काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
प्रस्तावना
पाठकों के सम्मुख आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ काश्यपसंहिता का हिन्दी अनुवाद उपस्थित करते हुए मुझे प्रसन्नता है। अनुवादक के सामने प्रधान दृष्टिकोण ग्रन्थ के मूल विषय को स्पष्ट करना होता है। साथ ही विषय का व्यतिक्रम न हो यह भी उसे ध्यान में रखना पड़ता है। इन दोनों बातों का सामञ्जस्य रखने का मैंने अपनी ओर से यथाशक्ति प्रयत्न किया है। काश्यपसंहिता आयुर्वेद का एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है। यह चरक तथा सुश्रुत का ही समकक्ष माना जाता है। इसकी उपलब्धि नेपाल में अभीतक खण्डितरूप में ही हुई है। कालक्रम से हमारे अनेक प्राचीन आयुर्वेदिक तथा अन्य ग्रन्थ भी विलुप्त हो चुके हैं। इन विलुप्त ग्रन्थों में से जो अनेक ग्रन्थ समय-समय पर उपलब्ध हुए हैं उन्हीं में से काश्यपसंहिता भी एक है। यद्यपि यह ग्रन्थ अभी तक पूर्णरूप से नहीं मिला है तथापि जर्जरित एवं खण्डित रूप में उपलब्ध होने पर भी यह हमारे महान् आयुर्वेद कोष की अमूल्य निधि समझी जानी चाहिये तथा समय प्रवाह से भविष्य में इस ग्रन्थ के अवशिष्ट अंशों की उपलब्धि की आशा भी रखनी चाहिये।
इस ग्रन्थ का मुख्य विषय कौमारभृत्य है अर्थात् इसमें बालकों के रोग, उनका पालन-पोषण, स्तन्यशोधन एवं धात्रीचिकित्सा आदि का विशद् वर्णन मिलता है। कौमारभृत्य अष्टाङ्ग आयुर्वेद का एक अविभाज्य अङ्ग है। इसके अभाव में अष्टाङ्ग आयुर्वेद पूर्ण नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार आयुर्वेद के आठ अङ्गों में से इस समय शालाक्य, विष, तथा भूतविद्या आदि केवल नाममात्र को ही अवशिष्ट हैं उसी प्रकार अष्टाङ्ग आयुर्वेद का कौमारभृत्य-सम्बन्धी विषय भी इस ग्रन्थ के उपलब्ध होने से पूर्वतक केवल नाममात्र को ही था। इस कौमारभृत्य का प्रधान आचार्य जीवक माना जाता है। अभी तक इस जीवक का कोई भी विशेष परिचय हमें उपलब्ध नहीं था। इस ग्रन्थ के उपलब्ध हो जाने से जीवक के विषय में भी हमें अनेक प्रकार का ज्ञान मिल जाता है। इससे उसके पिता, जन्मस्थान एवं आचार्य का परिचय मिलता है। कौमारभृत्य के प्रधान आचार्य जीवक, तथा इस संहिता के विषय में उपोद्घात में विशेष वर्णन किया गया है। इसके विषय में पुनः विशेष कुछ नहीं कहना है। इस ग्रन्थ में बालकों के विषय में अनेक ऐसी बातें दी हुई हैं जो अन्य प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थ में साधारणतया देखने को नहीं मिलती हैं। उदाहरण के लिये बालकों के लेहन, संन्निपात, फक्करोग आदि का इसमें विशेष वर्णन किया गया है। बालकों के दन्तोत्पत्ति का इतना विशद वर्णन अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। स्वेदन के प्रकरण में अत्यन्त छोटे बालकों के लिये अन्य स्वेदों के साथ विशेषरूप से हस्तस्वेद का विधान दिया गया है। हस्तस्वेद से अभिप्राय हाथों को गर्म करके उनके द्वारा स्वेदन देने से है। छोटे बालक अत्यन्त नाजुक होते हैं। थोड़ी-सी भी अधिक गरमी से बालकों के उष्णता के केन्द्र विचलित हो जाते हैं इस लिये उन्हें स्वेदन अत्यन्त सावधानी से देने की आवश्यकता होती है। हस्तस्वेद से यह भय नहीं रहता, इसमें हाथों द्वारा उष्णता का नियन्त्रण सुविधापूर्वक किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में संक्षेप में दिये हुए वेदनाध्याय, लक्षणाध्याय, बालग्रह आदि का इसमें विशद वर्णन किया गया है। रक्तगुल्म तथा गर्भ में प्रायः भ्रम उत्पन्न हो जाता है। इनकी भेदक परीक्षा इस संहिता में अत्यन्त विस्तार से दी गई है। विषम ज्वर के वेगों के विषय में यहां एक बिलकुल नवीन शंका उपस्थित करके उसका युक्तिपूर्वक बड़ा सुन्दर उत्तर दिया गया है। विषमज्वर के अन्येद्युष्क, तृतीयक तथा चतुर्थक के समान अन्य भेद क्यों नहीं होते ? अर्थात् जिस प्रकार विषमज्वर प्रतिदिन, तीसरे दिन एवं चौथे दिन होता है उसी प्रकार पांचवें तथा छठें दिन भी इसके वेग क्यों नहीं होते ? इसका उत्तर दिया है कि इस विषमज्वर के आमाशय, छाती, कण्ठ तथा सिर ये चार ही स्थान है। इनके अतिरिक्त इसका कोई स्थान नहीं है। इसलिये अन्य स्थानाभाव से इसके अन्य वेग नहीं होते हैं। इन उपर्युक्त स्थानों में से आमाशय में दोषों के पहुंचने पर ज्वर का वेग होता है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक दोष
६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
को पहुँचने में एक अहोरात्र लगता है अर्थात् अन्येद्युष्क का स्थान छाती है। छाती से आमाशय तक दोष के पहुंचने में एक अहोरात्र लगता है। इसलिये अन्येद्युष्क का वेग २४ घण्टे में होता है। तृतीयक का स्थान कण्ठ माना गया है। कण्ठ से छाती तक एक अहोरात्र तथा छाती से आमाशय तक पहुंचने में दूसरा अहोरात्र लगता है इसलिये तृतीयक का वेग तीसरे दिन होता है। इसी प्रकार चतुर्थक का स्थान सिर है। उसे आमाशय तक पहुंचने में तीन अहोरात्र लगते हैं अर्थात् चतुर्थक का वेग चौथे दिन होता है। इनके अतिरिक्त विषमज्वर का कोई स्थान नहीं है इसलिये चौथे दिन के बाद इसका कोई वेग नहीं होता है। यह अत्यन्त युक्तिसंगत उत्तर दिया गया है। इसी प्रकार अन्य भी बहुत से नवीन विषय इस संहिता में दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार संपूर्ण दृष्टियों से कौमार-भृत्य के विषय में यह एक पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना जा सकता है। अनेक वर्षों से मेरी इच्छा इसके अनुवाद करने की थी। चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय के व्यवस्थापकों के सत्रयत्नों से उस इच्छा को पूर्ण करने का अवसर मुझे उपलब्ध हो गया। इस ग्रन्थ के साथ राजगुरु हेमराज जी ने जो एक अत्यन्त विद्वत्तापूर्ण एवं सारगर्भित उपोद्घात लिख दिया है उससे तो इस ग्रन्थ की उपादेयता और भी बढ़ गई हैं। इसमें आयुर्वेद का विस्तृत इतिहास एवं विकासक्रम दिया गया है तथा आयुर्वेद के प्रधान ग्रन्थों एवं उनके आचार्यों का भी विस्तृत विवेचन किया गया है। परन्तु यह उपोद्घात संस्कृत भाषा में लिखा होने से आयुर्वेद के अनेक ऐसे प्रेमी, जो संस्कृत से अनभिज्ञ हैं; इससे विशेष लाभ नहीं उठा पाते, इसी लिये इस संहिता के अनुवाद का प्रश्न जब मेरे सामने आया तो मूल ग्रन्थ के साथ-साथ उपोद्घात का अनुवाद करना भी मैंने आवश्यक समझा, इससे यद्यपि ग्रन्थ का कलेवर अवश्य बढ़ गया है परन्तु इससे इसकी उपयोगिता निर्विवाद बढ़ गई है।
पूज्य हेमराज जी ने सहर्ष अत्यन्त उदारतापूर्वक प्रकाशक को सानुवाद उपोद्घात छापने की स्वीकृति प्रदान कर दी इसके लिये मैं तथा प्रकाशक उनके अत्यन्त आभारी हैं। चौखम्भा संस्कृत पुस्तकालय के व्यवस्थापक श्री जयकृष्णदास हरिदासजी गुप्त भी अत्यन्त धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने इस महान् अर्थ-संकट काल में भी आर्थिक लोलुपता से विरत होकर सेवाभाव से ही इस ग्रन्थ का प्रकाशन कर आयुर्वेद जगत् की एक महान् क्षति की पूर्ति कर दी है। श्री अत्रिदेव जी गुप्त का मैं अत्यन्त आभारी हूँ, उन्हीं की निरन्तर प्रेरणा का फल है कि मैं आप लोगों के सम्मुख इसका अनुवाद उपस्थित कर सका हूँ, उनको मैं धन्यवाद तो नहीं दे सकता क्योंकि वे मेरे गुरु हैं। काश्यपसंहिता का अनुवाद करना मेरे लिये सरल नहीं था क्योंकि यह एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है जिसमें स्थान-स्थान पर अनेक विषय एवं शब्द ऐसे आये हुए हैं जो बिलकुल अप्रसिद्ध एवं अस्पष्ट हैं। इनके अतिरिक्त सबसे अधिक कठिनाई जो थी वह कि यह ग्रन्थ स्थान-स्थान पर खण्डित अवस्था में है। इन कठिनाइयों के होते हुए भी प्रकाशक के द्वारा निरन्तर प्रोत्साहन मिलते रहने से ही मैं इस कार्य को पूर्ण कर सका हूँ अतः मैं उनका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ।
इस संहिता के अनुवाद कार्य में मुझे बहुत से व्यक्तियों से अत्यन्त अमूल्य सहायता प्राप्त हुई है उनको मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ। गुरुकुल आयुर्वेद महाविद्यालय के वयोवृद्ध उपाध्याय श्री कविराज हरिदास जी शास्त्री न्यायतीर्थ का मैं अत्यन्त आभारी हूँ जिनसे मुझे समय-समय पर बहुमूल्य सहायता मिलती रही है। श्री पं. हरिदत्त जी वेदालङ्कार, श्री पं. रामनाथ जी वेदालङ्कार तथा श्री पं. शंकरदेव जी विद्यालङ्कार को भी मैं धन्यवाद देता हूँ इनसे मुझे हर प्रकार की सहायता प्राप्त होती रही है। ऋषिकुल आयुर्वेद कालेज के विद्यार्थी ऋषिप्रकाश को भी हम धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकते जिन्होंने हमारे इस कार्य में अत्यन्त सहयोग प्रदान किया। अन्त में मुझे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सुशीलादेवी को भी अवश्य धन्यवाद देना चाहिये जिनकी आत्मिक सहायता एवं इच्छाशक्ति के बिना यह कार्य पूरा नहीं हो सकता था।
अन्त में हिन्दी अनुवाद के विषय में मैं इतना अवश्य कह देना चाहता हूँ कि इस संहिता में कुछ ऐसे विषय आये
विषयनुक्रमणिका
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हुए हैं जो अत्यन्त अस्पष्ट एवं संदिग्ध हैं। बहुत प्रयत्न करने पर भी मैं उनको स्पष्ट नहीं कर सका हूँ। उन संदिग्ध स्थलों का हमने अन्य कई वृद्ध वैद्यों के निर्देशानुसार केवल शब्दानुवाद मात्र कर दिया है। विद्वान् पाठक उन संदिग्ध स्थलों के विषय में मुझे अपने विचार लिख सकें तो मैं उनका आभारी होते हुए उन स्थलों को अगले संस्करण में स्पष्ट करने का प्रयत्न करूँगा।
<br>अक्षय तृतीया
वि. संवत् २०१०
निवेदक
सत्यपाल आयुर्वेदालङ्कार
८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
संस्कृत-उपोद्घातस्य संक्षिप्ता विषयानुक्रमणिका
| विषया: | पृ. | विषया: | पृ. |
|---|---|---|---|
| उपोद्घातप्रस्ताव: | १ | अत्र देशविशेषनिर्देशः | ९६ |
| १. सोपक्रम आयुर्वेदपरिच्छेदः । | ४. भारतीयभैषज्यसमर्थनपरिच्छेदः । | ||
| आयुर्वेदविषयोपन्यासः | १ | भारतीयभैषज्यविद्यायाः प्राचीनत्वम् | ९९ |
| आयुर्वेदस्य प्राचीनत्वम् | २ | हिपोक्रिटसम्बन्धी विमर्शः | ११३ |
| आयुर्वेदः | ३ | ग्रीसभारतीयवैद्यकयोः प्रायिको विषयसंवादः | ११६ |
| वेदायूर्वेदयोः संबन्धः | ४ | प्राचीनग्रीसवैद्यकसंप्रदायाः | १२२ |
| वेदे आयुर्वेदीया विषयाः | ५ | यवनैर्भारतीयविषयाणामुपादानम् | १२४ |
| २. आचार्यपरिच्छेदो ग्रन्थपरिचयसहिताः । | भारतीयविदुषां ग्रीसोपगमः | १२८ | |
| आयुर्वेदस्य प्रकाशः, आचार्याश्च | १२ | अलेक्जेन्डरद्वारा भारतालोकप्रसारः | १२९ |
| आत्रेयसुश्रुतसंहिते | १६ | भारतालोकप्रसारे अशोकशिलालेखः | १३१ |
| भेडसंहिता | १७ | ग्रीसभारतयोः पुराकालात् संबन्धः | १३३ |
| हारीतसंहिता | १८ | ग्रीसे शस्त्रवैद्यकस्य पश्चात् प्रचारः | १३६ |
| नवोपलब्धेयं काश्यपसंहिता | १८ | प्राचीनमिश्रे भैषज्यविज्ञानम् | १४० |
| कश्यपस्य विमर्शः | १९ | असीरियाबेबिलोनिययोः पूर्वं भैषज्यज्ञानम् | १४१ |
| जीवकस्य विमर्शः | २८ | मिश्रबेबिलोनियेरानचीनेषु भारतीयशब्दादिसाम्यम् | १४२ |
| वात्स्यः | ३२ | प्राचीनभारतस्य देशान्तरं संबन्धः | १४४ |
| प्रसङ्गस्मृतानि आचार्यान्तराणि | ३९ | धन्वन्वर्यादीनां पौर्वकालिकता | १४६ |
| धन्वन्तरिदिवोदासश्च | ३९ | भारतीयस्रोतसो देशकाल व्याप्तिः | १४७ |
| सुश्रुतः | ४५ | पौष्कलावतकरवीर्यौरभ्राद्याचार्येषु वितर्कः | १४८ |
| आत्रेयः | ५४ | वैदिकसाहित्यमूलकं भारतीयभैषज्यसमर्थनम् | १५३ |
| अग्निवेशः | ५८ | भारतीयभूगर्भतः प्राचीन भैषज्यदृष्टिः | १५५ |
| चरकः | ५९ | प्राचीनतत्तद्देशभैषज्यविमर्शस्यावश्यकता | १५६ |
| वार्योविद-दारुवाह-नग्नजिद्-भेदाः | ६९ | ५. उपसंहारपरिच्छेदः । | |
| रसग्रन्थाः | ७१ | प्राचीनाचार्याणां गौरवानुसंधानम् | १५८ |
| ३. संस्कारतुलनादिसहितो विषयपरिच्छेदः । | प्राचीनग्रन्थानां विलोपो रक्षा च | १५९ | |
| प्रतिसंस्कारः | ७३ | नेपालग्रन्थमालायाः प्रथमप्रकाशः | १६१ |
| अस्य ग्रन्थस्य संहितात्वं तन्त्रत्वं च | ८६ | साहाय्यसमादरः | १६२ |
| कश्यपात्रेयभेडसुश्रुतग्रन्थानां तुलनाविमर्शः | ८७ | परिशिष्टम् । | |
| अस्य ग्रन्थस्य विषयः | ९१ | ज्वरसमुच्चये काश्यपसंहितायाः श्लोकसंवादः | १६३ |
विषयक्रमणीका | ९
काश्यपसंहितायां समागतान्याचार्यान्तराणां नामानि
| विषयाः | पृ. | विषयाः | पृ. |
|---|---|---|---|
| दारुवाहः | ४८ | गार्ग्यः | २२० |
| भार्गवः प्रमतिः | ५८ | माठरः | २२० |
| वार्योविदः | ५८ | आत्रेयः पुनर्वसुः | २२० |
| काङ्कायनः | ५८ | पाराशर्यः | २२० |
| कृष्णो भरद्वाजः | ५८ | भेलः | २२० |
| हिरण्याक्षः | ५८ | वृद्धकाश्यपः | २३० |
| वैदेहो निमिः | ५८ | वैदेहो जनकः | २३० |
| धन्वन्तरिः | ८४ | वात्स्यः | २३० |
| अनायासो यक्षः | ३४१ |
हिन्दी उपोद्घात की संक्षिप्त विषयानुक्रमणिका
| विषयाः | पृ. | विषयाः | पृ. |
|---|---|---|---|
| उपोद्घात प्रस्ताव | १६७ | अग्निवेश | २२८ |
| १. सोपक्रम आयुर्वेद परिच्छेद। | चरक | २३० | |
| उपक्रम सहित आयुर्वेद सम्बन्धी विवरण | १६८ | वायोर्विद, दारुवाह, नग्नजित् तथा भेड | २४२ |
| आयुर्वेद की प्राचीनता | १६९ | रस के ग्रन्थ | २४४ |
| आयुर्वेद | १७० | ३. संस्करण की तुलना तथा तत्सम्बन्धी विषय। | |
| वेद तथा आयुर्वेद का परस्पर सम्बन्ध | १७१ | प्रतिसंस्कार | २४६ |
| वेद में आयुर्वेद सम्बन्धी विषय | १७३ | इस ग्रन्थ का संहितातत्व तथा तन्त्रत्व | २६१ |
| २. ग्रन्थपरिचय सहित आचार्य परिच्छेद। | कश्यप, आत्रेय, भेड तथा सुश्रुत के ग्रन्थों की परस्पर तुलना | २६३ | |
| आयुर्वेद का प्रकाश और आचार्य | १८२ | इस ग्रन्थ का विषय | २६७ |
| आत्रेय तथा सुश्रुत संहिताएँ | १८७ | इस में आये हुए देशों का वर्णन | २७३ |
| भेड संहिता | १८७ | ४. भारतीय भेषज्य समर्थन परिच्छेद। | |
| हारीत संहिता | १८८ | भारतीय चिकित्सा का वर्णन | २७६ |
| नवीनोपलब्ध काश्यप संहिता | १८८ | हिपोक्रिटस सम्बन्धी विचार | २९२ |
| कश्यप सम्बन्धी विमर्श | १८९ | ग्रीस तथा भारत की चिकित्सा में समानताएँ | २९६ |
| जीवक सम्बन्धी विचार | १९७ | प्राचीन ग्रीस वैद्यक संप्रदाय | ३०१ |
| वात्स्य निरूपण | २०० | यवनों द्वारा भारतीय विषयों का ग्रहण | ३०४ |
| प्रसङ्गवश निर्दिष्ट अन्य आचार्यों का विवरण | २०७ | भारतीय विद्वानों का ग्रीस में जाना | ३०८ |
| धन्वन्तरि तथा दिवोदास | २०८ | अलेग्जेण्डर द्वारा भारतीय विज्ञान का प्रसार | ३०९ |
| सुश्रुत | २१४ | भारतीय आलोक के प्रसार में अशोक के शिलालेख का स्थान | ३१२ |
| आत्रेय | २२४ |
१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| ग्रीस तथा भारत का प्राचीन काल से सम्बन्ध | ३१३ | वैदिक साहित्यमूलक भारतीय भैषज्य | ३३४ |
| ग्रीस में शस्त्रचिकित्सा का बाद में प्रचार | ३१७ | भारतीय भूगर्भ के अनुसार प्राचीन भैषज्यविषयक विमर्श | ३३६ |
| असीरिया तथा बेबिलोनिया में प्राचीन काल में भैषज्य विषयक ज्ञान | ३२२ | भिन्न-भिन्न देशों के प्राचीन भैषज्य के विमर्श की आवश्यकता | ३३७ |
| मिश्र, बेबिलोनिया, इरान, चीन आदि देशों में भारतीय शब्दों का सादृश्य | ३२२ | ५. उपसंहार परिच्छेद । | |
| प्राचीन भारत का अन्य देशों के साथ सम्बन्ध | ३२४ | प्राचीन आचार्यों का गौरव | ३३८ |
| धन्वन्तरि आदियों की प्राचीनता | ३२६ | प्राचीन ग्रन्थों का लोप और उनकी रक्षा | ३४० |
| प्रत्येक देश तथा काल में भारतीय स्त्रोतों की व्याप्ति | ३२८ | नेपाल ग्रन्थमाला का प्रथम प्रकाश | ३४३ |
| पौष्कलावत, करवीर्य तथा औरभ्रं आदि आचार्यों के विषय में विचार | ३२९ | कृतज्ञता प्रकाशन | ३४३ |
| परिशिष्ट । | |||
| ज्वरसमुच्चय में काश्यपसंहिता के मिलने वाले श्लोक | ३४४ |
॥ श्रीः ॥
उपोद्घातः
आयुष्याम्नायमाम्नाय नानोन्मेषैर्विवर्ध्य च । जगतः श्रेयसे सक्ताः स्मरणीया दयामयाः ॥ १ ॥
यत्प्रातिभरसासिक्त आयुर्वेदमहातरुः । फलत्यद्यापि जगति महात्मानो जयन्ति ते ॥ २ ॥
उपोद्घातप्रस्तावः
यत्किमपि प्रेक्षावतां पुरः प्रदर्श्यमानं किमिदं किमर्थमितीदंप्रथमां जिज्ञासां स्वतः समुत्थापयति। यावद्धि तन्नावगम्यते तावन्न प्रवर्तते सविशेषा दृष्टिः परीक्षका¹णाम् सामान्यतोऽवगते विशेषजिज्ञासोन्मुखीकरोति लोकान्। सति हि बाह्ये सामान्यविज्ञानेऽभीप्सितमर्थमुपादातुं, जिहासितमपार्थं च परिहर्तुं कल्पते लोकः। तामेतामादिमाकाङ्क्षां प्रशमयितुं शास्त्रादावनुबन्धनिर्देशवत्प्रस्तुतग्रन्थसम्बन्धिनोऽन्तरङ्गान् बहिरङ्गांश्च कांश्चन विशेषतो निरीक्षितान् विषयान् भूमिकाप्रस्तावनादिरूपेणोपहृत्य ग्रन्थः पुरस्क्रियत इति समुचितः साम्प्रतिको विपश्चित्सम्प्रदायः। अमुमाचारमनुरुन्धाने चेतसि प्रतिभातमन्यत्र परिदृष्टं च यत्किञ्चन विवेचकानां पुरतः कतिपयैः शब्दैः समुपाहर्तुं लेखनीयं पुरःसरति।
तत्रास्मिन्नुपोद्घाते पञ्च परिच्छेदाः—
(१) सोपक्रम आयुर्वेदपरिच्छेदः ।
(२) आचार्यपरिच्छेदो ग्रन्थपरिचयसहितः ।
(३) संस्कारतुलनादिसहितो विषयपरिच्छेदः ।
(४) भारतीयभैषज्यसमर्थनपरिच्छेदः ।
(५) उपसंहारपरिच्छेदः ।
(१) सोपक्रम आयुर्वेदपरिच्छेदः-
आयुर्वेदविषयोपन्यासः
निष्प्रचममेवेदं विपश्चितां सुखमेव परमः पुरुषार्थ इति ।
तच्च सुखं दुःखनिवृत्त्यात्मकं दुःखविरोधिभावान्तरं वेति द्विधा निरूप्यते विद्वद्भिः । उभयथाऽपि तल्लब्धये सर्वेषां समीहा । सति हि दुःखे तन्निवृत्तिर्वा सुखं वा नोदेतुं प्रभवति । दुःखं नाम बाधनालक्षणं सर्वाधिकमप्रियं जगति । यदतीतमपि स्मर्यमाणं बाधते, वर्तमानमपि यैः कैश्चिदुपायैर्निवर्तयितुमिष्यते, आगाम्यपि साधनावलम्बेन परिहर्तुं प्रयतते । नहि कोऽपि
१. सिद्धार्थं सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥ (श्लोकवार्तिकस्योपक्रमे)
२
काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
सचेता आत्मनो दुःखं समीहते । यावन्तो व्यापारास्तन्निवर्त्य सुखं साधयितुं प्रवर्त्यन्ते, परं सुखसमीहया प्रवर्तमानोऽप्ययथावेदनेन समुपचारपथं परिहायापचारवर्त्मनि प्रवृत्तो दुःखेन खलीक्रियते लोकः । एतस्यैव मार्गालोकाय सर्वाणि शास्त्राणि सर्वे लोकाश्च प्रावर्तन्त प्रवर्तन्ते च ॥
दुःखं च मनःशरीरादिकमात्मानं निमित्तीकृत्य जायमानमाध्यात्मिकं, पञ्चभूतप्राण्यादिभूतनिकायं निमित्तीकृत्य जायमानमाधिभौतिकं, ग्रहयक्षराक्षसविनायकादिकं देवनिकायं निमित्तीकृत्य जायमानमाधिदैविकमिति त्रिषु प्रस्थानेषु विभज्यते । एषु नानाप्रस्थानेषु यं कञ्चन दुःखविशेषमभिलक्ष्य तत्तन्निवृत्तिप्रधानोपायप्रदर्शनेन आध्यात्मिकानि साङ्ख्यादिदर्शनानि, उपासनाशास्त्राणि, नीतिभैषज्याद्यैहिकशास्त्राणि चार्थवन्ति भवन्ति ॥
परमेतान्याध्यात्मिकान्यैहिकानि च सर्वाणि शास्त्राणि शरीरिणां सुजीवनमुपलभ्यैव स्वात्मलाभाय कल्पन्ते । यः कश्चन सचेता नवनवोत्साहसम्पन्नः सदुपायान् विज्ञाय तत्परिष्कृतेन वर्त्मना आत्मानमुन्निनीषुः क्रमेण समीहितं स्थानमारोढुं पारयति । दुर्जीवनेन स्खलद्गतिः क्रियत्याऽपि मात्रया पुरः सर्तुमपारयन्नात्मना कमप्युपयोगं साधयितुं न प्रभवतीति शारीरान् सुजीवनोपायान् प्रतिपादयच्छास्त्रं विशेषतः शास्त्रान्तराणामप्युपजीव्यं भवति । प्रथमतः शरीरबाधया विना कृता स्थितिरस्माज्जीवनादुपेया ऐहिकीः आमुष्मिकीश्चोन्नतीर्गमयति । शरीरं नाम नानाविधैः स्थूलसूक्ष्मातिसूक्ष्मैरवयवैर्गहनाभिस्तत्तदंश-क्रियाप्रक्रियाभिर्यथावदप्रमेयमैश्वरशिल्पमयं महायन्त्रमिवावलोक्यते । यत्र क्वचन स्थूलेषु सूक्ष्मेषु वाऽशेषेषु दृश्याऽदृश्या वा या काचन विक्रिया समुत्पद्यमाना समस्तं शरीरं, न केवलं शरीरमपि तु तदनुस्यूतं शरीरशरीरिसमवायात्मकमान्तरमात्मानमपि विकलभावं प्रापयति । शरीरविक्रियया विक्रियमाणः शरीरी विकलेनान्तररात्मना शैथिल्यमापन्नो दुःखान्तराण्यमपि निरसितुं न भवति । शरीरे निर्बाधे दुःखान्तराणां परिहारोपाया विधातुं पार्यन्ते, फलन्ति च । शरीर एवामयेन विकलतामुपेते तदनुषङ्गेणान्तःकरणे च व्यथिते कठिनतपश्चर्यातीर्थाटनपरोपकारप्रभृतयो धार्मिका विषयाः, शिल्पवाणिज्यवार्तादेशान्तरभ्रमणादय आर्थिका उद्योगाः, यथाकाममाहारविहारविषयोपभोगादयः कामिकाः प्रयोगाः, मानसिकविचारविशेषक्रोधलोभाद्यान्तरिकशत्रुदमनेन्द्रियजयेश्वरभजनादयो मोक्षोपाया अपि न यथावत् प्रवर्तयितुं शक्यन्ते । उक्तमेव— ‘धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलसाधनम्’ । (च. सू. अ. १) इति ॥
तदेवमारोग्यपरिप्लुते जीवनतरौ सम्यञ्चि फलानि फलन्तीति तत्सम्पत्त्या चिरजीवनाय सुजीवनभावाय च शारीरबाधामयान्यैहिकानि च दुःखान्यवश्यं परिहरणीयानि भवन्ति । शारीराणि दुःखानि च नानाविधरोगात्मना शतधा प्ररोहन्ति । ते च शतशो रोगा नैकेनोपायेनोपदेशेन वा विज्ञेयाः परिहरणीया वा भवन्तीति तेषां निवृत्तयेऽनुत्पादाय च ये यावन्त उपाया व्यवस्थितायस्तेषां यावद्बुद्धिबलोदयं परिज्ञानमावश्यकं देहिनाम् ॥
तत्र हेया दुःखात्मानो रोगाः, तेषां हेतवः (निदानादीनि) हेयरोगाणां हानं (निवृत्तिः), हाने साधनानि (भेषजादीनि) चेति चतुर्धा विज्ञातव्यानि भवन्ति । हेयानां स्वरूपाणि परिचित्य ज्ञातैस्तदीयहेतुभिः पूर्वमेव परिह्रियमाणैस्तदनुत्पत्तये, विज्ञातैश्च हानसाधनैः कथञ्चनोत्पन्नानामपि तेषां निवृत्तये भवितव्यम् ।
लोकानां श्रेयः साधनतया हितावहेषु विविधेषु ज्ञान विज्ञानप्रभेदेषु सर्वोपजीव्यं यद्विज्ञानरत्नं तदेवायुर्वेदविज्ञानमित्युच्यते । एतदीयं विज्ञानं न केवलं स्वस्य एकद्रव्यव्यक्तिमात्रस्य वोपकृतये, अपि तु कुटुम्बस्य समाजस्य देशस्याप्युपकृतये समुन्नत्ये च भवतीत्यवश्यं विज्ञेयं शरीरिभिः, उपदेष्टव्यं च विज्ञातृभिरिति विशेषतोऽर्थवानस्यावबोध उपदेशश्च ॥
आयुर्वेदस्य प्राचीनत्वम्
यदा किल स्रष्ट्रा भूतानि भौतिकानि च सृष्टानि तदात्व एव प्राणिनां दीर्घायुष्यसाधनान्यपि विज्ञेयानि बभूवुः । उत्पन्नमात्रा एव मिथ्योपचारेण नष्टाः प्राणिनः कथङ्कारं सर्जनश्रममर्थवन्तं कुर्युः । यथा यथा ते चिरं सत्तां प्राप्नुवन्ति तथा तथा
उपोद्घातः ३
स्रष्टुः समीहितं किमपि सम्पादयितुं पारयेयुः । सतां लब्धवन्तोऽपि विकलाङ्गाः कतमस्मै कामाय कल्पेरन् । अतः सत्त्वबलावष्टब्धेन सकलीभावेन चिरमवस्थानमादित एवापैक्ष्यत । अस्मिंश्च स्रष्टुः शिल्पप्रपञ्चे चरा अचरा भोक्तारो भोज्या एवमादयो नैके प्रभेदाः । भोक्तृभोज्यानामप्यसंख्येयाः प्रकाराः । न खलु सर्वेषां भोक्तॄणां सर्वाणि भोज्यजातान्यनुकूलानि, अपि तु भोक्तॄणां जातिदेशकालावस्थाभेदेनोपकारायापकारायापि प्रतिनियतानि । नह्येकस्यानुकूलं प्रतिकूलं वा वस्तु तथैवसर्वेषाम्, एकस्याप्यनुकूलं प्रतिकूलं वा न सर्वं सर्वदा, अपि तु तत्राप्यवस्थादिविशेषेण व्यवस्थितम् । इतश्च कस्य कदा किमनुकूलं, किं वाऽस्य साधनं, किञ्च प्रतिकूलं, कथं तदुदयः, को वाऽस्य प्रशमनोपाय इति उपादेयं तदुपायः, हेयं हेयहेतुः, हानसाधनमित्येतानि तदात्व एव विजेयान्यभूवन् । सर्वास्वेषणासु प्राणैषणा प्राथम्येनोदेतुमर्हति । अतश्च प्राणिनां सृष्टिरेवायुर्वेदस्य बीजन्यासः ॥
‘अनुत्पाद्यैव प्रजा आयुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत्’ इति सुश्रुतोक्तेस्तौल्येन ‘आयुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत्ततो विश्वानि भूतानि’ इति काश्यपसंहितायां (पृ. ६१) सृष्टितोऽप्यायुर्वेदस्य ज्यैष्ठयं निर्दिश्यमानमपि निमित्तनैमित्तिकयोः पौर्वापर्यानुक्रममनुसन्धाय ‘अग्निहोत्रं जुहोति, यवागूं पचति’ इत्यादी पाठक्रमाद् बलीयांसमार्थक्रममिव ‘^१तव प्रसादस्य पुरस्तु सम्पदः’’ इति प्रसादे सम्पदः क्षेपिष्ठभावमिव वस्तुतः सृष्ट्या सहायुर्वेदस्य घनिष्ठं नेदिष्ठं च सम्बन्धमालङ्कारिकोक्त्याऽभिव्यनक्ति । किं वा बालकस्योत्पत्तेः पूर्वं स्तन्योद्गमनमिव सृष्टेः प्रथमत आयुर्विज्ञानं स्वरसतोऽपि सम्भवति । विकासवाददृशा भौतिकसृष्टेः पूर्वमोषधिवनस्पत्यादीनां सृष्टेः प्रतिपादनमपि भूतोद्भवात् प्रागेव भेषज्यविज्ञानस्य बीजन्यासं दर्शयति । आत्रेयाचार्येण तु ‘सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात् स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वात्’ (च. सू. अ. ३०) इत्यादिना आयुर्वेदीयावबोधोपदेशयोः सादित्वेऽपि संसारस्येवायुर्वेदविज्ञानपरम्पराया अप्यनादित्वं निर्दिष्टमस्ति ।।
आयुर्वेदः
आयुर्वेदशब्दार्थप्रदर्शनेऽस्यां काश्यपसंहितायाम्—‘‘आयुर्जीवितमुच्यते, विद ज्ञाने धातुः, विद्लृ लाभे च; आयुरनेन ज्ञानेन विद्यते ज्ञायते विन्दते लभते न रिष्यतीत्यायुर्वेदः’’ (पृ. ६१) इति दीर्घजीवितस्य ज्ञापकमुपायप्रतिपादनद्वारा प्रापकमविनाशकं च शास्त्रमायुर्वेद इति विधीयमानं निर्वचनमस्य स्वरूपं प्रयोजनं च निदर्शयति । एवं च आयुर्वेदशास्त्रादायुषः स्वरूपं, यैस्तदुपयेते ते उपायाः, विद्यमानमायुर्यैर्विज्ञायते तानि लक्षणानि च वेद्यन्ते, तानि विज्ञाय यथोपदेशं प्रवृत्त आयुरवस्थापयति च, एतज्ज्ञानमन्तरेणाय धावत्प्रवर्तमानं आयुर्विनाशाय प्रभवतीति ससाधनायुरवस्थापकशास्त्रमायुर्वेदशब्दार्थः ॥
तदिदं व्याधिपरिमोक्षः स्वास्थ्यपरिरक्षणं चेति प्रयोजनद्वयमा'त्रेयसु^३श्रुतोक्तिभ्यामपि समन्वेति ॥
आयुर्वेदशब्दोऽयं बहुशाखाविस्तीर्णं चिकित्साविज्ञानमवबोधयन्न केवलं मानवीयं भेषज्यमभिप्रैति, किन्तु हस्त्यश्वगवादीनां पशुपक्षिणां, वृक्षलतादीनामुद्भिद्विज्ञानामपि भेषज्यानि सङ्गृह्णाति । पालका^४प्य-मतङ्ग-शालिहोत्रादयो हस्त्यश्वादिभैषज्योपदेशा-
१. उदेति पूर्वं कुसुमं ततः फलं घनोदयः प्राक् तदनन्तरं पयः । निमित्तनैमित्तिकयोरयं क्रमस्तव प्रसादस्य पुरस्तु सम्पदः ॥
(शाकुन्तले ७ अङ्के)
२. चरकसंहितायां-‘हिताहितं सुखं दुःखम्’ इत्यादिना आत्मनो भोगायतनस्य पञ्चभूतविकारात्मकस्य शरीरस्य, भोगसाधनानां चक्षुरादीन्द्रियाणां, मनसोऽन्तःकरणस्य, ज्ञानप्रतिसन्धातृरात्मनश्चैषामदृष्टविशेषनिष्पन्नः संयोग एवायुःपदार्थः, आयुषः स्वरूपं, तत्र हिताहिते, पथ्यापथ्ये, तत्फलीभूते सुखदुःखे, आयुषस्तत्तदवस्थानुरूपाणि लक्षणानि चेत्येभिः साधनफलादिभिः समन्वितमायुर्वेदयति ज्ञापयतीत्यायुर्वेद इति प्रवचनं निर्दिश्यते (सूत्रस्थाने १ अ. ३०)
३. सुश्रुते—‘‘आयुरस्मिन्विद्यतेऽनेन वाऽऽयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः’’ इति कथनेन शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगरूपमायुरस्मिन् प्रतिपाद्यतया विद्यते, आयुरनेन विद्यते ज्ञायते विचार्यते वा, आयुरनेन विन्दति प्राप्नोतीत्यायुर्वेद इति निर्वचनं विधीयते (सू. अ. १)।
४. शालिहोत्रः सुश्रुताय ह्यायुर्वेदमुक्तवान् । पालकाप्योऽङ्गराजाय गजायुर्वेदम्ब्रवीत् ॥ (अग्निपुराणे २९२ अध्याये)
िति`
द्विविधान्यङ्गानि->द्विविधान्यङ्गानिमीमांसकैर्विभज्यन्ते->मीमांसकैर्विभज्यन्तेयान्यन्तरङ्ग-बहिरङ्गशब्दाभ्यामपि->यान्यन्तरङ्ग-बहिरङ्गशब्दाभ्यामपिवक्ष्यमाणरीत्याभैषज्याययुष्यसंशमनीयकर्मादीनां->वक्ष्यमाणरीत्या भेषज्याययुष्य...orवक्ष्यमाणरीत्याभैषज्यायुष्यसंशमनीयकर्मादीनां? Let's check:वक्ष्यमाणरीत्याभैषज्यायुष्यसंशमनीयकर्मादीनां->भैषज्यायुष्य...(य + ु + ष् + य) ->भैषज्यायुष्यसंशमनीयकर्मादीनां.वेदसंहिताभ्यन्तरेऽपि प्रोततया->वेदसंहिताभ्यन्तरेऽपि प्रोततयाआन्तरविषयाorआवन्तरविषया? ->आवान्तरविषयाorआवन्तरविषया? In text:आवन्तरविषया(without aa matra on va, orआवान्तरविषया).इत्यत आंयुर्वेदीयं-> `इत्यत आयुर्वे
| उपोद्घातः | ५ |
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शिक्षादीनामप्यङ्गभावमुपादाय सुश्रुतस्योपाङ्गत्वोल्लेखः स्यात्तदा शिक्षादेरपि पश्चाद्भावौचित्यवत आयुर्वेदस्य भूतसृष्टेरपि प्राग्भावः सुश्रुतेनैवोक्तः कथं न व्याहन्येत । शिक्षादिषु बहिरङ्गेष्वप्यवयवहतेन वेदशब्देनायुर्वेदस्य निर्देशोऽपि पूर्वभावित्वमेवास्य प्रगुणयति । विज्ञानमहोदधेर्वेदस्यैकतरङ्गरूपेण वर्तमानमिदमायुर्वेदीयविज्ञानं वेदशरीरमनुप्रविष्टमनुसंधाय केचन उपवेदशब्देन, अवयवावयविभावापन्नमनुसंधाय केचन वेदाङ्गशब्देन, स्वल्पावयवात्मकमनुसंधाय केचन वेदोपाङ्गशब्देन, व्यवहरन्तो मिथोऽव्याहतं समन्वयं गमयन्ति । किं बहुना, कश्यपाचार्येण तु उपशब्दमप्यनुपादायपञ्चमवेदत्वेन निर्दिष्टमस्ति । अन्तरवयवाश्च अवयविना सहैवावतिष्ठन्ते, नावयविसमयादुत्तरः समयोऽवयवानाम् । तदेवमुपवेदशब्दसामानाधिकरण्येन वर्तमानोऽयमुपाङ्गशब्दोऽपिआयुर्वेदमुपर्यवारोहयति, नतरामर्बाग्भावशङ्कोदयाय कल्पते ॥
इहेदमनुसंधीयते—ब्राह्मणोपनिषन्महाभारतपुराणस्मृत्यादिषु वेदचतुष्टयोल्लेखोपलम्भेऽपि अथ१र्ववेदे ऋग्यजुः-सामार्थवेदानामुल्लेखेन, त्रिषु वेदेष्वथर्ववेदस्या२नुल्लेखेन च त्रयीविभागः प्राथमिक इति विवेचकानां भणितिः । तत्र मन्त्रात्मके वेदे पद्यात्मक ऋक्, गद्यात्मकं यजुः, गीतात्मकं सामेति त्रिधा विभागः । अस्मिंस्त्रयीविभागेऽथर्वमन्त्राणामपि यथास्वमन्तर्भावः । आर्यहृद्भूविकासवादिमज्ञानसम्पत् त्रयीरू३पेण यदैव प्रादुर्बभूव, तदाऽप्यायुर्वेदविज्ञानमासीदेवेति ऋग्यजुःसामसु त्रिष्वपि तत्र तत्रोपलभ्यमानैस्तद्विषयैरवगम्यते । अथर्ववेदस्य प्रमेयवैशिष्ट्येन पृथग्गणनायामनेन सह चत्वारो वेदाः । ब्राह्मणोपनिषत्सु स्मृतीमीमांसादिष्वपि वेदानां चातुर्विध्योल्लेखश्रुतवेदविदां निर्देशश्चोपलभ्यते । तेन ऋग्यजुः-सामाथर्ववेदानां चतुर्णां पुराकालादेव समकक्षतया प्रामाण्यमित्येतस्मिन्विषये न्यायमञ्जर्यां वेदसर्वस्वे च बहु प्रपञ्चितमस्ति । अथर्ववेदेन सह चतुर्णां वेदानामुपवेदान् प्रदर्शयता चरणव्यूहकृता “ऋग्वेदस्यायुर्वेद उपवेद इत्याह भगवान् व्यासः स्कन्दो वा” इति व्यासस्कन्दमतरूपेण ऋग्वेदोपवेद४त्वमायुर्वेदस्योल्लिखितं दृश्यते । तदुक्त्या त्रिष्वपि वेदप्रस्थानेष्वेवतद्विषयलाभेऽपि, ऋग्वेदे स्ववैद्ययोरश्विनोः सूक्तेष्वन्यत्रापि तादात्विकैरतीतैश्च पुरावृत्तैः सह बहुश आयुर्वेदीयविज्ञानविषयाणामुपलम्भेन विशेषत ऋग्वेदेन सहास्य सम्बन्धमभिप्रेत्य त्रयीदृशा किल व्यासस्कन्दादिभिः कैश्चन पूर्वाचार्यैस्तथाऽभ्युपगतं सम्भाव्यते । यदा कर्मकलापस्यापि विकासविभागविशेषेण शान्तिकपौष्टिकाद्यैहिकश्रेयःकर्माणि दैहिकागन्तुकसंशमनकर्माणि चोपादाय तत्प्रधानस्याथर्ववेदस्य पृथग्गणनयावैदिकं विज्ञानं चतुर्था व्यभज्यत, तदाऽऽथर्वणे विज्ञाने भैषज्य५कर्मणायुष्यकर्माणि भूतादिपरिहारकर्माणि बहुशः पृथग्भावेनादृश्यन्त । कौशिकसूत्रकृताऽपि तथैव तत्र तत्र विनियोगः प्रदर्शितः । तदेवमाथर्वणप्रक्रियायां विशेषरूपमवाप्तस्य शान्तिकपौष्टिकादिशबलितस्य भैषज्यविज्ञानस्य क्रमशो विकसनेन साकमायुर्वेदीयविषयस्यापि विकसनाद्वक्ष्यमाणदिशा वेदान्तरेभ्योऽथर्ववेदे एतदीयविषयबाहुल्यदर्शनाच्च तादात्विकीं स्थितिमुपादाय अथर्वणा सहास्य नेदिष्ठं सम्बन्धमनुपश्यद्भिः पूर्वाचार्यैर्धन्वन्तरियत्रिकश्यपादिभिः पूर्वनिर्दिष्टलेखैरथर्वोपाङ्गत्वमथर्ववेदे विशेषभक्त्यादेशनमथर्वमूलकत्वं चोक्तं युक्तिसङ्गतमवगम्यते ॥
वेदे आयुर्वेदीया विषया
आर्षपरम्परायामानुश्रविकरूपेणानुवर्तमानस्य पूर्वैरपि कर्तुरस्मरणेन, 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै' इत्यादिना पूर्वसिद्धस्यैवेश्वरज्ञानात्मकस्यास्य जगत्स्रष्टुर्मनसि प्रतिभानोल्लेखेन, ऋषीणामपि केवलं मन्त्रद्रष्टृतया च
१. यस्मादृचोऽपातक्षन्यजुर्यस्मादपाकषन् । सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखम् । (अथर्व १०/७/२०)
२. तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । च्छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ।
ऋक् १०/७/८ ; यजुः ३१/७ ; अथर्व १७/६/१३
३. सा वा एषा वाक् त्रेधा विहिता-ऋचो यजूंषि सामानि । (शतपथ १०/५/१७)
४. 'तञ्जोर' पुस्तकालयगतायामुमामहेश्वरसंवादरूपायामन्यस्यां काश्यपसंहितायामपि— “ऋग्वेदस्योपवेदाङ्गं काश्यपं रचितं पुरा । लक्षग्रन्थं महातेजः अमेयं मम दीयताम्(?)” इति ऋग्वेदस्योपवेदत्वेनोल्लेखोऽस्ति ।
५. भेषजं वा आथर्वणानि । (ताण्ड्यमहाब्राह्मणे १२/९/१०)
६
काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
नित्यं पदपदार्थसम्बन्धमवलम्बमानस्यास्य अनादिनित्यत्वमिति वेदार्थमीमांसकानां पूर्वाचार्याणां सिद्धान्तः। वेदेऽपि तस्मात् परमेश्वरात् ऋचः सामानि जज्ञिरे यजुश्चाजा यतेत्युल्लेखोपलम्भेन शब्दस्य प्रत्युच्चारणं नवोत्पत्त्या तत्समुदायात्मकस्य वेदस्य न नित्यत्वमपितु सर्गादावीश्वरेण विरच्योपदेशनात् पौरुषेयत्वमेव, तथाऽपि सकलदोषाशङ्काविनिर्मुक्तस्य परमाप्तस्य परमात्मनः कृतिरूपतया सर्वशतोऽबाधितं प्रामाण्यमिति तार्किकादीनां सिद्धान्तः। अनादिरपौरुषेयः पौरुषेय आर्षो वा भवतु वेदः, कश्चास्य प्रकाशस्योद्गमस्य वा तात्त्विकः समुचितश्च समय इतीदानीं प्रसक्तानुप्रसक्तो विचार आस्तां तावत्। सर्वथाऽपि पूर्वतमैरपि सर्वातिशायिनि प्रमाणपदे प्रतिष्ठापितोऽयमपरिच्छेद्याद्रहोः कालादार्याणां शिरःसु संमानितोऽस्तीत्यत्र न कस्यापि विप्रतिपत्तिः। अद्यत्वेऽपि प्राच्याः पाश्चात्याश्च विपश्चित एनं प्रायः समानदृशैव पश्यन्ति। केवलं पुरातत्त्वानुसन्धानदृशा वैदिकं साहित्यं पर्यालोचयतां विवेचकानां विचारविशेषाणां निरीक्षणेऽपि केषाञ्चिद्द्वादशसहस्रवर्षपूर्वत्ववादः, केषाञ्चिच्चतुःसहस्रवर्षप्राग्भाववादश्चैवमादयो बहवः पक्षाः स्वस्वविचारारूढा दृश्यन्ते। यथातथाऽपि लोके यावन्ति प्राचीनसाहित्यानि तेषु सर्वप्रथमं वैदिकसाहित्यमित्यत्र न केषामपि विमतिः। तेनास्य वैदिकविज्ञानस्य, एतद्गर्भगतस्यायुर्वेदीयविज्ञानस्यापि समय उपर्येवारोहति। तस्मिन् वैदिके विज्ञानव्यूहे विज्ञानान्तराणीवायुर्वेदीयं विज्ञानमपि बहुश ओतं प्रोतं च दृश्यते। तथाहि—
ऋग्वेदसंहितायां—जराजीर्णस्याच्यवनस्य वन्दनस्य च ऋषेरश्विभ्यां रसायनेन पुनर्यौवनापादनं (१. ११६. १०। १. ११७. १३। १. ११९. ७); दासैरग्नौ जलेऽपि प्रक्षेपणे रक्षितस्य दीर्घतमसः पुनर्दासेन वितष्टशिरोवक्षसोप्यश्विभ्यां जीवनेन दशयुगपर्यन्तं जरां परिहार्य रक्षणं (१. १५८. ४-६); रणे शत्रुभिश्छिन्नपदायाः खेलनृपपल्या विष्पलानाम्या अश्विभ्यामायसजङ्घायोजनं (१. ११६. १५); विश्लिष्टाङ्गस्यात्र्यादेवयवसङ्घटनं (१. ११७. १९); शत्रुभिस्त्रिशकलीकृतस्य श्यावाश्वस्याङ्गशकलानि संयोज्य प्रत्युज्जीवनं (१. ११७. २४); किमन्यत्, दधीचस्य शिरः पृथक्कृत्य संरक्ष्याश्वशिरः संयोज्य तस्मादश्विभ्यां मधुविद्याया ग्रहणे तस्याश्वशिरश्छेदे पुनस्ताभ्यां पूर्वशिरसः संयोजनम् (१. ११६. १२। १. ११७. २२); अन्धाय ऋज्राश्वाय दृष्टिदानम् (१.११६.१६/१. ११७. १६); अन्धाय कण्वाय चक्षुर्दानं, बधिराय नार्षद्वदाय श्रोत्रदानं (१. ११७. ८); पङ्गवे परावृजाय विगुणजानवे श्रोणर्षये च गतिदानम् (१. ११२. ८) वधि्रमत्या नपुंसकभर्तृकाया अपि पुत्रोत्पादनं (१. ११६. १३); विश्वकाय विनष्टपुत्रदर्शनं (१. ११६. २३); कुष्ठरोगेण भर्तारमप्राप्य पितृगृहे जीर्यन्त्याः कक्षीवतीपुत्र्या घोषायाः कुष्ठं निवार्य भर्तृदानं (१. ११७. ७); कुष्ठेन श्यामवर्णाय श्यावाय रोगं निवार्य सुन्दरस्त्रीदापनम्) (१. ११७. ८) इत्यादीन्यश्विनोरद्भुतान्यवदानानि, देवभिषग्भ्यामश्विभ्यां वायुद्युपृथिव्यादिभिरिवानुकूलभेषजस्य प्रदानस्य प्रार्थना (१. ८९. ४); अश्विभ्यामोषधिवनस्पत्यादीनां प्रकर्षेणाभिव्यञ्जनं (१. ११६. ८); युवां भैषज्येन भिषजौ स्थ इत्यश्विनोः प्रार्थनम् (१. १५८. ६); अक्षदर्शनसंवैन्द्रियसामर्थ्यजरायनिवृत्तिशतवर्षायुः प्राप्त्यर्थमश्विनोः प्रार्थनं (१. ११६. २५); आर्चत्कस्य संयुक्तृषेश्च निवृत्तप्रसवाया अपि गोरश्विभ्यां प्रसवस्य पयोबाहुल्यस्य च सम्पादनम् (१. ११६. २२। १. ११७. २०); इन्द्रेणापि अन्धाय परावृजाय दृष्टेर्दानं, पङ्गवे श्रोणाय गतेर्दानम् (२. १५. ७) इन्द्रेण अपालायाश्चर्मरोगस्य, तत्पितुः खल्वाटस्य च निवारणम् (८. ९१. ७); इन्द्रस्यौषधिधारकत्वं (२. २३. ७); नानाविष्कृमिवर्णनं तत्प्रतीकारश्च (१. १९१. १-१६); नानायक्ष्मरोगनिरसनं (१०. १६३. १-६); सौरप्रतीकारेण हृद्रोगादीनां निरसनं (१. ५०. ११-१३); जलस्य भेषजत्वम् (१०. १३७. ६। १. २३. १९); ओषधीनां वर्णनम् (१०. ९७. १-२३); यक्ष्माज्ञातयक्ष्मराजयक्ष्मग्राहिपृष्ठ्यामयसिपसिमिहृद्रोगप्रभृतीनां रोगाणामुल्लेखः (१०. ९७. १०५. १३७. १६१. १६७) इत्यादयो बहवो विषयास्तत्र तत्रोपलभ्यन्ते॥
शुक्लयजुःसंहितायामपि द्वादशाध्याये सूक्तद्वये (१२. ७५-८९। १२. ९०-१०१) ओषधीनामगदङ्करत्वं, यक्ष्मनाशकत्वं, यस्तासां खनको यदर्थं च खननमुभयेषामुपकारकत्वं, बलासार्शःश्वयथुगण्डश्लीपदयक्ष्ममुखपाकक्षतादिनाशकत्वं; तत्र तत्र (१९. ८१-९३। २०. ५-९। २५. १-९। ३१.१०-१३/३०/८-१०) अश्वस्य मनुष्यस्य च शारीराङ्गोल्लेखः, यक्ष्मामीवाबलासोपचितपाकारुरो॑विषूचिकाहद्रोगार्मचर्मरोगकुष्ठाङ्गभेदादीनां रोगाणामुल्लेखश्चोपलभ्यते।
उपोद्घातः ७
तैत्तिरीयसंहितायां काम्येष्टिप्रकरणे दृष्टिप्राप्तेर्यक्ष्मोन्मादपरिहारस्य च प्रार्थना, यक्ष्मराजयक्ष्मजन्यरोगोत्पत्तेर्विषयो (२. २. १. १. । २. ४. १४. ५) दृश्यते ॥
सामसंहितायां मृक्प्रदिष्टानां मन्त्राणां प्रवेशेनायुर्वेदविषयावबोधकानां मन्त्राणामुपलम्भेन च साम्नोऽप्यस्मिन् विषये ऋगैकमत्यमवगम्यते ॥
अथर्वसंहितायां तु विशेषेणैतदीया बहुविधा विषया दृश्यन्ते । तत्रोपशतं सूक्तानि मन्त्राश्चैतद्विषये लभ्यन्ते । ऋगादिषु प्राय ऐतिहासिकेन रूपेण क्वचन प्रसङ्गेनाप्यायुर्वेदविषयाः समागच्छन्ति; अथर्वणि तु अन्तराऽन्तरा रोगाः, शारीरकावयवाः, रोगप्रतीकारविशेषाः, तत्तदोषधीनां तेषु तेषु रोगेषूपयोगिता चैवमादयो बहवो विषयाः प्रोता दृश्यन्ते; येनायुर्वेदस्याथर्व-सम्बन्धः स्फुटीभवति । तत्र—
रोगविषये—तक्म (ज्वर) रोगस्य वर्णनं (६. २१. १-३); तद्भेदानां संततशारद-ग्रैष्म-शीत-वार्षिक-तृतीयकादीनां निर्देशः (१. २५. ४ । ५. २२. १-१४); तक्मविभेदस्तत्र मण्डूकोपयोगः (७. १२२. १.२); तदात्वे जाङ्गलप्रदेशतया किलमूञ्जवद्वाहीकगान्धाराङ्गमगधादिषु तक्मप्रक्षेपनिर्देशः (५. २२. १४); बलासस्यास्थिपरुहृदयपीडकत्वं (६. १४. १-३); मन्यागण्डमालायाः ५५ बिभेदत्वं, ग्रैव्यगण्डमालायाः ७७ प्रभेदत्वं, स्कन्ध्यगण्डमालायाः ९९ प्रभेदत्वं (६. २५. १-३); अपचितः (गण्डमालायः) एनी-श्येनी-कृष्णा-रोहिण्य-सूति-केति भेदनिदर्शनं (६. ८३. १-३) शीर्षक्ति-शीर्षामय-कर्णशूल-विलोहित-विसल्पकाऽङ्गभेदाऽङ्गज्वर-विश्वाङ्ग्य-विश्वशारदतक्म-बलास-हरिम-यक्ष्मोधः-काहावाह-क्लोमोदरनाभिहृदयगतयक्ष्म-पार्श्वपृष्ठिवंक्षणान्त्रमज्जंगतपीडा-विद्रध-वातीकारा-ऽलजी-पादजानुश्रोणिपरिमंसोनू-कोष्ठिगाशीर्षवेदनादिनानारोगाणां वर्णनं च (९. १३. १-२२) दृश्यते ॥
शारीरकविषये—शरीरनाडीधमनीनिर्देशः, शिराणां शतत्वस्य धमनीनां सहस्रत्वस्योल्लेखश्च (१. १७. १. ४ । ७. ३६. २); नानारोगैः सह शारीरावयववर्णनं (२. ३३. १-७); नानाशरीरावयवोल्लेखः (२. ३३. २ । ४. १२. ४ । १०. २. १ । १०. ९. १३-२५); केशास्थिस्रावमांसमज्जापर्वोरुपादाष्ठीवच्छिरोहस्तमुखपृष्ठिवर्जह्यापार्श्वजिह्वाग्रीवाकीसत्वगादीनामुल्लेखश्च (११. १०. ११-१५) दृश्यते ॥
प्रतीकारविषये—मूत्राघाते शरशलाकादिभिर्मूत्रिनिः-सारणं भेदनं वा (१. ३. १-९); सुखप्रसवस्तद्विक्रियायां योनिभेदनादि (१. ११. १-६); जलधातनेन व्रणोपचारः (५. ५७. १-३); अपचितां पिडकानां शालाकावेधनम् (७. ७८. १-२); अपचिति लवणोपचारः (७. ८०. १-२) एवमाद्याः शल्य प्रक्रियाः; बहिर्देशाच्छरीरान्तरनुप्रविश्य रोगकारकाणां नानाविधकृमीणां तन्निर्सनस्य च वर्णनं (२. ३१. १-५); चक्षुर्नासिकादन्तादिषु प्रविश्य रोगकारकाणां येवासकष्कषैजस्काशिपिवित्ककासीनां कृमीणां नाशनं (५. २३. १-१३); नानावर्णकृमिवर्णनं, मनुष्यगतानां गवादिगतानां च कृमीणां सौरकिरणैर्निवारणं (२. ३२. १-६); हानिकारकाणां रोगजन्तूनां सौरकिरणैर्नाशनं (४. ३७. १-१२); सौररक्तकिरणैर्हृद्रोगकामलपाण्ड्वादि-रोगनाशनं (१. २२. १-४); प्रातरातपस्वेदनप्रभास्नानजलस्नानां शरीररोगनाशकत्वं (३. ७. १-७); हृदयरोगे हैमवन्नदीजलोपचारः (६. २४ १-३); जलस्य सर्वरोगौषधत्वं (६. ९२. ३); वानस्पत्यपर्वतीयवायोरारोग्यसाधनत्वं (१. १२. १-४), वायोर्भेषत्वम् (४. १३. २-३); आरोग्यवर्णनं (२. १०. १-८); क्लैब्यनाशनोपायदर्शनं (६. १३८. १-५); चैवमादयो विषया लभ्यन्ते ॥
औषधविषये—नक्तरामाकृष्णाऽसिक्रीब्रह्मासंज्ञकौषधीनां किलासपलितादिनाशकत्वं (१. २३. १-४); सुपर्णाऽऽसुरीसरू पाश्यामाद्यौषधीनां त्वग्रोगनिवारकत्वं (१. २४. १-४); वल्मीकलभ्यौषधविशेषस्य अतीसारातिमुत्रनाडीव्रणादिनाशकत्वं (२. ३. १-६); पृष्णिपर्ण्या गर्भनाशरक्तविकारप्रतीकारशरीरवृद्धिकारकत्वं (२. २५. १-४); हरिणशृङ्गस्य तच्चर्मणश्च क्षयकुष्ठापस्मारादिनाशकत्वं (३. ७. १-३); शतवीर्याया दूर्वाया दीर्घायुष्यानानारोगनिबर्हणकारकत्वं (३. ११. १-८);
२ का.सं.
८
काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
वृषाशुभाद्यौषधीनां वृष्यत्वं (४. ४. १-८); रोहिण्योषधेर्भग्नसन्धानक्षतप्रतीकारकत्वेन वर्णनं (४. १२. १-७); सहदेव्या अपामार्गस्य च तृषाक्षुधेन्द्रियादिगतनानारोगकृत्याशश्वादिनाशकत्वेन महिमवर्णनम् (४. १७. १-८ । ४. १८. १-८ । ४. १९. १-८); अपामार्गस्य पापनिवर्तकत्वं मुखदन्तशोधकत्वं च (७.६७. १-३); सिलाच्योषधेर्महिमगानं (५. ५. १-९); कुष्ठौषधेस्तक्मयक्ष्मकुष्ठादिनाशकत्वं (५. ४. १-१०); कुष्ठौषधेर्वर्णनं (६. ९५. १-३), कुष्ठधूपस्य तक्मनाशकत्वं, कुष्ठस्य विश्वभेषजत्वयातुधानतक्मनाशकत्वादिमहिमा (१९. ३९. १-१०); आशरीकविशरीकपृष्ठिकाविश्वसारदतक्मसु जङ्गिडौषधोपयोगः (५. २२. १-२४); जङ्गिडौषधेर्वर्णनं, तन्मणिबन्धनं, तस्य कृत्यानाशकत्वमायुष्करत्वं, विष्कन्ध (वातरोग) नाशकत्वम्, आशरीकविशरीकवलासपृष्ट्यामयविश्वशारदतक्मनाशकत्वं (२.४. १-६ । १९. ३४. १-१०); जङ्गिडस्य विष्कन्धहरत्वं, विश्वभेषजत्वं, यक्ष्महरत्वं, वातरोगनाशकत्वं, श्वित्रद्रुपमादितवग्दोषदुर्नामरोगनाशकत्वं (१९. ३५. १-५); विषाणौषधे रक्तस्त्रावेवातरोगे च हितकारकत्वं (६. ८४. १-३); वरणौषधेर्यक्ष्मनाशकत्वं (६. ८५. १-३); पिप्पल्याः क्षिप्तातिविद्धवातीकृतरोगभेषजत्वं (६. १०९. १-३); वलासविद्रधलोहितकविसल्पकरोगेषु चीपद्रुनामकौषधेरुपयोगः (६. १२७. १-३); देवीतितत्त्योषधेः केशवर्धनोपायस्य वर्णनं (६. १३६. १-३ । ६. १३७. १.३); गुग्गुलुधूपस्य गन्धेन यक्ष्मनाशः (१९. ३६. १-३); जलवायुद्वारा प्रसर्पिणां रोगाणां नाशकत्वेन अजश्रृङ्ग्याः, जलद्वारा प्रसर्पिणां रोगाणां नाशकत्वेन गुग्गुलुपीलानलद्यौक्षगन्धिप्रमन्दिनीनां, प्रसारिरोगनाशकत्वेन अश्वत्थन्यग्रोधशिखण्ड्याद्योषधीनां च वर्णनम् (४. ३७. १-१२); ओषधीनां महिमगानम् (६. २१. १-३); असिक्रीकृष्णापृष्णिप्रस्तृणतीस्तम्बिन्येकशुङ्गाप्रतन्वत्यंशुपतीकण्डिनी विशाखावैश्वदेव्याऽवकोल्वातीक्ष्णशृङ्ग्यादिरूपेण नानौषधीनां प्रकाराणां च वर्णनं; नानावीरूद्रसनिर्मितगुटिकात्मकवैयाघ्रमणेर्वर्णनम्, अश्वत्थदर्भसोमव्रीहियवानां, पुष्पवतीप्रसूमतीफलिन्यफलाप्रकाराणां विषदूषणीकृत्यानाशनबलासनासनादिगुणानामोषधीनां च वर्णनं (८. ७. १-२८); दर्भभङ्ग (शण) यवसहासोमवर्णनं (११. ८. १५); ब्राह्मणनामकौषधेर्विषहरत्वम्, अयस्कम्पौषधेर्विषदिग्धशस्त्रव्रणादिहितकरतृत्वं, पर्णाधिश्रृङ्कङ्कम्लानां शस्त्रप्राणयोषधिविषहरत्वं (४. ६. १-८); वरणाप्रक्रूयाद्योषधीनां विषहरत्वं (४. ७. १-७); नानाजातीयसर्पादीनुल्लिख्य तानुववास्तुवाद्योषधीनां विषहरत्ववर्णनं (५. १३. १-११); मधुपतृष्णीशीपालानां सर्पविशनाशकत्वं (६. १२. १-३); व्याख्याभेदेन वल्मीकमृदः सिलाच्योषधेर्वा विषनाशकत्वं (६. १००, १-३); मधुकौषधेर्नानाविधसर्पकृमिविषनिवर्तकत्वं (७. ५६. १-८); विषेणैव विषप्रतीकारः (७. ८८. १); विषदोहनविद्यया विषप्रतीकारः (८. ५. १-१६ । ८. ६. १-४); परचक्रागमे ऐन्द्रशान्तौ दर्भमणिबन्धनं (१९. २८. १. १० । १०. २९. १-९. । १९. ३०. १-५); पुष्टिकामस्यौदुम्बरमणिबन्धनं (१९. ३१. १-४४); मृत्युभयनिवृत्तये दर्भमणिबन्धनं (१९. ३२. १-२ । १९. ३३. १-५) चेत्यादयः शतश ओषधीनां निर्देशाः प्रभेदाः प्रयोगा उपयोगाश्च तत्र तत्रोपलभ्यन्ते ॥
ब्राह्मणग्रन्थेष्वपि—ऐतरेये—ऋचन शरीरोत्पत्तेः प्राणस्यचोल्लेखः, अश्विनोर्देववैद्यत्वनिर्देशः, ज्ञानेन्द्रियवर्णनम् (५. २२), ओषधीनां रोगनिवारकत्वम् (३. ४०), अञ्जनेन नेत्रामयनिवृत्तिः (१. ३), शापाद्प्युन्मादकुष्ठादीनामुद्भवः, शुनःशेपाख्याने वरुणकोपेन जलोदररोगः, छन्दोग्ये—हृदयनाडीवर्णनम् (८. १. ६), आहारपाकप्रक्रिया (६. ५), निद्रास्वप्नोल्लेखः (४. ३. ३), पामारोगवर्णनम् (४. १. ८), रोगं निरस्य षोडशाधिकशतवर्षायुष्यकारकस्योपायस्योल्लेखः (३. १६); बृहदारण्यके—अश्वाङ्गानां (१. १. १), मनुष्याङ्गानां (२. ४. ११) हृदयतन्नाडीनां वर्णनं (२. १. १९।४. २. २४. ३. २०), मनुष्यवृक्षयोस्तुलना (३. ९. २८), नेत्ररचना (२. २. ३), मृत्योल्लेखः (३. २. ११), शापाद्रोगोत्पत्तिः (३. ७. १ । ३. (९. २६); सामविधानब्राह्मणे—सर्पेभ्यो रक्षणं (२. ३. ३), भूताक्रान्तिः (२. २. २), रोगाक्रान्तिः (२. ३. ३); तैत्तिरीयारण्यके—कृमिवर्णनम् (४. ३६, १); श्रौतग्रन्थेषुआश्वलायनीये—यज्ञीयपशुषु ऋत्विक्षु च परिहरणीयानां रोगाणां निर्देशः; आपस्तम्बीये—कृमिवर्णनम् (१५. १९. ५); गृह्यग्रन्थेषु-आश्वलायनीये—सूर्योदयास्तसमययोः शयनस्य रोगहेतुत्वं (३. ७. १. २), यजमाने परिहरणीयस्य रोगस्योल्लेखः (१. २३. २०), पशुरोगनिवर्तनम् (४. ८. ४०).
उपोद्घातः ९
शाङ्ख्यायनीये—शारीरपीडासमये वेदमन्त्रगाननिषेधः (४. ७. ३६), आग्रहायणयज्ञे भोज्यवस्तुषु भूतनिवर्तनं (३. ८), सर्वरोगनिवर्तनं (५. ६. १-२); गोभिलीये—रोगनिवर्तकमन्त्रोल्लेखः (४. ६. २), सर्पदंशोपायः (४. ९. १६); आपस्तम्बीये—रुग्णस्त्रियाः पद्मपत्रादिभिरभिमन्त्रणं (३. ९. १०), अर्धशिरः पीडायाः कृमिहेतुकत्वनिर्देशः, बालके अपस्माररोगस्य हेतुतया कुक्कुरभूतस्योल्लेखः (७. १८. १), बालके क्षेत्रियरोगपरिहारः (६. १५. ४); पारस्करीये—शिरपीडाया मर्दनेन प्रतीकारः (३-६); हिरण्यकेशीये—अग्ने रोगनाशकत्वं (१. २. २८), बालकस्य क्षेत्रियरोगनिवर्तनं (२. ३. १०); खादिरे—कृमिवर्णन (४. ४. ३); गोरोगनिवृत्तये होमधूमप्रदेशे चारणं (४. ३. १३), सर्पदंशोपायः (४. ४-१) इत्यादीशा आयुर्वेदसम्बन्धिनो विषयास्तत्र तत्र न्यूनाधिकरूपेणोपलभ्यन्ते ॥
वैदिके साहित्ये आयुर्वेदीयविषयानुपादय ब्लूमफील्ड (M. Bloomfield), हिलब्राण्ड (A. Hillebrand), केलेण्ड (Caland), डॉ. पी. कार्डीयर् (P. Cordier), जाली (J. Jolly), बोलिङ (G. M. Bolling) झीमर (Zimmer) प्रभृतिभिः पाश्चात्यैर्विपश्चिद्भिः भारतीयैरपि कैश्चन विद्वद्भिर्बहुशो निरूपितमस्ति । सर्वास्वेषु विमर्शस्योपयोगित्वेऽपि प्रासङ्गिकविस्तरभयेनेह विरम्यते ॥
कौशिकसूत्रकृता तत्तन्मन्त्राणां विनियोगस्य प्रदर्शने तन्मन्त्रमहिमानमादर्शयता चतुर्थाध्याये 'अथ भैषज्यानि' इत्युपक्रम्य तत्तद्रोगप्रतीकारोपवर्णने तत्तन्मन्त्रैरभिमन्त्र्य जलौषधादिपानहवनमार्जनादयोऽपि बहुश उपाया उपवर्णिता दृश्यन्ते । मन्त्रसंहितामादाय प्रवृत्तेऽस्मिन्मान्त्रिकविधानान्यप्यनुस्यूतानि भवन्तु नाम, परं-तकम्रोगे वातिके मांसमेदःपानं, श्लैष्मिके मधुपानं, वातपित्तजे तैलपानं, धनुर्वाताङ्गकम्पशरीरभङ्गादिवातरोगेषु घृतस्य नस्यदानं, रुधिरवहने स्त्रीरजसोऽतिप्रवर्तने शुष्कपङ्कमृत्तिकापानं, हृद्रोगे कामले च व्याधितस्य हरिद्रौदनभोजनं, श्वेतकुष्ठेयावल्लोहितं कुष्ठं गोमयेन प्रघृष्य भृङ्गराजहरिद्रेन्द्रवारुणीनीलिकापुष्पाणि पिष्ट्वा लेपनं, वातविकारे पिप्पलप्राशनं, शस्त्रावघाते रुधिरप्रवाहे व्याधिस्थले कथितलाक्षोदकसेचनं, राजयक्ष्मकुष्ठशिरोरोगसर्वाङ्गत्रावेदनासु नवनीतमिश्रकुष्ठपिष्टेन व्याधितशरीरलेपनं, शस्त्राभिघाते कथितदुग्धलाक्षापानं गण्डमालायां शङ्खं घृष्ट्वा लेपनं, जलौकां संसृज्य रुधिरप्रवाहणं, सैन्धवलवणचूर्णप्रकिरणं, व्रणे गोमूत्रेण व्रणमर्दनं, मूत्रपुरीषप्रतिरोधे भेदनीयहरीतक्यादिद्रव्यबन्धनम्, आखुकिरिपूतीकमथितजरत्प्रमन्दसावस्कानां जलेनालोड्य पानम्, अश्वाद्यारोहणं, बाणमोक्षणं, गोदोहन्यां जले एकविंशतियवात्रिधाय शिश्ने ऊर्ध्वमुखे तज्जलप्रवेशनं, लोहशलाकायाः प्रवेशनं, यवगोधूम-वल्लीपद्ममूलपाविकाकाष्ठरूपस्य आलविसोलफाण्टस्य पानमित्यादीनि भेषजान्यपि प्रतीकारोपायतया निर्दिष्टानि सन्ति । मन्त्रप्रतिष्ठापनीयेऽपि शान्त्युदके शमी-शम-काश-वंशा-शाम्य-वाका-तलाशा-पलाश-वाशा-शिंशपा-शिम्बल-सिपुन-दर्भापामार्ग-कृति-लोष्ट-वल्मीक-वपा-दूर्वाप्रान्त-व्रीहि-यवादयः शान्तौषधयो निक्षेप्तुं विधीयमानास्तदुदकस्य भैषज्यदृष्ट्याऽपि बहुबाधापहारित्वं ज्ञापयन्तीति मान्त्रिक्यां क्रियायामिव भेषजविद्यायामपि सूत्रकृतस्तदुपात्ताथर्वसंहितायां अप्यान्तरः समन्वयो विज्ञायते ॥
प्राचीनकाले शारीरधातुवैषम्यादय इव रक्षोभूतप्रेतपिशाचग्रहस्कन्दादीनां रुद्रादिदेवानां कोपावेशादयोऽपि रोगकारणतया मता आसन्, येन वैदिकमन्त्रलिङ्गादपि 'रक्षोहामीवचातनः' इत्यादिरूपेण रोगनिरसनाय तन्निदानभूतानां रक्षः-प्रभृतीनामपाकरणमप्युपायतया निर्दिष्टमुपलभ्यते । पश्चात्तनवैद्यकग्रन्थेष्वप्युन्मादापस्मारादिषु भूताद्यावेशादीनामपि निदानत्वेनोल्लेख उपलभ्यते । वैदिकावस्थायामप्येतद्दृष्टेर्विशेषेणकौशिकसूत्रादिष्वाथर्वणमन्त्रविशेषाणां तत्र तत्र रोगे तन्निदानभूतरक्षःप्रभृत्यपसारणपरत्वेन विनियोग उपदर्शितः । तत्तद्रोगकारणत्वेन निरसनीयतयाऽथर्वादिमन्त्रेषु निर्दिष्टा नानाजातीयकृम्यादयोऽपि रोगकारणीभूतरक्षोभूतादिपरा इत्यपि केषाञ्चिद्विचारोऽस्ति । ते च रोगबीजाणुकीटा रक्षोभूतादयो वेत्युभयथाऽपि सम्भवन्ति । त्रिशिरस्त्रिपादपादरक्तलोचनादिरूपेण ज्वरादिरोगाणां मूर्तयो ग्रन्थकृद्भिरुल्लिखिता दृश्यन्ते, यास्तन्निदानभूतानां रक्षःप्रभृतीनां बीजाणुकीटानां वा रूपाण्यध्यारोप्य कल्पिता अपि सम्भवन्ति । अद्यत्वे सूक्ष्मवीक्षणयन्त्रैरवेक्षणे तेषु तेषु रोगेषु विचित्रविचित्राकृतयो रोगबीजाणुकीटा उपलभ्यन्ते ।
१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
एवंविधान्भीषणाकृतीन् कीटाणूनन्तर्दृशोपलब्धवद्भिः पुरातनैर्महर्ष्यादिभिस्तेषां रक्षोरूपेण वर्णनं विहितं किमु ? अद्यापि पर्वतीयादिजातिषु ज्वरादीनां भूतादिजन्यत्वमङ्गीकृत्य अपामार्गननप्राण्यन्तरसंक्रमणबलिदानादयोमान्त्रिका उपचाराः प्रायो विधीयन्ते, सफलतामुपयान्ति च। अद्यत्वे काचित्कव्यवहाररूपेण दृश्यमाना अपीदृशा उपाया न निर्मूलाः, अपि तु प्राचीनवैदिकावस्थात आरभ्यैवानुवर्तमाना विच्छिन्नविकलाङ्गेन केनापि रूपेणावशिष्यन्ते इत्यध्यवसातुं शक्यते। ईदृशो मान्त्रिकप्रक्रियासंवलितो भैषज्यविषयो न केवलं प्राचीनभारत एव, अपि तु प्राचीनमिश्रपाश्चात्यदेशेषु उत्तरअमेरिकारपर्यन्तदेशान्तरेष्वपि आसीदिति तत्तदीयपूर्ववृत्तानुसन्धानतः स्फुटीभवति ॥
आथर्वणसम्प्रदाये केवलं मान्त्रिकी भूतविद्यैव रोगनिरसनोपाय आसीदिति केषाञ्चिद्विचारो न सर्वश तः स्थिरीभवति। वैदिके समये मिथ्याहारव्यवहारा इव पापानि भूतप्रेतादयो रुद्रादिदेवकोपा अपि रोगहेतुतया, औषधविशेषाणां प्रयोगा इव तत्तद्देवतानामाराधनेन प्रसाधनानि, मन्त्रविशेषैर्भूतादीनपसारयितुं रोगिणां मार्जनजलाभिषेचनाभिमन्त्रणधूपनादीन्यपि रोगनिरसनोपायतया उपलभ्यन्तां नाम, तथाऽपि पूर्वोपदर्शितदिशा बहूनां रोगाणां क्वचन शल्यप्रक्रियायाः बहूनां शरीरावयवानामेकसहस्रसंख्यानां तत्तद्रोगनिबर्हकाणामोषधीनां च मन्त्रलिङ्गतः स्पष्टमवगमेन मन्त्रविद्यायामिव भेषजयप्रक्रियायामप्याथर्वणी प्रवृत्तिरासीदिति स्फुटीभवत्येव। तेन मन्त्रविद्या ओषधिविद्या चेत्युभये वर्त्मनी पूर्वैः परिगृहीते अवगम्येते। परमाथर्वणसूक्तमन्त्राणां केषाञ्चिच्छाब्दिकार्थलोचने भूतविद्याघसंपृक्तायुर्वेदीयविषयप्रतिपादकत्वेन दृश्यमानानामपि कौशिकसूत्रकृताऽभिचार-मन्त्रकरण्डकबन्धनभूतापसारणादिपरत्वेन विनियोजनं जलादिप्रतिपादकानां शन्नोदेवीरित्यादिमन्त्राणां शनिग्रहादिपरत्वेन गृह्यकारादिविनियोजनमिव कालक्रमागतं दृष्टिभेदं विभावयति ॥
ऋक्संहितानामल्पमात्रया दृश्यमानाय मान्त्रिकोपचारप्रक्रियाया भैषज्यविद्यायाश्चाथर्वणे आधिक्यदर्शनेन विकासः, तदनु मन्त्रलिङ्गतः केवलभैषज्यावबोधकत्वेन दृष्टानामपि मन्त्राणां मान्त्रिकप्रक्रियया कौशिकसूत्रकृता विनियोजनस्य दर्शनेन तत्सूत्रकाले मान्त्रिकप्रक्रियाया विकासविशेषः प्रावर्ततेति क्रमविकासपरम्पराऽवसीयते। किंवा अथर्वा भूतविद्यायामाचार्य आसीदिति श्रूयते। तत एवाथर्वणे वेदे भूतविद्याया मान्त्रिकप्रक्रियायाश्च विषया बहुतलया संमिलिता भवेयुः। अस्मिन् कौमारभृत्यतन्त्रे बालरोगेषु स्कन्दापस्मारग्रहपूतनादयो निदानतया धूपनपूजनादयः प्रतीकारतया इव धातुवैषम्यादिकमपि रोगहेतुतया तत्तदौषधोपयोगा अपि निबर्हणोपायतया प्रतिपाद्यमानाः पूर्वकालानुवृत्तामुभयतो दृशं निदर्शयन्ति ॥
वैदिकसाहित्ये बहुशो वैद्यकविषयोपलम्भेऽपि पूर्वोपदर्शितरीत्या ऋग्वेदे अश्विप्रभृतीनां तत्तदवदानरूपाणां भैषज्यविषयाणां केवलमैतिहासिकेन रूपेणोपलम्भो भवति। कया प्रक्रिययाऽश्विभ्यां विश्पलाया जङ्घा योजिता, ऋज्राश्वस्य चक्षुषी उन्मीलिते श्रोणस्य जानु प्रगुणीकृतमित्यादयो विधानविशेषा न ततोऽवगम्यन्ते। क्वचित् कानिचिद्दोषधानि कीर्त्यन्ते, न तत्र तेषामुपयोगप्रक्रिया निर्दिश्यते। अथर्वसंहियां यद्यपि नानारोगा, औषधानि, रोगहेतवः, कृतिप्रभृतयः, अमुकौषध्युपयोगेऽमुकरोगप्रतीकार इत्यादयो विषयविशेषा अपि क्वचन मन्त्रलिङ्गतोऽवगम्यन्ते, तथाऽपि नैतावता तदीयोपयोगप्रक्रियाविशेषा ज्ञातव्या अवबुध्यन्ते इति मन्त्रलिङ्गानि केवलं तादात्विकीमायुर्वेदविज्ञानपरिस्थितिं सूचयन्ति ॥
“यत्रौषधीः समग्मत राजानः समिताविव। विप्रः स उच्यते भिषग्रक्षोहामीव चातनः ॥
(ऋक्. १०. ९७. ६)
शतं ते राजन् भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिस्तेऽस्तु ॥
(ऋग् १. २४. ९)
शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमृत वीरुधः ॥”
(अथर्व २. ९. ३)
उपोद्घातः ११
इत्यादिमन्त्रलिङ्गेभ्यः शतश ओषधीनां संग्रहीतारो विप्रा भिषज आसन्, भिषजोऽपि न केवलमेकद्वाः, अपितु शतशः; ओषधित्वेन ज्ञाता लतादयोऽपि न विरलाः किन्तु सहस्रश आसन्नित्यवगमनेनातिपूर्वकालेऽपि शतश एतत्प्रस्थान-यायिभिर्महर्षिभिरवलम्ब्यमानस्तदीयं विज्ञानविशेषं विशदीकुर्वन्, उपयोगप्रक्रियां कार्त्स्न्येन निदर्शयन्, अशेषैः शृङ्खलितरूपैर्भैषज्यविषयैस्तदेकप्रधानताय सन्दृब्धोऽन्य एवायुर्वेदः पृथग्ग्रन्थरूपेणावस्थितः स्यात् । यतो विज्ञेयानां विषयविशेषाणां सूचनाः, तदुपयोगेन सञ्जातलाभानामितिवृत्तानि च वेदेषु तत्र तत्र विरलविकीर्णभावेनास्माभिर्लभ्यन्ते । वेदशब्देन समष्ट्यात्मनाऽवस्थितमाद्यज्ञानं, तत्सन्निकृष्टं व्यष्टिविशेषविज्ञानमुपवेदशब्देनावबोध्यते । गान्धर्वधनुष्यस्थापत्यादि-विज्ञानवद्व्यष्ट्यात्मनाऽवस्थितमायुष्यरक्षाविज्ञानमायुर्वेदशब्दोऽवबोधयति । सोऽयं प्राचीन आयुर्वेदो ब्रह्माश्वीन्द्रसंहितारूपेण पृथगात्मनाऽवस्थितः स्यात् । येन कैश्चनाचार्यैरुपवेदरूपेण, कश्यपेन पञ्चमवेदरूपेण निर्देशनमपि साधु सिध्यति । सोऽयं प्रत्नो मूलभूत आयुर्वेदः करालकालमुखप्रविष्टतया नै पृथगुपलभ्यते, केवलं वैदिकसंहितादिषु तत्र तत्र विरलविकीर्णभावमापन्नैः कैश्चनांशैः, सम्प्रदायपरम्परया केषाञ्चिन्महर्षिप्रभृतीनां लेखन्यामवतीर्णैः कैश्चनांशैरात्मलाभमवगमयति, प्रकाशं च ददाति ।
उपलभ्यमानायुर्वेदीयप्राचीनसंहितागतान् परिदृश्यमानवैदिकसाहित्यगतांश्चायुर्वेदीयविषयान् पुरो निधाय विमर्शेऽपि रोगाणां संज्ञाः, ओषधीनां नामानि, प्रयोगप्रक्रिया, निरूपणशैली च, बहुशो वैलक्षण्येन दृश्यन्ते । आर्षसंहितागतेषु विषयेषु वैदिकबिषयेभ्यः क्रमागता विकसितावस्थाऽपि विशेषविधया दृश्यते । भाषाशास्त्रदृष्टिरपि एवंरूपां परिवृत्तिं न स्वल्पान्तराले सम्भावयति । प्राचीनत्वेन संमानितानां सूत्रादिग्रन्थानामुपद्विसहस्रवर्षपूर्वतनानां कविलेखानां बौद्धसाहित्यानां, किं बहुना काश्यपात्रेयधन्वन्तरिलेखानाम्प्याधुनिकलेखैः सह तुलनायां लेखशैल्या भाषादृशा च यावदन्तरमुपलभ्यते, ततोऽप्यतिमात्रयाऽन्तरं वैदिकसंहितागतादायुर्वेदविषयादार्षसंहितागते तद्विषये समीक्ष्यते । सोऽयमीदृशो विशेषो बहोः समयस्यान्तरालमन्तरा न सम्भवति । यस्मिन् कस्मिन्नपि साहित्ये विज्ञानविकासः क्रमिक एव दृश्यते । आयुर्वेदीयविज्ञानेऽपि वैदिकसाहित्यात् संहितातन्त्रसाहित्ये विषयविकास उपलभ्यमानो बहुकालक्रमागतं पूर्वपरम्परामवलम्बते । वैदिकसंहितासाहित्यमनुब्राह्मणोप-निषत्कल्पसूत्रादिधारासु विरलतया वहन्नप्यायुर्वेदविज्ञानप्रवाहः स्वाचार्यपरम्पराप्रवाहपरिपोषमन्तरा प्राचीनार्षसंहितातन्त्रादिषु ज्ञानोदधिं कथमनुदर्शयेत् । तेन तत्र तत्र पूर्वाचार्यैरपि निर्दिष्ठानां नामशेषाणामन्येषामनिर्दिष्टानां नाम्नाऽपि विलुप्तानां च पूर्वतराचार्याणामौपदेशिकी विज्ञानपरम्परैव अस्मिन्नायुर्वेदीयविज्ञानप्रवाहे वैदिकं साहित्यं प्राचीनसंहिताश्चान्तरा सेतु रूपेण वर्तेत । अदृश्ययाऽप्यनया मध्यसेतुभूतया परम्परया अन्ततो गत्वा एकद्वसहस्रवर्षेभ्योऽप्यन्यूनयैव भवितव्यम् । “विविधानि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके” इत्युल्लिखन्नत्रेयाचार्यः स्वसमयेऽप्याचार्यान्तरशास्त्रोपलम्भं दर्शयति । तेनात्रेयादिभ्यः पूर्वमप्याचार्यान्तराणां सत्त्वं स्फुटीभवति ॥
इहेदमनुसन्धेयं भवति, वैदिके आयुर्वेदीय विज्ञाने शल्यप्रक्रियायां शारीरकादिविभागान्तरेषु वा सूक्ष्मा अपि विचारविशेषाः समुन्मिषन्ति । औषधप्रक्रियायाः पर्यालोचने धातुरत्नरसादयस्तादात्विकीं प्रक्रियामनारूढाः, वनस्पत्यादीनि साधारणान्यैवौषधानि प्रायः प्रयुज्यमानानि विज्ञायन्ते । तत्रापि पूर्वोद्दिष्टमन्त्रलिङ्गाद्यालोचनेन जङ्गिडकुष्ठरोहिण्यपामार्गप्रभृतयःप्राय एकैकश एव पदार्थास्तत्तद्रोगोपशमाय प्रयुज्यमाना आसन्नित्यवगम्यते । कौशिकसूत्रकृदपि प्रायस्तथैवैकैकशं वस्तूनां मधुतैलघृतपिप्पलंकाष्ठादीनां तत्र तत्र रोगे उपयोगं दर्शयति । आलविसोलपराण्ट-भृङ्गराजादिपुष्परसलेप-नवनीतमिश्रकुष्ठपिष्टलेप-कथितदुग्धलाक्षापानादीन् द्वित्रवस्तु योगोपचारान् कतिपयानेवोल्लिखति । तत्तद्रोगाणां तत्तद्दोषहराणां वस्तूनां च यथा-वदवगमे यथावसरं परिहारोपायाः स्वयमूहितुं शक्यन्ते इति निध्याय मूलपरिभाषारूपेण विज्ञेयान् शास्त्रार्थानुपादाय वातिकपैत्तिकश्लैष्मिकतद्धरजीवनीय-बृंहणीयतर्पणीयसंशमनीयवृष्यादिरूपेण वर्गश ओषधीर्विभज्य मूलभूतानि निहरणसाधनानि पञ्चकर्माणि चैवमादीन् प्रधानविषयान् सङ्गृह्य तत्तत्संहिताकर्तृभिः सूत्रस्थानमादितो न्यबध्यत । तावताऽपि यथावद्विज्ञातेन विशुद्धप्रतिभानवता प्रणिधानकल्पितैर्यौगौषधै रोगाः परिहर्तुं शक्यन्त इति सूत्रस्थानमात्रमपि भैषज्यपर्याप्तं पूर्वरूपमिति वक्तुं न खलु न शक्यते । अद्यत्वेऽपि ग्राम्यपर्वतीयादिव्यवहारेषु
१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
तत्र तत्र रोगे एकद्ववानस्पत्यौषधोपयोगस्तथैव निर्वाहश्चाभिदृश्यमानः प्राचीनां मौलिकीं प्रक्रयामनुवृत्तां निदर्शयति। अनन्तरं तत्तद्वस्तूनां गुणागुणपरीक्षानुभवे विवर्धमाने रोगेषु मिथः साङ्कर्यमवाप्तानां सर्वदोषाणामेकप्रयोगेण परिजिहीर्षया समानगुणानां विशेषगुणानां चौषधानां योगेन सामूहिकप्रयोगदृष्टिरपि प्रावर्तत। यथा यथा प्राणिनिकायस्याभिवृद्धिः, देशकालजलवाय्वन्नपानस्थानावस्थादीनां परिवृत्तिः, मिथः सन्निकर्षसङ्घर्षा दीनां चोदयः, तन्मूला बाह्या आभ्यन्तराश्च शारीरिका विकारा नानारोगात्मना प्रादुरासँस्तथा तथाऽनुक्रमेण तत्परिच्छेदस्य तन्निवृत्त्युपायदृक्कौशलस्याप्युपचयेन परिस्थितिविभेदतः स एव रोगोऽनेकधा दृश्यमानः कश्चन सङ्कीर्णेन नवरूपेण नव्या संज्ञायाऽपि व्यवह्रियमाणो बभूव। परिहरणीयतत्तद्दोषपरिपन्थिनां वस्तूनां व्यूहात्मकानि योगौषधान्यप्यनेकशतः कल्पितानि भवेयुः। ईदृशानि पूर्वैः कल्पितानि प्रणिधानोज्ज्वलेष्वन्तःकरणेषु स्वयं प्रतिभातानि योगौषधान्यप्यन्तर्निवेश्य प्रायः सूत्रस्थानलभ्यान् विषयानुपादाय विचारविशेषैश्चोपबृंह्य सूत्रस्थानविवरणात्मना किल स्थानान्तराण्यपि संयोज्य समुच्चितेन संहितारूपेण निबन्धने महर्षयः प्रवृत्ताः स्युः। एवमुत्तरोत्तरं पूर्वापरानुभवसिद्धान् रोगविशेषांस्तत्परिहारोपायविशेषांश्चानुप्रवेश्य देशकालपरिस्थितिविशेषानुसन्धानसमुन्मिषितदृष्टयो विद्वांसोऽप्यनेकानायुर्वेदग्रन्थान् निबबन्धुः। इत्थं नानाद्रव्ययोगसिद्धानामौषधानां प्रयोगपद्धतिरपि नार्वाचीना स्यात्। ष्टाइनमहाशयेन पूर्वतुरुष्कस्थानगत तूह्वाङ्ग (Tun Huang) स्थलोपलब्धं प्राचीनपुस्तकमिति हार्नलमहाशयेन निर्दिष्टे $^१$पुस्तके प्राचीननेरानभाषानुवादेन सह यो मूलसंस्कृतलेखोऽस्ति, तत्र भगवता (बुद्धेन) जीवकं सम्बोध्योपदिष्टा औषधविशेषोक्तय उपलभ्यन्ते। महावग्गादिनिर्दिष्टजीवकसाहचर्याद्बुद्धस्यास्मिन्नुपदेशे नानौषधयोगरूपाणां बहूनामौषधानामुल्लेखदर्शनेन नानाद्रव्ययोगौषधकल्पनाऽपि बुद्धसमयात् पूर्वतः प्रचलिताऽऽसीदिति ग्रन्थान्तरादप्यवगम्यते। पाश्चात्यभैषज्यपद्धतावपि निर्हरणीयदोषानुसारण विज्ञाततत्तद्गुणागुणानि वस्तूनि कार्यकाले सम्मिश्रय प्रयोगस्य सम्प्रदाये पूर्वतः प्रवर्तमाने सङ्कीर्णदोषमयानां रोगविशेषाणां निर्बर्हणाय Patent योगौषधान्यपि अद्यत्वे प्रकल्प्यन्ते। नुख्शाफार्मूलादिरूपेण कानिचित् निबन्धेषु प्रकाश्यन्ते च। पूर्वापरैः स्थानभेदैः संक्षेपविस्ताररूपेण स्वप्रमेयं यथावदवबोधयन्तीभिः संहिताभिः पश्चात्तनैर्निबन्धैश्चैवं विशदीकृतमप्येतद्विज्ञानं दिग्दर्शनमात्रं भवति। शारीरिकी प्राकृतिकी च परिस्थितिनं खलु सर्वेषां सर्वदा सर्वत्रैकरूप्यं वहति। प्रतिव्यक्तिप्रकृतिविभेदेन स एव रोगोऽप्युच्चावचैर्दोषान्तरसम्पृक्तैरपि तैस्तैर्दोषैर्विभिन्नानेकरूपतां धत्ते। यथा यथा देशकालजलवाय्वाहारविहारादिपरिस्थितिविभेदेन दोषसाङ्कर्येण नानारूपत्वमापद्य रोगा वर्धेरन्, नवनवाकृतयश्च प्रादुर्भवैयुः, तथा तथा देशकालादिविशेषाननुसन्धाय औषधविशेषाणामावापोद्वापौ मानगुरुलघुभावौ निक्षेपरचनापौर्वापर्यक्रमविशेषादिकं वा प्रकल्प्य नवनवानां प्रतीकारोपायानामनुभवविशुद्धानामौषधान्तराणामुपचयेन संरक्षणमुपबृंहणमपि प्राचीन आयुर्वेदविज्ञानकोशः समपेक्षते॥
( २ ) आचार्यपरिच्छेदो ग्रन्थपरिचयसहिताः—
आयुर्वेदस्य प्रकाशः आचार्याश्च
सृष्टेषु प्रजावर्गेषु स्वास्थ्यपरिपालनायापेक्षणीयामायुर्वेदविद्यामवधार्य स्वयम्भूरेव संहितारूपेण प्रथमतः प्रकाशया$^२$मास। सेयमश्वीन्द्राद्यनुक्रमेण आर्ष समाजवतीर्णा लोके प्रचारं प्रपेदे इति पूर्ववृत्तं वर्णयन्त्यायुर्वेदाचार्याः। अस्तु नाम स्वयम्भूक्रमं प्रकाशः, दैवो वा उपदेशः, आर्षो वा सर्ग आयुर्वेदस्य, सर्वथाऽप्येतदीय प्रादुर्भावः प्रत्नतर एव।
१. R. G. Bhandarkar Commemoration. Vol I, P. 416
२. (क) स्वयम्भूर्ब्रह्मा प्रजाः सिसृक्षुः प्रजानां परिपालनार्थमायुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत्। (काश्यपसंहितायां पृ. ६१)
(ख) इह खल्वायुर्वेदम्ष्टाङ्गमपाङ्गमथर्ववेदस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्त्रं च कृतवान् स्वयम्भूः॥
(सुश्रुते सू. अ. १)
(ग) ब्रह्मणा हि यथा प्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः (चरके सू. अ. १)
उपोद्घातः | १३
आयुर्वेदीयमूलग्रन्थेभ्य इत्थं सम्प्रदायक्रमोऽवगम्यते—
ब्रह्मा
दक्षः
अश्विनौ
इन्द्रः
| (सुश्रुतसंहितालेखात्) | (काश्यपसंहितालेखात्) | (चरकसंहितालेखात्) |
|---|---|---|
| धन्वन्तरिः | कश्यपवसिष्ठात्रिभृगवः | भरद्वाजः |
| दिवोदासः | एषां पुत्राः शिष्याश्च । | आत्रेयपुनर्वसुः |
| सुश्रुतौपधेनव- | अग्निवेशभेड- | |
| वैतरणौरभ्र- | जतूकर्णपराशर- | |
| पौष्कलावतकरवीर्य- | हारीतक्षारपाणयः । | |
| गोपुररक्षितभोजादयः । |
अस्यां काश्यपसंहितायामुपदेशपरम्परानिदर्शने ‘स्वयम्भूर्ब्रह्माऽऽयुर्वेदमग्रेऽसृजद्, ततश्च तं पुण्यमायुर्वेदमश्विभ्यां कः प्रददौ, ताविन्द्राय, इन्द्र ऋषिभ्यश्चतुर्भ्यः कश्यपवसिष्ठात्रिभृगुभ्यः, ते पुत्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च प्रददुहितार्थम्’ (पृ. ६१) इति लेखेन इन्द्रात् साक्षादेव कश्यपादिभिः पुरातनैर्महर्षिभिः प्रथमत एषा विद्या प्राप्ताऽवगम्यते । चरकोपक्रमग्रन्थे रोगैरुपद्रुतानां लोकानामुद्धारोपायस्य विवित्सया समवेतानां महर्षीणां प्रेरणया इन्द्रमुपेत्य तस्मादायुर्वेद मवाप्य प्रतिनिवृत्तो भरद्वाजो महर्षीनुपदिदेशेति निर्देशेन इन्द्रोपदिष्ट्वाद्भरद्वाजादेव महर्षीणामेतद्विद्याधिगमो लभ्यते । भरद्वाजो नाम आयुर्वेदविद्यायाः कश्चन प्राचीन आचार्यों ज्वरसमुच्चयादिषूद्धृतैस्तद्वचनैरप्यवगम्यते । महाभारतेऽपि वैद्यकाचार्यस्य भरद्वाजस्य निर्देशोऽस्ति । चरकसंहितायामुपक्रमोत्तरग्रन्थे भरद्वाजस्य द्विधोल्लेखो दृश्यते । वातकलाकलीये (च. सू. अ. १२), आत्रेयभद्रकाप्यीये (च. सू. अ. २६) च कुमारशिराभरद्वाजस्य मतं दर्शितमस्ति । स च भरद्वाजो विशेषणेन व्यावृत्तोऽन्य एवावगम्यते । एतदीयं मतमात्रेयेण प्रतिक्षिप्तं च । यज्जःपुरुषीये (च. सू. अ. २५), खुड्डीकागर्भावक्रान्तौ (च. शा. अ. ३) च अविशेषितस्य भरद्वाजस्य मतोल्लेखोऽस्ति । तत्रापि भरद्वाजमतमात्रेयेण प्रतिक्षेप्यकुक्षावेव निक्षिप्तमस्ति । उत्तरत्र (च. शा. अ. ३) प्रतिक्षिप्तेन भरद्वाजेन जिज्ञासया पृष्टे आत्रेयेण विशेषविवरणं प्रदत्तं चास्ति । नह्येवं निर्देशोऽस्यापि गुरुभावौचित्यं संगमयति । वातकलाकलीये ‘कुमारशिरा’ इति भरद्वाजविशेषणमात्रेयगुरुभरद्वाजनेषेधार्थम्’ इति, खुड्डीकागर्भावक्रान्तौ ‘भरद्वाजशब्देनेह नात्रेयगुरुरुच्यते किन्त्वन्य एव भरद्वाजगोत्रः कश्चित्’ इत्युल्लिखँट्टीकाकारश्चक्रपाणिरुभयत्रनिर्दिष्टस्य भरद्वाजस्य गुरुत्वाभावं स्पष्टं दर्शयति । चक्रपाण्युक्तदिशा गोत्रवाचकेन भरद्वाजशब्देनाभिधेयानां बहूनां सम्भवेन अत्रिपरम्पराप्राप्तविद्येनाप्यात्रेयेण कस्मान्निर्द्धरद्वाजादपि एतद्विद्याया ग्रहणस्य सम्भवेऽपि भरद्वाजस्योपदेशग्रहणं संमाननंतन्मतप्रतिष्ठापनं चावबोधयन्त्यात्रेयोक्तिः क्वाप्य-त्रात्रेयसंहितायामन्तरनुपलभ्यमाना संशयमावहति । तदेवमात्रेयगुरुत्वेन मन्यमानो भरद्वाजः कतम इति नैतावता निश्चेतुं शक्यते । काश्यपसंहितायां रोगाध्याये (पृ. ३९) केवलं कृष्णभरद्वाजस्योल्लेखोऽस्ति । सोऽपि सविशेषणो विभिन्नो भारद्वाजोऽवगम्यते । आयुर्वेदाध्ययनविधाने काश्यपीये (पृ. ५४) प्रजापत्यश्वीन्द्राणां सर्वप्रस्थानमपरमाचार्यस्य परमपुरुषावतारस्य धन्वन्तरेः, स्वप्रस्थानमूलाचार्यस्य कश्यपस्य स्वाहाकारदेवतात्वेन निर्देश इव आत्रेयसंहितायामपि (अ. वि. अ. ८) प्रजापत्यश्वीन्द्रधन्वन्तरीणामेव नामनिर्देशेन सह स्वाहाकारविधानमस्ति । तत्र सूत्रकारिणामृषीणामिति सामान्यतोऽप्युल्लेखेन ततो भरद्वाजस्यापि ग्रहणं सम्भवति । परं स्वकीयप्रस्थाने इन्द्रादनन्तराचार्यभावेन स्वस्यापि गुरुत्वेन च दृष्टस्यास्य विशेषतो नाम्ना ग्रहणं समुचितं किमित्युपेक्षितं स्यात् । यथा हि काश्यपीयोक्तौ कश्यपात्रिवासिष्ठभृगुषु इन्द्रस्य साक्षादौपदेशिकः सम्बन्धो
| १४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
|---|
दर्शितः, तथैवात्रेयसंहितायामपि रसायनपादे (च. चि. अ १) भृगुवत्रिवसिष्ठकश्यपानामङ्गिरोऽगस्त्यपुलस्त्यवामदेवासितगौतमादीनां च साक्षादेवेन्द्राद्रसायनौषधोपदेशः प्रदर्शितः । नात्रापि भरद्वाजस्योल्लेखोऽस्ति । बहुकालान्तरेण पौर्वापर्यवतामप्याचार्याणां चरकोपक्रमग्रन्थे महर्षिसमवाये सहभावनिर्देशः, उत्तरग्रन्थानुरूपलेखप्रौढेस्तत्रादर्शनमपि संशययति । इतश्च भरद्वाजादेव महर्षीणामायुर्वेदविद्यालब्धि दर्शयंश्चरकीय उपक्रमग्रन्थः किमाशयक इति विमर्शस्थानमेतत् । तदेवं सर्वतोऽनुसन्धाने कश्यपवसिष्ठात्रिभृगुमहर्षिभिरतिपुराकालादेव स्वपुत्रशिष्यसन्ततिष्वायुर्वेदविद्या प्रवर्तिता । येनात्रेयादिशब्दानां गोत्रनामतया आत्रेयपरम्परायां चरकसंहितामूलभूताचार्य आत्रेयपुनर्वसुः, अन्ये कृष्णात्रेयभिक्ष्वात्रेयादयोऽपि दृश्यन्ते । कश्यपपरम्परायामपि काश्यपवृद्धकाश्यपादय अन्येऽप्याचार्याः प्रतीयन्ते । एकाचार्यगोत्रपरम्परागतेनापि वैशिष्ट्यलाभाय आचार्यान्तराद्विद्या-ग्रहणस्याप्यौचित्येन चरकोपक्रमलेखानुसारेण स्वपूर्वपरम्पराप्राप्तविद्योनाप्यात्रेयपुनर्वसुना भरद्वाजादपि शिक्षाविशेषो गृहीतः सम्भवति, भृगुपरम्परागतेनापि जीवकेन मारीचकश्यपविद्याया ग्रहणमस्यामपि संहितायां दृश्यते । महाभारतलेखतो भरद्वाजाद्धन्वन्तरेर्विद्यालाभस्य, दिवोदासस्य भरद्वाजाश्रमप्राप्तेश्च लाभेऽपि सुश्रुतसंहितालेखतो धन्वन्तरिदिवोदासस्य इन्द्रादेवैतद्विद्यालब्धिरवगम्यते । यथातथाऽपि सर्वेषामिन्द्रस्य परमाचार्यतया साक्षात् परम्परया वा मूलोपदेष्टृत्वोल्लेखः संवादायैव जायते । त एते धन्वन्तरिमारीचकश्यपात्रेयपुनर्वसवो यथास्वं विज्ञानानि लोकोपकृतये संहितारूपेणान्तेवासिन उपादिक्षुः । तदेवं वैदिकविज्ञानपरमभूमिकायां ब्राह्मं विज्ञानबीजमुपष्टभ्य प्रादुर्भूतोऽयं चिरत्न आयुर्वेदकल्पतरूरुश्विन्द्र-कश्यपात्रिवसिष्ठभृगुप्रभृतिपरम्परया धन्वन्तर्यत्रिकश्यपैरन्यैरपि पूर्वाचार्यैः प्रयत्नेन प्रतिशाखं परिष्कृत्य पल्लवितः पुष्पितः फलितश्च कालग्रासावशिष्टैः कतिपयैरपि फलैः शिष्यपरम्पराद्वाराऽद्यापि लोकानुज्जीवयतीति सन्तोषस्यैव विषयः ॥
यद्यपि वैदिके साहित्ये आयुर्वेदीयविज्ञानस्याष्टधा विभागनिर्देशोऽष्टाङ्गानां नामोल्लेखश्च न दृश्यते, आत्रेयलेखतो ब्राह्मविज्ञानसमये हेतुं^१ लिङ्गौषधज्ञानरूपत्रिसूत्रात्मना तदवस्थानमवबुध्यत इति वैदिकं तद्विज्ञान पुरा त्रिस्कन्धात्मकमासीदित्यवगम्यते, तथाऽपि वैदिकायुर्वेदविषयाणां सङ्ग्रहणे पूर्वोपदर्शितदिशा अश्विनोरुपवर्णने जङ्घायोजनशकलीकृतशरीरसन्धान-दृष्टिश्रोत्रप्रदानकुष्ठादिनिवारणच्यवनरसायनापुत्रापुत्रोत्पादनादीनामैन्द्रस्तवनेऽप्येवमेव नानाविषयाणामुपलम्भेन, ऋग्यजुरथर्वोपनिषदादिषु नानाविधभैषज्यानामोषधिविद्याया भूतविद्याया विषपरिहारविद्यायाश्च तत्र तत्र दर्शनेन शल्यशालाक्यकायचिकित्सागद-भूतविद्यारसायनादीनामष्टविधानामेव विज्ञानविशेषाणां विषयाः पृथक्पृथग्रूपा अति तस्मिन् विज्ञाने प्रविष्टा एवासन्नित्यवगम्यते । भूतविद्यायामाचार्योऽथर्वा, महाभारतेऽप्युपलभ्यमानोऽगदतन्त्राचार्यः काश्यपः, कौमारभृत्याचार्यः कश्यपः, शालाक्याचार्या गार्ग्यगालवादयः, शल्याचार्याः शौनकादय एवमेकैकप्रस्थानाचार्यतयाऽवगम्यमानानां महर्षीणां प्राचीनतरत्वेन दर्शनमायुर्वेदविज्ञानस्याष्टप्रस्थानेषु विभक्तत्वमपि प्राचीनकालपरिदृष्टं दर्शयति । येनैकैकप्रस्थानवैशेष्यं केषाञ्चिन्महर्षिविशेषाणां विश्रुतयेऽजायत । केषुचित्तु सर्वप्रस्थानीयविज्ञानानां सामूहिकरूपेणावस्थानमपि भवेत् । ऋगपेक्षयाऽथर्वसंहिताया-मोषधिभैषज्यभूतचातनविषापहरणादिविषयाणां विकासावस्थाया निदर्शनेन एकैकांशोऽपि कालक्रमेण विज्ञानविशेषैः पुष्टिमापद्यमानो ग्रहणधारणप्रयोगसौकर्याय पृथक्पृथक्प्रस्थानरूपेण विभागप्रतिष्ठामापन्नः स्यात् । आर्षे समये आध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकरूपाणां त्रिविधानां दुःखानामेकैकशोऽपि परिहृतये अदृष्टद्वारकोपायानामिव दृष्टोपायानामपि क्रमशो विकासेनाथर्वणविकासमप्युपजीव्य शारीरभैषज्ये शस्त्रक्रियाप्राधान्यमुपादाय शल्यं, बहिन्द्रियप्रधानोत्तमाङ्गमुपादाय शालाक्यं, बलवीर्याभिवृद्धिप्राधान्यमुपादाय वाजीकरणं, वयःस्थापनादिमहाफलदीर्घप्रयोगविशेषानुपादाय रसायनम्, ऋतुगर्भबाल्यादिप्राथमिकभावस्थासम्बन्धमुपादाय कौमारभृत्यम्, एतदितरशारीरमानसभैषज्यमुपादाय कायचिकित्सा, बहिरागन्तुकविकृतिप्रशमने सर्पवृश्चिकप्रभृतिप्राण्यादिविषविप्लवमुपादाय अगदतन्त्रं, भूतग्रहस्कन्दादिदेववर्गविप्लवमुपादाय भूतविद्या, इति त्रिविधदुःखशाखाविशेषाननुसन्धाय तत्तत्प्रतीकारदृशाऽष्टौ
१. हेतुर्लिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् । त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं प्रजापतिः ॥
सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः । यथावदचिरात्सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ (चरक सू. अ. १)