कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
५८२ कथासरित्सागर
५८२ कथासरित्सागर सद्गत्वा गर्भमेतस्या विपाद्योर्ध्वमाहर। अनतिक्रमणीयं हि निजं सत्यवचस्तव ॥१९०॥ एवमुक्तस्तया शक्तिदेवः स्नेहकृपाकुलः। प्रतिज्ञापरतन्त्रश्च क्षणमासीदनुत्तरः ॥१९१॥ जातोद्वेगश्च निर्गत्य बिन्दुरेखान्तिकं ययौ। सापि खिन्नमुपायान्तं तं विलोक्यैवमब्रवीत् ॥१९२॥ आर्यपुत्र! विषण्णोऽसि किमद्य ननु वेद्म्यहम्। बिन्दुमत्य नियुक्तरत्वं गर्भस्योत्पाटने मम ॥१९३॥ तच्च तेऽवश्यकर्तव्यं कार्यं किञ्चिद्धि विद्यते। नृशंसता न मास्त्यत्र काचिन्मा घृणां कृपा ॥१९४॥ देवदत्तब्राह्मणस्य कथा तथाहि शृणु नामात्र देवदत्तकथामिमाम्। पुरामूद्धरिदत्ताख्यः कम्बुकाख्ये पुरे द्विजः ॥१९५॥ तस्य च श्रीमतः पुत्रः कृतविद्योऽपि शैशवे। देवदत्ताभिधानोऽभूद्द्यूतैकव्यसनी युवा ॥१९६॥ द्यूतहारितवस्त्रादिर्गन्तुं नालं पितुर्गृहम्। एकदा च विवेशैकः स शून्यं देवतागृहम् ॥१९७॥ तत्र चापश्यदेकाकी साधितानेक कार्मणम्। जपन्तं जालपादाख्यं महाव्रतिनमेककम् ॥१९८॥ चकार च शनैस्तस्य प्रणाममुपगम्य सः। तेनाप्यपास्तमौनेन स्वागतेनाभ्यनन्द्यत ॥१९९॥ स्थितः क्षणाच्च तेनैव पृष्टो वैधुर्यकारणम्। शशंसास्मै स्वविपदं व्यसनक्षीणवित्तताम् ॥२००॥ ततस्तं स जगादैवं देवदत्तं महाव्रती। नास्ति व्यसनिनां वत्स! भुवि पर्याप्तये धनम् ॥२०१॥ इच्छा च विपदं हर्तुं यदि ते कुरु मद्वचः। विद्याधरत्वं प्राप्तं यत् कृतः परिकरो मया ॥२०२॥ तत्साधय त्वमप्येतन्मया सह सुलक्षण! मच्छासनं तु पाल्यं तन्नश्यन्तु विपदस्तव ॥२०३॥ १ विविधकाम्यनानावशां तावकम् ।
पंचम लम्बक ५८१
पंचम लम्बक ५८१ इसलिए अब तुम उसके पास जाकर उसका पेट फाड़कर लाओ। अब तुम्हें अपनी कही हुई सत्य बात से विचलित न होना चाहिए'॥१९० ॥ पत्नी के द्वारा इस प्रकार कहा गया शक्तिदेव प्रेम और दया से व्याकुल तथा प्रतिज्ञा से पराधीन होकर कुछ देर चुप रहा॥१९१॥ कुछ क्षण आवेश में आकर और वहाँ से निकलकर वह बिन्दुरेखा के पास गया। बिन्दु- रेखा ने उसे दुःखी और चिन्तित होकर अपने पास आते हुए देखकर कहा—'आर्यपुत्र आज दुःखी क्यों हो? यह मैं जानती हूँ कि तुम्हें बिन्दुमंती ने मेरा गर्भ फाड़ने के लिए कहा है। यह कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिए। उससे कुछ काम बनेगा इसमें कुछ भी क्रूरता नहीं है। इसलिए घृणा न करो'॥१९२-१९४॥ देवदत्त ब्राह्मण की कथा 'हे नाथ इस सम्बन्ध में मैं तुम्हें देवदत्त की कथा कहती हूँ सुनो—प्राचीन समय में कम्बुक नामक नगर में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। उस धनी ब्राह्मण का देवदत्त नामक एक पुत्र हुआ जो बाल्यावस्था में ही विद्वान् होकर भी युवावस्था में जूए का व्यसनी हो गया था॥१९५-१९६॥ एक बार जूए में अपने कपड़े तक हार जाने के कारण वह अपने पिता के घर न जा सका और लज्जित होकर वह एक देवमन्दिर में जाकर ठहरा॥१९७॥ वहाँ मन्दिर में अकेले उसने अनेक सामग्रियों को एकत्र करके एकान्त में जप करते हुए महाव्रती जाह्नपाद नामक तपस्वी को देखा॥१९८॥ देवदत्त धीरे से उसके पास जाकर प्रणाम करके बैठा। जाह्नपाद ने भी मौन त्यागकर उसका प्रेमपूर्ण वचनों से स्वागत किया॥१९९॥ कुछ समय बैठने के पश्चात् व्रती जाह्नपाद ने उसकी चिन्ता और दुर्दशा का कारण पूछा। उसके पूछने पर देवदत्त ने अपनी दुर्दशा का कारण जूए के व्यसन में धन का नष्ट हो जाना बताया॥२००॥ तब महातपस्वी जाह्नपाद ने कहा—'बेटा व्यसनियों के लिए पृथ्वी में पूरा धन ही नहीं है'॥२०१॥ यदि तुम मेरी बात मानो तो मेरी इच्छा तुम्हारा कष्ट दूर करने की है। मैंने अपनी साधना से जैसे विद्याधरत्व प्राप्त किया है और सिद्धि प्राप्त की है, उसे तुम भी मेरे साथ प्राप्त करो किन्तु मेरी आज्ञा का पालन करना होगा। तुम्हारी सब विपत्तियां दूर हो जायेंगी'॥२०२-२०३॥
५८४ कथासरित्सागर
५८४ कथासरित्सागर इत्युक्तो व्रतिना तेन प्रतिश्रुत्य १ तथेति तत्। स देवदत्तस्तत्पार्श्वे सदैव स्थितिमग्रहीत् ॥२०४॥ अन्येद्युश्च श्मशानान्ते गत्वा वटतरोरधः। विधाय रजनीं पूजां परमान्नं निवेद्य च॥२ ५॥ बलीन्दिक्षु च विक्षिप्य सम्पादिततदर्चनः। तं पार्श्ववर्तिनं विप्रमुवाच स महाव्रती ॥२ ६॥ एवमेव त्वया कार्यमिह प्रत्यहमर्चनम्। विद्युत्प्रभे गृहाणेमां पूजामित्यभिधायिना ॥२०७॥ अतः परं न जानेऽहं सिद्धिस्त्वैव ध्रुवावयोः। इत्युक्त्वा स ययौ तेन समं स्वनिलयं व्रती ॥२०८॥ सोऽपि नित्यं तरोस्तस्य मूलं गत्वा समर्च तत्। देवदत्तोऽर्चनं चक्रे तथैव विधिना ततः ॥२०९॥ एकदा च सपर्यान्ते द्विधाभूतात्तरोस्ततः। अकस्मात्पश्यतस्तस्य दिव्या नारी विनिर्ययौ ॥२१ ॥ एह्यस्मत्स्वामिनी भद्र ! वक्ति त्वामिति वादिनी। सा तं प्रवेशयामास तस्यैवाभ्यन्तरं तरोः ॥२११॥ स प्रविश्य ददर्शात्र दिव्यां मणिमयं गृहम्। पर्यङ्कवर्त्तिनीमेकां तत्र चान्तर्वरस्त्रियम् ॥२१२॥ रूपिणी सिद्धिरस्माकमियं स्यादिति स क्षणात्। यावद्व्यवस्यति तावत्सा कृतातिथ्या वराङ्गना ॥२१३॥ रणिताभरणैरङ्गैर्विहितस्वागतैरिव । उत्थाय निजपर्यङ्के तमुपावेशयत् स्वयम् ॥२१४॥ जगाद च महाभाग ! सुता यक्षपतेरहम्। कन्या हि रत्नवर्यस्य ख्याता विद्युत्प्रभाख्यया ॥२१५॥ आराधयच्च मामेष बालपादो महाव्रती। यस्यार्थसिद्धिर्देवास्मि त्वं प्राणेष्वपि मे प्रभुः ॥२१६॥ तस्माद् दृष्टानुरागिण्याः कुरु पाणिग्रहं मम। इत्युक्तः स तया चक्रे देवदत्तस्तथेति तत् ॥२१७॥ १ स्वीकृत्येति भावः २ परमान्नं तु पायसम् इत्यमरः।
पंचम लम्बक ५८५
पंचम लम्बक ५८५ तपस्वी साम्बन द्वारा इस प्रकार कहे गये देवदत्त ने उसकी बात स्वीकार कर ली और तब से उसी के पास रहने लगा॥२४॥ महाव्रती जालपाद ने दूसरी रात्रि में श्मशान के पास जाकर वटवृक्ष के नीचे पूजा करके खीर और नैवेद्य चढ़ाकर दिशाओं को बलि फेंकते हुए पूजा की और साथ में बैठे हुए देवदत्त से कहा—॥२५-२६॥ देवदत्त तुम्हें भी प्रतिदिन इसी प्रकार पूजन करना चाहिए और पूजा करके कहना चाहिए, विद्युत्प्रभे ! इस पूजा को ग्रहण करो॥२७॥ इससे आगे मैं नहीं जानता। किन्तु हम दोनों को सिद्धि अवश्य मिलेगी। इतना कहकर वह तपस्वी उसको साथ लेकर अपने घर लौट आया॥२८॥ वह ब्राह्मण देवदत्त भी प्रतिदिन उस वटवृक्ष के नीचे जाकर उसी विधि से पूजन करने लगा॥२९॥ एक दिन देवदत्त के पूजा कर लेने के उपरान्त उस वृक्ष के तने को बीच से फाड़कर सहसा एक दिव्यस्त्री निकली॥२१०॥ वह कहने लगी—हे भले आदमी ! मेरी स्वामिनी तुम्हें बुलाती है। इस प्रकार कहकर उसे वह वृक्ष के अन्दर ले गई॥२११॥ देवदत्त ने अन्दर जाकर मणियों से निर्मित एक सुन्दर भवन देखा और उसके भीतर पर्यंक पर बैठी हुई एक सुन्दरी स्त्री देखी। उसे देखकर देवदत्त सोचने लगा सम्भव है यही हमारी मूर्तिमती सिद्धि हो। जबतक वह ऐसा सोचता है तबतक वह सुन्दरी रमणी उसका आतिथ्य करके शुम्भ्रायमान आभूषणों से सुशोभित अंगों से उसका स्वागत करती हुई कहने लगी— 'मैं रत्नपर्व नामक यक्ष की पुत्री विद्युत्प्रभा हूँ। इस महाव्रती जालपाद ने मेरी आराधना की है, उसको मैं भ्रष्टसिद्धि देनेवाली हूँ। किन्तु तुम तो मेरे प्राणों के भी स्वामी हो॥२१२-२१६॥ इसलिए बेअन्ते भाव से प्रेम करनेवाली मुझसे तुम पाणिग्रहण कर लो। उसके इस प्रकार कहने पर देवदत्त ने उससे विवाह कर लिया॥२१७॥ ७४
५८६ कथासरित्सागर
५८६ कथासरित्सागर स्थित्वा च कञ्चित्काल स गर्भभारे तया धृते। जगाम पुनरागन्तुं तं महाव्रतिन प्रति॥२१८॥ शशंस च यथावृत्तं स तस्मै सभयं ततः। सोऽप्येवमात्मसिद्धयर्थी जगादैनं महाव्रती॥२१९॥ भद्र! साधु कृतं किं तु गत्वास्या यक्षयोषितः। विपाट्योदरमाकृष्य शीघ्रं गर्भं तमानय॥२२०॥ इत्युक्त्वा स्मारयित्वा च व्रतिना पूर्वसङ्गरम्¹। प्रेषितस्तेन भूयस्तां देवदत्तोऽप्यगात् प्रियाम्॥२२१॥ तत्र तिष्ठति यावच्च तद्विभावनदुर्मनाः। तावद् विद्युत्प्रभा सा तं यक्षी स्वयमभाषत॥२२२॥ आर्यपुत्र ! विषण्णोऽसि किमर्थं विदितं मया। आदिष्टं जारुपादेन सन्न मद्गर्भपाटनम्॥२२३॥ तदुद्गर्भमेतमाकर्षं पाटयित्वा ममोदरम्। न चेत् स्वयं करोम्येतत्कार्यं ह्यस्त्यत्र किञ्चन॥२२४॥ एव तयोक्त स यदा कर्तुं तन्नाशकद् द्विजः। तदाकृष्टवती गर्भं सा स्वयं पाटितोदरा॥२२५॥ तं च कृच्छ्रं पुरस्कृत्यस्त्वा देवदत्तं तमभ्यधात्। भोक्तुर्विद्याधरत्वस्य कारणं गृह्यतामयम्॥२२६॥ अहं च शापाद्यक्षीत्वे जाता विद्याधरी सती। अयमीवृक्ष शापान्तो मम जातिस्मरा ह्यहम्॥२२७॥ इदानीं यामि धाम एवं सङ्गमश्चावयोः पुनः। तत्रैवेत्यभिधायैषा क्वापि विद्युत्प्रभा ययौ॥२२८॥ देवदत्तोऽपि तं गर्भं गृहीत्वा खिन्नमानसः। जगाम जारुपादस्य सस्य स व्रतिनोऽन्तिकम्॥२२९॥ उपानयच्च तं गर्भं तस्मै सिद्धिप्रदायिनम्। भजन्त्यारम्भमरित्वा हि दुर्लभंऽपि न साधकः॥२३०॥ सोऽपि तत्पाचयित्वैव गर्भमांसं महाव्रती। व्यमुञ्चद्वदतं तं भैरवाङ्गाहतञ्जबीम्॥२३१॥ ततो दप्तवस्त्रियाविदेत्य पश्यति स द्विजः। तावन्मांसमशेषं तद् व्रतिना तेन भक्षितम्॥२३२॥
१ महासाहसं कार्यमिति पूर्वप्रतिज्ञाम्।
पंचम लम्बक ५८७
पंचम लम्बक ५८७ और कुछ समय तक उसके गर्भांगार में रहकर फिर अपने मुंह उस महातपस्वी के पास लौट आया और आकर उसने डरते-डरते वह सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया। यह सब सुनकर महातपस्वी बोला—॥२१८-२१९॥ 'भद्र ! तुमने जो कुछ किया अच्छा किया। किन्तु अब जाकर उस यक्षिणी का पेट फाड़कर शीघ्र ही उसके गर्भ को ले आओ॥२२० ॥ ऐसा कहकर और उस पूर्व प्रतिज्ञा का स्मरण कराकर साधक ने देवदत्त को फिर वहाँ भेजा और देवदत्त उस प्रेयसी के पास गया॥२२१॥ जब वह इस कर्म को करने में दुःखी होकर विद्युत्प्रभा के पास खड़ा हुआ तब वह स्वयं उससे कहने लगी— आर्यपुत्र तुम जिस लिए चिन्तित हो मुझे विदित है। तुम्हें जालपाद ने मेरा पेट फाड़कर मेरा गर्भ लाने के लिए कहा है। इसलिए तुम इस गर्भ को मेरा पेट फाड़कर खींच लो। नहीं तो मैं स्वयं यह कार्य करती हूँ। इसमें कुछ रहस्य है' ॥२२२-२२४॥ विद्युत्प्रभा के ऐसा कहने पर भी जब वह ब्राह्मण शक्तिदेव उसका पेट फाड़ने के लिए उद्यत न हुआ तब उसने स्वयं अपना पेट फाड़कर गर्भ को पेट से बाहर खींच लिया॥२२५॥ निकाले हुए गर्भ को आगे रखकर वह देवदत्त से कहने लगी— 'इस खानेवाले को विद्याधर बनाने के लिए इसे ले लो। मैं विद्याधरी होकर भी शाप से यक्षी बन गई थी। बस यहीं और इसी प्रकार मेरे शाप का अन्त था। मैं पूर्वजन्म की जाति का स्मरण करती हूँ ॥२ २६-२२७॥ अब मैं अपने स्थान को जाती हूँ और हम दोनों का फिर वहीं समागम होगा। इतना कहकर विद्युत्प्रभा अन्तर्धान हो गई ॥२२८॥ व्यथितहृदय देवदत्त भी उस गर्भ को लेकर उस साधक जालपाद के पास आया। आकर उसने उस गर्भ को उसे भेंट कर दिया॥ २२९॥ सज्जन लोग कठिनाई में भी केवल अपना पेट भरना ही नहीं जानते ॥२३ ०॥ उस महासाधक ने उसका मांस पकाकर उसका कुछ अंश भैरव को देने के लिए शक्तिदेव को जंगल में भेज दिया॥२३१॥ वन में बलि देकर लौटने पर जब शक्तिदेव ने देखा तब जालपाद उस सारे मांस को खा गया था॥२३२॥
५८८ कथासरित्सागर
५८८ कथासरित्सागर कथं सर्वं त्वया भुक्तमिति भ्रात्रास्य जल्पतः। जिह्वां¹ विद्याधरो भूत्वा जाल्पादः समुद्ययौ ॥२३३॥ व्योमश्यामखनिस्त्रिंशे² हारकेयूरराजिते। तस्मिन्नुत्पतिते सोऽथ देवदत्तो व्यचिन्तयत् ॥२३४॥ कष्टं कीदृगनेनाहं वञ्चितः पापबुद्धिना। यदि वात्यन्तमुग्धता न कस्य परिभूतये ॥२३५॥ तदेतस्यापकारस्य कथमद्य प्रतिक्रियाम्। कुर्यां विद्याधरीभूतमध्येनं प्राप्नुयां कथम् ॥२३६॥ तन्नास्त्युपायो बेतालसाधनादपरोऽत्र मे। इति निश्चित्य स ययौ रात्रौ पितृवनं ततः ॥२३७॥ तत्राहूय तरोर्मूले बेतालं नक्तंचरे। पूजयित्वाऽकरोत्तस्य नृमांसबलिस्तर्पणम् ॥२३८॥ अतृप्यन्तं च बेतालं तमन्यानयनासहम्। तर्पयिष्यन् स्वमांसानि च्छेत्तुमारभते स्म सः ॥२३९॥ तत्क्षणं च स बेतालो महासत्त्वमभाषत। सत्त्वेनानेन तुष्टोऽस्मि तव मा साहसं कृथाः ॥२४०॥ तद् भद्र किमभिप्रेतं तब यत्साधयामि ते। इत्युक्तवन्तं बेतालं स वीरः प्रत्युवाच तम् ॥२४१॥ विश्वस्तवञ्चको यत्र जाल्पादो धर्ती स्थितः। विद्याधरनिवासं तं नय तन्निग्रहाय माम् ॥२४२॥ तथेत्युक्तवता तेन बेतालेन स तत्क्षणात्। स्कन्धेऽधिरोप्य नभसा निन्ये वैद्याधरं पदम्³ ॥२४३॥ तत्रापश्यच्च तं जाल्पादं प्रासादवर्तिनम्। स विद्याधरराजत्वदृप्तं रत्नवासनस्थितम् ॥२४४॥ प्रतारयन्त तामेव सत्यविद्यापरीपदाम्। विद्युत्प्रभामनिच्छन्ती भार्यात्वे तत्प्रवृत्तिभिः ॥२४५॥
१ त्रुटितः। २ आराद्भावत् श्यामन्तः निस्त्रिंशः खड्गोयस्य सः। खड्गस्य श्यामो वर्णः कविसमय-प्रसिद्ध ३ दमप्रान्तम्। ४ श्यामम्।
पंचम लम्बक ५८९
पंचम लम्बक ५८९ 'तुमने अकेले ही सारा मांस क्यों खा लिया मेरे लिए क्यों नहीं रखा ? —शक्तिदेव के इस प्रकार कहते हुए ही वह कुटिल जालपाद विद्याधर बनकर आकाश में उड़ गया ॥२३३॥ आकाश के समान नीले रंग की तलवार लिये हुए और हार, केयूर से सुशोभित जालपाद के उड़ जाने पर देवदत्त सोचने लगा ॥२३४॥ दुःख है कि उस दुष्ट बुद्धि ने मुझे ठगा। सच है अत्यन्त सरलता किसे अपमानित नहीं करती ? ॥२३५॥ तो अब उसके इस अपकार का बदला मैं कैसे लूँ। विद्याधर बने हुए भी इसे किस प्रकार पकड़ लूँ ॥२३६॥ अब इसके लिए बेताल-साधना के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है यह मानकर वह रात को श्मशान में गया ॥२३७॥ यहाँ पर एक वृक्ष की जड़ में जाकर मनुष्य के मुख में नरमांस की बलि तथा तर्पण आदि करके उसने बेताल का आवाहन किया ॥२३८॥ उससे भी बेताल को तृप्त होते न देखकर उसकी तृप्ति के लिए वह अपना मांस काटने लगा। तब बेताल उस महान् आत्मावाले देवदत्त से कहने लगा—मैं तुम्हारे इतने ही साहस से प्रसन्न हूँ अब अधिक साहस न करो। तुम अपना अभीष्ट कार्य बताओ मैं उसे तुम्हारे लिए सिद्ध करूँ। बेताल के ऐसा कहने पर वह वीर देवदत्त बोला—विश्वासी व्यक्ति को ठगनेवाला मायक जालपाद जहाँ भी हो उस विद्याधरों के निवास-स्थान में तुम आज के लिए मुझे ले चलो ॥२३९-२४२॥ देवदत्त के ऐसा कहने पर वह बेताल उसी क्षण उसे कन्धे पर चढ़ाकर आकाश-मार्ग से विद्याधरों के लोक को ले गया ॥२४३॥ विद्याधरलोक के राजभवन में रत्न-सिंहासन पर बैठे हुए, विद्याधर-पद प्राप्त करके अभिमान से अन्ध एवं विद्याधरी पद को प्राप्त पत्नी विद्यन्माला को, उसके न चाहते हुए भी विविध प्रकार की बातों से उसे सुखी बनाने की चेष्टा करते हुए उसने जालपाद को देखा ॥२४४-२४५॥
५९२ कथासरित्सागर
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५९२ कथासरित्सागर इति दिव्यां गिरं श्रुत्वा पाटितोदरमाशु स। गर्भं तस्या समाकृष्य पाणिना पृष्ठतोऽग्रहीत् ॥२६०॥ गृहीतमात्रो जज्ञे च स खड्गस्तस्य हस्तगः। आकृष्टः सत्वतः सिद्धेः केशपाश इवायतः ॥२६१॥ ततो विद्याधरः क्षिप्रात्स विप्रः समजायत। बिन्दुरेखा च तत्काळमदर्शनमियाय सा॥२६२॥ तद्दृष्ट्वा च स गत्वैव दाशपुत्र्यै न्यवेदयत्। बिन्दुमत्यै द्वितीयायै पत्न्यै सर्वं तथाविधः ॥२६३॥ सा समाह वयं नाथ ! विद्याधरपतेः सुताः। तिस्रो भगिन्यः कनकपुरीत' शापतश्च्युता॥२६४॥ एका कनकरेखा सा वर्धमानपुरे त्वया। यस्या दृष्टः स शापान्तः सा च तां स्वां पुरीं गता ॥२६५॥ शापान्तो हीदृशस्तस्या विचित्रो विधियोगतः। अहमेव तृतीया च शापान्तस्त्वत्कृतेनैव मे॥२६६॥ मया चाद्यैव गन्तव्या नगरी सा निजा प्रिया। विद्याधरशरीराणि तत्रैवास्माकमासते ॥२६७॥ चन्द्रप्रभा च भगिनी ज्यायसी हि स्थिताऽत्र न। तदायाहि त्वमप्याशु खड्गसिद्धिप्रभावतः ॥२६८॥ तत्र ह्यस्मांश्चतस्रोऽपि भार्याः सम्प्राप्य चाधिकाः। वनस्थेनार्पिताः पित्रा पुरि राज्यं करिष्यसि ॥२६९॥ इति निजपरमार्थमुक्तवत्या सममनया पुनरेव बिन्दुमत्या। अथ कनकपुरीं स शक्तिदेवो गगनपथेन' तथेति तां जगाम ॥ २७० ॥ तस्यां च यानि योषिद्वपूंषि पर्यङ्कतल्यवर्त्तीनि। निर्जीवितान्यपश्यत्पूर्वं त्रिषु मण्डपेषु दिव्यानि ॥२७१॥ तानि यथावत् स्वात्मभिरनुप्रविष्टा स कनकरेखाद्या। प्राप्तो भूयः प्रणता मन्नाशीता निजप्रियास्तिस्र ॥२७२॥ तां च चतुर्थीमैक्षत तज्ज्येष्ठां रचितमङ्गलां तत्र। चन्द्रप्रभां पिबन्तीं चिरदर्शोत्कण्ठा दृष्ट्या ॥२७३॥
१ खड्गसिद्धेरवात्तस्य विद्याधरत्वं खेचरत्वञ्च सम्प्राप्तम्।
पंचम लम्बक ५९३
पंचम लम्बक ५९३ इस प्रकार दिव्यवाणी सुनकर शक्तिदेव ने उसका पेट फाड़कर गर्भ को गले से पकड़ा॥२१४॥ बिन्दुरेखा उसी समय अदृश्य हो गई और गर्भ को पकड़ते ही वह आत्मबल से प्राप्त सिद्धि के लम्बे केशपाश के समान तलवार बनकर उसके हाथ में रह गया। इस प्रकार, हाथ में तलवार के आते ही वह ब्राह्मण शक्तिदेव भी तुरन्त विद्याधर बन गया। यह सब दृश्य शक्तिदेव न पाकर अपनी दूसरी पत्नी धीवर कन्या बिन्दुमती से कहा। तब वह रहस्योद्घाटन करती हुई बताने लगी—'हे स्वामिन्! हम तीनों विद्याधरों के राजा की कन्याएँ तीन बहिनें हैं, जो शाप के कारण कनकपुरी से पतित हुई हैं॥२१५१-२१४॥ एक कन्या कनकरेखा नाम से वर्धमान नगर में राजकन्या हुई, जिसके शाप का अन्त तुमने स्वयं किया। वह अपनी नगरी को चली गई। दैवयोग से उसके शाप का अन्त ही ऐसा विचित्र था। मैं तीसरी बहिन हूँ। आज मेरे शाप का भी अन्त हो गया। आज ही मैं अपनी प्रिय नगरी को चली जाऊँगी। वहीं पर हमारे विद्याधर-शरीर सुरक्षित हैं॥२१५-२१७॥ हमारी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा भी वहीं है। अब तुम भी खड्गसिद्धि के प्रभाव से शीघ्र वहीं आओ॥२१८॥ तुम वहाँ हम चारों बहिनों को पत्नी-रूप में प्राप्त करके और बलशाली हमारे पिता का राज्य भी प्राप्त करके कनकपुरी का राज्य करोगे॥२१९॥ इस प्रकार अपनी वास्तविक स्थिति बतलानेवाली बिन्दुमती के साथ ही वह शक्तिदेव आकाश-मार्ग से कनकपुरी को गया॥२२०॥ उसने पहली बार उस राजभवन के तीनों मंदरों के भीतर पर्यंकों पर पड़े जो तीन निर्जीव शरीर देखे थे, अब वहाँ पहुँचने पर उनमें अपने-अपने जीवों के प्रवेश करने पर उनसे प्रणाम करती हुई तीनों पत्नियों को देखा॥२२१-२२२॥ तदुपरान्त उसने उनकी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा को भी देखा, जो चिरकाल के पश्चात् दर्शन मिलने के कारण उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से आत्म-रचना स्पष्ट देख रही थी॥२२३॥ ७५
५१ कथासरित्सागर
५१ कथासरित्सागर दृष्ट्वैव च सवेतालोऽप्यभ्यधावत्स तं रुषा। हृप्यद्विद्युत्प्रभानेत्रचकोरामृतचन्द्रमाः ॥२४६॥ जासपादोऽपि सोऽकस्मातं दृष्ट्वैवागतं तथा। वित्रासाद् भ्रष्टनिस्त्रिंशो' निपपातासनाद् भुवि ॥२४७॥ देवदत्तोऽपि सखड्गं स लब्ध्वाप्यवधीन्न तम्। रिपुष्वपि हि भीतेषु सानुकम्पा महाशयाः ॥२४८॥ जिघांसन्तं च वेताल तं जगाद स तारयन्। पाखण्डिना किमेतेन कृपणेन हतेन नः॥२४९॥ स्थाप्यतां भुवि नीत्वाय सस्मारस्वनिलये त्वया। आस्तां तत्रैव भूयोऽपि याथ कापालिको वरम् ॥२५० ॥ इत्येव वदतस्तस्य देवदत्तस्य तत्क्षणम्। दिवोऽवतीर्य शर्वाणी देवी प्रत्यक्षतां ययौ ॥२५१॥ सा जगाद च तं प्रह्व पुत्र तुष्टास्मि तेऽधुना। अनन्यसदृशेनेह सत्त्वोत्कर्षेण सम्प्रति ॥२५२॥ तद्विद्याधरराज्यञ्च मया दत्तमिहैव ते। इत्युक्त्वापितविद्या सा देवी सद्यस्तिरोऽभवत् ॥२५३॥ जासपादश्च नीत्वैव वेतालेन स भूतले। विभ्रष्टसिद्धिर्निदधे नाशर्मस्थिरमुद्धये ॥२५४॥ देवदत्तोऽपि सहित स विद्युत्प्रभया तया। विद्याधराधिराज्यं तत्प्राप्य तत्र व्यजृम्भत ॥२५५॥ इत्याख्याय कथां पत्ये शक्तिदेवाय सत्वरा। सा बिन्दुरेखा भूयस्तं बभाषे मृदुभाषिणी ॥२५६॥ इतीदृशि भवन्त्येव कार्याणि तदिव मम। बिन्दुप्रत्युदितं गर्भं मुक्तशोकं विपाटय ॥२५७॥ शक्तिदेवस्य विद्याधरत्वप्राप्तिः इत्येव बिन्दुरेखायां वदन्त्यां पापशङ्किते। शक्तिदेवे च गगनादुदभूत्तत्र भारती ॥२५८॥ 'भो शक्तिदेव ! निश्शङ्कं गर्भोऽस्याः कृप्यतां त्वया। कष्ठे मुष्ट्या गृहीतो हि खड्गोऽसौ ते भविष्यति' ॥२५९॥ १ हस्तच्युत खङ्गः ।
पंचम लम्बक ५११
पंचम लम्बक ५११ उसे देखते ही मन्त्रमाता विद्युत्प्रभा के नेत्र-चकोरों के लिए चन्द्रमा के समान वह युवक देवदत्त वेताल के सहित जालपाद की ओर दौड़ पड़ा। जालपाद ने भी उसे अकस्मात् आये हुए देखकर, भय और व्याकुलता के कारण उसके हाथ से तलवार के गिर जाने पर वह सिंहासन से भूमि पर गिर पड़ा ॥ २४६-२४७॥ देवदत्त ने उसकी गिरी हुई तलवार को पाकर भी उसे मारा नहीं उदार पुरुष डरे हुए शत्रुओं पर भी दयालु होते हैं॥२४८॥ जालपाद को मारते हुए वेताल को भी उसने रोक कर कहा—'इस बेचारे पाखण्डी को मारने से क्या लाभ? इसे पृथ्वी पर ले जाकर इसी के घर में रख दो। यह पापी फिर यहाँ कापालिक-व्रत करता रहे तो ठीक है।॥२४९-२५०॥ इस प्रकार की घटना होने पर उसी क्षण देवी पार्वती स्वर्ग से उतरकर आई और देवदत्त से प्रेमपूर्वक कहने लगीं—'बेटा तेरे इस असाधारण भार्योत्कर्ष से मैं प्रसन्न हूँ। इसलिए अब मैं तुझे स्वयं विद्याधरराज्यपद और विद्याप्रदान करती हूँ' ॥२५१-२५२॥ इतना कहकर और देवदत्त को विद्या प्रदान कर देवी अन्तर्धान हो गई ॥२५३॥ जालपाद को वेताल ने लाकर भूमि पर पटक दिया और उसकी सिद्धि भ्रष्ट हो गई। सच है अधर्म की सम्पत्ति चिरकाल तक नहीं रह सकती ॥२५४॥ तदनन्तर देवदत्त विद्युत्प्रभा के साथ विद्याधर-राज्य प्राप्त करके सुखपूर्वक वहाँ रहने लगा और उन्नति करने लगा ॥२५५॥ मधुरभाषिणी बिन्दुलेखा इस प्रकार अपने पति शक्तिदेव को कथा सुनाकर फिर बोली— 'ये कार्य इस प्रकार के होते हैं। इसलिए, तुम भी बिन्दुमती के कहने के अनुसार मेरे चर्म को पेट फाड़कर निकाल लो' ॥२५६-२५७॥ शक्तिदेव द्वारा विद्याधरत्व की प्राप्ति बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर भी पाप की शंका करते हुए शक्तिदेव ने आकाशवाणी सुनी—'हे शक्तिदेव ! तुम बिना किसी शंका के चर्म को निकाल लो। उस चर्म के शिशु की गर्दन को मुट्ठी से पकड़ोगे तो वह खड्ग बन जायगा'॥२५८-२५९॥
इति दिव्यां गिरं श्रुत्वा पाटितोदरमाशु सः। गर्भं तस्याः समाकृष्य पाणिना कच्छपोऽग्रहीत् ॥२६०॥ गृहीतमात्रो जज्ञे च स खड्गस्तस्य हस्तगः। आकृष्टः सत्वरं सिद्धेः केशपाश इवायतः ॥२६१॥ ततो विद्याधरः क्षिप्रात्स विप्रः समजायत। बिन्दुरेखा च तत्कालमदर्शनमियाय सा ॥२६२॥ तद्दृष्ट्वा च स गत्वैव वाणपुत्रीं न्यवेदयत्। बिन्दुमत्यै द्वितीयस्यै पत्न्यै सर्वं यथाविध ॥२६३॥ सा तमाह वयं नाथ विद्याधरपतेः सुताः। तिस्रो भगिन्यः कनकपुर्याः शापवशच्युताः ॥२६४॥ एका कनकरेखा सा वर्धमानपुरे त्वया। यस्या दृष्टः स शापान्तः सा च तां स्वां पुरीं गता ॥२६५॥ शापान्तो हीदृशस्तस्या विचित्रो विधियोगतः। अहमेव तृतीया च शापान्तश्चाधुनैव मे ॥२६६॥ मया चाद्यैव गन्तव्या नगरी सा निजा प्रिया। विद्याधरशरीराणि तत्रैवास्माकमासते ॥२६७॥ चन्द्रप्रभा च भगिनी ज्यायसी हि स्थिताऽत्र नः। तदायाहि त्वमप्यद्य खड्गसिद्धिप्रभावतः ॥२६८॥ तत्र ह्यस्मांश्चतस्रोऽपि भार्याः सम्प्राप्य चार्थिकाः। अनन्येनापिताः पित्रा पुरि राज्यं करिष्यसि ॥२६९॥ इति निजपरमार्थमुक्तवत्या सममनया पुनरेव बिन्दुमत्या। अथ कनकपुरीं स शक्तिदेवो गगनपथेन तथेति सो जगाम ॥२७०॥ तस्यां च यानि योषिद्वपुषि पर्यङ्कतलवर्त्तीनि। निर्जीवितान्यपश्यत्पूर्वं त्रिषु मण्डपेषु दिव्यानि ॥२७१॥ तानि यथामत् स्वानमभित्रन्प्रविष्टा स कनकरेखाद्याः। प्राप्तो भूयः प्रणता अद्वादीता निजप्रियान्निस्त्र ॥२७२॥ तां च चतुर्थीमैक्षत तज्ज्येष्ठां रुचितमङ्गसां तत्र। चन्द्रप्रभां पिबन्तीं चिरदर्शनमोत्कया दृष्ट्या ॥२७३॥
१ तद्बुद्धिदर्शनान्न विद्याधरत्वं खेचरत्वञ्च सम्प्राप्तम्।
पञ्चम लम्बक १९३
पञ्चम लम्बक १९३ इस प्रकार दिव्यवाणी सुनकर शक्तिदेव ने उसका पेट फाड़कर गर्भ को गले से पकड़ा॥२६०॥ बिन्दुरेखा उसी समय अदृश्य हो गई और गर्भ को पकड़ते ही वह आत्मबल से प्राप्त सिद्धि के लम्बे केशपाश के समान तलवार बनकर उसके हाथ में रह गया। इस प्रकार, हाथ में तलवार के आते ही वह ब्राह्मण शक्तिदेव भी तुरन्त विद्याधर बन गया। यह सब दृश्य शक्तिदेव ने आकर अपनी दूसरी पत्नी धीवर-कन्या बिन्दुमती से कहा। तब वह रहस्योद्घाटन करती हुई बताने लगी—'हे स्वामिन् ! हम तीनों विद्याधरों के राजा की कन्याएँ तीन बहिनें हैं, जो शाप के कारण कनकपुरी से पतित हुई हैं॥२६१-२६४॥ एक कन्या कनकरेखा नाम से वर्धमान नगर में राजकन्या हुई, जिसके शाप का अन्त तुमने स्वयं देखा। वह अपनी नगरी को चली गई। दैवयोग से उसके शाप का अन्त ही ऐसा विचित्र था। मैं तीसरी बहिन हूँ। अब मेरे शाप का भी अन्त हो गया। आज ही मैं अपनी प्रिय नगरी को चली जाऊँगी। वहीं पर हमारे विद्याधर-शरीर सुरक्षित हैं॥२६५-२६७॥ हमारी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा भी वहीं है। अब तुम भी खड्गसिद्धि के प्रभाव से शीघ्र वहीं आओ॥२६८॥ तुम वहाँ हम चारों बहिनों को पत्नी-रूप में प्राप्त करके और चक्रवर्ती हमारे पिता का राज्य भी प्राप्त करके कनकपुरी का राज्य करिये॥२६९॥ इस प्रकार अपनी वास्तविक स्थिति बतलानेवाली बिन्दुमती के साथ ही वह शक्तिदेव आकाश-मार्ग से कनकपुरी को गया॥२७०॥ उसने पहली बार उस राजभवन में तीनों महलों के भीतर पलंगों पर पड़े जो तीन निर्जीव शरीर देखे थे अब वहाँ पहुँचने पर उनमें अपने-अपने जीवों के प्रवेश करने पर उसने प्रणाम करती हुई तीनों पत्नियों को देखा॥२७१-२७२॥ तदुपरान्त उसने उनकी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा को भी देखा, जो चिरकाल के पश्चात् दर्शन मिलने के कारण उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से मंगल-रचना करके देख रही थी॥२७३॥ ७५
५९४ कथासरित्सागर
५९४ कथासरित्सागर स्वस्वनियोगव्यापृतपरिजनवनिनामिनन्दितागमम् । वासगृहान्तं प्राप्तश्चन्द्रप्रभया तया जगदे ॥२७४॥ या तत्र कनकरेखा राजसुता सुभग ! वर्धमानपुरे । दृष्टा भवता सायं भगिनी मे चन्द्ररेखेति ॥२७५॥ या दाधाधिपपुत्री विन्दुमती प्रथममुत्सङ्गरद्वीपे । परिणीताभूद्भवता शशिरेखा मत्सखी सेयम् ॥२७६॥ या तदनु बिन्दुरेखा राजसुता तत्र दानवानीता । शक्तिदेवस्य विद्याधरीभिः सह विवाहः भार्या च ते तदामूच्छशिखाप्रभा सेयमनुजा मे ॥२७७॥ तदिदानीमेहि वृतिभस्मत्पितुरन्तिकं सहास्माभिः । तेन प्रदत्ताश्चैता द्रुतमखिलाः परिणयस्वास्मान् ॥२७८॥ इति कुसुमशराज्ञासप्रगल्भं च तस्यां त्वरितमुदितवत्यामत्र चन्द्रप्रभायाम् । अपि चतसृभिरामैः साकमेतत्पितुस्त- न्तिकमनुजनन्तं शक्तिदेवो जगाम ॥२७९॥ स च चरणनताभिस्ताभिरभ्यथितोऽसौ दुहितृभिरखिलाभिर्दिव्यवाक्प्रेरितश्च । युगपदथ ददौ ताः शक्तिदेवाय तस्मै मुदितमविरलोपास्तत्र विद्याधरेन्द्रः ॥२८०॥ तदनु कनकपुर्यामृद्धमस्यां स्वराज्यं सपदि स विततार ख्याञ्च विद्याः समस्ताः । अपि च कृतिनमेनं शक्तिवर्म स्वनाम्ना व्यधित समुचितेन स्वेषु विद्याधरेषु ॥२८१॥ धन्यो न जेष्यति भवत्प्रभृतिप्रभावाद् वत्सेश्वरात् पुनरुदेष्यति चक्रवर्ती । युष्मासु योऽत्र नरवाहनदत्तनामा भावी विभुः स तव तस्य मतिं विदध्याः ॥२८२॥ इत्युपिबादन विससर्ज महाप्रभावो विद्याधराधिपतिरारमतपोबनात्तम् । सत्वरय मप्रियतमं निजराजधानीं जामातरं स शशिखण्डपशभिधानः ॥२८३॥
पञ्चम लम्बक ५१५
पञ्चम लम्बक ५१५ अपनी-अपनी ओर से चन्द्रप्रभा की सेवा में लगी हुई उसकी सेविकाओं द्वारा शक्तिदेव के आगमन पर प्रसन्नता प्रकट किये जाने के पश्चात् वह शक्तिदेव चन्द्रप्रभा के साथ उसके शयनागार में गया। वहाँ जाकर चन्द्रप्रभा ने उससे इस प्रकार कहा—'हे सौभाग्यशालिन् ! तुमने वर्धमान नगर में कनकरेखा नाम की जो राजकुमारी देखी थी वह चन्द्ररेखा नाम की मेरी बहिन है॥२७४-२७५॥ उत्स्थल द्वीप में तुमने जिस धीवर-कन्या बिन्दुमत्ती से विवाह किया था वह मेरी शशि- रेखा नाम की बहिन है॥२७६॥ उसके पश्चात् दानव द्वारा ले जाई गई बिन्दुरेखा नाम की जिस कन्या से तुमने विवाह किया था वह मेरी शशिप्रभा नाम की चौथी और छोटी बहिन है॥२७७॥ शक्तिदेव का विद्याधरियों के साथ विवाह अब तुम हम लोगों के साथ हमारे पिताजी के पास चलो और उनसे दी हुई हम चारों का विवाह अपने साथ कर लो॥२७८॥ इस प्रकार कामदेव की आज्ञा के समान गम्भीरतापूर्वक चन्द्रप्रभा के कहने पर उन चारों प्रियतमाओं के साथ वह शक्तिदेव शीघ्र ही वन के मध्य में स्थित उनके पिता के पास गया॥२७९॥ उनके पिता के चरणों पर प्रणाम करती हुई उन चारों कन्याओं द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर और आकाशवाणी से प्रेरित होकर एक साथ ही चारों कन्याओं को शक्तिदेव के लिए दे दिया॥२८०॥ तदुपरान्त विद्याधरों के उस राजा ने कनकपुरी में समस्त अपने राज्य को और अपनी सभी विद्याओं को भी उसे देकर, उस खड्ग और शक्तिदेव को अपना शक्तिवेग नाम भी देकर अपनी विद्याधर जाति में समुचित स्थान प्रदान किया॥२८१॥ और कहा—'तुम्हारा इतना अधिक प्रभाव होगा कि तुम्हें कोई जीत न सकेगा। वत्स- राज उदयन से नरवाहनदत्त नाम का जो पुत्र होगा वह तुम विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा। वह तुम्हारा भावी स्वामी है। इसलिए तुम उसे प्रणाम करना'॥२८२॥ ऐसा कहकर उस महाप्रभावशाली शशिध्वज नामक विद्याधरों के अधिपति ने शक्तिवेग (शक्तिदेव) का सत्कार करके उसकी चारों पत्नियों के साथ उस जामाता को संजोग से विदा करके राजधानी कनकपुरी को भेज दिया॥२८३॥
५९६ कथासरित्सागरे
५९६ कथासरित्सागरे अथ सोऽपि शक्तिवेगो राजा भूत्वा विवेश कनकपुरीम्। स्ववधूभिः सह गत्वा विद्याधरलोकवैजयन्तीं ताम्॥२८४॥ तस्यां तिष्ठन् कनकरचनाविस्फुरन्मन्दिराया- मत्योन्नत्याविष पदुपतत्पिण्डितार्कप्रभायाम्। वामाक्षीभिश्चतसृभिरसौ रत्नसोपानवापी हृद्योद्यानेष्वरभतरा निर्वृतिं प्रेयसीभिः॥२८५॥ इति कथित्वा चरितं निजमेव विचित्रमेष तत्कासम्। निजगाद शक्तिवेगो वाग्मी वत्सेश्वरं भूयः॥२८६॥ तं मां शशाङ्ककुलभूषण! शक्तिवेगं जानीह्युपागतमिमं खलु वत्सराज। उत्पन्नभाविनिज नूतनचक्रवर्ति युष्मत्सुताङ्घ्रियुगदर्शनसाभिलाषम् ॥२८७॥ इत्थं मयेह मनुजेन सतापि लब्धा विद्याधराधिपतिता पुरजित्प्रसादात्। गच्छामि चाहमधुना नृपते स्वधाम दृष्टं प्रभुर्भवतु भद्रमभङ्गुरं वः॥२८८॥ इत्युक्त्वा रचिताञ्जलौ च वदति प्राप्ताभ्यनुज्ञे तत स्तस्मिन्नुत्पतिते मृगाङ्कमहसि द्यो शक्तिवेगे क्षणात्। देवीभ्यां सहितः सबालतनयो वत्सेश्वरो मन्त्रिभि सार्धं कामपि तत्र संमदमयीं भेजे तदानीं दशाम्॥२८९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे चतुर्दारिकालम्बके तृतीयस्तरङ्गः। समाप्तोऽयं चतुर्दारिकालम्बकः पञ्चमः।
[Header] पंचम लम्बक ५९७
[Header] पंचम लम्बक ५९७
वह शक्तिवेग भी अब राजा बनकर अपनी प्रियतमाओं के साथ विद्याधर-लोक की पताका के समान कनकपुरी में आ गया॥२८४॥ विद्याधराधिप वह शक्तिवेग मानों अत्यन्त ऊँची होने से नीचे गिरती हुई सूर्य-किरणों के समान सोने की रचना से चमचमाती हुई प्रासाद श्रृंखलाओंवाली कनकपुरी में उन चारों प्रियतमाओं के साथ रत्नजड़ित सीढ़ियोंवाली उद्यान-वावलियों में अत्यन्त मुग्ध और आनन्द लेने लगा॥२८५॥ वाक्पटु शक्तिवेग इस प्रकार अपना विचित्र चरित्र वत्सराज को सुनाकर फिर बोला-॥२८६॥ हे वत्स्य भूपाल वत्सराज तुम मुझ उसी शक्तिवेग को उत्पन्न हुए अपने नये चक्रवर्ती पुत्र के चरणकमलों के दर्शन का अधिकारी समझो॥२८७॥ इस प्रकार मनुष्य होकर भी मैंने शिवजी की कृपा से विद्याधरों की प्रभुता प्राप्त की है। अब मैं अपने स्थान को जाता हूँ। बाल-रामा का रक्षण कर लिया। आपका सर्वदा मंगल हो॥२८८॥ इस प्रकार प्रणाम कर जाने की आज्ञा प्राप्त करके चन्द्रमा के समान तेजस्वी शक्तिदेव के आकाश में उड़ जाने पर महारानियों मन्त्रियों और पिता के साथ वत्सराज ने अत्यन्त आनन्द का अनुभव किया॥२८९॥ तृतीय तरङ्ग समाप्त चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक समाप्त
मदनमञ्चुका नाम षष्ठो लम्बक
मदनमञ्चुका नाम षष्ठो लम्बक इदं गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्वरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्ग तर्जयन्निव विघ्नौघानमितोन्नमितेन यः। मुहुर्विभाति शिरसा स पायाद् वो गजाननः ॥१॥ नमः कामाय यद्बाणपातैरिव निरन्तरम्। भाति कण्टकितं शम्भोरप्याश्लिङ्गितं वपुः ॥२॥ इत्यादि दिव्यचरितं कृत्वात्मानं किसान्यवत्। प्राप्तविद्याधरैश्वर्यो यदा मरुत् स्वयं जगौ ॥३॥ नरवाहनदत्तोऽत्र सपत्नीकैर्महर्षिभिः। पृष्टः प्रसङ्गे कुत्रापि तदिदं शृणुताधुना ॥४॥ नरवाहनदत्तस्य युवावस्था अथ संवर्ध्यमानोऽत्र पित्रा वत्सेश्वरेण सः। नरवाहनदत्तोऽभूद्व्युत्क्रान्ताष्टमवत्सरः ॥५॥ विनीयमानो विद्यासु क्रीडन्नुपवनेषु च। सह मन्त्रिसुतैरासीद्राजपुत्रस्तदा न सः॥६॥ देवी वासवदत्ता च राज्ञी पद्मावती तथा। आस्तामेकतमस्नेहात्तदेवाग्रे दिवानिशम् ॥७॥ आरोहद्गुणभङ्गेण रेजे सद्वंशजन्मना। आनीरापूर्यमाणेन वपुषा धनुषा च सः ॥८॥ पिता वत्सेश्वरश्चास्य विवाहादिमनोरथैः। आसन्नफलसम्पत्तिकामैः कालं निनाय तम् ॥९॥
मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक
मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक (मंगला-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।) प्रथम तरंग ऊपर उठने और नीचे झुकते हुए मस्तक से विघ्नों के समूह को मानो दूर करते हुए गजानन आपकी रक्षा करें ॥१॥ उस कामदेव को नमस्कार है, जिसके बाणों के प्रहार से पार्वती द्वारा निरन्तर आलिङ्गित रहने पर भी शिवजी का शरीर सदा रोमाञ्चित रहता है ॥२॥ विद्याधरों का चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त करके अपने को एक स्तम्भ व्यक्ति बनाकर नर वाहनदत्त ने वार्तालाप के प्रसंग में मरुभूति महर्षियों के पूछने पर प्रारम्भ से लेकर जिस प्रकार अपना चरित्र वर्णन किया अब उसे सुनो ॥३॥ पिता वत्सराज द्वारा पालन-पोषण करते हुए नरवाहनदत्त ने अपनी बाल्यावस्था के आठ वर्ष व्यतीत किये ॥४॥ नरवाहनदत्त की युवावस्था उस समय वह राजकुमार नरवाहनदत्त मन्त्रियों के पुत्रों के साथ विद्याओं की शिक्षा ग्रहण करता हुआ और उद्यानों में खेलता हुआ समय व्यतीत कर रहा था ॥५॥ रानी वासवदत्ता और रानी पद्मावती दोनों समान स्नेह से रात-दिन उसकी देखभाल करती रहती थीं ॥६॥ वह राजकुमार जन्म में प्राप्त होने हुए गुणों से तथा उच्च कुल में जन्म लेने के कारण उत्तरोत्तर गौरवान्वित और धीरे-धीरे शरीर से तथा (धनुःपक्ष में) चढ़ाई हुई प्रत्यञ्चा (गुण) से तथा श्रेष्ठ बाँस से निर्मित और धीरे-धीरे चढ़ाये जाते हुए धनुष से शोभित होने लगा ॥७-८॥ कुमार का पिता वत्सराज उदयन भी शीघ्र ही फल देने के कारण मनोहर और आकर्षक उसके विवाह आदि मनोरथों से अपना समय व्यतीत कर रहा था ॥ ९॥