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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

६३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) क्षयस्थानवृद्धीनां चोत्तरोत्तरं लिप्सोत । प्रातिलोम्येन वा क्षयादीनाम् । आयत्यां विशेषं पश्येत् । (२) इति देशावस्थापनम् । (३) एतेन यात्रादिमध्यान्तेष्वर्थानर्थसंशयानामुपसंप्राप्तिर्व्याख्याता । (४) निरन्तरयोगित्वाच्चार्थानर्थसंशयानां यात्रादावर्थः श्रेयानुपसंप्राप्तुं पाष्णिग्राहासारप्रतिघाते क्षयव्ययप्रवासप्रत्यादेयमूलरक्षणेषु च भवति । तथानर्थः संशयो वा स्वभूमिष्ठस्य विषह्यो भवति । (५) एतेन यात्रामध्येऽर्थानर्थसंशयानामुपसम्प्राप्तिर्व्याख्याता । (६) यात्रान्ते तु कर्शनीयमुच्छेदनीयं वा कर्शयित्वोच्छिद्य वार्थः श्रेयानुपसम्प्राप्तुं नानर्थः संशयो वा पराबाधभयात् । (७) सामवायिकानामपुरोगस्य तु यात्रामध्यान्तगोऽनर्थः संशयो वा श्रेयानुपसंप्राप्तुमनिबन्धगामित्वात् ।


( १ ) क्षय ( शक्ति और सिद्धि की क्षीणता ), स्थान ( शक्ति और सिद्धि की एकावस्था ) और वृद्धि ( शक्ति और सिद्धि का उपचय ), इनमें से उत्तरोत्तर को प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए । अथवा यदि भविष्य में किसी वृद्धि की अतिशय संभावना हो तो वृद्धि से स्थान और स्थान से क्षय, इस प्रतिलोम गति से ही उसे प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए ।

( २ ) यहाँ तक देश-निमित्तक आपत्तियों का निरूपण किया गया ।

( ३ ) देशनिमित्तक आपत्तियों के स्वरूप और प्रतीकार के समान ही युद्धयात्रा के आदि, अन्त तथा मध्य में होने वाले अर्थ, अनर्थ और संशयों की प्राप्ति तथा प्रतीकार का भी निरूपण समझना चाहिए ।

( ४ ) यदि युद्धयात्रा के आदि में अर्थ, अनर्थ और संशय एक साथ ही उत्पन्न हो जायें तो उनमें से पहिले अर्थग्रहण करना ही श्रेयस्कर होता है । पाष्णिग्राह तथा आसार के प्रतिघात के लिए और क्षय, व्यय, प्रवास, प्रत्यादेय तथा मूल स्थान इन सबकी रक्षा के लिए अर्थ ही मूल कारण होता है : यदि युद्ध यात्रा के आरम्भ में अर्थ के समान ही अनर्थ और संशय भी उपस्थित हों तो अपनी भूमि में स्थित राजा उनका प्रतीकार सरलता से कर सकता है ।

( ५ ) इसी प्रकार युद्धयात्रा के मध्य में उत्पन्न अर्थ, अनर्थ और संशय की प्राप्ति तथा प्रतीकार का व्याख्यान भी समझ लेना चाहिए ।

( ६ ) यात्रा के अन्त में, परभूमि में स्थित विजिगीषु के लिए निर्बल एवं उच्छेदनीय शत्रु का ही अर्थग्रहण करना श्रेष्ठ है । ऐसी स्थिति में अनर्थ या संशय का ग्रहण करना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसे समय शत्रु की ओर से बाधा पहुँचने की पूरी सम्भावना बनी रहती है ।

( ७ ) यदि राजमंडल के किसी अप्रधान राजा पर आक्रमण किया जाय तो उस

प्र० १४५-१४६ : अ० ७ ] अर्थानर्थ-संशय विचार ६३१

(१) अर्थो धर्मः काम इत्यर्थत्रिवर्गः । तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयानुपसम्प्राप्तुम् । (२) अनर्थोऽधर्मः शोक इत्यनर्थत्रिवर्गः । तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयान् प्रतिकर्तुम् । (३) अर्थोऽनर्थ इति, धर्मोऽधर्म इति, कामः शोक इति संशयत्रिवर्गः । तस्योत्तरपक्षसिद्धौ पूर्वपक्षः श्रेयानुपसंप्राप्तुम् । (४) इति कालावस्थापनम् । इत्यापदः । (५) तासां सिद्धिः पुत्रभ्रातृबन्धुषु सामदानाभ्यां सिद्धिरनुरूपा, पौरजानपददण्डमुख्येषु दानभेदाभ्यां, सामन्ताटविकेषु भेददण्डाभ्याम् । (६) एषाऽनुलोमा विपर्यये प्रतिलोमा । मित्रामित्रेषु व्यामिश्रा सिद्धिः । परस्परसाधका ह्युपायाः ।


समय यात्रा के मध्य में और अन्त में होने वाले अनर्थ तथा संशय का प्रतीकार करना ही श्रेयस्कर होता है, क्योंकि प्रधान राजा उस समय नेतृत्व में ही फँसे रहते हैं और अप्रधान राजा प्रतिबन्धरहित होने के कारण कहीं भी जा सकता है ।

( १ ) अर्थ, धर्म और काम, इनको अर्थत्रिवर्ग कहा जाता है । इस अर्थत्रिवर्ग में पूर्व-पूर्व का ग्रहण करना अधिक श्रेयस्कर है ।

( २ ) अनर्थ, अधर्म और शोक, इनको अनर्थत्रिवर्ग कहा जाता है । इस अनर्थ-त्रिवर्ग में पूर्व-पूर्व का प्रतीकार करना अधिक कल्याणप्रद है ।

( ३ ) अर्थ-अनर्थ, धर्म-अधर्म और काम-शोक इनमें परस्पर संशय का होना संशयत्रिवर्ग कहा जाता है । इस संशयत्रिवर्ग में अनर्थ, अधर्म और शोक का प्रतीकार होने पर अर्थ, धर्म और काम का ग्रहण करना अधिक श्रेयस्कर है ।

( ४ ) यहाँ तक यात्राकाल के आदि, मध्य तथा अन्त आदि के अर्थों एवं अनर्थों की व्याख्या और अर्थ, अनर्थ तथा संशययुक्त सभी प्रकार की विपत्तियों का निरूपण किया गया ।

( ५ ) पुत्र, भाई और बन्धु-बांधवों के संबन्ध में साम तथा दान के अनुरूप प्रतीकार करना ही उचित समझा गया है । इसी प्रकार नागरिकों, जनपदवासियों, सैनिकों और राष्ट्र के प्रमुख व्यक्तियों के विषय में दान तथा भेद उपायों का प्रयोग करना ही उचित है । सामंत और आटविकों के संबंध में भेद तथा दण्ड के उपायों का प्रयोग करना उचित है ।

( ६ ) इस रीति से किया गया प्रतीकार अनुलोम कहलाता है और इसके विपरीत होने पर वह प्रतिलोम कहा जाता है । मित्र तथा शत्रुओं के विषय में आवश्यकतानुसार मिले-जुले ( व्यामिश्र ) उपायों द्वारा प्रतीकार करना चाहिए; क्योंकि सभी उपाय परस्पर एक-दूसरे के सहायक ही होते हैं ।

६३२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण

(१) शत्रोः शङ्कितामात्येषु सान्त्वं प्रयुक्तं शेषप्रयोगं निवर्तयति । दूष्यामात्येषु दानम् । संघातेषु भेदः । शक्तिमत्सु दण्ड इति । (२) गुरुलाघवयोगाच्चापदां नियोगविकल्पसमुच्चया भवन्ति । (३) 'अनेनैवोपायेन नान्येन' इति नियोगः । (४) 'अनेन वाऽन्येन वा' इति विकल्पः । (५) 'अनेनान्येन च' इति समुच्चयः । (६) तेषामेकयोगाश्चत्वारस्त्रियोगाश्च, द्वियोगाः षट्, एकश्चतुर्योग इति पञ्चदशोपायाः । तावन्तः प्रतिलोमाः । (७) तेषामेकेनोपायेन सिद्धिरेकसिद्धिः, द्वाभ्यां द्विसिद्धिः, त्रिभिस्त्रिसिद्धिः, चतुर्भिश्चतुःसिद्धिरिति ।


( १ ) अपने जिन अमात्यों पर शत्रु संदेह करता है उन पर किया गया साम प्रयोग अन्य सभी उपायों का निवारण कर देता है। इसी प्रकार शत्रु के दूष्य अमात्यों में दान, आपस में मिले हुए अमात्यों में भेद और शक्तिमान्-अमात्यों में दण्ड का प्रयोग, शेष सभी उपायों को निवृत्त कर देता है ।

( २ ) छोटी-बड़ी आपत्तियों के अनुसार ही उपायों के नियोग, विकल्प और समुच्चय हुआ करते हैं ।

( ३ ) केवल इसी उपाय से कार्यसिद्धि हो सकेगी, दूसरे से नहीं, इसी का नाम नियोग है ।

( ४ ) इस उपाय से कार्यसिद्धि होगी या दूसरे उपाय से इसका नाम विकल्प है ।

( ५ ) इस उपाय को तथा दूसरे उपाय को मिलाकर कार्यसिद्धि होगी, इसका नाम समुच्चय है ।

( ६ ) साम आदि चारों उपायों को अलग-अलग, दो-दो, तीन-तीन या चार-चार एक साथ मिलाकर पंद्रह तरह से प्रयोग में लाया जा सकता है । जैसे—सामदानभेद, सामदानदण्ड, सामभेददण्ड और दानभेददण्ड—ये चार; केवल साम, केवल दान, केवल भेद और केवल दण्ड—ये चार; सामदान, सामभेद, सामदण्ड, दानभेद, दानदण्ड और भेददण्ड—ये छः और सामदानदण्डभेद, इन चारों को मिलाकर एक; इस प्रकार ( ४+४+६+१ ) पंद्रह प्रयोग होते हैं । पंद्रह प्रकार के प्रतिलोम उपाय भी होते हैं; जैसे—दण्ड, भेद, दान, साम—ये चार; दण्डभेददान, दण्डभेदसाम, भेददानसाम, दण्डदानसाम—ये चार; दण्डभेद, दण्डदान, दण्डसाम, भेददान, भेदसाम, दानसाम—ये छह और दण्ड आदि चारों एक साथ मिलाकर पंद्रह प्रतिलोम उपाय होते हैं ।

( ७ ) उक्त उपायों में से एक ही उपाय के द्वारा जो कार्यसिद्धि होती है उसे

प्र० १४५-१४६ : अ० ७] अर्थानर्थ-संशय-विचार ६३३

(१) धर्ममूलत्वात्कामफलत्वाच्चार्थस्य धर्मार्थकामानुबन्धा याऽर्थस्य सिद्धिः सा सर्वार्थसिद्धिः ।
(२) इति सिद्धयः ।
(३) दैवादग्निरुदकं व्याधिः प्रमारो विद्रवो दुर्भिक्षमासुरी सृष्टिः इत्यापदः ।
(४) तासां दैवतब्राह्मणप्रणिपातः सिद्धिः ।

(५) अवृष्टिरतिवृष्टिर्वा सृष्टिर्वा याऽऽसुरी भवेत् ।
तस्यामाथर्वणं कर्म सिद्धारम्भाश्च सिद्धयः ॥

इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे अर्थानर्थसंशययुक्तास्तासामुपायविकल्पजाः सिद्धयश्चेति सप्तमोऽध्यायः; आदितः सप्तविंशत्युत्तरशततमः ।

समाप्तमिदमभियास्यत्कर्म नाम नवममधिकरणम् ।

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एकसिद्धि कहते हैं । इसी प्रकार दो उपायों से हुई सिद्धि को द्विसिद्धि तीन उपायों से हुई सिद्धि को त्रिसिद्धि और चार उपायों से हुई सिद्धि को चतुःसिद्धि कहते हैं ।

(१) इन सिद्धियों से प्रतीकारस्वरूप होने वाले अनेक लाभों में से धर्म, काम और अर्थ का साधक होने के कारण अर्थ-लाभ ही सर्वश्रेष्ठ होता है, उसी को सर्वार्थ-सिद्धि के नाम ले कहा जाता है ।

(२) यहाँ तक मानुषी आपत्तियों को लेकर सिद्धियों का निरूपण किया गया ।

(३) अग्नि, जल, व्याधि, महामारी, राष्ट्रविप्लव, दुर्भिक्ष और आसुरी सृष्टि ये सब दैवी आपत्तियाँ हैं ।

(४) इन दैवी आपत्तियों का प्रतीकार देवता और ब्राह्मणों को अभिवादन करने से किया जा सकता है ।

(५) अनावृष्टि, अतिवृष्टि अथवा आसुरी सृष्टि आदि के कारण जो आपत्तियाँ उत्पन्न हों उनके प्रतीकारार्थ अथर्ववेद में निरूपित शान्तिकर्मों के अनुष्ठान द्वारा किया जाना चाहिए । सिद्ध, तपस्वी, महात्मा पुरुषों द्वारा आरम्भ किये गये शान्तिकर्मों द्वारा भी इन आपत्तियों का प्रतीकार समझना चाहिए ।

इति अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में अर्थानर्थसंशय विचार नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।

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दसवाँ अधिकरण

दसवाँ अधिकरण

साङ्ग्रामिक

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प्रकरण १४७## स्कन्धावारनिवेशः
अध्याय १

(१) वास्तुकप्रशस्ते वास्तुनि नायकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्कन्धावारं वृत्तं दीर्घं चतुरस्रं वा, भूमिवशेन वा, चतुर्द्वारं षट्पथं नवसंस्थानमापयेयुः । खातवप्रसालद्वारारट्टलकसम्पन्नं भये स्थाने च ।

(२) मध्यमस्योत्तरे नवभागे राजवास्तुकं धनुःशतायाममर्धविस्तारं पश्चिमार्धे तस्यान्तःपुरम् । अन्तर्वैशिकसैन्यं चान्ते निविशेत । पुरस्तादुपस्थानं, दक्षिणतः कोशशासनकार्यकरणानि, वामतो राजौपवाह्यानां हस्त्यश्वरथानां स्थानम् । अतो धनुःशतान्तराश्चत्वारः शकटमेथीप्रततिस्तम्भ-


छावनी का निर्माण

(१) भवन-निर्माण-कला के विशेषज्ञों द्वारा प्रशंसित क्षेत्र में सेनापति (नायक), कारीगर (वर्धकि) और ज्योतिषी (मौहूर्तिक) ये तीनों पारस्परिक परामर्श से गोलाकार, लंबा, चौकोर या जैसी भूमि हो उसी के अनुसार चारों दिशाओं में चार दरवाजों, छह मार्गों और नौ संस्थानों (डिविजन्स = वर्गों) से युक्त सैनिक छावनी (स्कंधावार) का निर्माण करायें। खाई, सफील, परकोटा, एक प्रधान द्वार और अट्टालिकाओं से युक्त स्कंधावार उसी अवस्था में बनवाया जाय, जबकि आक्रमण का भय तथा अधिक समय तक वहाँ टिके रहने की संभावना हो।

(२) स्कंधावार के बीच में उत्तर की ओर नौवें हिस्से में सौ धनुष लंबा तथा पचास धनुष चौड़ा और राजा का निवास-स्थान बनवाया जाय। उसके आधे हिस्से में पश्चिम की ओर अंतःपुर का निर्माण कराया जाय और अन्तःपुर के समीप ही अन्तःपुररक्षकों के लिए भी स्थान बनवाये जाँय। राजगृह के सामने राजा का विश्रामस्थान (उपस्थान) होना चाहिए। राजगृह की दाहिनी ओर खजाना, सेक्रेट्रिएट (शासनकरण) और कार्य-निरीक्षकों (कार्यकरण) के स्थान बनवाये जाँय। राजगृह के बाँई ओर हाथी, घोड़ा, रथ आदि वाहनों के लिए स्थान होना चाहिए। राजगृह के कुछ दूर चारों ओर रक्षार्थ चार बाड़ बनवाये जायें, जिनमें पहली बाड़ गाड़ियों की, दूसरी बाड़ कांटेदार लताओं की, तीसरी बाड़ मजबूत

६३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

सालपरिक्षेपाः प्रथमे पुरस्तान्मन्त्रिपुरोहितौ, दक्षिणतः कोष्ठागारं महानसं च, वामतः कुप्यायुधागारम्, द्वितीये मौलभृतानां स्थानम्, अश्वरथानां, सेनापतेश्च। तृतीये हस्तिनः श्रेण्यः प्रशास्ता च। चतुर्थे विष्टिनायको मित्रामित्राटवीबलं स्वपुरुषाधिष्ठितम्। वणिजो रूपाजीवाश्चानुमहापथम्। बाह्यतो लुब्धकश्वगणिनः सत्यग्नयो गूढाश्चारक्षाः। (१) शत्रूणामापाते कूपकूटावपातकण्टकिनीश्च स्थापयेत्। अष्टादशवर्गाणारक्षविपर्यासं कारयेत्। दिवायामं च कारयेदपसर्पज्ञानार्थम्। (२) विवादसौरिकसमाजद्यूतवारणं च कारयेत्। मुद्रारक्षणं च। सेनानिवृत्तमायुधीयमशासनं शून्यपालोऽनुबध्नीयात्।

लकड़ी के खंभों की और चौड़ी बाड़ मजबूत चहार-दीवारी के ढंग की होनी चाहिए। प्रत्येक बाड़ का फासला सौ-सौ धनुष का होना चाहिए। पहली बाड़ के बीच में सामने की ओर मंत्रियों और पुरोहितों के स्थान बनवाने चाहिए। दाहिनी ओर भोजन-भंडार और रसोईघर होने चाहिए। बाँई ओर लोहा, ताँबा, लकड़ी आदि रखने की जगह और आयुधागार होने चाहिए। दूसरी बाड़ के बीच में मौलभृत आदि सेनाओं के स्थान और घोड़ों तथा सेनापति के स्थान होने चाहिए। इसी प्रकार बाड़ के तीसरे-घेरे में हाथियों, श्रेणीबल तथा प्रशास्ता (कंटकशोधन का अध्यक्ष) के स्थान होने चाहिए। बाड़ के चौथे घेरे में कर्मचारीवर्ग (विष्ट), नायक (दस सेनापतियों का प्रधान) और अपने विश्वस्त अधिकारी से संरक्षित मित्रसेना शत्रुसेना तथा आटविकसेना के स्थान बनवाये जाँय। व्यापारी और वेश्याओं के स्थान, बड़े बाजार (महापथ) में बनवाये जाँय। बहेलिये, शिकारी, बाजे तथा अग्नि आदि के इशारे से शत्रु के आगमन की सूचना देने वाले और ग्वाले आदि के वेष में रहने वाले रक्षकों को सबसे बाहर की ओर बसाया जाय।

(१) जिस मार्ग के शत्रु के आने की संभावना हो वहाँ कुएँ, गढे आदि खोदकर और लोहे की कीलों या काँटों से युक्त तख्तों को बिछाकर शत्रु को रोकने का प्रबन्ध किया जाय। हर समय पहरे के लिए अठारह वर्गों को बारी-बारी से नियुक्त किया जाय। शत्रु के गुप्तचरों का पता लगाने के लिए दिन-रात अपने आदमियों को घूमने के लिए नियुक्त करना चाहिए।

(२) आपसी झगड़ों, मदिरापान और जुआ आदि खेलने से सैनिकों को सर्वथा रोक लिया जाय। छावनी के भीतर-बाहर जाने-आने के लिए राजकीय मुहर का पास बनाया जाय। राजा की लिखित आज्ञापत्र के बिना युद्धभूमि से लौटने वाले सैनिकों को, शून्यपाल (राजधानी का रक्षण-अधिकारी) गिरफ्तार कर ले।

प्र० १४७ : अ० १ ] छावनी का निर्माण ६३९

(१) पुरस्तादध्वनः सम्यक्प्रशास्ता रक्षणानि च । यायाद्वर्द्धकिविष्टिभ्यामुदकानि च कारयेत् ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे स्कन्धावारनिवेशो नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितोऽष्टाविंशदुत्तरशततमः ।

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( १ ) प्रशास्ता ( कंटकशोधन-अधिकारी ) को चाहिए कि वह सेना और राजा के प्रस्थान करने से पहिले कारीगरों, मजदूरों तथा अध्यक्षों को साथ लेकर चला जाय और मार्गरक्षा का तथा आवश्यकतानुसार जल आदि का अच्छी तरह प्रबंध करे ।

इति सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में स्कन्धावारनिवेश नामक
पहला अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १४८-१४९स्कन्धावारप्रयाणां बलव्यसनाव-
अध्याय २स्कन्दकालरक्षणं च

(१) ग्रामारण्यानामध्वनि निवेशान् यवसेन्धनोदकवशेन परिसंख्याय स्थानासनगमनकालं च यात्रां यायात् । तत्प्रतीकारद्विगुणं भक्तोपकरणं वाहयेत् । अशक्तो वा सैन्येष्ववायोजयेत् । अन्तरेषु वा निचिनुयात् । (२) पुरस्तान्नायकः । मध्ये कलत्रं स्वामी च । पार्श्वयोरश्वा बाहूत्सारः । चक्रान्तेषु हस्तिनः । प्रसारवृद्धिर्वा सर्वतः । वनाजीवः प्रसारः । स्वदेशादन्वायतिर्वीवधः । मित्रबलमासारः । कलत्रस्थानमपसारः । पश्चात्सेनापतिः पर्यायान्निविशेत ।


छावनी का प्रमाण और आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा

( १ ) गावों, जंगलों तथा मार्गों में ठहरने योग्य स्थानों का घास, लकड़ी तथा जल आदि के अनुसार निर्णय कर और वहाँ पर पहुँचने, ठहरने, वहाँ से जाने आदि का पहिले ही से समय का निश्चय करके फिर विजिगीषु को यात्रा के लिए घर से निकलना चाहिए । उस यात्रा में खाने-पीने और पहनने ओढ़ने के लिए जितने समान की आवश्यकता हो, उससे दुगुना सामान साथ रखना चाहिए । यदि इतना सब सामान सवारियों पर ही न जा सके तो उसमें से थोड़ा-थोड़ा सैनिकों को दिया जाय । अथवा पड़ाव के लिए नियुक्त स्थानों से आवश्यक सामान को संग्रह करके साथ ले जाना चाहिए ।

( २ ) सेना के सबसे आगे दस सेनापतियों के प्रमुख नायक को चलना चाहिए, बीच में अन्तःपुर तथा राजा चले, अगल-बगल में भुजाओं से ही शत्रु के आघात को रोकने वाली घुड़सवारसेना चले, पिछले भाग में हाथी चलें, और अन्न, घास, भूसा आदि सब सामान चारों ओर से ले जाया जाय । जंगल में पैदा होने वाले अन्न, घास आदि आजीविका-योग्य वस्तुओं को प्रसार कहते हैं । अपने ही देश से अनाज आदि द्रव्यों के आयात को वीवध कहते हैं । मित्र की सेना को आसार कहा जाता है । रानियों के ठहरने के स्थान को अपसार कहते हैं । यात्राकाल में अपनी-अपनी सेना के सबसे पीछे सेनापति रहे ।

प्र० १४८-१४९ : अ० २ ] छावनी-सम्बन्धी विचार ६४१

(१) पुरस्तादभ्याघाते मकरेण यायात्, पश्चाच्छकटेन, पार्श्वयोर्वज्रेण, समन्ततः सर्वतोभद्रेण, एकायने सूच्या । (२) पथि द्वैधीभावे स्वभूमितो यायात् । अभूमिष्ठानां हि स्वभूमिष्ठा युद्धे प्रतिलोमा भवन्ति । योजनमधमा, अध्यर्धं मध्यमा, द्वियोजनमुत्तमा, संभाव्या वा गतिः । (३) आश्रयकारी, सम्पन्नघाती, पार्ष्णिरासारो मध्यम उदासीनो वा प्रतिकर्त्तव्यः, संकटो मार्गः शोधयितव्यः, कोशो दण्डो मित्रामित्राटवीबलं विष्टिरृतुश्च प्रतीक्ष्याः कृतदुर्गकर्मनिचयरक्षाक्षयः क्रीतबलनिर्वेदो मित्रबलनिर्वेदश्चागमिष्यति, उपजपिलारो वा नातित्वरयन्ति, शत्रुरभिप्रायं वा पूरयिष्यति इति शनैर्यायात् । विपर्यये शीघ्रम् ।


( १ ) यदि सामने की ओर से शत्रु के आक्रमण की आशंका हो तो 'मकराकार व्यूह' की रचना करके शत्रु की ओर बढ़ना चाहिए, यदि आक्रमण की पीछे से संभावना हो तो 'शकटव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए, यदि अगल-बगल से आक्रमण की संभावना हो तो 'चक्रव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए, और यदि चारों ओर से आक्रमण की संभावना हो तो 'सर्वतोभद्रव्यूह' बनाकर, यदि मार्ग इतना तंग हो कि उससे एक साथ न जाया जाय तो 'सूचीव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए ।

( २ ) यदि मार्ग में किसी प्रकार की द्विविधा हो तो उसी मार्ग से प्रस्थान करना चाहिए जिससे चतुरंगिनी सेना आसानी से जा सके, क्योंकि अनुकूल मार्ग से चलने वाले राजा पर प्रतिकूल मार्ग से चलने वाला राजा आक्रमण नहीं कर सकता है । प्रतिदिन एक योजन ( चार कोस ) चलना अधम गति है, डेढ़ योजन चलना मध्यम गति और दो योजन चलना उत्तम गति कहलाती है । अथवा सुविधानुसार प्रतिदिन जितना चला जा सके, उतना चलना चाहिए ।

( ३ ) विजिगीषु जब यह सोचे कि 'अपनी उन्नति के लिए मुझे किसी राजा को अपना आश्रय बनाना चाहिए, अथवा धनधान्य-सम्पन्न किसी शत्रुदल को नष्ट करना है, या पार्ष्णिग्राह, आसार, मध्यम और उदासीन राजा का प्रतीकार करना है, तो धीरे से यात्रा करे । ऊबड़-खावड़ मार्ग को साफ करने के लिए भी धीरे से ही यात्रा करे । अथवा जब कोष, अपनी सेना, मित्रसेना, शत्रुसेना, आटविक सेना, कारीगर और अपनी सेना के अनुकूल ऋतु की प्रतीक्षा करनी हो तो तब भी धीरे-धीरे यात्रा करे । अथवा जब यह संभावना हो कि शत्रु का दुर्ग बेमरम्मत है, उसका संगृहीत धान्य भी समाप्त प्राय है, उसके रक्षा-साधन भी विनष्ट हैं, धन देकर अपने वश में की हुई सेना भी उससे खिन्न है और मित्रसेना भी उससे विरक्त है, तो भी धीरे-धीरे यात्रा करे । अथवा जब समझे कि शत्रुद्रोही लोग अभी जल्दी में नहीं हैं,

४१ कौ०

६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

(१) हस्तिस्तम्भसंक्रमसेतुबन्धनौकाष्ठवेणुसंघातैः अलाबुचर्मकरण्ड-दृतिप्लवगण्डिकावेणिकाभिश्चोदकानि तारयेत् । (२) तीर्थाभिग्रहे हस्त्यश्वैरन्यतो रात्रावुत्तार्य सत्रं गृह्णीयात् । (३) अनुदके चक्रिचतुष्पदं चाध्वप्रमाणेने शक्त्योदकं वाहयेत् । (४) दीर्घकान्तारमनुदकं यवसेन्धनोदकहीनं वा कृच्छाध्वानमभियोग-प्रस्कन्नं क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तं पङ्कतोयगभीराणां वा नदीदरीशैलानामुच्चा-नापयाने व्यासक्तम् । एकायनमार्गं शैलविषमे सङ्कटे वा बहुलीभूतं निवेशे प्रस्थिते विसन्नाहं भोजनव्यासक्तम् । आयतगतपरिश्रान्तमवसुप्तं व्याधि-मरकदुर्भिक्षपीडितं व्याधितपत्त्यश्वद्विपमभूमिष्ठं वा बलव्यसनेषु वा स्वसैन्यं रक्षेत् । परसैन्यं चाभिहन्यात् ।


अथवा युद्ध के बिना ही शत्रु मेरे अभिप्राय को पूरा कर देगा, तब धीरे-धीरे यात्रा करे । इसके विपरीत अवस्थाओं में शीघ्रता से ही यात्रा करनी चाहिए ।

(१) यात्राकाल में हाथियों, लकड़ी के खंभों; झूलों, पुलों, नौकाओं, लकड़ी तथा बाँस के बेड़ों, तूंबियों, चर्मकाण्डों, चमड़े की तूंबियों, मोमजामा के तकियों, काग की लकड़ी के वेड़ों और मजबूत रस्सियों से सेनाओं को नदी पार उतारा जाय ।

(२) नदी के घाट यदि शत्रु के कब्जे में हों तो हाथी और घोड़ों के द्वारा रात में दूसरी ओर से बिना घाट के ही अपनी सेनाओं को पार उतार कर शत्रु के स्थानों पर कब्जा कर लेना चाहिए ।

(३) जिस प्रदेश से जल न हो वहाँ गाड़ी, बैल आदि चौपायों द्वारा पास में पर्याप्त जल रखकर मार्ग तय किया जाय ।

(४) विजिगीषु को चाहिए कि वह लम्बा रास्ता तय करने वाली तथा जंगलों से होकर सफर करने वाली अपनी सेना की भरसक रक्षा करे । मार्ग में जल न पाने वाली, धान, भूसा, ईंधन, लकड़ी आदि से हीन, कठिन मार्ग में चलनेवाली, लम्बे समय युद्ध में रहने के कारण खिन्न, भूख, प्यास तथा सफर के कारण बेचैन, भारी दलदल, गहरे पानी, नदी, गुफा तथा पर्वत आदि के पार करने एवं चढ़ने-उतरने में संलग्न, तंग रास्ते में, विषम स्थान में या पहाड़ी किलों में एकत्र, लम्बा सफर करने से थकी, नींद लेती हुई, ज्वर, महामारी तथा दुर्भिक्ष से पीडित, बीमार, पैदल-हाथी घोड़ों से युक्त, प्रतिकूल भूमि में ठहरी, सैनिक आपत्तियों से पस्त, आदि जितनी भी कठिनाइयाँ हैं उनमें विजिगीषु को अपनी सेना की रक्षा करनी चाहिए । साथ ही विजिगीषु को चाहिए कि उक्त अवस्थाओं को प्राप्त हुई शत्रु की सेना को नष्ट-भ्रष्ट कर डाले ।

प्र० १४८-१४९ : अ० २ ] छावनी-सम्बन्धी विचार ६४३

(१) एकायनमार्गप्रयातस्य सेनानिश्चारग्रासाहारशय्याप्रस्ताराग्नि-निधानध्वजायुधसंख्यानेन परबलज्ञानम् । तदात्मनो गूहयेत् । (२) पार्वतं वनदुर्गं वा सापसारप्रतिग्रहम् । स्वभूमौ पृष्ठतः कृत्वा युध्येत निविशेत च ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे स्कन्धावारप्रयाणं बलव्यसनावस्कन्दकालरक्षणं चेति द्वितीयोऽध्यायः; आदित एकोनत्रिंशदुत्तरशततमः ।

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(१) जब शत्रु एक ही जाने योग्य तंग रास्ते से जा रहा हो उस समय एक-एक करके जाते हुए सैनिकों की, उनकी सवारियों की, भोजन आदि सामग्री की, सोने के स्थान की, भोजन पकाने के चूल्हों की और अस्त्र-शस्त्रों की गिनती कर शत्रु-सेना की इयत्ता का पता लगा लेना चाहिए । अपनी सेना की इयत्ता का पता देने वाले साधनों को छिपा देना चाहिए या नष्ट कर देना चाहिए ।

(२) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपसार ( भागे हुए या पराजित के छिपने की जगह ) और प्रतिग्रह ( आक्रमण करती हुई शत्रुसेना को गिरफ्तार करने की जगह ) के युक्त पहाड़ी तथा जंगली दुर्ग अच्छी तरह तैयार करके और सर्वथा अनुकूल भूमि में ठहर कर युद्ध करे अथवा निश्चिन्त होकर निवास करे ।

साङ्ग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में दूसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १५०-१५२कूटयुद्धविकल्पाः, स्वसैन्योत्साहनं, स्वबलान्यबलव्यायोगश्च
अध्याय ३

(१) बलविशिष्टः कृतोपजापः प्रतिविहितर्तुः स्वभूम्यां प्रकाशयुद्धमुपेयात् विपर्यये कूटयुद्धम् । (२) बलव्यसनावस्कन्दकालेषु परमभिहन्यात् । अभूमिष्ठं वा स्वभूमिष्ठः । प्रकृतिप्रग्रहो वा स्वभूमिष्ठं दूष्यामित्र्राटवीबलैर्वा भङ्गं दत्त्वा विभूमिप्राप्तं हन्यात् । संहतानीकं हस्तिभिर्भेदयेत् । (३) पूर्वं भङ्गप्रदानेनानुप्रलीनं भिन्नमभिन्नं प्रतिनिवृत्य हन्यात् । पुरस्तादभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पृष्ठतो हस्त्यश्वेनाभिहन्यात् । पृष्ठतोऽभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पुरस्तात्सारबलेनाभिहन्यात् ।


कूटयुद्ध के भेद, अपनी सेना का प्रोत्साहन और अपनी तथा पराई सेना का प्रयोग

( १ ) बलवान् एवं बृहद् सेना से युक्त, शत्रुपक्ष को फोड़ने में समर्थ और युद्ध योग्य समय को अपने अनुकूल बनाने वाले विजिगीषु को चाहिए कि वह अपनी अनुकूल भूमि में ही प्रकाश-युद्ध करना स्वीकार करे । यदि इसके विपरीत व्यवस्था हो तो कूटयुद्ध ही करना चाहिए ।

( २ ) व्यसनापन्न सेना पर या लम्बे सफर, जंगल के सफर अथवा जलाभाव की अवस्था में शत्रु के ऊपर आक्रमण किया जाय । अथवा शत्रु की विरुद्ध स्थिति और अपनी अनुकूल स्थिति होने पर आक्रमण करे । अथवा शत्रु की अमात्य आदि प्रकृतियों को वश में करके तब आक्रमण किया जाय अथवा राजद्रोहियों, शत्रुओं और जांगलिकों को अपनी पराजय का विश्वास दिलाकर जब वे अपना स्थान छोड़ दें तब उन पर आक्रमण किया जाय । अनुकूल भूमि में एक स्थान पर ठहरी हुई शत्रु-सेना को हाथियों द्वारा छिन्न-भिन्न किया जाय ।

( ३ ) पूर्व पराजय के कारण तितर-बितर हुई शत्रु की सेना को विजिगीषु की एकत्र सेना लौट कर फिर मारे । सामने की ओर से आक्रमण करने के कारण तितर-बितर अथवा भागी हुई शत्रु सेना को पीछे की ओर से घुड़सवारों और हाथियों के द्वारा नष्ट करा दिया जाय । पीछे की ओर से आक्रमण करने के कारण छिन्न-भिन्न या उलटी भागी हुई शत्रु सेना को सामने की ओर से बहादुर सैनिकों के द्वारा नष्ट-भ्रष्ट करा दिया जाय ।

प्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग ६४५

(१) ताभ्यां पार्श्वाभिघातौ व्याख्यातौ । यतो वा दूष्यफल्गुबलं ततोऽभिहन्यात् । (२) पुरस्ताद्विषमायां पृष्ठतोऽभिहन्यात् । पृष्ठतो विषमायां पुरस्तादभिहन्यात् । पार्श्वतो विषमायामितरतोऽभिहन्यात् । (३) दूष्यामित्र्राटवीबलैर्वा पूर्वं योधयित्वा श्रान्तमश्रान्तः परमभिहन्यात् । दूष्यबलेन वा स्वयं भङ्गं दत्त्वा 'जितम्' इति विश्वस्तमविश्वस्तः सत्रापाश्रयोऽभिहन्यात् । सार्थव्रजस्कन्धावारसंवाहविलोप्रमत्तमप्रमत्तोऽभिहन्यात् । फल्गुबलावच्छन्नः सारबलो वा परवीराननुप्रविश्य हन्यात् । गोग्रहणेन श्वापदवधेन वा परवीरानाकृष्य सत्रच्छन्नोऽभिहन्यात् । (४) रात्राववस्कन्देन जागरयित्वाऽनिद्राक्लान्तानवसुप्तान् वा दिवा हन्यात् । सपादचर्मकोशैर्वा हस्तिभिः सौप्तिकं दद्यात् । अहः सन्नाहपरिश्रान्तानपराह्णेऽभिहन्यात् ।


( १ ) आगे-पीछे से किये गये आक्रमणों के अनुसार ही अगल-बगल से किये जाने वाले आक्रमणों के सम्बन्ध में भी जान लेना चाहिए । अथवा जिस ओर शत्रु की राजद्रोही या निर्बल सेना हो उसी ओर से आक्रमण करना चाहिए ।

( २ ) यदि सामने की ओर से आक्रमण करना अपने अनुकूल न हो तो पीछे की ओर से आक्रमण करना चाहिए और पीछे की ओर से असुविधा हो तो आगे की ओर से आक्रमण करना चाहिए । अगल-बगल के आक्रमण में जिस ओर से सुविधा हो उसी ओर से आक्रमण किया जाय ।

( ३ ) अथवा अपनी दूष्यसेना, शत्रुसेना तथा आटविक सेना के साथ शत्रु को लड़ाकर फिर विजिगीषु स्वयं ही उस पर आक्रमण करे । अथवा अपनी दूष्य सेना को लड़ाकर स्वयं को विजिगीषु पराजित करार दे और तब शत्रु का आश्रय लेकर उस पर धावा बोल दे जब शत्रु व्यापारी वर्ग, गायों के समूह तथा छावनियों की रक्षा में और उनको लुटता देख प्रमादी बना हुआ हो, तब उस पर आक्रमण किया जाय । अथवा बाहर की ओर अपनी निर्बल सेना को बांध कर और बीच में बहादुर सैनिकों को रख कर शत्रु की सेना को नष्ट-भ्रष्ट किया जाय । अथवा शत्रु-देश से गाय, आदि का अपहरण करने और व्याघ्र, वराह आदि का शिकार करने के बहाने शत्रु के वीर पुरुषों को प्रलोभन देकर सत्र में छिप कर मार डाला जाय ।

( ४ ) रात में लूट-मार, डाका-चोरी आदि के भय से शत्रु के सैनिकों को जगा-कर और फिर जब वे दिन में सोयें तो उन्हें मार डाला जाय । पैरों पर चमड़े का खोल पहनाये हुए हाथियों द्वारा सोते हुए सैनिकों पर आक्रमण किया जाय । कवायद करने के बाद थके हुए सैनिकों को दोपहर के बाद मरवा दिया जाय ।

६४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) शुष्कचर्मवृत्तशर्कराकोशकैर्गोमहिषोष्ट्रयूथैर्वा त्रस्नुभिरकृतहस्त्यश्वं भिन्नमभिन्नः प्रतिनिवृत्तं हन्यात् । प्रतिसूर्यवातं वा सर्वमभिहन्यात् । (२) धान्वनवनसङ्कटपङ्कशैलनिम्नविषमनावो गावः शकटव्यूहो नीहारो रात्रिरिति सत्राणि । (३) पूर्वे च प्रहरणकालाः कूटयुद्धहेतवः । (४) संग्रामस्तु निर्दिष्टदेशकालो धर्मिष्ठः । (५) संहत्य दण्डं ब्रूयात्—‘तुल्यवेतनॊऽस्मि, भवद्भिः सह भोग्यमिदं राज्यं, मयाभिहितः परोऽभिहन्तव्यः’ इति । वेदेष्वप्यनुश्रूयते समाप्तदक्षिणानां यज्ञानामवभृथेषु—‘सा ते गतिर्या शूराणाम्’ इति । अपीह श्लोकौ भवतः— (६) यान् यज्ञसंघैस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणः पात्रचयैश्च यान्ति । क्षणेन तामप्यतियान्ति शूराः प्राणान्सुयुद्धेषु परित्यजन्तः ॥


(१) सूखे चमड़े से बँधे हुए मिट्टी के छोटे-छोटे ढेलों से या घवड़ा जाने वाले गाय, भैंसों और ऊँटों के झुंडों के द्वारा हाथी-घोड़े रहित शत्रु की छिन्न-भिन्न हुई सेना को अपनी एकत्र सेना के द्वारा मरवा दिया जाय । सूर्य और हवा के सामने आयी हुई सभी तरह की सेना को नष्ट कर डालना चाहिए ।

(२) मरुस्थल का दुर्ग (धान्वन), जंगल का दुर्ग, कंटकाकीर्ण झाड़ियों वाले स्थान (संकट), दलदल भूमि, पहाड़ी इलाके, तराई क्षेत्र, ऊबड़-खाबड़ भूमि, नौकाएँ, गायों के झुंड, शकटव्यूह, कुहरा और रात्रि इन सब को सत्र कहा जाता है । इन स्थानों में छिप कर युद्ध करना चाहिए ।

(३) पूर्व प्रहार करने के समय और सत्र स्थान कूट युद्धों के कारण हुआ करते हैं ।

(४) यहाँ तक कूट युद्ध के विभिन्न प्रकारों का निरूपण किया गया ।

(५) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपनी संगठित सेना से कहे कि 'मैं भी आपके ही समान वेतनभोगी नौकर हूँ । आप लोगों के साथ ही मैं इस राज्य का उपयोग कर सकता हूँ । इसलिए जिसका मैं शत्रु बताऊँ वह आप लोगों के हाथों अवश्य मारा जाना चाहिए ।' इस प्रकार सेना को उत्साहित करना चाहिए । तदनंतर मन्त्रियों और पुरोहितों द्वारा सेना को यह कह कर उत्साहित कराये कि वेदों में ऐसा लिखा हुआ है कि यज्ञ, अनुष्ठान समाप्त हो जाने के बाद और दक्षिणा दिये जाने के बाद यजमान को जो फल मिलता है । वही फल युद्धक्षेत्र में वीरगति पाये हुए सैनिक को मिलता है । इसी सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों के दो श्लोक हैं कि—

(६) अनेक यज्ञों को करके, कठिन तप करके और अनेक सुपात्रों को दान

प्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग ६४७

(१) नवं शरावं सलिलस्य पूर्णं सुसंस्कृतं दर्भकृतोत्तरीयम् ।
तत्तस्य माभून्नरकं च गच्छेद्यो भर्तृपिण्डस्य कृते न युध्येत् ॥

(२) इति मन्त्रिपुरोहिताभ्यामुत्साहयेद्योधान् ।

(३) व्यूहसम्पदा कार्तान्तिकादिश्चास्य वर्गः सर्वज्ञदैवसंयोगख्यापनाभ्यां स्वपक्षमुद्धर्षयेत् । परपक्षं चोद्वेजयेत् । ‘श्वो युद्धम्’ इति कृतोपवासः शस्त्रवाहनं चानुशयीत । अथर्वभिश्च जुहुयात् । विजययुक्ताः स्वर्गीयाश्चाशिषो वाचयेत् । ब्राह्मणेभ्यश्चात्मानमतिसृजेत् ।

(४) शौर्यशिल्पाभिजानानुरागयुक्तमर्थमानाभ्यामविसंवादितमनीकगर्भं कुर्वीत । पितृपुत्रभ्रातृकाणामायुधीयानामध्वजं मुण्डानीकं राजस्थानम् । हस्ती रथो वा राजवाहनमश्वानुबन्धे । यत्प्रायः सैन्यो, यत्र वा विनीतः स्यात्, तदधिरोहयेत् । राजव्यञ्जनो व्यूहाधिष्ठानमायोज्यः ।


देकर ब्राह्मण लोग जिस उच्च गति को प्राप्त करते हैं, शूरवीर क्षत्रिय धर्मयुद्ध में प्राणोत्सर्ग करके उससे भी उच्च-गति को प्राप्त करते हैं ।

( १ ) ‘मन्त्रों से संस्कृत, जल से भरा हुआ और दर्भ से आच्छादित नई शराव का छलछलाता शकोरा उस व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता और वह नरक में जाता है, जो अपने स्वामी के लिए प्राणों की बाजी नहीं लगाता ।’

( २ ) इस प्रकार मंत्री और पुरोहितों के द्वारा सैनिकों को प्रोत्साहित किया जाय ।

( ३ ) विजिगीषु राजा के ज्योतिर्विद् एवं शकुनशास्त्री व्यक्तियों को चाहिए कि वे अलग-अलग व्यूहों की विशेष रचना द्वारा अपनी सर्वज्ञता को और दैव-साक्षात्कार होने की प्रसिद्धि को फैलाकर अपने पक्ष के सैनिकों को उत्साहित करते रहें तथा शत्रु के सैनिकों को बेचैन बनाये रखें । ‘कल युद्ध है’ ऐसा निश्चय हो जाने पर विजिगीषु को चाहिए कि उस दिन उपवास करता हुआ वह अपने रथ, हाथी, घोड़े आदि सवारियों के पास ही शयन करे, और अथर्ववेद में बताये गये शत्रु-ध्वंसक मंत्रों का जप तथा अनुष्ठान करता रहे । शत्रु के हार जाने पर अपनी विजय के अनुकूल और अपने ही सैनिकों की वीरगति प्राप्त होने पर ब्राह्मणों से स्वर्गीय आशीर्वादों का वाचन कराये । अपनी रक्षा के लिए स्वयं को वह ब्राह्मणों को अर्पण कर दे ।

( ४ ) बहादुर, कारीगर, खानदानी तथा अनुरक्त और धन, मान आदि से सदा अनुकूल बनाई गई सेना को अपनी बड़ी सेना में रक्षा के निमित्त नियुक्त किया जाना चाहिए । राजा के पिता, पुत्र, भाई आदि अन्तरंग संबंधियों के निवास स्थान को और राजा के अङ्गरक्षक तथा प्रच्छन्न वेष धारण किये प्रधान सेना के निवास-स्थान को राजा के निवास स्थान के समीप ही टिकाया जाय । राजा हाथी या रथ

६४८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दसवां अधिकरण

(१) सूतमागधाः शूराणां स्वर्गमस्वर्गं भीरूणां जातिसङ्घकुलकर्मवृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः । पुरोहितपुरुषाः कृत्याभिचारं ब्रूयुः । सत्रिकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्वकर्मसिद्धिमसिद्धिं परेषाम् ।

(२) सेनापतिरर्थमानाभ्यामभिसंस्कृतमनीकमाभाषेत—'शतसाहस्रो राजवधः । पञ्चाशतसाहस्रः सेनापतिकुमारवधः । दशसाहस्रः प्रवीरमुख्यवधः । पञ्चसाहस्रो हस्तिरथवधः । साहस्रोऽश्ववधः । शत्यः पत्तिमुख्यवधः । शिरो विंशतिकम् । भोगद्वैगुण्यं स्वयंग्राहश्चेति । तदेषां दशवर्गाधिपतयो विद्युः ।


पर सवार होकर चले और उसकी रक्षा के लिए साथ में अश्वारोही सैनिक हों । अथवा जिन सवारियों पर प्रायः सेना चल रही हो उसी प्रकार की सवारी में या जिस सवारी में चढ़ने का राजा का अच्छा अभ्यास हो, उसमें चढ़कर चले । व्यूहरचना का अधिष्ठाता किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाय, जो राजा से अविकल रूप में मिलता-जुलता हो ।

(१) सूतों ( ऐतिहासिक गाथाओं के गायकों ) और मागधों ( स्तुतिवाचकों ) को चाहिए कि वे—शूर-वीर सैनिकों को स्वर्ग, कायरों को नरक और अन्य जाति संघी ( बटालियनों ) को उनके कुल, कर्म, शील, स्वभाव तथा व्यवहार के अनुसार ओजोमयी उत्साहवर्धक वाणी सुनाकर स्तुतिगान करें । पुरोहितों को चाहिए कि वे अथर्ववेद में निर्दिष्ट शत्रुनाशक कृत्याभिचार का अनुष्ठान करें । सत्री, बढ़ई और ज्योतिषियों को चाहिए कि वे सदा ही अपने कार्यों की सिद्धि और शत्रुकार्यों की असफलता के सम्बन्ध में प्रचार करते रहें ।

(२) युद्ध के लिए तैयार, धन-सत्कार से संवर्द्धित सेना को ललकार कर सेनापति यों कहे, 'आप लोगों में से जो भी सैनिक शत्रुराजा को मार डालेगा उसे एक लाख स्वर्णमुद्राएँ पुरस्कार में दी जायेंगी । जो सैनिक शत्रु के सेनापति या राजकुमार को मार डालेगा, उसे पचास हजार स्वर्णमुद्रायें इनाम में दी जायेंगी । इस प्रकार शत्रु के वीर सैनिकों में से मुख्य सैनिकों को मारने वाले को दस हजार, हाथी तथा रथों को नष्ट करने वाले को पाँच हजार, घुड़सवारों को नष्ट करने वाले को एक हजार, पैदल सेना के मुख्य सैनिकों को नष्ट करने वाले को एक सौ और साधारण सिपाही का शिर काट कर लाने वाले को बीस स्वर्ण मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी । इसके अतिरिक्त युद्ध में भाग लेने वाले प्रत्येक सैनिक का वेतन, भत्ता दुगुना कर दिया जायेगा और शत्रु के यहाँ से लूट-पाट में मिला हुआ सारा माल भी उन्हें ही दिया जायेगा ।' इस प्रकार बताये गये राजवध का समाचार केवल पदिक सेनापति और नायक ही जान पायें ।

प्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग [ ६४९

(१) चिकित्सकाः शस्त्रयन्त्रागदस्नेहवस्त्रहस्ताः, स्त्रियश्चान्नपानरक्षिण्यः पुरुषाणामुद्धर्षणीयाः पृष्ठतस्तिष्ठेयुः । (२) अदक्षिणामुखं पृष्ठतः सूर्यमनुलोमवातमनीकं स्वभूमौ व्यूहेत । परभूमिव्यूहे चाश्वांश्चारयेयुः । (३) यत्र स्थानं प्रजवश्चाभूमि व्यूहस्य, तत्र स्थितः प्रजवितश्चोभयथा जीयेत । विपर्यये जयति । उभयथा स्थाने प्रजवे च । (४) समा विषमा व्यामिश्रा वा भूमिरिति । पुरस्तात्पार्श्वाभ्यां पश्चाच्च ज्ञेया । समायां दण्डमण्डलव्यूहाः, विषमायां भोगसंहतव्यूहाः । व्यामिश्रायां विषमव्यूहाः । (५) विशिष्टबलं भङ्क्त्वा सन्धि याचेत । समबलेन याचितः सन्दधीत । हीनमनुहन्यात् । न त्वेव स्वभूमिप्राप्तं त्यक्तात्मानं वा ।


( १ ) सैनिकों के स्वास्थ्य-संरक्षण और मनोविनोद के लिए चिकित्सक, काटने के औजार, चिमटी, दवाई, घी, तेल, मरहम-पट्टी, सहचिकित्सक, खाने-पीने की सामग्री और सैनिकों को प्रसन्न करने वाली स्त्रियाँ, इन सबको युद्धभूमि के लिये प्रस्थान करते समय सेना के पिछले हिस्से में रखा जाय ।

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि युद्धकाल में अमंगल-सूचक दक्षिण दिशा की ओर सैनिकों का मुँह करके खड़ा न करे । इस बात पर पूरा ध्यान दिया जाय कि सूर्य की किरणें सेना के पीठ पीछे और वायु का रुख अनुकूल हो, इस प्रकार व्यूह-रचना करके सैनिकों को खड़ा किया जाय । यदि युद्ध भूमि शत्रु के अनुकूल हो और वहीं पर विजिगीषु को भी व्यूह-रचना करनी पड़े, तो विजिगीषु को चाहिए कि वह घोड़े दौड़ा कर शत्रु के मोर्चे को विघटित कर दे ।

( ३ ) जिस स्थान पर ठहर कर विजिगीषु बहुत दिनों तक कार्य करता ही रह जाय या समयाभाव में जल्दी ही कार्य को करता हुआ, दोनों ही परिस्थितियों में, वहाँ पर अवश्य ही वह शत्रु द्वारा मारा जाता है ।

( ४ ) व्यूहभूमि तीन प्रकार की होती है, १. सम २. विषम और ३. व्यामिश्र । व्यूह-रचना के आगे, पीछे या बगल में, कहीं भी सम भूमि का होना आवश्यक है । इसी प्रकार विषम भूमि के संबंध में भी समझना चाहिए । तीनों प्रकार की उक्त समभूमि में दण्डाकार सेना की स्थापना ( दण्ड व्यूह ) और गोलाकार सेना की स्थापना ( मंडल व्यूह ) की जाय । इसी प्रकार तीनों तरह की विषम भूमि में भोग-व्यूह और संहत व्यूह की रचना की जाय । तीनों प्रकार की व्यामिश्र भूमि में विषमव्यूहों की रचना की जाय ।

( ५ ) विजिगीषु को चाहिए कि पहले वह अधिक शक्तिशाली शत्रु की सेना को