कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
५६ कथासरित्सागर
५६ कथासरित्सागर
ऋक्ष मानुषमद्य मे क्षिप यावद् व्रजाम्यहम्।
ऋक्षस्ततोऽब्रवीत्पाप ! न मित्रं घातयाम्यहम् ॥८४॥
क्रमादृक्षे प्रसुप्ते च राजपुत्रे च जाग्रति।
पुनं सिंहोऽब्रवीत्तन्मृक्षं मे क्षिप मानुष! ॥८५॥
तच्छ्रुत्वात्मभयात्तन सिंहस्याराधनाय सः।
क्षिप्तोऽपि नापतन्निम्नमृक्षो दैवप्रचोदितः ॥८६॥
मित्रद्रोहिन्मभोन्मत्त इति शापमवाप्य सः।
तस्य राजसुतस्तत्त्वं वृत्तान्तावगमावधिम् ॥८७॥
प्राप्यैव स्वगृहं प्रातर्हन्मत्तोऽभून्नृपात्मजः।
योगनन्दश्च तद् दृष्ट्वा विषादं सहसागमत् ॥८८॥
अब्रवीच्च स कालऽस्मिञ्जीवेद् वररुचिर्यदि।
ज्ञायेत तत्सर्वं धिक् च तद्वधपाटवम् ॥८९॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञः शकटालो व्यचिन्तयत्।
हन्त कात्यायनस्यायं समयः काल प्रकाशने ॥९०॥
न सोऽत्र मानी तिष्ठेच्च राजा मयि च विश्वसेत्।
इत्यालोच्य स राजानमब्रवीद्याचिताऽभयः ॥९१॥
राजन्ख विषादेन जीवन्वररुचिः स्थितः।
योगनन्दस्ततोऽवादीद्द्रुतमानीयतामिति ॥९२॥
अथाहं शकटारेन योगनन्तान्तिकं हठात्।
आनीतस्तं तथाभूतं राजपुत्रं व्यलोकयम् ॥९३॥
मित्रद्रोहः कृतोऽनेन देवेत्युक्त्वा तथैव सः।
सरस्वतीप्रसादेन वृत्तान्तः कथितो मया ॥९४॥
सतस्तच्छापमुक्तेन स्तुतोऽहं राजसूनुना।
त्वया कथमिवं ज्ञातमित्यपृच्छत्स भूपतिः ॥९५॥
अथाहमवदं राजँल्लक्षणैरनुमानतः।
प्रतिभातञ्च पश्यन्ति सर्वं प्रज्ञावतां धियः ॥९६॥
तद्यथा तिष्ठतां मातस्तथा सर्वमिदं मया।
इति मद्वचनात्साक्षाद्भूद्राजा सञ्जानुतापवान् ॥९७॥
अपानादृतमर्थाश्च परिगृह्यैव मामवान्।
स्वगृहं गतवानस्मि धीर हि विदुषां धनम् ॥९८॥
हे भ्रात तुम इस मनुष्य को पेड़ से नीचे फेंक दो। मैं इसे लेकर चला जाऊँ। भालू बोला—
'रे पापी ! यह मेरा मित्र है। मैं मित्र को मरवाना नहीं चाहता' ॥८४॥
क्रमशः भालू के सोने और राजपुत्र के जागते रहने पर सिंह ने राजपुत्र से कहा—
'हे मनुष्य तुम इस भालू को मेरे लिए पेड़ से नीचे फेंक दो' ॥८५॥
यह सुनकर भय के कारण सिंह को प्रसन्न करने के लिए राजपुत्र ने भालू को नीचे फेंकने
का यत्न किया। आश्चर्य है कि दैवयोग से तत्काल जागा हुआ भालू उसके यत्न करने पर भी नीचे
न गिर सका ॥८६॥
भालू ने राजपुत्र को शाप दिया कि 'हे मित्रद्रोहिन् ! जबतक यह वृत्तान्त प्रकट न होगा
तबतक तू पागल बना रहेगा' ॥८७॥
प्रातःकाल राजकुमार राजभवन पहुँचते ही पागल हो गया। योगनन्द, उसकी यह दशा
देखकर अकस्मात् अत्यन्त दुःखी हुआ ॥८८॥
राजा ने कहा—'यदि इस समय वररुचि जीवित होता तो इस पागलपन
का कारण मालूम होता। उसके मारने में जो मैंने चातुर्य किया इसके लिए मुझे धिक्कार
है' ॥८९॥
राजा की बातें सुनकर मन्त्री शकटाल ने सोचा कि यह अवसर वररुचि को प्रकट करने
का है ॥९०॥
उसने सोचा कि वररुचि मानी है। अब वह यहाँ मन्त्री बनकर न रह सकेगा
और मैं ही एकमात्र सर्वसर्वा रहूँगा। राजा मुझ पर विश्वास करेगा। (तब मैं अपना
बदला निर्द्वन्द्व होकर ले सकूँगा) ऐसा सोचकर उसने राजा से अभय की प्रार्थना करके
बोला ॥९१॥
इसके अनन्तर शकटाल ने हर्षपूर्वक मुझे योगनन्द के पास पहुँचाया और मैंने उन्मत्त
राजपुत्र को देखा ॥९२॥
उसे देखकर मैंने राजा से कहा—'इसने मित्रद्रोह किया है' और गन्धवती की कृपा से
उस को रात का सारा वृत्तान्त कह दिया ॥९३॥
मेरे वृत्तान्त कहने पर राजपुत्र शाप से मुक्त होकर मेरी स्तुति करने लगा और राजा ने
पूछा कि तुमने इस वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ॥९४-९५॥
तब मैंने कहा—'राजन् ! बुद्धिमान् की बुद्धि अथवा या अनुमान से तथा प्रतिभा से
सब कुछ जान लेती है। जैसे मैंने रात्री की कमर में सिंह का ज्ञान किया था। यह सुनकर राजा
पश्चात्ताप करने लगा ॥९६-९७॥
तदनन्तर राजा के द्वारा दिये गये सम्मान दान आदि की उपेक्षा करके विरक्तता को
बहुत बड़ा लाभ समझकर मैं अपने घर चला गया। कारण यह कि चरित्र की पवित्रता ही
विद्वानों का धन है ॥९८॥
प्राप्तस्यैव च तत्रस्थो जनोऽरोदीत्पुरो मम।
अभ्येत्य मां समुद्भ्रान्तमुपवर्षोऽब्रवीत्ततः ॥९९॥
राजा हत निशम्य त्वामुपकोशाग्निसाम्बुषु।
अकरोदथ मातुस्ते शुचा हृदयमस्फुटत् ॥१ ०॥
तच्छ्रुत्वाभिनवोद्भूतशोकवेगविव्हलः ।
सद्योऽहमपतं भूमौ वातरुग्ण इव द्रुमः ॥१०१॥
क्षणाच्च गतवानस्मि प्रलापार्ता रसज्ञताम्।
प्रियबन्धुविनाशोत्थः शोकाग्निः कं न तापयेत् ॥१०२॥
जातःसारं जगत्त्यस्मिन्का नित्या ह्यनित्यता।
तदेतामैश्वरीं मायां किं जानन्नपि मुह्यसि ॥१०३॥
इत्याविभिस्पागत्य वर्षेण वचनैरहम्।
बोधितोऽथ यथातत्त्वं कथम्चिद्धृतिमप्तवान् ॥१०४॥
ततो विरक्तहृदयस्त्यक्त्वा सर्व निबन्धनम्।
प्रस्थमैकसहायोऽहं तपोवनमक्षियिम् ॥१ ५॥
दिवसष्वप गच्छत्सु तत्तपोवनमकतः।
अयोध्यात उपागच्छद् विप्र एको मयि स्थितः ॥१ ६॥
स मया योगनन्दस्य राज्यवार्तामपृच्छ्यत।
प्रत्यभिज्ञाय मां सोऽथ सशोकमिदमब्रवीत् ॥१ ७॥
शृणु नन्दस्य यद्वृत्तं तत्सकाक्षाद् गते त्वयि।
[L20: लब्धावकाशस्तत्राभूच्छकटालश्चिरेण सः ॥१०८॥
स चिन्तयन्बधोपायं योगनन्दस्य युक्तितः।
क्षितिं खनन्तमद्राक्षीच्चाणक्याख्यं द्विजं पथि ॥१ ९॥
किं भुवः खनसीत्युक्ते तेन विप्रोऽथ सोऽब्रवीत्।
दर्भमुन्मूलयाम्यत्र पाने येतेन मे क्षतः ॥११ ०॥
तच्छ्रुत्वा सहसा मन्त्री कोपनं क्रूरनिश्चयम्।
तं विप्रं योगनन्दस्य बधोपायममन्यत ॥१११॥
नाम पृष्ट्वाऽब्रवीच्च व हे ब्रह्मन् दापयामि ते।
अह त्रयोदशीनाद्य गृहे नन्दस्य भूपतेः ॥११२॥
दक्षिणातः सुवर्णस्य लक्षं तव भविष्यति।
भोक्ष्यस धुरि चास्येपामर्हि तावद् गृहं मम ॥११३॥
प्रथम लम्बक ६९
प्रथम लम्बक ६९
मेरे घर पहुँचते ही वहाँ के सभी मनुष्य मेरे सामने आकर रोने लगे। इस प्रकार, व्याकुल
मुझे उपवर्ष (श्वशुर) ने कहा—॥१९॥
‘राजा के द्वारा तुम्हारे मारे जाने का समाचार सुनकर उपकोशा ने शरीर को अग्नि
में दग्ध कर दिया और तुम्हारी माता का हृदय शोक से फट गया’ ॥१ ॥
यह सुनकर अमितव शोक के आक्रमण से मूर्च्छित होकर मैं हवा से गिराये हुए वृक्ष के
समान भूमि पर गिर पड़ा ॥१ २॥
मूर्च्छित होने के अनन्तर ही पागलों की भाँति प्रलाप करने लगा। प्रियतम बन्धु के विनाश
से उत्पन्न शोक-अग्नि किसे उत्तप्त नहीं करती ॥१ २॥
‘इस अनन्त संसार में अनित्यता ही एकमात्र नित्य वस्तु है, इस बात (ईश्वरी माया) को
जानते हुए भी तुम साधारण मनुष्यों के समान क्यों मोहित हो रहे हो ? आचार्य वर्ष ने आकर ऐसे
वचनों से मुझे प्रतिबोधित किया तब किसी प्रकार मुझे धैर्य प्राप्त हुआ ॥१ ३-१ ४॥
वररुचि का वैराग्य और महाप्रस्थान
तदनन्तर विरक्तहृदय होकर और सांसारिक सभी बन्धनों को छोड़कर मैं शान्तिपूर्वक
तपोवन की शरण में गया ॥१ ५॥
कुछ दिनों के अनन्तर मेरे तपोवन में रहते ही उसमें एक ब्राह्मण अयोध्या से आया ॥१ ६॥
मैंने उस ब्राह्मण से योगनन्द की राज्य-स्थिति के सम्बन्ध में पूछा। उसने मुझे पहचान
कर शोक के साथ कहा ॥१ ७॥
सुनो मन्त्रिवर्य त्यागकर तुम्हारे चले जाने पर धीरे-धीरे शकटाल का चिरकाल के बाद
अवसर मिला ॥१ ८॥
शकटाल ने युक्ति द्वारा नन्द के वध का उपाय सोचते-सोचते पृथ्वी को खोदते हुए
चाणक्य नामक ब्राह्मण को मार्ग में देखा ॥१ ९॥
शकटाल के यह पूछने पर कि ‘तुम भूमि क्यों खोद रहे हो ?’ उस ब्राह्मण ने कहा कि
‘मैं कुशांकुरों का उन्मूलन कर रहा हूँ क्योंकि इसने मेरे पैरों में व्रण (घाव) कर दिया' ॥११० ॥
चाणक्य की कथा
शकटाल ने उस ब्राह्मण का नाम पूछकर कहा—'हे ब्राह्मण मैं तुम्हें राजा नन्द के घर में
त्रयोदशी तिथि को श्राद्ध का निमन्त्रण देता हूँ ॥१११॥
भोजन की दक्षिणा से तुम्हें एक लाख सोने की मुहरें प्राप्त होंगी एवं और भी ब्राह्मणों में
ऊँचे बैठकर भोजन करोगे। आओ मेरे घर पर' ॥११२-११३॥
१ विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में इस वार्ता को प्रकारान्तर से लिया गया है, किन्तु
मुद्राराक्षस की कथा का आधार यही है। चाणक्य के विषय में विस्तृत और ऐतिहासिक
विवेचन परिशिष्ट में देखिए।
कथासरित्सागर
४०
कथासरित्सागर
इत्युक्त्वा शकटालस्तं चाणक्यमनयद् गृहम्।
श्राद्धाहेऽदर्शयत् च राज्ञे स ददृशे च तम्॥११४॥
ततः स गत्वा चाणक्यो धुरि ग्राह उपाविशत्।
सुबन्धुनामा विप्रश्च तामच्छद्धुरमात्मनः॥११५॥
तद्गत्वा शकटालेन विज्ञप्तो मन्दभूपतिः।
अवादीन्नापरो योग्यः सुबन्धुर्धुरि तिष्ठतु॥११६॥
आगत्यतां च राज्ञाज्ञां शकटालो भयानतः।
न मेऽपराध इत्युक्त्वा चाणक्याय न्यवेदयत्॥११७॥
सोऽथ कोपेन चाणक्यो ज्वलन्निव समन्ततः।
निजां मुक्त्वा शिखां तत्र प्रतिज्ञामकरोदिमाम्॥११८॥
अवश्यं हन्त नन्दोऽयं सप्तभिर्दिवसैर्मया।
विनाश्यो वन्धनीयैषा ततो निर्मथ्युना शिखा॥११९॥
इत्युक्तवन्तं कुपिते योगनन्दे पलायितम्।
अलक्षितं स्वगेहे तं शकटाखो न्यवेशयत्॥१२०॥
तत्रोपकरणं दत्ते गुप्तं तेनैव मन्त्रिणा।
स चाणक्यो द्विजः क्वापि गत्वा कृत्यामसाधयत्॥१२१॥
तयोद्गाढोगनन्योऽथ दाहज्वरमवाप्य सः।
सप्तमे दिवसे प्राप्ते पञ्चत्वं समुपागमत्॥१२२॥
हत्वा हिरण्यगुप्तं च शकटालेन तत्सुतम्।
पूर्वनन्दसुते लक्ष्मीश्चन्द्रगुप्ते निवेशिता॥१२३॥
मन्त्रित्वे तस्य चाभ्यर्च्य बृहस्पतिसमं धिया।
चाणक्यं स्थापयित्वा तु स मन्त्री कृतकृत्यताम्॥१२४॥
मन्वानो योगनन्दस्य कृतवैरप्रतिक्रियः।
पुत्रशोकेन निर्विण्णः प्रविवेश महद् वनम्॥१२५॥
इति तस्य मुखाच्छ्रुत्वा विप्रस्य सुतरामहम्।
काणभूते ! गतः सर्वं सर्वमालोक्य चञ्चलम्॥१२६॥
तदाञ्चाहमिमां द्रष्टुमागता विन्ध्यवासिनीम्।
तत्प्रसादेन दृष्ट्वा स्पो स्मृता जातिर्मया मम॥१२७॥
प्राप्तं दिव्यं च विमानं मयोपेता च महावचाः।
इदानीं शीर्णपापोऽहं यतिष्ये देहमुज्झितुम्॥१२८॥
एष च मम्प्रति तिष्ठतु यावदायाति तेऽन्तिकम्।
शिष्ययुक्तो गुणाढ्याख्यस्तत्समात्रात्रयोऽसि ॥१२९॥
प्रथम लम्बकः ७१
प्रथम लम्बकः ७१
ऐसा कहकर शकटाल उस चाणक्य ब्राह्मण को अपने घर ले गया। श्राद्ध के दिन उस
राजा के पास ले गया और राजा ने उसे स्वीकार किया ॥११४॥
अनन्तर श्राद्ध के अवसर पर आकर चाणक्य सबसे ऊपर बैठ गया किन्तु सुबन्धु नामक
ब्राह्मण उस स्थान को अपने लिए चाहता था॥११५॥
शकटाल ने राजा नन्द के पास जाकर ऊपर बैठन का झगड़ा सुनाया। नन्द ने कहा—
सुबन्धु ही सबसे ऊपर बैठेगा। दूसरा योग्य नहीं है। ॥११६॥
भय से नीचे मुँह किये हुए शकटाल ने श्राद्ध-स्थान में आकर, चाणक्य को वह राजाज्ञा
सुना दी और कहा कि इसमें मेरा अपराध नहीं है, यह राजाज्ञा है॥११७॥
राजाज्ञा को अपना अपमान समझते हुए क्रोध से जलकर चाणक्य ने अपनी शिखा को
खोलकर यह प्रतिज्ञा की॥११८॥
सात दिनों के भीतर राजा नन्द को अवश्य मार डालूँगा। तभी मैं क्रोध-रहित होकर शिखा
को बाँधूँगा॥११९॥
ऐसा कहते हुए चाणक्य पर योगनन्द के कुपित होने के कारण वह वहाँ से भागा और
शकटाल ने गुप्त रूप से उसे अपने घर में रख लिया॥१२० ॥
शकटाल मन्त्री के द्वारा सामग्री दिये जाने पर वह ब्राह्मण वहीं एकान्त में जाकर कृत्या
की साधना करने लगा॥१२१॥
उस कृत्या के प्रभाव से राजा नन्द दाह-ज्वर से सातवें दिन मर
गया॥१२२॥
योगनन्द के मरने पर शकटाल ने उसके पुत्र हिरण्यगुप्त को मारकर (असल) नन्द के
पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बना दिया॥१२३॥
चन्द्रगुप्त की मन्त्रिता के लिए बृहस्पति के समान बुद्धिमान् चाणक्य को प्रसन्नतापूर्वक
स्वीकार कराकर शकटाल पुत्रों के शोक से विरक्त होकर भीषण वन में चला
गया॥१२४ १२५॥
हे राजसूनो ! उस ब्राह्मण के मुख से नन्द-राज्य की समस्त कथा सुनकर मुझे अत्यन्त खेद
हुआ कि यह सारा प्रपञ्च अनित्य है॥१२६॥
इसी खेद के कारण मैं विन्ध्यवासिनी का दर्शन करने के लिए यहाँ आया। इनकी कृपा से
तुम्हें देखकर मुझे अपना पूर्वजन्म का स्मरण हुआ॥१२७॥
और जाति-स्मरण होने के कारण दिव्य विज्ञान भी प्राप्त हो गया। अब मैं पापमुक्त
होकर शरीर छोड़ने का यत्न करूँगा॥१२८॥
हे राजसूनो ! तुम तबतक यहीं रहो, जबतक तीन ब्राह्मणों को छोड़े हुए गुणाढ्य नामक
ब्राह्मण शिष्यों के साथ तुम्हारे पास आता है॥१२९ ॥
७२ कथासरित्सागर
७२ कथासरित्सागर
सोऽपि इहमिव क्रोधादृष्या शप्तो गणोत्तम ।
माल्यवान्नाम मत्पक्षपाती मर्त्यत्वमागतः ॥१३०॥
तस्मै महेश्वरोक्तैषा कथनीया महाकथा ।
यतस्त्वं शापनिर्मुक्तिस्तस्य चापि भविष्यति ॥१३१॥
एव वररुचिस्तेन काणभूतिर्निवर्च स ।
प्रतस्थे देहमोक्षाय पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥१३२॥
गच्छन्वन्द्य गङ्गायां सोऽथ शाकाशिनं मुनिम् ।
तत्समक्षं च तस्यो कुशनाभूरकरक्षतिः ॥१३३॥
ततोऽस्य रुधिरं निघ्नंस्तन शाकरसीकृतम् ।
अहङ्कारपरीक्षार्थं कौतुकात्स्वप्रभावतः ॥१३४॥
तद्दृष्ट्वा हन्त सिद्धोऽस्मीत्यगाद्दर्पमसौ मुनिः ।
ततो वररुचिः किञ्चिद् विहस्यैव जगाद तम् ॥१३५॥
जिज्ञासनाय रक्तं ते मया शाकरसीकृतम् ।
यावन्नाद्याप्यहङ्कारः परित्यक्तस्त्वया मुने ॥१३६॥
ज्ञानमार्गे अहङ्कारः परिपन्थी दुरतिक्रमः ।
ज्ञानं विना च नास्त्येव मोक्षो व्रतशतैरपि ॥१३७॥
स्वगस्तु न मुमुक्षूणां क्षयी चित्तं विलोभयेत् ।
तस्मादहङ्कृतित्यागाज्ज्ञाने यत्नं मुने ! कुरु ॥१३८॥
विनीयैवं मुनिं तं प्रयतं कृतस्तुतिः ।
तं बदर्याशमोद्देशं शान्तं वररुचिर्ययौ ॥१३९॥
अथ स निबिडभक्त्या तत्र देवीं शर्वाणीं
शरणमुपगतोऽसौ मय्यभावं मुमुक्षुः ।
प्रकटितनिजमूर्तिः सापि तस्मै शशंस
स्वयममरससृष्ट्यां धारणां देहमुक्त्यै ॥१४०॥
दग्ध्वा शरीरमथ धारण्या तया तद्-
दिव्यां गतिं वररुचिः स निजां प्रपेदे ।
विन्ध्याटवीभुवि ततः स च काणभूति-
रासीदभीप्सितगुणाढ्यसमागमोत्कः ॥१४१॥
इति महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके
पञ्चमस्तरङ्गः ।
प्रथम लम्बक ७१
प्रथम लम्बक ७१
वह गुणाढ्य भी मेरा पक्षपाती शिवजी का माल्यवान् नामक उत्तम गण है। मेरा पक्षपात
करने के कारण पार्वती ने उसे क्रोध से शाप दिया इसीलिए मानव-योनि में उत्पन्न हुआ है॥१३०॥
इस गुणाढ्य को शिवजी के द्वारा कही गई और मुझसे सुनाई गई यह कथा सुनाना।
तब तुम्हारी और उसकी शाप-मुक्ति होगी ॥१३१॥
इस प्रकार वररुचि काणभूति को कहकर शरीर-त्याग करने के लिए पवित्र बद्रिकाश्रम
को गया ॥१३२॥
शाकाहारी मुनि की कथा
बद्रिकाश्रम जाते हुए वररुचि ने गङ्गातट पर एक शाकाहारी ब्राह्मण को देखा। वररुचि के
सामने ही उस ऋषि का हाथ कुश से कट गया ॥१३३॥
उस ऋषि के अहंकार की परीक्षा के लिए तथा कौतुक से उस निकलते हुए रक्त को
वररुचि ने अपने प्रभाव से शाक का रस बना दिया ॥१३४॥
अपने इस प्रभाव को देखकर उस मुनि को घमंड उत्पन्न हुआ यह देखकर वररुचि ने
मुसकराते हुए कहा ॥१३५॥
मैंने तुम्हारी परीक्षा के लिए रक्त को शाक का रस बना दिया। किन्तु मालूम हुआ कि
अभी तक तुमने अहंकार को त्यागा नहीं है ॥१३६॥
अहंकार, ज्ञानमार्ग में कठिनाई से हटनेवाली बाधा है और ज्ञान के बिना सैकड़ों यज्ञों
से भी मुक्ति नहीं होती ॥१३७॥
पुण्यों के क्षीण होने पर नष्ट हो जानेवाला स्वर्ग मुक्ति चाहनेवाला को आकृष्ट नहीं
करता। इसलिए अहंकार का त्याग कर मुक्ति के लिए यत्न करो ॥१३८॥
इस प्रकार मुनि को शिक्षा देकर और नम्र होते हुए उससे स्तुति किया गया वररुचि
प्रणाम-पावन बद्रिकाश्रम के स्थान को गया ॥१३९॥
मनुष्य-देह को छोड़ने की इच्छा से वररुचि बद्रिकाश्रम में गाढ़ी भक्ति के साथ देवी की
शरण में प्राप्त हुआ। देवी ने स्वयं प्रकट होकर, शरीर की मुक्ति के लिए उसे स्वयं योग द्वारा
शरीर से निकली हुई अग्नि से देहपात करने के लिए कहा अर्थात् अपने शरीर से उत्पन्न योगाग्नि
से अपने शरीर की मुक्ति के लिए उसे भस्म करो ॥१४०॥
इस प्रकार वररुचि उसी देवी के द्वारा निर्दिष्ट परम्परा से योगाग्नल से मानव-शरीर को
दग्ध करके अपनी यक्ष-गति को प्राप्त हुआ और उधर काणभूति दृष्टिगत गुणाढ्य के समागम के
प्रति उत्कण्ठित था ॥१४१॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का
पंचम तरंग समाप्त
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर
षष्ठस्तरङ्गः
ततः स मर्त्यवपुषा माल्यवान् विचरन् वनं।
नाम्ना गुणाढ्यः संवित्वा सातवाहनभूपतिम् ॥१॥
संस्कृताद्यास्त्वग्रे च भाषास्तिस्रः प्रतिज्ञया।
त्यक्त्वा खिन्नमना द्रष्टुमाययौ विन्ध्यवासिनीम् ॥२॥
तदावसनं गत्वा च काणभूतिं ददर्श सः।
ततो जातिं निजां स्मृत्वा प्रबुद्धः सहसाऽभवत् ॥३॥
आदित्य भाषां पैशाचीं भाषात्रयविलक्षणाम्
श्रावयित्वा निजं नाम काणभूतिं च सोऽब्रवीत् ॥४॥
पुष्पदन्ताच्छ्रुतां दिव्यां शीघ्रं कथय मे कथाम्।
येन शापं तरिष्यावस्त्वं चाहं च समं सखे ॥५॥
गुणाढ्यकथा
तच्छ्रुत्वा प्रणतो हृष्टः काणभूतिरुवाच तम्।
कथयामि कथां किं तु कौतुकं मे महत्प्रभो ! ॥६॥
आत्मचरितं तावच्छंस मे कुर्व्वन्नुग्रहम्।
इति तेनार्थितो वक्तुं गुणाढ्योऽथ प्रचक्रमे ॥७॥
प्रतिष्ठानेऽस्ति नगरं सुप्रतिष्ठितसञ्ज्ञकम् ।
तत्राभूत्सोमशर्माख्यः कोऽपि ब्राह्मणसत्तमः ॥८॥
वत्सश्च गुल्मकश्चैव तस्य द्वौ तनयौ सता।
जायते स्म तृतीया च श्रुतार्था नाम कन्यका ॥९॥
कालेन ब्राह्मणः सोऽथ सभार्यः पञ्चतां गतः।
तत्पुत्रौ तौ स्वसारं तां पालयन्तावतिष्ठताम् ॥१०॥
सा चाकस्मात्सगर्भामूत्तद्दृष्ट्वा वत्सगुल्मयोः ।
तत्रान्यपुंष्यामापाच्छङ्कान्योग्यमजायत ॥११॥
ततः श्रुतार्था चित्तज्ञा भ्रातरौ तावभाषत।
पापशङ्का न कर्त्तव्या शृणुतं कथयामि वाम् ॥१२॥
कुमारः कीर्त्तिसेनाख्यो नागराजस्य वासुकेः ।
भ्रातुः पुत्रोऽस्ति तेनाहं दृष्टा स्नातुं गता सती ॥१३॥
ततः स मदनाक्रान्तो निजधान्वयनामनी।
गान्धर्वेण विवाहेन मां भार्यामकरोत्तदा ॥१४॥
प्रथम लम्बक ७५
प्रथम लम्बक ७५
षष्ठ तरंग
वररुचि के चले जाने पर उसका मित्र खिन्नहृदय माल्यवान् नामक गण मर्त्यशरीर
में गुणाढ्य नाम से विख्यात होकर वन में घूमता हुआ संस्कृत आदि तीन भाषाओं को
प्रतिज्ञापूर्वक छोड़कर और सातवाहन राजा की सेवा करके विन्ध्यवासिनी भगवती के दर्शन के
लिए आया॥१-२॥
विन्ध्यकामिनी की आज्ञा से उसने विन्ध्यारण्य में काणभूति को देखा। काणभूति को
देखते ही गुणाढ्य को अपनी पूर्व जाति का स्मरण हो गया और वह मानो अकस्मात् जाग उठा॥३॥
संस्कृत प्राकृत एवं देशीय (अपभ्रंश)—इन तीनों भाषाओं को छोड़कर पैशाची भाषा
में अपना नाम सुनाकर वह काणभूति से बोला॥४॥
मित्र काणभूते पुष्पदन्त से सुनी हुई उस दिव्य कथा को शीघ्र सुनाओ जिसके सुनने पर
मैं और तुम दोनों एक साथ ही शाप से मुक्त हो जायेंगे॥५॥
गुणाढ्य की कथा
यह सुनकर काणभूति ने गुणाढ्य से कहा—हे स्वामिन्! उस दिव्य कथा को तो मैं
सुनाता हूँ। किन्तु मुझे एक महान् कौतूहल है॥६॥
वह यह कि पहले आप अपने जीवन का वृत्तान्त सुनाओ। इस प्रकार काणभूति के प्रार्थना
करने पर गुणाढ्य ने अपनी कथा प्रारम्भ की॥७॥
प्रतिष्ठान-प्रदेश में सुप्रतिष्ठित नामक नगर है। वहाँ पर सोमशर्मा नामक एक श्रेष्ठ
ब्राह्मण रहता था॥८॥
उस ब्राह्मण के वत्स और गुल्म नामक दो बालक और तीसरी श्रुतार्था नाम की एक
कन्या थी॥९॥
कालक्रम से सोमशर्मा और उसकी भार्या दोनों मर गये। उनके मरने पर वत्स और
गुल्म दोनों भाई बहन श्रुतार्था का पालन-पोषण करने लगे॥१०॥
उन्होंने किसी समय बहन को गर्भवती देखा। वहाँ अन्य किसी तीसरे पुरुष के अभाव में
उन दोनों को परस्पर शंका हुई॥११॥
भाइयों को शंकित देखकर चित्त की बात को समझनेवाली श्रुतार्था ने भाइयों से कहा—
'तुम्हें किसी प्रकार की शंका न करनी चाहिए। मैं सत्य बात तुम्हें बताती हूँ'॥१२॥
नागराज वासुकि के भाई का पुत्र कुमार कीर्तिसेन है। मुझे स्नान के लिए आते हुए
उसने देखा॥१३॥
मुझे देखकर काम-पीड़ित हुए कीर्तिसेन ने अपना वंश और नाम बताकर गान्धर्वविधि से
मुझे अपनी पत्नी बना लिया॥१४॥
इसलिए मेरा यह गर्भ ब्राह्मण-जाति में है। इस प्रकार बहन की बात सुनकर वत्स और
गुल्म बोले कि इसमें क्या प्रमाण है? ॥१५॥
७६ कथासरित्सागर
७६ कथासरित्सागर
विप्रभ्रातरय तस्मान्मम गर्भे इति स्वसु ।
श्रुत्वा क प्रत्ययोऽत्रेति वत्सगुल्माववोचताम् ॥१५॥
ततो रहसि सस्मार सा च नागकुमारकम्।
स्मृतमात्रागत सोऽथ वत्सगुल्मावभाषत ॥१६॥
भार्या कृता मयैवेय शापभ्रष्टा वराप्सरा ।
युष्मत्स्वसा युवा चैव शापेनैव च्युतौ भुवि ॥१७॥
पुत्रो जनिष्यते चात्र युष्मत्स्वसुरसंशयम्।
ततोऽस्या शापनिर्मुक्तिर्युवयोरपि भविष्यति ॥१८॥
इत्युक्त्वाऽन्तर्हितः सोऽभूत्तत स्तोकैश्च वासरै ।
श्रुताथाया सुतो जातःस्त हि जानीहि मा सख ! ॥१९॥
गणावतारो जातोऽय गुणाढ्यो नाम ब्राह्मणः।
इति तत्कालमुदमूदन्तरिक्षात्सरस्वती ॥२०॥
क्षीणशापास्ततस्ते च जननी मातुलौ मम।
कालेन पञ्चतां प्राप्ता गतश्चाहमधीरताम् ॥२१॥
अथ शोक समुत्सृज्य बालोऽपि गतवानहम्।
स्वावष्टम्भेन विद्यानां प्राप्तये दक्षिणापथम् ॥२२॥
कालेन तत्र सम्प्राप्य सर्वा विद्याः प्रसिद्धिमन्।
स्वदेशमागतोऽभूव वर्धयिष्यन्निजान् गुणान् ॥२३॥
प्रविशंश्च चिरात्तत्र नगरे सुप्रतिष्ठिते
अपश्य शिष्यसहित शोभां कामप्यह तदा ॥२४॥
क्वचित्सामानि छन्दोगा गायन्ति च यथाविधि।
क्वचिद् विवादो विप्राणामभूद् वेदविनिर्णये ॥२५॥
योऽत्र द्यूतकला वेत्ति तस्य हस्तगतो निधिः।
इत्यादिसर्ववेर्धूर्तमस्तुवन्कितवा क्वचित् ॥२६॥
अन्यान्यं निजवाणिज्यदशाक्रोधप्रवादिनाम्।
क्वचिच्च वणिजां मध्य वणिगेकोऽब्रवीदिदम् ॥२७॥
मूषकदर्शनं प्राप्तवतो वणिजः कथा
अर्थं सयत्नवानर्थात्प्राप्नोति कियदद्भुतम्।
मया पुनर्विनेवार्थं लक्ष्मीरासादिता पुरा ॥२८॥
गर्भस्थस्य च मे पूर्वं पिता पञ्चत्वमागतः।
मन्मातुश्च तदा पापैर्ज्ञातिजै सकल हृतम् ॥२९॥
प्रथम लम्बक ७७
प्रथम लम्बक ७७
यह सुनकर धूतार्था ने एकान्त में उस नागकुमार का स्मरण किया। नागकुमार स्मरण
करते ही आया और वत्स एवं गुल्म से बोला ॥१६॥
इस शापभ्रष्टा अप्सरा को मैंने पत्नी बनाया है जो तुम दोनों की बहन है। तुम दोनों भी
शाप के कारण पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हो ॥१७॥
तुम्हारी बहन के इस गर्भ से अवश्य पुत्र उत्पन्न होगा। इसके उत्पन्न होने पर इसकी
और तुम दोनों की शाप-मुक्ति होगी ॥१८॥
ऐसा कहकर वह नागकुमार अन्तर्धान हो गया और कुछ ही दिनों बाद धूतार्था का पुत्र
उत्पन्न हुआ। हे सखे वह धूतार्था का पुत्र मुझे ही समझो ॥१९॥
मेरे उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि यह गुणाढ्य नामक ब्राह्मण शिवजी के गण
का अवतार है ॥२०॥
मेरे उत्पन्न होने पर वे—मेरी माता और मामा—भी शापहीन होने के कारण मर गये और
एकाकी मैं अधीर हो गया ॥२१॥
कुछ दिनों के अनन्तर धाय का परित्याग करके मैं बालक होने पर भी अपने ही सहारे
विद्याओं की प्राप्ति के लिए दक्षिणापथ चला गया ॥२२॥
मैं कुछ समय में दक्षिण देश में समस्त विद्याओं को प्राप्त करके प्रसिद्ध विद्वान् हुआ और
अपने गुणों को दिखाने की इच्छा से स्वदेश आया ॥२३॥
बहुत दिनों के अनन्तर शिष्यों के साथ उस सुप्रतिष्ठित नगर में प्रवेश करते हुए मैंने
नगर की अपूर्व शोभा देखी ॥२४॥
मैंने उस नगर में देखा कि कहीं सामवेदी विद्वान् विधिपूर्वक साम-गान कर रहे हैं और
कहीं वेदों के अर्थ-निर्णय पर विद्वानों का शास्त्रार्थ हो रहा है ॥२५॥
कहीं जुआरी अपनी डींग हांक रहे थे कि जो जुए की कला जानता है, उसके हाथ में
खजाना है ॥२६॥
अपनी-अपनी व्यापार-कला का चातुर्य बतलाते हुए कुछ बनियों की मंडली में एक
बनिया इस प्रकार बोला ॥२७॥
चूहे से धनी बने सेठ की कथा
'पैसों के विषय में संयम रखनेवाला ही पैसा कमाता है' यह कितने आश्चर्य की बात है।
मैं जब गर्भ में था तभी मेरे पिता मर गये। मेरी माता के पास जो कुछ भी धन था वह दुष्ट
संबंधियों ने उसे फुसलाकर ले लिया ॥२८ १ ॥
७८ कथासरित्सागर
७८ कथासरित्सागर
ततः सा तद्भयाद् गत्वा रक्षन्ती गर्भमात्मनः।
तस्थौ कुमारदत्तस्य पितुर्मित्रस्य वेश्मनि ॥३०॥
तत्र तस्याश्च जातोऽहं साध्व्या वृत्तिमिव धनम्।
ततश्चावर्धयत्सा मां कृच्छ्रकर्माणि कुर्वती ॥३१॥
उपाध्यायमथाम्यर्थ्य तयाकिञ्चन्यदीनया।
क्रमेण शिक्षितश्चाहं लिपिं गणितमेव च ॥३२॥
वणिक्पुत्रोऽसि तत्पुत्र ! वाणिज्यं कुरु साम्प्रतम्।
विशाखिलाख्यो देशेऽस्मिन् वणिक्चास्ति महाधनः ॥३३॥
दरिद्राणां कुलीनानां भाण्डमूल्यं ददाति सः।
गच्छ याचस्व तं मूल्यमिति माताब्रवीच्च माम् ॥३४॥
ततोऽहमगमं तस्य सकाशं सोऽपि तत्क्षणम्।
इत्यवोचत् रुषा कञ्चिद् वणिक्पुत्रं विशाखिलः ॥३५॥
मूषको दृश्यते योऽयं गतप्राणोऽत्र भूतले।
एतेनापि हि पण्येन कुशलो धनमर्जयेत् ॥३६॥
दत्तास्तव पुनः पाप दीनारा बहवो मया।
दूरे तिष्ठतु तद्वृद्धिस्त्वया तेऽपि न रक्षिताः ॥३७॥
तच्छ्रुत्वा सहसैवाहं तमवोचं विशाखिलम्।
गृहीतोऽयं मया त्वत्तो भाण्डमूल्याय मूषकः ॥३८॥
इत्युक्त्वा मूषकं हस्ते गृहीत्वा सम्पुटे च तम्।
लिखित्वास्य गतोऽभूवमहं सोऽप्यहसद् वणिक् ॥३९॥
चणकाञ्जलिमुग्मं मूल्येन स च मूषकः।
मार्जारस्य कृते दत्तः कस्यचिद् वणिजो मया ॥४०॥
कृत्वा तोयवणशक्तून्तान्गृहीत्वा जलकुम्भिकाम्।
मतिष्ठं परतरं गत्वा छायायां नगराद् बहिः ॥४१॥
तत्र श्रान्तागतायाम्भः शीतलं चणकांश्च तान्।
काष्ठभारिकसङ्घाय सप्रश्रयमदामहम् ॥४२॥
एकैकः काष्ठिकः प्रीत्या काष्ठे द्वे द्वे ददौ मम।
विक्रीतवानहं तानि नीत्वा काष्ठानि चापणं ॥४३॥
ततः स्तोकेन मूल्येन क्रीत्वा तांश्चणकांस्ततः।
तथैव काष्ठिकेभ्योऽहमन्येद्युः काष्ठमाहरम् ॥४४॥
प्रथम लम्बक ७९
प्रथम लम्बक ७९
तब मेरी माता उन सम्बन्धियों की लूट-खसोट के भय से गर्भ की रक्षा करती हुई अपने
पिता के मित्र कुमारदत्त के घर जाकर रहने लगी ॥३०॥
कुमारदत्त के घर में उस पतिव्रता के जीवन का आधार मैं उत्पन्न हुआ। मेरी माता
कष्टसाध्य कार्य करती हुई, मुझे जिलाने लगी ॥३१॥
मेरे कुछ बड़े होने पर उस अकिंचन और दीन माता ने गुरु से प्रार्थना करके मुझे अक्षर
लिखना और कुछ गणित (हिसाब-किताब) सिखा दिया ॥३२॥
कुछ पढ़ लेने पर माता ने कहा—'बेटा! बनिये के बालक हो व्यापार करो। इस
नगर में विशाखिल नाम का एक धनी व्यापारी बनिया है। कुलीन घर के दरिद्र लोगों को वह
व्यापार का सामान देता है। अतः तुम उसी के पास जाओ और माँगो' ॥३३-३४॥
माता की आज्ञा से मैं उस बनिये के पास गया। उस समय विशाखिल बनिया क्रोध में
किसी बनिये के लड़के से कह रहा था कि यहाँ भूमि पर एक मरा हुआ चूहा पड़ा है। यदि चतुर
बनिया हो तो इस सौदे से भी धन कमा सकता है ॥३५-३६॥
हे दुष्ट, मैंने तुझे बहुत-सी स्वर्ण-मुद्राएँ दीं उनकी वृद्धि तो दूर रही तूने उनकी रक्षा भी
नहीं की ॥३७॥
बनिये की बातें सुनकर मैंने विशाखिल से कहा—मैंने बेचने के सामान में तुझसे इस
चूहे को लिया ॥३८॥
ऐसा कहकर मैंने मरे हुए चूहे को हाथ से उठाकर एक डिब्बे में रख लिया और बनिये की
बही में लिखकर चला। मेरे इस कार्य पर वह बनिया भी हँसने लगा ॥३९॥
मैंने दो अँजुली चने के बदले उस चूहे को किसी बनिये की बिल्ली को ग्रास के लिए
दे दिया ॥४०॥
उस चने को भाड़ में भुनाकर और एक घड़ा पानी लेकर मैं शहर के बाहर एक चौराहे
पर पेड़ की छाया में जा बैठा ॥४१॥
लकड़ी का बोझ लेकर जानेवाले थके मजदूरों को मैं नम्रता के साथ चना खिलाने और
ठंडा पानी पिलाने लगा ॥४२॥
प्रत्येक लकड़हारा अपने-अपने बोझ से दो-दो लकड़ियाँ मुझे प्रेमपूर्वक देने लगा। इस
प्रकार कुछ समय में मेरे पास लकड़ी का एक खासा एकत्र हो गया और मैंने उसे बाजार में जाकर
बेच दिया ॥४३॥
लकड़ी बेचकर प्राप्त हुए मूल्य में से कुछ मूल्य से चने खरीदकर मैंने दूसरे दिन फिर
उसी प्रकार चौराहे पर पानी पिलाना प्रारम्भ किया। इस प्रकार मेरे पास पर्याप्त मात्रा में लकड़ियाँ
इकट्ठी हो गईं ॥४४॥
८० कथामरित्सागरै
८० कथामरित्सागरै
एवं प्रतिदिनं कृत्वा प्राप्य मूल्यं क्रमान्मया।
काष्ठिकेभ्योऽखिलं दारु क्रीतं तेभ्यो विनिश्चयम् ॥४५॥
अकस्मादथ सञ्जाते काष्ठच्छेदातिवृष्टिभिः ।
मया तद्दारु विक्रीतं पणानां बहुभिः शतैः ॥४६॥
तेनैव विपणिं कृत्वा धनेन निजकौशलात्।
कुर्वन्वणिज्यां क्रमशः सम्पन्नोऽस्मि महाधनः ॥४७॥
सौवर्णो मूषकः कृत्वा मया तस्मै समर्पितः ।
विशाखिलाय सोऽपि स्वां कन्यां मह्यमदात्ततः ॥४८॥
अतएव च लोकेऽस्मिन् प्रसिद्धो मूषकराख्यया।
एव लक्ष्मीरियं प्राप्ता निर्धनेन सता मया ॥४९॥
सञ्श्रुत्वा तत्र तेऽभूवन्वणिजोऽन्ये सविस्मयाः ।
धीरैर्न चित्रीयते कस्मादमित्तो चित्रकर्मणा ॥५०॥
मूर्खद्विजवेश्याकथा
क्वचित्प्रतिग्रहप्राप्तहेममाषाष्टको द्विजः।
छन्दोगः कश्चिदित्युक्तो विटप्रायेण केनचित् ॥५१॥
ब्राह्मण्याद् भोजनं तावदस्ति ते सत्त्रयामुना।
लोकयात्रा सुवर्णेन वैदग्ध्यायैह शिक्ष्यताम् ॥५२॥
को मां शिक्षयतीत्युक्तो तं मुग्धं सोऽब्रवीत् ।
यैषा चतुरिका नाम वेश्या तस्या गृहं व्रज ॥५३॥
तत्र किं करवाणीति द्विजेनोक्तो विटोऽब्रवीत् ।
स्वर्णं दत्वा प्रयुञ्जीथा रञ्जयन्ताम् किञ्चन ॥५४॥
धूर्तेनेवम्प्रच्छन्दोगो द्रुतं चतुरिकागृहम् ।
उपाविशत्प्रविश्याथ कृतप्रत्युद्गतिस्तया ॥५५॥
मामद्य लोकयात्रां त्वं शिक्षयैतेन साम्प्रतम् ।
इति जल्पन्स तत्तस्यै स्वर्णमर्पितवान् द्विजः ॥५६॥
प्रहसत्यथ तत्रस्थे जने किञ्चिद्वद् विचिन्त्य सः ।
गोवज्रसदृशौ कृत्वा करावायतसारणौ ॥५७॥
तारस्वरं तया साम गायति स्म जडाशयः ।
यथा तत्र मिषन्ति स्म विटा हास्यविदूषकः ॥५८॥
ते चावोचञ्शृगालोऽयं प्रविष्टोऽत्र कुतोऽन्यथा।
तच्छीघ्रमर्धचन्द्रोऽस्य मस्तकेऽस्मिन्दीयतामिति ॥५९॥
प्रथम लम्बक ८१
प्रथम लम्बक ८१
इस प्रकार प्रतिदिन करते-करते मैंने धन-संग्रह करके तीन दिनों तक लकड़हारों से सारी
लकड़ियाँ खरीद लीं ॥४५॥
एक बार भयंकर वृष्टि के कारण लकड़ियों का जंगल से आना बन्द हो गया।
तब मैंने अपनी इकट्ठी की हुई लकड़ियों को महंगे दाम पर बेचकर पर्याप्त धन कमा
लिया ॥४६॥
उस धन से एक दूकान करके व्यापार की चतुराई से मैं बहुत धनवान् हो गया। मैंने
सोने का चूहा बनाकर अपने महाजन विशाखिल को मृत चूहे के मूल्य-स्वरूप भेंट में
दिया ॥४७॥
वह भी मेरी व्यापार-बुद्धि से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने अपनी कन्या मुझे
दे दी ॥४८॥
एक मरे हुए चूहे के आधार पर व्यापार करने के कारण मैं नगर में 'मूषक' के नाम से
विख्यात हो गया। इस प्रकार निर्धन होकर मैंने लक्ष्मी प्राप्त की ॥४९॥
यह सुनकर वहाँ एकत्र सभी बनिये आश्चर्य-चकित हो गये। बिना भीत की चित्र-रचना
करने पर किसकी बुद्धि आश्चर्य-चकित नहीं होगी ॥५०॥
मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण की कथा
वहीं पर कहीं मशान में आग मांगता-मांगता जाता हुआ पञ्चाली ब्राह्मण खड़ा था। उस विशी
वाचालों के दलाल ने कहा—'ब्राह्मण ज्ञान के राज्य तुम्हें भोजन भी मिलता था ? सही या तुम
इस आग मांग-मांग कर क्यों जाकर औरत-मर्दों के ... चतुरता सीखो ॥५१-५२॥
मुझे चतुरता कौन सिखायेगा? —ब्राह्मण के ऐसा पूछने पर उसने कहा—'यहीं जो
बगुसिका नाम की वेश्या है उसके घर जाकर सीखो ॥५३॥
वेश्या के घर जाकर क्या करूं? —ऐसा पूछने पर ... ने कहा—'मंशाला देकर
चतुराई सिखाने को कहना तथा मांस और मद्य (मदिरा) की बात करना' ॥५४॥
यह सुनकर वह भोला ब्राह्मण तुरंत बगुसिका के घर गया और उसके द्वारा प्रमदाजन
व्यहार करने पर भीतर जाकर बैठ गया ॥५५॥
मुझे आज इस मूर्ख का ... महा मूर्खतापूर्ण स्वरूप दिखायेंगे— ...
का हाथ मांगता-मांगता उस ब्राह्मण का अभिनन्दन किया ॥५६॥
उसके ऐसा कहने पर वहाँ बैठे हुए द्यूतप्रिय हँस पड़े। तब हँसता देखकर उस कर्म के इस
प्रकार रोता गया कि जो भी बात वे लोग कहा करते उसका वह उल्टा उत्तर देता
बड़ी सरलता से व्यंग्य करते हुए कि ब्राह्मण के प्रति ऐसा व्यंग्य-उपहास होता रहा
वे लोग बहुत हँसते रहे।
वेश्या ने उस दूती द्वारा ब्राह्मण के सम्मुख उपहासपूर्वक एक सोने का सिक्का (मद्यपान हेतु) देकर
बाहर निकाल दिया ॥५७॥
११
यमचन्द्र धरं मत्वा शिरश्छेदभयाद्द्रुतम् ।
शिक्षिता लोकयात्रेति गर्जन्स निरगात्ततः ॥६०॥
तत्सकाशं ततोऽगच्छदनासो प्रेषितोऽभवत् ।
वृत्तान्तं यावदस्तस्मै सोऽपि क्षतमयापत ॥६१॥
साम सान्त्व मयोक्तं तं वेदस्यावसरोऽत्र कः ।
किं वा धाराधिरूढे हि जाड्यं वदजडे जने ॥६२॥
एव विहस्य गत्वा च तनोक्ता सा विलासिनी ।
द्विपवस्य पशोरस्य तत्सुवर्णतृणं त्यज ॥ ६३ ॥
हसन्त्या च तया त्यक्तं सुवर्णं प्राप्य स द्विजः ।
पुनर्जातमिवात्मानं मन्वानो गृहमागत ॥६४॥
एवंप्रायाण्यहं पश्यन् कौतुकानि पदे पदे ।
प्राप्तवान् राजभवनं महेन्द्रसदनोपमम् ॥६५॥
धतश्चान्तः प्रविष्टोऽहं शिष्यैरथ निवेदितः ।
भास्वान्स्थितमद्राक्षं राजानं सातवाहनम् ॥६६॥
शर्ववर्मप्रभृतिभिर्मन्त्रिभिः परिवारितम् ।
रत्नसिंहासनासीनममरैरिव वासवम् ॥६७॥
विहितस्वस्तिकारं मामुपविष्टमथासने ।
राजा कृतादरं चैव शर्ववर्मादयोऽस्तुवन् ॥६८॥
अयं ह्य भुवि ख्यातः सर्वविद्याविशारदः ।
गुणाढ्य इति नामास्य यथार्थमतएव हि ॥६९॥
इत्यादि तत्स्तुतिं श्रुत्वा मन्त्रिभिः सातवाहनः ।
प्रीतः क्षपवि सत्कृत्य मन्त्रित्वे मां न्ययोजयत् ॥७०॥
अथाहुं राजकार्याणि चिन्तयन्नवस सुखम् ।
शिष्यानध्यापयंस्तत्र कृतदारपरिग्रहः ॥७१॥
कदाचित्कौतुकाद् भ्राम्यन्स्वरं गोदावरीतटे ।
देवीकृतिरितिख्यातामुद्यानं दृष्टवानहम् ॥७२॥
तच्चातिरम्यमालोक्य क्षितिस्यमिव मन्दनम् ।
उद्यानपालः पृष्टोऽभून्मया तत्र तदागमम् ॥७३॥
१ पृष्ठे बाङ्घट = सम्पन्नः समृद्ध इत्यर्थः ।
प्रथम लम्बक ४१
प्रथम लम्बक ४१
ब्राह्मण अर्धचन्द्र को बाण समझकर सिर कटने के भय से मैंने डाकयात्रा (चतुष्पद) गुप्त
सीख ली'—ऐसा कहता हुआ भय से शीघ्र बाहर भाग गया॥६१ ॥
वैदिक ब्राह्मण वेश्या के घर से भागकर फिर उसी के पास गया जिसने उसे भेजा
था और उससे सारा वृत्तान्त भी बताया। उसने कहा कि मैंने तुमसे कहा था कि वहाँ साम
(शान्ति) का प्रयोग करना। सामवेद पढ़ने की कौन-सी तुक थी। सचमुच वेदपाठी मूर्ख
ब्राह्मणों में मूर्खता कूट-कूट कर भरी गई है॥६१ ६२॥
इस प्रकार हँसकर और उस वेश्या के पास जाकर उस धूर्त ने कहा कि 'इस दो पैर
के पशु को वह सुवर्ण-रूपी घास दे दो अर्थात् इसका सोना लौटा दो'॥६३॥
वेश्या ने हँसते हुए उस ब्राह्मण का आठ माशा सोना लौटा दिया और वह भी मानों अपना
पुनर्जन्म समझता हुआ घर वापस आया॥६४॥
गुणाढ्य ने काणभूति से कहा कि मैं उस सुप्रतिष्ठित नगर में पग-पग पर इस प्रकार के
तमाशे देखता हुआ सहस्र भवन के समान राजभवन में पहुँचा॥६५॥
वहाँ पर मैंने शर्ववर्मा आदि मन्त्रियों से घिरे हुए तथा दरबार में बैठे हुए राजा सातवाहन
को देवताओं से घिरे हुए इन्द्र के समान देखा॥६६॥
आशीर्वाद देकर आसन पर बैठे हुए और राजा के द्वारा सत्कार किये गये शर्ववर्मा
आदि मन्त्री मेरी प्रशंसा करने लगे॥६७॥
हे महाराज यह सारे भुवन में विख्यात और सभी विद्याओं में पारंगत गुणाढ्य
नाम का विद्वान् है। सभी गुणों से पूर्ण होने के कारण गुण-आढ्य इसका नाम यथार्थ
है॥६९॥
मन्त्रियों द्वारा मेरी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न राजा सातवाहन ने मुझे भी एक मन्त्री का
पद प्रदान किया॥७०॥
मन्त्री नियुक्त होने पर सर्व विद्या रूपक और विद्या का पड़ौस हुए आनन्द के साथ
रहने लगा॥७१॥
देवी उद्यान की कथा
किसी समय ग्रीष्मऋतु समाप्त होने के समय बहते हुए दिनों में पर मानरूपी बेला
पर देवी के बनाए हुए उद्यान को देखा॥७२॥
पृथ्वी पर बने हुए मलय देश के समान उस अनन्त रमणीय उद्यान को देखकर मैंने
'पाताल (पानी) के रसादि उत्पत्ति का कारण पूछा॥७३॥'
८४ कथासरित्सागर
८४ कथासरित्सागर
स च मामब्रवीत् स्वामिन्वृद्धेभ्यः श्रूयते यथा।
पूर्वं मौनी निराहारो द्विजः कश्चित्समाययौ ॥७४॥
स दिव्यमिदमुद्यानं सदेवभवनं व्यधात्।
ततोऽत्र ब्राह्मणाः सर्वे मिलन्ति स्म सकौतुकाः ॥७५॥
निवासास स पृष्टः स्वं वृत्तान्तमवदद्विजः।
अस्तीह मरुकच्छाख्यो¹ विषयो नर्मदातटे ॥७६॥
तस्मिन्नहं समुत्पन्नो विप्रस्तस्य च मे पुरा।
न भिक्षामप्यदात् कश्चिद्दरिद्रस्यालसस्य च ॥७७॥
अथ खेदाद् गृहं त्यक्त्वा विरक्तो जीवितं प्रति।
भ्रान्त्वा तीर्थान्यहं द्रष्टुमगच्छं विन्ध्यवासिनीम् ॥७८॥
दृष्ट्वा ततश्च तां देवीमिति सञ्चिन्तितं मया।
लोकः पशूपहारेण प्रीणाति वरदामिमाम् ॥७९॥
अहं त्वात्मानमेवेह हन्मि मूर्खमिमं पशुम्।
निश्चित्येति शिरश्छेत्तुं मया शस्त्रमगृह्यत ॥८०॥
तत्क्षणं सा प्रसन्ना मां देवी स्वयमभाषत।
पुत्र सिद्धोऽसि मात्मानं वधीस्तिष्ठ ममान्तिके ॥८१॥
इति देवीवरं लब्ध्वा सम्प्राप्ता दिव्यता मया।
सद्यःप्रभृति नष्टा मे बुभुक्षा च तृषा सह ॥८२॥
कदाचिदथ देवी मां ततश्च स्वयमादिशत्।
गत्वा पुत्र प्रतिष्ठाने रचयोद्यानमुत्तमम् ॥८३॥
इत्युक्त्वा सद्य मे बीजं दिव्यं प्रादात्ततो मया।
इहागत्य कृतं कान्तमुद्यानं तत्प्रभावतः ॥८४॥
पाल्यमेतच्च युष्माभिरित्युक्त्वा स तिरोदधे।
इति निर्मितमुद्यानमिदं देव्या पुरा प्रभो ॥८५॥
उद्यानपालकादित्थमवदेशं देव्यनुग्रहम्।
आकर्ण्य विस्मयाविष्टो गृहाय गतवानहम् ॥८६॥
एवमुक्ते गुणाढ्येन काणभूतिरभाषत।
सातवाहन इत्यस्य कस्मान्नामाभवत् प्रभो ॥८७॥
१ मरुकच्छः—साम्प्रतं गुर्जरदेशे 'भड़ोच' इति प्रसिद्धः ।
प्रथम लम्बक ८५
प्रथम लम्बक ८५
माली ने मुझसे कहा—यान्त्रिक ! वृद्धों से ऐसा सुना जाता है कि प्राचीन समय में
मौनी और निराहारी एक ब्राह्मण यहाँ आया और उसने देव-मन्दिर के साथ इस बाग को
बनाया। इसलिए इसमें ब्राह्मणगण बड़े उत्साह के साथ यहाँ एकत्र होते हैं परस्पर
मिलते हैं॥७५॥
अति आग्रह के साथ उनसे पूछ आने पर उस ब्राह्मण ने कहा कि इस भारतभूमि में
नर्मदा के तट पर भृगुकच्छ नाम का प्रसिद्ध देश है॥७६॥
मैं उसी भृगुकच्छ देश में उत्पन्न एक ब्राह्मण हूँ। मुझ आलसी और दरिद्र को कोई
भिक्षा भी नहीं देता था॥७७॥
इस कारण अत्यन्त दुःख से मैं जीवन के प्रति विरक्त होकर अनेक तीर्थों का भ्रमण करता
हुआ विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए गया॥७८॥
देवी का दर्शन करके मैंने सोचा कि यहाँ लोग वरदानी देवी को पशुबलि देकर प्रसन्न
करते हैं तो मैं मूर्ख और पशु-स्वरूप अपने को ही मारकर बलि क्यों न दे दूँ—ऐसा सोचकर मैंने
अपना गला काटने के लिए शस्त्र उठाया ॥७८॥
उसी क्षण प्रसन्न होकर देवी ने मुझे स्वप्न दिया—'पुत्र तू सिद्ध हो गया है। मरने का मत
धार! मेरे पास रह' ॥८१॥
इस प्रकार देवी का वर प्राप्त करके मैंने दिव्यता प्राप्त की। उसी से प्यास के साथ मेरी
भूख भी नष्ट हो गई॥८२॥
किसी समय वहीं निवास करती हुई देवी ने मुझसे स्वयं कहा—'हे पुत्र, तुम प्रतिष्ठान
नगर में जाकर एक अच्छा उद्यान बनाओ ॥८३॥
ऐसा कहकर देवी ने यह दिव्य बीज दिया और उसीके प्रभाव से मैंने यह रमणीय
उद्यान बनाया॥८४॥
[L23: बार-बार तुम उद्यान की रक्षा करो तथा कहकर वह अन्तर्धान हो गया। हे
राजमित्र ! इस प्रकार प्राचीन समय से देवी ने यह उद्यान को बनाया' ॥८५॥
तदनन्तर (माली) से इस प्रकार उस देश में देवी की कृपा का समाचार सुनकर मैं
आश्चर्यचकित होकर घर के लिए लौटा॥८६॥
द्यूताध्यक्ष के द्वारा बन्धन हुए कान्तसेन ने कहा कि राजा यशःकेतु का नाम बली
[३] ॥ ७॥