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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

२४२ कथासरित्सागर

२४२ कथासरित्सागर तस्यां दग्धां च वत्सेशो नवाम्यां परिणेष्यति। देवी दग्धति जातायां ख्यातौ सर्वस्तु रोत्स्यति ॥२४॥ पद्मावत्यां च रुष्टायां सम्बन्धी मगधाधिपः। पश्चात्कोपं न कुरुते सहायत्वं च गच्छति ॥२५॥ ततः पूर्वां विदां जतु गच्छामोऽन्यांश्च सत्क्रमात्। इत्थं वत्सेश्वरस्यैतां साधयामोऽखिलां भुवम् ॥२६॥ कृतोद्योगेषु चास्मासु पृथिवीमेष भूपतिः। प्राप्नुयादेव पूर्वं हि देव्या यागवमद्रवीत् ॥२७॥ ध्रुवेति मन्त्रिवृषभाद् वचो यौगन्धरायणात्। साहसं चेतनाशङ्क्यं रुमण्वांस्तमभाषत ॥२८॥ व्याजः पद्मावतीहेतोः क्रियमाणः कदाचन। दोषायास्माकमेव स्यात्तथा ह्यत्र कथां शृणु ॥२९॥ मूर्खमठाधीशकथा अस्ति माकन्दिका नाम नगरी जाह्नवीतटे। तस्यां मौनव्रतः कश्चिदासीत्प्रव्राजकः पुरा ॥३०॥ स च भिक्षाशनोऽनेकपरिव्राट्परिवारितः। आस्त देवकुलस्यान्तमंठिकायां कृतस्थितिः ॥३१॥ प्रविष्टो जातु भिक्षार्थमेकस्य वणिजो गृहे। स ददर्श शुभां कन्यां भिक्षामादाय निर्गताम् ॥३२॥ दृष्ट्वा चाद्भुतरूपां तां स कामवशगः शठः। 'हा हा कष्ट' मितिस्माह वणिजस्तस्य शृण्वतः ॥३३॥ गृहीतभिक्षश्च ततो जगाम निलयं निजम्। ततस्तं स वणिग्गत्वा रहः पप्रच्छ विस्मितः ॥३४॥ किमद्यैवमकस्मात्त्वं मौनं त्यक्त्वोक्तवानिति। तच्छ्रुत्वा वणिजं तं च परिव्राडेवमब्रवीत् ॥३५॥ दुर्लक्षणेयं कन्या ते विवाहोऽस्या यदा भवेत्। तदा ससुतदारस्य क्षयः स्यात्तव निश्चितम् ॥३६॥ तदेतां वीक्ष्य दुःखं मे जातं भक्तो हि मे भवान्। तेनेवमुक्तवानस्मि त्यक्त्वा मौनं भवत्कृते ॥३७॥ तदेषा कन्यका नक्तं मञ्जूषायां निवेशिता। उपरि न्यस्तदीपायां गङ्गायां क्षिप्यतां त्वया ॥३८॥

तृतीय लम्बक २४३

तृतीय लम्बक २४३ वासवदत्ता के रहते वत्सराज भी दूसरा विवाह न करेगा। उसका अत्यधिक स्नेह है। 'महारानी जल गई' ऐसा घोषित करने पर सब कुछ सिद्ध हो जायगा ॥२४॥ पद्मावती के साथ वत्सराज का विवाह हो जाने पर सम्बन्धी मगध-नरेश पीछे से आक्रमण न करेगा बल्कि सहायक ही बनेगा ॥२५॥ इसलिए हम पहले पूर्व दिशा की ओर आक्रमण करेंगे और क्रमशः अन्य दिशाओं की ओर जायंगे इस प्रकार वत्सराज के लिए सारी भूमि को वश में करेंगे ॥२६॥ 'हमारे उद्योग करने पर राजा समस्त पृथ्वी का शासक बन सकेगा'—ऐसी आकाशवाणी भी पहले हो चुकी है' ॥२७॥ मन्त्रिश्रेष्ठ यौगन्धरायण की इस योजना को सुनकर और इसे एक साहस-मात्र समझकर रुमण्वान् उससे बोला—पद्मावती के लिए किया हुआ बहाना कदाचित् हमारे लिए प्रतिकूल बैठे ? और कहीं हमी न दोषी ठहराये जायें ? यह सम्भव है। इस सम्बन्ध में एक कथा सुनो —॥२८ २९॥ धूर्त साधु की कथा गंगा-तट पर माकन्दिका नाम की एक नगरी है। उस नगरी में मौनव्रत धारण किये हुए एक परिव्राजक रहता था ॥३०॥ भिक्षाटन द्वारा भोजन करनेवाला वह संन्यासी अनेक संन्यासी चेलों के साथ किसी दैव-मन्दिर के अन्दर मठिया में रहता था ॥३१॥ एक बार वह भिक्षा माँगते-माँगते किसी वैश्य के घर में गया और उसने वहाँ भिक्षा लेकर निकली हुई एक सुन्दरी कन्या को देखा। उस अद्भुत सुन्दरी कन्या को देखकर वह दुष्ट परिव्राजक काम के वशीभूत होकर 'हाय रे ! मर गया !' इस प्रकार बोला जबकि वह वैश्य (कन्या का पिता) सुन रहा था ॥३२ ३३॥ तदनन्तर भिक्षा लेकर अपने स्थान पर लौट आया। तब वह वैश्य उसके समीप जाकर प्रणाम व आश्चर्य से पूछने लगा कि हे संन्यासी ! आज तुमने अकस्मात् अपना मौन-व्रत क्यों भंग किया और चिल्ला उठा। यह सुनकर संन्यासी बोला — तुम्हारी कन्या का लक्षण अशुभ है। इसका जब विवाह होगा तब तुम्हारा स्त्री पुत्र आदि के साथ अवश्य नाश हो जायगा। अतः उस कन्या को देखकर मुझे दुःख हुआ क्योंकि तुम मेरे भक्त हो। मैं तुम्हारी हानि नहीं देख सकता। अतः तुम्हारे लिए ही मैंने मौन का त्याग किया। इसलिए इस कन्या को काठ के सन्दूक में बन्द करके उसपर दिया जलाकर नदी में बहा दो ॥३४ ३८॥

२४४ कथासरित्सागर

२४४ कथासरित्सागर तथेति प्रतिपद्यैतद् गत्वा सोऽथ वणिग्भयात्। नक्तं चक्रे तथा सर्व निर्विमर्शा हि भीरवः ॥३९॥ प्रव्राजकोऽपि तत्कालमुवाचानुचराद्विजान्। गङ्गां गच्छत तन्मान्तर्वहन्ती यां च पश्यथ ॥४०॥ पृष्टोर्ध्वदीपां मञ्जूषां गुप्तमानयतह ताम्। उद्घाटनीया न च सा धृतज्येष्ठार्चनाविति ॥४१॥ तथेति चागता यावद् गङ्गां न प्राप्नुवन्ति च। राजपुत्र किमप्येकस्तावत्तस्यामवातरत् ॥४२॥ सोऽत्र तां वणिजा क्षिप्तां मञ्जूषां वीक्ष्य दीपतं । भृत्यैरानाय्य सहसा कौतुकादुदघाटयत् ॥४३॥ ददर्श चान्तःकन्यां तां हृद्योन्मादकारिणीम्। उपयेमे च गान्धर्वविधिना तां च सत्क्षणम् ॥४४॥ मञ्जूषां तां च गङ्गायां तथैवोर्ध्वस्पदीपिकाम्। कृत्वा तस्याञ्च निक्षिप्य, घोरं वानरमन्तरे ॥४५॥ गवेष्य तस्मिन्सम्प्राप्तकन्यारत्ने नृपात्मजे। आययुस्तस्य चिन्वन्त शिष्याः प्रव्राजकस्य ते ॥४६॥ ददृशुस्तां च मञ्जूषां गृहीत्वा तस्य चान्तिकम्। निन्यु प्रव्राजकस्यैनां सोऽथ हृष्टो जगाद तान् ॥४७॥ एकोऽह साधय मन्त्रमादामैतामिहोपरि। अधस्तूष्णीं च युष्माभि स्थातव्यमिमां निशाम् ॥४८॥ इत्युक्त्वा तां स मञ्जूषामारोप्य मठिकोपरि। स परिव्राट् विवृतवान् वणिक्कन्याभिकामुक ॥४९॥ सत्तश्च तस्या निर्गत्य वानरो भीषणाकृतिः। तमभ्यधावत् स्वकृतो मूर्त्तिमानिव दुर्नयः ॥५०॥ स तस्य दशनैर्नासां नखैः कर्णौ च तत्क्षणम्। चिच्छेद पापस्य कपिर्निग्रहज्ञ इव क्रुधा ॥५१॥ तथाभूतोऽथ स तत परिव्राडवतीर्णवान्। यत्नस्तम्भितहासाश्च शिष्यास्तं ददृशुस्तदा ॥५२॥ प्रातर्बुद्ध्वा च तत्सर्वं जहाम सकलो जनः। ननन्द स वणिक सा च तत्सुता प्राप्सत्पति ॥५३॥ १ प्राप्ता स्पृष्टदीपिका येति बहुव्रीहिः।

तृतीय लम्बक २४५

तृतीय लम्बक २४५ वह बनिया उसी प्रकार स्वीकार करके घर गया और भय के कारण रात में उसने उसी प्रकार किया—अर्थात् कन्या को सन्दूक में बन्द करके नदी में बहा दिया क्योंकि भीरु (डरपोक) लोग विवेकहीन होते हैं॥३९॥ संन्यासी ने भी मठ में रहनेवाले अपने चेलों से कहा कि जाओ नदी में देखो। यदि पीठ पर जलते हुए दीयेवाले बहते हुए सन्दूक को देखना तो उसे चुपचाप मेरे पास लाओ। यदि उसके अन्दर से आवाज भी आती हो तो उसे खोलना मत॥४०-४१॥ जब साधु के चेले गंगा-तट पर पहुंचे तब उससे पहले ही कोई राजपुत्र गंगा तट पर उतरा और उसने उस बनिये के द्वारा दीप जलाकर गंगा में बहाई हुई पेटी को देखा तथा अपने नौकरों से पेटी को मँगाकर खोला तो उसमें हृदय को उन्मत्त कर देनेवाली सुन्दरी कन्या को देखा। राजकुमार ने उस सुन्दरी को निकालकर वहीं उसके साथ तुरन्त गन्धर्व-विवाह कर लिया और पेटी में एक भयानक बन्दर को बन्द करके उसी प्रकार दीप-सहित पेटी को नदी में छोड़ दिया॥४३-४५॥ उस कन्यारत्न को लेकर राजकुमार के चले जाने पर उसी पेटी को खोजते हुए संन्यासी चेलों ने उस पेटी को देखा और उसे निकालकर गुरु के पास ले गये तथा प्रसन्न मुद्रा में गुरु ने उनसे कहा—अकेला ही इस पेटी पर बैठकर मन्त्र सिद्ध करता हूँ और तुमलोग नीचे जाकर रातभर चुपचाप सो जाओ ॥४६-४८॥ ऐसा कहकर उस संन्यासी ने सुन्दरी वैश्य-कन्या की प्राप्ति की उत्कंठा से एकान्त में उस पेटी को खोला। उसे खोलते ही संन्यासी की दुर्नीति के मूर्तिमान स्वरूप के समान एक भीषण बन्दर उससे निकलकर उछला॥४९-५०॥ बन्दर ने निकलते ही दांतों से संन्यासी की नाक और नखों से उसके कान काट लिये। मानों बानर संन्यासी की दुष्टता का दंड देने के लिए ही आया हो। तदनन्तर वह संन्यासी उसी रूप में नीचे उतरा। उसे उस रूप में देखकर उसके शिष्यों ने बड़ी ही कठिनाई से हंसी को रोका॥५१-५२॥ प्रातःकाल यह समाचार जानकर वह बनिया तथा अन्य सभी लोग खूब हँसत रहे। वह वैश्यकन्या एक राजकुमार को सुन्दर पति के रूप में प्राप्त कर आनन्द करने लगी॥५३॥

२४६ कथासरित्सागर

२४६ कथासरित्सागर एवं यथा स हास्यत्वं गतः प्रव्राजकस्तथा । व्याजप्रयोगम्यसिद्धौ वयं गच्छेम जातुचित् ॥५४॥ बहुदोषो हि विरहो राज्ञो वासवदत्तया । एवं रुमण्वतोक्त सन्नाह यौगन्धरायणम् ॥५५॥ नान्यथोद्योगसिद्धिः स्यादनुद्योगे च निश्चितम् । राजनि व्यसनिन्येतत्क्षयेदपि यथास्थितम् ॥५६॥ लब्धापि मन्त्रिताख्यातिरस्माकं चान्यथा भवेत् । स्वामिसम्भावनायाश्च भवेम व्यभिचारिणः ॥५७॥ स्वायत्तसिद्धे¹ राज्ञो हि प्रज्ञोपकरणं मताः । सचिवाः परे भवत्सर्वे कृते वाऽप्यभवत्कृते ॥५८॥ सचिवायत्तसिद्धस्तु तत्प्रभावसाधनम् । त एव चन्निहत्साहाः श्रियो दत्तो जलाञ्जलिः ॥५९॥ अथ देवी पितुश्चण्डमहासनाद् विवक्त्सुसे । स सुपुत्रश्च देवी च वचः कुरुत एव मे ॥६०॥ इत्युक्तवन्तं धीराणां धुर्यं यौगन्धरायणम् । प्रमादशङ्किहृदयो रुमण्वानपुनरब्रवीत् ॥६१॥ अभीष्टस्त्रीवियोगार्त्या सविवेकोऽपि बाध्यते । किं पुनर्वत्सराजोऽयमात्र चैतां कथां शृणु ॥६२॥ पुराभूद्देवसेनाख्यो राजा मतिमतो वरः । श्रावस्तीति पुरी तस्य राजधानी बभूव च ॥६३॥ तस्यां च पुर्यामभवद् वणिगेशो महाधनः । तस्योदपद्यतानन्यसदृशी दुहिता किल ॥६४॥ उन्मादिनीति नाम्ना च मन्यथा सापि पप्रथे । उन्माद्यति गतस्तन्म्या रूपं दृष्ट्वाऽखिलो जनः ॥६५॥ मतयय्मनाबञ्च राने वेषा क्वचिन्न मः । रा हि कुप्येद्गिति पिता तस्या सोऽर्थयत्प्रयद् वणिक ॥६६॥ ततश्च गत्वा राजान दन्तस्तन व्यजिापन् । देवास्ति कन्यारत्न मे गृह्यतामुपयोगि यत् ॥६७॥ १ त्रिविधा हि राजानः— १ स्वायत्तसिद्धिः, २ सचिवायत्तसिद्धि उभयायत्तसिद्धि श्चेति। तत्रायमुद्यमः सचिवायत्तसिद्धिः।

तृतीय लम्बक २४७

तृतीय लम्बक २४७ इसी प्रकार इस क्रूर प्रयोग की असफलता होने पर कहीं हम भी हँसी के पात्र न बनें। राजा के लिए वासवदत्ता का वियोग अत्यन्त असह्य है, इस कारण और कुछ अनर्थ भी सम्भव है। राजा के रहते हुए जो भी है उससे भी हाथ धोना पड़ेगा। रुमण्वान् के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा—'बिना उद्योग के सिद्धि नहीं प्राप्त होगी। यदि उद्योग न किया जायगा तो उस व्यसनी राजा का जो शेष राज्य है, वह भी न रह जायगा' ॥५४-५७॥ जिन राजाओं की सफलता मन्त्रियों के अधीन होती है, उनके लिए मन्त्रियों की बुद्धि ही कार्य-साधन करती है, इसलिए राजा का उपकार न करने के कारण हम दोषी होंगे। स्वायत्त-सिद्धि राजाओं के कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य के लिए उनकी निजी बुद्धि ही साधन होती है। उनके लिए कुछ करने या न करने में मन्त्रियों का उत्तरदायित्व नहीं होता। सचिवायत्त सिद्धिवाले राजा यदि निरुत्साह और निष्द्योग रहेंगे तो राजलक्ष्मी को तिलांजलि देनी होगी। यदि तुम महारानी के पिता चंडमहासेन से शंका करते हो तो व्यर्थ है। वह राजा और उसका पुत्र गोपालक मेरी बात मानते ही हैं, ॥५८-६१॥ धीर-धुरन्धर यौगन्धरायण के ऐसा कहने पर प्रमाद से शंकित चित्तवाला रुमण्वान् फिर बोला—बड़े-बड़े विवेकी पुरुष भी अति प्रिय स्त्री के वियोग से पीड़ित होते हैं, फिर वत्सराज की तो बात ही क्या? इस प्रसंग में यह कथा सुनो—॥६१ ६२॥ राजा देवसेन और उन्मादिनी की कथा पूर्व समय में देवसेन नाम का बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा था। श्रावस्ती नाम की नगरी उसकी राजधानी थी। उस नगरी में एक अत्यन्त धनी बनिया था। उसकी एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या थी। वह कन्या उन्मादिनी के नाम से प्रसिद्ध हुई क्योंकि उसे देखकर, देखनेवाले उन्मत्त हो जाते थे ॥६४-६५॥ वैश्य ने सोचा कि राजा को सूचना दिये बिना इस कन्या को कहीं न दूँगा नहीं तो राजा कुपित होगा ॥६६॥ तब उसने राजा देवसेन के पास जाकर निवेदन किया कि राजन् मेरे यहाँ एक कन्यारत्न है। यदि आपके उपयोगी हो तो आप उसे ग्रहण करें ॥६७॥

२४८ कथासरित्सागर

२४८ कथासरित्सागर सच्छल्या व्यसृजद्राजा सोऽथ प्रत्ययितान् द्विजान्। गत्वा सुलक्षणा सा वा न वेत्यालोच्यतामिति ॥६८॥ तथेति ते द्विजा गत्वा तां दृष्ट्वैव वणिक्सुताम्। उन्मादिनीं ययुः क्षोभं सद्यः सञ्जातमन्मथाः ॥६९॥ राजास्यां परिणीतायामवश्यमनास्त्यजेत्। राजकार्याणि नश्येच्च सर्वं तस्मात्किमेतया ॥७०॥ इति च प्रकृतिं प्राप्ता द्विजा सम्मन्त्र्य ते गताः। कुलक्षणा सा कस्येति मिथ्या राजानमब्रुवन् ॥७१॥ ततो राज्ञा परित्यक्तां स सोन्मादिनीं वणिक्। तत्सेनापत्ये प्रादादन्तर्जात्यभिमानिनाम् ॥७२॥ भर्तुःवेश्मनि हर्म्यस्था साथ जातु समागतम्। राजानं येन मार्गेण बुद्ध्वात्मानमदर्शयत् ॥७३॥ दृष्ट्वैव च स तां राजा जगत्सम्मोहनौषधिम्। प्रयुक्तामिव कामेन जातोन्माद इवाभवत् ॥७४॥ गत्वा स्वभवनं ज्ञात्वा तां च पूर्वावधीरिताम्। उन्मना ज्वरसन्तापपीडां गाढमवाप सः ॥७५॥ सा दासी न परस्त्री' ति गृह्यतां यदि वाप्यहम्। त्यजामि तां देवकुले स्वीकरोतु ततः प्रभुः ॥७६॥ इति तेन च तद्भर्त्रा स्वसेनापतिना ततः। अभ्यर्थ्यमानो यत्नेन जगादैव स भूपतिः ॥७७॥ माहुः परस्त्रीभावास्ये त्वं वा त्यक्ष्यसि तां यदि। ततो नङ्क्ष्यति ते धर्मो दण्ड्यो मे च भविष्यसि ॥७८॥ सन्द्रुध्या मन्त्रिणोऽन्यं च तूष्णीमासन्स च क्रमात्। स्मरज्वरेण तेनैव नृपः पञ्चत्वमाययौ ॥७९॥ एव स राजा नष्टोऽभूद्धीरोऽप्युन्मादिनीं विना। विना वासवदत्तां तु वत्सराजः कथं भवेत् ॥८०॥ १. अत्र प्राचीन भारते प्रचलिताया देवदासित्व प्रथाया आभास उपलभ्यते साम्प्रतमपि दक्षिणदेशे उत्कलेऽपि सैषा प्रथा दृश्यते।

तृतीय लम्बक २४९

तृतीय लम्बक २४९ यह सुनकर राजा ने विश्वस्त ब्राह्मणों को कन्या को देखने के लिए भेजा कि जाकर देखो कि कन्या सुलक्षणा और विवाह के योग्य है या नहीं। ब्राह्मणों ने वहाँ जाकर जैसे ही उन्मादिनी को देखा वैसे ही वे स्वयं उस पर आसक्त होकर लुब्ध हो गये। उन्होंने सोचा कि इसे पाकर राजा इसपर आसक्त होकर राज्य-कार्य करना भी छोड़ देगा। अतः इससे क्या लाभ ? ॥६८-७०॥ सावधानतापूर्वक ऐसा सोचकर ब्राह्मणों ने राजा से झूठ कह दिया कि 'महाराज! कन्या कुलक्षणा है' ॥७१॥ इस प्रकार राजा ने उसे छोड़ दिया। इस कारण वणिक् ने अपमान से कुपिता कन्या का राजा के सेनापति से विवाह कर दिया ॥७२॥ एक बार अपने घर में बैठी हुई उस कन्या ने ऊपर से जाते हुए राजा को जानकर खिड़की से अपने रूप को दिखा दिया ॥७३॥ राजा विश्व-वशीकरण औषधि के समान उस सुन्दरी को देखकर कामवश से पागल-सा हो गया ॥७४॥ अपने घर जाकर और पहले स्वयं छोड़ी हुई उस वैश्य-कन्या का पता पाकर व्याकुल राजा गहरे कामज्वर से पीड़ित हो गया ॥७५॥ इस वृत्तान्त को जानकर सेनापति ने राजा से कहा कि 'वह आपकी दासी है परस्त्री नहीं है। अतः आप उसे स्वीकार करें। मैं उसे देवमन्दिर में छोड़ देता हूँ। आप उसे वहीं से ग्रहण कर लें।' ॥७६॥ सेनापति के द्वारा इस प्रकार दण्डवत्पूर्वक प्रार्थित राजा बोला—'यदि तू उसे त्याग देगा तो भी मैं परस्त्री को ग्रहण न करूँगा। यदि तू ऐसा करेगा तो तेरा धर्म नष्ट होगा और मैं तुझे स्त्री-परित्याग करने के कारण दण्ड भी दूँगा।' ऐसा सुनकर सभी मंत्री घर गये और राजा कामवेदना से मर गया ॥७७-७९ ॥ वह राजा धैर्यवान् और विवेकी होने पर भी जिस प्रकार उन्मादिनी के बिना मर गया उसी प्रकार कामवेदना के बिना उदयन की क्या स्थिति होगी ? ॥८० ॥ १ प्राचीन काल में मन्दिरों को देवदासी भेंट करने की प्रथा थी। विशेष रूप से कन्याओं को भेंट किया जाता था। कहा जाता है कि गीतगोविन्द के कर्त्ता जयदेव की भार्या पद्मावती भी इसी प्रकार देवताओं को भेंट की गई कन्या थी। दक्षिण के संडोवा मन्दिर में, उड़ीसा के जगन्नाथ के मन्दिर में, गुजरात के बहुचरा तथा कालिका के मन्दिर में अभी कुछ दिन पहले तक यह प्रथा थी। दक्षिण भारत में मात्र मठनायकों को भी कन्याएँ भेंट की जाती थीं, किन्तु यह प्रथा अनर्थकारी होने से अब प्रायः समाप्त सी हो रही है। ३२

२५ कथासरित्सागर

२५ कथासरित्सागर एतद्रुमण्वतः श्रुत्वा पुनर्यौगन्धरायणः। उवाच सह्यते क्लेशो राजभिः कार्यदर्शिभिः ॥८१॥ रावणोच्छित्तये देवीं स्मृत्वा युक्तिं वियोजिताम्। सीतादभ्या न किं रामो विषहे विरहव्यथाम् ॥८२॥ एतच्छ्रुत्वा च भूयोऽपि रुमण्वानभ्यभाषत। ते हि रामादयो देवास्तेषां सर्वसहं मनः ॥८३॥ असह्यं तु मनुष्याणां तथा च श्रूयतां कथा। अस्तीह बहुरत्नाढ्या मधुरेति महापुरी ॥८४॥ तस्यामभूद् वणिक्पुत्रः कोऽपि नाम्ना मङ्खलकः। तस्य चाभूत्प्रिया भार्या सर्वेशानुगमानसा ॥८५॥ तया सह वसन्तोऽयं कदाचित्कार्यगौरवात्। द्वीपान्तरं वणिक्पुत्रो गन्तुं व्यवसितोऽभवत् ॥८६॥ सद्भार्यापि च तेनैव सह गन्तुमियेप सा। स्त्रीणां भावानुरक्तं हि विरहासहनं मनः ॥८७॥ ततः स च वणिक्पुत्रः प्रतस्थे कृतमङ्गलः। न च तां सह जग्राह भार्यां कॢप्तप्रसाधनाम् ॥८८॥ साथ तं प्रस्थितं पश्चात्पश्यन्ती साश्रुलोचना। अतिष्ठत्प्राङ्गणद्वार कपाटान्तविसंज्ञिनी ॥८९॥ गते दृष्टिपथात्तस्मिन्सा वियोगासहा सतः। नियन्तुं नाशकन्मुग्धा प्राणांस्तस्या विनिर्ययुः ॥९०॥ तद्बुद्ध्वा च वणिक्पुत्रः प्रत्यावृत्य च तत्क्षणम्। ददर्श विह्वलां कान्तामेतामुत्क्रान्तजीविताम् ॥९१॥ सुन्दरापाण्डरच्छायां विलोलामलकालञ्छनाम्। भुवि चान्द्रमसीं लक्ष्मीं दिवः सुप्तच्युतामिव ॥९२॥ अङ्के कृत्वा च तां सद्यः क्रन्दतस्तस्य निर्ययुः। शोकाग्निज्वलिताद्देहादुत भीता इवासवः ॥९३॥ एवमन्योन्यविरहाद्दम्यती तौ विनेशतुः। अतोऽन्य राज्ञो देव्याश्च रक्ष्यान्योन्यवियोगिता ॥९४॥ इत्युक्त्वा विरते तस्मिन्बद्धाशङ्के रुमण्वति। जगाद धैर्यजलधिर्धीमान्यौगन्धरायणः ॥९५॥ मयैतन्निश्चितं सर्वं कार्याणि च महीभृताम्। भवन्त्यवधिमान्यत्र तथा चान्यां कथां शृणु ॥९६॥

तृतीय लम्बक १५१

तृतीय लम्बक १५१ दम्भोलि से इस प्रकार का उदाहरण सुनकर यौगन्धरायण फिर बोला कि अपनी कार्यसिद्धि का ध्यान रखते हुए राजा लोग कष्टों को सहन करते हैं। रावण के विनाश के लिए देवताओं द्वारा सीता से वियुक्त किये गये राम ने कितनी भीषण विरह-वेदना सहन की थी। ऐसा सुनकर दम्भोलि फिर भी बोला—वे राम आदि राजा देवता थे मनुष्य नहीं अतः उनका मन वियोग को सहन कर सकता था किन्तु मानव-हृदय उसे सहन नहीं कर सकता इसपर एक कथा सुनो—॥८१-८४॥ यशस्कर सेठ की कथा इस देश में अनेक रत्नों से पूर्ण मथुरा नाम की महानगरी है। उसमें 'यशस्कर' नाम का एक वैश्य-पुत्र था। उसकी स्त्री उसके प्रति अत्यन्त अनुरक्त थी॥८४-८५॥ उसके साथ रहते हुए उसे आवश्यक कार्य के कारण वैश्य-पुत्र दूसरे द्वीप को जाने को उद्यत हुआ। उसकी प्यारी पत्नी भी उसके साथ जाने के लिए तैयार हुई। कारण यह कि प्रेमपूर्ण स्त्रियों का हृदय पति के विरह को सहन नहीं कर सकता॥८६-८७॥ वह वैश्य-पुत्र मंगलाचरण करके यात्रा के लिए चल पड़ा किन्तु जाने के लिए तैयार बैठी हुई पत्नी को साथ न ले गया। उसकी पत्नी जाते हुए पति को आंसुओं से पूर्ण नेत्रों से देखती हुई गृह-द्वार के किवाड़ के सहारे लटककर खड़ी रही। धीरे-धीरे उसके अंगों से ओझल हो जाने पर वियोग को सहन न कर सकने के कारण वह गिर पड़ी और मानों भय से उसके प्राण निकल गये॥८८-९०॥ वैश्य-पुत्र यह जानकर पीछे लौटा और उसने वियोग-व्याकुल अनाथ निर्जीव पत्नी को देखा॥ ९१॥ भूमि पर निर्जीव पड़ी हुई उसके पीले मुख पर सुगन्धा लेप रही थी। इस प्रकार स्थित हुई उसकी सुन्दर कान्ति लटक रही थी। ऐसा मालूम होता था कि मानो चन्द्रमा की समस्त शोभा भी मान के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ी हो॥ ॥ वैश्य-पुत्र उसे अपनी गोद में सुला लिया और रोने लगा। जोर-जोर उसकी श्वासानि के तपते हुए शरीर से मानो भयभीत प्राण-पवन निकल भागे कि कहीं हम भी अन्दर ही जलकर भस्म न जायें॥ ३॥ इस प्रकार परस्पर के विरह से वह दम्पती मर गया। इसीलिए सच्चा स्नेही और परस्पर वियोगियों से भी रक्षा करनी होती॥९४॥ मन्त्रिवित् दम्भोलि के इस प्रकार कहने पर धैर्य-भण्डार यौगन्धरायण बोला—वीर पुरुष का स्वभाव निष्ठा है। राजाओं के साथ ऐसा ही होता है। इस प्रसंग में कथा सुनो—॥ ९५-९६॥

२५२ कथासरित्सागर

२५२ कथासरित्सागर राजा पुण्यसेनस्य कथा उज्जयिन्यामभूत्पूर्वं पुण्यसेनाभिधो नृपः। स जातु बलिनान्येन राज्ञा गत्वाभ्ययुज्यत॥१९७॥ अथ तमन्त्रिणो धीरास्तमरिं वीक्ष्य दुर्जयम्। मिथ्या 'राजा मृत' इति प्रवाद्य सर्वतो व्यधुः॥१९८॥ प्रच्छन्नं स्थापयामासुः पुण्यसेनं नृपं च ते। अन्यं कञ्चिदधाक्षुश्च' राजार्हविधिना शवम्॥१९९॥ अराजकानामधुना भव राजा त्वमेव नः। इति दूतमुखेनाथ तमरिं जगदुश्च ते॥२००॥ तथेत्युक्तवतस्तस्य रिपोस्तुष्टस्य ते सतः। मिलित्वा सैन्यसहिताः कटकं बिभिदुः क्रमात्॥१०१॥ भिन्ने च सैन्ये राजानं पुण्यसेनं प्रकाश्य तम्। ते सम्प्राप्तबलाः शत्रुं तं निजघ्नुः स्वमन्त्रिणः॥१०२॥ ईदृशि राजकार्याणि भवन्ति सचिव क्षमम्। देवीदाहप्रवावेन कार्यं धैर्येण कुर्महे॥१०३॥ इत्येतन्निश्चितमते भूत्वा यौगन्धरायणात्। रुमन्वत्तानब्रवीदेवं तर्हि यद्येष निश्चयः॥१०४॥ तद्गोपालकमानीय देव्या भ्रातरमादृतम्। सम्मन्त्र्य च समं तेन सम्यक्सर्वं विधीयताम्॥१०५॥ एवमस्त्विति वक्ति स्म ततो यौगन्धरायणः। तत्क्षणमात्रमन्वाद्यं चक्रे कर्त्तव्यनिश्चयम्॥१०६॥ अन्येद्युर्मन्त्रिमख्यो हि दूतं व्यसृजतां निजम्। गोपालकं समानेतुमुत्कण्ठाभ्यपदेशतः॥१०७॥ कार्यहेतोर्गतं पूर्वं तद्भूरावधनाच्च सः। अगाद् गोपालकस्तत्र स्वयं मूर्त्त इवोत्सवः॥१०८॥ आगतं तमहद्दृष्ट्वा स्वयं यौगन्धरायणः। निनाय सहमन्त्र्यक्तं गृहं गोपालकं निशि॥१०९॥ तत्र चास्मै सवुत्साहं शशंस स्वचिकीर्षितम्। यत्पूर्वं मन्त्रितं तेन समं सह रुमण्वता॥११०॥ १ अधाक्षुः = दाहं चक्रुः।

तृतीय लम्बक २५३

तृतीय लम्बक २५३ राजा पुण्यसेन की कथा प्राचीन काल में उज्जयिनी में पुण्यसेन नाम का राजा था। वह किसी बलवान् शत्रु राजा से आक्रान्त हो गया। उसके धैर्यशाली मन्त्रियों ने शत्रु को अजेय समझकर यह झूठी घोषणा कर दी कि राजा मर गया और अन्य किसी मुर्दे का राजा के समान धूमधाम से संस्कार करा दिया ॥१९॥ तदनन्तर मन्त्रियों ने एक दूत द्वारा शत्रु राजा को यह सन्देश भेजा कि हमलोग बिना राजा के अनाथ हो गये हैं। अब आप ही हमारे राजा बनिए ॥२०॥ सन्देश सुनकर राजा सन्तुष्ट एवं युद्ध के लिए शिथिल हो गया और उसने स्वीकार कर लिया। इस सन्धि के अवसर से लाभ उठाकर मन्त्रियों ने उसकी शिथिल सेना पर छापा मार दिया ॥२१॥ सेना के पैर उखड़ गये और वह भाग गई। तब मन्त्रियों ने अपने राजा पुण्यसेन को प्रकट करके शत्रु-राजा को भी पकड़कर मार दिया। राज्य-संबंधी काम इसी प्रकार छल-कपटों से सिद्ध किये जाते हैं। इसी प्रकार महारानी के जल जाने का हल्ला मचाकर हमलोग धैर्यपूर्वक कार्य करते हैं ॥२२॥ इस कार्य के लिए दृढ़ निश्चय किये हुए यौगन्धरायण से यह सुनकर रुमण्वान् ने कहा कि यदि ऐसी बात है तो मैं तैयार हूँ। महारानी के भाई गोपालक को बाहर बुलाकर उसके साथ भलीभाँति विचार कर लो' ॥२३॥ तब यौगन्धरायण ने 'ऐसा ही हो'—यह कहकर दूसरे ही दिन गोपालक को मिलने के बहाने बुलाने के लिए दूत भेजा ॥२४॥ प्रथम बार विवाह के लिए आया गोपालक इस बार दूत के कहने से मूर्त्तिमान् उत्सव के समान कौशाम्बी आया। उसके आने के दिन ही यौगन्धरायण उसे रात में रुमण्वान् के साथ अपने घर ले गया ॥२५-२६॥ वहाँ ले जाकर यौगन्धरायण ने रुमण्वान् के साथ परामर्श करके जो मन्तव्य निर्धारित किया था वह गोपालक को कह सुनाया ॥२७॥

२६४ कथासरित्सागर

२६४ कथासरित्सागर स च राजहितैषी सन् दुःखावहमपि स्वसुः । गोपालकोऽनुमन् तन्वत्सन्त्य हि सतां वचः ॥१११॥ सर्वमेतत्सुविहितं देवी दग्धामवत्य तु । प्राणैस्त्यजन् मयं रक्ष्यो वत्सेश इति चिन्यताम् ॥११२॥ सदुपायान्सामग्रीसम्भवं किल सत्यपि । गुरुममङ्ग हि मन्त्रस्य विनिपातप्रतिक्रिया ॥११३॥ इति भूयोऽपि तत्कालमुक्ते तत्र रूमण्वता । उवाचालोचिताशेषकार्यो यौगन्धरायणः ॥११४॥ नास्त्यत्र चिन्ता यद्राजपुत्री गोपालकस्य सा । कनीयसी स्वसा देवी प्राणेभ्योऽप्यधिका प्रिया ॥११५॥ एतस्य पाल्पमालोक्य शोकं वत्सेश्वरस्तदा । जीवत्येवाभिहेवेति मत्वा धैर्यमवाप्स्यति ॥११६॥ अपि चोत्तमसत्त्वोऽयं शीघ्रं च परिणीयते । पद्मावती ततो देवी दर्श्यत षाचिरादिति ॥११७॥ एवमेतद् विनिश्चित्य ततो यौगन्धरायणः । गोपालको रूमण्वाञ्च ततो मन्त्रमिति व्यधुः ॥११८॥ युक्त्या लावाणकं याम सह वेष्या नृपेण च । पर्यन्तो मगधासन्नवर्ती हि विषयोऽस्ति सः ॥११९॥ सुभगाखेटभूमित्वाद्राज्ञश्चाशास्यभिधानकृत् । तत्रान्तः पुरमादीप्य क्रियते मन्त्रि चिन्तितम् ॥१२०॥ देवी च स्थाप्यते नीत्वा युक्त्या पद्मावतीगृहे । छन्नस्थिताया येनास्याः सैव स्याच्छीलसाक्षिणी ॥१२१॥ एव रात्रौ मिथः कृत्वा मन्त्रं सर्वेऽपरेऽहनि । यौगन्धरायणाद्यास्ते प्राविशन् राजमन्दिरम् ॥१२२॥ तत्रैषमथ विज्ञप्तो वत्सराजो रूमण्वता । देव ! लावाणकेऽस्माकं गतानां वर्ततं शिवम् ॥१२३॥ स चातिरम्यो विषयस्तत्र चाखेटभूमयः । शोभनाः सन्ति हे राजन्प्रमदासाश्च सुग्रहाः ॥१२४॥ बाधते तं च नैकट्यात्सर्वं स मगधेश्वरः । ततत्र रक्षाहतोश्च विनोदाय च गम्यताम् ॥१२५॥

तृतीय लम्बक २५५

तृतीय लम्बक २५५ उस राजा के हितैषी गोपालक ने बहिन के लिए अति कष्टप्रद होने पर भी उस योजना को सुनकर अपनी सहमति प्रकट की क्योंकि हितैषी सज्जनों के वचन तो मानने ही चाहिए। इस योजना में सब बातें तो ठीक हैं, किन्तु देवी को जली जानकर अपने प्राणों को त्यागने की चेष्टा करते हुए वत्सराज की रक्षा कैसे की जाय यह विचारणीय प्रश्न है। अच्छे उपाय आदि सभी सामग्री के रहते हुए भी योजना को नष्ट होने से बचाना योजकों का मुख्य अंग है। अर्थात् यदि राजा का अस्तित्व ही न रहा तो योजना का आधार नष्ट हो जायगा ॥१११–११३॥ रुमण्वान् के उस समय पुनः ऐसा कहने पर सारे कामों पर भलीभाँति सोचे-समझे हुए यौगन्धरायण बोला—‘इस विषय में चिन्ता न करनी चाहिए कि महारानी गोपालक की छोटी बहिन राजा को प्राणों से प्रिय है ॥११४–११५॥ उस समय राजा के शोक के कुछ कम होने पर कदाचित् रानी जीवित हो जाय। ऐसी आशा से राजा धैर्य धारण करेगा। और राजा उच्चतम कोटि का जीव है अतः उसका विवाह भी शीघ्र ही हो जायगा फिर उस बीच ही पद्मावती भी दिखा दी जायगी ॥११६-११७॥ इस प्रकार गोपालक रुमण्वान् और यौगन्धरायण परस्पर विचार-विनिमय करते रहे। अन्त में निश्चय हुआ कि हमलोग कोई बहाना बनाकर राजा और रानी के साथ लावानक गाँव को चलें। वह हमारा स्थान सीमा पर तथा मगध के समीप है। सुन्दर शिकारगाह होने के कारण राजा भी शिकार में लगा रहेगा इसी बीच हमलोग रनिवास में आग लगा देंगे किसी उपाय से महारानी को गुप्त रूप से पद्मावती के पास ही छिपा देंगे जिससे वह वासवदत्ता के स्वभाव और चरित्र से परिचित हो जायगी ॥११८–१२१॥ इस प्रकार रात्रि के समय सम्मति करके दूसरे दिन वे सब राजभवन को गये। वहाँ जाकर रुमण्वान् ने वत्सराज से निवेदन किया कि 'देव ! हमलोग लावानक ग्राम में जायें तो बहुत अच्छा हो। वह अति रमणीय स्थान है। वहाँ अच्छे-अच्छे शिकारगाह हैं और वहाँ मद पान की भी बहुतायत है। समीप होने के कारण मगध-नरेश वहाँ सदा बाधा पहुँचाता रहता है। इसलिए उसकी रक्षा के लिए और मनोरंजन के लिए वहाँ चलिए ॥१२२–१२५॥

२५६ कथासरित्सागर

२५६ कथासरित्सागर एतच्छ्रुत्वा च वत्सेशः समं वासवदत्तया। क्रीडङ्कलारसद्दध्रे गन्तुं लावाणकं मतिम्॥१२६॥ निश्चितं गमनेऽन्येद्युलग्ने च परिकल्पिते। अकस्मान्नारदमुनिः कान्तिद्योतितदिङ्मुखः॥१२७॥ अवतीय नभोमध्यात् प्रदत्तनयनोत्सवः। धात्रीव स्वकुलप्रीत्या च वत्सेश्वरमभ्यगात्॥१२८॥ गृहीतातिथ्यसत्कारः पारिजातमयीं स्रजम्। प्रीतः स च मुनिस्तस्मै ददौ प्रह्लाय भूभृते॥१२९॥ विद्याधराधिपं पुत्रं कामदेवांशमाप्स्यसि। इति वासवदत्तां च सोऽभ्यनन्दत्कृतान्तरः॥१३०॥ ततश्चोवाच वत्सस्य स्थिते यौगन्धरायणे। राजन् वासवदत्तां ते दृष्ट्वा हन्त स्मृतं मया॥१३१॥ युधिष्ठिरादयोऽभूवन्पुरा त प्रपितामहाः। पञ्चानां द्रौपदी सेषामेका पत्नी बभूव च॥१३२॥ सा च वासवदत्तेव रूपेणाप्रतिमाभवत्। ततस्तद्दोषमाशङ्क्य तानवमहमभ्यधाम्॥१३३॥ स्त्रीवैरं रक्षणीयं वस्तद्धि बीजमिहापदाम्। समाहि शृणुतेसां च कथां वः कथयाम्यहम्॥१३४॥ सुन्दोपसुन्दकथा सुन्दोपसुन्दनामानौ भ्रातरौ द्वौ बभूवतुः। असुरौ विक्रमाक्रान्तलोकत्रितयदुर्जयौ॥१३५॥ तयोर्विनाशकामश्च दत्त्वाज्ञां विश्वकर्मणः। ब्रह्मा निर्मापयामास दिव्यनारीं तिलोत्तमाम्॥१३६॥ रूपमालोकितुं यस्याश्चतुर्विक्क चतुर्मुखः। बभूव किल शर्वोऽपि कुर्व्वाणायाः प्रदक्षिणम्॥१३७॥ सा पद्मयोगरावेक्षात्पार्श्वं सुन्दोपसुन्दयोः। प्रलोभनाय प्रययौ कैलासोद्यानवत्तिनोः॥१३८॥ १ महाभारतस्यादियर्ववि कथेयमुपक्रम्यते।

तृतीय लम्बक २५७

तृतीय लम्बक २५७ यह सुनकर एकमात्र क्रीड़ा का लोभी राजा वासवदत्ता के साथ लावणक जाने के लिए उद्यत हो गया ॥१२६॥ किसी दिन जाने का निश्चय होने और यात्रा का शुभ मुहूर्त निकलने पर अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए नारद मुनि आकाश से उतरकर दर्शकों की आँखों को आनन्दित करने लगे। मानों चन्द्रमा अपने वंश (चन्द्रवंश) से प्रेम के कारण आकाश से उतर आया हो ॥१२७-१२८॥ राजा के द्वारा आतिथ्य-सत्कार ग्रहण किए हुए नारद मुनि ने नम्रता से झुके हुए राजा उदयन को प्रसन्नता से पारिजात के फूलों की माला प्रदान की ॥१२९॥ ऋषि ने नमस्कार करती हुई वासवदत्ता से कहा—'तुम कामदेव के अंश से उत्पन्न एक पुत्र को प्राप्त करोगी जो विद्याधरों का राजा होगा'॥१३०॥ तब यौगन्धरायण के सामने नारद ने वत्सराज से कहा—हे राजन्! तुम्हारी पत्नी वासवदत्ता को देखकर मुझे स्मरण हो गया कि प्राचीन समय में तुम्हारे पर दादा युधिष्ठिर भीम आदि पाँच भाई थे । उन पाँचों की एक ही पत्नी द्रौपदी थी। वह वासवदत्ता के समान ही अनुपम सुन्दरी थी। इस दोष को देखकर मैंने इन लोगों से कहा कि तुम पाँचों को स्त्री के सम्बन्ध से परस्पर बैर न करना चाहिए । इस प्रसंग में एक कथा कहता हूँ सुनो ॥१३१-१३४॥ सुन्द और उपसुन्द की कथा प्राचीन काल में सुन्द और उपसुन्द नाम के दो असुर थे जो अपने अतुल बल के कारण तीनों लोकों को जीतने के कारण अजेय थे ॥१३५॥ उन दोनों भाइयों के विनाश की इच्छा से ब्रह्मा ने विश्वकर्मा से तिलोत्तमा नामक दिव्य नारी का निर्माण कराया ॥१३६॥ चारों ओर से उसके रूप को देखने के लिए ब्रह्मा चतुर्मुख हो गये। जब वह प्रदक्षिणा कर रही थी तब शिव भी उसे चारों ओर से देखने के लिए ही चतुर्मुख हो गये ॥१३७॥ वह तिलोत्तमा ब्रह्मा की आज्ञा से विन्ध्याचल के तटवर्ती प्रदेश में स्थित उन असुरों के प्रलोभन के लिए गई ॥१३८॥ ३३

५५८ कथासरित्सागर

५५८ कथासरित्सागर तौ चासुरौ जगृहतुस्तां दृष्ट्वैवान्तिकागताम्। उभावप्युभयोर्बाह्वो सुन्दरीं काममोहितौ ॥१३९॥ परस्परविरोधेन हरन्तौ तां च तत्क्षणम्। प्रवृत्तसम्प्रहारत्वादुद्वावपि क्षयमीयतुः ॥१४०॥ एवं स्त्रीनाम विषयो निदानं कस्य नापदाम्। युष्माकं द्रौपदी चैका बहूनामिह वल्लभा ॥१४१॥ तन्निमित्तं समयः संरक्षण्यो भवतां किल। मद्वाक्यादयमस्तस्या समयश्चास्तु वः सदा ॥१४२॥ ज्येष्ठांतिकगता माता मन्तव्य कनीयसा। ज्येष्ठेन च स्नुषा ज्ञेया कनिष्ठान्तिकवर्तिनी ॥१४३॥ इत्येतन्मद्वचो राजंस्तव ते प्रपितामहाः। तथेति प्रत्यपद्यन्त कल्याणकृतबुद्धयः ॥१४४॥ ते च मे सुहृदोऽभूवस्तत्प्रीत्या चाहमागतः। त्वां द्रष्टुमिह वत्सेश¹ तदिदं शृणु वच्मि ते ॥१४५॥ यद्यत्मे कुरु वाक्यं कुर्यांस्त्वं मन्त्रिणां सह। अचिरेण च कालेन महतीमृद्धिमाप्स्यसि ॥१४६॥ किंचित्काल च दुःखं तन्भविष्यति न च त्वया। तत्रातिमोहः कर्त्तव्यः सुखान्तं भविता हि तत् ॥१४७॥ सम्यगेवमभिधाय तत्क्षणं वत्सराजमुवयस्य भाविषु। र्धर्मिसुचनविधौ विशारदो नारदो मुनिरखशन ययौ ॥१४८॥ सर्वे च तस्य वचसा मुनिपुङ्गवस्य योगन्धरायणमुखा सचिवास्त्ववस्ते। सम्भाष्य सिद्धयुवयमारमभिकीर्षितस्य सम्पादनाय सुतरां जगृहु प्रयत्नम् ॥१४९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे लावानक लम्बके प्रथमस्तरङ्गः

तृतीय लम्बक १५९

तृतीय लम्बक १५९ उसे एकान्त में समीप आई हुई देखकर उन काम-मोहित दोनों असुरों ने उसे दोनों बाहुओं से पकड़ा। उसे अपनी-अपनी ओर खींचते हुए वे दोनों परस्पर लड़ पड़े और नष्ट हो गये' ॥१३९-१४०॥ इस प्रकार स्त्री किसके लिए विपत्तियों का कारण नहीं बनती। तुम बहुतों की एक ही प्यारी स्त्री द्रौपदी है॥१४१॥ इसको लेकर होनेवाले आपसी कलह से तुमलोगों को बचना चाहिए। मेरे कहने से आप लोग उसका एक नियम निर्धारण कर लें ॥१४२॥ बड़े भाई के पास गई हुई उसे छोटे भाई, माता के समान समझें और छोटे भाइयों के समीप जाने पर बड़ा भाई उसे बहू (पुत्र-वधू) के समान समझें। हे राजन् ! शुभ बुद्धि वाले तुम्हारे परदादों ने मेरे वचन को उसी प्रकार स्वीकार कर लिया। वे लोग मेरे मित्र थे मैं तुम्हारे पास उसी प्रेम से तुम्हें देखने आया हूँ और यह कहता हूँ सुनो ॥१४३-१४५॥ जैसे तुम मेरी बात को मानते हो उसी प्रकार अपने मंत्रियों की बात को भी मानना। इस प्रकार तुम शीघ्र ही महान् ऐश्वर्य प्राप्त करोगे ॥१४६॥ कुछ समय तक तुम्हें कष्ट होगा उस समय तुम अधिक मोह न करना क्योंकि यह दुःख सुखान्त होगा अर्थात् अन्त में सुख मिलेगा ॥१४७॥ 'आप जो कहते हैं ठीक है' वत्सराज के ऐसा कहने पर भावी अभ्युदय के चिह्नों की सूचना देने में विशारद नारद मुनि अन्तर्धान हो गये ॥१४८॥ यौगन्धरायण आदि सभी राज-मन्त्री मुनिप्रवर नारद के वचनों से अपनी योजना की सफलता समझ कर उसे कार्यान्वित करने का प्रयत्न करने लगे ॥१४९॥ महाकवि सोमदेव भट्ट-विरचित कथा सरित्सागर के लावानक लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त।

१ यह कथा महाभारत के आदि पर्व में भी आती है।

२६ कथासरित्सागर

२६ कथासरित्सागर द्वितीयस्तरङ्ग वत्सराज-पद्मावत्योःपरिणयः ततः पूर्वोक्तया युक्त्या वत्सराजं सवल्लभम्। यौगन्धरायणाद्यास्ते निन्युर्लावाणकं प्रति ॥१॥ स राजा प्राप तं देशं स्वयशोपेण मूर्च्छता। अभिवाञ्छितसंसिद्धिं वदन्तमिव मन्त्रिणाम् ॥२॥ तत्र प्राप्तं विदित्वा च वत्सेशं सपरिच्छदम्। अवस्कन्दभयाच्छङ्की चकंपे मगधेश्वरः ॥३॥ यौगन्धरायणोपान्तं स्वबुद्धिविससर्ज च। स दूतं सोऽपि सम्मन्त्र्य कार्यशोऽभिननन्द तम् ॥४॥ वत्सेश्वरोऽपि निवसंस्तस्मिन्देशे दवीयसीम्। आखेटकार्थमटवीमटति स्म दिने दिने ॥५॥ एकस्मिन् दिवसे तस्मिन् राज्ञ्याखेटकं गते। कर्तव्यसविदं कृत्वा गोपालकसमन्वितः ॥६॥ यौगन्धरायणो धीमान् सङ्क्रमय्यवसन्तकः। देव्या वासवदत्ताया विजने निकटं ययौ ॥७॥ तत्र तां राजकार्येऽत्र साहाय्ये तदाद्युक्तिभिः। प्रह्वामभ्यर्थयामास भ्रात्रा पूर्वं प्रबोधिताम् ॥८॥ सानुमेने च विरह-क्लेश-दायितवात्मनः। किं नाम न सहन्ते हि भर्तृभक्ताः कुलाङ्गनाः ॥९॥ ततस्तां ब्राह्मणीरूपां देवीं यौगन्धरायणः। स चकार कृती दत्त्वा योगं रूपविवर्त्तनम् ॥१०॥ वसन्तकं च कृतवान् काणं बटुकरूपिणम्। आत्मना च तथैवाभूत्स्थविर-ब्राह्मणाकृतिः ॥११॥ तथा रूपां गृहीत्वाथ तां देवीं स महामतिः। वसन्तकसखः स्वरं प्रतस्थे मगधान् प्रति ॥१२॥ तथा वासवदत्ता सा स्वगृहाद्विर्गता सती। जगाम्बिपतनं भर्त्तारं पन्थानं वपुषा पुनः ॥१३॥ तन्मन्दिरमथादीप्य दह्यतेन रुमण्वता। हा हा वसन्तकयुता देवी दग्धेत्यघोषयत् ॥१४॥ तया च बहुमात्रन्दो रुमं तत्रोदतिष्ठताम्। शमं शशाम वह्नो न पुन' क्रन्दितध्वनिः ॥१५॥

तृतीय लम्बक २५१

तृतीय लम्बक २५१ द्वितीय सरग राजा उदयन और पद्मावती के विवाह की कथा नारद मुनि के प्रस्थान करने पर यौगन्धरायण आदि मन्त्री पूर्व-निर्धारित राजा को रानी के साथ लावानक ग्राम ले गये ॥१॥ राजा उदयन चारों ओर फैलते हुए सेना के सदस्यों के साथ लावानक पहुँचा। सेना की कलकल ध्वनि से वह स्थान मानो मन्त्रियों की सफलता की घोषणा कर रहा था ॥२॥ सीमा पर सेना के साथ आये हुए उदयन का पता पाकर मगध का राजा आक्रमण के भय से काँप उठा ॥३-४॥ वत्सराज भी वहाँ रहते हुए शिकार के लिए प्रतिदिन गहरे वनों में घूमता था ॥५॥ मगध-नरेश ने सद्भावना-प्रदर्शन के लिए यौगन्धरायण के पास अपना दूत भेजा। उस चतुर मन्त्री ने भी दूत का समुचित रूप से अभिनन्दन किया ॥६॥ वासवदत्ता के जलने की कथा एक दिन राजा उदयन के शिकार के लिए चले जाने पर यौगन्धरायण गोपालक रुमण्वान और वसन्तक के साथ समिति करके एकान्त में वासवदत्ता के समीप गया। भाई द्वारा पहले ही तैयार की गई रानी से उसने राजकार्य में सहायता के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की बातें समझाई ॥७-८॥ वासवदत्ता ने उस अत्यन्त विरह-क्लेश देनेवाली योजना को भी राजा के अभ्युदय के लिए स्वीकार कर लिया। पतिभक्त कुल-रमणियाँ पति के लिए कौन-सा कष्ट सहन नहीं करती ॥९॥ तब राजनीति-कुशल यौगन्धरायण ने वेश बदलने का सामान देकर वासवदत्ता को ब्राह्मणी का रूप धारण कराया ॥१०॥ वसन्तक को काने ब्रह्मचारी शिष्य का रूप धारण कराया और स्वयं बूढे ब्राह्मण का रूप धारण किया ॥११॥ इस प्रकार कृत्रिम वेष से यौगन्धरायण उन दोनों को साथ लेकर धीरे-धीरे मगध देश की ओर चला ॥१२॥ उस रूप में घर से निकली हुई वासवदत्ता मन से पति की ओर और शरीर से मगध-मार्ग की ओर चली ॥१३॥ उन तीनों के चले जाने पर दूसरे मन्त्री रुमण्वान् ने लावानक के राजगृह में आग लगा दी और यह घोषणा कर दी कि वसन्तक के साथ महारानी जल गईं। समूचे लावानक में आग और क्रन्दन की ध्वनि एक साथ ही उठी। आग धीरे-धीरे दब गई, किन्तु क्रन्दन-ध्वनि बन्द न हुई ॥१४-१५॥