कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
चतुर्थ लम्बक ४१९
चतुर्थ लम्बक ४१९ पत्नी के ऐसा कहने पर उसके पति ने कहा—'महाराज ! अपने भाई-बन्धुओं के साथ मुझे मार डालना चाहती हुई यह स्त्री झूठ बोलती है। एक वर्ष पर्यन्त मैंने इसे भोजन वस्त्र आदि सब कुछ दिया है। इसके सभी भाई-बन्धु तथा और भी निष्पक्षपात व्यक्ति इस बात के साक्षी हैं ॥१९-२०॥ इस प्रकार उससे निवेदित राजा स्वयं बोला—'इस बात का साक्ष्य रानी के स्वप्न में भगवान् शिवजी ने स्वयं किया है, तो अब और दूसरे साक्षियों की क्या आवश्यकता है। अतः इस दुष्टा स्त्री को बन्धु-बान्धवों सहित पकड़कर कैद कर लेना चाहिए ॥२१॥ राजा के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा—॥२२॥ महाराज ! यह तो ठीक है। फिर भी, नियमानुसार साक्षियों की बातों पर ही यथो- चित दंड दिया जाना चाहिए; क्योंकि जनता स्वप्न की बात को न जानती हुई इस समुचित न्याय पर कैसे विश्वास करेगी ॥२२-२३॥ यह सुनकर और यौगन्धरायण की सम्मति को उचित मानकर राजा ने साक्षियों को बुला कर साक्षी ली। सभी ने उस स्त्री को झूठी बताया ॥२४॥ तब राजा ने उस स्त्री के लिए बन्धुओं के साथ सज्जन पति के द्रोह का अपराध लगाकर पुत्रों और बन्धुओं के साथ देश-निकाले का दंड दिया ॥२५॥ और उसके सज्जन पति का आदर कर दयालु राजा ने उसका दूसरा विवाह करने के लिए स्वयं प्रचुर द्रव्य भी उसे दिया ॥२६॥ सच है क्रूर और कुलटा स्त्रियां दुर्बलापरत्न एवं व्याकुल पतियों को जीते-ही जीते कौवियों के समान नोच खाती हैं ॥२७॥ वृक्ष की छाया के समान स्नेहपूर्ण सुशीला उदारहृदया सुगृहिणी और सन्मार्ग स्थित पत्नी किसी को ही बड़े पुण्यों से प्राप्त होती है ॥२८॥ इस प्रकार कहते हुए राजा के समीप बैठा हुआ कथा कहने में निपुण विदूषक वसन्तक बोला—॥२९॥ महाराज ! एक बात और भी है कि मनुष्य में परस्पर स्नेह या विराग प्रायः पूर्व जन्म के संस्कार से ही होता है ॥३०॥ मैं इस सम्बन्ध में एक कथा की कहानी सुनाता हूँ, उसे सुनो ॥३१॥ निहिश्चय और उसकी कलहकारिणी भार्या की कथा किसी समय वाराणसी नगरी में विषमशील नाम का एक राजा था। उसका सिंह- विक्रम नाम का एक प्यारा सेवक था, जो दण्ड में और जुआ खेलने में अतिनिपुण था ॥३२-३३॥
४०० कथासरित्सागर
४०० कथासरित्सागर तस्याऽभवच्च विकृता वपुषीवाशयेऽप्यरम्। ख्याता कलहकारीति नाम्नान्वर्थेन गेहिनी ॥३३॥ स सम्यक् सततं भूरि राजतो द्यूततस्तथा। प्राप्य प्राप्य धनं धीरः सर्वमेव समर्पयत् ॥३४॥ सा तु तस्य समुत्पन्नपुत्रत्रययुता शठा। तथापि क्षणमप्येकं न तस्थौ कलहं विना ॥३५॥ बहिः पिवसि भुङ्क्षे च नैव किञ्चिद्ददासि न । इत्याटन्ती ससूता सा तं नित्यमतापयत् ॥३६॥ प्रसाध्यमानाप्याहारपानवस्त्रैरहर्निशम् । दुरन्ता भोगतृष्णेव भृशं जज्वल तस्य सा ॥३७॥ ततः श्रमण तन्मुषितस्त्यक्त्वैव तद्गृहम्। स विन्ध्यवासिनीं द्रष्टुमागात्सिंहपराक्रमः ॥३८॥ सा च स्वप्ने निराहारस्थितं देवी समाविशत् । उत्तिष्ठ पुत्र तामद्य गच्छ वाराणसीं पुरीम् ॥३९॥ तत्र सर्वमहानेको योऽस्ति न्यग्रोधपादपः । तन्मूलात् खन्यमानाच्च स्वं निधिमवाप्स्यसि ॥४०॥ तन्मध्याल्लप्स्यसे चैकं नभःखण्डमिव च्युतम् । पात्रं गरुडमाणिक्यमयं निस्त्रिंशन्निर्मलम् ॥४१॥ तत्रापिताक्षो द्रक्ष्यस्यन्तः प्रतिमितामिव । सर्वस्य जन्तोः प्राग्जातिं या स्याज्जिज्ञासिता तव ॥४२॥ तेनैव वटवा भार्याया पूर्वजातिं तथाऽऽत्मनः । अवाप्ताथ सुखी तत्र गतसवो निवत्स्यसि ॥४३॥ एवमुक्तश्च देव्या स प्रबुद्धः कृतपारणः । वाराणसीं प्रति प्रायात्प्रातः सिंहपराक्रमः ॥४४॥ गत्वा च तां पुरीं प्राप्य तस्मान्न्यग्रोधमूलतः । खनं निधानं तन्मध्यात् पात्रं मणिमयं महत् ॥४५॥ अपश्यच्चात्र जिज्ञासुः पात्रे पूर्वं च जन्मनि । घोरामृक्षीं स्वभार्यां तामात्मानं च मृगाधिपम् ॥४६॥ पूर्वजातिमहावैरवासनानिच्छल ततः । बुद्ध्वा भार्यारमनोद्रूपं गेहमोहो मुमोष सः ॥४७॥
चतुर्थ लम्बक ४७१
चतुर्थ लम्बक ४७१ उसकी कलहकारिणी नाम की पत्नी यथार्थ नामवाली थी जो शरीर और हृदय दोनों से कुटिल थी ।।३३।। वह धैर्यशाली सिंहविक्रम नौकरी से और जुए से भी प्राप्त सभी धन उस पत्नी को अर्पण कर देता था।।३४।। तीन पुरुषोंकी वह दुष्टा स्त्री एक क्षण भी बिना कलह किये नही रह सकती थी ।।३५।। वह अपने पति से कहा करती थी कि 'तुम बाहर ही खाते-पीते हो मुझे कुछ नहीं देते हो'। इस प्रकार वह उसे प्रतिदिन सन्ताप देती थी।।३६।। भोजन वस्त्र और आभूषण आदि से सदा उसको प्रसन्न रखने की चेष्टा करते रहने पर भी वह ज्वलन्त मोम-गुग्गुल के समान सदा जलती ही रहती थी।।३७।। इस प्रकार उसके दुःख से दुःखी सिंहविक्रम उस घर को छोड़कर विन्ध्यवासिनी देवी का दर्शन करने के लिए चला गया ।।३८।। वहां जाकर उसके निराहार धरना देने पर प्रसन्न देवी ने स्वप्न में उससे कहा—'बेटा ! उठो अभी वाराणसी नगरी को जाओ।।३९।। वहाँ एक बहुत विशाल वटवृक्ष है उसकी जड़ खोदने पर तुम बहुत बड़ा खजाना पाओगे। उसके भीतर तुम मानों आकाश से गिरा हुआ और तलवार-सा चमकता हुआ एक मणिमय पात्र पाओगे। उसके भीतर देखने से सभी प्राणियों के पूर्वजन्म तुम देख सकोगे। उससे तुम अपनी पत्नी तथा अपने पूर्व जन्म की जाति को जानकर सफल मुखी और शोकरहित हो जाओगे' ।।४०-४३।। देवी से इस प्रकार आदिष्ट वह सिंहविक्रम प्रातःकाल उठकर और व्रत का पारण (समाप्ति) करके वाराणसी को गया ।।४४।। वहाँ जाकर उसने वटवृक्ष की जड़ से खजाना प्राप्त किया और वह पात्र भी उसे मिल गया ।।४५।। उस पात्र में उसने अपनी पत्नी को पूर्वजन्म में भीषण भालू (भाड़ा) के रूप में और अपने को सिंह के रूप में देखा। अतः उसने पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण अपना और पत्नी का घोर मतभेद समझकर दुःख और मोह छोड़ दिया ।।४६-४७।।
४७२ कथासरित्सागर
४७२ कथासरित्सागर अथ बह्वी परिप्राप्तामन्यत्र पात्रभावतः। प्राग्जन्मविप्रजानीयाः परिगृह्यैव रूपकाः ॥४८॥ तुल्यां अत्रान्तरे गित्वा परिणीय विधिन्य मः। भार्यां द्वितीयां गृहशोभाम्नीं गिल्पगत्रम् ॥४९॥ कृत्वा शृङ्गारिणं च तां ग ग्रामकभागिनीम्। निधानप्राप्तिजन्मित्तस्मन्धी नवबधूरग ॥५०॥ इत्थं दातव्ययोरीह भवन्ति भुवन नृणाम्। प्रारम्भावन्ध्यतायात्दैवम्महा महीपत ॥५१॥ इत्यापद्य कथां चित्रां बह्वराजो वसन्तकम्। भूय सुभोग सहितो दद्या कामबशता ॥५२॥ एव दिनेषु गच्छत्सु राज्ञस्तस्य न्विनिशम्। भतृम्पत्य लसद्गर्भेदीवश्चन्द्रनुददान ॥५३॥ मन्त्रिपुत्राणामुत्पत्तिः मन्त्रिणामुदपद्यन्त सर्वेषां शुभलक्षणाः। क्रमेण तनयास्तत्र भाविबस्त्याणसूचकाः ॥५४॥ प्रथम मन्त्रिमुल्यस्य जायते स्म विलास्मजः। योगन्धरायनम्यव मम्मूर्तिरिति श्रुतः ॥५५॥ ततो रुमन्वतॊ जज्ञे सुतो हरिदिलाभिधः। वसन्तकस्याप्युत्पेद तनयोज्य तपन्तकः ॥५६॥ ततो नित्येोदिताख्यास्य प्रतीहाराधिकारिणः। इत्यकापरसज्ञस्य पुत्रोऽजायत गोमुखः ॥५७॥ वत्सराजसुतस्येह भाविनश्चक्रवर्त्तिनः। मन्त्रिणोऽमी भविष्यन्ति पैरिवंदाबमवित् ॥५८॥ इति तेषु च जातेषु वर्त्तमाने महोत्सवे। तत्राशरीरा नभसो निस्ससार सरस्वती ॥५९॥ दिवसेष्वथ कातेषु वत्सराजस्य तस्य सा। देवी मासपदतामूदागन्नप्रमवोदया ॥६०॥ नरवाहनदत्तजन्म जध्यास्त सा च तस्मिन्न पुण्योभि परिष्कृतम्। जातवासगृहं साकल्यमीगुप्तगुबालकम् ॥६१॥
चतुर्थ लम्बक ४०५
चतुर्थ लम्बक ४०५ उसके पश्चात् उसने पात्र के प्रभाव से अनेक कन्याओं के पूर्वजन्म को देखा और पूर्वजन्म की भिन्न-भिन्न जातीय उन कन्याओं को छोड़कर अपने पूर्व जाति के समान सिंह जाति की एक कन्या से उसने विवाह किया। उस स्त्री का नाम सिंहिनी था ॥४८ ४९॥ उस कलहकारिणी स्त्री को केवल भोजन मात्र देकर, खजाना मिलने से सुखी सिंहविक्रम नवीन वधू के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥५०॥ इस कथा को सुनाकर वसन्तक ने कहा—महाराज ! इस प्रकार पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण भी स्त्री पुत्र मित्र आदि इस जन्म में स्नेही या विरोधी हो जाते हैं ॥५१॥ वत्सराज उदयन वसन्तक के मुख से इस कथा को सुनकर महारानी के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥५२॥ इस प्रकार गर्भवती रानी के मुखचन्द्र को निरन्तर देखते हुए राजा के दिन व्यतीत होने लगे ॥५३॥ मन्त्रियों के पुत्रों की उत्पत्ति इन्हीं दिनों राजा के सभी मन्त्रियों के यहाँ शुभ लक्षणोंवाले पुत्र उत्पन्न हुए, जो भविष्य के लिए कल्याण-प्राप्ति की सूचना देनेवाले थे ॥५४॥ सबसे पहले यौगन्धरायण का मरुभूति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५५॥ तब सेनापति रुमण्वान् का हरिशिख नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और नर्मसचिव वसन्तक का भी तपन्तक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५६॥ तब गिरिपोषित नाम के द्वारपालाध्यक्ष के जिसका दूसरा नाम 'इत्यक' था गोमुख नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५७॥ ये सभी बालक विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती एवं बैरियों के वंश का नाश करनेवाले वत्सराज के कुमार के भावी मन्त्री होंगे ॥५८॥ इन बालकों के उत्पन्न होने पर जब महोत्सव मनाये जा रहे थे तब उस समय वहाँ पर आकाश से देववाणी हुई—॥५९॥ 'कुछ ही और दिनों के व्यतीत होने पर वत्सराज की रानी वासवदत्ता का प्रसवकाल भी सन्निकट होगा' ॥६०॥ नरवाहनदत्त का जन्म तब वह रानी आक और शमी के पत्तों से ढँकी हुई खिड़कियोंवाले रत्न-दीपकों की किरणों और शस्त्रास्त्रों की चमक-दमक से आलोकित एवं पुत्रवती सुहागिनों से भरे हुए प्रसूति गृह में रहने लगी ॥६१॥ ९
४७४ कथासरित्सागर
४७४ कथासरित्सागर
रत्नदीपप्रभासङ्गमक्रूरविविधायुधैः । गर्भरक्षाक्षमं तेजो ज्वलद्द्भिरिवावृतम् ॥६२॥ मन्त्रिभिस्तन्त्रितानमन्त्रतन्त्रादिरक्षितम् । धातृ मातृगणस्येव दुर्गं दुरितदुजयम् ॥६३॥ तत्रासूत च सा काले कुमारं कान्तदर्शनम् । क्षीरेन्दुमित्रं निर्गच्छच्छामृतमयमद्युतिम् ॥६४॥ येन जातेन न परं मन्दिरं तत्प्रकाशितम् । यावद्धृदयमप्यस्या मातुर्निश्शोकतमासम् ॥६५॥ ततः प्रमोदे प्रसरत्यन्तःपुरवासिनाम् । वत्सेशः सुतजन्मैतच्छुश्रावाभ्यान्तराज्जनात् ॥६६॥ तस्मै स राज्यमपि यत्प्रीतं प्रियनिवेदने । न ददौ तदनौचित्यभयेन न तु तृष्णया ॥६७॥ एत्य चान्तःपुरं सद्यो बढोत्सुक्येन चेतसा । चिरात्फलितसङ्कल्पः स ददर्श सुतं नृपः ॥६८॥ रक्तायताधरदलं पलोर्वाचारुकेसरम् । मुखं दधानं साम्राज्यलक्ष्मीलीलाम्बुजोपमम् ॥६९॥ प्रायेणान्यनृपश्रोभिर्भीत्येव निजलाञ्छनैः । उज्झितरक्षितं मूर्द्धो पादयोश्छत्रचामरैः ॥७०॥ ततो हर्षभरापूर्पोत्नोत्फुल्लया दृशा । मात्रायाः स्रवतीवास्मिंस्तत्स्नेहमहीपती ॥७१॥ नन्दत्स्वपि च योगन्धरायणादिषु मन्त्रिषु । गगनादुच्चचारैष काले तस्मिन् सरस्वती ॥७२॥ कामदेवावतारोऽयं राजन् जातस्तवात्मजः । नरवाहनदत्तश्च जामीहोनेमिहाख्यया ॥७३॥ अनेन भवितव्यं च दिव्यं कल्पमतन्द्रिणा । सर्वविद्याधरेन्द्रणामधिराज्यचक्रवर्तिना ॥७४॥ इत्युक्त्वा विरते वाचा तत्क्षणं नभसः क्रमात् । पुष्पवर्षनिपतितं प्रसूतं दुन्दुभिस्वने ॥७५॥ ततः महोत्सवारम्भजनिताभ्यधिकादरम् । स राजा सुतरां हृष्टश्चकार परमुत्सवम् ॥७६॥
चतुर्थ लम्बक ४०५
चतुर्थ लम्बक ४०५ वह प्रसूति-गृह मन्त्रियों द्वारा अनेक मन्त्र-तन्त्रों से सुरक्षित किया गया मानों मृगों की रक्षा के लिए और कष्टों के लिए दुर्गम दुर्ग बन गया हो। उस प्रसूति-गृह में रानी ने समय आने पर सुन्दर और दर्शनीय पुत्र को इस प्रकार जन्म दिया जिस प्रकार आकाश स्वच्छ और अमृतमय चन्द्रमा को जन्म देता है ॥६२-६४॥ इस कुमार के जन्म लेने से केवल प्रसूति-गृह ही आलोकित नहीं हुआ प्रत्युत माता का हृदय-गह्वर भी शोक रहित हो प्रसन्नता से आलोकित हो उठा॥६५॥ पुत्र-जन्म से सारे रनिवास में प्रसन्नता की लहर उठ गई और रनिवास के व्यक्ति से ही राजा उदयन ने यह शुभ समाचार सुना ॥६६॥ पुत्र-जन्म का समाचार सुनानेवाले दूत को प्रसन्न राजा ने अपना राज्य साकल्यवत नहीं दिया यह नहीं प्रत्युत अनुचित समझकर ही नहीं दिया ॥६७॥ इस प्रकार, चिरकाल के पश्चात् सफल मनोरथवाले महाराज ने अत्यन्त उत्सुक हृदय से प्रसूति-गृह में जाकर बालक को देखा ॥६८॥ उस बालक का मुख लाल और चौड़े अधरोंवाला ऊन के रेशों के समान सिर के कोमल बालोंवाला और साम्राज्य-लक्ष्मी के लीला-कमल के समान शोभित हो रहा था ॥६९॥ अन्य राजाओं की राज्य-लक्ष्मी ने मानों भय से उसके कोमल चरणों को पहले से ही छत्र और चामर से चिह्नित कर दिया था ॥७० ॥ पुत्र का मुख देखने पर हर्ष की अधिकता से फैली हुई और हर्षाश्रु-धारा बहाती हुई आँखों से प्रतीत होता था कि राजा की पुत्र-स्नेह-वाष्प मानों बह निकली ॥७१॥ उस अवसर पर राजा के परम हितैषी यौगन्धरायण आदि भी अति प्रसन्न हो रहे थे। उसी समय आकाश से इस प्रकार की वाणी हुई—'राजन् तुम्हारा यह पुत्र कामदेव का अवतार है, इसका नाम नरवाहनदत्त होगा। यह वीर एक दिव्य युग तक विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा रहेगा ॥७२-७४॥ ऐसा कहकर वाणी बन्द हो गई। आकाश से पुष्पवर्षा हुई और वाद्यनादों के संगीत फैलने लगे ॥७५॥ देवताओं द्वारा मनाये गये उत्सव से अत्यन्त उत्साहित और प्रसन्न होकर राजा ने अपने विस्तृत राज्य में व्यापक पुत्रजन्म-महोत्सव मनाया ॥७६॥
२४६ कथासरित्सागर
२४६ कथासरित्सागर बभ्रमुस्तूर्यनिर्नादा नभस्तो मन्दिरोद्गताः । विद्याधरेभ्यः सर्वेभ्यो राजनभय शंसितुम् ॥७७॥ सौधाग्रेष्वनिलोद्धूताः शोणरागाः स्वकान्तिभिः । पताका अपि सिन्दूरमयोममकिरन्निव ॥७८॥ भुवि साङ्गस्मरोत्पत्तितोषान्निव सुराङ्गनाः । समागताः प्रतिपदं ननर्तुर्वारयोषितः ॥७९॥ अदृश्यत च सर्वा सा समानविभवा पुरी । राज्ञो महोत्सवात् प्राप्तैर्नववस्त्रविभूषणैः ॥८०॥ तदा हर्षाभ्युपे तस्मिन्खर्वत्यर्थ्यनुजीविषु । कोषादूतं न तन्मध्यो दधौ कश्चन रिक्तताम् ॥८१॥ मङ्गस्यपूर्वा स्वाचारदक्षिणा नर्त्तितापरा । मत्स्रामृतोत्तरास्तैस्तैः सुरक्ष्मिभिरधिष्ठिता ॥८२॥ प्रसृतातोद्यनिर्ह्रादा साक्षाद्दिव इवाखिला । समन्तादाययश्चात्र सामन्तान्तःपुराङ्गनाः ॥८३॥ चेष्टा नृत्तमयी तत्र पूर्णपात्रमयः वचः । व्यवहारो महात्यागमयस्तूर्यमयो ध्वनिः ॥८४॥ चीनपिष्टमयोमोदकचारुचक्रमयी च भूः । मानन्दमयी सर्वस्यामपि तस्यामभूत्पुरि ॥८५॥ एव महोत्सवास्तत्र भूरिवासर्वर्धितः । निर्वर्त्तते स्म न सम पूर्णे पौरमनोरथः ॥८६॥ सोऽपि व्रजत्सु दिवसेष्वथ राजपुत्रो वृद्धिं धित्युः प्रतिपदिन्दुरिवा जगाम । पित्रा यथाविधिनिवेदितदिव्यवाणी निर्दिष्टपूर्वनरवाहनदत्तनाम्ना ॥८७॥ यानि स्फुर मसृणमुग्धमुखप्रभाणि द्वित्राणि यानि च लघुकलनाद्दुराणि । तानि स्मरन्ति ददतो वदतश्च तस्य दृष्ट्वा निशम्य च पदानि पिता तुतोष ॥८८॥ अथ तस्म मन्त्रिवरा स्वसुतानानीय राजपुत्राय । शिशवे शिशून् महीपतिहृदयानन्दान् समर्पयामासुः ॥८९॥
चतुर्थ लम्बक ४७७
चतुर्थ लम्बक ४७७ वाद्यों के शब्द घरों से निकलकर आकाश में फैलने लगे मानों समस्त विद्याधरों को नवीन राजा के जन्म लेने की सूचना दे रहे हों॥७७॥ ऊँचे-ऊँचे महलों पर फहराती हुई सात रंग की पताकाएँ मानां प्रसन्नता से आपस में गुलाल उड़ा रही हों—ऐसी प्रतीत होती थी॥७८॥ घर-घर में प्रसन्नता से वेश्याओं के नाच-गान चल रहे थे। ऐसा लगता था मानों स्वर्ग की सुन्दरियाँ प्रसन्नता से भूमि पर उतर आई हों॥७९॥ उत्सव के उपलक्ष में राजा द्वारा बाँटे गये एक समान वस्त्रों और आभूषणों से सारी नगरी एक समान वैभवशाली मालूम होती थी॥८०॥ जब राजा ने उत्सव के उपलक्ष में अपने सेवकों को धन लुटाना प्रारंभ किया तब खजाने के अतिरिक्त और कोई भी खाली न रहा॥८१॥ पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी मंगलगान करती हुई रीति-रिवाजों को जाननेवाली नाचती गाती और विविध प्रकार के उपहार हाथों में ली हुई अपने लड़कों के साथ-साथ रनिवास में एकत्र हुईं, तो ऐसा लगता था मानों स्वर्ग की स्त्रियाँ प्रसन्नता से राजभवन में उतर आई हों॥८२-८३॥ उस समय सभी की चेष्टाएँ नृत्यमयी सभी के वचन पूर्णपात्रमय सभी का व्यवहार त्यागमय और सभी का स्वर वाद्यमय हो रहा था॥८४॥ आनन्दमयी उस नगरी में सभी जन अबीर-गुलालमय और सारी भूमि रुचियों से भरी हुई थी॥८५॥ इस प्रकार अनेक दिनों तक चलता हुआ यह उत्सव नागरिकों के मनोरथ के समान पूर्ण हुआ॥८६॥ आकाशवाणी के आज्ञानुसार पिता द्वारा दिये गये नरवाहनदत्त नामवाला वह राजकुमार कुछ दिनों में ही प्रतिपदा के चन्द्रमा के समान क्रमशः बड़ा हुआ॥८७॥ चमकते चिकने और सुन्दर गलों की कान्तिवाले दो-चार निकलते हुए आगे के सुन्दर दाँतों- वाले उस राजकुमार के मुँह से निकलते हुए कुछ अस्पष्ट और तुतले बोलों तथा लीलापूर्वक दो-चार डग भरने की उसकी चालों को देखकर उसका पिता मन ही मन अत्यन्त प्रसन्नता अनुभव करता था॥८८॥ इस प्रकार, उसके कुछ बड़े होने पर सभी मन्त्रियों ने हृदयों को आनन्द देनेवाले अपने- अपने बालकों को सादर खेलने के लिए राजकुमार को सौंप दिया॥८९॥
४०८ कथासरित्सागर
४०८ कथासरित्सागर यौगन्धरायणः प्राङ्मरुभूतिं हरिशिखं रुमण्वानथ । गोमुखमित्येकनामा तपन्तकाख्यं वसन्तकश्च सुतम् ॥१९०॥ शान्तिकरोऽपि पुरोधा भ्रातृसुतं शान्तिसोममपरं च। वैश्वानरमर्पितवान्पिङ्गलिकापुत्रकौ यमजौ ॥१९१॥ तस्मिन्क्षणे च नभसो निपपात दिव्या नान्दीनिनादसुभगा सुरपुष्पवृष्टिः । राजा ननन्द च तथा महिषीसमेत- सत्कृत्य तत्र सचिवात्मजमण्डल तद् ॥१९२॥ बाल्योऽपि तैरभिमतैश्च मन्त्रिपुत्रै पञ्चभिस्तदेकनिरतैश्च स राजपुत्रः । युक्तः सदैव नरवाहनदत्त आसी- द्युक्तो गुणैरिव महोदयहेतुभूतैः ॥१९३॥ तं च क्रीडाञ्चलितललिताम्यक्तनर्माभिलापं यान्तं प्रीतिप्रवणमनसामङ्कतोऽङ्कं नृपाणाम्। पुत्रं स्मेराननसरसिज सादरं पश्यतस्ते सदानन्दाः किमपि दिवसा वत्सराजस्य जग्मुः ॥१९४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे नरवाहनदत्तजनन लम्बके तृतीयस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं नरवाहनदत्तजनन लम्बकश्चतुर्थः।
चतुर्थ लम्बक ४७९
चतुर्थ लम्बक ४७९ सबसे पहले यौगन्धरायण ने अपने पुत्र मरुभूति का इसी प्रकार क्रमशः रुमण्वान् ने हरि- शिख को इत्यक (नित्यादित) ने गोमुख का वसन्तक ने तपन्तक का और पुरोहित शान्तिस्वर ने अपने दोनों जुड़वाँ भतीजे शान्तिसोम और वैश्वानर नामक पिंगलिका के पुत्रों को लाकर समर्पित कर दिया ॥९०-९१॥ उस समय सुन्दर मंगलवाद्यों के साथ आकाश से दिव्य पुष्पों की वृष्टि हुई और राजा तथा रानी नवीन मन्त्रिमण्डल का सत्कार करके अत्यन्त आनन्दित हुए ॥९२॥ बाल्यकाल में उन छह अनन्य प्रेमी मन्त्रिपुत्रों के साथ युक्त वह राजकुमार नरवाहनदत्त अभ्युदय के कारणभूत गुणों के समान शोभित हो रहा था ॥९३॥ अपनी विविध और सुन्दर बाल-क्रीड़ाओं से प्रेमपूर्ण हृदयवाले राजाओं की एक गोद से दूसरी गोद में जाते हुए, एवं मुस्कुराते हुए उस राजकुमार के मुखकमल को देखते हुए वत्सराज के दिन सानन्दपूर्वक व्यतीत होने लगे ॥९४॥ तृतीय तरंग समाप्त महाकवि सोमदेवभट्ट-रचित कथासरित्सागर का नरवाहनदत्त-जनन नामक चतुर्थ लम्बक समाप्त
चतुर्दारिका नाम पञ्चमो लम्बकः
चतुर्दारिका नाम पञ्चमो लम्बकः इद गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्वराम्बोलना त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति य विगतविघ्नलब्धद्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन त ॥ प्रथमस्तरङ्गः मदघूर्णितवक्त्रोत्थै सिन्दूरस्फुरयन् महीम्। हेरम्ब पातु वो विघ्नान् स्वतेजोभिर्बहूत्क्षिपन् ॥१॥ एवं स देवीसहितस्तस्थौ वत्सेश्वरस्तदा। नरवाहनदत्तं तमेकपुत्रं विवर्धयन् ॥२॥ तत्राशाकातरं तं च दृष्ट्वा राजानमेकदा। यौगन्धरायणो मन्त्री विजनस्थितमब्रवीत् ॥३॥ राजन् राजपुत्रस्य कृते चिन्ता त्वयाधुना। नरवाहनदत्तस्य विधातव्या कदाचन ॥४॥ असौ भगवता भावी भर्गेण हि भवद्गृहे। सर्वविद्याधराधीशचक्रवर्ती विनिर्मितः ॥५॥ विद्याप्रभावावेक्षञ्च बुद्ध्वा विद्याधराधिपाः। गताः पापेच्छया क्षोभं हन्तुंरमहिप्सवः ॥६॥ तद्विदित्वा च देवेन रक्षार्थं शशिमौलिना। एतस्य स्तम्भको नाम गणेशः स्थापितो निजः ॥७॥ स च तिष्ठत्यदृश्यः सम् रक्षतेतं सुतं तव। एतच्च क्षिप्रमभ्येत्य नारदो मे न्यवेदयत् ॥८॥ वत्सराजसभायां शशिनदैवस्यावगमनकथा इति तस्मिन् वदत्येव मन्त्रिणि व्योममध्यतः। किरीटी कुण्डली दिव्यः खड्गी चावातरत्पुमान् ॥९॥
चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक
चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक [मंगलश्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें ।] प्रथम तरंग वत्सराज की सभा में शक्तिवेग का आगमन मद-मृषित मुख से छिटकते हुए सिन्दूर से सुशोभित मानों अपने तेज से विघ्नों को नष्ट करते हुए और सिन्दूरी आभा से पृथ्वी को रंजित करते हुए गजानन आपकी रक्षा करें।।१।। इस प्रकार उस एकमात्र कुमार नरवाहनदत्त का पालन-पोषण करता हुआ वत्सराज उदयन महारानी वासवदत्ता के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।।२।। एकबार पुत्र की रक्षा के लिए व्याकुल राजा को देखकर मन्त्री यौगन्धरायण ने एकान्त में राजा से कहा ।।३।। 'राजन्! तुम्हें राजकुमार नरवाहनदत्त के लिए अब किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।।४।। इस राजकुमार का भगवान् शिव ने होनेवाले विद्याधरों के चक्रवर्ती के रूप में तुम्हारे घर में उत्पन्न किया है।।५।। विद्याधरों के राजा अपनी विद्याओं के प्रभाव से इस बात को जानकर ईर्ष्या (जलन) के कारण अत्यन्त क्षुब्ध हो गये हैं ।।६।। इस बात को जानकर शिवजी ने उसकी रक्षा के लिए अपने स्तम्भक नामक गणों के सरदार को नियुक्त किया है।।७।। वह हमेशा इस तुम्हारे बालक की रक्षा करता हुआ अप्रत्यक्ष रूप से यहाँ निवास करता है। यह बात नारदमुनि ने शीघ्र ही आकर मुझसे कही है ॥८॥ जब मन्त्री यौगन्धरायण यह बात राजा से कह रहा था कि उसी समय किरीट और कुंडल धारण कर और हाथ में खड्ग लिये हुए एक दिव्य पुरुष आकाश से उतरा ।।९।। ९१
४८२ कथासरित्सागर
४८२ कथासरित्सागर
प्रणतं कल्पितातिथ्यं क्रमाद् वत्सेश्वरोऽथ तम्। कस्त्वं किमिह ते कार्यमित्यपृच्छत् सकौतुकम् ॥११०॥ सोऽप्यवादीदहं मर्त्यो भूत्वा विद्याधराधिपः। सम्पन्नः शक्तिवेगाख्यः प्रभूताश्च ममारयः ॥१११॥ सोऽहं प्रभावाद् विज्ञाय भाव्यस्मच्चक्रवर्तिनम्। भवतस्तनयं द्रष्टुमागतोऽस्म्यवनीपते ॥११२॥ इत्युक्तवन्तं तं दृष्ट्वा भाव्यञ्चक्रवर्तिनम्। प्रीतः वत्सेश्वरो हृष्टः पुनः पप्रच्छ विस्मयात् ॥११३॥ विद्याधरत्वं प्राप्येत कथं कीदृग्विधं च तत्। त्वया च सत्कथं प्राप्तमेतत् कथय नः सखे ! ॥११४॥ तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञः स तदा विनयानतः। विद्याधरः शक्तिवेगस्तमेवं प्रत्यबोधत ॥११५॥ राजन्निहैव पूर्वे वा जन्मन्याराध्य शङ्करम्। विद्याधरपदं धीरा लभन्ते तदनुग्रहात् ॥११६॥ तच्चानेकविधं विद्याखड्गमालादिसाधनम्। मया च तद्यथा प्राप्तं वक्ष्यामि तथा शृणु ॥११७॥ एवमुक्त्वा स्वसम्बद्धां शक्तिवेगः स सन्निधौ। देव्या वासवदत्तायाः कथामाख्यातवानिमाम् ॥११८॥
कनकपुरी शक्तिवेगयोः कथा
अभवद् वर्धमानाख्यं पुरं भूचक्रभूषणम्। नाम्ना परोपकारीति पुरा राजा परन्तपः ॥११९॥ तस्याप्रतिमरूपाभून्महिषी कनकप्रभा। त्रिदिवादागतेवेव सा तु निर्मुक्तशापना ॥१२०॥ तस्यां तस्य च कालेन श्यामाजायत कन्यका। रूपेणोपेक्ष्यान्येव या रूप्या धातृव निर्मिता ॥१२१॥ अवर्धत शनैः सा च शारदाभ्रगता यथा। पित्रा कनकलेखेति यथार्थाख्या कृतात्मजा ॥१२२॥ अथ सा यौवनं प्राप्ता दृष्ट्वा राजा स विस्मितः। विस्मेरो रागिणां देव्या जगाद कनकप्रभाम् ॥१२३॥
पंचम लम्बक ४८१
पंचम लम्बक ४८१ प्रणाम करके आतिथ्य सत्कार किये गये उस पुरुष को वत्सराज उदयन ने उत्सुकता से पूछा कि 'तुम कौन हो ? और 'तुम्हारा यहाँ क्या कार्य है। अर्थात् किसलिए आय हो' ॥११ ॥ उसने कहा मैं मनुष्य होकर भी शक्तिवेग नाम से विद्याधरों का राजा बन गया। अतः मेरे बहुत शत्रु हैं ॥१२॥ इसलिए हे राजन् ! मैं अपनी विद्या के प्रभाव से यह जानकर कि तुम्हारा पुत्र भविष्य में हम विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा इसलिए उसे देखने के लिए आया हूँ ॥१२॥ ऐसा कहकर भावी विद्याधर चक्रवर्ती का दर्शन कर प्रसन्न शक्तिवेग ने राजा से आश्चर्य के साथ पूछा—॥१३॥ 'मित्र ! विद्याधरत्व कैसे प्राप्त होता है। वह कैसा होता है और तुमने विद्याधरत्व को कैसे प्राप्त किया'। यह सब मुझसे कहो ॥१४॥ राजा की बातें सुनकर विनय से नम्र शक्तिवेग नामक विद्याधर बोला ॥१५॥ 'राजन् ! इस जन्म में या अगले जन्म में शिवजी की आराधना करने पर धैर्यशाली व्यक्ति उनकी कृपा से विद्याधर-पद को प्राप्त होता है ॥१६॥ वह विद्याधर-पद, अनेक प्रकार का होता है जो विद्या खड्ग या माला आदि की सिद्धि द्वारा प्राप्त होता है। मैंने उसे जिस प्रकार पाया कहता हूँ सुनो ॥१७॥ ऐसा कहकर शक्तिवेग ने महारानी वासवदत्ता के समक्ष राजा से अपनी कथा कहनी प्रारम्भ की ॥१८॥ कनकपुरी और शक्तिवेग की कथा प्राचीन काल में वर्धमान¹ नाम का नगर था जो भूतल का भूषण था। उस नगर में परोपकारी नामक वीर राजा हुआ ॥१९॥ उस उन्नतिशील राजा की महारानी मेघ की रानी विद्युत् के समान 'कनकप्रभा' नाम की थी। वह चंचलता से रहित अर्थात् अति गंभीर थी ॥२० ॥ कुछ समय के पश्चात् उस राजा को रानी कनकप्रभा के गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई, जो विधाता ने मानों लक्ष्मी के रूप का अभिमान नष्ट करने के लिए निर्मित की थी ॥२१॥ लोकों की आँखों के लिए चाँदनी के समान वह राजकुमारी धीरे-धीरे बढ़ने लगी। पिता ने माता के ही नाम पर उसका नाम कनकरेखा रख दिया ॥२२॥ कन्या के युवती होने पर एक बार राजा ने एकान्त में आई हुई महारानी कनकप्रभा से कहा—॥२३॥ १ बंगाल का प्रसिद्ध वर्द्धमान (वर्धमान) नगर।
४८४ कथासरित्सागर
४८४ कथासरित्सागर वर्धमाना सहैवैतत्समानोद्वाहचिन्तया। एषा कनकरेखा मे हृदयं देवि बाधते ॥२४॥ स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतिवत् कुलकन्यका। उद्वेजिनी परस्यापि श्रूयमाणव कणयो ॥२५॥ विद्येव कन्यका मोहादपात्रे प्रतिपादिता। यशसे न न धर्माय जातानुशयाय तु ॥२६॥ सत्कस्मै दीयतां ह्येषा मया नृपतये सुता। कोऽस्याः समः स्यादिति मे चिन्ता देवि १ गरीयसी ॥२७॥ तच्छ्रुत्वा सा विहस्यैव बभाषे कनकप्रभा। स्वमेवमात्थ कन्या तु नेच्छत्युद्वाहमेव सा ॥२८॥ अद्यैव मर्मणा सा हि कृतकृत्रिमपुत्रका। वत्स कदा विवाहं ते द्रक्ष्यामीत्युदिता मया ॥२९॥ सा तच्छ्रुत्वैव साक्षेपमथ मां प्रत्यभाषत। मा मवमम्ब दातव्या नैव कस्मैचिदप्यहम् ॥३०॥ मद्वियोगो न भविता कन्यावास्मि सुशोभना। अन्यथा मां मृतां विद्धि किञ्चिदस्त्यत्र कारणम् ॥३१॥ एवं तयोक्ता त्वत्पार्श्वं राजन् विग्नाहमागता । तन्निषिद्धविवाहायाः का वरस्य विचारणा ॥३२॥ इति राज्ञीमुखाच्छ्रुत्वा समुद्विग्नोऽथ स नृपतिः। कन्याकान्तःपुरं गत्वा तामभाषीत्तदा सुताम् ॥३३॥ प्रार्थयन्तेऽपि तपसा यं सुरासुरकन्यकाः। प्रसूंस्तथा कथं वत्से स निषिद्धः किल त्वया ॥३४॥ एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा भूतलन्यस्तलोचना। तदा कनकरेखा सा निजगाद नृपात्मजा ॥३५॥ तात नैवेप्सितस्तावद् विवाहो मम साम्प्रतम्। ततातस्यापि किं तन कार्यं यश्चात्र वो ग्रहः ॥३६॥ इत्युक्तः स तया राजा पृष्ट्वा धीमतां वरः। परोपकारी च पुनरेवमेतामभाषत ॥३७॥ १ व्याकुला।
पंचम लम्बक ४८९
पंचम लम्बक ४८९ 'यह कन्या कनकरेखा विवाह की चिन्ता के साथ समान रूप से बढ़ती हुई मेरे हृदय को व्यथित कर रही है॥२४॥ समुचित स्थान से भ्रष्ट गीति (गान) के समान कन्या पराये व्यक्ति के भी कानों में उद्वेग उत्पन्न करती है॥२५॥ अज्ञान से कुपात्र में दी हुई विद्या के समान कुपात्र को दी हुई कन्या न यश के लिए होती है, न धर्म के लिए ही प्रत्युत पश्चात्ताप के लिए होती है॥२६॥ अतः मैं इस कन्या को किस राजा के लिए दूँ। इसके योग्य वर कौन होगा यह मेरे हृदय में भारी चिन्ता हो रही है' ॥२७॥ यह सुनकर महारानी कनकप्रभा हँसकर राजा से बोली कि 'आप तो इस प्रकार चिन्तित हैं किन्तु वह कनकरेखा तो विवाह ही नहीं करना चाहती' ॥२८॥ 'आज ही खेल में गुड़िया बनाती हुई उससे मैंने कहा कि 'मैं तुम्हारा विवाह कब देखूँगी' ॥२९॥ मेरे ऐसा प्रश्न करते ही उसने रोष के साथ मुझसे कहा 'माँ ऐसा मत कहो ऐसा मत कहो मुझे किसी के लिए भी न दो॥३०॥ तुम्हारे साथ मेरा वियोग न होगा। मैं अविवाहित ही ठीक हूँ। यदि तुमने मेरा विवाह किया तो मुझे मरी ही समझो। इसमें कुछ कारण है'॥३१॥ यह सुनकर व्याकुल मैं तुम्हारे पास आई हूँ। विवाह न करनेवाली कन्या के लिए वर का शोधना ही व्यर्थ है॥३२॥ रानी के मुख से ऐसा सुनकर घबराया हुआ राजा कन्या के भवन में जाकर उससे बोला—'बेटी जिस पति की प्राप्ति के लिए देवताओं और दैत्यों की कन्याएँ तपस्या करके भगवान् से प्रार्थना करती हैं उसे तू ने मना कर दिया ॥३३ ३४॥ पिता की बातें सुनकर भूमि पर दृष्टि गड़ाए हुई राजकुमारी कनकरेखा बोली—॥३५॥ 'पिताजी मुझे विवाह की चाह नहीं है तो इसमें आपको इतना आग्रह क्यों है ? ॥३६॥ पुत्री के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् और परोपकारी राजा इस तरह कहने लगा—बेटी कन्यादान के बिना गृहस्थ की फलप्राप्ति के लिए दूसरा कौनसा उपाय है ? ॥३७॥
४८४ कथासरित्सागर
४८४ कथासरित्सागर वर्धमाना सहैवैतत् समानोद्वाहचिन्तया। एषा कनकरेखा मे हृदयं देवि बाधते ॥२४॥ स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतिवत् कुलकन्यका। उद्वेगिनी परस्यापि श्रूयमाणैव कर्णयोः ॥२५॥ विद्येव कन्यका मोहादपात्रे प्रतिपादिता। यशसे न न धर्माय जातानुशयाय तु ॥२६॥ तत्कस्मै दीयते ह्येषा मया नृपतम सुता। योऽस्याः सम स्यादिति मे चिन्ता देवि ! गरीयसी ॥२७॥ तच्छ्रुत्वा सा विहस्यैव बभाषे कनकप्रभा। त्वमेवमात्थ कन्या तु नेच्छत्युद्वाहमेव सा ॥२८॥ अद्यैव नर्मणा सा हि कृतकृत्रिमपुत्रका। वत्से कदा विवाहं ते द्रक्ष्यामीत्युदिता मया ॥२९॥ सा तच्छ्रुत्वैव साक्षेपमेव मां प्रत्यबोधत। मा मैवमम्ब दातव्या नैव कस्मैचिदप्यहम् ॥३०॥ मद्वियोगो न चादिष्टः कस्यचास्मि सुशोभना। अन्यथा मां मृतां विद्धि किञ्चिदस्त्यत्र कारणम् ॥३१॥ एव तयोक्ता त्वत्पार्श्वं राजन् विग्नाहमागता । सन्निषिद्धविवाहायाः का वरस्य विचारणा ॥३२॥ इति राज्ञीमुखाच्छ्रुत्वा समुद्भ्रान्तः स नृपतिः। कन्यकान्तः पुरं गत्वा तामवादीत्तदा सुताम् ॥३३॥ प्रार्थ्यन्तेऽपि तपसा यं सुरासुरकन्यकाः। भर्तृकामः कथं वत्से स निषिद्धः किल त्वया ॥३४॥ एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा भूतलन्यस्तलोचना। तदा कनकरेखा सा निजगाद नृपात्मजा ॥३५॥ तात नैवेप्सितस्तावद् विवाहो मम साम्प्रतम्। तत्तादृश्यापि किं तेन कार्यं कश्चात्र वो ग्रहः ॥३६॥ इत्युक्तः स तया राजा दुहित्रा धीमतां वरः। परोपकारी स पुनरेवमेतामभाषत ॥३७॥
१ प्याश्रुत्वा।
पंचम लम्बक ४८९
पंचम लम्बक ४८९ "यह कन्या कनकरेखा विवाह की चिन्ता के साथ समान रूप से बढ़ती हुई मेरे हृदय को व्यथित कर रही है॥२४॥ समुचित स्थान से भ्रष्ट मोति(मान) के समान कन्या पराये व्यक्ति के भी कानों में उद्वेग उत्पन्न करती है॥२५॥ अज्ञान से कुपात्र में दी हुई विद्या के समान कुपात्र को दी हुई कन्या न यश के लिए होती है, न धर्म के लिए ही, प्रत्युत पश्चात्ताप के लिए होती है॥२६॥ अतः मैं इस कन्या को किस राजा के लिए दूँ। इसके योग्य वर कौन होगा यह मेरे हृदय में भारी चिन्ता हो रही है" ॥२७॥ यह सुनकर महारानी कनकप्रभा हँसकर राजा से बोली कि 'आप तो इस प्रकार चिन्तित हैं किन्तु वह कनकरेखा तो विवाह ही नहीं करना चाहती' ॥२८॥ आज ही खेल में गुड़िया बनाती हुई उससे मैंने कहा कि 'मैं तुम्हारा विवाह कर दूँगी' ॥२९॥ मेरे ऐसा प्रश्न करते ही उसने भय के साथ मुझसे कहा 'माँ ऐसा मत कहो ऐसा मत कहो, मुझे किसी के लिए भी न दो॥३०॥ तुम्हारे साथ मेरा वियोग न होगा। मैं अविवाहित ही ठीक हूँ। यदि तुमने मेरा विवाह किया तो मुझे मरी ही समझो। इसमें कुछ कारण है' ॥३१॥ यह सुनकर व्याकुल मैं तुम्हारे पास आई हूँ। विवाह न करनेवाली कन्या के लिए वर का सोचना ही व्यर्थ है॥३२॥ रानी के मुख से ऐसा सुनकर घबराया हुआ राजा कन्या के भवन में जाकर उससे बोला—'बेटी जिस पति की प्राप्ति के लिए देवमाता और दैत्यों की कन्याएँ तपस्या करके भगवान् से प्रार्थना करती हैं, उसे तू ने मना कर दिया' ॥३३-३४॥ पिता की बातें सुनकर भूमि पर दृष्टि गड़ाए हुई राजकुमारी कनकरेखा बोली—॥३५॥ 'पिताजी जब विवाह की चाह नहीं है तो इसके कारण इतना आग्रह क्यों है? ॥३६॥ पुत्री के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् और परोपकारी राजा इस तरह कहने लगा—'बेटी कन्यादान के बिना पुरुष की पारशान्ति के लिए दूसरा कौनसा उपाय है?' ॥३७॥
४८६ कथासरित्सागर
४८६ कथासरित्सागर
० यादानादृते पुत्रि ! किं स्यात् किल्बषशान्तये । न च बन्धुपराधीना कन्या स्वातन्त्र्यमर्हति ॥३८॥ जातैव हि परस्यार्थे कन्यका नाम रक्ष्यते । बाल्यावृते विना भर्त्तृ कीदृक्तम्या पितुर्गृहम् ॥३९॥ ऋतुमत्य हि कन्यायां बान्धवा मान्त्यधोगतिम् । वृषली' सा वरश्यास्या वृषलीपति रुच्यते ॥४०॥ इति तेनोदिता पित्रा राजपुत्री मनोगताम् । वाचं कनकरेखा सा तत्क्षण ममुवरयत् ॥४१॥ यद्येव तात तद्येन विप्रेण क्षत्रियेण वा । दृष्टा कनकपुर्याख्या नगरी कृतिना किर ॥४२॥ तस्म त्वयाहं दातव्या स मे भर्त्ता भविष्यति । नान्यथा तात मिथ्यैव कर्त्तव्या मे कवर्षना ॥४३॥ एव तयोक्ते सुतया स राजा समचिन्तयत् । विष्टमोद्वाहस्य तसावत् प्रसङ्गोऽङ्गीकृतोऽनया ॥४४॥ नूनं च कारणोत्पन्ना देवीय कापि मवगृहे । इतरकथं विजानाति बाला भूत्वान्यथा दृसौ ॥४५॥ इति सञ्चिन्त्य तत्कालं तमत्युक्त्वा च तां सुताम् । उत्थाय विनवस्तंभ्य स चकार महीपति ॥४६॥ अन्यद्युरास्थानगतो जगाद स च पार्श्वगान् । दृष्टा कनकपुर्याख्या पुरी युष्मासु केनचित् ॥४७॥ येन दृष्टा च सा तस्मै विप्राय क्षत्रियाय वा । मया कनकरेखा च यौवराज्यं च दीयते ॥४८॥ श्रुतापि नैव सास्माभिर्दर्शने वेव का कथा । इति ते चावदन् सर्वे अन्योन्याननदर्शिन ॥४९॥ ततो राजा प्रतीहारमानीयाविशति स्म सः । गच्छ भ्रमय कुरम्मेऽथ पुरं पटहघोपणाम् ॥५०॥ जानीहि यदि केनापि दृष्टा सा नगरी न वा । इत्यादिष्ट प्रतीहार स तद्यति विनिर्ययौ ॥५१॥
१ शूद्री।