कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
२९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रेक्षायामनंशदः सस्वजनो न प्रेक्षेत । प्रच्छन्नश्रवणेक्षणे च सर्वहिते च कर्मणि निग्रहेण द्विगुणमंशं दद्यात् ।
(२) सर्वहितमेकस्य ब्रुवतः कुर्युराज्ञाम् । अकरणे द्वादशपणो दण्डः । तं चेत्सम्भूय वा हन्युः पृथगेषामपराधद्विगुणो दण्डः । उपहन्तृषु विशिष्टः ।
(३) ब्राह्मणतश्चैषां ज्यैष्ठ्यं नियम्येत । प्रवहणेषु चैषां ब्राह्मणेना-कामाः कुर्युः । अंशं च लभेरन् ।
(४) तेन देशजातिकुलसंघानां समयस्यानपाकर्म व्याख्यातम् ।
(५) राजा देशहितान् सेतून् कुर्वतां पथि संक्रमान् ।
ग्रामशोभांश्च रक्षांश्च तेषां प्रियहितं चरेत् ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तुके प्रकरणे दशमोऽध्यायः,
आदितः षट्षष्टितमः ।
—: ० :—
(१) यदि कोई ग्रामवासी गांव के सार्वजनिक मनोरंजन के कार्यों में अपने हिस्से का चन्दा न दे तो सपरिवार उसको उत्सव में प्रवेश न करने दिया जाय । यदि वे छिपकर तमाशा देखें या सुनें; और जो गाँव के सार्वजनिक हितकारी कार्यों में भाग न ले उससे दुगुना हिस्सा वसूल किया जाय ।
(२) जो व्यक्ति सार्वजनिक कल्याण का सुझाव दे उसकी बात को सभी ग्राम-वासी मानें । उसका तिरस्कार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि गांव के लोग मिलकर उस व्यक्ति को मारें-पीटें तो प्रत्येक ग्रामीण पर अपराध से दुगना दण्ड वसूल किया जाय । जो लोग घातक प्रहार करें उन पर विशेष दण्ड किया जाय ।
(३) उन मारने वालों में यदि ब्राह्मण या उससे भी प्रतिष्ठित कोई व्यक्ति हो तो उसे सबसे अधिक दण्डित किया जाय । यदि किसी सार्वजनिक कार्य में ब्राह्मण सामिल न हो सके तो गाँव के लोग ही उसके अभाव को पूरा कर दें; किन्तु अनु-पस्थित रहने का जो मुआवजा ब्राह्मण की ओर निकले, उसे गाँव वाले अवश्य वसूल कर लें ।
(४) इसी प्रकार देश, जाति, कुल और दूसरे समुदायों की व्यवस्था को समझ लेना चाहिये ।
(५) जो लोग मिलकर जनता के आराम के लिए रास्तों पर मकान बनाते हैं; जो व्यक्ति गांवों को सजाने-सुधारने और उनकी रक्षा करने के लिए यत्नशील रहते हैं उनके सहयोग और कल्याण की ओर राजा का ध्यान रहना चाहिए ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ६७ | ऋणादानम् |
|---|---|
| अध्याय ११ |
(१) सपादपणा धर्म्या मासवृद्धिः पणशतस्य । पञ्चपणा व्यावहारिकी । दशपणा कान्तारगाणाम् । विंशतिपणा सामुद्राणाम् । (२) ततः परं कर्तुः कारयितुश्च पूर्वः साहसदण्डः । श्रोतॄणामेकैकं प्रत्यर्धदण्डः । (३) राजन्ययोगक्षेमवहे तु धनिकारणिकयोश्चरित्रमवेक्षेत । (४) धान्यवृद्धिः सस्यनिष्पत्तावुपार्धा, परं मूल्यकृता वर्धेत । प्रक्षेपवृद्धिुरुदयादर्धम् । सन्निधानसन्ना वार्षिकी देया । (५) चिरप्रवासः संस्तम्भप्रविष्टो वा मूल्यद्विगुणं दद्यात् । अकृत्वा वृद्धिं साधयतो वर्धयतो वा मूल्यं वा वृद्धिमरोप्य श्रावयतो बन्धचतुर्गुणो
ऋण लेना
(१) व्याज के नियम—सामान्यतया सौ-पण पर सवा-पण व्याज प्रतिमास लिया जाना चाहिए । इसी सौ-पण पर व्यापारी लोगों से पांच पण, जंगल में रहने या वहाँ व्यापार करने वालों से दस पण और समुद्र के व्यापारियों से बीस पण व्याज लेना चाहिए ।
(२) इससे अधिक व्याज लेने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । उसमें जिन्होंने गवाही भरी हो उन्हें आधा दण्ड दिया जाय ।
(३) यदि ऋण देने वाले ( धनिक ) और ऋण लेने वाले ( धारणि ) के आपसी सौदे पर राज्य की भलाई होती हो तो सरकार को उनके चरित्र पर निगरानी रखनी चाहिए ।
(४) यदि अन्नसम्बन्धी व्याज फसल के समय पर चुकता करना हो तो वह मूलधन की आधा रकम से अधिक न होना चाहिए । गोदाम के इकट्ठे बेचे हुए माल पर उसके लाभ का आधा व्याज होना चाहिए । इस प्रकार के लेन-देन का हिसाब-किताब वर्ष में एक बार अवश्य करना चाहिए ।
(५) यदि विदेश में चले जाने के कारण या जान-बूझकर खरीददार अपने माल को नहीं निकालता तो वह माल के मूलधन का दुगुना मूल्य बेचने वाले को अदा करे । अवधि से पहिले ही जो व्याज मांगे, अथवा व्याज को मूलधन के साथ जोड़कर उतना रुपया मांगे, उसे मांगे हुए धन का, चौगुना दण्ड देना चाहिए । थोड़ा धन
३०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
दण्डः । तुच्छश्रावणायामभूतचतुर्गुणः । तस्य त्रिभागमादाता दद्यात्, शेषं प्रदाता ।
(१) दीर्घसत्रव्याधिगुरुकुलोपरुद्धं बालमसारं वा नर्णमनु वर्धेत । मुच्यमानमृणमप्रतिगृह्णतो द्वादशपणो दण्डः । कारणापदेशेन निवृत्तवृद्धिकमन्यत्र तिष्ठेत् ।
(२) दशवर्षोपेक्षितमृणमप्रतिग्राह्यमन्यत्र बालवृद्धव्याधितव्यसनिप्रोषितदेशत्यागराजविभ्रमेभ्यः ।
(३) प्रेतस्य पुत्राः कुसीदं दद्युः । दायादा वा रिक्थहराः सहग्राहिणः प्रतिभुवो वा । न प्रातिभाव्यमन्यत् । असारं बालप्रातिभाव्यम् । असंख्यातदेशकालं तु पुत्राः पौत्रा दायादा वा रिक्थं हरमाणा दद्युः ।
(४) जीवितविवाहभूमिप्रातिभाव्यमसंख्यातदेशकालं तु पुत्राः पौत्रा वा वहेयुः ।
को अधिक कहा जाय और जब गवाहियाँ ली जाँय, उस समय गवाह जितना धन बतायें, उसका चौगुना दण्ड अधमर्ण और उत्तमर्ण दोनों को दिया जाना चाहिए । उसमें से तीन भाग अधमर्ण ( ऋण लेने वाला ) और बाकी उत्तमर्ण ( ऋण देने वाला ) अदा करे ।
( १ ) लम्बी अवधि तक यज्ञकार्य में लगे हुए, व्याधिग्रस्त, गुरुकुल में अध्यन करने वाले, बालक और अशक्त आदि व्यक्तियों के ऋण पर ब्याज नहीं जोड़ा जाना चाहिए । यदि कर्जदार अपने कर्जे की अन्तिम रकम को अदा करें और धनिक उसको न ले तो, धनिक पर बारह पण का दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि न लेने का कोई विशेष कारण हो तो वह रकम बिना सूद के कहीं और जमा कर दी जानी चाहिए ।
( २ ) यदि कोई उत्तमर्ण दस वर्ष के अन्दर अपना कर्जा वसूल नहीं कर पाता तो उस धन पर उसका फिर कोई अधिकार नहीं रहता है । यदि वह कर्जे का धन बाल, बूढ़े, बीमार, आपद्ग्रस्त, प्रवासी, देशत्यागी या राजकाज से बाहर गए किसी व्यक्ति का हो तो वह दस वर्ष बाद भी उस धन का अधिकारी माना जायेगा ।
( ३ ) यदि ऋण लेने वाला ( अधमर्ण ) मर जाय तो उसका पुत्र ऋण को चुकता करे । अथवा उसके वारिस या उसके साथ काम करने वाले जामिन हिस्सेदार उसके ऋण को अदा करें । इनके अतिरिक्त ऐसे मृतक अधमर्ण के ऋण का जामिन दूसरा न माना जाय, बालक जामिन होने का अधिकारी नहीं है । जिस ऋण का स्थान तथा समय निश्चित नहीं है, उसको कर्जेदार के पुत्र, पौत्र या दूसरे दायभागी अदा करें ।
( ४ ) जो कर्जा आजीविका, विवाह और जमीन के लिए लिया गया हो उसको
प्र० ६७ : अ० ११ ] ऋ॒ण सम्बन्धी नियम ३०१
(१) नानर्णसमवाये तु नैकं द्वौ युगपदभिवदेयाताम् अन्यत्र प्रतिष्ठ- मानात् । तत्रापि गृहीतानुपूर्व्या राजश्रोत्रियद्रव्यं वा पूर्वं प्रतिपादयेत् । (२) दम्पत्योः पितापुत्रयोर्भ्रातॄणां चाविभक्तानां परस्परकृतमृणम- साध्यम् । (३) अग्राह्याः कर्मकालेषु कर्षका राजपुरुषाश्च। स्त्री वाऽप्रतिश्राविणी पतिकृतमृणमन्यत्र गोपालकार्धसीतिकेभ्यः । (४) पतिस्तु ग्राह्यः स्त्रोकृतमृणमप्रतिविधाय प्रोषित इति । सम्प्रति- पत्तावुत्तमः । असम्प्रतिपत्तौ तु साक्षिणः प्रमाणम् । प्रात्ययिकाः शुचयोऽनु- मतो वा त्रयोऽवरास्त्र्यर्थाः । पक्षानुमतौ वा द्वौ ऋणं प्रति, न त्वेवैकः ।
तथा जामिन के द्वारा चुकता किये जाने योग्य ऋण को केवल उनके पुत्र, पौत्र ही अदा करें।
(१) एक व्यक्ति पर अनेक व्यक्तियों का कर्जा : यदि एक व्यक्ति पर अनेक व्यक्तियों का कर्जा हो तो उस पर एक साथ अनेक कर्जा देने वाले मुकदमा नहीं चला सकते हैं, किन्तु यदि वह कर्जदार कहीं विदेश को जा रहा हो तो उस पर एक साथ अनेक मुकदमे चलाये जा सकते हैं। मुकदमों का फैसला हो जाने के बाद ऋण का भुगतान उसी क्रम से होना चाहिए, जिस क्रम से उसको लिया गया है। यदि उसमें राजा या ब्राह्मण का कर्जा निकले तो उसका भुगतान सबसे पहिले होना चाहिए।
(२) भार्या, पति, पिता, पुत्र और एक साथ रहने वाले भाई परस्पर कर्जा लें-दें तो उनके कर्जे का मुकदमा अदालत में नहीं चलाया जा सकता ।
(३) कर्जा लेने वाले किसान और राज-कर्मचारी यदि काम पर लगे हों तो ऋण के सम्बन्ध में उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। पति के कर्ज लिए हुए ऋण को यदि उसकी स्त्री चुकाना मंजूर नहीं करती तो उस पर किसी प्रकार का जोर-दबाव नहीं डाला जा सकता है; किन्तु ग्वाला आदि कार्यों की कमाई पर निर्भर रहने वाले लोगों की स्त्रियाँ अपने पति की अनुपस्थिति में अपने पति का कर्जा चुकता करने की जिम्मेदार हैं।
(४) साक्षियों की गवाह : यदि पत्नी कर्जा ले तो उसको अदा करने के लिए उसके पति को विवश किया जा सकता है। स्त्री के ऋण को न चुकाने की नौबत से बच कर या बहाना करके यदि कोई पुरुष विदेश चला जाय और उसकी यह बात सावित हो जाय तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। यदि कारण सिद्ध न हो सके तो साक्षियों की गवाही के अनुसार निर्णय किया जाय। दोनों पक्षों से अनुमत कम-से-कम तीन गवाह होने चाहिए। जो विश्वास योग्य और चरित्रवान् हों। अथवा दोनों पक्षों की राय से दो गवाह भी हो सकते हैं। किन्तु कर्जे के मामले में एक गवाह कदापि न होना चाहिए।
३०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रतिषिद्धाः स्यालसहायान्वर्थिधनिकधारणिकवैरिन्यङ्गधृतदण्डाः । पूर्वे चाव्यवहार्याः । राजश्रोत्रियग्रामभृतककुष्ठिव्रणिनः पतितचण्डालकुत्सितकर्माणोऽन्धबधिरमूकाहंवादिनः स्त्रीराजपुरुषाश्च । अन्यत्र स्ववर्गेभ्यः । (२) पारुष्यस्तेयसंग्रहणेषु तु वैरिस्यालसहायवर्ज्याः । रहस्यव्यवहारेष्वेका स्त्री पुरुष उपश्रोता उपद्रष्टा वा साक्षी स्याद्राजतापसवर्जम् । (३) स्वामिनो भृत्यानामृत्विगाचार्याः शिष्याणां मातापितरौ पुत्राणां चानिग्रहेण साक्ष्यं कुर्युः । तेषामितरे वा । परस्पराभियोगे चैषामुत्तमाः परोक्ता दशबन्धं दद्युरवराः पञ्चबन्धम् । इति साक्ष्यधिकारः । (४) ब्राह्मणोदकुम्भाग्निसकाशे साक्षिणः परिगृह्णीयात् । तत्र ब्राह्मणं ब्रूयात्—सत्यं ब्रूहीति । राजन्यं वैश्यं वा—मा तवेष्टापूर्तफलं, कपालहस्तः शत्रुकुलं भिक्षार्थी गच्छेरिति । शूद्रं—जन्ममरणान्तरे यद् वः पुण्यफलं तद्
( १ ) साला, सहायक, क्रीतदास ( अन्वर्थी ), ऋण देने वाला ( धनिक ), कर्जदार ( धारणिक ), दुश्मन, अंगहीन और राज्य से सजा पाये पुरुष गवाह नहीं हो सकते हैं । विश्वासी, चरित्रवान् और दोनों पक्षों से अनुमत व्यक्ति भी यदि व्यवहारकुशल न हों तो वे भी गवाह होने के योग्य नहीं हैं । राजा, वेदपाठी ब्राह्मण, गांव का मुखिया, कोढ़ी, दागयुक्त शरीर वाला, पतित, चाण्डाल, नीच कार्य करने वाला, अंधा, बहरा, गूँगा, घमण्डी, स्त्री और राजकर्मचारी ये सब अपने-अपने वर्गों को छोड़कर अन्यत्र गवाह नहीं हो सकते हैं ।
( २ ) परन्तु पारुष्य, चोरी और व्यभिचार के मामलों में शत्रु, साला और सहायक को छोड़कर पूर्वोक्त बाकी सभी लोग गवाह हो सकते हैं । गुप्त मामलों में स्त्री, राजा और तपस्वी को छोड़कर सुनने-देखने वाला अकेला व्यक्ति भी गवाह हो सकता है ।
( ३ ) नौकरों के मालिक, शिष्यों के आचार्य, पुत्रों के माता-पिता और मालिकों के नौकर आदि परस्पर खुले तौर पर गवाह हो सकते हैं । आपसी मुकदमों में यदि मालिक, आचार्य तथा माता-पिता पराजित हो जायें तो नौकर, शिष्य आदि को वे पराजय का दसवाँ भाग दें; यदि नौकर आदि हार जायें तो अपने स्वामी आदि को वे हारे हुए धन का पाचवाँ हिस्सा दण्ड रूप में दें । यहाँ तक साक्षी के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
( ४ ) शपथ : पानी से भरे घड़े के पास या आग के पास ब्राह्मण को शपथ के लिए ले जाया जाय, यदि ब्राह्मण गवाह हो तो उसे 'सच बोलो' इतनी भर शपथ दिलाई जाय । यदि गवाही देने वाला क्षत्रिय और वैश्य हो तो उससे 'तुमको यज्ञ आदि इष्ट का और कुआँ, धर्मशाला आदि परोपकार का फल न मिले; तुम अपनी
प्र० ६७ : अ० ११ ] ऋण सम्बन्धी नियम ३०३
राजानं गच्छेत् । राज्ञश्च किल्विषं युष्मानन्यथावादे । दण्डश्चानुबन्धः । पश्चादपि ज्ञायेत यथादृष्टश्रुतम् । एकमन्त्राः सत्यमवहरतेति । (१) अनवहरतां सप्तरात्रादूर्ध्वं द्वादशपणो दण्डः त्रिपक्षादूर्ध्वमभियागं दद्युः । (२) साक्षिभेदे यतो बहवः शुचयोऽनुमता वा ततो नियच्छेयुः । मध्यं वा गृह्णीयुः । तद्वा द्रव्यं राजा हरेत् । साक्षिणश्चेदभियोगादूनं ब्रूयुरतिरिक्तस्याभियोक्ता बन्धं दद्यात् । अतिरिक्तं वा ब्रूयुस्तदतिरिक्तं राजा हरेत् । बालिश्यादभियोक्तुर्वा दुःश्रुतं दुर्लिखितं प्रेताभिनिवेशं वा समीक्ष्य साक्षिप्रत्ययमेव स्यात् । (३) साक्षिबालिश्येष्वेव पृथगनुयोगे देशकालकार्याणां पूर्वमध्यमोत्तमा दण्डा इत्यौशनसाः ।
शत्रु-सेना को जीतकर भी हाथ में खप्पर लेकर भीख मांगते फिरो, यदि झूठ बोलो तो' इस प्रकार शपथ दिलाई जाय । यदि गवाह शूद्र हो तो उसके सम्मुख कहा जाय 'देखो यदि सच न बोलो तो जन्म-जन्मान्तर का तुम्हारा सारा पुण्य राजा को प्राप्त हो; यदि तुमने झूठ बोला तो तुम्हें निश्चित ही दण्ड मिलेगा; बाद में भी सुनकर-देखकर मामले की जाँच-पड़ताल की जायेगी; इसलिए तुम सब लोगों को मिलकर सही-सही कहना चाहिए' इस प्रकार कहा जाय ।
( १ ) इतना कहने पर भी सात दिन तक यदि वे सही-सही वारदात न बतायें तो उनमें प्रत्येक को बारह-बारह पण दण्ड दिया जाय । यदि वे डेढ़ मास तक भी कुछ भेद न खोलें तो उनके विरुद्ध मुकदमे का फैसला किया जाय ।
( २ ) यदि किसी मुकदमे में गवाहों का आपसी मतभेद हो जाय तो उनमें जिस बात को बहुसंख्यक, चरित्रवान्, विश्वासी तथा अनुमत गवाह कहें, उसी के आधार पर फैसला कर दिया जाय अथवा किसी को मध्यस्थ बनाकर फैसला किया जाय । यदि किसी भी युक्ति से फैसला न हो सके तो उस विवादग्रस्त संपत्ति को राजा ले ले । कर्ज की जो रकम कर्जा देने वाले ने बताई है, गवाह यदि उससे कम रकम बताये तो अभियोक्ता उस अधिक बताई रकम का पांचवां हिस्सा राजा को दे दे । यदि गवाह अधिक बताये तो उस अधिक रकम को राजा ले ले । अभियोक्ता यदि मूर्ख हो, ठीक तरह न सुन पाये, ठीक न लिख सके, अथवा पागल हो, तो गवाहों के आधार पर ही ऐसे मामलों का फैसला दिया जाय ।
( ३ ) आचार्य उशना ( शुक्राचार्य ) के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'देश, काल और कार्यों के ठीक-ठीक बताये जाने के कारण अदालत में यदि गवाहों की मूर्खता सिद्ध हो जाय तो उनको उनके अपराध के अनुसार यथोचित प्रथम साहस, मध्यम साहस और उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।'
| ३०४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
|---|
(१) कूटसाक्षिणो यमर्थमभूतं वा कुर्युर्भूतं वा नाशयेयुस्तद्दशगुणं दण्डं दद्युरिति मानवाः।
(२) बालिश्याद्वा विसंवादयतां चित्रो घात इति बार्हस्पत्याः।
(३) नेति कौटिल्यः। ध्रुवा हि साक्षिणः श्रोतव्याः। अशृण्वतां चतुर्विंशतिपणो दण्डः, ततोऽर्धमध्रुवाणाम्।
(४)
देशकालाविदूरस्थान् साक्षिणः प्रतिपादयेत्।
दूरस्थानप्रसारान् वा स्वामिवाक्येन साधयेत्॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे ऋणग्रहणं नाम एकादशोऽध्यायः,
आदितोः सप्तषष्टितमः।
— : ० : —
(१) आचार्य मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'अकारण ही जो छली, प्रपञ्ची गवाह मुकदमा खड़ा करवा कर धन का नाश कराये, उन्हें उस नष्ट हुए धन का दस गुना दण्ड दिया जाय।'
(२) आचार्य बृहस्पति के मतानुयायी विद्वानों का अभिमत है कि 'अपनी मूर्खता से परस्पर विरुद्ध बोलने वाले गवाहों का, यातना देकर, वध किया जाय।'
(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य ऐसा कराना उचित नहीं मानते हैं। उनका कथन है कि 'साक्षियों की सुनी हुई बात सभी ठीक होती है। जो साक्षी किसी बात को ठीक तरह से हृदयंगम न करके गवाही देने को खड़े हो जाते हैं उनको चौबीस पण दण्ड दिया जाय। इसका आधा दण्ड उन्हें दिया जाय जो गवाह मामले को ठीक-ठीक नहीं बता पाते।
(४) अभियोक्ता को चाहिए कि देश-काल के अनुसार अधिक पास रहने वाले व्यक्ति को ही गवाह बनाये। अथवा न्यायाधीश की आज्ञा प्राप्त कर वह सुगमता से न आ सकने वाले दूर-देशस्थ गवाहों को भी अदालत में हाजिर करे।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में ऋणग्रहण नामक ग्यारहवां अध्याय समाप्त।
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| प्रकरण ६८ | औपनिधिकम् |
|---|---|
| अध्याय १२ |
(१) उपनिधिः ऋणेन व्याख्यातः ।
(२) परचक्राटविकाभ्यां दुर्गराष्ट्रविलोपे वा, प्रतिरोधकैर्वा ग्रामसार्थव्रजविलोपे, चक्रयुक्ते नाशे वा, ग्राममध्याग्न्युदकाबाधे वा, किञ्चिदमोक्ष्यमाणे कुप्यमनिर्हार्यवर्जमेकदेशमुक्तद्रव्ये वा, ज्वालावेगोपरुद्धे वा, नावि निमग्नायां मुषितायां वा स्वयमुपरूढो नोपनिधिमभ्याभवेत् ।
(३) उपनिधिभोक्ता देशकालानुरूपं भोगवेतनं दद्यात् । द्वादशपणं च दण्डम् । उपभोगनिमित्तं नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेत्, चतुर्विंशतिपणश्च दण्डः । अन्यथा वा निष्पतने । प्रेतं व्यसनगतं वा नोपनिधिमभ्यावहेत् ।
धरोहर सम्बन्धी नियम
( १ ) ऋण सम्बन्धी नियमों के अनुसार ही उपनिधि सम्बन्धी नियमों को भी समझना चाहिए ।
( २ ) धरोहर : शत्रु के षड्यंत्र और जंगलवासियों के आक्रमण से दुर्ग तथा राष्ट्र का नाश हो जाने पर; या डाकू-चोरों के द्वारा गाँव, व्यापारिक कम्पनियाँ तथा पशुओं का नाश हो जाने पर; या भीतरी षड्यन्त्रों के कारण नाश हो जाने पर; गाँव में आग लग जाने या बाढ़ के कारण नष्ट हो जाने पर, अग्नि या बाढ़ से नष्ट होने वाले ताँबा, लोहा आदि कुप्य वस्तुओं के शेष रह जाने पर; अग्नि से घिर जाने पर, नाव के डूब जाने पर, या नाव के माल की चोरी हो जाने पर, अपना बचाव हो जाने पर भी उपनिधि ( धरोहर ) पाने के लिए कोई व्यक्ति किसी पर मुकदमा नहीं चला सकता है ।
( ३ ) जो व्यक्ति उपनिधि को अपने उपयोग में लाये, देश-काल के अनुसार वह उपयोग का बदलां ( भोगवेतन ) चुका दे और दण्डरूप में बारह पण अदा करे । उपभोग के कारण उपनिधि को नष्ट कर देने वाले व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जाय, और चौबीस पण दण्ड किया जाय । किसी भी प्रकार से उपनिधि के नष्ट हो जाने पर यही नियम लागू किया जाय । यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को लेकर भाग जाय या विपत्ति में फँस जाय तो उस पर न तो अभियोग चलाया जा सकता है और न ही दण्ड किया जा सकता है ।
२० कौ०
३०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) आधानविक्रयापव्ययनेषु चास्य चतुर्गुणपञ्चबन्धो दण्डः। परिवर्तने निष्पातने वा मूल्यसमः। (२) तेन आधिप्रणाशोपभोगविक्रयाधानापहारा व्याख्याताः। (३) नाधिः सोपकारः सीदेत्। न चास्य मूल्यं वर्धेत। निरुपकारः सीदेन्मूल्यं चास्य वर्धेतान्यत्र निसर्गात्। (४) उपस्थितस्याधिमप्रयच्छतो द्वादशपणो दण्डः। प्रयोजकासन्निधाने वा ग्रामवृद्धेषु स्थापयित्वा निष्क्रयमाधिं प्रतिपद्येत। निवृत्तवृद्धिको वाधिस्तत्कालकृतमूल्यस्तत्रैवावतिष्ठेत, अनाशविनाशकरणाधिष्ठितो वा। धारणकसंन्निधाने वा विनाशभयादुद्गतार्थं धर्मस्थानुज्ञातो विक्रीणीत। आधिपालप्रत्ययो वा।
(१) यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को कहीं गिरवी रख दे, बेच दे या अन्य किसी तरह से उसका अपव्यय कर दे, उस पर उपनिधि का चौगुना पञ्चबन्ध दण्ड किया जाय। यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को बदले या किसी भी प्रकार से नष्ट करे उससे उपनिधि की कीमत वसूल कर ली जाय।
(२) गिरवी : उपनिधि के समान ही आधि (गिरवी रखी हुई वस्तु) के नाश हो जाने, उपयोग में लाने, बेचने, गिरवी रखने और बदलने आदि के सम्बन्ध में भी नियम समझना चाहिए।
(३) यदि गिरवी रखी हुई वस्तु सोने चांदी के आभूषण (सोपकार) हों तो वे नष्ट नहीं होते और उन पर ब्याज नहीं लिया जाता है। इनके अतिरिक्त आधि के नष्ट हो जाने का भी व्यय रहता है और उस पर ब्याज भी लगता है।
(४) यदि गिरवी रखने वाला व्यक्ति अपनी वस्तु को लेना चाहे और ब्याज आदि के लोभ से उत्तमर्ण उसको देना न चाहे तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय। यदि अधमर्ण को उत्तमर्ण उसके स्थान पर न मिले, तो वह आधि के बदले में लिए धन को उस गाँव के वृद्ध पुरुषों के पास रखकर अपनी गिरवी रखी हुई वस्तु को वापिस ले सकता है। यदि अधमर्ण अपनी आधि को बेचकर अपना कर्जा चुकाना चाहे तो उसी समय उसकी लागत निश्चित करके उस वस्तु को उत्तमर्ण के पास रहने दिया जाय, उसके बाद उत्तमर्ण उस आधि पर ब्याज नहीं ले सकता है। आधि के रखने में उत्तमर्ण का लाभ हो रहा या हानि हो रही है, किन्तु निकट भविष्य में यदि उसके नष्ट हो जाने की आशंका हो, अथवा उसकी लागत से कर्जा की संख्या अधिक हो रही हो, ऐसी अवस्था में, अधमर्ण की अनुपस्थिति में भी, न्यायाधीश (धर्मस्थ) की आज्ञा लेकर उत्तमर्ण उस आधि को बेच दे। न्यायाधीश की अनुपस्थिति में आधिपाल (न्यायविभाग का अधिकारी) से आज्ञा ली जा सकती है।
प्र० ६८ : अ० १२ ] धरोहर-सम्बन्धी नियम ३०७
(१) स्थावरस्तु प्रयासभोग्यः फलभोग्यो वा। प्रक्षेपवृद्धिमूल्यशुद्ध-माजीवममूल्यक्षयेणोपनयेत् । (२) अनिसृष्टोपभोक्ता मूल्यशुद्धमाजीवं बन्धं च दद्यात् । शेषमुप-निधिना व्याख्यातम् । (३) एतेनादेशोऽन्वाधिश्च व्याख्यातौ । सार्थेनान्वाधिहस्तो वा प्रदिष्टं भूमिमप्राप्तश्चोरैर्भग्नोत्सृष्टो वा नान्वाधिमभ्यावहेत् । अन्तरे वा मृतस्य दायादोऽपि नाभ्यावहेत् । शेषमुपनिधिना व्याख्यातम् । (४) याचितकमवक्रीतकं वा यथाविधं गृह्णीयुस्तथाविधमेव अर्पयेयुः । श्लेषोपनिपाताभ्यां देशकालोपरोधि दत्तं नष्टं विनष्टं वा नाभ्याभवेयुः । शेषमुपनिधिना व्याख्यातम् । (५) वैयापृत्यविक्रयस्तु—वैयापृत्यकरा यथादेशकालं विक्रीणानाः पण्यं यथाजातं मूल्यमुदयं च दद्युः । शेषमुपनिधिना व्याख्यातम् ।
( १ ) जो स्थायी संपति परिश्रम या बिना ही परिश्रम फल देती हो अथवा उपभोग करने योग्य हो, उसे बेचा नहीं जा सकता है, जिस आधि को उत्तमर्ण व्यापार में लगाये उसका लाभ अधमर्ण को दिया जाना चाहिए ।
( २ ) जो व्यक्ति बिना आज्ञा या शर्त के आधि का उपभोग करे, उससे आधि के अच्छी हालत का मूल्य वसूल किया जाय और अलग से उस पर जुर्माना किया जाय । आधि के सम्बन्ध में शेष नियम उपनिधि के समान हैं ।
( ३ ) आदेश और अन्वाधि : आदेश ( आज्ञा ) और अन्वाधि ( गिरवी रखी हुई वस्तु को वापिस मँगाना ) के सम्बन्ध में उपर्युक्त नियम समझने चाहिए । व्यापारी यदि किसी की गिरवी रखी वस्तु को किसी व्यक्ति के द्वारा कहीं दूसरी जगह भेजे और बीच ही में उस वस्तु की चोरी हो जाय तो उसे ले जाने वाले पर आधि विषयक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है । यदि किसी कारण वह बीच रास्ते में ही मर जाय तो उसके उत्तराधिकारियों पर भी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है । बाकी सब नियम उपनिधि के समान हैं ।
( ४ ) उधार ली गई वस्तु को लौटाना : उधार या किराये पर ली गई वस्तु जिस दशा में लायी जाय ठीक उसी दशा में वापिस करनी चाहिए । यदि देश, काल, दोष या आकस्मिक आपत्ति के कारण उस वस्तु में कोई खराबी आ जाय या सर्वथा वह नष्ट हो जाय, तो उस वस्तु के सम्बन्ध में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है । शेष नियम उपनिधि के समान समझने चाहिए ।
( ५ ) फुटकर वस्तुओं को बेचने का नियम : फुटकर वस्तुओं को बेचने वाले व्यापारियों को चाहिए कि वे देश, काल के अनुसार अपनी वस्तुओं को बेचते
३०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) देशकालातिपातने वा परिहीणं संप्रदानकालिकेन अर्धेण मूल्य-मुदयं च दद्युः। (२) यथासम्भाषितं वा विक्रीणाना नोभयमधिगच्छेयुः। मूल्यमेव दद्युः। अर्घपतने वा परिहीणं यथापरिहीणं मूल्यमूनं दद्युः। (३) सांव्यवहारिकेषु वा प्रात्ययिकेष्वराजवाच्येषु श्रेष्ठोपनिपाताभ्यां नष्टं विनष्टं वा मूल्यमपि न दद्युः। देशकालान्तरितानां तु पण्यानां क्षय-व्ययविशुद्धं मूल्यमुदयं च दद्युः। पण्यसमवायानां च प्रत्यंशम्। शेषमुप-निधिना व्याख्यातम्। एतेन वैयापृत्यविक्रयो व्याख्यातः। (४) निक्षेपश्चोपनिधिना। तमन्येन निक्षिप्तमन्यस्यार्पयतो हीयेत। निक्षेपापहारे पूर्वापदानं निक्षेप्तारश्च प्रमाणम्।
हुए थोक व्यापारियों को यथोचित मूल्य और ब्याज दें। शेष नियम उपनिधि के समान हैं।
(१) यदि देश, काल के अनुसार पहिले खरीद कर रखी हुई वस्तुओं का मूल्य गिर जाय तो वर्तमान में दिए जाने वाले मूल्य के अनुसार ही उसका मूल्य और ब्याज थोक व्यापारियों को दिया जाय।
(२) यदि थोक व्यापारियों का बड़े व्यापारियों के साथ यह तय हो चुका हो कि वे किसी नियत मूल्य पर ही माल बेचेंगे तो उसी मूल्य पर बेचते हुए छोटे व्यापारी, बड़े व्यापारियों को केवल मूल्य दें, ब्याज नहीं। यदि भाव गिर जाय तो उसी के अनुसार मूल्य दिया जाय।
(३) बिना कानूनी कार्यवाही के व्यावहारिक विश्वास पर होने वाले सौदे में यदि किसी प्रकार के दोष या आपत्ति के कारण खराबी आ जाय माल सर्वथा ही नष्ट हो जाय तो थोक व्यापारी उसका मूल्य न दें। किन्तु दूसरे स्थान और दूसरे समय में बेचे जाने वाले माल का छीजन (क्षय) और खर्च (व्यय) के हिसाब से उचित मूल्य और ब्याज दिया जाय। स्टेशनरी (पण्यसमवाय) में कुछ अंश छीजन का निकाल लिया जाय। इसके शेष नियम उपनिधि के समान समझने चाहिएँ। ये ही नियम फुटकर बिक्री के भी हैं।
(४) निक्षेप धन : निक्षेप, अर्थात् दिखाकर या गिनकर रखी जाने वाली धरोहर वस्तु के नियम उपनिधि के समान हैं। किसी के निक्षेप को यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे को दे दें, तो देने वाले को यथोचित दण्ड दिया जाय। निक्षेप रखने वाला व्यक्ति यदि उसे दबा दे या नष्ट कर दे तो पूर्वस्थिति की जाँच करके, इस सम्बन्ध में धरोहर रखने वाला (निक्षेप्ता) जैसी गवाही दे तदनुसार ही मामले का फैसला किया जाय।
प्र० ६८ : अ० १२] धरोहर-सम्बन्धी नियम ३०९
(१) अशुचयो हि कारवः, नैषां करणपूर्वो निक्षेपधर्मः। करणहीनं निक्षेपमपव्ययमानं गूढभित्तिन्यस्तान् साक्षिणो निक्षेप्ता रहस्यप्रणिपातेन प्रज्ञापयेत्, वनान्ते वा मद्यप्रहवणविश्वासेन।
(२) रहसि वृद्धो व्याधितो वा वैदेहकः कश्चित् कृतलक्षणं द्रव्यमस्य हस्ते निक्षिप्यापगच्छेत्। तस्य प्रतिदेशेन पुत्रो भ्राता वाभिगम्य निक्षेपं याचेत। दाने शुद्धिः। अन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात्।
(३) प्रव्रज्याभिमुखो वा श्रद्धेयः कश्चित् कृतलक्षणं द्रव्यमस्य हस्ते निक्षिप्य प्रतिष्ठेत। ततः कालान्तरागतो याचेत। दाने शुचिरन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात्।
(४) कृतलक्षणेन वा द्रव्येण प्रत्यानयेदेनम्। बालिशजातीयो वा रात्रौ राजदायिकांक्षणभीतः सारमस्य हस्ते निक्षिप्यापगच्छेत्। स एनं बन्धना-गारगतो याचेत। दाने शुचिः अन्यथा निक्षेपं स्तेयदण्डं च दद्यात्।
(५) अभिज्ञानेन चास्य गृहे जनमुभयं याचेत। अन्यतरादाने यथोक्तं पुरस्तात्।
( १ ) शिल्पी लोग प्रायः ईमानदार नहीं होते हैं। उनके यहाँ जो निक्षेप रखा जाता है, उसका वे लोग कोई लिखित प्रमाण ( कारणपूर्व ) नहीं देते हैं। यदि वे लोग ऐसे अलिखित निक्षेप का अपव्यय करें तो निक्षेप्ता को चाहिए कि वह छिपे तौर पर दीवारों की ओर से साक्षियों को उनके ( शिल्पियों के ) गुप्त भेद बता दे। अथवा जंगल में नाव में या एकान्त में विश्वास से साक्षियों को बता दे।
( २ ) कोई बीमार या वैदेहक किसी चिह्नित वस्तु को शिल्पी के हाथ में देकर चला जाय। बाद में निक्षेप्ता के कहने पर उसका लड़का या भाई शिल्पी के पास आकर उस चिह्नित निक्षेप को माँगे। यदि वह दे दे तो उसको ईमानदार समझा जाय और न दे तो उससे निक्षेप वसूल कर उसे चोरी की सज़ा दी जाय।
( ३ ) अथवा कोई विश्वासी व्यक्ति सन्यासी का वेष बनाकर किसी चिह्नित वस्तु को शिल्पी के हाथ में सौंप कर चला जाय। फिर कुछ समय बाद वह उस वस्तु को माँगे। उस वस्तु को वापिस कर देने पर शिल्पी को ईमानदार समझा जाय और न दे तो निक्षेप वसूल कर उसे चोरी की सजा दी जाय।
( ४ ) अथवा चिह्नित वस्तु के द्वारा ही उसको गिरफ्तार किया जाय। अथवा कोई व्यक्ति रात में पुलिस से डरा-सा, मूर्ख की शक्ल बनाकर शिल्पी के हाथ में द्रव्य को सौंप कर चलता बने। वह फिर जेल में जाकर शिल्पी से अपना धन माँगे। दे दे तो ईमानदार, अन्यथा धन वसूल कर उसको चोरी का दण्ड दिया जाय।
( ५ ) शिल्पी के घर में माल की शिनाख्त करने के बाद घर के दो आदमियों
३१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) द्रव्यभोगानामागमं चास्यानुयुञ्जीत । तस्य चार्थस्य व्यवहारोप- लिङ्गनमभियोक्तुश्चार्थसामर्थ्यम् । (२) एतेन मिथस्समवायो व्याख्यातः । (३) तस्मात्साक्षिमदच्छन्नं कुर्यात्सम्यग्विभाषितम् । स्वे परे वा जने कार्यं देशकालाग्रवर्णतः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे औपनिधिकं नाम द्वादशोऽध्यायः, आदितोऽष्टसप्ततितमः ।
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से अलग-अलग उस माल को माँगा जाय । यदि दोनों ही देने से इन्कार करें तो पूर्वोक्त नियम का उपयोग किया जाय ।
(१) अदालत में शिल्पी से पूछा जाय कि 'यह जो तुम धन के कारण मौज उड़ा रहे हो, यह तुम्हें कहाँ से मिला है ?' इसके अतिरिक्त उस धन के व्यवहार एवं चिह्नों के सम्बन्ध में भी उससे तथा अभियोक्ता की आर्थिक दशा के सम्बन्ध में भी जाँच-पड़ताल की जाय ।
(२) इसी के अनुसार परस्पर व्यवहार करने वाले सभी व्यक्तियों के सम्बन्ध में समझना चाहिए ।
(३) इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने तथा पराये के व्यवहार में गवाह के सामने ही लेन-देन के सभी कार्यों की कहा-सुनी तथा लिखा-पढ़ी करे और साथ ही स्थान एवं समय का विशेष रूप से उल्लेख कर दे ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में औपनिधिक नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ६९ | \multirow{2}{*}{\Large दासकर्मकरकल्पम्} |
|---|---|
| अध्याय १३ |
(१) उदरदासवर्जमार्यप्राणमप्राप्तव्यवहारं शूद्रं विक्रयाधानं नयतः स्वजनस्य द्वादशपणो दण्डः। वैश्यं द्विगुणः। क्षत्रियं त्रिगुणः। ब्राह्मणं चतुर्गुणः। परजनस्य पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः क्रेतृश्रोतॄणां च। (२) म्लेच्छानामदोषः प्रजां विक्रेतुमाधातुं वा। न त्वेवार्यस्य दासभावः। (३) अथवार्यमाधाय कुलबन्धन आर्याणामापदि निष्क्रयं चाधिगम्य बालं साहाय्यदातारं वा पूर्वं निष्क्रीणीरन्। (४) सकृदात्माधाता निष्पतितः सीदेत्। द्विरन्येनाहितकः। सकृदुभौ परविषयाभिमुखौ।
दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम
( १ ) उदरदास को छोड़कर आर्यों के प्राणभूत नाबालिग शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण को यदि उनके ही परिवार का कोई व्यक्ति बेचे या गिरवी रखे तो उन-पर क्रमशः बारह पण, चौबीस पण, छत्तीस पण और अड़तालीस पण का दण्ड किया जाय। यदि इन्हीं नाबालिग शूद्र आदि को यदि कोई दूसरा व्यक्ति बेचे या गिरवी रखे तो उक्त क्रम से उनको प्रथम, मध्यम, उत्तम साहस और प्राणवध का दण्ड दिया जाय। यही दण्ड खरीदारों और इस मामले में गवाही देने वालों को भी दिया जाय।
( २ ) म्लेच्छ लोग अपनी सन्तान को बेच और गिरवी रख सकते हैं, इसमें कोई दोष नहीं है; परन्तु आर्यजाति किसी हालत में भी गुलाम नहीं बनाई जा सकती है।
( ३ ) यदि सारा परिवार गिरफ्तार हो गया हो या बहुत सारे आर्यों पर विपत्ति आ पड़ी हो तो उस दशा में आर्य को गिरवी रखा जा सकता है और जब छुड़ाने योग्य धन प्राप्त हो जाय तो पहिले बालक को या सहायक को मुक्त करना चाहिए।
( ४ ) जो व्यक्ति अपने आपको गिरवी रखा चुका हो, यदि एक बार भी वह वहाँ से भाग निकले तो उसे आजीवन गुलाम बनाकर रखा जाय। जो व्यक्ति दूसरों के द्वारा गिरवी रखा गया हो, यदि वह दो बार भाग जाय तो उसे सदा के लिए दास
३१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) वित्तापहारिणो वा दासस्यार्यभावमपहरतोऽर्धदण्डः । निष्पतित-प्रेतव्यसनिनामाधाता मूल्यं भजेत । (२) प्रेतविण्मूत्रोच्छिष्टग्राहणमाहितस्य नग्नस्नापनं दण्डप्रेषणमति-क्रमणं च स्त्रीणां मूल्यनाशकरम् । धात्रीपरिचारिकार्धसीतिकोपचारिकाणां च मोक्षकरम् । सिद्धमुपचारकस्याभिप्रजातस्य अपक्रमणम् । (३) धात्रीमाहितिकां वाकामां स्ववशामधिगच्छतः पूर्वः साहस दण्डः, परवशां मध्यमः । कन्यामाहितिकां वा स्वयमन्येन वा दूषयतः मूल्यनाशः शुल्कं तद्विगुणश्च दण्डः । (४) आत्मविक्रयिणः प्रजामार्यां विद्यात् । आत्माधिगतं स्वामिकर्मा-विरुद्धं लभेत, पित्र्यं च दायम् । मूल्येन चार्यत्वं गच्छेत् । तेनोदरदासाहित-कौ व्याख्यातौ ।
बनाकर रखा जाय । ये दोनों दास यदि किसी दूसरे देश में चले जाने का इरादा करें तब भी उन्हें जीवन पर्यन्त के लिए दास बनाया जाय ।
(१) धन का अपहरण करने वाले तथा किसी आर्य को दास बनाने वाले व्यक्ति को आधा दण्ड दिया जाय । गिरवी रखे हुए व्यक्ति यदि भाग जायँ, मर जांय या बीमार हो जांय तो गिरवी रखने वाला ही उनका मूल्य दे ।
(२) जो स्वामी अपने पुरुष गुलामों से मुर्दा, मल-मूत्र या जूठन उठवावे, और महिला गुलामों को अनुचित दण्ड दे, उनके सतीत्व को नष्ट करे, नग्नावस्था में उसके पास जाय या नङ्गा कराके उनको अपने पास बुलावे तो उसका धन जब्त कर लिया जाय । यदि यही व्यवहार दाई, परिचारिका, अर्द्धसीतिका (जिस जाति में पुरुषों का जीवन-निर्वाह स्त्रियों पर निर्भर रहता है) और भीतरी दासी (उपचारिका) आदि के साथ किया जाय तो उन्हें दासकार्य से मुक्त कराया जाय । यदि उच्चकुलोत्पन्न दास से उक्त कार्य कराये जायँ तो वह दास कर्म को छोड़कर जा सकता है ।
(३) अपनी दासी या गिरवी रखी हुई किसी स्त्री को उनकी इच्छा के विरुद्ध अपने वश में करने वाले व्यक्ति को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय किन्तु उनको यदि दूसरे व्यक्ति के वश में करने की कोशिश करे तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाय । गिरवी में आई कन्या को यदि कोई व्यक्ति स्वयं या किसी दूसरे के द्वारा दूषित करे तो उसका बदले में दिया धन जब्त कर लिया जाय, जुर्माने के तौर पर कुछ धन वह कन्या को दे और उससे दुगुना दण्ड सरकार को अदा करे ।
(४) अपने आपको बेच देने वाले आर्य पुरुष की सन्तान भी आर्य ही समझी जाय । वह अपने मालिक की आज्ञानुसार कमाये हुए धन को अपने पास रख सकता है और पिता की सम्पत्ति का भी उत्तराधिकारी हो सकता है । बाद में अपनी कीमत
प्र० ६६ : अ० १३ ] दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम ३१३
(१) प्रक्षेपानुरूपश्चास्य निष्क्रयः । (२) दण्डप्रणीतः कर्मणा दण्डमुपनयेत् । (३) आर्यप्राणो ध्वजाहृतः कर्मकालानुरूपेण मूल्यार्धेन वा विमुच्येत । (४) गृहजातदायागतलब्धक्रीतानामन्यतमं दासमूनाष्टवर्षं विबन्धु-मकामं नीचे कर्मणि विदेशे दासीं वा सगर्भामप्रतिविहितगर्भभर्मण्यां विक्र-याधानं नयतः पूर्वः साहसदण्डः, क्रेतृश्रोतॄणां च । (५) दासमनुरूपेण निष्क्रयेणार्यमकुर्वतो द्वादशपणो दण्डः । संरोध-श्चाकारणात् । दासद्रव्यस्य ज्ञातयो दायादाः । तेषाम् अभावे स्वामी । (६) स्वामिनः स्वस्यां दास्यां जातं समातृकमदासं विद्यात् । गृह्या चेत् कुटुम्बार्थचिन्तनी, माता भ्राता भगिनी चास्या अदासाः स्युः ।
को चुकता कर वह आर्यश्रेणी में आ सकता है । इसी प्रकार उदरदास ( आजीवन दास ) और आहितक दास ( गिरवी रखा हुआ दास ) के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
( १ ) गिरवी रखने के अनुसार ही उनके छुड़ाने का मूल्य भी होना चाहिए ।
( २ ) जिस व्यक्ति को दण्ड का धन भुगतान न करने के कारण दास बनना पड़ा हो, वह किसी तरह का कार्य कर उस धन का भुगतान करके स्वतन्त्र हो सकता है ।
( ३ ) आर्य जाति का कोई व्यक्ति यदि युद्ध में पराजित होने पर दास बनाया गया हो तो वह अपने कार्य के बल पर या समय के अनुसार या अपने पकड़े जाने का आधा मूल्य देकर छुटकारा पा सकता है ।
( ४ ) अपने ( स्वामी के ) घर में पैदा हुए, दाय-भाग के समय अपने हिस्से में आये या स्वयं खरीदे हुए, बन्धु-बान्धवों से रहित, आठ वर्ष से कम उम्र के दास को उसकी इच्छा के विरुद्ध, यदि कोई व्यक्ति नीच कार्य के लिए किसी विदेशी के हाथ बेचे या गिरवी रखे तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय; इसी प्रकार यदि कोई स्वामी गर्भिणी दासी को, उसके गर्भ की रक्षा का कोई प्रबन्ध न करके दूसरे के हाथ बेचे या गिरवी रखे तो उसको भी प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । इनके अति-रिक्त उनके खरीदने वालों और गवाहों को भी यही दण्ड दिया जाय ।
( ५ ) जो व्यक्ति उचित मूल्य पाने पर भी किसी को दासता से मुक्त नहीं करता, उस पर बाहर पण दण्ड किया जाय । यदि मुक्त न करने का कोई कारण न हो तो उसको कारवास का दण्ड दिया जाय । दास की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी उसके बन्धु-बांधव एवं कुटुम्बी लोग होते हैं । उनके न होने पर दास का स्वामी ही उसकी सम्पत्ति का अधिकारी है ।
( ६ ) यदि स्वामी द्वारा अपनी दासी में सन्तान पैदा हो जाय तो वह सन्तान
३१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
३१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) दासं दासीं वा निष्क्रीय पुनर्वििक्रयाधानं नयतो द्वादशपणो दण्डः, अन्यत्र स्वयंवादिभ्यः । इति दासकल्पः । (२) कर्मकरस्य कर्मसम्बन्धमासन्ना विद्युः । यथासम्भाषितं वेतनं लभेत । कर्मकालानुरूपमसम्भाषितवेतनम् । कर्षकः सस्यानां, गोपालकः सर्पिषां, वैदेहकः पण्यानामात्मना व्यवहृतानां दशभागमसम्भाषितवेतनो लभेत । सम्भाषितवेतनस्तु यथासम्भाषितम् । (३) कारुशिल्पिकुशीलवचिकित्सकवाग्जीवनपरिचारकादिराशाकारिकवर्गस्तु यथान्यस्तद्विधः कुर्यात् । यथा वा कुशलाः कल्पयेयुः तथा वेतनं लभेत । साक्षिप्रत्ययमेव स्यात् । साक्षिणामभावे यतः कर्म ततोऽनुयुञ्जीत । (४) वेतनादाने दशबन्धो दण्डः, षट्पणो वा । अपव्ययमाने द्वादशपणो दण्डः, पंचबन्धो वा ।
और उसकी माता, दोनों को दासता से मुक्त कर दिया जाय । यदि वह स्त्री सद्गृहिणी बनकर स्वामी के घर में ही उसकी पत्नी बनकर रहना चाहे तो उसकी माँ, बहिन और भाइयों को दासता से मुक्त कर दिया जाय ।
( १ ) एक बार मुक्त हुए दास-दासी को यदि फिर कोई व्यक्ति बेचे या गिरवी रखे तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । किन्तु दास-दासी ही यदि स्वयं बिकने और गिरवी रखे जाने को कहें तो किसी को दोष न दिया जाय । यहां तक दास-दासियों के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
( २ ) नौकर का वेतन : पास-पड़ोस के रहने वालों की जानकारी में ही नौकर की नियुक्ति की जाय । जिसका वेतन तय हो गया हो वह उसी पर कार्य करे; किन्तु जिसका वेतन पहिले तय न हुआ हो वह अपने कार्य और समय के अनुसार अपना वेतन ले । किसान का नौकर अनाज का, ग्वाले का नौकर घी का और बनिये का नौकर अपने द्वारा व्यवहार की हुई वस्तुओं का दसवां हिस्सा ले; बशर्ते कि उसका वेतन तय न हुआ हो । यदि वेतन पहिले से तय है तो उसी पर नौकरी करे ।
( ३ ) कारीगर, नट, नर्तक, चिकित्सक, वकील ( वाग्जीवन ) और नौकर-चाकर आदि मेहनताने की आशा से कार्य करने वाले ( आशाकारिक ) व्यक्तियों को वैसा ही वेतन दिया जाय, जैसा अन्यत्र दिया जाता हो, अथवा जो भी वेतन कुशल पुरुष नियत कर दे तदनुसार दिया जाय । इस विषय पर विवाद होने पर साक्षियों के अनुसार ही निर्णय दिया जाय । यदि साक्षी न हों तो जैसा कार्य किया हो, उसी के अनुसार फैसला किया जाय ।
( ४ ) उनका वेतन न देने पर वेतन का दसवां हिस्सा या छह पण दण्ड किया जाय । अपव्यय करने पर उसका पांचवां हिस्सा या बारह पण दण्ड किया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में स्वाम्यधिकार नामक
प्र० ६९ : अ० १३ ] दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम ३१५
(१) नदीवेगज्वालास्तेनव्यालोपरुद्धः सर्वस्वपुत्रदारात्मदानेनार्त-स्त्रातारमाहूय निस्तीर्णः कुशलप्रदिष्टं वेतनं दद्यात् । तेन सर्वत्रार्तदानानुशया व्याख्याताः ।
(२) लभेत पुंश्चली भोगं सङ्गमस्योपलिङ्गनात् ।
अतियाच्ञा तु जीयेत दौर्मत्याविनयेन वा ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे स्वाम्यधिकारो नाम त्रयोदशोऽध्यायः,
आदित एकोनसप्ततितमः ।
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( १ ) नदी के प्रवाह में बहता हुआ या अग्नि, चोर, सांप और हिंसक पशुओं से घिरा हुआ कोई व्यक्ति यदि जान बचाने की गरज से किसी को अपना सर्वस्व, स्त्री, पुत्र धन आदि, देने का वायदा कर आपत्ति से बच जाय तो उस पर तत्कालीन चतुर व्यक्ति जो भी निर्णय दे दें उसी के अनुसार रक्षक को दिया जाय । इसी प्रकार आपद्युक्त लोगों के दूसरे प्रणों के सम्बन्ध में भी जान लेना चाहिए ।
( २ ) वेश्या को चाहिए कि वह संभोग शुल्क को पहिले ही ले ले । यदि वह बुरी नियत से या डरा-धमका कर अनुचित तरीके से अधिक धन लेना चाहे तो उसे वह कदापि न दिया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में स्वाम्यधिकार नामक
तेरहवाँ अध्याय समाप्त
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प्रकरण ७० अध्याय १४
कर्मकरकल्पः, सम्भूयसमुत्थानम्
(१) गृहीत्वा वेतनं कर्म अकुर्वतो भृतकस्य द्वादशपणो दण्डः । संरोधश्चाकारणात् । (२) अशक्तः कुत्सिते कर्मणि व्याधौ व्यसने वा अनुशयं लभेत, परेण वा कारयितुम् । तस्य व्ययकर्मणा लभेत, भर्ता वा कारयितुम् । (३) नान्यस्त्वया कारयितव्यो मया वा नान्यस्य कर्तव्यमित्यवरोधे भर्तुरकारयतो भृतकस्याकुर्वतो वा द्वादशपणो दण्डः । कर्मनिष्ठापने भर्तुरन्यत्र गृहीतवेतनो नासकामः कुर्यात् । (४) उपस्थितमकारयतः कृतमेव विद्यादित्याचार्याः । (५) नेति कौटिल्यः । कृतस्य वेतनं, नाकृतस्यास्ति । स चेदल्पमपि कारयित्वा न कारयेत्, कृतमेवास्य विद्यात् । देशकालातिपातनेन कर्मणा-
मजदूरी के नियम और साझेदारी का हिस्सा
(१) वेतन लेकर जो नौकर कार्य न करे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि अकारण ही वह कार्य न करे तो उसे कारावास में बन्द कर दिया जाय ।
(२) किसी अशक्त, कुत्सित कार्य के आ जाने पर, बीमारी में या किसी आपत्ति में फँस जाने के कारण नौकर आकस्मिक छुट्टी (अनुशय) ले सकता है; अथवा अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को रखकर छुट्टी ले सकता है। स्थानापन्न नौकर की मजदूरी उसके कार्य से ही पूरी की जाय अथवा मालिक ही किसी दूसरे से कार्य ले ।
(३) 'न तो आप किसी से कार्य करवायेंगे और न मैं ही किसी का कार्य करूँगा' इस प्रकार के आपसी समझौते को यदि मालिक भंग करे तो बारह पण दण्ड और यदि नौकर भंग करे तो भी बारह पण दण्ड दिया जाय । यदि किसी मजदूर ने दूसरी जगहों से अग्रिम वेतन ले लिया हो, तो पहिले मालिक का कार्य पूरा करने पर ही, वह दूसरी जगह जा सकता है ।
(४) कुछ आचार्यों का अभिमत है कि हाजिर हुआ मजदूर यदि कुछ कार्य न भी करे तो हाजिरी मात्र से ही उसका कार्य समझ लिया जाय ।
(५) परन्तु आचार्य कौटिल्य ऐसा नहीं मानते हैं। उनका कथन है कि वेतन कार्य करने का दिया जाता है, खाली बैठने का नहीं। यदि मालिक थोड़ा ही काम
प्र० ७० : अ० १४ ] मजदूरी के नियम ३१७
मन्यथाकरणे वा नासकामः कृतमनुमन्येत । सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं न मोघं कुर्यात् । (१) तेन संघभृता व्याख्याताः । तेषामाधिः सप्तरात्रमासीत । ततोऽन्यमुपस्थापयेत्; कर्मनिष्पाकं च । न चानिवेद्य भर्तुः संघः कंचित्परिहरेदुपनयेद्वा । तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः । संघेन परिहृतस्यार्धदण्डः । इति भृतकाधिकारः । (२) सघंभृताः सम्भूयसमुत्थातारो वा यथासम्भाषितं वेतनं समं वा विभजेरन् । (३) कर्षकवैदेहका वा सस्यपण्यारम्भपर्यवसानान्तरे सन्नस्य यथाकृतस्य कर्मणः प्रत्यंशं दद्युः । पुरुषोपस्थाने समग्रमंशं दद्युः । संसिद्धे तूद्धृतपण्ये सन्नस्य तदानीमेव प्रत्यंशं दद्युः । सामान्या हि पथि सिद्धिश्चासिद्धिश्च ।
कराके फिर न कराये तो नौकर का पूरा काम किया हुआ समझा जाय । मालिक के आज्ञानुसार ठीक स्थान और समय पर काम न करने से या कार्यों को उलटा कर देने से नौकर काम किया हुआ न समझा जाय । मालिक जितना काम बताये नौकर यदि उससे अधिक कार्य कर डाले तो वह अतिरिक्त मेहनत व्यर्थ समझनी चाहिए ।
( १ ) मिल, कारखाना और कम्पनियों में काम करने वाले मजदूरों के लिए भी यही नियम समझना चाहिए । ठीक तरह से कार्य न करने वाले मजदूरों की सात दिन की मजदूरी दबाये रखनी चाहिए, इतने पर भी यदि वे ठीक तरह से कार्य न करें तो वह कार्य दूसरे को दे देना चाहिए, और उस कार्य को ठीक कराकर दूसरे को उचित मजदूरी दे देनी चाहिए । मजदूरों को चाहिए कि मालिक को बिना सूचित किये वे न तो किसी वस्तु को नष्ट करें और न ले जाँय । इस नियम का उल्लंघन करने पर चौबीस पण दण्ड दिया जाय यदि सभी मजदूर मिलकर ऐसा करें तो उनको आधा दण्ड दिया जाय । यहाँ तक मजदूरों ( भृतकों ) के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
( २ ) संघ से एक मुष्ट मजदूरी पाने वाले या मिलकर ठेके आदि पर काम करने वाले मजदूर पहले से तय की हुई मजदूरी आपस में बराबर-बराबर बांट लें ।
( ३ ) किसान को चाहिए कि वह फसल के आरम्भ से अन्त तक और खरीद-फरोख्त करने वाले व्यापारी को चाहिए कि माल खरीदने से लेकर बेचने तक वे अपने साझीदार को उसके कार्य के अनुसार हिस्सा दें । यदि कोई साझीदार अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को नियत कर दे तब भी उसका पूरा हिस्सा दिया जाय, माल बिक जाने पर दुकान उठने से पहिले ही साझीदार को उसका हिस्सा भी दिया जाय; क्योंकि आगे कार्य करने सफलता और असफलता समान है ।