कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
गुणाढ्य-कृत मूल बृहत्कथा अब प्राप्य नहीं है। ज्ञात होता है सोमदेव के बाद उस महान् ग्रन्थ का लोप हो गया। किन्तु कालक्रम से बृहत्कथा के जो रूपान्तर बने उनमें चार अबतक प्राप्त हैं। पहला बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह है। इसकी रचना संस्कृत में लगभग पाँचवीं शती में हुई। इसमें २८ सर्ग हैं, पर ग्रन्थ अपूर्ण रहा। इसके कर्ता बुधस्वामी ने गुप्तकालीन स्वर्ण-युग की संस्कृति के साँचे में बृहत्कथा को ढालने का यत्न किया। विद्वान् इसे बृहत्कथा की पैशाची वाचना मानते हैं। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह का देवनागरी-लिपि में मूल संस्करण और फ्रेंच-अनुवाद फीकाकोत ने पेरिस से प्रकाशित कराया था। बुधस्वामी के प्रायः साथ ही या संभवतः १ वर्ष के भीतर बृहत्कथा का एक प्राकृत संस्करण जैन परम्परा में संघदासगणि ने वसुदेव हिण्डी के नाम से तैयार की। मूल बृहत्कथा में नरवाहनदत्त नायक था। वह वत्सराज उदयन का पुत्र था। कालिदास ने लिखा है कि मालवा के गाँवों में वहाँ के बड़े-बूढ़े उदयन की कहानी कहने में चतुर थे। उदयन से सम्बन्धित यह कहानी केवल वासवदत्ता और उदयन की प्रेम-कहानी तक सीमित न रही होगी। उतना अंश तो कथा- सरित्सागर के आरम्भ में ही है, किन्तु उदयन की कहानी का पूरा चक्र था। उसके ही पेटे में उसके पुत्र नरवाहनदत्त के विवाह की अनेक कथाएँ भी थीं। पुत्र ने पिता के पद-चिह्नों पर चलते हुए अपने जीवन में अनेक प्रेम-परिणयों का ठाट विकसित किया। नरवाहनदत्त के अनेक विवाहों के वर्णन करने के कारण मूल बृहत्कथा का स्वरूप कामकथा या शृंगारकथा जैसा था। नरवाहनदत्त देशान्तरों का भ्रमण करते हुए जहाँ जाता वहीं उसकी यात्रा का पर्यवसान एक विवाह के रूप में होता था। जैसे व्यापारी धन कमाकर सकुशल लौट आने पर सिद्ध यात्री बनते हैं वैसे ही नरवाहनदत्त के चरित में द्वीपान्तर-पर्यटन की सिद्ध यात्रा एक नई रानी के साथ विवाह के रूप में होती है। कथासरित्सागर में जहाँ एक ओर अपने नाम के अनुसार १२४ तरंगों का विभाग है वहीं उसके १८ लम्बक भी हैं। यह लम्बक शब्द अपने मूल स्रोत की ओर संकेत करता है। लम्बक का मूल संस्कृत रूप लम्भक था। एक विवाह द्वारा एक स्त्री की प्राप्ति 'लम्भ' कहलाती थी और उसी की कथा के लिए लम्भक शब्द प्रयुक्त हुआ। तदनुसार ही अलंकारवती लम्भक, शशांकवती लम्भक इत्यादि अलग-अलग कथाओं के नाम पड़ होंगे। हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासन की टीका में स्पष्ट शब्दों में बृहत्कथा को लम्भों में विभक्त कहा है। वही लम्भक का मूल रूप ज्ञात होता है। वादीभसिंह-कृत गद्य-चिन्तामणि में नायक द्वारा पत्नी की प्राप्ति का वर्णन करनेवाले कथाखण्डों को लम्भ कहा है। स्मरण रखने की बात है कि वसुदेव हिण्डी के विभागों में तो लम्भक शब्द है किन्तु बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह में ग्रन्थ का विभाग सर्गों में हुआ है अर्थात् वह एक सर्गबद्ध रचना है, पर वहाँ भी प्रत्येक कथा के अन्त में 'लाभ' शब्द आया है। ज्ञात होता है कि लम्भ या उसी के प्राकृत रूप लम्भ का प्रयोग गुप्तकाल में होने लगा था। सुबन्धु-कृत वासवदत्ता में जिसकी रचना चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के कुछ बाद पाँचवीं शताब्दी के आरम्भ में हुई, बृहत्कथा को लम्भों से युक्त कहा है—बृहत्कथालम्बैरिव सालभञ्जिकासन्निधैः अर्थात् बृहत्कथा के लम्भों
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वा परिच्छेदों में शालभञ्जिका या स्त्रियों की कथाएँ थीं। दशरूपक के कर्त्ता धनंजय ने जो मालव राज मुंज का सभासद था रामायण के साथ बृहत्कथा का उल्लेख किया है। इससे यह अनुमान किया गया है कि शायद रामायण की तरह बृहत्कथा की रचना भी सर्गों में हुई हो पर इस अनुमान के लिए पर्याप्त कारण नहीं है और यही सम्भावना अधिक प्रतीत होती है कि मूल पैशाची बृहत्कथा में ही कथाओं के विभाग को लम्भ या लम्भक जैसे मिलते-जुलते शब्द से सूचित किया गया था और उसी परम्परा में बना लम्भक शब्द सुबन्धु के समय में प्रयुक्त होने लगा था। बृहत्कथा के मूल स्वरूप पर प्रकाश डालने के लिए संघदासगणि-कृत वसुदेव हिण्डी की प्राप्ति उल्लेखनीय घटना है। 'हिण्डी' शब्द का अर्थ परिभ्रमण या पर्यटन है। संघदासगणि ने जो वसुदेव हिण्डी लिखी उसमें उन्होंने यद्यपि बृहत्कथा को ही आधार बनाया था किन्तु ग्रन्थ के ठाट और उद्देश्य में काफी परिवर्तन किए। जहाँ बृहत्कथा लौकिक कामकथा थी वहाँ संघदास ने वसुदेव हिण्डी को धर्मकथा का रूप दिया और जैनधर्म की प्रभावना करनेवाले कितने ही प्रसंगों को उसमें यथास्थान सम्मिलित किया। इससे भी अधिक महत्त्व का परिवर्तन कथा के नायक का बदल डालना था। पैशाची बृहत्कथा में वत्सराज उदयन के पुत्र नरवाहनदत्त के विवाहों की कहानियाँ थीं किन्तु संघदास ने अन्धकवृष्णि-वंश के प्रसिद्ध पुरुष वसुदेव को अपना नायक बनाया। वसुदेव हिण्डी में २९ लम्भक हैं और यह महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में गद्य-शैली में है जिसमे कुछ मिलाकर लगभग ११ हजार श्लोक प्रमाण की सामग्री है। वसुदेव हिण्डी के भी जैन परम्परा में दो रूप मिलते हैं। पहला ग्रन्थ तो यही संघदासगणि का रचा हुआ है। इसे प्रथम खण्ड कहते हैं। किन्तु इसी का एक दूसरा खण्ड उपलब्ध है जो मध्यम खण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। उसकी रचना धर्मदासगणि ने अपने पूर्ववर्ती संघदासगणि की रचना को आगे बढ़ाते हुए लगभग दो शती बाद की। उसकी भूमिका में धर्मदास ने कहा है—'कृष्ण के पिता वसुदेव ने १०० वर्ष तक परिभ्रमण किया और अनेक विद्याधरों एवं राजाओं की कन्याओं से विवाह किया। संघदासगणि ने वसुदेव के केवल २९ विवाहों का वर्णन किया था। शेष ७१ विवाहों की कथा उसने विस्तार-भय से छोड़ दी थी। उसे मध्यम या बीच के लम्भकों के साथ कथासूत्र मिलाते हुए मैं कह रहा हूँ।' धर्मदासगणि-कृत मध्यम वसुदेव हिण्डी में ७१ लम्भक १७ श्लोकों में पूर्ण हुए हैं। यह बड़ा ग्रन्थ अभी तक अप्रकाशित है इसलिये इसकी कहानियों के विषय में विशेष कुछ नहीं १ सुव्वइ य किल वसुदेवेणं वाससतं परिब्भमंतिएं इमम्मि भरहे विज्जाधरिवरवइत्ति बालदुक्खंवाससंभवाणं कन्याणं सतं परिणीतं तत्थ य सामावियपमावियाणं रोहिणीपञ्चउवसायाणं एगुणतीस लम्भता संघदासवायरएणं उवणिबद्धा। एगसत्तरिं च वित्थारभीएणा कहामज्झे छड्डिया। तो हुं भो सोहयसिगारकहापसंसणं असहमागं आयरियसयाते अवधारेऊणं पवयणणुरागेणं आयरियमिओएण य तेंति लब्भित्थलक्खणमग्गं गंधव्वएणे जग्गुत्तउत्तो हे। तं सुणह इतो पुव्वकहाणुसारेण चेव।
उससे पहले की बृहत्कथा में विवाहों की कहानियों का ऐसा ही विस्तार था।
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कहा जा सकता। किन्तु अनुमान के आधार पर वसुदेव के पहले विवाह के ढंग पर ही जितनी और कथाएं मिल सकीं या गढ़ी जा सकीं उन्हें जोड़-बटोरकर धर्मदास ने परिशिष्ट-रूप में एक नए ग्रंथ का ठाट खड़ा किया। इससे यह अनुमान करना उचित नहीं कि मूल वसुदेव हिण्डी में या उससे पहले की बृहत्कथा में विवाहों की कहानियों का ऐसा ही विस्तार था। धर्मदासगणि की वसुदेव हिण्डी को मध्यम खण्ड कहा जाता है। इसका कारण यह है कि संघदास के ग्रन्थ का २९वां लम्भक जहां समाप्त होता था उससे आगे धर्मदास ने अपना कथा- सूत्र नहीं चलाया बल्कि उसने पहली वसुदेव हिण्डी की १८वीं कथा पियंगुमंजरी लम्भक के साथ अपने ७१ लम्भकों का सन्दर्भ जोड़ा है और इस तरह संघदास की वसुदेव हिण्डी के पेटे में अपने ग्रन्थ को भरा है। इसी से इसे वसुदेव हिण्डी का मध्य भाग या मध्यम खण्ड कहते हैं। वस्तु स्थिति यह है कि संघदासगणि का २९ लम्भकोंवाला ग्रन्थ अलग और अपने-आप में सम्पूर्ण था। उसके बाद धर्मदासगणि ने अपना ग्रन्थ अलग बनाया और चतुराई से उसे अपने पूर्ववर्ती ग्रंथ की एक खूंटी पर टाँग दिया। संघदास की वसुदेव हिण्डी की रचना में इस समय छ प्रकरण पाए जाते हैं—(१) कथोत्पत्ति (२) धम्मिल्ल हिण्डी (३) पीठिका (प्राकृत पेढिया) (४) मुख (५) प्रतिमुख (६) शरीर। इसमें शरीर के अन्तर्गत २९ लम्भकों की कहानियां हैं जिनमें से अन्तिम इस समय त्रुटित है और बीच के १९वें २० वें दो लम्भकों की कथाएं भी नहीं हैं। १८वें पियंगुमंजरी लम्भक के बाद २१ वें केतुमती लम्भक की कथा शुरू होती है। यही १८ वें लम्भक की समाप्ति पर धर्मदासगणि ने अपने मध्यम खण्ड का पेबन्द जोड़ा है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि कथोत्पत्ति नामक पहले प्रकरण के बाद ५ पृष्ठों में धम्मिल्ल हिण्डी नाम का एक महत्त्वपूर्ण प्रकरण उपलब्ध होता है। किन्तु स्पष्ट है कि वह अपने किसी अज्ञात मूल स्थान से छटक कर यहाँ वसुदेव हिण्डी में कटफन्त रूप में ही रक्खा गया है। इस धम्मिल्ल हिण्डी प्रकरण में धम्मिल्ल नामक किसी सार्थवाह पुत्र की कथा है जिसने देश-देशान्तरों में जाकर ३२ विवाह किए। मूल ग्रन्थ में इसे धम्मिल्ल चरित कहा गया है और धम्मिल्ल शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए लिखा है कि गर्भ के समय उसकी माता को धर्माचरण के विषय में दोहृद उत्पन्न हुआ था। अतएव पुत्र का नाम धम्मिल्ल रक्खा गया। बृहत्कथा के दूसरे रूपान्तरों में जैसे बृहत्कथामंजरी या कथासरित्सागर में धम्मिल्ल चरित की गन्ध भी नहीं है। धम्मिल्ल हिण्डी का वातावरण सार्थवाहों के संसार से लिया गया है। इसे अपने-आप में एक स्वतंत्र रचना माना जा सकता है जिसने मूल ठाट को कुंबी नरवाहनदत्त या वसुदेव हिण्डी की तरह ही कई विवाहों की कहानियों पर आश्रित है। धम्मिल्ल शब्द का प्रयोग पहले-पहल गुप्तकालीन संस्कृत-नाट्य में पाया जाता है। एक प्रकार के केशबन्ध को धम्मिल्ल केश कहते थे जिसमें बालों का एक जूड़ा बनाकर सिर के अग्रभाग या मध्य भाग में बाँधा जाता था। इस शब्द की व्युत्पत्ति द्रभिल या डमिल से संभाव्य है। हो सकता है कि दक्षिण भारत के किसी प्रसिद्ध सार्थवाह का नाम इसके मूल में रहा हो और शिलप्प्याधिकार नामक तमिल-काव्य में व्यापार का जो वातावरण है उसकी पृष्ठभूमि में
बृहत्कथासरित्सागर में इस तरह का क्रमभिक पेंचस्व नहीं है।
- १ - ग्रम्भिक की कथाओं की रचना हुई हो। वस्तुतः धम्मिल्ल हिण्डी में धनवती सार्थवाह के पुत्र धनदत्त के विषय में उल्लेख है कि उसने जहाज लेकर यवन विषय या यवन देश की व्यापारिक यात्रा की थी और अपने साथ बहुत से सांप्रायिक व्यापारियों को ले गया था। शिलप्पधिकारम् के अनुसार मलय-देश के व्यापारियों का घनिष्ठ सम्बन्ध पुहार या कावेरीपतन के व्यापारियों के साथ था। बृहत्कथा की किसी दूसरी वाचना में धम्मिल्ल हिण्डी जैसा कोई वंश नहीं पाया जाता। कम-से-कम बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह, क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी और सोमदेव-कृत बृहत्कथासरित्सागर में इस तरह का क्रमभिक पेंचस्व नहीं है। वसुदेव हिण्डी में धम्मिल्लक हिण्डी के अलावा छः विभाग थे—अर्थात कथा की उत्पत्ति पीठिका, मुख, प्रतिमुख, शरीर और उपसंहार। कथोत्पत्ति पीठिका और मुख इनमें कथा का प्रस्ताव हुआ है। प्रतिमुख में वसुदेव आत्मकथा का आरम्भ करते हैं। सत्यभामा के पुत्र भानु के लिए १८ कन्याएँ इकट्ठी की गई थीं। किन्तु उनका विवाह रुक्मिणी के पुत्र शाम्ब से कर दिया गया। इस पर प्रद्युम्न ने वसुदेव से कहा—'देखिए, साम्ब ने अन्त पुर में बैठे-बैठे १८ बहुएँ पा लीं जब कि आप १ वर्ष तक उनके लिए घूमते फिरे। इसके उत्तर में वसुदेव ने कहा—'साम्ब तो कुएँ का मेढक है, जो सरलता से प्राप्त भोग से सन्तुष्ट हो गया। मैंने तो पर्यटन करते हुए अनेक सुख और दुःखों का अनुभव किया। मैं मानता हूँ कि दूसरे किसी पुरुष के भाग्य में इस तरह का उतार-चढ़ाव न आया होगा। वस्तुतः वसुदेव के इस छोटे-से सटीक वाक्य में उस महान् युग की हलचल का बीज समाया हुआ है। उस समय के चैतन्य हृदय पश्चिम के यवन-देश से पूर्व के यवद्वीप और सुवर्णभूमि तक के विशाल क्षेत्र को रात दिन ढूंढ़ते रहते थे। बाण के शब्दों में कहा जाय तो उनके पैरों में मानों कोई द्वीपान्तरसंचारी पादलेप लगा हुआ था। वे यह मानते थे कि द्वीपान्तरों की यात्रा किए बिना लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती (अलभ्यमटनं श्रीसमाकर्षणं भवति)। मत्स्यपुराण के लेखक ने समुद्र को ललकारते हुए कहा है—हे उत्ताल तरंगोंवाले महार्णव, आजतक शंखा आदिद्वीपों में निवास करनेवाले राक्षस ही तुम्हारे जल में आते-जाते रहे हैं जिसके कारण उसमें कीच उठ खड़ी हुई है। अब अपने उस कलुष को शिखाओं से जुड़े हुए प्रांगण से दूरक डालो, क्योंकि देवाधिदेव शिव अपने परिवार के साथ तुम्हारा संतरण करना चाहते हैं— भूर्जालम्बाः कुरुत शिखिलोपमं पयः सुरद्विषाममल महातिकर्वमम्। (मत्स्यपुराण, १५४—४५५) जैसा सभापर्व में आया है, पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व की समुद्र-यात्राओं का ताँता उस समय लगा रहता था (सभा ४९।१६)। दिव्यावदान में तो यहाँतक कहा है कि महासमुद्र की यात्रा किए बिना अर्थोपार्जन की आशा ऐसी है, जैसे ओस की बूंदों से घड़ा भरने का प्रयत्न। वसुदेव ने प्रद्युम्न को जो उत्तर दिया, वह मानव-हृदय के इन भावों के सर्वथा अनुकूल था। निरन्तर पर्यटन और दूर-दूर के देशों में परिभ्रमण यही गुप्तों के स्वर्णयुग में जीवन की टेक बन गई थी। एक बार नहीं कई-कई बार लोग जोखिम उठाकर भी समुद्रों की यात्रा करते थे।
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शूर्पारक-निवासी पूर्ण नाम के सार्थवाह के कथन से यह बात सूचित होती है— भाइयो महासमुद्र की यात्रा में दुःख बहुत है, सुख थोड़ा है। बहुत-से जाते हैं, पर थोड़े ही लौट पाते हैं। क्या आपने ऐसे किसी का नाम सुना है, जो छ' बार महासमुद्र की यात्रा से सफलता के साथ अपने जहाजों को लेकर लौट आया हो ?' अवश्य ही सातवाहन-युग की सामुद्रिक यात्राओं के वातावरण में जिन कहानियों का ठाट रचा गया और बृहत्कथा के रूप में गुणाढ्य ने जिनका संग्रह किया, उनकी मूल भावना इसी प्रकार की जल-थल-सम्बन्धी हलचलों से पोषित थी। उसका भरपूर प्रभाव वसुदेव हिण्डी और बृहत्कथा की दूसरी उत्तरकालीन वाचनाओं पर पड़ा। सोमदेव के कथासरित्सागर में भी उत्तर-पश्चिम की ओर अपरगांधार की राजधानी पुष्यकलावती तक का उल्लेख है। जहां उत्तरापथगामी वणिग्पुत्र म्लेच्छभूयसी भूमि को पार करते हुए पहुँचते थे और उनकी इस यात्रा में महाप्रातिभ नामक शैव योगी भी उनके साथी के रूप में वितस्ता के उस पार के देशों में चक्कर लगाते थे। दूसरी ओर समुद्रशूर वणिक की कथा है जो पूर्व दिशा में कटाहद्वीप, कर्पूर द्वीप और स्वर्णद्वीप तक पहुँचकर लौटते हुए नारिकेलद्वीप में आया और फिर सिंहलद्वीप में उतरा। इनमें से नारिकेलद्वीप वर्तमान निकोवार का पुराना नाम था जिसे राजेन्द्र चोल के लेखों में नक्क्वरं कहा गया है। सुवर्णद्वीप सुमात्रा की संज्ञा थी जहाँ आठवीं शती में शैलेन्द्रवंशी राजाओं ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जो लगभग तीन शती तक विजयशाली रहा। सोमदेव के कानों में अवश्य ही शैलेन्द्रों के यश की भनक पड़ी होगी क्योंकि दो कहानियों में उन्होंने स्वर्णद्वीप का उल्लेख किया है (तरंग ५४ श्लोक १ तरंग ५६ श्लोक ६२)। एक कहानी में चन्द्रस्वामी नाम का सार्थवाह अपने खोए हुए पुत्रों को ढूंढ़ने के लिये पहले नारिकेलद्वीप में जाता है (कथा ५६।५६) और फिर जहाज पर बैठकर समुद्रमार्ग से कटाहद्वीप पहुँचता है (५६।६०) और वहाँ से आगे बढ़कर कर्पूरद्वीप तक चला जाता है। कर्पूरद्वीप से स्वर्णद्वीप और स्वर्णद्वीप से सिंहलद्वीप लौटकर वहाँ से चित्रकूट या चित्तौड़ की यात्रा करता है (कथा ५६। ६१, ६२, ६३)। कटाहद्वीप मलय प्रायद्वीप का एक भाग था जिसे इस समय केडा कहते हैं और राजेन्द्र चोल के लेखों में उसे कडारं कहा गया है। कुमारदास के जानकीहरण-काव्य में भी कटाह द्वीप का उल्लेख आया है।२ कटाहद्वीप की यात्रा में नारिकेलद्वीप एक पड़ाव के समान था। उसके वर्णन में सोमदेव ने लिखा है—
अस्ति मध्ये महम्भोधेः श्रीमद्द्दीपवरं महत्। प्रभारिकेलदीपाख्यं स्यातं जगति सुन्दरम्॥ (५४।१४-१५)
१ भ्रात महासमुद्रो बह्वादीनवोऽल्पास्वाद बहवोऽवतरन्ति अल्पाव्युत्तिष्ठन्ति। भवन्तोऽस्ति कश्चित् युष्माभिर्दृष्टः श्रुतो वा यःषट्कृत्वो महासमुद्रान् ससिद्धयानपात्रश्च प्रत्यागतः॥ —(दिव्यावदान, पूर्णावदान पृ० २४-३५)। २ समुद्रमुत्सङ्घय पतत्तदीयरत्नोदकैरन्थिपातो गुफरन्ध्रिरिङः। नितान्ततप्तानिपपूर्वशष्पडैः प्रोत्सवेयामास नृपं कटाहैः॥ (१।१०)
वराहद्वीप से आज जिस वायुद्वीप का वर्णन है वह इन्दोनेशिया का वाराह द्वीप होना चाहिए और संभव है वह वराह नामक असुर की जन्मभूमि आजकल का वराह माना जाता हो जिसे मध्ययुग में वारुश द्वीप कहते थे। कथासरित्सागर में दीपान्तर व मलयपुर का भी उल्लेख है, जहाँ के राजा की पुत्री मलयवती के साथ विक्रमादित्य ने विवाह किया था।१ गुणाढ्य से लेकर सोमदेव के समय तक भारतीय कहानियों के विस्तृत भौगोलिक क्षितिज का उल्लेख बहुत दिया गया है। उसमें समुद्रिक परिभ्रमण के लिए प्राकृतभाषा में हिण्डी इस छोटे सार्थक शब्द का निर्माण किया गया। उसी के अनुसार संघदास ने गुणाढ्य-कृत बृहत्कथा की शैली को तो अपनाया किन्तु अपने ग्रन्थ का नाम बदलकर वसुदेव हिण्डी कर दिया। प्रद्युम्न ने कुछ दावानल में बूढ़े वसुदेव को जिस प्रकार छोड़ दिया था उससे वसुदेव के मन में आप-बीती सुनाने के लिए एक फरहरी-सी उत्पन्न हो गई और २९ लम्भकों के रूप में उन्होंने अपने २९ विवाहों की कहानियाँ सुना डालीं। इन्हीं से वसुदेव हिण्डी ग्रन्थ का 'शरीर' बना है। ग्रन्थ के अन्त में उपसंहार नाम का अन्तिम भाग भी था जो इस समय प्राप्त नहीं है। बृहत्कथा के प्राचीनतम रूपान्तर वसुदेव हिण्डी के विषय में प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् आल्म- डोर्फ ने बहुत अनुसन्धान के बाद जो इस प्रकार लिखा है वह ध्यान देने योग्य है— गुणाढ्य की बृहत्कथा निस्सन्देह प्राचीन भारतीय साहित्य का एक रसमय और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इस लुप्त ग्रन्थ के ठीक प्रकार पुनर्गठन का कार्य अत्यन्त रोचक है। सोमदेव कृत कथासरित्सागर और क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी के रूप में काश्मीरी रूपकों की दो कृतियाँ जबतक विदित थीं तबतक बृहत्कथा के स्वरूप का अनुमान करना सरल था। किन्तु जब उससे आश्चर्यजनक रीति से भिन्न बृहत्कथा का नेपाली रूपान्तर बुधस्वामी के बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के रूप में प्राप्त हुआ तब यह समस्या कुछ कठिन हो गई। फ्रेंच विद्वान् लाकोत ने 'गुणाढ्य एवं बृहत्कथा' नामक १९०८ में प्रकाशित अपनी पुस्तक में इस क्लिष्ट प्रश्न को विलक्षण निपुणता से सुलझाने का प्रयास किया और वे इस निर्णय पर पहुँचे—'आज तो काश्मीरी रूपान्तरों (कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी) में गुणाढ्य की मूल बृहत्कथा अत्यन्त भ्रष्ट एवं अव्यवस्थित रूप में उपलब्ध है। इन ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर मूल ग्रन्थ का संक्षिप्त सारोद्धार कर दिया गया है और इनमें मूल के कई अंश छोड़ भी दिए गए हैं एवं कितने ही नये अंश प्रक्षेप रूप में जोड़ दिये गये हैं। इस तरह मूल ग्रन्थ की वस्तु और आयोजना में बेडौल फेरफार हो गये। फलस्वरूप इन काश्मीरी कृतियों में कई प्रकार की असंगतियों का गर्व और छोड़े हुए अंशों के कारण मूलग्रन्थ का स्वरूप पर्याप्त भ्रष्ट हो गया। इस स्थिति में बुधस्वामी के ग्रन्थ से वस्तु की आयोजना द्वारा मूल प्राचीन बृहत्कथा का सच्चा चित्र प्राप्त होता है। किन्तु खेद है कि यह चित्र पूरा नहीं है क्योंकि बुधस्वामी के ग्रन्थ का केवल चतुर्थांश ही उपलब्ध है। इसलिए केवल उसी अंश का काश्मीरी कृतियों के साथ तुलनात्मक मिलान शक्य है। १ दृष्टं मया तन्मलयपुरं नाम महापुरम्। श्रीमत्ताम्रपुरीयं वारिनिधेर्द्विपमध्यगम्॥ (१२।१।७९)
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'लाकोत के उपर्युक्त मत के साथ श्रीविण्टरपित्स सहमत हैं (हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लिटरेचर, भाग १)। किन्तु आज तक मिले हुए रूपान्तरों के आधार से मूल ग्रन्थ की पुनः घटना करने के प्रयत्न को वे व्यर्थ मानते हैं। उनके मतानुसार लाकोत का मत संदिग्ध है और अपर्याप्त सामग्री की सहायता से प्रतिपादित किया गया है। विण्टरपित्स के इस कथन में इतना ही यथार्थ है कि जबतक और अधिक सामग्री न मिले तबतक लाकोत के निर्णयों में बहुत सुधार की गुंजाइश नहीं। जब १९०८ में लाकात ने अपना ग्रन्थ लिखा था उसके साथ बृहत्कथा की कठिन समस्या को सुलझाने के लिये कोई उपयोगी सामग्री न मिली थी। "अब जैनों के पास काश्मीरी और नैपाली इन दोनों रूपान्तरों से विस्तृत बृहत्कथा का एक रूपान्तर प्राप्त हुआ है, जो ध्यान खींचता है और आश्चर्यजनक है। नरवाहनदत्त के पराक्रम को जैनों ने कृष्ण के पिता वसुदेव पर आरोपित कर दिया है। वसुदेव हिण्डी (वसुदेव का परिभ्रमण) यह जैनों की पुरानी कथाओं में एवं विश्व के प्राचीन कथा-साहित्य में एक महत्त्व का ग्रन्थ है। वर्षों पहले प्रकाशित हेमचन्द्र के त्रिपष्टिशलाकापुरुषचरित्र में श्रीनेमिनाथ चरित्र के अन्तर्गत वसुदेव का चरित्र भी आया है। उसमें जैन बृहत्कथा की रूपरेखा दिखाई पड़ती है। उसमें एवं श्रीकृष्ण की प्राचीन कथाओं से सम्बन्धित जैन ग्रन्थों में इसका संक्षिप्त सार प्राप्त होता है। किन्तु कुछ वर्ष हुए, भारतवर्ष में संघदासगणि कृत जो वसुदेव हिण्डी नामक ग्रन्थ ज्ञात हुआ है वह अपने विस्तार और विषय के कारण जैन बृहत्कथा में हुए परिवर्तनों को जान लेना सुगम करता है। आवश्यकचूर्णि में तीन बार वसुदेव हिण्डी का उल्लेख है जिससे ज्ञात होता है कि ६ ईसवी के आसपास इसकी रचना की अन्तिम मर्यादा थी। ग्रन्थ की अत्यन्त प्राचीन भाषा से भी उसका रचना-काल प्राचीन सूचित होता है। लगता है कि इस नए मिले हुए प्राकृत-ग्रन्थ में बृहत्कथा का प्राचीनतम रूपान्तर प्राप्त हो गया है। किन्तु इस ग्रन्थ में बृहत्कथा की वस्तु को श्रीकृष्ण की प्राचीन कथा के आधार पर गूंथ दिया गया है जो हर्मनया श्रीयाकोबी के मतानुसार जैनों में ईसवी सन् से ३ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुकी थी। श्रीयाकाबी मानते हैं कि ईस्वी-सन् के प्रारम्भ तक जैन पुराण-कथा सम्पूर्ण बन चुकी थी। जिस समय जैनों ने बृहत्कथा को अपनी पुराण-कथा के डम्बर में शामिल किया उस समय वह एक सुप्रसिद्ध कवि की कृति होने के अतिरिक्त दैव कथा की भव्यता से प्रकाशमान प्राचीनतर युग की रचना मानी जाने लगी थी जिसकी महत्ता पुराण एवं महाकाव्यों की कथाओं के समान हो गई थी। इसका अर्थ यह हुआ कि बृहत्कथा के जैन रूपान्तर से मूल बृहत्कथा का रचनाकाल कई शती प्राचीनतर मानना पड़ता है। श्रीबूलर ने गुणाढ्य का समय ईस्वी-सन् की पहली या दूसरी शती में और लाकोत ने तीसरी शती में माना था। उसके बदले यदि बहुत प्राचीन समय में नहीं तो उसे ईस्वी-सन् की पहली या दूसरी शती पूर्व में मानना चाहिए। 'लाकोत के मत के अनुसार नष्ट हुई बृहत्कथा की आयोजना इस प्रकार थी—प्रस्तावित भाग में उदयन और उसकी रानी वासवदत्ता एवं पद्मावती की सुविदित कथा थी। वासवदत्ता का पुत्र नरवाहनदत्त जब युवा राजकुमार की अवस्था को प्राप्त हुआ तब उसका गन्धर्वपुत्री
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मदनमंचुका से प्रेम हो गया। उसने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध उससे विवाह कर लिया। एक विद्याधर राजा मदनमंचुका को हर ले गया। मदनमंचुका की खोज करते हुए नरवाहनदत्त ने विद्याधर-लोक और मनुष्य-लोक में नये-नये पराक्रम किए। शीर्ष पराक्रम के बाद मदनमंचुका से उसका मिलन हुआ वह स्वयं विद्याधर चक्रवर्ती बना और मदनमंचुका उसकी पटरानी हुई। इससे पूर्व उसके पराक्रमों की सूची में वह हर बार एक स्त्री से विवाह करता है। इस प्रकार के प्रत्येक पराक्रम के अन्त में गुणाढ्य ने उसका लम्भ यह नाम रखा। इस रीति से नरवाहनदत्त की कथा वेगवती लम्भ अजिनावती लम्भ प्रियदर्शना लम्भ इत्यादि प्रकरणों में विभक्त थी। जैन परम्परा के अनुसार (वसुदेव हिण्डी में) श्रीकृष्ण की प्राचीन कथा की योजना इस प्रकार हुई—वसुदेव अपने बड़े भाई के साथ अनबन होने के कारण घर छोड़कर चले गए और पीछे लम्बे परिभ्रमण के दरम्यान नरवाहनदत्त की तरह पराक्रम करते रहे और अन्त में अपनी अन्तिम पत्नी के रूप में उन्होंने रोहिणी को प्राप्त किया। इस समय अकस्मात् वसुदेव का अपने बड़े भाई के साथ मेल हो गया और वे अपने कुटुम्ब के साथ मिलकर रहने लगे। मदनमंचुका से मिलने और राज्याभिषेक के प्रसंग इस कथा में छोड़ दिए गए हैं क्योंकि कृष्ण की कथा के प्रसंग में उनकी संगति न थी। पर मदनमंचुका के साथ प्रणय प्रसंग का जो विस्तृत वर्णन अन्तिम विवाह में आता था उसे श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ जोड़ दिया गया यह कुछ समझ में नहीं आता। मदनमंचुका के अपहरण का प्रसंग भी वसुदेव के पराक्रमों के वर्णन में छोड़ दिया गया है। कथा के मूलभूत पात्र मदनमंचुका के स्थान में यहां दो पात्र हो गए हैं गणिकापुत्री सुहिरण्या और राजकन्या सोमश्री। "इस तरह मूल बृहत्कथा की वस्तु और उसकी आयोजना की कई एक अनावश्यक घटनाएं इसमें होने से नष्ट हुए मूल ग्रन्थ के स्वरूप के विषय में जैन रूपान्तर की प्राप्ति से कई महत्त्वपूर्ण तथ्य ज्ञात होते हैं। "इससे आगे उल्लेखनीय बात यह है कि काश्मीरी रूपान्तर (कथासरित्सागर) में १८ लम्बकों में कथा विभक्त है। यहाँ भ्रष्ट रूप में प्राप्त लम्बक शब्द की बात हम नहीं कहते। 'म' के बदले 'ब' यह शब्द प्राकृत के अनुसार स्वाभाविक रीति से मूल ग्रन्थ का नहीं है। लम्बक (लम्भक) का अर्थ वह प्रकरण हो सकता है जिसमें नरवाहनदत्त एक पत्नी प्राप्त करता है। पर उदयन की कथा में और ग्रन्थ के आरम्भिक भाग में भी यह शब्द आता है। तो मानना पड़ेगा कि गुणाढ्य के कथा लिखने तक उसके अर्थ का विस्तार नहीं हुआ था। बुधस्वामी का बृहत्कथा- श्लोकसंग्रह काव्यों के समान सर्गों में विभक्त है और उसके उपलब्ध अंश में २८ सर्ग हैं। सब नहीं तो अनेक सर्गों के अन्त में लम्भ शब्द के बदले उसका पर्याय 'लाभ' शब्द मिलता है और जानबूझ कर नियम के रूप में एक लाभ में कई संख्याबद्ध सर्गों का समावेश कर दिया जाता है। लाकोत मानते हैं कि गुणाढ्य की कृति रामायण की तरह अलग-अलग काण्डों में विभक्त थी एवं मुख्य कथा-भाग लम्भों के सहित काण्डों में रचा गया था। जैन रूपान्तर में लम्भ का प्रयोग अपने मूल अर्थ में अर्थात् नरवाहनदत्त की (यहाँ वसुदेव की) विजय के वर्णनात्मक मुख्य कथा भाग के प्रकरणों
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के नामकरण के लिये हुआ है। इस मुख्य कथा-भाग को 'शरीर' कहा गया है और ग्रन्थ के ७ अधिकारों में यह पांचवाँ है। कथा की उत्पत्ति पीठिका मुख और प्रतिमुख ये चार अधिकार उससे पहिले आते हैं। 'शरीर' के पीछे उपसंहार होना चाहिए था पर ग्रन्थ का अन्तिम भाग त्रुटित होने से वह नहीं मिलता। मुख्य कथा भाग-रूप 'शरीर' की अपेक्षा से लम्भों का समूह ग्रंथ बडा गौण था। मूल प्राचीन बृहत्कथा में आमूलचूल विभागीकरण नहीं था। प्रस्तावित कथा प्रकरण के बाद दूसरे नामकरण के साथ संख्या बध्य लम्भ थे और उसके बाद उपसंहार था। संस्कृत रूपान्तरों में केवल बृहत्कथामंजरी में उपसंहार का निवेश है, पर लाकोत उपसंहार को मूलकथा का गौण अंग गिनते हैं। वसुदेव हिण्डी से सिद्ध होता है कि मूल बृहत्कथा में उपसंहार था। सोमदेव ने अपने कथासरित्सागर में उपसंहार निकाल दिया है पर उसके अतिरिक्त क्षेमेन्द्र में प्राप्त कुछ प्रकीर्ण बातों बत के बाद सोमदेव ने नरवाहनदत्त के तमाम लम्भकों की एक सूची अपने ग्रन्थ के आरम्भ में दी है। उससे ज्ञात होता है कि बृहत्कथामंजरी के आरम्भ में भी मूलग्रन्थ की विषय-सूची थी जो अब नष्ट हो गई है। अपने ग्रन्थ में कथा-उत्पत्ति यह शुद्ध जैन कथामात्र है पर पीठिका और मुख की बाबत ऐसा नहीं। बुधस्वामी की कृति में 'कथामुख' यह तीसरे सर्ग का नाम है पर पहले बेनाम के दो सर्ग भी कथामुख के ही प्रारम्भिक भाग हैं। अर्थ-संपत्ति की दृष्टि से कथामुख में जो होना चाहिए वह उसमें है, अर्थात् कथा कहनेवाले का परिचय। कथा कहने का प्रसंग किस रीति से उपस्थित हुआ यह उसमें बताया गया है। नरवाहनदत्त अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त उत्तमपुरुष में कहते हैं। काश्मीरी लेखकों ने दूसरे लम्बक का नाम कथामुख लम्बक रखा है। इसमें उदयन की कथा आती है। बुधस्वामी ने कथामुख में जो भाग आता है वह (कथामृत के लेखकों ने) उस ग्रन्थ के अन्त में रखा है और नरवाहनदत्त आत्म-वृत्तान्त कहते हैं ऐसा भी स्पष्ट उल्लेख स्वयं नहीं किया। इतना ही नहीं कथा का बयान प्रथमपुरुष में तटस्थ रीति से किया है। नेपाली रूपान्तर की सच्चाई और काश्मीरी रूपान्तर की भ्रष्टता सिद्ध करने में लाकोत का यही मुख्य प्रमाण है। इस अनुमान को जैन रूपान्तर से भी समर्थन मिलता है। इसमें भी वसुदेव अपना सब वृत्तान्त भागवत कथा के रूप में उत्तमपुरुष में ही कहते हैं। 'कथामुख' अथवा उसके तैयार किए हुए प्रति- मुख द्वारा बताया गया है कि भागवतकथा किस प्रकार कही गई। काश्मीरी लेखक सोमदेव और क्षेमेन्द्र ने कथारीठ का पहला लम्बक कहा है। गुणाढ्य कवि-संबंधी कथानक उसका विषय है। उसके देखने से ज्ञान होता है कि गुणाढ्य कवि-संबंधी कथानक का मूल कथा में होना संभव न था। बुधस्वामी के रूपान्तर में कथारीठ शायद देखने में नहीं आता। किन्तु जैसा ऊपर कहा है बुधस्वामी का प्रारम्भिक भाग ही कथामुख है। इस आधार में लाकोत निश्चित रूप से मानते हैं कि गुणाढ्य के मूल ग्रंथ में ही कथारीठ अंश नहीं था पर वसुदेव हिण्डी में पीठिका (पेडिया) भाग के होने से मानना पडता है कि बृहत्कथा में भी कथारीठ नामक भाग था। इस कथारीठ का विषय क्या था यह एक प्रश्न है। गुणाढ्य-संबंधी कथानक तो इसमें न रहा होगा और वसुदेव हिण्डी की पीठिका में कृष्ण-संबंधी कथा का जो भाग है वह
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भी उसमें न होगा। नैपाली रूपान्तर में तो कथापीठ है ही नहीं पर काश्मीरी रूपान्तरों में पीठ अर्थात् कथापीठ है। इससे यह सम्भावित है कि नैपाली रूपान्तर, अर्थात् बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह में मूल कथापीठ के कुछ अंश मिल-जुल गए हैं। काश्मीरी रूपान्तरों में उदयन वासवदत्ता और पद्मावती की सम्पूर्ण कथाएँ हैं, पर बुधस्वामी में वे नहीं हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि बुधस्वामी के ग्रन्थ का आरम्भिक भाग शायद खण्डित है। दूसरी ओर मूल प्राचीन बृहत्कथा के एक भाग के रूप में उदयन की कथा के होने के विषय में कुछ विद्वानों ने शंका उठाई है (दे विन्तरनित्स भारतीय साहित्य का इतिहास भाग ३)। इस प्रकार की मिली हुई कथा घटनाओं का विवरण यहाँ संभव नहीं तो भी वसुदेव हिण्डी के आधार पर मैं निश्चयपूर्वक यह मानता हूँ कि प्राचीन बृहत्कथा में उदयन-संबंधी कथाएं कथामुख से पूर्व कथापीठ नामक भाग में सम्मिलित थीं। बुधस्वामी ने बिना कारण इन कथाओं का असमावेश किया है। मूल प्राचीन बृहत्कथा की वस्तु आयोजना के परिणामस्वरूप उत्पन्न कुछ कालानुक्रमविषयक कठिनाइयों से बचने के लिए काश्मीरी लेखकों ने कथापीठ में समाविष्ट वर्ण्य विषय का अलग रीति से प्रयोग किया। मूल प्राचीन बृहत्कथा में वस्तु की आयोजना इस प्रकार होनी चाहिए थी— (१) कथापीठ—उदयन और उसकी रानियों की कथाएँ (२) कथामुख—कथा कहने वाले के रूप में नरवाहनदत्त का परिचय (३) नरवाहनदत्त द्वारा घटित जन्मों की शृंखला और (४) उपसंहार। "बुधस्वामी के बृहत्कथाश्लोकसंग्रह द्वारा बृहत्कथा का जो नैपाली रूपान्तर प्राप्त हुआ है उसके अनेक कथा-प्रसंगों का वसुदेव हिण्डी के साथ साम्य है। काश्मीरी रूपान्तरों के मुकाबले नैपाली रूपान्तर, मूल बृहत्कथा का सच्चा चित्र प्रस्तुत करता है। लाकोते का यह मत पूरी तरह मान्य है। उदाहरण के लिए वसुदेव हिण्डी की गणिकापुत्री सुहिरण्या की तरह ही बृहत्कथा- श्लोक-संग्रह की मदनमंजुका भी एक वारांगना की पुत्री है, पर काश्मीरी रूपान्तरों में मदनमंचुका एक बौद्ध राजा की दौहित्री है। वसुदेव की पत्नी गंधर्वदत्ता एक वणिक की दत्तक पुत्री है। बुध स्वामी में भी यह प्रसंग इसी प्रकार है, पर काश्मीरी रूपान्तर में गान्धार देश का राजा दोनों का स्वामी है। गन्धर्वदत्ता के पालन करनेवाले पिता की आत्मकथा समुद्री यात्रा में पराक्रम करने की अत्यन्त रम्यपूर्ण कथा है, एवं इसका यह अंश अलिफ़ लैला की कहानियों जैसा है। यह पूरी कथा काश्मीरी रूपान्तरों में छोड़ दी गई है। वसुदेव हिण्डी का कथानक इस अंश में बुध स्वामी से मिलता है। उसमें भी इसम कुछ अंश अधिक रसपूर्ण हैं। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के पाँच बड़े और आवश्यक अंश काश्मीरी रूपान्तरों में लुप्त हैं। वे वसुदेव हिण्डी में देखने को मिलते हैं। दूसरी बात यह थी, स्मारक, इसके पोषक हैं कि काश्मीरी रूपान्तर के जिन अंशों को स्पीयर ने मूल प्राचीन बृहत्कथा का साझा यथार्थ और प्रक्षिप्त माना था और ऐसे अंश काश्मीरी रूपान्तरों में रहे जिन?—उनका मात्र विसतेवाद का अंश वसुदेव हिण्डी में भी नहीं है, अर्थात् अबतक जो बिल्कुल सम्भावित मान परत थे, पर बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के अपूर्ण होने के कारण जो निज
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नहीं किए जा सकते थे वे भी अब साबित हो गये हैं। एक तरफ प्राचीन मूल बृहत्कथा का एक बड़ा भाग काश्मीरी रूपान्तरों में लुप्त हो गया है दूसरी ओर काश्मीरी रूपान्तरों का एक बड़ा अंश मूल बृहत्कथा से उत्पन्न नहीं हुआ। अंत में यह भी साबित होता है कि काश्मीरी लेखकों के सामने बृहत्कथा का हाड़-पंजर मात्र था। किन्तु वसुदेव हिण्डी और बृहत्कथाश्लोकसंग्रह इन दो रूपान्तरों के रचयिताओं के सामने मूल बृहत्कथा का एक अत्यन्त रस-पूर्ण जीवन्त और अतीत की सामग्री से भरा हुआ स्वरूप था। काश्मीरी रूपान्तरों की ऊपर कही हुई त्रुटियों के कारण अब इसकी छानबीन होना कठिन है कि बुधस्वामी में गुणाढ्य के मूल ग्रंथ की वस्तु-संरचना और उसकी प्राणवत्ता का किस हद तक उत्तराधिकार सुरक्षित है। किन्तु यहाँ बुधस्वामी के विषय म अपना विश्वास बहुत अंश में दृढ़ होता है। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह एवं वसुदेव हिण्डी के बीच में संख्या-संबंधी भेदों के कारण यह कहना कठिन है कि इन दोनों ग्रंथों में कौन किसका आधार था। पर, जिन अंशों के संबंध में विचार हो सकता है उनसे ज्ञात होता है कि बृहत्कथाश्लोकसंग्रह और वसुदेव हिण्डी के बीच में छोटी-से-छोटी बातों में एवं वर्णन की सम्पूर्ण कला में इतना रोचक साम्य है कि यह मानने में संदेह नहीं रहता कि दोनों के लेखकों के सम्मुख कवि गुणाढ्य का मूल रूप कम- से-कम अन्तर के साथ विद्यमान था। अन्त के कथाभागों में तो वसुदेव हिण्डी प्राचीन बृहत्कथा का विशिष्ट रसप्रद और लाक्षणिक नमूना है। एवं सर्वांश में अवलोकन करने से भी यह जान पड़ता है कि मूल बृहत्कथा की लाक्षणिकता एवं गुणाढ्य की काव्य-शक्ति अपने अधिकांश जीवन्त रूप में वसुदेव हिण्डी में विद्यमान है। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के आधार पर विण्टरनित्स ने जो बुधस्वामी की भारी प्रशंसा की है उसका अधिकांश श्रेय गुणाढ्य को ही मिलना चाहिए। १
गुणाढ्य की बृहत्कथा किसी समय व्यास-कृत महाभारत के समान अपने देश के काव्य और कथा-साहित्य पर छाई हुई थी। आज वह काल के विशाल अंतराल में न जाने कहाँ विलीन हो गई है। इसलिए उसके विषय में उसके उत्तरकालीन रूपान्तर एवं वाचनाओं से ही अनुमान की कुछ कड़ियाँ जोड़नी पड़ती हैं। जिस महती कथा के विषय में कालिदास सुबन्धु बाण दण्डी धनिक गोवर्धन आदि आचार्यों ने इस प्रकार प्रशंसा के ग्रन्थ लिखे हैं सचमुच वह भारतीय वाङ्मय की कोई अमूल्य रचना थी। कोलार-क्षेत्र के गुम्मा रेड्डीपुर से प्राप्त एक ताम्रपत्र में जो राजा दुर्विनीत के चालीसवें वर्ष (छठी शती के पूर्वारम्भ) में दिया गया कहा है कि राजा दुर्विनीत ने एक व्याकरण किरातार्जुनीय के पंद्रह सर्गों की टीका और बृहत्कथा का संस्कृत में एक
१ दे श्री भोगीलाल जे सान्डेसरा-कृत वसुदेव हिण्डी का गुजराती भाषान्तर, पृष्ठ ११३। आल्टडोर्फ के Eine neve Version der Verlorenen Bṛhatkathā des Guṇāḍhya (A new version of the lost Bṛhatkathā of Guṇāḍhya) नामक जर्मन-निबन्ध का गुजराती अनुवाद श्री रसिकलाल पारिख ने किया था। प
- १८ - रूपान्तर किया था।१ न केवल भारतवर्ष वरन् बृहत्तर भारत के द्वीपान्तरों में भी गुणाढ्य का यश छा गया था। कम्बोज के महाराज यशोवर्मन् के लेखों में तीन बार गुणाढ्य का उल्लेख आया है जहाँ उसे प्राकृतप्रिय विशेषण दिया गया है। बारहवीं शती तक यह ग्रन्थ विद्यमान था और उसके बाद उसका कोई चिह्न शेष न रहा यह आश्चर्य की बात है। हो सकता है कि सोमदेव की अद्भुत सफलता ने गुणाढ्य को नामशेष करा दिया। धन्वन् के अनुसार गुणाढ्य का जन्म गोदावरी के किनारे प्रतिष्ठान नगर में हुआ था। सोमदेव से भी इसका समर्थन होता है। यह शातवाहन वंश के सम्राट् हाल या शालिवाहन की राजधानी थी। विद्वाना के अनुसार शालिवाहन या सातवाहन प्रथम शती ईसवी में हुए। साकल का अनुमान है कि गुणाढ्य का जन्म मथुरा में हुआ था बाद में वे उज्जयिनी या कौशाम्बी में जाकर रहने लग गये । बुधस्वामिन् का बृहत्कथाश्लोकसंग्रह बृहत्कथा की नेपाली वाचना कहलाती है। इसमें अट्ठाईस सर्गों में लगभग ४५३९ श्लोक हैं। या तो मूल में ही यह ग्रंथ अधूरा रह गया या इस समय त्रुटित मिला है। इसमें नरवाहनदत्त अपने अट्ठाईस विवाहों में से केवल छः की कथा कह पाया है। यदि इसी दर पर सारी कथा कही जाती तो लगभग १९ हजार श्लोकों में पूरी कहानी का फैलाव होता और नरवाहनदत्त के राज्य-विस्तार और अभिषेक की कथा मिलाकर इसमें लग भग २५ सहस्र श्लोकों का विस्तार बैठता और सर्गों की संख्या भी १ म कम न होती। काव्य के आरम्भ में उज्जयिनी की प्रशंसा और वहाँ के शासक महासेन प्रद्योत की मृत्यु का उल्लेख है। उसके बाद उसका पुत्र गोपाल गद्दी पर बैठा किन्तु पितृहन्ता होने के अपयश से उसने राज्य छोड़ दिया और उसका भाई पालक राजा हुआ। उसने भी राज्य त्याग दिया और गोपाल का पुत्र अवन्तिवर्धन सिंहासन पर बैठा। उसके उपरान्त सुरतमंजरी के साथ उसके प्रेम की कथा आती है और चौथे सर्ग से नरवाहनदत्त की प्रेम-कहानियाँ ग्रंथ में स्थान घेरती हैं। बुधस्वामिन् भी कोई कम प्रतिभाशाली लेखक न था। उसने लगभग पाँचवीं शताब्दी में अपने ग्रंथ की रचना की और गुप्त वंश की स्वर्ण-संस्कृति की अनेक संस्थाओं के वातावरण में प्रवाहमयी संस्कृत-शैली में ग्रंथ का निर्माण किया। बुधस्वामिन् के बाद संस्कृत-वाचना की प्राप्ति न होकर संघदासगणि-कृत वसुदेव हिण्डी की प्राकृत-वाचना ही अबतक प्राप्त हुई है जिसके संबंध में आवश्यक विवरण ऊपर दिया जा चुका है और जिसने बृहत्कथा के ढके हुए पदों का उद्घाटन करने में पर्याप्त योग दिया है। इसके अनन्तर क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी का स्थान आता है। क्षेमेन्द्र काश्मीर के राजा अनन्त (१०२९ १ ९०) की सभा के सभासद थे। उनका दूसरा नाम व्यासदास था। उन्होंने
१ शब्दानुशासनकारेण दैवभारतीनिबद्धकवेन किरातार्जुनीये पंचदशसर्गटीकाकारेण दुर्विनीतनामधेयेन, [मैसूर पुरातत्त्व-विभाग की वार्षिक रिपोर्ट १९१२ पृष्ठ ३५ ३९ Indian Antiquary ४२।२ ४ JRAS १९१३ १८९।]
में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं।
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रामायण और महाभारत का संक्षेप भी रामायणमंजरी और भारतमंजरी नामक ग्रंथों में किया। उनका अवदानकल्पलता ग्रंथ भी प्रसिद्ध है। कला-विलास देशोपदेश नर्ममाला और समय मातृका ग्रंथों में क्षेमेन्द्र की प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप प्राप्त होता है। क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं। बृहत्कथा की अंतिम वाचना सोमदेव-कृत कथासरित्सागर है। सोमदेव ने अपनी प्रारंभिक प्रतिज्ञा में कहा है— 'मेरे सामने जैसा मूल था वैसा ही मैंने यह ग्रंथ रचा है। तनिक-सा फेर-फार भी नहीं किया। हाँ केवल औचित्य और एक दूसरे के साथ अन्वय या जोड़ मिलाने का ध्यान यथाशक्ति रक्खा गया है। इसमें काव्य का अंश मैंने इतना ही जोड़ा है जिससे कहानी के रस का विघात न हो। पांडित्य के यश के लोभ से मेरा यह प्रयत्न नहीं है। मेरा उद्देश्य यह है कि अनेक कथाओं का समूह सरलता से स्मृति में रक्खा जा सके।' कथा की उत्पत्ति के संबंध में सोमदेव ने लिखा है—'एक बार शिव ने पार्वती से सात विद्याधर चक्रवर्तियों की आश्चर्यमयी कथाओं का वर्णन किया। यद्यपि शिव की वार्ता एकान्त में हुई थी किन्तु उनके अनुचर पुष्पदन्त ने वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी जया को उन्हें सुना दिया। जया ने उन कहानियों को अपनी सहेलियों से कहा। जब यह बात पार्वतीजी के कान में पड़ी तो उन्होंने रुष्ट होकर पुष्पदन्त को मर्त्यलोक में जन्म लेने का शाप दिया। पुष्पदन्त के भाई माल्यवान् ने उसकी ओर से क्षमायाचना की तो उसे भी वैसा ही दंड मिला। पुष्पदन्त की पत्नी जया पार्वतीजी की परिचारिका थी। जब पार्वतीजी ने अपनी सखी को शोक से दुःखी देखा तो उन्हें करुणा आ गई और उन्होंने अपने शाप का परिहार करते हुए कहा कि पुष्पदन्त का विन्ध्य पर्वत में काणभूति नामक एक पिशाच से मिलना होगा। उसे अपने पूर्व जन्मों की स्मृति बनी रहेगी और जब वह काणभूति को ये कथाए सुनायेगा तब उसकी शाप-मुक्ति होगी। माल्यवान् भी जब काणभूति से इन बृहत्कथाओं को सुनकर लोक में इनका प्रचार कर चुकेगा तब वह पुनः स्वर्ग में लौट आएगा। इस विधान के अनुसार पुष्पदन्त ने कौशाम्बी में वररुचि-कात्यायन के रूप में जन्म लिया और वह महान् वैयाकरण एवं नन्द-वंश के अंतिम राजा योगानन्द का मंत्री हुआ। अंत में वह वनवासी हो गया और विन्ध्याचल की विन्ध्यवासिनी देवी की यात्रा में काणभूति से उसकी भेंट हुई। तब उसे अपने पूर्व जन्म की स्मृति हुई और उसने काणभूति को वे सात
१ यथामूलं तथैवैतन्न मनागप्यतिक्रमः। ग्रन्थविस्तरसंक्षेपमात्रं भाषा च भिद्यते॥ औचित्यान्वयरक्षा च यथाशक्ति विधीयते। कथारसाविघातेन काव्यांशस्य च योजना॥ वैदग्ध्यख्यातिलोभाय मम नैवायमुद्यमः। किन्तु नाना कथाजालस्मृतिसौकर्यसिद्धये॥ कथासरित्सागर १।१०-१२।
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बृहत्कथाएं सुनाई। इतना करने के बाद वह शापमुक्त होकर स्वर्ग चला गया। उसके भाई माल्य- वान् ने भी मृत्युलोक में प्रतिष्ठान पुरी में गुणाढ्य के रूप में जन्म लिया और वह वहाँ के राजा सातवाहन का मंत्री बना। गुणदेव और नन्दिदेव उसके दो शिष्य थे। उन्हें लेकर वह काणभूति के पास आया। वहाँ काणभूति से उसे पिशाच भाषा में सात बृहत्कथाएं प्राप्त हुईं और उसने प्रत्येक को एक-एक लाख श्लोकों में अपने रक्त से लिखा। अपने शिष्यों की सलाह से उसने उन्हें राज सातवाहन के पास इस विचार से भेजा कि राजा उनकी रक्षा करेगा। पर पिशाचों की भाषा में लिखी हुई कहानियों को राजा ने पसन्द नहीं किया। इस समाचार से गुणाढ्य को बहुत दुःख हुआ और उसने अपनी छः कहानियां जला डालीं। अपने शिष्यों का अनुरोध मानकर केवल सातवीं कहानी बची रहने दी। उस कथा को सुनकर जंगल के जीव भी मोहित हो गए। जब राजा सातवाहन को यह ज्ञात हुआ तब उसे पश्चात्ताप हुआ और उसने गुणाढ्य के स्थान पर जाकर बचे हुए कथाभाग को उससे ले लिया। उसने गुणदेव और नन्दिदेव की सहायता से उसका अध्ययन किया और कथा की उत्पत्ति का वर्णन करनेवाला अंश स्वयं उसमें जोड़ा।¹
नेपाल-माहात्म्य (अध्याय २७-२९) में इस कहानी का रूप थोड़ा भिन्न है। आरंभ में शिव-पार्वती के संवाद का उल्लेख है। पार्वती ने शिव से नई कहानी सुनाने की प्रार्थना की। शिव एकान्त में सब द्वार बन्द करके सुनाने लगे। पर उनके भुङ्गी नामक गण ने भौरे का रूप रखकर और भीतर जाकर वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी विजया को उन्हें सुना दिया। किसी दिन जब पार्वती ने कहानियां अपनी सखियों को सुनाने लगीं तो विजया को वे पहले से ज्ञात थीं। पार्वती ने यह जानना चाहा कि किसने यह अपराध किया था। शिव ने ध्यान धरकर देखा और भुङ्गी को शाप दिया। भुङ्गी ने क्षमा-याचना की। तब शिव ने क्षमा करते हुए कहा—इसे मर्त्यलोक में जन्म लेना होगा और सुनी हुई कथाओं को नौ लाख श्लोकों में लिखना होगा। फिर उसे एक लिंग की प्रतिष्ठा करनी होगी और तब वह कैलास को लौटने का अधिकारी होगा। इस उल्लेख से भी ज्ञात होता है कि बृहत्कथा मूल में एक शृंगार-कथा थी। पर नेपाल-माहात्म्य के इस उल्लेख में कथा का सुननेवाला भुङ्गी नामक गण था। भुङ्गी ने गुणाढ्य के रूप में मथुरा में जन्म लिया। वह बचपन में अनाथ हो गया और तब उज्जयिनी चला आया। उज्जयिनी में मदन नामक राजा राज्य करते थे उनकी रानी लीलावती गौड़देश के राजा की पुत्री थी। उज्जयिनी में सर्ववर्मन् नाम के महान् पण्डित राजसभा में थे। वे गुणाढ्य की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्होंने उसे भी राजा की सभा का सदस्य बनवा दिया। एक दिन राजा अपनी रानियों के साथ जल-विहार कर रहा था। तब उसने 'मोदक' शब्द का अशुद्ध प्रयोग किया। गुणाढ्य ने १२ वर्ष में उसे व्याकरण की शिक्षा देने की बात कही। पर सर्ववर्मन ने केवल दो ही वर्षों में उसे व्याकरण में पण्डित बना देने को कहा। गुणाढ्य और सर्ववर्मन में इसके लिए स्पर्द्धा हुई, और सर्ववर्मन ने कलाप-व्याकरण की रचना करके दो ही वर्षों में राजा को व्याकरण का ज्ञान करा दिया। गुणाढ्य
१ कृष्णमाचार्य संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृष्ठ ४१४-४१५।
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को संस्कृत-भाषा में न बोलने का आदेश हुआ। वह एक ऋषि के आश्रम में जाकर रहने लगा। वहाँ उसे पुलस्त्य ऋषि ने पैशाची भाषा में अपनी कथाएँ लिख डालने का परामर्श दिया और यह भी कहा कि ग्रंथ-समाप्ति के बाद वह नेपाल में शिवलिंग की स्थापना करके शाप-विमुक्त होकर मर्त्य-योनि से छूटेगा। गुणाढ्य गेरू से पेड़ की पत्तियों पर कथा लिखने लगा। वह उन्हें उच्चस्वर में पढ़ता जाता था जिसे सुनकर जंगल के पशु-पक्षी मोहित हो गए। यह बात राजा ने सुनी और जंगल में जाकर सब कुछ अपनी आँखों से देखा। उसने गुणाढ्य से सभा में लौट जाने का अनुरोध किया पर गुणाढ्य ने उसे स्वीकार न किया और कहा—'मैंने सौ लाख श्लोकों में पैशाची भाषा में इस कथा की रचना की है। आप इसकी रचना संस्कृत में कराएँ। मैं तो अब नेपाल जाऊँगा। तब उसने नेपाल जाकर पशुपतिनाथ शिव के दर्शन किए। वहीं रहनेवाले मुनियों को एकत्र करके उसने भृङ्गीश्वर शिव की स्थापना की और वहाँ से वह कैलाश चला गया। कथासरित्सागर के आरंभ में सोमदेव ने उसके स्वरूप और वर्ण्य विषयों का अच्छा परिचय दिया है। मैं बृहत्कथा के सार का संग्रह कर रहा हूँ। इसमें पहला लम्बक कथापीठ है। उसके बाद दूसरा कथामुख है। तीसरे लम्बक का नाम लावानक है। चौथे लम्बक में नरवाहनदत्त का जन्म है। उसके बाद पाँचवें लम्बक का नाम चतुर्दारिका है। छठा लम्बक मदनमंचुका और सातवाँ रत्न प्रभा नाम का है। आठवें लम्बक का नाम सूर्यप्रभा है। नवाँ अलंकारवती लम्बक है। दसवाँ शक्तियशस् लम्बक और ग्यारहवाँ वेला लम्बक है। बारहवाँ शशांकवती और तेरहवाँ मदिरा वती लम्बक है। उसके बाद पंच नामक चौदहवाँ लम्बक और पन्द्रहवाँ महाभिषेक लम्बक है। उसके बाद १६वाँ सुरतमंजरी लम्बक सत्रहवाँ पद्मावती लम्बक और अट्ठारहवाँ विषमशील लम्बक है। कथाओं को कहने की दृष्टि से सोमदेव का अपना पद है। उसकी प्रवाहमयी शैली की रोचकता को दूसरा कोई नहीं पहुँच पाता। सी एच टॉनी (C. H. Tawney) कृत कथासरित्सागर के अंग्रेजी-अनुवाद की भूमिका में पेंजर ने सोमदेव के ग्रंथ की प्रशंसा में लिखा है— 'जब हम इस ग्रंथ को देखते हैं तब इसमें आई हुई हर प्रकार की कथाओं को देखकर मन आश्चर्य से भर जाता है। ईसवी-सन् से सैकड़ों वर्ष पहले की जीवजन्तु-कथाएं इसमें हैं। द्य लोक और पृथ्वी के निर्माण-संबंधी ऋग्वेदकालीन कथाएं भी यहाँ हैं। उसी प्रकार रक्तपान करने वाले बेतालों की कहानियां सुन्दर काव्यमयी प्रेम-कहानियां और देवता मनुष्य एवं असुरों के युद्ध की कहानियां भी इस संग्रह में हैं। यह न भूलना चाहिए कि भारतवर्ष कथा-साहित्य की सच्ची भूमि है जो इस विषय में ईरान और अरब से बढ़ चढ़कर है। भारत के इतिहास की कथा भी तो उसी प्रकार की एक कहानी है। इसका अतिशयोक्तिपूर्ण रूप इन आख्यानों से कम रोचक नहीं है। 'इन कहानियों का संग्रह करनेवाला लेखक सोमदेव विलक्षण प्रतिभाशाली पुरुष था।
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कवियों में उसकी प्रतिभा कालिदास से दूसरे स्थान पर आती है। स्पष्ट रोचक और मन को खींच लेनेवाले ढंग से कहानी कहने की उसमें वैसी ही अद्भुत शक्ति थी जैसी कहानियों के विषयों की व्यापकता और विविधता है। मानवी प्रकृति का परिचय भाषा-शैली की सरलता वर्णन का सौन्दर्य और शक्ति एवं चातुर्य-भरी उक्तियां इन सब की रचना अत्यन्त प्रभावपूर्ण है। दूसरी ओर जैसा कि प्रायः पूर्वी (विशेषतः भारतीय) कहानियों में मिलता है यहाँ एक विशेषता यह भी है कि नई-नई कहानियां पहली कहानियों के पेटे में समाई हुई हैं और आश्चर्य जनक वेग से एक के बाद दूसरी कहानी उभरती हुई सामने आती चली जाती है। तब पाठक अभिलाषा करता है कि कोई सूत्र सहायक बनकर उसे कथाओं के इस भूल-भुलैये से उसका उद्धार करे। इस संस्करण के सम्पादक ने इस प्रकार का एक सहायक सूत्र सावधानी के साथ तैयार किया है और कहानियों पर संख्याओं के अंक डाल दिए गए हैं। "कथासरित्सागर अलिफ लैला की कहानियों से प्राचीनतर ग्रंथ है और अलिफ लैला की अनेक कहानियों के मूल रूप इसमें हैं। इसके द्वारा न केवल ईरानी और तुर्की लेखकों को बल्कि बोकेशिओ चौसर एवं लां फौतिन एवं अन्य अनेक लेखकों के द्वारा पश्चिमी संसार को भी अनेक कल्पनाएं प्राप्त हुई हैं। सोमदेव ने सोचा कि जैसे हिमालय से आई हुई अनेक धाराएं आगे-पीछे बहती हुई समुद्र में ही पहुँच जाती हैं वैसे ही छोटी-बड़ी सभी कहानियां उनके इस महान् ग्रंथ में इकट्ठी हो जायें और वह सच्चे अर्थ में कहानी-रूपी नदियों का सागर बन जाय। कथासरित्सागर के रूप में कल्पना ने एक ऐसे महान् कथा-सागर की सृष्टि की है कि उसमें अद्भुत कन्याओं और उनके साहसी प्रेमियों राजाओं और नगरों राजतन्त्र एवं षड्यन्त्र जादू और टोने छल और कपट हत्या और युद्ध रक्तपायी बेताल पिशाच यक्ष और प्रेत पशु-पक्षियों की सच्ची और गढ़ी हुई कहानियां एवं भिखमंगि साधु, विदग्धक जुआरी वेश्या विट और कुट्टनी इन सभी की कहानियां एकत्र हो गई हैं। ऐसा यह कथासरित्सागर भारतीय कल्पना जगत् का दर्पण है जिसे सोमदेव भविष्य की पीढ़ियों के लिए छोड़ गए हैं।" कथासरित्सागर की वर्तमान संघटना और लम्बकों के क्रम की तात्विक आलोचना करते हुए श्रीकीय ने जो लिखा है वह भी ध्यान देने योग्य है— "कथासरित्सागर में मूल ग्रंथ के कथा-क्रम में परिवर्तन किया गया है और इस परिवर्तन का अभिप्राय कथा के रस की रक्षा करना है। यह बात ग्रंथ के क्रम की वस्तु-स्थिति के बिलकुल अनुकूल है। पहले पाँच लम्बकों में कोई परिवर्तन नहीं है। शेष लम्बकों में सोमदेव पर काव्य के प्रभाव की रक्षा करने की अभिलाषा की प्रधानता थी। स्पष्टतया इसी कारण ने सोमदेव को पंच और महाभिषेक नामक लम्बकों के मध्य की खाई को दूर करने के लिए विवश किया। उनके ग्रंथ में उक्त दोनों लम्बकों का संक्रमण निर्दोष है। पंच नामक लम्बक का अन्त राजकुमार के इस निर्णय से होता है कि उसे एक भावी सम्राट् के राज्याभिषेक के लिए आवश्यक रत्नों को प्राप्त करना है। अगले लम्बक में यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है। यह कुछ ऐसे आकस्मिक ढंग से होता है जिसे सोमदेव बिलकुल मिटा नहीं सके हैं। परन्तु इससे सोमदेव रसमग्ना सर्वव्यापकी और
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शक्तियशस् नामक तीन लम्बकों को यथास्थान रख सके। साथ ही इससे काव्य के प्रारम्भिक भाग में इस दृष्टि से कि वह अत्यधिक भारी न हो जाये पूर्णतः आमूल परिवर्तन भी स्पष्टतः आवश्यक हो गया। इसके लिए जिस समाधान का आश्रय लिया गया वह इन तीन लम्बकों को जिनका संबंध राजकुमार के सम्राट् होने से पहले के वृत्तान्तों से है पञ्च नामक लम्बक के प्रथम रखने में तथा पद्मावती और विषमशील नामक दो लम्बकों को जिनका संबंध नायक से न होकर केवल उन कथाओं से था जो उसको सुनाई गई थीं और इसी कारण जिनको औचित्य के साथ एक परिशिष्ट के रूप में रखा जा सकता था ग्रन्थ के प्रारम्भिक विषय से हटा देने में था। पञ्च नामक लम्बक के पहले आनेवाले विषय का क्रम कलापूर्ण ढंग से रक्खा गया है क्योंकि उसमें मुख्यतया प्रासंगिक उपकथाओं से संबंध रखनेवाले लम्बकों को नायक के आकस्मिक होते हुए भी महत्त्वयुक्त कार्यों को देनेवाले लम्बकों के बीच-बीच में रखने का प्रयत्न किया गया है। जैसा कि पाँचवें लम्बक के अनन्तर जिसका संबंध प्रासंगिक कथाओं से है मदनमंचुका (६) नामक महत्त्व का लम्बक दिया गया है। इसके अनन्तर रत्नप्रभा (७) है। अलंकारवती (९) से पहले आनेवाला लम्बक 'सूर्यप्रभ' (८) मूर्त्त केवल उपकथाओं से सम्बन्ध रखता है। आकस्मिक कथाओं से सम्बद्ध शक्तियशस् (१०) सहज ही अलंकारवती के अनन्तर आता है। तदनन्तर वेला (११) शशांकवती (१२) मदिरावती (१३) और पूर्णतः महत्त्वयुक्त पंच तथा महाभिषेक (१४ और १५) आते हैं। तदनन्तर, परिशिष्ट रूप में सुरतमंजरी पद्मावती और विषमशील (१६ १८) दिए हुए हैं। एक लम्बक के वास्तविक विषय में एक परिवर्तन आवश्यक था। क्षेमेन्द्र में और संभवतः मूल ग्रन्थ में भी वेला का संबंध केवल प्रासंगिक उपकथाओं से ही नहीं था उसके अंत में मदनमंचुका के तिरोहित होने का आवश्यक अंश सम्मिलित था। उसी के आधार पर हम अगले लम्बकों में सूचित राजा के शोक को समझ सकते हैं। परन्तु, इस प्रकार का वर्णन रत्नप्रभा अलंकारवती और शक्तियशस् इन लम्बकों के संबंध में सोमदेव की योजना से मेल नहीं खाता था इसी कारण उक्त आवश्यक अंश को हटा देना पड़ा तो भी सोमदेव के लिए अपने क्रम में पंच से पहले के लम्बकों में मदनमंचुका के पहले से ही तिरोहित हो जाने के यत्र-तत्र चिन्हों को हटा देना संभव नहीं था। ¹
जैसा कीथ ने लिखा है कि प्रयत्न करने पर भी सोमदेव एक सुसंघटित ग्रंथ की रचना में सफल नहीं हुए, परन्तु कथासरित्सागर के उत्कर्ष का आधार उसके वस्तु की संघटना पर नहीं है। उसका आधार इस ठोस वस्तुस्थिति पर है कि सोमदेव ने सरस और अकृत्रिम रहते हुए आकर्षक और सुन्दर रूप में ऐसी कथाओं की बड़ी भारी संख्या को प्रस्तुत किया है जो नितान्त विभिन्न रूपों में—मनोविनोदकारक अथवा भयानक अथवा प्रेम-संबंधी अथवा कष्ट और त्रास के अद्भुत दृश्यों के प्रति हममें अनुराग उत्पन्न करने के लिए आश्चर्यजनक अथवा हास्योत्पादक थी
१ कीथ, संस्कृत-साहित्य का इतिहास श्रीमन्मङ्गलदेव शास्त्री कृत हिन्दी-अनुवाद पृ ३१४-३१५।
यहाँ पृष्ठ का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
परिचित कहानियों का सादृश्य उपस्थित करनेवाले रूपों में—हमारे लिए अत्यंत रुचिकर हैं। क्षेमेन्द्र में कहीं अत्यधिक संक्षेप और कहीं अस्पष्टता के कारण कहानियों का सारा आकर्षण और रोचकता ही नष्ट हो जाती है। ठीक इसके विपरीत पंचतंत्र के लेखक की तरह सोमदेव प्रतिभा के धनी हैं। वे पाठक के मन को थकाए बिना सावधानी से अभीष्ट अर्थ का प्रकथन कर सकते हैं। उनकी कहानियों का रुचिकर रूप कभी नहीं छीजता। (कीथ वही पृष्ठ ३३५) कथासरित्सागर में कहानियों का एक बढ़िया गुच्छा बेतालपंचविंशति नामक पच्चीस कहानियों का है (कथासरित्सागर, तरंग ७५-९९)। क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामंजरी में भी ये कहानियां हैं (९।२।११९-१२२१)। सोमदेव की अपेक्षा क्षेमेन्द्र का वर्णन संक्षिप्त और अलंकार- रहित है। क्षेमेन्द्र में जहाँ केवल १२१९ श्लोक हैं वहीं सोमदेव में २१९५।$^१$ प्रश्न होता है कि बेताल-विक्रम की ये कहानियां मूल बृहत्कथा में थीं या नहीं। इस विषय में हर्टेल और एजर्टन का मत है जो सम्भाव्य है कि मूल बृहत्कथा में बेतालपंचविंशति की कहानियां विद्यमान न थीं। नरवाहनदत्त के उपाख्यान से स्पष्टतः उनका कोई वास्तविक संबंध नहीं जान पड़ता। कीथ के अनुसार बेतालपंचविंशति के उपाख्यानों पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट है। पंचतंत्र की भी बहुत-सी कहानियां कथासरित्सागर में बिखरी हुई हैं। क्षेमेन्द्र ने उनको पंचतंत्र के अनुसार एक साथ ही कर दिया है। इनमें से कम-से-कम आधी कहानियां चार सौ पचास ईस्वी से पूर्व बने हुए एक ऐसे संग्रह में विद्यमान थीं जिसका उपयोग आर्यसेन संघ नाम के एक भिक्षु ने अपने ग्रंथ में किया था और जिसका चीनी भाषान्तर उसके शिष्य गुणवृद्धि ने ४९२ ई. में किया था। सोमदेव ने भूतों की कहानियां कहने में बड़ा रस लिया है। इसके अतिरिक्त चोर, जुआरी, धूर्त, वेश्यागामी, चालबाज़, हुँडोड़, कपटी, बदमाश, ठग, भण्डे, रंगीले भिक्षु आदि की कहानियों की तह जमाने में सोमदेव को अद्भुत सफलता मिली है। उनकी दृष्टि में समाज का अर्धांश चित्र नहीं, पूरा चित्र समाया हुआ है। भले और बुरे, ऊँच और नीच, धनी और कंगाल, धर्मात्मा और गुण्डे सभी के उभरे हुए चित्र उनके ग्रंथ में पाए जाते हैं। जैसे समुद्र सब नदियों का स्थान है, वैसे ही मानव-स्वभाव का जितना वैचित्र्य है, उसका पूरा अंकन सोमदेव ने अपने ग्रंथ में किया है। सोमदेव ने स्त्रियों के स्वभाव के विश्लेषण में बहुत रुचि ली है। स्त्री-चरित्र की अनन्त कहानियां उनके संग्रह में हैं। उनके स्वभाव के गुण-दोषों का चित्रण वे खुलकर करते हैं। ११वीं शती का काश्मीर स्त्रियों के विषय में कुछ अधिक सम्मानसूचक भाव से प्रभावित नहीं था। पतिप्रेममयी हींगला और अमर्यादित उच्छृंखलता प्रायः स्त्री-चरित्र के ऐसे पक्ष को सामने रखती हैं जो किसी प्रकार भव्य नहीं कहा जा सकता। सोमदेव का गुण इतना ही है कि वे कुछ भी कहने में संकोच का अनुभव नहीं करते। जैसे बरसाती नदियों की मटमैली धाराओं के ऊपर चारों ओर का चन्दनसार आकर बहने लगता है, वैसे ही सोमदेव की कथाओं की शैली बुराइयों को समेटकर सामने ले आती है। मानव-स्वभाव जैसा है, वैसा ही उसे दिखाना यह महान् लेखक
पाद-टिप्पणी: १. सुशील कुमार दे, संस्कृत-साहित्य का इतिहास, पृष्ठ ४२१ पाद टिप्पणी।
की विशेषता होती है और सोमदेव इसमें पिछड़े हुए नहीं हैं। सोमदेव की अनेक कहानियां मन पर एक बार छप जाने के बाद फिर नहीं भुलाई जा सकतीं। कहानी के विस्तार और संक्षेप की कला में सोमदेव सिद्धहस्त थे। वे उतने ही परिमित शब्दों का प्रयोग करते हैं जितनों से पाठकों की रुचि का विघात न हो और कहानी का रस भी अच्छी तरह अनुभव में आ सके। जब ११वीं शती में समासबहुला शैली का बोलबाला था उस समय सोमदेव ने जिस शैली का प्रयोग किया उसे देखकर आश्चर्य होता है। उन्होंने मानो बिना समासों के सरल वाक्यों का धड़ल्ले से निर्माण किया है, जैसे— बबन्ध मेखलां भूम्नि हारं च जग्रहस्तने । नूपुरौ करयोस्तस्याः कर्णयोरपि कङ्कणौ ॥ (६१।२६) कहानियों के सम्पुट को वे कितना छोटा बना सकते थे इसका एक नुकीला उदाहरण तूलिक या रूई बेचनेवाले मूर्ख की कहानी है— ध्वस्तोलूखलको देव श्रुणु वच्म्यथ तूलिकम् । मूर्खः कश्चित्पुमांस्तूलविक्रयायापणं ययौ ॥ अशुद्धमिति तत्सस्य न जग्राहार्य कश्चन । तावद्ददर्श तत्राग्नौ हेमविद्वत्प्रशोधितम् ॥ स्वर्णकारेण विक्रीतं गृहीतं ग्राहकेण च। तद् दृष्ट्वापि स तत्तूलमिद्धेऽग्न्योधमज्जडः । भस्मौ चिक्षेप दग्धे च तस्मिंल्लोको जहास्तम् । श्रुतोऽयं तूलिको देव खर्जूरीच्छेदकं शृणु ॥ ६१।२८-३१ ॥ 'हे देव ! पहलों के संबंध में मूर्ख की कहानी कह चुका अब रूईवाले की कहानी सुनिए। कोई मूर्ख रूई बेचने बाजार में गया पर साफ न होने से उसे किसी ने लिया नहीं। तब उसने देखा कि सुनार सोने को आग में तपाकर शुद्ध कर रहा है। उस सोने को सुनार ने बेचा और ग्राहक ने खरीद किया। यह देखकर उसने भी अपनी रूई को साफ करने के लिए आग में डाल दिया। इससे सब लोग उस उल्लू पर हँसने लगे। यह तूलिक की कहानी हुई, अब खजूर काटनेवाले मूर्ख की कहानी सुनें। इस प्रकार की तरंगित शैली में सोमदेव की छोटी कहानियां बड़ी कहानियों के सम्पुट में कटहल के कोयों की तरह भरी हुई हैं। इसी प्रकार गंवार गो-दोहक की कहानी है। उसकी गाय प्रति दिन पच्चीस सेर दूध देती थी। उसके यहां कोई उत्सव होने को हुआ। उसने सोचा कि एक ही बार में उत्सव के लिए सारा दूध दुह लूंगा और महीने भर तक गाय नहीं दुही। उत्सव आने पर जब दुहने बैठा तब उसे दूध की बूंद भी न मिली (६१।४४-४७)। पंचतंत्र के हिरण्यक चूहे, लघुपतनक कौए, चित्रग्रीव कबूतर, मंधरुक कछुए की कहानी भी इसमें लम्बक की ६१वीं तरंग में है जिसे सोमदेव ने प्रज्ञामिष्ठ या व्यावहारिक बुद्धिमानी की कहानी कहा है। ४
सोमदेव ने अपने वर्णन के बीच-बीच में नीति-संबंधी अनेक सूक्तियाँ डाल दी हैं। जैसे— अर्थो हि यौवनं पुंसां तदभावश्च वार्धकम्। तेनास्यौजौ बलं रूपमुत्साहश्चापि हीयते॥ (६।१।११६) भवन्तिके प्रभो भूत्वा नपूर्व्वं भ्रमरास्तदम्। मज्जन्तं च सरो हंसा मुञ्चन्त्यपि विरोदितम्॥ (६।१।११८) शुचिनो न बिभेत्योस्ति न सन्तुष्टस्य चाशुभम्। धीरस्य च विपन्नास्ति माहात्म्यं व्यवतामिव॥ ६।१।१२१ इस प्रकार नीति-संबंधी सूक्तियों की छौंक वर्णन के स्वाद को बढ़ा देती है और इस युक्ति से सोमदेव ने पूरा लाभ उठाया है। एक बार नरवाहनदत्त समुद्र के बीच में स्थित नारिकेलद्वीप से श्वेतद्वीप में आता है। यह श्वेतद्वीप क्षीरोद समुद्र के पास था जिसे आजकल कास्पियन सागर कहते हैं। इस श्वेतद्वीप का उल्लेख महाभारत के नारायणीय पर्व में हर्षचरित में तथा अन्य पुराणों में बहुधा आता है। सोमदेव ने यह संकेत वहीं से अपनाया। श्वेतद्वीप में निवास करनेवाले नारायण की जो स्तुति सोमदेव ने दी है वह स्तोत्र-विषय में भी उनकी सफलता की सूचक है (५।४२।९-१८)। स्तोत्र साहित्य का यह चमकता हुआ नग है। साहित्य की कितनी ही शैलियों और अभिप्रायों के बरतन में बढ़ी हुई निपुणता सोमदेव का गुण था। कथासरित्सागर अनेकविध कहानियों का महार्णव है। उसके पूरे स्वरूप की कल्पना कठिनाई से ही की जा सकती है। इस ग्रंथ का पठन और प्रचार अधिक होना चाहिए। भारतीयों का विश्वास था कि कहानी सुनने से पाप नष्ट होता है। इसका अभिप्राय यही है कि अच्छी कहानी मन के तनाव को दूर करती है और मनुष्य को फिर अपनी स्वाभाविक स्थिति में पहुँचा देती है। यह नमक की उस चुटकी के समान है जो क्षार भोजन को स्वादिष्ट बनाती है। ऐसे ही जीवन के अनेक व्यवहारों को करते हुए कहानी की उचित मात्रा से हम जीवन को अधिक रसपूर्ण बना सकते हैं। सोमदेव का ग्रंथ बहुमूल्य कोशों का समूह है अर्थात् उसमें रत्नों से परिपूर्ण अनेक डिब्बे भरे हुए हैं। चाहे वहाँ से अपनी रुचि के अनुसार हम उन्हें चुन सकते हैं। बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद् का यह प्रयत्न अभिनन्दन के योग्य है। इसमें कथासरित्सागर का न केवल हिन्दी-अनुवाद बल्कि मूल संस्कृत-पाठ भी दिया गया है। इस अनुवाद का श्रेय पं केदारनाथजी सारस्वत को है। पहले भाग में दस लम्बकों का अनुवाद उनका किया हुआ है। अब वे नहीं रहे पर आशा है कि परिषद् इसी प्रकार से शेष लम्बकों को भी मूल और अनुवाद के साथ प्रकाशित करेगी। काशी-विश्वविद्यालय शनिवार, ज्येष्ठ कृष्ण ४ सं २०१७ १४-५ १९६० वासुदेवशरण अग्रवाल