कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
४५२ कथासरित्सागर
४५२ कथासरित्सागर सोऽहं स त समुत्पन्नो नाम्ना जीमूतवाहनः । विद्याधरकुलेऽमुष्मिंश्चेष जातिस्मरोऽधुना ॥१६६॥ स चापि शबरेन्द्रस्त्वं जातो मित्रावसुः पुनः । त्र्यक्षप्रसादात्सिद्धानां राज्ञो विश्वावसो सुतः ॥१६७॥ सापि विद्याधरी मित्र मम भार्या मनोवती । तव स्वसा समुत्पन्ना नाम्ना मलयवत्यसौ ॥१६८॥ एव मे पूर्वपत्न्येषा भगिनी ते भवानपि । पूर्वमित्रमतो युक्ता परिणेतुमसो मम ॥१६९॥ किं तु पूर्वमितो गत्वा मम पित्रोर्निवेदय । तयो प्रमाणीकृतयो सिद्ध्येदेतत्तदीप्सितम् ॥१७०॥ जीमूतवाहनमलयवतीविवाहः इत्य निशम्य जीमूतवाहनात् प्रीतमानसः । गत्वा मित्रावसुः सर्वं तत्पितृभ्यां शशंस तत् ॥१७१॥ अभिनन्दितवाक्यश्च ताभ्यां दृष्टस्तथैव सः । उपगम्य तयैवाथ स्वपितृभ्यां न्यवेदयत् ॥१७२॥ तयोरीप्सितसम्पत्तिस्तुष्टयोः सत्वरं च सः । युवराजो विवाहाय सम्भारमकरोत् स्वसुः ॥१७३॥ ततो जग्राह विधिवत्तस्या जीमूतवाहनः । पाणिं मलयवत्याः स सिद्धराजपुरस्कृतः ॥१७४॥ बभूव चोत्सवस्तत्र चण्डद्युतिचरेश्वरः । सम्मिश्रितोदकश्चातो वत्सादिविद्याधरोत्करैः ॥१७५॥ कृतोद्वाहस्ततस्तस्थौ तस्मिञ्जीमूतवाहनः । मलयाद्रौ महार्हेण विभवेन वधूसखः ॥१७६॥ एकदा च स्वशूर्येण स मित्रावसुना सह । वनावनानि जलधेरवलोकयितुं ययौ ॥१७७॥ तत्रापश्यच्च पुरुषं युवानं खिन्नमागतम् । निवारयन्तं जननीं हा पुत्रे ति विरविणीम् ॥१७८॥ भटेश्च परिव्यस्तं भटनेवानुयायिना । पृष्ठतः पृच्छत प्राप्त्यक शिलाखण्डम् ॥१७९॥
चतुर्थ लम्बक ४५३
चतुर्थ लम्बक ४५३ वह जातिस्मर मैं अब समुत्पन्न जीमूतवाहन नाम से विद्याधर-कुल में उत्पन्न हुआ वही शंखेन्द्र तुम मित्रावसु हो जो शिवजी की कृपा से सिद्धों के राजा विश्वावसु के पुत्र हो।।१६६ १६७।। हे मित्र वह मेरी विद्याधरी पत्नी मनोवती मलयवती नाम से तुम्हारी बहिन है। वह तुम्हारी बहिन मेरे पूर्वजन्म की पत्नी है और तुम भी मेरे उसी जन्म में मित्र हो। अतः मैं इससे विवाह करना उचित समझता हूँ ।।१६८ १६९।। किन्तु इसके पूर्व तुम मेरे पिता से निवेदन करो। उनके स्वीकार करने पर ही तुम्हारा यह अभीष्ट सिद्ध होगा ॥१७०॥ जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह जीमूतवाहन से ऐसा सुनकर प्रसन्नचित्त मित्रावसु ने मेरे पिता के समीप जाकर यह प्रस्ताव उपस्थित किया। उनके द्वारा समर्थन प्राप्त कर लेने पर सन्तुष्ट मित्रावसु ने यही प्रस्ताव अपनी माता और पिता से किया ॥१७१॥ वे यह सुनकर अभिलषित सम्पत्ति मिल जाने के समान प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रसन्नता- पूर्वक इस सम्बन्ध को स्वीकार किया ॥१७२॥ तदनन्तर युवराज मित्रावसु ने अपने विवाह की तैयारी की और जीमूतवाहन ने भी विधिपूर्वक मलयवती का पाणिग्रहण किया ॥१७३॥ आकाशचारी चारणों के गीतों से मनोहर उनका विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ। इस विवाह में सिद्धों और विद्याधरों के झुंड भी सम्मिलित हुए थे ।।१७४ १७५।। विवाह के उपरान्त जीमूतवाहन अपनी पत्नी के साथ अपने राजसी ठाटबाट से वहाँ रहने लगा ॥१७६॥ एकबार वे अपने साले मित्रावसु के साथ समुद्र-तट के जंगलों की सैर करता हुआ टहल रहा था कि इतने में उसने एक व्याकुल युवा पुरुष को अपनी ओर आते हुए देखा और उसके पीछे एक वृद्धा स्त्री 'हाय बेटा हाय बेटा' कहकर रोती-बिलखती आ रही थी ॥१७७-१७८॥ पीछे आते हुए सैनिक के समान किसी पुरुष ने एक ऊँची चट्टान के समीप लाकर उसे छोड़ दिया था॥१७९॥
४५४ कथासरित्सागर
४५४ कथासरित्सागर कस्त्वं किमीहसे किं च माता त्वां क्षोभतीति तम्। स पप्रच्छ ततः सोऽपि तस्मै वृत्तान्तमब्रवीत् ॥१८०॥ कद्रूविनतयो कथा पुरा कश्यपभार्ये द्वे कद्रूश्च विनता तथा। मिथः कथाप्रसङ्गेन विवादं किल चक्रतुः ॥१८१॥ आद्या श्यामान् हरेरश्वानवादीदपरा सितान्। अन्योन्यदासभावं च पणमत्र बबन्धतुः ॥१८२॥ ततो जयैषिणी कद्रूः स्वैरं मार्गैर्निजात्मजैः। विषफूत्कारमलिनैरस्याश्वानकारयत् ॥१८३॥ तादृशांश्चोपदर्श्यैतान्विनतां छद्मना जिताम्। दासीञ्चकार कष्टा हि स्त्रीणामन्यामहिष्णुता ॥१८४॥ तद्बुद्ध्वागत्य विनतातनयो गरुडस्तदा। सान्त्वेन मातुर्निर्यत्यैमुक्तिं कद्रूमयाचत ॥१८५॥ एतं कद्रुसुता नागा विचिन्त्यैवं तमब्रुवन्। भो वैनतेय क्षीराब्धेः प्राग्दधो मथितुं सुरैः ॥१८६॥ ततः सुधां समाहृत्य प्रतिवस्तु प्रयच्छ नः। मातरं स्वीकुरुष्वाथ मत्वान्दिं यन्निषां घटः॥१८७॥ एतन्नागवचः श्रुत्वा गत्वा च क्षीरवारिधिम्। सुधार्थं वधयामास गरुडो गुह्यकौरवम् ॥१८८॥ ततः पराक्रमप्रीतो वेधस्तत्र स्वयं हरिः। तुष्टोऽस्मि त वरं कञ्चिद् वृणीष्वेत्याविशेश तम् ॥१८९॥ नागा भवन्तु मे भक्ष्या इति सोऽपि हरेस्ततः। वैनतेयो वरं वव्रे मातुर्दास्येन कोपितः ॥१९०॥ तथेति हरिणादिष्टो निजवीर्याज्जितामृतः। स ववमथ दातुं गर्वितो ज्ञातवस्तुना ॥१९१॥ तथा पक्षीन्द्र ! कार्यं ते यथा मूढं मुच्यते। नागैः सथा यथा चैनां तेभ्यः प्रत्याहराम्यहम् ॥१९२॥ एतच्छ्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स बष्णनवरोऽसुरः। सुधाकलशमादाय तार्क्ष्यो नागानुपाययौ ॥१९३॥
चतुर्थ लम्बक ४५५
चतुर्थ लम्बक ४५५ 'तू कौन है तथा क्या चाहता है ? माता तेरे सम्बन्ध में शोक क्यो कर रही है?' इत्यादि। जीमूतवाहन ने उस युवक से यह सब वृत्तान्त पूछा। उत्तर में उसने जीमूतवाहन का सारा वृत्तान्त इस प्रकार कहा—॥१८८॥ कद्रू और विनता की कथा प्राचीन समय में कश्यप की दो पत्नियां विनता और कद्रू किसी कथा के प्रसंग में परस्पर विवाद कर बैठीं ॥१८९॥ कद्रू ने कहा कि सूर्य के घोड़े काले हैं और विनता ने कहा श्वेत। बस इसी बात पर उन्होंने आपस में शर्त लगा ली कि जिसकी बात झूठी होगी वह सच्ची बातवाली की दासता करेगी ॥१९०॥ जीतने की इच्छा रखनेवाली कद्रू ने अपने पुत्र सर्पों के द्वारा विषैली फुत्कार से सूर्य के घोड़ों का रंग काला करवा दिया और छल से जीती हुई कद्रू ने विनता को दासी बना लिया। सच है कि स्त्रियों की पारस्परिक ईर्ष्या भी दुर्लङ्घ्य होती है ॥१९१-१९४॥ यह जानकर विनता के पुत्र गरुड़ ने दास्यि के साथ अपनी माता की दासता की मुक्ति के लिए कद्रू से प्रार्थना की ॥१९५॥ तब कद्रू के पुत्र नागगण आपस में विचार करके बोले कि 'हे गरुड़ ! देवताओ ने अभी क्षीरसागर का मथना प्रारम्भ किया है। वहाँ से इसके बदले में अमृत लाकर हमें दो तब अपनी माता को स्वीकार करो क्योंकि तुम अत्यन्त बलवान् हो ॥१९६-१९७॥ नागों के यह वचन सुनकर और अमृत के लिए क्षीर समुद्र पर जाकर गरुड़ ने अत्यन्त पौरुष प्रकट किया ॥१९८॥ गरुड़ के पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने स्वयं गरुड़ से कहा कि मैं तुमपर प्रसन्न हूँ अतः कुछ वर मांगो ॥१९९॥ माता के दास्य के अपमान से क्रुद्ध गरुड़ ने भगवान् से वर मांगा कि नाग मेरे भक्ष्य हों ॥२००॥ भगवान् ने 'ऐसा ही हो'—कहकर उसे वही वरदान दिया। तदनन्तर गरुड़ अपने पराक्रम से अमृत को प्राप्त कर जब चलने लगा तब देवराज इन्द्र ने उससे कहा—॥२०१॥ 'हे पक्षिराज तुम्हें ऐसा करना चाहिए कि जिससे ये धूर्त सर्प अमृत को न खा सकें। अतः मैं इसे सर्पों से हरण कर लूँगा ॥२०२॥ ऐसा सुनकर विष्णु के वर से प्रसन्न गरुड़ ने इन्द्र के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और अमृत-कलश लेकर सर्पों के समीप गया ॥२०३॥
४५६ कथासरित्सागर
४५६ कथासरित्सागर वरप्रभावभीतांश्च मुग्धानाश्वास्यगाद तान् । इदमानीतममृतं मुक्त्वाम्बां मम गृह्यताम् ॥१९४॥ अय निक्षिपाम्येतदहं वो धर्मसंस्तरे । तन्मोच्याम्बा च गच्छामि स्वीकुरुध्वमिदं सुधाम् ॥१९५॥ तथेत्युक्ते च तैर्नागैः स पवित्रं कुशास्तरे । सुधाकलशमाधत्त ते प्रास्य जननीं जहुः ॥१९६॥ दास्यमुक्तां च कृत्वैवं मातरं गरुडे गते । यावद्धावन्ते नागा मिथुश्चास्तत्स्थिलामृतम् ॥१९७॥ तावन्निपत्य सहसा तान् विमोह्य स्वशक्तितः । स सुधाकलशं शक्रो जहार कुशसंस्तरात् ॥१९८॥ विपन्नास्तेऽथ नागास्तं लिलिहुर्धर्मसंस्तरम् । कदाचिदमृतस्योतलेपोऽप्यस्मिन् भवेदिति ॥१९९॥ तेन पाटितजिह्वास्ते वृथा प्रापुर्द्विजिह्वताम् । हास्यादृते किमन्यत्स्यादतिलौल्यवतः फलम् ॥२००॥ अथालब्धामृतरसान्नागान्वैरी हरेर्वरात् । तार्क्ष्यः प्रबभूवे भोक्तुं तान्निपत्य पुनः पुनः ॥२०१॥ तदापाते च पातालं त्रासनिर्जिताखिलम् । प्रभ्रष्टगर्भिणीगर्भमभूत्कंपितपन्नगम् ॥२०२॥ नागानां ह्रासो जीमूतवाहनस्यात्मनोत्सव तं दृष्ट्वा बान्धवहं तत्र वासुकिर्भुजगेश्वरः । कृत्स्नमेवपदं नष्टं नागलोकममन्यत ॥२०३॥ ततो दुर्वारवीर्यस्य सपत्नस्तस्य विचिन्त्य सः । समयं प्रार्थनापूर्वं चकारैवं गरुत्मतः ॥२०४॥ एकैकं प्रतिदिनं नागं ते प्रेषयाम्यहम् । आहारहेतोः पक्षीन्द्र ! पयोधिपुलिनाञ्चले ॥२०५॥ पातालन्तु प्रवेष्टव्यं न त्वया सर्ववारिणा । मामलोभदायात्साभ्यस्सर्वैव हि विनश्यति ॥२०६॥ इति वासुकिना प्रोक्तस्तथेति गरुडोऽन्वहम् । तत्प्रहितमिहैकेकं नागं भोक्तुं प्रचक्रमे ॥२०७॥
चतुर्थ लम्बक ४५७
चतुर्थ लम्बक ४५७ और वर के प्रभाव से डरे हुए नागों से बोला कि 'मैंने अमृत ला दिया है। मेरी माता को दासता से मुक्त करके इसे लो' ॥१९४॥ यदि तुम्हें मुझसे भय है तो मैं इसे कुशा के आसन पर रख देता हूँ और अपनी माता को छुड़ा ले जाता हूँ। तुम लोग इसे स्वीकार करो' ॥१९५॥ 'ऐसा ही करो' नागों के इस प्रकार कहने पर पवित्र कुशासन पर अमृत-कलश को रखवा- कर नागों ने गरुड़ की माता विनता को छोड़ दिया ॥१९६॥ माता को दासता से मुक्त कराकर गरुड़ के चले जाने पर नाग निर्भयतापूर्वक जब अमृतपान करने के लिए एकत्र हुए, तब इन्द्र ने अपनी शक्ति से कुशासन पर रखे हुए सुधा-कलश का अपहरण कर लिया ॥१९७-१९८॥ हताश नागों ने 'कहीं अमृत गिरकर कुशा में न लगा हो'—ऐसा मानकर कुशाग्रों को चाटना प्रारम्भ किया ॥१९९॥ कुशाग्रों को चाटने से उनकी जीभों के दो टुकड़े हो गये । सच है, अत्यन्त लोभियों को हँसी के सिवा और क्या फल मिलता है ॥२००॥ अमृत के स्वाद से वञ्चित नागों का शत्रु गरुड़ विष्णु के वरदान के कारण बार-बार नागों पर टूटकर उन्हें खाने लगा ॥२०१॥ फलतः गरुड़ के आक्रमण से सारा पाताल व्याकुल हो गया। भय के कारण सर्प निर्जीव से हो गये। गर्भिणी नागपत्नियों के गर्भपात होने लगे और इसी भय मात्र से अनेक नाग प्राणों से भी हाथ धो बैठे ॥२०२॥ नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण प्रतिदिन इस प्रकार का आतङ्क देखकर नागराज वासुकि ने सोचा कि इस प्रकार तो सारा नागलोक सहसा नष्ट हो जायगा और गरुड़ भी अजेय है। ऐसा सोचकर उसने गरुड़ के साथ मिलकर एक नियम बना लिया कि प्रतिदिन एक नाग समुद्र-तट के पर्वत पर गरुड़ के भोजन के लिए भेज दिया जायगा। तब नागराज ने गरुड़ से कहा कि 'तुम पाताल में उपद्रव करने का आतङ्क फैलाने न आया करो। अन्यथा इस प्रकार एक साथ ही समस्त नागों के नाश हो जाने पर तुम्हारा स्वार्थ नष्ट ही जायगा' ॥२०३-२०५॥ गरुड़ ने भी इस व्यवस्था को मान लिया और वासुकि द्वारा भेजे हुए एक-एक नाग को वह प्रतिदिन खाने लगा ॥२०६॥ १ सर्प इसीलिए 'द्विजिव्ह' या दो जिह्वा वाले कहे जाते हैं। ५८
४५८ कथासरित्सागर
४५८ कथासरित्सागर तेन क्रमेण वासस्या फणिनोऽत्र क्षयं गताः। अहं च शङ्खचूडाख्यो नागो वारे ममाद्य च ॥२०८॥ अतोऽहं गरुडाहारकृतोबध्यशिलामिमाम्। मातुश्च शोच्यतां प्राप्तो नागराजनिवेशतः ॥२ ०९॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा शङ्खचूडस्य दुःखितः। सान्त्वयंस्तं स जीमूतवाहनस्तमभाषत ॥२१०॥ अहो किमपि निःसत्त्वं राजत्वं बत वासुकेः। यत्स्वहस्तेन नीयन्ते रिपोरामिषतां प्रजाः ॥२११॥ किं न प्रथममात्मैव तेन दत्तो गरुत्मते। क्लीबेनाभ्यर्थिता केयं स्वकुलक्षयसाक्षिता ॥२१२॥ उत्पद्य कश्यपात्पापं तार्क्ष्योऽपि कुरुते कियत्। देहमात्रकृते मोहः कीदृशो महतामपि ॥२१३॥ तदहं तावदद्यैकं रक्षामि त्वां गरुत्मतः। स्वशरीरप्रदानेन मा विषादं वृथा सखे' ॥२१४॥ तच्छ्रुत्वा शङ्खचूड़ोऽपि धैर्यवित्पुवाच तम्। शान्तमेतन्महासत्त्व ! मा स्मैवं भाषथाः पुनः ॥२१५॥ न काचस्य कृते जातु युक्ता मुक्तामणेः क्षतिः। न चाप्यहं गमिष्यामि कथां कुलकलङ्किताम् ॥२१६॥ इत्युक्त्वा तं निषिध्यैव मातुर्जीमूतवाहनम्। भत्त्वा गरुडवेलां च स क्षणास्तरगामिनीम् ॥२१७॥ शङ्खचूड़ो ययौ तत्र वारिधेस्तीरवर्तिनम्। अन्तकाले नमस्कर्तुं गोकर्णाख्यमुमापतिम् ॥२१८॥ गते तस्मिंश्च कारुण्यनिधिर्जीमूतवाहनः। तत्त्राणायात्मदानेन बुबुधे लब्धमन्तरम् ॥२१९॥ ततस्तद्विस्मृतमिव क्षिप्रं कृत्वा स्वमुक्तिदं। कार्यापवेगादभ्यमुञ्चन्न मित्रवसुं गृहम् ॥२२०॥ तत्क्षणं च समासन्नताक्ष्र्यपक्षानिलाहता। तत्सत्त्वदर्शनाश्चर्यादिव सा मूर्ध्न्यूधयत् ॥२२१॥ तत्राहीर्रिपुमायान्तं मत्वा जीमूतवाहनः। परानुकम्पी तां बध्यशिलामभ्यारुरोह सः ॥२२२॥
चतुर्थ लम्बक ४५९
चतुर्थ लम्बक ४५९ अतः नागवध के उसी क्रम में आज मेरी बारी है। मेरा नाम शंखचूड़ है। मैं भी नागराज की आज्ञा से आज गरुड़ के आहार के लिए इस वध्यशिला पर लाया गया हूँ। अतः मैं माता के लिए शोचनीय हो रहा हूँ। इस प्रकार शंखचूड़ के वचन सुनकर और उसके मुख से दुःखी जीमूतवाहन धैर्यपूर्वक उससे बोला—॥२८-२१॥ अहो ! वासुकि का नागराज होना कितना सारहीन है, जो स्वयं अपने हाथों से अपनी प्रजा को शत्रु का आमिष (भोजन) बना रहा है॥२११॥ क्यों नहीं उसने सबसे पहले अपने को ही गरुड़ के लिए प्रदान किया। प्रत्युत इसके विपरीत ही नपुंसक के समान उसने अपने कुल का ही नाश स्वीकार किया॥२१२॥ उधर, गरुड़ भी कश्यप ऋषि की सन्तान होकर कितना पाप कर रहा है। महान् पुरुषों को भी इस देह के लिए कितना मोह है॥२१३॥ इसलिए आज मैं तुम एक नाग की अपना शरीर-दान करके रक्षा करता हूँ। तुम व्यर्थ शोक न करो॥२१४॥ यह सुनकर शंखचूड़ भी धैर्य के साथ बोला—हे महात्मन् ! ऐसा फिर न कहना॥२१५॥ काँच के लिए मोती की हानि करना उचित नहीं है। मैं भी कुल-कलंक बनना नहीं चाहता'॥२१६॥ ऐसा कहकर और जीमूतवाहन को रोककर वह सज्जन नाग शंखचूड़ तुरन्त आनेवाले गरुड़ के समय को जानकर समुद्रतीरवासी गोकर्ण नामक शिव को अन्तिम समय का प्रणाम करने के लिए गया। उसके जाने पर दयानिधि जीमूतवाहन को उसकी रक्षा के लिए अपना प्राणदान करने का अवसर मिल गया॥२१७-२१९॥ तब उसने पुलिन में माँ त्रिशिखी की बात का स्मरण करके किसी काम के बहाने से अपने साथी मित्रावसु को वहाँ से भेज दिया॥२२०॥ उसी समय समीप आये गरुड़ के पंखों की वायु से काँपती हुई भूमि मानो उस महापुरुष के दर्शन से आश्चर्यचकित हो घूमने लगी॥२२१॥ इस लक्षण से परोपकारी जीमूतवाहन गरुड़ का आया हुआ जानकर उस वध्यशिला पर चढ़ गया॥२२२॥
४६ कथासरित्सागर
४६ कथासरित्सागर
क्षणाच्चात्र निपत्यैव महासत्त्वं जहार तम्। आहृत्य चञ्च्वा गरुडः स्वच्छायाच्छादिताम्बरः ॥२२३॥ परिस्रवदसृग्धारे च्युतोत्खातशिखामणिम्। नीत्वा भक्षयितुं चन्मारेम शिखरे गिरेः॥२२४॥ तस्याङ्गे पुष्पवृष्टिश्च निपपात नभस्तलात्। तद्दर्शनाच्च किं स्वेदिविति तार्क्ष्यो विसिस्मये ॥२२५॥ तावत्स शङ्खचूड़ोऽत्र गत्वा गोकर्णमागतः। ददर्श रुधिरासारसिक्तं वध्यशिलातलम् ॥२२६॥ हा धिङ्मदर्थं तेनात्मा दत्तो नूनं महात्मना। तत्कुत्र नीतस्तार्क्ष्येण क्षणस्मिन् स भविष्यति ॥२२७॥ अन्विष्यामि द्रुतं तावत्कचिन्तमवाप्नुयाम्। इति साश्रुः स तद्रक्तधारामनुसरन्ययौ ॥२२८॥ अत्रान्तरे च दृष्टं तं दृष्ट्वा जीमूतवाहनम्। गरुडो भक्षणं मुक्त्वा सविस्मयमचिन्तयत् ॥२२९॥ कश्चित्किमप्य एवाय भक्ष्यमाणोऽपि यो मया। विपद्यते न तु परं धीरः प्रत्युत हृष्यति ॥२३०॥ इत्यन्तर्विमृशन्तं च तार्क्ष्यं तादुग्विभोऽपि सः। निजगाद निजाभीष्टसिद्धये जीमूतवाहनः ॥२३१॥ पक्षिराज ! ममास्त्येव शरीरे मांसशोणितम्। तदकस्मात्कृतोऽपि त्वं निवृत्तोऽसि भक्षणात् ॥२३२॥ तच्छ्रुत्वाश्चर्यवशगस्तं स पप्रच्छ पक्षिराट्। नागः साभो न तावत्त्वं ब्रूहि तत्को भवानिति ॥२३३॥ नाग एवास्मि भुङ्क्ष्व स्वं यथारब्धं समापय। आरब्धा ह्यसमाप्तैव किं धीरस्याद्यते क्रिया ॥२३४॥ इति यावच्च जीमूतबाहुं प्रतिवक्ति तम्। तावत्स शङ्खचूड़ोऽत्र प्राप्तो दूरादभाषत ॥२३५॥ मा मा गरुत्मन्नेष नागो नागोऽह्याह्र तव। तदेनं मुञ्च कोऽयं ते जातोऽश्राण्ट बत भ्रमः ॥२३६॥ तच्छ्रुत्वातोय विम्रान्तो बभूव स गरुडेश्वरः। वाञ्छितासिद्धिगेन च भेजे जीमूतवाहनः ॥२३७॥
चतुर्थ लम्बक ४३१
चतुर्थ लम्बक ४३१ अपने विशालपंखों की छाया से आकाश को छाये हुए गरुड़ ने चोंच मारकर उस महाप्राणी जीमूतवाहन को उठा लिया॥२२३॥ बहती हुई रक्तधारावाले और उखड़कर गिरी हुई सिर की मणिवाले जीमूतवाहन को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर उसका भक्षण करने लगा॥२२४॥ इसी समय आकाश से पुष्पवृष्टि हुई। गरुड़ भी यह क्या है ऐसा सोचकर आश्चर्य चकित हो गया॥२२५॥ इतने में ही वह शंखचूड़ भी गोकर्णेश्वर शिव को प्रणाम करके आ गया और उसने वध्यशिला को रक्त से सचंप पाया॥२२६॥ और सोचने लगा कि धिक्कार है मुझे। उस महात्मा ने निश्चय ही मेरे लिए जीवन-दान दिया है। गरुड़ इस समय उसे कहाँ ले गया होगा॥२२७॥ मैं उसे शीघ्र खोजता हूँ। सम्भव है, मैं उसे प्राप्त कर लूँ। ऐसा सोचकर वह सज्जन रक्त की धारा के पीछे-पीछे चला॥२२८॥ उधर, जीमूतवाहन को प्रसन्न देखकर गरुड़ ने उसका भोजन करना छोड़ दिया और आश्चर्यान्वित हो उसे देखने लगा॥२२९॥ 'यह नाग नहीं कोई दूसरा ही जीव है, जो मेरे खाये जाने पर भी मरता नहीं प्रत्युत इसके विपरीत प्रसन्न हो रहा है' ॥२३०॥ इस प्रकार मन में सोचते हुए गरुड़ को अपनी दृष्टिसिद्धि के लिए जीमूतवाहन बोला—॥२३१॥ 'हे पक्षिराज ! अब भी मेरे शरीर में मांस और रक्त है। फिर भी तुम बिना तृप्त हुए ही खाने से सहसा क्यों रुक गये हो ? ॥२३२॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित गरुड़ ने पूछा—हे सज्जन तुम नाग नहीं बताओ कौन हो ? ॥२३३॥ 'मैं नाग ही हूँ तुम खाओ। जो प्रारम्भ किया है, उसे समाप्त करो। महान् व्यक्ति किसी कार्य को जिसको आरम्भ किया हो समाप्त किये बिना नहीं छोड़ते'॥२३४॥ जीमूतवाहन जबतक ऐसा कह ही रहा था तबतक शंखचूड़ दूर से चिल्लाकर बोला—॥२३५॥ 'हे गरुड़ ! इसे मत खाओ मत खाओ। यह नाग नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य नाग मैं हूँ। तुम्हें यह सहसा भ्रम कैसे हो गया। इसे छोड़ दो'॥२३६॥ यह सुनकर पक्षिराज गरुड़ अत्यन्त व्याकुल हो गया और जीमूतवाहन को अपनी अभीष्ट सिद्धि न होने का खेद हुआ॥२३७॥
४६२ कथासरित्सागर
४६२ कथासरित्सागर ततोऽप्योव्यसमालाप्रचन्दद्विद्याधराधिपम् बुद्धवा तं भक्षितं मोहाद् गरुत्मानभ्यतप्यत ॥२३८॥ अहो बत मूढस्य पापमापतितं मम । किं वा सुलभपापा हि भवन्त्युन्मार्गवृत्तयः ॥२३९॥ श्लाघ्यस्त्वय महात्मैष परार्थप्राणदायिना । ममेति मोहकृद्वक्ष येन विश्वमधः कृतम् ॥२४०॥ इति तं चिन्तयन्तं च गरुडं पापशुद्धये । वह्निं विविक्षुं जीमूतवाहनोऽथ जगाद स ॥२४१॥ पक्षिन्द्र किं विषण्णोऽसि सत्यं पापाद् बिभेषि चेत् । सन्दिदानीं न भूयस्ते भक्ष्याहीमे भुजङ्गमाः ॥२४२॥ कार्यश्चानुशयस्तेषु पूर्वभक्तेषु भोगिषु । एषोऽत्र हि प्रतीकारो वृथान्यच्चिन्तितं तव ॥२४३॥ इत्युक्तस्तेन स प्रीतस्ताख्यो भूतानुकम्पिना । तथेति प्रतिपेदे तद्वाक्यं तस्य गुरोरिव ॥२४४॥ ययौ चामृतमानेतुं नाकाञ्जीवयितुं जवात् । क्षताङ्गं तत्र तं चाप्यानस्थिशेषानहीनपि ॥२४५॥ ततश्च साक्षादागत्य देव्या सिक्तोऽमृतेन स । जीमूतवाहनो गौर्या तद्भार्याभक्तितुष्टया ॥२४६॥ तेनाधिकतरोद्भूतकान्तिर्ग्व्यङ्गानि जज्ञिरे । तस्य सानन्दगीर्वाणदुन्दुभिध्वनिभि सह ॥२४७॥ स्वस्थोत्थितं ततस्तस्मिन्नानीय गरुडोऽपि तत् । कृत्स्ने बेलातटेऽप्यथ ववर्षामृतमम्बरात् ॥२४८॥ तेन सर्वे समुत्तस्थुर्जीवन्तस्तत्र पन्नगाः । बभौ तच्च तदा भूरिभुजङ्गकुलसङ्कुलम् ॥२४९॥ बेलावनं विनिर्मुक्तबैनतेयभय तत । पातालमिव जीमूतवाहनालोकनागतम् ॥२५० ॥ ततोऽक्षयेण देहेन यशसा च विराजितम् । बुद्ध्वाभ्यनन्दत् बन्धुजनो जीमूतवाहनम् ॥२५१॥ ननन्द तस्य भार्या च सन्नातिः पितरौ तथा । को न प्रहृष्येद् दृष्टेन सुसत्त्वपरिघातिना ॥२५२॥
चतुर्थ लम्बक ४६१
चतुर्थ लम्बक ४६१ तदनन्तर परस्पर वार्तालाप के प्रसंग में सिसकते हुए उसे विद्याधरों का राजा जानकर और भ्रम से उसे खाकर गरुड़ को भारी मानसिक ताप हुआ ॥२३८॥ वह सोचने लगा कि मुझ जैसा क्रूर ने भारी पाप किया। उच्छृङ्खल वृत्ति के व्यक्तियों से पाप हो जाना सुलभ या स्वाभाविक है। यह एक प्रशंसनीय महात्मा है जो दूसरों के लिए अपने प्राण दे रहा है। मैंने अज्ञानवश संसार को नीचा कर दिया ॥२३९ २४ ॥ इस प्रकार पश्चात्ताप कर पापमुक्ति के लिए आग में जलकर प्राण-त्याग करने की बात सोचते हुए गरुड़ को जीमूतवाहन ने कहा—॥२४०॥ 'हे पक्षीराज ! दुःखी क्यों हो रहे हो। यदि सचमुच पाप से डरते हो तो आज से इन सर्पों का भक्षण करना छोड़ दो। पहले जिन्हें खा चुके हो उनके लिए पश्चात्ताप करो। यही इसका प्रायश्चित्त या प्रतिक्रिया है। और कुछ सोचना व्यर्थ है' ॥२४२-२४३॥ इस प्रकार प्राणियों पर दया करनेवाले जीमूतवाहन के कहने पर गरुड़ ने उसके वचन को गुरु की आज्ञा के समान माना ॥ २४४॥ और, तदपश्चात् वह खाये हुए नागों को जीवित करने के लिए अमृत लेने गया। उस अमृत से क्षत-विक्षत अंगवाले जीमूतवाहन पर उसकी पत्नी मलयवती की भक्ति से सन्तुष्ट गौरी ने स्वयं आकर अमृत-सिंचन किया। स्वयं गौरी के अमृत-सिंचन से अधिक मनोहर होने के कारण उसकी शोभा और बढ़ गई। लावण्ययुक्त देवताओं के भाव-बोध के साथ स्वस्थ होकर उठे जीमूतवाहन को देखकर गरुड़ ने समूचे समुद्र-तट पर अमृत की वर्षा कर दी ॥२४५ २४८॥ इस अमृत-सिंचन से तट पर इधर-उधर बिखरे हुए सभी नाग-कंकाल पुनर्जीवित हो उठे। फलतः वह शंखा-वत्त नागों के झुंडों से भर गया और उन्हें सर्वदा के लिए गरुड़ के भय से मुक्ति मिल गई ॥२४९॥ ऐसा प्रतीत होता था कि नागकुल के रक्षक जीमूतवाहन को देखने के लिए मानो सारा पाताल वहीं आ गया हो ॥२५०॥ तदनन्तर अक्षय शरीर और अक्षय यश से शोभित जीमूतवाहन का समस्त बन्धुओं ने अभिनन्दन किया ॥२५१॥ जीमूतवाहन की पत्नी और उसके माता-पिता सभी परम प्रसन्न हुए। सच है दुःख के सुख-रूप में परिणत हो जाने पर कौन प्रसन्न नहीं होता ॥ २५२॥
४६४ कथासरित्सागर
४६४ कथासरित्सागर विवस्वन्तमिव च द्योः शङ्खचक्रगदाधरम् । न्यग्रोधमण्डलेऽपश्यद् वेश्माभ्यन्तरमञ्जसा ॥ ५३॥ ततः प्राविशदाश्चर्यतरमस्यापरं गृहं प्रत्युद्गतं वितानीकृतमण्डपं सन्ततम् । मन्दारपुष्पवर्षैर्निश्चिन्तितानुद्धतं गङ्गावर्त्ताकारैश्च मणिरत्नप्रदीपैर्विराजितम् ॥ ५४॥ मध्ये चापश्यदेनां शुभां प्राग्दृष्टां च तरुणीम् । मन्दरोन्मथिताम्बुधेश्चन्द्रिकामिवोद्गताम् ॥ ५५ ॥ ताराभिरिव संकीर्णां विलोक्यैतां च मन्दरात् । पार्श्वगस्य शुश्राव विद्याधरपतेर्गिरम् ॥ ५६॥ एष शङ्खचक्रगदाधरोऽपरापराजितः । अभ्यन्तरपदेऽनेन संलग्नोऽस्ति महान् ॥ ५७॥ इत्याकर्ण्य कथां दिव्यामेतामादौ समाहितमनाः । दृष्ट्वा च तां कन्यां तद्रूपानन्दपूरिता ॥ ५८॥ ततः स राजा शुश्राव गीतिं तस्याः सुमधुरस्वरसंयुक्तां वीणावादनतत्पराम् । दिव्यस्त्रीसदृशाकारां दृष्ट्वा तां हृष्टचेताः स राजा तां विलोक्य ॥ ५९॥ एवं संचिन्त्य स नृपस्तस्याः समीपं गत्वा सादरमुक्तवानिति । ततोऽवदन्नृपः .................................................. .................................................. .................................................. .................................................. .................................................. .................................................. ..................................................
चतुर्थ लम्बक ४६५
चतुर्थ लम्बक ४६५ जीमूतवाहन के कहने पर शंखचूड़ भी रसातल को गया और जीमूतवाहन का यश तीनों लोकों में फैल गया॥ २५३॥ तदनन्तर प्रेम से नम्र देवताओं के समूह गरुड़ के पास आकर उस विद्याधर-कुल के तिलक जीमूतवाहन को प्रणाम करने लगे। पार्वती की कृपा से मतंग नामक जीमूतवाहन के सम्बन्धी भी भय से जाकर उसे प्रणाम करने लगे जो पहले उसके विरुद्ध थे॥ २५४॥ उन्हीं पूर्वविरोधी बन्धुओं से प्रार्थना किया गया जीमूतवाहन अपनी पत्नी मलयवती और प्रियमित्र मित्रावसु के साथ मलयाचल से हिमाचल पर अपनी प्राचीन राजधानी को गया॥२५५॥ इस प्रकार उस धैर्यशाली जीमूतवाहन ने चिरकाल तक विद्याधर-चक्रवर्ती पद का उपभोग किया ॥२५६॥ अपने इस उज्ज्वल चरित्र से तीनों लोकों के हृदयों को चमत्कृत करनेवाले महापुरुषों की कल्याण-परम्परा स्वयं उनके समीप आती है ॥२५७॥ महारानी वासवदत्ता यौगन्धरायण के मुख से इस अद्भुत कथा को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई ॥२५८॥ तदनन्तर प्रसन्न देवताओं के निरन्तर आवेश प्राप्त होते रहने के कारण इसी प्रसंग की चर्चा करती हुई अपने पति के निकट बैठी वासवदत्ता ने विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती अपने पुत्र की कथा में वह दिन व्यतीत किया ॥ २५९॥ नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त तृतीय तरंग वासवदत्ता का स्वप्न कुछ समय के अनन्तर एक दिन वासवदत्ता मन्त्रियों के साथ बैठे हुए वत्सराज से एकान्त में इस प्रकार कहने लगी—॥१॥ 'हे आर्यपुत्र ! जबसे मैंने इस गर्भ को धारण किया है, तब से मुझे इसकी रक्षा के लिए हृदय में अत्यधिक व्याकुलता बढ़ रही है ॥२॥ इसी प्रकार की चिन्ता करती हुई मैं आज रात किसी प्रकार सोई। नींद आने पर मैंने स्वप्न में एक पुरुष को देखा ॥३॥ ५९
४६६ कथासरित्सागर
४६६ कथासरित्सागर भस्माङ्गरागसितया क्षेत्तरीकृतचन्द्रया। पिङ्गङ्गजटामूर्ध्न्या क्षोभितं सूरुहस्तया ॥४॥ स च मामभ्युपेत्येव सानुकम्प इवाबदत् । पुत्रि ! गर्भकृते चिन्ता न कार्या काचन त्वया ॥५॥ अह तर्बेनं रक्षामि दत्तो ह्येष मयैव ते । किञ्चायच्छृणु वक्ष्याव तव प्रत्ययकारणम् ॥६॥ श्व कापि नारी विज्ञाप्तिहेतोर्युष्मानुपैष्यति । अवष्टभ्यैव साक्षेपमाक्रयन्ती निज पतिम् ॥७॥ सा च दुश्चारिणी योषित् स्वबान्धवबलात् पतिम् । त घातयितुमिच्छन्ती सब मिथ्या ब्रवीति तत् ॥८॥ त्व चात्र पुत्रि ! वत्सस्य पूर्व विज्ञापयस्तया । तस्या सकाशात्स यथा साधुर्मुच्येत कुस्त्रिय ॥९॥ इत्यादिश्य गते तस्मिन्नन्तर्धान महार्मान । प्रबुद्धा सहसैवाह विभाता च विभावरी ॥१ ॥ एवमुक्ते तया देव्या शर्वानुग्रहवादिन । तत्रासन्विसिमता सर्वे संवादापेक्षिमानसा ॥११॥ तस्मिन्नव क्षण चात्र प्रविश्यार्त नुकम्पिनम् । वत्सराज प्रतीहारमुस्त्याऽकस्माद्व्यजिज्ञपत् ॥१२॥ आगता देव विज्ञप्त्यै कापि स्त्री बान्धवैर्वृता। पञ्चपुत्रान् गृहीत्वा स्वमाक्षिप्य विषण्ण पतिम् ॥१३॥ तच्छ्रुत्वा नृपतिर्देवीस्वप्नसम्वादविस्मित । प्रवेश्यतामिहैवेति प्रतीहारं तमादिशत् ॥१४॥ स्वप्नसत्यत्वसञ्जातमत्पुत्रप्राप्तिनिश्चया । देवी वासवदत्तापि सा सम्प्राप परां मुदम् ॥१५॥ अथ द्वारोन्मुख सर्वेरीक्ष्यमाणा सकौतुकम् । प्रतीहारानुया योषिद् भर्तृयुक्ता विवेश सा ॥१६॥ प्रविश्याश्रितवेन्था च यथाक्रमकृतानति । मध संसदि राजानं सदेवीक व्यजिज्ञपत् ॥१७॥ मय निरपराधाया मम भर्त्ता मदश्रपि । न प्रयच्छत्यनाथाया भोजनाच्छादनादिकम् ॥१८॥
चतुर्थ लम्बक ४६७
चतुर्थ लम्बक ४६७ उस पुरुष की मूर्ति भस्म के अंगराग से श्वेत थी और मस्तक पर चन्द्रमा था। उसकी लम्बी-लम्बी और पीले रंग की जटाएँ थीं और हाथ में त्रिशूल था॥४॥ उसने मेरे पास आकर मानों दयार्द्र होकर कहा — 'बेटी! तुम्हें अपने गर्भ के सम्बन्ध में कोई भी चिन्ता नहीं करनी चाहिए॥५॥ मैं तेरे गर्भ की रक्षा करता हूँ और मैंने ही तुझे यह गर्भ दिया है। तुम्हारे विश्वास के लिए एक बात और बता दूँ, सुनो॥६॥ प्रातःकाल कोई एक स्त्री अपने पति को पकड़कर डाँटती-डपटती और उसे खींचती हुई कुछ निवेदन करने के लिए तुमलोगों के पास आवेगी ॥७॥ यह स्त्री दुराचारिणी है और अपने बन्धुजन के बलपर पति को मारना चाहती है। वह मिथ्या भाषण करती है॥८॥ यह बात सुनकर वत्सराज उदयन को पहले ही बता देना जिससे वह सज्जन पति उस दुष्टा से छूट जाय' ॥९॥ इस प्रकार स्वप्न में आज्ञा देने पर और उनके सहसा अदृश्य हो जाने पर मैं एकाएक जागी तो देखा कि रात भी बीत चुकी और प्रातःकाल हो गया ॥१० ॥ रानी का यह स्वप्न-समाचार सुनकर शिवजी की कृपा का वर्णन करते हुए उस स्त्री के आने की प्रतीक्षा करते हुए सभी व्यक्ति आश्चर्यचकित हो रहे थे॥११॥ उसी क्षण प्रधान द्वारपाल ने आकर वीणा पर ध्यान वत्सराज से एकाएक निवेदन किया—॥१२॥ महाराज ! अपने बान्धवों के साथ पाँच पुत्रों को लिये हुए और विवश पति को डाँटती-फटकारती हुई कोई स्त्री महाराज से निवेदन करने के लिए द्वार पर आई है' ॥१३॥ रानी के स्वप्न-समाचार से आश्चर्यचकित राजा ने यह सुनते ही 'उसे यहाँ लाओ'— इस प्रकार की आज्ञा द्वारपाल को दी ॥१४॥ स्वप्न की सत्यता से उत्तम पुत्र की प्राप्ति का पूर्ण विश्वास हो जाने के कारण रानी वासवदत्ता ने परम प्रसन्नता प्राप्त की॥१५॥ तदनन्तर बड़े ही कौतुक के साथ द्वार की ओर देखते हुए सभी उपस्थित व्यक्तियों के सामने पति से युक्त वह स्त्री द्वारपाल की आज्ञा से सम्मुख आई॥१६॥ आते ही दीनतापूर्ण मुख बनाकर और क्रमशः सभी उपस्थित व्यक्तियों का अभिवादन करके रानी के साथ बैठे हुए राजा से उसने निवेदन किया—॥१७॥ 'हे महाराज ! मुझ निरपराधिन का पति होकर भी यह व्यक्ति मुझ अनाथिनी को भोजन-वस्त्र नहीं देता' ॥१८॥
४१८ कथासरित्सागर
४१८ कथासरित्सागर इत्युक्तवत्यां तस्यां च स तद्भर्त्ता व्यजिज्ञपत्। देव ! मिथ्या वदत्येषा सवन्न्मूर्खद्वेषिणी ॥१९॥ आ वत्सरान्तं सर्वं हि दत्तमस्या मयाग्रतः। एतद्वेश्मभव एवाये तटस्था मेऽत्र साक्षिणः ॥२०॥ एव विज्ञापितस्तेन राजा स्वयमभाषत। देवीस्वप्ने कृतं साक्ष्य देवेनैवात्र शूलिना ॥२१॥ तत्किं साक्षिभिरेषैव निग्राह्या स्त्री सबान्धवा। इति राज्ञोदितेऽवादीद्धीमान् यौगन्धरायणः ॥२२॥ तथापि साक्षिबचनात्कार्यं देव यथोचितम्। लोको ह्यतदजानानो न प्रतीयात् कथञ्चन ॥२३॥ तच्छ्रुत्वा साक्षिणो राजा तद्वत्यानाय्य तत्क्षणम्। पृष्टाः शशंसुस्ते धाम तां मिथ्यावादिनीं स्त्रियम् ॥२४॥ तत प्रख्याप्यसधर्मद्रोहामतां सबान्धवाम्। सपुत्रां च स वत्सेशः स्वदेशान्नरवासयत् ॥२५॥ विससर्ज च तं साधु तद्भर्त्तारं दयार्द्रधीः। विवाहान्तरपर्याप्तं द्वितीयं विपुलं वसु ॥२६॥ पुमांसमाकुलं क्रूरा पतितं दुर्व्यधावटे। जीवन्तमेव कृच्छ्राति शकीव कुकुटुम्बिनी ॥२७॥ स्निग्धा कुलीना महती गृहिणी तापहारिणी। तरुच्छायेव मार्गस्था पुण्यैः कस्यापि जायते ॥२८॥ इति धवलमङ्गेन वदन्तं स महीपतिम्। वसन्तकः स्थितः पार्श्वे कथापटुरबोचत ॥२९॥ किं च देव विरोधो वा स्नेहो वापीह देहिनाम्। प्राग्जन्मवासनाभ्याससञ्चारप्रायेण जायते ॥३०॥ तथा च श्रूयतामत्र कथैषा वर्ण्यते मया। सिंहविक्रमस्य कलहकारिण्यास्तद्भार्यायाश्च कथा आसीद् विक्रमचण्डाख्यो वाराणस्यां महीपतिः ॥३१॥ तस्याभूद् वल्लभो भृत्यो नाम्ना सिंहपराक्रमः। यो रणेष्विव सर्वेषु धूतेष्वप्यसमो जयी ॥३२॥
चतुर्थ लम्बक ४१९
चतुर्थ लम्बक ४१९ पत्नी के ऐसा कहने पर उसके पति ने कहा—'महाराज ! अपने भाई-बन्धुओं के साथ मुझे मार डालना चाहती हुई यह स्त्री झूठ बोलती है। एक वर्ष पर्यन्त मैंने इसे भोजन वस्त्र आदि सब कुछ दिया है। इसके सभी भाई-बन्धु तथा और भी निष्पक्षपात व्यक्ति इस बात के साक्षी हैं ॥१९-२०॥ इस प्रकार उससे निवेदित राजा स्वयं बोला—'इस बात का साक्ष्य रानी के स्वप्न में भगवान् शिवजी ने स्वयं किया है, तो अब और दूसरे साक्षियों की क्या आवश्यकता है। अतः इस दुष्टा स्त्री को बन्धु-बान्धवों सहित पकड़कर कैद कर लेना चाहिए ॥२१॥ राजा के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा—॥२२॥ महाराज ! यह तो ठीक है। फिर भी, नियमानुसार साक्षियों की बातों पर ही यथो- चित दंड दिया जाना चाहिए; क्योंकि जनता स्वप्न की बात को न जानती हुई इस समुचित न्याय पर कैसे विश्वास करेगी ॥२२-२३॥ यह सुनकर और यौगन्धरायण की सम्मति को उचित मानकर राजा ने साक्षियों को बुला कर साक्षी ली। सभी ने उस स्त्री को झूठी बताया ॥२४॥ तब राजा ने उस स्त्री के लिए बन्धुओं के साथ सज्जन पति के द्रोह का अपराध लगाकर पुत्रों और बन्धुओं के साथ देश-निकाले का दंड दिया ॥२५॥ और उसके सज्जन पति का आदर कर दयालु राजा ने उसका दूसरा विवाह करने के लिए स्वयं प्रचुर द्रव्य भी उसे दिया ॥२६॥ सच है क्रूर और कुलटा स्त्रियां दुर्बलापरत्न एवं व्याकुल पतियों को जीते-ही जीते कौवियों के समान नोच खाती हैं ॥२७॥ वृक्ष की छाया के समान स्नेहपूर्ण सुशीला उदारहृदया सुगृहिणी और सन्मार्ग स्थित पत्नी किसी को ही बड़े पुण्यों से प्राप्त होती है ॥२८॥ इस प्रकार कहते हुए राजा के समीप बैठा हुआ कथा कहने में निपुण विदूषक वसन्तक बोला—॥२९॥ महाराज ! एक बात और भी है कि मनुष्य में परस्पर स्नेह या विराग प्रायः पूर्व जन्म के संस्कार से ही होता है ॥३०॥ मैं इस सम्बन्ध में एक कथा की कहानी सुनाता हूँ, उसे सुनो ॥३१॥ निहिश्चय और उसकी कलहकारिणी भार्या की कथा किसी समय वाराणसी नगरी में विषमशील नाम का एक राजा था। उसका सिंह- विक्रम नाम का एक प्यारा सेवक था, जो दण्ड में और जुआ खेलने में अतिनिपुण था ॥३२-३३॥
४०० कथासरित्सागर
४०० कथासरित्सागर तस्याऽभवच्च विकृता वपुषीवाशयेऽप्यरम्। ख्याता कलहकारीति नाम्नान्वर्थेन गेहिनी ॥३३॥ स सम्यक् सततं भूरि राजतो द्यूततस्तथा। प्राप्य प्राप्य धनं धीरः सर्वमेव समर्पयत् ॥३४॥ सा तु तस्य समुत्पन्नपुत्रत्रययुता शठा। तथापि क्षणमप्येकं न तस्थौ कलहं विना ॥३५॥ बहिः पिवसि भुङ्क्षे च नैव किञ्चिद्ददासि न । इत्याटन्ती ससूता सा तं नित्यमतापयत् ॥३६॥ प्रसाध्यमानाप्याहारपानवस्त्रैरहर्निशम् । दुरन्ता भोगतृष्णेव भृशं जज्वल तस्य सा ॥३७॥ ततः श्रमण तन्मुषितस्त्यक्त्वैव तद्गृहम्। स विन्ध्यवासिनीं द्रष्टुमागात्सिंहपराक्रमः ॥३८॥ सा च स्वप्ने निराहारस्थितं देवी समाविशत् । उत्तिष्ठ पुत्र तामद्य गच्छ वाराणसीं पुरीम् ॥३९॥ तत्र सर्वमहानेको योऽस्ति न्यग्रोधपादपः । तन्मूलात् खन्यमानाच्च स्वं निधिमवाप्स्यसि ॥४०॥ तन्मध्याल्लप्स्यसे चैकं नभःखण्डमिव च्युतम् । पात्रं गरुडमाणिक्यमयं निस्त्रिंशन्निर्मलम् ॥४१॥ तत्रापिताक्षो द्रक्ष्यस्यन्तः प्रतिमितामिव । सर्वस्य जन्तोः प्राग्जातिं या स्याज्जिज्ञासिता तव ॥४२॥ तेनैव वटवा भार्याया पूर्वजातिं तथाऽऽत्मनः । अवाप्ताथ सुखी तत्र गतसवो निवत्स्यसि ॥४३॥ एवमुक्तश्च देव्या स प्रबुद्धः कृतपारणः । वाराणसीं प्रति प्रायात्प्रातः सिंहपराक्रमः ॥४४॥ गत्वा च तां पुरीं प्राप्य तस्मान्न्यग्रोधमूलतः । खनं निधानं तन्मध्यात् पात्रं मणिमयं महत् ॥४५॥ अपश्यच्चात्र जिज्ञासुः पात्रे पूर्वं च जन्मनि । घोरामृक्षीं स्वभार्यां तामात्मानं च मृगाधिपम् ॥४६॥ पूर्वजातिमहावैरवासनानिच्छल ततः । बुद्ध्वा भार्यारमनोद्रूपं गेहमोहो मुमोष सः ॥४७॥
चतुर्थ लम्बक ४७१
चतुर्थ लम्बक ४७१ उसकी कलहकारिणी नाम की पत्नी यथार्थ नामवाली थी जो शरीर और हृदय दोनों से कुटिल थी ।।३३।। वह धैर्यशाली सिंहविक्रम नौकरी से और जुए से भी प्राप्त सभी धन उस पत्नी को अर्पण कर देता था।।३४।। तीन पुरुषोंकी वह दुष्टा स्त्री एक क्षण भी बिना कलह किये नही रह सकती थी ।।३५।। वह अपने पति से कहा करती थी कि 'तुम बाहर ही खाते-पीते हो मुझे कुछ नहीं देते हो'। इस प्रकार वह उसे प्रतिदिन सन्ताप देती थी।।३६।। भोजन वस्त्र और आभूषण आदि से सदा उसको प्रसन्न रखने की चेष्टा करते रहने पर भी वह ज्वलन्त मोम-गुग्गुल के समान सदा जलती ही रहती थी।।३७।। इस प्रकार उसके दुःख से दुःखी सिंहविक्रम उस घर को छोड़कर विन्ध्यवासिनी देवी का दर्शन करने के लिए चला गया ।।३८।। वहां जाकर उसके निराहार धरना देने पर प्रसन्न देवी ने स्वप्न में उससे कहा—'बेटा ! उठो अभी वाराणसी नगरी को जाओ।।३९।। वहाँ एक बहुत विशाल वटवृक्ष है उसकी जड़ खोदने पर तुम बहुत बड़ा खजाना पाओगे। उसके भीतर तुम मानों आकाश से गिरा हुआ और तलवार-सा चमकता हुआ एक मणिमय पात्र पाओगे। उसके भीतर देखने से सभी प्राणियों के पूर्वजन्म तुम देख सकोगे। उससे तुम अपनी पत्नी तथा अपने पूर्व जन्म की जाति को जानकर सफल मुखी और शोकरहित हो जाओगे' ।।४०-४३।। देवी से इस प्रकार आदिष्ट वह सिंहविक्रम प्रातःकाल उठकर और व्रत का पारण (समाप्ति) करके वाराणसी को गया ।।४४।। वहाँ जाकर उसने वटवृक्ष की जड़ से खजाना प्राप्त किया और वह पात्र भी उसे मिल गया ।।४५।। उस पात्र में उसने अपनी पत्नी को पूर्वजन्म में भीषण भालू (भाड़ा) के रूप में और अपने को सिंह के रूप में देखा। अतः उसने पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण अपना और पत्नी का घोर मतभेद समझकर दुःख और मोह छोड़ दिया ।।४६-४७।।