भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गृहपतितापसव्यञ्जन प्रणिधि

२४४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) समाहर्ता जनपदं चिन्तयेदेवमुत्थितः । चिन्तयेयुश्च संस्थास्ताः संस्थाश्चान्याः स्वयोनयः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गृहपतितापसव्यञ्जनप्रणिधिर्नाम पंचविंशोऽ- ध्यायः, आदितः पञ्चपञ्चाशः ।

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(१) इस प्रकार अपने कार्यों में तत्पर समाहर्त्ता जनपद की रक्षा का प्रबन्ध करें और उसकी आज्ञा से कार्य करने वाले गुप्तचर एवं उनके विभिन्न संघ, संस्था आदि जनपद के प्रबन्ध में तत्पर रहें।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गृहपतितापसव्यञ्जन प्रणिधि पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ५५ | नागरिकप्रणिधिः अध्याय ३६ |


(१) समाहर्तृवन्नागरिको नगरं चिन्तयेत्, दशकुलीं गोपो, विंशतिकुलीं चत्वारिंशत्कुलीं वा । स तस्यां स्त्रीपुरुषाणां जातिगोत्रनामकर्मभिः जङ्घाग्रमायव्ययौ च विद्यात् । (२) एवं दुर्गचतुर्भागं स्थानिकश्चिन्तयेत् । (३) धर्मवसथिनः पाषण्डिपथिकानावेद्य वासयेयुः । स्वप्रत्ययाश्च तपस्विनः श्रोत्रियांश्च । (४) कारुशिल्पिनः स्वकर्मस्थानेषु स्वजनं वासयेयुः । वैदेहकाश्चान्योन्यं स्वकर्मस्थानेषु । पण्यानामदेशकालविक्रेतारमस्वकरणं च निवेदयेयुः । (५) शौण्डिकपाक्वमांसिकौदनिकरूपाजीवाः परिज्ञातमावासयेयुः । अतिव्ययकर्तारमत्याहितकर्माणं च निवेदयेयुः ।


नागरिक के कार्य

( १ ) समाहर्त्ता की तरह नागरिक अधिकारी भी नगर के प्रबन्ध की चिन्ता करे । उत्तम दस कुलों, मध्यम बीस कुलों और अधम चालीस कुलों का प्रबन्ध गोप नामक अधिकारी करे । उन कुलों के स्त्री-पुरुषों के वर्ण, गोत्र, नाम, कार्य, उनकी संख्या और उनके आय-व्यय के सम्बन्ध के वह भली भाँति जाने ।

( २ ) इसी प्रकार दुर्ग के चौथे हिस्से का प्रबन्ध, अर्थात् दुर्ग में रहने वाले स्त्री-पुरुषों के सम्बन्ध में उक्त जानकारी स्थानिक नामक अधिकारी प्राप्त करे ।

( ३ ) धर्मशाला के प्रबन्धक को चाहिए कि वह, धूर्त-पाखण्डी मुसाफिरों को गोप की अनुमति से ही टिकाये, किन्तु जिन तपस्वियों या श्रोत्रियों को वह स्वयं जानता है, उन्हें अपनी जिम्मेदारी पर भी टिका सकता है ।

( ४ ) मोटे तथा महीन कार्य को करने वाले सुपरिचित एवं विश्वस्त कारीगर को अपने कार्य करने के स्थानों में ठहराया जा सकता है । व्यापारी लोग अपने जान-पहचान वाले व्यापारियों को अपनी-अपनी दूकानों में ठहरा सकते हैं, किन्तु देश-काल के विपरीत व्यापार करने वाले या दूसरे के सामान को अपने व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति की सूचना नागरिक को कर देनी चाहिए ।

( १ ) मद्य-मांस बेचने वाले, होटल वाले और वेश्यायें अपने-अपने परिचितों

२४६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) चिकित्सकः प्रच्छन्नव्रणप्रतीकारयितारमपथ्यकारिणं च गृहस्वामी च निवेद्य गोपस्थानिकयोर्मुच्यते । अन्यथा तुल्यदोषः स्यात् ।

(२) प्रस्थितागतौ च निवेदयेत् । अन्यथा रात्रिदोषं भजेत । क्षेमरात्रुषु त्रिपणं दद्यात् ।

(३) पथिकोत्पथिकांश्च बहिरन्तश्च नगरस्य देवगृहपुण्यस्थानवनश्मशानेषु सत्रणमनिष्टोपकरणमुद्भाण्डीकृतमाविग्नमतिस्वप्नमध्वक्लान्तमपूर्वं वा गृह्णीयुः ।

(४) एवमभ्यन्तरे शून्यनिवेशायवेशनशौण्डिकौदनिकपाक्वमांसिकद्यूतपाषण्डावासेषु विचयं कुर्युः ।

(५) अग्निप्रतीकारं च ग्रीष्मे मध्यमयोरह्णश्चतुर्भागयोः । अष्टभागोऽग्निदण्डः । बहिरधिश्रयणं वा कुर्युः ।


को अपने घर ठहरा सकते हैं । जो व्यक्ति अधिक खर्चीला दीखे या अधिक शराब पीता हो, उसकी सूचना गोप अथवा स्थानिक के पास भेज देनी चाहिए ।

( १ ) जो व्यक्ति हथियार लगे अपने घावों का इलाज छिपा कर कराता है और रोग या महामारी आदि फैलाने वाले द्रव्यों का छिपे तौर से उपयोग करता है, उसका इलाज करने वाला वैद्य यदि उसके इन कार्यों की सूचना गोप या स्थानिक को दे देता है तो वह अदण्ड्य है, किन्तु यदि वह सूचना न दे तो अपराधी के समान ही उसको भी दण्ड दिया जाना चाहिए, जिस घर में ऐसे कार्य किए जाते हों उस घर का मालिक यदि गोप या स्थानिक को सूचित कर देता है तो वह क्षम्य है, अन्यथा उसको भी अपराधी के समान दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( २ ) घर के मालिक को चाहिए कि वह घर से जाने वाले या घर में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सूचना गोप को दे । अन्यथा वे लोग रात्रि में यदि किसी की चोरी आदि करें तो गृहस्वामी उसके लिए उत्तरदायी समझा जायगा । वे लोग भले ही कुछ भी अपराध न करें, किन्तु सूचना न देने के अपराध में गृहस्वामी प्रतिरात्रि तीन पण दण्ड का भागी है ।

( ३ ) व्यापारियों के वेश में बड़े-बड़े मार्गों पर घूमने वाले, ग्वाले तथा लकड़हारे के वेश में रास्ता छोड़कर जंगलों में घूमने वाले, नगर के भीतर या बाहर बने हुए मन्दिरों, तीर्थों, जंगलों या श्मशानों, कहीं भी, हथियार से घायल, हथियार तथा विष को लिये हुए, सामर्थ्य से अधिक भार उठाये हुए, डरे हुए, घबड़ाये हुए, घोर निद्रा में सोये हुए, थके हुए या इसी प्रकार का कोई अजनबी पन किये हुये, इस प्रकार के सन्दिग्ध व्यक्ति को पकड़कर नागरिक के सुपुर्द कर देना चाहिए ।

( ४ ) इसी प्रकार नगर के खंडहरों में, कल-कारखानों में, शराब की दूकानों में, होटलों में, मांस बेचने वाली दूकानों में, जुआघरों में, पाखंडियों के अड्डों में कोई सन्दिग्ध व्यक्ति दिखाई दे तो, गुप्तचर उसको पकड़ कर नागरिक को सौंप दें ।

( ५ ) गर्मी की ऋतु में मध्याह्न के चार भागों में आग जलाने की मनाही कर

प्र० ५५ : अ० ३६ ] नागरिक के कार्य २४७

(१) पादः पञ्चघटीनाम् । कुम्भद्रोणीनिःश्रेणीपरशुशूर्पाङ्कुशकचग्रहणीदृतीनां चाकरणे । (२) तृणकटच्छन्नान्यपनयेत् । अग्निजीविन एकस्थान् वासयेत् । स्वगृहद्वारेषु गृहस्वामिनो वसेयुरसम्पातिनो रात्रौ । रथ्यासु कुटव्रजाः सहस्रं तिष्ठेयुः, चतुष्पथद्वारराजपरिग्रहेषु च । (३) प्रदीप्तमनभिधावतो गृहस्वामिनो द्वादशपणो दण्डः । षट्पणोऽवक्रयिणः । प्रमादाद्दीप्तेषु चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः । (४) प्रादीपिकोऽग्निना वध्यः । (५) पांसुन्न्यासे रथ्यायामष्टभागो दण्डः । पङ्कोदकसन्निरोधे पादः । राजमार्गे द्विगुणः ।


देनी चाहिए। जो भी इस आज्ञा का उल्लंघन करे उसे एक पण का आठवां हिस्सा दण्ड दिया जाय । अथवा ( यदि आवश्यक ही हो तो ) घास-फूस के मकानों के बाहर खुली जगह में आग जलाई जाय ।

( १ ) यदि कोई व्यक्ति निषिद्ध समय में पांच घड़ी तक आग जलावे तो उसे चौथाई पण दण्ड दिया जाय और उस व्यक्ति को भी यही दण्ड दिया जाय, जो गर्मी के मौसम में अपने घर के सामने पानी से भरे घड़े, पानी से भरी नांद, सीढ़ी, कुल्हाड़ा, सूप, छाज, कोंचा, फूस आदि को निकालने के लिए लम्बा लट्ठ, और चमड़े की मशक आदि वस्तुओं का इन्तजाम करके न रखें ।

( २ ) गर्मी की मौसम में फूस और चटाई के बने मकानों को एकदम उठा देना चाहिए। बढ़ई और लुहार आदि को किसी एक जगह में ही बसाया जाना चाहिए । घरों के स्वामियों को रात को अपने ही दरवाजों पर सोना चाहिए । गलियों तथा बाजारों में पानी से भरे हुए एक हजार घड़ों का हर समय प्रबन्ध रहना चाहिए । इसी प्रकार चौराहों, नगर के प्रधान द्वारों, खजानों कोष्ठागारों, गजशालाओं और अश्वशालाओं में भी पानी के भरे हजार-हजार घड़ों का हर समय इंतजाम रहना चाहिए ।

( ३ ) यदि गृहस्वामी घर में लगी हुई आग को बुझाने का प्रबंध न करे तो उस पर बारह पण दण्ड कर देना चाहिए । उस घर में रहने वाला किरायेदार भी यदि ऐसा ही करे तो उसे छह पण दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि धोखे से अपने घर में ही आग लग जाय तो गृहस्वामी को चौवन पण दण्ड देना चाहिए ।

( ४ ) मकान में आग लगाने वाला व्यक्ति यदि पकड़ लिया जाय तो उसे प्राण दण्ड की सजा देनी चाहिए ।

( ५ ) सड़क पर मिट्टी या कूड़ा-करकट डालने वाले व्यक्ति को पण का आठवाँ हिस्सा ( १/८ पण ) दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति गाड़ी, कीचड़ या पानी से सड़क को रोके उसे १/४ पण दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति राजमार्ग को इस प्रकार गन्दा करे या रोके उसे दुगुना दण्ड दिया जाना चाहिए ।

२४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) पुण्यस्थानोदकस्थानदेवगृहराजपरिग्रहेषु पणोत्तरा विष्ठादण्डाः । मूत्रेष्वर्धदण्डाः । (२) भैषज्यव्याधिभयनिमित्तमदण्ड्याः । (३) मार्जारश्वनकुलसर्पप्रेतानां नगरस्यान्तरुत्सर्गे त्रिपणो दण्डः । खरोष्ट्राश्वतरशवपशुप्रेतानां षट्पणः । मनुष्यप्रेतानां पञ्चाशतपणः । (४) मार्गविपर्यासे शवद्वारादन्यतः शवनिर्णयने पूर्वः साहसदण्डः । द्वाःस्थानां द्विशतम् । श्मशानादन्यत्र न्यासे दहने च द्वादशपणो दण्डः । (५) विषण्नालिकमुभयतोरात्रं यामतूर्यम् । तूर्यशब्दे राज्ञो गृहाभ्याशे सपादपणमक्षणताडनं प्रथमपश्चिमयामिकम् । मध्यमयामिकं द्विगुणम् । बहिश्चतुर्गुणम् ।

(१) राजमार्ग पर मल-त्याग करने वालों को एक पण, पवित्र तीर्थस्थानों पर मल-त्याग करने वालों को दो पण, जलाशयों पर मल-त्याग करने वालों पर तीन पण, देवालय में मल-त्याग करने वालों पर चार पण और खजाना, कोष्ठागार आदि स्थानों पर मलत्याग करनेवाले व्यक्तियों पर पाँच पण दण्ड किया जाना चाहिए । इन्हीं स्थानों में यदि कोई व्यक्ति पेशाब करे तो उस पर इसका आधा दण्ड किया जाना चाहिए ।

(२) यदि जुलाब लेने के कारण या अतिसार, प्रमेह आदि बीमारियों के कारण अथवा किसी डर से, उक्त स्थानों में कोई व्यक्ति मल-मूत्र-त्याग करे तो उसे दण्ड नहीं देना चाहिए ।

(३) मरे हुये बिल्ली, कुत्ता, नेवला और साँप को यदि कोई व्यक्ति नगर के पास या नगर के बीच में डाल आवे तो उस पर तीन पण दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि गधा, ऊँट, खच्चर तथा घोड़ा आदि को इस प्रकार छोड़ दिया जाय तो छोड़ने वाले को छह पण दण्ड दिया जाय । मनुष्य की लाश इस प्रकार छोड़ी जाने पर पचास पण दण्ड दिया जाना चाहिए ।

(४) मुर्दों को ले जाने के लिए जो रास्ता नियत है उसको छोड़ कर और जो द्वार नियत है, उसको छोड़कर दूसरी ही ओर से मुर्दा ले जाने वालों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । द्वार का रक्षक पुरुष यदि उन मुर्दा ले जाने वालों को न रोके तो उसे दो-सौ पण दण्ड दिया जाना चाहिए । श्मशान भूमि के अन्यत्र मुर्दा जलाने और गाड़ने वालों पर बारह पण दण्ड करना चाहिए ।

(५) रात की पहिली छह घड़ी बीत जाने पर और रात के अन्तिम छह घड़ी बाकी रह जाने पर, दोनों समय भोंपू देना चाहिये । उस रात्रि-घोष के बीच यदि कोई व्यक्ति राजमहल के पास गुजरता हुआ दिखाई दे तो उसे सवा पण दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति रात्रिघोष के ठीक मध्यकाल में आता-जाता पकड़ा जाय, उसे ढाई पण दण्ड देना चाहिए । यदि कोई व्यक्ति नगर के बाहर इस प्रकार आता-जाता पकड़ा जाये तो उस पर पाँच दण्ड कर देना चाहिए ।

प्र० ५५ : अ० ३६ ] नागरिक के कार्य २४९

(१) शङ्कनीये देशे लिङ्गे पूर्वापदाने च गृहीतमनुयुञ्जीत । (२) राजपरिग्रहोपगमने नगररक्षारोहणे च मध्यमः साहसदण्डः । (३) सूतिकाचिकित्सकप्रेतप्रदीपयानानागरिकतूर्यप्रेक्षाग्निनिमित्तं द्राभिश्चाग्राह्याः । (४) चाररात्रिषु प्रच्छन्नविपरीतवेषाः प्रव्रजिता दण्डशस्त्रहस्ताश्च मनुष्या दोषतो दण्ड्याः । (५) रक्षिणामवार्यं वारयतां वार्यं चावारयतामक्षणद्विगुणो दण्डः । स्त्रियं दासीमधिमेहयतां पूर्वः साहसदण्डः, अदासीं मध्यमः, कृतावरोधामुत्तमः, कुलस्त्रियं वधः । (६) चेतनाचेतनिकं रात्रिदोषमशंसतो नागरिकस्य दोषानुरूपो दण्डः, प्रमादस्थाने च ।


( १ ) उक्त रोक लगे समय में यदि कोई व्यक्ति बगीचों में छिपे हुये पाये जाँय, या जिनके पास ऐसा सामान पाया जाय कि उन पर चोर-डाकू होने का शक किया जा सके, अथवा जो पहिले से ही बदनाम हों और इस प्रकार घूमते हुए मिल जांय तो उनसे पूछा जाना चाहिए 'तुम कौन हो ? कहाँ से आये हो ? कहाँ जाओगे ? क्या कार्य करते हो ? यहाँ तुम क्यों आये हो ?' यदि वे सन्तोषजनक उत्तर दें तो उनके साथ उचित व्यवहार किया जाना चाहिए ।

( २ ) यदि इस प्रकार का कोई शंकित व्यक्ति सरकारी इमारतों या नगर-रक्षा के लिए बने सफ़ीलों अथवा दुर्गों के ऊपर चढ़ता हुआ पकड़ा जाय तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( ३ ) यदि उक्त रोक लगे समय में प्रसूता स्त्री, वैद्य हकीम, मुर्दाफ़रोश, उजाला लिए, सूचनार्थ आवाज करते हुए, नाटक-सिनेमा देखने, आग बुझाने आदि के लिए और जिनके पास राजकीय अनुमतिपत्र हो, आते-जाते पकड़ लिये जायें तो उन्हें गिरफ्तार नहीं करना चाहिए ।

( ४ ) विशेष उत्सवों के समय रात्रि में रोक हटा दी जाने पर जो व्यक्ति मुँह ढँककर अथवा वेष बदलकर तथा संन्यासी के वेष में दण्ड या हथियार लिए पकड़े जाय, उन्हें अपराध के अनुसार दण्ड देना चाहिए ।

( ५ ) जो पहरेदार रोके जाने योग्य व्यक्तियों को न रोक लें तो उन्हें, रोक लगे समय के अपराध से दुगुना अर्थात् ढाई पण दण्ड देना चाहिए । जो पुरुष दूसरे की स्त्री तथा दासी के साथ बलात्कार करे, उसे प्रथम साहस दण्ड देना चाहिए । दासी आदि के अलावा किसी वेश्या के साथ बलात्कार करने पर मध्यम साहस दण्ड देना चाहिए । यदि कोई दासी या वेश्या किसी की पत्नी बन चुकी हो और तब उसके साथ कोई बलात्कार करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । जो पुरुष कुलीन स्त्रियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करे उसको प्राणदण्ड की सजा देनी चाहिए ।

( ६ ) जान-बूझकर या अनजाने में, रात को किये गये अपराधों की सूचना

२५०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) नित्यमुदकस्थानमार्गभूमिच्छन्नपथवप्रप्राकाररक्षावेक्षणं नष्टप्रस्मृतापसृतानां च रक्षणम् । (२) बन्धनागारे च बालवृद्धव्याधितानाथानां जातनक्षत्रपौर्णमासीषु विसर्गः । पुण्यशीलाः समयानुबद्धा वा दोषनिष्क्रयं दद्युः । (३) दिवसे पञ्चरात्रे वा बन्धनस्थान् विशोधयेत् । कर्मणा कायदण्डेन हिरण्यानुग्रहेण वा ॥ (४) अपूर्वदेशाधिगमे युवराजाभिषेचने । पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य विधीयते ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे नागरिकप्रणिधिर्नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः, आदितः षट्पञ्चाशः ।

समाप्तमिदमध्यक्षप्रचारो नाम द्वितीयमधिकरणम् ।

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यदि कोई नगरवासी अध्यक्ष को न पहुँचावे तो अपराध के अनुसार उसके लिए दण्ड नियत होना चाहिए । उन पहरेदारों को भी उनके अपराध के अनुसार यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए, जिन्होंने पहरा देने में किसी प्रकार का प्रमाद किया हो ।

(१) नगर-अधिकारी ( नागरिक ) को चाहिए कि वह जल-स्थल मार्ग, सुरंग मार्ग, सफील, परकोटा, खाई तथा बुर्ज आदि की अच्छी तरह देख-भाल करें, और उन सभी खोये हुए, भूले हुए, छूटे हुए, आभूषण, सामान या प्राणियों को तब तक अपने संरक्षण के रखे, जब तक कि उनके असली मालिक का पता न लग जाय ।

(२) जेल में बन्द हुए बूढे, बच्चे बीमार और अनाथ कैदियों को राजा की वर्ष गांठ आदि अच्छे उत्सवों या पूर्णिमा आदि पर्वों पर छोड़ देना चाहिए । धोखे में यदि कोई धर्मात्मा पुरुष अपराधी बनाकर कैद में डाला गया हो तथा ऐसे व्यक्ति, जो भविष्य में अपराध न करने की प्रतिज्ञा करते हों, उन्हें अपराध के बदले में धन लेकर छोड़ देना चाहिए, उन्हें फिर जेल में न रखा जाना चाहिए ।

(३) प्रतिदिन या प्रति पाँचवें दिन, ऐसा नियम बना दिया जाय कि उस दिन धन लेकर, शारीरिक दण्ड देकर या कार्य कराकर ( निष्क्रय ) कुछ कैदी छोड़ दिये जांय । धनदण्ड, शारीरिक दण्ड या कार्यदण्ड, इन तीनों में से जो कैदी आसानी से जिस दण्ड को भुगत सके वही दण्ड उसको दिया जाय ।

(४) किसी नये देश की जीतने पर, युवराज का राज्याभिषेक होने पर और राजपुत्र के जन्मोत्सव पर कैदियों को छोड़ देना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में नागरिकप्रणिधि नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ।

दूसरा खण्ड

खण्ड १५३५

तीसरा अधिकरण

तीसरा अधिकरण

धर्मस्थीय

प्रकाशकीय विज्ञप्ति

परिशिष्ट ३.

प्रकरण ५६-५७
अध्याय १

व्यवहारस्थापना विवाहपदनिबन्धाश्चः

(१) धर्मस्थास्त्रयस्त्रयोऽमात्या जनपदसन्धिसंग्रहणद्रोणमुखस्थानीयेषु व्यावहारिकानर्थान् कुर्युः । (२) तिरोहितान्तरगारनक्तारण्योपध्युपह्वरकृतांश्च व्यवहारान् प्रतिषेधयेयुः । कर्तुः कारयितुश्च पूर्वः साहसदण्डः । श्रोतॄणामेकैकं प्रत्यर्धदण्डाः । श्रद्धेयानां तु द्रव्यव्यपनयः । (३) परोक्षेणाधिकरणग्रहणमवक्तव्यकरा वा तिरोहिताः सिद्धयेयुः । (४) दायनिक्षेपोपनिधिविवाहसंयुक्ताः स्त्रीणामनिष्कासिनीनां व्याधितानां चामूढसंज्ञानामन्तरगारकृताः सिद्धयेयुः । (५) साहसानुप्रवेशकलहविवाहराजनियोगयुक्ताः पूर्वरात्रव्यवहारिणां च रात्रिकृताः सिद्धयेयुः ।


शर्तनामों का लेखन प्रकार और तत्संबंधी विवादों का निर्णय

( १ ) दो राज्यों या गाँवों की सीमा ( जनपद-संधि ) पर, दस गाँवों के केन्द्र ( संग्रहण ) में, चार सौ गाँवों के केन्द्र ( द्रोणमुख ) में और आठ सौ गाँवों के केन्द्र ( स्थानीय ) में तीन-तीन न्यायाधीश ( धर्मस्थ ) एक साथ रह कर इकरारनामा, शर्तनामा आदि व्यवहार-संबंधी कार्यों का प्रबंध करें ।

( २ ) नियम-विरुद्ध शर्तनामे : उन शर्तनामों को न्याय-विरुद्ध घोषित किया जाय, जो छिप कर, घर के अंदर, रात में, जंगल में, छल-कपट से और एकांत में किए गए हैं । ऐसा नियम विरुद्ध कार्य करने वालों और कराने वालों, दोनों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । इस प्रकार के व्यवहारों में सुनकर गवाही देने वालों को आधा साहस दण्ड, और श्रद्धा-सहानुभूति रखने वालों को अर्थदण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जिस व्यवहार को गुप्त रूप से किसी दूसरे ने सुन लिया हो तथा जिसको नियम विरुद्ध-साबित न किया जा सके, ऐसा व्यवहार यदि छिपा कर भी किया गया हो तो उसे गैर कानूनी करार न दिया जाय ।

( ४ ) पर्दानशीन महिलाओं तथा चैतन्य रोगियों के द्वारा दायभाग, अमानत, धरोहर और विवाहसंबंधी घर के अंदर किए हुए व्यवहार भी नियमविरुद्ध न समझे जांय ।

( ५ ) डाका ( साहस ), चोरी ( अनुप्रवेश ), झगड़ा, विवाह तथा सरकारी

२५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

( १ ) सार्थव्रजाश्रमव्याधचारणमध्येष्वरण्यचरणामारण्यकृताः सिद्धयेयुः । ( २ ) गूढाजीविषु चोपधिकृताः सिद्धयेयुः । ( ३ ) मिथःसमवाये चोपह्वरकृताः सिद्धयेयुः । ( ४ ) अतोऽन्यथा न सिद्धयेयुः । अपाश्रयवद्भिर्वा कृताः, पितृमता पुत्रेण, पित्रा पुत्रवता, निष्कुलेन भ्रात्रा, कनिष्ठेनाविभक्तांशेन, पतिमत्या पुत्रवत्या च स्त्रिया, दासाहितकाभ्याम्, अप्राप्तातीतव्यवहाराभ्याम्, अभिशस्तप्रव्रजितव्यङ्गव्यसनिभिश्चान्यत्र निसृष्टव्यवहारेभ्यः । ( ५ ) तत्रापि क्रुद्धेनार्तेन मत्तेनोन्मत्तेनावगृहीतेन वा कृता व्यवहारा न सिद्धयेयुः कर्तृकारयितृश्रोतॄणां पृथग् यथोक्ता दण्डाः । ( ६ ) स्वे स्वे तु वर्गे देशे काले च स्वकरणकृताः सम्पूर्णचाराः शुद्धदेशा दृष्टरूपलक्षणप्रमाणगुणाः सर्वव्यवहाराः सिद्धयेयुः ।


हुक्म और रात के प्रथम पहर में वेश्यासंबंधी व्यवहार यदि रात के समय में भी किए जांय तो उन्हें गैरकानूनी नहीं माना जाय ।

( १ ) व्यापारी, ग्वाले, आश्रमवासी, शिकारी और गुप्तचर आदि जंगलों में रहने वालों तथा घूमने वालों के द्वारा जंगल में किए गए व्यवहार भी वैध समझे जांय ।

( २ ) गुप्तरूप से जीविका चलाने वालों द्वारा किए गए छल-कपट संबंधी व्यवहार भी नियमानुकूल समझे जांय ।

( ३ ) आपसी समझौते से एकांत में किए गए व्यवहार भी नियमसंगत हैं ।

( ४ ) इस प्रकार की विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त स्वीकार किए गए सभी व्यवहार गैरकानूनी समझे जांय । निराश्रित व्यक्ति, जिसका पिता जीवित हो, जिसका पुत्र जीवित हो, बिरादरी से बहिष्कृत भाई, जिसकी संपत्ति का बँटवारा न हुआ हो, जिस स्त्री का पति या पुत्र जीवित हो, दास, नाबालिग, बहुत बूढ़ा, समाज में निंदित, संन्यासी, लूले-लंगड़े और बीमार आदि व्यक्तियों द्वारा किए गए व्यवहार भी जायज न समझे जांय; किन्तु उन व्यवहारों को वैध समझा जाय जो कि उन्हें राजा की ओर से प्राप्त हो चुके हों ।

( ५ ) क्रोधी, दुःखी, मत्त, उन्मत्त, पागल आदि व्यक्तियों के द्वारा किये गये व्यवहार भी वैधानिक न समझे जांय । जो भी व्यक्ति इस प्रकार के व्यवहार करें या करायें तथा सुनें उन्हें पूर्वोक्त दण्ड देने चाहिएँ ।

( ६ ) परीक्षा : अपनी-अपनी जाति में उचित देश-काल और प्रकृति के अनुसार किए गए दोषरहित सभी व्यवहार वैध समझे जांय; बशर्ते कि उनकी सूचना

प्र० ५६-५७ : अ० १ ] विवादों का निर्णय २५७

(१) पश्चिमं चैषां करणमादेशाधिवर्जं श्रद्धेयम् । इति व्यवहार-स्थापना ।

(२) संवत्सरमृतुं मासं पक्षं दिवसं करणमधिकरणमृणं वेदकावेदकयोः कृतसमर्थावस्थयोर्देशग्रामजातिगोत्रनामकर्माणि चाभिलिख्य वादिप्रतिवादि-प्रश्नानर्थानुपूर्व्या निवेशयेत् । निविष्टांश्चावेक्षेत ।

(३) निबद्धं पादमुत्सृज्यान्यं पादं सङ्क्रामति । पूर्वोक्तं पश्चिमेनार्थेन नाभिसन्धत्ते । परवाक्यमनभिग्राह्यमभिग्राह्यावतिष्ठते । प्रतिज्ञाय देशं 'निर्दिश' इत्युक्ते न निर्दिशति । निर्दिष्टाद् देशादन्यं देशमुपस्थापयति । उपस्थिते देशेऽर्थवचनं 'नैवम्' इत्यपव्ययते । साक्षिभिरवधृतं नेच्छति । असम्भाष्ये देशे साक्षिभिर्मिथः सम्भाषत । इति परोक्तहेतवः ।

(४) परोक्तदण्डः पञ्चबन्धः । स्वयंवादिदण्डो दशबन्धः । पुरुषभृति-रष्टांशः । पथिभक्तमर्घविशेषतः । तदुभयं नियम्यो दद्यात् ।


दी गई हो और उनके रूप, लक्षण, प्रमाण तथा गुण की अच्छी तरह परीक्षा की गई हो ।

( १ ) बलात्कार जैसे व्यवहारों को छोड़ कर उनके सभी व्यवहार न्याय-सम्मत माने जाँय । यहाँ तक व्यवहार की स्थापना बताई गई ।

( २ ) अपने-अपने पक्ष की सहादत के लिए उपस्थित हुए मुद्दाला ( वेदक ) और मुद्दई ( आवेदक ) के देश, गाँव, जाति, गोत्र, नाम और व्यवसाय आदि को पहिले लिखा जाय; फिर कर्जा लेने या चुकाने का वर्ष, ऋतु, पक्ष, महीना, दिन, स्थान और गवाही आदि को लिखा जाय; अन्त में मुद्दई तथा मुद्दाला के बयान क्रमपूर्वक लिखे जाँय । तब जाकर उन पर विचार किया जाय ।

( ३ ) पराजय के लक्षण : बयान देते समय जो व्यक्ति प्रसङ्ग की बात न कहकर इधर-उधर की हाँकने लगता है; जिसके बयानों में कोई सिलसिला न हो, दूसरे की अमान्य बात को पकड़ कर उस पर डट जाता है, कर्जा लेने के स्थान पर हलफ देकर भी पूछने पर नहीं बतलाता या उसकी जगह किसी दूसरे ही स्थान को बतलाता है स्थान ठीक बताने पर ऋण लेने से मुकर जाता है; गवाहों की बात को स्वीकार नहीं करता; और निषिद्ध स्थान में गवाहों से मिल कर बात करता है; उसको हारा हुआ समझना चाहिए ।

( ४ ) पराजय का दण्ड : ऐसे हारे हुए व्यक्ति को ऋण की रकम का पाँचवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय । बिना गवाह के अपनी ही बात को जो बार-बार ठीक कहता जाय उसको ( देय रकम ) का दसवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय । इसके अतिरिक्त हर्जने के रूप में हारे हुए अपराधी से नौकरों के वेतन का आठवाँ हिस्सा और रास्ते का भोजन-भत्ता भी अदा कर लिया जाय ।

१७ कौ०

२५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) अभियुक्तो न प्रत्यभियुञ्जीत, अन्यत्र कलहसाहससार्थसमवायेभ्यः । न चाभियुक्तेऽभियोगोऽस्ति । (२) अभियोक्ता चेत् प्रत्युक्तस्तदहरेव न प्रतिब्रूयात्, परोक्तः स्यात् । कृतकार्यविनिश्चयो ह्यभियोक्ता, नाभियुक्तः । (३) तस्याप्रतिब्रुवतस्त्रिरात्रं सप्तरात्रमिति । अत ऊर्ध्वं त्रिपणावरार्ध्यं द्वादशपणपरं दण्डं कुर्यात् । त्रिपक्षादूर्ध्वमप्रतिब्रुवतः परोक्तदण्डं कृत्वा यान्यस्य द्रव्याणि स्युस्ततोऽभियोक्तारं प्रतिपादयेदन्यत्र प्रत्युपकरणेभ्यः । तदेव निष्पततोऽभियुक्तस्य कुर्यात् । अभियोक्तुर्निष्पातसमकालः परोक्तभावः । प्रेतस्य व्यसनिनो वा साक्षिवचनाः सारम् । अभियोक्ता दण्डं दत्त्वा कर्म कारयेत् । आधिं वा स कामं प्रवेशयेत् । रक्षोधनरक्षितं वा कर्मणा प्रतिपादयेदन्यत्र ब्राह्मणादिति ।


( १ ) फौजदारी, डाका, व्यापारियों और लिमिटेड कम्पनियों के झगड़ों को छोड़कर अभियुक्त, अभियोक्ता पर उलटा मुकदमा नहीं चला सकता है। अभियुक्त भी पहिली बात को लेकर अभियोक्ता पर पुनः मुकदमा नहीं चला सकता है।

( २ ) जवाबतलबी : जवाबतलब किये जाने पर तत्काल ही वादी यदि उत्तर नहीं देता तो उसको पराजित समझा जाय । क्योंकि पूरे सोच-विचार के बाद ही अभियोक्ता दावा दायर करता है, जब कि अभियुक्त ऐसी स्थिति में नहीं रहता है ।

( ३ ) मुहलत : इसलिए, अभियुक्त यदि फौरन ही जवाब न दे सके तो उसे तीन से सात रात तक की मुहलत दी जाय । इतनी मुहलत मिलने पर भी यदि वह उत्तर नहीं दे पाता तो उस पर तीन से बारह पण तक का दण्ड किया जाय । यदि डेढ़ महीने की मुहलत के बाद भी वह अपने अभियोग की सफाई पेश नहीं कर पाता तो उसको देय धन का पाँचवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय और उसकी सम्पत्ति में से जितना भी न्यायसंगत हो उतना हिस्सा अभियोक्ता को दिलाया जाय; सारी सम्पत्ति को दिये जाने के बाद भी यदि कुछ कर्जा बाकी रह जाय तो अभियुक्त के जीवन-निर्वाह योग्य अन्न, वस्त्र, बर्तन, बिस्तर आदि सामान अभियोक्ता को नहीं दिलाया जाय । यदि अभियोक्ता अपराधी सिद्ध हो जाय तब उपर्युक्त सारे अधिकार अभियुक्त को दिये जायें; किन्तु अभियुक्त ही यदि अपराधी साबित हो जाय तो उसको सफाई पेश करने की मुहलत न दी जाय; बल्कि तत्काल ही पूर्वोक्त दण्ड दिया जाय । यदि बीच ही में अभियुक्त मर जाय या किसी भारी विपदा में फँस जाय तो उसके गवाहों की सहादत के अनुसार अदालत अपराधी अभियोक्ता को यथोचित दण्ड देकर उससे काम ले । नियत समय तक न्यायालय उसको अपने अधिकार में रखे अथवा उससे जन-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को कराये । यदि अभियोक्ता ब्राह्मण हो तो उससे ऐसे कार्य न करवाये जायँ ।

प्र० ५६-५७ : अ० १ ] विवादों का निर्णय २५९

(१) चतुर्वर्णाश्रमस्यायं लोकस्याचाररक्षणात् ।
नश्यतां सर्वधर्माणां राजधर्मः प्रवर्तकः ॥
(२) धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम् ।
विवादार्थश्चतुष्पादः पश्चिमः पूर्वबाधकः ।
(३) अत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु ।
चरित्रं सङ्ग्रहे पुंसां राज्ञामाज्ञा तु शासनम् ॥
(४) राज्ञः स्वधर्मः स्वर्गाय प्रजा धर्मेण रक्षितुः ।
अरक्षितुर्वा क्षेप्तुर्वा मिथ्यादण्डमतोऽन्यथा ॥
(५) दण्डो हि केवलो लोकं परं चेमं च रक्षति ।
राज्ञा पुत्रे च शत्रौ च यथादोषं समं धृतः ॥
(६) अनुशासद्धि धर्मेण व्यवहारेण संस्थया ।
न्यायेन च चतुर्थेन चतुरन्तां महीं जयेत् ॥
(७) संस्थया धर्मशास्त्रेण शास्त्रं वा व्यावहारिकम् ।
यस्मिन्नर्थे विरुद्ध्येत धर्मेणार्थं विनिर्णयेत् ॥
(८) शास्त्रं विप्रतिपद्येत धर्मन्यायेन केनचित् ।
न्यायस्तत्र प्रमाणं स्यात्तत्र पाठो हि नश्यति ॥


( १ ) राजाज्ञा : चारों वर्ण, चारों आश्रम, सम्पूर्ण लोकाचार और नष्ट होते हुए सभी धर्मों का रक्षक राजा है; इसीलिये उसे धर्म का प्रवर्त्तक माना जाता है।

( २ ) धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजाज्ञा, ये विवाद के निर्णायक साधन होने के कारण राष्ट्र के चार पैर माने जाते हैं; इन्हीं पर सारा राज्य टिका है। इनमें भी धर्म से व्यवहार, व्यवहार से चरित्र और चरित्र की अपेक्षा राजाज्ञा श्रेष्ठ है।

( ३ ) उनमें धर्म सच्चाई में, व्यवहार साक्षियों में चरित्र समाज के जीवन में और राजाज्ञा राजकीय शासन में स्थित रहती है।

( ४ ) धर्मपूर्वक प्रजा पर शासन करना ही राजा का निजी धर्म है; वही उसको स्वर्ग तक ले जाता है। इसके विपरीत प्रजा की रक्षा न कर उसको पीड़ा पहुँचाने वाला राजा कभी भी सुखी नहीं रहता है।

( ५ ) पुत्र और शत्रु को उनके अपराध के अनुसार समानरूप से राजा द्वारा दिया हुआ दण्ड ही लोक और परलोक की रक्षा करता है।

( ६ ) धर्म, व्यवहार, चरित्र और न्यायपूर्वक शासन करता हुआ राजा सारी पृथ्वी का स्वामित्व प्राप्त करे।

( ७ ) जहाँ भी चरित्र तथा लोकाचार का धर्मशास्त्र के साथ विरोध की बात उपस्थित हो, वहाँ धर्मशास्त्र को ही प्रमाण मानना चाहिए।

( ८ ) किन्तु, किसी बात पर यदि राजा के धर्मानुकूल शासन का धर्मशास्त्र के

२६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) दृष्टदोषः स्वयंवादः स्वपक्षपरपक्षयोः । अनुयोगार्जवं हेतुः शपथश्चार्थसाधकः ॥ (२) पूर्वोत्तरार्थव्याघाते साक्षिवक्तव्यकारणे । चारहस्ताच्च निष्पाते प्रदेष्टव्यः पराजयः ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयाऽधिकरणे विवादपदनिबन्धो नाम प्रथमोऽध्यायः, आदितोः सप्तपञ्चाशः ।

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साथ विरोध पैदा हो जाय, तो वहाँ राज-शासन को ही प्रमाण मानना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से धर्मशास्त्र का पाठ मात्र ही नष्ट होता है।

(१ निर्णय के हेतु : मुकदमे का फैसला देने से पूर्व कुछ बातें आवश्यक हैं; जैसे १. जिसका अपराध देख लिया गया हो, २. जिसने अपने अपराध को स्वीकार कर लिया हो; ३. सरलता से जिरह; ४. सरलता से कारणों का पता लग जाना और २. कसम दिलाना, ये पाँचों बातें सच्चाई को सिद्ध करने में सहायक होती हैं ।

(२) यदि उक्त पांच हेतुओं के माध्यम से भी वादी-प्रतिवादी की पारस्परिक विरुद्ध दलीलों का उचित समाधान न हो सके तो साक्षियों और गुप्तचरों के द्वारा मामले की छान-बीन कराकर अपराध का फैसला देना चाहिए ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में विवादपदनिबन्ध नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ५८विवाहसंयुक्तं; विवाहधर्मः;
अध्याय २स्त्रीधनकल्प; आधिवेदनिकम्;

(१) विवाहपूर्वो व्यवहारः । (२) कन्यादानं कन्यामलङ्कृत्य ब्राह्मो विवाहः । (३) सहधर्मचर्या प्राजापत्यः । (४) गोमिथुनादानादार्षः । (५) अन्तर्वेद्यामृत्विजे दानाद् दैवः । (६) मिथस्समवायाद् गान्धर्वः । (७) शुल्कादानादासुरः । (८) प्रसह्यादानाद् राक्षसः ।


विवाह सम्बन्ध

धर्मविवाह : स्त्री का धन : स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार : पुरुष को पुनर्विवाह का अधिकार

( १ ) धर्मविवाह : विवाह के बाद ही सारे सांसारिक व्यवहार आरम्भ होते हैं ।

( २ ) वस्त्र-आभूषण आदि से सजाकर विधिपूर्वक-कन्यादान करना ब्राह्म विवाह कहलाता है ।

( ३ ) कन्या और वर, दोनों सहधर्म पालन करने की प्रतिज्ञा कर जिस विवाह बन्धन को स्वीकार करते हैं, उसे प्राजापत्य विवाह कहते हैं ।

( ४ ) वर से गऊ का जोड़ा लेकर जो विवाह किया जाता है उसे आर्ष विवाह कहते हैं ।

( ५ ) विवाह वेदी में बैठकर ऋत्विक् को जो कन्यादान दिया जाता है उसे दैव विवाह कहते हैं ।

( ६ ) कन्या और वर का आपसी सलाह से किया गया विवाह गान्धर्व विवाह ( Love marriage ) कहलाता है ।

( ७ ) कन्या के पिता को धन देकर जो विवाह किया जाता है उसे आसुर विवाह कहते हैं ।

( ८ ) किसी कन्या से बलात्कार करके विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है ।

२६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) सुप्तादानात् पैशाचः । (२) पितृप्रमाणाश्चत्वारः पूर्वे धर्म्याः । मातापितृप्रमाणाः शेषाः । तौ हि शुल्कहरौ दुहितुः । अन्यतराभावेऽन्यतरो वा । (३) द्वितीयं शुल्कं स्त्री हरेत् । सर्वेषां प्रीत्यारोपणमप्रतिषिद्धम् । (४) वृत्तिराबन्ध्यं वा स्त्रीधनम् । परद्विसाहस्रा स्थाप्या वृत्तिः । आबन्ध्या नियमः । (५) तदात्मपुत्रस्नुषाभर्मणि प्रवासाप्रतिविधाने च भार्याया भोक्तु-मदोषः । प्रतिरोधकव्याधिदुर्भिक्षभयप्रतीकारे धर्मकार्ये च पत्युः । सम्भूय वा दम्पत्योर्मिथुनं प्रजातयोस्त्रिवर्षोपभुक्तं च धर्मिष्ठेषु विवाहेषु नानुयु-ञ्जीत । गान्धर्वासुरोपभुक्तं सवृद्धिकमुभयं दाप्येत । राक्षसैपैशाचोपभुक्तं स्तेयं दद्यात् । इति विवाहधर्मः ।

(१) सोई हुई कन्या को हरण करके विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है।

(२) उक्त आठ प्रकार के विवाहों में पहिले चार प्रकार के विवाह पिता की सलाह से होने के कारण धर्मानुकूल विवाह हैं । बाकी चार विवाह माता-पिता दोनों की सलाह से होते हैं; क्योंकि वे दोनों लड़की को देकर उसके बदले में धन लेते हैं । उस धन को यदि पिता न हो तो माता ले सकती है और माता न हो पिता ले सकता है।

(३) इसके अतिरिक्त प्रीतिवश दिया हुआ दूसरे प्रकार का धन उस कन्या का है जिसके साथ विवाह किया गया हो । सभी प्रकार के विवाहों में स्त्री-पुरुष में परस्पर प्रीति का होना आवश्यक है ।

(४) स्त्री का धन : स्त्री का धन दो प्रकार का होता है : १. वृत्ति और २. आबध्य । स्त्री का वृत्ति धन वह है जो स्त्री के नाम से बैंक आदि में जमा किया गया हो । उसकी रकम कम-से-कम दो हजार तक होनी चाहिए । गहना या जेवर आदि आबध्य धन कहलाते हैं, जिनकी तादाद का कोई नियम नहीं है ।

(५) किसी स्त्री का पति परदेश चला जाय और उसकी (स्त्री की) जीविका निर्वाह के लिए कोई जरिया न हो तो वह स्त्री अपने पुत्र और अपनी पतोहू के जीवन-निर्वाह के लिए अपने निजी धन को खर्च कर सकती है । किसी विपत्ति, बीमारी, दुर्भिक्ष या इसी तरह के आकस्मिक संकट से बचने के लिए और किसी धर्म-कार्य में पति भी यदि स्त्री के निजी धन को खर्च करता है तो उसमें कोई बुराई नहीं । इसी प्रकार दो सन्तान पैदा होने पर स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर यदि उस धन को खर्च करें तब भी कोई दोष नहीं; और ऐसे पति-पत्नी जिनका विवाह धर्मानुकूल हुआ हो, कोई सन्तान पैदा न होने पर तीन वर्ष तक उस धन को खर्च कर सकते हैं । जिन्होंने गान्धर्व या आसुर विवाह किया हो और आपसी सलाह से वे स्त्री-धन को खर्च कर डालें तो उनसे ब्याजसहित मूलधन जमा कर लिया जाय । जिन्होंने

प्र० ५८ : अ० २ ] विवाह सम्बन्ध ( १ ) २६३

(१) मृते भर्तरि धर्मकामा तदानीमेवास्थाप्याभरणं शुल्कशेषं च लभेत । लब्ध्वा वा विन्दमाना सवृद्धिकमुभयं दाप्येत । कुटुम्बकामा तु श्वशुरपतिदत्तं निवेशकाले लभेत । निवेशकालं हि दीर्घप्रवासे व्याख्यास्यामः । (२) श्वशुरप्रातिलोम्येन वा निविष्टा श्वशुरपतिदत्तं जीयेत । ज्ञातिहस्तादभिमृष्टाया ज्ञातयो यथागृहीतं दद्युः । (३) न्यायोपगतायाः प्रतिपत्ता स्त्रीधनं गोपायेत् । (४) पतिदायं विन्दमाना जीयेत । धर्मकामा भुञ्जीत । (५) पुत्रवती विन्दमाना स्त्रीधनं जीयेत । तत्तु स्त्रीधनं पुत्रा हरेयुः । (६) पुत्रभरणार्थं वा विन्दमाना पुत्रार्थं स्फातीकुर्यात् ।


राक्षस तथा पैशाच विधि से विवाह किया हो ऐसे पति-पत्नी यदि स्त्री धन को खर्च कर डालें तो उन्हें चोरी का दण्ड दिया जाय । यहाँ तक विवाह धर्म का निरूपण किया गया है ।

( १ ) स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार : पति के मर जाने पर स्त्री यदि अपने धर्म-कर्म पर रहना चाहती हो तो उसे अपने दोनों प्रकार के निजी धन तथा प्रीति धन ले लेना चाहिए । उस धन को ले लेने के बाद यदि वह दूसरा पति कर ले तो ब्याज सहित सारे मूलधन को वह वापिस कर दे । यदि वह परिवार की इच्छा से दूसरा विवाह करना चाहती हो तो अपने मृत पति और श्वसुर के दिए हुए धन को विवाह के समय में ही पा सकती है, उसके पहिले नहीं । इस प्रकार के पुनर्विवाह का विस्तृत विवेचन आगे दीर्घप्रवास प्रकरण में किया जाएगा ।

( २ ) यदि विधवा स्त्री अपने ससुर की इच्छा के विरुद्ध पुनर्विवाह करना चाहे तो ससुर और मृत-पति का धन उसे नहीं मिलेगा । यदि विरादरी वालों के हाथ से उसके पुनर्विवाह का प्रबन्ध हो तो विरादरी वाले ही उसके लिये हुए धन को वापिस करें ।

( ३ ) न्यायपूर्वक प्राप्त हुई स्त्री की रक्षा करने वाला पुरुष ही उसके धन की भी रक्षा करे । पुनर्विवाह की इच्छा करने वाली स्त्री अपने मृत पति के उत्तराधिकार को नहीं पा सकती है ।

( ४ ) यदि वह धर्मपूर्वक जीवन-निर्वाह करने की इच्छा करे तो वह अपने मृत पति के उत्तराधिकार को भोग सकती है ।

( ५ ) यदि पुत्रवती स्त्री पुनर्विवाह करना चाहे तो वह निजी स्त्रीधन की अधिकारिणी नहीं हो सकती । उस स्त्री के निजी धन के उत्तराधिकारी उसके पुत्र ही होंगे ।

( ६ ) यदि कोई विधवा स्त्री अपने पुत्रों के भरण-पोषण के लिए पुनर्विवाह करना चाहे तो उसे अपनी निजी सम्पत्ति अपने लड़कों के नामजद कर देनी पड़ेगी ।