूर्यरूप है, इसीलिये 'स्वरन् एति' इसी प्रकार यहाँ भी व्युत्पत्ति की गयी है। अर्थात् हमारे प्राणके द्वारा निरन्तर ओंकारकी ध्वनि हो रही है—ऐसी भावना करते हुए उसमें ओंकाररूप परमात्माका ध्यान करना चाहिये ॥ ३ ॥ एक बार कौषीतकि ऋषिने अपने पुत्रसे यह बात कही कि "बेटा ! मैने इस प्राणको ही लक्ष्य करके—इसीमें परमात्माकी भावना करते हुए ओंकारका भलीभाँति गान— आवर्तन किया था, इसलिये मेरे तू एक पुत्र है। 'निश्चय ही मेरे बहुत से पुत्र होंगे' इस सङ्कल्पसे तू अनेक रूपोंमें प्रतिष्ठित प्राणरूप परमात्माका भलीभाँति गान कर— उपासना कर"*॥ ४ ॥ अब कहते हैं कि निश्चय ही सामका जो उद्गीथ नामक भाग है, वही प्रणव है, क्योंकि प्रणव उसका सार है। और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। अर्थात् दोनोंमें कोई भेद नहीं है। इस रहस्यको जाननेवाला निःसन्देह होताके आसनसे ही उद्गाताद्वारा किये गये दोषयुक्त उद्गानको प्रणवके उच्चारणसे पीछे सुधार लेता है, क्योंकि भगवान्‌के नामोच्चारणसे यज्ञकी सारी त्रुटियाँ दूर हो जाती हैं। यह इस ज्ञानकी महिमा है ॥ ५ ॥ षष्ठ खण्ड विविध रूपोंमें उद्गीथोपासना यह पृथिवी ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह यह अग्निरूप साम इस पृथिवीरूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है—भलीभाँति स्थित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। पृथिवी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है, वे दोनों मिलकर 'साम' हैं। इसी प्रकार अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है। वह यह वायुरूप साम इस अन्तरिक्षरूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। अन्तरिक्ष ही मानो 'सा' है और वायु 'अम' है, वे दोनों मिलकर साम हैं। पुनः द्युलोक—स्वर्गलोक ही ऋक् और सूर्य ही साम है। वह यह सूर्यरूप साम इस स्वर्गरूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। द्युलोक ही मानो 'सा' है और सूर्य मानो 'अम' है, वे दोनों मिलकर साम हैं। समस्त नक्षत्रमण्डल ही ऋक् है और चन्द्रमा साम है। वही यह चन्द्रमारूप साम इस नक्षत्र- रूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। नक्षत्रमण्डल ही मानो 'सा' है और चन्द्रमा 'अम' है, दोनों मिलकर साम हैं ॥१-४ ॥ अब दूसरी बात कहते हैं। जो यह प्रत्यक्ष दीखनेवाली सूर्यकी श्वेत आभा है, वही ऋक् है, तथा जो उसके भीतर छिपा हुआ नीलापन और अतिशय श्यामता है, वह साम है। वह श्याम आभारूप साम इस श्वेत आभारूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है, इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। इसके सिवा यह जो सूर्यकी श्वेत प्रभा—उज्ज्वल प्रकाश है, वही 'सा' है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम प्रभा है, वह 'अम' है। वे दोनों मिलकर साम हैं। तथा सूर्यमें जो यह उसका अन्तर्यामी स्वर्णसदृश प्रकाशस्वरूप पुरुष दिखायी देता है—जिसकी दाढी सुवर्णकी भाँति प्रकाशमय है तथा केश भी सोनेकी ही भाँति चमचमाते हैं और जो नखके अग्रभागसे लेकर चोटीतक सब का सब स्वर्णमय प्रकाशयुक्त है, वह परमपुरुष परमेश्वर ही है। उस सुवर्णसदृश प्रकाशयुक्त पुरुषके दोनों नेत्र ऐसे हैं, जैसे कोई लाल कमल हो। उसका 'उत'

  • जो बात इन्हीं ऋषिने दूसरे मन्त्रमें सूर्यके सम्बन्धमें कही थी, वही यहाँ प्राणके सम्बन्धमें कही गयी है। इससे भी प्राण और सूर्यकी एकता प्रतिपादित होती है। प्रश्नोपनिषद्‌में प्राण और सूर्यकी एकताका भलीभाँति निरूपण हुआ है।

खण्ड ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४११. (सबसे ऊपर उठा हुआ) यह नाम है। वह यह परमेश्वर समस्त पापोंसे ऊपर उठा हुआ है। जो कोई उपासक इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही सब पापोंसे ऊपर उठ जाता है ॥ ५-७ ॥ ऋग्वेद और सामवेद उस परमात्माके ही गुणगान हैं, इसलिये वह उद्गीथ है, तथा इसीलिये जो उद्गाता है, वह वास्तवमें उसीका गान करनेवाला है। जो स्वर्गलोकसे भी ऊपरके लोक हैं, उनका भी तथा देवताओंके भोगोंका भी शासन वह परमात्मा ही करता है। यह आधिदैविक उपासना समाप्त हुई ॥ ८ ॥ सप्तम खण्ड शरीरकी दृष्टिसे उद्गीथोपासना अब वही बात शरीरकी दृष्टिसे समझायी जाती है। वाक्- इन्द्रिय ही ऋक् है, प्राण साम है। वही यह प्राणरूप साम वाणीरूप ऋक्में प्रतिष्ठित—भलीभाँति स्थित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। वाणी ही ‘सा’ है, प्राण ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम हैं। इसी प्रकार नेत्र ही ऋक् है और उसके भीतरकी काली पुतली साम है। वही यह आँखकी पुतलीरूप साम इस नेत्ररूप ऋक्में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्मे प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। नेत्र ही ‘सा’ है और पुतली ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम हैं। पुन श्रोत्र ही ऋक् है, मन साम है। वही यह मनरूप साम श्रोत्ररूप ऋक्मे प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। श्रोत्र ही ‘सा’ है, मन ‘अम’ है, दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह जो नेत्रोंकी श्वेत आभा है, वही ऋक् है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम आभा है, वह साम है। वही यह श्याम आभारूप साम इस श्वेत आभारूप ऋक्में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। तथा यह जो नेत्रकी श्वेत आभा है, वही ‘सा’ है; और जो नील और अतिशय श्याम आभा है, वह ‘अम’ है, उन दोनोंका सम्मिलित रूप साम है। तथा यह जो नेत्रके भीतर पुरुष दिखायी देता है, वही ऋक् है, वही साम है, वही यजुर्वेद है, वही उक्थ—स्तोत्र समूह है और वही ब्रह्म है। इस पुरुषका वही रूप है, जो छठे खण्डमें वर्णित आदित्यमण्डलमें स्थित पुरुषका रूप है। जो उसके गुणगान हैं, वे ही इसके गुणगान हैं और जो उसका नाम (उत्) है, वही इसका भी नाम है। पृथिवीसे नीचे जो भी लोक हैं, उनका यही पुरुष शासन करता है तथा मनुष्योंके भोग भी उसीके अधीन हैं। इसलिये जो लोग वीणापर गाते हैं, वे इन्हीं परमेश्वरका गुणगान करते हैं, इसीसे वे धनलाभ करते हैं—अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करते हैं। तथा इस रहस्यको इस रूपमें जाननेवाला जो उपासक साम-गान करता है, वह नेत्रस्थित तथा आदित्यमण्डलवर्ती दोनों ही पुरुषोंका गुणगान करता है, वह उन परमेश्वरसे ही अभीष्ट लाभ करता है। जो भी उस सूर्यलोकसे ऊपरके लोक हैं, उन सबको तथा देवताओंके भोगोंको भी वह प्राप्त कर लेता है। तथा सूर्यलोक अथवा मनुष्यलोकसे नीचेके जो भी लोक हैं, उनको तथा मनुष्योंके भोगोंको भी वह इन परमपुरुषसे ही प्राप्त कर लेता है। इसलिये निस्सन्देह इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे यों कहे—'मैं तेरे लिये कौन-सी अभीष्ट वस्तुका गानके द्वारा आवाहन करूँ?' क्योंकि जो इस रहस्यको इस प्रकार जानकर सामका गान करता है, वही वाञ्छित भोगोंका गानद्वारा आवाहन करनेमें समर्थ होता है ॥ १-९ ॥ अष्टम खण्ड उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और दाल्भ्यका संवाद प्रसिद्ध है, तीन ऋषि उद्गीथका तत्त्व जाननेमें कुशल थे— एक तो शालावान्के पुत्र शिलक, दूसरे चिकितायनके पुत्र दाल्भ्य* और तीसरे जीवळके पुत्र प्रवाहण। एक बार वे तीनों आपसमें इस प्रकार कहने लगे—‘निश्चय ही हमलोग उद्गीथविद्यामें कुशल हैं, इसलिये यदि सबकी सम्मति हो तो हम उद्गीथके विषयमें बातचीत करें।' 'बहुत ठीक है, ऐसा ही हो' यों कहकर वे सब एक स्थानपर सुखसे बैठ गये। तब प्रसिद्ध राजर्षि जीवळके पुत्र प्रवाहण ऋषि श्रेष्ठ दोनोंसे;

  • दाल्भ्यका अर्थ है दल्भकी सन्तान। यहाँ उनके पिताका नाम चिकितायन दिया गया है। ऐसी दशामें सम्भव है ये दल्भ- गोत्रमें उत्पन्न रहे हों, इसीलिये दाल्भ्य कहलाये हों। अथवा सम्भव है, ये द्वयामुष्यायण रहे हों। 'द्वयामुष्यायण' उन्हें कहते हैं, जो किसी दूसरेके गोद आये हों और जिन्होंने अपने जन्म देनेवाले पिताका उत्तराधिकार भी न छोड़ा हो। इस प्रकार वे दो पिताओंके पुत्र होते हैं। दो पिताओंके पुत्रकी ही हिंदू धर्म-शास्त्रोंमें 'द्वयामुष्यायण' संज्ञा है।

४१२ \ छान्दोग्योपनिषद् \ [ अध्याय १

४१२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय १


बोले--'पहले आप दोनो पूज्यजन बातचीत आरम्भ करें। उपदेश देते हुए आप दोनों ब्राह्मणोंके वचनोंको मैं सुनूँगा।' यों कहकर वे चुप हो गये ॥ १-२ ॥

कहा जाता है, तब वे शालावान्के पुत्र शिलक ऋषि चिकितायनके पुत्र दाल्भ्यसे बोले--'कहिये तो मै ही आपसे प्रश्न करूँ?' इसपर दाल्भ्यने कहा--'पूछो।' शिलकने पूछा--'सामका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने कहा--'स्वर ही सामका आश्रय है।' 'स्वरका आश्रय कौन है?' इस प्रकार पूछे जानेपर उन्होंने कहा--'प्राण ही स्वरका आश्रय है।' फिर प्रश्न हुआ--'प्राणका आश्रय कौन है?' उत्तर मिला--'अन्न ही प्राणका आश्रय है।' शिलकने फिर प्रश्न किया--'अन्नका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने उत्तर दिया--'जल ही अन्नका आश्रय है।' शिलकने पुनः पूछा--'जलका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने कहा--'स्वर्गलोक ही जलका आश्रय है।' 'उस लोकका आश्रय कौन है?' शिलक पूछते ही गये। इसपर दाल्भ्य बोले--'स्वर्गलोकसे आगे नहीं जाना चाहिये, उसके परेकी बात नहीं पूछनी चाहिये। हम स्वर्गलोकमे ही सामकी पूर्णतया स्थिति मानते हैं, क्योंकि सामको स्वर्गलोक कहकर ही उसकी स्तुति की जाती है'* ॥ ३-५ ॥

चिकितायन-पुत्र दाल्भ्यसे शालावान्के पुत्र सुप्रसिद्ध शिलक ऋषिने कहा--'दाल्भ्य ! तुम्हारा बताया हुआ साम निःसन्देह प्रतिष्ठाहीन है अर्थात् तुमने जो सामका अन्तिम आश्रय स्वर्ग बताया, वह ठीक नहीं है। स्वर्गका भी कोई और आश्रय अवश्य होना चाहिये। यदि कोई सामके तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् तुम्हारे इस अधूरे उत्तरपर झुंझलाकर तुम्हें यह कह दे कि तुम्हारा सिर गिर जायगा, तो उसके यों कहते ही तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा--यह निश्चय समझो।' दाल्भ्यने कहा--'क्या मै सामका तत्त्व श्रीमान्से जान सकता हूँ?' शिलकने कहा--'हाँ, जानो।' तब दाल्भ्यने पूछा--'स्वर्गलोकका आधार कौन है?' 'यह मनुष्यलोक ही उसका आधार है,' शिलकने स्पष्ट उत्तर दिया। 'मनुष्यलोकका आधार कौन है?' दाल्भ्यका अगला प्रश्न था। इसपर शिलक बोले--'जो सबकी प्रतिष्ठा है, उस लोकमे आगे प्रश्न नहीं करना चाहिये। सबकी प्रतिष्ठारूप मनुष्यलोकमे ही हम सामकी भलीभाँति स्थिति मानते हैं, क्योंकि सामको सबकी प्रतिष्ठारूप पृथ्वी कहकर ही उसकी स्तुति की जाती है।'† तब जीवला-पुत्र प्रवाहणने शिलकसे कहा--'शालावान्के पुत्र शिलक ! तुम्हारा समझा हुआ साम भी निःसन्देह अन्तवाला ही है। अत यदि ऐसी स्थितिमें कोई सामके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष तुम्हे शाप दे दे कि तुम्हारा सिर गिर जायगा तो उसके यों कहते ही तुम्हारा सिर गिर सकता है।' इसपर शिलकने कहा--'क्या मैं इस रहस्यको श्रीमान्से जान सकता हूँ ?' प्रवाहणने उत्तर दिया--'जान लो' ॥ ६-८ ॥


नवम खण्ड

उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और प्रवाहणका संवाद

शिलकने प्रवाहणसे पूछा--'इस मनुष्यलोकका आश्रय कौन है?' इसपर प्रवाहणने उत्तर दिया--'आकाश अर्थात् सर्वत्र प्रकाशित परमात्मा ही इसके आश्रय हैं। निःसदेह ये समस्त जीव आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाशमें ही विलीन होते हैं; क्योंकि आकाश ही इन सबसे बड़ा है और आकाश ही सबका परम आश्रय है। वे आकाशस्वरूप परमात्मा ही बड़े से-बड़े और उद्गीथ (गानेयोग्य) हैं। वे सर्वथा असीम हैं। जो कोई उपासक इस प्रकार समझकर इस बड़े-से बड़े उद्गीथरूप परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका जीवन निःसन्देह ऊँचे-से-ऊँचा हो जाता है और वह निश्चय ही बड़े-से-बड़े लोकोंको जीत लेता है--प्राप्त कर लेता है।' एक बार शौनकके पुत्र अतिधन्वा नामक ऋषिने उदरशाण्डिल्य नामके ऋषिको इस ऊपर बताये हुए उद्गीथका रहस्य बताकर कहा था--'तेरी संतानोंमे लोग जबतक इस उद्गीथको जानते रहेंगे, तबतक इस लोकमें उनका जीवन इन सब साधारण मनुष्योंसे अवश्य ही अत्यन्त श्रेष्ठ बना रहेगा। तथा मरनेके बाद उन्हें उस लोकमे--परलोकमे उत्तम स्थान मिलेगा।' इस प्रकार समझना चाहिये। इस रहस्यको जाननेवाला जो कोई पुरुष उद्गीथकी उपासना करता है, उसका जीवन इस मनुष्यलोकमें निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। तथा मरनेके बाद परलोकमें उसे सर्वोपरि स्थान मिलता है--यह निश्चित बात है ॥ १-४ ॥


* श्रुति कहती है--'स्वर्गो वै लोक सामवेद ।' † श्रुतिका वचन है--'इयं वै रथन्तरम्' (यह पृथ्वी ही रथन्तरसाम है)।

खण्ड ११] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१३ दशम खण्ड उपस्तिका आख्यान एक बार ओले गिरनेसे कुरुदेशकी खेती चौपट हो गयी थी। उन दिनों चक्र मुनिके पुत्र उपस्ति ऋषि अपनी धर्मपत्नी आटिकीके साथ (जिसने अभी युवावस्था में प्रवेश नहीं किया था) बड़ी दीन अवस्थामें-पराश्रित होकर किसी हाथीवालोंके गाँवमें रहते थे। एक दिन अन्नके लिये भीख माँगते हुए उपस्तिने अत्यन्त निकृष्ट कोटिके उड़द खाते हुए एक महावतसे याचना की। उन प्रसिद्ध मुनिसे हाथीवान् इस प्रकार बोला कि 'जितने और जो उड़द मेरे इस पात्रमें रक्खे हैं, उनके सिवा ओर उड़द मेरे पास नहीं हैं।' ऋषिने कहा-'इन्हींमेंसे मुझे दे दे।' महावतने अपने पात्रमें बचे हुए सारे उड़द उन्हें दे दिये। महावत बोला- 'उड़द खाकर जल भी पी लीजिये।' इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'नहीं, ऐसा करनेपर मेरेद्वारा तुम्हारा जूठा जल पिया जायगा।' 'क्या ये उड़द भी जूठे नहीं हैं?' महावतके यों पूछनेपर उन प्रसिद्ध ऋषिने उत्तर दिया-'अवश्य ही इन उड़दोंको न खानेपर मैं जीवित न रहता। पर पीनेका जल तो मुझे यथेष्ट मिल जाता है' ॥ १-४ ॥ उपस्ति ऋषि खानेसे बचे हुए उड़दोंको अपनी पत्नीके लिये ले आये। उसने पहले ही अच्छी भिक्षा पा ली थी, इसलिये उसने उन उड़दोंको अपने पतिसे लेकर रख दिया। दूसरे दिन प्रातः काल शय्यात्याग करते समय उपस्तिने कहा- 'हाय, यदि हमें थोड़ा-सा भी अन्न मिल जाता तो हम कुछ धन कमा लाते। अमुक राजा यज्ञ करनेवाला है। वह मुझे ऋत्विजोंके सभी प्रकारके कार्योंके लिये वरण कर लेगा।' ऋषिसे उनकी पत्नीने कहा- 'स्वामिन् ! लीजिये, कल जो उड़द आप मुझे दे गये थे, वे ही मेरे पास बचे हुए हैं।' बस, उन्हें खाकर उपस्ति उस विशाल यज्ञमें चले गये ॥ ५-७ ॥ उस यज्ञमें पहुँचकर जहाँ उद्गातालोग स्तुति करते हैं, उस स्थानपर स्तुति करनेके लिये उद्यत उद्गाता आदि ऋत्विजों- के समीप वे बैठ गये। फिर उन्होंने स्तुति करनेवाले प्रस्तोता ऋत्विक्से कहा- 'प्रस्तोता ! जिस देवताका प्रस्तावसे सम्बन्ध है, अर्थात् जिनकी तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम स्तुति करोगे तो याद रखना, तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' इसी प्रकार उन्होंने उद्गातासे कहा-'उद्गाता ! जिस देवताका उद्गीथसे सम्बन्ध है, अर्थात् जिसका तुम उद्गीथ- द्वारा गान करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम उद्गान करोगे तो निश्चय समझो, तुम्हारा मस्तक गिर पड़ेगा।' तदनन्तर उन्होंने प्रतिहर्तासे कहा- 'प्रतिहर्ता ! जिस देवताका प्रतिहारसे सम्बन्ध है, उसे न जानते हुए यदि तुम प्रतिहार- क्रिया करोगे तो समझ लो कि तुम्हारा सिर तुम्हारी गर्दनपर नहीं रहेगा।' इसपर वे सब ऋत्विक् अपने-अपने कार्यसे उपरत होकर चुपचाप बैठ गये ॥ ८-११ ॥ एकादश खण्ड प्रस्ताव आदि कर्मोंसे सम्बद्ध देवताओंका वर्णन तब इन उपस्ति ऋषिसे यज्ञ करानेवाले राजाने कहा- 'मैं श्रीमान्‌का ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ।' इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'मैं चक्रका पुत्र उपस्ति नामका ऋषि हूँ।' राजाने कहा- 'सच मानिये, मैंने इन समस्त ऋत्विज् सम्बन्धी कर्मोंके लिये श्रीमान्‌की सब जगह खोज की थी। श्रीमान्‌के न मिलनेपर ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंको चुना है। परन्तु अब मेरे सम्पूर्ण ऋत्विज्-सम्बन्धी कर्मोंपर श्रीमान् ही रहें।' ऋषिने 'बहुत अच्छा' कहकर राजाके प्रस्तावका अनुमोदन किया और फिर कहा- 'तब मेरी आज्ञा पाकर ये पहलेवाले ऋत्विज् ही स्तुति आरम्भ करें। परन्तु एक बात है-जितना धन आप इन लोगोंको दें, उतना ही मुझे भी दें।' राजाने 'यही होगा' कहकर अपनी स्वीकृति दे दी ॥१-३॥ तदनन्तर प्रस्तोता उन प्रसिद्ध ऋषिके पास आकर बोला- “श्रीमान्‌ने मुझे यह कहा था कि 'प्रस्तोता ! जिस देवताकी तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम स्तुति- पाठ करोगे तो तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जायगा।' सो वह देवता कौन है-मैं यह जानना चाहता हूँ।" इसपर ऋषि बोले-“वह देवता प्राण है। निःसन्देह ये समस्त प्राणी प्रलय- के समय प्राणमे ही प्राणरूप होकर विलीन हो जाते हैं और पुनः सृष्टिकालमें प्राणसे ही प्रकट होते हैं। वही यह प्राण प्रस्ताव अर्थात् स्तुतिमें अनुगत देवता है, उसको बिना जाने यदि तुम स्तुति आरम्भ कर देते तो मेरे यह कहनेपर कि 'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय,' वैसा अवश्य हो जाता” ॥ ४५ ॥ तदनन्तर उद्गाता उपस्तिके पास आकर बोला- “श्रीमान्‌ने मुझसे यह कहा था कि 'उद्गाता ! जो उद्गीथसे